श्रीमद्भागवत महापुराण प्रथम स्कन्ध भाग 4 — अध्याय 10–12, द्वारका आगमन और परीक्षित जन्म
श्रीमद्भागवत महापुराण
प्रथम स्कन्ध • भाग ४ • अध्याय १०–१२
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भगवान का स्वागत और परीक्षित की जन्मकथा
भीष्मजी के परमगति प्राप्त करने के बाद श्रीकृष्ण हस्तिनापुर से द्वारका के लिए प्रस्थान करते हैं। विदाई में पाण्डवों का प्रेम और द्वारका में भक्तों का उल्लास दिखाई देता है। आगे परीक्षित की गर्भरक्षा, जन्म, विष्णुरात नामकरण और उनके भविष्य के विषय में ब्राह्मणों का कथन है।
अध्याय 10 के 36, अध्याय 11 के 39 और अध्याय 12 के 36—कुल 111 श्लोक मूल क्रम में हैं। प्रत्येक के साथ स्वतंत्र रूप से लिखा सरल हिंदी भावार्थ दिया गया है।
प्रथम स्कन्ध • अध्याय 10
हस्तिनापुर से श्रीकृष्ण का प्रस्थान
श्लोक 10.1
सरल हिंदी भावार्थ: शौनकजी ने पूछा—अपने राज्य के लिए युद्ध करने वाले आततायी संबंधियों के मारे जाने पर भोजन तक छोड़ चुके धर्मश्रेष्ठ युधिष्ठिर ने भाइयों सहित आगे क्या किया?
श्लोक 10.2
सरल हिंदी भावार्थ: सूतजी बोले—संसार का पालन करने वाले श्रीहरि ने आपसी वैर की अग्नि से नष्टप्राय कुरुवंश को फिर सँभाला और युधिष्ठिर को उनके राज्य में स्थापित करके प्रसन्न हुए।
श्लोक 10.3
सरल हिंदी भावार्थ: भीष्मजी और श्रीकृष्ण के वचन सुनकर युधिष्ठिर का भ्रम दूर हुआ। भगवान के आश्रय और भाइयों के सहयोग से वे समुद्रपर्यन्त पृथ्वी का शासन करने लगे।
श्लोक 10.4
सरल हिंदी भावार्थ: उनके शासन में मेघ आवश्यकता के अनुसार वर्षा करते, धरती सब आवश्यक उपज देती और स्वस्थ गायों के दूध से गोष्ठ समृद्ध रहते थे।
श्लोक 10.5
सरल हिंदी भावार्थ: नदियाँ, समुद्र, पर्वत, वृक्ष, लताएँ और औषधियाँ अपनी-अपनी ऋतु के अनुसार भरपूर फल देते थे।
श्लोक 10.6
सरल हिंदी भावार्थ: अजातशत्रु युधिष्ठिर के राज्य में प्राणियों को मानसिक पीड़ा, रोग और दैविक, भौतिक अथवा शारीरिक क्लेश नहीं सताते थे।
श्लोक 10.7
सरल हिंदी भावार्थ: श्रीकृष्ण अपने प्रियजनों का शोक दूर करने और बहन सुभद्रा को प्रसन्न रखने के लिए कुछ महीने हस्तिनापुर में रहे।
श्लोक 10.8
सरल हिंदी भावार्थ: फिर युधिष्ठिर की अनुमति लेकर, उन्हें गले लगाकर और प्रणाम करके भगवान रथ पर चढ़े। अन्य स्वजनों ने भी उन्हें आलिंगन और प्रणाम किया।
श्लोक 10.9
सरल हिंदी भावार्थ: सुभद्रा, द्रौपदी, कुन्ती, उत्तरा, गान्धारी, धृतराष्ट्र, युयुत्सु, कृपाचार्य तथा नकुल-सहदेव विदाई के समय उपस्थित थे।
श्लोक 10.10
सरल हिंदी भावार्थ: भीमसेन, धौम्य और उत्तरा आदि स्त्रियाँ भी श्रीकृष्ण के वियोग की कल्पना से व्याकुल थीं; वे उनका बिछोह सह नहीं पा रहे थे।
श्लोक 10.11
सरल हिंदी भावार्थ: जिन भगवान का मधुर यश एक बार सुनकर सत्संगी मनुष्य बुरी संगति छोड़ देता है, उन भगवान को छोड़ना उसके लिए कठिन हो जाता है।
श्लोक 10.12
सरल हिंदी भावार्थ: तो दर्शन, स्पर्श, बातचीत, साथ सोने-बैठने और भोजन करने से जिनका चित्त उन्हीं में लग गया था, वे पाण्डव उनका वियोग कैसे सहते?
