श्रीमद्भागवत महापुराण चतुर्थ स्कन्ध भाग 4 — अध्याय 24–31, रुद्रगीत, पुरञ्जन कथा और प्रचेता उपदेश

भक्ति भावना • पुराण साहित्य

श्रीमद्भागवत महापुराण

चतुर्थ स्कन्ध • भाग ४ • अध्याय २४–३१

४२९ मूल श्लोक • प्रत्येक श्लोक का सरल हिंदी भावार्थ

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शिव का भगवत्स्तवन और जीवननगर का रहस्य

प्रचेताओं को शिव रुद्रगीत का उपदेश देते हैं। दूसरी ओर नारद प्राचीनबर्हि को पुरञ्जन की कथा सुनाकर शरीर, बुद्धि, इन्द्रियों, काल और आत्मा का सम्बन्ध समझाते हैं। अन्त में प्रचेताओं को भगवान के दर्शन और नारद से सर्वभूतदया, सन्तोष तथा निष्काम भक्ति की शिक्षा मिलती है।

अध्याय 24–31 के सभी 429 श्लोक और प्रत्येक का स्वतंत्र सरल हिंदी भावार्थ यहाँ हैं। यह चतुर्थ स्कन्ध का अंतिम भाग है; चारों भागों में सभी 31 अध्याय और चुने आधार-पाठ के 1445 श्लोक पूर्ण होते हैं। रुद्रगीत की स्तुति अध्याय 24 के श्लोक 33–68 में है।

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चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 24

प्रचेता–शिव मिलन और रुद्रगीत

श्लोक 24.1

मैत्रेय उवाच । विजिताश्वोऽधिराजाऽऽसीत्पृथुपुत्रः पृथुश्रवाः । यवीयोभ्योऽददात्काष्ठा भ्रातृभ्यो भ्रातृवत्सलः ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—पृथु के यशस्वी पुत्र विजिताश्व सम्राट बने। भाइयों से स्नेह रखने के कारण उन्होंने छोटे भाइयों को अलग दिशाओं का शासन दिया।

श्लोक 24.2

हर्यक्षायादिशत्प्राचीं धूम्रकेशाय दक्षिणाम् । प्रतीचीं वृकसंज्ञाय तुर्यां द्रविणसे विभुः ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: हर्यक्ष को पूर्व, धूम्रकेश को दक्षिण, वृक को पश्चिम और द्रविण को उत्तर दिशा सौंपी।

श्लोक 24.3

अन्तर्धानगतिं शक्राल्लब्ध्वान्तर्धानसंज्ञितः । अपत्यत्रयमाधत्त शिखण्डिन्यां सुसम्मतम् ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: इन्द्र से अदृश्य होने की विद्या पाकर वे अन्तर्धान कहलाए। उनकी पत्नी शिखण्डिनी से तीन सम्मानित पुत्र हुए।

श्लोक 24.4

पावकः पवमानश्च शुचिरित्यग्नयः पुरा । वसिष्ठशापादुत्पन्नाः पुनर्योगगतिं गताः ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: वे पावक, पवमान और शुचि थे, जो पहले अग्निदेवता थे। वसिष्ठ के शाप से मनुष्यरूप में आए और बाद में फिर योग से अपना दिव्य पद पाया।

श्लोक 24.5

अन्तर्धानो नभस्वत्यां हविर्धानमविन्दत । य इन्द्रमश्वहर्तारं विद्वानपि न जघ्निवान् ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: अन्तर्धान और नभस्वती से हविर्धान उत्पन्न हुए। अन्तर्धान वही थे जिन्होंने घोड़ा चुराने वाले इन्द्र को पहचानकर भी उनका वध नहीं किया था।

श्लोक 24.6

राज्ञां वृत्तिं करादानदण्डशुल्कादिदारुणाम् । मन्यमानो दीर्घसत्त्रव्याजेन विससर्ज ह ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: कर लेना, दण्ड देना और शुल्क वसूलना आदि राजकार्य उन्हें कठोर लगे। उन्होंने दीर्घ यज्ञ की दीक्षा के बहाने शासनभार छोड़ दिया।

श्लोक 24.7

तत्रापि हंसं पुरुषं परमात्मानमात्मदृक् । यजंस्तल्लोकतामाप कुशलेन समाधिना ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: उस यज्ञ में भी आत्मज्ञानी होकर उन्होंने हंसरूप परम पुरुष की आराधना की और स्थिर समाधि से उनका लोक प्राप्त किया।

श्लोक 24.8

हविर्धानाद्धविर्धानी विदुरासूत षट् सुतान् । बर्हिषदं गयं शुक्लं कृष्णं सत्यं जितव्रतम् ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: विदुर, हविर्धान की पत्नी हविर्धानी से बर्हिषद, गय, शुक्ल, कृष्ण, सत्य और जितव्रत नामक छह पुत्र हुए।

श्लोक 24.9

बर्हिषत्सुमहाभागो हाविर्धानिः प्रजापतिः । क्रियाकाण्डेषु निष्णातो योगेषु च कुरूद्वह ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: हविर्धान के पुत्र बर्हिषद बड़े पुण्यवान प्रजापति थे। वे वैदिक कर्मकाण्ड और योग दोनों में निपुण थे।

श्लोक 24.10

यस्येदं देवयजनमनुयज्ञं वितन्वतः । प्राचीनाग्रैः कुशैरासीदास्तृतं वसुधातलम् ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनके लगातार यज्ञ करने से भूमि पूर्वमुखी नोक वाले कुशों से ढक गई; इसी कारण वे प्राचीनबर्हि कहलाए।

श्लोक 24.11

सामुद्रीं देवदेवोक्तामुपयेमे शतद्रुतिम् । यां वीक्ष्य चारुसर्वाङ्गीं किशोरीं सुष्ठ्वलङ्कृताम् । परिक्रमन्तीमुद्वाहे चकमेऽग्निः शुकीमिव ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मा के निर्देश से उन्होंने समुद्र की पुत्री शतद्रुति से विवाह किया। विवाह में परिक्रमा करती सुन्दर अलङ्कृत किशोरी को देखकर अग्नि भी आकर्षित हुए, जैसे पहले शुकी से हुए थे।

श्लोक 24.12

विबुधासुरगन्धर्वमुनिसिद्धनरोरगाः । विजिताः सूर्यया दिक्षु क्वणयन्त्यैव नूपुरैः ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: उस नववधू के नूपुरों की मधुर ध्वनि ने दिशाओं में देव, असुर, गन्धर्व, मुनि, सिद्ध, मनुष्य और नागों का मन मोह लिया।

श्लोक 24.13

प्राचीनबर्हिषः पुत्राः शतद्रुत्यां दशाभवन् । तुल्यनामव्रताः सर्वे धर्मस्नाताः प्रचेतसः ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्राचीनबर्हि और शतद्रुति के दस पुत्र हुए। समान नाम, व्रत और धर्माचरण वाले वे सब प्रचेता कहलाए।

श्लोक 24.14

पित्राऽऽदिष्टाः प्रजासर्गे तपसेऽर्णवमाविशन् । दशवर्षसहस्राणि तपसाऽऽर्चंस्तपस्पतिम् ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: पिता ने उन्हें सन्तानविस्तार का कार्य दिया। वे समुद्र में तप करने गए और कथा के अनुसार दस हजार वर्ष तप के अधिपति भगवान की आराधना की।

श्लोक 24.15

यदुक्तं पथि दृष्टेन गिरिशेन प्रसीदता । तद्ध्यायन्तो जपन्तश्च पूजयन्तश्च संयताः ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: मार्ग में प्रसन्न शिव ने उन्हें जो उपदेश दिया था, उसका ध्यान, जप और पूजन करते हुए वे संयम में रहे।

श्लोक 24.16

विदुर उवाच । प्रचेतसां गिरित्रेण यथाऽऽसीत्पथि सङ्गमः । यदुताह हरः प्रीतस्तन्नो ब्रह्मन् वदार्थवत् ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: विदुर ने पूछा—प्रचेताओं का मार्ग में शिव से मिलन कैसे हुआ और प्रसन्न हर ने उन्हें क्या सार्थक उपदेश दिया?

श्लोक 24.17

सङ्गमः खलु विप्रर्षे शिवेनेह शरीरिणाम् । दुर्लभो मुनयो दध्युरसङ्गाद्यमभीप्सितम् ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: ऋषिवर, देहधारियों के लिए शिव का ऐसा मिलन दुर्लभ है। अनासक्त मुनि भी उनके इच्छित दर्शन के लिए ध्यान करते हैं।

श्लोक 24.18

आत्मारामोऽपि यस्त्वस्य लोककल्पस्य राधसे । शक्त्या युक्तो विचरति घोरया भगवान् भवः ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: वे आत्माराम हैं, फिर भी लोकव्यवस्था के कल्याण के लिए अपनी प्रचण्ड शक्ति सहित विचरण करते हैं।

श्लोक 24.19

मैत्रेय उवाच । प्रचेतसः पितुर्वाक्यं शिरसाऽऽदाय साधवः । दिशं प्रतीचीं प्रययुस्तपस्यादृतचेतसः ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—सज्जन प्रचेताओं ने पिता की आज्ञा शिरोधार्य की और तप में आदरयुक्त होकर पश्चिम दिशा की ओर चले।

श्लोक 24.20

समुद्रमुप विस्तीर्णमपश्यन् सुमहत्सरः । महन्मन इव स्वच्छं प्रसन्नसलिलाशयम् ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: समुद्र के पास उन्होंने एक बहुत बड़ा सरोवर देखा। उसका जल महात्मा के मन की तरह स्वच्छ और प्रसन्न था।

श्लोक 24.21

नीलरक्तोत्पलाम्भोजकह्लारेन्दीवराकरम् । हंससारसचक्राह्वकारण्डवनिकूजितम् ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: उसमें नीले–लाल उत्पल, कमल, कह्लार और इन्दीवर खिले थे; हंस, सारस, चकवे और कारण्डव मधुर ध्वनि कर रहे थे।

श्लोक 24.22

मत्तभ्रमरसौस्वर्यहृष्टरोमलताङ्घ्रिपम् । पद्मकोशरजो दिक्षु विक्षिपत्पवनोत्सवम् ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: भ्रमरों की सुरीली गुंजार से लताएँ और वृक्ष मानो रोमाञ्चित थे। वायु कमलों का पराग चारों दिशाओं में बिखेर रही थी।

श्लोक 24.23

तत्र गान्धर्वमाकर्ण्य दिव्यमार्गमनोहरम् । विसिस्म्यू राजपुत्रास्ते मृदङ्गपणवाद्यनु ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ मृदङ्ग और पणव के साथ दिव्य पद्धति का मनोहर संगीत सुनकर राजकुमार आश्चर्य में पड़ गए।

श्लोक 24.24

तर्ह्येव सरसस्तस्मान्निष्क्रामन्तं सहानुगम् । उपगीयमानममरप्रवरं विबुधानुगैः ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: उसी समय उन्होंने सरोवर से अनुचरों सहित देवश्रेष्ठ शिव को निकलते देखा; दिव्यजन उनका यश गा रहे थे।

श्लोक 24.25

तप्तहेमनिकायाभं शितिकण्ठं त्रिलोचनम् । प्रसादसुमुखं वीक्ष्य प्रणेमुर्जातकौतुकाः ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनकी कान्ति तपे सोने जैसी, कण्ठ नीला, तीन नेत्र और मुख प्रसन्न था। कौतूहल और श्रद्धा से राजकुमारों ने उन्हें प्रणाम किया।

श्लोक 24.26

स तान् प्रपन्नार्तिहरो भगवान् धर्मवत्सलः । धर्मज्ञान् शीलसम्पन्नान् प्रीतः प्रीतानुवाच ह ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: शरणागतों का दुःख हरने वाले और धर्मप्रिय भगवान ने उन धर्मज्ञ, शीलवान तथा प्रसन्न राजकुमारों से प्रेमपूर्वक कहा।

श्लोक 24.27

रुद्र उवाच । यूयं वेदिषदः पुत्रा विदितं वश्चिकीर्षितम् । अनुग्रहाय भद्रं व एवं मे दर्शनं कृतम् ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: रुद्र बोले—तुम प्राचीनबर्हि के पुत्र हो। तुम्हारा उद्देश्य मुझे ज्ञात है। तुम्हारा कल्याण हो; कृपा करने के लिए मैंने तुम्हें दर्शन दिया है।

श्लोक 24.28

यः परं रंहसः साक्षात्त्रिगुणाज्जीवसंज्ञितात् । भगवन्तं वासुदेवं प्रपन्नः स प्रियो हि मे ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो गुणमयी प्रकृति और जीव की सीमित स्थिति से परे भगवान वासुदेव की शरण लेता है, वह मुझे प्रिय है।

श्लोक 24.29

स्वधर्मनिष्ठः शतजन्मभिः पुमान् विरिञ्चतामेति ततः परं हि माम् । अव्याकृतं भागवतोऽथ वैष्णवं पदं यथाहं विबुधाः कलात्यये ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: अपने धर्म में निष्ठावान मनुष्य अनेक जन्मों की उन्नति से ब्रह्मपद और फिर मेरा पद पाता है; भगवान का भक्त उससे भी परे वैष्णव पद पाता है, जहाँ कल्पान्त में मैं और अन्य देवता भी जाते हैं।

श्लोक 24.30

अथ भागवता यूयं प्रियाः स्थ भगवान् यथा । न मद्भागवतानां च प्रेयानन्योऽस्ति कर्हिचित् ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: तुम भगवद्भक्त हो, इसलिए मुझे भगवान की तरह प्रिय हो। मेरे और भगवान के भक्तों के लिए भगवान तथा उनके भक्तों से अधिक प्रिय कोई नहीं।

श्लोक 24.31

इदं विविक्तं जप्तव्यं पवित्रं मङ्गलं परम् । निःश्रेयसकरं चापि श्रूयतां तद्वदामि वः ॥ ३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: अब अत्यन्त पवित्र, मंगलमय और परम कल्याणकारी यह एकान्तभजन योग्य स्तोत्र सुनो; मैं तुम्हें बताता हूँ।

श्लोक 24.32

मैत्रेय उवाच । इत्यनुक्रोशहृदयो भगवानाह ताञ्छिवः । बद्धाञ्जलीन् राजपुत्रान् नारायणपरो वचः ॥ ३२॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—नारायणपरायण और करुणामय शिव ने हाथ जोड़े खड़े राजकुमारों को यह उपदेश दिया।

श्लोक 24.33

रुद्र उवाच । जितं त आत्मविद्धुर्यस्वस्तये स्वस्तिरस्तु मे । भवता राधसा राद्धं सर्वस्मा आत्मने नमः ॥ ३३॥

सरल हिंदी भावार्थ: रुद्र बोले—आत्मज्ञानियों का कल्याण करने वाले प्रभु, आपकी जय हो। आपका उत्कर्ष मेरा भी कल्याण करे। सर्वात्मा आपको प्रणाम है।

श्लोक 24.34

नमः पङ्कजनाभाय भूतसूक्ष्मेन्द्रियात्मने । वासुदेवाय शान्ताय कूटस्थाय स्वरोचिषे ॥ ३४॥

सरल हिंदी भावार्थ: कमलनाभ, सूक्ष्म भूतों और इन्द्रियों के आधार, शान्त, अविकारी और स्वप्रकाश वासुदेव को नमस्कार है।

श्लोक 24.35

सङ्कर्षणाय सूक्ष्माय दुरन्तायान्तकाय च । नमो विश्वप्रबोधाय प्रद्युम्नायान्तरात्मने ॥ ३५॥

सरल हिंदी भावार्थ: सूक्ष्म, असीम और संहारकारी सङ्कर्षण को प्रणाम; विश्व को जाग्रत करने वाले अन्तरात्मा प्रद्युम्न को नमस्कार है।

श्लोक 24.36

नमो नमोऽनिरुद्धाय हृषीकेशेन्द्रियात्मने । नमः परमहंसाय पूर्णाय निभृतात्मने ॥ ३६॥

सरल हिंदी भावार्थ: इन्द्रियों के नियन्ता और आधार अनिरुद्ध को बार–बार नमस्कार; पूर्ण, शान्तचित्त परम हंसस्वरूप को प्रणाम है।

श्लोक 24.37

स्वर्गापवर्गद्वाराय नित्यं शुचिषदे नमः । नमो हिरण्यवीर्याय चातुर्होत्राय तन्तवे ॥ ३७॥

सरल हिंदी भावार्थ: स्वर्ग और मुक्ति के द्वार, पवित्र अन्तःकरण में नित्य स्थित प्रभु को नमस्कार। स्वर्णमय तेज और चार प्रधान पुरोहितकर्मों से सम्पन्न यज्ञ के विस्ताररूप को प्रणाम है।

श्लोक 24.38

नम ऊर्ज इषे त्रय्याः पतये यज्ञरेतसे । तृप्तिदाय च जीवानां नमः सर्वरसात्मने ॥ ३८॥

सरल हिंदी भावार्थ: बल, अन्न, वेदत्रयी के स्वामी और यज्ञ के मूल कारण आपको नमस्कार। प्राणियों को तृप्ति देने वाले तथा सब रसों के आत्मा को प्रणाम है।

श्लोक 24.39

सर्वसत्त्वात्मदेहाय विशेषाय स्थवीयसे । नमस्त्रैलोक्यपालाय सह ओजो बलाय च ॥ ३९॥

सरल हिंदी भावार्थ: सभी प्राणियों के देहरूप, स्थूल विराट विशेषरूप, त्रिलोकी के पालक और सहनशक्ति, ओज तथा बल के आधार को नमस्कार है।

श्लोक 24.40

अर्थलिङ्गाय नभसे नमोऽन्तर्बहिरात्मने । नमः पुण्याय लोकाय अमुष्मै भूरिवर्चसे ॥ ४०॥

सरल हिंदी भावार्थ: शब्द और अर्थ के बोध का माध्यम आकाशरूप तथा भीतर–बाहर व्यापक आत्मा को प्रणाम। पुण्यमय, प्रकाशमान दिव्यलोक के स्वरूप को नमस्कार है।

श्लोक 24.41

प्रवृत्ताय निवृत्ताय पितृदेवाय कर्मणे । नमोऽधर्मविपाकाय मृत्यवे दुःखदाय च ॥ ४१॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्रवृत्ति और निवृत्ति कर्मों, पितृदेवता तथा कर्मव्यवस्था के आधार को प्रणाम। अधर्म का दुःखद परिणाम देने वाली मृत्युरूप शक्ति को भी नमस्कार है।

श्लोक 24.42

नमस्त आशिषामीश मनवे कारणात्मने । नमो धर्माय बृहते कृष्णायाकुण्ठमेधसे । पुरुषाय पुराणाय साङ्ख्ययोगेश्वराय च ॥ ४२॥

सरल हिंदी भावार्थ: आशीर्वादों के स्वामी, मनु, जगत के कारण, महान धर्म, अविकुण्ठित बुद्धि वाले कृष्ण, पुरातन पुरुष और साङ्ख्य–योग के ईश्वर को प्रणाम है।

श्लोक 24.43

शक्तित्रयसमेताय मीढुषेऽहङ्कृतात्मने । चेत आकूतिरूपाय नमो वाचो विभूतये ॥ ४३॥

सरल हिंदी भावार्थ: ज्ञान, क्रिया और द्रव्य की शक्तियों से युक्त, अहंकारतत्त्व, चित्त और सङ्कल्प के रूप में कार्य करने वाले तथा वाणी की विभूति को नमस्कार है।

श्लोक 24.44

दर्शनं नो दिदृक्षूणां देहि भागवतार्चितम् । रूपं प्रियतमं स्वानां सर्वेन्द्रियगुणाञ्जनम् ॥ ४४॥

सरल हिंदी भावार्थ: हमें अपना वह भक्तपूजित रूप दिखाइए, जो आपके प्रियजनों को सबसे प्रिय और सभी इन्द्रियों को पूर्ण तृप्त करने वाला है।

श्लोक 24.45

स्निग्धप्रावृट् घनश्यामं सर्वसौन्दर्यसङ्ग्रहम् । चार्वायतचतुर्बाहुं सुजातरुचिराननम् ॥ ४५॥

सरल हिंदी भावार्थ: वह वर्षा के चिकने मेघ जैसा श्याम, समस्त सौन्दर्य का सङ्ग्रह, चार सुन्दर लम्बी भुजाओं और मनोहर मुख वाला है।

श्लोक 24.46

पद्मकोशपलाशाक्षं सुन्दरभ्रू सुनासिकम् । सुद्विजं सुकपोलास्यं समकर्णविभूषणम् ॥ ४६॥

सरल हिंदी भावार्थ: कमलदल जैसे नेत्र, सुन्दर भौहें, नासिका, दाँत, कपोल और मुख तथा दोनों कानों में समान सुशोभित आभूषण हैं।

श्लोक 24.47

प्रीतिप्रहसितापाङ्गमलकैरुपशोभितम् । लसत्पङ्कजकिञ्जल्कदुकूलं मृष्टकुण्डलम् ॥ ४७॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्रेमपूर्ण मुस्कान और कटाक्ष, सुन्दर अलकें, कमलकेसर जैसे पीले रेशमी वस्त्र और चमकते कुण्डल उसकी शोभा हैं।

श्लोक 24.48

स्फुरत्किरीटवलयहारनूपुरमेखलम् । शङ्खचक्रगदापद्ममालामण्युत्तमर्द्धिमत् ॥ ४८॥

सरल हिंदी भावार्थ: किरीट, कङ्कण, हार, नूपुर और करधनी चमकते हैं; शङ्ख, चक्र, गदा, कमल, वनमाला और श्रेष्ठ मणि से वह ऐश्वर्यमय है।

श्लोक 24.49

सिंहस्कन्धत्विषो बिभ्रत्सौभगग्रीवकौस्तुभम् । श्रियानपायिन्या क्षिप्तनिकषाश्मोरसोल्लसत् ॥ ४९॥

सरल हिंदी भावार्थ: सिंह जैसे पुष्ट कन्धे, सुन्दर ग्रीवा और कौस्तुभमणि हैं। स्थायी लक्ष्मी से श्याम कसौटी जैसी छाती पर अद्भुत शोभा झलकती है।

श्लोक 24.50

पूररेचकसंविग्नवलिवल्गुदलोदरम् । प्रतिसङ्क्रामयद्विश्वं नाभ्याऽऽवर्तगभीरया ॥ ५०॥

सरल हिंदी भावार्थ: श्वास के आने–जाने से उदर की सुन्दर वलियाँ हिलती हैं। गहरी भँवर जैसी नाभि मानो विश्व को अपने में समेटती है।

श्लोक 24.51

श्यामश्रोण्यधिरोचिष्णु दुकूलस्वर्णमेखलम् । समचार्वङ्घ्रिजङ्घोरुनिम्नजानुसुदर्शनम् ॥ ५१॥

सरल हिंदी भावार्थ: श्याम कटिभाग पर चमकते पीतवस्त्र और स्वर्णकरधनी हैं; सम, सुन्दर चरण, पिण्डलियाँ, जाँघें और घुटने अनुपम हैं।

श्लोक 24.52

पदा शरत्पद्मपलाशरोचिषा नखद्युभिर्नोऽन्तरघं विधुन्वता । प्रदर्शय स्वीयमपास्तसाध्वसं पदं गुरो मार्गगुरुस्तमोजुषाम् ॥ ५२॥

सरल हिंदी भावार्थ: शरदकमल जैसे चरणों और उनके नखप्रकाश से हमारे भीतर का पाप मिटाइए। अज्ञान में पड़े जीवों के मार्गदर्शक गुरु, भयहर अपना चरणपद दिखाइए।

श्लोक 24.53

एतद्रूपमनुध्येयमात्मशुद्धिमभीप्सताम् । यद्भक्तियोगोभयदः स्वधर्ममनुतिष्ठताम् ॥ ५३॥

सरल हिंदी भावार्थ: आत्मशुद्धि चाहने वालों को इस रूप का ध्यान करना चाहिए। अपने कर्तव्य निभाने वालों का भक्तियोग उन्हें अभय और कल्याण देता है।

श्लोक 24.54

भवान् भक्तिमता लभ्यो दुर्लभः सर्वदेहिनाम् । स्वाराज्यस्याप्यभिमत एकान्तेनात्मविद्गतिः ॥ ५४॥

सरल हिंदी भावार्थ: आप समस्त देहधारियों के लिए दुर्लभ हैं, पर भक्त के लिए सुलभ। आप आत्मज्ञानी की परम गति और आत्मराज्य से भी अधिक प्रिय हैं।

श्लोक 24.55

तं दुराराध्यमाराध्य सतामपि दुरापया । एकान्तभक्त्या को वाञ्छेत्पादमूलं विना बहिः ॥ ५५॥

सरल हिंदी भावार्थ: संतों के लिए भी दुर्लभ अनन्य भक्ति से आपको प्रसन्न करके कौन आपके चरणों के अतिरिक्त किसी बाहरी वस्तु की इच्छा करेगा?

