वृंद सतसई भाग 1 — दोहे 1–350, मूल पाठ और हिंदी अर्थ सहित
वृंद सतसई — भाग 1
दोहे 1–350 · हिंदी अर्थ सहित
गुरु-वंदना से आरंभ होकर वाणी, प्रेम, परिश्रम, समय, उदारता और व्यवहार की कसौटियों तक—वृंद की दृष्टांतमयी नीति-वाणी पढ़ें, मूल पाठ और स्वतंत्र सरल व्याख्या के साथ।
दृष्टांत से जीवन की बात
वृंद की नीति-वाणी में छोटी बात के साथ सटीक उदाहरण आता है। मधुर वचन को शीतल जल, अभ्यास को पत्थर पर पड़ते रस्सी के निशान और समय पर सहायता को सूखने से पहले मिली वर्षा से समझाया गया है। इन दोहों का उद्देश्य केवल याद करना नहीं, उनके संकेत को अपनी स्थिति में विवेक से समझना है।
इस भाग में श्यामसुंदरदास संपादित सतसई-सप्तक, १९३१ के वृंद-सतसई खंड के क्रमांक १–३५० हैं। आरंभिक गुरु-वंदना और कवि के प्रयोजन वाले छंद भी अपने मूल क्रम पर हैं। नीचे की सीमाएँ पढ़ने की सुविधा हैं, मूल ग्रंथ के अलग अध्याय नहीं।
संग्रह दो बड़े भागों में
| भाग | मुद्रित क्रमांक | इस योजना में सामग्री |
|---|---|---|
| भाग १ · यह लेख | १–३५० | ३५० छंद, मूल पाठ और अर्थ सहित |
| भाग २ · अगला लेख | ३५१–७०६ | शेष ३५६ क्रमांकित छंद |
चुने गए मुद्रित संस्करण में आरंभ और समापन सहित अंतिम क्रमांक ७०६ है। इसलिए केवल प्रचलित “सात सौ” नाम देखकर अंतिम छंद छोड़े नहीं जाएँगे। इस समय इस फ़ाइल में केवल १–३५० हैं; दूसरा भाग तैयार और प्रकाशित होने का दावा यहाँ नहीं किया गया है।
पाठ और अर्थ को कैसे समझें?
- मूल पाठ: मुद्रित क्रमांक सुरक्षित हैं; पुरानी ब्रजभाषा को आधुनिक वाक्य बनाकर मूल में नहीं मिलाया गया।
- शब्दार्थ: मुख्य कठिन शब्दों का अर्थ।
- सरल हिंदी अर्थ: दोहे और उसके दृष्टांत का संक्षिप्त परिचय।
- भावार्थ: जीवन में विचार करने योग्य संकेत; यह कवि की अतिरिक्त मूल पंक्ति नहीं।
- पाठ-टिप्पणी: जहाँ शब्द या प्रसंग कठिन है, वहाँ अनिश्चितता और संदर्भ स्पष्ट हैं।
नीति-वचन की सीमा: दोहे अनुभव और प्रसंग की सूक्तियाँ हैं, हर व्यक्ति और परिस्थिति पर लागू अटल नियम नहीं। एक पद सत्संग का प्रभाव कहता है, दूसरा अपने स्वभाव की दृढ़ता; दोनों को संदर्भ के अनुसार समझना चाहिए।
मूल में स्त्री, जाति, पेशा, दिव्यांगता, शृंगार और युद्ध से जुड़े पुराने दृष्टांत हैं। वे ऐतिहासिक पाठ का हिस्सा हैं। किसी मनुष्य की गरिमा जन्म, लिंग, पेशे या शारीरिक दशा से कम नहीं होती। युद्ध-युक्ति के पद सामान्य जीवन में हिंसा, छल अथवा अन्याय का निर्देश नहीं हैं।
क्रमांक से दोहा चुनें
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दोहे १–५०
दोहे ५१–१००
दोहे १०१–१५०
दोहे १५१–२००
दोहे २०१–२५०
दोहे २५१–३००
दोहे ३०१–३५०
प्रसिद्ध दोहे
पहली पंक्ति से खोजें · सभी ३५० छंद
- श्रीगुरुनाथ प्रभाव तैं होत मनोरथ सिद्ध।
- किए वृंद प्रस्ताव के दोहा सुगम बनाय।
- भाव सरस समझत सबै भले लगें यह भाय।
- नीकी पै फीकी लगै बिनु अवसर की बात।
- फीकी पै नीकी लगै कहिए समय बिचारि।
- रागी अवगुन ना गनै यहै जगत की चाल।
- जो जाकी प्यारी लगै सो तिहिं करत बखान।
- जो जाकौ गुन जानही सो तिहिं आदर देत।
- अन-उद्यमही एक कौ यौं हरि करत निबाह।
- हलन चलन की सकति है तौ लौं उद्यम ठानि।
- कहा होय उद्यम किए जौ प्रभु ही प्रतिकूल।
- जाही तैं कछु पाइयै करियै ताकी आस।
- जो जाही कौं है रहै सो तिहिं पूरै आस।
- गुन ही तजु भनाइयै जो जीवन सुख भौन।
- रस अरस समुझै न कछु पढ़ै प्रेम की गाथ।
- कैसें निबहै निबल जन कर सबलन सों गैर।
- कीजै समझ न कीजिये बिन बिचारि बिवहार।
- दीवौ अवसर कौ भलौ जासों सुधरै काम।
- अपनी पहुँच बिचारि कै करतब करिये दौर।
- पिसुन छल्यो नर सुजन सों करत बिसास न चूकि।
- प्रान तृषातुर के रहें थोरे हूँ जलदान।
- विद्या धन उद्यम बिना कहौ जु पावै कौन।
- बनती देख बनाइयै परन न दीजै खोट।
- ओछे नर की प्रीति की दीनी रीति बताय।
- अन-मिलती जोई करत ताही कौ उपहास।
- बुरे लगत सिख के बचन हिए बिचारो आप।
- बड़े बड़न कौ दुख हरत पै न नीच यह थाप।
- गुरुता लघुता पुरुष की आस्रय बसतें होय।
- रहै समीप बड़ेन के होत बड़ो हित मेल।
- उपकारी उपकार जग सबसों करत प्रकास।
- होय बड़ेहु न हूजिए कठिन मलिन मुख रंग।
- कहूँ जाहु नाहिन मिटत जो विधि लिख्यौ लिलार।
- विधि रूठे टूटै कवन को करि सकै सहाय।
- प्रेम पगत बरजी न क्यौं अब बरजत बेकाज।
- फेर न ह्वैहै कपट सौं जो कीजै ब्यौपार।
- करियै सुख की होत दुख यह कहु कौन सयान।
- नैना देत बताय सब हिय कौ हेत अहेत।
- अति परचै तैं होत है अरुचि अनादर भाय।
- सो ताके अवगुन कहै जो जिहिं चाहै नाहिं।
- सुखदाई ए देत दुख सो सब दिन कौ फेर।
- विधि के बिरचे सुजन हूँ दुर्जन सम है जात।
- जासौं जैसौ भाव सो तैसौ ठानत ताहि।
- आप बुरे जग है बुरौ भलौ भले जग जानि।
- सौ जु सयाने एक मत यहै कहावत साँच।
- भले बुरे सब एक से जौ लौं बोलत नाहिं।
- भाव भाव की सिद्धि है भाव भाव में भेव।
- निरफल श्रोता मूढ़ पै कविता बचन बिलास।
- भले बुरे जहँ एक से तहां न बसिए जाय।
- न करि नाम रंग देखि सम गुन बिन समुझै बात।
- बिन गुन कुल जाने बिना मान न करि मनुहारि।
- हित हूँ की कहिये न तिहिं जो नर होय अबोध।
- अति अनीति लहियै न धन जो प्यारी मन होय।
- मूरख कौं पोथी दई बाँचन कौं गुन गाथ।
- मधुर बचन तैं जात मिट उत्तम जन अभिमान।
- जासौं रक्षा होत है है ताही सौं घात।
- सबै सहायक सबल के कोउ न निबल सहाय।
- कछु बसाय नहिं सबल सौं करै निबल पर जोर।
- सबै समुझ कै कीजिये काम वहै अभिराम।
- जो जाही सों रमि रह्यौ तिहिं ताही सों काम।
- जिय चाहै सोई मिलै जियत भलौ हिय लागि।
- जिय पिय चाहै तुम करौ घन चंदन उपचार।
- विरह तपन पिय बात तैं उठत चौगुनी जागि।
- रोस मिटै कैसें सहत रिस उपजावन बात।
- अति हठ मत कर हठ बढ़े बात न करिहै कोय।
- लालच हू ऐसो भलौ जासौं पूरै आस।
- विष हू ते सरसी लगै रिस में रस की भाख।
- जो जेहिं भावै सो भलौ गुन को कछु न विचार।
- हरि-रस परिहरि विषय-रस संग्रह करत अयान।
- कुल मारग छाँड़ै न कोउ होहि वृद्धि कै हानि।
- जासौं निबहै जीविका करिए सो अभ्यास।
- दुष्ट न छाँड़ै दुष्टता कैसें हू सुख देत।
- कहूँ अवगुन सोइ होत गुन कहूँ गुन अवगुन होत।
- असुभ करत सोइ होत सुभ सज्जन बचन अनूप।
- एक भले सब कौ भलौ देखौ सबद बिबेक।
- एक बुरे सब कौ बुरौ होत सबल के कोप।
- बड़ेन पै जाँचै भलौ जदपि छोत परमान।
- अवगुन करता और ही देत और कौं मार।
- मान होत है गुननि तैं गुन बिन मान न होइ।
- आडंबर तजि कीजियै गुन संग्रह चित चाय।
- जैसो गुन दैनी दई तैसो रूप निबंध।
- अभिलाषी इक बात के तिनमें होय विरोध।
- जो जाकौ चाहै भलौ सो ताही की भीर।
- अहित किए हू हित करै सज्जन परम अधोर।
- ह्वै सहाय हित हू करैं तऊ दुष्ट दुख देत।
- अपनी अपनी ठौर पर सोभा लहत बिसेष।
- जो चाहैं सोई करौ मेरौ कछु न कहाव।
- जाकौं जैसो उचित तिहिं करिए सोइ बिचार।
- जुरै न जैसें लहत हैं मिले विरंगहू रंग।
- नहिं ह्वाब देख्यौ सुन्यौ जासौं मिटत सुभाव।
- जाकौ जासौं मन लग्यौ सो तिहिं आवै भाय।
- होय कछू समुझै कछू जाकी मति विपरीत।
- प्रेम निबाहन कठिन है समुझ कीजियौ कोय।
- कोउ बिन देखे बिन सुने कैसें कहै बिचार।
- देव सेवै फल देत हैं जाकौ जैसो भाय।
- कुल बल जैसो होय सो तैसी करिहै बात।
- जाकी ओर न जाइयै कैसें मिलिहै सोइ।
- जैसो बंधन प्रेम कौ तैसो बंध न और।
- जे उदार ते देत हैं रीझत जिहिं तिहिं चाल।
- अपनी अपनी गरज सब बोलत करत निहोर।
- जो सब ही कौं देत है दाता कहियै सोइ।
- तिन सौं बिमुख न हूजियै जे उपकार समेत।
- जो समुझै जा बात कौं सो तिहिं कहै बिचार।
- नवल नेह आनंद उमंग दुरै न मुख चख ओर।
- प्रकृत मिले मन मिलत है अनमिलते न मिलाय।
- बात कहन की रीति में है अंतर अधिकाय।
- एक वस्तु गुन होत है भिन्न प्रकृत के भाय।
- सुख में होत सरीक सौ दुख सरीक सौ होय।
- स्वारथ के सब ही सगे बिन स्वारथ कोउ नाहिं।
- जो लायक जिहिं भाँति कौ तासौं तैसी होय।
- सुख बीते दुख होत है दुख बीते सुख होत।
- जो भावै सोई सही बड़े पुरुष सुख बानि।
- दोष-भरी न उचारियै जदपि यथारथ बात।
- पर घर कबहूँ न जाइयै गए घटत है जोति।
- औरहि तैं कोमल प्रकृत सज्जन परम दयाल।
- सज्जन अंगीकृत कियौ ताकौं लेत निबाहि।
- जिन पंडित विद्या तजहु धन मूरख अवरेख।
- एक सदा निबहै नहीं जनि पछतावहु कोय।
- होय सुद्ध मिटि कलुषता सत संगति कौं पाय।
- ब्रह्म बनाए बन रहे ते फिर और बनै न।
- जाहि पर्यौ जैसो ब्यसन ता बिन रहत न सोय।
- जे चेतन ते क्यौं तजें जाकौ जासौं मोह।
- घटति बढ़ति संपति सुमति गति अरहट की जोय।
- प्रापति तैसी होति है जिहिं जैसी लै भाइ।
- उत्तम जन की होड़ करि नीच न होत रसाल।
- उत्तम जन के संग में सहजै ही सुख भास।
- या जग की बिपरीति गति समुझि देखि सुभाव।
- भले लगें सब कौं कहैं कोउ हित के बैन।
- जो जाके हित की कहै सो ताकै अभिराम।
- कोउ है हित की कहै है ताही सों हेत।
- को चाहै अपनौ तजु जा संग लहियै पीर।
- एक बिरानौ ही भलौ जिहिं सुख होत सरीर।
- जो पावै अति उच्च पद ताकौ पतन निदान।
- अनुचित अति बल आपनौ कहे अनादर होय।
- कलुष भाव देखें जहाँ उत्तम जन न रहायँ।
- जो चाहै सोई लहै यौं सुख होइ सरीर।
- मन-भावन के मिलन छिन यौं जिय होय उदास।
- जिहिं प्रसंग दूषन लगै तजिए ताकौ साथ।
- जाकै संग दूषन दुरै करिए तिहिं पहिचानि।
- जिहिं देखें लांछन लगौ तासौं दृष्टि न जोर।
- मूरख गुन समुझै नहीं तौ न गुनी मैं चूक।
- खल जन सौं कहियै नहीं गूढ़ कबहूँ करि मेल।
- एकहि गुन ऐसौ भलौ जिहिं अवगुन छिप जात।
- मूढ़ तहाँ ही मानिए जहाँ न पंडित होइ।
- बिन स्वारथ कैसें सहै कोउ करुए बैन।
- सज्जन तजत न सज्जनता कोटिहु दोष अपार।
- दुष्ट न छाँड़ै दुष्टता पोखै राखै ओट।
- धन संच्यौ किहिं काम कौ खाउ खरच हरि प्रीति।
- करै बुराई सुख चहै कैसै पावै कोइ।
- होय बुराई तें बुरी यह कीनौ निरधार।
- दिए सहस गुन देत सोइ पावै यह सच बात।
- एक भेष कै आदरें जाति बरन छिप जात।
- जाकौ जहाँ स्वारथ सधै सोइ ताहि सुहात।
- जैसी ही भवतव्यता तैसी बुद्धि प्रकास।
- निहचै भावी कौं कहाँ प्रतिकार जो होइ।
- कछू सहाय न चलि सकै होनहार कै पास।
- अति ही सरल न हूजियै देखौ ज्यौं बनराय।
- बहुतन कौं न बिरोधियै निबल जानि बलवान।
- बहुत निबल मिलि बल करैं करैं जु चाहै सोय।
- दुर्जन के संसर्ग तैं सज्जन लहत कलेस।
- सुजन कुसंगति संग तैं सज्जनता न तजंत।
- कष्ट परेहूँ साधु जन नैक न होत मलान।
- जे उत्तम ते असम सौं धरत न रिस मन माहिं।
- खल बंचत नर सुजन कौं नहि न बिसास करेइ।
- मिथ्या-भाषी साँच हू कहै न मानै कोइ।
- सदा समै बलवान पै नाहिं पुरुष बलवान।
- कन कन जोरै मन जुरै खाते निबरै सोय।
- थोरै ही गुन तैं कहूँक प्रगट होत जग माहिं।
- ऊँचे बैठे ना लहै गुन बिन बड़पन कोइ।
- दुख पाए बिनहूँ कहूँ गुन पावत है कोइ।
- निपट अबुध समुझैं कहाँ बुध जन बचन बिलास।
- बिनसत सतगुन गुनिय के अगुन पुरुष के पास।
- साँच झूठ निरनै करै नीति-निपुन जो होय।
- इक समीप बसि अहित कर इक हितकर बसि दूर।
- दोषहि को उमहै गहै गुन न गहै खल लोक।
- भली न होवै दुष्ट जन भलौ कहै जो कोय।
- कारज करत असाध के सब में साध कहाय।
- एक उदर वाही समय उपज न इक से होय।
- सुरत देवहू निबल अरु दुरबल ही के प्रान।
- जिहिं जासौं मतलब नहीं ताकी ताहि न चाह।
- जे पर ते पर यह समुझ अपनो होय न कोय।
- दीजै सीख अजान कौं मानै सीख सुजान।
- उद्यम कबहूँ न छाँड़ियै पर आसा के मोद।
- कारज धीरे होतु है काहे होत अधीर।
- जो पहिले कीजै जतन सो पीछे फलदाय।
- होत सिद्धि जैसे समय तैसो ही अभिलाख।
- क्यों कीजै ऐसौ जतन जातें काज न होय।
- साँची संपति और की और भोगवै आय।
- सेयौ छोटौ ही भलौ जासौं गरज सराय।
- श्रम ही तैं सब मिलत है बिन श्रम मिले न काहि।
- कहियै बात प्रमाण की जासौं सुधरै काज।
- कहै रसीली बात सौं बिगरी लेत सुधारि।
- जो चाहैं सोई करैं बड़े असंकित अंग।
- बड़े सहज ही बात तैं रीझि देत बकसीस।
- बड़े कहैं सो कीजिये करैं सु करियै नाहिं।
- काहू कियौ न कीजियै तिय जिय को बिसवास।
- सुधरी बिगरै बेग ही बिगरी फिर सुधरै न।
- न कछु तजु वाकी तलब ताही की मनुहार।
- गुनी तऊ अवसर बिना आग्रह करै न कोइ।
- जदपि आपनौ होय तऊ दुख में करत न सोर।
- विद्या मिलै अभ्यास तैं सुजन सुभाव मिलै न।
- काम सबै पावै सु दुख जस निबल के अंग।
- यह कहवत जैसौ करै तैसौ पावै लोय।
- छोटे नर तैं रहत है सोभायुत सिरताज।
- हित हू भलौ न नीच कौ नाहिन भलौ अहेत।
- सहज रसीलौ होय सो करै अहित पर हेत।
- कर बिगरी सुधरै बचनहि जैसें बनिक बिलेख।
- अरि के संग कुटुंब लखि जिय उपजत है त्रास।
- कबहूँ संग न कीजियै भिन्न प्रकृत की हानि।
- कोउ काहु कौं बुरी करै परै तिहिं धाम।
- कहा करै कोउ जतन प्रकृति न बदलै कोइ।
- जदपि सहोदर होय तऊ प्रकृत और की और।
- डरै न काहू दुख सौं जाहि प्रेम की बान।
- बहुत किए हू नीच कौ नीच सुभाव न जात।
- चतुर कूर इक से गनै जाके नाहिं बिबेक।
- कूर न होवै चतुर नर कूर कहै जो कोइ।
- कैसें हू छुटत नहीं जा में परी कुबानि।
- भेष बनाए सूर कौ कायर सूर न होय।
- धन बाढ़ै मन बढ़ि गयौ नाहिन मन घट होय।
- सब तैं लघु है माँगिबौ जा में फेर न सार।
- बड़े न लोपैं लाज कुल लोपैं नीच अधीर।
- नाम भलौ होत न भलौ भलौ भाग जिहिं भाल।
