श्रीमद्भागवत महापुराण पंचम स्कन्ध भाग 3 — अध्याय 16–17, भुवनकोश और गंगा महिमा

॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण
पंचम स्कन्ध • भाग 3

अध्याय 16–17 • भुवनकोश, गंगा महिमा और सङ्कर्षण-स्तुति

52 क्रमाङ्कित मूल पाठ • प्रत्येक का सरल हिंदी भावार्थ

पिछले भाग में भरत चरित्र, जड़भरत–रहूगण संवाद और संसारवन रूपक पढ़ा। अब राजा परीक्षित के प्रश्न पर शुकदेवजी जम्बूद्वीप, मेरु और दिव्य प्रदेशों का वर्णन करते हैं। उसके बाद भगवत्पदी गंगा की धाराओं और भगवान शिव की सङ्कर्षण-स्तुति का पाठ आता है।

पंचम स्कन्ध • अध्याय 16
जम्बूद्वीप और मेरु का वर्णन

मूल पाठ 16.1

राजोवाच । उक्तस्त्वया भूमण्डलायामविशेषो यावदादित्यस्तपति यत्र चासौ ज्योतिषां गणैश्चन्द्रमा वा सह दृश्यते ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: राजा परीक्षित ने कहा—आपने भूमण्डल के उस विस्तार का उल्लेख किया है जहाँ सूर्य का प्रकाश पहुँचता है और जहाँ चन्द्रमा तथा अन्य ज्योतिष्पिण्ड दिखाई देते हैं। अब मैं उसका विशेष विवरण सुनना चाहता हूँ।

मूल पाठ 16.2

तत्रापि प्रियव्रतरथचरणपरिखातैः सप्तभिः सप्त सिन्धव उपकॢप्ता यत एतस्याः सप्तद्वीपविशेषविकल्पस्त्वया भगवन्खलु सूचित एतदेवाखिलमहं मानतो लक्षणतश्च सर्वं विजिज्ञासामि ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवन्! आपने बताया कि प्रियव्रत के रथ के पहियों से बनी सात खाइयों के कारण सात समुद्र और सात द्वीपों का विभाग हुआ। उनके परिमाण, स्वरूप और विशेष लक्षणों को मैं विस्तार से जानना चाहता हूँ।

मूल पाठ 16.3

भगवतो गुणमये स्थूलरूप आवेशितं मनो ह्यगुणेऽपि सूक्ष्मतम आत्मज्योतिषि परे ब्रह्मणि भगवति वासुदेवाख्ये क्षममावेशितुं तदु हैतद्गुरोऽर्हस्यनुवर्णयितुमिति ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: गुरुदेव! भगवान के गुणमय स्थूल विश्वरूप में एकाग्र किया गया मन आगे चलकर गुणों से परे, अत्यन्त सूक्ष्म, स्वयंप्रकाश परम ब्रह्म वासुदेव में भी स्थिर होने योग्य बनता है। इसलिए कृपा करके यह वर्णन कीजिए।

मूल पाठ 16.4

ऋषिरुवाच । न वै महाराज भगवतो मायागुणविभूतेः काष्ठां मनसा वचसा वाधिगन्तुमलं विबुधायुषापि पुरुषस्तस्मात्प्राधान्येनैव भूगोलक-विशेषं नामरूपमानलक्षणतो व्याख्यास्यामः ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: शुकदेवजी ने कहा—महाराज! देवताओं के समान दीर्घ आयु पाकर भी मनुष्य मन और वाणी से भगवान की मायामयी विभूति का अन्त नहीं पा सकता। इसलिए मैं इस भूगोल के मुख्य विभागों का नाम, रूप, परिमाण और लक्षणों के अनुसार वर्णन करूँगा।

मूल पाठ 16.5

यो वायं द्वीपः कुवलयकमलकोशाभ्यन्तरकोशो नियुतयोजनविशालः समवर्तुलो यथा पुष्करपत्रम् ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: यह जम्बूद्वीप भूमण्डलरूपी कमल के भीतर के कोश के समान है। पुराण में इसका विस्तार एक लाख योजन बताया गया है और इसका आकार कमलपत्र की तरह गोल कहा गया है।

मूल पाठ 16.6

यस्मिन्नव वर्षाणि नवयोजनसहस्रायामान्यष्टभिर्मर्यादागिरिभिः सुविभक्तानि भवन्ति ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: इस द्वीप में नौ वर्ष अर्थात् नौ भूभाग हैं। प्रत्येक का विस्तार नौ हजार योजन बताया गया है। आठ सीमा-पर्वत इन्हें एक-दूसरे से अलग करते हैं। यहाँ “वर्ष” शब्द भूभाग के अर्थ में है।