श्लोक 24.56

यत्र निर्विष्टमरणं कृतान्तो नाभिमन्यते । विश्वं विध्वंसयन् वीर्यशौर्यविस्फूर्जितभ्रुवा ॥ ५६॥

सरल हिंदी भावार्थ: आपके चरणों में शरण पाए को मृत्यु भी वश में नहीं कर सकती, यद्यपि वह अपने प्रचण्ड भ्रूभङ्ग से समस्त विश्व का विनाश करती है।

श्लोक 24.57

क्षणार्धेनापि तुलये न स्वर्गं नापुनर्भवम् । भगवत्सङ्गिसङ्गस्य मर्त्यानां किमुताशिषः ॥ ५७॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान के भक्त का आधे क्षण का सङ्ग भी स्वर्ग और मुक्ति से तुलना योग्य नहीं; फिर नश्वर सांसारिक वरदानों की क्या बात!

श्लोक 24.58

अथानघाङ्घ्रेस्तव कीर्तितीर्थयो- रन्तर्बहिः स्नानविधूतपाप्मनाम् । भूतेष्वनुक्रोशसुसत्त्वशीलिनां स्यात्सङ्गमोऽनुग्रह एष नस्तव ॥ ५८॥

सरल हिंदी भावार्थ: आपके यशरूपी तीर्थ में भीतर–बाहर स्नान करके शुद्ध हुए, प्राणियों पर करुणा और निर्मल आचरण रखने वाले भक्तों का सङ्ग मिले—हम पर आपकी यही कृपा हो।

श्लोक 24.59

न यस्य चित्तं बहिरर्थविभ्रमं तमोगुहायां च विशुद्धमाविशत् । यद्भक्तियोगानुगृहीतमञ्जसा मुनिर्विचष्टे ननु तत्र ते गतिम् ॥ ५९॥

सरल हिंदी भावार्थ: भक्तियोग से अनुगृहीत मुनि का चित्त बाहरी विषयभ्रम और अज्ञान की गुफा में नहीं जाता। उसी निर्मल चित्त में वह आपके स्वरूप को स्पष्ट देखता है।

श्लोक 24.60

यत्रेदं व्यज्यते विश्वं विश्वस्मिन्नवभाति यत् । तत्त्वं ब्रह्म परञ्ज्योतिराकाशमिव विस्तृतम् ॥ ६०॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिसमें यह विश्व प्रकट होता है और जो विश्व में प्रकाशित है, वही आप आकाश की तरह व्यापक परम ज्योति ब्रह्म हैं।

श्लोक 24.61

यो माययेदं पुरुरूपयासृज- द्बिभर्ति भूयः क्षपयत्यविक्रियः । यद्भेदबुद्धिः सदिवात्मदुःस्थया तमात्मतन्त्रं भगवन् प्रतीमहि ॥ ६१॥

सरल हिंदी भावार्थ: आप अविकारी रहते हुए विविधरूप माया से जगत रचते, पालते और समेटते हैं। दुर्बल चित्त की भेदबुद्धि इसे अलग सत्य मानती है; हम आपको स्वतन्त्र परमात्मा जानते हैं।

श्लोक 24.62

क्रियाकलापैरिदमेव योगिनः श्रद्धान्विताः साधु यजन्ति सिद्धये । भूतेन्द्रियान्तःकरणोपलक्षितं वेदे च तन्त्रे च त एव कोविदाः ॥ ६२॥

सरल हिंदी भावार्थ: श्रद्धालु साधक सिद्धि के लिए भूत, इन्द्रिय और अन्तःकरण में प्रकट आपके इसी स्वरूप की विधिपूर्वक पूजा करते हैं; वही वेद और तन्त्र का मर्म समझते हैं।

श्लोक 24.63

त्वमेक आद्यः पुरुषः सुप्तशक्ति- स्तया रजःसत्त्वतमो विभिद्यते । महानहं खं मरुदग्निवार्धराः सुरर्षयो भूतगणा इदं यतः ॥ ६३॥

सरल हिंदी भावार्थ: आप अकेले आदिपुरुष हैं, जिनकी शक्ति पहले अव्यक्त रहती है। उससे सत्त्व, रज और तम के भेद तथा महत्तत्त्व, अहंकार, आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, देव, ऋषि और जीवसमूह उत्पन्न होते हैं।

श्लोक 24.64

सृष्टं स्वशक्त्येदमनुप्रविष्ट- श्चतुर्विधं पुरमात्मांशकेन । अथो विदुस्तं पुरुषं सन्तमन्त- र्भुङ्क्ते हृषीकैर्मधु सारघं यः ॥ ६४॥

सरल हिंदी भावार्थ: अपनी शक्ति से चार प्रकार के शरीर रचकर आप जीवांश के साथ उनमें प्रवेश करते हैं। भीतर स्थित पुरुष इन्द्रियों से विषयों का आस्वाद लेता है, जैसे मधुमक्खी मधु लेती है।

श्लोक 24.65

स एष लोकानतिचण्डवेगो विकर्षसि त्वं खलु कालयानः । भूतानि भूतैरनुमेयतत्त्वो घनावलीर्वायुरिवाविषह्यः ॥ ६५॥

सरल हिंदी भावार्थ: कालरूप से आप अत्यन्त तीव्र गति से लोकों और प्राणियों को दूसरे प्राणियों के द्वारा नष्ट करते हैं, जैसे प्रबल वायु मेघसमूह बिखेरती है; आपके प्रभाव से आपका तत्त्व अनुमानित होता है।

श्लोक 24.66

प्रमत्तमुच्चैरितिकृत्यचिन्तया प्रवृद्धलोभं विषयेषु लालसम् । त्वमप्रमत्तः सहसाभिपद्यसे क्षुल्लेलिहानोऽहिरिवाखुमन्तकः ॥ ६६॥

सरल हिंदी भावार्थ: कर्तव्यों की अन्तहीन चिन्ता, बढ़े लोभ और विषयलालसा में असावधान जीव को सावधान काल अचानक पकड़ लेता है, जैसे जीभ लपलपाता सर्प चूहे को।

श्लोक 24.67

कस्त्वत्पदाब्जं विजहाति पण्डितो यस्तेऽवमानव्ययमानकेतनः । विशङ्कयास्मद्गुरुरर्चति स्म यद्- विनोपपत्तिं मनवश्चतुर्दश ॥ ६७॥

सरल हिंदी भावार्थ: कौन ज्ञानी आपके चरण छोड़ेगा, जहाँ अहंकार और मान का नाश होता है? हमारे गुरु ब्रह्मा और चौदह मनु भी आशंका से बचने के लिए निष्कपट भाव से उनकी पूजा करते हैं।

श्लोक 24.68

अथ त्वमसि नो ब्रह्मन् परमात्मन् विपश्चिताम् । विश्वं रुद्रभयध्वस्तमकुतश्चिद्भया गतिः ॥ ६८॥

सरल हिंदी भावार्थ: परमात्मन्, आप ही ज्ञानियों का परम ब्रह्म और निर्भय आश्रय हैं। रुद्र के प्रलयभय से विचलित विश्व की अन्तिम गति भी आप हैं।

श्लोक 24.69

इदं जपत भद्रं वो विशुद्धा नृपनन्दनाः । स्वधर्ममनुतिष्ठन्तो भगवत्यर्पिताशयाः ॥ ६९॥

सरल हिंदी भावार्थ: राजकुमारो, शुद्ध होकर, अपने कर्तव्य निभाते हुए और मन भगवान को अर्पित करके इसका जप करो; तुम्हारा कल्याण हो।

श्लोक 24.70

तमेवात्मानमात्मस्थं सर्वभूतेष्ववस्थितम् । पूजयध्वं गृणन्तश्च ध्यायन्तश्चासकृद्धरिम् ॥ ७०॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्हीं अन्तरात्मा हरि को अपने भीतर और सभी प्राणियों में स्थित जानकर बार–बार ध्यान, गुणगान और पूजा करो।

श्लोक 24.71

योगादेशमुपासाद्य धारयन्तो मुनिव्रताः । समाहितधियः सर्व एतदभ्यसतादृताः ॥ ७१॥

सरल हिंदी भावार्थ: इस योगोपदेश को ग्रहण करके मुनियों का संयम अपनाओ और एकाग्र बुद्धि से सब मिलकर श्रद्धापूर्वक अभ्यास करो।

श्लोक 24.72

इदमाह पुरास्माकं भगवान् विश्वसृक्पतिः । भृग्वादीनामात्मजानां सिसृक्षुः संसिसृक्षताम् ॥ ७२॥

सरल हिंदी भावार्थ: पहले सृष्टि का विस्तार करने की इच्छा से ब्रह्मा ने हम भृगु आदि पुत्रों को यह उपदेश दिया था, जो सन्तानविस्तार में लगने वाले थे।

श्लोक 24.73

ते वयं नोदिताः सर्वे प्रजासर्गे प्रजेश्वराः । अनेन ध्वस्ततमसः सिसृक्ष्मो विविधाः प्रजाः ॥ ७३॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्रजासृष्टि की प्रेरणा पाकर हम सब प्रजापतियों ने इससे अज्ञान दूर किया और विविध प्रजाएँ उत्पन्न कीं।

श्लोक 24.74

अथेदं नित्यदा युक्तो जपन्नवहितः पुमान् । अचिराच्छ्रेय आप्नोति वासुदेवपरायणः ॥ ७४॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो वासुदेवपरायण मनुष्य सावधान और एकाग्र होकर नित्य इसका जप करता है, वह शीघ्र कल्याण पाता है।

श्लोक 24.75

श्रेयसामिह सर्वेषां ज्ञानं निःश्रेयसं परम् । सुखं तरति दुष्पारं ज्ञाननौर्व्यसनार्णवम् ॥ ७५॥

सरल हिंदी भावार्थ: समस्त कल्याणों में आत्मज्ञान परम कल्याण है। ज्ञानरूपी नौका कठिन दुःखसागर को सहज पार करा देती है।

श्लोक 24.76

य इमं श्रद्धया युक्तो मद्गीतं भगवत्स्तवम् । अधीयानो दुराराध्यं हरिमाराधयत्यसौ ॥ ७६॥

सरल हिंदी भावार्थ: मेरे गाए इस भगवत्स्तोत्र का श्रद्धा से अध्ययन करने वाला दुर्लभ आराध्य हरि को प्रसन्न करता है।

श्लोक 24.77

विन्दते पुरुषोऽमुष्माद्यद्यदिच्छत्यसत्वरम् । मद्गीतगीतात्सुप्रीताच्छ्रेयसामेकवल्लभात् ॥ ७७॥

सरल हिंदी भावार्थ: इस स्तोत्र से प्रसन्न, समस्त कल्याण के परम आश्रय भगवान से साधक अपने योग्य अभिलषित कल्याण पाता है।

श्लोक 24.78

इदं यः कल्य उत्थाय प्राञ्जलिः श्रद्धयान्वितः । श‍ृणुयाच्छ्रावयेन्मर्त्यो मुच्यते कर्मबन्धनैः ॥ ७८॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो प्रातः उठकर हाथ जोड़ और श्रद्धा से इसे सुनता अथवा सुनाता है, वह कर्मबन्धनों से मुक्त होता है।

श्लोक 24.79

गीतं मयेदं नरदेवनन्दनाः परस्य पुंसः परमात्मनः स्तवम् । जपन्त एकाग्रधियस्तपो मह- च्चरध्वमन्ते तत आप्स्यथेप्सितम् ॥ ७९॥

सरल हिंदी भावार्थ: राजकुमारो, मैंने परम पुरुष परमात्मा की यह स्तुति गाई है। एकाग्र मन से इसका जप करते हुए महान तप करो; अन्त में अभिलषित परम फल पाओगे।

॥ चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 24 समाप्त ॥

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चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 25

नारद का उपदेश और पुरञ्जन की नवद्वार नगरी

श्लोक 25.1

मैत्रेय उवाच । इति सन्दिश्य भगवान् बार्हिषदैरभिपूजितः । पश्यतां राजपुत्राणां तत्रैवान्तर्दधे हरः ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—प्रचेताओं को ऐसा उपदेश देकर और उनकी पूजा स्वीकार करके शिव उन्हीं के देखते वहाँ अन्तर्धान हो गए।

श्लोक 25.2

रुद्रगीतं भगवतः स्तोत्रं सर्वे प्रचेतसः । जपन्तस्ते तपस्तेपुर्वर्षाणामयुतं जले ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: सभी प्रचेता रुद्रगीत नामक भगवत्स्तोत्र का जप करते हुए जल में दस हजार वर्ष तप करते रहे, ऐसा कथा में कहा गया है।

श्लोक 25.3

प्राचीनबर्हिषं क्षत्तः कर्मस्वासक्तमानसम् । नारदोऽध्यात्मतत्त्वज्ञः कृपालुः प्रत्यबोधयत् ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: विदुर, उधर कर्मकाण्ड में आसक्त प्राचीनबर्हि को अध्यात्मतत्त्वज्ञ और करुणामय नारद ने समझाया।

श्लोक 25.4

श्रेयस्त्वं कतमद्राजन् कर्मणाऽऽत्मन ईहसे । दुःखहानिः सुखावाप्तिः श्रेयस्तन्नेह चेष्यते ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने पूछा—राजन्, इन कर्मों से तुम अपना कौन सा कल्याण चाहते हो? सच्चा कल्याण दुःख की निवृत्ति और स्थायी सुख है; वह केवल इस कर्मप्रवृत्ति में दिखाई नहीं देता।

श्लोक 25.5

राजोवाच । न जानामि महाभाग परं कर्मापविद्धधीः । ब्रूहि मे विमलं ज्ञानं येन मुच्येय कर्मभिः ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: राजा बोले—महाभाग, कर्मों में अटकी बुद्धि से मैं परम कल्याण नहीं जानता। मुझे निर्मल ज्ञान दीजिए जिससे कर्मबन्धन से मुक्त हो सकूँ।

श्लोक 25.6

गृहेषु कूटधर्मेषु पुत्रदारधनार्थधीः । न परं विन्दते मूढो भ्राम्यन् संसारवर्त्मसु ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: पुत्र, पत्नी और धन को ही लक्ष्य बनाकर दिखावटी गृहधर्म में फँसा मूढ़ व्यक्ति संसार में भटकता है और परम तत्त्व नहीं पाता।

श्लोक 25.7

नारद उवाच । भो भोः प्रजापते राजन् पशून् पश्य त्वयाध्वरे । संज्ञापिताञ्जीवसङ्घान् निर्घृणेन सहस्रशः ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: नारद बोले—प्रजापालक राजन्, देखो, तुम्हारे यज्ञों में निर्दयता से हजारों जीवों का वध हुआ है।

श्लोक 25.8

एते त्वां सम्प्रतीक्षन्ते स्मरन्तो वैशसं तव । सम्परेतमयःकूटैश्छिन्दन्त्युत्थितमन्यवः ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: वे तुम्हारी हिंसा याद करके प्रतीक्षा कर रहे हैं; परलोक में क्रुद्ध होकर तुम्हें लोहे जैसे कठोर प्रहारों से पीड़ित करेंगे। यह हिंसक कर्म के प्रतिफल का पौराणिक चेतावनीरूप चित्रण है।

श्लोक 25.9

अत्र ते कथयिष्येऽमुमितिहासं पुरातनम् । पुरञ्जनस्य चरितं निबोध गदतो मम ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: अब मैं तुम्हें पुरञ्जन का प्राचीन इतिहास सुनाता हूँ। ध्यान से उसकी कथा समझो।

श्लोक 25.10

आसीत्पुरञ्जनो नाम राजा राजन् बृहच्छ्रवाः । तस्याविज्ञातनामाऽऽसीत्सखाविज्ञातचेष्टितः ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: राजन्, पुरञ्जन नाम का एक प्रसिद्ध राजा था। उसका एक मित्र था जिसका नाम और आचरण किसी को पूरी तरह ज्ञात नहीं था।

श्लोक 25.11

सोऽन्वेषमाणः शरणं बभ्राम पृथिवीं प्रभुः । नानुरूपं यदाविन्ददभूत्स विमना इव ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: अपने योग्य निवास खोजते हुए वह पृथ्वी पर घूमता रहा। जब मन के अनुकूल आश्रय नहीं मिला तो उदास हुआ।

श्लोक 25.12

न साधु मेने ताः सर्वा भूतले यावतीः पुरः । कामान् कामयमानोऽसौ तस्य तस्योपपत्तये ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: विविध भोगों की पूर्ति चाहने के कारण उसे पृथ्वी की कोई नगरी पर्याप्त अच्छी नहीं लगती थी।

श्लोक 25.13

स एकदा हिमवतो दक्षिणेष्वथ सानुषु । ददर्श नवभिर्द्वार्भिः पुरं लक्षितलक्षणाम् ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: एक दिन हिमालय की दक्षिणी ढलान पर उसने नौ द्वारों वाली सुन्दर लक्षणों से युक्त नगरी देखी।

श्लोक 25.14

प्राकारोपवनाट्टालपरिखैरक्षतोरणैः । स्वर्णरौप्यायसैः श‍ृङ्गैः सङ्कुलां सर्वतो गृहैः ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: उसमें प्राकार, उपवन, अटारियाँ, खाइयाँ, झरोखे और तोरण थे; स्वर्ण, चाँदी और लोहे के शिखरों वाले घर भरे थे।

श्लोक 25.15

नीलस्फटिकवैदूर्यमुक्तामरकतारुणैः । कॢप्तहर्म्यस्थलीं दीप्तां श्रिया भोगवतीमिव ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: नीलम, स्फटिक, वैदूर्य, मोती, पन्ने और लाल रत्नों से बने महल उस नगरी को भोगवती जैसी समृद्ध शोभा देते थे।

श्लोक 25.16

सभाचत्वररथ्याभिराक्रीडायतनापणैः । चैत्यध्वजपताकाभिर्युक्तां विद्रुमवेदिभिः ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: सभा, चौराहे, गलियाँ, खेलस्थल, बाजार, पूजास्थल, ध्वज–पताकाएँ और मूँगे की वेदियाँ उसे सुशोभित करती थीं।

श्लोक 25.17

पुर्यास्तु बाह्योपवने दिव्यद्रुमलताकुले । नदद्विहङ्गालिकुलकोलाहलजलाशये ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: नगरी के बाहर दिव्य वृक्षों और लताओं वाला उपवन था; उसके जलाशय पक्षियों और भ्रमरों के कलरव से गूँजते थे।

श्लोक 25.18

हिमनिर्झरविप्रुष्मत्कुसुमाकरवायुना । चलत्प्रवालविटपनलिनीतटसम्पदि ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: शीतल झरनों के जलकणों से युक्त वसन्तवायु कोमल पत्तों, शाखाओं और कमलिनी के तटों को हिला रही थी।

श्लोक 25.19

नानारण्यमृगव्रातैरनाबाधे मुनिव्रतैः । आहूतं मन्यते पान्थो यत्र कोकिलकूजितैः ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: अनेक वन्यजीव मुनियों की तरह शान्त और उपद्रवरहित थे। कोयल की पुकार से पथिक को लगता मानो कोई स्वागत कर रहा हो।

श्लोक 25.20

यदृच्छयाऽऽगतां तत्र ददर्श प्रमदोत्तमाम् । भृत्यैर्दशभिरायान्तीमेकैकशतनायकैः ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ राजा ने संयोग से एक सुन्दर युवती देखी। उसके साथ दस सेवक थे और प्रत्येक के अधीन सौ सहायक थे।

श्लोक 25.21

पञ्चशीर्षाहिना गुप्तां प्रतीहारेण सर्वतः । अन्वेषमाणामृषभमप्रौढां कामरूपिणीम् ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: उसकी रक्षा पाँच सिर वाला सर्प प्रहरी की तरह कर रहा था। वह नवयुवती अपनी इच्छा का रूप धारण करती और योग्य पति खोजती थी।

श्लोक 25.22

सुनासां सुदतीं बालां सुकपोलां वराननाम् । समविन्यस्तकर्णाभ्यां बिभ्रतीं कुण्डलश्रियम् ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: उसकी नासिका, दाँत, कपोल और मुख सुन्दर थे; दोनों कानों में समान रूप से शोभित कुण्डल थे।

श्लोक 25.23

पिशङ्गनीवीं सुश्रोणीं श्यामां कनकमेखलाम् । पद्भ्यां क्वणद्भ्यां चलतीं नूपुरैर्देवतामिव ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: पीले वस्त्र, सुन्दर कटि और स्वर्णकरधनी धारण किए वह नूपुरों की झंकार के साथ देवी जैसी चल रही थी।

श्लोक 25.24

स्तनौ व्यञ्जितकैशोरौ समवृत्तौ निरन्तरौ । वस्त्रान्तेन निगूहन्तीं व्रीडया गजगामिनीम् ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: यौवन प्रकट होने पर वह लज्जा से वस्त्र सँभाल रही थी और हाथिनी जैसी मन्द गम्भीर चाल से चलती थी।

श्लोक 25.25

तामाह ललितं वीरः सव्रीडस्मितशोभनाम् । स्निग्धेनापाङ्गपुङ्खेन स्पृष्टः प्रेमोद्भ्रमद्भ्रुवा ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: उसकी संकोचभरी मुस्कान और स्नेहपूर्ण कटाक्ष से आकृष्ट राजा ने प्रेमपूर्ण मधुर वाणी में पूछा।

श्लोक 25.26

का त्वं कञ्जपलाशाक्षि कस्यासीह कुतः सति । इमामुप पुरीं भीरु किं चिकीर्षसि शंस मे ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: कमलनयनी, तुम कौन हो, किसकी पुत्री हो और कहाँ से आई हो? इस नगरी के पास तुम्हारा क्या उद्देश्य है?

श्लोक 25.27

क एतेऽनुपथा ये त एकादश महाभटाः । एता वा ललनाः सुभ्रु कोऽयं तेऽहिः पुरःसरः ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: तुम्हारे पीछे आने वाले ये ग्यारह वीर कौन हैं? ये स्त्रियाँ कौन हैं और आगे चलने वाला यह सर्प कौन है?