- उत्तम पर कारज करै अपनौ काज बिसार।
- देवन हू सौं देव प्रभु कहा सुरेस नरेस।
- सब इक से होत न काहु होत सबन में फेर।
- अपनौ समै बिचारि कै अरि जीतिए अचूक।
- छल बल समय बिचारिकै अरि हनिए अभ्यास।
- काम परे ही जानियै जो नर जैसो होय।
- जैसी संपति तैसियै इज्जत मिलि है आय।
- अनघर सुघर समाज में आय बिगारै रंग।
- अनमिल सुमिल समाज सौं होत गए उठि चैन।
- चतुर सभा में कूर नर सोभा पावत नाहिं।
- रसिक सभा में निरस नर होत होत रस हानि।
- मिल्यौ दुष्ट नाहिन भलौ उपजत मिलै अहेत।
- दोष धरैं निरदोष कौं जे नर होयँ सदोष।
- होत सुसंगति सहज सुख दुख कुसंग के थान।
- भले बचन मुख नीच के नाहिन होत प्रकास।
- सुधरौ बिगरि कुसंग तैं सत संगति कौं पाय।
- मिलै सुसंगति उच्च हू करत नीच सौं प्यार।
- बिगरौ होय कुसंग जिहिं कौन सकै समुझाय।
- ह्वैहैं बड़े बड़ेन सौं होय न छोटे काज।
- अगुनात लखि नर नीच की काहू कौं न सुहात।
- छाँड़ि सबल अरु निबल की कबहूँ न गहिए ओट।
- प्रेम छकैं मन कौं हठकि रखि न सकै कुल लाज।
- बात प्रेम की राखियै अपने ही मन माहिं।
- ताकौं त्यौं समुझाइए ज्यौं समुझै जिहि बानि।
- बिपत परे सुख पाइए ता ढिंग करिए भौन।
- हीन अकेलौ ही भलौ मिले भले नहिं होय।
- जैसौ घ्रानक सेइए तैसी पूरै काम।
- बाँके सीधे कौ मिलन निबहै नाहिं निदान।
- क्यों करिए प्रापति अलप जामें श्रम अति होय।
- होय पहुँच जाकी जिती तेती करत प्रकास।
- जहाँ चतुर नाहिन तहाँ मूढ़नि सौ व्यवहार।
- होत न कारज मो बिना यह जु कहै सु अयान।
- उत्तम कौ अपमान अरु जहाँ नीच की मान।
- यथाजोग की ठौर बिन नर छबि पावै नाहिं।
- बिपति बड़ई सहि सकैं इतर बिपति तैं दूर।
- ठौर छूटे तैं मीत हू ह्वै अमीत सततात।
- होत बहुत धन होत तऊ गुन जुत भए उदोत।
- कहा भयौ जो धन भयौ गुन तैं आदर होइ।
- जात गुनी जात न वहाँ आडंबर जुत सोय।
- गुनवारी संपति लहै लहै न बिन गुन कोय।
- को करि सकै बड़ेन सौं कबहूँ प्रति उपकार।
- विद्या गुरु की भक्ति सौं कै कीन्हे अभ्यास।
- गुरु हू सिखवौ ज्ञान गुन सिष्य सुबुद्धि जु होय।
- पंडित पंडित सौं मिले संसै मिटत न बेर।
- उत्तिम बुधि-बल सौं मिले तब पावत सुख-साज।
- जाकौ हृदय कठोर तिहिं लगौ न कोमल बैन।
- सबकौ रस में राखिए अंत लीजिए नाहिं।
- फल बिचारि कारज करौ कारहु न व्यर्थ प्रमेल।
- पीछे कारज कीजिए पहिले पहुँच बिचार।
- दुष्ट निकट बसिए नहीं बस न कीजिए बात।
- तिनके कारज होत हैं जिनके बड़े सहाय।
- पुन्य बिबेक प्रभाव तैं निहचल लच्छि निवास।
- नर कारज की सिद्धि लौं करै अनेक प्रकार।
- अरि छोटौ गनियै नहीं जातें होत बिगार।
- छोटे अरि पर चढ़त हूँ सजें सुभट तनत्रान।
- गुन तैं संग्रह सब करैं कुल न बिचारै कोय।
- बुरौ होय तऊ सुकुल की तासौं बुरी न होय।
- ताकौ अरि कहा करि सकै जाकौ जतन उपाय।
- पंडित जन कौ श्रम मरम जानत जे मतिधीर।
- सूर बीर की संपदा कायर पै नहिं जाय।
- भूपति कै संग सुभट गन आपस में यह रीति।
- जाय दरिद्र कवि जनन की सेवै राज-समाज।
- वीर पराक्रम ना करै तासौं डरत न कोइ।
- वीर पराक्रम तैं करै भुव-मंडल कौ राज।
- जोरावर अरि मारियै बुध बल किए उपाय।
- राजा के बल लोक सब फिरै घिरै चहुँ ओर।
- नृप प्रताप तैं देस में रहै दुष्ट नहिं छाय।
- यहै बात सब ही कहै राजा करै सु न्याव।
- कारज ताही कौ सरै करै जु समै निहारि।
- सब देखै पै आपनौ दोष न देखै कोइ।
- संत कष्ट सहि आपुही सुखि राखैं जु समीप।
- मारै इक रच्छा करै एकहि कुल कौ होय।
- अपनी अपनी ठौर पर सबकौं लागी दाव।
- सुनि मन सुस्थिर कुबात तैं कैसें राखे कोइ।
- जो हाजिर अवसान पर सोई शस्त्र प्रमान।
- बड़े अनीति करैं तऊ बुरी कहै नहिं कोइ।
- नीति-निपुन राजानि कौं अजुगुत नाहिं सुहाय।
- लघु मिलिए गहबे जदपि बड़े कछु लै ताहि।
- भले बुरे छोटे बड़े रहैं बड़ेन पै आय।
- बड़े भार लै निबहैं तजत न खेद बिचारि।
- बुरी करैं पर जे बड़े भली करैं हित धारि।
- उत्तम जन सौं मिलत ही अवगुनहूँ गुन होय।
- काहू सौं नाहिं मिटै अपरापत के अंक।
- कोउ दूर न करि सकै विधि के उलटे अंक।
- गहिए ओट बड़ेन की जहाँ मिटै दुखदंद।
- छल बल धर्म अधर्म करि अरि साधिए अभिमीत।
- गाहक सबै सपूत के सारे काज सपूत।
- आप कष्ट सहर और कौं सोभा करत सपूत।
- करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान।
- सुख दिखाय दुख दीजियै खल सौं लरियै नाहिं।
- बिन बूझे ही जानिए बुध मूरख मन माहिं।
- सहज संतोष है साध कौं खल दुख देन प्रवीन।
- सुंदर थान न छाँड़ियै जौ लौं होय न और।
- फिर पीछे पछताइए सो न करै मति सूध।
- को सुख को दुख देत है देत करम झकझोर।
- सब सुख है संतोष में धरिए मन संतोष।
- पाँय परे हू पिसुन सौं बिसरि न करिए बात।
- सबल न पुष्ट सरीर कौ सबल तेज जुत होय।
- कायर नर की देख रन मुख फीकौ दरसाय।
- दोष धरै गुनि कौ पिसुन इह डर गुन न बितारि।
- भली करत लागत बिलम बिलम न बुरे बिचार।
- सोई अपनौ आपनौ रहै निरंतर साथ।
- बिनसत बार न लगई ओछे जन की प्रीति।
- करिए बात न तन परस खल ढिग जैए नाहिं।
- निपट अनमिलती बात कौं कैसें करिहै कोइ।
- देखि ठिकानौ माँगिए माँगो मिलै जु होइ।
- कहै मूढ़ की बात के करिए जो चित होय।
- झूठहु ऐसौ बोलिए साँच बराबर होय।
- समुझै अनसमुझै कछुक कहिए मीठी बात।
- सुबुध बीच परि दुहुँन कौं हरत कलह रस पूर।
- अधिक दुखी लखि आप तैं कीजै दुख बिसराय।
- होत बुरे हूँ तैं भलौ काहु समै प्रकास।
- एक अनीति करै लहै संगी दुख सुख नाहिं।
- बड़े बिपत में हूँ करैं भले बिराने काम।
- बड़े बड़े हू काम करि आप सिखावत नाहिं।
- बड़े बचन पलटैं नहीं कहि निरबहैं धीर।
- बुरी करैं तेई बुरे नाहिं बुरौ कोउ और।
- झूठ बसै जा पुरुष में ताही की अप्रतीति।
- कुल सपूत जान्यौ परै लखि सुभ लच्छन गात।
- नियमित जननी उदर में कुल को लेब सुमान।
- बिना सिखाए लेत है जिहिं कुल जैसी रीति।
- सत्य बचन मुख जो कहत ताकी चाह सराह।
- प्रेम पगन जासों भये सुख दुख ताके संग।
- चहल पहल अवसर परे लोक रहत घर घेर।
- बुधि बिना विद्या कहौ कहा सिखावै कोइ।
- बहुत न बिलंब कीजिए कारज अवसर पाय।
- भजन निरंतर संत जन हरि पद चित लगाय।
- का रस में का रोष में अरि ये जिनि पतियाय।
- चप चप करती ना रहै नर लबार की जीभ।
मूल पाठ और हिंदी अर्थ · १–५०
पढ़ने की सुविधा के लिए क्रमांक-समूह · मुद्रित पृष्ठ २८७–२९०
आरंभिक छंद १
शब्दार्थ: मनोरथ = अभिलाषा; घन = बादल।
सरल हिंदी अर्थ: गुरु के प्रभाव से शुभ उद्देश्य पूरे होते हैं, जैसे वर्षा से पेड़-लताओं के पत्ते, फूल और फल बढ़ते हैं।
भावार्थ: सद्मार्गदर्शन विकास का सहारा है।
आरंभिक छंद २
शब्दार्थ: दृष्टांत = उदाहरण; सुगम = सरल।
सरल हिंदी अर्थ: वृंद ने प्रस्तावित विषयों पर सरल दोहे बनाकर कथन का अर्थ उदाहरणों से पुष्ट किया है।
भावार्थ: उदाहरण से शिक्षा स्पष्ट होती है।
आरंभिक छंद ३
शब्दार्थ: बानी = वाणी; सरस = रसयुक्त।
सरल हिंदी अर्थ: सरल और सरस भाव सब समझते और पसंद करते हैं, जैसे समय पर कही बात अच्छी लगती है।
भावार्थ: सरलता और अवसर वाणी सँवारते हैं।
दोहा ४
शब्दार्थ: नीकी = अच्छी; सिंगार = शृंगार।
सरल हिंदी अर्थ: अच्छी बात भी अनुचित अवसर पर फीकी लगती है; युद्ध के बीच शृंगार-वर्णन उपयुक्त नहीं होता।
भावार्थ: कथन से पहले प्रसंग समझें।
दोहा ५
शब्दार्थ: गारि = विवाह के परिहास-गीत।
सरल हिंदी अर्थ: सामान्यतः अप्रिय शब्द भी उचित लोकपरंपरा में अच्छे लगते हैं, जैसे विवाह के हँसी-परिहास वाले गीत।
भावार्थ: प्रसंग और सहमति से अर्थ बदलता है।
दोहा ६
शब्दार्थ: रागी = अनुरागी; लाल = प्रिय का संबोधन।
सरल हिंदी अर्थ: प्रेम करने वाला प्रिय के दोष नहीं गिनता; श्यामवर्ण बालक भी सबका प्यारा लाल कहलाता है।
भावार्थ: प्रेम बाहरी भेद से ऊपर उठता है।
दोहा ७
शब्दार्थ: बखान = प्रशंसा; विषभखी = विष खाने वाला।
सरल हिंदी अर्थ: जिसे जो प्रिय लगता है, वह उसी की प्रशंसा करता है; विषभक्षी के लिए विष भी अमृत जैसा है।
भावार्थ: रुचि को सार्वभौमिक मूल्य न मानें।
दोहा ८
शब्दार्थ: अंब = आम; निबौरी = नीम का फल।
सरल हिंदी अर्थ: जो जिस गुण को पहचानता है उसी को मान देता है; कोयल आम और कौआ निबौरी चुनता है।
भावार्थ: गुण पहचानने के लिए उपयुक्त दृष्टि चाहिए।
दोहा ९
शब्दार्थ: उद्यम = प्रयत्न; भख = आहार।
सरल हिंदी अर्थ: कवि अजगर का काव्य-बिंब देकर बिना उद्यम के निर्वाह की सीमित स्थिति कहता है; प्राणी-विज्ञान का कथन नहीं करता।
भावार्थ: सामान्य जीवन में कर्म आवश्यक है।
दोहा १०
शब्दार्थ: मृगपति = सिंह; बदन = मुँह।
सरल हिंदी अर्थ: जब तक सामर्थ्य हो, काम करते रहो; सिंह के मुँह में अजगर की उपमा की तरह भोजन स्वयं नहीं आता।
भावार्थ: क्षमता अनुसार सक्रिय प्रयास करें।
दोहा ११
शब्दार्थ: सलभ = टिड्डी; निरमूल = नष्ट।
सरल हिंदी अर्थ: प्रयास के बाद भी अनियंत्रित विपत्ति फल बिगाड़ सकती है, जैसे तैयार खेत को टिड्डियाँ नष्ट कर दें।
भावार्थ: परिश्रम के साथ अनिश्चितता भी समझें।
दोहा १२
शब्दार्थ: रीते = खाली; सरवर = तालाब।
सरल हिंदी अर्थ: आशा उसी से रखें जिसके पास सहायता की क्षमता हो; खाली तालाब प्यास नहीं बुझाता।
भावार्थ: अपेक्षा में वास्तविकता देखें।
दोहा १३
शब्दार्थ: सघन = जलसमृद्ध स्थान; चातक = काव्यपक्षी।
सरल हिंदी अर्थ: एकनिष्ठ इच्छा वाला अन्य साधन होते हुए भी उसी विशेष आश्रय को चाहता है; चातक का स्वाति-बूँद बिंब है।
भावार्थ: निष्ठा की तीव्रता काव्य में व्यक्त है।
दोहा १४
शब्दार्थ: अगर = सुगंधित वृक्ष; भौन = भवन।
सरल हिंदी अर्थ: अगर की सुगंध ही उसे जलाए जाने का कारण बनती है; कवि गुण से आने वाले कष्ट पर विरोधाभास रचता है।
भावार्थ: गुण के साथ उसकी जिम्मेदारी भी आती है।
पाठ और प्रसंग: पहले चरण का “तजु भनाइयै” पाठ कठिन है। मूल रूप रखा है; अर्थ अगर-वृक्ष के स्पष्ट दृष्टांत तक सीमित है।
दोहा १५
शब्दार्थ: अरस = नीरसता; बीछू = बिच्छू।
सरल हिंदी अर्थ: रस का विवेक बिना प्रेम की कठिन बातों में उतरना वैसा है जैसे सुरक्षा का ज्ञान बिना साँप का पिटारा छूना।
भावार्थ: गहरी बात में तैयारी से उतरें।
दोहा १६
शब्दार्थ: निबल = निर्बल; गैर = विरोध।
सरल हिंदी अर्थ: समुद्र में रहकर मगर से शत्रुता जैसे असमान संघर्ष में निर्बल का निर्वाह कठिन होता है।
भावार्थ: संघर्ष में शक्ति और सहयोग परखें।
दोहा १७
शब्दार्थ: बिवहार = व्यवहार; पायन = पैरों का।
सरल हिंदी अर्थ: बिना सोचे व्यवहार न करें; गलत व्यवस्था से अनचाहा भार आता है। दूसरे चरण का संकेत कठिन है।
भावार्थ: निर्णय के पहले परिणाम सोचें।
पाठ और प्रसंग: दूसरे चरण में “सिर कौ पायन भार” का संकेत संक्षिप्त और कठिन है। सामान्य सावधानी को ही अर्थ में लिया है।
दोहा १८
शब्दार्थ: दीवौ = दिया गया; घन = बादल।
सरल हिंदी अर्थ: समय पर मिली मदद काम सँवारती है; खेत सूख जाने के बाद वर्षा व्यर्थ हो सकती है।
भावार्थ: सहायता में समय महत्त्वपूर्ण है।
दोहा १९
शब्दार्थ: सौर = ओढ़ने की चादर; पहुँच = सामर्थ्य।
सरल हिंदी अर्थ: अपनी क्षमता देखकर कार्य का विस्तार करें; चादर जितनी हो, उतने पैर फैलाएँ।
भावार्थ: संसाधनों के अनुसार योजना रखें।
दोहा २०
शब्दार्थ: पिसुन = कपटी; दाध्यो = जला हुआ।
सरल हिंदी अर्थ: कपटी से ठगा व्यक्ति सज्जन पर भी तुरंत भरोसा नहीं करता, जैसे दूध से जला छाछ फूँकता है।
भावार्थ: पुरानी चोट विश्वास को प्रभावित करती है।
दोहा २१
शब्दार्थ: तृषातुर = प्यास से व्याकुल।
सरल हिंदी अर्थ: समय पर थोड़ा जल प्राण बचा सकता है; बहुत देर के बाद हजार घड़े भी वही अवसर नहीं लौटाते।
भावार्थ: जरूरत के समय सहायता दें।
दोहा २२
शब्दार्थ: पौन = हवा; उद्यम = श्रम।
सरल हिंदी अर्थ: विद्या और धन बिना प्रयास नहीं मिलते, जैसे पंखा हिलाए बिना हवा नहीं देता।
भावार्थ: अभ्यास और कर्म सफलता का आधार हैं।
दोहा २३
शब्दार्थ: बयार = हवा; ओट = आड़।
सरल हिंदी अर्थ: बनती परिस्थिति सँवारें और बिगड़ने से बचाएँ; हवा की दिशा देखकर उचित आड़ दी जाती है।
भावार्थ: परिस्थिति के अनुरूप उपाय करें।
दोहा २४
शब्दार्थ: छीलर = उथला छोटा ताल।
सरल हिंदी अर्थ: कमजोर निष्ठा का प्रेम उथले ताल के पानी की तरह जल्दी घट जाता है।
भावार्थ: मित्रता में स्थिरता देखें।
दोहा २५
शब्दार्थ: अनमिलती = असंगत; जोग = योग।
सरल हिंदी अर्थ: अपने घोषित मार्ग से विपरीत काम करने वाला उपहास पाता है, जैसे योगी का भोग में ही उलझना।
भावार्थ: वचन और कर्म में संगति रखें।
दोहा २६
शब्दार्थ: सिख = सीख; भेषज = औषधि।
सरल हिंदी अर्थ: हितकारी सीख पहले कड़वी लग सकती है, जैसे उपचार की कड़वी दवा रोग के लिए उपयोगी होती है।
भावार्थ: हित और केवल मिठास अलग पहचानें।
दोहा २७
शब्दार्थ: गिरवर = पर्वत; थाप = सामर्थ्य।
सरल हिंदी अर्थ: पर्वत की गर्मी बादल मिटा सकता है, नदी नहीं; बड़ी समस्या के लिए उपयुक्त सामर्थ्य चाहिए।
भावार्थ: सहायक का मूल्य क्षमता से जुड़ा है, जन्म से नहीं।
दोहा २८
शब्दार्थ: करी = हाथी; वृंद = झुंड।
सरल हिंदी अर्थ: झुंड में हाथी पर्वत जैसा और दर्पण में छोटा दिखता है; आश्रय और संदर्भ महत्ता का अनुभव बदलते हैं।
भावार्थ: मूल्यांकन में संदर्भ समझें।
दोहा २९
शब्दार्थ: वृच्छ = वृक्ष; बेल = लता।
