श्रीकृष्ण गीतावली गोस्वामी तुलसीदास जी की कृष्णभक्ति से संबंधित पद-रचना है। माता यशोदा की गोद और माखन की बाललीला से लेकर गोवर्धन-धारण, ब्रज-विरह, गोपी–उद्धव संवाद तथा द्रौपदी की रक्षा तक इसमें भक्ति के अनेक भाव मिलते हैं। ब्रजभाषा के इन गेय पदों में वात्सल्य, रूप-माधुरी, विरह और शरणागति प्रमुख हैं।
1. बाललीला और माता यशोदा का वात्सल्य
पद 1 · राग बिलावल
माता लै उछंग गोबिंद मुख बार-बार निरखै।
पुलकित तनु आनँदघन छन छन मन हरषै ।। 1 ।।
पूछत तोतरात बात मातहि जदुराई।
अतिसय सुख जाते तोहि मोहि कहु समुझाई ।। 2 ।।
देखत तुव बदन कमल मन अनंद होई।
कहै कौन रसन मौन जानै कोइ कोई ।। 3 ।।
सुंदर मुख मोहि देखाउ इच्छा अति मोरे।
मम समान पुन्य पुंज बालक नहिं तोरे ।। 4 ।।
तुलसी प्रभु प्रेम बिबस मनुज रूपधारी ।
बालकेलि लीला रस ब्रज जन हितकारी ।। 5 ।।
सरल हिंदी भावार्थमाता गोविंद को गोद में लेकर बार-बार उनका मुख देखती हैं और आनंद से पुलकित होती हैं। बालक तोतली बोली में पूछता है कि उन्हें इतना सुख क्यों मिल रहा है। माता मुख-कमल के दर्शन का अनिर्वचनीय आनंद बताती हैं। प्रेम के वश होकर मनुष्य-रूप धारण किए प्रभु की बाललीला ब्रजवासियों को सुख देती है।
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पद 2 · राग ललित
'छोटी मोटी मीसी रोटी चिकनी चुपरि कै तू दै री, मैया!'
'लै कन्हैया!' 'सो कब?' 'अबहिं तात ।।'
'सिगरियै हौंहीं खैहौं, बलदाऊ को न दैहौं ।।'
'सो क्यों?' 'भटू, तेरो कहा' कहि इत उत जात ।। 1 ।।
बाल बोलि डहकि बिरावत, चरित लखि,
गोपि गन महरि मुदित पुलकित गात।
नूपुर की धुनि किंकिनि को कलरव सुनि,
कूदि कूदि किलकि किलकि ठाढ़े ठाढ़े खात ।। 2 ।।
तनियाँ ललित कटि, बिचित्र टेपारो सीस,
मुनि मन हरत बचन कहै तोतरात।
तुलसी निरखि हरषत बरषत फूल,
भूरिभागी ब्रजबासी बिबुध सिद्ध सिहात ।। 3 ।।
सरल हिंदी भावार्थकन्हैया माँ से घी लगी छोटी-मोटी रोटी माँगते हैं और बालहठ करते हैं कि सब स्वयं खाएँगे, बलदाऊ को नहीं देंगे। उनके भोले बोल, छलकती चंचलता और उछल-कूद देखकर माता तथा गोपियाँ प्रसन्न हैं। देवता भी उस बाललीला पर फूल बरसाते और ब्रजवासियों के सौभाग्य की सराहना करते हैं।
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पद 3 · राग आसावरी
तोहि स्याम की सपथ जसोदा! आइ देखु गृह मेरे।
जैसी हाल करी यहि ढोटा छोटे निपट अनेरे ।। 1 ।।
गोरस हानि सहौं, न कहौं कछु, यहि ब्रजबास बसेरे।
दिन प्रति भाजन कौन बेसाहै? घर निधि काहू केरे ।। 2 ।।
किएँ निहोरो हँसत, खिझे तें डाँटत नयन तरेरे।
अबहीं तें ये सिखे कहाधौं चरित ललित सुत तेरे ।। 3 ।।
बैठो सकुचि साधु भयो चाहत मातु बदन तन हेरे।
तुलसीदास प्रभु कहौं ते बातैं जे कहि भजे सबेरे ।। 4।।
सरल हिंदी भावार्थएक गोपी यशोदा को अपने घर बुलाकर कान्हा की शरारतें दिखाना चाहती है। दूध-दही का नुकसान वह सह ले, लेकिन रोज नए पात्र कहाँ से लाए! समझाने पर बालक हँसता और डाँटने पर आँखें दिखाता है। माँ को देखकर कृष्ण चुपचाप निर्दोष बनकर बैठ जाते हैं; शिकायत में भी गोपी का स्नेह छिपा है।
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पद 4 · राग आसावरी
मो कहँ झूठेहुँ दोष लगावहिं।
मैया! इन्हहि बानि पर घर की, नाना जुगुति बनावहिं ।। 1 ।।
इन्ह के लिएँ खेलिबो छाँड्यो तऊ न उबरन पावहिं।
भाजन फोरि बोरि कर गोरस, देन उरहनो आवहिं ।। 2 ।।
कबहुँक बाल रोवाइ पानि गहि, मिस करि उठि-उठि धावहिं।
करहिं आपु, सिर धरहिं आन के, बचन बिरंचि हरावहिं ।। 3 ।।
मेरी टेव बूझि हलधर सों, संतत संग खेलावहिं।
जे अन्याउ करहिं काहू को, ते सिसु मोहि न भावहिं ।। 4 ।।
सुनि सुनि बचन चातुरी ग्वालिनि हँसि हँसि बदन दुरावहिं।
बाल गोपाल केलि कल कीरति तुलसीदास मुनि गावहिं ।। 5 ।।
सरल हिंदी भावार्थकृष्ण माँ से कहते हैं कि गोपियाँ उन पर झूठे दोष लगाती हैं। अपने घर के पात्र स्वयं तोड़कर और बच्चों को रुलाकर दोष उनके सिर रख देती हैं। वे बलराम से गवाही लेने को कहते हैं। इतनी चतुर सफाई सुनकर गोपियाँ हँसी छिपाती हैं; कवि इस मनोहर बाललीला का आनंद लेते हैं।
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पद 5 · राग आसावरी
कबहुँ न जात पराए धामहिं ।
खेलत ही देखौं निज आँगन सदा सहित बलरामहिं ।। 1 ।।
मेरे कहाँ थाकु गोरस को, नव निधि मन्दिर यामहिं।
ठाढ़ी ग्वालि ओरहना के मिस आइ बकहिं बेकामहिं ।। 2 ।।
हौं बलि जाउँ जाहु कितहूँ जनिए, मातु सिखावति स्यामहिं।
बिनु कारन हठि दोष लगावति तात गएँ गृह ता महिं ।। 3 ।।
हरि मुख निरखि, परूष बानी सुनि, अधिक-अधिक अभिरामहिं।
तुलसीदास प्रभु देख्योइ चाहति श्रीउर ललित ललामहिं ।। 4 ।।
सरल हिंदी भावार्थयशोदा कहती हैं कि उनका बालक तो बलराम के साथ अपने ही आँगन में खेलता है; घर में दूध-दही की कमी भी नहीं। फिर कृष्ण को प्यार से समझाती हैं कि दूसरों के यहाँ मत जाया करो, वहाँ व्यर्थ दोष मिलता है। गोपियाँ उनकी कठोर लगती शिकायतों के पीछे भी कृष्ण-दर्शन की लालसा रखती हैं।
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पद 6 · राग आसावरी
अब सब साँची कान्ह तिहारी।
जो हम तजे, पाइ गौं मोहन गृह आए दै गारी।। 1 ।।
सुसुकि सभीत सकुचि रूखे मुख बातें सकल सँवारी।
साधु जानि हँसि हदय लगाए, परम प्रीति महतारी ।। 2।।
कोटि जतन करि सपथ कहैं हम, मानै कौन हमारी।
तुमहि बिलोकि, आन को ऐसी क्यों कहिहैं बर नारी ।। 3 ।।
जैसे हौ तैसे सुखदायक ब्रजनायक बलिहारी।
तुलसीदास प्रभु मुख छबि निरखत मन सब जुगुति बिसारी ।। 4 ।।
सरल हिंदी भावार्थशिकायतों के बीच माँ कृष्ण की बातें सुनती हैं। बालक डर और संकोच के साथ अपने पक्ष की बात सँवारता है; माता प्रेम से हँसकर उसे हृदय से लगा लेती हैं। अंततः वह कहती हैं कि जैसे भी हो, तुम ब्रज को सुख देते हो। मुख की सुंदरता देखकर तर्क और नाराज़गी सब भूल जाते हैं।
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पद 7 · राग केदारा
महरि तिहारे पायँ परौं, अपनो ब्रज लीजै।
सहि देख्यो, तुम सों कह्मो, अब नाकहिं आई, कौन दिनहिं दिन छीजै ।। 1 ।।
ग्वालिनि तौ गोरस सुखी, ता बिनु क्यों जीजै।
सुत समेत पाउँ धारि, आपुहि भवन मेरे, देखिये जो न पतीजै ।। 2 ।।
अति अनीति नीकी नहीं, अजहूँ सिख दीजै।
तुलसिदास प्रभु सों कहै उर लाइ जसोमति, ऐसी बलि कबहूँ नहिं कीजै ।। 3 ।।
