श्रीमद्भागवत महापुराण चतुर्थ स्कन्ध भाग 4 — अध्याय 24–31, रुद्रगीत, पुरञ्जन कथा और प्रचेता उपदेश
श्रीमद्भागवत महापुराण
चतुर्थ स्कन्ध • भाग ४ • अध्याय २४–३१
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शिव का भगवत्स्तवन और जीवननगर का रहस्य
प्रचेताओं को शिव रुद्रगीत का उपदेश देते हैं। दूसरी ओर नारद प्राचीनबर्हि को पुरञ्जन की कथा सुनाकर शरीर, बुद्धि, इन्द्रियों, काल और आत्मा का सम्बन्ध समझाते हैं। अन्त में प्रचेताओं को भगवान के दर्शन और नारद से सर्वभूतदया, सन्तोष तथा निष्काम भक्ति की शिक्षा मिलती है।
अध्याय 24–31 के सभी 429 श्लोक और प्रत्येक का स्वतंत्र सरल हिंदी भावार्थ यहाँ हैं। यह चतुर्थ स्कन्ध का अंतिम भाग है; चारों भागों में सभी 31 अध्याय और चुने आधार-पाठ के 1445 श्लोक पूर्ण होते हैं। रुद्रगीत की स्तुति अध्याय 24 के श्लोक 33–68 में है।
चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 24
प्रचेता–शिव मिलन और रुद्रगीत
श्लोक 24.1
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—पृथु के यशस्वी पुत्र विजिताश्व सम्राट बने। भाइयों से स्नेह रखने के कारण उन्होंने छोटे भाइयों को अलग दिशाओं का शासन दिया।
श्लोक 24.2
सरल हिंदी भावार्थ: हर्यक्ष को पूर्व, धूम्रकेश को दक्षिण, वृक को पश्चिम और द्रविण को उत्तर दिशा सौंपी।
श्लोक 24.3
सरल हिंदी भावार्थ: इन्द्र से अदृश्य होने की विद्या पाकर वे अन्तर्धान कहलाए। उनकी पत्नी शिखण्डिनी से तीन सम्मानित पुत्र हुए।
श्लोक 24.4
सरल हिंदी भावार्थ: वे पावक, पवमान और शुचि थे, जो पहले अग्निदेवता थे। वसिष्ठ के शाप से मनुष्यरूप में आए और बाद में फिर योग से अपना दिव्य पद पाया।
श्लोक 24.5
सरल हिंदी भावार्थ: अन्तर्धान और नभस्वती से हविर्धान उत्पन्न हुए। अन्तर्धान वही थे जिन्होंने घोड़ा चुराने वाले इन्द्र को पहचानकर भी उनका वध नहीं किया था।
श्लोक 24.6
सरल हिंदी भावार्थ: कर लेना, दण्ड देना और शुल्क वसूलना आदि राजकार्य उन्हें कठोर लगे। उन्होंने दीर्घ यज्ञ की दीक्षा के बहाने शासनभार छोड़ दिया।
श्लोक 24.7
सरल हिंदी भावार्थ: उस यज्ञ में भी आत्मज्ञानी होकर उन्होंने हंसरूप परम पुरुष की आराधना की और स्थिर समाधि से उनका लोक प्राप्त किया।
श्लोक 24.8
सरल हिंदी भावार्थ: विदुर, हविर्धान की पत्नी हविर्धानी से बर्हिषद, गय, शुक्ल, कृष्ण, सत्य और जितव्रत नामक छह पुत्र हुए।
श्लोक 24.9
सरल हिंदी भावार्थ: हविर्धान के पुत्र बर्हिषद बड़े पुण्यवान प्रजापति थे। वे वैदिक कर्मकाण्ड और योग दोनों में निपुण थे।
श्लोक 24.10
सरल हिंदी भावार्थ: उनके लगातार यज्ञ करने से भूमि पूर्वमुखी नोक वाले कुशों से ढक गई; इसी कारण वे प्राचीनबर्हि कहलाए।
श्लोक 24.11
सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मा के निर्देश से उन्होंने समुद्र की पुत्री शतद्रुति से विवाह किया। विवाह में परिक्रमा करती सुन्दर अलङ्कृत किशोरी को देखकर अग्नि भी आकर्षित हुए, जैसे पहले शुकी से हुए थे।
श्लोक 24.12
सरल हिंदी भावार्थ: उस नववधू के नूपुरों की मधुर ध्वनि ने दिशाओं में देव, असुर, गन्धर्व, मुनि, सिद्ध, मनुष्य और नागों का मन मोह लिया।
श्लोक 24.13
सरल हिंदी भावार्थ: प्राचीनबर्हि और शतद्रुति के दस पुत्र हुए। समान नाम, व्रत और धर्माचरण वाले वे सब प्रचेता कहलाए।
श्लोक 24.14
सरल हिंदी भावार्थ: पिता ने उन्हें सन्तानविस्तार का कार्य दिया। वे समुद्र में तप करने गए और कथा के अनुसार दस हजार वर्ष तप के अधिपति भगवान की आराधना की।
श्लोक 24.15
सरल हिंदी भावार्थ: मार्ग में प्रसन्न शिव ने उन्हें जो उपदेश दिया था, उसका ध्यान, जप और पूजन करते हुए वे संयम में रहे।
श्लोक 24.16
सरल हिंदी भावार्थ: विदुर ने पूछा—प्रचेताओं का मार्ग में शिव से मिलन कैसे हुआ और प्रसन्न हर ने उन्हें क्या सार्थक उपदेश दिया?
श्लोक 24.17
सरल हिंदी भावार्थ: ऋषिवर, देहधारियों के लिए शिव का ऐसा मिलन दुर्लभ है। अनासक्त मुनि भी उनके इच्छित दर्शन के लिए ध्यान करते हैं।
श्लोक 24.18
सरल हिंदी भावार्थ: वे आत्माराम हैं, फिर भी लोकव्यवस्था के कल्याण के लिए अपनी प्रचण्ड शक्ति सहित विचरण करते हैं।
श्लोक 24.19
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—सज्जन प्रचेताओं ने पिता की आज्ञा शिरोधार्य की और तप में आदरयुक्त होकर पश्चिम दिशा की ओर चले।
श्लोक 24.20
सरल हिंदी भावार्थ: समुद्र के पास उन्होंने एक बहुत बड़ा सरोवर देखा। उसका जल महात्मा के मन की तरह स्वच्छ और प्रसन्न था।
श्लोक 24.21
सरल हिंदी भावार्थ: उसमें नीले–लाल उत्पल, कमल, कह्लार और इन्दीवर खिले थे; हंस, सारस, चकवे और कारण्डव मधुर ध्वनि कर रहे थे।
श्लोक 24.22
सरल हिंदी भावार्थ: भ्रमरों की सुरीली गुंजार से लताएँ और वृक्ष मानो रोमाञ्चित थे। वायु कमलों का पराग चारों दिशाओं में बिखेर रही थी।
श्लोक 24.23
सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ मृदङ्ग और पणव के साथ दिव्य पद्धति का मनोहर संगीत सुनकर राजकुमार आश्चर्य में पड़ गए।
श्लोक 24.24
सरल हिंदी भावार्थ: उसी समय उन्होंने सरोवर से अनुचरों सहित देवश्रेष्ठ शिव को निकलते देखा; दिव्यजन उनका यश गा रहे थे।
श्लोक 24.25
सरल हिंदी भावार्थ: उनकी कान्ति तपे सोने जैसी, कण्ठ नीला, तीन नेत्र और मुख प्रसन्न था। कौतूहल और श्रद्धा से राजकुमारों ने उन्हें प्रणाम किया।
श्लोक 24.26
सरल हिंदी भावार्थ: शरणागतों का दुःख हरने वाले और धर्मप्रिय भगवान ने उन धर्मज्ञ, शीलवान तथा प्रसन्न राजकुमारों से प्रेमपूर्वक कहा।
श्लोक 24.27
सरल हिंदी भावार्थ: रुद्र बोले—तुम प्राचीनबर्हि के पुत्र हो। तुम्हारा उद्देश्य मुझे ज्ञात है। तुम्हारा कल्याण हो; कृपा करने के लिए मैंने तुम्हें दर्शन दिया है।
श्लोक 24.28
सरल हिंदी भावार्थ: जो गुणमयी प्रकृति और जीव की सीमित स्थिति से परे भगवान वासुदेव की शरण लेता है, वह मुझे प्रिय है।
श्लोक 24.29
सरल हिंदी भावार्थ: अपने धर्म में निष्ठावान मनुष्य अनेक जन्मों की उन्नति से ब्रह्मपद और फिर मेरा पद पाता है; भगवान का भक्त उससे भी परे वैष्णव पद पाता है, जहाँ कल्पान्त में मैं और अन्य देवता भी जाते हैं।
श्लोक 24.30
सरल हिंदी भावार्थ: तुम भगवद्भक्त हो, इसलिए मुझे भगवान की तरह प्रिय हो। मेरे और भगवान के भक्तों के लिए भगवान तथा उनके भक्तों से अधिक प्रिय कोई नहीं।
श्लोक 24.31
सरल हिंदी भावार्थ: अब अत्यन्त पवित्र, मंगलमय और परम कल्याणकारी यह एकान्तभजन योग्य स्तोत्र सुनो; मैं तुम्हें बताता हूँ।
श्लोक 24.32
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—नारायणपरायण और करुणामय शिव ने हाथ जोड़े खड़े राजकुमारों को यह उपदेश दिया।
श्लोक 24.33
सरल हिंदी भावार्थ: रुद्र बोले—आत्मज्ञानियों का कल्याण करने वाले प्रभु, आपकी जय हो। आपका उत्कर्ष मेरा भी कल्याण करे। सर्वात्मा आपको प्रणाम है।
श्लोक 24.34
सरल हिंदी भावार्थ: कमलनाभ, सूक्ष्म भूतों और इन्द्रियों के आधार, शान्त, अविकारी और स्वप्रकाश वासुदेव को नमस्कार है।
श्लोक 24.35
सरल हिंदी भावार्थ: सूक्ष्म, असीम और संहारकारी सङ्कर्षण को प्रणाम; विश्व को जाग्रत करने वाले अन्तरात्मा प्रद्युम्न को नमस्कार है।
श्लोक 24.36
सरल हिंदी भावार्थ: इन्द्रियों के नियन्ता और आधार अनिरुद्ध को बार–बार नमस्कार; पूर्ण, शान्तचित्त परम हंसस्वरूप को प्रणाम है।
श्लोक 24.37
सरल हिंदी भावार्थ: स्वर्ग और मुक्ति के द्वार, पवित्र अन्तःकरण में नित्य स्थित प्रभु को नमस्कार। स्वर्णमय तेज और चार प्रधान पुरोहितकर्मों से सम्पन्न यज्ञ के विस्ताररूप को प्रणाम है।
श्लोक 24.38
सरल हिंदी भावार्थ: बल, अन्न, वेदत्रयी के स्वामी और यज्ञ के मूल कारण आपको नमस्कार। प्राणियों को तृप्ति देने वाले तथा सब रसों के आत्मा को प्रणाम है।
श्लोक 24.39
सरल हिंदी भावार्थ: सभी प्राणियों के देहरूप, स्थूल विराट विशेषरूप, त्रिलोकी के पालक और सहनशक्ति, ओज तथा बल के आधार को नमस्कार है।
श्लोक 24.40
सरल हिंदी भावार्थ: शब्द और अर्थ के बोध का माध्यम आकाशरूप तथा भीतर–बाहर व्यापक आत्मा को प्रणाम। पुण्यमय, प्रकाशमान दिव्यलोक के स्वरूप को नमस्कार है।
श्लोक 24.41
सरल हिंदी भावार्थ: प्रवृत्ति और निवृत्ति कर्मों, पितृदेवता तथा कर्मव्यवस्था के आधार को प्रणाम। अधर्म का दुःखद परिणाम देने वाली मृत्युरूप शक्ति को भी नमस्कार है।
श्लोक 24.42
सरल हिंदी भावार्थ: आशीर्वादों के स्वामी, मनु, जगत के कारण, महान धर्म, अविकुण्ठित बुद्धि वाले कृष्ण, पुरातन पुरुष और साङ्ख्य–योग के ईश्वर को प्रणाम है।
श्लोक 24.43
सरल हिंदी भावार्थ: ज्ञान, क्रिया और द्रव्य की शक्तियों से युक्त, अहंकारतत्त्व, चित्त और सङ्कल्प के रूप में कार्य करने वाले तथा वाणी की विभूति को नमस्कार है।
श्लोक 24.44
सरल हिंदी भावार्थ: हमें अपना वह भक्तपूजित रूप दिखाइए, जो आपके प्रियजनों को सबसे प्रिय और सभी इन्द्रियों को पूर्ण तृप्त करने वाला है।
श्लोक 24.45
सरल हिंदी भावार्थ: वह वर्षा के चिकने मेघ जैसा श्याम, समस्त सौन्दर्य का सङ्ग्रह, चार सुन्दर लम्बी भुजाओं और मनोहर मुख वाला है।
श्लोक 24.46
सरल हिंदी भावार्थ: कमलदल जैसे नेत्र, सुन्दर भौहें, नासिका, दाँत, कपोल और मुख तथा दोनों कानों में समान सुशोभित आभूषण हैं।
श्लोक 24.47
सरल हिंदी भावार्थ: प्रेमपूर्ण मुस्कान और कटाक्ष, सुन्दर अलकें, कमलकेसर जैसे पीले रेशमी वस्त्र और चमकते कुण्डल उसकी शोभा हैं।
श्लोक 24.48
सरल हिंदी भावार्थ: किरीट, कङ्कण, हार, नूपुर और करधनी चमकते हैं; शङ्ख, चक्र, गदा, कमल, वनमाला और श्रेष्ठ मणि से वह ऐश्वर्यमय है।
श्लोक 24.49
सरल हिंदी भावार्थ: सिंह जैसे पुष्ट कन्धे, सुन्दर ग्रीवा और कौस्तुभमणि हैं। स्थायी लक्ष्मी से श्याम कसौटी जैसी छाती पर अद्भुत शोभा झलकती है।
श्लोक 24.50
सरल हिंदी भावार्थ: श्वास के आने–जाने से उदर की सुन्दर वलियाँ हिलती हैं। गहरी भँवर जैसी नाभि मानो विश्व को अपने में समेटती है।
श्लोक 24.51
सरल हिंदी भावार्थ: श्याम कटिभाग पर चमकते पीतवस्त्र और स्वर्णकरधनी हैं; सम, सुन्दर चरण, पिण्डलियाँ, जाँघें और घुटने अनुपम हैं।
श्लोक 24.52
सरल हिंदी भावार्थ: शरदकमल जैसे चरणों और उनके नखप्रकाश से हमारे भीतर का पाप मिटाइए। अज्ञान में पड़े जीवों के मार्गदर्शक गुरु, भयहर अपना चरणपद दिखाइए।
श्लोक 24.53
सरल हिंदी भावार्थ: आत्मशुद्धि चाहने वालों को इस रूप का ध्यान करना चाहिए। अपने कर्तव्य निभाने वालों का भक्तियोग उन्हें अभय और कल्याण देता है।
श्लोक 24.54
सरल हिंदी भावार्थ: आप समस्त देहधारियों के लिए दुर्लभ हैं, पर भक्त के लिए सुलभ। आप आत्मज्ञानी की परम गति और आत्मराज्य से भी अधिक प्रिय हैं।
श्लोक 24.55
सरल हिंदी भावार्थ: संतों के लिए भी दुर्लभ अनन्य भक्ति से आपको प्रसन्न करके कौन आपके चरणों के अतिरिक्त किसी बाहरी वस्तु की इच्छा करेगा?