सरल हिंदी अर्थ: बड़े सहायक के पास रहने से विकास होता है, जैसे वृक्ष के सहारे लता ऊँची बढ़ती है।
भावार्थ: अच्छा मार्गदर्शन और संग चुनें।
दोहा ३०
शब्दार्थ: मलयज = चंदन; सुबास = सुगंध।
सरल हिंदी अर्थ: उपकारी सभी का हित करता है, जैसे चंदन की सुगंध अलग-अलग वृक्षों में फैलती है।
भावार्थ: भलाई में पक्षपात कम करें।
दोहा ३१
शब्दार्थ: कूच = वक्ष; मर्दन = दबना।
सरल हिंदी अर्थ: कठोरता और मलिन मुख के शृंगारिक बिंब से कवि अहं और रूखे व्यवहार का परिणाम बताता है।
भावार्थ: बड़प्पन में कोमल व्यवहार रहे।
पाठ और प्रसंग: मूल में शरीर और शृंगार का दृष्टांत है। उसे सामाजिक व्यवहार के रूपक की तरह पढ़ें।
दोहा ३२
शब्दार्थ: लिलार = ललाट; करिकुंभ = हाथी का माथा।
सरल हिंदी अर्थ: हाथी के माथे का अंकुश और वक्ष का नख-चिह्न लेकर कवि कष्ट से बच न पाने का रूपक रचता है।
भावार्थ: यह नियति-भाव का काव्य है, निश्चित भविष्यवाणी नहीं।
पाठ और प्रसंग: “भदु” पद अस्पष्ट है; मुद्रित रूप अनुमान से नया नहीं बनाया गया है।
दोहा ३३
शब्दार्थ: दव = वनाग्नि; नलिन = कमल।
सरल हिंदी अर्थ: आग से बचकर जल में आए कमल को पाला झुलसा देता है; विपत्ति में आश्रय भी विफल हो सकता है।
भावार्थ: सुरक्षा के साधन परिस्थिति अनुसार जाँचें।
दोहा ३४
शब्दार्थ: पगत = आरंभ में लगते समय; बेकाज = व्यर्थ।
सरल हिंदी अर्थ: प्रेम आरंभ में न रोका, अब वह रोम-रोम में बस गया; रोकने को कवि निष्फल कहता है।
भावार्थ: गहरा लगाव सहज आदेश से नहीं बदलता।
दोहा ३५
शब्दार्थ: फेर = दोबारा; कपट = छल।
सरल हिंदी अर्थ: छल का व्यापार बार-बार नहीं चलता, जैसे लकड़ी की हाँडी बार-बार आग नहीं सहती।
भावार्थ: विश्वास खोने पर लाभ टिकता नहीं।
दोहा ३६
शब्दार्थ: सयान = समझदार; सौनै = सोना।
सरल हिंदी अर्थ: जिस सुख के साधन से दुख बढ़े, उसे त्यागना उचित है; कान तोड़ने वाला आभूषण उपयोगी नहीं।
भावार्थ: साधन से पहले वास्तविक हित देखें।
दोहा ३७
शब्दार्थ: हेत-अहेत = प्रेम और अप्रेम; आरसी = दर्पण।
सरल हिंदी अर्थ: आँखें मन का लगाव और दूरी प्रकट करती हैं, जैसे साफ दर्पण रूप दिखाता है।
भावार्थ: भाव व्यवहार में झलकते हैं।
दोहा ३८
शब्दार्थ: परचै = परिचय; मलयागिरि = चंदन का पर्वत।
सरल हिंदी अर्थ: बहुत सुलभ वस्तु का महत्त्व भुलाया जा सकता है; चंदन का ईंधन होना उदाहरण है।
भावार्थ: परिचित के मूल्य को पहचानें; समुदाय का तिरस्कार न करें।
दोहा ३९
शब्दार्थ: बिरहिन = विरहिणी; ससि = चंद्रमा।
सरल हिंदी अर्थ: जिससे सुख न मिले, व्यक्ति उसी में दोष देखता है; विरहिणी शीतल चंद्रमा को भी जलाने वाला कहती है।
भावार्थ: भावना मूल्यांकन का रंग बदलती है।
दोहा ४०
शब्दार्थ: संयोग = मिलन; बेर = समय।
सरल हिंदी अर्थ: मिलन में शीतल चंद्रमा विरह में तपता लगता है; वही वस्तु परिस्थिति बदलने पर अलग अनुभव देती है।
भावार्थ: दूसरे के अनुभव का संदर्भ समझें।
दोहा ४१
शब्दार्थ: बिरचे = रचे; बुभात = बुझाता।
सरल हिंदी अर्थ: दीपक को हवा से बचाने वाला आँचल उसे बुझा भी सकता है; हितकारी संग विपरीत पड़ सकता है।
भावार्थ: इरादे के साथ प्रभाव भी देखें।
दोहा ४२
शब्दार्थ: सुधाकर = अमृतमय चंद्रमा।
सरल हिंदी अर्थ: मन के भाव के अनुसार कोई चंद्रमा को सुधाकर और कोई कलंकी कहता है।
भावार्थ: अपना दृष्टिकोण अंतिम सत्य न मानें।
दोहा ४३
शब्दार्थ: बहेड़ा, अंब = वृक्ष; आनि = आकर।
सरल हिंदी अर्थ: जैसे व्यवहार और गुण हों, वैसा जगत का संबंध बनता है; लोग अनुपयोगी छोड़ उपयोगी आश्रय चुनते हैं।
भावार्थ: दूसरों से अपेक्षा से पहले अपना व्यवहार देखें।
दोहा ४४
शब्दार्थ: पाँच = पन्ना रत्न का पुराना नाम।
सरल हिंदी अर्थ: समझदार काँच और पन्ने में भेद पहचानते हैं; विवेक वाले वास्तविक मूल्य पर सहमत हो सकते हैं।
भावार्थ: चमक से आगे गुण परखें।
दोहा ४५
शब्दार्थ: काक = कौआ; पिक = कोयल।
सरल हिंदी अर्थ: बोलने से पहले लोग समान दिख सकते हैं; आवाज से कौआ और कोयल पहचाने जाते हैं।
भावार्थ: वाणी व्यक्तित्व का परिचय देती है।
दोहा ४६
शब्दार्थ: भीत = दीवार; लेव = लेप; भेव = भेद।
सरल हिंदी अर्थ: श्रद्धा से मूर्ति में देवत्व अनुभव होता है; श्रद्धा बिना वही पदार्थ मात्र लगता है।
भावार्थ: भक्ति में भीतरी भाव महत्त्वपूर्ण है।
दोहा ४७
शब्दार्थ: तीय = स्त्री; बिलास = सौंदर्यपूर्ण अभिव्यक्ति।
सरल हिंदी अर्थ: ग्रहणशीलता बिना कविता का रस नहीं खुलता; कवि दृश्य संकेत न देख पाने का पुराना बिंब देता है।
भावार्थ: यह उपमा है; दिव्यांगता बुद्धि का अभाव नहीं।
दोहा ४८
शब्दार्थ: खर = गधा; गुर = गुड़; भाय = मूल्य।
सरल हिंदी अर्थ: जहाँ भेद-विवेक ही न हो वहाँ न रहें; अन्यायी नगर में गधे और गुड़ का एक मूल्य होना व्यंग्य है।
भावार्थ: न्याय में विवेकपूर्ण भेद जरूरी है।
पाठ और प्रसंग: पुस्तक की दीपिका में “गुर” का अर्थ गुड़ है। इसे गुरु का संबोधन नहीं पढ़ना चाहिए।
दोहा ४९
शब्दार्थ: गो = गाय; सेंहुड़ = दूधिया रस वाला पौधा।
सरल हिंदी अर्थ: सफेद रंग देखकर गाय के दूध और सेंहुड़ के रस को समान न मानें; गुण जाने बिना निर्णय गलत होगा।
भावार्थ: बाहरी समानता वास्तविक समानता नहीं।
दोहा ५०
शब्दार्थ: मनुहार = आदरपूर्ण आग्रह; भेष = वेश।
सरल हिंदी अर्थ: गुण और वास्तविक परिचय जाने बिना केवल भक्त-वेश देखकर विश्वास न करें; वेश में छल भी संभव है।
भावार्थ: आस्था के साथ प्रमाण और आचरण देखें।
मूल पाठ और हिंदी अर्थ · ५१–१०२
पढ़ने की सुविधा के लिए क्रमांक-समूह · मुद्रित पृष्ठ २९१–२९४
दोहा ५१
शब्दार्थ: अबोध = न समझने वाला; आरसी = दर्पण।
सरल हिंदी अर्थ: अनिच्छुक व्यक्ति को हित की बात भी क्रोध दिलाती है; कवि शरीर-संबंधी पुरानी उपमा देता है।
भावार्थ: समझाइश में संवेदनशीलता रखें।
दोहा ५२
शब्दार्थ: अनीति = अन्याय।
सरल हिंदी अर्थ: धन प्रिय हो तब भी अन्याय से न पाएँ; सोने की छुरी मिलने पर स्वयं को घायल नहीं करते।
भावार्थ: लाभ से पहले हित देखें।
दोहा ५३
शब्दार्थ: पोथी = पुस्तक; बाँचन = पढ़ना।
सरल हिंदी अर्थ: ग्रहणशीलता बिना गुणों की पुस्तक निष्फल है; दर्पण न देख सकने का दृश्य-बिंब है।
भावार्थ: दिव्यांगता को बुद्धि का अभाव न मानें।
दोहा ५४
शब्दार्थ: सीत = शीतल।
सरल हिंदी अर्थ: मधुर वचन उत्तम व्यक्ति का रोष शांत करते हैं, जैसे थोड़ा ठंडा जल दूध का उफान घटाता है।
भावार्थ: कोमल संवाद प्रभावी हो सकता है।
दोहा ५५
शब्दार्थ: वारि = खेत की बाड़; ककरिया = ककड़ी।
सरल हिंदी अर्थ: रक्षक ही हानि करे तो रक्षा कठिन है, जैसे बाड़ स्वयं ककड़ी खाए।
भावार्थ: रक्षक की जवाबदेही भी जरूरी है।
दोहा ५६
शब्दार्थ: सबल = शक्तिशाली।
सरल हिंदी अर्थ: हवा बड़ी आग बढ़ाती, छोटा दीप बुझाती है; समाज भी बलवान का साथ अधिक देता है।
भावार्थ: निर्बल की सहायता का संकल्प रखें।
दोहा ५७
शब्दार्थ: अचल = पर्वत।
सरल हिंदी अर्थ: जो बलवान को न हिला पाए, वह कमजोर पर जोर दिखाता है; हवा पर्वत नहीं, पेड़ उखाड़ती है।
भावार्थ: शक्ति का अन्यायपूर्ण उपयोग न करें।
दोहा ५८
शब्दार्थ: सैंधव = नमक या घोड़ा; धौरा = घोड़ा।
सरल हिंदी अर्थ: भोजन में नमक माँगा गया हो तो घोड़ा लाना व्यर्थ है; शब्द का अर्थ प्रसंग से समझें।
भावार्थ: कार्य से पहले आशय स्पष्ट करें।
पाठ और प्रसंग: “सैंधव” के नमक और घोड़े, दोनों अर्थ हैं; भोजन-प्रसंग अर्थ तय करता है।
दोहा ५९
शब्दार्थ: किरवा = कीड़ा; आक = पौधा।
सरल हिंदी अर्थ: आक में रमे कीड़े को अच्छे आम का आकर्षण नहीं; रुचि अपने अनुरूप वस्तु चुनती है।
भावार्थ: सबकी पसंद समान नहीं होती।
दोहा ६०
शब्दार्थ: नीर = जल।
सरल हिंदी अर्थ: जिसे प्यास है उसे जल चाहिए, आग नहीं; सही आवश्यकता पूरी होने पर ही सुख मिलता है।
भावार्थ: सहायता जरूरत के अनुरूप हो।
दोहा ६१
शब्दार्थ: करार = चैन।
सरल हिंदी अर्थ: विरह की पीड़ा में चंदन लगाना अलग रोग की दवा जैसा है; उससे मन का दुख नहीं मिटता।
भावार्थ: समस्या का असली कारण समझें।
दोहा ६२
शब्दार्थ: सनेह = प्रेम और तेल।
सरल हिंदी अर्थ: प्रिय की चर्चा विरह और बढ़ाती है; तेल की आग पर पानी पड़ने जैसी उपमा है।
भावार्थ: यह भावनात्मक रूपक है, प्रयोग का निर्देश नहीं।
दोहा ६३
शब्दार्थ: रोस, रिस = क्रोध; बुभात = बुझे।
सरल हिंदी अर्थ: क्रोध बढ़ाने वाली बातें सुनते हुए रोष नहीं मिटता, जैसे ईंधन डालने से आग नहीं बुझती।
भावार्थ: विवाद में उत्तेजना कम करें।
दोहा ६४
शब्दार्थ: कामरी = कंबल।
सरल हिंदी अर्थ: हठ बढ़ने पर समाधान कठिन होता है, जैसे भीगा कंबल और भारी होता जाता है।
भावार्थ: लचीलापन संवाद बचाता है।
दोहा ६५
शब्दार्थ: ओस = शबनम।
सरल हिंदी अर्थ: आशा ऐसी वस्तु से रखें जो जरूरत पूरी करे; ओस चाटकर प्यास नहीं बुझती।
भावार्थ: अल्प संकेत को पर्याप्त साधन न समझें।
दोहा ६६
शब्दार्थ: पित्तज्वरीन = पित्त-ज्वर वाला; दाख = अंगूर।
सरल हिंदी अर्थ: क्रोधित मन को मधुर बात भी विष जैसी लगती है, जैसे रोग में अंगूर कड़वे लगें।
भावार्थ: मनःस्थिति सुनने का अनुभव बदलती है।
दोहा ६७
शब्दार्थ: गुंजा = लाल-काले बीज।
सरल हिंदी अर्थ: व्यक्ति प्रिय वस्तु चुनता है; मोती छोड़ बीजों का हार पहनना रुचि का उदाहरण है।
भावार्थ: रुचि के अंतर से समुदाय को छोटा न आँकें।
दोहा ६८
शब्दार्थ: अयान = अविवेकी; सुधा = अमृत।
सरल हिंदी अर्थ: भक्ति का आनंद छोड़ केवल भोगासक्ति जोड़ना अमृत छोड़ विष चुनने जैसा बताया है।
भावार्थ: क्षणिक सुख के साथ आंतरिक दिशा देखें।
दोहा ६९
शब्दार्थ: महावत = हाथी का संचालक।
सरल हिंदी अर्थ: जोखिम के बाद भी लोग परिचित काम करते हैं; एक महावत घायल हो, दूसरा हाथी पर चढ़ता है।
भावार्थ: परंपरा के साथ जोखिम-विवेक भी रखें।
पाठ और प्रसंग: व्यवसायगत जोखिम का ऐतिहासिक उदाहरण है, असुरक्षित काम का आदेश नहीं।
दोहा ७०
शब्दार्थ: जीविका = आजीविका; सील = यहाँ संयम का पुराना अर्थ।
सरल हिंदी अर्थ: कवि पुराने पेशागत उदाहरण से कहता है कि जीवन-निर्वाह के काम के अनुरूप कौशल चाहिए।
भावार्थ: व्यक्ति का सम्मान उसके पेशे से कम न करें।
पाठ और प्रसंग: पुराने पेशागत और स्त्री-संबंधी मानदंड मूल का हिस्सा हैं। उनसे किसी की मानवीय गरिमा कम नहीं होती।
दोहा ७१
शब्दार्थ: काजर = काजल; सेत = सफेद।
सरल हिंदी अर्थ: केवल सुविधा देने से जड़ बुरी आदत नहीं मिटती, जैसे काजल धोकर सफेद नहीं बनता।
भावार्थ: भलाई के साथ आचरण की जाँच रखें।
दोहा ७२
शब्दार्थ: कुच = वक्ष; उदोत = प्रकट।
सरल हिंदी अर्थ: शृंगारिक उदाहरण से बताया है कि गुण-दोष का मूल्य संदर्भ के अनुसार बदलता है।
भावार्थ: एक कसौटी हर प्रसंग पर न थोपें।
दोहा ७३
शब्दार्थ: स्रवन = श्रवण कुमार; बर = वरदान।
सरल हिंदी अर्थ: दशरथ को मिला श्रवण के पिता का शाप राम-पुत्र होने से जोड़कर शुभ परिणति का कथात्मक विरोध दिखाया है।
भावार्थ: कथा का संकेत है, अन्याय का समर्थन नहीं।
दोहा ७४
शब्दार्थ: सत = सत्य; उधरे = कल्याण पाया।
सरल हिंदी अर्थ: हरिश्चंद्र के सत्य के उदाहरण से एक अच्छे व्यक्ति का व्यापक शुभ प्रभाव बताया है।
भावार्थ: अपना सदाचार अनेक लोगों को लाभ देता है।
दोहा ७५
शब्दार्थ: अर्जुन = सहस्रार्जुन; छत्रिन = क्षत्रिय।
सरल हिंदी अर्थ: सहस्रार्जुन-परशुराम कथा से कहा है कि एक शासक के दोष का परिणाम बहुतों पर पड़ सकता है।
भावार्थ: इसे सामूहिक दंड का औचित्य न मानें।
दोहा ७६
शब्दार्थ: जाँचै = माँगे; दंत = हाथीदाँत।
सरल हिंदी अर्थ: बड़े आश्रय से छोटा अंश भी मूल्यवान मिल सकता है; गिरे हाथीदाँत का उदाहरण है।
भावार्थ: आश्रय की वास्तविक क्षमता देखें।
पाठ और प्रसंग: दूसरे चरण के कुछ पुराने पद कठिन हैं; सामान्य आश्रय-विषयक व्याख्या निर्णायक पाठ-संशोधन नहीं है।
दोहा ७७
शब्दार्थ: रबि = सूर्य; मार = कामदेव का संकेत।
सरल हिंदी अर्थ: एक के कारण पीड़ा हो, पर क्रोध दूसरे पर उतरे; विरहिणी के काव्य-बिंब से यह विसंगति दिखाई है।
भावार्थ: दोष सही व्यक्ति और कारण से जोड़ें।
पाठ और प्रसंग: विरह की अतिशयोक्ति और दोष के दूसरे पर पड़ने का संकेत है।
दोहा ७८
शब्दार्थ: सुक = तोता; सारी = मैना।
सरल हिंदी अर्थ: गुण से आदर मिलता है; कवि मधुर बोलने वाले पक्षियों को पालने का उदाहरण देता है।
भावार्थ: आदर का आधार आचरण और योग्यता हो।
दोहा ७९
शब्दार्थ: छीर = दूध; आडंबर = दिखावा।
सरल हिंदी अर्थ: गाय को घंटी पहनाने से दूध की कमी नहीं भरती; वास्तविक गुण सजावट से अलग हैं।
भावार्थ: दिखावे से अधिक क्षमता विकसित करें।
दोहा ८०
शब्दार्थ: दैनी = दैव; दोऊ = दोनों।
सरल हिंदी अर्थ: सब श्रेष्ठ गुण एक जगह नहीं मिलते; सोने में सुगंध न होना उदाहरण है।
भावार्थ: अपूर्णता में भी वास्तविक गुण पहचानें।
दोहा ८१
शब्दार्थ: राजसुत = राजकुमार।
सरल हिंदी अर्थ: एक ही पद चाहने वालों में संघर्ष हो सकता है, जैसे राज्य के लिए राजकुमार लड़ते हैं।
भावार्थ: साझी आकांक्षा में न्यायपूर्ण व्यवस्था रखें।
दोहा ८२
शब्दार्थ: भीर = कठिनाई; समीर = हवा।
सरल हिंदी अर्थ: जल आग बुझाता है, पर हवा जल सुखाती है; सहायक भी अलग प्रभावों से घिरता है।
भावार्थ: हित-संबंधों की जटिलता समझें।
दोहा ८३
शब्दार्थ: अधोर = मूल का कठिन पद; समीर = हवा।