श्लोक 10.13
सरल हिंदी भावार्थ: स्नेह से बँधे सभी स्वजन अपलक श्रीकृष्ण को देखते और मन से उनका अनुसरण करते हुए इधर-उधर उनके पीछे चलते रहे।
श्लोक 10.14
सरल हिंदी भावार्थ: स्वजन स्त्रियों ने प्रेम-विह्वल होकर उमड़ते आँसू रोक लिए, यह सोचकर कि प्रस्थान करते श्रीकृष्ण के सामने अशुभ संकेत न हो।
श्लोक 10.15
सरल हिंदी भावार्थ: मृदंग, शंख, भेरी, वीणा, पणव, गोमुख, धुन्धुरी, आनक, घंटा और दुन्दुभि आदि वाद्य बजने लगे।
श्लोक 10.16
सरल हिंदी भावार्थ: कुरुवंश की स्त्रियाँ दर्शन के लिए महलों की छतों पर चढ़ीं और प्रेम, लज्जा तथा मुस्कान भरी दृष्टि से श्रीकृष्ण पर पुष्प बरसाने लगीं।
श्लोक 10.17
सरल हिंदी भावार्थ: प्रिय सखा अर्जुन ने अपने परम प्रिय श्रीकृष्ण के ऊपर मोतियों की झालर और रत्नमय दण्ड से सजा श्वेत छत्र धारण किया।
श्लोक 10.18
सरल हिंदी भावार्थ: उद्धव और सात्यकि सुन्दर चँवर डुला रहे थे। पुष्पवर्षा के बीच मार्ग में चलते यदुपति श्रीकृष्ण अत्यन्त शोभायमान थे।
श्लोक 10.19
सरल हिंदी भावार्थ: ब्राह्मणों के सत्य आशीर्वाद चारों ओर सुनाई देते थे। गुणातीत भगवान के लिए मानवीय कामनाओं वाले आशीर्वाद पूर्णतः उपयुक्त न होकर भी उनके भक्तवत्सल स्वरूप में शोभते थे।
श्लोक 10.20
सरल हिंदी भावार्थ: श्रीकृष्ण में मन लगाए हस्तिनापुर की स्त्रियाँ आपस में ऐसी चर्चा करने लगीं, जो वेदों के सार की तरह मन को आकर्षित करती थी।
श्लोक 10.21
सरल हिंदी भावार्थ: यही वे सनातन परम पुरुष हैं, जो सृष्टि से पहले, जब गुण और शक्तियाँ अप्रकट थीं तथा जीव परमात्मा में लीन थे, तब भी अकेले विद्यमान थे।
श्लोक 10.22
सरल हिंदी भावार्थ: इन्होंने अपनी शक्ति से प्रकृति को सृष्टि की ओर प्रेरित किया और नाम-रूप से रहित जीवों को नाम-रूप देने के लिए उसमें प्रवेश किया; शास्त्रों की व्यवस्था भी इन्हीं से है।
श्लोक 10.23
सरल हिंदी भावार्थ: इन्द्रियों और प्राण को वश में रखने वाले ज्ञानी जिस परम पद को निर्मल भक्तिपूर्ण चित्त से देखते हैं, वही भगवान हमारे अन्तःकरण को शुद्ध करने में समर्थ हैं।
श्लोक 10.24
सरल हिंदी भावार्थ: गूढ़ वेदों और तत्त्वदर्शियों द्वारा जिनकी महिमा कही जाती है, वे यही हैं। एकमात्र ईश्वर अपनी लीला से जगत की रचना, रक्षा और संहार करते हुए भी उसमें आसक्त नहीं होते।
श्लोक 10.25
सरल हिंदी भावार्थ: जब अज्ञानग्रस्त राजा अधर्म से शासन करते हैं, तब यही भगवान जीवों के कल्याण के लिए युग-युग में अवतार लेकर ऐश्वर्य, सत्य, ऋत, दया और यश प्रकट करते हैं।
श्लोक 10.26
सरल हिंदी भावार्थ: यदुवंश कितना धन्य और मधु की भूमि कितनी पुण्यमयी है, जिसे लक्ष्मीपति श्रीकृष्ण ने अपने जन्म और विचरण से सुशोभित किया है!