मूल पाठ 16.7

एषां मध्ये इलावृतं नामाभ्यन्तरवर्षं यस्य नाभ्यामवस्थितः सर्वतः सौवर्णः कुलगिरिराजो मेरुर्द्वीपायामसमुन्नाहः कर्णिकाभूतः कुवलयकमलस्य मूर्धनि द्वात्रिंशत्सहस्रयोजनविततो मूले षोडशसहस्रं तावतान्तर्भूम्यां प्रविष्टः ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: इन भूभागों के बीच इलावृतवर्ष है। उसके मध्य में स्वर्णमय पर्वतराज मेरु स्थित है, जो भूमण्डलरूपी कमल की कर्णिका के समान कहा गया है। उसकी ऊँचाई द्वीप के विस्तार के बराबर, शिखर की चौड़ाई बत्तीस हजार योजन और मूल की चौड़ाई सोलह हजार योजन बताई गई है। उतना ही भाग भूमि के भीतर प्रविष्ट है।

मूल पाठ 16.8

उत्तरोत्तरेणेलावृतं नीलः श्वेतः शृङ्गवानिति त्रयो रम्यकहिरण्मय-कुरूणां वर्षाणां मर्यादागिरयः प्रागायता उभयतः क्षारोदावधयो द्विसहस्रपृथव एकैकशः पूर्वस्मात्पूर्वस्मादुत्तर उत्तरो दशांशाधिकांशेन दैर्घ्य एव ह्रसन्ति ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: इलावृत के उत्तर में क्रमशः नील, श्वेत और शृङ्गवान् पर्वत हैं। ये रम्यक, हिरण्मय और उत्तरकुरु की सीमाएँ बनाते हैं। पूर्व-पश्चिम दिशा में समुद्र तक फैले इन पर्वतों की चौड़ाई दो हजार योजन कही गई है। उत्तर की ओर जाते हुए इनकी लम्बाई क्रमशः घटती जाती है।

मूल पाठ 16.9

एवं दक्षिणेनेलावृतं निषधो हेमकूटो हिमालय इति प्रागायता यथा नीलादयोऽयुतयोजनोत्सेधा हरिवर्षकिम्पुरुषभारतानां यथासङ्ख्यम् ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: इसी प्रकार इलावृत के दक्षिण में निषध, हेमकूट और हिमालय पर्वत हैं। ये क्रमशः हरिवर्ष, किम्पुरुषवर्ष और भारतवर्ष की सीमाएँ बनाते हैं। नील आदि की भाँति इनका फैलाव पूर्व-पश्चिम है और ऊँचाई दस हजार योजन बताई गई है।

मूल पाठ 16.10

तथैवेलावृतमपरेण पूर्वेण च माल्यवद्गन्धमादनावानीलनिषधायतौ द्विसहस्रं पप्रथतुः केतुमालभद्राश्वयोः सीमानं विदधाते ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: इलावृत के पश्चिम और पूर्व में क्रमशः माल्यवान् तथा गन्धमादन पर्वत हैं। ये उत्तर के नील से दक्षिण के निषध तक फैले हैं। इनका विस्तार दो हजार योजन कहा गया है और ये क्रमशः केतुमाल तथा भद्राश्व की सीमाएँ बनाते हैं।

मूल पाठ 16.11

मन्दरो मेरुमन्दरः सुपार्श्वः कुमुद इत्ययुतयोजनविस्तारोन्नाहा मेरोश्चतुर्दिशमवष्टम्भगिरय उपकॢप्ताः ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: मेरु की चार दिशाओं में मन्दर, मेरुमन्दर, सुपार्श्व और कुमुद नामक पर्वत उसके आधार या सहारे के समान स्थित बताए गए हैं। प्रत्येक की ऊँचाई और विस्तार दस हजार योजन कहा गया है।

मूल पाठ 16.12

चतुर्ष्वेतेषु चूतजम्बूकदम्बन्यग्रोधाश्चत्वारः पादपप्रवराः पर्वतकेतव इवाधिसहस्रयोजनोन्नाहास्तावद्विटपविततयः शतयोजनपरिणाहाः ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: इन चार पर्वतों पर क्रमशः आम, जामुन, कदम्ब और वट के चार विशाल वृक्ष पर्वतों की ध्वजाओं के समान हैं। इनकी ऊँचाई और शाखाओं का फैलाव एक हजार योजन से अधिक तथा तनों का घेरा सौ योजन कहा गया है।

मूल पाठ 16.13

ह्रदाश्चत्वारः पयोमध्विक्षुरसमृष्टजला यदुपस्पर्शिन उपदेवगणा योगैश्वर्याणि स्वाभाविकानि भरतर्षभ धारयन्ति ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ दूध, मधु, ईख के रस और मधुर जल के चार सरोवर वर्णित हैं। हे भरतश्रेष्ठ! पुराण के अनुसार उनका सेवन या स्पर्श करने वाले उपदेवगण स्वाभाविक योग-ऐश्वर्यों से सम्पन्न होते हैं। यह दिव्यलोक के वर्णन का प्रसंग है।