सरल हिंदी अर्थ: हवा जल सुखाए, फिर भी जल उसे शीतल करता है; सज्जन प्रतिकूलता में भी भलाई करता है।
भावार्थ: करुणा में विवेकपूर्ण सीमा भी रखें।
पाठ और प्रसंग: “अधोर” की वर्तनी और विशिष्ट अर्थ अनिश्चित हैं; दूसरे चरण की स्पष्ट उपमा पर सरल अर्थ आधारित है।
दोहा ८४
शब्दार्थ: पावक = आग।
सरल हिंदी अर्थ: हवा सहायक हो तब भी आग उसे तपाती है; बुरी प्रवृत्ति उपकार के बाद भी हानि कर सकती है।
भावार्थ: व्यवहार देखकर भरोसा करें।
दोहा ८५
शब्दार्थ: ठौर = स्थान; महावर = चरण-रंग।
सरल हिंदी अर्थ: महावर पैरों और अंजन आँखों पर शोभता है; सही स्थान पर ही साधन का पूरा मूल्य है।
भावार्थ: भूमिका के अनुरूप योग्यता लगाएँ।
दोहा ८६
शब्दार्थ: जंत्री = वादक; जंत्र = वाद्य।
सरल हिंदी अर्थ: भक्त स्वयं को प्रभु के हाथ का वाद्य कहता है: जैसी इच्छा हो वैसा बजाओ।
भावार्थ: समर्पण में अहं हलका होता है।
दोहा ८७
शब्दार्थ: गजमुक्ता = हाथी का काव्य-मोती।
सरल हिंदी अर्थ: सियार से हाथी मारकर मोती लाने की अपेक्षा अनुचित है; काम क्षमता के अनुसार दें।
भावार्थ: उचित जिम्मेदारी उचित व्यक्ति को दें।
दोहा ८८
शब्दार्थ: काथ = कत्था; चूनौ = चूना।
सरल हिंदी अर्थ: अलग रंग वाले कत्थे-चूने के मिलने से लालिमा बनती है; मिलकर नया गुण उत्पन्न होता है।
भावार्थ: सहयोग में भिन्नता उपयोगी है।
दोहा ८९
शब्दार्थ: मधुपुट = मधु का संसर्ग; कोटिक = करोड़ों।
सरल हिंदी अर्थ: कवि कहता है कि मधु का संसर्ग देकर भी विष का स्वभाव नहीं बदलता।
भावार्थ: गहरी प्रवृत्ति बदलने में वास्तविक आंतरिक प्रयास चाहिए।
पाठ और प्रसंग: मूल में विष-स्वभाव की उपमा है; “ह्वाब” आरंभिक पद कठिन है।
दोहा ९०
शब्दार्थ: भाल = माथा; मुंड = कपाल।
सरल हिंदी अर्थ: शिव के भस्म, विष और कपाल-रूप के बावजूद पार्वती उनसे आत्मीयता रखती हैं; प्रेम बाहरी रूप से ऊपर है।
भावार्थ: प्रियता में भीतर का संबंध महत्त्वपूर्ण है।
दोहा ९१
शब्दार्थ: कनक = धतूरा; पीत = पीला।
सरल हिंदी अर्थ: भ्रमित बुद्धि वस्तु को उलटा समझती है; नशे से रंग बदलकर दिखने का उदाहरण है।
भावार्थ: निर्णय से पहले मन की स्पष्टता देखें।
दोहा ९२
शब्दार्थ: लहर = नशे का प्रभाव।
सरल हिंदी अर्थ: प्रेम शुरू करना आसान, निभाना कठिन है; भांग खाने और प्रभाव सहने का विरोध दिया है।
भावार्थ: संबंध में जिम्मेदारी समझें।
दोहा ९३
शब्दार्थ: भेष = बाहरी रूप।
सरल हिंदी अर्थ: देखे-सुने बिना निष्कर्ष कैसे निकले? बाहरी रूप से समुद्र की पूरी गहराई नहीं समझी जाती।
भावार्थ: अपर्याप्त जानकारी पर अंतिम निर्णय न दें।
दोहा ९४
शब्दार्थ: भाय = भाव; आरसी = दर्पण।
सरल हिंदी अर्थ: भक्त अपने भाव के अनुसार देव-अनुभव पाता है, जैसे दर्पण सामने वाला चेहरा दिखाता है।
भावार्थ: उपासना में भावना का महत्त्व है।
दोहा ९५
शब्दार्थ: बनिक = व्यापारी; गढ़ = किला।
सरल हिंदी अर्थ: कवि परिचित प्रशिक्षण के अनुसार कार्य-दृष्टि बनने की बात व्यापारी और दुर्ग-युद्ध के उदाहरण से कहता है।
भावार्थ: योग्यता जन्म से तय न मानें; प्रशिक्षण से बढ़ती है।
पाठ और प्रसंग: प्रशिक्षण और परिचित कार्य का पुराना उदाहरण है। जन्म से क्षमता निश्चित करने का मत नहीं अपनाया गया है।
दोहा ९६
शब्दार्थ: दिस = दिशा।
सरल हिंदी अर्थ: लक्ष्य की ओर चले बिना वह नहीं मिलता; पश्चिम जाकर पूरब का काम पूरा नहीं होगा।
भावार्थ: प्रयत्न लक्ष्य के अनुरूप हों।
दोहा ९७
शब्दार्थ: भौंर = भँवरा।
सरल हिंदी अर्थ: लकड़ी भेदने वाला भँवरा प्रेमवश कमल से बाहर नहीं निकलता—प्रचलित काव्य-मान्यता है।
भावार्थ: आत्मीय लगाव बहुत प्रभावी होता है।
दोहा ९८
शब्दार्थ: गौरीकंत = शिव; गाल बजाना = भक्तिभाव की ध्वनि।
सरल हिंदी अर्थ: उदार प्रभु सरल भाव पर भी प्रसन्न होते हैं; शिव का सहज प्रसन्न होना उदाहरण है।
भावार्थ: भक्ति में निष्कपटता को स्थान दें।
दोहा ९९
शब्दार्थ: गरज = जरूरत; निहोर = विनती।
सरल हिंदी अर्थ: लोग आवश्यकता से बोलते और निवेदन करते हैं; पर्वत का मोर भी अपना प्रयोजन रखता है।
भावार्थ: व्यवहार में जरूरत का संदर्भ समझें।
दोहा १००
शब्दार्थ: जलधर = बादल।
सरल हिंदी अर्थ: वास्तविक दाता सम-विषम स्थान का भेद नहीं करता, जैसे बादल सब पर वर्षा करता है।
भावार्थ: दान में निष्पक्ष करुणा रखें।
दोहा १०१
शब्दार्थ: बिमुख = मुँह फेरना।
सरल हिंदी अर्थ: उपकार करने वाले से मुँह न मोड़ें; मोर का जल पीकर ताल की ओर रहना काव्य-उदाहरण है।
भावार्थ: कृतज्ञता बनाए रखें।
दोहा १०२
शब्दार्थ: चार = विचार, गति।
सरल हिंदी अर्थ: चिकित्सा और ग्रह-विचार अलग विशेषज्ञता हैं; विषय समझने वाले से उसी की बात पूछें।
भावार्थ: विशेषज्ञता की सीमा पहचानें।
मूल पाठ और हिंदी अर्थ · १०३–१५४
पढ़ने की सुविधा के लिए क्रमांक-समूह · मुद्रित पृष्ठ २९५–२९८
दोहा १०३
शब्दार्थ: दुरै = छिपे; चख = आँख।
सरल हिंदी अर्थ: नया प्रेम और आनंद चेहरे-आँखों में झलकते हैं, जैसे सुगंध छिपाए नहीं छिपती।
भावार्थ: भीतर का भाव बाहर आता है।
दोहा १०४
शब्दार्थ: प्रकृत = स्वभाव; काँजी = खट्टा पेय।
सरल हिंदी अर्थ: अनुकूल स्वभाव में मन मिलता है, जैसे जामन दूध जमाता और अनुपयुक्त खटास फाड़ देती है।
भावार्थ: संगति में अनुकूलता देखें।
दोहा १०५
शब्दार्थ: रीति = ढंग; रिस = क्रोध।
सरल हिंदी अर्थ: कहने का तरीका महत्त्वपूर्ण है: एक शब्द क्रोध बढ़ाता, दूसरा शांत करता है।
भावार्थ: वाणी में तरीका भी सोचें।
दोहा १०६
शब्दार्थ: भटा = बैंगन; बाय = वात।
सरल हिंदी अर्थ: एक ही वस्तु अलग स्वभाव वालों को भिन्न लगती है; बैंगन के प्रभाव का पुराना लोक-उदाहरण है।
भावार्थ: इसे सार्वभौमिक स्वास्थ्य-नियम न मानें।
दोहा १०७
शब्दार्थ: सरीक = सहभागी; कटुक = कड़वा।
सरल हिंदी अर्थ: जिसके सुख में साथ हों उसके दुख में भी रहें; मिठास के साथ कड़वाहट भी बाँटें।
भावार्थ: मित्रता में दोनों समय साथ दें।
दोहा १०८
शब्दार्थ: सरस = फलवान; निरस = रसहीन।
सरल हिंदी अर्थ: लाभ रहने तक संबंध जोड़ने वाले पक्षियों जैसे हैं, जो सूखे पेड़ से उड़ जाते हैं।
भावार्थ: सच्ची निष्ठा और स्वार्थ पहचानें।
दोहा १०९
शब्दार्थ: लायक = अनुरूप।
सरल हिंदी अर्थ: व्यवहार व्यक्ति की प्रवृत्ति के अनुसार प्रतिक्रिया पाता है; सज्जन और दुर्जन अलग उत्तर देते हैं।
भावार्थ: प्रतिक्रिया देखकर समझ बढ़ाएँ।
दोहा ११०
शब्दार्थ: निसि = रात; उदोत = उदय।
सरल हिंदी अर्थ: दिन-रात की तरह सुख-दुख आते-जाते हैं।
भावार्थ: परिवर्तन में धैर्य रखें।
दोहा १११
शब्दार्थ: अनंग = कामदेव, देहरहित; महारूप = अत्यंत सौंदर्य।
सरल हिंदी अर्थ: बड़े का प्रिय कथन सही मान लिया जाता है; देहरहित कामदेव भी सौंदर्य का भंडार कहलाते हैं।
भावार्थ: मान्यता और वास्तविक आधार का अंतर देखें।
पाठ और प्रसंग: “अनंग” कामदेव का नाम है; देह न होते हुए सौंदर्य का भंडार कहना विरोधाभास है।
दोहा ११२
शब्दार्थ: उचारियै = बोलिए; सतरात = क्रोधित होता।
सरल हिंदी अर्थ: सत्य कहने में भी अपमानजनक संबोधन से बचें; शरीर की कमी गिनाना चोट पहुँचाता है।
भावार्थ: सत्य संवेदनशीलता से कहें।
दोहा ११३
शब्दार्थ: ससि = चंद्रमा; जोति = तेज।
सरल हिंदी अर्थ: पराश्रय में अपनी पहचान फीकी पड़ सकती है; सूर्य के पास चंद्रमा की आभा का बिंब है।
भावार्थ: स्वतंत्रता और गरिमा सँभालें।
दोहा ११४
शब्दार्थ: प्रकृत = स्वभाव; दयाल = करुणामय।
सरल हिंदी अर्थ: सज्जन की कोमलता सहज होती है, जैसे हंस को उसकी चाल अलग से नहीं सिखाई जाती।
भावार्थ: करुणा स्वाभाविक बनाएँ।
दोहा ११५
शब्दार्थ: अंगीकृत = अपनाया; कुटिल = टेढ़ा।
सरल हिंदी अर्थ: सज्जन अपनाए का साथ निभाता है; शिव टेढ़े और कलंकी चंद्र को नहीं छोड़ते।
भावार्थ: संबंध में धैर्य रखें।
दोहा ११६
शब्दार्थ: कुलजा, कुलटा = पुराने सामाजिक संबोधन।
सरल हिंदी अर्थ: धनवान अविवेकी देखकर विद्वान विद्या न छोड़े; दूसरे चरण में पुराना स्त्री-आदर्श उदाहरण है।
भावार्थ: दूसरे के लाभ से अपना सद्गुण न छोड़ें।
पाठ और प्रसंग: ऐतिहासिक स्त्री-वर्गीकरण काव्य का संदर्भ है, वर्तमान नैतिक वर्गीकरण नहीं।
दोहा ११७
शब्दार्थ: मान = अभिमान; निधन = विनाश।
सरल हिंदी अर्थ: सदा एक जैसी दशा नहीं रहती; दुर्योधन के अभिमान से हानि का उदाहरण है।
भावार्थ: अहंकार से बचें।
दोहा ११८
शब्दार्थ: कलुषता = मैल; कनक = सोना।
सरल हिंदी अर्थ: सत्संग से मन निर्मल होता है; पारस से लोहा सोना बनने की काव्य-मान्यता है।
भावार्थ: अच्छा संग सुधारता है।
दोहा ११९
शब्दार्थ: ब्रह्म = सृष्टिकर्ता; बैन = वचन।
सरल हिंदी अर्थ: कान सुनता और जीभ बोलती है; अलग साधनों की अलग स्वाभाविक भूमिका है।
भावार्थ: साधन के अनुरूप काम लें।
पाठ और प्रसंग: कान और जीभ के काम अलग होने की उपमा है; आरंभ “ब्रह्म बनाए” है।
दोहा १२०
शब्दार्थ: ब्यसन = लत; बिकल = व्याकुल।
सरल हिंदी अर्थ: लत लगने पर व्यक्ति हानि देखकर भी उसे नहीं छोड़ पाता; मदिरापान उदाहरण है।
भावार्थ: हानिकारक आदत पर समय रहते काम करें।
दोहा १२१
शब्दार्थ: अचेतन = जड़।
सरल हिंदी अर्थ: जड़ लोहा चुंबक की ओर खिंचता है; चेतन का प्रिय के प्रति आकर्षण कितना गहरा होगा।
भावार्थ: लगाव मन को दिशा देता है।
दोहा १२२
शब्दार्थ: अरहट = रहँट; घटिका = डोली।
सरल हिंदी अर्थ: रहँट की डोलियों की तरह संपत्ति घटती-बढ़ती है; खाली भरती, भरी खाली होती है।
भावार्थ: स्थिति को स्थायी न मानें।
दोहा १२३
शब्दार्थ: भाजन = पात्र; सरित = नदी।
सरल हिंदी अर्थ: नदी में बहुत जल हो, पर व्यक्ति अपने पात्र जितना ही ला पाता है; प्राप्ति ग्रहण-क्षमता से जुड़ी है।
भावार्थ: ग्रहण की क्षमता बढ़ाएँ।
पाठ और प्रसंग: दूसरे चरण में “सरित” अर्थात् नदी है।
दोहा १२४
शब्दार्थ: होड़ = बराबरी की स्पर्धा।
सरल हिंदी अर्थ: केवल नकल से गुण नहीं आते; कौए और हंस की चाल अलग है।
भावार्थ: अभ्यास से गुण विकसित करें।
दोहा १२५
शब्दार्थ: अतर = इत्र; बास = सुगंध।
सरल हिंदी अर्थ: राजा के लगाए इत्र की सुगंध सभा तक पहुँचती है; गुणवान का संग दूसरों को लाभ देता है।
भावार्थ: शुभ प्रभाव वाला संग चुनें।
दोहा १२६
शब्दार्थ: जनार्दन, शंकर = देवनाम।
सरल हिंदी अर्थ: नाम और काम के विरोधी अर्थों से कवि जगत की विचित्रता पर चुटकी लेता है।
भावार्थ: शब्द के कई अर्थ समझें।
पाठ और प्रसंग: दीपिका जनार्दन और शंकर के अर्थों में विरोधी संकेत समझाती है। देवनामों का श्लेष है।
दोहा १२७
शब्दार्थ: पिय आगम = प्रिय का आना।
सरल हिंदी अर्थ: हितकारी समाचार अच्छा लगता है; प्रिय-आगमन का कौए का संकेत विरहिणी को सुख देता है।
भावार्थ: शुभ समाचार आशा जगाता है।
दोहा १२८
शब्दार्थ: बायस = कौआ; पिक = कोयल।
सरल हिंदी अर्थ: प्रिय के आने की सूचना दे तो कौआ प्रिय है; केवल मधुर कोयल वहाँ क्या करे।
भावार्थ: मिठास से अधिक वास्तविक हित देखें।
दोहा १२९
शब्दार्थ: बलि = भेंट।
सरल हिंदी अर्थ: सामान्यतः भगाया कौआ भी शुभ संकेत देने पर विरहिणी को प्रिय है।
भावार्थ: संदर्भ से मूल्यांकन बदलता है।
दोहा १३०
शब्दार्थ: पीर = पीड़ा।
सरल हिंदी अर्थ: अपना ही क्यों न हो, पीड़ा देने वाले से मुक्त होना चाहेंगे; शरीर का रोग उदाहरण है।
भावार्थ: अपनापन हानि को अनदेखा नहीं करता।
दोहा १३१
शब्दार्थ: बिरानौ = पराया।
सरल हिंदी अर्थ: पराया भी हितकारी है यदि कष्ट मिटाए, जैसे वन की औषधि रोग घटाती है।
भावार्थ: हित को अपनापन का आधार बनाएँ।
दोहा १३२
शब्दार्थ: भान = सूर्य।
सरल हिंदी अर्थ: शिखर पर पहुँची अवस्था भी बदलती है; दोपहर का सूर्य अंततः अस्त होता है।
भावार्थ: उन्नति में विनम्र रहें।
दोहा १३३
शब्दार्थ: रुक्म = कथा का नाम-संकेत।
सरल हिंदी अर्थ: मुद्रित दीपिका में राजकुमारियों को बंदी रखने वाले राजा के कृष्ण द्वारा पराजित होने का संदर्भ है; अनुचित शक्ति-प्रदर्शन से अपमान होता है।
भावार्थ: सामर्थ्य में मर्यादा रखें।
पाठ और प्रसंग: दीपिका राजकुमारियों को बंदी रखने वाले राजा की कथा बताती है। इसे स्वतंत्र ऐतिहासिक विवरण न समझें।
दोहा १३४
शब्दार्थ: कलुष = मैला; पावस = वर्षा।
सरल हिंदी अर्थ: दुष्प्रवृत्ति देखकर गुणी दूर होता है, जैसे मानसूनी मैले जल से हंस उड़ जाता है।
भावार्थ: हानिकारक वातावरण से दूरी रखें।
दोहा १३५
शब्दार्थ: लहै = पाए; नीर = जल।
सरल हिंदी अर्थ: सच्ची आवश्यकता पूरी हो तो सुख है, जैसे प्यासे को शीतल साफ जल मिलना।
भावार्थ: जरूरत समझकर सहायता दें।
दोहा १३६
शब्दार्थ: चकोर, चकवा = काव्यपक्षी।
सरल हिंदी अर्थ: प्रिय-मिलन में बाधा हो तो सुख का समय भी उदास करता है; पक्षियों की पारंपरिक उपमाएँ हैं।
भावार्थ: भीतरी स्थिति अनुभव बदलती है।
पाठ और प्रसंग: चकोर और चकवे के व्यवहार काव्य-परंपरा के बिंब हैं।
दोहा १३७
शब्दार्थ: कलाली = मदिरा-विक्रेता।
सरल हिंदी अर्थ: संग से गलत धारणा बन सकती है; मदिरा-विक्रेता के हाथ दूध भी मदिरा मान लिया जाता है।
भावार्थ: धारणा और प्रमाण अलग परखें।
दोहा १३८
शब्दार्थ: अहीरी = दुग्ध-व्यवसायी स्त्री।
सरल हिंदी अर्थ: अच्छी पहचान से दोष भी छिप सकता है; दुग्ध-विक्रेता के हाथ पेय को दूध समझना उदाहरण है।
भावार्थ: भली छवि को अंतिम प्रमाण न मानें।
दोहा १३९