श्लोक 25.28

त्वं ह्रीर्भवान्यस्यथवाग्रमा पतिं विचिन्वती किं मुनिवद्रहो वने । त्वदङ्घ्रिकामाप्तसमस्तकामं क्व पद्मकोशः पतितः कराग्रात् ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: क्या तुम ह्री, पार्वती, सरस्वती या लक्ष्मी हो, जो एकान्त वन में योग्य पति खोज रही हो? यदि लक्ष्मी हो तो तुम्हारे हाथ का कमल कहाँ है?

श्लोक 25.29

नासां वरोर्वन्यतमा भुविस्पृक् पुरीमिमां वीरवरेण साकम् । अर्हस्यलङ्कर्तुमदभ्रकर्मणा लोकं परं श्रीरिव यज्ञपुंसा ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: तुम्हारे चरण पृथ्वी को छूते हैं, इसलिए इन देवियों में से नहीं लगतीं। जैसे लक्ष्मी भगवान के साथ दिव्यलोक को सुशोभित करती हैं, वैसे मेरे साथ इस नगरी को सुशोभित करो।

श्लोक 25.30

यदेष मापाङ्गविखण्डितेन्द्रियं सव्रीडभावस्मितविभ्रमद्भ्रुवा । त्वयोपसृष्टो भगवान् मनोभवः प्रबाधतेऽथानुगृहाण शोभने ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: तुम्हारे लज्जामय हास और कटाक्ष ने मेरी इन्द्रियों को विचलित कर दिया है। तुम्हारे कारण जागी कामना मुझे व्याकुल कर रही है; मुझ पर कृपा करो।

श्लोक 25.31

त्वदाननं सुभ्रु सुतारलोचनं व्यालम्बि नीलालकवृन्दसंवृतम् । उन्नीय मे दर्शय वल्गु वाचकं यद्व्रीडया नाभिमुखं शुचिस्मिते ॥ ३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: सुन्दर भौंहों और मधुर वाणी वाली, लज्जा से झुका अपना मुख उठाकर मुझे दिखाओ; वह नीली अलकों और चमकते नेत्रों से सुशोभित है।

श्लोक 25.32

नारद उवाच । इत्थं पुरञ्जनं नारी याचमानमधीरवत् । अभ्यनन्दत तं वीरं हसन्ती वीरमोहिता ॥ ३२॥

सरल हिंदी भावार्थ: नारद ने कहा—इस प्रकार अधीर होकर प्रार्थना करने वाले वीर पुरञ्जन से वह युवती भी आकर्षित हुई और मुस्कराकर बोली।

श्लोक 25.33

न विदाम वयं सम्यक्कर्तारं पुरुषर्षभ । आत्मनश्च परस्यापि गोत्रं नाम च यत्कृतम् ॥ ३३॥

सरल हिंदी भावार्थ: पुरुषश्रेष्ठ, हम अपने या दूसरे के स्रष्टा को नहीं जानते; अपने कुल, नाम और उत्पत्ति का पूरा ज्ञान भी नहीं है।

श्लोक 25.34

इहाद्य सन्तमात्मानं विदाम न ततः परम् । येनेयं निर्मिता वीर पुरी शरणमात्मनः ॥ ३४॥

सरल हिंदी भावार्थ: हम इतना ही जानते हैं कि इस समय यहाँ मौजूद हैं। यह आश्रयनगरी किसने बनाई, उससे आगे का ज्ञान हमें नहीं।

श्लोक 25.35

एते सखायः सख्यो मे नरा नार्यश्च मानद । सुप्तायां मयि जागर्ति नागोऽयं पालयन् पुरीम् ॥ ३५॥

सरल हिंदी भावार्थ: ये पुरुष और स्त्रियाँ मेरे साथी हैं। मेरे सोने पर यह सर्प जागता रहता और नगरी की रक्षा करता है।

श्लोक 25.36

दिष्ट्याऽऽगतोऽसि भद्रं ते ग्राम्यान् कामानभीप्ससे । उद्वहिष्यामि तांस्तेऽहं स्वबन्धुभिररिन्दम ॥ ३६॥

सरल हिंदी भावार्थ: तुम सौभाग्य से आए हो; तुम्हारा मंगल हो। तुम सांसारिक सुख चाहते हो, मैं अपने साथियों सहित उन्हें तुम्हारे लिए जुटाऊँगी।

श्लोक 25.37

इमां त्वमधितिष्ठस्व पुरीं नवमुखीं विभो । मयोपनीतान् गृह्णानः कामभोगान् शतं समाः ॥ ३७॥

सरल हिंदी भावार्थ: मेरे प्रस्तुत किए विषयभोग ग्रहण करते हुए इस नौ द्वारों की नगरी में सौ वर्ष निवास करो।

श्लोक 25.38

कं नु त्वदन्यं रमये ह्यरतिज्ञमकोविदम् । असम्परायाभिमुखमश्वस्तनविदं पशुम् ॥ ३८॥

सरल हिंदी भावार्थ: तुम्हारे अतिरिक्त मैं किसे स्वीकार करूँ? ऐसे व्यक्ति को क्यों चुनूँ जो प्रेमसुख और लोकव्यवहार न जाने, न भविष्य की चिन्ता करे और न परलोक का विचार रखे?

श्लोक 25.39

धर्मो ह्यत्रार्थकामौ च प्रजानन्दोऽमृतं यशः । लोका विशोका विरजा यान्न केवलिनो विदुः ॥ ३९॥

सरल हिंदी भावार्थ: इस गृहस्थजीवन में धर्म, अर्थ, काम, सन्तानानन्द, यश और शोकमुक्त शुभ लोकों की उपलब्धि कही गई है, जिन्हें केवल त्याग का आग्रह रखने वाले नहीं समझते। यह युवती का गृहस्थपक्ष है।

श्लोक 25.40

पितृदेवर्षिमर्त्यानां भूतानामात्मनश्च ह । क्षेम्यं वदन्ति शरणं भवेऽस्मिन् यद्गृहाश्रमः ॥ ४०॥

सरल हिंदी भावार्थ: पितरों, देवताओं, ऋषियों, मनुष्यों, प्राणियों और अपने लिए भी गृहस्थाश्रम को इस जगत का हितकारी आश्रय कहा जाता है।

श्लोक 25.41

का नाम वीर विख्यातं वदान्यं प्रियदर्शनम् । न वृणीत प्रियं प्राप्तं मादृशी त्वादृशं पतिम् ॥ ४१॥

सरल हिंदी भावार्थ: मेरे जैसी कौन स्त्री तुम्हारे जैसे प्रसिद्ध, उदार और प्रियदर्शन वीर को पति के रूप में न चुनेगी, जो स्वयं सामने आया हो?

श्लोक 25.42

कस्या मनस्ते भुवि भोगिभोगयोः स्त्रिया न सज्जेद्भुजयोर्महाभुज । योऽनाथवर्गाधिमलं घृणोद्धत- स्मितावलोकेन चरत्यपोहितुम् ॥ ४२॥

सरल हिंदी भावार्थ: तुम दीनों का दुःख करुणामय मुस्कान और दृष्टि से दूर करते हो; तुम्हारी समर्थ भुजाओं का आश्रय कौन नहीं चाहेगा?

श्लोक 25.43

नारद उवाच । इति तौ दम्पती तत्र समुद्य समयं मिथः । तां प्रविश्य पुरीं राजन् मुमुदाते शतं समाः ॥ ४३॥

सरल हिंदी भावार्थ: नारद ने कहा—ऐसा परस्पर सम्बन्ध निश्चित करके दोनों उस नगरी में गए और सौ वर्ष सुख भोगते रहे।

श्लोक 25.44

उपगीयमानो ललितं तत्र तत्र च गायकैः । क्रीडन् परिवृतः स्त्रीभिर्ह्रदिनीमाविशच्छुचौ ॥ ४४॥

सरल हिंदी भावार्थ: राजा स्थान–स्थान पर गायकों के मधुर गीत सुनता, स्त्रियों से घिरा क्रीड़ा करता और गर्मी में शीतल नदी में प्रवेश करता था।

श्लोक 25.45

सप्तोपरि कृता द्वारः पुरस्तस्यास्तु द्वे अधः । पृथग्विषयगत्यर्थं तस्यां यः कश्चनेश्वरः ॥ ४५॥

सरल हिंदी भावार्थ: उस नगरी के सात द्वार ऊपर और दो नीचे थे। उनका स्वामी अलग–अलग विषयों तक पहुँचने के लिए उन द्वारों का उपयोग करता था।

श्लोक 25.46

पञ्चद्वारस्तु पौरस्त्या दक्षिणैका तथोत्तरा । पश्चिमे द्वे अमूषां ते नामानि नृप वर्णये ॥ ४६॥

सरल हिंदी भावार्थ: पाँच द्वार पूर्व, एक दक्षिण, एक उत्तर और दो पश्चिम में थे। राजन्, अब उनके नाम सुनो।

श्लोक 25.47

खद्योऽऽताविर्मुखी च प्राग्द्वारावेकत्र निर्मिते । विभ्राजितं जनपदं याति ताभ्यां द्युमत्सखः ॥ ४७॥

सरल हिंदी भावार्थ: पूर्व में साथ बने खद्योता और आविर्मुखी द्वारों से वह द्युमान मित्र के साथ विभ्राजित नामक प्रदेश में जाता था।

श्लोक 25.48

नलिनी नालिनी च प्राग्द्वारावेकत्र निर्मिते । अवधूतसखस्ताभ्यां विषयं याति सौरभम् ॥ ४८॥

सरल हिंदी भावार्थ: पूर्व के ही नलिनी और नालिनी द्वारों से अवधूत मित्र के साथ सौरभ नामक विषयप्रदेश में जाता था।

श्लोक 25.49

मुख्या नाम पुरस्ताद्द्वास्तयाऽऽपणबहूदनौ । विषयौ याति पुरराड्रसज्ञविपणान्वितः ॥ ४९॥

सरल हिंदी भावार्थ: पूर्व का मुख्य द्वार मुख्या कहलाता था। उससे रसज्ञ और विपण के साथ आपण तथा बहूदन प्रदेशों में जाता था।

श्लोक 25.50

पितृहूर्नृप पुर्या द्वार्दक्षिणेन पुरञ्जनः । राष्ट्रं दक्षिणपञ्चालं याति श्रुतधरान्वितः ॥ ५०॥

सरल हिंदी भावार्थ: दक्षिण दिशा के पितृहू द्वार से पुरञ्जन श्रुतधर के साथ दक्षिणपञ्चाल प्रदेश जाता था।

श्लोक 25.51

देवहूर्नाम पुर्या द्वा उत्तरेण पुरञ्जनः । राष्ट्रमुत्तरपञ्चालं याति श्रुतधरान्वितः ॥ ५१॥

सरल हिंदी भावार्थ: उत्तर के देवहू द्वार से वह उसी श्रुतधर के साथ उत्तरपञ्चाल प्रदेश में जाता था।

श्लोक 25.52

आसुरी नाम पश्चाद्द्वास्तया याति पुरञ्जनः । ग्रामकं नाम विषयं दुर्मदेन समन्वितः ॥ ५२॥

सरल हिंदी भावार्थ: पश्चिम के आसुरी द्वार से वह दुर्मद के साथ ग्रामक नामक प्रदेश में जाता था।

श्लोक 25.53

निरृतिर्नाम पश्चाद्द्वास्तया याति पुरञ्जनः । वैशसं नाम विषयं लुब्धकेन समन्वितः ॥ ५३॥

सरल हिंदी भावार्थ: पश्चिम के निर्ऋति द्वार से लुब्धक के साथ वैशस नामक प्रदेश में जाता था।

श्लोक 25.54

अन्धावमीषां पौराणां निर्वाक्पेशस्कृतावुभौ । अक्षण्वतामधिपतिस्ताभ्यां याति करोति च ॥ ५४॥

सरल हिंदी भावार्थ: नगर के निवासियों में निर्वाक और पेशस्कृत नामक दो नेत्रहीन सेवक थे। राजा उनके माध्यम से चलता और कार्य करता था।

श्लोक 25.55

स यर्ह्यन्तःपुरगतो विषूचीनसमन्वितः । मोहं प्रसादं हर्षं वा याति जायात्मजोद्भवम् ॥ ५५॥

सरल हिंदी भावार्थ: अन्तःपुर में विषूचीन के साथ रहते हुए वह पत्नी–सन्तान से जुड़ा मोह, प्रसन्नता और हर्ष अनुभव करता था।

श्लोक 25.56

एवं कर्मसु संसक्तः कामात्मा वञ्चितोऽबुधः । महिषी यद्यदीहेत तत्तदेवान्ववर्तत ॥ ५६॥

सरल हिंदी भावार्थ: इस प्रकार कर्म और कामना में फँसा अज्ञानी पुरञ्जन विवेक खो बैठा। रानी जो चाहती, वह उसी के पीछे चलता था।

श्लोक 25.57

क्वचित्पिबन्त्यां पिबति मदिरां मदविह्वलः । अश्नन्त्यां क्वचिदश्नाति जक्षत्यां सह जक्षिति ॥ ५७॥

सरल हिंदी भावार्थ: वह मदिरा पीती तो वह भी पीता, भोजन करती तो साथ खाता और कुछ चबाती तो उसी का अनुकरण करता।

श्लोक 25.58

क्वचिद्गायति गायन्त्यां रुदत्यां रुदति क्वचित् । क्वचिद्धसन्त्यां हसति जल्पन्त्यामनु जल्पति ॥ ५८॥

सरल हिंदी भावार्थ: वह गाती तो गाता, रोती तो रोता, हँसती तो हँसता और बोलती तो उसी के साथ बोलता।

श्लोक 25.59

क्वचिद्धावति धावन्त्यां तिष्ठन्त्यामनु तिष्ठति । अनु शेते शयानायामन्वास्ते क्वचिदासतीम् ॥ ५९॥

सरल हिंदी भावार्थ: वह दौड़ती तो दौड़ता, खड़ी होती तो खड़ा रहता, सोती तो सोता और बैठती तो बैठता।

श्लोक 25.60

क्वचिच्छृणोति श‍ृण्वन्त्यां पश्यन्त्यामनु पश्यति । क्वचिज्जिघ्रति जिघ्रन्त्यां स्पृशन्त्यां स्पृशति क्वचित् ॥ ६०॥

सरल हिंदी भावार्थ: वह सुनती, देखती, सूँघती या स्पर्श करती तो वह भी उन्हीं अनुभवों का अनुसरण करता।

श्लोक 25.61

क्वचिच्च शोचतीं जायामनु शोचति दीनवत् । अनु हृष्यति हृष्यन्त्यां मुदितामनु मोदते ॥ ६१॥

सरल हिंदी भावार्थ: पत्नी शोक करती तो वह दीन होकर शोक करता; वह हर्षित या प्रसन्न होती तो वह भी वैसा ही होता।

श्लोक 25.62

विप्रलब्धो महिष्यैवं सर्वप्रकृतिवञ्चितः । नेच्छन्ननुकरोत्यज्ञः क्लैब्यात्क्रीडामृगो यथा ॥ ६२॥

सरल हिंदी भावार्थ: रानी के प्रभाव में उसने अपने स्वाभाविक विवेक और स्वतन्त्रता को खो दिया। अज्ञानी होकर वह न चाहते हुए भी खेल के पालतू पशु की तरह अनुकरण करने लगा।

॥ चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 25 समाप्त ॥

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चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 26

पुरञ्जन का आखेट और आसक्ति

श्लोक 26.1

नारद उवाच । स एकदा महेष्वासो रथं पञ्चाश्वमाशुगम् । द्वीषं द्विचक्रमेकाक्षं त्रिवेणुं पञ्चबन्धुरम् ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: नारद ने कहा—एक दिन धनुर्धारी पुरञ्जन पाँच घोड़ों वाला तेज रथ लेकर चला। उसमें दो दण्ड, दो पहिए, एक धुरी, तीन ध्वजदण्ड और पाँच बन्धन थे।

श्लोक 26.2

एकरश्म्येकदमनमेकनीडं द्विकूबरम् । पञ्चप्रहरणं सप्तवरूथं पञ्चविक्रमम् ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: उसमें एक लगाम, एक सारथि, एक आसन, दो जुए, पाँच आयुध, सात आवरण और पाँच प्रकार की गतियाँ थीं। यह रथ आगे समझाए जाने वाले देहरूपक का भाग है।

श्लोक 26.3

हैमोपस्करमारुह्य स्वर्णवर्माक्षयेषुधिः । एकादशचमूनाथः पञ्चप्रस्थमगाद्वनम् ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: स्वर्णसज्जित रथ पर चढ़कर, स्वर्णकवच और अक्षय तरकस धारण किए, ग्यारह सेनाओं का स्वामी पुरञ्जन पञ्चप्रस्थ वन गया।

श्लोक 26.4

चचार मृगयां तत्र दृप्त आत्तेषुकार्मुकः । विहाय जायामतदर्हां मृगव्यसनलालसः ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: शिकार की लत में आसक्त वह अपनी स्नेहयोग्य पत्नी को छोड़कर अभिमान से धनुष–बाण लिए वन में घूमने लगा।

श्लोक 26.5

आसुरीं वृत्तिमाश्रित्य घोरात्मा निरनुग्रहः । न्यहनन्निशितैर्बाणैर्वनेषु वनगोचरान् ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: आसुरी वृत्ति, कठोर मन और निर्दयता से उसने तीखे बाणों द्वारा वन्यजीवों को मारना आरम्भ किया।

श्लोक 26.6

तीर्थेषु प्रतिदृष्टेषु राजा मेध्यान् पशून् वने । यावदर्थमलं लुब्धो हन्यादिति नियम्यते ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्राचीन यज्ञविधान में भी राजा को नियत अवसर पर केवल आवश्यक सीमा में निर्दिष्ट पशुओं तक सीमित रखा गया था; मनमाना वध निषिद्ध था।

श्लोक 26.7

य एवं कर्म नियतं विद्वान् कुर्वीत मानवः । कर्मणा तेन राजेन्द्र ज्ञानेन न स लिप्यते ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो ज्ञानी मनुष्य कर्म की निर्धारित मर्यादा और उसके उद्देश्य को समझकर कर्तव्य करता है, वह उसी प्रकार कर्म में आसक्त होकर नहीं बँधता।

श्लोक 26.8

अन्यथा कर्म कुर्वाणो मानारूढो निबध्यते । गुणप्रवाहपतितो नष्टप्रज्ञो व्रजत्यधः ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: परन्तु अहंकार से मर्यादा तोड़कर कर्म करने वाला गुणप्रवाह में फँसता, विवेक खोता और अधोगति पाता है।

श्लोक 26.9

तत्र निर्भिन्नगात्राणां चित्रवाजैः शिलीमुखैः । विप्लवोऽभूद्दुःखितानां दुःसहः करुणात्मनाम् ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: रंगीन पंखों वाले बाणों से घायल पशुओं की पीड़ा और करुण क्रन्दन दयालु हृदय के लिए असह्य था।

श्लोक 26.10

शशान् वराहान् महिषान् गवयान् रुरुशल्यकान् । मेध्यानन्यांश्च विविधान् विनिघ्नन् श्रममध्यगात् ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: खरगोश, सूअर, भैंसे, गवय, रुरु, साही और अन्य अनेक पशुओं को मारते–मारते राजा थक गया।

श्लोक 26.11

ततः क्षुत्तृट्‍परिश्रान्तो निवृत्तो गृहमेयिवान् । कृतस्नानोचिताहारः संविवेश गतक्लमः ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: भूख, प्यास और परिश्रम से व्याकुल होकर वह घर लौटा। स्नान और उचित भोजन करके आराम किया तथा थकान दूर की।

श्लोक 26.12

आत्मानमर्हयाञ्चक्रे धूपालेपस्रगादिभिः । साध्वलङ्कृतसर्वाङ्गो महिष्यामादधे मनः ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: धूप, चन्दन और मालाओं से शरीर सँवारा, सुन्दर आभूषण पहने और मन अपनी रानी में लगाया।

श्लोक 26.13

तृप्तो हृष्टः सुदृप्तश्च कन्दर्पाकृष्टमानसः । न व्यचष्ट वरारोहां गृहिणीं गृहमेधिनीम् ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: तृप्त और हर्षित होकर कामना में डूबे राजा को गृह की शोभा बढ़ाने वाली सुन्दरी पत्नी दिखाई नहीं दी।

श्लोक 26.14

अन्तःपुरस्त्रियोऽपृच्छद्विमना इव वेदिषत् । अपि वः कुशलं रामाः सेश्वरीणां यथा पुरा ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: वह उदास होकर अन्तःपुर की स्त्रियों से पूछने लगा—क्या तुम सब अपनी स्वामिनी सहित पहले की तरह कुशल हो?

श्लोक 26.15

न तथैतर्हि रोचन्ते गृहेषु गृहसम्पदः । यदि न स्याद्गृहे माता पत्नी वा पतिदेवता । व्यङ्गे रथ इव प्राज्ञः को नामासीत दीनवत् ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: यदि घर में माता या पति में अनुरक्त पत्नी न हो तो सम्पदा भी शोभा नहीं देती। समझदार व्यक्ति ऐसे घर में टूटे रथ में बैठे की तरह असहाय कैसे रहे?

श्लोक 26.16

क्व वर्तते सा ललना मज्जन्तं व्यसनार्णवे । या मामुद्धरते प्रज्ञां दीपयन्ती पदे पदे ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: वह कहाँ है जो संकट में डूबते मुझे बार–बार विवेक का प्रकाश देकर उबारती है?