श्लोक 24.56
सरल हिंदी भावार्थ: आपके चरणों में शरण पाए को मृत्यु भी वश में नहीं कर सकती, यद्यपि वह अपने प्रचण्ड भ्रूभङ्ग से समस्त विश्व का विनाश करती है।
श्लोक 24.57
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान के भक्त का आधे क्षण का सङ्ग भी स्वर्ग और मुक्ति से तुलना योग्य नहीं; फिर नश्वर सांसारिक वरदानों की क्या बात!
श्लोक 24.58
सरल हिंदी भावार्थ: आपके यशरूपी तीर्थ में भीतर–बाहर स्नान करके शुद्ध हुए, प्राणियों पर करुणा और निर्मल आचरण रखने वाले भक्तों का सङ्ग मिले—हम पर आपकी यही कृपा हो।
श्लोक 24.59
सरल हिंदी भावार्थ: भक्तियोग से अनुगृहीत मुनि का चित्त बाहरी विषयभ्रम और अज्ञान की गुफा में नहीं जाता। उसी निर्मल चित्त में वह आपके स्वरूप को स्पष्ट देखता है।
श्लोक 24.60
सरल हिंदी भावार्थ: जिसमें यह विश्व प्रकट होता है और जो विश्व में प्रकाशित है, वही आप आकाश की तरह व्यापक परम ज्योति ब्रह्म हैं।
श्लोक 24.61
सरल हिंदी भावार्थ: आप अविकारी रहते हुए विविधरूप माया से जगत रचते, पालते और समेटते हैं। दुर्बल चित्त की भेदबुद्धि इसे अलग सत्य मानती है; हम आपको स्वतन्त्र परमात्मा जानते हैं।
श्लोक 24.62
सरल हिंदी भावार्थ: श्रद्धालु साधक सिद्धि के लिए भूत, इन्द्रिय और अन्तःकरण में प्रकट आपके इसी स्वरूप की विधिपूर्वक पूजा करते हैं; वही वेद और तन्त्र का मर्म समझते हैं।
श्लोक 24.63
सरल हिंदी भावार्थ: आप अकेले आदिपुरुष हैं, जिनकी शक्ति पहले अव्यक्त रहती है। उससे सत्त्व, रज और तम के भेद तथा महत्तत्त्व, अहंकार, आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, देव, ऋषि और जीवसमूह उत्पन्न होते हैं।
श्लोक 24.64
सरल हिंदी भावार्थ: अपनी शक्ति से चार प्रकार के शरीर रचकर आप जीवांश के साथ उनमें प्रवेश करते हैं। भीतर स्थित पुरुष इन्द्रियों से विषयों का आस्वाद लेता है, जैसे मधुमक्खी मधु लेती है।
श्लोक 24.65
सरल हिंदी भावार्थ: कालरूप से आप अत्यन्त तीव्र गति से लोकों और प्राणियों को दूसरे प्राणियों के द्वारा नष्ट करते हैं, जैसे प्रबल वायु मेघसमूह बिखेरती है; आपके प्रभाव से आपका तत्त्व अनुमानित होता है।
श्लोक 24.66
सरल हिंदी भावार्थ: कर्तव्यों की अन्तहीन चिन्ता, बढ़े लोभ और विषयलालसा में असावधान जीव को सावधान काल अचानक पकड़ लेता है, जैसे जीभ लपलपाता सर्प चूहे को।
श्लोक 24.67
सरल हिंदी भावार्थ: कौन ज्ञानी आपके चरण छोड़ेगा, जहाँ अहंकार और मान का नाश होता है? हमारे गुरु ब्रह्मा और चौदह मनु भी आशंका से बचने के लिए निष्कपट भाव से उनकी पूजा करते हैं।
श्लोक 24.68
सरल हिंदी भावार्थ: परमात्मन्, आप ही ज्ञानियों का परम ब्रह्म और निर्भय आश्रय हैं। रुद्र के प्रलयभय से विचलित विश्व की अन्तिम गति भी आप हैं।
श्लोक 24.69
सरल हिंदी भावार्थ: राजकुमारो, शुद्ध होकर, अपने कर्तव्य निभाते हुए और मन भगवान को अर्पित करके इसका जप करो; तुम्हारा कल्याण हो।
श्लोक 24.70
सरल हिंदी भावार्थ: उन्हीं अन्तरात्मा हरि को अपने भीतर और सभी प्राणियों में स्थित जानकर बार–बार ध्यान, गुणगान और पूजा करो।
श्लोक 24.71
सरल हिंदी भावार्थ: इस योगोपदेश को ग्रहण करके मुनियों का संयम अपनाओ और एकाग्र बुद्धि से सब मिलकर श्रद्धापूर्वक अभ्यास करो।
श्लोक 24.72
सरल हिंदी भावार्थ: पहले सृष्टि का विस्तार करने की इच्छा से ब्रह्मा ने हम भृगु आदि पुत्रों को यह उपदेश दिया था, जो सन्तानविस्तार में लगने वाले थे।
श्लोक 24.73
सरल हिंदी भावार्थ: प्रजासृष्टि की प्रेरणा पाकर हम सब प्रजापतियों ने इससे अज्ञान दूर किया और विविध प्रजाएँ उत्पन्न कीं।
श्लोक 24.74
सरल हिंदी भावार्थ: जो वासुदेवपरायण मनुष्य सावधान और एकाग्र होकर नित्य इसका जप करता है, वह शीघ्र कल्याण पाता है।
श्लोक 24.75
सरल हिंदी भावार्थ: समस्त कल्याणों में आत्मज्ञान परम कल्याण है। ज्ञानरूपी नौका कठिन दुःखसागर को सहज पार करा देती है।
श्लोक 24.76
सरल हिंदी भावार्थ: मेरे गाए इस भगवत्स्तोत्र का श्रद्धा से अध्ययन करने वाला दुर्लभ आराध्य हरि को प्रसन्न करता है।
श्लोक 24.77
सरल हिंदी भावार्थ: इस स्तोत्र से प्रसन्न, समस्त कल्याण के परम आश्रय भगवान से साधक अपने योग्य अभिलषित कल्याण पाता है।
श्लोक 24.78
सरल हिंदी भावार्थ: जो प्रातः उठकर हाथ जोड़ और श्रद्धा से इसे सुनता अथवा सुनाता है, वह कर्मबन्धनों से मुक्त होता है।
श्लोक 24.79
सरल हिंदी भावार्थ: राजकुमारो, मैंने परम पुरुष परमात्मा की यह स्तुति गाई है। एकाग्र मन से इसका जप करते हुए महान तप करो; अन्त में अभिलषित परम फल पाओगे।
॥ चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 24 समाप्त ॥
चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 25
नारद का उपदेश और पुरञ्जन की नवद्वार नगरी
श्लोक 25.1
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—प्रचेताओं को ऐसा उपदेश देकर और उनकी पूजा स्वीकार करके शिव उन्हीं के देखते वहाँ अन्तर्धान हो गए।
श्लोक 25.2
सरल हिंदी भावार्थ: सभी प्रचेता रुद्रगीत नामक भगवत्स्तोत्र का जप करते हुए जल में दस हजार वर्ष तप करते रहे, ऐसा कथा में कहा गया है।
श्लोक 25.3
सरल हिंदी भावार्थ: विदुर, उधर कर्मकाण्ड में आसक्त प्राचीनबर्हि को अध्यात्मतत्त्वज्ञ और करुणामय नारद ने समझाया।
श्लोक 25.4
सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने पूछा—राजन्, इन कर्मों से तुम अपना कौन सा कल्याण चाहते हो? सच्चा कल्याण दुःख की निवृत्ति और स्थायी सुख है; वह केवल इस कर्मप्रवृत्ति में दिखाई नहीं देता।
श्लोक 25.5
सरल हिंदी भावार्थ: राजा बोले—महाभाग, कर्मों में अटकी बुद्धि से मैं परम कल्याण नहीं जानता। मुझे निर्मल ज्ञान दीजिए जिससे कर्मबन्धन से मुक्त हो सकूँ।
श्लोक 25.6
सरल हिंदी भावार्थ: पुत्र, पत्नी और धन को ही लक्ष्य बनाकर दिखावटी गृहधर्म में फँसा मूढ़ व्यक्ति संसार में भटकता है और परम तत्त्व नहीं पाता।
श्लोक 25.7
सरल हिंदी भावार्थ: नारद बोले—प्रजापालक राजन्, देखो, तुम्हारे यज्ञों में निर्दयता से हजारों जीवों का वध हुआ है।
श्लोक 25.8
सरल हिंदी भावार्थ: वे तुम्हारी हिंसा याद करके प्रतीक्षा कर रहे हैं; परलोक में क्रुद्ध होकर तुम्हें लोहे जैसे कठोर प्रहारों से पीड़ित करेंगे। यह हिंसक कर्म के प्रतिफल का पौराणिक चेतावनीरूप चित्रण है।
श्लोक 25.9
सरल हिंदी भावार्थ: अब मैं तुम्हें पुरञ्जन का प्राचीन इतिहास सुनाता हूँ। ध्यान से उसकी कथा समझो।
श्लोक 25.10
सरल हिंदी भावार्थ: राजन्, पुरञ्जन नाम का एक प्रसिद्ध राजा था। उसका एक मित्र था जिसका नाम और आचरण किसी को पूरी तरह ज्ञात नहीं था।
श्लोक 25.11
सरल हिंदी भावार्थ: अपने योग्य निवास खोजते हुए वह पृथ्वी पर घूमता रहा। जब मन के अनुकूल आश्रय नहीं मिला तो उदास हुआ।
श्लोक 25.12
सरल हिंदी भावार्थ: विविध भोगों की पूर्ति चाहने के कारण उसे पृथ्वी की कोई नगरी पर्याप्त अच्छी नहीं लगती थी।
श्लोक 25.13
सरल हिंदी भावार्थ: एक दिन हिमालय की दक्षिणी ढलान पर उसने नौ द्वारों वाली सुन्दर लक्षणों से युक्त नगरी देखी।
श्लोक 25.14
सरल हिंदी भावार्थ: उसमें प्राकार, उपवन, अटारियाँ, खाइयाँ, झरोखे और तोरण थे; स्वर्ण, चाँदी और लोहे के शिखरों वाले घर भरे थे।
श्लोक 25.15
सरल हिंदी भावार्थ: नीलम, स्फटिक, वैदूर्य, मोती, पन्ने और लाल रत्नों से बने महल उस नगरी को भोगवती जैसी समृद्ध शोभा देते थे।
श्लोक 25.16
सरल हिंदी भावार्थ: सभा, चौराहे, गलियाँ, खेलस्थल, बाजार, पूजास्थल, ध्वज–पताकाएँ और मूँगे की वेदियाँ उसे सुशोभित करती थीं।
श्लोक 25.17
सरल हिंदी भावार्थ: नगरी के बाहर दिव्य वृक्षों और लताओं वाला उपवन था; उसके जलाशय पक्षियों और भ्रमरों के कलरव से गूँजते थे।
श्लोक 25.18
सरल हिंदी भावार्थ: शीतल झरनों के जलकणों से युक्त वसन्तवायु कोमल पत्तों, शाखाओं और कमलिनी के तटों को हिला रही थी।
श्लोक 25.19
सरल हिंदी भावार्थ: अनेक वन्यजीव मुनियों की तरह शान्त और उपद्रवरहित थे। कोयल की पुकार से पथिक को लगता मानो कोई स्वागत कर रहा हो।
श्लोक 25.20
सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ राजा ने संयोग से एक सुन्दर युवती देखी। उसके साथ दस सेवक थे और प्रत्येक के अधीन सौ सहायक थे।
श्लोक 25.21
सरल हिंदी भावार्थ: उसकी रक्षा पाँच सिर वाला सर्प प्रहरी की तरह कर रहा था। वह नवयुवती अपनी इच्छा का रूप धारण करती और योग्य पति खोजती थी।
श्लोक 25.22
सरल हिंदी भावार्थ: उसकी नासिका, दाँत, कपोल और मुख सुन्दर थे; दोनों कानों में समान रूप से शोभित कुण्डल थे।
श्लोक 25.23
सरल हिंदी भावार्थ: पीले वस्त्र, सुन्दर कटि और स्वर्णकरधनी धारण किए वह नूपुरों की झंकार के साथ देवी जैसी चल रही थी।
श्लोक 25.24
सरल हिंदी भावार्थ: यौवन प्रकट होने पर वह लज्जा से वस्त्र सँभाल रही थी और हाथिनी जैसी मन्द गम्भीर चाल से चलती थी।
श्लोक 25.25
सरल हिंदी भावार्थ: उसकी संकोचभरी मुस्कान और स्नेहपूर्ण कटाक्ष से आकृष्ट राजा ने प्रेमपूर्ण मधुर वाणी में पूछा।
श्लोक 25.26
सरल हिंदी भावार्थ: कमलनयनी, तुम कौन हो, किसकी पुत्री हो और कहाँ से आई हो? इस नगरी के पास तुम्हारा क्या उद्देश्य है?
