तत्त्वबोध सम्पूर्ण — मूल संस्कृत पाठ और सरल हिंदी भावार्थ सहित

भक्ति भावना • गीता एवं दर्शन

तत्त्वबोध

सम्पूर्ण मूल पाठ

संस्कृत प्रश्न–उत्तर एवं सरल हिंदी भावार्थ

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तत्त्वबोध अद्वैत वेदान्त का आरम्भिक प्रकरण ग्रंथ है, जो परंपरा में आदि शंकराचार्य से संबद्ध माना जाता है। इसमें साधक की योग्यता, आत्मा और शरीर का विवेक, अनुभव की तीन अवस्थाएँ, पाँच कोश, सृष्टिविचार, जीव–ईश्वर का सम्बन्ध और ज्ञान से मुक्ति का विषय समझाया गया है।

नीचे मंगलाचरण से उपसंहार तक संस्कृत पाठ के साथ भक्ति भावना के लिए लिखा गया सरल हिंदी भावार्थ दिया गया है। पहले मूल वाक्य पढ़ें, फिर अर्थ पर मनन करें।

पाठ-सूचना: यह मुख्यतः गद्य और प्रश्न–उत्तर वाला ग्रंथ है। पढ़ने की सुविधा के लिए विषय-शीर्षक दिए गए हैं; इन्हें मूल अध्याय या श्लोक-संख्या न माना जाए। संस्कृत के स्पष्ट टंकणदोषों में सामान्य वर्तनी-संशोधन किए गए हैं। नीचे का भावार्थ अद्वैत वेदान्त के इसी ग्रंथ के दृष्टिकोण को स्पष्ट करता है।

मंगलाचरण और प्रयोजन

वासुदेवेन्द्रयोगीन्द्रं नत्वा ज्ञानप्रदं गुरुम् ।
मुमुक्षूणां हितार्थाय तत्त्वबोधोभिधीयते ॥

साधनचतुष्टयसम्पन्नाधिकारिणां मोक्षसाधनभूतं
तत्त्वविवेकप्रकारं वक्ष्यामः ।

सरल हिंदी भावार्थ: ज्ञान देने वाले योगिश्रेष्ठ गुरु वासुदेवेन्द्र को प्रणाम करके मुक्ति चाहने वालों के हित के लिए तत्त्वबोध कहा जाता है। आगे उन साधकों के लिए सत्य के विवेक की रीति बताई जाएगी, जो साधनचतुष्टय से सम्पन्न हैं। यह विवेक मोक्ष का साधन है।

साधनचतुष्टय

साधनचतुष्टयं किम् ?
नित्यानित्यवस्तुविवेकः ।
इहामुत्रार्थफलभोगविरागः ।
शमादिषट्कसम्पत्तिः ।
मुमुक्षुत्वं चेति ।

सरल हिंदी भावार्थ: चार आवश्यक साधन कौन से हैं? नित्य और अनित्य का विवेक, इस लोक तथा परलोक के भोगों के फल में वैराग्य, शम आदि छह गुणों की सम्पदा और मुक्ति की इच्छा। ये आत्मज्ञान के अध्ययन के लिए मन को योग्य बनाते हैं।

विवेक

नित्यानित्यवस्तुविवेकः कः ?
नित्यवस्त्वेकं ब्रह्म तद्व्यतिरिक्तं सर्वमनित्यम् ।
अयमेव नित्यानित्यवस्तुविवेकः ।

सरल हिंदी भावार्थ: नित्य और अनित्य का विवेक यह है कि केवल ब्रह्म नित्य है; उससे भिन्न सब परिवर्तनशील और अनित्य है। साधक स्थायी सत्य तथा बदलने वाली वस्तुओं का भेद समझे।

वैराग्य

विरागः कः ?
इहस्वर्गभोगेषु इच्छाराहित्यम् ।

सरल हिंदी भावार्थ: इस संसार और स्वर्ग के भोगों की लालसा का अभाव वैराग्य है। इसका आशय भोगों में स्थायी तृप्ति खोजने की आसक्ति का क्षय है।

षट्सम्पत्ति

शमादिसाधनसम्पत्तिः का ?
शमो दम उपरमस्तितिक्षा श्रद्धा समाधानं च इति ।

सरल हिंदी भावार्थ: शम, दम, उपरम, तितिक्षा, श्रद्धा और समाधान—ये छह साधनगुण हैं। इन्हें साधक की आन्तरिक सम्पत्ति कहा गया है।