श्लोक 26.17

रामा ऊचुः । नरनाथ न जानीमस्त्वत्प्रिया यद्व्यवस्यति । भूतले निरवस्तारे शयानां पश्य शत्रुहन् ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: स्त्रियाँ बोलीं—राजन्, आपकी प्रिया के मन का विचार हम नहीं जानतीं। देखिए, वे बिना बिछौने के भूमि पर लेटी हैं।

श्लोक 26.18

नारद उवाच । पुरञ्जनः स्वमहिषीं निरीक्ष्यावधुतां भुवि । तत्सङ्गोन्मथितज्ञानो वैक्लव्यं परमं ययौ ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: नारद ने कहा—अपनी रानी को उपेक्षित दशा में भूमि पर देखकर आसक्ति से विवेक खो चुके पुरञ्जन बहुत व्याकुल हो गए।

श्लोक 26.19

सान्त्वयन् श्लक्ष्णया वाचा हृदयेन विदूयता । प्रेयस्याः स्नेहसंरम्भलिङ्गमात्मनि नाभ्यगात् ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: दुखी मन से वे मधुर वचनों द्वारा उसे मनाने लगे, पर अपने प्रति उसके पूर्व स्नेह के चिह्न नहीं देख पाए।

श्लोक 26.20

अनुनिन्येऽथ शनकैर्वीरोऽनुनयकोविदः । पस्पर्श पादयुगलमाह चोत्सङ्गलालिताम् ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: मनाना जानने वाले राजा ने धीरे–धीरे अनुनय किया, उसके चरण छुए, गोद में लेकर स्नेह किया और कहा।

श्लोक 26.21

पुरञ्जन उवाच । नूनं त्वकृतपुण्यास्ते भृत्या येष्वीश्वराः शुभे । कृतागःस्वात्मसात्कृत्वा शिक्षा दण्डं न युञ्जते ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: पुरञ्जन बोला—जिन सेवकों की भूल पर स्वामी उन्हें अपना मानकर अनुशासन नहीं देते, वे सचमुच दुर्भाग्यशाली हैं।

श्लोक 26.22

परमोऽनुग्रहो दण्डो भृत्येषु प्रभुणार्पितः । बालो न वेद तत्तन्वि बन्धुकृत्यममर्षणः ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: स्वामी का सुधारने वाला दण्ड सेवक पर अनुग्रह है; क्रोधी और अपरिपक्व व्यक्ति उसके हितकारी उद्देश्य को नहीं समझता। राजा यह बात स्वयं की भूल स्वीकारने के लिए कह रहा था।

श्लोक 26.23

सा त्वं मुखं सुदति सुभ्र्वनुरागभार- व्रीडाविलम्बविलसद्धसितावलोकम् । नीलालकालिभिरुपस्कृतमुन्नसं नः स्वानां प्रदर्शय मनस्विनि वल्गु वाक्यम् ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्रिये, अपना स्नेह, लज्जा, मुस्कान और सुन्दर दृष्टि से शोभित मुख दिखाओ। नीली अलकों और उन्नत नासिका वाले उस मुख से मधुर वचन कहो।

श्लोक 26.24

तस्मिन् दधे दममहं तव वीरपत्नि योऽन्यत्र भूसुरकुलात्कृतकिल्बिषस्तम् । पश्ये न वीतभयमुन्मुदितं त्रिलोक्या- मन्यत्र वै मुररिपोरितरत्र दासात् ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: वीरपत्नी, जिसने तुम्हारा अपराध किया हो उसे मैं दण्ड दूँगा; ब्रह्मनिष्ठों और भगवान के भक्तों को छोड़कर तीनों लोकों में कोई अपराधी मेरे न्याय से निश्चिन्त नहीं रह सकेगा।

श्लोक 26.25

वक्त्रं न ते वितिलकं मलिनं विहर्षं संरम्भभीममविमृष्टमपेतरागम् । पश्ये स्तनावपि शुचोपहतौ सुजातौ बिम्बाधरं विगतकुङ्कुमपङ्करागम् ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैं तुम्हारा तिलकहीन, मलिन, उदास, क्रोध और आँसुओं से भरा मुख नहीं देखना चाहता। तुम्हारी लाली और प्रसन्नता क्यों लुप्त हैं?

श्लोक 26.26

तन्मे प्रसीद सुहृदः कृतकिल्बिषस्य स्वैरं गतस्य मृगयां व्यसनातुरस्य । का देवरं वशगतं कुसुमास्त्रवेग- विस्रस्तपौंस्नमुशती न भजेत कृत्ये ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: अपने मन से शिकार को चले जाने की भूल करने वाले मुझ स्नेही को क्षमा करो। मैं कामना से व्याकुल और तुम्हारे अधीन हूँ; प्रिये, मुझ पर प्रसन्न होओ।

॥ चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 26 समाप्त ॥

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चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 27

चण्डवेग और कालकन्या का आक्रमण

श्लोक 27.1

नारद उवाच । इत्थं पुरञ्जनं सध्र्यग् वशमानीय विभ्रमैः । पुरञ्जनी महाराज रेमे रमयती पतिम् ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: नारद ने कहा—महाराज, पुरञ्जनी ने अपनी मनोहर चेष्टाओं से पुरञ्जन को पूर्ण वश में करके उसके साथ सुखभोग किया।

श्लोक 27.2

स राजा महिषीं राजन् सुस्नातां रुचिराननाम् । कृतस्वस्त्ययनां तृप्तामभ्यनन्ददुपागताम् ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: स्नान, शृङ्गार और मंगलकर्म से प्रसन्न तथा सुन्दर मुख वाली रानी के आने पर राजा ने हर्ष से उसका स्वागत किया।

श्लोक 27.3

तयोपगूढः परिरब्धकन्धरो रहोऽनुमन्त्रैरपकृष्टचेतनः । न कालरंहो बुबुधे दुरत्ययं दिवानिशेति प्रमदापरिग्रहः ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: आलिङ्गन और एकान्त की प्रेमवार्ता में उसकी चेतना ऐसी खिंची कि दिन–रात के रूप में भागते दुस्तर काल का बोध नहीं रहा।

श्लोक 27.4

शयान उन्नद्धमदो महामना महार्हतल्पे महिषीभुजोपधिः । तामेव वीरो मनुते परं यत- स्तमोऽभिभूतो न निजं परं च यत् ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: बहुमूल्य शय्या पर रानी की भुजा का तकिया बनाकर लेटा, मद और मोह से ढका राजा उसी को सर्वोच्च मानता रहा; उसे अपना या परमात्मा का सत्य न सूझा।

श्लोक 27.5

तयैवं रममाणस्य कामकश्मलचेतसः । क्षणार्धमिव राजेन्द्र व्यतिक्रान्तं नवं वयः ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: कामना से मलिन मन लिए इस प्रकार रमते हुए उसका नया यौवन मानो आधे क्षण में बीत गया।

श्लोक 27.6

तस्यामजनयत्पुत्रान् पुरञ्जन्यां पुरञ्जनः । शतान्येकादश विराडायुषोऽर्धमथात्यगात् ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: पुरञ्जनी से उसके ग्यारह सौ पुत्र हुए और आयु का आधा भाग निकल गया।

श्लोक 27.7

दुहितॄर्दशोत्तरशतं पितृमातृयशस्करीः । शीलौदार्यगुणोपेताः पौरञ्जन्यः प्रजापते ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनकी एक सौ दस कन्याएँ भी हुईं, जो शील, उदारता और गुणों से माता–पिता का यश बढ़ाती थीं।

श्लोक 27.8

स पञ्चालपतिः पुत्रान् पितृवंशविवर्धनान् । दारैः संयोजयामास दुहितॄः सदृशैर्वरैः ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: पञ्चालपति ने वंश बढ़ाने वाले पुत्रों का विवाह किया और पुत्रियों को उनके समान योग्य वरों से जोड़ा।

श्लोक 27.9

पुत्राणां चाभवन् पुत्रा एकैकस्य शतं शतम् । यैर्वै पौरञ्जनो वंशः पञ्चालेषु समेधितः ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्रत्येक पुत्र के सौ–सौ पुत्र हुए; उनसे पञ्चाल में पुरञ्जन का वंश बहुत बढ़ा।

श्लोक 27.10

तेषु तद्रिक्थहारेषु गृहकोशानुजीविषु । निरूढेन ममत्वेन विषयेष्वन्वबध्यत ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: घर और कोश पर निर्भर उन उत्तराधिकारियों के प्रति गहरी ममता से वह विषयभोगों में और बँध गया।

श्लोक 27.11

ईजे च क्रतुभिर्घोरैर्दीक्षितः पशुमारकैः । देवान् पितॄन् भूतपतीन् नानाकामो यथा भवान् ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: तुम्हारी तरह अनेक कामनाओं से प्रेरित होकर उसने भी पशुवध वाले घोर यज्ञों की दीक्षा ली और देवताओं, पितरों तथा भूताधिपतियों की पूजा की।

श्लोक 27.12

युक्तेष्वेवं प्रमत्तस्य कुटुम्बासक्तचेतसः । आससाद स वै कालो योऽप्रियः प्रिययोषिताम् ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: कुटुम्ब की आसक्ति में असावधान रहते हुए उसके पास वह काल आ पहुँचा जो विषयसुख में डूबे लोगों को अप्रिय लगता है।

श्लोक 27.13

चण्डवेग इति ख्यातो गन्धर्वाधिपतिर्नृप । गन्धर्वास्तस्य बलिनः षष्ट्युत्तरशतत्रयम् ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: राजन्, चण्डवेग नामक गन्धर्वराज था; उसके तीन सौ साठ बलवान गन्धर्व अनुचर थे।

श्लोक 27.14

गन्धर्व्यस्तादृशीरस्य मैथुन्यश्च सितासिताः । परिवृत्त्या विलुम्पन्ति सर्वकामविनिर्मिताम् ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनकी उतनी ही उजली और काली गन्धर्व पत्नियाँ थीं। वे बारी–बारी उस भोगसम्पन्न नगरी की शक्ति लूटती रहती थीं; यह दिन–रात का रूपक है।

श्लोक 27.15

ते चण्डवेगानुचराः पुरञ्जनपुरं यदा । हर्तुमारेभिरे तत्र प्रत्यषेधत्प्रजागरः ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: चण्डवेग के अनुचरों ने पुरञ्जन की नगरी लूटनी शुरू की तो उसके सजग प्रहरी सर्प ने विरोध किया।

श्लोक 27.16

स सप्तभिः शतैरेको विंशत्या च शतं समाः । पुरञ्जनपुराध्यक्षो गन्धर्वैर्युयुधे बली ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: वह बलवान नगररक्षक अकेला ही सात सौ बीस गन्धर्व–गन्धर्वियों से सौ वर्ष तक लड़ता रहा।

श्लोक 27.17

क्षीयमाणे स्वसम्बन्धे एकस्मिन् बहुभिर्युधा । चिन्तां परां जगामार्तः स राष्ट्रपुरबान्धवः ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: बहुतों से युद्ध में अपने एकमात्र रक्षक की शक्ति घटती देखकर पुरञ्जन राज्य, नगर और बन्धुओं सहित बड़ी चिन्ता में पड़ा।

श्लोक 27.18

स एव पुर्यां मधुभुक् पञ्चालेषु स्वपार्षदैः । उपनीतं बलिं गृह्णन् स्त्रीजितो नाविदद्भयम् ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: फिर भी वह नगरी में विषयों का मधु लेता और साथियों की लाई भेंटें स्वीकारता रहा; आसक्ति के वश में आने वाले भय को नहीं समझा।

श्लोक 27.19

कालस्य दुहिता काचित्त्रिलोकीं वरमिच्छती । पर्यटन्ती न बर्हिष्मन् प्रत्यनन्दत कश्चन ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: बर्हिष्मन्, काल की एक कन्या तीनों लोकों में पति खोजती घूम रही थी, पर किसी ने उसे प्रसन्न होकर स्वीकार नहीं किया।

श्लोक 27.20

दौर्भाग्येनात्मनो लोके विश्रुता दुर्भगेति सा । या तुष्टा राजर्षये तु वृतादात्पूरवे वरम् ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: अपनी अप्रियता के कारण वह दुर्भगा कहलाती थी। जिसे राजर्षि पुरु ने स्वीकार किया तो प्रसन्न होकर उसने उन्हें वर दिया; यहाँ वह वृद्धावस्था का रूप है।

श्लोक 27.21

कदाचिदटमाना सा ब्रह्मलोकान्महीं गतम् । वव्रे बृहद्व्रतं मां तु जानती काममोहिता ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: एक बार घूमते हुए उसने मुझे ब्रह्मलोक से पृथ्वी पर आया देखा। मेरा ब्रह्मचर्य जानते हुए भी मोहवश मुझे पति बनाना चाहा।

श्लोक 27.22

मयि संरभ्य विपुलमदाच्छापं सुदुःसहम् । स्थातुमर्हसि नैकत्र मद्याच्ञाविमुखो मुने ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: मेरे इनकार से क्रुद्ध होकर उसने कठिन शाप दिया—मुनि, मेरी प्रार्थना ठुकराई है, इसलिए तुम एक स्थान पर स्थिर न रह सकोगे।

श्लोक 27.23

ततो विहतसङ्कल्पा कन्यका यवनेश्वरम् । मयोपदिष्टमासाद्य वव्रे नाम्ना भयं पतिम् ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: इच्छा पूरी न होने पर वह मेरे संकेत के अनुसार भय नामक यवनराज के पास गई और उसे पति के रूप में चुना।

श्लोक 27.24

ऋषभं यवनानां त्वां वृणे वीरेप्सितं पतिम् । सङ्कल्पस्त्वयि भूतानां कृतः किल न रिष्यति ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: उसने कहा—यवनों के श्रेष्ठ वीर, मैं तुम्हें पति चुनती हूँ। प्राणियों का तुम्हारे प्रति किया सङ्कल्प निष्फल नहीं होता।

श्लोक 27.25

द्वाविमावनुशोचन्ति बालावसदवग्रहौ । यल्लोकशास्त्रोपनतं न राति न तदिच्छति ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: दो प्रकार के अविवेकी पछताते हैं—जो लोक और शास्त्र की उचित अपेक्षा होने पर दान नहीं देता तथा जो योग्य प्राप्त वस्तु को स्वीकार नहीं करता।

श्लोक 27.26

अथो भजस्व मां भद्र भजन्तीं मे दयां कुरु । एतावान् पौरुषो धर्मो यदार्ताननुकम्पते ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: इसलिए मुझे स्वीकार करो और शरण आई मुझ पर दया करो। दुःखियों पर करुणा करना पुरुषार्थ का सच्चा धर्म है।

श्लोक 27.27

कालकन्योदितवचो निशम्य यवनेश्वरः । चिकीर्षुर्देवगुह्यं स सस्मितं तामभाषत ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: कालकन्या की बात सुनकर यवनराज देवव्यवस्था का गूढ़ कार्य पूरा करना चाहता था; उसने मुस्कराकर कहा।

श्लोक 27.28

मया निरूपितस्तुभ्यं पतिरात्मसमाधिना । नाभिनन्दति लोकोऽयं त्वामभद्रामसम्मताम् ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैंने ध्यानपूर्वक तुम्हारे लिए उपयुक्त सम्बन्ध निश्चित किया है। तुम्हारे अप्रिय परिणाम के कारण यह जगत तुम्हारा स्वागत नहीं करता।

श्लोक 27.29

त्वमव्यक्तगतिर्भुङ्क्ष्व लोकं कर्मविनिर्मितम् । या हि मे पृतना युक्ता प्रजानाशं प्रणेष्यसि ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: इसलिए छिपी गति से कर्मनिर्मित शरीरों का उपभोग करो। मेरी सेना के साथ मिलकर प्राणियों के विनाश की ओर ले जाओगी।

श्लोक 27.30

प्रज्वारोऽयं मम भ्राता त्वं च मे भगिनी भव । चराम्युभाभ्यां लोकेऽस्मिन्नव्यक्तो भीमसैनिकः ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: यह प्रज्वार मेरा भाई है और तुम मेरी बहन बनो। मैं अपनी भयानक सेना सहित तुम दोनों के साथ अदृश्य रूप से जगत में घूमूँगा।

॥ चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 27 समाप्त ॥

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चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 28

नगरी का विनाश और अविज्ञात मित्र का बोध

श्लोक 28.1

नारद उवाच । सैनिका भयनाम्नो ये बर्हिष्मन् दिष्टकारिणः । प्रज्वारकालकन्याभ्यां विचेरुरवनीमिमाम् ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: नारद ने कहा—बर्हिष्मन्, भय के सैनिक नियति का कार्य करते हुए प्रज्वार और कालकन्या के साथ पृथ्वी पर घूमने लगे।

श्लोक 28.2

त एकदा तु रभसा पुरञ्जनपुरीं नृप । रुरुधुर्भौमभोगाढ्यां जरत्पन्नगपालिताम् ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: एक दिन उन्होंने सांसारिक भोगों से भरी पुरञ्जन की नगरी को बलपूर्वक घेर लिया; उसका रक्षक सर्प अब बूढ़ा हो चुका था।

श्लोक 28.3

कालकन्यापि बुभुजे पुरञ्जनपुरं बलात् । ययाभिभूतः पुरुषः सद्यो निःसारतामियात् ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: कालकन्या ने भी नगरी पर अधिकार कर लिया। उसके वश में पड़कर मनुष्य की देहशक्ति शीघ्र क्षीण हो जाती है।

श्लोक 28.4

तयोपभुज्यमानां वै यवनाः सर्वतोदिशम् । द्वार्भिः प्रविश्य सुभृशं प्रार्दयन् सकलां पुरीम् ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: उसके आक्रमण के साथ यवन सब दिशाओं के द्वारों से भीतर घुसे और समस्त नगरी को पीड़ित करने लगे।

श्लोक 28.5

तस्यां प्रपीड्यमानायामभिमानी पुरञ्जनः । अवापोरुविधांस्तापान् कुटुम्बी ममताकुलः ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: नगरी पीड़ित हुई तो उसे अपना स्वरूप मानने वाला कुटुम्बी पुरञ्जन ममता से घिरकर अनेक ताप भोगने लगा।

श्लोक 28.6

कन्योपगूढो नष्टश्रीः कृपणो विषयात्मकः । नष्टप्रज्ञो हृतैश्वर्यो गन्धर्वयवनैर्बलात् ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: कालकन्या से ग्रस्त होकर उसकी शोभा और विवेक नष्ट हुए। विषयों में फँसा वह दीन हो गया और गन्धर्वों तथा यवनों ने उसका ऐश्वर्य छीन लिया।

श्लोक 28.7

विशीर्णां स्वपुरीं वीक्ष्य प्रतिकूलाननादृतान् । पुत्रान् पौत्रानुगामात्यान् जायां च गतसौहृदाम् ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: उसने नगरी को जर्जर, पुत्र–पौत्र, अनुचर और मन्त्रियों को प्रतिकूल तथा उपेक्षापूर्ण और पत्नी को भी पहले जैसा स्नेहहीन पाया।

श्लोक 28.8

आत्मानं कन्यया ग्रस्तं पञ्चालानरिदूषितान् । दुरन्तचिन्तामापन्नो न लेभे तत्प्रतिक्रियाम् ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: स्वयं वृद्धावस्था से ग्रस्त और पञ्चालप्रदेश शत्रुओं से दूषित देखकर वह अन्तहीन चिन्ता में पड़ा, पर उपाय नहीं मिला।

श्लोक 28.9

कामानभिलषन् दीनो यातयामांश्च कन्यया । विगतात्मगतिस्नेहः पुत्रदारांश्च लालयन् ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: वह दुर्बल होकर भी विषयों की इच्छा करता, आत्मकल्याण का प्रेम खो चुका था और पुत्र–पत्नी को ही दुलारता रहा।

श्लोक 28.10

गन्धर्वयवनाक्रान्तां कालकन्योपमर्दिताम् । हातुं प्रचक्रमे राजा तां पुरीमनिकामतः ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: गन्धर्वों और यवनों के आक्रमण तथा कालकन्या के दबाव से अन्ततः वह अनिच्छा से नगरी छोड़ने को विवश हुआ।

श्लोक 28.11

भयनाम्नोऽग्रजो भ्राता प्रज्वारः प्रत्युपस्थितः । ददाह तां पुरीं कृत्स्नां भ्रातुः प्रियचिकीर्षया ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: भय का बड़ा भाई प्रज्वार आया और अपने भाई का काम पूरा करने के लिए पूरी नगरी जलाने लगा।

श्लोक 28.12

तस्यां सन्दह्यमानायां सपौरः सपरिच्छदः । कौटुम्बिकः कुटुम्बिन्या उपातप्यत सान्वयः ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: नगरी जलने पर निवासियों, सामग्री, पत्नी और परिवार सहित गृहासक्त पुरञ्जन बहुत संतप्त हुआ।

श्लोक 28.13

यवनोपरुद्धायतनो ग्रस्तायां कालकन्यया । पुर्यां प्रज्वारसंसृष्टः पुरपालोऽन्वतप्यत ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: यवनों से घिरा, कालकन्या से ग्रस्त और प्रज्वार से तपता नगररक्षक प्राण भी व्याकुल हो उठा।

श्लोक 28.14

न शेके सोऽवितुं तत्र पुरुकृच्छ्रोरुवेपथुः । गन्तुमैच्छत्ततो वृक्षकोटरादिव सानलात् ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: बहुत कष्ट और कम्पन के कारण वह रक्षा न कर सका। जलते वृक्ष के कोटर से सर्प निकलना चाहे, वैसे वह निकलना चाहता था।

श्लोक 28.15

शिथिलावयवो यर्हि गन्धर्वैर्हृतपौरुषः । यवनैररिभी राजन्नुपरुद्धो रुरोद ह ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: गन्धर्वों से शक्ति क्षीण और यवनों से घिरा, शिथिल अङ्गों वाला पुरञ्जन रोने लगा।

श्लोक 28.16

दुहितॄः पुत्रपौत्रांश्च जामिजामातृपार्षदान् । स्वत्वावशिष्टं यत्किञ्चिद्गृहकोशपरिच्छदम् ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: पुत्रियाँ, पुत्र, पौत्र, सम्बन्धी, दामाद, सेवक तथा बचा हुआ घर, कोश और सामान—

श्लोक 28.17

अहं ममेति स्वीकृत्य गृहेषु कुमतिर्गृही । दध्यौ प्रमदया दीनो विप्रयोग उपस्थिते ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: इन सबको मैं और मेरा मानने वाला दुर्बुद्धि गृहस्थ, वियोग सामने देखकर पत्नी की चिन्ता में दीन हो गया।

श्लोक 28.18

लोकान्तरं गतवति मय्यनाथा कुटुम्बिनी । वर्तिष्यते कथं त्वेषा बालकाननुशोचती ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: मेरे दूसरे लोक जाने पर यह असहाय पत्नी बच्चों के लिए शोक करती हुई कैसे रहेगी?

श्लोक 28.19

न मय्यनाशिते भुङ्क्ते नास्नाते स्नाति मत्परा । मयि रुष्टे सुसन्त्रस्ता भर्त्सिते यतवाग्भयात् ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: मेरे भोजन और स्नान से पहले स्वयं नहीं करती; मुझमें अनुरक्त रहती और मेरे क्रुद्ध या डाँटने पर भय से चुप हो जाती है—वह पुराने सम्बन्ध को याद करता रहा।

श्लोक 28.20

प्रबोधयति माविज्ञं व्युषिते शोककर्शिता । वर्त्मैतद्गृहमेधीयं वीरसूरपि नेष्यति ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैं नासमझ होता हूँ तो यह समझाती है। मेरे जाने पर शोक से दुर्बल होकर, वीर पुत्रों की माता होते हुए भी गृहस्थी कैसे सँभालेगी?

श्लोक 28.21

कथं नु दारका दीना दारकीर्वापरायणाः । वर्तिष्यन्ते मयि गते भिन्ननाव इवोदधौ ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: मेरे बाद पुत्र–पुत्रियाँ सहाराहीन होकर समुद्र में टूटी नाव के यात्रियों की तरह कैसे जीएँगे?