मूल पाठ 16.14

देवोद्यानानि च भवन्ति चत्वारि नन्दनं चैत्ररथं वैभ्राजकं सर्वतोभद्रमिति ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ नन्दन, चैत्ररथ, वैभ्राजक और सर्वतोभद्र नाम के चार दिव्य उद्यान भी बताए गए हैं।

मूल पाठ 16.15

येष्वमरपरिवृढाः सह सुरललनाललामयूथपतय उपदेवगणैरुपगीयमानमहिमानः किल विहरन्ति ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: इन उद्यानों में प्रमुख देवता श्रेष्ठ देवाङ्गनाओं के साथ विहार करते हैं। उपदेवगण उनके गुण और महिमा का गायन करते रहते हैं।

मूल पाठ 16.16

मन्दरोत्सङ्ग एकादशशतयोजनोत्तुङ्गदेवचूतशिरसो गिरिशिखरस्थूलानि फलान्यमृतकल्पानि पतन्ति ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: मन्दर पर्वत पर स्थित ग्यारह सौ योजन ऊँचे दिव्य आम्रवृक्ष से पर्वत-शिखरों के समान बड़े और अमृततुल्य फल गिरते हैं—ऐसा इस दिव्य प्रदेश का वर्णन है।

मूल पाठ 16.17

तेषां विशीर्यमाणानामतिमधुरसुरभिसुगन्धिबहुलारुणरसोदेनारुणोदा नाम नदी मन्दरगिरिशिखरान्निपतन्ती पूर्वेणेलावृतमुपप्लावयति ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: गिरकर फूटे हुए उन फलों के अत्यन्त मधुर और सुगन्धित लाल रस से अरुणोदा नामक नदी बनती है। वह मन्दर के शिखर से उतरकर इलावृत के पूर्वी भाग को सींचती है।

मूल पाठ 16.18

यदुपजोषणाद्भवान्या अनुचरीणां पुण्यजनवधूनामवयवस्पर्शसुगन्धवातो दशयोजनं समन्तादनुवासयति ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: उस रस का सेवन करने वाली भवानी की परिचारिकाओं और यक्ष-पत्नियों के शरीर से ऐसी सुगन्ध निकलती है कि उन्हें छूकर बहने वाली वायु दस योजन तक का प्रदेश सुगन्धित कर देती है—यहाँ दिव्य सुगन्ध का गौरव कहा गया है।

मूल पाठ 16.19

एवं जम्बूफलानामत्युच्चनिपातविशीर्णानामनस्थिप्रायाणामिभकायनिभानां रसेन जम्बू नाम नदी मेरुमन्दरशिखरादयुतयोजनादवनितले निपतन्ती दक्षिणेनात्मानं यावदिलावृतमुपस्यन्दयति ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: इसी प्रकार हाथियों के शरीर के समान बड़े और अत्यल्प बीज वाले जामुन ऊँचाई से गिरकर फूटते हैं। उनके रस से जम्बू नदी बनती है। वह दस हजार योजन ऊँचे मेरुमन्दर से उतरकर इलावृत के दक्षिणी भाग को सींचती है।

मूल पाठ 16.20

तावदुभयोरपि रोधसोर्या मृत्तिका तद्रसेनानुविध्यमाना वाय्वर्कसंयोगविपाकेन सदामरलोकाभरणं जाम्बूनदं नाम सुवर्णं भवति ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: उस नदी के दोनों किनारों की मिट्टी फलरस से भीगकर वायु और सूर्य के संयोग से जाम्बूनद नामक स्वर्ण बनती है। पुराण में इसे देवलोक के आभूषणों के लिए विशेष स्वर्ण कहा गया है।

मूल पाठ 16.21

यदु ह वाव विबुधादयः सह युवतिभिर्मुकुटकटककटिसूत्राद्याभरणरूपेण खलु धारयन्ति ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: देवता और उनकी देवियाँ उसी जाम्बूनद स्वर्ण के बने मुकुट, कङ्कण, करधनी आदि आभूषण धारण करते हैं।

मूल पाठ 16.22

यस्तु महाकदम्बः सुपार्श्वनिरूढो यास्तस्य कोटरेभ्यो विनिःसृताः पञ्चायामपरिणाहाः पञ्च मधुधाराः सुपार्श्वशिखरात्पतन्त्योऽपरेणात्मानमिलावृतमनुमोदयन्ति ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: सुपार्श्व पर्वत पर विशाल कदम्ब वृक्ष है। उसके कोटरों से निकलने वाली पाँच मधुधाराएँ, जिनका विस्तार पाँच योजन बताया गया है, पर्वत से उतरकर इलावृत के पश्चिमी भाग को आनन्दित करती हैं।