श्लोक 10.27
सरल हिंदी भावार्थ: द्वारका कितनी पवित्र और पृथ्वी का यश बढ़ाने वाली है! वहाँ की प्रजा प्रतिदिन अपने स्वामी श्रीकृष्ण की कृपामयी मुस्कान और दृष्टि का दर्शन करती है।
श्लोक 10.28
सरल हिंदी भावार्थ: सखियो, श्रीकृष्ण की पत्नियों ने अवश्य व्रत, स्नान और यज्ञ आदि से भगवान की आराधना की होगी। वे बार-बार उनके अधरामृत का सौभाग्य पाती हैं, जिसके स्मरण में व्रजसुन्दरियाँ मोहित रहती थीं।
श्लोक 10.29
सरल हिंदी भावार्थ: कुछ रानियों को भगवान ने स्वयंवर में शिशुपाल आदि बलवान राजाओं को हराकर प्राप्त किया; वे प्रद्युम्न, साम्ब और अम्ब आदि की माताएँ बनीं। हजारों अन्य को भौमासुर के वध के बाद मुक्त कराया।
श्लोक 10.30
सरल हिंदी भावार्थ: ये रानियाँ अपने स्त्री-जन्म को धन्य करती हैं। कमलनयन श्रीकृष्ण उनके पति हैं और प्रेमपूर्ण व्यवहार से हृदय को छूते हुए उनके घरों में निरन्तर रहते हैं।
श्लोक 10.31
सरल हिंदी भावार्थ: नगर की स्त्रियों के ऐसे प्रेमपूर्ण वचन सुनकर भगवान मुस्कान भरी दृष्टि से उनका अभिनन्दन करते हुए आगे बढ़े।
श्लोक 10.32
सरल हिंदी भावार्थ: युधिष्ठिर ने प्रेमवश शत्रुओं की आशंका करके श्रीकृष्ण की रक्षा और सम्मान के लिए चतुरंगिणी सेना साथ भेजी।
श्लोक 10.33
सरल हिंदी भावार्थ: दूर तक साथ आए स्नेही और वियोग से व्याकुल कुरुवंशियों को श्रीकृष्ण ने समझाकर लौटाया और प्रिय साथियों सहित अपनी नगरी की ओर चले।
श्लोक 10.34
सरल हिंदी भावार्थ: वे कुरुजाङ्गल, पाञ्चाल, शूरसेन, यमुना के निकटवर्ती क्षेत्र, ब्रह्मावर्त, कुरुक्षेत्र, मत्स्य और सारस्वत प्रदेशों से होकर गए।
श्लोक 10.35
सरल हिंदी भावार्थ: फिर मरुस्थल तथा सौवीर और आभीर प्रदेश पार करके आनर्त देश पहुँचे। यात्रा में उनके घोड़े कुछ थक गए थे।
श्लोक 10.36
सरल हिंदी भावार्थ: मार्ग में स्थान-स्थान पर लोगों ने उनका स्वागत और पूजन किया। संध्या होने पर वे रथ से उतरकर विश्राम तथा संध्योपासना करते थे।
॥ श्रीमद्भागवत महापुराण • प्रथम स्कन्ध • अध्याय 10 समाप्त ॥
प्रथम स्कन्ध • अध्याय 11
द्वारका में भगवान का मंगलमय स्वागत
श्लोक 11.1
सरल हिंदी भावार्थ: सूतजी बोले—समृद्ध आनर्त देश के निकट पहुँचकर श्रीकृष्ण ने श्रेष्ठ शंख बजाया, मानो उसके नाद से अपनी प्रजा का वियोग-दुःख मिटा रहे हों।
श्लोक 11.2
सरल हिंदी भावार्थ: उनके कमल जैसे हाथों में रखा श्वेत शंख अधरों की लालिमा से लाल दिखाई दे रहा था, जैसे कमलों के बीच मधुर स्वर करता राजहंस।
श्लोक 11.3
सरल हिंदी भावार्थ: संसार के भय को दूर करने वाला वह शंखनाद सुनकर समस्त प्रजा अपने रक्षक प्रभु के दर्शन की लालसा से स्वागत करने निकली।
श्लोक 11.4
सरल हिंदी भावार्थ: लोग आदर से उपहार लाए, यद्यपि आत्माराम और पूर्णकाम भगवान अपनी ही पूर्णता में सदा तृप्त हैं; यह सूर्य को दीपक दिखाने जैसा प्रेमपूर्ण अर्पण था।
