वैराग्य संदीपनी गोस्वामी तुलसीदास जी की लघु रचना है। इसमें रामभक्ति के आधार पर संत का स्वभाव, सद्वाणी, समता, लोभ और अहंकार से मुक्ति तथा आंतरिक शांति की शिक्षा दी गई है। वैराग्य यहाँ भीतर की अनावश्यक आसक्ति घटाने और जीवन को विवेक से सँभालने की प्रेरणा है।
मंगलाचरण और ग्रंथ का उद्देश्य
छंद 1–7
दोहा · छंद 1
राम बाम दिसि जानकी लखन दाहिनी ओर ।
ध्यान सकल कल्यानमय सुरतरु तुलसि तोर ॥ १॥
सरल हिंदी अर्थकवि राम का ध्यान करते हैं, जिनकी बाईं ओर जानकी और दाईं ओर लक्ष्मण हैं। तुलसी के लिए यह मंगलमय ध्यान कल्पवृक्ष के समान आश्रय है, जो मन को भक्ति और कल्याण की ओर लगाता है।
↑ विषय-सूची
दोहा · छंद 2
तुलसी मिटै न मोह तम किएँ कोटि गुन ग्राम ।
हृदय कमल फूलै नहीं बिनु रबि-कुल-रबि राम ॥ २॥
सरल हिंदी अर्थअसंख्य गुण और उपलब्धियाँ जुटा लेने पर भी केवल उनसे मोह का अंधकार नहीं मिटता। जैसे सूर्य के बिना कमल नहीं खिलता, वैसे ही कवि के अनुसार राम की कृपा और उनके स्मरण के बिना हृदय में सच्चा प्रकाश नहीं होता।
↑ विषय-सूची
दोहा · छंद 3
सुनत लखत श्रुति नयन बिनु रसना बिनु रस लेत ।
बास नासिका बिनु लहै परसै बिना निकेत ॥ ३॥
सरल हिंदी अर्थपरमात्मा सामान्य शरीर और इंद्रियों की सीमा में बँधा नहीं है। वह कान-नेत्र के बिना सुनने-देखने और अन्य इंद्रियों के बिना अनुभव करने में समर्थ कहा गया है। यह उसके सर्वव्यापक, देहातीत स्वरूप का संकेत है।
↑ विषय-सूची
सोरठा · छंद 4
अज अद्वैत अनाम अलख रूप-गुन-रहित जो ।
माया पति सोई राम दास हेतु नर-तनु-धरेउ ॥ ४॥
सरल हिंदी अर्थवही अजन्मा, अद्वैत, नाम-रूप और गुणों की सीमा से परे, माया का स्वामी परमात्मा भक्तों के प्रेम के लिए राम के रूप में मनुष्य-देह धारण करता है। यहाँ निर्गुण और सगुण को एक ही सत्य की दो अनुभूतियाँ माना गया है।
↑ विषय-सूची
दोहा · छंद 5
तुलसी यह तनु खेत है मन बच कर्म किसान ।
पाप-पुन्य द्वै बीज हैं बवै सो लवै निदान ॥ ५॥
सरल हिंदी अर्थयह शरीर खेत की तरह है और मन, वाणी तथा कर्म उसकी खेती करने वाले हैं। अच्छे-बुरे कर्म बीज हैं। मनुष्य जैसा बोता है, अंततः वैसा फल पाता है; इसलिए अपने विचार, शब्द और व्यवहार के प्रति सजग रहना चाहिए।
↑ विषय-सूची
दोहा · छंद 6
तुलसी यह तनु तवा है तपत सदा त्रैताप ।
सांति होई जब सांतिपद पावै राम प्रताप ॥ ६॥
सरल हिंदी अर्थकवि शरीर को तीन प्रकार के तापों से तपते हुए तवे की उपमा देते हैं। शारीरिक-मानसिक, बाहरी और दैविक कष्टों के बीच राम की कृपा से मिलने वाली आंतरिक शांति ही उस जलन को शांत करती है।
↑ विषय-सूची
दोहा · छंद 7
तुलसी बेद-पुरान-मत पूरन सास्त्र बिचार ।
यह बिराग-संदीपनी अखिल ग्यान को सार ॥ ७॥
सरल हिंदी अर्थतुलसीदास इस रचना को वेद, पुराण और शास्त्रों के विचार से निकले वैराग्य और ज्ञान के सार के रूप में प्रस्तुत करते हैं। उसका लक्ष्य केवल जानकारी बढ़ाना नहीं, जीवन को विवेक और शांति की ओर मोड़ना है।
↑ विषय-सूची
प्रथम प्रकाश — संत-स्वभाव