शब्दार्थ: लांछन = कलंक।
सरल हिंदी अर्थ: चौथ के चंद्र-दर्शन की लोकमान्यता से अपयश लाने वाले प्रसंग से दूरी कही है।
भावार्थ: यह लोकविश्वास का रूपक है।
दोहा १४०
शब्दार्थ: बिभौ = प्रकाश; उलूक = उल्लू।
सरल हिंदी अर्थ: कोई गुण न समझे तो गुणी दोषी नहीं; उल्लू न देखे तो दिन का प्रकाश नहीं घटता।
भावार्थ: उपेक्षा से अपना मूल्य न घटाएँ।
दोहा १४१
शब्दार्थ: गूढ़ = गुप्त; खल = अविश्वसनीय।
सरल हिंदी अर्थ: अविश्वसनीय को भेद न दें; वह पानी पर तेल की तरह फैल सकता है।
भावार्थ: विश्वास सावधानी से दें।
दोहा १४२
शब्दार्थ: नीरद = बादल।
सरल हिंदी अर्थ: एक उपयोगी गुण अन्य कमियों पर भारी पड़ सकता है; वर्षा से बादल की कालिमा गौण होती है।
भावार्थ: मुख्य योगदान पहचानें।
दोहा १४३
शब्दार्थ: रवि = सूर्य।
सरल हिंदी अर्थ: जहाँ श्रेष्ठ विवेक न हो, वहाँ साधारण समझ भी बड़ी लगती है; सूर्य आने पर दीप गौण है।
भावार्थ: तुलना संदर्भ पर निर्भर है।
दोहा १४४
शब्दार्थ: धैन = गाय; बैन = वचन।
सरल हिंदी अर्थ: लाभ के कारण लोग कटुता भी सहते हैं, जैसे दूध देने वाली गाय की लात सहकर उसे पुचकारें।
भावार्थ: स्वार्थ व्यवहार को बदलता है।
दोहा १४५
शब्दार्थ: कुठार = कुल्हाड़ी।
सरल हिंदी अर्थ: काटने वाली कुल्हाड़ी को भी चंदन सुगंध देता है; सज्जन विपरीतता में गुण रखता है।
भावार्थ: भलाई में आत्मरक्षा भी रखें।
दोहा १४६
शब्दार्थ: पोखै = पोषे; चुपै = दबने पर।
सरल हिंदी अर्थ: पाला साँप भी दबने पर काटता है; सहायता मात्र से हानिकारक प्रवृत्ति बदलना निश्चित नहीं।
भावार्थ: सीमा और सावधानी रखें।
दोहा १४७
शब्दार्थ: गँधीलौ = गंधयुक्त; कूप = कुआँ।
सरल हिंदी अर्थ: अप्रयुक्त धन रुके जल जैसा है; आवश्यक उपभोग, सेवा और शुभ कर्म में उसका सार्थक उपयोग हो।
भावार्थ: संग्रह का उद्देश्य भी सोचें।
दोहा १४८
शब्दार्थ: बिरवा = पौधा; आक = वनस्पति।
सरल हिंदी अर्थ: आक लगाकर आम नहीं मिलता; गलत कर्म से अच्छे फल की अपेक्षा असंगत है।
भावार्थ: साधन और फल जुड़े हैं।
दोहा १४९
शब्दार्थ: खांड़ = खड्डा, गड्ढा; निरधार = निश्चय।
सरल हिंदी अर्थ: दूसरे के लिए गड्ढा खोदने वाले के लिए स्वयं कुआँ तैयार हो सकता है; बुराई लौटकर बड़ी हानि बनती है।
भावार्थ: दूसरे के अहित का संकल्प छोड़ें।
पाठ और प्रसंग: मुद्रित दीपिका के अनुसार “खांड़” गड्ढा है; यह चीनी नहीं। दूसरे चरण का अंतिम पद “कूप तयार” है।
दोहा १५०
शब्दार्थ: सहस गुन = हजार गुना; बीज = आरंभिक दान का रूपक।
सरल हिंदी अर्थ: देने का फल बहुत गुना लौटने की बात बीज और वृक्ष के बिंब से कही है। दूसरे चरण का अंतिम पद कठिन है।
भावार्थ: उदारता को अंकगणित की गारंटी न मानें।
पाठ और प्रसंग: बीज, फल और देने के प्रतिफल का संबंध स्पष्ट है, पर दूसरे चरण के अंतिम पद का पूरा व्याकरण अनिश्चित है।
दोहा १५१
शब्दार्थ: भेष = वेश; बरन = वर्ण।
सरल हिंदी अर्थ: एक व्यापक पहचान के नीचे छोटे भेद छिप जाते हैं, जैसे हाथी के पदचिह्न में छोटे पदचिह्न।
भावार्थ: व्यक्ति को जन्म से सीमित न करें।
दोहा १५२
शब्दार्थ: स्वारथ = निजी लाभ।
सरल हिंदी अर्थ: जिससे काम बने वही प्रिय लगता है; चोर को उजाले से अधिक अँधेरा पसंद है।
भावार्थ: पसंद के पीछे उद्देश्य देखें।
दोहा १५३
शब्दार्थ: भवतव्यता = होने वाली घटना।
सरल हिंदी अर्थ: रावण की विनाशकारी बुद्धि और सीताहरण से कवि गलत निर्णय का परिणाम दिखाता है।
भावार्थ: अहंकारी चाह विवेक हर सकती है।
दोहा १५४
शब्दार्थ: प्रतिकार = उपाय; भावी = नियति।
सरल हिंदी अर्थ: सभी विपत्तियाँ टलतीं तो नल और हरिश्चंद्र जैसे पात्र दुख न झेलते।
भावार्थ: नियति-बिंब में धैर्य की प्रेरणा है।
मूल पाठ और हिंदी अर्थ · १५५–२०६
पढ़ने की सुविधा के लिए क्रमांक-समूह · मुद्रित पृष्ठ २९९–३०२
दोहा १५५
शब्दार्थ: होनहार = भावी; कुरुबंस = कुरुवंश।
सरल हिंदी अर्थ: भीष्म-युधिष्ठिर जैसे होते हुए भी कुरुवंश का विनाश हुआ; हर परिस्थिति एक व्यक्ति नहीं रोक सकता।
भावार्थ: प्रयास की सीमा भी पहचानें।
पाठ और प्रसंग: मुख्य स्कैन में पृष्ठ २९९ का दायाँ भाग कटा था। इस और अगले १२ पदों का पूरा पाठ उसी पुस्तक की दूसरी स्कैन-प्रति के पृष्ठ २९९ से मिलाया गया है।
दोहा १५६
शब्दार्थ: बनराय = वृक्षसमूह।
सरल हिंदी अर्थ: सीधे पेड़ पहले काटे जाते हैं; भोलेपन का अनुचित लाभ लिया जा सकता है।
भावार्थ: सरलता के साथ विवेक रखें।
दोहा १५७
शब्दार्थ: पिपीलिका = चींटी; नग = पर्वत।
सरल हिंदी अर्थ: कई छोटे मिलकर शक्तिशाली पर भारी पड़ते हैं; चींटियों और बड़े साँप का उदाहरण है।
भावार्थ: किसी को तुच्छ न समझें।
दोहा १५८
शब्दार्थ: रसरी = रस्सी; करी = हाथी।
सरल हिंदी अर्थ: छोटे तिनकों की रस्सी हाथी बाँध देती है; संगठन सामर्थ्य बढ़ाता है।
भावार्थ: एकता में शक्ति है।
दोहा १५९
शब्दार्थ: जलेस = समुद्र; दसमुख = रावण।
सरल हिंदी अर्थ: रावण के अपराध पर समुद्र में सेतु पड़ा; दूसरों के कर्म का कष्ट आसपास भी आता है।
भावार्थ: संग के परिणाम समझें।
दोहा १६०
शब्दार्थ: भुजंग = साँप।
सरल हिंदी अर्थ: सुदृढ़ सज्जन चंदन की तरह अपना गुण रखता है, जिस पर साँप का विष नहीं चढ़ता।
भावार्थ: अंतःकरण दृढ़ बनाएँ।
दोहा १६१
शब्दार्थ: कंचन = सोना; मलान = मलिन।
सरल हिंदी अर्थ: सोना तपकर चमकता है; सज्जन कठिनाई में भी चरित्र सँभालता है।
भावार्थ: परीक्षा में मूल्य न छोड़ें।
दोहा १६२
शब्दार्थ: हरि = सिंह; असम = असमान।
सरल हिंदी अर्थ: सिंह बादल की गर्जना पर गरजता, सियार की आवाज पर नहीं; हर उकसावे पर प्रतिक्रिया जरूरी नहीं।
भावार्थ: अपनी ऊर्जा विवेक से लगाएँ।
दोहा १६३
शब्दार्थ: डहक्यौ = धोखा खाया; उड़ = तारे।
सरल हिंदी अर्थ: तारों के प्रतिबिंब से धोखा खाया हंस असली मोती पर भी संदेह करता है।
भावार्थ: छल भविष्य का विश्वास बिगाड़ता है।
दोहा १६४
शब्दार्थ: भांड = हास्य-कलाकार; मिस = अभिनय।
सरल हिंदी अर्थ: सदा अभिनय करने वाला सच्चे दुख में पुकारे तो लोग अभिनय समझ सकते हैं।
भावार्थ: विश्वसनीयता लगातार सत्य से बनती है।
दोहा १६५
शब्दार्थ: काबरि = भील; पथवान = पार्थ अर्जुन।
सरल हिंदी अर्थ: अर्जुन की बाद की विवशता की कथा से समय के बदलते प्रभाव को दिखाया है।
भावार्थ: शक्ति पर स्थायी अहं न करें।
पाठ और प्रसंग: दीपिका में “काबरि” भील और “पथवान” पार्थ के अर्थ में हैं; यह उत्तरकालीन अर्जुन-कथा का संकेत है।
दोहा १६६
शब्दार्थ: मन = मण, भार; तोय = जल।
सरल हिंदी अर्थ: कण जोड़ने से संग्रह, खर्च से क्षय होता है; बूँदों से घड़ा भरता-खाली होता है।
भावार्थ: छोटे प्रयास और खर्च गिनें।
पाठ और प्रसंग: “मन” यहाँ मण है, मनोभाव नहीं।
दोहा १६७
शब्दार्थ: कर = हाथ, सूँड; करी = हाथी।
सरल हिंदी अर्थ: हाथी एक सूँड से ही शक्तिशाली है; थोड़े उपयोगी गुण भी बड़ी पहचान देते हैं।
भावार्थ: गुण की गहराई बढ़ाएँ।
दोहा १६८
शब्दार्थ: देवल = मंदिर; बायस = कौआ।
सरल हिंदी अर्थ: मंदिर के शिखर पर बैठकर कौआ गरुड़ नहीं होता; ऊँचा पद गुण का विकल्प नहीं।
भावार्थ: पद से अधिक गुण विकसित करें।
दोहा १६९
शब्दार्थ: बेध = छेदना; गुन = धागा, गुण।
सरल हिंदी अर्थ: फूल छेद और बंधन सहकर माला में पिरोया जाता है; गुण साधने में श्रम लगता है।
भावार्थ: अभ्यास की कठिनाई स्वीकारें।
दोहा १७०
शब्दार्थ: भेक = मेढक; अमल = निर्मल।
सरल हिंदी अर्थ: पास रहने पर भी मेढक कमल की सुगंध का रस नहीं जानता; ग्रहणशीलता अलग गुण है।
भावार्थ: संग के साथ समझ भी चाहिए।
दोहा १७१
शब्दार्थ: अंजनगिर = काजल का पर्वत; चंद कर = चंद्रकिरण।
सरल हिंदी अर्थ: काजल पर चंद्रकिरण की आभा दब जाती है; अनुपयुक्त संग में गुण का प्रकाश नहीं खुलता।
भावार्थ: गुण के लिए सही वातावरण चुनें।
दोहा १७२
शब्दार्थ: छीर-नीर = दूध-पानी।
सरल हिंदी अर्थ: विवेकी सत्य-असत्य अलग करता है; हंस के नीर-क्षीर विवेक की काव्य-मान्यता है।
भावार्थ: जानकारी परखकर निर्णय लें।
दोहा १७३
शब्दार्थ: सूर = सूर्य।
सरल हिंदी अर्थ: पास का हंस कमल को चोट पहुँचा सकता है, दूर का सूर्य खिला सकता है।
भावार्थ: निकटता से अधिक वास्तविक हित देखें।
दोहा १७४
शब्दार्थ: रुधिर = रक्त; पय = दूध; जोक = जोंक।
सरल हिंदी अर्थ: स्तन पर जोंक दूध नहीं, रक्त लेती है; दोषग्राही अच्छे में भी बुरा खोजता है।
भावार्थ: गुण ग्रहण करने का अभ्यास करें।
दोहा १७५
शब्दार्थ: लवन = नमक।
सरल हिंदी अर्थ: कह देने से विष हितकारी या नमक मीठा नहीं बनता; नाम गुण नहीं बदलता।
भावार्थ: दावे से अलग वास्तविकता जाँचें।
दोहा १७६
शब्दार्थ: असाध = कठिन; हेमंत = ऋतु।
सरल हिंदी अर्थ: ठंड में सामान्य लकड़ी भी आग देकर उपयोगी होती है; कठिन समय में सहायता का मूल्य बढ़ता है।
भावार्थ: समय पर उपयोगी बनें।
दोहा १७७
शब्दार्थ: उदर = पेट; बाँके = टेढ़े।
सरल हिंदी अर्थ: एक ही पेड़ के काँटे अलग आकार के होते हैं; समान मूल से समान स्वभाव निश्चित नहीं।
भावार्थ: हर व्यक्ति को अलग परखें।
पाठ और प्रसंग: कुल या समान मूल से स्वभाव की गारंटी नहीं दी गई है।
दोहा १७८
शब्दार्थ: छाग = बकरा; निबल = कमजोर।
सरल हिंदी अर्थ: सिंह-बाघ छोड़ बकरे की बलि का उदाहरण निर्बल पर पड़ते भार की विडंबना है।
भावार्थ: कमजोर की गरिमा और सुरक्षा देखें।
पाठ और प्रसंग: मूल में बलि का उदाहरण है; अर्थ निर्बल पर पड़ते अन्याय के प्रश्न तक सीमित है।
दोहा १७९
शब्दार्थ: निसप्रेही = निष्काम; सुरताह = कल्पवृक्ष।
सरल हिंदी अर्थ: निष्काम व्यक्ति को कल्पवृक्ष भी तिनके जैसा है; जरूरत बिना आकर्षण घट जाता है।
भावार्थ: संतोष बाहरी मोह कम करता है।
दोहा १८०
शब्दार्थ: पिकसुत = कोयल का बच्चा।
सरल हिंदी अर्थ: कौए के पालने पर भी कोयल की पहचान नहीं बदलती; भिन्न प्रकृति का बिंब है।
भावार्थ: इसे पालक संबंधों की अवमानना न मानें।
दोहा १८१
शब्दार्थ: ताजन = घोड़े की चाबुक; टारहि = टट्टू।
सरल हिंदी अर्थ: एक को दी सीख दूसरा समझदार भी ग्रहण कर लेता है; घोड़ों का बिंब है।
भावार्थ: दूसरे के अनुभव से सीखें।
दोहा १८२
शब्दार्थ: उनयौ = घिरा; पयोद = बादल।
सरल हिंदी अर्थ: बादल देखकर पानी का घड़ा नहीं फोड़ते; दूसरे की आशा पर अपना श्रम न छोड़ें।
भावार्थ: आशा के साथ तैयारी रखें।
दोहा १८३
शब्दार्थ: केतक = कितना भी।
सरल हिंदी अर्थ: बहुत पानी देने पर भी पेड़ उचित समय पर फलता है; कार्य की परिपक्वता में समय लगता है।
भावार्थ: धैर्यपूर्वक नियमित प्रयास करें।
दोहा १८४
शब्दार्थ: जतन = तैयारी; बुभाय = बुझाए।
सरल हिंदी अर्थ: आग लगने के बाद कुआँ खोदना देर है; पहले की तैयारी समय पर फल देती है।
भावार्थ: संकट से पहले व्यवस्था रखें।
दोहा १८५
शब्दार्थ: करि = हाथी; अभिलाख = इच्छा।
सरल हिंदी अर्थ: वस्तु की जरूरत समय से बदलती है; कभी सस्ता भी न लें, कभी हाथी पर लाख खर्चें।
भावार्थ: निर्णय में समय और जरूरत देखें।
पाठ और प्रसंग: दूसरे चरण में “करि” हाथी है। मूल्य और आवश्यकता का समय-सापेक्ष अंतर है।
दोहा १८६
शब्दार्थ: तोय = जल।
सरल हिंदी अर्थ: गलत स्थान पर कुआँ खोदने जैसा प्रयास व्यर्थ है यदि लक्ष्य से उसका संबंध नहीं।
भावार्थ: मेहनत की दिशा जाँचें।
दोहा १८७
शब्दार्थ: साँची = संचित; कन = अन्नकण।
सरल हिंदी अर्थ: चींटियों का जुटाया अन्न तीतर खा जाए; संग्रह का उपयोग कोई और भी कर सकता है।
भावार्थ: संग्रह का उद्देश्य सार्थक रखें।
दोहा १८८
शब्दार्थ: गरज सराय = आवश्यकता पूरी हो; पयोधि = समुद्र।
सरल हिंदी अर्थ: प्यास न मिटाने वाले समुद्र से उपयोगी छोटा जलाशय अच्छा है।
भावार्थ: महत्ता सेवा से है।
दोहा १८९
शब्दार्थ: श्रम = प्रयास।
सरल हिंदी अर्थ: जमा घी निकालने में भी प्रयत्न चाहिए; बिना काम किए उपलब्धि की अपेक्षा उचित नहीं।
भावार्थ: उचित उपाय से मेहनत करें।
दोहा १९०
शब्दार्थ: लौन = नमक; कौंरी = बेस्वाद।
सरल हिंदी अर्थ: जितने नमक से स्वाद सुधरे उतना डालें; अधिक से भोजन बिगड़ता है।
भावार्थ: बात भी संतुलित मात्रा में कहें।
दोहा १९१
शब्दार्थ: लौन = नमक; सरस = यहाँ अधिक रस का संकेत।
सरल हिंदी अर्थ: नींबू का रस स्वाद सँवारता है; मधुर सार्थक बात संबंध का बिगाड़ कम कर सकती है।
भावार्थ: संवाद में सुधार की दिशा रखें।
दोहा १९२
शब्दार्थ: असंकित = निर्भय; हर = शिव।
सरल हिंदी अर्थ: नग्न तपस्वी शिव का गौरी को अर्धांग में धारण करना विलक्षण सामर्थ्य का काव्य-बिंब है।
भावार्थ: विशिष्ट प्रसंग की अंधी नकल न करें।
पाठ और प्रसंग: शिव के अर्धनारीश्वर-संबंधी काव्य-बिंब को साधारण व्यवहार की सीधी कसौटी न बनाएँ।
दोहा १९३
शब्दार्थ: ईस = शिव; बकसीस = अनुग्रह।
सरल हिंदी अर्थ: विष्णु तुलसी से और शिव आक-धतूरे से प्रसन्न कहे जाते हैं; सरल भेंट में भाव प्रधान है।
भावार्थ: श्रद्धा वैभव की मोहताज नहीं।
दोहा १९४
शब्दार्थ: पंचन = कथा का समूह-संकेत।
सरल हिंदी अर्थ: महान के उचित उपदेश ग्रहण करें; उनके हर विलक्षण आचरण की नकल सबके लिए उपयुक्त नहीं।
भावार्थ: अनुकरण में विवेक रखें।
पाठ और प्रसंग: “पंचन” का कथात्मक संकेत संक्षिप्त है; अर्थ विवेकपूर्ण अनुकरण तक सीमित है।
दोहा १९५
शब्दार्थ: तिय = स्त्री; अरधंग = अर्धांग।