श्लोक 11.5
सरल हिंदी भावार्थ: प्रेम से खिले मुख और हर्ष से रुंधे कंठ से लोग ऐसे बोले, जैसे बालक अपने पिता, हितैषी और रक्षक से बोलते हैं।
श्लोक 11.6
सरल हिंदी भावार्थ: हे नाथ, हम आपके चरणकमलों को प्रणाम करते हैं। ब्रह्मा, रुद्र और इन्द्र भी उनकी वन्दना करते हैं; वे परम कल्याण चाहने वालों के आश्रय हैं, जहाँ काल का भी प्रभाव नहीं।
श्लोक 11.7
सरल हिंदी भावार्थ: हे विश्वपालक, हमारे कल्याण के लिए सदा हमारे साथ रहिए। आप ही माता, मित्र, स्वामी, पिता, सद्गुरु और परम आराध्य हैं; आपकी सेवा से हमारा जीवन सफल हुआ है।
श्लोक 11.8
सरल हिंदी भावार्थ: आपके कारण हम सनाथ हैं। देवताओं के लिए भी दुर्लभ आपका प्रेममयी मुस्कान और स्नेहभरी दृष्टि वाला मंगलमय मुख हमें देखने को मिलता है।
श्लोक 11.9
सरल हिंदी भावार्थ: हे कमलनयन अच्युत, जब आप स्वजनों से मिलने कुरु अथवा मथुरा प्रदेश जाते हैं, तब आपके बिना हमारा एक क्षण करोड़ों वर्षों जैसा हो जाता है, जैसे सूर्य के बिना आँखें व्यर्थ हों।
श्लोक 11.10
सरल हिंदी भावार्थ: भक्तवत्सल भगवान प्रजा के ये वचन सुनते हुए कृपाभरी दृष्टि से सबको अनुगृहीत करते हुए नगर में प्रवेश करने लगे।
श्लोक 11.11
सरल हिंदी भावार्थ: वह नगर मधु, भोज, दशार्ह, अर्ह, कुकुर, अन्धक और वृष्णिवंश के अपने समान पराक्रमी वीरों से सुरक्षित था, जैसे नागों से भोगवती नगरी सुरक्षित रहती है।
श्लोक 11.12
सरल हिंदी भावार्थ: द्वारका में सभी ऋतुओं के फल-फूल देने वाले वृक्ष, लताएँ, आश्रम, उद्यान, उपवन और कमलों से भरे सरोवर शोभा बढ़ा रहे थे।
श्लोक 11.13
सरल हिंदी भावार्थ: नगर के गोपुरों, द्वारों और मार्गों पर मंगल तोरण लगे थे। रंग-बिरंगी ध्वजाओं और पताकाओं की छाया धूप को रोक रही थी।
श्लोक 11.14
सरल हिंदी भावार्थ: मुख्य मार्ग, गलियाँ, बाजार और चौराहे साफ करके सुगन्धित जल से सींचे गए थे; उन पर फल, फूल, अक्षत और अंकुर बिखेरे गए थे।
श्लोक 11.15
सरल हिंदी भावार्थ: घर-घर के द्वार दही, अक्षत, फल, गन्ने, पूर्ण कलश, उपहार, धूप और दीपों से सजे थे।
श्लोक 11.16
सरल हिंदी भावार्थ: प्रिय श्रीकृष्ण के आगमन का समाचार सुनकर महामना वसुदेव, अक्रूर, उग्रसेन और अद्भुत पराक्रमी बलराम उत्साहित हो उठे।
श्लोक 11.17
सरल हिंदी भावार्थ: प्रद्युम्न, चारुदेष्ण और जाम्बवतीपुत्र साम्ब भी आनन्द से इतने भर गए कि सोना, बैठना और भोजन तक छोड़कर उठ पड़े।
श्लोक 11.18
सरल हिंदी भावार्थ: वे मंगलमय सामग्री लिए ब्राह्मणों और एक श्रेष्ठ हाथी को आगे करके रथों से स्वागत को निकले। शंख, वाद्य और वेदमंत्र गूँज रहे थे; प्रेम से सबके हृदय उमड़ रहे थे।
श्लोक 11.19