मूल पाठ 16.23

या ह्युपयुञ्जानानां मुखनिर्वासितो वायुः समन्ताच्छतयोजनमनुवासयति ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन मधुधाराओं का सेवन करने वालों के मुख से निकलने वाली सुगन्धित वायु सौ योजन तक के प्रदेश को सुगन्धित करती है—यह उस दिव्य मधु की महिमा का वर्णन है।

मूल पाठ 16.24

एवं कुमुदनिरूढो यः शतवल्शो नाम वटस्तस्य स्कन्धेभ्यो नीचीनाः पयोदधिमधुघृतगुडान्नाद्यम्बरशय्यासनाभरणादयः सर्व एव कामदुघा नदाः कुमुदाग्रात्पतन्तस्तमुत्तरेणेलावृतमुपयोजयन्ति ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: कुमुद पर्वत पर शतवल्श नामक वटवृक्ष है। उसकी शाखाओं से नीचे की ओर बहती दिव्य धाराएँ दूध, दही, मधु, घृत, गुड़, अन्न, वस्त्र, शय्या, आसन और आभूषण आदि इच्छित वस्तुएँ प्रदान करने वाली कही गई हैं। वे इलावृत के उत्तरी भाग को उपकृत करती हैं।

मूल पाठ 16.25

यानुपजुषाणानां न कदाचिदपि प्रजानां वलीपलितक्लमस्वेददौर्गन्ध्यजरामयमृत्युशीतोष्णवैवर्ण्योपसर्गादयस्तापविशेषा भवन्ति यावज्जीवं सुखं निरतिशयमेव ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन दिव्य धाराओं का सेवन करने वाली प्रजाओं के विषय में कहा गया है कि वे झुर्रियों, सफेद बाल, थकान, पसीने, दुर्गन्ध, वृद्धावस्था, रोग, मृत्यु, शीत-उष्ण और शरीर की विकृति जैसे कष्टों से रहित होकर जीवनपर्यन्त अत्यन्त सुख पाती हैं। यह ग्रन्थ के दिव्यलोक-वर्णन का कथन है।

मूल पाठ 16.26

कुरङ्गकुररकुसुम्भवैकङ्कत्रिकूटशिशिरपतङ्गरुचकनिषधशिनीवास-कपिलशङ्खवैदूर्यजारुधिहंसऋषभनागकालञ्जरनारदादयो विंशतिगिरयो मेरोः कर्णिकाया इव केसरभूता मूलदेशे परित उपकॢप्ताः ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: मेरु के मूल के चारों ओर कुरङ्ग, कुरर, कुसुम्भ, वैकङ्क, त्रिकूट, शिशिर, पतङ्ग, रुचक, निषध, शिनीवास, कपिल, शङ्ख, वैदूर्य, जारुधि, हंस, ऋषभ, नाग, कालञ्जर और नारद आदि बीस पर्वत स्थित बताए गए हैं। वे कमल की कर्णिका के चारों ओर के केसरों के समान शोभा देते हैं।

मूल पाठ 16.27

जठरदेवकूटौ मेरुं पूर्वेणाष्टादशयोजनसहस्रमुदगायतौ द्विसहस्रं पृथुतुङ्गौ भवतः एवमपरेण पवनपारियात्रौ दक्षिणेन कैलासकरवीरौ प्रागायतावेवमुत्तरतस्त्रिशृङ्गमकरावष्टभिरेतैः परिसृतोऽग्निरिव परितश्चकास्ति काञ्चनगिरिः ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: मेरु के पूर्व में जठर और देवकूट पर्वत उत्तर-दक्षिण दिशा में अठारह हजार योजन लम्बे तथा दो हजार योजन चौड़े और ऊँचे हैं। पश्चिम में पवन और पारियात्र, दक्षिण में कैलास और करवीर तथा उत्तर में त्रिशृङ्ग और मकर पर्वत हैं। दक्षिण और उत्तर के ये पर्वत पूर्व-पश्चिम दिशा में फैले हैं। इन आठ पर्वतों से घिरा स्वर्णमय मेरु अग्नि के समान शोभित होता है।

मूल पाठ 16.28

मेरोर्मूर्धनि भगवत आत्मयोनेर्मध्यत उपकॢप्तां पुरीमयुतयोजनसाहस्रीं समचतुरस्रां शातकौम्भीं वदन्ति ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: मेरु के शिखर के मध्य में स्वयंभू ब्रह्माजी की स्वर्णमयी नगरी बताई गई है। वह चौकोर है और उसका परिमाण दस हजार योजन कहा गया है।

मूल पाठ 16.29

तामनुपरितो लोकपालानामष्टानां यथादिशं यथारूपं तुरीयमानेन पुरोऽष्टावुपकॢप्ताः ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: उस ब्रह्मपुरी के चारों ओर आठों दिशाओं में आठ लोकपालों की आठ नगरियाँ स्थित कही गई हैं। प्रत्येक अपने लोकपाल के अनुरूप है और ब्रह्मपुरी के परिमाण के चौथाई आकार की है।

