श्रीमद्भागवत महापुराण प्रथम स्कन्ध भाग 4 — अध्याय 10–12, द्वारका आगमन और परीक्षित जन्म

भक्ति भावना • पुराण साहित्य

श्रीमद्भागवत महापुराण

प्रथम स्कन्ध • भाग ४ • अध्याय १०–१२

१११ मूल श्लोक • प्रत्येक श्लोक का सरल हिंदी भावार्थ

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भगवान का स्वागत और परीक्षित की जन्मकथा

भीष्मजी के परमगति प्राप्त करने के बाद श्रीकृष्ण हस्तिनापुर से द्वारका के लिए प्रस्थान करते हैं। विदाई में पाण्डवों का प्रेम और द्वारका में भक्तों का उल्लास दिखाई देता है। आगे परीक्षित की गर्भरक्षा, जन्म, विष्णुरात नामकरण और उनके भविष्य के विषय में ब्राह्मणों का कथन है।

अध्याय 10 के 36, अध्याय 11 के 39 और अध्याय 12 के 36—कुल 111 श्लोक मूल क्रम में हैं। प्रत्येक के साथ स्वतंत्र रूप से लिखा सरल हिंदी भावार्थ दिया गया है।

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प्रथम स्कन्ध • अध्याय 10

हस्तिनापुर से श्रीकृष्ण का प्रस्थान

श्लोक 10.1

शौनक उवाच । हत्वा स्वरिक्थस्पृध आततायिनो युधिष्ठिरो धर्मभृतां वरिष्ठः । सहानुजैः प्रत्यवरुद्धभोजनः कथं प्रवृत्तः किमकारषीत्ततः ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: शौनकजी ने पूछा—अपने राज्य के लिए युद्ध करने वाले आततायी संबंधियों के मारे जाने पर भोजन तक छोड़ चुके धर्मश्रेष्ठ युधिष्ठिर ने भाइयों सहित आगे क्या किया?

श्लोक 10.2

सूत उवाच । वंशं कुरोर्वंशदवाग्निनिर्हृतं संरोहयित्वा भवभावनो हरिः । निवेशयित्वा निजराज्य ईश्वरो युधिष्ठिरं प्रीतमना बभूव ह ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: सूतजी बोले—संसार का पालन करने वाले श्रीहरि ने आपसी वैर की अग्नि से नष्टप्राय कुरुवंश को फिर सँभाला और युधिष्ठिर को उनके राज्य में स्थापित करके प्रसन्न हुए।

श्लोक 10.3

निशम्य भीष्मोक्तमथाच्युतोक्तं प्रवृत्तविज्ञानविधूतविभ्रमः । शशास गामिन्द्र इवाजिताश्रयः परिध्युपान्तामनुजानुवर्तितः ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: भीष्मजी और श्रीकृष्ण के वचन सुनकर युधिष्ठिर का भ्रम दूर हुआ। भगवान के आश्रय और भाइयों के सहयोग से वे समुद्रपर्यन्त पृथ्वी का शासन करने लगे।

श्लोक 10.4

कामं ववर्ष पर्जन्यः सर्वकामदुघा मही । सिषिचुः स्म व्रजान् गावः पयसोधस्वतीर्मुदा ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनके शासन में मेघ आवश्यकता के अनुसार वर्षा करते, धरती सब आवश्यक उपज देती और स्वस्थ गायों के दूध से गोष्ठ समृद्ध रहते थे।

श्लोक 10.5

नद्यः समुद्रा गिरयः सवनस्पतिवीरुधः । फलन्त्योषधयः सर्वाः काममन्वृतु तस्य वै ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: नदियाँ, समुद्र, पर्वत, वृक्ष, लताएँ और औषधियाँ अपनी-अपनी ऋतु के अनुसार भरपूर फल देते थे।

श्लोक 10.6

नाधयो व्याधयः क्लेशा दैवभूतात्महेतवः । अजातशत्रावभवन् जन्तूनां राज्ञि कर्हिचित् ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: अजातशत्रु युधिष्ठिर के राज्य में प्राणियों को मानसिक पीड़ा, रोग और दैविक, भौतिक अथवा शारीरिक क्लेश नहीं सताते थे।

श्लोक 10.7

उषित्वा हास्तिनपुरे मासान् कतिपयान् हरिः । सुहृदां च विशोकाय स्वसुश्च प्रियकाम्यया ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: श्रीकृष्ण अपने प्रियजनों का शोक दूर करने और बहन सुभद्रा को प्रसन्न रखने के लिए कुछ महीने हस्तिनापुर में रहे।

श्लोक 10.8

आमन्त्र्य चाभ्यनुज्ञातः परिष्वज्याभिवाद्य तम् । आरुरोह रथं कैश्चित्परिष्वक्तोऽभिवादितः ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: फिर युधिष्ठिर की अनुमति लेकर, उन्हें गले लगाकर और प्रणाम करके भगवान रथ पर चढ़े। अन्य स्वजनों ने भी उन्हें आलिंगन और प्रणाम किया।

श्लोक 10.9

सुभद्रा द्रौपदी कुन्ती विराटतनया तथा । गान्धारी धृतराष्ट्रश्च युयुत्सुर्गौतमो यमौ ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: सुभद्रा, द्रौपदी, कुन्ती, उत्तरा, गान्धारी, धृतराष्ट्र, युयुत्सु, कृपाचार्य तथा नकुल-सहदेव विदाई के समय उपस्थित थे।

श्लोक 10.10

वृकोदरश्च धौम्यश्च स्त्रियो मत्स्यसुतादयः । न सेहिरे विमुह्यन्तो विरहं शार्ङ्गधन्वनः ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: भीमसेन, धौम्य और उत्तरा आदि स्त्रियाँ भी श्रीकृष्ण के वियोग की कल्पना से व्याकुल थीं; वे उनका बिछोह सह नहीं पा रहे थे।

श्लोक 10.11

सत्सङ्गान्मुक्तदुःसङ्गो हातुं नोत्सहते बुधः । कीर्त्यमानं यशो यस्य सकृदाकर्ण्य रोचनम् ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिन भगवान का मधुर यश एक बार सुनकर सत्संगी मनुष्य बुरी संगति छोड़ देता है, उन भगवान को छोड़ना उसके लिए कठिन हो जाता है।

श्लोक 10.12

तस्मिन् न्यस्तधियः पार्थाः सहेरन् विरहं कथम् । दर्शनस्पर्शसंलापशयनासनभोजनैः ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: तो दर्शन, स्पर्श, बातचीत, साथ सोने-बैठने और भोजन करने से जिनका चित्त उन्हीं में लग गया था, वे पाण्डव उनका वियोग कैसे सहते?