श्लोक 25.27
सरल हिंदी भावार्थ: तुम्हारे पीछे आने वाले ये ग्यारह वीर कौन हैं? ये स्त्रियाँ कौन हैं और आगे चलने वाला यह सर्प कौन है?
श्लोक 25.28
सरल हिंदी भावार्थ: क्या तुम ह्री, पार्वती, सरस्वती या लक्ष्मी हो, जो एकान्त वन में योग्य पति खोज रही हो? यदि लक्ष्मी हो तो तुम्हारे हाथ का कमल कहाँ है?
श्लोक 25.29
सरल हिंदी भावार्थ: तुम्हारे चरण पृथ्वी को छूते हैं, इसलिए इन देवियों में से नहीं लगतीं। जैसे लक्ष्मी भगवान के साथ दिव्यलोक को सुशोभित करती हैं, वैसे मेरे साथ इस नगरी को सुशोभित करो।
श्लोक 25.30
सरल हिंदी भावार्थ: तुम्हारे लज्जामय हास और कटाक्ष ने मेरी इन्द्रियों को विचलित कर दिया है। तुम्हारे कारण जागी कामना मुझे व्याकुल कर रही है; मुझ पर कृपा करो।
श्लोक 25.31
सरल हिंदी भावार्थ: सुन्दर भौंहों और मधुर वाणी वाली, लज्जा से झुका अपना मुख उठाकर मुझे दिखाओ; वह नीली अलकों और चमकते नेत्रों से सुशोभित है।
श्लोक 25.32
सरल हिंदी भावार्थ: नारद ने कहा—इस प्रकार अधीर होकर प्रार्थना करने वाले वीर पुरञ्जन से वह युवती भी आकर्षित हुई और मुस्कराकर बोली।
श्लोक 25.33
सरल हिंदी भावार्थ: पुरुषश्रेष्ठ, हम अपने या दूसरे के स्रष्टा को नहीं जानते; अपने कुल, नाम और उत्पत्ति का पूरा ज्ञान भी नहीं है।
श्लोक 25.34
सरल हिंदी भावार्थ: हम इतना ही जानते हैं कि इस समय यहाँ मौजूद हैं। यह आश्रयनगरी किसने बनाई, उससे आगे का ज्ञान हमें नहीं।
श्लोक 25.35
सरल हिंदी भावार्थ: ये पुरुष और स्त्रियाँ मेरे साथी हैं। मेरे सोने पर यह सर्प जागता रहता और नगरी की रक्षा करता है।
श्लोक 25.36
सरल हिंदी भावार्थ: तुम सौभाग्य से आए हो; तुम्हारा मंगल हो। तुम सांसारिक सुख चाहते हो, मैं अपने साथियों सहित उन्हें तुम्हारे लिए जुटाऊँगी।
श्लोक 25.37
सरल हिंदी भावार्थ: मेरे प्रस्तुत किए विषयभोग ग्रहण करते हुए इस नौ द्वारों की नगरी में सौ वर्ष निवास करो।
श्लोक 25.38
सरल हिंदी भावार्थ: तुम्हारे अतिरिक्त मैं किसे स्वीकार करूँ? ऐसे व्यक्ति को क्यों चुनूँ जो प्रेमसुख और लोकव्यवहार न जाने, न भविष्य की चिन्ता करे और न परलोक का विचार रखे?
श्लोक 25.39
सरल हिंदी भावार्थ: इस गृहस्थजीवन में धर्म, अर्थ, काम, सन्तानानन्द, यश और शोकमुक्त शुभ लोकों की उपलब्धि कही गई है, जिन्हें केवल त्याग का आग्रह रखने वाले नहीं समझते। यह युवती का गृहस्थपक्ष है।
श्लोक 25.40
सरल हिंदी भावार्थ: पितरों, देवताओं, ऋषियों, मनुष्यों, प्राणियों और अपने लिए भी गृहस्थाश्रम को इस जगत का हितकारी आश्रय कहा जाता है।
श्लोक 25.41
सरल हिंदी भावार्थ: मेरे जैसी कौन स्त्री तुम्हारे जैसे प्रसिद्ध, उदार और प्रियदर्शन वीर को पति के रूप में न चुनेगी, जो स्वयं सामने आया हो?
श्लोक 25.42
सरल हिंदी भावार्थ: तुम दीनों का दुःख करुणामय मुस्कान और दृष्टि से दूर करते हो; तुम्हारी समर्थ भुजाओं का आश्रय कौन नहीं चाहेगा?
श्लोक 25.43
सरल हिंदी भावार्थ: नारद ने कहा—ऐसा परस्पर सम्बन्ध निश्चित करके दोनों उस नगरी में गए और सौ वर्ष सुख भोगते रहे।
श्लोक 25.44
सरल हिंदी भावार्थ: राजा स्थान–स्थान पर गायकों के मधुर गीत सुनता, स्त्रियों से घिरा क्रीड़ा करता और गर्मी में शीतल नदी में प्रवेश करता था।
श्लोक 25.45
सरल हिंदी भावार्थ: उस नगरी के सात द्वार ऊपर और दो नीचे थे। उनका स्वामी अलग–अलग विषयों तक पहुँचने के लिए उन द्वारों का उपयोग करता था।
श्लोक 25.46
सरल हिंदी भावार्थ: पाँच द्वार पूर्व, एक दक्षिण, एक उत्तर और दो पश्चिम में थे। राजन्, अब उनके नाम सुनो।
श्लोक 25.47
सरल हिंदी भावार्थ: पूर्व में साथ बने खद्योता और आविर्मुखी द्वारों से वह द्युमान मित्र के साथ विभ्राजित नामक प्रदेश में जाता था।
श्लोक 25.48
सरल हिंदी भावार्थ: पूर्व के ही नलिनी और नालिनी द्वारों से अवधूत मित्र के साथ सौरभ नामक विषयप्रदेश में जाता था।
श्लोक 25.49
सरल हिंदी भावार्थ: पूर्व का मुख्य द्वार मुख्या कहलाता था। उससे रसज्ञ और विपण के साथ आपण तथा बहूदन प्रदेशों में जाता था।
श्लोक 25.50
सरल हिंदी भावार्थ: दक्षिण दिशा के पितृहू द्वार से पुरञ्जन श्रुतधर के साथ दक्षिणपञ्चाल प्रदेश जाता था।
श्लोक 25.51
सरल हिंदी भावार्थ: उत्तर के देवहू द्वार से वह उसी श्रुतधर के साथ उत्तरपञ्चाल प्रदेश में जाता था।
श्लोक 25.52
सरल हिंदी भावार्थ: पश्चिम के आसुरी द्वार से वह दुर्मद के साथ ग्रामक नामक प्रदेश में जाता था।
श्लोक 25.53
सरल हिंदी भावार्थ: पश्चिम के निर्ऋति द्वार से लुब्धक के साथ वैशस नामक प्रदेश में जाता था।
श्लोक 25.54
सरल हिंदी भावार्थ: नगर के निवासियों में निर्वाक और पेशस्कृत नामक दो नेत्रहीन सेवक थे। राजा उनके माध्यम से चलता और कार्य करता था।
श्लोक 25.55
सरल हिंदी भावार्थ: अन्तःपुर में विषूचीन के साथ रहते हुए वह पत्नी–सन्तान से जुड़ा मोह, प्रसन्नता और हर्ष अनुभव करता था।
श्लोक 25.56
सरल हिंदी भावार्थ: इस प्रकार कर्म और कामना में फँसा अज्ञानी पुरञ्जन विवेक खो बैठा। रानी जो चाहती, वह उसी के पीछे चलता था।
श्लोक 25.57
सरल हिंदी भावार्थ: वह मदिरा पीती तो वह भी पीता, भोजन करती तो साथ खाता और कुछ चबाती तो उसी का अनुकरण करता।
श्लोक 25.58
सरल हिंदी भावार्थ: वह गाती तो गाता, रोती तो रोता, हँसती तो हँसता और बोलती तो उसी के साथ बोलता।
श्लोक 25.59
सरल हिंदी भावार्थ: वह दौड़ती तो दौड़ता, खड़ी होती तो खड़ा रहता, सोती तो सोता और बैठती तो बैठता।
श्लोक 25.60
सरल हिंदी भावार्थ: वह सुनती, देखती, सूँघती या स्पर्श करती तो वह भी उन्हीं अनुभवों का अनुसरण करता।
श्लोक 25.61
सरल हिंदी भावार्थ: पत्नी शोक करती तो वह दीन होकर शोक करता; वह हर्षित या प्रसन्न होती तो वह भी वैसा ही होता।
श्लोक 25.62
सरल हिंदी भावार्थ: रानी के प्रभाव में उसने अपने स्वाभाविक विवेक और स्वतन्त्रता को खो दिया। अज्ञानी होकर वह न चाहते हुए भी खेल के पालतू पशु की तरह अनुकरण करने लगा।
॥ चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 25 समाप्त ॥
चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 26
पुरञ्जन का आखेट और आसक्ति
श्लोक 26.1
सरल हिंदी भावार्थ: नारद ने कहा—एक दिन धनुर्धारी पुरञ्जन पाँच घोड़ों वाला तेज रथ लेकर चला। उसमें दो दण्ड, दो पहिए, एक धुरी, तीन ध्वजदण्ड और पाँच बन्धन थे।
श्लोक 26.2
सरल हिंदी भावार्थ: उसमें एक लगाम, एक सारथि, एक आसन, दो जुए, पाँच आयुध, सात आवरण और पाँच प्रकार की गतियाँ थीं। यह रथ आगे समझाए जाने वाले देहरूपक का भाग है।
श्लोक 26.3
सरल हिंदी भावार्थ: स्वर्णसज्जित रथ पर चढ़कर, स्वर्णकवच और अक्षय तरकस धारण किए, ग्यारह सेनाओं का स्वामी पुरञ्जन पञ्चप्रस्थ वन गया।
श्लोक 26.4
सरल हिंदी भावार्थ: शिकार की लत में आसक्त वह अपनी स्नेहयोग्य पत्नी को छोड़कर अभिमान से धनुष–बाण लिए वन में घूमने लगा।
श्लोक 26.5
सरल हिंदी भावार्थ: आसुरी वृत्ति, कठोर मन और निर्दयता से उसने तीखे बाणों द्वारा वन्यजीवों को मारना आरम्भ किया।
श्लोक 26.6
सरल हिंदी भावार्थ: प्राचीन यज्ञविधान में भी राजा को नियत अवसर पर केवल आवश्यक सीमा में निर्दिष्ट पशुओं तक सीमित रखा गया था; मनमाना वध निषिद्ध था।
श्लोक 26.7
सरल हिंदी भावार्थ: जो ज्ञानी मनुष्य कर्म की निर्धारित मर्यादा और उसके उद्देश्य को समझकर कर्तव्य करता है, वह उसी प्रकार कर्म में आसक्त होकर नहीं बँधता।
श्लोक 26.8
सरल हिंदी भावार्थ: परन्तु अहंकार से मर्यादा तोड़कर कर्म करने वाला गुणप्रवाह में फँसता, विवेक खोता और अधोगति पाता है।
श्लोक 26.9
सरल हिंदी भावार्थ: रंगीन पंखों वाले बाणों से घायल पशुओं की पीड़ा और करुण क्रन्दन दयालु हृदय के लिए असह्य था।
श्लोक 26.10
सरल हिंदी भावार्थ: खरगोश, सूअर, भैंसे, गवय, रुरु, साही और अन्य अनेक पशुओं को मारते–मारते राजा थक गया।
श्लोक 26.11
सरल हिंदी भावार्थ: भूख, प्यास और परिश्रम से व्याकुल होकर वह घर लौटा। स्नान और उचित भोजन करके आराम किया तथा थकान दूर की।
श्लोक 26.12
सरल हिंदी भावार्थ: धूप, चन्दन और मालाओं से शरीर सँवारा, सुन्दर आभूषण पहने और मन अपनी रानी में लगाया।
श्लोक 26.13
सरल हिंदी भावार्थ: तृप्त और हर्षित होकर कामना में डूबे राजा को गृह की शोभा बढ़ाने वाली सुन्दरी पत्नी दिखाई नहीं दी।
श्लोक 26.14
सरल हिंदी भावार्थ: वह उदास होकर अन्तःपुर की स्त्रियों से पूछने लगा—क्या तुम सब अपनी स्वामिनी सहित पहले की तरह कुशल हो?
श्लोक 26.15
सरल हिंदी भावार्थ: यदि घर में माता या पति में अनुरक्त पत्नी न हो तो सम्पदा भी शोभा नहीं देती। समझदार व्यक्ति ऐसे घर में टूटे रथ में बैठे की तरह असहाय कैसे रहे?
श्लोक 26.16
सरल हिंदी भावार्थ: वह कहाँ है जो संकट में डूबते मुझे बार–बार विवेक का प्रकाश देकर उबारती है?
श्लोक 26.17
सरल हिंदी भावार्थ: स्त्रियाँ बोलीं—राजन्, आपकी प्रिया के मन का विचार हम नहीं जानतीं। देखिए, वे बिना बिछौने के भूमि पर लेटी हैं।
श्लोक 26.18
सरल हिंदी भावार्थ: नारद ने कहा—अपनी रानी को उपेक्षित दशा में भूमि पर देखकर आसक्ति से विवेक खो चुके पुरञ्जन बहुत व्याकुल हो गए।
श्लोक 26.19
सरल हिंदी भावार्थ: दुखी मन से वे मधुर वचनों द्वारा उसे मनाने लगे, पर अपने प्रति उसके पूर्व स्नेह के चिह्न नहीं देख पाए।
श्लोक 26.20
सरल हिंदी भावार्थ: मनाना जानने वाले राजा ने धीरे–धीरे अनुनय किया, उसके चरण छुए, गोद में लेकर स्नेह किया और कहा।
श्लोक 26.21
सरल हिंदी भावार्थ: पुरञ्जन बोला—जिन सेवकों की भूल पर स्वामी उन्हें अपना मानकर अनुशासन नहीं देते, वे सचमुच दुर्भाग्यशाली हैं।
श्लोक 26.22
सरल हिंदी भावार्थ: स्वामी का सुधारने वाला दण्ड सेवक पर अनुग्रह है; क्रोधी और अपरिपक्व व्यक्ति उसके हितकारी उद्देश्य को नहीं समझता। राजा यह बात स्वयं की भूल स्वीकारने के लिए कह रहा था।
श्लोक 26.23
सरल हिंदी भावार्थ: प्रिये, अपना स्नेह, लज्जा, मुस्कान और सुन्दर दृष्टि से शोभित मुख दिखाओ। नीली अलकों और उन्नत नासिका वाले उस मुख से मधुर वचन कहो।
श्लोक 26.24
सरल हिंदी भावार्थ: वीरपत्नी, जिसने तुम्हारा अपराध किया हो उसे मैं दण्ड दूँगा; ब्रह्मनिष्ठों और भगवान के भक्तों को छोड़कर तीनों लोकों में कोई अपराधी मेरे न्याय से निश्चिन्त नहीं रह सकेगा।
श्लोक 26.25
सरल हिंदी भावार्थ: मैं तुम्हारा तिलकहीन, मलिन, उदास, क्रोध और आँसुओं से भरा मुख नहीं देखना चाहता। तुम्हारी लाली और प्रसन्नता क्यों लुप्त हैं?