॥ पंचम स्कन्ध का अध्याय 16 समाप्त ॥

पंचम स्कन्ध • अध्याय 17
गंगा की धाराएँ और शिव की सङ्कर्षण-स्तुति

मूल पाठ 17.1

श्रीशुक उवाच । तत्र भगवतः साक्षाद्यज्ञलिङ्गस्य विष्णोर्विक्रमतो वामपादाङ्गुष्ठनख-निर्भिन्नोर्ध्वाण्डकटाहविवरेणान्तःप्रविष्टा या बाह्यजलधारा तच्चरण-पङ्कजावनेजनारुणकिञ्जल्कोपरञ्जिताखिलजगदघमलापहोपस्पर्शनामला साक्षाद्भगवत्पदीत्यनुपलक्षितवचोऽभिधीयमानातिमहता कालेन युगसहस्रोपलक्षणेन दिवो मूर्धन्यवततार यत्तद्विष्णुपदमाहुः ॥१॥

सरल हिंदी भावार्थ: शुकदेवजी कहते हैं—त्रिविक्रम रूप में भगवान विष्णु का चरण ऊपर उठा तो बाएँ पैर के अँगूठे के नख से ब्रह्माण्ड का ऊपरी आवरण भेद गया। उस छिद्र से भीतर आई बाहरी जलधारा उनके चरणकमलों को धोकर उनके लाल पराग से रँग गई। जिसके स्पर्श से जगत के पाप-मल दूर होने का वर्णन है, वह निर्मल धारा भगवान के चरणों से प्रकट होने के कारण भगवत्पदी कहलाती है। एक सहस्र युग के दीर्घ काल के बाद वह स्वर्ग के शिरोभाग में विष्णुपद नामक दिव्य स्थान पर उतरी।

मूल पाठ 17.2

यत्र ह वाव वीरव्रत औत्तानपादिः परमभागवतोऽस्मत्कुलदेवता-चरणारविन्दोदकमिति यामनुसवनमुत्कृष्यमाणभगवद्भक्तियोगेन दृढं क्लिद्यमानान्तर्हृदय औत्कण्ठ्यविवशामीलितलोचनयुगल-कुड्मलविगलितामलबाष्पकलयाभिव्यज्यमानरोमपुलककुलकोऽधुनापि परमादरेण शिरसा बिभर्ति ॥२॥

सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ उत्तानपाद के पुत्र परम भक्त ध्रुव उसे अपने आराध्य के चरणकमलों का जल मानकर आज भी बड़े आदर से सिर पर धारण करते हैं। निरन्तर बढ़ती भक्ति से उनका हृदय द्रवित होता है, प्रेम की उत्कण्ठा में नेत्र मूँद जाते हैं, निर्मल आँसू बहते हैं और शरीर पुलकित हो उठता है।

मूल पाठ 17.3

ततः सप्त ऋषयस्तत्प्रभावाभिज्ञा यां ननु तपस आत्यन्तिकी सिद्धिरेतावती भगवति सर्वात्मनि वासुदेवेऽनुपरतभक्तियोगलाभेनैवोपेक्षितान्यार्थात्मगतयो मुक्तिमिवागतां मुमुक्षव इव सबहुमानमद्यापि जटाजूटैरुद्वहन्ति ॥३॥

सरल हिंदी भावार्थ: उसके बाद सप्तर्षि उस धारा को अपनी जटाओं में आदरपूर्वक धारण करते हैं। वे उसके प्रभाव को जानते हैं और सर्वात्मा वासुदेव में अटूट भक्ति की प्राप्ति को ही तपस्या की परम सिद्धि मानते हैं। अन्य इच्छाओं से उदासीन वे उसका सम्मान ऐसे करते हैं, जैसे मुक्ति चाहने वाला सामने आई मुक्ति का करता है।

मूल पाठ 17.4

ततोऽनेकसहस्रकोटिविमानानीकसङ्कुलदेवयानेनावतरन्तीन्दुमण्डलमावार्य ब्रह्मसदने निपतति ॥४॥

सरल हिंदी भावार्थ: फिर वह असंख्य दिव्य विमानों से भरे देवयान मार्ग से उतरती हुई चन्द्रमण्डल को व्याप्त करके ब्रह्मा के सदन में गिरती है। यह पुराण के दिव्य लोकों का वर्णन है।

मूल पाठ 17.5

तत्र चतुर्धा भिद्यमाना चतुर्भिर्नामभिश्चतुर्दिशमभिस्पन्दन्ती नदनदीपतिमेवाभिनिविशति सीतालकनन्दा चक्षुर्भद्रेति ॥५॥

सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ से वह चार धाराओं में बँटकर सीता, अलकनन्दा, चक्षु और भद्रा नामों से चारों दिशाओं में बहती है और अन्ततः नदियों के स्वामी समुद्र में मिलती है।