सरल हिंदी अर्थ: शिव-पार्वती और हरि की व्यापक उपस्थिति से कवि पुराने स्त्री-संबंधी अविश्वास का बिंब रचता है।
भावार्थ: लिंग से चरित्र तय न करें।
पाठ और प्रसंग: स्त्रियों पर सामान्यीकृत अविश्वास पुराने सामाजिक विचार का अंश है। उसे तथ्य या सार्वभौमिक नियम नहीं माना गया है।
दोहा १९६
शब्दार्थ: बेग = जल्दी; काँजी = खट्टा पेय।
सरल हिंदी अर्थ: कुछ वस्तुएँ जल्दी बिगड़ती और पहले जैसी नहीं बनतीं, जैसे फटा दूध।
भावार्थ: समय रहते सावधानी रखें।
दोहा १९७
शब्दार्थ: तलब = चाह; तिलक = राज्याभिषेक।
सरल हिंदी अर्थ: जिस चीज की चाह बनी हो, उसके लिए बड़ा भी हाथ फैलाता है; राजा की भेंट लेना उदाहरण है।
भावार्थ: इच्छा व्यवहार को प्रभावित करती है।
दोहा १९८
शब्दार्थ: हिय = छाती; सयन = सोना।
सरल हिंदी अर्थ: मूल्यवान हार भी सोते समय उतारते हैं; गुण का उपयोग उचित अवसर से जुड़ा है।
भावार्थ: उपयोग में समय समझें।
दोहा १९९
शब्दार्थ: सोर = भागीदारी का संकेत; पोर = जोड़।
सरल हिंदी अर्थ: दूसरी उँगली पास हो तब भी पहली का दर्द स्वयं नहीं सहती; पीड़ा का निजीपन बताया है।
भावार्थ: सहानुभूति के लिए सचेत प्रयास करें।
दोहा २००
शब्दार्थ: स्रौत = सुनना; बिपुल = अधिक।
सरल हिंदी अर्थ: अभ्यास से विद्या मिलती है, पर सहज स्वभाव अलग है; अधिक सुनने से आँखों का आकार नहीं बढ़ता।
भावार्थ: ज्ञान के साथ चरित्र भी साधें।
दोहा २०१
शब्दार्थ: अबला = पुराने काव्य में स्त्री।
सरल हिंदी अर्थ: निर्बल पर अधिक कष्ट पड़ता है; कवि शृंगारिक शरीर-बिंब से शक्ति-असमानता दिखाता है।
भावार्थ: कमजोर का शोषण न करें।
पाठ और प्रसंग: शृंगारिक शरीर-बिंब से शक्ति-असमानता का संकेत है।
दोहा २०२
शब्दार्थ: आंधौ = अंधा करने वाला और अंधा का श्लेष।
सरल हिंदी अर्थ: जैसा कर्म वैसी पहचान बनती है; दूसरे को अंधा करने वाले के नाम में भी वही शब्द लगता है।
भावार्थ: कर्म की जिम्मेदारी समझें।
दोहा २०३
शब्दार्थ: पायँदाज = नीचे बिछी वस्तु।
सरल हिंदी अर्थ: ऊपरी शोभा नीचे के सहारे से टिकती है; बिछावन का उदाहरण है।
भावार्थ: सहायक योगदान का सम्मान करें।
पाठ और प्रसंग: “पायँदाज” नीचे बिछे सहारे का संकेत है; भावानुवाद संदर्भ-सापेक्ष है।
दोहा २०४
शब्दार्थ: अहेत = विरोध; स्वान = कुत्ता।
सरल हिंदी अर्थ: कवि दुष्ट की निकटता और शत्रुता दोनों हानिकारक बताता है; कुत्ते की पुरानी उपमा है।
भावार्थ: जन्म नहीं, व्यवहार के आधार पर सीमा रखें।
दोहा २०५
शब्दार्थ: उख = गन्ना।
सरल हिंदी अर्थ: गन्ना दबाने पर रस देता है; गुणवान प्रतिकूलता में भी मधुरता रखता है।
भावार्थ: सद्गुण के साथ आत्मरक्षा रखें।
दोहा २०६
शब्दार्थ: बनिक बिलेख = व्यापारी की संक्षिप्त लिखावट।
सरल हिंदी अर्थ: बिना स्पष्ट मात्राओं का लेख पढ़ने में बोलकर संदर्भ समझना पड़ता है; वाणी लिखित भ्रम सुधारती है।
भावार्थ: अर्थ स्पष्ट करके संवाद करें।
पाठ और प्रसंग: दीपिका बताती है कि व्यापारियों के संक्षिप्त मुड़े लेख में मात्राएँ नहीं लिखी जाती थीं; शब्द बोलकर आशय साफ होता है।
मूल पाठ और हिंदी अर्थ · २०७–२५८
पढ़ने की सुविधा के लिए क्रमांक-समूह · मुद्रित पृष्ठ ३०३–३०६
दोहा २०७
शब्दार्थ: बैसी = कुल्हाड़ी का बेंट; त्रास = भय।
सरल हिंदी अर्थ: लकड़ी का बेंट कुल्हाड़ी से जुड़कर पेड़ काटता है; अपने का विरोधी संग चिंता देता है।
भावार्थ: सहयोग का उद्देश्य परखें।
दोहा २०८
शब्दार्थ: प्रकृत = स्वभाव।
सरल हिंदी अर्थ: संवाद की असंगति से समझाना कठिन होता है; कवि संप्रेषण-बाधा का पुराना बिंब देता है।
भावार्थ: भिन्न जरूरतों के लिए उपयुक्त भाषा चुनें।
दोहा २०९
शब्दार्थ: धाम = अपने स्थान पर।
सरल हिंदी अर्थ: दूसरे को हानि पहुँचाने वाला स्वयं बदनाम होता है; नाक काटने वाली रानी का लोक-बिंब है।
भावार्थ: कर्म पहचान बनाता है।
दोहा २१०
शब्दार्थ: सनेह = घी और प्रेम।
सरल हिंदी अर्थ: घी खाते हुए भी जीभ स्थायी चिकनी नहीं होती; केवल बाहरी संग से गहरा स्वभाव नहीं बदलता।
भावार्थ: परिवर्तन में भीतर का प्रयास चाहिए।
दोहा २११
शब्दार्थ: सहोदर = एक मूल से; सुधा = अमृत।
सरल हिंदी अर्थ: समुद्रमंथन के विष-अमृत एक स्रोत से होकर विपरीत हैं; समान मूल समान स्वभाव नहीं बनाता।
भावार्थ: हर व्यक्ति को अलग पहचानें।
दोहा २१२
शब्दार्थ: बान = आदत; केतकी = पुष्प।
सरल हिंदी अर्थ: काँटे जानकर भी भँवरा केतकी से लगाव नहीं छोड़ता; प्रेम की दृढ़ता का बिंब है।
भावार्थ: निष्ठा के साथ जोखिम-विवेक रखें।
दोहा २१३
शब्दार्थ: कुंभ = घड़ा।
सरल हिंदी अर्थ: सुविधा देकर भी पुरानी आदत नहीं मिटती; कौए का व्यवहार उदाहरण है।
भावार्थ: स्वभाव को व्यवहार में परखें।
दोहा २१४
शब्दार्थ: पाँच = पंचरत्न; कूर = अविवेकी।
सरल हिंदी अर्थ: विवेक बिना रत्न और काँच समान लगते हैं, वैसे गुणी-अगुणी का भेद छूट जाता है।
भावार्थ: परख की क्षमता बढ़ाएँ।
दोहा २१५
शब्दार्थ: कूर = मूर्ख; पाँच = रत्न।
सरल हिंदी अर्थ: किसी के कहने से रत्न काँच या समझदार मूर्ख नहीं हो जाता।
भावार्थ: बाहरी अपमान से मूल्य न घटाएँ।
दोहा २१६
शब्दार्थ: कुबानि = बुरी आदत।
सरल हिंदी अर्थ: आदत बदलना कठिन बताया है; कौए को कोयल बनाने की उपमा है।
भावार्थ: मनुष्य सुधार सकता है, पर अभ्यास चाहिए।
दोहा २१७
शब्दार्थ: सूर = वीर; स्यार = सियार।
सरल हिंदी अर्थ: सिंह की खाल से सियार सिंह नहीं होता; वेश साहस का विकल्प नहीं।
भावार्थ: चरित्र कर्म से बने।
दोहा २१८
शब्दार्थ: जलज = कमल।
सरल हिंदी अर्थ: पानी के साथ बढ़ा कमल पानी घटने पर उतना छोटा नहीं होता; संपत्ति के साथ बढ़ी चाह बनी रहती है।
भावार्थ: आदतों और अपेक्षाओं पर ध्यान दें।
दोहा २१९
शब्दार्थ: बावन = वामन; जाँचत = माँगते।
सरल हिंदी अर्थ: वामन-प्रसंग से याचना की विनम्र स्थिति बताई गई है।
भावार्थ: जरूरतमंद का अपमान न करें।
दोहा २२०
शब्दार्थ: उदधि = समुद्र; मरजाद = सीमा।
सरल हिंदी अर्थ: धीर मर्यादा रखता है, अधीर बहकता है; समुद्र और नदी के प्रवाह का बिंब है।
भावार्थ: स्थिर आचरण साधें।
दोहा २२१
शब्दार्थ: लच्छि = लक्ष्मी; भुपाल = राजा।
सरल हिंदी अर्थ: समृद्धि-सूचक नाम वाले भी निर्धन हो सकते हैं; नाम दशा की गारंटी नहीं।
भावार्थ: नाम से आगे तथ्य देखें।
दोहा २२२
शब्दार्थ: भिच्छा = भिक्षा; धार = आधार।
सरल हिंदी अर्थ: अन्नपूर्णा सबको अन्न देती हैं, पर शिव के भिक्षा-जीवन का बिंब परसेवा की विडंबना बताता है।
भावार्थ: सेवा के साथ अपना निर्वाह भी सँभालें।
दोहा २२३
शब्दार्थ: धनेस = कुबेर; महेस = शिव।
सरल हिंदी अर्थ: धनपति कुबेर के समीप होकर भी शिव चर्म पहनते हैं; सामीप्य और निजी चुनाव अलग हैं।
भावार्थ: सादगी का भी अपना मूल्य है।
दोहा २२४
शब्दार्थ: बाफता = धूपछाँह कपड़ा; समसेर = तलवार।
सरल हिंदी अर्थ: एक ही व्यापक वर्ग में गुण और उपयोग के भेद होते हैं; कपड़े-तलवार की सूची से यही कहा है।
भावार्थ: समूह देखकर सबको समान न आँकें।
पाठ और प्रसंग: वस्त्रों और वस्तुओं की पुरानी सूची का आशय सबमें अंतर होना है; हर शब्द का आधुनिक निश्चित समकक्ष नहीं दिया गया है।
दोहा २२५
शब्दार्थ: घूघ, घूक = उल्लू; अरि = शत्रु।
सरल हिंदी अर्थ: दिन कौए और रात उल्लू के अनुकूल है; कार्य की सफलता अवसर पर निर्भर है।
भावार्थ: अपनी अनुकूल परिस्थिति पहचानें।
दोहा २२६
शब्दार्थ: द्रोणसुत = अश्वत्थामा।
सरल हिंदी अर्थ: रात्रि-आक्रमण की महाभारत कथा से अवसर की शक्ति दिखाई है।
भावार्थ: कथा युद्ध-संदर्भ है, छल का सार्वभौमिक समर्थन नहीं।
दोहा २२७
शब्दार्थ: खोटो-खरो = अशुद्ध-शुद्ध।
सरल हिंदी अर्थ: सोना तपने पर परखा जाता है; व्यक्ति की निष्ठा जरूरत के समय खुलती है।
भावार्थ: परीक्षा में आचरण देखें।
दोहा २२८
शब्दार्थ: सेहरा = सिरोपकरण; पनही = जूता।
सरल हिंदी अर्थ: मखमल सिर पर या पाँव में लगे तो मान अलग है; स्थिति से सामाजिक आदर बदलता है।
भावार्थ: दिखावटी प्रतिष्ठा से अलग गरिमा समझें।
दोहा २२९
शब्दार्थ: अनघर = अनगढ़; खान = यहाँ मल का संकेत।
सरल हिंदी अर्थ: असंगत व्यवहार सुंदर सभा बिगाड़ता है, जैसे दूषण सुगंधित जल का रस बिगाड़े।
भावार्थ: साझे वातावरण का ध्यान रखें।
दोहा २३०
शब्दार्थ: तिन = तिनका; बिकसै = खुले।
सरल हिंदी अर्थ: आँख में छोटा तिनका भी दुख देता है; असंगत संग से सहजता जाती रहती है।
भावार्थ: साथ में अनुकूलता जरूरी है।
दोहा २३१
शब्दार्थ: बक = बगुला; कूर = अनभिज्ञ।
सरल हिंदी अर्थ: सभा के अनुरूप समझ न हो तो सहभाग कठिन लगता है; पक्षियों का बिंब है।
भावार्थ: योग्यता सीखकर विकसित करें।
दोहा २३२
शब्दार्थ: निरस = रस न समझने वाला।
सरल हिंदी अर्थ: असंवेदनशील सहभाग रस बिगाड़ता है, जैसे ताल में कीचड़ उठे।
भावार्थ: दूसरे की रुचि का सम्मान करें।
दोहा २३३
शब्दार्थ: अहेत = अप्रेम; काँटो = काँटा।
सरल हिंदी अर्थ: हानिकारक व्यक्ति की निकटता शरीर में अटके काँटे जैसी पीड़ा दे सकती है।
भावार्थ: स्वस्थ सीमा रखें।
दोहा २३४
शब्दार्थ: घटि = घटाकर; सदोष = दोषयुक्त।
सरल हिंदी अर्थ: असंतुष्ट व्यक्ति निष्पक्ष दाता में भी कमी निकालता है; अपना दोष दूसरे पर डालता है।
भावार्थ: आलोचना में आत्मपरीक्षण करें।
दोहा २३५
शब्दार्थ: गंधी = इत्र-विक्रेता।
सरल हिंदी अर्थ: इत्र और भट्ठी की दुकान का अनुभव अलग है; संग से वातावरण का प्रभाव मिलता है।
भावार्थ: हितकारी वातावरण चुनें।
दोहा २३६
शब्दार्थ: घन = कपूर।
सरल हिंदी अर्थ: तीखी गंध में सुगंध दबती है; खराब आचरण मधुर शब्दों का प्रभाव घटाता है।
भावार्थ: वाणी और चरित्र साथ हों।
दोहा २३७
शब्दार्थ: सीकर = बूँद; जीरा = मसाला।
सरल हिंदी अर्थ: बिगड़ा प्रभाव अच्छे संग से सँवर सकता है; मसालों और जल का लोक-बिंब है।
भावार्थ: अच्छे संग से सुधार संभव है।
पाठ और प्रसंग: हींग, जीरा और जल की पाक-संबंधी लोक-उपमा है; इसे वैज्ञानिक नियम न समझें।
दोहा २३८
शब्दार्थ: खर = गधा; छार = धूल।
सरल हिंदी अर्थ: गंगास्नान के बाद गधे का धूल में लोटना पुरानी आदत की दृढ़ता का बिंब है।
भावार्थ: केवल बाहरी संस्कार पर्याप्त नहीं।
दोहा २३९
शब्दार्थ: बसन = वस्त्र; बसाए = गंधयुक्त।
सरल हिंदी अर्थ: कपड़े की तीखी गंध पर फूल की सुगंध कठिन से टिकती है; गहरा असर हटाना कठिन है।
भावार्थ: दुर्संग का असर समय से रोकें।
दोहा २४०
शब्दार्थ: फनीन = साँप; बिटप = वृक्ष।
सरल हिंदी अर्थ: साँप पकड़ने वाला हाथी नहीं पकड़ सकता; बड़े काम के लिए अलग सामर्थ्य चाहिए।
भावार्थ: अपेक्षा क्षमता अनुसार रखें।
दोहा २४१
शब्दार्थ: दाख = अंगूर; अनखात = खीझता।
सरल हिंदी अर्थ: अयोग्य के अनुचित लाभ पर लोगों को खीझ होती है; गधे के अंगूर खाने का बिंब है।
भावार्थ: ईर्ष्या से अलग न्याय का प्रश्न परखें।
दोहा २४२
शब्दार्थ: ओट = आश्रय; बिलंबै = लटकने पर।
सरल हिंदी अर्थ: टूटी शाख पर लटकना चोट देगा; अनुपयुक्त सहारे पर जीवन का भार न डालें।
भावार्थ: आश्रय की क्षमता जाँचें।
दोहा २४३
शब्दार्थ: छकैं = भरपूर; तंत = तंतु।
सरल हिंदी अर्थ: प्रबल प्रेम को कमल-तंतु से हाथी बाँधने जैसी रोक नहीं बाँधती।
भावार्थ: भावना की तीव्रता समझें।
दोहा २४४
शब्दार्थ: छाया-धूप = अंतर्मन का बिंब।
सरल हिंदी अर्थ: कवि अंतरंग प्रेम की गोपनीयता कहता है; मन की हर बात सार्वजनिक न हो।
भावार्थ: निजता और भरोसा सँभालें।
दोहा २४५
शब्दार्थ: बैन = वचन; पानि = हाथ के संकेत।
सरल हिंदी अर्थ: जिसे सुनकर समझना सहज हो उसे बोलें, जिसे संकेत चाहिए उसे संकेत दें।
भावार्थ: संचार आवश्यकता के अनुरूप हो।
दोहा २४६
शब्दार्थ: ढिंग = पास; सौन = सुनना।
सरल हिंदी अर्थ: जिससे संकट में सहायता मिले उसका संग करें; अलग क्षमताएँ एक-दूसरे की पूरक हो सकती हैं।
भावार्थ: सहयोग में सम्मान रखें।
दोहा २४७
शब्दार्थ: पावक = आग; बिकरै = फैले।
सरल हिंदी अर्थ: कुछ शक्तियाँ मिलकर हानि बढ़ाती हैं, जैसे हवा और आग।
भावार्थ: हर मेल हितकारी नहीं।
दोहा २४८
शब्दार्थ: घ्रानक = मुद्रित कठिन शब्द; मुक्ता = मोती।
सरल हिंदी अर्थ: आश्रय के स्वभाव अनुसार प्राप्ति होती है; एक गुफा में मोती, दूसरी में अवशेष मिलते हैं।
भावार्थ: स्रोत पहचानकर अपेक्षा रखें।
पाठ और प्रसंग: पहले चरण का “घ्रानक” अस्पष्ट है; दूसरे चरण के आश्रय और प्राप्ति-बिंब पर सामान्य अर्थ दिया गया है।
दोहा २४९
शब्दार्थ: गुन = डोरी, गुण; बान = तीर।
सरल हिंदी अर्थ: टेढ़े धनुष और सीधे बाण का साथ अंततः अलग होता है; विरोधी चाल का संबंध कठिन है।
भावार्थ: संग में मूल्यों की संगति देखें।
दोहा २५०
शब्दार्थ: अलप = थोड़ा; गिरिवर = पर्वत।
सरल हिंदी अर्थ: छोटे लाभ के लिए पहाड़ खोदने जैसा अत्यधिक श्रम अनुपयुक्त है।
भावार्थ: श्रम और लाभ का संतुलन देखें।
दोहा २५१
शब्दार्थ: तम = अँधेरा; रवि = सूर्य।
सरल हिंदी अर्थ: दीप अपनी सीमा तक उजाला देता है, सूर्य जितना नहीं; योगदान क्षमता के अनुसार है।
भावार्थ: छोटी क्षमता का भी सम्मान करें।
दोहा २५२
शब्दार्थ: बर = बरगद; पीपर = पीपल।
सरल हिंदी अर्थ: बड़े वृक्ष न हों तो एरंड प्रमुख लगता है; उपलब्ध विकल्प से काम चलाना पड़ता है।
भावार्थ: विकल्प सुधारने का प्रयास रखें।
दोहा २५३
शब्दार्थ: कुक्कुट = मुर्गा; बिहान = सुबह।
