अष्टावक्र गीता अध्याय 3: आत्मज्ञान की परीक्षा — 14 श्लोक हिंदी अर्थ सहित

भक्ति भावना • अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

अध्याय ३ • आत्मज्ञान की परीक्षा

सम्पूर्ण १४ श्लोक • मूल संस्कृत पाठ एवं सरल हिंदी भावार्थ

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अष्टावक्र गीता के इस अध्याय का मुख्य विषय है—आत्मज्ञान की परीक्षा। यहाँ अष्टावक्र और जनक के संवाद में आत्मतत्त्व का विवेचन मिलता है। नीचे सभी १४ मूल श्लोक क्रम से सरल हिंदी भावार्थ के साथ दिए गए हैं।

पाठ का संदर्भ: यह अद्वैत दर्शन का आत्मस्वरूप संबंधी संवाद है। अकर्तापन और बंधन से परे होने के कथन शुद्ध आत्मा की दृष्टि से हैं; व्यवहार में कर्तव्य, सदाचार और करुणा का महत्त्व बना रहता है। हिंदी भावार्थ भक्ति भावना द्वारा सरल भाषा में प्रस्तुत है। अध्याय का विषय-शीर्षक पाठ की सुविधा के लिए दिया गया है।

अध्याय ३ • श्लोक १

अष्टावक्र उवाच ॥

अविनाशिनमात्मानमेकं विज्ञाय तत्त्वतः ।
तवात्मज्ञानस्य धीरस्य कथमर्थार्जने रतिः ॥ ३-१॥

सरल हिंदी भावार्थ: अष्टावक्र पूछते हैं—आत्मा को वास्तव में एक और अविनाशी जान लेने पर भी तुम जैसे धीर आत्मज्ञानी की धन-संग्रह में आसक्ति कैसे रह सकती है?

अध्याय ३ • श्लोक २

आत्माज्ञानादहो प्रीतिर्विषयभ्रमगोचरे ।
शुक्तेरज्ञानतो लोभो यथा रजतविभ्रमे ॥ ३-२॥

सरल हिंदी भावार्थ: जैसे सीप को न जानने से उसमें कल्पित चाँदी का लोभ होता है, वैसे ही आत्मा के अज्ञान से भ्रामक विषयों में आकर्षण होता है।

अध्याय ३ • श्लोक ३

विश्वं स्फुरति यत्रेदं तरङ्गा इव सागरे ।
सोऽहमस्मीति विज्ञाय किं दीन इव धावसि ॥ ३-३॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिसमें यह विश्व समुद्र की तरंगों की तरह प्रकट होता है, “वही मैं हूँ”—यह जानकर भी दीन व्यक्ति की तरह विषयों के पीछे क्यों दौड़ते हो?

अध्याय ३ • श्लोक ४

श्रुत्वापि शुद्धचैतन्य आत्मानमतिसुन्दरम् ।
उपस्थेऽत्यन्तसंसक्तो मालिन्यमधिगच्छति ॥ ३-४॥

सरल हिंदी भावार्थ: आत्मा को अत्यंत सुंदर और शुद्ध चेतना सुन लेने पर भी, कामभोग में अत्यधिक आसक्त व्यक्ति अपने मन को मलिन करता है।

अध्याय ३ • श्लोक ५

सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि ।
मुनेर्जानत आश्चर्यं ममत्वमनुवर्तते ॥ ३-५॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो मुनि सभी प्राणियों में आत्मा और आत्मा में सभी प्राणियों को जानता है, उसमें भी ममत्व चलता रहे—यह आश्चर्य है।

अध्याय ३ • श्लोक ६

आस्थितः परमाद्वैतं मोक्षार्थेऽपि व्यवस्थितः ।
आश्चर्यं कामवशगो विकलः केलिशिक्षया ॥ ३-६॥

सरल हिंदी भावार्थ: परम अद्वैत में निष्ठा और मोक्ष की अभिलाषा होते हुए भी, कामना के वश में होकर भोगों से व्याकुल होना आश्चर्य है।