सरल हिंदी भावार्थ: नगर की सैकड़ों गणिकाएँ भी दर्शन की उत्सुकता से वाहनों पर निकलीं। उनके झिलमिलाते कुण्डल गालों और मुख की शोभा बढ़ा रहे थे।
श्लोक 11.20
सरल हिंदी भावार्थ: नट, नर्तक, गायक, सूत, मागध और वन्दीजन भगवान के अद्भुत और पवित्र चरित्रों का गान कर रहे थे।
श्लोक 11.21
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान ने अपने संबंधियों, नगरवासियों और सेवकों से यथायोग्य मिलकर सबका सम्मान किया।
श्लोक 11.22
सरल हिंदी भावार्थ: किसी को झुककर, किसी को प्रणाम करके, किसी को गले लगाकर, हाथ छूकर अथवा मुस्कान भरी दृष्टि से उन्होंने सन्तुष्ट किया। समाज के सबसे उपेक्षित लोगों तक को मनचाहा वर और आश्वासन दिया।
श्लोक 11.23
सरल हिंदी भावार्थ: गुरुजनों, ब्राह्मणों, उनकी पत्नियों, वृद्धों और अन्य लोगों के आशीर्वाद तथा वन्दीजनों की स्तुति स्वीकारते हुए भगवान नगर में प्रविष्ट हुए।
श्लोक 11.24
सरल हिंदी भावार्थ: श्रीकृष्ण राजमार्ग पर चले तो द्वारका की कुलवधुएँ उनके दर्शन का उत्सव मनाने के लिए महलों की छतों पर चढ़ गईं।
श्लोक 11.25
सरल हिंदी भावार्थ: द्वारकावासी प्रतिदिन भगवान को देखते थे, फिर भी सौन्दर्य और ऐश्वर्य के आश्रय उनके स्वरूप को देखकर आँखें कभी तृप्त नहीं होती थीं।
श्लोक 11.26
सरल हिंदी भावार्थ: उनका वक्षःस्थल लक्ष्मी का निवास, मुख आँखों के लिए अमृत का पात्र, भुजाएँ लोकपालों का आश्रय और चरणकमल भक्तरूपी भ्रमरों के विश्रामस्थल हैं।
श्लोक 11.27
सरल हिंदी भावार्थ: श्वेत छत्र, चँवर और पुष्पवर्षा के बीच पीताम्बर तथा वनमाला धारण किए भगवान ऐसे शोभित हुए, जैसे मेघ सूर्य, चन्द्रमा, इन्द्रधनुष और बिजली से सुशोभित हो।
श्लोक 11.28
सरल हिंदी भावार्थ: माता-पिता के घर पहुँचकर उन्होंने देवकी आदि सातों माताओं को सिर झुकाकर प्रणाम किया। माताओं ने उन्हें हर्ष से गले लगा लिया।
श्लोक 11.29
सरल हिंदी भावार्थ: माताओं ने पुत्र को गोद में बिठाया। वात्सल्य से उनके स्तनों से दूध बहने लगा और आनन्द के आँसुओं से उन्होंने श्रीकृष्ण को भिगो दिया।
श्लोक 11.30
सरल हिंदी भावार्थ: फिर भगवान अपने सर्वसम्पन्न भवन में गए, जहाँ उनकी सोलह हजार पत्नियों के महल थे।
श्लोक 11.31
सरल हिंदी भावार्थ: प्रवास से लौटे पति को देखकर रानियों के मन में आनन्द का उत्सव उमड़ पड़ा। वे लज्जा से मुख और दृष्टि झुकाए, आसन तथा वियोगकालीन नियम छोड़कर उठ खड़ी हुईं।
श्लोक 11.32
सरल हिंदी भावार्थ: अगाध प्रेम से उन्होंने पहले हृदय में, फिर दृष्टि से और फिर पुत्रों के माध्यम से अपने पति का आलिंगन किया। लज्जावश रोकने पर भी प्रेम के आँसू बह निकले।
श्लोक 11.33
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान एकान्त में पास रहते हुए भी उनके चरण हर क्षण नए लगते थे। लक्ष्मी भी जिन चरणों को कभी नहीं छोड़तीं, उनसे किसका मन हट सकता है?