सरल हिंदी भावार्थगोपी यशोदा से कहती है कि अब बहुत सह लिया; कृष्ण की शरारतें दिन-प्रतिदिन बढ़ रही हैं। दूध-दही ही ग्वालिनों की आजीविका है, उसके बिना कैसे जिएँ? विश्वास न हो तो बालक के साथ घर आकर देख लें। यशोदा स्नेह से कृष्ण को सीने से लगाकर ऐसी हरकत न करने को समझाती हैं।
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पद 8 · राग केदारा
अबहिं उरहनो दै गई, बहुरौ फिरि आई।
सुनु मैया ! तेरी सौं करौं, याको टेव लरन की, सकुच बेंचि सी खाई ।। 1 ।।
या ब्रज में लरिका घने, हौं ही अन्याई।
मुँह लाएँ मूँडहिं चढ़ी, अंतहुँ अहिरिनि, तू सूधी करि पाई ।। 2 ।।
सुनि सुत की अति चातुरी जसुमति मुसुकाई।
तुलसिदास ग्वालिनि ठगी आयो न उतरु, कछु, कान्ह ठगौरी लाई ।। 3 ।।
सरल हिंदी भावार्थएक गोपी शिकायत करके फिर लौट आती है। कृष्ण माँ से उसकी झगड़ने की आदत का उलाहना देते हैं और विनोद से अपना बचाव करते हैं। यशोदा बालक की वाक्चतुरता पर मुसकराती हैं। गोपी निरुत्तर रह जाती है; इस मीठी नोकझोंक में सब कृष्ण की मोहिनी लीला में बँधे हैं।
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पद 9 · राग गौरी
अब ब्रज बास महरि किमि कीबो ?।
दूध दह्यो माखन ढारत हैं, हुतो पोसात दान दिन दीबो ।। 1 ।।
अब तौ कठिन कान्ह के करतब तुम हौ हँसति कहा कहि लीबो ?।
लीजै गाउँ, नाउँ लै रावरो, है जग ठाउँ कहूँ है जीबो ।। 2 ।।
ग्वालि बचन सुनि कहति जसोमति, भलो न भूमि पर बादर छीबो
दैअहि लागि कहौं तुलसी प्रभु, अजहुँ न तजत पयोधर पीबो ।। 3 ।।
सरल हिंदी भावार्थगोपी कहती है कि दूध, दही और माखन इस तरह नष्ट होंगे तो ब्रज में रहना कठिन है। यशोदा का हँसना उसकी शिकायत और बढ़ाता है। माता उत्तर में बालक की छोटी अवस्था याद दिलाती हैं। गोपी का उलाहना और माँ का पक्ष लेना वात्सल्य की सहज घरेलू झाँकी है।
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पद 10 · राग गौरी
जानी है ग्वालि परी फिरि फीकें।
मातु काज लागी लखि डाटत, है बायनो दियो घर नीकें ।। 1 ।।
अब कहि देउँ, कहति किन, यों कहि, माँगत दही धरयो जो छीकें ।। 2।।
तुलसी प्रभु मुख निरखि रही चकि, रहा न सयानप तन मन ती कें ।। 3 ।।
सरल हिंदी भावार्थएक गोपी फिर आई है। माँ को काम में लगा देखकर कृष्ण उसे उलटा टोकते हैं और छींके पर रखा दही माँगने लगते हैं। उसके बोलने से पहले ही बालक अपनी चतुराई चलाता है। गोपी कृष्ण के मुख को देखती रह जाती है और उसकी अपनी समझ-बूझ मानो ठहर जाती है।
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पद 11 · राग गौरी
जौलौं हौं कान्ह रहौं गुन गोए।
तौलौं तुमहि पत्यात लोग सब, सुसुकि सभीत साँचु सो रोए ।। 1 ।।
हौ भले नँग-फँग परे गढ़ीबे, अब ए गढ़त महरि मुख जोएँ।
चुपकि न रहत, कहै कछु चाहत, ह्वैहै कीच कोठिला धोएँ ।। 2 ।।
गरजति कहा तरजिनिन्ह तरजति, बरजत सैन नैन के कोए।
तुलसी मुदित मातु सुत गति लखि, विथकी है ग्वाति मैन मन मोए ।। 3।।
सरल हिंदी भावार्थमाँ कृष्ण से कहती हैं कि जब तक वह उनकी बातें छिपाती रहेंगी, लोग बालक के रोने को सच मानेंगे। अब और बहाने न बनाएँ। उधर आँखों और संकेतों से रोकने-टोकने का विनोद चलता है। गोपी माँ-बेटे की यह दशा देखकर मोह और आश्चर्य में पड़ जाती है।
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पद 12 · राग गौरी
भूलि न जात हौं काहूके काऊ।
साखि सखा सब सुबल, सुदामा, देखि धौं बूझि, बोलि बलदाऊ ।। 1 ।।
यह तो मोहि खिझाइ कोटि बिधि, उलटि बिबादन आइ अगाऊ।
याहि कहा मैया मुँह लावति, गनति कि ए लंगरि झगराऊ ।। 2 ।।
कहत परसपर बचन, जसोमति लखि नहिं सकति कपट सति भाऊ।
तुलसिदास ग्वालिनि अति नागरि, नट नागर मनि नंद ललाऊ ।। 3 ।।
सरल हिंदी भावार्थकृष्ण अपने को निर्दोष बताते हुए सुबल, सुदामा और बलराम को साक्षी बनाने को कहते हैं। उनका कहना है कि गोपी उन्हें चिढ़ाकर उलटी शिकायत करती है। दोनों की बातों में यशोदा सच और खेल को अलग नहीं कर पातीं। गोपी भी चतुर है और नंदलाल तो चतुराई के शिरोमणि हैं।
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पद 13 · राग गौरी
छाँड़ों मेरे ललन! ललित लरिकाई।
ऐहैं सुत! देखुवार कालि तेरे, बबै ब्याह की बात चलाई
डरिहैं सासु ससुर चोरी सुनि, हँसिहैं नइ दुलहिया सुहाई।
उबटौं न्हाहुए गुहौं चुटिया बलि, देखि भलो बर करिहिं बड़ाई।। 2 ।।
मातु कह्यो करि कहत बोलि दै, 'भइ बड़ि बार, कालि तौ न आई'।
'जब सोइबो तात' यों 'हाँ' कहि, नयन मीचि रहे पौढ़ि कन्हाई।। 3 ।।
उठि कहो, भोर भयो, झँगुली दै, मुदित महरि लखि आतुरताई।
बिहँसी ग्वालि जानि तुलसी प्रभु, सकुचि लगे जननी उर धाई।। 4 ।।
सरल हिंदी भावार्थमाँ बालक को समझाती हैं कि अब चोरी और शरारत छोड़ो, कल विवाह की बात देखने लोग आएँगे। भोले कृष्ण चाहते हैं कि वह कल तुरंत आ जाए। माँ कहती हैं कि सोने के बाद सुबह होगी; वे आँखें मूँदकर लेट जाते हैं और फिर जल्दी उठकर कपड़े माँगते हैं। उनकी बाल-उत्सुकता सबको हँसा देती है।
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पद 14 · राग केदारा
हरि को ललित बदन निहारु
निपट हीं डाँटति निठुर ज्यों लकुट कर तें डारु ।। 1।।
मंजु अजन सहित जल कन चवत लोचन चारु।
स्याम सारस मग मनहुँ ससि स्त्रवत सुधा सिंगारु ।। 2 ।।
सुभग उर दधि बुंद सुंदर लखि अपनपौ वारु।
मनहुँ मरकत मृदु सिखर पर लसत बिसद तुषारु ।। 3 ।।
कान्हहू पर सतर भोंहें महरि ! मनहिं बिचारु।
दास तुलसी रहति क्यों रिस निरखि नंदकुमारु ।। 4 ।।
सरल हिंदी भावार्थसखी यशोदा से कहती है कि डंडा छोड़कर बालक का सुंदर मुख तो देखें। काजल भरे नेत्रों से टपकते आँसू, साँवले वक्ष पर दही की बूँदें और मोहक रूप देखकर क्रोध टिक ही नहीं सकता। कवि कमल, चंद्रमा, पन्ने और ओस की उपमाओं से डरे हुए नंदकुमार की कोमलता दिखाते हैं।
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पद 15 · राग केदारा
लेत भरि भरि नीर कान्ह कमल नैन ।
फरक अधर डर, निरखि लकुट कर, कहि न सकत कछु बैन ।। 1 ।।
दुसह दाँवरी छोरि, थोरी खोरि, कहा कीन्हो,
चीन्हो री सुभाउ तेरो आजु लगे माई मैं न ।
तुलसिदास नँद ललन ललित लखि रिस क्यों रहति उर ऐन ॥2॥
सरल हिंदी भावार्थमाँ के हाथ में छड़ी देखकर कृष्ण के कमल-नेत्र आँसुओं से भर जाते हैं। होंठ काँप रहे हैं और वे बोल नहीं पा रहे। सखी यशोदा से रस्सी खोलने को कहती है—इतनी छोटी भूल पर इतना दंड क्यों? इस कोमल बालक का रूप देखकर मन में रोष कैसे रह सकता है!