श्लोक 26.26
सरल हिंदी भावार्थ: अपने मन से शिकार को चले जाने की भूल करने वाले मुझ स्नेही को क्षमा करो। मैं कामना से व्याकुल और तुम्हारे अधीन हूँ; प्रिये, मुझ पर प्रसन्न होओ।
॥ चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 26 समाप्त ॥
चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 27
चण्डवेग और कालकन्या का आक्रमण
श्लोक 27.1
सरल हिंदी भावार्थ: नारद ने कहा—महाराज, पुरञ्जनी ने अपनी मनोहर चेष्टाओं से पुरञ्जन को पूर्ण वश में करके उसके साथ सुखभोग किया।
श्लोक 27.2
सरल हिंदी भावार्थ: स्नान, शृङ्गार और मंगलकर्म से प्रसन्न तथा सुन्दर मुख वाली रानी के आने पर राजा ने हर्ष से उसका स्वागत किया।
श्लोक 27.3
सरल हिंदी भावार्थ: आलिङ्गन और एकान्त की प्रेमवार्ता में उसकी चेतना ऐसी खिंची कि दिन–रात के रूप में भागते दुस्तर काल का बोध नहीं रहा।
श्लोक 27.4
सरल हिंदी भावार्थ: बहुमूल्य शय्या पर रानी की भुजा का तकिया बनाकर लेटा, मद और मोह से ढका राजा उसी को सर्वोच्च मानता रहा; उसे अपना या परमात्मा का सत्य न सूझा।
श्लोक 27.5
सरल हिंदी भावार्थ: कामना से मलिन मन लिए इस प्रकार रमते हुए उसका नया यौवन मानो आधे क्षण में बीत गया।
श्लोक 27.6
सरल हिंदी भावार्थ: पुरञ्जनी से उसके ग्यारह सौ पुत्र हुए और आयु का आधा भाग निकल गया।
श्लोक 27.7
सरल हिंदी भावार्थ: उनकी एक सौ दस कन्याएँ भी हुईं, जो शील, उदारता और गुणों से माता–पिता का यश बढ़ाती थीं।
श्लोक 27.8
सरल हिंदी भावार्थ: पञ्चालपति ने वंश बढ़ाने वाले पुत्रों का विवाह किया और पुत्रियों को उनके समान योग्य वरों से जोड़ा।
श्लोक 27.9
सरल हिंदी भावार्थ: प्रत्येक पुत्र के सौ–सौ पुत्र हुए; उनसे पञ्चाल में पुरञ्जन का वंश बहुत बढ़ा।
श्लोक 27.10
सरल हिंदी भावार्थ: घर और कोश पर निर्भर उन उत्तराधिकारियों के प्रति गहरी ममता से वह विषयभोगों में और बँध गया।
श्लोक 27.11
सरल हिंदी भावार्थ: तुम्हारी तरह अनेक कामनाओं से प्रेरित होकर उसने भी पशुवध वाले घोर यज्ञों की दीक्षा ली और देवताओं, पितरों तथा भूताधिपतियों की पूजा की।
श्लोक 27.12
सरल हिंदी भावार्थ: कुटुम्ब की आसक्ति में असावधान रहते हुए उसके पास वह काल आ पहुँचा जो विषयसुख में डूबे लोगों को अप्रिय लगता है।
श्लोक 27.13
सरल हिंदी भावार्थ: राजन्, चण्डवेग नामक गन्धर्वराज था; उसके तीन सौ साठ बलवान गन्धर्व अनुचर थे।
श्लोक 27.14
सरल हिंदी भावार्थ: उनकी उतनी ही उजली और काली गन्धर्व पत्नियाँ थीं। वे बारी–बारी उस भोगसम्पन्न नगरी की शक्ति लूटती रहती थीं; यह दिन–रात का रूपक है।
श्लोक 27.15
सरल हिंदी भावार्थ: चण्डवेग के अनुचरों ने पुरञ्जन की नगरी लूटनी शुरू की तो उसके सजग प्रहरी सर्प ने विरोध किया।
श्लोक 27.16
सरल हिंदी भावार्थ: वह बलवान नगररक्षक अकेला ही सात सौ बीस गन्धर्व–गन्धर्वियों से सौ वर्ष तक लड़ता रहा।
श्लोक 27.17
सरल हिंदी भावार्थ: बहुतों से युद्ध में अपने एकमात्र रक्षक की शक्ति घटती देखकर पुरञ्जन राज्य, नगर और बन्धुओं सहित बड़ी चिन्ता में पड़ा।
श्लोक 27.18
सरल हिंदी भावार्थ: फिर भी वह नगरी में विषयों का मधु लेता और साथियों की लाई भेंटें स्वीकारता रहा; आसक्ति के वश में आने वाले भय को नहीं समझा।
श्लोक 27.19
सरल हिंदी भावार्थ: बर्हिष्मन्, काल की एक कन्या तीनों लोकों में पति खोजती घूम रही थी, पर किसी ने उसे प्रसन्न होकर स्वीकार नहीं किया।
श्लोक 27.20
सरल हिंदी भावार्थ: अपनी अप्रियता के कारण वह दुर्भगा कहलाती थी। जिसे राजर्षि पुरु ने स्वीकार किया तो प्रसन्न होकर उसने उन्हें वर दिया; यहाँ वह वृद्धावस्था का रूप है।
श्लोक 27.21
सरल हिंदी भावार्थ: एक बार घूमते हुए उसने मुझे ब्रह्मलोक से पृथ्वी पर आया देखा। मेरा ब्रह्मचर्य जानते हुए भी मोहवश मुझे पति बनाना चाहा।
श्लोक 27.22
सरल हिंदी भावार्थ: मेरे इनकार से क्रुद्ध होकर उसने कठिन शाप दिया—मुनि, मेरी प्रार्थना ठुकराई है, इसलिए तुम एक स्थान पर स्थिर न रह सकोगे।
श्लोक 27.23
सरल हिंदी भावार्थ: इच्छा पूरी न होने पर वह मेरे संकेत के अनुसार भय नामक यवनराज के पास गई और उसे पति के रूप में चुना।
श्लोक 27.24
सरल हिंदी भावार्थ: उसने कहा—यवनों के श्रेष्ठ वीर, मैं तुम्हें पति चुनती हूँ। प्राणियों का तुम्हारे प्रति किया सङ्कल्प निष्फल नहीं होता।
श्लोक 27.25
सरल हिंदी भावार्थ: दो प्रकार के अविवेकी पछताते हैं—जो लोक और शास्त्र की उचित अपेक्षा होने पर दान नहीं देता तथा जो योग्य प्राप्त वस्तु को स्वीकार नहीं करता।
श्लोक 27.26
सरल हिंदी भावार्थ: इसलिए मुझे स्वीकार करो और शरण आई मुझ पर दया करो। दुःखियों पर करुणा करना पुरुषार्थ का सच्चा धर्म है।
श्लोक 27.27
सरल हिंदी भावार्थ: कालकन्या की बात सुनकर यवनराज देवव्यवस्था का गूढ़ कार्य पूरा करना चाहता था; उसने मुस्कराकर कहा।
श्लोक 27.28
सरल हिंदी भावार्थ: मैंने ध्यानपूर्वक तुम्हारे लिए उपयुक्त सम्बन्ध निश्चित किया है। तुम्हारे अप्रिय परिणाम के कारण यह जगत तुम्हारा स्वागत नहीं करता।
श्लोक 27.29
सरल हिंदी भावार्थ: इसलिए छिपी गति से कर्मनिर्मित शरीरों का उपभोग करो। मेरी सेना के साथ मिलकर प्राणियों के विनाश की ओर ले जाओगी।
श्लोक 27.30
सरल हिंदी भावार्थ: यह प्रज्वार मेरा भाई है और तुम मेरी बहन बनो। मैं अपनी भयानक सेना सहित तुम दोनों के साथ अदृश्य रूप से जगत में घूमूँगा।
॥ चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 27 समाप्त ॥
चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 28
नगरी का विनाश और अविज्ञात मित्र का बोध
श्लोक 28.1
सरल हिंदी भावार्थ: नारद ने कहा—बर्हिष्मन्, भय के सैनिक नियति का कार्य करते हुए प्रज्वार और कालकन्या के साथ पृथ्वी पर घूमने लगे।
श्लोक 28.2
सरल हिंदी भावार्थ: एक दिन उन्होंने सांसारिक भोगों से भरी पुरञ्जन की नगरी को बलपूर्वक घेर लिया; उसका रक्षक सर्प अब बूढ़ा हो चुका था।
श्लोक 28.3
सरल हिंदी भावार्थ: कालकन्या ने भी नगरी पर अधिकार कर लिया। उसके वश में पड़कर मनुष्य की देहशक्ति शीघ्र क्षीण हो जाती है।
श्लोक 28.4
सरल हिंदी भावार्थ: उसके आक्रमण के साथ यवन सब दिशाओं के द्वारों से भीतर घुसे और समस्त नगरी को पीड़ित करने लगे।
श्लोक 28.5
सरल हिंदी भावार्थ: नगरी पीड़ित हुई तो उसे अपना स्वरूप मानने वाला कुटुम्बी पुरञ्जन ममता से घिरकर अनेक ताप भोगने लगा।
श्लोक 28.6
सरल हिंदी भावार्थ: कालकन्या से ग्रस्त होकर उसकी शोभा और विवेक नष्ट हुए। विषयों में फँसा वह दीन हो गया और गन्धर्वों तथा यवनों ने उसका ऐश्वर्य छीन लिया।
श्लोक 28.7
सरल हिंदी भावार्थ: उसने नगरी को जर्जर, पुत्र–पौत्र, अनुचर और मन्त्रियों को प्रतिकूल तथा उपेक्षापूर्ण और पत्नी को भी पहले जैसा स्नेहहीन पाया।
श्लोक 28.8
सरल हिंदी भावार्थ: स्वयं वृद्धावस्था से ग्रस्त और पञ्चालप्रदेश शत्रुओं से दूषित देखकर वह अन्तहीन चिन्ता में पड़ा, पर उपाय नहीं मिला।
श्लोक 28.9
सरल हिंदी भावार्थ: वह दुर्बल होकर भी विषयों की इच्छा करता, आत्मकल्याण का प्रेम खो चुका था और पुत्र–पत्नी को ही दुलारता रहा।
श्लोक 28.10
सरल हिंदी भावार्थ: गन्धर्वों और यवनों के आक्रमण तथा कालकन्या के दबाव से अन्ततः वह अनिच्छा से नगरी छोड़ने को विवश हुआ।
श्लोक 28.11
सरल हिंदी भावार्थ: भय का बड़ा भाई प्रज्वार आया और अपने भाई का काम पूरा करने के लिए पूरी नगरी जलाने लगा।
श्लोक 28.12
सरल हिंदी भावार्थ: नगरी जलने पर निवासियों, सामग्री, पत्नी और परिवार सहित गृहासक्त पुरञ्जन बहुत संतप्त हुआ।
श्लोक 28.13
सरल हिंदी भावार्थ: यवनों से घिरा, कालकन्या से ग्रस्त और प्रज्वार से तपता नगररक्षक प्राण भी व्याकुल हो उठा।
श्लोक 28.14
सरल हिंदी भावार्थ: बहुत कष्ट और कम्पन के कारण वह रक्षा न कर सका। जलते वृक्ष के कोटर से सर्प निकलना चाहे, वैसे वह निकलना चाहता था।
श्लोक 28.15
सरल हिंदी भावार्थ: गन्धर्वों से शक्ति क्षीण और यवनों से घिरा, शिथिल अङ्गों वाला पुरञ्जन रोने लगा।
श्लोक 28.16
सरल हिंदी भावार्थ: पुत्रियाँ, पुत्र, पौत्र, सम्बन्धी, दामाद, सेवक तथा बचा हुआ घर, कोश और सामान—
श्लोक 28.17
सरल हिंदी भावार्थ: इन सबको मैं और मेरा मानने वाला दुर्बुद्धि गृहस्थ, वियोग सामने देखकर पत्नी की चिन्ता में दीन हो गया।
श्लोक 28.18
सरल हिंदी भावार्थ: मेरे दूसरे लोक जाने पर यह असहाय पत्नी बच्चों के लिए शोक करती हुई कैसे रहेगी?
श्लोक 28.19
सरल हिंदी भावार्थ: मेरे भोजन और स्नान से पहले स्वयं नहीं करती; मुझमें अनुरक्त रहती और मेरे क्रुद्ध या डाँटने पर भय से चुप हो जाती है—वह पुराने सम्बन्ध को याद करता रहा।
श्लोक 28.20
सरल हिंदी भावार्थ: मैं नासमझ होता हूँ तो यह समझाती है। मेरे जाने पर शोक से दुर्बल होकर, वीर पुत्रों की माता होते हुए भी गृहस्थी कैसे सँभालेगी?
श्लोक 28.21
सरल हिंदी भावार्थ: मेरे बाद पुत्र–पुत्रियाँ सहाराहीन होकर समुद्र में टूटी नाव के यात्रियों की तरह कैसे जीएँगे?