शम

शमः कः ?
मनोनिग्रहः ।

सरल हिंदी भावार्थ: मन का निग्रह शम है। विचारों और इच्छाओं के पीछे अनियंत्रित बहने के स्थान पर मन को विवेक के अधीन रखना इसका भाव है।

दम

दमः कः ?
चक्षुरादिबाह्येन्द्रियनिग्रहः ।

सरल हिंदी भावार्थ: नेत्र आदि बाहरी इन्द्रियों का संयम दम है। इन्द्रियों का उपयोग विवेकपूर्वक हो और वे साधक को विषयों की ओर निरन्तर न खींचें।

उपरम

उपरमः कः ?
स्वधर्मानुष्ठानमेव ।

सरल हिंदी भावार्थ: यहाँ उपरम का लक्षण अपने धर्म अर्थात् कर्तव्य का अनुष्ठान बताया गया है। साधक अपने उचित आचरण में स्थित हो।

तितिक्षा

तितिक्षा का ?
शीतोष्णसुखदुःखादिसहिष्णुत्वम् ।

सरल हिंदी भावार्थ: सर्दी-गर्मी और सुख-दुःख आदि द्वन्द्वों को सह सकने की क्षमता तितिक्षा है। इनसे विचलित होकर साधना छोड़ न देना इसका भाव है।

श्रद्धा

श्रद्धा कीदृशी ?
गुरुवेदान्तवाक्यादिषु विश्वासः श्रद्धा ।

सरल हिंदी भावार्थ: गुरु और वेदान्त के वचनों में विश्वास श्रद्धा है। यह विश्वास साधक को उनके उपदेश का अध्ययन और मनन करने के लिए तैयार करता है।

समाधान

समाधानं किम् ?
चित्तैकाग्रता ।

सरल हिंदी भावार्थ: चित्त की एकाग्रता समाधान है। मन का विषयों में बिखरने के बजाय आत्मविचार में स्थिर होना इसका आशय है।

मुमुक्षुत्व

मुमुक्षुत्वं किम् ?
मोक्षो मे भूयाद् इति इच्छा ।
एतत् साधनचतुष्टयम् ।
ततस्तत्त्वविवेकस्याधिकारिणो भवन्ति ।

सरल हिंदी भावार्थ: “मुझे मोक्ष प्राप्त हो”—यह इच्छा मुमुक्षुत्व है। विवेक, वैराग्य, षट्सम्पत्ति और मुमुक्षुत्व मिलकर साधनचतुष्टय हैं। इनसे सम्पन्न साधक तत्त्वविवेक का अधिकारी होता है।

तत्त्वविवेक और आत्मा

तत्त्वविवेकः कः ?
आत्मा सत्यं तदन्यत् सर्वं मिथ्येति ।
आत्मा कः ?
स्थूलसूक्ष्मकारणशरीराद्व्यतिरिक्तः पञ्चकोशातीतः सन्
अवस्थात्रयसाक्षी सच्चिदानन्दस्वरूपः सन्
यस्तिष्ठति स आत्मा ।

सरल हिंदी भावार्थ: आत्मा सत्य है और उससे भिन्न सब मिथ्या है—यह तत्त्वविवेक है। अद्वैत में “मिथ्या” का अर्थ सर्वथा शून्य नहीं, बल्कि ऐसा अनुभवगत अस्तित्व है जिसकी स्वतंत्र परम सत्ता नहीं है। आत्मा स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर से भिन्न, पाँच कोशों से परे, जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति का साक्षी तथा सच्चिदानन्दस्वरूप है।

स्थूल शरीर

स्थूलशरीरं किम् ?
पञ्चीकृतपञ्चमहाभूतैः कृतं सत्कर्मजन्यं
सुखदुःखादिभोगायतनं शरीरम्
अस्ति जायते वर्धते विपरिणमते अपक्षीयते विनश्यतीति
षड्विकारवदेतत्स्थूलशरीरम् ।

सरल हिंदी भावार्थ: पंचीकृत पाँच महाभूतों से बना, पूर्व पुण्यकर्म से प्राप्त और सुख-दुःख के अनुभव का आश्रय यह स्थूल शरीर है। इसमें छह परिवर्तन होते हैं—अस्तित्व में होना, जन्म लेना, बढ़ना, बदलना, क्षीण होना और नष्ट होना।