श्लोक 10.13

सर्वे तेऽनिमिषैरक्षैस्तमनुद्रुतचेतसः । वीक्षन्तः स्नेहसम्बद्धा विचेलुस्तत्र तत्र ह ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: स्नेह से बँधे सभी स्वजन अपलक श्रीकृष्ण को देखते और मन से उनका अनुसरण करते हुए इधर-उधर उनके पीछे चलते रहे।

श्लोक 10.14

न्यरुन्धन्नुद्गलद्बाष्पमौत्कण्ठ्याद्देवकीसुते । निर्यात्यगारान्नोऽभद्रमिति स्याद्बान्धवस्त्रियः ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: स्वजन स्त्रियों ने प्रेम-विह्वल होकर उमड़ते आँसू रोक लिए, यह सोचकर कि प्रस्थान करते श्रीकृष्ण के सामने अशुभ संकेत न हो।

श्लोक 10.15

मृदङ्गशङ्खभेर्यश्च वीणापणवगोमुखाः । धुन्धुर्यानकघण्टाद्या नेदुर्दुन्दुभयस्तथा ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: मृदंग, शंख, भेरी, वीणा, पणव, गोमुख, धुन्धुरी, आनक, घंटा और दुन्दुभि आदि वाद्य बजने लगे।

श्लोक 10.16

प्रासादशिखरारूढाः कुरुनार्यो दिदृक्षया । ववृषुः कुसुमैः कृष्णं प्रेमव्रीडास्मितेक्षणाः ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: कुरुवंश की स्त्रियाँ दर्शन के लिए महलों की छतों पर चढ़ीं और प्रेम, लज्जा तथा मुस्कान भरी दृष्टि से श्रीकृष्ण पर पुष्प बरसाने लगीं।

श्लोक 10.17

सितातपत्रं जग्राह मुक्तादामविभूषितम् । रत्नदण्डं गुडाकेशः प्रियः प्रियतमस्य ह ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्रिय सखा अर्जुन ने अपने परम प्रिय श्रीकृष्ण के ऊपर मोतियों की झालर और रत्नमय दण्ड से सजा श्वेत छत्र धारण किया।

श्लोक 10.18

उद्धवः सात्यकिश्चैव व्यजने परमाद्भुते । विकीर्यमाणः कुसुमै रेजे मधुपतिः पथि ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: उद्धव और सात्यकि सुन्दर चँवर डुला रहे थे। पुष्पवर्षा के बीच मार्ग में चलते यदुपति श्रीकृष्ण अत्यन्त शोभायमान थे।

श्लोक 10.19

अश्रूयन्ताशिषः सत्यास्तत्र तत्र द्विजेरिताः । नानुरूपानुरूपाश्च निर्गुणस्य गुणात्मनः ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: ब्राह्मणों के सत्य आशीर्वाद चारों ओर सुनाई देते थे। गुणातीत भगवान के लिए मानवीय कामनाओं वाले आशीर्वाद पूर्णतः उपयुक्त न होकर भी उनके भक्तवत्सल स्वरूप में शोभते थे।

श्लोक 10.20

अन्योन्यमासीत्सञ्जल्प उत्तमश्लोकचेतसाम् । कौरवेन्द्रपुरस्त्रीणां सर्वश्रुतिमनोहरः ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: श्रीकृष्ण में मन लगाए हस्तिनापुर की स्त्रियाँ आपस में ऐसी चर्चा करने लगीं, जो वेदों के सार की तरह मन को आकर्षित करती थी।

श्लोक 10.21

स वै किलायं पुरुषः पुरातनो य एक आसीदविशेष आत्मनि । अग्रे गुणेभ्यो जगदात्मनीश्वरे निमीलितात्मन् निशि सुप्तशक्तिषु ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: यही वे सनातन परम पुरुष हैं, जो सृष्टि से पहले, जब गुण और शक्तियाँ अप्रकट थीं तथा जीव परमात्मा में लीन थे, तब भी अकेले विद्यमान थे।

श्लोक 10.22

स एव भूयो निजवीर्यचोदितां स्वजीवमायां प्रकृतिं सिसृक्षतीम् । अनामरूपात्मनि रूपनामनी विधित्समानोऽनुससार शास्त्रकृत् ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: इन्होंने अपनी शक्ति से प्रकृति को सृष्टि की ओर प्रेरित किया और नाम-रूप से रहित जीवों को नाम-रूप देने के लिए उसमें प्रवेश किया; शास्त्रों की व्यवस्था भी इन्हीं से है।

श्लोक 10.23

स वा अयं यत्पदमत्र सूरयो जितेन्द्रिया निर्जितमातरिश्वनः । पश्यन्ति भक्त्युत्कलितामलात्मना नन्वेष सत्त्वं परिमार्ष्टुमर्हति ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: इन्द्रियों और प्राण को वश में रखने वाले ज्ञानी जिस परम पद को निर्मल भक्तिपूर्ण चित्त से देखते हैं, वही भगवान हमारे अन्तःकरण को शुद्ध करने में समर्थ हैं।

श्लोक 10.24

स वा अयं सख्यनुगीतसत्कथो वेदेषु गुह्येषु च गुह्यवादिभिः । य एक ईशो जगदात्मलीलया सृजत्यवत्यत्ति न तत्र सज्जते ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: गूढ़ वेदों और तत्त्वदर्शियों द्वारा जिनकी महिमा कही जाती है, वे यही हैं। एकमात्र ईश्वर अपनी लीला से जगत की रचना, रक्षा और संहार करते हुए भी उसमें आसक्त नहीं होते।

श्लोक 10.25

यदा ह्यधर्मेण तमोधियो नृपा जीवन्ति तत्रैष हि सत्त्वतः किल । धत्ते भगं सत्यमृतं दयां यशो भवाय रूपाणि दधद्युगे युगे ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: जब अज्ञानग्रस्त राजा अधर्म से शासन करते हैं, तब यही भगवान जीवों के कल्याण के लिए युग-युग में अवतार लेकर ऐश्वर्य, सत्य, ऋत, दया और यश प्रकट करते हैं।

श्लोक 10.26

अहो अलं श्लाघ्यतमं यदोः कुल- महो अलं पुण्यतमं मधोर्वनम् । यदेष पुंसामृषभः श्रियः पतिः स्वजन्मना चङ्क्रमणेन चाञ्चति ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: यदुवंश कितना धन्य और मधु की भूमि कितनी पुण्यमयी है, जिसे लक्ष्मीपति श्रीकृष्ण ने अपने जन्म और विचरण से सुशोभित किया है!