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पद 16 · राग केदारा
हाहा री महरि! बारो, कहा रिसबस भई,
कोखि के जाए सों रोषु केतो बड़ो कियो है।
ढीली करि दाँवरी, बावरी! साँवरेहि देखि,
सकुचि सहमि सिसु भारी भय भियो है।। 1 ।।
दूध दधि माखन भो, लाखन गोधन धन
जब ते जनम हलधर हरि लियो है।
खायो, कै खवायो, कै बिगार्यो, ढार्यो लरिका री,
ऐस सुत पर कोह, कैसो तेरो हियो है? ।। 2 ।।
मुनि कहैं सुकृती न नंद जसुमति सम
न भयो, न भावी, नहिं बिद्यमान बियो है।
कौन जानै कौनें तप, कौनें जोग जाप जप
कान्ह सो सुवन तोको महादेव दियो है।। 3 ।।
इन्हही के आए ते बधाए ब्रज नित नए
नादत बाढ़त सब सब सुख जियो है।
नंदलाल बाल जस संत सुर सरबस
गाइ सो अमिय रस तुलसिहुँ पियो है।। 4 ।।
सरल हिंदी भावार्थयशोदा को समझाया जाता है कि अपने ही बालक पर इतना क्रोध उचित नहीं। कृष्ण और बलराम के जन्म से ब्रज में दूध, दही, माखन तथा गोधन की वृद्धि हुई है। खाने-खिलाने की बाललीला पर इतना रोष क्यों? मुनि भी नंद-यशोदा जैसे सौभाग्यशाली माता-पिता की प्रशंसा करते हैं।
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पद 17 · राग केदारा
ललित लालन निहारि, महरि मन बिचारि,
डारि दे घर-बसी लकुटी बेगि कर तें।
कछु न कहि सकत, सुसुकत सकुचत,
डरहूँ को डर, कान्ह डरै तेरे डर तें ।। 1 ।।
कह्यो मेरो मानि, हित जानि, तू सयानी बड़ी,
बड़े भाग पायो पूत बिधि हरि हर तें।
ताहि बाँधिबे को धाई, ग्वालिनी गोरस बहाई
लै लै आई बावरी दाँवरी घर घर तें ।। 2 ।।
कुल-गुरु-तिय के बचन कमनीय सुनि
सुधि भए बचन जे सुने मुनिबर तें।
छोरि, लिए लाइ उर, बरषैं सुमन सुर
मंगल है तिहुँ पुर हरि हलधर तें ।। 3 ।।
आनँद बधावनो मुदित गोप-गोपीगन,
आजु परी कुसल कठिन करवर तें।
तुलसी जे तोरे तरु, किए देव दियो बरु,
कै न लह्यो कौन फरु देव दामोदर तें ।। 4 ।।
सरल हिंदी भावार्थकुलगुरु की पत्नी यशोदा से छड़ी छोड़ने और बालक को भयमुक्त करने को कहती हैं। जिससे भय भी डरता है, वही कृष्ण माँ से सहमा हुआ है। यशोदा को मुनियों की बातें याद आती हैं; वह रस्सी खोलकर कृष्ण को गले लगा लेती हैं। देवता पुष्प बरसाते हैं और ब्रज आनंद मनाता है।
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2. गोवर्धन, गोचारण और रूप-माधुरी
पद 18 · राग मलार
ब्रज पर घन घमंड करि आए।
अति अपमान बिचारि आपनो कोपि सुरेस पठाए ।। 1।।
दमकति दुसह दसहुँ दिसि दामिनि, भयो तम गगन गँभीर।
गरजत घोर बारिधर धावत प्रेरित प्रबल समीर ।। 2 ।।
बार-बार पबिपात, उपल घन बरषत बूँद बिसाल।
सीत-सभीत पुकारत आरत गो गोसुत गोपी ग्वाल ।। 3 ।।
राखहु राम कान्ह यहि अवसर, दुसह दसा भइ आइ।
नंद बिरोध कियो सुरपति सों, सो तुम्हरो बल पाइ ।। 4 ।।
सुनि हँसि उठ्यो नंद को नाहरु, लियो कर कुधर उठाइ।
तुलसिदास मघवा अपने सो करि गयो गर्ब गँवाइ ।। 5 ।।
सरल हिंदी भावार्थइंद्र अपने अपमान से क्रुद्ध होकर भीषण बादल भेजते हैं। बिजली, ओले और तूफानी वर्षा से गायें, बछड़े तथा ब्रजवासी भयभीत होकर कृष्ण-बलराम को पुकारते हैं। नंदनंदन हँसकर पर्वत उठा लेते हैं। उनकी रक्षा से ब्रज सुरक्षित होता है और इंद्र का अभिमान टूट जाता है।
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पद 19 · राग गौरी
टेरीं कान्ह गोबर्धन चढ़ि गैया।
मथि मथि पियो बारि चारिक मैं भूख न जाति अघाति न घैया ।। 1 ।।
सैल सिखर चढ़ि चितै चकित चित, अति हित बचन कहो बल भैया।
बाँधि लकुट पट फेरि बोलाईं, सुनि कल बेनु धेनु धुकि धैया ।। 2 ।।
बलदाऊ! देखियत दूरि तैं, आवति छाक पठाई मेरी मैया।
किलकि सखा सब नचत मोर ज्यों, कूदत कपि कुरंग की नैया ।। 3 ।।
खेलत खात परसपर डहकत, छीनत कहत करत रोग दैया।
तुलसी बालकेलि सुख निरखत, बरषत सुमन सहित सुर सैया ।। 4 ।।
सरल हिंदी भावार्थगोवर्धन के पास कृष्ण गायों को पुकारते हैं। भूख-प्यास के बीच बलराम और सखाओं के साथ उनका गाय चराने का सहज खेल है। दूर से माँ की भेजी भोजन-सामग्री आती दिखाई देती है तो सभी उत्साह से नाच-कूद उठते हैं। मिलकर खाने और एक-दूसरे को चिढ़ाने की बाललीला देवताओं को भी सुख देती है।
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पद 20 · राग नट
गावत गोपाल लाल नीकें राग नट हैं।
चलि री आलि देखन, लोयन लाहु पेखन, ठाढ़े सुरतरु तर तटिनी के तट हैं ।। 1 ।।
मोरचंदा चारु सिर, मंजु गुंजापुंज धरें, बनि बनधातु तन ओढ़े पीत पट हैं।
मुरली तान तरँग, मोहे कुरँग बिहँग, जोहैं मूरति त्रिभंग निपट निकट हैं ।। 2 ।।
अंबर अमर हरषत बरषत फूल, स्नेह सिथिल गोप गाइन के ठट हैं।
तुलसी प्रभु निहारि जहाँ तहाँ ब्रज नारि, ठगी ठाढ़ी मग लिएँ रीते भरे घट हैं ।। 3 ।।
सरल हिंदी भावार्थसखी दूसरी सखी को बुलाती है कि चलो, नदी के किनारे वृक्ष के नीचे राग नट में गाते गोपाल को देखें। सिर पर मोरपंख, तन पर वन-सज्जा और पीतांबर है। बाँसुरी की तान पर पशु-पक्षी भी ठहर जाते हैं। गोपियाँ अपने घट लिए मार्ग में ही कृष्ण की त्रिभंग-मूर्ति पर मोहित खड़ी हैं।
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पद 21 · राग बिलावल
देखु सखी हरि बदन इंदु पर।
चिक्कन कुटिल अलक-अवली-छबि कहि न जाइ सोभा अनूप बर ।। 1 ।।
बाल भुअंगिनि निकर मनहुँ मिलि रहीं घेरि रस जानि सुधाकर।
तजि न सकहिं, नहिं करहिं पान, कहु, कारन कौन बिचारि डरहिं डर ।। 2 ।।
अरून बनज लोचन कपोल सुभ, स्त्रुति मंडित कुंडल अति सुंदर।
मनहुँ सिंधु निज सुतहि मनावन पठए जुगुल बसीठ बारिचर ।। 3 ।।
नँदनंदन मुख की सुंदरता कहि न सकत स्त्रुति सेष उमाबर।
तुलसिदास त्रैलोक्य बिमोहन रूप कपट नर त्रिबिध सूलहर ।। 4 ।।
सरल हिंदी भावार्थकृष्ण के चंद्रमुख पर घुँघराली अलकों की शोभा निराली है। आँखें, कपोल और कानों के कुंडल अनेक सुंदर उपमाएँ जगाते हैं। वेद, शेष और शिव भी उस सौंदर्य का पूरा वर्णन नहीं कर सकते। कवि मनुष्य जैसे दिखते इस दिव्य रूप में तीनों लोकों को मोहने और दुख हरने वाले प्रभु को देखते हैं।
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पद 22 · राग बिलावल
आजु उनीदे आए मुरारी।
आलसवंत सुभग लोचन सखि! छिन मूदत छिन देत उघारी ।। 1 ।।
मनहुँ इंदु पर खंजरीट द्वै कछुक अरुन बिधि रचे सँवारी।
कुटिल अलक जनु मार फंद कर, गहे सजग है रह्यो सँभारी ।। 2 ।।