छंद 8–33
दोहा · छंद 8
सरल बरन भाषा सरल सरल अर्थमय मानि ।
तुलसी सरलै संतजन ताहि परी पहिचानि ॥ ८॥
सरल हिंदी अर्थरचना के शब्द और भाषा सरल हैं, पर उसके भीतर का सच्चा अर्थ सरल हृदय वाले संत पहचानते हैं। बाहरी शब्दों की सहजता के साथ पाठक के मन की निर्मलता भी समझने में सहायक होती है।
↑ विषय-सूची
चौपाई · छंद 9
अति सीतल अति ही सुखदाई ।
सम दम राम भजन अधिकाई ॥
जड जीवन कौं करै सचेता ।
जग महँ बिचरत है एहि हेता ॥ ९॥
सरल हिंदी अर्थसंत का स्वभाव अत्यंत शीतल और सुख देने वाला है। मन तथा इंद्रियों का संयम और रामभजन उसमें प्रमुख हैं। वह असजग जीवन को चेतना देता है और दूसरों को जगाने, सँभालने तथा सही दिशा दिखाने के लिए संसार में विचरता है।
↑ विषय-सूची
दोहा · छंद 10
तुलसी ऐसे कहुँ कहूँ धन्य धरनि वह संत ।
परकाजे परमारथी प्रीति लिये निबहंत ॥ १०॥
सरल हिंदी अर्थऐसे संत जहाँ कहीं मिलते हैं, वह स्थान धन्य है। वे दूसरों के काम आते हैं, परमार्थ में लगे रहते हैं और प्रेम के संबंध को परिस्थिति बदलने पर भी निभाते हैं। संतत्व की पहचान लोकहितकारी आचरण से होती है।
↑ विषय-सूची
दोहा · छंद 11
की मुख पट दीन्हे रहैं जथा अर्थ भाषंत ।
तुलसी या संसारमें सो बिचारजुत संत ॥ ११॥
सरल हिंदी अर्थविवेकी संत अनावश्यक बोलने से बचते हैं। बोलना आवश्यक हो तो प्रसंग और अर्थ के अनुसार बात कहते हैं। मौन और वाणी दोनों का मूल्य तभी है जब वे विचार, संयम और उपयोगिता से जुड़े हों।
↑ विषय-सूची
दोहा · छंद 12
बोलै बचन बिचारि कै लीन्हें संत सुभाव ।
तुलसी दुख दुर्बचन के पंथ देत नहिं पाँव ॥ १२॥
सरल हिंदी अर्थसंत बोलने से पहले विचार करते हैं और अपने सौम्य स्वभाव को बनाए रखते हैं। वे उन कठोर शब्दों के मार्ग पर कदम नहीं रखते जो किसी को दुःख पहुँचाएँ। वाणी में जिम्मेदारी उनके चरित्र का अंग है।
↑ विषय-सूची
दोहा · छंद 13
सत्रु न काहू करि गनै मित्र गनै नहिं काहि ।
तुलसी यह मत संत को बोलै समता माहि ॥ १३॥
सरल हिंदी अर्थसंत अपने मन में किसी के प्रति शत्रुता नहीं पालता और किसी के प्रति ऐसा पक्षपात भी नहीं करता जो समता छीन ले। उसका व्यवहार और कथन मित्र-विरोधी की निजी भावना के ऊपर उठकर संतुलित रहता है।
↑ विषय-सूची
चौपाई · छंद 14
अति अनन्यगति इंद्री जीता ।
जाको हरि बिनु कतहुँ न चीता ॥
मृग तृष्णा सम जग जिय जानी ।
तुलसी ताहि संत पहिचानी ॥ १४॥
सरल हिंदी अर्थजिसने इंद्रियों को संयमित किया है और जिसका चित्त हरि में अनन्य रूप से लगा है, वह संसार की चंचल तृष्णाओं को मृगतृष्णा जैसा पहचानता है। कवि ऐसे विवेकशील और एकनिष्ठ व्यक्ति को संत कहते हैं।
↑ विषय-सूची
दोहा · छंद 15
एक भरोसो एक बल एक आस बिस्वास ।
रामरूप स्वाती जलद चातक तुलसीदास ॥ १५॥
सरल हिंदी अर्थचातक जैसे एक विशेष वर्षाजल की आशा में आकाश की ओर देखता है, वैसे ही तुलसीदास राम को अपना भरोसा, बल और विश्वास मानते हैं। उपमा भक्ति की एकाग्रता और अपने आराध्य पर दृढ़ आश्रय को व्यक्त करती है।
↑ विषय-सूची