मूल पाठ 17.6

सीता तु ब्रह्मसदनात्केसराचलादिगिरिशिखरेभ्योऽधोऽधः प्रस्रवन्ती गन्धमादनमूर्धसु पतित्वान्तरेण भद्राश्ववर्षं प्राच्यां दिशि क्षारसमुद्रमभिप्रविशति ॥६॥

सरल हिंदी भावार्थ: सीता नामक धारा ब्रह्मा के सदन से केसराचल आदि पर्वतों के शिखरों पर उतरती है। गन्धमादन के ऊपर से बहकर वह भद्राश्ववर्ष के बीच से पूर्व दिशा के खारे समुद्र में प्रवेश करती है।

मूल पाठ 17.7

एवं माल्यवच्छिखरान्निष्पतन्ती ततोऽनुपरतवेगा केतुमालमभि चक्षुः प्रतीच्यां दिशि सरित्पतिं प्रविशति ॥७॥

सरल हिंदी भावार्थ: चक्षु नामक धारा माल्यवान पर्वत के शिखर से निकलकर अविराम वेग से केतुमालवर्ष की ओर बहती है और पश्चिम दिशा के समुद्र में मिलती है।

मूल पाठ 17.8

भद्रा चोत्तरतो मेरुशिरसो निपतिता गिरिशिखराद्गिरिशिखरमतिहाय शृङ्गवतः शृङ्गादवस्यन्दमाना उत्तरांस्तु कुरूनभित उदीच्यां दिशि जलधिमभिप्रविशति ॥८॥

सरल हिंदी भावार्थ: भद्रा धारा मेरु के शिखर से उत्तर की ओर गिरकर एक पर्वत-शिखर से दूसरे को पार करती है। शृङ्गवान पर्वत से नीचे उतरकर उत्तरकुरु के प्रदेश से होती हुई उत्तरी समुद्र में प्रवेश करती है।

मूल पाठ 17.9

तथैवालकनन्दा दक्षिणेन ब्रह्मसदनाद्बहूनि गिरिकूटान्यतिक्रम्य हेमकूटाद्धैमकूटान्यतिरभसतररंहसा लुठयन्ती भारतमभिवर्षं दक्षिणस्यां दिशि जलधिमभिप्रविशति यस्यां स्नानार्थं चागच्छतः पुंसः पदे पदेऽश्वमेधराजसूयादीनां फलं न दुर्लभमिति ॥९॥

सरल हिंदी भावार्थ: अलकनन्दा ब्रह्मा के सदन से दक्षिण की ओर अनेक पर्वत-शिखरों को पार करती है। हेमकूट और हिमालय के पर्वतों पर अत्यन्त वेग से बहती हुई भारतवर्ष में आती है और दक्षिण के समुद्र में मिलती है। ग्रंथ इसकी स्नान-यात्रा की महिमा बताते हुए प्रत्येक पग का गौरव अश्वमेध और राजसूय आदि यज्ञों के फल के समान कहता है।

मूल पाठ 17.10

अन्ये च नदा नद्यश्च वर्षे वर्षे सन्ति बहुशो मेर्वादिगिरिदुहितरः शतशः ॥१०॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्रत्येक वर्ष अर्थात् इन विशाल भू-प्रदेशों में मेरु आदि पर्वतों से निकलने वाले सैकड़ों अन्य नद और नदियाँ भी हैं।

मूल पाठ 17.11

तत्रापि भारतमेव वर्षं कर्मक्षेत्रमन्यान्यष्ट वर्षाणि स्वर्गिणां पुण्यशेषोपभोगस्थानानि भौमानि स्वर्गपदानि व्यपदिशन्ति ॥११॥

सरल हिंदी भावार्थ: इनमें भारतवर्ष को कर्मक्षेत्र कहा गया है। शेष आठ वर्ष स्वर्गवासियों के बचे हुए पुण्य के भोग-स्थान माने गए हैं; इसी कारण पुराण उन्हें पृथ्वी पर स्थित स्वर्ग-सदृश प्रदेश कहता है।

मूल पाठ 17.12

एषु पुरुषाणामयुतपुरुषायुर्वर्षाणां देवकल्पानां नागायुतप्राणानां वज्रसंहननबलवयोमोदप्रमुदितमहासौरतमिथुनव्यवायापवर्गवर्षधृतैकगर्भकलत्राणां तत्र तु त्रेतायुगसमः कालो वर्तते ॥१२॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन आठ प्रदेशों के निवासियों का पुराण में देवताओं के समान वर्णन है—दस हजार वर्ष की आयु, दस हजार हाथियों के समान प्राणबल, वज्र-समान सुदृढ़ शरीर और स्थिर यौवन। वे दाम्पत्य सुख में प्रसन्न रहते हैं और उनकी पत्नियाँ जीवन के अन्तिम वर्ष में एक बार गर्भ धारण करती हैं। वहाँ काल की स्थिति त्रेतायुग जैसी कही गई है।