मनहुँ उड़न चाहत अति चंचल पलक पंख छिन देत पसारी।
नासिक कीर, बचन पिक, सुनि करि, संगति मनु गुनि रहत बिचारी ।। 3।।
रुचिर कपोल, चारु कुंडल बर, भ्रुकुटि सरासन की अनुहारी।
परम चपल तेहि त्रास मनहुँ खग प्रगटत दुरत न मानत हारी ।। 4 ।।
जदुपति मुख छबि कलप कोटि लगि कहि न जाइ जाकें मुख चारी।
तुलसिदास जेहि निरखि ग्वालिनी भजीं तात पति तनय बिसारी ।। 5 ।।
सरल हिंदी भावार्थअलसाए नेत्रों वाले कृष्ण कभी पलकें मूँदते, कभी खोलते आते हैं। सखी उनके मुख, लालिमा लिए नेत्रों, अलकों, नासिका और वाणी की शोभा का वर्णन करती है। पक्षियों और चंद्रमा की उपमाओं के बीच कवि कहते हैं कि ब्रह्मा भी करोड़ों कल्पों में इस रूप का पूरा वर्णन नहीं कर सकते।
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पद 23 · राग गौरी
गोपाल गोकुल बल्लवी प्रिय गोप गोसुत बल्लभं।
चरनारबिंद महं भजे भजनीय सुर मुनि दुर्लभं ।। 1 ।।
घनश्याम काम अनेक छबि, लोकभिराम मनोहरं।
किंजल्क बसन, किसोर मूरति, भूरि गुन करुनाकरं ।। 2 ।।
सिर केकि पच्छ बिलोल कुंडल, अरून बनरूह लोचनं।
गुंजावतंस बिचित्र सब अँग धातु, भव भय मोचनं ।। 3 ।।
कच कुटिल, सुंदर तिलक भ्रू, राका मयंक समाननं।
अपहरन तुलसीदास त्रास बिहार बृंदाकाननं ।। 4 ।।
सरल हिंदी भावार्थकवि गोकुल की गोपियों, गोपों और बछड़ों के प्रिय गोपाल के चरण-कमलों का भजन करते हैं। मेघ के समान साँवला किशोर रूप, पीतवसन, मोरपंख, कुंडल, लाल कमल जैसे नेत्र और गुंजा की सज्जा मनोहर है। वृंदावन में विहार करने वाले करुणामय प्रभु से तुलसी अपना भय दूर करने की प्रार्थना करते हैं।
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3. ब्रज-विरह की व्यथा
पद 24 · राग बिलावल
बिछुरत श्रीब्रजराज आजु इन नयनन की परतीति गई।
उड़ि न लगे हरि संग सहज तजि, है न गए सखि स्याममई ।। 1 ।।
रूप रसिक लालची कहावत, सो करनी कछु तौ न भई।
साँचेहु कूर कुटिल सित मेचक, बृथा मीन छबि छीन लई ।। 2 ।।
अब काहें सोचत मोचत जल, समय गएँ चित सूल नई।
तुलसीदास जड़ भए आपहि तें, जब पलकनि हठि दगा दई ।। 3 ।।
सरल हिंदी भावार्थकृष्ण के ब्रज से जाते समय गोपी को अपनी आँखों पर ही अविश्वास हो गया है। रूप के रस की लालची कहलाने वाली आँखें उनके साथ क्यों न चली गईं? अब रोने से क्या लाभ! विरह की इस तीखी वाणी में पलकों से ओझल होते प्रिय को न रोक पाने की व्यथा है।
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पद 25 · राग कान्हरा
नहिं कछु दोष स्याम को माई!
जो दुख मैं पायों सुनि सजनी सो तो सबै मन की चतुराई ।। 1।।
निज हित लागि तबहिं ए बंचक सब अंगनि बसि प्रीति बढ़ाई।
लियो जो सकल सुख हरि अँग-सँग को, जहँ जेहि बिधि तहँ सोइ बनाई ।। 2 ।।
अब नँदलाल गवन सुनि मधुबन, तनहि तजत नहिं बार लगाई
रुचिर रूप-जल मो रसेस ह्वे मिलि, न फिरन की बात चलाई ।। 3 ।।
एहि सरीर बसि सखि वा सठ कहँ,कहि न जाइ जो निधि फिरि पाई।
तदपि कछू उपकार न कीन्हो, निज मिलन्यौ तहिं मोहि लिखाई ।। 4 ।।
आपु मिल्यो यहि भाँति जाति तजि, तनु मिलयो जल पय की नाई।
ह्वै मराल आयो सुफलक सुत, लै गयो छीर नीर बिलगाई ।। 5 ।।
मनहूँ तजी कान्हहूँ त्यागी, प्रानौ चलिहैं परिमिति पाई।
तुलसिदास रीतेहु तन ऊपर नयननि की ममता अधिकाई ।। 6 ।।
सरल हिंदी भावार्थविरहिणी कृष्ण को दोष देने के बजाय अपने मन से शिकायत करती है। मिलन के समय मन ने सुख पाया और अब प्रिय के मथुरा जाने पर मानो उन्हीं के साथ चला गया। अक्रूर के आगमन को दूध-पानी अलग करने वाले हंस की उपमा दी गई है। तन ब्रज में रह गया, पर मन कृष्ण के पास है।
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पद 26 · राग धनाश्री
करि है हरि बालक की सी केलि।
हरष न रचत, बिषाद न बिगरत ए डगरि चले हँसि खेलि ।। 1 ।।
बई बनाय बारि बृंदाबन प्रीति सँजीवनि बेलि।
सींचि सनेह सुधा, खनि काढ़ी लोक बेद परहेलि ।। 2 ।।
तृन ज्यों तजीं, पालि तनु ज्यों हम बिधि बासव बल पेलि।
एतहु पर भावत तुलसी प्रभु गए मोहिनी मेलि ।। 3 ।।
सरल हिंदी भावार्थगोपी को लगता है कि कृष्ण ने प्रेम को बालक के खेल जैसा बना दिया। वृंदावन में स्नेह की संजीवनी बेल उगाई और फिर उसे छोड़ दिया। जिन्होंने ब्रज की रक्षा की, वही आज दूर चले गए। यह विरह की व्यंग्यभरी शिकायत है जिसमें छोड़े जाने का दुख और पुराने उपकार की स्मृति साथ हैं।
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पद 27 · राग धनाश्री
आलि! अब कहुँ जनि नेह निहारि।
समुझें सहें हमारो है हित बिधि बामता बिचारि ।। 1 ।।
सत्य सनेह सील सोभा सुख सब गुन उदधि अपारि।
देख्यो सुन्यो न कबहुँ काहु कहुँ मीन बियोगी बारि ।। 2 ।।
कहियत काकु कूबरीहूँ को, सो कुबानि बस नारि।
बिष तें बिषम बिनय अनहित की, सुधा सनेही गारि ।। 3 ।।
मन फेरियत कुतर्क कोटि करि कुबल भरोसे भारि।
तुलसी जग दूजा न देखियत कान्ह कुँवर अनुहारि ।। 4 ।।
सरल हिंदी भावार्थसखी समझाती है कि प्रतिकूल भाग्य को समझकर दुख सहना ही अब हितकर है। एकतरफा वियोग में प्रेमी की पीड़ा को जल से बिछुड़ी मछली की तरह व्यक्त किया गया है। वह कटु तर्कों से मन फेरना चाहती है, फिर भी मानती है कि संसार में कृष्ण के समान दूसरा कोई नहीं।
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पद 28 · राग धनाश्री
लागियै रहति नयननि आगे तें न टरति मोहन मूरति।
नील नलिन स्याम सोभा अगनित काम, पावन हृदय जेहिं फूरति ।। 1।।
अमित सारादा सेष नहीं कहि सकत अंग अँग सूरति।
तुलसिदास बड़े भाग मन लागेहु तें सब सुख पूरति ।। 2 ।।
सरल हिंदी भावार्थमोहन की मूर्ति आँखों के सामने से हटती ही नहीं। नील कमल जैसे श्याम सौंदर्य की प्रत्येक छवि मन में बस गई है। सरस्वती और शेष भी उस रूप का वर्णन पूरा नहीं कर सकते। कवि के अनुसार ऐसा अनुराग मिलना सौभाग्य है और उसी में भक्त अपने सुख की पूर्णता देखता है।
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पद 29 · राग धनाश्री
जब ते ब्रज तजि गये कन्हाई।
तब ते बिरह रबि उदित एकरस सखि! बिछुरन बृष पाई ।। 1 ।।
घटत न तेज, चलत नाहिन रथए रह्यो उर नभ पर छाई।
इन्द्रिय रूप रासि सोचहि सुठि सुधि सब की बिसराई ।। 2 ।।
भया सोक भय कोक कोकनद भ्रम भ्रमरनि सुखदाई।
चित चकोर, मन मोर, कुमुद मुद, सकल बिकल अधिकाई ।। 3 ।।