श्लोक 28.22
सरल हिंदी भावार्थ: इस प्रकार अनुचित दीनता से शोक करते पुरञ्जन को पकड़ने के लिए भय सामने आ गया।
श्लोक 28.23
सरल हिंदी भावार्थ: यवन उसे पशु की तरह विनाश की ओर ले चले। उसके पीछे अनुचर भी अत्यन्त व्याकुल होकर शोक करते चले।
श्लोक 28.24
सरल हिंदी भावार्थ: नगरी छोड़कर रक्षक सर्प चला गया तो उसके पीछे नगरी भी टूटकर अपने मूल तत्त्वों में मिल गई।
श्लोक 28.25
सरल हिंदी भावार्थ: बलवान यवन द्वारा खींचे जाते हुए अज्ञान से ढका पुरञ्जन अपने पुराने हितैषी मित्र को पहचान न सका।
श्लोक 28.26
सरल हिंदी भावार्थ: उसने निर्दयता से यज्ञ में जिन पशुओं को मारा था, वे अपनी पीड़ा याद करके क्रुद्ध प्रहार करते दिखाई दिए। यह हिंसा के कर्मफल का रूपक है।
श्लोक 28.27
सरल हिंदी भावार्थ: आसक्ति से दूषित और आत्मस्मृति खोया वह बहुत समय तक गहरे अन्धकार और दुःख का अनुभव करता रहा।
श्लोक 28.28
सरल हिंदी भावार्थ: अन्तकाल में उसी स्त्री का चिन्तन रहने के कारण अगले जन्म में वह विदर्भराज के घर सुन्दर कन्या के रूप में जन्मा।
श्लोक 28.29
सरल हिंदी भावार्थ: पाण्ड्यदेश के वीर मलयध्वज ने युद्ध में अन्य राजाओं को जीतकर उस विदर्भकन्या से विवाह किया; उसका स्वयंवर पराक्रम पर आधारित था।
श्लोक 28.30
सरल हिंदी भावार्थ: उससे एक सुन्दर नेत्रों वाली पुत्री और बाद में सात पुत्र हुए, जो द्रविड़देश के सात शासक बने।
श्लोक 28.31
सरल हिंदी भावार्थ: हर पुत्र की बहुत विशाल सन्तति हुई; कथा कहती है कि उनके वंशज मन्वन्तरभर पृथ्वी का पालन करते रहे।
श्लोक 28.32
सरल हिंदी भावार्थ: अगस्त्य ने पहले जन्मी व्रतशील पुत्री से विवाह किया। उनसे दृढच्युत हुए और उनके पुत्र इध्मवाह मुनि थे।
श्लोक 28.33
सरल हिंदी भावार्थ: राजर्षि मलयध्वज ने पुत्रों में राज्य बाँटा और कृष्ण की आराधना के लिए कुलाचल पर्वत चले गए।
श्लोक 28.34
सरल हिंदी भावार्थ: वैदर्भी ने घर, पुत्र और भोग छोड़े तथा पति के पीछे ऐसे चलीं जैसे चाँदनी चन्द्रमा के साथ रहती है।
श्लोक 28.35
सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ चन्द्रवसा, ताम्रपर्णी और वटोदका नदियों के पुण्यजल में स्नान करके राजा शरीर और मन दोनों को शुद्ध करते थे।
श्लोक 28.36
सरल हिंदी भावार्थ: कन्द, बीज, मूल, फल, फूल, पत्ते, घास और जल से सादा निर्वाह करते हुए वे तप में लगे; धीरे–धीरे शरीर क्षीण हुआ।
श्लोक 28.37
सरल हिंदी भावार्थ: समदृष्टि से उन्होंने शीत, गर्मी, वायु, वर्षा, भूख, प्यास, प्रिय–अप्रिय और सुख–दुःख के द्वन्द्व जीते।
श्लोक 28.38
सरल हिंदी भावार्थ: तप, ज्ञान, यम और नियम से संस्कार शुद्ध हुए। इन्द्रिय, प्राण और मन को वश में करके उन्होंने चित्त ब्रह्म में लगाया।
श्लोक 28.39
सरल हिंदी भावार्थ: कथा में वे सौ दिव्य वर्ष एक स्थान पर वृक्ष की तरह स्थिर रहे। भगवान वासुदेव में प्रेम रखते हुए उन्हें दूसरी वस्तु का बोध नहीं रहा।
श्लोक 28.40
सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने व्यापक आत्मा को देह से अलग और विचारों के साक्षी के रूप में जाना, जैसे जागा व्यक्ति अपने स्वप्न को देखता है; फिर चित्त शान्त हुआ।
श्लोक 28.41
सरल हिंदी भावार्थ: परम गुरु भगवान हरि के उपदेश और उज्ज्वल शुद्धज्ञान के दीपक से उन्हें सर्वव्यापक परम तत्त्व का बोध हुआ।
श्लोक 28.42
सरल हिंदी भावार्थ: अपने को परम ब्रह्म में और परम ब्रह्म को अपने भीतर देखते हुए उन्होंने भेदयुक्त देखने का आग्रह भी छोड़ा और देहसम्बन्धी व्यवहार से उपराम हो गए।
श्लोक 28.43
सरल हिंदी भावार्थ: वैदर्भी भोग छोड़कर परम धर्मज्ञ पति मलयध्वज की प्रेम से सेवा करती रहीं।
श्लोक 28.44
सरल हिंदी भावार्थ: वल्कल पहने, व्रत से दुर्बल और बँधे केशों वाली शान्त रानी पति के समीप ऐसे शोभित थीं जैसे शान्त अग्नि के पास उसकी ज्योति।
श्लोक 28.45
सरल हिंदी भावार्थ: स्थिर आसन पर बैठे प्रिय पति का देहान्त हो गया है, यह न जानकर वे पहले की तरह सेवा करती रहीं।
श्लोक 28.46
सरल हिंदी भावार्थ: जब चरणसेवा करते हुए उष्णता नहीं मिली तो उनका मन अत्यन्त घबरा गया, जैसे झुण्ड से बिछुड़ी हरिणी।
श्लोक 28.47
सरल हिंदी भावार्थ: स्वयं को असहाय और बन्धुरहित समझकर वे आँसुओं से भीग गईं और वन में ऊँचे स्वर से रोने लगीं।
श्लोक 28.48
सरल हिंदी भावार्थ: वे पुकारने लगीं—राजर्षि, उठिए! डाकुओं और अयोग्य शासकों से भयभीत इस समुद्रपर्यन्त पृथ्वी की रक्षा कीजिए।
श्लोक 28.49
सरल हिंदी भावार्थ: पति के पीछे वन आई रानी इस प्रकार विलाप करती उनके चरणों पर गिर पड़ीं और आँसू बहाती रहीं।
श्लोक 28.50
सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने लकड़ियों की चिता बनाई, उस पर पति का शरीर रखकर अग्नि दी और शोक में स्वयं भी देहत्याग का विचार किया। यह आख्यान की परिस्थिति है; आगे आत्मज्ञानी मित्र उन्हें समझाता है।
श्लोक 28.51
सरल हिंदी भावार्थ: तभी उनका पुराना आत्मज्ञानी मित्र ब्राह्मणरूप में वहाँ आया और रोती हुई रानी को मधुर हितवाणी से समझाने लगा।
श्लोक 28.52
सरल हिंदी भावार्थ: ब्राह्मण बोला—तुम कौन हो, किसकी हो और यह लेटा कौन है जिसके लिए रो रही हो? क्या मुझे अपना वह मित्र पहचानती हो जिसके साथ पहले रहा करती थीं?
श्लोक 28.53
सरल हिंदी भावार्थ: मित्र, क्या तुम्हें अपना वह स्वरूप याद है जिसका मित्र अविज्ञात था? मुझे छोड़कर तुम सांसारिक भोग का आश्रय खोजने चली गई थीं।
श्लोक 28.54
सरल हिंदी भावार्थ: हम दोनों हंस, परस्पर मित्र और मानस में निवास करने वाले थे। बहुत समय तक हमारा सम्बन्ध बना रहा, फिर तुमने वह आश्रय छोड़ दिया।
श्लोक 28.55
सरल हिंदी भावार्थ: बन्धु, विषयों में लगी बुद्धि से मुझे छोड़ पृथ्वी पर घूमते हुए तुमने एक स्त्री द्वारा व्यवस्थित निवास देखा था।
श्लोक 28.56
सरल हिंदी भावार्थ: उसमें पाँच उद्यान, नौ द्वार, एक रक्षक, तीन कक्ष, छह परिवार, पाँच बाजार और पाँच भौतिक तत्त्व थे; उसका स्वामी स्त्री के अधीन था।
श्लोक 28.57
सरल हिंदी भावार्थ: पाँच विषय उद्यान हैं, नौ इन्द्रियद्वार प्रवेशमार्ग हैं; तेज, जल और अन्न तीन कक्ष तथा इन्द्रियों का समूह परिवार है।
श्लोक 28.58
सरल हिंदी भावार्थ: कर्म करने की शक्तियाँ बाजार और पाँच भूत उसके आधार हैं। इन शक्तियों का स्वामी जीव उस शरीर में प्रवेश करके अपना स्वरूप भूल जाता है।
श्लोक 28.59
सरल हिंदी भावार्थ: उस स्त्री के सङ्ग में रमते हुए तुमने सुना हुआ ज्ञान और आत्मस्मृति खो दी; उसी आसक्ति से ऐसी कठिन दशा में पहुँचे।
श्लोक 28.60
सरल हिंदी भावार्थ: तुम वास्तव में विदर्भ की पुत्री नहीं, यह वीर तुम्हारा नित्य बन्धु नहीं और तुम पुरञ्जनी के पति भी नहीं हो; वे सब नौ द्वारों की देह से बने सम्बन्ध हैं।
श्लोक 28.61
सरल हिंदी भावार्थ: अपने को कभी पुरुष और कभी स्त्री मानना मेरी मायारचित उपाधि है। सत्य में आत्मा इन दोनों से परे है; हम दोनों हंसों की वास्तविक स्थिति देखो।
श्लोक 28.62
सरल हिंदी भावार्थ: मैं तुमसे सर्वथा अलग नहीं और तुम मुझसे असम्बद्ध नहीं। ज्ञानी हमारे सम्बन्ध में ऐसा विच्छेद नहीं देखते; अपने आत्मस्वरूप को पहचानो।
श्लोक 28.63
सरल हिंदी भावार्थ: जैसे एक मनुष्य दर्पण और देखने की स्थिति के कारण अपने एक ही रूप को दो जैसा देखता है, वैसे ही हमारे बीच भेद दिखाई देता है।
श्लोक 28.64
सरल हिंदी भावार्थ: उस परम हंस के समझाने से मनरूपी मानस में रहने वाले जीवहंस को होश आया। अपने स्वरूप में स्थित होकर उसे खोई आत्मस्मृति फिर मिली।
श्लोक 28.65
सरल हिंदी भावार्थ: बर्हिष्मन्, मैंने तुम्हें यह अध्यात्मज्ञान रूपक के द्वारा दिखाया है; विश्व के पोषक भगवान को ऐसे अप्रत्यक्ष अर्थवाले उपदेश प्रिय हैं।
॥ चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 28 समाप्त ॥
चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 29
पुरञ्जन रूपक का अर्थ और कर्मबन्धन से मुक्ति
श्लोक 29.1
सरल हिंदी भावार्थ: प्राचीनबर्हि बोले—भगवन्, आपकी बात पूरी तरह समझ नहीं आई। ज्ञानी इसका अर्थ जानते हैं, पर हम कर्मों में मोहित हैं।
श्लोक 29.2
सरल हिंदी भावार्थ: नारद बोले—पुरञ्जन जीव को समझो, जो अपने कर्मों के अनुसार एक, दो, तीन, चार, अनेक पैरों वाले या बिना पैरों वाले शरीररूपी नगर अपनाता है।
श्लोक 29.3
सरल हिंदी भावार्थ: उसका अविज्ञात मित्र ईश्वर है, जिन्हें सामान्य लोग नाम, कर्म और गुणों के बाहरी विचार से पूरा नहीं जान सकते।
श्लोक 29.4
सरल हिंदी भावार्थ: प्रकृति के गुणों का विस्तृत अनुभव चाहकर जीव ने दो हाथ, दो पैर और नौ द्वारों वाला मनुष्यशरीर अपने लिए उपयुक्त माना।
श्लोक 29.5
सरल हिंदी भावार्थ: वह स्त्री बुद्धि है, जिससे मैं और मेरा का अभिमान बनता है। उसी का आश्रय लेकर जीव इन्द्रियों से गुणों का अनुभव करता है।
श्लोक 29.6
सरल हिंदी भावार्थ: उसके मित्र ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ हैं, उनकी सहेलियाँ उनकी वृत्तियाँ हैं। पाँच सिर वाला सर्प पाँच प्रकार की गति वाला प्राण है।
श्लोक 29.7
सरल हिंदी भावार्थ: दोनों प्रकार की इन्द्रियों का शक्तिशाली नायक मन है। पाँच विषय पञ्चालप्रदेश हैं और उनके बीच नौ छिद्रों वाला शरीरनगर है।
श्लोक 29.8
सरल हिंदी भावार्थ: दो आँखें, दो नासिकाछिद्र, दो कान, मुख, जननेन्द्रिय और गुदा नौ द्वार हैं; जीव उनके द्वारा सम्बन्धित विषयों का अनुभव करता है।