दोहा · छंद 16
सो जन जगत जहाज है जाके राग न दोष ।
तुलसी तृष्णा त्यागि कै गहै सील संतोष ॥ १६॥
सरल हिंदी अर्थजिसके भीतर आसक्ति और द्वेष का आग्रह घट गया है, जो तृष्णा छोड़कर शील और संतोष अपनाता है, वह संसार में दूसरों को पार लगाने वाले जहाज की तरह है। उसका जीवन मार्गदर्शक और सहारा बनता है।
↑ विषय-सूची
दोहा · छंद 17
सील गहनि सब की सहनि कहनि हीय मुख राम ।
तुलसी रहिए एहि रहनि संत जनन को काम ॥ १७॥
सरल हिंदी अर्थशील अपनाना, दूसरों की बात सहनशीलता से सुनना और हृदय तथा वाणी में राम का स्मरण रखना संत की जीवन-पद्धति है। कवि ऐसी रहन-सहन की प्रेरणा देते हैं जिसमें भक्ति व्यवहार में भी दिखाई दे।
↑ विषय-सूची
दोहा · छंद 18
निज संगी निज सम करत दुरजन मन दुख दून ।
मलयाचल है संतजन तुलसी दोष बिहून ॥ १८॥
सरल हिंदी अर्थसंत को मलय पर्वत की उपमा दी गई है, जिसकी चंदन-सुगंध आसपास को सुगंधित करती है। संत का साथ लोगों को उसके सद्गुणों की ओर मोड़ता है। दुष्टता उस भलाई को देखकर खिन्न हो सकती है, पर संत दोष बढ़ाने के बजाय गुण फैलाता है।
↑ विषय-सूची
दोहा · छंद 19
कोमल बानी संत की स्त्रवत अमृतमय आइ ।
तुलसी ताहि कठोर मन सुनत मैन होइ जाइ ॥ १९॥
सरल हिंदी अर्थसंत की कोमल वाणी अमृत जैसी लगती है। उसे सुनकर कठोर मन भी मोम की तरह पिघल सकता है। प्रेमपूर्ण और सच्चे शब्द भीतर परिवर्तन की संभावना जगाते हैं।
↑ विषय-सूची
दोहा · छंद 20
अनुभव सुख उतपति करत भय-भ्रम धरै उठाइ ।
ऐसी बानी संत की जो उर भेदै आइ ॥ २०॥
सरल हिंदी अर्थसंत की वाणी जीवन-अनुभव से निकली होती है। जब वह हृदय तक पहुँचती है, तो सुखद बोध जगाती है और भय तथा भ्रम को दूर करने में सहायक होती है। उसका प्रभाव केवल सुनने में अच्छा लगने तक सीमित नहीं रहता।
↑ विषय-सूची
दोहा · छंद 21
सीतल बानी संत की ससिहू ते अनुमान ।
तुलसी कोटि तपन हरै जो कोउ धारै कान ॥ २१॥
सरल हिंदी अर्थसंत के शीतल वचनों को कवि चंद्रमा से भी बढ़कर तापहर मानते हैं। जो ध्यान से सुनता है, उसे भीतर की अनेक व्याकुलताओं से राहत मिलती है। यह सद्वाणी की सांत्वना और प्रकाश का काव्यात्मक वर्णन है।
↑ विषय-सूची
चौपाई · छंद 22
पाप ताप सब सूल नसावै ।
मोह अंध रबि बचन बहावै ॥
तुलसी ऐसे सदगुन साधू ।
बेद मध्य गुन बिदित अगाधू ॥ २२॥
सरल हिंदी अर्थसाधु के सद्गुण और वचन सूर्य के समान मोह का अंधकार मिटाते हैं। वे पाप-वृत्तियों, संताप और हृदय की चुभन को कम करने की दिशा दिखाते हैं। वेदों में भी ऐसे गुणों की महिमा गाई गई है।
↑ विषय-सूची
दोहा · छंद 23
तन करि मन करि बचन करि काहू दूखत नाहिं ।
तुलसी ऐसे संतजन रामरूप जग माहिं ॥ २३॥
सरल हिंदी अर्थजो शरीर, मन और वाणी से किसी को पीड़ा नहीं देता, कवि ऐसे संत को जगत में राम के गुणों का प्रत्यक्ष रूप मानते हैं। करुणा और अहिंसक आचरण भक्ति की सजीव पहचान हैं।
↑ विषय-सूची
दोहा · छंद 24
मुख दीखत पातक हरै परसत कर्म बिलाहिं ।
बचन सुनत मन मोहगत पूरुब भाग मिलाहिं ॥ २४॥