तनु तड़ाग बल बारि सुखन लाग्यो परि कुरुपता काई।
प्रान मीन दिन दीन दूबरेए दसा दुसह अब आई ।। 4 ।।
तुलसीदास मनोरथ मन मृग मरत जहाँ तहँ धाई।
राम स्याम सावन भादौं बिनु जिय की जरनि न जाई ।। 5 ।।
सरल हिंदी भावार्थकृष्ण के जाने से विरह का सूर्य हृदय के आकाश में स्थिर हो गया है। देहरूपी सरोवर सूख रहा है और प्राणरूपी मछली व्याकुल है। मन, इंद्रियाँ और इच्छाएँ सब विरह से विचलित हैं। कृष्ण-बलराम की सावन-भादों जैसी शीतल उपस्थिति के बिना यह अंतर-दाह नहीं मिटता।
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पद 30 · राग धनाश्री
ससि तें सीतल मोकौं लागै माई री! तरनि।
याके उएँ बरति अधिक अँग अँग दव, वाके उएँ मिटति रजनि जनित जरनि ।। 1 ।।
सब बिपरीत भए माधव बिनु, हित जो करत अनहित की करनि।
तुलसीदास स्यामसुंदर-बिरह की दुसह दसा सो मो पैं परति नहीं बरनि ।। 2 ।।
सरल हिंदी भावार्थगोपी कहती है कि चंद्रमा की अपेक्षा सूर्य अधिक शीतल लगता है। चंद्रमा रात में प्रिय की याद बढ़ाकर विरह-दाह को तीव्र करता है, जबकि सूर्य उगने पर रात का दुख कुछ घटता है। माधव के बिना सुख देने वाली वस्तुएँ भी विपरीत प्रभाव करती हैं; कवि इसी असह्य अवस्था को दिखाते हैं।
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पद 31 · राग धनाश्री
संतत दुखद सखी! रजनीकर।
स्वारथ रत तब, अबहुँ एकरस, मो को कबहूँ न भयो तापहर ।। 1 ।।
निज अंसिक सुख लागि चतुर अति, कीन्ही प्रथम निसा सुभ सुंदर।
अब बिनु मन तन दहतए दया करि। राखत रबि ह्वै नयन बारिधर ।। 2 ।।
जद्यपि है दारून बड़वानल, राख्यो है जलधि गँभीर धीरतर।
ताहु तें परम कठिन जान्यो ससि, तज्यो पिता, तब भयो ब्योमचर ।। 3 ।।
सकल बिकार कोस बिरहिनि रिपु काहे तें याहि सराहत सुर नर।
तुलसिदास त्रैलाक्य मान्य भयो, कारन इहै, गह्यो गिरिजाबर ।। 4 ।।
सरल हिंदी भावार्थविरहिणी चंद्रमा पर उलाहना देती है कि वह कभी उसका ताप हरने वाला नहीं हुआ। पहले मिलन की रात में उपयोगी लगता था, अब उसके बिना तन-मन जलाता है। समुद्र और शिव से जुड़ी चंद्रमा की उपमाओं में उसका क्रोध भी व्यक्त है। यह विरह की भाव-दृष्टि है।
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पद 32 · राग मलार
कोउ सखि नई बात सुनि आई।
यह ब्रजभूमि सकल सुरपति सों, मदन मिलिक करि पाई ।। 1।।
घन धावनए बग पाँति पटो सिर, बैरख तड़ित सोहाई।
बेलत पिक नकीब, गरजनि मिस, मानहुँ फिरत दोहाई ।। 2 ।।
चतक मोर चकोर मधुप सुक सुमन समीर सहाई।
चहत कियो बास बृंदाबनए बिधि सों कछु न बसाई ।। 3 ।।
सींव न चाँपि सक्यो कोऊ तब, जब हुते राम कन्हाई।
अब तुलसी गिरिधर बिनु गोकुल कौन करिहि ठकुराई ।। 4 ।।
सरल हिंदी भावार्थवर्षा का दृश्य गोपी को कामदेव का ब्रज पर अधिकार लगता है। बादल, बिजली, पक्षी, फूल और पवन उसकी सेना जैसे हैं। कृष्ण-बलराम के रहते कोई इस सीमा पर अधिकार नहीं कर सकता था; अब विरह में ऋतु की हर शोभा पीड़ा बढ़ाती है। कृष्ण के बिना ब्रज को कौन संभाले!
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4. गोपी–उद्धव संवाद
पद 33 · राग सोरठा
ऊधो! या ब्रज की दसा बिचारौ।
ता पाछे यह सिद्धि आपनी जोग कथा बिस्तारौ ।। 1 ।।
जा कारन पठए तुम माधव, सो सोचहु मन माहीं।
कोतिक बीच बिरह परमारथ, जानत हौ किधौं नाहीं ।। 2 ।।
परम चतुर निज दास स्याम के, संतत निकट रहत हौ।
जल बूड़त अवलंब फेन कौ फिरि-फिरि कहा कहत हौ? ।। 3 ।।
वह अति ललित मनोहर आनन कौने जतन बिसारौं।
जोग जुगुमि अरू मुकुति बिबिध बिधि वा मुरली पर वारौं ।। 4 ।।
जेहिं उस बसत स्यामसुंदर घन, तेहिं निर्गुन कस आवैं।
तुलसिदास सो भजन बहावौ, जाहि दूसरो भावै ।। 5 ।।
सरल हिंदी भावार्थगोपियाँ उद्धव से कहती हैं कि पहले ब्रज की विरह-दशा समझें, फिर योग का उपदेश दें। डूबते को झाग का सहारा देने जैसी शिक्षा उन्हें उपयोगी नहीं लगती। मन में श्यामसुंदर पहले से बसे हैं; उनकी मुरली के आगे वे योग और मुक्ति भी न्योछावर करती हैं। प्रेम का अनुभव इस संवाद का केंद्र है।
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पद 34 · राग सोरठा
मधुकर! कहहु कहन जो पारौ।
बलि, नाहिन अपराध रावरो, सकुचि साध जनि मारौ ।। 1 ।।
नहिं तुम ब्रज बसि नन्दलाल को बालबिनोद निहारौ।
नाहिन रास रसिक रस चाख्यो, तात डेल सो डारौं ।। 2 ।।
तुलसी जौ न गए, प्रीपम सँग प्रान त्यागि तनु न्यारौ।
तौ सुनिबो देखिबो बहुत अब कहा करम सों चारौ ।। 3 ।।
सरल हिंदी भावार्थगोपियाँ उद्धव को अपनी बात कहने देती हैं और उन्हें व्यक्तिगत दोष नहीं देतीं। उनका कहना है कि जिसने ब्रज की बाललीला और रास का रस न देखा हो, वह उनकी स्थिति कैसे समझेगा? प्रिय के जाने पर प्राण भी साथ न गए, इसलिए अब बहुत कुछ सुनना-सहना शेष है।
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पद 35 · राग सोरठा
ऊधो जू कह्यो तिहारोइ कीबो।
नीकें जिय की जाने अपनपौ समुझि सिखावन दीबो ।। 1 ।।
स्याम बियोगी ब्रज के लोगिनि जोग जोग जो जानौ।
तौ सँकोच परिहरि पा पागौं परमारथहि बखानौ ।। 2 ।।
गोपी गाय ग्वाल गोसुत सब रहत रूप अनुरागे।
दीन मलीन छीन तनु डोलत मीन मजा सों लागे ।। 3 ।।
तुलसी है सनेह दुखदायक, नहिं जानत ऐसो को है।
तऊ न होत कान्ह को सो मन, सबै साहिबहि सोहै।। 4 ।।
सरल हिंदी भावार्थगोपियाँ विनोद और पीड़ा के बीच कहती हैं कि उद्धव उन्हें ठीक पहचानकर ही शिक्षा दें। गाय, बछड़े, गोप और गोपियाँ सब कृष्ण के रूप में अनुरक्त हैं और विरह में क्षीण हो रहे हैं। प्रेम से दुख होता है, यह सब जानते हैं; फिर भी कृष्ण से मन हटाना उनके बस में नहीं।
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पद 36 · राग बिलावल
सो कहौ मधुप! जे मोहन कहि पठई।
तुम सकुचत कत? हौंही नीकें जानति, नंदनंदन हो निपट करी सठई ।। 1 ।।
हुतो न साँचो सनेह, मिट्यो मन को सँदेह हरि परे उघरि, सँदेसहु ठठई।
तुलसिदास कौन आस मिलन की, कहि गये सो तौ कछु एकौ न चित ठई ।। 2 ।।
सरल हिंदी भावार्थगोपी उद्धव से कृष्ण का संदेश बिना संकोच सुनाने को कहती है। उसे लगता है कि वचन निभाने के बदले यह शिक्षा भेजकर प्रिय ने ठिठोली की है। मन का संशय अब शिकायत में बदलता है—जब पुराने आश्वासन ही स्मरण नहीं रहे, तो मिलने की आशा किस आधार पर रखी जाए!