श्लोक 11.34
सरल हिंदी भावार्थ: पृथ्वी पर भार बने शक्तिशाली राजाओं में उन्होंने परस्पर विरोध उत्पन्न किया, जैसे वायु बाँसों में अग्नि जगा देती है। वे राजा आपसी युद्ध से नष्ट हुए और भगवान स्वयं शस्त्र उठाए बिना निवृत्त रहे।
श्लोक 11.35
सरल हिंदी भावार्थ: अपनी माया से मनुष्यलोक में अवतरित भगवान श्रेष्ठ रानियों के बीच सामान्य मनुष्य की तरह गृहस्थ लीला करते रहे।
श्लोक 11.36
सरल हिंदी भावार्थ: जिन श्रेष्ठ रानियों की निर्मल मुस्कान और लज्जाभरी दृष्टि से कामदेव भी मोहित हो जाए, वे भी अपने आकर्षण से भगवान की इन्द्रियों को विचलित नहीं कर सकीं।
श्लोक 11.37
सरल हिंदी भावार्थ: अज्ञानी लोग भगवान को अपने जैसा मानते हैं। इसलिए पूर्णतः अनासक्त होकर लीला करने वाले भगवान को भी संसार में आसक्त समझ बैठते हैं।
श्लोक 11.38
सरल हिंदी भावार्थ: ईश्वर की यही प्रभुता है कि प्रकृति में रहकर भी उसके गुणों से नहीं बँधते। उनके आश्रित भक्त की बुद्धि भी अन्तःस्थित भगवान में लगकर उन गुणों से मुक्त होती है।
श्लोक 11.39
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान की असीम महिमा को पूर्णतः न जानने वाली रानियाँ प्रेमवश उन्हें केवल अपना एकनिष्ठ पति समझती थीं, जैसे सीमित बुद्धि उनकी ईश्वरता का पूरा अनुमान नहीं कर पाती।
॥ श्रीमद्भागवत महापुराण • प्रथम स्कन्ध • अध्याय 11 समाप्त ॥
प्रथम स्कन्ध • अध्याय 12
परीक्षित का जन्म, नामकरण और भविष्य का वर्णन
श्लोक 12.1
सरल हिंदी भावार्थ: शौनकजी ने कहा—अश्वत्थामा के छोड़े ब्रह्मास्त्र के प्रचण्ड तेज से उत्तरा के गर्भस्थ बालक का जीवन संकट में पड़ गया था; भगवान ने उसे फिर जीवन प्रदान किया।
श्लोक 12.2
सरल हिंदी भावार्थ: हम उन बुद्धिमान महात्मा परीक्षित का जन्म, कर्म, मृत्यु और मृत्यु के बाद प्राप्त गति जानना चाहते हैं।
श्लोक 12.3
सरल हिंदी भावार्थ: जिन्हें शुकदेवजी ने ज्ञान दिया, उन परीक्षित की कथा हम श्रद्धापूर्वक सुनना चाहते हैं; उचित समझें तो हमें सुनाइए।
श्लोक 12.4
सरल हिंदी भावार्थ: सूतजी बोले—धर्मराज युधिष्ठिर श्रीकृष्ण के चरणकमलों की सेवा से विषयकामनाओं से रहित होकर पिता की तरह प्रजा का पालन और प्रसन्नता सुनिश्चित करते थे।
श्लोक 12.5
सरल हिंदी भावार्थ: उनके पास सम्पत्ति, यज्ञों का वैभव, श्रेष्ठ लोकों की प्राप्ति, रानी, भाई, पृथ्वी का राज्य, जम्बूद्वीप का आधिपत्य और स्वर्ग तक फैला यश था।
श्लोक 12.6
सरल हिंदी भावार्थ: किन्तु श्रीकृष्ण में मन लगाए राजा को देवताओं के लिए भी वांछनीय ये भोग विशेष सुख न देते थे, जैसे भूखे मनुष्य को भोजन के अतिरिक्त दूसरी चीजें तृप्त नहीं करतीं।
श्लोक 12.7
सरल हिंदी भावार्थ: हे भृगुवंशी, गर्भ में अस्त्र के तेज से जलते हुए उस वीर बालक ने अपने निकट एक अद्भुत पुरुष को देखा।
श्लोक 12.8
सरल हिंदी भावार्थ: वे अँगूठे भर आकार के, निर्मल, चमकते स्वर्णमुकुट से सुशोभित, श्यामवर्ण और बिजली जैसे पीतवस्त्र धारण किए अच्युत भगवान थे।
श्लोक 12.9
सरल हिंदी भावार्थ: उनकी चार सुन्दर लम्बी भुजाएँ थीं, तपे सोने जैसे कुण्डल थे और नेत्र लालिमा लिए थे। वे बालक के चारों ओर घूमते हुए अग्नि जैसी प्रकाशमान गदा घुमा रहे थे।
श्लोक 12.10
सरल हिंदी भावार्थ: सूर्य जैसे कुहरे को मिटाता है, वैसे वे अपनी गदा से अस्त्र का तेज नष्ट कर रहे थे। बालक निकट से उन्हें देखकर सोच रहा था—ये कौन हैं?