सरल हिंदी अर्थसंत के दर्शन, निकटता और सद्वचनों से मनुष्य के भीतर दोषों तथा मोह से मुक्त होने की प्रेरणा जागती है। कवि ऐसे संत-मिलन को सौभाग्य का फल मानते हैं और उसकी आध्यात्मिक महिमा व्यक्त करते हैं।
↑ विषय-सूची
दोहा · छंद 25
अति कोमल अरु बिमल रुचि मानस में मल नाहिं ।
तुलसी रत मन होइ रहै अपने साहिब माहिं ॥ २५॥
सरल हिंदी अर्थसंत का हृदय कोमल है, उसकी रुचि निर्मल है और उसके मन में दूषित आग्रह नहीं है। उसका चित्त अपने स्वामी में प्रेमपूर्वक लगा रहता है। आंतरिक पवित्रता और ईश्वर-स्मरण यहाँ साथ चलते हैं।
↑ विषय-सूची
दोहा · छंद 26
जाके मन ते उठि गई तिल-तिल तृष्णा चाहि ।
मनसा बाचा कर्मना तुलसी बंदत ताहि ॥ २६॥
सरल हिंदी अर्थजिसके मन से चाह और तृष्णा का सूक्ष्म से सूक्ष्म अंश भी उठ गया है, तुलसीदास मन, वचन और कर्म से उसकी वंदना करते हैं। यहाँ त्याग बाहरी घोषणा नहीं, मन के लोभ से मुक्त होने की स्थिति है।
↑ विषय-सूची
दोहा · छंद 27
कंचन काँचहि सम गनै कामिनि काष्ठ पषान ।
तुलसी ऐसे संतजन पृथ्वी ब्रह्म समान ॥ २७॥
सरल हिंदी अर्थकवि वैरागी संत का आदर्श रखते हैं जो सोने और काँच के भेद से लोभ में नहीं पड़ता तथा काम-आकर्षण से विचलित नहीं होता। ऐसी समता को वे ब्रह्मनिष्ठ अवस्था कहते हैं। स्त्री-संबंधी उपमा इस संन्यासी संयम के प्रसंग की है; आशय स्त्रियों के व्यक्तित्व या सम्मान को कम करना नहीं है।
↑ विषय-सूची
चौपाई · छंद 28
कंचन को मृतिका करि मानत ।
कामिनि काष्ठ सिला पहिचानत ॥
तुलसी भूलि गयो रस एह ।
ते जन प्रगट राम की देहा ॥ २८॥
सरल हिंदी अर्थजिसने धन के लोभ और विषय-आकर्षण पर अपनी निर्भरता छोड़ दी है, उसके जीवन में राम के गुण प्रकट होते हैं। यहाँ काठ, पत्थर और मिट्टी की उपमाएँ साधक की अनासक्ति बताती हैं, दूसरों के प्रति असम्मान का व्यवहार नहीं सिखातीं।
↑ विषय-सूची
दोहा · छंद 29
आकिंचन इंद्रीदमन रमन राम इक तार ।
तुलसी ऐसे संत जन बिरले या संसार ।२९ ॥
सरल हिंदी अर्थअकिंचन भाव, इंद्रिय-संयम और राम में निरंतर प्रेम—इन गुणों वाला संत दुर्लभ है। अकिंचनता का मूल भाव यह है कि मन वस्तुओं और अपने होने के अहंकारी दावे में जकड़ा न हो।
↑ विषय-सूची
दोहा · छंद 30
अहंबाद मैं तैं नहीं दुष्ट संग नहिं कोइ ।
दुख ते दुख नहिं ऊपजै सुख तैं सुख नहिं होइ ॥ ३०॥
सरल हिंदी अर्थसंत के भीतर अहंकार और मैं-तू का विभाजन हावी नहीं होता। वह दुष्ट संगति से बचता है तथा सुख-दुःख की घटनाओं में अपना आंतरिक संतुलन नहीं खोता। अगला दोहा इसी समता को आगे स्पष्ट करता है।
↑ विषय-सूची
दोहा · छंद 31
सम कंचन काँचै गिनत सत्रु मित्र सम दोइ ।
तुलसी या संसारमें कात संत जन सोई ॥ ३१॥
सरल हिंदी अर्थसंत सोने-काँच और शत्रु-मित्र के कारण अपने मन में पक्षपात या वैर नहीं बढ़ाता। यह सब वस्तुओं का व्यावहारिक उपयोग एक समझना नहीं, उनके प्रति लोभ और द्वेष से ऊपर उठना है।
↑ विषय-सूची
दोहा · छंद 32
बिरले बिरले पाइए माया त्यागी संत ।
तुलसी कामी कुटिल कलि केकी केक अनंत ॥ ३२॥