श्लोक 28.22

एवं कृपणया बुद्ध्या शोचन्तमतदर्हणम् । ग्रहीतुं कृतधीरेनं भयनामाभ्यपद्यत ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: इस प्रकार अनुचित दीनता से शोक करते पुरञ्जन को पकड़ने के लिए भय सामने आ गया।

श्लोक 28.23

पशुवद्यवनैरेष नीयमानः स्वकं क्षयम् । अन्वद्रवन्ननुपथाः शोचन्तो भृशमातुराः ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: यवन उसे पशु की तरह विनाश की ओर ले चले। उसके पीछे अनुचर भी अत्यन्त व्याकुल होकर शोक करते चले।

श्लोक 28.24

पुरीं विहायोपगत उपरुद्धो भुजङ्गमः । यदा तमेवानु पुरी विशीर्णा प्रकृतिं गता ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: नगरी छोड़कर रक्षक सर्प चला गया तो उसके पीछे नगरी भी टूटकर अपने मूल तत्त्वों में मिल गई।

श्लोक 28.25

विकृष्यमाणः प्रसभं यवनेन बलीयसा । नाविन्दत्तमसाऽऽविष्टः सखायं सुहृदं पुरः ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: बलवान यवन द्वारा खींचे जाते हुए अज्ञान से ढका पुरञ्जन अपने पुराने हितैषी मित्र को पहचान न सका।

श्लोक 28.26

तं यज्ञपशवोऽनेन संज्ञप्ता येऽदयालुना । कुठारैश्चिच्छिदुः क्रुद्धाः स्मरन्तोऽमीवमस्य तत् ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: उसने निर्दयता से यज्ञ में जिन पशुओं को मारा था, वे अपनी पीड़ा याद करके क्रुद्ध प्रहार करते दिखाई दिए। यह हिंसा के कर्मफल का रूपक है।

श्लोक 28.27

अनन्तपारे तमसि मग्नो नष्टस्मृतिः समाः । शाश्वतीरनुभूयार्तिं प्रमदासङ्गदूषितः ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: आसक्ति से दूषित और आत्मस्मृति खोया वह बहुत समय तक गहरे अन्धकार और दुःख का अनुभव करता रहा।

श्लोक 28.28

तामेव मनसा गृह्णन् बभूव प्रमदोत्तमा । अनन्तरं विदर्भस्य राजसिंहस्य वेश्मनि ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: अन्तकाल में उसी स्त्री का चिन्तन रहने के कारण अगले जन्म में वह विदर्भराज के घर सुन्दर कन्या के रूप में जन्मा।

श्लोक 28.29

उपयेमे वीर्यपणां वैदर्भीं मलयध्वजः । युधि निर्जित्य राजन्यान् पाण्ड्यः परपुरञ्जयः ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: पाण्ड्यदेश के वीर मलयध्वज ने युद्ध में अन्य राजाओं को जीतकर उस विदर्भकन्या से विवाह किया; उसका स्वयंवर पराक्रम पर आधारित था।

श्लोक 28.30

तस्यां स जनयाञ्चक्र आत्मजामसितेक्षणाम् । यवीयसः सप्त सुतान् सप्त द्रविडभूभृतः ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: उससे एक सुन्दर नेत्रों वाली पुत्री और बाद में सात पुत्र हुए, जो द्रविड़देश के सात शासक बने।

श्लोक 28.31

एकैकस्याभवत्तेषां राजन्नर्बुदमर्बुदम् । भोक्ष्यते यद्वंशधरैर्मही मन्वन्तरं परम् ॥ ३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: हर पुत्र की बहुत विशाल सन्तति हुई; कथा कहती है कि उनके वंशज मन्वन्तरभर पृथ्वी का पालन करते रहे।

श्लोक 28.32

अगस्त्यः प्राग्दुहितरमुपयेमे धृतव्रताम् । यस्यां दृढच्युतो जात इध्मवाहात्मजो मुनिः ॥ ३२॥

सरल हिंदी भावार्थ: अगस्त्य ने पहले जन्मी व्रतशील पुत्री से विवाह किया। उनसे दृढच्युत हुए और उनके पुत्र इध्मवाह मुनि थे।

श्लोक 28.33

विभज्य तनयेभ्यः क्ष्मां राजर्षिर्मलयध्वजः । आरिराधयिषुः कृष्णं स जगाम कुलाचलम् ॥ ३३॥

सरल हिंदी भावार्थ: राजर्षि मलयध्वज ने पुत्रों में राज्य बाँटा और कृष्ण की आराधना के लिए कुलाचल पर्वत चले गए।

श्लोक 28.34

हित्वा गृहान् सुतान् भोगान् वैदर्भी मदिरेक्षणा । अन्वधावत पाण्ड्येशं ज्योत्स्नेव रजनीकरम् ॥ ३४॥

सरल हिंदी भावार्थ: वैदर्भी ने घर, पुत्र और भोग छोड़े तथा पति के पीछे ऐसे चलीं जैसे चाँदनी चन्द्रमा के साथ रहती है।

श्लोक 28.35

तत्र चन्द्रवसा नाम ताम्रपर्णी वटोदका । तत्पुण्यसलिलैर्नित्यमुभयत्रात्मनो मृजन् ॥ ३५॥

सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ चन्द्रवसा, ताम्रपर्णी और वटोदका नदियों के पुण्यजल में स्नान करके राजा शरीर और मन दोनों को शुद्ध करते थे।

श्लोक 28.36

कन्दाष्टिभिर्मूलफलैः पुष्पपर्णैस्तृणोदकैः । वर्तमानः शनैर्गात्रकर्शनं तप आस्थितः ॥ ३६॥

सरल हिंदी भावार्थ: कन्द, बीज, मूल, फल, फूल, पत्ते, घास और जल से सादा निर्वाह करते हुए वे तप में लगे; धीरे–धीरे शरीर क्षीण हुआ।

श्लोक 28.37

शीतोष्णवातवर्षाणि क्षुत्पिपासे प्रियाप्रिये । सुखदुःखे इति द्वन्द्वान्यजयत्समदर्शनः ॥ ३७॥

सरल हिंदी भावार्थ: समदृष्टि से उन्होंने शीत, गर्मी, वायु, वर्षा, भूख, प्यास, प्रिय–अप्रिय और सुख–दुःख के द्वन्द्व जीते।

श्लोक 28.38

तपसा विद्यया पक्वकषायो नियमैर्यमैः । युयुजे ब्रह्मण्यात्मानं विजिताक्षानिलाशयः ॥ ३८॥

सरल हिंदी भावार्थ: तप, ज्ञान, यम और नियम से संस्कार शुद्ध हुए। इन्द्रिय, प्राण और मन को वश में करके उन्होंने चित्त ब्रह्म में लगाया।

श्लोक 28.39

आस्ते स्थाणुरिवैकत्र दिव्यं वर्षशतं स्थिरः । वासुदेवे भगवति नान्यद्वेदोद्वहन् रतिम् ॥ ३९॥

सरल हिंदी भावार्थ: कथा में वे सौ दिव्य वर्ष एक स्थान पर वृक्ष की तरह स्थिर रहे। भगवान वासुदेव में प्रेम रखते हुए उन्हें दूसरी वस्तु का बोध नहीं रहा।

श्लोक 28.40

स व्यापकतयाऽऽत्मानं व्यतिरिक्ततयाऽऽत्मनि । विद्वान् स्वप्न इवामर्शसाक्षिणं विरराम ह ॥ ४०॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने व्यापक आत्मा को देह से अलग और विचारों के साक्षी के रूप में जाना, जैसे जागा व्यक्ति अपने स्वप्न को देखता है; फिर चित्त शान्त हुआ।

श्लोक 28.41

साक्षाद्भगवतोक्तेन गुरुणा हरिणा नृप । विशुद्धज्ञानदीपेन स्फुरता विश्वतोमुखम् ॥ ४१॥

सरल हिंदी भावार्थ: परम गुरु भगवान हरि के उपदेश और उज्ज्वल शुद्धज्ञान के दीपक से उन्हें सर्वव्यापक परम तत्त्व का बोध हुआ।

श्लोक 28.42

परे ब्रह्मणि चात्मानं परं ब्रह्म तथाऽऽत्मनि । वीक्षमाणो विहायेक्षामस्मादुपरराम ह ॥ ४२॥

सरल हिंदी भावार्थ: अपने को परम ब्रह्म में और परम ब्रह्म को अपने भीतर देखते हुए उन्होंने भेदयुक्त देखने का आग्रह भी छोड़ा और देहसम्बन्धी व्यवहार से उपराम हो गए।

श्लोक 28.43

पतिं परमधर्मज्ञं वैदर्भी मलयध्वजम् । प्रेम्णा पर्यचरद्धित्वा भोगान् सा पतिदेवता ॥ ४३॥

सरल हिंदी भावार्थ: वैदर्भी भोग छोड़कर परम धर्मज्ञ पति मलयध्वज की प्रेम से सेवा करती रहीं।

श्लोक 28.44

चीरवासा व्रतक्षामा वेणीभूतशिरोरुहा । बभावुप पतिं शान्ता शिखा शान्तमिवानलम् ॥ ४४॥

सरल हिंदी भावार्थ: वल्कल पहने, व्रत से दुर्बल और बँधे केशों वाली शान्त रानी पति के समीप ऐसे शोभित थीं जैसे शान्त अग्नि के पास उसकी ज्योति।

श्लोक 28.45

अजानती प्रियतमं यदोपरतमङ्गना । सुस्थिरासनमासाद्य यथापूर्वमुपाचरत् ॥ ४५॥

सरल हिंदी भावार्थ: स्थिर आसन पर बैठे प्रिय पति का देहान्त हो गया है, यह न जानकर वे पहले की तरह सेवा करती रहीं।

श्लोक 28.46

यदा नोपलभेताङ्घ्रावूष्माणं पत्युरर्चती । आसीत्संविग्नहृदया यूथभ्रष्टा मृगी यथा ॥ ४६॥

सरल हिंदी भावार्थ: जब चरणसेवा करते हुए उष्णता नहीं मिली तो उनका मन अत्यन्त घबरा गया, जैसे झुण्ड से बिछुड़ी हरिणी।

श्लोक 28.47

आत्मानं शोचती दीनमबन्धुं विक्लवाश्रुभिः । स्तनावासिच्य विपिने सुस्वरं प्ररुरोद सा ॥ ४७॥

सरल हिंदी भावार्थ: स्वयं को असहाय और बन्धुरहित समझकर वे आँसुओं से भीग गईं और वन में ऊँचे स्वर से रोने लगीं।

श्लोक 28.48

उत्तिष्ठोत्तिष्ठ राजर्षे इमामुदधिमेखलाम् । दस्युभ्यः क्षत्रबन्धुभ्यो बिभ्यतीं पातुमर्हसि ॥ ४८॥

सरल हिंदी भावार्थ: वे पुकारने लगीं—राजर्षि, उठिए! डाकुओं और अयोग्य शासकों से भयभीत इस समुद्रपर्यन्त पृथ्वी की रक्षा कीजिए।

श्लोक 28.49

एवं विलपती बाला विपिनेऽनुगता पतिम् । पतिता पादयोर्भर्तू रुदत्यश्रूण्यवर्तयत् ॥ ४९॥

सरल हिंदी भावार्थ: पति के पीछे वन आई रानी इस प्रकार विलाप करती उनके चरणों पर गिर पड़ीं और आँसू बहाती रहीं।

श्लोक 28.50

चितिं दारुमयीं चित्वा तस्यां पत्युः कलेवरम् । आदीप्य चानुमरणे विलपन्ती मनो दधे ॥ ५०॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने लकड़ियों की चिता बनाई, उस पर पति का शरीर रखकर अग्नि दी और शोक में स्वयं भी देहत्याग का विचार किया। यह आख्यान की परिस्थिति है; आगे आत्मज्ञानी मित्र उन्हें समझाता है।

श्लोक 28.51

तत्र पूर्वतरः कश्चित्सखा ब्राह्मण आत्मवान् । सान्त्वयन् वल्गुना साम्ना तामाह रुदतीं प्रभो ॥ ५१॥

सरल हिंदी भावार्थ: तभी उनका पुराना आत्मज्ञानी मित्र ब्राह्मणरूप में वहाँ आया और रोती हुई रानी को मधुर हितवाणी से समझाने लगा।

श्लोक 28.52

ब्राह्मण उवाच । का त्वं कस्यासि को वायं शयानो यस्य शोचसि । जानासि किं सखायं मां येनाग्रे विचचर्थ ह ॥ ५२॥

सरल हिंदी भावार्थ: ब्राह्मण बोला—तुम कौन हो, किसकी हो और यह लेटा कौन है जिसके लिए रो रही हो? क्या मुझे अपना वह मित्र पहचानती हो जिसके साथ पहले रहा करती थीं?

श्लोक 28.53

अपि स्मरसि चात्मानमविज्ञातसखं सखे । हित्वा मां पदमन्विच्छन् भौमभोगरतो गतः ॥ ५३॥

सरल हिंदी भावार्थ: मित्र, क्या तुम्हें अपना वह स्वरूप याद है जिसका मित्र अविज्ञात था? मुझे छोड़कर तुम सांसारिक भोग का आश्रय खोजने चली गई थीं।

श्लोक 28.54

हंसावहं च त्वं चार्य सखायौ मानसायनौ । अभूतामन्तरा वौकः सहस्रपरिवत्सरान् ॥ ५४॥

सरल हिंदी भावार्थ: हम दोनों हंस, परस्पर मित्र और मानस में निवास करने वाले थे। बहुत समय तक हमारा सम्बन्ध बना रहा, फिर तुमने वह आश्रय छोड़ दिया।

श्लोक 28.55

स त्वं विहाय मां बन्धो गतो ग्राम्यमतिर्महीम् । विचरन् पदमद्राक्षीः कयाचिन्निर्मितं स्त्रिया ॥ ५५॥

सरल हिंदी भावार्थ: बन्धु, विषयों में लगी बुद्धि से मुझे छोड़ पृथ्वी पर घूमते हुए तुमने एक स्त्री द्वारा व्यवस्थित निवास देखा था।

श्लोक 28.56

पञ्चारामं नवद्वारमेकपालं त्रिकोष्ठकम् । षट्कुलं पञ्चविपणं पञ्चप्रकृति स्त्रीधवम् ॥ ५६॥

सरल हिंदी भावार्थ: उसमें पाँच उद्यान, नौ द्वार, एक रक्षक, तीन कक्ष, छह परिवार, पाँच बाजार और पाँच भौतिक तत्त्व थे; उसका स्वामी स्त्री के अधीन था।

श्लोक 28.57

पञ्चेन्द्रियार्था आरामा द्वारः प्राणा नव प्रभो । तेजोऽबन्नानि कोष्ठानि कुलमिन्द्रियसङ्ग्रहः ॥ ५७॥

सरल हिंदी भावार्थ: पाँच विषय उद्यान हैं, नौ इन्द्रियद्वार प्रवेशमार्ग हैं; तेज, जल और अन्न तीन कक्ष तथा इन्द्रियों का समूह परिवार है।

श्लोक 28.58

विपणस्तु क्रिया शक्तिर्भूतप्रकृतिरव्यया । शक्त्यधीशः पुमांस्त्वत्र प्रविष्टो नावबुध्यते ॥ ५८॥

सरल हिंदी भावार्थ: कर्म करने की शक्तियाँ बाजार और पाँच भूत उसके आधार हैं। इन शक्तियों का स्वामी जीव उस शरीर में प्रवेश करके अपना स्वरूप भूल जाता है।

श्लोक 28.59

तस्मिंस्त्वं रामया स्पृष्टो रममाणोऽश्रुतस्मृतिः । तत्सङ्गादीदृशीं प्राप्तो दशां पापीयसीं प्रभो ॥ ५९॥

सरल हिंदी भावार्थ: उस स्त्री के सङ्ग में रमते हुए तुमने सुना हुआ ज्ञान और आत्मस्मृति खो दी; उसी आसक्ति से ऐसी कठिन दशा में पहुँचे।

श्लोक 28.60

न त्वं विदर्भदुहिता नायं वीरः सुहृत्तव । न पतिस्त्वं पुरञ्जन्या रुद्धो नवमुखे यया ॥ ६०॥

सरल हिंदी भावार्थ: तुम वास्तव में विदर्भ की पुत्री नहीं, यह वीर तुम्हारा नित्य बन्धु नहीं और तुम पुरञ्जनी के पति भी नहीं हो; वे सब नौ द्वारों की देह से बने सम्बन्ध हैं।

श्लोक 28.61

माया ह्येषा मया सृष्टा यत्पुमांसं स्त्रियं सतीम् । मन्यसे नोभयं यद्वै हंसौ पश्यावयोर्गतिम् ॥ ६१॥

सरल हिंदी भावार्थ: अपने को कभी पुरुष और कभी स्त्री मानना मेरी मायारचित उपाधि है। सत्य में आत्मा इन दोनों से परे है; हम दोनों हंसों की वास्तविक स्थिति देखो।

श्लोक 28.62

अहं भवान् न चान्यस्त्वं त्वमेवाहं विचक्ष्व भोः । न नौ पश्यन्ति कवयश्छिद्रं जातु मनागपि ॥ ६२॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैं तुमसे सर्वथा अलग नहीं और तुम मुझसे असम्बद्ध नहीं। ज्ञानी हमारे सम्बन्ध में ऐसा विच्छेद नहीं देखते; अपने आत्मस्वरूप को पहचानो।

श्लोक 28.63

यथा पुरुष आत्मानमेकमादर्शचक्षुषोः । द्विधाभूतमवेक्षेत तथैवान्तरमावयोः ॥ ६३॥

सरल हिंदी भावार्थ: जैसे एक मनुष्य दर्पण और देखने की स्थिति के कारण अपने एक ही रूप को दो जैसा देखता है, वैसे ही हमारे बीच भेद दिखाई देता है।

श्लोक 28.64

एवं स मानसो हंसो हंसेन प्रतिबोधितः । स्वस्थस्तद्व्यभिचारेण नष्टामाप पुनः स्मृतिम् ॥ ६४॥

सरल हिंदी भावार्थ: उस परम हंस के समझाने से मनरूपी मानस में रहने वाले जीवहंस को होश आया। अपने स्वरूप में स्थित होकर उसे खोई आत्मस्मृति फिर मिली।

श्लोक 28.65

बर्हिष्मन्नेतदध्यात्मं पारोक्ष्येण प्रदर्शितम् । यत्परोक्षप्रियो देवो भगवान् विश्वभावनः ॥ ६५॥

सरल हिंदी भावार्थ: बर्हिष्मन्, मैंने तुम्हें यह अध्यात्मज्ञान रूपक के द्वारा दिखाया है; विश्व के पोषक भगवान को ऐसे अप्रत्यक्ष अर्थवाले उपदेश प्रिय हैं।

॥ चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 28 समाप्त ॥

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चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 29

पुरञ्जन रूपक का अर्थ और कर्मबन्धन से मुक्ति

श्लोक 29.1

प्राचीनबर्हिरुवाच । भगवंस्ते वचोऽस्माभिर्न सम्यगवगम्यते । कवयस्तद्विजानन्ति न वयं कर्ममोहिताः ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्राचीनबर्हि बोले—भगवन्, आपकी बात पूरी तरह समझ नहीं आई। ज्ञानी इसका अर्थ जानते हैं, पर हम कर्मों में मोहित हैं।

श्लोक 29.2

नारद उवाच । पुरुषं पुरञ्जनं विद्याद्यद्व्यनक्त्यात्मनः पुरम् । एकद्वित्रिचतुष्पादं बहु पादमपादकम् ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: नारद बोले—पुरञ्जन जीव को समझो, जो अपने कर्मों के अनुसार एक, दो, तीन, चार, अनेक पैरों वाले या बिना पैरों वाले शरीररूपी नगर अपनाता है।

श्लोक 29.3

योऽविज्ञाताहृतस्तस्य पुरुषस्य सखेश्वरः । यन्न विज्ञायते पुम्भिर्नामभिर्वा क्रियागुणैः ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: उसका अविज्ञात मित्र ईश्वर है, जिन्हें सामान्य लोग नाम, कर्म और गुणों के बाहरी विचार से पूरा नहीं जान सकते।

श्लोक 29.4

यदा जिघृक्षन् पुरुषः कार्त्स्न्येन प्रकृतेर्गुणान् । नवद्वारं द्विहस्ताङ्घ्रि तत्रामनुत साध्विति ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्रकृति के गुणों का विस्तृत अनुभव चाहकर जीव ने दो हाथ, दो पैर और नौ द्वारों वाला मनुष्यशरीर अपने लिए उपयुक्त माना।

श्लोक 29.5

बुद्धिं तु प्रमदां विद्यान्ममाहमिति यत्कृतम् । यामधिष्ठाय देहेऽस्मिन् पुमान् भुङ्क्तेऽक्षभिर्गुणान् ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: वह स्त्री बुद्धि है, जिससे मैं और मेरा का अभिमान बनता है। उसी का आश्रय लेकर जीव इन्द्रियों से गुणों का अनुभव करता है।

श्लोक 29.6

सखाय इन्द्रियगणा ज्ञानं कर्म च यत्कृतम् । सख्यस्तद्वृत्तयः प्राणः पञ्चवृत्तिर्यथोरगः ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: उसके मित्र ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ हैं, उनकी सहेलियाँ उनकी वृत्तियाँ हैं। पाँच सिर वाला सर्प पाँच प्रकार की गति वाला प्राण है।

श्लोक 29.7

बृहद्बलं मनो विद्यादुभयेन्द्रियनायकम् । पञ्चालाः पञ्चविषया यन्मध्ये नव खं पुरम् ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: दोनों प्रकार की इन्द्रियों का शक्तिशाली नायक मन है। पाँच विषय पञ्चालप्रदेश हैं और उनके बीच नौ छिद्रों वाला शरीरनगर है।

श्लोक 29.8

अक्षिणी नासिके कर्णौ मुखं शिश्नगुदाविति । द्वे द्वे द्वारौ बहिर्याति यस्तदिन्द्रियसंयुतः ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: दो आँखें, दो नासिकाछिद्र, दो कान, मुख, जननेन्द्रिय और गुदा नौ द्वार हैं; जीव उनके द्वारा सम्बन्धित विषयों का अनुभव करता है।

श्लोक 29.9

अक्षिणी नासिके आस्यमिति पञ्च पुरः कृताः । दक्षिणा दक्षिणः कर्ण उत्तरा चोत्तरः स्मृतः ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: आँखें, नासिकाछिद्र और मुख सामने के पाँच द्वार हैं। दक्षिण का द्वार दाहिना कान और उत्तर का बायाँ कान है।

श्लोक 29.10

पश्चिमे इत्यधो द्वारौ गुदं शिश्नमिहोच्यते । खद्योताविर्मुखी चात्र नेत्रे एकत्र निर्मिते । रूपं विभ्राजितं ताभ्यां विचष्टे चक्षुषेश्वरः ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: पीछे या नीचे के दो द्वार गुदा और जननेन्द्रिय हैं। खद्योता और आविर्मुखी दोनों आँखें हैं, जिनसे दृष्टिशक्ति के सहारे रूपरूपी विभ्राजित प्रदेश देखा जाता है।

श्लोक 29.11

नलिनी नालिनी नासे गन्धः सौरभ उच्यते । घ्राणोऽवधूतो मुख्यास्यं विपणो वाग्रसविद्रसः ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: नलिनी और नालिनी नासिकाएँ, सौरभ गन्धविषय और अवधूत घ्राणशक्ति है। मुख्या मुख, विपण वाणी और रसज्ञ स्वाद पहचानने वाली शक्ति है।

श्लोक 29.12

आपणो व्यवहारोऽत्र चित्रमन्धो बहूदनम् । पितृहूर्दक्षिणः कर्ण उत्तरो देवहूः स्मृतः ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: आपण बोलचाल–व्यवहार और बहूदन विविध भोजन है। पितृहू दाहिना कान और देवहू बायाँ कान है।

श्लोक 29.13

प्रवृत्तं च निवृत्तं च शास्त्रं पञ्चालसंज्ञितम् । पितृयानं देवयानं श्रोत्राच्छ्रुतधराद्व्रजेत् ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्रवृत्ति और निवृत्ति के शास्त्र पञ्चाल के दो भाग हैं; श्रुतधर नामक श्रवणशक्ति से कर्मपरक पितृयान और ज्ञानपरक देवयान की शिक्षा मिलती है।

श्लोक 29.14

आसुरी मेढ्रमर्वाग्द्वार्व्यवायो ग्रामिणां रतिः । उपस्थो दुर्मदः प्रोक्तो निरृतिर्गुद उच्यते ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: आसुरी जननेन्द्रिय का द्वार, ग्रामक मैथुनसुख और दुर्मद उसकी कामवृत्ति है। निर्ऋति गुदाद्वार है।