श्लोक 10.27

अहो बत स्वर्यशसस्तिरस्करी कुशस्थली पुण्ययशस्करी भुवः । पश्यन्ति नित्यं यदनुग्रहेषितं स्मितावलोकं स्वपतिं स्म यत्प्रजाः ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: द्वारका कितनी पवित्र और पृथ्वी का यश बढ़ाने वाली है! वहाँ की प्रजा प्रतिदिन अपने स्वामी श्रीकृष्ण की कृपामयी मुस्कान और दृष्टि का दर्शन करती है।

श्लोक 10.28

नूनं व्रतस्नानहुतादिनेश्वरः समर्चितो ह्यस्य गृहीतपाणिभिः । पिबन्ति याः सख्यधरामृतं मुहु- र्व्रजस्त्रियःसम्मुमुहुर्यदाशयाः ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: सखियो, श्रीकृष्ण की पत्नियों ने अवश्य व्रत, स्नान और यज्ञ आदि से भगवान की आराधना की होगी। वे बार-बार उनके अधरामृत का सौभाग्य पाती हैं, जिसके स्मरण में व्रजसुन्दरियाँ मोहित रहती थीं।

श्लोक 10.29

या वीर्यशुल्केन हृताः स्वयंवरे प्रमथ्य चैद्यप्रमुखान् हि शुष्मिणः । प्रद्युम्नसाम्बाम्बसुतादयोऽपरा याश्चाहृता भौमवधे सहस्रशः ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: कुछ रानियों को भगवान ने स्वयंवर में शिशुपाल आदि बलवान राजाओं को हराकर प्राप्त किया; वे प्रद्युम्न, साम्ब और अम्ब आदि की माताएँ बनीं। हजारों अन्य को भौमासुर के वध के बाद मुक्त कराया।

श्लोक 10.30

एताः परं स्त्रीत्वमपास्तपेशलं निरस्तशौचं बत साधु कुर्वते । यासां गृहात्पुष्करलोचनः पति- र्न जात्वपैत्याहृतिभिर्हृदि स्पृशन् ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: ये रानियाँ अपने स्त्री-जन्म को धन्य करती हैं। कमलनयन श्रीकृष्ण उनके पति हैं और प्रेमपूर्ण व्यवहार से हृदय को छूते हुए उनके घरों में निरन्तर रहते हैं।

श्लोक 10.31

एवंविधा गदन्तीनां स गिरः पुरयोषिताम् । निरीक्षणेनाभिनन्दन् सस्मितेन ययौ हरिः ॥ ३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: नगर की स्त्रियों के ऐसे प्रेमपूर्ण वचन सुनकर भगवान मुस्कान भरी दृष्टि से उनका अभिनन्दन करते हुए आगे बढ़े।

श्लोक 10.32

अजातशत्रुः पृतनां गोपीथाय मधुद्विषः । परेभ्यः शङ्कितः स्नेहात्प्रायुङ्क्त चतुरङ्गिणीम् ॥ ३२॥

सरल हिंदी भावार्थ: युधिष्ठिर ने प्रेमवश शत्रुओं की आशंका करके श्रीकृष्ण की रक्षा और सम्मान के लिए चतुरंगिणी सेना साथ भेजी।

श्लोक 10.33

अथ दूरागतान् शौरिः कौरवान् विरहातुरान् । सन्निवर्त्य दृढं स्निग्धान् प्रायात्स्वनगरीं प्रियैः ॥ ३३॥

सरल हिंदी भावार्थ: दूर तक साथ आए स्नेही और वियोग से व्याकुल कुरुवंशियों को श्रीकृष्ण ने समझाकर लौटाया और प्रिय साथियों सहित अपनी नगरी की ओर चले।

श्लोक 10.34

कुरुजाङ्गलपाञ्चालान् शूरसेनान् सयामुनान् । ब्रह्मावर्तं कुरुक्षेत्रं मत्स्यान् सारस्वतानथ ॥ ३४॥

सरल हिंदी भावार्थ: वे कुरुजाङ्गल, पाञ्चाल, शूरसेन, यमुना के निकटवर्ती क्षेत्र, ब्रह्मावर्त, कुरुक्षेत्र, मत्स्य और सारस्वत प्रदेशों से होकर गए।

श्लोक 10.35

मरुधन्वमतिक्रम्य सौवीराभीरयोः परान् । आनर्तान् भार्गवोपागाच्छ्रान्तवाहो मनाग् विभुः ॥ ३५॥

सरल हिंदी भावार्थ: फिर मरुस्थल तथा सौवीर और आभीर प्रदेश पार करके आनर्त देश पहुँचे। यात्रा में उनके घोड़े कुछ थक गए थे।

श्लोक 10.36

तत्र तत्र ह तत्रत्यैर्हरिः प्रत्युद्यतार्हणः । सायं भेजे दिशं पश्चाद्गविष्ठो गां गतस्तदा ॥ ३६॥

सरल हिंदी भावार्थ: मार्ग में स्थान-स्थान पर लोगों ने उनका स्वागत और पूजन किया। संध्या होने पर वे रथ से उतरकर विश्राम तथा संध्योपासना करते थे।

॥ श्रीमद्भागवत महापुराण • प्रथम स्कन्ध • अध्याय 10 समाप्त ॥

प्रथम स्कन्ध • अध्याय 11

द्वारका में भगवान का मंगलमय स्वागत

श्लोक 11.1

सूत उवाच । आनर्तान् स उपव्रज्य स्वृद्धाञ्जनपदान् स्वकान् । दध्मौ दरवरं तेषां विषादं शमयन्निव ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: सूतजी बोले—समृद्ध आनर्त देश के निकट पहुँचकर श्रीकृष्ण ने श्रेष्ठ शंख बजाया, मानो उसके नाद से अपनी प्रजा का वियोग-दुःख मिटा रहे हों।

श्लोक 11.2

स उच्चकाशे धवलोदरो दरो- ऽप्युरुक्रमस्याधरशोणशोणिमा । दाध्मायमानः करकञ्जसम्पुटे यथाब्जखण्डे कलहंस उत्स्वनः ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनके कमल जैसे हाथों में रखा श्वेत शंख अधरों की लालिमा से लाल दिखाई दे रहा था, जैसे कमलों के बीच मधुर स्वर करता राजहंस।

श्लोक 11.3

तमुपश्रुत्य निनदं जगद्भयभयावहम् । प्रत्युद्ययुः प्रजाः सर्वा भर्तृदर्शनलालसाः ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: संसार के भय को दूर करने वाला वह शंखनाद सुनकर समस्त प्रजा अपने रक्षक प्रभु के दर्शन की लालसा से स्वागत करने निकली।

श्लोक 11.4

तत्रोपनीतबलयो रवेर्दीपमिवादृताः । आत्मारामं पूर्णकामं निजलाभेन नित्यदा ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: लोग आदर से उपहार लाए, यद्यपि आत्माराम और पूर्णकाम भगवान अपनी ही पूर्णता में सदा तृप्त हैं; यह सूर्य को दीपक दिखाने जैसा प्रेमपूर्ण अर्पण था।