सूक्ष्म शरीर

सूक्ष्मशरीरं किम् ?
अपञ्चीकृतपञ्चमहाभूतैः कृतं सत्कर्मजन्यं
सुखदुःखादिभोगसाधनं
पञ्चज्ञानेन्द्रियाणि पञ्चकर्मेन्द्रियाणि पञ्चप्राणादयः
मनश्चैकं बुद्धिश्चैका
एवं सप्तदशाकलाभिः सह यत्तिष्ठति तत्सूक्ष्मशरीरम् ।

सरल हिंदी भावार्थ: अपंचीकृत पाँच महाभूतों से उत्पन्न और पूर्व कर्म से प्राप्त सूक्ष्म शरीर सुख-दुःख के अनुभव का साधन है। इसमें पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच प्राण, मन और बुद्धि—कुल सत्रह अवयव माने गए हैं। यह ग्रंथ का पारंपरिक वेदान्तीय विवेचन है।

पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ

श्रोत्रं त्वक् चक्षुः रसना घ्राणम् इति पञ्च ज्ञानेन्द्रियाणि ।
श्रोत्रस्य दिग्देवता ।
त्वचो वायुः ।
चक्षुषः सूर्यः ।
रसनाया वरुणः ।
घ्राणस्य अश्विनौ ।
इति ज्ञानेन्द्रियदेवताः ।
श्रोत्रस्य विषयः शब्दग्रहणम् ।
त्वचो विषयः स्पर्शग्रहणम् ।
चक्षुषो विषयः रूपग्रहणम् ।
रसनाया विषयः रसग्रहणम् ।
घ्राणस्य विषयः गन्धग्रहणम् इति ।

सरल हिंदी भावार्थ: कान, त्वचा, नेत्र, जीभ और नाक पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं। ग्रंथ में इनके अधिष्ठाता क्रमशः दिशा, वायु, सूर्य, वरुण और अश्विनीकुमार बताए गए हैं। इनके विषय क्रम से शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध को ग्रहण करना हैं।

पाँच कर्मेन्द्रियाँ

वाक्पाणिपादपायूपस्थानीति पञ्चकर्मेन्द्रियाणि ।
वाचो देवता वह्निः ।
हस्तयोरिन्द्रः ।
पादयोर्विष्णुः ।
पायोर्मृत्युः ।
उपस्थस्य प्रजापतिः ।
इति कर्मेन्द्रियदेवताः ।
वाचो विषयः भाषणम् ।
पाण्योर्विषयः वस्तुग्रहणम् ।
पादयोर्विषयः गमनम् ।
पायोर्विषयः मलत्यागः ।
उपस्थस्य विषयः आनन्द इति ।

सरल हिंदी भावार्थ: वाणी, हाथ, पैर, गुदा और जननेन्द्रिय पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं। इनके अधिष्ठाता क्रमशः अग्नि, इन्द्र, विष्णु, मृत्यु और प्रजापति बताए गए हैं। इनके कार्य बोलना, वस्तु ग्रहण करना, चलना, मलत्याग और जननेन्द्रिय से सम्बन्धित आनन्द हैं।

कारण शरीर

कारणशरीरं किम् ?
अनिर्वाच्यानाद्यविद्यारूपं शरीरद्वयस्य कारणमात्रं
सत्स्वरूपाऽज्ञानं निर्विकल्पकरूपं यदस्ति तत्कारणशरीरम् ।

सरल हिंदी भावार्थ: जो अनादि अविद्या के रूप में है, जिसे निश्चित रूप से सत् या असत् नहीं कहा जा सकता, जो स्थूल और सूक्ष्म दोनों शरीरों का कारण है तथा अपने वास्तविक स्वरूप का अज्ञान है—वह कारण शरीर है। इसमें भेदयुक्त विचार प्रकट नहीं होते।

तीन अवस्थाएँ

अवस्थात्रयं किम् ?
जाग्रत्स्वप्नसुषुप्त्यवस्थाः ।

सरल हिंदी भावार्थ: जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति—अनुभव की ये तीन अवस्थाएँ हैं। आगे इनके आधार पर आत्मा और बदलते अनुभव का विवेक किया गया है।

जाग्रत् अवस्था

जाग्रदवस्था का ?
श्रोत्रादिज्ञानेन्द्रियैः शब्दादिविषयैश्च ज्ञायते इति यत्
सा जाग्रदावस्था ।
स्थूल शरीराभिमानी आत्मा विश्व इत्युच्यते ।

सरल हिंदी भावार्थ: ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा शब्द आदि बाहरी विषयों का अनुभव होना जाग्रत् अवस्था है। स्थूल शरीर से तादात्म्य रखने वाले आत्मा को इस अवस्था में “विश्व” कहा जाता है। यह आत्मा का नया स्वरूप नहीं, उपाधि के अनुसार उसका नाम है।