मूल पाठ 17.13

यत्र ह देवपतयः स्वैः स्वैर्गणनायकैर्विहितमहार्हणाः सर्वर्तुकुसुमस्तबकफलकिसलयश्रियानम्यमानविटपलताविटपिभिरुपशुम्भमानरुचिरकाननाश्रमायतनवर्षगिरिद्रोणीषु तथा चामलजलाशयेषु विकचविविधनववनरुहामोदमुदितराजहंसजलकुक्कुटकारण्डवसारसचक्रवाकादिभिर्मधुकरनिकराकृतिभिरुपकूजितेषु जलक्रीडादिभिर्विचित्रविनोदैः सुललितसुरसुन्दरीणां कामकलिलविलासहासलीलावलोकाकृष्टमनोदृष्टयः स्वैरं विहरन्ति ॥१३॥

सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ अपने गणनायकों से सम्मानित देवाधिपति रमणीय वनों, आश्रमों, निवासों और पर्वतीय घाटियों में विहार करते हैं। सभी ऋतुओं के फूलों, फलों और कोमल पत्तों से लदे वृक्ष तथा लताएँ शोभा बढ़ाते हैं। निर्मल सरोवरों में खिले कमलों की सुगन्ध, हंसों और अन्य जल-पक्षियों का कलरव तथा भ्रमरों का गुंजार रहता है। देवांगनाओं के हास-विलास से आकर्षित होकर वे जलक्रीड़ा आदि विविध विनोद करते हैं।

मूल पाठ 17.14

नवस्वपि वर्षेषु भगवान्नारायणो महापुरुषः पुरुषाणां तदनुग्रहायात्मतत्त्वव्यूहेनात्मनाद्यापि सन्निधीयते ॥१४॥

सरल हिंदी भावार्थ: इन नौ वर्षों में महापुरुष भगवान नारायण वहाँ के लोगों पर अनुग्रह करने के लिए अपने तत्त्व के अनुरूप विभिन्न दिव्य रूपों में आज भी उपस्थित माने गए हैं।

मूल पाठ 17.15

इलावृते तु भगवान्भव एक एव पुमान्न ह्यन्यस्तत्रापरो निर्विशति भवान्याः शापनिमित्तज्ञो यत्प्रवेक्ष्यतः स्त्रीभावस्तत्पश्चाद्वक्ष्यामि ॥१५॥

सरल हिंदी भावार्थ: इलावृतवर्ष में भगवान शिव ही एकमात्र पुरुष हैं। भवानी के शाप का कारण जानने वाला अन्य पुरुष वहाँ प्रवेश नहीं करता; उस कथा के अनुसार प्रवेश करने वाले को स्त्रीभाव प्राप्त होता है। शुकदेवजी कहते हैं कि इसका प्रसंग आगे सुनाऊँगा।

मूल पाठ 17.16

भवानीनाथैः स्त्रीगणार्बुदसहस्रैरवरुध्यमानो भगवतश्चतुर्मूर्तेर्महापुरुषस्य तुरीयां तामसीं मूर्तिं प्रकृतिमात्मनः सङ्कर्षणसंज्ञामात्मसमाधिरूपेण सन्निधाप्यैतदभिगृणन्भव उपधावति ॥१६॥

सरल हिंदी भावार्थ: भवानी और उनके असंख्य स्त्री-गणों से घिरे शिवजी भगवान के चतुर्व्यूह में चतुर्थ, तमोगुण से सम्बद्ध सङ्कर्षण स्वरूप का ध्यान करते हैं। उन्हें अपने प्राकट्य का कारण मानकर समाधि में सन्निहित करते हुए शिवजी इस प्रकार स्तुति करते हैं।

मूल पाठ 17.17

श्रीभगवानुवाच । ॐ नमो भगवते महापुरुषाय सर्वगुणसङ्ख्यानायानन्तायाव्यक्ताय नम इति । भजे भजन्यारणपादपङ्कजं भगस्य कृत्स्नस्य परं परायणम् । भक्तेष्वलं भावितभूतभावनं भवापहं त्वा भवभावमीश्वरम् ॥१७॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान शिव कहते हैं—ॐ! समस्त गुणों के आधार, अनन्त और अव्यक्त महापुरुष भगवान को नमस्कार। मैं आपके उन चरणकमलों का भजन करता हूँ जो उपासकों को शरण देते हैं और सम्पूर्ण ऐश्वर्य का परम आश्रय हैं। हे प्राणियों के पालनकर्ता! आप भक्तों के हृदय में प्रकट होते हैं, संसार-बन्धन मिटाते हैं और जगत के प्राकट्य के भी ईश्वर हैं।

मूल पाठ 17.18

न यस्य मायागुणचित्तवृत्तिभिर्निरीक्षतो ह्यण्वपि दृष्टिरज्यते । ईशे यथा नोऽजितमन्युरंहसां कस्तं न मन्येत जिगीषुरात्मनः ॥१८॥

सरल हिंदी भावार्थ: आप सबको देखते हुए भी माया के गुणों और चित्त की वृत्तियों से तनिक भी प्रभावित नहीं होते। हमारी स्थिति ऐसी नहीं है; क्रोध आदि के वेग हमें प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए अपने मन और इन्द्रियों को जीतने की इच्छा रखने वाला कौन साधक आपका आदर और आश्रय नहीं लेगा?