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पद 37 · राग बिलावल
मेरे जान और कछु न मन गुनिए।
कूबरी रवन कान्ह कही जो मधुप सों, सोई सिख सजनी ! सुचित दै सुनिए ।। 1 ।।
काहे को करति रोष, देहि धौं कौन को दोष, निज नयननिको बयो सब लुनिए।
दारु सरीर, कीट पहिले सुख, सुमिरि सुमिरि बासर निसि धुनिए ।। 2 ।।
ये सनेह सुचि अधिक अधिक रुचि, बरज्यो न करत कितो सिर धुनिए।
तुलसीदास अब नंदसुवन हित बिषम बियोग अनल तनु हुनिए ॥ 3 ॥
सरल हिंदी भावार्थसखी कहती है कि कृष्ण ने जो शिक्षा भेजी है, उसे ध्यान से सुनें और दूसरों पर दोष न दें। विरह में बीते सुखों की स्मृति भीतर से कुतरती रहती है। प्रेम रोकने से भी नहीं रुकता। पद में शिकायत के साथ आत्मसंयम और प्रिय के हित में दुख सहने की भावना जुड़ी है।
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पद 38 · राग बिलावल
भली कही, आली हमहुँ पहिचाने।
हरि निर्गुन, निर्लेप, निरपने, निपट निठुर, निज काज सयाने ।। 1 ।।
ब्रज को बिरह, अरु संग महर को, कुबरिहि बरत न नेकु लजाने।
समुझि सो प्रीति की रीति स्याम की, सोइ बावरि जो परेखो उर आने ।। 2 ।।
सुनत न सिख लालची बिलोचन, एतेहु पर रुचि रूप लोभाने।
तुलसीदास इहै अधिक कान्ह पहिं, नीकेई लागत मन रहत समाने ।। 3 ।।
सरल हिंदी भावार्थगोपियाँ निर्गुण, निर्लेप और निरपेक्ष जैसे शब्दों पर व्यंग्य करती हैं। उन्हें लगता है कि कृष्ण ब्रज और माता के प्रेम को भूलकर मथुरा में नए संबंधों में रम गए हैं। इतनी शिकायत के बाद भी आँखें उनकी सुंदरता ही चाहती हैं। उलाहने के भीतर प्रेम की अटूट स्थिति बनी रहती है।
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पद 39 · राग मलार
जो पै अलि! अंत इहै करिबो हो।
तौ अगनित अहीर अबलनि को हठि न हियो हरिबो हो ।। 1 ।।
जौ प्रंपच करि नाम प्रेम फिरि अनुचित आचरिबो हो।
तौ मथुराहि महाहिमा लहि सकल ढरनि ढरिबो हो ।। 2 ।।
दै कूबरिहि रूप ब्रज सुधि भएँ लौकिक डर डरिबो हो।
ग्यान बिराग काल कृत करतब हमरहि सिर धरिबो हो।
उन्हहि राग रबि नीरद जल ज्यों प्रभु परिमिति परिबो हो।
हमहुँ निठुर निरूपाधि नीर निधिनिज भुजबल तरिबो हो ।। 4 ।।
भलो भयो सब भाँति हमारोए एक बार मरिबो हो।
तुलसी कान्ह बिरह नित नव जरजरि जीवन भरिबो हो ।। 5 ।।
सरल हिंदी भावार्थगोपी कहती है कि यदि अंत में छोड़ना ही था, तो कृष्ण ने ब्रज की स्त्रियों के हृदय क्यों बाँधे? अब ज्ञान-वैराग्य का संदेश भेजना उसे प्रिय की दूरी का नया रूप लगता है। वह इस विरह को कठिन सागर मानती है। पद की तीखी वाणी बार-बार दुख सहने की असहायता व्यक्त करती है।
↑ विषय-सूची
पद 40 · राग मलार
ऊधो! यह ह्याँ न कछू कहिबे ही।
ग्यान गिरा कुबरीरवन की सुनि बिचारि गहिबे ही ।। 1 ।।
पाइ रजाइ, नाइ सिर, गृह ह्वै गति परमिति लहिबे ही।
मति मटुकी मृगजल भरि घृत हित मन-हीं-मन महिबे ही ।। 2 ।।
गाडे भली, उखारे अनुचित, बनि आएँ बहिबे ही।
तुलसी प्रभुहिं तुमहिं हमहूँ हियँ सासति सी सहिबे ही ।। 3 ।।
सरल हिंदी भावार्थगोपियाँ कहती हैं कि अब तो उद्धव के संदेश को सिर झुकाकर मानना ही पड़ेगा। पर उनकी दृष्टि में उससे प्रेम-पीड़ा का समाधान निकालना मृगजल से घी मथने जैसा है। रोपना, उखाड़ना और बह जाना—इन उपमाओं में प्रेम की अस्थिर परिस्थिति तथा हृदय की विवशता सामने आती है।
↑ विषय-सूची
पद 41 · राग मलार
मधुकर! कान्ह कही ते न होही।
कै ये नई सीख सिखई हरि निज अनुराग बिछोही ।। 1 ।।
राखी सचि कूबरी पीठ पर ये बातें बकुचौहीं।
स्याम सो गाहक पाइ सयानी! खोलि देखाई है गौहीं ।। 2 ।।
नगर मनि सो सागर जेहिं जग जुबतीं हँसि मोहीं।
लियो रूप दै ग्यान गाँठरी भलो ठग्यो ठगु ओहीं ।। 3 ।।
है निर्गुन सारी बारिक, बलि घरी करौं, हम जोही।
तुलसी ये नागरिन्ह जोग पट, जिन्हहि आजु सब सोही ।। 4 ।।
सरल हिंदी भावार्थगोपियाँ संदेह और व्यंग्य से कहती हैं कि यह शिक्षा कृष्ण की अपनी कैसे हो सकती है! कुब्जा, सौदा और वस्त्र की उपमाओं में वे संदेश की चतुराई पर चुटकी लेती हैं। जिस निर्गुण साधना को वे अपने अनुभव से असंगत पाती हैं, उसे नगर की चतुर स्त्रियों के लिए उपयुक्त बताती हैं।
↑ विषय-सूची
पद 42 · राग मलार
मधुप! तुम्ह कान्ह ही की कही क्यों न कही है?
यह बतकही चपल चेरी की निपट चरेरीयै रही है।। 1 ।।
कब ब्रज तज्यो, ग्यान कब उपज्यो? कब बिदेहता लही है?
गए बिसरि रीति गोकुल की, अब निर्गुन गति गही है।। 2 ।।
आयसु देहु, करहिं सोइ सिर धरि, प्रीति परमिति निरबही है।
तुलसी परमेस्वर न सहैगो, हम अबलनि सब सही है।। 3 ।।
सरल हिंदी भावार्थगोपियाँ उद्धव से पूछती हैं कि वे सीधे कृष्ण की कही बात क्यों नहीं कहते। ब्रज की प्रेम-रीति भूलकर निर्गुण की ओर मुड़ने का उलाहना देती हैं। वे मान लेने का संकेत भी करती हैं, पर कहती हैं कि उनके दुख की सीमा किसी ने नहीं जानी। यह आहत प्रेम की व्यंग्यपूर्ण वाणी है।
↑ विषय-सूची
पद 43 · राग मलार
दीन्हीं हैं मधुप सबहि सिख नीकी।
सोइ आदरौ, आस जाके जिय बारि बिलोवत घी की ।। 1 ।।
बुझी बात कान्ह कुबरी की, मधुकर कछु जनि पूछौ।
ठालीं ग्वालि जानि पठए, अलि, कह्यो है पछोरन छूछौ ।। 2 ।।
हमहूँ कछुक लखी ही तब की औरेब नंदलला की।
ये अब लही चतुर चेरी पै चोखी चाल चलाकी ।। 3 ।।
गए कर तें घर तें, आँगन तें ब्रजहू तें ब्रजनाथ।
तुलसी प्रभु गयो चहत मनहु तें, सो तो है हमारे हाथ ।। 4 ।।
सरल हिंदी भावार्थगोपियाँ कहती हैं कि जिन्हें जल मथकर घी पाने की आशा हो, वे यह शिक्षा स्वीकार करें। कृष्ण ब्रज, घर और आँगन से जा चुके हैं; अब क्या मन से भी उन्हें निकालना होगा? बाहरी दूरी सह सकती हैं, पर हृदय में बसे कृष्ण को सुरक्षित रखना वे अपने अधिकार की बात मानती हैं।
↑ विषय-सूची
पद 44 · राग मलार
ताकी सिख ब्रज न सुनैगो कोउ भोरें।
जाकी कहनि रहनि अनमिल अलि! सुनत समझियत थोरें ।। 1 ।।
आपु कंज मकरंद सुधाह्रद हृदय रहत नित बोरें ।
हम सों कहत बिरह-स्त्रम जैहे गगन कूप खनि खोरें ।। 2 ।।
धान को गाँव पयार तें जानिय ग्यान बिषय मन मोरें।
तुलसी अधिक कहें न रहै रस, गूलरि को सो फल फोरें ।। 3 ।।
सरल हिंदी भावार्थगोपी कथनी और करनी में मेल का प्रश्न उठाती है। मधुकर स्वयं कमल का मधुर रस लेता है और उन्हें विरह मिटाने के लिए निराधार उपाय बताता है। वह कहती है कि थोड़े संकेत से ही बात समझ आती है; अधिक खोलने से प्रेम का रस घटेगा। व्यंग्य संदेशवाहक की असंगति पर है।
↑ विषय-सूची
पद 45 · राग मलार
आली! अति अनुचित, उतरु न दीजै।
सेवक सखा सनेही हरि के, जो कछु कहैं सो कीजै ।। 1 ।।
देस काल उपदेस सँदेसो सादर सब सुनि लीजै।
कै समुझिबो कै ये समुझैहैं, हारेहुँ मानि सहीजै ।। 2 ।।
सखि सरोष प्रिय दोष बिचारत प्रम पीन पन छीजै।
खग मृग मीन सलभ सरसिज गति सुनि पाहनौ पसीजै ।। 3 ।।
ऊधो परम हितू हित सिखवत परमिति पहुँचि पतीजै।
तुलसिदास अपराध आपनो, नंदलाल पहुँचि बिनु जीजै ।। 4 ।।