स्वप्न अवस्था

स्वप्नावस्था केति चेत् ?
जाग्रदवस्थायां यद्दृष्टं यद् श्रुतम्
तज्जनितवासनया निद्रासमये यः प्रपञ्चः प्रतीयते सा
स्वप्नावस्था ।
सूक्ष्मशरीराभिमानी आत्मा तैजस इत्युच्यते ।

सरल हिंदी भावार्थ: जाग्रत् अवस्था में देखी और सुनी बातों से बनी वासनाओं के कारण नींद में जो जगत् दिखाई देता है, वह स्वप्न अवस्था है। सूक्ष्म शरीर से तादात्म्य के कारण इसी आत्मा को “तैजस” कहा जाता है।

सुषुप्ति अवस्था

अतः सुषुप्त्यवस्था का ?
अहं किमपि न जानामि सुखेन मया निद्राऽनुभूयत इति
सुषुप्त्यवस्था ।
कारणशरीराभिमानी आत्मा प्राज्ञ इत्युच्यते ।

सरल हिंदी भावार्थ: जिस नींद के बाद अनुभव होता है कि “मैं कुछ नहीं जानता था और सुख से सोया”, वह सुषुप्ति है। कारण शरीर से तादात्म्य रखने वाला आत्मा “प्राज्ञ” कहलाता है। यहाँ विषयों का ज्ञान प्रकट नहीं रहता, किन्तु आत्मस्वरूप का अज्ञान बना रहता है।

पाँच कोश

पञ्च कोशाः के ?
अन्नमयः प्राणमयः मनोमयः विज्ञानमयः आनन्दमयश्चेति ।

सरल हिंदी भावार्थ: अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय—ये पाँच कोश हैं। कोश का अर्थ यहाँ वह आवरण है जिसके साथ आत्मा की पहचान मान ली जाती है।

अन्नमय कोश

अन्नमयः कः ?
अन्नरसेनैव भूत्वा अन्नरसेनैव वृद्धिं प्राप्य अन्नरूपपृथिव्यां
यद्विलीयते तदन्नमयः कोशः स्थूलशरीरम् ।

सरल हिंदी भावार्थ: जो अन्न के रस से बनता है, उसी से बढ़ता है और अन्त में अन्न उत्पन्न करने वाली पृथ्वी में लीन हो जाता है—वह अन्नमय कोश है। यही स्थूल शरीर है।

प्राणमय कोश

प्राणमयः कः ?
प्राणाद्याः पञ्चवायवः वागादीन्द्रियपञ्चकं प्राणमयः कोशः ।

सरल हिंदी भावार्थ: प्राण आदि पाँच वायु और वाणी आदि पाँच कर्मेन्द्रियाँ मिलकर प्राणमय कोश हैं। यह जीवन की क्रियाशील शक्ति का वेदान्तीय विवेचन है।

मनोमय कोश

मनोमयः कोशः कः ?
मनश्च ज्ञानेन्द्रियपञ्चकं मिलित्वा यो भवति स मनोमयः कोशः ।

सरल हिंदी भावार्थ: मन और पाँच ज्ञानेन्द्रियों का सम्मिलित रूप मनोमय कोश है। मन के माध्यम से संकल्प-विकल्प और विषयों का मानसिक अनुभव होता है।

विज्ञानमय कोश

विज्ञानमयः कः ?
बुद्धिज्ञानेन्द्रियपञ्चकं मिलित्वा यो भवति स विज्ञानमयः कोशः ।

सरल हिंदी भावार्थ: बुद्धि और पाँच ज्ञानेन्द्रियों का सम्मिलित रूप विज्ञानमय कोश है। यहाँ “विज्ञान” का आशय निश्चय करने वाली बुद्धि से है।

आनन्दमय कोश

आनन्दमयः कः ?
एवमेव कारणशरीरभूताविद्यास्थमलिनसत्त्वं
प्रियादिवृत्तिसहितं सत् आनन्दमयः कोशः ।
एतत्कोशपञ्चकम् ।

सरल हिंदी भावार्थ: कारण शरीररूप अविद्या में स्थित मलिन सत्त्व, प्रिय आदि वृत्तियों सहित आनन्दमय कोश कहलाता है। यहाँ प्रिय का भाव है इच्छित वस्तु के दर्शन आदि से उत्पन्न सुखवृत्ति। यह भी पाँच कोशों में एक है; इसे निरुपाधिक आत्मस्वरूप समझ लेना उचित नहीं।