सरल हिंदी अर्थमाया का मोह छोड़ने वाले सच्चे संत कम मिलते हैं, जबकि मधुर दिखने पर भी भीतर से कपटी और वासनाओं में फँसे लोग बहुत हैं। कवि मोर की उपमा से बाहरी रूप और भीतर के आचरण में अंतर पहचानने को कहते हैं।
↑ विषय-सूची
दोहा · छंद 33
मैं तं मेट्यो मोह तम उग्यो आतमा भानु ।
संत राज सो जानिये तुलसी या सहिदानु ॥ ३३॥
सरल हिंदी अर्थजब आत्मबोध का सूर्य उगता है, तब अहंकार और अपने-पराए की अज्ञानजनित दीवार का अंधकार घटता है। कवि इसी निर्मल बोध और समता को संत-श्रेष्ठ की पहचान बताते हैं।
↑ विषय-सूची
द्वितीय प्रकाश — संत-महिमा
छंद 34–42
सोरठा · छंद 34
को बरनै मुख एक तुलसी महिमा संत की ।
जिन्ह के बिमल बिबेक सेस महेस न कहि सकत ॥ ३४॥
सरल हिंदी अर्थसंत की महिमा का पूरा वर्णन एक मुख से कैसे हो सकता है? जिनका विवेक इतना निर्मल है, उनकी गहराई को शेष और शिव जैसे महान भी पूरी तरह नहीं कह सकते—इस अतिशयोक्ति से कवि संतत्व की अगाधता व्यक्त करते हैं।
↑ विषय-सूची
दोहा · छंद 35
महि पत्री करि सिंधु मसि तरु लेखनी बनाइ ।
तुलसी गनपत सों तदपि महिमा लिखी न जाइ ॥ ३५॥
सरल हिंदी अर्थपृथ्वी को कागज, समुद्र को स्याही और वृक्षों को लेखनी बना दिया जाए, गणेश स्वयं लिखें, तब भी संत की महिमा पूरी न लिखी जा सके। यह उनके सद्गुणों के असीम विस्तार की काव्यात्मक प्रशंसा है।
↑ विषय-सूची
दोहा · छंद 36
धन्य धन्य माता पिता धन्य पुत्र बर सोइ ।
तुलसी जो रामहि भजे जैसेहुँ कैसेहुँ होइ ॥ ३६॥
सरल हिंदी अर्थजो किसी भी परिस्थिति में रामभजन से जुड़ा है, कवि उसे और उसके माता-पिता को धन्य कहते हैं। व्यक्ति की सच्ची शोभा केवल बाहरी उपलब्धि नहीं, उसके भीतर का प्रेम और सदाचार भी है।
↑ विषय-सूची
दोहा · छंद 37
तुलसी जाके बदन ते धोखेहुँ निकसत राम ।
ताके पग की पगतरी मेरे तन को चाम ॥ ३७॥
सरल हिंदी अर्थजिसके मुख से अनायास भी रामनाम निकलता है, उसके प्रति कवि अत्यधिक विनय व्यक्त करते हैं। अपने चमड़े की पादुका बनने की उपमा आत्मदीनता और सेवा-भाव की भक्तिपरक अतिशयोक्ति है, कोई शारीरिक क्रिया का निर्देश नहीं।
↑ विषय-सूची
दोहा · छंद 38
तुलसी भगत सुपच भलौ भजै रैन दिन राम ।
ऊँचो कुल केहि कामको जहाँ न हरिको नाम ॥ ३८॥
सरल हिंदी अर्थकवि जन्म-आधारित ऊँचाई से अधिक रामभक्ति को महत्त्व देते हैं। ऐतिहासिक समाज में उपेक्षित माने गए व्यक्ति का निर्मल भजन भी उस कुल-गर्व से श्रेष्ठ है जिसमें हरि-स्मरण नहीं। भाव का केंद्र भक्ति की समान उपलब्धता और अहंकार का त्याग है।
↑ विषय-सूची
दोहा · छंद 39
अति ऊँचे भूधरनि पर भुजगन के अस्थान ।
तुलसी अति नीचे सुखद ऊख अन्न अरु पान ॥ ३९॥
सरल हिंदी अर्थऊँचे पर्वत पर विषधर रह सकते हैं, जबकि नीचे की भूमि अन्न, गन्ना और जल से जीवन सँभालती है। उपमा बताती है कि केवल ऊँचा स्थान या जन्म श्रेष्ठता का प्रमाण नहीं; वास्तविक मूल्य उपयोगिता, विनम्रता और सद्गुण का है।
↑ विषय-सूची
चौपाई · छंद 40
अति अनन्य जो हरि को दासा ।