अध्याय ३ • श्लोक ७

उद्भूतं ज्ञानदुर्मित्रमवधार्यातिदुर्बलः ।
आश्चर्यं काममाकाङ्क्षेत् कालमन्तमनुश्रितः ॥ ३-७॥

सरल हिंदी भावार्थ: कामना को ज्ञान का शत्रु जानकर और जीवन के अंत की ओर बढ़ते हुए भी दुर्बल मनुष्य उसका आकांक्षी बना रहे—यह आश्चर्य है।

अध्याय ३ • श्लोक ८

इहामुत्र विरक्तस्य नित्यानित्यविवेकिनः ।
आश्चर्यं मोक्षकामस्य मोक्षाद् एव विभीषिका ॥ ३-८॥

सरल हिंदी भावार्थ: इस लोक और परलोक से विरक्त, नित्य-अनित्य का विवेकी और मुक्ति का इच्छुक व्यक्ति मुक्ति से ही डरे—यह आश्चर्य है।

अध्याय ३ • श्लोक ९

धीरस्तु भोज्यमानोऽपि पीड्यमानोऽपि सर्वदा ।
आत्मानं केवलं पश्यन् न तुष्यति न कुप्यति ॥ ३-९॥

सरल हिंदी भावार्थ: धीर पुरुष का आदर किया जाए या उसे पीड़ा दी जाए, वह केवल आत्मस्वरूप को देखते हुए न अहंकारपूर्ण प्रसन्न होता है, न क्रोधित।

अध्याय ३ • श्लोक १०

चेष्टमानं शरीरं स्वं पश्यत्यन्यशरीरवत् ।
संस्तवे चापि निन्दायां कथं क्षुभ्येत् महाशयः ॥ ३-१०॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो अपने क्रियाशील शरीर को दूसरे के शरीर की तरह साक्षीभाव से देखता है, वह महात्मा स्तुति या निंदा से कैसे विचलित हो सकता है?

अध्याय ३ • श्लोक ११

मायामात्रमिदं विश्वं पश्यन् विगतकौतुकः ।
अपि सन्निहिते मृत्यौ कथं त्रस्यति धीरधीः ॥ ३-११॥

सरल हिंदी भावार्थ: इस विश्व को माया का प्रदर्शन जानकर जिसके आकर्षण शांत हो गए हैं, वह धीर पुरुष मृत्यु निकट होने पर भी कैसे भयभीत होगा?

अध्याय ३ • श्लोक १२

निःस्पृहं मानसं यस्य नैराश्येऽपि महात्मनः ।
तस्यात्मज्ञानतृप्तस्य तुलना केन जायते ॥ ३-१२॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिस महात्मा का मन अपेक्षारहित है और जो आत्मज्ञान में तृप्त है, उसकी तुलना किससे की जा सकती है?

अध्याय ३ • श्लोक १३

स्वभावाद् एव जानानो दृश्यमेतन्न किञ्चन ।
इदं ग्राह्यमिदं त्याज्यं स किं पश्यति धीरधीः ॥ ३-१३॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो सहज जानता है कि दृश्य जगत की अलग स्थायी सत्ता नहीं, वह धीर पुरुष “यह लेना है, यह छोड़ना है”—ऐसा आग्रह क्यों करेगा?

अध्याय ३ • श्लोक १४

अन्तस्त्यक्तकषायस्य निर्द्वन्द्वस्य निराशिषः ।
यदृच्छयागतो भोगो न दुःखाय न तुष्टये ॥ ३-१४॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिसके भीतर की वासनाएँ छूट गई हैं, जो द्वंद्व और आशा से मुक्त है, उसे संयोग से मिले भोग न दुःखी करते हैं, न विशेष रूप से उल्लसित।

भक्ति भावना • मूल संस्कृत पाठ एवं सरल हिंदी भावार्थ

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