आत्मा पाँचों कोशों से भिन्न है

मदीयं शरीरं मदीयाः प्राणाः मदीयं मनश्च
मदीया बुद्धिर्मदीयं अज्ञानमिति स्वेनैव ज्ञायते
तद्यथा मदीयत्वेन ज्ञातं कटककुण्डल गृहादिकं
स्वस्माद्भिन्नं तथा पञ्चकोशादिकं स्वस्माद्भिन्नम्
मदीयत्वेन ज्ञातमात्मा न भवति ॥

सरल हिंदी भावार्थ: हम स्वयं जानते हैं—“मेरा शरीर, मेरे प्राण, मेरा मन, मेरी बुद्धि और मेरा अज्ञान।” जिस प्रकार “मेरे” कहकर जाने गए कंगन, कुण्डल और घर अपने जानने वाले से भिन्न हैं, उसी प्रकार पाँचों कोश भी जानने वाले आत्मा से भिन्न हैं। जो वस्तु “मेरी” कहकर जानी जाती है, वह जानने वाला आत्मा नहीं है।

सत्–चित्–आनन्द

आत्मा तर्हि कः ?
सच्चिदानन्दस्वरूपः ।
सत्किम् ?
कालत्रयेऽपि तिष्ठतीति सत् ।
चित्किम् ?
ज्ञानस्वरूपः ।
आनन्दः कः ?
सुखस्वरूपः ।
एवं सच्चिदानन्दस्वरूपं स्वात्मानं विजानीयात् ।

सरल हिंदी भावार्थ: आत्मा सच्चिदानन्दस्वरूप है। “सत्” वह है जो भूत, वर्तमान और भविष्य—तीनों कालों में विद्यमान है। “चित्” ज्ञानस्वरूप चेतना है। “आनन्द” सुखस्वरूप है। अपने आत्मा को इसी सच्चिदानन्दस्वरूप में जानना चाहिए।

माया और तत्त्वों की उत्पत्ति

अथ चतुर्विंशतितत्त्वोत्पत्तिप्रकारं वक्ष्यामः ।
ब्रह्माश्रया सत्त्वरजस्तमोगुणात्मिका माया अस्ति ।

सरल हिंदी भावार्थ: अब चौबीस तत्त्वों की उत्पत्ति का प्रकार कहा जाता है। ब्रह्म के आश्रय में सत्त्व, रजस् और तमस्—इन तीन गुणों वाली माया मानी गई है। आगे का सृष्टिविवेचन इसी अद्वैत वेदान्त की पारंपरिक शिक्षापद्धति के अनुसार है।

पाँच महाभूतों का क्रम

ततः आकाशः सम्भूतः ।
आकाशाद् वायुः ।
वायोस्तेजः ।
तेजस आपः ।
अद्भ्यः पृथिवी ।

सरल हिंदी भावार्थ: माया से आकाश, आकाश से वायु, वायु से तेज अर्थात् अग्नि, तेज से जल और जल से पृथ्वी उत्पन्न होती है। यह ग्रंथ में दिया गया सृष्टि का तात्त्विक क्रम है।

सात्त्विक अंश से ज्ञानेन्द्रियाँ

एतेषां पञ्चतत्त्वानां मध्ये
आकाशस्य सात्विकांशात् श्रोत्रेन्द्रियं सम्भूतम् ।
वायोः सात्विकांशात् त्वगिन्द्रियं सम्भूतम् ।
अग्नेः सात्विकांशात् चक्षुरिन्द्रियं सम्भूतम् ।
जलस्य सात्विकांशात् रसनेन्द्रियं सम्भूतम् ।
पृथिव्याः सात्विकांशात् घ्राणेन्द्रियं सम्भूतम् ।

सरल हिंदी भावार्थ: पाँच तत्त्वों के सात्त्विक अंशों से पाँच ज्ञानेन्द्रियों की उत्पत्ति कही गई है—आकाश से श्रवण, वायु से स्पर्श, अग्नि से दृष्टि, जल से रसग्रहण और पृथ्वी से गन्धग्रहण की इन्द्रिय।

अन्तःकरण के चार कार्य

एतेषां पञ्चतत्त्वानां समष्टिसात्विकांशात्
मनोबुद्ध्यहङ्कार चित्तान्तःकरणानि सम्भूतानि ।
सङ्कल्पविकल्पात्मकं मनः ।
निश्चयात्मिका बुद्धिः ।
अहंकर्ता अहंकारः ।
चिन्तनकर्तृ चित्तम् ।
मनसो देवता चन्द्रमाः ।
बुद्धेः ब्रह्मा ।
अहंकारस्य रुद्रः ।
चित्तस्य वासुदेवः ।