श्लोक 11.5

प्रीत्युत्फुल्लमुखाः प्रोचुर्हर्षगद्गदया गिरा । पितरं सर्वसुहृदमवितारमिवार्भकाः ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्रेम से खिले मुख और हर्ष से रुंधे कंठ से लोग ऐसे बोले, जैसे बालक अपने पिता, हितैषी और रक्षक से बोलते हैं।

श्लोक 11.6

नताः स्म ते नाथ सदाङ्घ्रिपङ्कजं विरिञ्चवैरिञ्च्यसुरेन्द्रवन्दितम् । परायणं क्षेममिहेच्छतां परं न यत्र कालः प्रभवेत्परः प्रभुः ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: हे नाथ, हम आपके चरणकमलों को प्रणाम करते हैं। ब्रह्मा, रुद्र और इन्द्र भी उनकी वन्दना करते हैं; वे परम कल्याण चाहने वालों के आश्रय हैं, जहाँ काल का भी प्रभाव नहीं।

श्लोक 11.7

भवाय नस्त्वं भव विश्वभावन त्वमेव माताथ सुहृत्पतिः पिता । त्वं सद्गुरुर्नः परमं च दैवतं यस्यानुवृत्त्या कृतिनो बभूविम ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: हे विश्वपालक, हमारे कल्याण के लिए सदा हमारे साथ रहिए। आप ही माता, मित्र, स्वामी, पिता, सद्गुरु और परम आराध्य हैं; आपकी सेवा से हमारा जीवन सफल हुआ है।

श्लोक 11.8

अहो सनाथा भवता स्म यद्वयं त्रैविष्टपानामपि दूरदर्शनम् । प्रेमस्मितस्निग्धनिरीक्षणाननं पश्येम रूपं तव सर्वसौभगम् ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: आपके कारण हम सनाथ हैं। देवताओं के लिए भी दुर्लभ आपका प्रेममयी मुस्कान और स्नेहभरी दृष्टि वाला मंगलमय मुख हमें देखने को मिलता है।

श्लोक 11.9

यर्ह्यम्बुजाक्षापससार भो भवान् कुरून् मधून् वाथ सुहृद्दिदृक्षया । तत्राब्दकोटिप्रतिमः क्षणो भवे- द्रविं विनाक्ष्णोरिव नस्तवाच्युत ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: हे कमलनयन अच्युत, जब आप स्वजनों से मिलने कुरु अथवा मथुरा प्रदेश जाते हैं, तब आपके बिना हमारा एक क्षण करोड़ों वर्षों जैसा हो जाता है, जैसे सूर्य के बिना आँखें व्यर्थ हों।

श्लोक 11.10

इति चोदीरिता वाचः प्रजानां भक्तवत्सलः । श‍ृण्वानोऽनुग्रहं दृष्ट्या वितन्वन् प्राविशत्पुरीम् ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: भक्तवत्सल भगवान प्रजा के ये वचन सुनते हुए कृपाभरी दृष्टि से सबको अनुगृहीत करते हुए नगर में प्रवेश करने लगे।

श्लोक 11.11

मधुभोजदशार्हार्हकुकुरान्धकवृष्णिभिः । आत्मतुल्यबलैर्गुप्तां नागैर्भोगवतीमिव ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: वह नगर मधु, भोज, दशार्ह, अर्ह, कुकुर, अन्धक और वृष्णिवंश के अपने समान पराक्रमी वीरों से सुरक्षित था, जैसे नागों से भोगवती नगरी सुरक्षित रहती है।

श्लोक 11.12

सर्वर्तुसर्वविभवपुण्यवृक्षलताश्रमैः । उद्यानोपवनारामैर्वृतपद्माकरश्रियम् ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: द्वारका में सभी ऋतुओं के फल-फूल देने वाले वृक्ष, लताएँ, आश्रम, उद्यान, उपवन और कमलों से भरे सरोवर शोभा बढ़ा रहे थे।

श्लोक 11.13

गोपुरद्वारमार्गेषु कृतकौतुकतोरणाम् । चित्रध्वजपताकाग्रैरन्तः प्रतिहतातपाम् ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: नगर के गोपुरों, द्वारों और मार्गों पर मंगल तोरण लगे थे। रंग-बिरंगी ध्वजाओं और पताकाओं की छाया धूप को रोक रही थी।

श्लोक 11.14

सम्मार्जितमहामार्गरथ्यापणकचत्वराम् । सिक्तां गन्धजलैरुप्तां फलपुष्पाक्षताङ्कुरैः ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: मुख्य मार्ग, गलियाँ, बाजार और चौराहे साफ करके सुगन्धित जल से सींचे गए थे; उन पर फल, फूल, अक्षत और अंकुर बिखेरे गए थे।

श्लोक 11.15

द्वारि द्वारि गृहाणां च दध्यक्षतफलेक्षुभिः । अलङ्कृतां पूर्णकुम्भैर्बलिभिर्धूपदीपकैः ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: घर-घर के द्वार दही, अक्षत, फल, गन्ने, पूर्ण कलश, उपहार, धूप और दीपों से सजे थे।

श्लोक 11.16

निशम्य प्रेष्ठमायान्तं वसुदेवो महामनाः । अक्रूरश्चोग्रसेनश्च रामश्चाद्भुतविक्रमः ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्रिय श्रीकृष्ण के आगमन का समाचार सुनकर महामना वसुदेव, अक्रूर, उग्रसेन और अद्भुत पराक्रमी बलराम उत्साहित हो उठे।

श्लोक 11.17

प्रद्युम्नश्चारुदेष्णश्च साम्बो जाम्बवतीसुतः । प्रहर्षवेगोच्छ्वसितशयनासनभोजनाः ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्रद्युम्न, चारुदेष्ण और जाम्बवतीपुत्र साम्ब भी आनन्द से इतने भर गए कि सोना, बैठना और भोजन तक छोड़कर उठ पड़े।

श्लोक 11.18

वारणेन्द्रं पुरस्कृत्य ब्राह्मणैः ससुमङ्गलैः । शङ्खतूर्यनिनादेन ब्रह्मघोषेण चादृताः । प्रत्युज्जग्मू रथैर्हृष्टाः प्रणयागतसाध्वसाः ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: वे मंगलमय सामग्री लिए ब्राह्मणों और एक श्रेष्ठ हाथी को आगे करके रथों से स्वागत को निकले। शंख, वाद्य और वेदमंत्र गूँज रहे थे; प्रेम से सबके हृदय उमड़ रहे थे।

श्लोक 11.19

वारमुख्याश्च शतशो यानैस्तद्दर्शनोत्सुकाः । लसत्कुण्डलनिर्भातकपोलवदनश्रियः ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: नगर की सैकड़ों गणिकाएँ भी दर्शन की उत्सुकता से वाहनों पर निकलीं। उनके झिलमिलाते कुण्डल गालों और मुख की शोभा बढ़ा रहे थे।