रटै नाम निसिदिन प्रति स्वासा ॥
तुलसी तेहि समान नहिं कोई ।
हम नीकें देखा सब कोई ॥ ४०॥
सरल हिंदी अर्थहरि का जो सेवक अनन्य भाव से प्रत्येक श्वास के साथ उनका नाम स्मरण करता है, कवि उसकी निष्ठा को अनुपम मानते हैं। श्रेष्ठता का आधार निरंतर प्रेम और समर्पित जीवन है।
↑ विषय-सूची
चौपाई · छंद 41
जदपि साधु सबही बिधि हीना ।
तद्यपि समता के न कुलीना ॥
यह दिन रैन नाम उच्चरै ।
वह नित मान अगिनि महँ जरै ॥ ४१॥
सरल हिंदी अर्थसंत के पास बाहरी साधन कम हों, तब भी केवल कुल के गर्व में रहने वाला व्यक्ति उसकी बराबरी नहीं कर सकता। एक रामनाम में शांति पाता है, दूसरा मान-अभिमान की आग में जलता रहता है।
↑ विषय-सूची
दोहा · छंद 42
दास रता एक नाम सों उभय लोक सुख त्यागि ।
तुलसी न्यारो ह्वै रहै दहै न दुख की आगि ॥ ४२॥
सरल हिंदी अर्थभगवान का सेवक सांसारिक और स्वर्गीय सुख की सौदेबाजी से ऊपर उठकर नाम में प्रेम रखता है। आसक्ति घटने से दुःख की अग्नि उसे पहले की तरह नहीं बाँधती। वैराग्य का अर्थ यहाँ संसार के प्रति घृणा नहीं, सुख के लोभ से स्वतंत्रता है।
↑ विषय-सूची
तृतीय प्रकाश — शांति-वर्णन
छंद 43–62
दोहा · छंद 43
रैनि को भूषन इंदु है दिवस को भूषन भानु ।
दास को भूषन भक्ति है भक्ति को भूषन ग्यानु ॥ ४३॥
सरल हिंदी अर्थजैसे रात की शोभा चंद्रमा और दिन की सूर्य है, वैसे ही भक्त की शोभा भक्ति है। भक्ति को ज्ञान सँवारता है, ताकि प्रेम विवेक से जुड़कर अधिक परिपक्व बने।
↑ विषय-सूची
दोहा · छंद 44
ग्यान को भूषन ध्यान है ध्यान को भूषन त्याग ।
त्याग को भूषन शांतिपद तुलसी अमल अदाग ॥ ४४॥
सरल हिंदी अर्थज्ञान को ध्यान जीवन में उतारता है; ध्यान को त्याग गहराई देता है। त्याग की श्रेष्ठ शोभा निर्मल शांति है। यह क्रम केवल जानने से आगे बढ़कर अभ्यास, अनासक्ति और शांत चित्त तक पहुँचने का मार्ग बताता है।
↑ विषय-सूची
चौपाई · छंद 45
अमल अदाग शांतिपद सारा ।
सकल कलेस न करत प्रहारा ॥
तुलसी उर धारै जो कोई ।
रहै अनंद सिंधु महँ सोई ॥ ४५॥
सरल हिंदी अर्थनिर्मल और निष्कलंक शांतिपद ही साधना का सार है। जो इसे हृदय में स्थिर करता है, वह आनंद की गहराई में रहता है। कवि ऐसी अवस्था का वर्णन करते हैं जहाँ क्लेश मन पर अपना पुराना अधिकार नहीं जमा पाते।
↑ विषय-सूची
चौपाई · छंद 46
बिबिध पाप संभव जो तापा ।
मिटहिं दोष दुख दुसह कलापा ॥
परम सांति सुख रहै समाई ।
तहँ उतपात न बेधै आई ॥ ४६॥
सरल हिंदी अर्थदोषपूर्ण प्रवृत्तियों से उठने वाले ताप और असह्य दुःखों की पकड़ शांति में घटती है। जब मन उस परम शांति के सुख में स्थित होता है, तो बाहरी उपद्रव उसकी भीतरी स्थिरता को आसानी से भेद नहीं पाते।
↑ विषय-सूची
चौपाई · छंद 47
तुलसी ऐसे सीतल संता ।
सदा रहै एहि भाँति एकंता ॥
कहा करै खल लोग भुजंगा ।
कीन्ह्यौ गरल-सील जो अंगा ॥ ४७॥
सरल हिंदी अर्थऐसा संत भीतर से शीतल और एकाग्र रहता है। विषधर जैसे कटु स्वभाव वाले लोग भी उसकी मूल शांत वृत्ति नहीं बदल पाते। उपमा का उद्देश्य संत के धैर्य और दुर्भाव से अप्रभावित रहने की क्षमता दिखाना है।