सरल हिंदी भावार्थएक सखी दूसरी को रोकती है कि कृष्ण के सेवक और सखा से कटु उत्तर न दें। संदेश का आदरपूर्वक विचार करें; या वे समझेंगे, या हम समझेंगे। प्रिय के दोष सोचते रहने से प्रेम की मर्यादा घटती है। अपनी व्यथा के बीच भी सम्मान और विनम्रता बनाए रखने का आग्रह है।
↑ विषय-सूची
पद 46 · राग मलार
ऊधो हैं बड़े, कहैं सोइ कीजै।
अलि ए पहिचानि प्रेमकी परिमिति उतरु फेरि नहिं दीजै ।। 1 ।।
जननी जनक जरठ जाने, जन परिजन लोगु न छीजै।
दै पठयो पहिलो बिढ़तो ब्रज, सादर सिर धरि लीजै ।। 2 ।।
कंस मारि जदुबंस सुखी कियो, स्त्रवन सुजस सुनि जीजै।
तुलसी त्यों-त्यों होइगी गरूई, ज्यों ज्यों कामरि भीजै ।। 3 ।।
सरल हिंदी भावार्थसखी उद्धव को बड़ा और कृष्ण का आत्मीय मानकर उनकी बात सुनने को कहती है। वृद्ध माता-पिता और ब्रजवासियों के सुख का भी ध्यान है। कंस-वध तथा यदुवंश को मिले सुख का समाचार सुनकर जीवन बिताने की बात कही जाती है। फिर भी विरह की पीड़ा भीगते कंबल की तरह लगातार भारी होती जाती है।
↑ विषय-सूची
पद 47 · राग मलार
कान्ह, अलि, भए नए गुरु ग्यानी।
तुम्हरे कहत आपने समुझत बात सही उर आनी ।। 1 ।।
लिए अपनाइ लाइ चंदन तन, कछु कटु चाह उड़ानी।
जरी सुँघाइ कूबरी कौतुक करि जोगी बघा-जुड़ानी ।। 2 ।।
ब्रज बसि रास बिलास, मधुपुरी चेरी सों रति मानी।
जोग जोग ग्वालिनी बियोगिनि जान सिरोमनि जानी ।। 3 ।।
कहिबे कछूए कछू कहि जैहै, रहौ आलि! अरगानी।
तुलसी हाथ पराएँ प्रीतम, तुम्ह प्रिय हाथ बिकानी ।। 4 ।।
सरल हिंदी भावार्थगोपियाँ विनोद से कहती हैं कि कृष्ण अब नए ज्ञानगुरु हो गए हैं। ब्रज में प्रेमलीला करने वाले ने विरहिणियों को योग सिखाने भेजा है। कुब्जा की ओर संकेत करके उनकी चंचलता पर चुटकी ली जाती है। उलाहने के अंत में भी स्वीकार है कि प्रिय दूर हैं, लेकिन गोपियाँ प्रेम में उन्हीं की हैं।
↑ विषय-सूची
पद 48 · राग मलार
सब मिलि साहस करिय सयानी।
ब्रज आनियहिं मनाइ पायँ परि कान्ह कूबरी रानी ।। 1 ।।
बसैं सुबास, सुपास हेहिं सब फिरि गोकुल रजधानीं।
महरि महर जीवहिं सुख जीवन खुलहिं मोद मनि खानीं ।। 2 ।।
तजि अभियान अनख अपनों हित कीजिय मुनिबर वानी।
देखिबो दरस दूसरेहुँ बड़ो लाभ, लघु हानि ।। 3 ।।
पावक परत निषिद्ध लाकरी होति अनल जग जानी।
तुलसी सो तिहुँ भुवन नंदसुवन सनमानी ।। 4 ।।
सरल हिंदी भावार्थसखी प्रस्ताव देती है कि मान और रोष छोड़कर कृष्ण तथा कुब्जा को भी आदर से ब्रज बुलाएँ। उनके आने से नंद-यशोदा सहित सबका जीवन फिर सुखी होगा। यदि प्रिय का दर्शन हो जाए तो थोड़ा मान छोड़ना बड़ी हानि नहीं। पद मिलन की इच्छा को अहंकार से ऊपर रखता है।
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पद 49 · राग मलार
कही है भली बात सब के मन मानी।
प्रय समप्रिय सनेह भाजन सखि प्रीय-रीति जग जानी ।। 1 ।।
भूषन भूति गरल परिहरि कै हर मूरित उर आनी।
मज्जन पान कियो के सुरसरि कर्मनास जल छानी ।। 2 ।।
पूँछ सो प्रेम, बिरोध सींग सों एहिं बिचार हित हानी।
कीजै कान्ह कुबरी सों नित नेह करम मन बानी ।। 3 ।।
तुलसी तजिय कुचालि आलि! अब, सुधरै सबइ नसानी।
आगें करि मधुकर मथुरा कहँ सोधिय सुदिन सयानी ।। 4 ।।
सरल हिंदी भावार्थसखियाँ इस बात को उचित मानती हैं कि प्रिय के प्रिय का भी सम्मान किया जाए। शिव और गंगा से जुड़ी उपमाएँ बताती हैं कि आदर में मनपसंद अंश ही चुनना पूरा प्रेम नहीं। वे मन, वचन और कर्म से स्नेह रखने तथा शुभ दिन देखकर मथुरा जाने की तैयारी की बात करती हैं।
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पद 50 · राग कान्हरा
हे हम समाचार सब पाए।
अब बिसेष देखे तुम देखे, हैं कूबरी हाँक से लाए ।। 1 ।।
मथुरा बड़ो नगर नागर जन, जिन्ह जातहिं जदुनाथ पढ़ाए।
समुझि रहनिए सुनि कहनि बिरह ब्रन, अनख अमिय ओषध सरुहाए ।। 2 ।।
मधुकर रसिक सिरोमनि कहियत, कौने यह रस रीति सिखाए।
बिनु आखर को गीत गाइ कै चाहत ग्वालिन ग्वाल रिझाए ।। 3 ।।
फल पहिले हीं लों ब्रजबासिन्ह, टब साधन उपदेसन आए।
तुलसी अलि अजहुँ नहीं बूझत, कौन हेतु नँदलाल पठाए ।। 4 ।।
सरल हिंदी भावार्थगोपियाँ कहती हैं कि समाचार उन्हें मिल चुके हैं; उद्धव को देखकर और भी समझ आया। उन्हें यह विरोध खटकता है कि रस के ज्ञाता प्रेम छोड़ने की शिक्षा कैसे देते हैं। जिसने पहले ही प्रेम का फल चखा हो, उसे अब आरंभिक साधन बताना व्यर्थ लगता है। वे कृष्ण के संदेश का वास्तविक प्रयोजन पूछती हैं।
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पद 51 · राग कान्हरा
कौन सुनै अलि की चतुराई।
अपनिहिं मतिबिलास अकास महँ चाहत सियनि चलाई ।। 1 ।।
सरल सुलभ हरिभगति सुखाकर निगम पुराननि गाई ।
तजि सोइ सुधा मनोरथ करि को मरिहै री, माई ।। 2 ।।
जद्यपि ताको सोइ मारग प्रिय जहाँ बनि आई ।
मैन के दसन कुलिस के मोदक कहत सुनत बौराई ।। 3 ।।
सुगन छीरनिधि तीर बसत ब्रज तिहुँ पुर बिदित बड़ाई।
आक दुहन तुम कह्मो, सो परिहरि हम यह मति नहिं पाई ।। 4 ।।
जानत हैं जदुनाथ सबनि की बुधि बिबेक जड़ताई।
तुलसीदास जनि बकहि मधुप सठ! हठ निसि दिन अँवराई ।। 5 ।।
सरल हिंदी भावार्थगोपियाँ कहती हैं कि वेद-पुराणों में गाई सरल हरिभक्ति को छोड़कर कठिन और अनुपयुक्त उपाय क्यों अपनाएँ? मोम के दाँतों से वज्र चबाने और दूध के बदले आक दुहने जैसी उपमाएँ इस असंगति को दिखाती हैं। कृष्ण सबकी समझ जानते हैं; उद्धव से हठ छोड़कर ब्रज की स्थिति समझने की अपेक्षा है।
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पद 52 · राग केदार
गोकुल प्रीति नित नई जानि।
जइ अनत सुनाइ मधुकर ग्यान गिरा पुरानि ।। 1 ।।
मिलहिं जोगी जरठ तिन्हहि देखाउ निरगुन खानि।
नवल नंदकुमार के ब्रज सगुन सुजस बखानि ।। 2 ।।
तू जो हम आदर्यो, सो तो ब्रज कमल की कानिं।
तजहि तुलसी समुझि यह उपदेसिबे की बानि ।। 3 ।।
सरल हिंदी भावार्थब्रज का प्रेम प्रतिदिन नया है। गोपियाँ उद्धव से कहती हैं कि पुराना निरपेक्ष ज्ञान किसी दूसरे श्रोता को सुनाएँ; यहाँ नंदकुमार के सगुण रूप और सुयश की चर्चा ही सुहाती है। संदेशवाहक का आदर कृष्ण से उनके संबंध के कारण है। वे उसे अपने प्रेमानुभव के अनुरूप बात करने को कहती हैं।
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पद 53 · राग केदार
काहे को कहत बचन सँवारि।
ग्यानगाहक नाहिनै ब्रज, मधुप! अनत सिधारि ।। 1 ।।
जुगुति धूम बघारिबे की समुझिहैं न गँवारि।
जोगिजन मुनिमंडली मों जाइ रीती ढारि ।। 2 ।।
सुनै तिन्ह की कौन तुलसीण् जिन्हहि जीति न हारि।
सकति खारो कियो चाहत मेघहू को बारि ।। 3 ।।
सरल हिंदी भावार्थगोपियाँ स्पष्ट कहती हैं कि ब्रज इस प्रकार के ज्ञान का ग्राहक नहीं। योगियों और मुनियों की सभा में ऐसी युक्तियाँ समझी जा सकती हैं; उनकी सहज प्रेममति पर वे नहीं टिकतीं। खारेपन और मेघजल की उपमा से वे अपने सरस अनुभव को कठोर तर्क में बदलने का विरोध करती हैं।
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पद 54 · राग केदार
ऐसो हौंहुँ जानति भृंग!