श्लोक 29.9
सरल हिंदी भावार्थ: आँखें, नासिकाछिद्र और मुख सामने के पाँच द्वार हैं। दक्षिण का द्वार दाहिना कान और उत्तर का बायाँ कान है।
श्लोक 29.10
सरल हिंदी भावार्थ: पीछे या नीचे के दो द्वार गुदा और जननेन्द्रिय हैं। खद्योता और आविर्मुखी दोनों आँखें हैं, जिनसे दृष्टिशक्ति के सहारे रूपरूपी विभ्राजित प्रदेश देखा जाता है।
श्लोक 29.11
सरल हिंदी भावार्थ: नलिनी और नालिनी नासिकाएँ, सौरभ गन्धविषय और अवधूत घ्राणशक्ति है। मुख्या मुख, विपण वाणी और रसज्ञ स्वाद पहचानने वाली शक्ति है।
श्लोक 29.12
सरल हिंदी भावार्थ: आपण बोलचाल–व्यवहार और बहूदन विविध भोजन है। पितृहू दाहिना कान और देवहू बायाँ कान है।
श्लोक 29.13
सरल हिंदी भावार्थ: प्रवृत्ति और निवृत्ति के शास्त्र पञ्चाल के दो भाग हैं; श्रुतधर नामक श्रवणशक्ति से कर्मपरक पितृयान और ज्ञानपरक देवयान की शिक्षा मिलती है।
श्लोक 29.14
सरल हिंदी भावार्थ: आसुरी जननेन्द्रिय का द्वार, ग्रामक मैथुनसुख और दुर्मद उसकी कामवृत्ति है। निर्ऋति गुदाद्वार है।
श्लोक 29.15
सरल हिंदी भावार्थ: वैशस मलत्याग का कष्टप्रदेश और लुब्धक पायु की क्रियाशक्ति है। दो नेत्रहीन सेवक हाथ और पैर हैं, जिनसे मनुष्य काम करता और चलता है।
श्लोक 29.16
सरल हिंदी भावार्थ: अन्तःपुर हृदय और विषूचीन मन है। वहीं उसके गुणों के अनुसार मोह, प्रसन्नता और हर्ष होते हैं।
श्लोक 29.17
सरल हिंदी भावार्थ: गुणों से रंगी बुद्धि जैसे बदलती या कार्य करती है, साक्षी आत्मा देहाभिमान के कारण उसकी वृत्तियों का अनुकरण करता हुआ प्रतीत होता है।
श्लोक 29.18
सरल हिंदी भावार्थ: देह रथ, इन्द्रियाँ घोड़े, वर्ष की गति उसका वेग, पुण्य–पाप दो पहिए, तीन गुण ध्वज और पाँच प्राण उसके बन्धन हैं।
श्लोक 29.19
सरल हिंदी भावार्थ: मन लगाम, बुद्धि सारथि, हृदय आसन, सुख–दुःख जैसे द्वन्द्व दो जुए, पाँच विषय आयुध और सात धातुएँ रथ के आवरण हैं।
श्लोक 29.20
सरल हिंदी भावार्थ: सङ्कल्प बाहरी गति बनकर विषयों की मृगतृष्णा की ओर दौड़ता है। ग्यारह इन्द्रियाँ सेना और पाँच प्रकार की प्राणिहिंसा शिकारविनोद हैं।
श्लोक 29.21
सरल हिंदी भावार्थ: चण्डवेग वर्षरूप काल है। उसके गन्धर्व दिन और गन्धर्वियाँ रातें हैं; तीन सौ साठ दिन–रात चक्र लगाकर आयु ले जाते हैं।
श्लोक 29.22
सरल हिंदी भावार्थ: कालकन्या प्रत्यक्ष वृद्धावस्था है, जिसका कोई स्वागत नहीं करता। यवनराज मृत्यु ने प्राणियों के क्षय के लिए उसे बहन बनाया।
श्लोक 29.23
सरल हिंदी भावार्थ: मानसिक पीड़ाएँ और शारीरिक रोग उसके सैनिक हैं। प्रज्वार प्राणान्तक ताप का रूप है, जो शरीर और मन को संतप्त करता है।
श्लोक 29.24
सरल हिंदी भावार्थ: दैविक, भौतिक और अपने शरीर–मन से उत्पन्न अनेक दुःखों से घिरा जीव अज्ञानवश देह में अपनी आयु बिताता है।
श्लोक 29.25
सरल हिंदी भावार्थ: स्वरूप से गुणातीत होकर भी प्राण, इन्द्रिय और मन के धर्म अपने पर आरोपित करता है; छोटी कामनाओं में सोया, मैं–मेरा सोचकर कर्म करता रहता है।
श्लोक 29.26
सरल हिंदी भावार्थ: जब मनुष्य अपने वास्तविक आत्मा और परम गुरु भगवान को न जानकर प्रकृति के गुणों में आसक्त होता है—
श्लोक 29.27
सरल हिंदी भावार्थ: तब वह गुणों का अभिमान करके विवशता से सत्त्व, तम और रज के अनुरूप कर्म करता तथा उनके अनुसार जन्म पाता है।
श्लोक 29.28
सरल हिंदी भावार्थ: कभी सात्त्विक कर्म से प्रकाशमय लोक, कभी रजोगुण से परिश्रम और अन्ततः दुःख तथा कभी तमोगुण से अन्धकार और शोक की स्थिति पाता है।
श्लोक 29.29
सरल हिंदी भावार्थ: कर्म और गुण के अनुसार कभी पुरुष, कभी स्त्री, कभी अन्य देहरूप तथा देव, मनुष्य या पशु आदि जन्म मिलता है।
श्लोक 29.30
सरल हिंदी भावार्थ: जैसे भूखा असहाय कुत्ता घर–घर घूमकर कहीं मार और कहीं अन्न पाता है—
श्लोक 29.31
सरल हिंदी भावार्थ: वैसे ही कामनाओं वाला जीव ऊँचे, नीचे और बीच के मार्गों में भटकता तथा अपने कर्मफल के अनुसार प्रिय–अप्रिय अनुभव पाता है।
श्लोक 29.32
सरल हिंदी भावार्थ: दैविक, भौतिक और शारीरिक–मानसिक दुःखों में से किसी न किसी का सम्बन्ध बना रहता है; केवल बाहरी प्रतिकार से उनका पूर्ण अन्त नहीं होता।
श्लोक 29.33
सरल हिंदी भावार्थ: सिर का भारी बोझ कन्धे पर रख लेने से उसका स्थान बदलता है, बोझ मिटता नहीं; अनेक बाहरी प्रतिकार भी ऐसे ही होते हैं।
श्लोक 29.34
सरल हिंदी भावार्थ: केवल दूसरे कर्म से कर्मबन्धन का स्थायी प्रतिकार नहीं होता। अज्ञान पर आधारित दोनों उपाय स्वप्न के भीतर दूसरे स्वप्न जैसे हैं।
श्लोक 29.35
सरल हिंदी भावार्थ: अलग वास्तविक सत्ता न होने पर भी मन के संस्कारों से संसारानुभव चलता है, जैसे स्वप्न में व्यक्ति मनरूपी सूक्ष्म शरीर से घूमता है।
श्लोक 29.36
सरल हिंदी भावार्थ: आत्मा के लिए इस अनर्थपरम्परा का कारण बने संसारबन्धन का अन्त परम गुरु में श्रेष्ठ भक्ति से होता है।
श्लोक 29.37
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान वासुदेव में सम्यक लगाया भक्तियोग साथ ही वास्तविक ज्ञान और वैराग्य उत्पन्न करता है।
श्लोक 29.38
सरल हिंदी भावार्थ: राजर्षि, अच्युत की कथा का आश्रय लेकर नित्य श्रद्धा से सुनने और अध्ययन करने वाले में यह स्थिति शीघ्र आती है।
श्लोक 29.39
सरल हिंदी भावार्थ: जहाँ निर्मल हृदय वाले भगवद्भक्त संत भगवान के गुणों को कहने और सुनने में मन लगाए रहते हैं—
श्लोक 29.40
सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ महात्माओं के मुख से भगवान की चरित्रकथामृत की धाराएँ बहती हैं। जो तन्मय कानों से उनका पान करते हैं, उन्हें भूख–प्यास, भय, शोक और मोह अन्तःकरण पर वैसे वश नहीं कर पाते।
श्लोक 29.41
सरल हिंदी भावार्थ: फिर भी सामान्य जीव अपने स्वभावजन्य कष्टों में उलझा रहकर हरि के इस कथामृतनिधि में प्रेम नहीं लगाता।
श्लोक 29.42
सरल हिंदी भावार्थ: स्वयं ब्रह्मा, शिव, मनु, दक्ष आदि प्रजापति और आजीवन ब्रह्मचारी सनकादि—
श्लोक 29.43
सरल हिंदी भावार्थ: तथा मरीचि, अत्रि, अङ्गिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, भृगु, वसिष्ठ और मैं नारद—
श्लोक 29.44
सरल हिंदी भावार्थ: ये सब वाणी के ज्ञाता तप, विद्या और समाधि के द्वारा देखते हुए भी सबके द्रष्टा परमेश्वर का सम्पूर्ण अन्त नहीं पा सकते।
श्लोक 29.45
सरल हिंदी भावार्थ: वेद के विशाल शब्दसमुद्र में विचरते हुए यदि मनुष्य केवल मन्त्रों के सीमित कर्मचिह्नों में अटका रहे, तो परम तत्त्व को नहीं जान पाता।
श्लोक 29.46
सरल हिंदी भावार्थ: जिस पर अन्तःकरण में चिन्तित भगवान कृपा करते हैं, वह केवल सांसारिक और वैदिक कर्मफलों में जमी आसक्ति छोड़ देता है।
श्लोक 29.47
सरल हिंदी भावार्थ: इसलिए बर्हिष्मन्, अज्ञान से आकर्षक लगने वाले फलवादी कर्मों को परम उद्देश्य मत मानो; वे कान को प्रिय लग सकते हैं, पर आत्मतत्त्व का स्पर्श नहीं करते।
श्लोक 29.48
सरल हिंदी भावार्थ: जो जनार्दन के परम धाम को नहीं जानते और केवल सकाम कर्म को ही सम्पूर्ण वेद कहते हैं, उनकी समझ अभी धुँधली है।
श्लोक 29.49
सरल हिंदी भावार्थ: पूर्वमुखी कुशों से पृथ्वी भर देना और बड़े पशुवध वाले यज्ञों का अभिमान करना परम कर्मज्ञान नहीं। कर्म वही है जिससे हरि प्रसन्न हों, विद्या वही जिससे उनमें बुद्धि लगे।
श्लोक 29.50
सरल हिंदी भावार्थ: हरि सब देहधारियों के आत्मा, स्वतन्त्र मूलाधार और ईश्वर हैं। उनके चरणों की शरण से मनुष्यों को वास्तविक कल्याण मिलता है।
श्लोक 29.51
सरल हिंदी भावार्थ: वे ही परम प्रिय आत्मा हैं जिनसे तनिक भय नहीं। जो इसे जानता है वही ज्ञानी है; ऐसे ज्ञान का परम गुरु हरि हैं।
श्लोक 29.52
सरल हिंदी भावार्थ: नारद ने कहा—पुरुषश्रेष्ठ, तुम्हारे प्रश्न का मूल उत्तर दे दिया। अब इस निश्चित गूढ़ अर्थ को और ध्यान से सुनो।
श्लोक 29.53
सरल हिंदी भावार्थ: एक छोटे हरिण को देखो जो हरिणी के साथ पुष्पोद्यान में रम रहा है, भ्रमरों के गीत पर मोहित है और सामने के भेड़ियों को नहीं गिनता; पीछे से शिकारी का बाण उसे भेद देता है।
श्लोक 29.54
सरल हिंदी भावार्थ: इसका अर्थ है—जीव गृहस्थी के फूल–मधु जैसे क्षणिक स्वाद और मैथुनसुख में डूबकर प्रियजनों की मनोहर बातों में कान लगाता है। दिन–रात रूपी भेड़िए उसकी आयु हरते हैं, पर वह अनजान रहता है। पीछे छिपा कालरूपी शिकारी उसके हृदय को मृत्यु के बाण से भेदता है। राजन्, इस चित्र में अपनी स्थिति पहचानो।
श्लोक 29.55
सरल हिंदी भावार्थ: अपने भीतर इस हरिण जैसे आचरण को देखकर चित्त संयमित करो और कानों की विषयधारा भीतर मोड़ो। आसक्तिजनक जीवन और निकृष्ट गोष्ठियाँ धीरे–धीरे छोड़कर परम हंसों के आश्रय भगवान को प्रसन्न करो।
श्लोक 29.56
सरल हिंदी भावार्थ: राजा बोले—गुरुदेव, आपका उपदेश सुना और विचार किया। मेरे पुराने शिक्षक इसे जानते होते तो अवश्य बताते; वे शायद इसका मर्म नहीं जानते थे।
श्लोक 29.57
सरल हिंदी भावार्थ: आपने बड़ा संशय काट दिया, पर एक गहरी शङ्का पूछना चाहता हूँ जिसमें ऋषि भी उलझते हैं और इन्द्रियाँ उत्तर नहीं दे सकतीं।
श्लोक 29.58
सरल हिंदी भावार्थ: मनुष्य जिस शरीर से कर्म करता है उसे छोड़ देता है, फिर दूसरे लोक में दूसरे शरीर से उन्हीं कर्मों का फल कैसे भोगता है?
श्लोक 29.59
सरल हिंदी भावार्थ: वेदज्ञ ऐसा कहते हैं, पर किया कर्म क्रिया समाप्त होने पर दिखाई नहीं देता। फिर फल का सम्बन्ध कैसे बना रहता है?