श्लोक 11.20

नटनर्तकगन्धर्वाः सूतमागधवन्दिनः । गायन्ति चोत्तमश्लोकचरितान्यद्भुतानि च ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: नट, नर्तक, गायक, सूत, मागध और वन्दीजन भगवान के अद्भुत और पवित्र चरित्रों का गान कर रहे थे।

श्लोक 11.21

भगवांस्तत्र बन्धूनां पौराणामनुवर्तिनाम् । यथाविध्युपसङ्गम्य सर्वेषां मानमादधे ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान ने अपने संबंधियों, नगरवासियों और सेवकों से यथायोग्य मिलकर सबका सम्मान किया।

श्लोक 11.22

प्रह्वाभिवादनाश्लेषकरस्पर्शस्मितेक्षणैः । आश्वास्य चाश्वपाकेभ्यो वरैश्चाभिमतैर्विभुः ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: किसी को झुककर, किसी को प्रणाम करके, किसी को गले लगाकर, हाथ छूकर अथवा मुस्कान भरी दृष्टि से उन्होंने सन्तुष्ट किया। समाज के सबसे उपेक्षित लोगों तक को मनचाहा वर और आश्वासन दिया।

श्लोक 11.23

स्वयं च गुरुभिर्विप्रैः सदारैः स्थविरैरपि । आशीर्भिर्युज्यमानोऽन्यैर्वन्दिभिश्चाविशत्पुरम् ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: गुरुजनों, ब्राह्मणों, उनकी पत्नियों, वृद्धों और अन्य लोगों के आशीर्वाद तथा वन्दीजनों की स्तुति स्वीकारते हुए भगवान नगर में प्रविष्ट हुए।

श्लोक 11.24

राजमार्गं गते कृष्णे द्वारकायाः कुलस्त्रियः । हर्म्याण्यारुरुहुर्विप्राः तदीक्षणमहोत्सवाः ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: श्रीकृष्ण राजमार्ग पर चले तो द्वारका की कुलवधुएँ उनके दर्शन का उत्सव मनाने के लिए महलों की छतों पर चढ़ गईं।

श्लोक 11.25

नित्यं निरीक्षमाणानां यदपि द्वारकौकसाम् । न वितृप्यन्ति हि दृशः श्रियो धामाङ्गमच्युतम् ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: द्वारकावासी प्रतिदिन भगवान को देखते थे, फिर भी सौन्दर्य और ऐश्वर्य के आश्रय उनके स्वरूप को देखकर आँखें कभी तृप्त नहीं होती थीं।

श्लोक 11.26

श्रियो निवासो यस्योरः पानपात्रं मुखं दृशाम् । बाहवो लोकपालानां सारङ्गाणां पदाम्बुजम् ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनका वक्षःस्थल लक्ष्मी का निवास, मुख आँखों के लिए अमृत का पात्र, भुजाएँ लोकपालों का आश्रय और चरणकमल भक्तरूपी भ्रमरों के विश्रामस्थल हैं।

श्लोक 11.27

सितातपत्रव्यजनैरुपस्कृतः प्रसूनवर्षैरभिवर्षितः पथि । पिशङ्गवासा वनमालया बभौ घनो यथार्कोडुपचापवैद्युतैः ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: श्वेत छत्र, चँवर और पुष्पवर्षा के बीच पीताम्बर तथा वनमाला धारण किए भगवान ऐसे शोभित हुए, जैसे मेघ सूर्य, चन्द्रमा, इन्द्रधनुष और बिजली से सुशोभित हो।

श्लोक 11.28

प्रविष्टस्तु गृहं पित्रोः परिष्वक्तः स्वमातृभिः । ववन्दे शिरसा सप्त देवकीप्रमुखा मुदा ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: माता-पिता के घर पहुँचकर उन्होंने देवकी आदि सातों माताओं को सिर झुकाकर प्रणाम किया। माताओं ने उन्हें हर्ष से गले लगा लिया।

श्लोक 11.29

ताः पुत्रमङ्कमारोप्य स्नेहस्नुतपयोधराः । हर्षविह्वलितात्मानः सिषिचुर्नेत्रजैर्जलैः ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: माताओं ने पुत्र को गोद में बिठाया। वात्सल्य से उनके स्तनों से दूध बहने लगा और आनन्द के आँसुओं से उन्होंने श्रीकृष्ण को भिगो दिया।

श्लोक 11.30

अथाविशत्स्वभवनं सर्वकाममनुत्तमम् । प्रासादा यत्र पत्नीनां सहस्राणि च षोडश ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: फिर भगवान अपने सर्वसम्पन्न भवन में गए, जहाँ उनकी सोलह हजार पत्नियों के महल थे।

श्लोक 11.31

पत्न्यः पतिं प्रोष्य गृहानुपागतं विलोक्य सञ्जातमनोमहोत्सवाः । उत्तस्थुरारात्सहसाऽऽसनाशया- त्साकं व्रतैर्व्रीडितलोचनाननाः ॥ ३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्रवास से लौटे पति को देखकर रानियों के मन में आनन्द का उत्सव उमड़ पड़ा। वे लज्जा से मुख और दृष्टि झुकाए, आसन तथा वियोगकालीन नियम छोड़कर उठ खड़ी हुईं।

श्लोक 11.32

तमात्मजैर्दृष्टिभिरन्तरात्मना दुरन्तभावाः परिरेभिरे पतिम् । निरुद्धमप्यास्रवदम्बुनेत्रयो- र्विलज्जतीनां भृगुवर्य वैक्लवात् ॥ ३२॥

सरल हिंदी भावार्थ: अगाध प्रेम से उन्होंने पहले हृदय में, फिर दृष्टि से और फिर पुत्रों के माध्यम से अपने पति का आलिंगन किया। लज्जावश रोकने पर भी प्रेम के आँसू बह निकले।

श्लोक 11.33

यद्यप्यसौ पार्श्वगतो रहोगत- स्तथापि तस्याङ्घ्रियुगं नवं नवम् । पदे पदे का विरमेत तत्पदा- च्चलापि यच्छ्रीर्न जहाति कर्हिचित् ॥ ३३॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान एकान्त में पास रहते हुए भी उनके चरण हर क्षण नए लगते थे। लक्ष्मी भी जिन चरणों को कभी नहीं छोड़तीं, उनसे किसका मन हट सकता है?