सरल हिंदी भावार्थ: पाँचों तत्त्वों के सम्मिलित सात्त्विक अंश से मन, बुद्धि, अहंकार और चित्त उत्पन्न होते हैं। संकल्प-विकल्प करना मन का कार्य है; निश्चय करना बुद्धि का; “मैं कर्ता हूँ” मानना अहंकार का; और चिन्तन करना चित्त का। इनके अधिष्ठाता क्रमशः चन्द्रमा, ब्रह्मा, रुद्र और वासुदेव बताए गए हैं।

राजस अंश से कर्मेन्द्रियाँ और प्राण

एतेषां पञ्चतत्त्वानां मध्ये
आकाशस्य राजसांशात् वागिन्द्रियं सम्भूतम् ।
वायोः राजसांशात् पाणीन्द्रियं सम्भूतम् ।
वह्नेः राजसांशात् पादेन्द्रियं सम्भूतम् ।
जलस्य राजसांशात् उपस्थेन्द्रियं सम्भूतम् ।
पृथिव्या राजसांशात् गुदेन्द्रियं सम्भूतम् ।
एतेषां समष्टिराजसांशात् पञ्चप्राणाः सम्भूताः ।

सरल हिंदी भावार्थ: आकाश के राजस अंश से वाणी, वायु से हाथ, अग्नि से पैर, जल से जननेन्द्रिय और पृथ्वी से गुदेन्द्रिय की उत्पत्ति कही गई है। पाँचों तत्त्वों के सम्मिलित राजस अंश से पाँच प्राण उत्पन्न होते हैं।

पंचीकरण और स्थूल जगत्

एतेषां पञ्चतत्त्वानां तामसांशात्
पञ्चीकृतपञ्चतत्त्वानि भवन्ति ।
पञ्चीकरणं कथम् इति चेत् ।
एतेषां पञ्चमहाभूतानां तामसांशस्वरूपम्
एकमेकं भूतं द्विधा विभज्य एकमेकमर्धं पृथक्
तूष्णीं व्यवस्थाप्य अपरमपरमर्धं चतुर्धां विभज्य
स्वार्धमन्येषु अर्धेषु स्वभागचतुष्टयसंयोजनं कार्यम् ।
तदा पञ्चीकरणं भवति ।
एतेभ्यः पञ्चीकृतपञ्चमहाभूतेभ्यः स्थूलशरीरं भवति ।
एवं पिण्डब्रह्माण्डयोरैक्यं सम्भूतम् ।

सरल हिंदी भावार्थ: पाँच तत्त्वों के तामस अंशों का पंचीकरण होता है। प्रत्येक तत्त्व को दो बराबर भागों में बाँटकर उसका आधा भाग अलग रखा जाता है। शेष आधे के चार बराबर अंश करके अन्य चार तत्त्वों के आधे भागों के साथ एक-एक अंश मिलाया जाता है। इस प्रकार प्रत्येक पंचीकृत तत्त्व में उसका अपना आधा और शेष चार तत्त्वों का एक-एक आठवाँ अंश होता है। इन्हीं से स्थूल शरीर बनता है। इस समान तात्त्विक आधार से पिण्ड अर्थात् व्यक्ति और ब्रह्माण्ड का ऐक्य बताया गया है।

जीव और ईश्वर

स्थूलशरीराभिमानि जीवनामकं ब्रह्मप्रतिबिम्बं भवति ।
स एव जीवः प्रकृत्या स्वस्मात् ईश्वरं भिन्नत्वेन जानाति ।
अविद्योपाधिः सन् आत्मा जीव इत्युच्यते ।
मायोपाधिः सन् ईश्वर इत्युच्यते ।
एवं उपाधिभेदात् जीवेश्वरभेददृष्टिः यावत्पर्यन्तं तिष्ठति
तावत्पर्यन्तं जन्ममरणादिरूपसंसारो न निवर्तते ।
तस्मात्कारणान्न जीवेश्वरयोर्भेदबुद्धिः स्वीकार्या ।