↑ विषय-सूची
दोहा · छंद 48
अति सीतल अतिही अमल सकल कामना हीन ।
तुलसी ताहि अतीत गनि बृत्ति सांति लयलीन ॥ ४८॥
सरल हिंदी अर्थजिसकी वृत्ति निर्मल शांति में लीन है और जो कामनाओं के दबाव से मुक्त है, कवि उसे सामान्य आकर्षण-विकारों से ऊपर उठा हुआ मानते हैं। बाहरी चिह्न से अधिक यह आंतरिक स्थिति महत्त्वपूर्ण है।
↑ विषय-सूची
चौपाई · छंद 49
जो कोइ कोप भरे मुख बैना ।
सन्मुख हतै गिरा-सर पैना ॥
तुलसी तऊ लेस रिस नाहिं ।
सो सीतल कहिए जग माहीं ॥ ४९॥
सरल हिंदी अर्थकोई सामने क्रोध से तीखे शब्द-बाण चलाए, तब भी जो प्रतिशोध के क्रोध में नहीं बहता, वह शीतल स्वभाव वाला है। संत की परीक्षा अनुकूल समय के बोल से नहीं, विपरीत परिस्थिति में उसके धैर्य से होती है।
↑ विषय-सूची
दोहा · छंद 50
सात दीप नव खंड लौ तीनि लोक जग माहिं ।
तुलसी सांति समान सुख अपर दूसरो नाहीं ॥ ५०॥
सरल हिंदी अर्थकवि सारे जगत का उदाहरण देकर कहते हैं कि शांति के समान दूसरा सुख नहीं है। बाहरी वैभव अनेक प्रकार का हो सकता है, पर मन का संतुलन और निर्मल संतोष विशेष धन है।
↑ विषय-सूची
चौपाई · छंद 51
जहाँ सांति सतगुरु की दई ।
तहाँ क्रोध की जर जरि गई ॥
सकल काम बासना बिलानी ।
तुलसी बहै सांति सहिदानी ॥ ५१॥
सरल हिंदी अर्थसद्गुरु की शिक्षा से मिली वास्तविक शांति की पहचान यह है कि क्रोध की जड़ कमजोर हो और वासनाओं का दबाव घटे। केवल शांत दिखाई देना पर्याप्त नहीं; भीतर का परिवर्तन आचरण में प्रकट होना चाहिए।
↑ विषय-सूची
चौपाई · छंद 52
तुलसी सुखद सांति को सागर ।
संतन गायो करन उजागर ॥
तामें तन मन रहै समोई ।
अहं अगिनि नहिं दाहैं कोई ॥ ५२॥
सरल हिंदी अर्थसंत शांति को सुख और बोध का समुद्र कहते हैं। तन-मन से इस साधना में डूबने पर अहंकार की आग का प्रभाव घट जाता है। मन अपनी प्रतिष्ठा की हर चोट को दाहक संकट बनाकर नहीं जीता।
↑ विषय-सूची
दोहा · छंद 53
अहंकार की अगिनि में दहत सकल संसार ।
तुलसी बाँचै संतजन केवल सांति अधार ॥ ५३॥
सरल हिंदी अर्थसंसार का बड़ा दुःख अहंकार की आग है—मैं बड़ा हूँ, मेरा मान होना चाहिए, मेरी बात ही चले। संत शांति का आश्रय लेकर इस जलन से बचते हैं।
↑ विषय-सूची
दोहा · छंद 54
महा सांति जल परसि कै सांत भए जन जोइ ।
अहं अगिनि ते नहिं दहैं कोटि करै जो कोइ ॥ ५४॥
सरल हिंदी अर्थजिसने महान शांति का अनुभव करके मन को स्थिर कर लिया है, उसे दूसरों के उकसाने पर भी अहंकार की आग में लौटना नहीं पड़ता। यह शांति उसके स्वभाव की गहराई तक पहुँच जाती है।
↑ विषय-सूची
दोहा · छंद 55
तेज होत तन तरनि को अचरज मानत लोइ ।
तुलसी जो पानी भया बहुरि न पावक होइ ॥ ५५॥
सरल हिंदी अर्थऐसे संत का प्रभाव सूर्य की तरह उज्ज्वल हो सकता है, फिर भी वह भीतर जल की तरह शीतल रहता है। सम्मान और सामर्थ्य पा लेने से उसका स्वभाव क्रोध और अहंकार की आग नहीं बन जाता।
↑ विषय-सूची
दोहा · छंद 56
जद्यपी सीतल सम सुखद जगमें जीवन प्रान ।