श्लोक 11.34

एवं नृपाणां क्षितिभारजन्मना- मक्षौहिणीभिः परिवृत्ततेजसाम् । विधाय वैरं श्वसनो यथानलं मिथो वधेनोपरतो निरायुधः ॥ ३४॥

सरल हिंदी भावार्थ: पृथ्वी पर भार बने शक्तिशाली राजाओं में उन्होंने परस्पर विरोध उत्पन्न किया, जैसे वायु बाँसों में अग्नि जगा देती है। वे राजा आपसी युद्ध से नष्ट हुए और भगवान स्वयं शस्त्र उठाए बिना निवृत्त रहे।

श्लोक 11.35

स एष नरलोकेऽस्मिन्नवतीर्णः स्वमायया । रेमे स्त्रीरत्नकूटस्थो भगवान् प्राकृतो यथा ॥ ३५॥

सरल हिंदी भावार्थ: अपनी माया से मनुष्यलोक में अवतरित भगवान श्रेष्ठ रानियों के बीच सामान्य मनुष्य की तरह गृहस्थ लीला करते रहे।

श्लोक 11.36

उद्दामभावपिशुनामलवल्गुहास- व्रीडावलोकनिहतो मदनोऽपि यासाम् । सम्मुह्य तापमजहात्प्रमदोत्तमास्ता यस्येन्द्रियं विमथितुं कुहकैर्न शेकुः ॥ ३६॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिन श्रेष्ठ रानियों की निर्मल मुस्कान और लज्जाभरी दृष्टि से कामदेव भी मोहित हो जाए, वे भी अपने आकर्षण से भगवान की इन्द्रियों को विचलित नहीं कर सकीं।

श्लोक 11.37

तमयं मन्यते लोको ह्यसङ्गमपि सङ्गिनम् । आत्मौपम्येन मनुजं व्यापृण्वानं यतोऽबुधः ॥ ३७॥

सरल हिंदी भावार्थ: अज्ञानी लोग भगवान को अपने जैसा मानते हैं। इसलिए पूर्णतः अनासक्त होकर लीला करने वाले भगवान को भी संसार में आसक्त समझ बैठते हैं।

श्लोक 11.38

एतदीशनमीशस्य प्रकृतिस्थोऽपि तद्गुणैः । न युज्यते सदाऽऽत्मस्थैर्यथा बुद्धिस्तदाश्रया ॥ ३८॥

सरल हिंदी भावार्थ: ईश्वर की यही प्रभुता है कि प्रकृति में रहकर भी उसके गुणों से नहीं बँधते। उनके आश्रित भक्त की बुद्धि भी अन्तःस्थित भगवान में लगकर उन गुणों से मुक्त होती है।

श्लोक 11.39

तं मेनिरेऽबला मूढाः स्त्रैणं चानुव्रतं रहः । अप्रमाणविदो भर्तुरीश्वरं मतयो यथा ॥ ३९॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान की असीम महिमा को पूर्णतः न जानने वाली रानियाँ प्रेमवश उन्हें केवल अपना एकनिष्ठ पति समझती थीं, जैसे सीमित बुद्धि उनकी ईश्वरता का पूरा अनुमान नहीं कर पाती।

॥ श्रीमद्भागवत महापुराण • प्रथम स्कन्ध • अध्याय 11 समाप्त ॥

प्रथम स्कन्ध • अध्याय 12

परीक्षित का जन्म, नामकरण और भविष्य का वर्णन

श्लोक 12.1

शौनक उवाच । अश्वत्थाम्नोपसृष्टेन ब्रह्मशीर्ष्णोरुतेजसा । उत्तराया हतो गर्भ ईशेनाजीवितः पुनः ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: शौनकजी ने कहा—अश्वत्थामा के छोड़े ब्रह्मास्त्र के प्रचण्ड तेज से उत्तरा के गर्भस्थ बालक का जीवन संकट में पड़ गया था; भगवान ने उसे फिर जीवन प्रदान किया।

श्लोक 12.2

तस्य जन्म महाबुद्धेः कर्माणि च महात्मनः । निधनं च यथैवासीत्स प्रेत्य गतवान् यथा ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: हम उन बुद्धिमान महात्मा परीक्षित का जन्म, कर्म, मृत्यु और मृत्यु के बाद प्राप्त गति जानना चाहते हैं।

श्लोक 12.3

तदिदं श्रोतुमिच्छामो गदितुं यदि मन्यसे । ब्रूहि नः श्रद्दधानानां यस्य ज्ञानमदाच्छुकः ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिन्हें शुकदेवजी ने ज्ञान दिया, उन परीक्षित की कथा हम श्रद्धापूर्वक सुनना चाहते हैं; उचित समझें तो हमें सुनाइए।

श्लोक 12.4

सूत उवाच । अपीपलद्धर्मराजः पितृवद्रञ्जयन् प्रजाः । निःस्पृहः सर्वकामेभ्यः कृष्णपादाब्जसेवया ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: सूतजी बोले—धर्मराज युधिष्ठिर श्रीकृष्ण के चरणकमलों की सेवा से विषयकामनाओं से रहित होकर पिता की तरह प्रजा का पालन और प्रसन्नता सुनिश्चित करते थे।

श्लोक 12.5

सम्पदः क्रतवो लोका महिषी भ्रातरो मही । जम्बूद्वीपाधिपत्यं च यशश्च त्रिदिवं गतम् ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनके पास सम्पत्ति, यज्ञों का वैभव, श्रेष्ठ लोकों की प्राप्ति, रानी, भाई, पृथ्वी का राज्य, जम्बूद्वीप का आधिपत्य और स्वर्ग तक फैला यश था।

श्लोक 12.6

किं ते कामाः सुरस्पार्हा मुकुन्दमनसो द्विजाः । अधिजह्रुर्मुदं राज्ञः क्षुधितस्य यथेतरे ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: किन्तु श्रीकृष्ण में मन लगाए राजा को देवताओं के लिए भी वांछनीय ये भोग विशेष सुख न देते थे, जैसे भूखे मनुष्य को भोजन के अतिरिक्त दूसरी चीजें तृप्त नहीं करतीं।

श्लोक 12.7

मातुर्गर्भगतो वीरस्स तदा भृगुनन्दन । ददर्श पुरुषं कञ्चिद्दह्यमानोऽस्त्रतेजसा ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: हे भृगुवंशी, गर्भ में अस्त्र के तेज से जलते हुए उस वीर बालक ने अपने निकट एक अद्भुत पुरुष को देखा।

श्लोक 12.8

अङ्गुष्ठमात्रममलं स्फुरत्पुरटमौलिनम् । अपीच्यदर्शनं श्यामं तडिद्वाससमच्युतम् ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: वे अँगूठे भर आकार के, निर्मल, चमकते स्वर्णमुकुट से सुशोभित, श्यामवर्ण और बिजली जैसे पीतवस्त्र धारण किए अच्युत भगवान थे।

श्लोक 12.9

श्रीमद्दीर्घचतुर्बाहुं तप्तकाञ्चनकुण्डलम् । क्षतजाक्षं गदापाणिमात्मनः सर्वतो दिशम् । परिभ्रमन्तमुल्काभां भ्रामयन्तं गदां मुहुः ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनकी चार सुन्दर लम्बी भुजाएँ थीं, तपे सोने जैसे कुण्डल थे और नेत्र लालिमा लिए थे। वे बालक के चारों ओर घूमते हुए अग्नि जैसी प्रकाशमान गदा घुमा रहे थे।

श्लोक 12.10

अस्त्रतेजः स्वगदया नीहारमिव गोपतिः । विधमन्तं सन्निकर्षे पर्यैक्षत क इत्यसौ ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: सूर्य जैसे कुहरे को मिटाता है, वैसे वे अपनी गदा से अस्त्र का तेज नष्ट कर रहे थे। बालक निकट से उन्हें देखकर सोच रहा था—ये कौन हैं?