श्लोक 29.15

वैशसं नरकं पायुर्लुब्धकोऽन्धौ तु मे श‍ृणु । हस्तपादौ पुमांस्ताभ्यां युक्तो याति करोति च ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: वैशस मलत्याग का कष्टप्रदेश और लुब्धक पायु की क्रियाशक्ति है। दो नेत्रहीन सेवक हाथ और पैर हैं, जिनसे मनुष्य काम करता और चलता है।

श्लोक 29.16

अन्तःपुरं च हृदयं विषूचिर्मन उच्यते । तत्र मोहं प्रसादं वा हर्षं प्राप्नोति तद्गुणैः ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: अन्तःपुर हृदय और विषूचीन मन है। वहीं उसके गुणों के अनुसार मोह, प्रसन्नता और हर्ष होते हैं।

श्लोक 29.17

यथा यथा विक्रियते गुणाक्तो विकरोति वा । तथा तथोपद्रष्टाऽऽत्मा तद्वृत्तीरनुकार्यते ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: गुणों से रंगी बुद्धि जैसे बदलती या कार्य करती है, साक्षी आत्मा देहाभिमान के कारण उसकी वृत्तियों का अनुकरण करता हुआ प्रतीत होता है।

श्लोक 29.18

देहो रथस्त्विन्द्रियाश्वः संवत्सररयोऽगतिः । द्विकर्मचक्रस्त्रिगुणध्वजः पञ्चासुबन्धुरः ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: देह रथ, इन्द्रियाँ घोड़े, वर्ष की गति उसका वेग, पुण्य–पाप दो पहिए, तीन गुण ध्वज और पाँच प्राण उसके बन्धन हैं।

श्लोक 29.19

मनोरश्मिर्बुद्धिसूतो हृन्नीडो द्वन्द्वकूबरः । पञ्चेन्द्रियार्थप्रक्षेपः सप्तधातुवरूथकः ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: मन लगाम, बुद्धि सारथि, हृदय आसन, सुख–दुःख जैसे द्वन्द्व दो जुए, पाँच विषय आयुध और सात धातुएँ रथ के आवरण हैं।

श्लोक 29.20

आकूतिर्विक्रमो बाह्यो मृगतृष्णां प्रधावति । एकादशेन्द्रियचमूः पञ्चसूना विनोदकृत् ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: सङ्कल्प बाहरी गति बनकर विषयों की मृगतृष्णा की ओर दौड़ता है। ग्यारह इन्द्रियाँ सेना और पाँच प्रकार की प्राणिहिंसा शिकारविनोद हैं।

श्लोक 29.21

संवत्सरश्चण्डवेगः कालो येनोपलक्षितः । तस्याहानीह गन्धर्वा गन्धर्व्यो रात्रयः स्मृताः । हरन्त्यायुः परिक्रान्त्या षष्ट्युत्तरशतत्रयम् ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: चण्डवेग वर्षरूप काल है। उसके गन्धर्व दिन और गन्धर्वियाँ रातें हैं; तीन सौ साठ दिन–रात चक्र लगाकर आयु ले जाते हैं।

श्लोक 29.22

कालकन्या जरा साक्षाल्लोकस्तां नाभिनन्दति । स्वसारं जगृहे मृत्युः क्षयाय यवनेश्वरः ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: कालकन्या प्रत्यक्ष वृद्धावस्था है, जिसका कोई स्वागत नहीं करता। यवनराज मृत्यु ने प्राणियों के क्षय के लिए उसे बहन बनाया।

श्लोक 29.23

आधयो व्याधयस्तस्य सैनिका यवनाश्चराः । भूतोपसर्गाशुरयः प्रज्वारो द्विविधो ज्वरः ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: मानसिक पीड़ाएँ और शारीरिक रोग उसके सैनिक हैं। प्रज्वार प्राणान्तक ताप का रूप है, जो शरीर और मन को संतप्त करता है।

श्लोक 29.24

एवं बहुविधैर्दुःखैर्दैवभूतात्मसम्भवैः । क्लिश्यमानः शतं वर्षं देहे देही तमोवृतः ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: दैविक, भौतिक और अपने शरीर–मन से उत्पन्न अनेक दुःखों से घिरा जीव अज्ञानवश देह में अपनी आयु बिताता है।

श्लोक 29.25

प्राणेन्द्रियमनोधर्मानात्मन्यध्यस्य निर्गुणः । शेते कामलवान् ध्यायन् ममाहमिति कर्मकृत् ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: स्वरूप से गुणातीत होकर भी प्राण, इन्द्रिय और मन के धर्म अपने पर आरोपित करता है; छोटी कामनाओं में सोया, मैं–मेरा सोचकर कर्म करता रहता है।

श्लोक 29.26

यदाऽऽत्मानमविज्ञाय भगवन्तं परं गुरुम् । पुरुषस्तु विषज्जेत गुणेषु प्रकृतेः स्वदृक् ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: जब मनुष्य अपने वास्तविक आत्मा और परम गुरु भगवान को न जानकर प्रकृति के गुणों में आसक्त होता है—

श्लोक 29.27

गुणाभिमानी स तदा कर्माणि कुरुतेऽवशः । शुक्लं कृष्णं लोहितं वा यथा कर्माभिजायते ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: तब वह गुणों का अभिमान करके विवशता से सत्त्व, तम और रज के अनुरूप कर्म करता तथा उनके अनुसार जन्म पाता है।

श्लोक 29.28

शुक्लात्प्रकाशभूयिष्ठान् लोकानाप्नोति कर्हिचित् । दुःखोदर्कान् क्रियायासांस्तमः शोकोत्कटान् क्वचित् ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: कभी सात्त्विक कर्म से प्रकाशमय लोक, कभी रजोगुण से परिश्रम और अन्ततः दुःख तथा कभी तमोगुण से अन्धकार और शोक की स्थिति पाता है।

श्लोक 29.29

क्वचित्पुमान् क्वचिच्च स्त्री क्वचिन्नोभयमन्धधीः । देवो मनुष्यस्तिर्यग्वा यथा कर्मगुणं भवः ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: कर्म और गुण के अनुसार कभी पुरुष, कभी स्त्री, कभी अन्य देहरूप तथा देव, मनुष्य या पशु आदि जन्म मिलता है।

श्लोक 29.30

क्षुत्परीतो यथा दीनः सारमेयो गृहं गृहम् । चरन् विन्दति यद्दिष्टं दण्डमोदनमेव वा ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: जैसे भूखा असहाय कुत्ता घर–घर घूमकर कहीं मार और कहीं अन्न पाता है—

श्लोक 29.31

तथा कामाशयो जीव उच्चावचपथा भ्रमन् । उपर्यधो वा मध्ये वा याति दिष्टं प्रियाप्रियम् ॥ ३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: वैसे ही कामनाओं वाला जीव ऊँचे, नीचे और बीच के मार्गों में भटकता तथा अपने कर्मफल के अनुसार प्रिय–अप्रिय अनुभव पाता है।

श्लोक 29.32

दुःखेष्वेकतरेणापि दैवभूतात्महेतुषु । जीवस्य न व्यवच्छेदः स्याच्चेत्तत्तत्प्रतिक्रिया ॥ ३२॥

सरल हिंदी भावार्थ: दैविक, भौतिक और शारीरिक–मानसिक दुःखों में से किसी न किसी का सम्बन्ध बना रहता है; केवल बाहरी प्रतिकार से उनका पूर्ण अन्त नहीं होता।

श्लोक 29.33

यथा हि पुरुषो भारं शिरसा गुरुमुद्वहन् । तं स्कन्धेन स आधत्ते तथा सर्वाः प्रतिक्रियाः ॥ ३३॥

सरल हिंदी भावार्थ: सिर का भारी बोझ कन्धे पर रख लेने से उसका स्थान बदलता है, बोझ मिटता नहीं; अनेक बाहरी प्रतिकार भी ऐसे ही होते हैं।

श्लोक 29.34

नैकान्ततः प्रतीकारः कर्मणां कर्म केवलम् । द्वयं ह्यविद्योपसृतं स्वप्ने स्वप्न इवानघ ॥ ३४॥

सरल हिंदी भावार्थ: केवल दूसरे कर्म से कर्मबन्धन का स्थायी प्रतिकार नहीं होता। अज्ञान पर आधारित दोनों उपाय स्वप्न के भीतर दूसरे स्वप्न जैसे हैं।

श्लोक 29.35

अर्थे ह्यविद्यमानेऽपि संसृतिर्न निवर्तते । मनसा लिङ्गरूपेण स्वप्ने विचरतो यथा ॥ ३५॥

सरल हिंदी भावार्थ: अलग वास्तविक सत्ता न होने पर भी मन के संस्कारों से संसारानुभव चलता है, जैसे स्वप्न में व्यक्ति मनरूपी सूक्ष्म शरीर से घूमता है।

श्लोक 29.36

अथात्मनोऽर्थभूतस्य यतोऽनर्थपरम्परा । संसृतिस्तद्व्यवच्छेदो भक्त्या परमया गुरौ ॥ ३६॥

सरल हिंदी भावार्थ: आत्मा के लिए इस अनर्थपरम्परा का कारण बने संसारबन्धन का अन्त परम गुरु में श्रेष्ठ भक्ति से होता है।

श्लोक 29.37

वासुदेवे भगवति भक्तियोगः समाहितः । सध्रीचीनेन वैराग्यं ज्ञानं च जनयिष्यति ॥ ३७॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान वासुदेव में सम्यक लगाया भक्तियोग साथ ही वास्तविक ज्ञान और वैराग्य उत्पन्न करता है।

श्लोक 29.38

सोऽचिरादेव राजर्षे स्यादच्युतकथाश्रयः । श‍ृण्वतः श्रद्दधानस्य नित्यदा स्यादधीयतः ॥ ३८॥

सरल हिंदी भावार्थ: राजर्षि, अच्युत की कथा का आश्रय लेकर नित्य श्रद्धा से सुनने और अध्ययन करने वाले में यह स्थिति शीघ्र आती है।

श्लोक 29.39

यत्र भागवता राजन् साधवो विशदाशयाः । भगवद्गुणानुकथनश्रवणव्यग्रचेतसः ॥ ३९॥

सरल हिंदी भावार्थ: जहाँ निर्मल हृदय वाले भगवद्भक्त संत भगवान के गुणों को कहने और सुनने में मन लगाए रहते हैं—

श्लोक 29.40

तस्मिन् महन्मुखरिता मधुभिच्चरित्र- पीयूषशेषसरितः परितः स्रवन्ति । ता ये पिबन्त्यवितृषो नृप गाढकर्णै- स्तान् न स्पृशन्त्यशनतृड्भयशोकमोहाः ॥ ४०॥

सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ महात्माओं के मुख से भगवान की चरित्रकथामृत की धाराएँ बहती हैं। जो तन्मय कानों से उनका पान करते हैं, उन्हें भूख–प्यास, भय, शोक और मोह अन्तःकरण पर वैसे वश नहीं कर पाते।

श्लोक 29.41

एतैरुपद्रुतो नित्यं जीवलोकः स्वभावजैः । न करोति हरेर्नूनं कथामृतनिधौ रतिम् ॥ ४१॥

सरल हिंदी भावार्थ: फिर भी सामान्य जीव अपने स्वभावजन्य कष्टों में उलझा रहकर हरि के इस कथामृतनिधि में प्रेम नहीं लगाता।

श्लोक 29.42

प्रजापतिपतिः साक्षाद्भगवान् गिरिशो मनुः । दक्षादयः प्रजाध्यक्षा नैष्ठिकाः सनकादयः ॥ ४२॥

सरल हिंदी भावार्थ: स्वयं ब्रह्मा, शिव, मनु, दक्ष आदि प्रजापति और आजीवन ब्रह्मचारी सनकादि—

श्लोक 29.43

मरीचिरत्र्यङ्गिरसौ पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः । भृगुर्वसिष्ठ इत्येते मदन्ता ब्रह्मवादिनः ॥ ४३॥

सरल हिंदी भावार्थ: तथा मरीचि, अत्रि, अङ्गिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, भृगु, वसिष्ठ और मैं नारद—

श्लोक 29.44

अद्यापि वाचस्पतयस्तपोविद्यासमाधिभिः । पश्यन्तोऽपि न पश्यन्ति पश्यन्तं परमेश्वरम् ॥ ४४॥

सरल हिंदी भावार्थ: ये सब वाणी के ज्ञाता तप, विद्या और समाधि के द्वारा देखते हुए भी सबके द्रष्टा परमेश्वर का सम्पूर्ण अन्त नहीं पा सकते।

श्लोक 29.45

शब्दब्रह्मणि दुष्पारे चरन्त उरु विस्तरे । मन्त्रलिङ्गैर्व्यवच्छिन्नं भजन्तो न विदुः परम् ॥ ४५॥

सरल हिंदी भावार्थ: वेद के विशाल शब्दसमुद्र में विचरते हुए यदि मनुष्य केवल मन्त्रों के सीमित कर्मचिह्नों में अटका रहे, तो परम तत्त्व को नहीं जान पाता।

श्लोक 29.46

यदा यमनुगृह्णाति भगवानात्मभावितः । स जहाति मतिं लोके वेदे च परिनिष्ठिताम् ॥ ४६॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिस पर अन्तःकरण में चिन्तित भगवान कृपा करते हैं, वह केवल सांसारिक और वैदिक कर्मफलों में जमी आसक्ति छोड़ देता है।

श्लोक 29.47

तस्मात्कर्मसु बर्हिष्मन्नज्ञानादर्थकाशिषु । मार्थदृष्टिं कृथाः श्रोत्रस्पर्शिष्वस्पृष्टवस्तुषु ॥ ४७॥

सरल हिंदी भावार्थ: इसलिए बर्हिष्मन्, अज्ञान से आकर्षक लगने वाले फलवादी कर्मों को परम उद्देश्य मत मानो; वे कान को प्रिय लग सकते हैं, पर आत्मतत्त्व का स्पर्श नहीं करते।

श्लोक 29.48

स्वं लोकं न विदुस्ते वै यत्र देवो जनार्दनः । आहुर्धूम्रधियो वेदं सकर्मकमतद्विदः ॥ ४८॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो जनार्दन के परम धाम को नहीं जानते और केवल सकाम कर्म को ही सम्पूर्ण वेद कहते हैं, उनकी समझ अभी धुँधली है।

श्लोक 29.49

आस्तीर्य दर्भैः प्रागग्रैः कार्त्स्न्येन क्षितिमण्डलम् । स्तब्धो बृहद्वधान्मानी कर्म नावैषि यत्परम् । तत्कर्म हरितोषं यत्सा विद्या तन्मतिर्यया ॥ ४९॥

सरल हिंदी भावार्थ: पूर्वमुखी कुशों से पृथ्वी भर देना और बड़े पशुवध वाले यज्ञों का अभिमान करना परम कर्मज्ञान नहीं। कर्म वही है जिससे हरि प्रसन्न हों, विद्या वही जिससे उनमें बुद्धि लगे।

श्लोक 29.50

हरिर्देहभृतामात्मा स्वयं प्रकृतिरीश्वरः । तत्पादमूलं शरणं यतः क्षेमो नृणामिह ॥ ५०॥

सरल हिंदी भावार्थ: हरि सब देहधारियों के आत्मा, स्वतन्त्र मूलाधार और ईश्वर हैं। उनके चरणों की शरण से मनुष्यों को वास्तविक कल्याण मिलता है।

श्लोक 29.51

स वै प्रियतमश्चात्मा यतो न भयमण्वपि । इति वेद स वै विद्वान् यो विद्वान् स गुरुर्हरिः ॥ ५१॥

सरल हिंदी भावार्थ: वे ही परम प्रिय आत्मा हैं जिनसे तनिक भय नहीं। जो इसे जानता है वही ज्ञानी है; ऐसे ज्ञान का परम गुरु हरि हैं।

श्लोक 29.52

नारद उवाच । प्रश्न एवं हि सञ्छिन्नो भवतः पुरुषर्षभ । अत्र मे वदतो गुह्यं निशामय सुनिश्चितम् ॥ ५२॥

सरल हिंदी भावार्थ: नारद ने कहा—पुरुषश्रेष्ठ, तुम्हारे प्रश्न का मूल उत्तर दे दिया। अब इस निश्चित गूढ़ अर्थ को और ध्यान से सुनो।

श्लोक 29.53

क्षुद्रं चरं सुमनसां शरणे मिथित्वा रक्तं षडङ्घ्रिगणसामसु लुब्धकर्णम् । अग्रे वृकानसुतृपोऽविगणय्य यान्तं पृष्ठे मृगं मृगयलुब्धकबाणभिन्नम् ॥ ५३॥

सरल हिंदी भावार्थ: एक छोटे हरिण को देखो जो हरिणी के साथ पुष्पोद्यान में रम रहा है, भ्रमरों के गीत पर मोहित है और सामने के भेड़ियों को नहीं गिनता; पीछे से शिकारी का बाण उसे भेद देता है।

श्लोक 29.54

अस्यार्थः - सुमनः समधर्मणां स्त्रीणां शरण आश्रमे पुष्पमधुगन्धवत्क्षुद्रतमं काम्यकर्म- विपाकजं कामसुखलवं जैह्व्यौपस्थ्यादि विचिन्वन्तं मिथुनीभूय तदभिनिवेशितमनसं षडङ्घ्रिगणसामगीतवदतिमनोहरवनितादि जनालापेष्वतितरामतिप्रलोभितकर्णमग्रे वृकयूथवदात्मन आयुर्हरतोऽहोरात्रान् तान् काललवविशेषानविगणय्य गृहेषु विहरन्तं पृष्ठत एव परोक्षमनुप्रवृत्तो लुब्धकः कृतान्तोऽन्तः शरेण यमिह पराविध्यति तमिममात्मानमहो राजन् भिन्नहृदयं द्रष्टुमर्हसीति ॥ ५४॥

सरल हिंदी भावार्थ: इसका अर्थ है—जीव गृहस्थी के फूल–मधु जैसे क्षणिक स्वाद और मैथुनसुख में डूबकर प्रियजनों की मनोहर बातों में कान लगाता है। दिन–रात रूपी भेड़िए उसकी आयु हरते हैं, पर वह अनजान रहता है। पीछे छिपा कालरूपी शिकारी उसके हृदय को मृत्यु के बाण से भेदता है। राजन्, इस चित्र में अपनी स्थिति पहचानो।

श्लोक 29.55

स त्वं विचक्ष्य मृगचेष्टितमात्मनोऽन्त- श्चित्तं नियच्छ हृदि कर्णधुनीं च चित्ते । जह्यङ्गनाश्रममसत्तमयूथगाथं प्रीणीहि हंसशरणं विरम क्रमेण ॥ ५५॥

सरल हिंदी भावार्थ: अपने भीतर इस हरिण जैसे आचरण को देखकर चित्त संयमित करो और कानों की विषयधारा भीतर मोड़ो। आसक्तिजनक जीवन और निकृष्ट गोष्ठियाँ धीरे–धीरे छोड़कर परम हंसों के आश्रय भगवान को प्रसन्न करो।

श्लोक 29.56

राजोवाच । श्रुतमन्वीक्षितं ब्रह्मन् भगवान् यदभाषत । नैतज्जानन्त्युपाध्यायाः किं न ब्रूयुर्विदुर्यदि ॥ ५६॥

सरल हिंदी भावार्थ: राजा बोले—गुरुदेव, आपका उपदेश सुना और विचार किया। मेरे पुराने शिक्षक इसे जानते होते तो अवश्य बताते; वे शायद इसका मर्म नहीं जानते थे।

श्लोक 29.57

संशयोऽत्र तु मे विप्र सञ्छिन्नस्तत्कृतो महान् । ऋषयोऽपि हि मुह्यन्ति यत्र नेन्द्रियवृत्तयः ॥ ५७॥

सरल हिंदी भावार्थ: आपने बड़ा संशय काट दिया, पर एक गहरी शङ्का पूछना चाहता हूँ जिसमें ऋषि भी उलझते हैं और इन्द्रियाँ उत्तर नहीं दे सकतीं।

श्लोक 29.58

कर्माण्यारभते येन पुमानिह विहाय तम् । अमुत्रान्येन देहेन जुष्टानि स यदश्नुते ॥ ५८॥

सरल हिंदी भावार्थ: मनुष्य जिस शरीर से कर्म करता है उसे छोड़ देता है, फिर दूसरे लोक में दूसरे शरीर से उन्हीं कर्मों का फल कैसे भोगता है?

श्लोक 29.59

इति वेदविदां वादः श्रूयते तत्र तत्र ह । कर्म यत्क्रियते प्रोक्तं परोक्षं न प्रकाशते ॥ ५९॥

सरल हिंदी भावार्थ: वेदज्ञ ऐसा कहते हैं, पर किया कर्म क्रिया समाप्त होने पर दिखाई नहीं देता। फिर फल का सम्बन्ध कैसे बना रहता है?