श्लोक 12.11
सरल हिंदी भावार्थ: धर्म के रक्षक, अपरिमेय सामर्थ्य वाले भगवान उस तेज को दूर करके दस महीने के गर्भस्थ बालक के देखते-देखते वहीं अन्तर्धान हो गए।
श्लोक 12.12
सरल हिंदी भावार्थ: फिर शुभ गुणों की वृद्धि कराने वाले अनुकूल ग्रहयोग में पाण्डुवंश का वह उत्तराधिकारी जन्मा, जो तेज में मानो स्वयं पाण्डु जैसा था।
श्लोक 12.13
सरल हिंदी भावार्थ: आनन्दित युधिष्ठिर ने धौम्य और कृपाचार्य आदि ब्राह्मणों से मंगलवाचन कराकर बालक के जन्म-संस्कार सम्पन्न कराए।
श्लोक 12.14
सरल हिंदी भावार्थ: दान के उचित अवसर जानने वाले राजा ने पुत्रजन्म के पुण्य अवसर पर ब्राह्मणों को सोना, गायें, भूमि, गाँव, उत्तम हाथी-घोड़े और उत्तम अन्न दान किए।
श्लोक 12.15
सरल हिंदी भावार्थ: प्रसन्न ब्राह्मणों ने विनयशील युधिष्ठिर से कहा—हे पौरवश्रेष्ठ, आपके इस वंश में उत्पन्न यह बालक अत्यन्त विशेष है।
श्लोक 12.16
सरल हिंदी भावार्थ: जब अनिवार्य दैव के प्रभाव से पवित्र पुरुवंश का उत्तराधिकार समाप्त होने को था, तब सामर्थ्यवान विष्णु ने आप पर कृपा करके यह बालक प्रदान किया है।
श्लोक 12.17
सरल हिंदी भावार्थ: इसलिए यह विष्णुरात नाम से विख्यात होगा। निश्चय ही यह महान यशस्वी और श्रेष्ठ भगवद्भक्त बनेगा।
श्लोक 12.18
सरल हिंदी भावार्थ: युधिष्ठिर ने पूछा—हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो, क्या यह बालक अपने वंश के पुण्यकीर्ति महात्मा राजर्षियों के यश और उत्तम आचरण का अनुसरण करेगा?
श्लोक 12.19
सरल हिंदी भावार्थ: ब्राह्मणों ने कहा—यह मनुपुत्र इक्ष्वाकु के समान प्रजा का रक्षक और दशरथनन्दन श्रीराम के समान ब्राह्मणहितैषी तथा सत्यप्रतिज्ञ होगा।
श्लोक 12.20
सरल हिंदी भावार्थ: यह उशीनरपुत्र शिबि के समान दानी और शरणागत का रक्षक होगा; यज्ञकर्ता दुष्यन्तपुत्र भरत की तरह अपने कुल का यश फैलाएगा।
श्लोक 12.21
सरल हिंदी भावार्थ: यह धनुर्धरों में अग्रणी तथा दोनों अर्जुनों—कार्तवीर्य अर्जुन और पाण्डव अर्जुन—के समान पराक्रमी होगा; अग्नि के समान दुर्जेय और समुद्र के समान दुस्तर होगा।
श्लोक 12.22
सरल हिंदी भावार्थ: यह सिंह के समान वीर, हिमालय के समान सबके लिए आश्रययोग्य, पृथ्वी के समान तितिक्षाशील और माता-पिता के समान सहनशील होगा।
श्लोक 12.23
सरल हिंदी भावार्थ: यह समता में ब्रह्मा, शीघ्र प्रसन्न होने में शिव और सब प्राणियों को आश्रय देने में लक्ष्मीपति भगवान जैसा होगा।
श्लोक 12.24
सरल हिंदी भावार्थ: समस्त सद्गुणों में श्रीकृष्ण का अनुगामी, रन्तिदेव जैसा उदार और ययाति जैसा धर्मपरायण होगा।
श्लोक 12.25
सरल हिंदी भावार्थ: धैर्य में बलि के समान तथा श्रीकृष्ण में अटूट निष्ठा में प्रह्लाद जैसा होगा। यह अश्वमेध यज्ञ करेगा और वृद्धों की सेवा करेगा।
श्लोक 12.26
सरल हिंदी भावार्थ: यह राजर्षियों का जनक और कुमार्ग पर चलने वालों का शासक होगा। पृथ्वी पर धर्म की रक्षा के लिए कलियुग के अधर्म को नियंत्रित करेगा।