श्लोक 12.11

विधूय तदमेयात्मा भगवान् धर्मगुब्विभुः । मिषतो दशमास्यस्य तत्रैवान्तर्दधे हरिः ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: धर्म के रक्षक, अपरिमेय सामर्थ्य वाले भगवान उस तेज को दूर करके दस महीने के गर्भस्थ बालक के देखते-देखते वहीं अन्तर्धान हो गए।

श्लोक 12.12

ततः सर्वगुणोदर्के सानुकूलग्रहोदये । जज्ञे वंशधरः पाण्डोर्भूयः पाण्डुरिवौजसा ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: फिर शुभ गुणों की वृद्धि कराने वाले अनुकूल ग्रहयोग में पाण्डुवंश का वह उत्तराधिकारी जन्मा, जो तेज में मानो स्वयं पाण्डु जैसा था।

श्लोक 12.13

तस्य प्रीतमना राजा विप्रैर्धौम्यकृपादिभिः । जातकं कारयामास वाचयित्वा च मङ्गलम् ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: आनन्दित युधिष्ठिर ने धौम्य और कृपाचार्य आदि ब्राह्मणों से मंगलवाचन कराकर बालक के जन्म-संस्कार सम्पन्न कराए।

श्लोक 12.14

हिरण्यं गां महीं ग्रामान् हस्त्यश्वान् नृपतिर्वरान् । प्रादात्स्वन्नं च विप्रेभ्यः प्रजातीर्थे स तीर्थवित् ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: दान के उचित अवसर जानने वाले राजा ने पुत्रजन्म के पुण्य अवसर पर ब्राह्मणों को सोना, गायें, भूमि, गाँव, उत्तम हाथी-घोड़े और उत्तम अन्न दान किए।

श्लोक 12.15

तमूचुर्ब्राह्मणास्तुष्टा राजानं प्रश्रयान्वितम् । एष ह्यस्मिन् प्रजातन्तौ पुरूणां पौरवर्षभ ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्रसन्न ब्राह्मणों ने विनयशील युधिष्ठिर से कहा—हे पौरवश्रेष्ठ, आपके इस वंश में उत्पन्न यह बालक अत्यन्त विशेष है।

श्लोक 12.16

दैवेनाप्रतिघातेन शुक्ले संस्थामुपेयुषि । रातो वोऽनुग्रहार्थाय विष्णुना प्रभविष्णुना ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: जब अनिवार्य दैव के प्रभाव से पवित्र पुरुवंश का उत्तराधिकार समाप्त होने को था, तब सामर्थ्यवान विष्णु ने आप पर कृपा करके यह बालक प्रदान किया है।

श्लोक 12.17

तस्मान्नाम्ना विष्णुरात इति लोके बृहच्छ्रवाः । भविष्यति न सन्देहो महाभागवतो महान् ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: इसलिए यह विष्णुरात नाम से विख्यात होगा। निश्चय ही यह महान यशस्वी और श्रेष्ठ भगवद्भक्त बनेगा।

श्लोक 12.18

युधिष्ठिर उवाच । अप्येष वंश्यान् राजर्षीन् पुण्यश्लोकान् महात्मनः । अनुवर्तिता स्विद्यशसा साधुवादेन सत्तमाः ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: युधिष्ठिर ने पूछा—हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो, क्या यह बालक अपने वंश के पुण्यकीर्ति महात्मा राजर्षियों के यश और उत्तम आचरण का अनुसरण करेगा?

श्लोक 12.19

ब्राह्मणा ऊचुः । पार्थ प्रजाविता साक्षादिक्ष्वाकुरिव मानवः । ब्रह्मण्यः सत्यसन्धश्च रामो दाशरथिर्यथा ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: ब्राह्मणों ने कहा—यह मनुपुत्र इक्ष्वाकु के समान प्रजा का रक्षक और दशरथनन्दन श्रीराम के समान ब्राह्मणहितैषी तथा सत्यप्रतिज्ञ होगा।

श्लोक 12.20

एष दाता शरण्यश्च यथा ह्यौशीनरः शिबिः । यशो वितनिता स्वानां दौष्यन्तिरिव यज्वनाम् ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: यह उशीनरपुत्र शिबि के समान दानी और शरणागत का रक्षक होगा; यज्ञकर्ता दुष्यन्तपुत्र भरत की तरह अपने कुल का यश फैलाएगा।

श्लोक 12.21

धन्विनामग्रणीरेष तुल्यश्चार्जुनयोर्द्वयोः । हुताश इव दुर्धर्षः समुद्र इव दुस्तरः ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: यह धनुर्धरों में अग्रणी तथा दोनों अर्जुनों—कार्तवीर्य अर्जुन और पाण्डव अर्जुन—के समान पराक्रमी होगा; अग्नि के समान दुर्जेय और समुद्र के समान दुस्तर होगा।

श्लोक 12.22

मृगेन्द्र इव विक्रान्तो निषेव्यो हिमवानिव । तितिक्षुर्वसुधेवासौ सहिष्णुः पितराविव ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: यह सिंह के समान वीर, हिमालय के समान सबके लिए आश्रययोग्य, पृथ्वी के समान तितिक्षाशील और माता-पिता के समान सहनशील होगा।

श्लोक 12.23

पितामहसमः साम्ये प्रसादे गिरिशोपमः । आश्रयः सर्वभूतानां यथा देवो रमाश्रयः ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: यह समता में ब्रह्मा, शीघ्र प्रसन्न होने में शिव और सब प्राणियों को आश्रय देने में लक्ष्मीपति भगवान जैसा होगा।

श्लोक 12.24

सर्वसद्गुणमाहात्म्ये एष कृष्णमनुव्रतः । रन्तिदेव इवोदारो ययातिरिव धार्मिकः ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: समस्त सद्गुणों में श्रीकृष्ण का अनुगामी, रन्तिदेव जैसा उदार और ययाति जैसा धर्मपरायण होगा।