सरल हिंदी अर्थ: मुर्गे की बाँग बिना भी सुबह होती है; स्वयं को अनिवार्य मानना अहं है।
भावार्थ: अपना महत्त्व संतुलित रखें।
दोहा २५४
शब्दार्थ: बखान = प्रशंसा।
सरल हिंदी अर्थ: उलटी परख से गुण नहीं बदलते; कौए की प्रशंसा और हंस की निंदा उसका उदाहरण है।
भावार्थ: लोकमत से अलग गुण देखें।
दोहा २५५
शब्दार्थ: कथीर = राँगा धातु; कनक = सोना।
सरल हिंदी अर्थ: अनुपयुक्त स्थान में रत्न की शोभा दबती है; व्यक्ति को भी सही भूमिका चाहिए।
भावार्थ: योग्यता के अनुकूल अवसर चुनें।
पाठ और प्रसंग: “कथीर” राँगा अथवा टिन-सदृश धातु का पुराना नाम है।
दोहा २५६
शब्दार्थ: ससि-सूर = चंद्र-सूर्य।
सरल हिंदी अर्थ: राहु के ग्रहण-बिंब से कहा है कि ऊँचे पद पर संकट भी बड़े होते हैं।
भावार्थ: महत्ता में जिम्मेदारी समझें।
दोहा २५७
शब्दार्थ: अमीत = प्रतिकूल; उखरे = अलग हुए।
सरल हिंदी अर्थ: पानी से अलग कमल को वही सूर्य झुलसाता है जो जल में उसे खिलाता था।
भावार्थ: संदर्भ बदलने पर संबंध का प्रभाव बदलता है।
दोहा २५८
शब्दार्थ: नेह = तेल; गुन = बत्ती।
सरल हिंदी अर्थ: तेल भरा दीपक भी बत्ती बिना नहीं जलता; धन गुण के साथ उपयोगी है।
भावार्थ: संसाधन के साथ योग्यता जोड़ें।
मूल पाठ और हिंदी अर्थ · २५९–३१०
पढ़ने की सुविधा के लिए क्रमांक-समूह · मुद्रित पृष्ठ ३०७–३१०
दोहा २५९
शब्दार्थ: गुन = गुण और डोरी; कोटि = धनुष के सिरे।
सरल हिंदी अर्थ: धनुष के दो सिरे हों, पर डोरी बिना कौन उठाए; धन से अधिक गुण काम आते हैं।
भावार्थ: संसाधन को उपयोगी क्षमता से जोड़ें।
पाठ और प्रसंग: “कोटि” धनुष का सिरा और बड़ी संख्या का श्लेष है।
दोहा २६०
शब्दार्थ: चंग = पतंग; गुन = डोरी।
सरल हिंदी अर्थ: डोरी से जुड़ी पतंग आकाश पहुँचती है; गुण काम करते हैं, दिखावा नहीं।
भावार्थ: दिखावे से अधिक गुण साधें।
दोहा २६१
शब्दार्थ: घट = घड़ा; गुन = रस्सी।
सरल हिंदी अर्थ: रस्सी लगा घड़ा गहरे से जल लाता है; गुण साधन को प्रभावी बनाते हैं।
भावार्थ: प्राप्ति में योग्यता जरूरी है।
दोहा २६२
शब्दार्थ: उदधि = समुद्र; अँचयौ = पी लिया।
सरल हिंदी अर्थ: अगस्त्य के समुद्र पीने पर उसके आश्रित पर्वत-वृक्ष रक्षा न कर सके—कथा से प्रत्युपकार की सीमा है।
भावार्थ: कृतज्ञता रहे, असंभव अपेक्षा नहीं।
दोहा २६३
शब्दार्थ: भील = एकलव्य का कथा-संदर्भ।
सरल हिंदी अर्थ: एकलव्य के उदाहरण से भक्ति और अभ्यास की सीखने में भूमिका कही है।
भावार्थ: लगन से सीख बढ़ती है।
पाठ और प्रसंग: एकलव्य की कथा के वृंद-कृत संकेत हैं; ग्रंथ से बाहर कोई नई कथा नहीं जोड़ी गई है।
दोहा २६४
शब्दार्थ: चितेरौ = चित्रकार; भीत = दीवार।
सरल हिंदी अर्थ: चित्र के लिए उपयुक्त दीवार चाहिए; शिक्षण में शिष्य की तैयारी और ग्रहणशीलता भी जरूरी है।
भावार्थ: सीखने की जमीन तैयार करें।
दोहा २६५
शब्दार्थ: संसै = संशय; बेर = देर।
सरल हिंदी अर्थ: समझदारों के संवाद से संशय मिटता है, जैसे दो दीपक मिलकर अँधेरा हटाते हैं।
भावार्थ: विचार-विनिमय ज्ञान बढ़ाता है।
दोहा २६६
शब्दार्थ: पंगु = चलने में असमर्थ।
सरल हिंदी अर्थ: अलग क्षमताएँ मिलकर काम सँवारती हैं; एक की दृष्टि और दूसरे की चलने की शक्ति पूरक हैं।
भावार्थ: सहयोग गरिमा से करें।
दोहा २६७
शब्दार्थ: मैन = मोम; बैन = शब्द।
सरल हिंदी अर्थ: कठोर अनिच्छुक मन पर कोमल वचन का असर कठिन है, जैसे मोम का तीर पत्थर न भेदे।
भावार्थ: संवाद में ग्रहणशीलता पहचानें।
दोहा २६८
शब्दार्थ: रतनाकर = समुद्र।
सरल हिंदी अर्थ: अति खींचने पर सुखद प्रसंग भी बिगड़ सकता है; समुद्रमंथन का विष उदाहरण है।
भावार्थ: हर बात में अति से बचें।
पाठ और प्रसंग: समुद्रमंथन का दृष्टांत है; इसे कालक्रम का वैज्ञानिक विवरण न पढ़ें।
दोहा २६९
शब्दार्थ: प्रमेल = प्रयत्न का संकेत; बालू = रेत।
सरल हिंदी अर्थ: रेत पेरकर तेल नहीं निकलेगा; साधन और परिणाम का संबंध समझें।
भावार्थ: प्रयास की दिशा सही रखें।
पाठ और प्रसंग: “प्रमेल” कठिन पुराना पाठ है; रेत और तिल की स्पष्ट उपमा अर्थ का आधार है।
दोहा २७०
शब्दार्थ: बावन = बौना।
सरल हिंदी अर्थ: कार्य से पहले क्षमता देखें; ऊँचे फल तक छोटी पहुँच का उपाय अलग होगा।
भावार्थ: तैयारी से काम चुनें।
दोहा २७१
शब्दार्थ: कदली = केला; कंटक = काँटे।
सरल हिंदी अर्थ: बेर के काँटे केले के पत्ते चीरते हैं; हानिकारक निकटता से बचें।
भावार्थ: स्वस्थ दूरी उपयोगी है।
दोहा २७२
शब्दार्थ: प्रनत = आश्रित; बिलाय = नष्ट।
सरल हिंदी अर्थ: कृष्ण के मार्गदर्शन से पांडव विजयी हुए; समर्थ सहायता कार्य सँवारती है।
भावार्थ: अच्छा मार्गदर्शन चुनें।
दोहा २७३
शब्दार्थ: लच्छि = लक्ष्मी; निहचल = स्थिर।
सरल हिंदी अर्थ: सद्कर्म-विवेक समृद्धि का आधार हैं, जैसे दीप के प्रकाश का तेल।
भावार्थ: संपत्ति को विवेक से सँभालें।
दोहा २७४
शब्दार्थ: सिद्धि = पूरा होना।
सरल हिंदी अर्थ: काम बाकी रहे तब तक उपाय खोजे जाते हैं; स्वस्थ होने के बाद उसी रोग का उपचार नहीं खोजते।
भावार्थ: आवश्यकता प्रयास को दिशा देती है।
दोहा २७५
शब्दार्थ: तिन = तिनके; अँगार = चिंगारी।
सरल हिंदी अर्थ: छोटी चिंगारी बड़ा तिनका-ढेर जला देती है; छोटे खतरे की उपेक्षा न करें।
भावार्थ: जोखिम समय से पहचानें।
दोहा २७६
शब्दार्थ: तनत्रान = कवच; ससा = खरहा।
सरल हिंदी अर्थ: छोटी चुनौती में भी तैयारी ढीली न हो; शिकार का उदाहरण है।
भावार्थ: काम में पर्याप्त तैयारी रखें।
दोहा २७७
शब्दार्थ: मृगमद = कस्तूरी।
सरल हिंदी अर्थ: कस्तूरी का गुण उसके मूल से ऊपर माना जाता है; उपयोगी गुण जहाँ मिले ग्रहण करें।
भावार्थ: जन्म से मूल्य तय न करें।
पाठ और प्रसंग: मृगमद के उदाहरण में वस्तु के गुण का ग्रहण है; जन्म-आधारित श्रेष्ठता का समर्थन नहीं।
दोहा २७८
शब्दार्थ: सुकुल = यहाँ उत्तम स्रोत; अगर = सुगंधित लकड़ी।
सरल हिंदी अर्थ: अगर का धुआँ भी सुगंध देता है; मूल गुण अवशिष्ट रह सकता है।
भावार्थ: इसे वंशगत श्रेष्ठता का नियम न मानें।
दोहा २७९
शब्दार्थ: ताती = गरम; पनही = जूता।
सरल हिंदी अर्थ: जूते वाला गरम रेत से बचता है; सही तैयारी हानि घटाती है।
भावार्थ: सुरक्षा के उपाय अपनाएँ।
दोहा २८०
शब्दार्थ: मरम = भीतर का अनुभव; प्रसूत = प्रसव।
सरल हिंदी अर्थ: अनुभव की पीड़ा उसे झेलने वाला बेहतर समझता है; प्रसव की पुरानी उपमा है।
भावार्थ: बिना अनुभव भी सहानुभूति रखें।
दोहा २८१
शब्दार्थ: बलि = यहाँ पराक्रम से अर्जित वस्तु।
सरल हिंदी अर्थ: वीरता का वास्तविक फल केवल कायरता से नहीं मिलता; सिंह-सियार का उदाहरण है।
भावार्थ: उपलब्धि के लिए आवश्यक कर्म करें।
दोहा २८२
शब्दार्थ: अभीत = निर्भय; सुभट = योद्धा।
सरल हिंदी अर्थ: वन सिंह को आश्रय देता और सिंह वन की रक्षा करता है; नेतृत्व और सहयोगी परस्पर बल हैं।
भावार्थ: संबंध में पारस्परिक योगदान देखें।
दोहा २८३
शब्दार्थ: हाथ चढ़े = सामर्थ्य में आए।
सरल हिंदी अर्थ: समर्थ आश्रय से निर्वाह होता है; सिंह को पर्याप्त आहार का काव्य-बिंब दिया है।
भावार्थ: आजीविका का सक्षम आधार खोजें।
दोहा २८४
शब्दार्थ: पराक्रम = साहसपूर्ण कर्म।
सरल हिंदी अर्थ: चित्र का बाघ बच्चे का खिलौना है; केवल वीरता का रूप भय या सम्मान नहीं लाता।
भावार्थ: पहचान कर्म से प्रमाणित हो।
दोहा २८५
शब्दार्थ: भुवमंडल = पृथ्वी; मृगराज = सिंह।
सरल हिंदी अर्थ: सिंह का वन में प्रभुत्व उसके पराक्रम से है; कार्यशील सामर्थ्य का महत्त्व कहा है।
भावार्थ: शक्ति के साथ न्याय जरूरी है।
दोहा २८६
शब्दार्थ: कालयवन, मुचुकुंद = पौराणिक पात्र।
सरल हिंदी अर्थ: कृष्ण की कालयवन-कथा से बुद्धि और युक्ति की भूमिका बताई है।
भावार्थ: कठिनाई में केवल बल पर निर्भर न रहें।
दोहा २८७
शब्दार्थ: हय = घोड़ा।
सरल हिंदी अर्थ: सुरक्षा देने वाली व्यवस्था से लोग निर्भय चलते हैं; बँधे बलवान घोड़े का संकेत है।
भावार्थ: सुरक्षा सामूहिक सुविधा देती है।
दोहा २८८
शब्दार्थ: दिनेस = सूर्य; तिमिर = अँधेरा।
सरल हिंदी अर्थ: न्यायी शासन में दुष्टता न टिके, जैसे सूर्य से अँधेरा हटता है।
भावार्थ: नेतृत्व की कसौटी न्याय है।
दोहा २८९
शब्दार्थ: चौपर = खेल; दाव = परिणाम।
सरल हिंदी अर्थ: शासक का निर्णय ही न्याय मान लिया जाना सत्ता की विडंबना है, जैसे पासे का परिणाम खेल तय करता है।
भावार्थ: न्याय को सत्ता से स्वतंत्र परखें।
पाठ और प्रसंग: यह सत्ता और न्याय के बीच अंतर पर भी पढ़ी जा सकने वाली उक्ति है; शासक का हर निर्णय स्वतः न्याय नहीं है।
दोहा २९०
शब्दार्थ: समै = समय; सरै = पूरा हो।
सरल हिंदी अर्थ: समय और परिस्थिति देखकर चाल चलने वाले का कार्य सँवरता है; खेल की उपमा है।
भावार्थ: योजना से कार्य करें।
दोहा २९१
शब्दार्थ: तरै = नीचे।
सरल हिंदी अर्थ: दीप के नीचे अँधेरा रहता है; दूसरों को देखकर भी अपने दोष अनदेखे रह सकते हैं।
भावार्थ: नियमित आत्मपरीक्षण करें।
दोहा २९२
शब्दार्थ: आप जरै = स्वयं जलता।
सरल हिंदी अर्थ: दीप स्वयं जलकर आसपास प्रकाश देता है; सेवा में परिश्रम का बिंब है।
भावार्थ: सेवा में अपनी क्षमता भी सँभालें।
दोहा २९३
शब्दार्थ: कृपान = तलवार; कवच = रक्षा-कवच।
सरल हिंदी अर्थ: एक लोहे की तलवार मारती और कवच बचाता है; मूल समान, उपयोग अलग।
भावार्थ: परिणाम कर्म और उपयोग से तय होता है।
दोहा २९४
शब्दार्थ: थल = भूमि; दाव = अवसर।
सरल हिंदी अर्थ: पानी में नाव गाड़ी ढोती, जमीन पर गाड़ी नाव; साधन अपने क्षेत्र में प्रभावी है।
भावार्थ: उपयुक्त स्थान पर क्षमता लगाएँ।
दोहा २९५
शब्दार्थ: कुबात = कटु बात; वात = हवा।
सरल हिंदी अर्थ: हवा से जल का स्थिर प्रतिबिंब हिलता है; कटु वचन मन को विचलित करते हैं।
भावार्थ: वाणी की चोट समझें।
दोहा २९६
शब्दार्थ: हाजिर = उपलब्ध; दाभ = दर्भ घास; बलदेव = बलराम।
सरल हिंदी अर्थ: निर्णायक समय पर उपलब्ध साधन प्रभावी हो सकता है; बलराम और सूत की कथा में दर्भ का उदाहरण है।
भावार्थ: साधन के साथ उपयोगकर्ता और प्रसंग देखें।
पाठ और प्रसंग: दाभ/दर्भ-घास और बलराम-सूत का पौराणिक प्रसंग है; हिंसा का वर्तमान निर्देश नहीं।
दोहा २९७
शब्दार्थ: बालि = रामकथा का पात्र।
सरल हिंदी अर्थ: कवि बालि-वध पर सवाल उठाकर प्रभावशाली के प्रति अलग कसौटी की विडंबना कहता है।
भावार्थ: मूल काव्य-मत को प्रसंग सहित पढ़ें।
पाठ और प्रसंग: बालि-वध पर सवाल कवि की मूल उक्ति है। उसे हटाकर मूल पंक्ति नहीं बदली गई है।
दोहा २९८
शब्दार्थ: अजुगुत = अनुचित; सूद्र = शूद्र।
सरल हिंदी अर्थ: शंबूक-प्रसंग में पुरानी वर्णव्यवस्था का तर्क आता है; यह ऐतिहासिक सामाजिक दृष्टि है।
भावार्थ: जन्म-आधारित भेदभाव स्वीकार न करें।
पाठ और प्रसंग: शंबूक-प्रसंग के पुराने वर्ण-धर्म का मत मूल में है; जन्म के आधार पर अवसर या गरिमा घटाने का समर्थन नहीं।
दोहा २९९
शब्दार्थ: कपिन = वानर; मकरालय = समुद्र।
सरल हिंदी अर्थ: सेतु में वानरों के लाए पत्थर समुद्र ने धारण किए; छोटे योगदान भी बड़ा काम सँवारते हैं।
भावार्थ: योगदान का आकार नहीं, उपयोग देखें।
दोहा ३००
शब्दार्थ: मंदर = पर्वत; दधि = यहाँ समुद्र।
सरल हिंदी अर्थ: समुद्र अनेक विरोधी तत्वों को जगह देता है; समर्थ आश्रय में विविध लोग आते हैं।
भावार्थ: व्यापकता में विवेक रखें।
दोहा ३०१
शब्दार्थ: शेष = पौराणिक शेषनाग।
सरल हिंदी अर्थ: शेष के पृथ्वी धारण करने के बिंब से जिम्मेदारी निभाने का धैर्य बताया है।
भावार्थ: दायित्व में स्थिर रहें।
दोहा ३०२
शब्दार्थ: दधि = समुद्र; कपिदल = वानर-सेना।
सरल हिंदी अर्थ: समुद्र बाँधा गया, फिर भी उसने वानर-सेना पार कराई; विपरीतता में हित का बिंब है।
भावार्थ: उचित सहयोग में उदारता रखें।
दोहा ३०३
शब्दार्थ: खारौ = खारा; तोय = जल।
सरल हिंदी अर्थ: समुद्र का खारा जल बादल से मीठी वर्षा का बिंब बनता है; अच्छा संग रूपांतरकारी है।
भावार्थ: सुधार देने वाला संग चुनें।
दोहा ३०४
शब्दार्थ: मयंक = चंद्रमा; अपरापत = अभाव।
सरल हिंदी अर्थ: शिव के मस्तक पर रहते भी अर्धचंद्र पूर्ण नहीं; बड़ा आश्रय हर सीमा नहीं मिटाता।
भावार्थ: सीमा स्वीकारकर गुण बढ़ाएँ।
दोहा ३०५
शब्दार्थ: उदधि = समुद्र।
सरल हिंदी अर्थ: समुद्र-पुत्र चंद्रमा का कलंक पिता नहीं धो सका; कथा से नियति की सीमा कही है।
भावार्थ: आश्रय से हर दोष मिटना निश्चित नहीं।
दोहा ३०६
शब्दार्थ: मैनाक = पौराणिक पर्वत; इंद = इंद्र।
सरल हिंदी अर्थ: समुद्र में मैनाक की शरण से रक्षा हुई; उपयुक्त आश्रय संकट घटाता है।
भावार्थ: सक्षम और हितकारी सहारा चुनें।
दोहा ३०७
शब्दार्थ: अरि = शत्रु; भारत = महाभारत।
सरल हिंदी अर्थ: महाभारत के युद्ध में विविध युक्तियों की ओर संकेत है; कवि पुरानी युद्धनीति कहता है।
भावार्थ: इसे सामान्य जीवन में छल की अनुमति न मानें।
दोहा ३०८
शब्दार्थ: सपूत = गुणी संतान; सूत = धागा।
सरल हिंदी अर्थ: उपयोगी संतान सबके काम आती है, जैसे धागे से बने वस्त्र सबको ढकते हैं।
भावार्थ: जीवन का मूल्य योगदान में है।
पाठ और प्रसंग: “बन कौ सूत” और “सपूत” का अनुप्रास तथा सेवा का बिंब है।
दोहा ३०९
शब्दार्थ: पींजन = रुई धुनना।
सरल हिंदी अर्थ: धागा अनेक प्रक्रियाएँ सहकर वस्त्र बनता है; गुणी परिश्रम से दूसरों का हित करता है।