श्लोक 29.60

नारद उवाच । येनैवारभते कर्म तेनैवामुत्र तत्पुमान् । भुङ्क्ते ह्यव्यवधानेन लिङ्गेन मनसा स्वयम् ॥ ६०॥

सरल हिंदी भावार्थ: नारद बोले—जिस मनरूपी सूक्ष्म शरीर से कर्म का सङ्कल्प करता है, उसी निरन्तर बने रहने वाले सूक्ष्म आधार से वह आगे उसका फल भोगता है।

श्लोक 29.61

शयानमिममुत्सृज्य श्वसन्तं पुरुषो यथा । कर्मात्मन्याहितं भुङ्क्ते तादृशेनेतरेण वा ॥ ६१॥

सरल हिंदी भावार्थ: जैसे सोते समय साँस लेते स्थूल शरीर को छोड़ मनुष्य स्वप्न में समान या अलग रूप के मनोमय शरीर से संचित अनुभव भोगता है।

श्लोक 29.62

ममैते मनसा यद्यदसावहमिति ब्रुवन् । गृह्णीयात्तत्पुमान् राद्धं कर्म येन पुनर्भवः ॥ ६२॥

सरल हिंदी भावार्थ: मन जिन वस्तुओं को मेरा और जिन रूपों को मैं मानकर पकड़ता है, उन्हीं से उसके कर्मसंस्कार और पुनर्जन्म का सम्बन्ध बनता है।

श्लोक 29.63

यथानुमीयते चित्तमुभयैरिन्द्रियेहितैः । एवं प्राग्देहजं कर्म लक्ष्यते चित्तवृत्तिभिः ॥ ६३॥

सरल हिंदी भावार्थ: जैसे ज्ञान और कर्मेन्द्रियों के व्यवहार से चित्त का अनुमान होता है, वैसे चित्तवृत्तियों से पूर्वदेह के कर्मों का संकेत जाना जाता है।

श्लोक 29.64

नानुभूतं क्व चानेन देहेनादृष्टमश्रुतम् । कदाचिदुपलभ्येत यद्रूपं यादृगात्मनि ॥ ६४॥

सरल हिंदी भावार्थ: मन में कभी ऐसा रूप भी उभरता है जिसे इस शरीर ने न देखा, न सुना और न अनुभव किया हो—नारद इसे पूर्वसंस्कार के तर्क में रखते हैं।

श्लोक 29.65

तेनास्य तादृशं राजन् लिङ्गिनो देहसम्भवम् । श्रद्धत्स्वाननुभूतोऽर्थो न मनः स्प्रष्टुमर्हति ॥ ६५॥

सरल हिंदी भावार्थ: राजन्, इस परम्परागत विवेचन में वैसी मनोवृत्ति सूक्ष्म जीव के पूर्वदेहसम्बन्ध का संकेत मानी जाती है, क्योंकि अनुभवसंस्कार के बिना मन में उसका स्पर्श नहीं माना गया।

श्लोक 29.66

मन एव मनुष्यस्य पूर्वरूपाणि शंसति । भविष्यतश्च भद्रं ते तथैव न भविष्यतः ॥ ६६॥

सरल हिंदी भावार्थ: मनुष्य का मन उसके पहले के रूपों, आगे की सम्भावनाओं और देहबन्धन से मुक्ति की दिशा का भी परिचय देता है; तुम्हारा कल्याण हो।

श्लोक 29.67

अदृष्टमश्रुतं चात्र क्वचिन्मनसि दृश्यते । यथा तथानुमन्तव्यं देशकालक्रियाश्रयम् ॥ ६७॥

सरल हिंदी भावार्थ: इस जन्म में न देखी–सुनी बात कभी मन में दिखे तो उसे देश, काल, कर्म और संस्कारों के सम्बन्ध से समझना चाहिए।

श्लोक 29.68

सर्वे क्रमानुरोधेन मनसीन्द्रियगोचराः । आयान्ति वर्गशो यान्ति सर्वे समनसो जनाः ॥ ६८॥

सरल हिंदी भावार्थ: इन्द्रियों के विषय क्रम और समूह से मन में आते–जाते हैं; जीव अपनी मनोवृत्ति के साथ उनका अनुभव करता है।

श्लोक 29.69

सत्त्वैकनिष्ठे मनसि भगवत्पार्श्ववर्तिनि । तमश्चन्द्रमसीवेदमुपरज्यावभासते ॥ ६९॥

सरल हिंदी भावार्थ: जब मन शुद्ध सत्त्व में स्थिर होकर भगवान के समीप होता है, तब शेष अज्ञान वैसे पहचाना जाता है जैसे चन्द्रमा पर लगा अँधेरा धब्बा।

श्लोक 29.70

नाहं ममेति भावोऽयं पुरुषे व्यवधीयते । यावद्बुद्धिमनोऽक्षार्थगुणव्यूहो ह्यनादिमान् ॥ ७०॥

सरल हिंदी भावार्थ: जब तक बुद्धि, मन, इन्द्रिय, विषय और गुणों का अनादि संस्कारसमूह बना है, तब तक जीव का मैं–मेरा का अभिमान पूरी तरह नहीं मिटता।

श्लोक 29.71

सुप्तिमूर्च्छोपतापेषु प्राणायनविघाततः । नेहतेऽहमिति ज्ञानं मृत्युप्रज्वारयोरपि ॥ ७१॥

सरल हिंदी भावार्थ: नींद, मूर्च्छा, तीव्र कष्ट, मृत्यु या प्राणक्रिया की बाधा में मैं का स्पष्ट ज्ञान प्रकट नहीं रहता; इससे उसका संस्कार पूर्ण नष्ट हो गया, ऐसा नहीं।

श्लोक 29.72

गर्भे बाल्येऽप्यपौष्कल्यादेकादशविधं तदा । लिङ्गं न दृश्यते यूनः कुह्वां चन्द्रमसो यथा ॥ ७२॥

सरल हिंदी भावार्थ: गर्भ और बाल्य में मन सहित ग्यारह इन्द्रियों की क्षमता पूरी विकसित नहीं दिखती, जैसे अमावस्या में चन्द्रमा छिपा रहता है; युवा अवस्था में वह स्पष्ट होती है।

श्लोक 29.73

अर्थे ह्यविद्यमानेऽपि संसृतिर्न निवर्तते । ध्यायतो विषयानस्य स्वप्नेऽनर्थागमो यथा ॥ ७३॥

सरल हिंदी भावार्थ: विषयों की स्वतन्त्र वास्तविकता न होने पर भी उनका चिन्तन संसारभ्रम चलाता है, जैसे स्वप्न का अनर्थ जाग्रत सत्य न होकर भी अनुभव होता है।

श्लोक 29.74

एवं पञ्चविधं लिङ्गं त्रिवृत्षोडशविस्तृतम् । एष चेतनया युक्तो जीव इत्यभिधीयते ॥ ७४॥

सरल हिंदी भावार्थ: पाँच सूक्ष्म विषयों, तीन गुणों और सोलह विस्तारों वाला यह सूक्ष्म सङ्घात जब चेतना से जुड़ता है तो जीव की उपाधि कहलाता है।

श्लोक 29.75

अनेन पुरुषो देहानुपादत्ते विमुञ्चति । हर्षं शोकं भयं दुःखं सुखं चानेन विन्दति ॥ ७५॥

सरल हिंदी भावार्थ: इसी सूक्ष्म आधार से जीव शरीर ग्रहण और त्याग करता तथा हर्ष, शोक, भय, दुःख और सुख अनुभव करता है।

श्लोक 29.76

यथा तृणजलूकेयं नापयात्यपयाति च । न त्यजेन्म्रियमाणोऽपि प्राग्देहाभिमतिं जनः ॥ ७६॥

सरल हिंदी भावार्थ: जैसे तृणजलूका आगे का आश्रय पकड़ने से पहले पिछला नहीं छोड़ती, वैसे मरते समय भी जीव पुराने शरीर का अभिमान तुरंत नहीं छोड़ता।

श्लोक 29.77

यावदन्यं न विन्देत व्यवधानेन कर्मणाम् । मन एव मनुष्येन्द्र भूतानां भवभावनम् ॥ ७७॥

सरल हिंदी भावार्थ: जब तक कर्मों के अन्तराल से नया आश्रय न मिले, पिछली प्रवृत्ति का सम्बन्ध रहता है। राजन्, जीवों के अगले जन्म की रचना में मन मुख्य माध्यम है।

श्लोक 29.78

यदाक्षैश्चरितान् ध्यायन् कर्माण्याचिनुतेऽसकृत् । सति कर्मण्यविद्यायां बन्धः कर्मण्यनात्मनः ॥ ७८॥

सरल हिंदी भावार्थ: इन्द्रियों के अनुभवों का बार–बार ध्यान करते हुए जीव कर्मसंस्कार जमा करता है। अज्ञान और कर्म बने रहने पर अनात्म वस्तुओं से बन्धन चलता है।

श्लोक 29.79

अतस्तदपवादार्थं भज सर्वात्मना हरिम् । पश्यंस्तदात्मकं विश्वं स्थित्युत्पत्त्यप्यया यतः ॥ ७९॥

सरल हिंदी भावार्थ: इस बन्धन को दूर करने के लिए समस्त विश्व को भगवान पर आश्रित जानकर सर्वभाव से हरि का भजन करो; उन्हीं से सृष्टि, स्थिति और लय है।

श्लोक 29.80

मैत्रेय उवाच । भागवतमुख्यो भगवान् नारदो हंसयोर्गतिम् । प्रदर्श्य ह्यमुमामन्त्र्य सिद्धलोकं ततोऽगमत् ॥ ८०॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—प्रमुख भगवद्भक्त नारद ने जीव और परमात्मा के दोनों हंसों की गति समझाई, राजा से विदा ली और सिद्धलोक चले गए।

श्लोक 29.81

प्राचीनबर्ही राजर्षिः प्रजासर्गाभिरक्षणे । आदिश्य पुत्रानगमत्तपसे कपिलाश्रमम् ॥ ८१॥

सरल हिंदी भावार्थ: राजर्षि प्राचीनबर्हि ने पुत्रों को सृष्टिविस्तार और पालन का उत्तरदायित्व दिया तथा तप के लिए कपिलाश्रम चले गए।

श्लोक 29.82

तत्रैकाग्रमना वीरो गोविन्दचरणाम्बुजम् । विमुक्तसङ्गोऽनुभजन् भक्त्या तत्साम्यतामगात् ॥ ८२॥

सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ आसक्ति छोड़कर एकाग्र मन से गोविन्द के चरणों का भजन करते हुए वे भगवत्स्वरूप के अनुरूप निर्मल अवस्था को प्राप्त हुए।

श्लोक 29.83

एतदध्यात्मपारोक्ष्यं गीतं देवर्षिणानघ । यः श्रावयेद्यः श‍ृणुयात्स लिङ्गेन विमुच्यते ॥ ८३॥

सरल हिंदी भावार्थ: निष्पाप विदुर, देवर्षि के गाए इस अध्यात्मरूपक को सुनने या सुनाने वाला सूक्ष्म बन्धन से मुक्ति की दिशा पाता है।

श्लोक 29.84

एतन्मुकुन्दयशसा भुवनं पुनानं देवर्षिवर्यमुखनिःसृतमात्मशौचम् । यः कीर्त्यमानमधिगच्छति पारमेष्ठ्यं नास्मिन् भवे भ्रमति मुक्तसमस्तबन्धः ॥ ८४॥

सरल हिंदी भावार्थ: देवर्षि के मुख से निकली मुकुन्दयश की यह कथा जगत और अन्तःकरण को पवित्र करती है। उसका मर्म ग्रहण करने वाला उच्च भगवत्पद पाकर बन्धनों से मुक्त होता और संसार में नहीं भटकता।

श्लोक 29.85

अध्यात्मपारोक्ष्यमिदं मयाधिगतमद्भुतम् । एवं स्त्रियाऽऽश्रमः पुंसश्छिन्नोऽमुत्र च संशयः ॥ ८५॥

सरल हिंदी भावार्थ: यह अद्भुत अध्यात्मरूपक सुनकर राजा का आसक्त गृहाभिमान और परलोकसम्बन्धी संशय दोनों दूर हुए।

॥ चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 29 समाप्त ॥

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चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 30

प्रचेताओं को भगवान का दर्शन और मारिषा विवाह

श्लोक 30.1

विदुर उवाच । ये त्वयाभिहिता ब्रह्मन् सुताः प्राचीनबर्हिषः । ते रुद्रगीतेन हरिं सिद्धिमापुः प्रतोष्य काम् ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: विदुर ने पूछा—प्राचीनबर्हि के जिन पुत्रों का आपने उल्लेख किया, उन्होंने रुद्रगीत से हरि को प्रसन्न करके कौन सी सिद्धि पाई?

श्लोक 30.2

किं बार्हस्पत्येह परत्र वाथ कैवल्यनाथप्रियपार्श्ववर्तिनः । आसाद्य देवं गिरिशं यदृच्छया प्रापुः परं नूनमथ प्रचेतसः ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: बृहस्पति के शिष्य, मुक्तिनाथ के प्रिय शिव का अनायास सान्निध्य पाकर प्रचेताओं को इस लोक या परलोक में अवश्य परम लाभ मिला होगा; बताइए।

श्लोक 30.3

मैत्रेय उवाच । प्रचेतसोऽन्तरुदधौ पितुरादेशकारिणः । जपयज्ञेन तपसा पुरञ्जनमतोषयन् ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—पिता की आज्ञा मानते हुए प्रचेताओं ने समुद्र में तप और जपयज्ञ से सभी शरीरों में स्थित परम पुरुष को प्रसन्न किया।

श्लोक 30.4

दशवर्षसहस्रान्ते पुरुषस्तु सनातनः । तेषामाविरभूत्कृच्छ्रं शान्तेन शमयन् रुचा ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: दस हजार वर्षों के अन्त में सनातन पुरुष उन्हें दर्शन देने आए; उनकी शान्त कान्ति ने तप का कष्ट दूर किया।

श्लोक 30.5

सुपर्णस्कन्धमारूढो मेरुश‍ृङ्गमिवाम्बुदः । पीतवासा मणिग्रीवः कुर्वन् वितिमिरा दिशः ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: गरुड़ के कन्धे पर बैठे वे मेरुशिखर पर मेघ जैसे लगते थे। पीतवस्त्र और कण्ठमणि से शोभित होकर दिशाओं का अन्धकार मिटा रहे थे।

श्लोक 30.6

काशिष्णुना कनकवर्णविभूषणेन भ्राजत्कपोलवदनो विलसत्किरीटः । अष्टायुधैरनुचरैर्मुनिभिः सुरेन्द्रै- रासेवितो गरुडकिन्नरगीतकीर्तिः ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: स्वर्णप्रभा आभूषण, प्रकाशित मुख–कपोल और चमकता किरीट था। आठ आयुध, अनुचर, मुनि और देवता उनकी सेवा में थे; गरुड़ और किन्नर कीर्ति गा रहे थे।

श्लोक 30.7

पीनायताष्टभुजमण्डलमध्यलक्ष्म्या स्पर्धच्छ्रिया परिवृतो वनमालयाऽऽद्यः । बर्हिष्मतः पुरुष आह सुतान् प्रपन्नान् पर्जन्यनादरुतया सघृणावलोकः ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: आठ लम्बी पुष्ट भुजाओं के बीच लक्ष्मी और उनसे मानो होड़ करती वनमाला शोभित थीं। करुणादृष्टि वाले आदिपुरुष ने मेघगम्भीर वाणी से शरणागत राजकुमारों से कहा।

श्लोक 30.8

श्रीभगवानुवाच । वरं वृणीध्वं भद्रं वो यूयं मे नृपनन्दनाः । सौहार्देनापृथग्धर्मास्तुष्टोऽहं सौहृदेन वः ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान बोले—राजकुमारो, तुम्हारा कल्याण हो; वर माँगो। समान धर्म और परस्पर सौहार्द रखने वाले तुम भाइयों के प्रेम से मैं प्रसन्न हूँ।

श्लोक 30.9

योऽनुस्मरति सन्ध्यायां युष्माननुदिनं नरः । तस्य भ्रातृष्वात्मसाम्यं तथा भूतेषु सौहृदम् ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो प्रतिदिन सन्ध्या में तुम्हारा स्मरण करेगा, उसके भीतर भाइयों के प्रति समता और सभी प्राणियों के प्रति मैत्री बढ़ेगी।

श्लोक 30.10

ये तु मां रुद्रगीतेन सायं प्रातः समाहिताः । स्तुवन्त्यहं कामवरान् दास्ये प्रज्ञां च शोभनाम् ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो प्रातः–सायं एकाग्र होकर रुद्रगीत से मेरी स्तुति करेगा, उसे योग्य अभिलषित वर और शुभ बुद्धि दूँगा।

श्लोक 30.11

यद्यूयं पितुरादेशमग्रहीष्ट मुदान्विताः । अथो व उशती कीर्तिर्लोकाननु भविष्यति ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: तुमने प्रसन्नता से पिता की आज्ञा मानी है; इसलिए तुम्हारी मंगलमयी कीर्ति लोकों में फैलेगी।

श्लोक 30.12

भविता विश्रुतः पुत्रोऽनवमो ब्रह्मणो गुणैः । य एतामात्मवीर्येण त्रिलोकीं पूरयिष्यति ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: तुम्हें ऐसा विख्यात पुत्र मिलेगा जो गुणों में ब्रह्मा से न्यून न होगा और अपने प्रभाव से तीनों लोकों में प्रजा का विस्तार करेगा।

श्लोक 30.13

कण्डोः प्रम्लोचया लब्धा कन्या कमललोचना । तां चापविद्धां जगृहुर्भूरुहा नृपनन्दनाः ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: कण्डु और प्रम्लोचा की कमलनयनी कन्या को माता ने छोड़ दिया था; वृक्षों ने उसे अपनाकर पाला।

श्लोक 30.14

क्षुत्क्षामाया मुखे राजा सोमः पीयूषवर्षिणीम् । देशिनीं रोदमानाया निदधे स दयान्वितः ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: भूख से दुर्बल और रोती कन्या के मुख में करुणामय सोम ने अमृतरस देने वाली अपनी तर्जनी रखी और उसका पोषण किया।

श्लोक 30.15

प्रजाविसर्ग आदिष्टाः पित्रा मामनुवर्तता । तत्र कन्यां वरारोहां तामुद्वहत मा चिरम् ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: मेरे अनुगामी तुम्हारे पिता ने तुम्हें सन्तानविस्तार का कार्य दिया है; इसलिए उस सुन्दर कन्या से शीघ्र विवाह करो।

श्लोक 30.16

अपृथग्धर्मशीलानां सर्वेषां वः सुमध्यमा । अपृथग्धर्मशीलेयं भूयात्पत्न्यर्पिताशया ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: तुम सबके धर्म और आचरण समान हैं; वह भी उसी एक धर्मभाव से समर्पित होकर तुम सबकी पत्नी होगी। यह कथा की विशिष्ट वैवाहिक व्यवस्था है।

श्लोक 30.17

दिव्यवर्षसहस्राणां सहस्रमहतौजसः । भौमान् भोक्ष्यथ भोगान् वै दिव्यांश्चानुग्रहान्मम ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: मेरी कृपा से तुम बहुत दीर्घ दिव्यकाल तक पृथ्वी और दिव्यलोक के भोग प्राप्त करोगे; कथा उस अवधि को दस लाख दिव्य वर्ष कहती है।

श्लोक 30.18

अथ मय्यनपायिन्या भक्त्या पक्वगुणाशयाः । उपयास्यथ मद्धाम निर्विद्य निरयादतः ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: फिर अचल भक्ति से तुम्हारे गुणसंस्कार परिपक्व होंगे। इस दुःखमय संसार से वैराग्य पाकर तुम मेरे धाम आओगे।

श्लोक 30.19

गृहेष्वाविशतां चापि पुंसां कुशलकर्मणाम् । मद्वार्ता यातयामानां न बन्धाय गृहा मताः ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: कल्याणकारी कर्म करते और मेरी कथाओं में समय बिताते गृहस्थों के लिए घर भी बन्धन का कारण नहीं बनता।

श्लोक 30.20

न व्यवद्धृदये यज्ज्ञो ब्रह्मैतद्ब्रह्मवादिभिः । न मुह्यन्ति न शोचन्ति न हृष्यन्ति यतो गताः ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: क्योंकि उनके हृदय में ज्ञानी जिस ब्रह्म का अनुभव करते हैं वह ढकता नहीं। उस स्थिति में पहुँचकर वे मोह, शोक और असंयत हर्ष के वश नहीं होते।

श्लोक 30.21

मैत्रेय उवाच । एवं ब्रुवाणं पुरुषार्थभाजनं जनार्दनं प्राञ्जलयः प्रचेतसः । तद्दर्शनध्वस्ततमोरजोमला गिरागृणन् गद्गदया सुहृत्तमम् ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—दर्शन से रज–तम का मल मिटे प्रचेताओं ने हाथ जोड़कर पुरुषार्थों के आश्रय और परम मित्र जनार्दन की गद्गद वाणी से स्तुति की।

श्लोक 30.22

प्रचेतस ऊचुः । नमो नमः क्लेशविनाशनाय निरूपितोदारगुणाह्वयाय । मनोवचोवेगपुरोजवाय सर्वाक्षमार्गैरगताध्वने नमः ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्रचेता बोले—क्लेश मिटाने वाले, उदार गुणों और नामों से प्रसिद्ध, मन–वाणी के वेग से परे तथा इन्द्रियों की पहुँच से अगम प्रभु को बार–बार नमस्कार।

श्लोक 30.23

शुद्धाय शान्ताय नमः स्वनिष्ठया मनस्यपार्थं विलसद्द्वयाय । नमो जगत्स्थानलयोदयेषु गृहीतमायागुणविग्रहाय ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: अपने स्वरूप में शुद्ध और शान्त, मन के द्वैतभ्रम से परे आपको प्रणाम। जगत की सृष्टि, पालन और लय के लिए मायागुणमय रूप धारण करने वाले प्रभु को नमस्कार।

श्लोक 30.24

नमो विशुद्धसत्त्वाय हरये हरिमेधसे । वासुदेवाय कृष्णाय प्रभवे सर्वसात्वताम् ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: विशुद्ध सत्त्वस्वरूप, हरि, दिव्य बुद्धि वाले वासुदेव कृष्ण और सभी भक्तों के स्वामी को प्रणाम है।

श्लोक 30.25

नमः कमलनाभाय नमः कमलमालिने । नमः कमलपादाय नमस्ते कमलेक्षण ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: कमलनाभ, कमलमालाधारी, कमलचरण और कमलनयन प्रभु को नमस्कार है।

श्लोक 30.26

नमः कमलकिञ्जल्कपिशङ्गामलवाससे । सर्वभूतनिवासाय नमोऽयुङ्क्ष्महि साक्षिणे ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: कमलकेसर जैसे पीले निर्मल वस्त्रधारी, समस्त प्राणियों के आश्रय और साक्षी भगवान को हम प्रणाम करते हैं।

श्लोक 30.27

रूपं भगवता त्वेतदशेषक्लेशसङ्क्षयम् । आविष्कृतं नः क्लिष्टानां किमन्यदनुकम्पितम् ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: आपने कष्ट पाए हम लोगों के सामने समस्त क्लेशहर अपना रूप प्रकट किया; इससे बढ़कर कृपा और क्या होगी?

श्लोक 30.28

एतावत्त्वं हि विभुभिर्भाव्यं दीनेषु वत्सलैः । यदनुस्मर्यते काले स्वबुद्ध्याभद्ररन्धन ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: दीनवत्सल समर्थ स्वामी का यही अनुग्रह है कि वह अपने आश्रित को समय पर याद करे। अमंगल मिटाने वाले प्रभु, आपने हमारी सुधि ली।

श्लोक 30.29

येनोपशान्तिर्भूतानां क्षुल्लकानामपीह ताम् । अन्तर्हितोऽन्तर्हृदये कस्मान्नो वेद नाशिषः ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: सबसे छोटे जीव का भी कल्याण जिससे हो, वह इच्छा भी अन्तर्हृदय में स्थित आपसे कैसे छिप सकती है?

श्लोक 30.30

असावेव वरोऽस्माकमीप्सितो जगतः पते । प्रसन्नो भगवान् येषामपवर्गगुरुर्गतिः ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: जगत्पति, यही हमारा इच्छित वर है कि मुक्ति के गुरु और परम आश्रय भगवान हम पर प्रसन्न हैं।

श्लोक 30.31

वरं वृणीमहेऽथापि नाथ त्वत्परतः परात् । न ह्यन्तस्त्वद्विभूतीनां सोऽनन्त इति गीयसे ॥ ३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: फिर भी सर्वोच्च प्रभु, आपसे एक वर माँगते हैं। आपकी विभूतियों का अन्त नहीं, इसलिए आप अनन्त कहलाते हैं।

श्लोक 30.32

पारिजातेऽञ्जसा लब्धे सारङ्गोऽन्यन्न सेवते । त्वदङ्घ्रिमूलमासाद्य साक्षात्किं किं वृणीमहि ॥ ३२॥

सरल हिंदी भावार्थ: पारिजात मिल जाने पर भ्रमर दूसरे फूलों का आश्रय नहीं खोजता। आपके चरण मिल जाने पर हम और क्या माँगें?

श्लोक 30.33

यावत्ते मायया स्पृष्टा भ्रमाम इह कर्मभिः । तावद्भवत्प्रसङ्गानां सङ्गः स्यान्नो भवे भवे ॥ ३३॥

सरल हिंदी भावार्थ: जब तक माया और कर्मों से इस संसार में घूमना पड़े, तब तक जन्म–जन्म में आपके भक्तों का सङ्ग मिलता रहे।

श्लोक 30.34

तुलयाम लवेनापि न स्वर्गं नापुनर्भवम् । भगवत्सङ्गिसङ्गस्य मर्त्यानां किमुताशिषः ॥ ३४॥

सरल हिंदी भावार्थ: भक्तों के सङ्ग के एक क्षण की तुलना भी स्वर्ग या मुक्ति से नहीं करते; फिर नश्वर वरों का क्या मूल्य!