सरल हिंदी भावार्थ: स्थूल शरीर से तादात्म्य रखने वाला ब्रह्म का प्रतिबिम्ब “जीव” कहलाता है। वह सामान्यतः ईश्वर को अपने से भिन्न जानता है। अविद्या की उपाधि से आत्मा जीव और माया की उपाधि से ईश्वर कहलाता है। जब तक उपाधियों के कारण जीव और ईश्वर में परम भेद की दृष्टि बनी रहती है, जन्म-मरणरूप संसार नहीं मिटता। इसलिए आत्मस्वरूप के स्तर पर दोनों में भेदबुद्धि को अन्तिम सत्य न माना जाए।

“तत्त्वमसि” का वाच्यार्थ और लक्ष्यार्थ

ननु साहंकारस्य किंचिज्ज्ञस्य जीवस्य निरहंकारस्य सर्वज्ञस्य
ईश्वरस्य तत्त्वमसीति महावाक्यात् कथमभेदबुद्धिः स्यादुभयोः
विरुद्धधर्माक्रान्तत्वात् ।
इति चेन्न । स्थूलसूक्ष्मशरीराभिमानी त्वंपदवाच्यार्थः ।
उपाधिविनिर्मुक्तं समाधिदशासम्पन्नं शुद्धं चैतन्यं
त्वंपदलक्ष्यार्थः ।
एवं सर्वज्ञत्वादिविशिष्ट ईश्वरः तत्पदवाच्यार्थः ।
उपाधिशून्यं शुद्धचैतन्यं तत्पदलक्ष्यार्थः ।
एवं च जीवेश्वरयोः चैतन्यरूपेणाऽभेदे बाधकाभावः ।

सरल हिंदी भावार्थ: प्रश्न है—अहंकारयुक्त और अल्पज्ञ जीव तथा अहंकाररहित सर्वज्ञ ईश्वर को “तत्त्वमसि” कैसे एक कहता है? उत्तर है कि दोनों पदों के सीधे अर्थ और लक्षित अर्थ अलग करके समझें। “त्वम्” का वाच्यार्थ शरीरों से तादात्म्य रखने वाला जीव है; उसका लक्ष्यार्थ उपाधियों से मुक्त, समाधिदशा में उपलब्ध शुद्ध चैतन्य है। “तत्” का वाच्यार्थ सर्वज्ञता आदि से विशिष्ट ईश्वर है; उसका लक्ष्यार्थ उपाधिरहित शुद्ध चैतन्य है। इस प्रकार चैतन्यस्वरूप में दोनों के अभेद में विरोध नहीं रहता।

जीवन्मुक्त कौन है?

एवं च वेदान्तवाक्यैः सद्गुरूपदेशेन च सर्वेष्वपि
भूतेषु येषां
ब्रह्मबुद्धिरुत्पन्ना ते जीवन्मुक्ताः इत्यर्थः ।
ननु जीवन्मुक्तः कः ?
यथा देहोऽहं पुरुषोऽहं ब्राह्मणोऽहं शूद्रोऽहमस्मीति
दृढनिश्चयस्तथा नाहं ब्राह्मणः न शूद्रः न पुरुषः
किन्तु असंगः सच्चिदानन्द स्वरूपः प्रकाशरूपः सर्वान्तर्यामी
चिदाकाशरूपोऽस्मीति दृढनिश्चय
रूपोऽपरोक्षज्ञानवान् जीवन्मुक्तः ॥

सरल हिंदी भावार्थ: वेदान्त के वचनों और सद्गुरु के उपदेश से जिन्हें सब प्राणियों में ब्रह्म का बोध होता है, वे जीवन्मुक्त हैं। जैसे सामान्यतः “मैं शरीर हूँ, पुरुष हूँ, ब्राह्मण हूँ या शूद्र हूँ” जैसी दृढ़ पहचान रहती है, वैसे ही जिन्हें प्रत्यक्ष आत्मबोध हो कि “मैं इन देहगत पहचानों तक सीमित नहीं; मैं असंग, सच्चिदानन्द, स्वयंप्रकाश, सबके भीतर का चेतन आत्मा और आकाश के समान निराकार चैतन्य हूँ”—वे जीवन्मुक्त हैं। यहाँ देह और सामाजिक परिचय से परे आत्मा का विवेक किया गया है।