श्लोक 12.25

धृत्या बलिसमः कृष्णे प्रह्लाद इव सद्ग्रहः । आहर्तैषोऽश्वमेधानां वृद्धानां पर्युपासकः ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: धैर्य में बलि के समान तथा श्रीकृष्ण में अटूट निष्ठा में प्रह्लाद जैसा होगा। यह अश्वमेध यज्ञ करेगा और वृद्धों की सेवा करेगा।

श्लोक 12.26

राजर्षीणां जनयिता शास्ता चोत्पथगामिनाम् । निग्रहीता कलेरेष भुवो धर्मस्य कारणात् ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: यह राजर्षियों का जनक और कुमार्ग पर चलने वालों का शासक होगा। पृथ्वी पर धर्म की रक्षा के लिए कलियुग के अधर्म को नियंत्रित करेगा।

श्लोक 12.27

तक्षकादात्मनो मृत्युं द्विजपुत्रोपसर्जितात् । प्रपत्स्यत उपश्रुत्य मुक्तसङ्गः पदं हरेः ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: जब इसे ब्राह्मणपुत्र के शाप से तक्षक के द्वारा अपनी मृत्यु का समाचार मिलेगा, तब आसक्ति छोड़कर भगवान के चरणों की शरण लेगा।

श्लोक 12.28

जिज्ञासितात्मयाथात्म्यो मुनेर्व्याससुतादसौ । हित्वेदं नृप गङ्गायां यास्यत्यद्धाकुतोभयम् ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: व्यासपुत्र शुकदेवजी से आत्मतत्त्व जानकर यह गङ्गातट पर शरीर त्यागेगा और निश्चय ही निर्भय परम पद प्राप्त करेगा।

श्लोक 12.29

इति राज्ञ उपादिश्य विप्रा जातककोविदाः । लब्धापचितयः सर्वे प्रतिजग्मुः स्वकान् गृहान् ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: जन्मफल के ज्ञाता ब्राह्मण राजा को यह सब बताकर और सम्मान प्राप्त करके अपने-अपने घर लौट गए।

श्लोक 12.30

स एष लोके विख्यातः परीक्षिदिति यत्प्रभुः । गर्भे दृष्टमनुध्यायन् परीक्षेत नरेष्विह ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: गर्भ में देखे हुए प्रभु का स्मरण करके वह लोगों को परखता रहता था कि कहीं यही तो वे नहीं हैं; इसलिए संसार में परीक्षित नाम से प्रसिद्ध हुआ।

श्लोक 12.31

स राजपुत्रो ववृधे आशु शुक्ल इवोडुपः । आपूर्यमाणः पितृभिः काष्ठाभिरिव सोऽन्वहम् ॥ ३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: परिजनों के पालन-पोषण से वह राजकुमार दिन-प्रतिदिन वैसे ही बढ़ता गया, जैसे शुक्लपक्ष का चन्द्रमा अपनी कलाओं से पूर्ण होता है।

श्लोक 12.32

यक्ष्यमाणोऽश्वमेधेन ज्ञातिद्रोहजिहासया । राजालब्धधनो दध्यावन्यत्र करदण्डयोः ॥ ३२॥

सरल हिंदी भावार्थ: स्वजनों के प्रति हुए युद्धजन्य अपराध का प्रायश्चित्त करने के लिए युधिष्ठिर अश्वमेध करना चाहते थे। पर्याप्त धन न होने से उन्होंने कर और दण्ड के अतिरिक्त किसी अन्य साधन पर विचार किया।

श्लोक 12.33

तदभिप्रेतमालक्ष्य भ्रातरोऽच्युतचोदिताः धनं प्रहीणमाजह्रुरुदीच्यां दिशि भूरिशः ॥ ३३॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनकी इच्छा जानकर श्रीकृष्ण की प्रेरणा से भाइयों ने उत्तर दिशा में छोड़ा हुआ बहुत-सा धन लाकर दिया।

श्लोक 12.34

तेन सम्भृतसम्भारो धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः । वाजिमेधैस्त्रिभिर्भीतो यज्ञैः समयजद्धरिम् ॥ ३४॥

सरल हिंदी भावार्थ: उस धन से यज्ञ की सामग्री जुटाकर धर्मपुत्र युधिष्ठिर ने स्वजनवध के पाप की आशंका दूर करने के लिए तीन अश्वमेध यज्ञों द्वारा श्रीहरि की आराधना की।

श्लोक 12.35

आहूतो भगवान् राज्ञा याजयित्वा द्विजैर्नृपम् । उवास कतिचिन्मासान् सुहृदां प्रियकाम्यया ॥ ३५॥

सरल हिंदी भावार्थ: राजा के निमन्त्रण पर श्रीकृष्ण ने ब्राह्मणों से उनके यज्ञ सम्पन्न कराए और प्रियजनों को प्रसन्न रखने के लिए कुछ महीने वहीं रहे।

श्लोक 12.36

ततो राज्ञाभ्यनुज्ञातः कृष्णया सहबन्धुभिः । ययौ द्वारवतीं ब्रह्मन् सार्जुनो यदुभिर्वृतः ॥ ३६॥

सरल हिंदी भावार्थ: फिर राजा, द्रौपदी और अन्य स्वजनों की अनुमति लेकर भगवान अर्जुन तथा यदुवंशियों के साथ द्वारका लौट गए।

॥ श्रीमद्भागवत महापुराण • प्रथम स्कन्ध • अध्याय 12 समाप्त ॥

प्रेम, अनासक्ति और भगवान का आश्रय

इन अध्यायों में भक्तों का प्रेम विदाई और स्वागत दोनों में प्रकट होता है। भगवान सबका आदर करते हैं, फिर भी संसार के गुणों से बँधते नहीं। परीक्षित की कथा में गर्भ से लेकर जीवन के अन्त तक भगवान के आश्रय का सूत्र दिखाई देता है।

पाठाधार और संपादकीय जानकारी

मूल संस्कृत पाठ का आधार Sanskrit Documents का “श्रीमद्भागवतं—प्रथमस्कन्धः” है। अध्याय 11 के श्लोक-क्रम का संस्कृत विकिस्रोत से मिलान किया गया है। आधार-पाठ में “नित्यं निरीक्षमाणानां” वाले श्लोक की संख्या 26 दोहराई गई है; क्रम-मिलान के अनुसार यहाँ 25 रखी गई है। कोष्ठकों में दिया अतिरिक्त पाठ और वैकल्पिक पाठान्तर मुख्य पाठ में नहीं जोड़े गए हैं। हिंदी भावार्थ भक्ति भावना की स्वतंत्र संपादकीय प्रस्तुति है; यह किसी आधुनिक टीका की प्रतिलिपि नहीं है। यह प्रथम स्कन्ध का चौथा क्रमिक भाग है।

अगला भाग: अध्याय 13–15 — विदुर उपदेश और पाण्डव प्रस्थान →

भक्ति भावना • मूल पाठ और सरल हिंदी भावार्थ

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