श्लोक 29.60
सरल हिंदी भावार्थ: नारद बोले—जिस मनरूपी सूक्ष्म शरीर से कर्म का सङ्कल्प करता है, उसी निरन्तर बने रहने वाले सूक्ष्म आधार से वह आगे उसका फल भोगता है।
श्लोक 29.61
सरल हिंदी भावार्थ: जैसे सोते समय साँस लेते स्थूल शरीर को छोड़ मनुष्य स्वप्न में समान या अलग रूप के मनोमय शरीर से संचित अनुभव भोगता है।
श्लोक 29.62
सरल हिंदी भावार्थ: मन जिन वस्तुओं को मेरा और जिन रूपों को मैं मानकर पकड़ता है, उन्हीं से उसके कर्मसंस्कार और पुनर्जन्म का सम्बन्ध बनता है।
श्लोक 29.63
सरल हिंदी भावार्थ: जैसे ज्ञान और कर्मेन्द्रियों के व्यवहार से चित्त का अनुमान होता है, वैसे चित्तवृत्तियों से पूर्वदेह के कर्मों का संकेत जाना जाता है।
श्लोक 29.64
सरल हिंदी भावार्थ: मन में कभी ऐसा रूप भी उभरता है जिसे इस शरीर ने न देखा, न सुना और न अनुभव किया हो—नारद इसे पूर्वसंस्कार के तर्क में रखते हैं।
श्लोक 29.65
सरल हिंदी भावार्थ: राजन्, इस परम्परागत विवेचन में वैसी मनोवृत्ति सूक्ष्म जीव के पूर्वदेहसम्बन्ध का संकेत मानी जाती है, क्योंकि अनुभवसंस्कार के बिना मन में उसका स्पर्श नहीं माना गया।
श्लोक 29.66
सरल हिंदी भावार्थ: मनुष्य का मन उसके पहले के रूपों, आगे की सम्भावनाओं और देहबन्धन से मुक्ति की दिशा का भी परिचय देता है; तुम्हारा कल्याण हो।
श्लोक 29.67
सरल हिंदी भावार्थ: इस जन्म में न देखी–सुनी बात कभी मन में दिखे तो उसे देश, काल, कर्म और संस्कारों के सम्बन्ध से समझना चाहिए।
श्लोक 29.68
सरल हिंदी भावार्थ: इन्द्रियों के विषय क्रम और समूह से मन में आते–जाते हैं; जीव अपनी मनोवृत्ति के साथ उनका अनुभव करता है।
श्लोक 29.69
सरल हिंदी भावार्थ: जब मन शुद्ध सत्त्व में स्थिर होकर भगवान के समीप होता है, तब शेष अज्ञान वैसे पहचाना जाता है जैसे चन्द्रमा पर लगा अँधेरा धब्बा।
श्लोक 29.70
सरल हिंदी भावार्थ: जब तक बुद्धि, मन, इन्द्रिय, विषय और गुणों का अनादि संस्कारसमूह बना है, तब तक जीव का मैं–मेरा का अभिमान पूरी तरह नहीं मिटता।
श्लोक 29.71
सरल हिंदी भावार्थ: नींद, मूर्च्छा, तीव्र कष्ट, मृत्यु या प्राणक्रिया की बाधा में मैं का स्पष्ट ज्ञान प्रकट नहीं रहता; इससे उसका संस्कार पूर्ण नष्ट हो गया, ऐसा नहीं।
श्लोक 29.72
सरल हिंदी भावार्थ: गर्भ और बाल्य में मन सहित ग्यारह इन्द्रियों की क्षमता पूरी विकसित नहीं दिखती, जैसे अमावस्या में चन्द्रमा छिपा रहता है; युवा अवस्था में वह स्पष्ट होती है।
श्लोक 29.73
सरल हिंदी भावार्थ: विषयों की स्वतन्त्र वास्तविकता न होने पर भी उनका चिन्तन संसारभ्रम चलाता है, जैसे स्वप्न का अनर्थ जाग्रत सत्य न होकर भी अनुभव होता है।
श्लोक 29.74
सरल हिंदी भावार्थ: पाँच सूक्ष्म विषयों, तीन गुणों और सोलह विस्तारों वाला यह सूक्ष्म सङ्घात जब चेतना से जुड़ता है तो जीव की उपाधि कहलाता है।
श्लोक 29.75
सरल हिंदी भावार्थ: इसी सूक्ष्म आधार से जीव शरीर ग्रहण और त्याग करता तथा हर्ष, शोक, भय, दुःख और सुख अनुभव करता है।
श्लोक 29.76
सरल हिंदी भावार्थ: जैसे तृणजलूका आगे का आश्रय पकड़ने से पहले पिछला नहीं छोड़ती, वैसे मरते समय भी जीव पुराने शरीर का अभिमान तुरंत नहीं छोड़ता।
श्लोक 29.77
सरल हिंदी भावार्थ: जब तक कर्मों के अन्तराल से नया आश्रय न मिले, पिछली प्रवृत्ति का सम्बन्ध रहता है। राजन्, जीवों के अगले जन्म की रचना में मन मुख्य माध्यम है।
श्लोक 29.78
सरल हिंदी भावार्थ: इन्द्रियों के अनुभवों का बार–बार ध्यान करते हुए जीव कर्मसंस्कार जमा करता है। अज्ञान और कर्म बने रहने पर अनात्म वस्तुओं से बन्धन चलता है।
श्लोक 29.79
सरल हिंदी भावार्थ: इस बन्धन को दूर करने के लिए समस्त विश्व को भगवान पर आश्रित जानकर सर्वभाव से हरि का भजन करो; उन्हीं से सृष्टि, स्थिति और लय है।
श्लोक 29.80
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—प्रमुख भगवद्भक्त नारद ने जीव और परमात्मा के दोनों हंसों की गति समझाई, राजा से विदा ली और सिद्धलोक चले गए।
श्लोक 29.81
सरल हिंदी भावार्थ: राजर्षि प्राचीनबर्हि ने पुत्रों को सृष्टिविस्तार और पालन का उत्तरदायित्व दिया तथा तप के लिए कपिलाश्रम चले गए।
श्लोक 29.82
सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ आसक्ति छोड़कर एकाग्र मन से गोविन्द के चरणों का भजन करते हुए वे भगवत्स्वरूप के अनुरूप निर्मल अवस्था को प्राप्त हुए।
श्लोक 29.83
सरल हिंदी भावार्थ: निष्पाप विदुर, देवर्षि के गाए इस अध्यात्मरूपक को सुनने या सुनाने वाला सूक्ष्म बन्धन से मुक्ति की दिशा पाता है।
श्लोक 29.84
सरल हिंदी भावार्थ: देवर्षि के मुख से निकली मुकुन्दयश की यह कथा जगत और अन्तःकरण को पवित्र करती है। उसका मर्म ग्रहण करने वाला उच्च भगवत्पद पाकर बन्धनों से मुक्त होता और संसार में नहीं भटकता।
श्लोक 29.85
सरल हिंदी भावार्थ: यह अद्भुत अध्यात्मरूपक सुनकर राजा का आसक्त गृहाभिमान और परलोकसम्बन्धी संशय दोनों दूर हुए।
॥ चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 29 समाप्त ॥
चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 30
प्रचेताओं को भगवान का दर्शन और मारिषा विवाह
श्लोक 30.1
सरल हिंदी भावार्थ: विदुर ने पूछा—प्राचीनबर्हि के जिन पुत्रों का आपने उल्लेख किया, उन्होंने रुद्रगीत से हरि को प्रसन्न करके कौन सी सिद्धि पाई?
श्लोक 30.2
सरल हिंदी भावार्थ: बृहस्पति के शिष्य, मुक्तिनाथ के प्रिय शिव का अनायास सान्निध्य पाकर प्रचेताओं को इस लोक या परलोक में अवश्य परम लाभ मिला होगा; बताइए।
श्लोक 30.3
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—पिता की आज्ञा मानते हुए प्रचेताओं ने समुद्र में तप और जपयज्ञ से सभी शरीरों में स्थित परम पुरुष को प्रसन्न किया।
श्लोक 30.4
सरल हिंदी भावार्थ: दस हजार वर्षों के अन्त में सनातन पुरुष उन्हें दर्शन देने आए; उनकी शान्त कान्ति ने तप का कष्ट दूर किया।
श्लोक 30.5
सरल हिंदी भावार्थ: गरुड़ के कन्धे पर बैठे वे मेरुशिखर पर मेघ जैसे लगते थे। पीतवस्त्र और कण्ठमणि से शोभित होकर दिशाओं का अन्धकार मिटा रहे थे।
श्लोक 30.6
सरल हिंदी भावार्थ: स्वर्णप्रभा आभूषण, प्रकाशित मुख–कपोल और चमकता किरीट था। आठ आयुध, अनुचर, मुनि और देवता उनकी सेवा में थे; गरुड़ और किन्नर कीर्ति गा रहे थे।
श्लोक 30.7
सरल हिंदी भावार्थ: आठ लम्बी पुष्ट भुजाओं के बीच लक्ष्मी और उनसे मानो होड़ करती वनमाला शोभित थीं। करुणादृष्टि वाले आदिपुरुष ने मेघगम्भीर वाणी से शरणागत राजकुमारों से कहा।
श्लोक 30.8
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान बोले—राजकुमारो, तुम्हारा कल्याण हो; वर माँगो। समान धर्म और परस्पर सौहार्द रखने वाले तुम भाइयों के प्रेम से मैं प्रसन्न हूँ।
श्लोक 30.9
सरल हिंदी भावार्थ: जो प्रतिदिन सन्ध्या में तुम्हारा स्मरण करेगा, उसके भीतर भाइयों के प्रति समता और सभी प्राणियों के प्रति मैत्री बढ़ेगी।
श्लोक 30.10
सरल हिंदी भावार्थ: जो प्रातः–सायं एकाग्र होकर रुद्रगीत से मेरी स्तुति करेगा, उसे योग्य अभिलषित वर और शुभ बुद्धि दूँगा।
श्लोक 30.11
सरल हिंदी भावार्थ: तुमने प्रसन्नता से पिता की आज्ञा मानी है; इसलिए तुम्हारी मंगलमयी कीर्ति लोकों में फैलेगी।
श्लोक 30.12
सरल हिंदी भावार्थ: तुम्हें ऐसा विख्यात पुत्र मिलेगा जो गुणों में ब्रह्मा से न्यून न होगा और अपने प्रभाव से तीनों लोकों में प्रजा का विस्तार करेगा।
श्लोक 30.13
सरल हिंदी भावार्थ: कण्डु और प्रम्लोचा की कमलनयनी कन्या को माता ने छोड़ दिया था; वृक्षों ने उसे अपनाकर पाला।
श्लोक 30.14
सरल हिंदी भावार्थ: भूख से दुर्बल और रोती कन्या के मुख में करुणामय सोम ने अमृतरस देने वाली अपनी तर्जनी रखी और उसका पोषण किया।
श्लोक 30.15
सरल हिंदी भावार्थ: मेरे अनुगामी तुम्हारे पिता ने तुम्हें सन्तानविस्तार का कार्य दिया है; इसलिए उस सुन्दर कन्या से शीघ्र विवाह करो।
श्लोक 30.16
सरल हिंदी भावार्थ: तुम सबके धर्म और आचरण समान हैं; वह भी उसी एक धर्मभाव से समर्पित होकर तुम सबकी पत्नी होगी। यह कथा की विशिष्ट वैवाहिक व्यवस्था है।
श्लोक 30.17
सरल हिंदी भावार्थ: मेरी कृपा से तुम बहुत दीर्घ दिव्यकाल तक पृथ्वी और दिव्यलोक के भोग प्राप्त करोगे; कथा उस अवधि को दस लाख दिव्य वर्ष कहती है।
श्लोक 30.18
सरल हिंदी भावार्थ: फिर अचल भक्ति से तुम्हारे गुणसंस्कार परिपक्व होंगे। इस दुःखमय संसार से वैराग्य पाकर तुम मेरे धाम आओगे।
श्लोक 30.19
सरल हिंदी भावार्थ: कल्याणकारी कर्म करते और मेरी कथाओं में समय बिताते गृहस्थों के लिए घर भी बन्धन का कारण नहीं बनता।
श्लोक 30.20
सरल हिंदी भावार्थ: क्योंकि उनके हृदय में ज्ञानी जिस ब्रह्म का अनुभव करते हैं वह ढकता नहीं। उस स्थिति में पहुँचकर वे मोह, शोक और असंयत हर्ष के वश नहीं होते।
श्लोक 30.21
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—दर्शन से रज–तम का मल मिटे प्रचेताओं ने हाथ जोड़कर पुरुषार्थों के आश्रय और परम मित्र जनार्दन की गद्गद वाणी से स्तुति की।
श्लोक 30.22
सरल हिंदी भावार्थ: प्रचेता बोले—क्लेश मिटाने वाले, उदार गुणों और नामों से प्रसिद्ध, मन–वाणी के वेग से परे तथा इन्द्रियों की पहुँच से अगम प्रभु को बार–बार नमस्कार।
श्लोक 30.23
सरल हिंदी भावार्थ: अपने स्वरूप में शुद्ध और शान्त, मन के द्वैतभ्रम से परे आपको प्रणाम। जगत की सृष्टि, पालन और लय के लिए मायागुणमय रूप धारण करने वाले प्रभु को नमस्कार।
श्लोक 30.24
सरल हिंदी भावार्थ: विशुद्ध सत्त्वस्वरूप, हरि, दिव्य बुद्धि वाले वासुदेव कृष्ण और सभी भक्तों के स्वामी को प्रणाम है।
श्लोक 30.25
सरल हिंदी भावार्थ: कमलनाभ, कमलमालाधारी, कमलचरण और कमलनयन प्रभु को नमस्कार है।
श्लोक 30.26
सरल हिंदी भावार्थ: कमलकेसर जैसे पीले निर्मल वस्त्रधारी, समस्त प्राणियों के आश्रय और साक्षी भगवान को हम प्रणाम करते हैं।
श्लोक 30.27
सरल हिंदी भावार्थ: आपने कष्ट पाए हम लोगों के सामने समस्त क्लेशहर अपना रूप प्रकट किया; इससे बढ़कर कृपा और क्या होगी?
श्लोक 30.28
सरल हिंदी भावार्थ: दीनवत्सल समर्थ स्वामी का यही अनुग्रह है कि वह अपने आश्रित को समय पर याद करे। अमंगल मिटाने वाले प्रभु, आपने हमारी सुधि ली।
श्लोक 30.29
सरल हिंदी भावार्थ: सबसे छोटे जीव का भी कल्याण जिससे हो, वह इच्छा भी अन्तर्हृदय में स्थित आपसे कैसे छिप सकती है?
श्लोक 30.30
सरल हिंदी भावार्थ: जगत्पति, यही हमारा इच्छित वर है कि मुक्ति के गुरु और परम आश्रय भगवान हम पर प्रसन्न हैं।
श्लोक 30.31
सरल हिंदी भावार्थ: फिर भी सर्वोच्च प्रभु, आपसे एक वर माँगते हैं। आपकी विभूतियों का अन्त नहीं, इसलिए आप अनन्त कहलाते हैं।
श्लोक 30.32
सरल हिंदी भावार्थ: पारिजात मिल जाने पर भ्रमर दूसरे फूलों का आश्रय नहीं खोजता। आपके चरण मिल जाने पर हम और क्या माँगें?
श्लोक 30.33
सरल हिंदी भावार्थ: जब तक माया और कर्मों से इस संसार में घूमना पड़े, तब तक जन्म–जन्म में आपके भक्तों का सङ्ग मिलता रहे।
श्लोक 30.34
सरल हिंदी भावार्थ: भक्तों के सङ्ग के एक क्षण की तुलना भी स्वर्ग या मुक्ति से नहीं करते; फिर नश्वर वरों का क्या मूल्य!
श्लोक 30.35
सरल हिंदी भावार्थ: जहाँ आपकी मधुर कथा गाई जाती है, वहाँ तृष्णा शान्त होती है, प्राणियों के प्रति वैर नहीं रहता और किसी को भय नहीं दिया जाता।
श्लोक 30.36
सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ अनासक्त संतों की सत्कथाओं में त्यागियों के परम आश्रय साक्षात नारायण की बार–बार स्तुति होती है।
श्लोक 30.37
सरल हिंदी भावार्थ: आपके भक्त तीर्थों को भी पवित्र करने के लिए घूमते हैं। संसार से भयभीत किस व्यक्ति को उनका मिलन प्रिय न होगा?