कर्म के तीन प्रकार

ब्रह्मैवाहमस्मीत्यपरोक्षज्ञानेन निखिलकर्मबन्धविनिर्मुक्तः
स्यात् ।
कर्माणि कतिविधानि सन्तीति चेत्
आगामिसञ्चितप्रारब्धभेदेन त्रिविधानि सन्ति ।
ज्ञानोत्पत्त्यनन्तरं ज्ञानिदेहकृतं पुण्यपापरूपं कर्म
यदस्ति तदागामीत्यभिधीयते ।
सञ्चितं कर्म किम् ?
अनन्तकोटिजन्मनां बीजभूतं सत् यत्कर्मजातं पूर्वार्जितं
तिष्ठति तत् सञ्चितं ज्ञेयम् ।
प्रारब्धं कर्म किमिति चेत् ।
इदं शरीरमुत्पाद्य इह लोके एवं सुखदुःखादिप्रदं यत्कर्म
तत्प्रारब्धं
भोगेन नष्टं भवति प्रारब्धकर्मणां भोगादेव क्षय इति ।

सरल हिंदी भावार्थ: “मैं ब्रह्म ही हूँ” इस अपरोक्ष ज्ञान से कर्मबन्धन से मुक्ति होती है। कर्म तीन प्रकार के हैं—आगामी, संचित और प्रारब्ध। ज्ञान के बाद ज्ञानी के शरीर द्वारा होने वाला पुण्य-पापरूप कर्म आगामी कहलाता है। अनगिनत पूर्व जन्मों से संचित, आगे के जन्मों का बीज बनने वाला कर्मसमूह संचित है। जिस कर्म ने वर्तमान शरीर को जन्म दिया और जो जीवन में सुख-दुःख देता है, वह प्रारब्ध है। ग्रंथ के अनुसार प्रारब्ध का क्षय उसका भोग होने से होता है।

कर्मबन्ध से मुक्ति और उपसंहार

सञ्चितं कर्म ब्रह्मैवाहमिति निश्चयात्मकज्ञानेन नश्यति ।
आगामि कर्म अपि ज्ञानेन नश्यति किंच आगामि कर्मणां
नलिनीदलगतजलवत् ज्ञानिनां सम्बन्धो नास्ति ।
किंच ये ज्ञानिनं स्तुवन्ति भजन्ति अर्चयन्ति तान्प्रति
ज्ञानिकृतं आगामि पुण्यं गच्छति ।
ये ज्ञानिनं निन्दन्ति द्विषन्ति दुःखप्रदानं कुर्वन्ति तान्प्रति
ज्ञानिकृतं सर्वमागामि क्रियमाणं यदवाच्यं कर्म
पापात्मकं तद्गच्छति ।
सुहृदः पुण्यकृतं दुर्हृदः पापकृत्यं गृह्णन्ति ।
तथा चात्मवित्संसारं तीर्त्वा ब्रह्मानन्दमिहैव प्राप्नोति ।
तरति शोकमात्मवित् इति श्रुतेः ।
तनुं त्यजतु वा काश्यां श्वपचस्य गृहेऽथ वा ।
ज्ञानसम्प्राप्तिसमये मुक्तोऽसौ विगताशयः । इति स्मृतेश्च ।

इति श्रीशङ्करभगवत्पादाचार्यप्रणीतः तत्त्वबोधप्रकरणं समाप्तम् ।

सरल हिंदी भावार्थ: “मैं ब्रह्म हूँ” इस दृढ़ ज्ञान से संचित कर्म नष्ट होते हैं। आगामी कर्म भी ज्ञानी को बाँधते नहीं; जैसे कमल के पत्ते पर जल नहीं चिपकता, वैसे ही वे उससे असंग रहते हैं। ग्रंथ आगे परंपरागत फलविवरण देता है कि ज्ञानी की स्तुति, सेवा और अर्चना करने वालों को उसके आगामी पुण्य का फल तथा निन्दा, द्वेष और दुःख देने वालों को पापकर्म का फल जाता है; मित्र पुण्य और विरोधी पापफल ग्रहण करते हैं। आत्मज्ञानी संसार से पार होकर यहीं ब्रह्मानन्द प्राप्त करता है; श्रुति कहती है कि आत्मा को जानने वाला शोक से पार होता है। अन्तिम स्मृतिवचन का आशय है—आत्मज्ञान प्राप्त होने पर साधक मुक्त है; शरीर काशी में छूटे या श्वपच के घर, मुक्ति का आधार स्थान नहीं, ज्ञान है। “श्वपच” प्राचीन सामाजिक प्रयोग है; यहाँ स्थान और सामाजिक भेद से ऊपर आत्मज्ञान की प्रधानता बताई गई है। इस प्रकार तत्त्वबोध प्रकरण समाप्त होता है।

॥ तत्त्वबोध प्रकरण सम्पूर्ण ॥

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भक्ति भावना • मूल पाठ, सरल अर्थ और आत्मविचार

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