मूल पाठ 17.19

असद्दृशो यः प्रतिभाति मायया क्षीबेव मध्वासवताम्रलोचनः । न नागवध्वोऽर्हण ईशिरे ह्रिया यत्पादयोः स्पर्शनधर्षितेन्द्रियाः ॥१९॥

सरल हिंदी भावार्थ: अशुद्ध दृष्टि वालों को आपकी माया के कारण आपका रूप ऐसा प्रतीत होता है, मानो मदिरा से मतवाले किसी व्यक्ति की आँखें लाल हों। पर आपका दिव्य स्वरूप लौकिक विकारों से परे है। आपके चरणों के स्पर्श से नाग-पत्नियों की इन्द्रियाँ अभिभूत हो गईं और वे लज्जा के कारण आपकी पूजा भी न कर सकीं।

मूल पाठ 17.20

यमाहुरस्य स्थितिजन्मसंयमं त्रिभिर्विहीनं यमनन्तमृषयः । न वेद सिद्धार्थमिव क्वचित्स्थितं भूमण्डलं मूर्धसहस्रधामसु ॥२०॥

सरल हिंदी भावार्थ: ऋषि आपको जगत की स्थिति, उत्पत्ति और लय का कारण कहते हैं, जबकि आप स्वयं इन तीनों परिवर्तनों से रहित हैं। आपका नाम अनन्त है। आपके सहस्र मस्तकों में किसी एक पर स्थित भूमण्डल सरसों के दाने जैसा है; उसका भार आपको अनुभव भी नहीं होता।

मूल पाठ 17.21

यस्याद्य आसीद्गुणविग्रहो महान्विज्ञानधिष्ण्यो भगवानजः किल । यत्सम्भवोऽहं त्रिवृता स्वतेजसा वैकारिकं तामसमैन्द्रियं सृजे ॥२१॥

सरल हिंदी भावार्थ: आपसे पहले महत्तत्त्व रूप, ज्ञान के अधिष्ठाता अजन्मा ब्रह्मा का प्राकट्य हुआ। उन्हीं से उत्पन्न होकर मैं अपने त्रिगुणात्मक तेज से वैकारिक, तामस और ऐन्द्रिय अहंकार से सम्बन्धित सृष्टि को प्रकट करता हूँ—अर्थात् देवताओं, भूतों और इन्द्रियों के क्रम में कार्य करता हूँ।

मूल पाठ 17.22

एते वयं यस्य वशे महात्मनः स्थिताः शकुन्ता इव सूत्रयन्त्रिताः । महानहं वैकृततामसेन्द्रियाः सृजाम सर्वे यदनुग्रहादिदम् ॥२२॥

सरल हिंदी भावार्थ: महत्तत्त्व, अहंकार, देवता, भूत और इन्द्रियाँ—हम सब उस महात्मा के अधीन हैं, जैसे डोरी से बँधे पक्षी। आपके अनुग्रह से ही हम सभी इस जगत की रचना में अपना-अपना कार्य कर पाते हैं।

मूल पाठ 17.23

यन्निर्मितां कर्ह्यपि कर्मपर्वणीं मायां जनोऽयं गुणसर्गमोहितः । न वेद निस्तारणयोगमञ्जसा तस्मै नमस्ते विलयोदयात्मने ॥२३॥

सरल हिंदी भावार्थ: गुणों से बनी सृष्टि में मोहित जीव आपकी रची उस माया से, जिसकी गाँठें कर्म हैं, बाहर निकलने का सरल उपाय स्वयं नहीं जान पाता। जगत की उत्पत्ति और लय के आधारस्वरूप आप परमेश्वर को मेरा नमस्कार है।

॥ पंचम स्कन्ध का अध्याय 17 समाप्त ॥

पाठाधार: विकिस्रोत पर उपलब्ध श्रीमद्भागवतपुराण के पंचम स्कन्ध का प्राचीन संस्कृत पाठ। हिंदी भावार्थ भक्ति भावना की स्वतंत्र संपादकीय प्रस्तुति है।

भक्ति भावना
मूल पाठ और सरल हिंदी भावार्थ
॥ जय श्रीकृष्ण ॥

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