नाहिनै काहूँ लह्यो सुख प्रीति करि इक अंग ।। 1 ।।
कौन भीर जो नीरदहि, जेहि लागि रटत बिहंग।
मीन जल बिनु तलफि तनु तजै, सलिल सहज असंग ।। 2 ।।
पीर कछू न मनिहि, जाकें बिरह बिकल भुअंग।
ब्याध बिसिख बिलोक नहिं कलगान लुबुध कुरंग ।। 3 ।।
स्यामघन गुनबरि छबिमनि मुरलि तान तरंग।
लग्यो मन बहु भाँति तुलसी होइ क्यों रसभंग? ।। 4 ।।
सरल हिंदी भावार्थगोपी एकतरफा प्रेम की पीड़ा जानती है। चातक-मेघ, मछली-जल, सर्प-मणि और मृग-संगीत की उपमाएँ बताती हैं कि प्रेमी अपनी सुध खो बैठता है। फिर भी कृष्ण के गुण, रूप और मुरली की तान ने मन को अनेक ओर से बाँध रखा है। केवल समझाने से यह रस टूट नहीं सकता।
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पद 55 · राग केदार
ऊधो! प्रीति करि निरमोहियन सों को न भयो दुख दीन?।
सनत समुझत कहत हम सब भई अति अप्रबीन ।। 1 ।।
अहि कुरंग पतंग कुरंग कंज चकोर चातक मीन।
बैठि इन की पाँति अब सुख चहत मन मतिहीन ।। 2 ।।
निठुरता अरू नेह की गति कठित परति कही न।
दास तुलसी सोच नित निज प्रेम जानि मलीन ।। 3 ।।
सरल हिंदी भावार्थगोपियाँ उद्धव से कहती हैं कि निर्मोह से प्रेम करके कौन दुखी नहीं हुआ! फिर अपनी ही अपरिपक्व समझ पर खेद करती हैं। अनेक प्रेम-उपमाओं में जीव का एकनिष्ठ लगाव और उसकी पीड़ा आती है। तुलसी अंत में अपने प्रेम को भी अपूर्ण मानते हुए आत्मपरीक्षण का भाव व्यक्त करते हैं।
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पद 56 · राग गौरी
सुनत कुलिस सम बचन तिहारे।
चित दै मधुर! सुनइु सोइ कारन, जाते जात न प्रान हमारे ।। 1 ।।
ग्यान कृपान समान लगत उर, बिहरत छिन-छिन होत निनारे।
अविध जरा जोरति हठि पुरि-पुनि, याते रहत सहत दुख भारे ।। 2 ।।
पवक बिरह, समीर स्वास, तनु तूल मिले तुम जारनिहारे।
तिन्हहि निदरि अपने हित कारन, राखत नयन निपुन रखवारे ।। 3 ।।
जीवन कठिन, मरन की यह गति, दुसह बिपति ब्रजनाथ निवारे।
तुलसिदास यह दसा जानि जियँ, उचित होइ सो कहौ अलि! प्यारे ।। 4 ।।
सरल हिंदी भावार्थउद्धव के वचन गोपियों को वज्र और ज्ञान की धार तलवार जैसी लगती है। विरह की आग, श्वास का पवन और रुई जैसे शरीर की उपमा से असह्य पीड़ा बताई गई है। आँखों के आँसू मानो इस तन को बचाए हुए हैं। वे संदेशवाहक से अपनी दशा समझकर उचित उपाय कहने का आग्रह करती हैं।
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पद 57 · राग गौरी
छपद! सुनहु बर बचन हमारे।
बिनु ब्रजनाथ ताप नयननि को कौन हरे, हरि अंतर कारे ।। 1 ।।
कनक कुंभ भरि-भरि पियूष जल बरषत जलद कलप सत हारे।
कदलि सीप, चातक को कारज स्वाति बारि बिनु कोउ न सँवारे ।। 2 ।।
सब अँग रुचिर किसोर स्यामघन जेहिं ह्यदि जलज बसत हरि प्यारे।
तेहिं उर क्यों समात बिराट बपु स्यों महि सरित सिंधु गिरि भारे ।। 3 ।।
बढ्यो प्रेंम अति प्रलय के बर ज्यों बिपुल जोग जल बोरि न पारे।
तुलसिदास ब्रज बनितनि को ब्रत समरथ को करि जतन निवारे ।। 4 ।।
सरल हिंदी भावार्थगोपियाँ कहती हैं कि ब्रजनाथ के बिना आँखों का ताप कोई और नहीं हर सकता। जैसे चातक की प्यास विशेष जल से जुड़ी है, वैसे ही उनके हृदय में किशोर श्याम का रूप बसा है। विशाल निराकार या विराट धारणा उस व्यक्तिगत प्रेम का स्थान नहीं लेती। उनकी प्रतिज्ञा प्रेम में अचल रहने की है।
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पद 58 · राग गौरी
मधुप! समुझि देखहु मन माहीं।
प्रेम पियूषरूप उड़ुपति बिनु कैसे हो अलि! पैयत रबि पाहीं ।। 1 ।।
जद्यपि तुम हित लागि कहत सुनि स्त्रवन बचन नहीं हृदयँ समाहीं।
मिलहिं न पावक महँ तुषार कन जौ खौजत सत कल्प सिराहीं ।। 2 ।।
तुम कहि रहे, हमहुँ पचि हारीं, लोचन हठी तजत हठ नाहीं।
तुलसिदास सोइ जतन करहु कछु बारेक स्याम इहाँ फिरि जाहीं ।। 3 ।।
सरल हिंदी भावार्थगोपियाँ उद्धव के हितभाव को मानती हैं, लेकिन कहती हैं कि उनके वचन कानों से भीतर हृदय तक नहीं पहुँचते। आग में हिमकण मिलने जैसी असंगति उन्हें प्रतीत होती है। आँखें दर्शन का हठ नहीं छोड़तीं। वे केवल ऐसा प्रयत्न चाहती हैं जिससे कृष्ण एक बार फिर ब्रज आ जाएँ।
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पद 59 · राग गौरी
मोको अब नयन भए रिपु माई!
हरि-बियोग तनु तजेहिं परम सुख, ए राखहिं सो करि बरिआई ।। 1 ।।
बरु मन कियो बहुत हित मेरो, बरहिं बार काम दव लाई।
बरषि नीर ये तबहिं बुझावहिं स्वारथ निपुन अधिक चतुराई ।। 2 ।।
ग्यान परसु दै मधुप पठायो बिरह बेलि कैसेहुँ कटि जाई।
सो थाक्यो बरू रह्यो एकटक देखत इन की सहज सिंचाई ।। 3 ।।
हारतहूँ न हारि मानत सठ सखि! सुभाव कंदुक की नाई।
चातक जलज मीनहु ते भोरे, समुझत नहिं उन की निठुराई ।। 4 ।।
ये हठ निरत दरस लालच बस, परे जहाँ बल बुधि न बसाई।
तुलसिदास इन्ह पै जो द्रवहिं हरि तौ पुनि मिलहिं बैरु बिसराई ।। 5 ।।
सरल हिंदी भावार्थविरहिणी अपनी आँखों से शिकायत करती है कि वे आँसू बहाकर उसे जीवित रखती हैं और दर्शन की आशा नहीं छोड़तीं। ज्ञान का फरसा भी विरह की बेल नहीं काट पाया, क्योंकि आँखें उसे निरंतर सींचती रहती हैं। अंत में आशा है कि कृष्ण इस अनन्य लालसा पर द्रवित होकर फिर मिलेंगे।
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