श्लोक 30.38
सरल हिंदी भावार्थ: आपके प्रिय मित्र शिव के थोड़े समय के सङ्ग से ही आज हमें दुश्चिकित्स्य जन्म–मरण के सर्वोत्तम वैद्य और परम आश्रय आपके चरण मिले हैं।
श्लोक 30.39
सरल हिंदी भावार्थ: हमने जो अध्ययन किया, गुरु, ज्ञानियों और वृद्धों को सेवा से प्रसन्न किया तथा आदरणीयों, मित्रों, भाइयों और सभी प्राणियों का ईर्ष्यारहित सम्मान किया—
श्लोक 30.40
सरल हिंदी भावार्थ: और दीर्घकाल जल में निराहार रहकर जो तप किया—वह सब, अनन्त पुरुष, केवल आपकी प्रसन्नता के लिए समर्पित है।
श्लोक 30.41
सरल हिंदी भावार्थ: मनु, ब्रह्मा, शिव और तप–ज्ञान से निर्मल महात्मा आपकी महिमा का अन्त न पाकर भी स्तुति करते हैं; हम भी अपनी क्षमता के अनुसार आपका गुणगान करते हैं।
श्लोक 30.42
सरल हिंदी भावार्थ: समदर्शी, शुद्ध, परम पुरुष, सत्त्वस्वरूप भगवान वासुदेव आपको प्रणाम है।
श्लोक 30.43
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—स्तुति सुनकर शरणागतवत्सल हरि प्रसन्न हुए और बोले—ऐसा ही हो। प्रचेता उन्हें जाते देखना नहीं चाहते थे, फिर भी अविनाशी प्रभाव वाले भगवान अपने धाम गए।
श्लोक 30.44
सरल हिंदी भावार्थ: समुद्र से बाहर आकर प्रचेताओं ने पृथ्वी को ऊँचे वृक्षों से ढका देखा, मानो वे स्थान रोक रहे हों; इससे वे क्रुद्ध हुए।
श्लोक 30.45
सरल हिंदी भावार्थ: क्रोध में उन्होंने मुख से अग्नि और वायु छोड़ी और पृथ्वी को वनस्पतिरहित करने लगे, जैसे प्रलय में संवर्तक अग्नि होती है।
श्लोक 30.46
सरल हिंदी भावार्थ: वृक्षों को जलते देखकर ब्रह्मा आए और नीति के वचनों से प्राचीनबर्हि के पुत्रों का क्रोध शान्त किया।
श्लोक 30.47
सरल हिंदी भावार्थ: बचे हुए भयभीत वृक्षों ने ब्रह्मा के निर्देश पर अपनी पाली कन्या प्रचेताओं को समर्पित की।
श्लोक 30.48
सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मा की आज्ञा से प्रचेताओं ने मारिषा से विवाह किया। उनसे वही दक्ष फिर जन्मे जो महात्मा शिव की अवज्ञा के कारण पूर्व स्थिति से च्युत हुए थे।
श्लोक 30.49
सरल हिंदी भावार्थ: चाक्षुष मन्वन्तर में पूर्व सृष्टि काल से नष्ट होने के बाद उन्हीं दक्ष ने दैवी प्रेरणा से फिर विविध प्रजाएँ उत्पन्न कीं।
श्लोक 30.50
सरल हिंदी भावार्थ: जन्म से ही अपने तेज से तेजस्वियों को प्रभावित करने और कार्यकुशलता के कारण वे दक्ष कहलाए।
श्लोक 30.51
सरल हिंदी भावार्थ: अनादि ब्रह्मा ने उन्हें प्रजासृष्टि और रक्षा का अधिकार दिया तथा अन्य प्रजापतियों को भी उनके कार्यों में नियुक्त किया।
॥ चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 30 समाप्त ॥
चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 31
नारद का भक्तियोग और चतुर्थ स्कन्ध की पूर्णाहुति
श्लोक 31.1
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—भगवान का उपदेश याद करके प्रचेताओं में वैराग्य और ज्ञान जागा। पत्नी को पुत्र के संरक्षण में सौंपकर वे घर से निकल गए।
श्लोक 31.2
सरल हिंदी भावार्थ: पश्चिम के उस समुद्रतट पर, जहाँ जाजलि सिद्ध हुए थे, वे सब प्राणियों में आत्मभाव वाले ब्रह्मसत्र में दीक्षित हुए।
श्लोक 31.3
सरल हिंदी भावार्थ: प्राण, मन, वाणी, दृष्टि और आसन संयमित, शान्त तथा समभाव से निर्मल ब्रह्म में चित्त लगाए प्रचेताओं को देव–असुरों के पूज्य नारद ने देखा।
श्लोक 31.4
सरल हिंदी भावार्थ: नारद आए तो वे उठे, प्रणाम और अभिनन्दन किया, उचित पूजा करके आसन दिया और उनके सुखपूर्वक बैठने पर बोले।
श्लोक 31.5
सरल हिंदी भावार्थ: प्रचेता बोले—देवर्षि, आपका स्वागत है। सौभाग्य से आज दर्शन मिला। सूर्य की तरह आपका भ्रमण लोकों को अभय देने के लिए होता है।
श्लोक 31.6
सरल हिंदी भावार्थ: शिव और अधोक्षज भगवान ने जो उपदेश दिया था, गृहासक्ति में हम उसका बहुत अंश विस्मृत कर बैठे।
श्लोक 31.7
सरल हिंदी भावार्थ: हमें वह आत्मज्ञान फिर प्रकाशित कीजिए जिससे तत्त्व का वास्तविक बोध हो और हम दुस्तर संसारसागर सहज पार कर सकें।
श्लोक 31.8
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—प्रचेताओं का प्रश्न सुनकर उत्तमश्लोक भगवान में तन्मय नारद मुनि ने राजकुमारों से कहा।
श्लोक 31.9
सरल हिंदी भावार्थ: नारद बोले—वही जन्म, कर्म, आयु, मन और वाणी सफल हैं जिनसे विश्वात्मा हरि की सेवा होती है।
श्लोक 31.10
सरल हिंदी भावार्थ: उसके बिना शारीरिक जन्म, उपनयन और यज्ञदीक्षा के तीन जन्म, वेदविहित कर्म या देवताओं जैसी दीर्घ आयु भी क्या कर सकती है?
श्लोक 31.11
सरल हिंदी भावार्थ: केवल अध्ययन, तप, वाणी, चित्त की कुशलता, तीक्ष्ण बुद्धि, बल और समर्थ इन्द्रियों का क्या लाभ—
श्लोक 31.12
सरल हिंदी भावार्थ: यदि उनमें आत्मदान करने वाले हरि का सम्बन्ध नहीं? तब योग, साङ्ख्य, संन्यास, स्वाध्याय और अन्य कल्याणसाधन भी अपूर्ण रहते हैं।
श्लोक 31.13
सरल हिंदी भावार्थ: सभी कल्याणसाधनों का अन्तिम प्रयोजन आत्मा है; हरि सभी प्राणियों के आत्मा, आत्मबोधदाता और परम प्रिय हैं।
श्लोक 31.14
सरल हिंदी भावार्थ: जैसे वृक्ष की जड़ में जल देने से तना, शाखाएँ और उपशाखाएँ तृप्त होती हैं तथा प्राण के पोषण से इन्द्रियाँ, वैसे अच्युत की पूजा सभी की समुचित आराधना है।
श्लोक 31.15
सरल हिंदी भावार्थ: जैसे सूर्य के प्रभाव से जल ऊपर जाता और समय पर लौटता है तथा स्थावर–जङ्गम पृथ्वी से उत्पन्न होकर उसी में मिलते हैं, वैसे गुणों का प्रवाह हरि से प्रकट होकर उन्हीं में लीन होता है।
श्लोक 31.16
सरल हिंदी भावार्थ: जगत के आत्मा का परम स्वरूप सूर्यप्रभा की तरह स्वप्रकाश है। उसी में सुप्त शक्तियाँ जागतीं और द्रव्य, क्रिया तथा ज्ञान के भेद प्रकट होते हैं; ज्ञान में उनका भ्रम मिट जाता है।
श्लोक 31.17
सरल हिंदी भावार्थ: जैसे आकाश में मेघ, अन्धकार और प्रकाश आते–जाते हैं, वैसे परम ब्रह्म में रज, तम और सत्त्व की शक्तियों का प्रवाह प्रकट और लुप्त होता है।
श्लोक 31.18
सरल हिंदी भावार्थ: इसलिए सब देहधारियों के एक आत्मा, काल, प्रकृति और पुरुष के अधीश्वर तथा अपने तेज से गुणप्रवाह से परे प्रभु का पूर्ण आत्मीयभाव से भजन करो।
श्लोक 31.19
सरल हिंदी भावार्थ: सभी प्राणियों पर दया, जो मिले उसमें सन्तोष और समस्त इन्द्रियों की शान्ति से जनार्दन शीघ्र प्रसन्न होते हैं।
श्लोक 31.20
सरल हिंदी भावार्थ: जिस निर्मल हृदय से सभी स्वार्थकामनाएँ दूर हो गईं और प्रेम निरन्तर बढ़ता है, उसमें पुकारे गए अविनाशी भगवान भक्त के वश होकर वैसे ही बने रहते हैं जैसे आकाश अपने विस्तार में।
श्लोक 31.21
सरल हिंदी भावार्थ: हरि उन दुर्बुद्धियों की पूजा स्वीकार नहीं करते जो विद्या, धन, कुल या कर्म का अभिमान करके निर्धन निष्काम संतों का अपमान करते हैं। उन्हें आत्मा को ही धन मानने वाले प्रिय हैं।
श्लोक 31.22
सरल हिंदी भावार्थ: पूर्णतृप्त प्रभु लक्ष्मी और उनके इच्छुक राजाओं–देवताओं से भी आसक्त नहीं होते, पर अपने सेवकों के प्रेम के अधीन रहते हैं। कौन कृतज्ञ मनुष्य ऐसे भगवान को छोड़ेगा?
श्लोक 31.23
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—प्रचेताओं को यह तथा अन्य भगवत्कथाएँ सुनाकर ब्रह्मापुत्र नारद ब्रह्मलोक चले गए।
श्लोक 31.24
सरल हिंदी भावार्थ: प्रचेताओं ने उनके मुख से निकला लोकमलहर हरियश सुना और भगवान के चरणों का ध्यान करते हुए उनकी परम गति पाई।
श्लोक 31.25
सरल हिंदी भावार्थ: विदुर, तुम्हारे पूछने पर मैंने प्रचेताओं और नारद का यह हरिकीर्तनमय संवाद सुनाया।
श्लोक 31.26
सरल हिंदी भावार्थ: शुकदेव ने कहा—राजश्रेष्ठ, मनुपुत्र उत्तानपाद का वंश बताया गया। अब प्रियव्रत का वंश भी सुनो।
श्लोक 31.27
सरल हिंदी भावार्थ: प्रियव्रत ने नारद से आत्मविद्या पाई, फिर राज्य का पालन किया, पुत्रों में पृथ्वी बाँटी और अन्ततः भगवान का पद प्राप्त किया।
श्लोक 31.28
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय से अजेय भगवान की ये सत्कथाएँ सुनकर विदुर का प्रेम बढ़ा और आँखें आँसुओं से भर गईं। उन्होंने मुनि के चरण मस्तक पर और हरि के चरण हृदय में धारण किए।
श्लोक 31.29
सरल हिंदी भावार्थ: विदुर बोले—करुणामय महायोगी, आपने आज अज्ञान के पार का मार्ग दिखाया, जहाँ निष्काम भक्तों को सुलभ हरि विराजते हैं।
श्लोक 31.30
सरल हिंदी भावार्थ: शुकदेव ने कहा—इस प्रकार प्रणाम करके और विदा लेकर तृप्तचित्त विदुर अपने सम्बन्धियों से मिलने हस्तिनापुर चले गए।
श्लोक 31.31
सरल हिंदी भावार्थ: राजन्, भगवान को आत्मसमर्पित राजाओं की यह कथा सुनने वाले के लिए शुभ आयु, धन, यश, मंगल, परम गति और ऐश्वर्य का फल कहा गया है।
॥ चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 31 समाप्त ॥
इस भाग का भक्ति-सन्देश
जीवन की सार्थकता शरीर, प्रतिष्ठा या कर्मफल में बँधना नहीं, बल्कि आत्मस्मृति और भगवान की सेवा में है। सभी प्राणियों पर दया, सन्तोष, इन्द्रियशान्ति और सत्सङ्ग भक्ति को पुष्ट करते हैं। जैसे जड़ में जल देने से पूरा वृक्ष पोषित होता है, वैसे अच्युत की आराधना समस्त जीवन में आत्मीयता जगाती है।
पाठाधार और संपादकीय जानकारी
प्राचीन मूल संस्कृत पाठ का आधार Sanskrit Documents का “श्रीमद्भागवतं—चतुर्थस्कन्धः” है। अध्याय 24–31 में क्रमशः 79, 62, 26, 30, 65, 85, 51 और 31 क्रमाङ्कित पाठखण्ड हैं; कुल 429। अध्याय 29 का क्रमाङ्क 54 मूल में व्याख्यात्मक गद्य है और उसे उसी रूप में रखा गया है। श्लोक 46 तथा 76 से पहले कोष्ठकों में दिए अनङ्कित अतिरिक्त पाठ मुख्य क्रम में नहीं मिलाए गए हैं। हिंदी भावार्थ स्वतंत्र संपादकीय प्रस्तुति है, किसी आधुनिक टीका की प्रतिलिपि नहीं। पुरञ्जन कथा अध्यात्मरूपक है; स्वयं नारद अध्याय 29 में उसका अर्थ स्पष्ट करते हैं। दीर्घ तप, दिव्य आयु, देहान्तर और विशिष्ट विवाहव्यवस्था पौराणिक आख्यान के अनुसार हैं। अध्याय 28 में शोकाकुल रानी के देहत्याग-विचार के बाद आत्मज्ञानी मित्र उन्हें स्वरूपबोध कराता है; कथा आत्महानि का निर्देश नहीं।
॥ चतुर्थ स्कन्ध सम्पूर्ण • भाग ४ समाप्त ॥
॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥
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