तदपि सांति जल जनि गनौ पावक तेल प्रमान ॥ ५६॥
सरल हिंदी अर्थशांति शीतल, सम और सुखद है, फिर भी उसे निष्क्रियता या दुर्बलता न समझें। उसमें दोषों और अहंकार को मिटाने वाला अग्नि-समान तेज है। इस स्थान के पाठांतर की जानकारी नीचे दी गई है।
पाठांतर: आधार-पाठ में “पावक तेल प्रमान” है; कविता कोश के तुलनात्मक पाठ में “पावक तेज प्रमाण” मिलता है। यहाँ मूल आधार-पाठ नहीं बदला गया है। अर्थ में शांति के शीतल होने के साथ उसके दोष-दाहक तेज का भाव लिया गया है।
↑ विषय-सूची
चौपाई · छंद 57
जरै बरै अरु खीझि खिझावै ।
राग द्वेष महँ जनम गँवावै ॥
सपनेहुँ सांति नहि उन देही ।
तुलसी जहाँ-जहाँ ब्रत एही ॥ ५७॥
सरल हिंदी अर्थजो स्वयं जलता है, दूसरों को खिझाता है और राग-द्वेष में जीवन गँवाता है, उसे शांति नहीं मिलती। अपने व्यवहार की यही आदत बनी रहे तो केवल बाहरी अनुष्ठान से भीतर का संघर्ष नहीं मिटेगा।
↑ विषय-सूची
दोहा · छंद 58
सोइ पंडित सोइ पारखी सोई संत सुजान ।
सोई सूर सचेत सो सोई सुभट प्रमान ॥ ५८॥
सरल हिंदी अर्थसच्चा पंडित, विवेकी परखने वाला, समझदार संत और सजग शूरवीर कौन है—कवि यह प्रश्न उठाकर अगले दोहे में कसौटी बताते हैं। केवल उपाधि या बाहरी प्रशंसा से ये गुण सिद्ध नहीं होते।
↑ विषय-सूची
दोहा · छंद 59
सोइ ग्यानी सोइ गुनी जन सोई दाता ध्यानि ।
तुलसी जाके चित भई राग द्वेष की हानि ॥ ५९॥
सरल हिंदी अर्थजिसके चित्त में राग और द्वेष घट गए हैं, वही वास्तविक ज्ञानी, गुणी, दानी और ध्यानी है। यह कसौटी पिछले दोहे के पंडित और शूरवीर पर भी लागू है: अपने विकारों को जीतना बड़ी साधना है।
↑ विषय-सूची
चौपाई · छंद 60
राग द्वेष की अगिनि बुझानी ।
काम क्रोध बासना नसानी ॥
तुलसी जबहि सांति गृह आई ।
तब उरहीं उर फिरी दोहाई ॥ ६०॥
सरल हिंदी अर्थजब शांति हृदय में आती है, तब राग-द्वेष की आग बुझने लगती है और काम-क्रोध की पकड़ टूटती है। मन के भीतर ही राम का आश्रय और प्रभाव प्रकट होता है।
↑ विषय-सूची
दोहा · छंद 61
फिरी दोहाई राम की गे कामादिक भाजि ।
तुलसी ज्यों रबि कें उदय तुरत जात तम लाजि ॥ ६१॥
सरल हिंदी अर्थराम-स्मरण का प्रकाश मन में फैलता है तो काम, क्रोध जैसे दोष हटते हैं, जैसे सूर्य निकलते ही अंधकार दूर होता है। भक्ति और शांति मिलकर अंतःकरण को उज्ज्वल करते हैं।
↑ विषय-सूची
दोहा · छंद 62
यह बिराग संदीपनी सुजन सुचित सुनि लेहु ।
अनुचित बचन बिचारि के जस सुधारि तस देहु ॥ ६२॥
सरल हिंदी अर्थकवि सज्जनों से इस रचना को सजग और शुद्ध चित्त से सुनने को कहते हैं। वे विनम्रतापूर्वक पाठक के विवेक का स्वागत करते हैं कि जो कथन अनुचित लगे, उसे विचारकर उचित रूप में सुधारा जाए। यह सीख ग्रहण करने के साथ विवेक बनाए रखने का आग्रह भी है।
↑ विषय-सूची
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें
🙏 जय श्री राम 🙏
अपनी श्रद्धा, सुझाव या प्रतिक्रिया कमेंट में अवश्य लिखें।
कृपया भाषा शालीन और सम्मानजनक रखें।
🚩 भक्ति भावना परिवार से जुड़े रहने के लिए धन्यवाद।