श्लोक 12.27
सरल हिंदी भावार्थ: जब इसे ब्राह्मणपुत्र के शाप से तक्षक के द्वारा अपनी मृत्यु का समाचार मिलेगा, तब आसक्ति छोड़कर भगवान के चरणों की शरण लेगा।
श्लोक 12.28
सरल हिंदी भावार्थ: व्यासपुत्र शुकदेवजी से आत्मतत्त्व जानकर यह गङ्गातट पर शरीर त्यागेगा और निश्चय ही निर्भय परम पद प्राप्त करेगा।
श्लोक 12.29
सरल हिंदी भावार्थ: जन्मफल के ज्ञाता ब्राह्मण राजा को यह सब बताकर और सम्मान प्राप्त करके अपने-अपने घर लौट गए।
श्लोक 12.30
सरल हिंदी भावार्थ: गर्भ में देखे हुए प्रभु का स्मरण करके वह लोगों को परखता रहता था कि कहीं यही तो वे नहीं हैं; इसलिए संसार में परीक्षित नाम से प्रसिद्ध हुआ।
श्लोक 12.31
सरल हिंदी भावार्थ: परिजनों के पालन-पोषण से वह राजकुमार दिन-प्रतिदिन वैसे ही बढ़ता गया, जैसे शुक्लपक्ष का चन्द्रमा अपनी कलाओं से पूर्ण होता है।
श्लोक 12.32
सरल हिंदी भावार्थ: स्वजनों के प्रति हुए युद्धजन्य अपराध का प्रायश्चित्त करने के लिए युधिष्ठिर अश्वमेध करना चाहते थे। पर्याप्त धन न होने से उन्होंने कर और दण्ड के अतिरिक्त किसी अन्य साधन पर विचार किया।
श्लोक 12.33
सरल हिंदी भावार्थ: उनकी इच्छा जानकर श्रीकृष्ण की प्रेरणा से भाइयों ने उत्तर दिशा में छोड़ा हुआ बहुत-सा धन लाकर दिया।
श्लोक 12.34
सरल हिंदी भावार्थ: उस धन से यज्ञ की सामग्री जुटाकर धर्मपुत्र युधिष्ठिर ने स्वजनवध के पाप की आशंका दूर करने के लिए तीन अश्वमेध यज्ञों द्वारा श्रीहरि की आराधना की।
श्लोक 12.35
सरल हिंदी भावार्थ: राजा के निमन्त्रण पर श्रीकृष्ण ने ब्राह्मणों से उनके यज्ञ सम्पन्न कराए और प्रियजनों को प्रसन्न रखने के लिए कुछ महीने वहीं रहे।
श्लोक 12.36
सरल हिंदी भावार्थ: फिर राजा, द्रौपदी और अन्य स्वजनों की अनुमति लेकर भगवान अर्जुन तथा यदुवंशियों के साथ द्वारका लौट गए।
॥ श्रीमद्भागवत महापुराण • प्रथम स्कन्ध • अध्याय 12 समाप्त ॥
प्रेम, अनासक्ति और भगवान का आश्रय
इन अध्यायों में भक्तों का प्रेम विदाई और स्वागत दोनों में प्रकट होता है। भगवान सबका आदर करते हैं, फिर भी संसार के गुणों से बँधते नहीं। परीक्षित की कथा में गर्भ से लेकर जीवन के अन्त तक भगवान के आश्रय का सूत्र दिखाई देता है।
पाठाधार और संपादकीय जानकारी
मूल संस्कृत पाठ का आधार Sanskrit Documents का “श्रीमद्भागवतं—प्रथमस्कन्धः” है। अध्याय 11 के श्लोक-क्रम का संस्कृत विकिस्रोत से मिलान किया गया है। आधार-पाठ में “नित्यं निरीक्षमाणानां” वाले श्लोक की संख्या 26 दोहराई गई है; क्रम-मिलान के अनुसार यहाँ 25 रखी गई है। कोष्ठकों में दिया अतिरिक्त पाठ और वैकल्पिक पाठान्तर मुख्य पाठ में नहीं जोड़े गए हैं। हिंदी भावार्थ भक्ति भावना की स्वतंत्र संपादकीय प्रस्तुति है; यह किसी आधुनिक टीका की प्रतिलिपि नहीं है। यह प्रथम स्कन्ध का चौथा क्रमिक भाग है।
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