श्लोक 30.35

यत्रेड्यन्ते कथा मृष्टास्तृष्णायाः प्रशमो यतः । निर्वैरं यत्र भूतेषु नोद्वेगो यत्र कश्चन ॥ ३५॥

सरल हिंदी भावार्थ: जहाँ आपकी मधुर कथा गाई जाती है, वहाँ तृष्णा शान्त होती है, प्राणियों के प्रति वैर नहीं रहता और किसी को भय नहीं दिया जाता।

श्लोक 30.36

यत्र नारायणः साक्षाद्भगवान् न्यासिनां गतिः । संस्तूयते सत्कथासु मुक्तसङ्गैः पुनः पुनः ॥ ३६॥

सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ अनासक्त संतों की सत्कथाओं में त्यागियों के परम आश्रय साक्षात नारायण की बार–बार स्तुति होती है।

श्लोक 30.37

तेषां विचरतां पद्भ्यां तीर्थानां पावनेच्छया । भीतस्य किं न रोचेत तावकानां समागमः ॥ ३७॥

सरल हिंदी भावार्थ: आपके भक्त तीर्थों को भी पवित्र करने के लिए घूमते हैं। संसार से भयभीत किस व्यक्ति को उनका मिलन प्रिय न होगा?

श्लोक 30.38

वयं तु साक्षाद्भगवन् भवस्य प्रियस्य सख्युः क्षणसङ्गमेन । सुदुश्चिकित्स्यस्य भवस्य मृत्यो- र्भिषक्तमं त्वाद्य गतिं गताः स्म ॥ ३८॥

सरल हिंदी भावार्थ: आपके प्रिय मित्र शिव के थोड़े समय के सङ्ग से ही आज हमें दुश्चिकित्स्य जन्म–मरण के सर्वोत्तम वैद्य और परम आश्रय आपके चरण मिले हैं।

श्लोक 30.39

यन्नः स्वधीतं गुरवः प्रसादिता विप्राश्च वृद्धाश्च सदानुवृत्त्या । आर्या नताः सुहृदो भ्रातरश्च सर्वाणि भूतान्यनसूययैव ॥ ३९॥

सरल हिंदी भावार्थ: हमने जो अध्ययन किया, गुरु, ज्ञानियों और वृद्धों को सेवा से प्रसन्न किया तथा आदरणीयों, मित्रों, भाइयों और सभी प्राणियों का ईर्ष्यारहित सम्मान किया—

श्लोक 30.40

यन्नः सुतप्तं तप एतदीश निरन्धसां कालमदभ्रमप्सु । सर्वं तदेतत्पुरुषस्य भूम्नो वृणीमहे ते परितोषणाय ॥ ४०॥

सरल हिंदी भावार्थ: और दीर्घकाल जल में निराहार रहकर जो तप किया—वह सब, अनन्त पुरुष, केवल आपकी प्रसन्नता के लिए समर्पित है।

श्लोक 30.41

मनुः स्वयम्भूर्भगवान् भवश्च येऽन्ये तपोज्ञानविशुद्धसत्त्वाः । अदृष्टपारा अपि यन्महिम्नः स्तुवन्त्यथो त्वात्मसमं गृणीमः ॥ ४१॥

सरल हिंदी भावार्थ: मनु, ब्रह्मा, शिव और तप–ज्ञान से निर्मल महात्मा आपकी महिमा का अन्त न पाकर भी स्तुति करते हैं; हम भी अपनी क्षमता के अनुसार आपका गुणगान करते हैं।

श्लोक 30.42

नमः समाय शुद्धाय पुरुषाय पराय च । वासुदेवाय सत्त्वाय तुभ्यं भगवते नमः ॥ ४२॥

सरल हिंदी भावार्थ: समदर्शी, शुद्ध, परम पुरुष, सत्त्वस्वरूप भगवान वासुदेव आपको प्रणाम है।

श्लोक 30.43

मैत्रेय उवाच । इति प्रचेतोभिरभिष्टुतो हरिः प्रीतस्तथेत्याह शरण्यवत्सलः । अनिच्छतां यानमतृप्तचक्षुषां ययौ स्वधामानपवर्गवीर्यः ॥ ४३॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—स्तुति सुनकर शरणागतवत्सल हरि प्रसन्न हुए और बोले—ऐसा ही हो। प्रचेता उन्हें जाते देखना नहीं चाहते थे, फिर भी अविनाशी प्रभाव वाले भगवान अपने धाम गए।

श्लोक 30.44

अथ निर्याय सलिलात्प्रचेतस उदन्वतः । वीक्ष्याकुप्यन् द्रुमैश्छन्नां गां गां रोद्धुमिवोच्छ्रितैः ॥ ४४॥

सरल हिंदी भावार्थ: समुद्र से बाहर आकर प्रचेताओं ने पृथ्वी को ऊँचे वृक्षों से ढका देखा, मानो वे स्थान रोक रहे हों; इससे वे क्रुद्ध हुए।

श्लोक 30.45

ततोऽग्निमारुतौ राजन्नमुञ्चन् मुखतो रुषा । महीं निर्वीरुधं कर्तुं संवर्तक इवात्यये ॥ ४५॥

सरल हिंदी भावार्थ: क्रोध में उन्होंने मुख से अग्नि और वायु छोड़ी और पृथ्वी को वनस्पतिरहित करने लगे, जैसे प्रलय में संवर्तक अग्नि होती है।

श्लोक 30.46

भस्मसात्क्रियमाणांस्तान् द्रुमान् वीक्ष्य पितामहः । आगतः शमयामास पुत्रान् बर्हिष्मतो नयैः ॥ ४६॥

सरल हिंदी भावार्थ: वृक्षों को जलते देखकर ब्रह्मा आए और नीति के वचनों से प्राचीनबर्हि के पुत्रों का क्रोध शान्त किया।

श्लोक 30.47

तत्रावशिष्टा ये वृक्षा भीता दुहितरं तदा । उज्जह्रुस्ते प्रचेतोभ्य उपदिष्टाः स्वयम्भुवा ॥ ४७॥

सरल हिंदी भावार्थ: बचे हुए भयभीत वृक्षों ने ब्रह्मा के निर्देश पर अपनी पाली कन्या प्रचेताओं को समर्पित की।

श्लोक 30.48

ते च ब्रह्मण आदेशान्मारिषामुपयेमिरे । यस्यां महदवज्ञानादजन्यजनयोनिजः ॥ ४८॥

सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मा की आज्ञा से प्रचेताओं ने मारिषा से विवाह किया। उनसे वही दक्ष फिर जन्मे जो महात्मा शिव की अवज्ञा के कारण पूर्व स्थिति से च्युत हुए थे।

श्लोक 30.49

चाक्षुषे त्वन्तरे प्राप्ते प्राक्सर्गे कालविद्रुते । यः ससर्ज प्रजा इष्टाः स दक्षो दैवचोदितः ॥ ४९॥

सरल हिंदी भावार्थ: चाक्षुष मन्वन्तर में पूर्व सृष्टि काल से नष्ट होने के बाद उन्हीं दक्ष ने दैवी प्रेरणा से फिर विविध प्रजाएँ उत्पन्न कीं।

श्लोक 30.50

यो जायमानः सर्वेषां तेजस्तेजस्विनां रुचा । स्वयोपादत्त दाक्ष्याच्च कर्मणां दक्षमब्रुवन् ॥ ५०॥

सरल हिंदी भावार्थ: जन्म से ही अपने तेज से तेजस्वियों को प्रभावित करने और कार्यकुशलता के कारण वे दक्ष कहलाए।

श्लोक 30.51

तं प्रजासर्गरक्षायामनादिरभिषिच्य च । युयोज युयुजेऽन्यांश्च स वै सर्वप्रजापतीन् ॥ ५१॥

सरल हिंदी भावार्थ: अनादि ब्रह्मा ने उन्हें प्रजासृष्टि और रक्षा का अधिकार दिया तथा अन्य प्रजापतियों को भी उनके कार्यों में नियुक्त किया।

॥ चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 30 समाप्त ॥

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चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 31

नारद का भक्तियोग और चतुर्थ स्कन्ध की पूर्णाहुति

श्लोक 31.1

मैत्रेय उवाच । तत उत्पन्नविज्ञाना आश्वधोक्षजभाषितम् । स्मरन्त आत्मजे भार्यां विसृज्य प्राव्रजन् गृहात् ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—भगवान का उपदेश याद करके प्रचेताओं में वैराग्य और ज्ञान जागा। पत्नी को पुत्र के संरक्षण में सौंपकर वे घर से निकल गए।

श्लोक 31.2

दीक्षिता ब्रह्मसत्रेण सर्वभूतात्ममेधसा । प्रतीच्यां दिशि वेलायां सिद्धोऽभूद्यत्र जाजलिः ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: पश्चिम के उस समुद्रतट पर, जहाँ जाजलि सिद्ध हुए थे, वे सब प्राणियों में आत्मभाव वाले ब्रह्मसत्र में दीक्षित हुए।

श्लोक 31.3

तान्निर्जितप्राणमनोवचोदृशो जितासनान् शान्तसमानविग्रहान् । परेऽमले ब्रह्मणि योजितात्मनः सुरासुरेड्यो ददृशे स्म नारदः ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्राण, मन, वाणी, दृष्टि और आसन संयमित, शान्त तथा समभाव से निर्मल ब्रह्म में चित्त लगाए प्रचेताओं को देव–असुरों के पूज्य नारद ने देखा।

श्लोक 31.4

तमागतं त उत्थाय प्रणिपत्याभिनन्द्य च । पूजयित्वा यथादेशं सुखासीनमथाब्रुवन् ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: नारद आए तो वे उठे, प्रणाम और अभिनन्दन किया, उचित पूजा करके आसन दिया और उनके सुखपूर्वक बैठने पर बोले।

श्लोक 31.5

प्रचेतस ऊचुः । स्वागतं ते सुरर्षेऽद्य दिष्ट्या नो दर्शनं गतः । तव चङ्क्रमणं ब्रह्मन्नभयाय यथा रवेः ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्रचेता बोले—देवर्षि, आपका स्वागत है। सौभाग्य से आज दर्शन मिला। सूर्य की तरह आपका भ्रमण लोकों को अभय देने के लिए होता है।

श्लोक 31.6

यदादिष्टं भगवता शिवेनाधोक्षजेन च । तद्गृहेषु प्रसक्तानां प्रायशः क्षपितं प्रभो ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: शिव और अधोक्षज भगवान ने जो उपदेश दिया था, गृहासक्ति में हम उसका बहुत अंश विस्मृत कर बैठे।

श्लोक 31.7

तन्नः प्रद्योतयाध्यात्मज्ञानं तत्त्वार्थदर्शनम् । येनाञ्जसा तरिष्यामो दुस्तरं भवसागरम् ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: हमें वह आत्मज्ञान फिर प्रकाशित कीजिए जिससे तत्त्व का वास्तविक बोध हो और हम दुस्तर संसारसागर सहज पार कर सकें।

श्लोक 31.8

मैत्रेय उवाच । इति प्रचेतसां पृष्टो भगवान् नारदो मुनिः । भगवत्युत्तमश्लोक आविष्टात्माब्रवीन्नृपान् ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—प्रचेताओं का प्रश्न सुनकर उत्तमश्लोक भगवान में तन्मय नारद मुनि ने राजकुमारों से कहा।

श्लोक 31.9

नारद उवाच । तज्जन्म तानि कर्माणि तदायुस्तन्मनो वचः । नृणां येनेह विश्वात्मा सेव्यते हरिरीश्वरः ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: नारद बोले—वही जन्म, कर्म, आयु, मन और वाणी सफल हैं जिनसे विश्वात्मा हरि की सेवा होती है।

श्लोक 31.10

किं जन्मभिस्त्रिभिर्वेह शौक्लसावित्रयाज्ञिकैः । कर्मभिर्वा त्रयीप्रोक्तैः पुंसोऽपि विबुधायुषा ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: उसके बिना शारीरिक जन्म, उपनयन और यज्ञदीक्षा के तीन जन्म, वेदविहित कर्म या देवताओं जैसी दीर्घ आयु भी क्या कर सकती है?

श्लोक 31.11

श्रुतेन तपसा वा किं वचोभिश्चित्तवृत्तिभिः । बुद्ध्या वा किं निपुणया बलेनेन्द्रियराधसा ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: केवल अध्ययन, तप, वाणी, चित्त की कुशलता, तीक्ष्ण बुद्धि, बल और समर्थ इन्द्रियों का क्या लाभ—

श्लोक 31.12

किं वा योगेन साङ्ख्येन न्यासस्वाध्याययोरपि । किं वा श्रेयोभिरन्यैश्च न यत्रात्मप्रदो हरिः ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: यदि उनमें आत्मदान करने वाले हरि का सम्बन्ध नहीं? तब योग, साङ्ख्य, संन्यास, स्वाध्याय और अन्य कल्याणसाधन भी अपूर्ण रहते हैं।

श्लोक 31.13

श्रेयसामपि सर्वेषामात्मा ह्यवधिरर्थतः । सर्वेषामपि भूतानां हरिरात्माऽऽत्मदः प्रियः ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: सभी कल्याणसाधनों का अन्तिम प्रयोजन आत्मा है; हरि सभी प्राणियों के आत्मा, आत्मबोधदाता और परम प्रिय हैं।

श्लोक 31.14

यथा तरोर्मूलनिषेचनेन तृप्यन्ति तत्स्कन्धभुजोपशाखाः । प्राणोपहाराच्च यथेन्द्रियाणां तथैव सर्वार्हणमच्युतेज्या ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: जैसे वृक्ष की जड़ में जल देने से तना, शाखाएँ और उपशाखाएँ तृप्त होती हैं तथा प्राण के पोषण से इन्द्रियाँ, वैसे अच्युत की पूजा सभी की समुचित आराधना है।

श्लोक 31.15

यथैव सूर्यात्प्रभवन्ति वारः पुनश्च तस्मिन् प्रविशन्ति काले । भूतानि भूमौ स्थिरजङ्गमानि तथा हरावेव गुणप्रवाहः ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: जैसे सूर्य के प्रभाव से जल ऊपर जाता और समय पर लौटता है तथा स्थावर–जङ्गम पृथ्वी से उत्पन्न होकर उसी में मिलते हैं, वैसे गुणों का प्रवाह हरि से प्रकट होकर उन्हीं में लीन होता है।

श्लोक 31.16

एतत्पदं तज्जगदात्मनः परं सकृद्विभातं सवितुर्यथा प्रभा । यथासवो जाग्रति सुप्तशक्तयो द्रव्यक्रियाज्ञानभिदा भ्रमात्ययः ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: जगत के आत्मा का परम स्वरूप सूर्यप्रभा की तरह स्वप्रकाश है। उसी में सुप्त शक्तियाँ जागतीं और द्रव्य, क्रिया तथा ज्ञान के भेद प्रकट होते हैं; ज्ञान में उनका भ्रम मिट जाता है।

श्लोक 31.17

यथा नभस्यभ्रतमः प्रकाशा भवन्ति भूपा न भवन्त्यनुक्रमात् । एवं परे ब्रह्मणि शक्तयस्त्वमू रजस्तमःसत्त्वमिति प्रवाहः ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: जैसे आकाश में मेघ, अन्धकार और प्रकाश आते–जाते हैं, वैसे परम ब्रह्म में रज, तम और सत्त्व की शक्तियों का प्रवाह प्रकट और लुप्त होता है।

श्लोक 31.18

तेनैकमात्मानमशेषदेहिनां कालं प्रधानं पुरुषं परेशम् । स्वतेजसा ध्वस्तगुणप्रवाह- मात्मैकभावेन भजध्वमद्धा ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: इसलिए सब देहधारियों के एक आत्मा, काल, प्रकृति और पुरुष के अधीश्वर तथा अपने तेज से गुणप्रवाह से परे प्रभु का पूर्ण आत्मीयभाव से भजन करो।

श्लोक 31.19

दयया सर्वभूतेषु सन्तुष्ट्या येन केन वा । सर्वेन्द्रियोपशान्त्या च तुष्यत्याशु जनार्दनः ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: सभी प्राणियों पर दया, जो मिले उसमें सन्तोष और समस्त इन्द्रियों की शान्ति से जनार्दन शीघ्र प्रसन्न होते हैं।

श्लोक 31.20

अपहतसकलैषणामलात्म- न्यविरतमेधितभावनोपहूतः । निजजनवशगत्वमात्मनो य- न्न सरति छिद्रवदक्षरः सतां हि ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिस निर्मल हृदय से सभी स्वार्थकामनाएँ दूर हो गईं और प्रेम निरन्तर बढ़ता है, उसमें पुकारे गए अविनाशी भगवान भक्त के वश होकर वैसे ही बने रहते हैं जैसे आकाश अपने विस्तार में।

श्लोक 31.21

न भजति कुमनीषिणां स इज्यां हरिरधनात्मधनप्रियो रसज्ञः । श्रुतधनकुलकर्मणां मदैर्ये विदधति पापमकिञ्चनेषु सत्सु ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: हरि उन दुर्बुद्धियों की पूजा स्वीकार नहीं करते जो विद्या, धन, कुल या कर्म का अभिमान करके निर्धन निष्काम संतों का अपमान करते हैं। उन्हें आत्मा को ही धन मानने वाले प्रिय हैं।

श्लोक 31.22

श्रियमनुचरतीं तदर्थिनश्च द्विपदपतीन् विबुधांश्च यत्स्वपूर्णः । न भजति निजभृत्यवर्गतन्त्रः कथममुमुद्विसृजेत्पुमान् कृतज्ञः ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: पूर्णतृप्त प्रभु लक्ष्मी और उनके इच्छुक राजाओं–देवताओं से भी आसक्त नहीं होते, पर अपने सेवकों के प्रेम के अधीन रहते हैं। कौन कृतज्ञ मनुष्य ऐसे भगवान को छोड़ेगा?

श्लोक 31.23

मैत्रेय उवाच । इति प्रचेतसो राजन्नन्याश्च भगवत्कथाः । श्रावयित्वा ब्रह्मलोकं ययौ स्वायम्भुवो मुनिः ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—प्रचेताओं को यह तथा अन्य भगवत्कथाएँ सुनाकर ब्रह्मापुत्र नारद ब्रह्मलोक चले गए।

श्लोक 31.24

तेऽपि तन्मुखनिर्यातं यशो लोकमलापहम् । हरेर्निशम्य तत्पादं ध्यायन्तस्तद्गतिं ययुः ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्रचेताओं ने उनके मुख से निकला लोकमलहर हरियश सुना और भगवान के चरणों का ध्यान करते हुए उनकी परम गति पाई।

श्लोक 31.25

एतत्तेऽभिहितं क्षत्तर्यन्मां त्वं परिपृष्टवान् । प्रचेतसां नारदस्य संवादं हरिकीर्तनम् ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: विदुर, तुम्हारे पूछने पर मैंने प्रचेताओं और नारद का यह हरिकीर्तनमय संवाद सुनाया।

श्लोक 31.26

श्रीशुक उवाच । य एष उत्तानपदो मानवस्यानुवर्णितः । वंशः प्रियव्रतस्यापि निबोध नृपसत्तम ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: शुकदेव ने कहा—राजश्रेष्ठ, मनुपुत्र उत्तानपाद का वंश बताया गया। अब प्रियव्रत का वंश भी सुनो।

श्लोक 31.27

यो नारदादात्मविद्यामधिगम्य पुनर्महीम् । भुक्त्वा विभज्य पुत्रेभ्य ऐश्वरं समगात्पदम् ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्रियव्रत ने नारद से आत्मविद्या पाई, फिर राज्य का पालन किया, पुत्रों में पृथ्वी बाँटी और अन्ततः भगवान का पद प्राप्त किया।

श्लोक 31.28

इमां तु कौषारविणोपवर्णितां क्षत्ता निशम्याजितवादसत्कथाम् । प्रवृद्धभावोऽश्रुकलाकुलो मुने- र्दधार मूर्ध्ना चरणं हृदा हरेः ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय से अजेय भगवान की ये सत्कथाएँ सुनकर विदुर का प्रेम बढ़ा और आँखें आँसुओं से भर गईं। उन्होंने मुनि के चरण मस्तक पर और हरि के चरण हृदय में धारण किए।

श्लोक 31.29

विदुर उवाच । सोऽयमद्य महायोगिन् भवता करुणात्मना । दर्शितस्तमसः पारो यत्राकिञ्चनगो हरिः ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: विदुर बोले—करुणामय महायोगी, आपने आज अज्ञान के पार का मार्ग दिखाया, जहाँ निष्काम भक्तों को सुलभ हरि विराजते हैं।

श्लोक 31.30

श्रीशुक उवाच । इत्यानम्य तमामन्त्र्य विदुरो गजसाह्वयम् । स्वानां दिदृक्षुः प्रययौ ज्ञातीनां निर्वृताशयः ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: शुकदेव ने कहा—इस प्रकार प्रणाम करके और विदा लेकर तृप्तचित्त विदुर अपने सम्बन्धियों से मिलने हस्तिनापुर चले गए।

श्लोक 31.31

एतद्यः श‍ृणुयाद्राजन् राज्ञां हर्यर्पितात्मनाम् । आयुर्धनं यशः स्वस्ति गतिमैश्वर्यमाप्नुयात् ॥ ३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: राजन्, भगवान को आत्मसमर्पित राजाओं की यह कथा सुनने वाले के लिए शुभ आयु, धन, यश, मंगल, परम गति और ऐश्वर्य का फल कहा गया है।

॥ चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 31 समाप्त ॥

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इस भाग का भक्ति-सन्देश

जीवन की सार्थकता शरीर, प्रतिष्ठा या कर्मफल में बँधना नहीं, बल्कि आत्मस्मृति और भगवान की सेवा में है। सभी प्राणियों पर दया, सन्तोष, इन्द्रियशान्ति और सत्सङ्ग भक्ति को पुष्ट करते हैं। जैसे जड़ में जल देने से पूरा वृक्ष पोषित होता है, वैसे अच्युत की आराधना समस्त जीवन में आत्मीयता जगाती है।

पाठाधार और संपादकीय जानकारी

प्राचीन मूल संस्कृत पाठ का आधार Sanskrit Documents का “श्रीमद्भागवतं—चतुर्थस्कन्धः” है। अध्याय 24–31 में क्रमशः 79, 62, 26, 30, 65, 85, 51 और 31 क्रमाङ्कित पाठखण्ड हैं; कुल 429। अध्याय 29 का क्रमाङ्क 54 मूल में व्याख्यात्मक गद्य है और उसे उसी रूप में रखा गया है। श्लोक 46 तथा 76 से पहले कोष्ठकों में दिए अनङ्कित अतिरिक्त पाठ मुख्य क्रम में नहीं मिलाए गए हैं। हिंदी भावार्थ स्वतंत्र संपादकीय प्रस्तुति है, किसी आधुनिक टीका की प्रतिलिपि नहीं। पुरञ्जन कथा अध्यात्मरूपक है; स्वयं नारद अध्याय 29 में उसका अर्थ स्पष्ट करते हैं। दीर्घ तप, दिव्य आयु, देहान्तर और विशिष्ट विवाहव्यवस्था पौराणिक आख्यान के अनुसार हैं। अध्याय 28 में शोकाकुल रानी के देहत्याग-विचार के बाद आत्मज्ञानी मित्र उन्हें स्वरूपबोध कराता है; कथा आत्महानि का निर्देश नहीं।

॥ चतुर्थ स्कन्ध सम्पूर्ण • भाग ४ समाप्त ॥

॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

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