भावार्थ: परिश्रम और सेवा का मान रखें।
दोहा ३१०
शब्दार्थ: रसरी = रस्सी; सिल = पत्थर।
सरल हिंदी अर्थ: रस्सी की रगड़ पत्थर पर निशान डालती है; नियमित अभ्यास से समझ बढ़ती है।
भावार्थ: छोटा निरंतर अभ्यास जारी रखें।
मूल पाठ और हिंदी अर्थ · ३११–३५०
पढ़ने की सुविधा के लिए क्रमांक-समूह · मुद्रित पृष्ठ ३११–३१४
दोहा ३११
शब्दार्थ: गुर = गुड़; खल = दुष्ट।
सरल हिंदी अर्थ: कवि विरोधी से निपटने में सीधे संघर्ष के बजाय उपाय का पुराना युद्धनीति-बिंब देता है।
भावार्थ: इसे छल या विष देने का निर्देश न मानें।
दोहा ३१२
शब्दार्थ: ओछै = कम भरे; बुध = समझदार।
सरल हिंदी अर्थ: कम भरा घड़ा छलकता है; ज्ञान का अभाव अक्सर अधिक प्रदर्शन में झलकता है।
भावार्थ: विनम्रता से सीखते रहें।
दोहा ३१३
शब्दार्थ: मीन = मछली; प्रवीन = निपुण।
सरल हिंदी अर्थ: अपने में रहने वाली मछली भी मछुआरे की मार झेलती है; निर्दोष को हानि की विडंबना है।
भावार्थ: करुणा और न्याय चुनें।
दोहा ३१४
शब्दार्थ: थान = स्थान; ठौर = जगह।
सरल हिंदी अर्थ: अगला सुरक्षित आधार देखे बिना पुराना न छोड़ें; कदम रखने की उपमा है।
भावार्थ: बदलाव में तैयारी रखें।
दोहा ३१५
शब्दार्थ: तातौ = गरम; मति सूध = साफ बुद्धि।
सरल हिंदी अर्थ: गरम दूध जल्दबाजी में पीकर जलना पछतावा देता है; पहले परिणाम सोचें।
भावार्थ: क्षणिक उतावली से बचें।
दोहा ३१६
शब्दार्थ: उरझै-सुरझै = उलझे-सुलझे।
सरल हिंदी अर्थ: कर्म और परिस्थितियाँ सुख-दुख में भूमिका निभाती हैं; हवा में झंडा उलझने-सुलझने का बिंब है।
भावार्थ: नियंत्रण और जिम्मेदारी दोनों पहचानें।
दोहा ३१७
शब्दार्थ: पोष = पालन; नैक = थोड़ा भी।
सरल हिंदी अर्थ: कवि साँप के वायु-आहार की पुरानी मान्यता से संतोष का महत्त्व बताता है।
भावार्थ: यह जीवविज्ञान या भोजन-त्याग का नियम नहीं।
दोहा ३१८
शब्दार्थ: पिसुन = कपटी; जीवन = जल और प्राण।
सरल हिंदी अर्थ: कपटी विनय करे तब भी भेद न दें; रिसती डोल जल खो देती है।
भावार्थ: भरोसा प्रमाण से बने।
दोहा ३१९
शब्दार्थ: तेज = प्रभावी सामर्थ्य; अंकुस = अंकुश।
सरल हिंदी अर्थ: विशाल हाथी अंकुश से नियंत्रित होता है; केवल आकार शक्ति नहीं।
भावार्थ: कौशल और विवेक महत्त्वपूर्ण हैं।
दोहा ३२०
शब्दार्थ: रन = युद्ध; काँचौ = अस्थिर।
सरल हिंदी अर्थ: संकट में दिखावटी साहस उतरता है, जैसे धूप में कच्चा रंग फीका पड़ता है।
भावार्थ: साहस अभ्यास से विकसित करें।
दोहा ३२१
शब्दार्थ: पिसुन = दोषदर्शी; बसन = वस्त्र।
सरल हिंदी अर्थ: जूँ के डर से कपड़ा नहीं फेंकते; निंदक के भय से अपना गुण न छोड़ें।
भावार्थ: आलोचना से विवेकपूर्वक सीखें।
दोहा ३२२
शब्दार्थ: बिलम = विलंब।
सरल हिंदी अर्थ: घर बनाने में समय, गिराने में पल लगता है; निर्माण कठिन और विनाश तेज है।
भावार्थ: बिगाड़ने से पहले ठहरें।
दोहा ३२३
शब्दार्थ: आपनौ = अपना।
सरल हिंदी अर्थ: जो अपने अधिकार और साथ में हो वही स्थिर सहारा है; दूसरे के नियंत्रण में अपना भी पराया लग सकता है।
भावार्थ: स्वावलंबन विकसित करें।
दोहा ३२४
शब्दार्थ: भीति = दीवार; डंबर = दिखावा।
सरल हिंदी अर्थ: उथली प्रीति रेत की दीवार की तरह जल्दी ढहती है; दिखावा उसे टिकाता नहीं।
भावार्थ: संबंध की नींव मजबूत करें।
पाठ और प्रसंग: पहले चरण का भाव स्पष्ट है; “अवर डंबर साँभ” के विशिष्ट पद-विभाजन में कठिनाई है।
दोहा ३२५
शब्दार्थ: ढिग = पास; तनपरस = निकट संपर्क।
सरल हिंदी अर्थ: दुर्जन के संसर्ग से वाणी और व्यवहार पर भी दूषण आता है; दूसरे चरण का पाठ कठिन है।
भावार्थ: हानिकारक संग से सावधान रहें।
पाठ और प्रसंग: दूसरे चरण का वनस्पति-संबंधी पाठ कठिन है; मूल को अनुमान से नया दोहा नहीं बनाया गया।
दोहा ३२६
शब्दार्थ: माट = रंगने का पात्र।
सरल हिंदी अर्थ: नीले रंग के घड़े से लाल कपड़ा नहीं बनेगा; गलत साधन से विरोधी फल की आशा व्यर्थ है।
भावार्थ: उपाय लक्ष्य के अनुसार चुनें।
दोहा ३२७
शब्दार्थ: कामिनी = स्त्री; ठिकानौ = उपलब्धि का स्थान।
सरल हिंदी अर्थ: जो जहाँ उपलब्ध नहीं, वहाँ खोज निष्फल है; त्यागी के आश्रम का उदाहरण है।
भावार्थ: स्रोत और जरूरत का मेल करें।
दोहा ३२८
शब्दार्थ: सीख दिवाए = उकसाने पर।
सरल हिंदी अर्थ: किसी के मूर्खतापूर्ण कहने से आग में नहीं कूदते; अपनी बुद्धि लगाएँ।
भावार्थ: दबाव में विवेक न छोड़ें।
पाठ और प्रसंग: दूसरे के उकसावे में आत्महानि न करने का स्पष्ट सामान्य बोध है।
दोहा ३२९
शब्दार्थ: भीति = दीवार।
सरल हिंदी अर्थ: संकेत या प्रतिरूप असली वस्तु नहीं, फिर भी उसे समझाता है; दीवार के चंद्र-बिंब की उपमा है।
भावार्थ: रूपक और तथ्य का भेद समझें।
पाठ और प्रसंग: झूठ शब्द यहाँ चंद्रमा के प्रतिरूप जैसे संकेत की ओर भी जा सकता है; यह धोखे की सामान्य अनुमति नहीं है।
दोहा ३३०
शब्दार्थ: स्रवन = कान।
सरल हिंदी अर्थ: पूर्ण समझ हो या न हो, कोमल वचन सुनने में सुख देते हैं; बच्चे का उदाहरण है।
भावार्थ: मधुर वाणी अपनाएँ।
दोहा ३३१
शब्दार्थ: देहरीदीप = चौखट का दीप।
सरल हिंदी अर्थ: विवेकी दोनों पक्षों का विवाद घटाता है, जैसे चौखट का दीप भीतर-बाहर रोशनी देता है।
भावार्थ: मध्यस्थता निष्पक्ष हो।
दोहा ३३२
शब्दार्थ: धरमसुवन = युधिष्ठिर।
सरल हिंदी अर्थ: नल की विपत्ति सुनकर युधिष्ठिर को अपना दुख सहने का धैर्य मिला—कथात्मक संदर्भ है।
भावार्थ: दूसरे की पीड़ा से करुणा सीखें।
दोहा ३३३
शब्दार्थ: अधिक मास = कालगणना का संदर्भ।
सरल हिंदी अर्थ: कभी प्रतिकूल दिखती बात लाभ देती है; पांडवों की समय-गणना का संक्षिप्त कथा-संकेत है।
भावार्थ: परिस्थिति के सभी पक्ष देखें।
पाठ और प्रसंग: पांडवों की अवधि और अधिक मास का संक्षिप्त संदर्भ है; पूरी गणना इस दोहे में नहीं दी गई।
दोहा ३३४
शब्दार्थ: कीचकन = कीचक के संबंधी।
सरल हिंदी अर्थ: एक के अन्याय का कष्ट साथियों तक पहुँचता है; भीम-कीचक कथा उदाहरण है।
भावार्थ: संग में नैतिक जिम्मेदारी समझें।
दोहा ३३५
शब्दार्थ: बिराटसु = विराटपुत्र उत्तर।
सरल हिंदी अर्थ: अज्ञातवास की कठिन दशा में अर्जुन ने विराटपुत्र की रक्षा की।
भावार्थ: संकट में भी क्षमता अनुसार सहयोग दें।
दोहा ३३६
शब्दार्थ: पथ = पार्थ का संक्षिप्त पाठ।
सरल हिंदी अर्थ: अर्जुन ने कार्य करके यश उत्तर को दिया; महान हर सफलता का श्रेय अपने नाम नहीं करता।
भावार्थ: सहयोगियों को सम्मान दें।
पाठ और प्रसंग: “पथ” पार्थ-संबंधी संक्षिप्त पाठ है; उत्तर को यश देने का प्रसंग प्रमुख है।
दोहा ३३७
शब्दार्थ: निरबहैं = निभाते हैं।
सरल हिंदी अर्थ: राम ने विजय के बाद विभीषण को राज्य देकर वचन निभाया।
भावार्थ: सफलता के बाद भी वचन रखें।
दोहा ३३८
शब्दार्थ: बनिज = व्यापार।
सरल हिंदी अर्थ: बुराई कर्म से पहचानी जाती है; व्यक्ति का कार्य उसकी पहचान बनाता है।
भावार्थ: जन्म के बजाय आचरण देखें।
दोहा ३३९
शब्दार्थ: अप्रतीति = अविश्वास।
सरल हिंदी अर्थ: बार-बार झूठ और छल से विश्वसनीयता जाती है; लोग संबंध में हिचकते हैं।
भावार्थ: सत्य से विश्वास बनाएँ।
दोहा ३४०
शब्दार्थ: बिरवान = वृक्ष; लच्छन = लक्षण।
सरल हिंदी अर्थ: वृक्ष के स्वस्थ पत्तों जैसे अच्छे आचरण भविष्य की संभावना बताते हैं।
भावार्थ: यह संभावना है, जन्माधारित गारंटी नहीं।
दोहा ३४१
शब्दार्थ: सुमान = सम्मान; घनतान = बादल की गर्जना।
सरल हिंदी अर्थ: सिंह-शावक के गर्भ में उछलने की काव्य-कल्पना से सहज तेज बताया है।
भावार्थ: काव्य को जैविक प्रमाण न मानें।
पाठ और प्रसंग: गर्भस्थ सिंह की काव्य-कल्पना है; मानव जन्म से गुण निश्चित करने का प्रमाण नहीं।
दोहा ३४२
शब्दार्थ: तनय = पुत्र; अभीति = निर्भय।
सरल हिंदी अर्थ: जन्मते सिंह-शावक की निर्भयता काव्य-अतिशयोक्ति है; सहज प्रवृत्ति की बात है।
भावार्थ: मनुष्य में शिक्षा से क्षमता बढ़ती है।
दोहा ३४३
शब्दार्थ: इकशब्दी = वचन का पक्का; साह = व्यापारी।
सरल हिंदी अर्थ: पक्के वचन वाले व्यापारी के पास दूर से ग्राहक आते हैं।
भावार्थ: विश्वसनीयता दीर्घकालिक संपदा है।
दोहा ३४४
शब्दार्थ: अलि = भँवरा; मतंग = हाथी।
सरल हिंदी अर्थ: कमल के प्रेम में भँवरा उसके साथ रहता और कमल खाता हाथी उसे भी निगल सकता है।
भावार्थ: आत्मीयता के परिणाम भी साझे होते हैं।
दोहा ३४५
शब्दार्थ: बटेर = पक्षी।
सरल हिंदी अर्थ: सुविधा में भीड़ लगती है, अवसर बीतने पर लौटती नहीं; फसल के पक्षी का बिंब है।
भावार्थ: भीड़ और निष्ठा अलग पहचानें।
दोहा ३४६
शब्दार्थ: गाँठ = आधार; साँठ = मेल।
सरल हिंदी अर्थ: आधारभूत समझ बिना शिक्षा जोड़ना कठिन है; गाँठ और जोड़ का रूपक है।
भावार्थ: बुनियाद मजबूत करके सीखें।
पाठ और प्रसंग: बुनियादी समझ का रूपक है; किसी विद्यार्थी को स्थायी अयोग्य ठहराने का नियम नहीं।
दोहा ३४७
शब्दार्थ: बक = बगुला; दाँव = अवसर।
सरल हिंदी अर्थ: अवसर मिलने पर बगुला मछली पकड़ता है; अत्यधिक देर मौका खो देती है।
भावार्थ: उचित समय पर काम करें।
दोहा ३४८
शब्दार्थ: बरत = करतब की रस्सी का संकेत।
सरल हिंदी अर्थ: रस्सी पर नट की एकाग्रता जैसी संत की भक्ति में स्थिर दृष्टि है।
भावार्थ: साधना में नियमित ध्यान रखें।
दोहा ३४९
शब्दार्थ: तत = गरम; जिनि = मत।
सरल हिंदी अर्थ: ठंडा-गरम जल दोनों आग बुझाते हैं; विरोधी की मिठास-क्रोध दोनों को बिना परखे न मानें।
भावार्थ: व्यवहार का उद्देश्य समझें।
दोहा ३५०
शब्दार्थ: लबार = बढ़बोला, झूठा; निस = रात।
सरल हिंदी अर्थ: बढ़बोले की जीभ चंचल वस्तु की तरह चलती रहती है; दूसरे चरण का पाठ कठिन है।
भावार्थ: बोलने में सत्य और संयम रखें।
पाठ और प्रसंग: “चल-हल दल” और “निस दीठ” पुराने कठिन पद हैं। पहला चरण बढ़बोलेपन पर स्पष्ट है; दूसरा चंचलता का संकेत देता है।
पहले भाग से विचार की कुछ बातें
- कथन से पहले अवसर: सही बात भी सही समय और उचित ढंग से कही जाए।
- गुण का आधार: ऊँचा पद, बड़ा नाम और वेश अकेले चरित्र का प्रमाण नहीं।
- निरंतर अभ्यास: पराई आशा पर अपना उद्यम न छोड़ें।
- संगति का विवेक: निकटता, लाभ और सच्चे हित में अंतर देखें।
- करुणा और सम्मान: सेवा समय पर और आवश्यकता के अनुसार हो।
इस फ़ाइल में पहला भाग क्रमांक १–३५० पूरा है। अगला भाग ३५१ से आरंभ होकर चुने संस्करण के ७०६ तक जाएगा। दूसरे भाग का वास्तविक प्रकाशित लिंक उपलब्ध होने पर ही जोड़ा जाएगा।
सामान्य प्रश्न
कुल कितने भागों की योजना है?
दो बड़े भाग: १–३५० और ३५१–७०६। यह पहली फ़ाइल है। छोटे-छोटे ५०-दोहों के समूह केवल इसी लेख की नेविगेशन सुविधा हैं, अलग पोस्ट नहीं।
क्या यह अकेली फ़ाइल पूरी वृंद सतसई है?
नहीं। यह चुने गए मुद्रित संस्करण का पहला आधा अध्ययन है। पूरी श्रृंखला के लिए दूसरा भाग भी आवश्यक होगा।
७०० के बजाय ७०६ क्रमांक क्यों?
सतसई-सप्तक के चुने खंड में आरंभिक गुरु-वंदना, रचना-परिचय और अंत के समापन-छंद क्रम में शामिल हैं। स्रोत के वास्तविक अंतिम अंक का पालन किया गया है; नाम के आधार पर छंद काटे या नए नहीं जोड़े गए।
क्या मूल की हर पुरानी उक्ति आज का नियम है?
नहीं। ऐतिहासिक भाषा, सामाजिक दृष्टि और युद्ध-कथा का संदर्भ अर्थ में बताया गया है। उपयोगी शिक्षा विवेक से ग्रहण करें; किसी वर्ग के बारे में अपमानजनक सामान्यीकरण को तथ्य न मानें।
कठिन पाठ कहाँ बताया गया है?
संबंधित दोहे के नीचे “पाठ और प्रसंग” में। जहाँ पूरे संकेत का निश्चित अर्थ नहीं मिला है, वहाँ सामान्य भाव को भावानुवाद के रूप में सीमित रखा गया है।
संदर्भ और संपादन-पद्धति
मुख्य मुद्रित आधार: सतसई-सप्तक, संग्रहकर्ता एवं संपादक श्यामसुंदरदास, हिंदुस्तानी एकेडमी, प्रयाग, १९३१; खंड ६, वृंद-सतसई। इस भाग का मूल पाठ मुद्रित पृष्ठ २८७–३१४ से है। पुस्तक की अंत में दी “दीपिका” से चुनिंदा कठिन शब्दों और कथा-संकेतों का मिलान किया गया है।
- Internet Archive · सतसई-सप्तक की मुख्य मुद्रित स्कैन-प्रति
- Internet Archive · उसी पुस्तक की दूसरी स्कैन-प्रति — मुख्य प्रति के कटे पृष्ठ २९९ का पूरा पाठ क्रमांक १५५–१६७ के लिए इससे देखा गया।
- हिन्दवी · सतसई-सप्तक पुस्तक-परिचय और संस्करण विवरण
- हिन्दवी · वृंद के चुनिंदा दोहे — लोकप्रिय पाठों के तुलनात्मक संदर्भ के लिए; इसे पूरी सतसई का स्थानापन्न नहीं बनाया गया।
पाठ-संपादन: OCR को अंतिम मूल नहीं माना गया। मुद्रित पृष्ठ पढ़कर पंक्तियाँ व्यवस्थित की गई हैं। दंड-चिह्न, रिक्तियाँ, कुछ पुराने संयुक्ताक्षरों का यूनिकोड लेखन और अनुस्वार व्यवस्थित हैं। मूल क्रमांक नहीं बदले गए।
व्याख्या: शब्दार्थ, सरल अर्थ और भावार्थ इस लेख के लिए स्वतंत्र रूप से लिखे गए हैं; किसी आधुनिक टीका के शब्दशः पुनर्मुद्रण नहीं। कठिन बचे पदों को अनुमान से नई मूल पंक्ति बनाकर नहीं बदला गया है।
सीमा: यह सरल पाठक-संस्करण है, सभी पांडुलिपियों का आलोचनात्मक संस्करण नहीं। इसी पुस्तक के अन्य कवियों की सतसइयाँ यहाँ वृंद के नाम से नहीं मिलाई गई हैं।
अभ्यास से विवेक तक
नीति का सार केवल दूसरे को परखना नहीं, अपने मन और व्यवहार को भी देखना है। मधुर वाणी, समय पर कर्म, सच्चा सहयोग और निरंतर अभ्यास—इनमें से किसी एक सीख को प्रतिदिन जीवन में उतारें।
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