श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 8: अक्षरब्रह्मयोग — सम्पूर्ण 28 श्लोक हिंदी अर्थ सहित
श्रीमद्भगवद्गीता
अध्याय ८ • अक्षरब्रह्मयोग
अर्जुन ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म और अन्तकाल के स्मरण के विषय में पूछते हैं। भगवान अक्षर परम तत्त्व, निरन्तर स्मरण, परम गति तथा सृष्टि के आविर्भाव और लय का रहस्य समझाते हैं।
श्लोक १–१०
अध्याय ८ • श्लोक १
अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते ॥८.१॥
सरल हिंदी अर्थ: अर्जुन ने पूछा—हे पुरुषोत्तम! ब्रह्म क्या है, अध्यात्म क्या है और कर्म क्या है? अधिभूत किसे कहते हैं और अधिदैव क्या है?
अध्याय ८ • श्लोक २
प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः ॥८.२॥
सरल हिंदी अर्थ: हे मधुसूदन! इस शरीर में अधियज्ञ कौन है और कैसे स्थित है? संयमित साधक अन्तकाल में आपको कैसे जानते हैं?
अध्याय ८ • श्लोक ३
अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते ।
भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः ॥८.३॥
सरल हिंदी अर्थ: श्रीभगवान ने कहा—परम अक्षर तत्त्व ब्रह्म है और जीव का अपना स्वरूप अध्यात्म कहलाता है। प्राणियों की उत्पत्ति कराने वाला विसर्जन कर्म कहलाता है।
अध्याय ८ • श्लोक ४
अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर ॥८.४॥
सरल हिंदी अर्थ: नाशवान भाव अधिभूत है और पुरुष अधिदैव है। हे देहधारियों में श्रेष्ठ! इस शरीर में अधियज्ञ मैं स्वयं हूँ।
अध्याय ८ • श्लोक ५
यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः ॥८.५॥
सरल हिंदी अर्थ: जो अन्तकाल में केवल मेरा स्मरण करते हुए शरीर छोड़ता है, वह मेरे भाव को प्राप्त होता है; इसमें संशय नहीं है।
अध्याय ८ • श्लोक ६
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः ॥८.६॥
सरल हिंदी अर्थ: हे कुन्तीपुत्र! मनुष्य अन्त में जिस भाव का स्मरण करते हुए शरीर छोड़ता है, निरन्तर उसी भाव का अभ्यास होने के कारण उसी को प्राप्त होता है।
अध्याय ८ • श्लोक ७
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयः ॥८.७॥
सरल हिंदी अर्थ: इसलिए हर समय मेरा स्मरण करो और अपना कर्तव्यरूप युद्ध भी करो। मन और बुद्धि मुझे अर्पित करके तुम निःसंदेह मुझे ही पाओगे।
अध्याय ८ • श्लोक ८
परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन् ॥८.८॥
सरल हिंदी अर्थ: हे पार्थ! अभ्यासयोग से युक्त और अन्य विषयों में न भटकने वाले चित्त से परम दिव्य पुरुष का चिन्तन करने वाला उसे प्राप्त होता है।
अध्याय ८ • श्लोक ९
मणोरणीयंसमनुस्मरेद्यः ।
सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूप-
मादित्यवर्णं तमसः परस्तात् ॥८.९॥
सरल हिंदी अर्थ: जो सर्वज्ञ, पुरातन, सबके नियन्ता, सूक्ष्म से भी सूक्ष्म, सबके धारणकर्ता, अचिन्त्य स्वरूप और अन्धकार से परे सूर्य के समान प्रकाशमान परम पुरुष का स्मरण करता है—
अध्याय ८ • श्लोक १०
भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव ।
भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक्
स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥८.१०॥
सरल हिंदी अर्थ: वह अन्तकाल में अचल मन से, भक्ति और योगबल से युक्त होकर, भौंहों के बीच प्राण को स्थिर करते हुए उस परम दिव्य पुरुष को प्राप्त होता है।
श्लोक ११–२०
अध्याय ८ • श्लोक ११
विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः ।
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति
तत्ते पदं सङ्ग्रहेण प्रवक्ष्ये ॥८.११॥
सरल हिंदी अर्थ: वेद के ज्ञाता जिसे अक्षर कहते हैं, रागरहित यति जिसमें प्रवेश करते हैं और जिसकी प्राप्ति के लिए साधक ब्रह्मचर्य रखते हैं, वह पद संक्षेप में बताऊँगा।
अध्याय ८ • श्लोक १२
मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम् ॥८.१२॥
सरल हिंदी अर्थ: सभी इन्द्रिय-द्वारों को संयमित करके, मन को हृदय में रोककर और प्राण को मस्तक में स्थापित करते हुए योगधारणा में स्थित हो—
अध्याय ८ • श्लोक १३
यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम् ॥८.१३॥
सरल हिंदी अर्थ: जो ॐ इस एकाक्षर ब्रह्म का उच्चारण करते हुए मेरा स्मरण करता है और शरीर छोड़ता है, वह परम गति को प्राप्त होता है।
अध्याय ८ • श्लोक १४
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः ॥८.१४॥
सरल हिंदी अर्थ: हे पार्थ! जो अनन्य चित्त से निरन्तर मेरा स्मरण करता है, उस सदा युक्त योगी के लिए मैं सहज उपलब्ध हूँ।
अध्याय ८ • श्लोक १५
नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः ॥८.१५॥
सरल हिंदी अर्थ: परम सिद्धि प्राप्त महात्मा मुझे पाकर दुःखों के स्थान और अनित्य संसार में फिर जन्म नहीं लेते।
अध्याय ८ • श्लोक १६
मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते ॥८.१६॥
सरल हिंदी अर्थ: हे अर्जुन! ब्रह्मलोक तक के सभी लोक पुनरावृत्ति वाले हैं; पर हे कुन्तीपुत्र! मुझे प्राप्त होने के बाद पुनर्जन्म नहीं होता।
अध्याय ८ • श्लोक १७
रात्रिं युगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जनाः ॥८.१७॥
सरल हिंदी अर्थ: जो लोग ब्रह्मा के एक दिन को हजार युग और उनकी एक रात्रि को भी हजार युग के बराबर जानते हैं, वे उस विराट दिन-रात्रि का स्वरूप जानते हैं।
अध्याय ८ • श्लोक १८
रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके ॥८.१८॥
सरल हिंदी अर्थ: ब्रह्मा का दिन आरम्भ होने पर सभी प्रकट रूप अव्यक्त से उत्पन्न होते हैं और रात्रि आने पर उसी अव्यक्त में लीन हो जाते हैं।
अध्याय ८ • श्लोक १९
रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे ॥८.१९॥
सरल हिंदी अर्थ: हे पार्थ! यही प्राणिसमूह बार-बार उत्पन्न होकर रात्रि में विवश होकर लीन होता है और दिन आने पर फिर प्रकट होता है।
अध्याय ८ • श्लोक २०
यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति ॥८.२०॥
सरल हिंदी अर्थ: पर उस अव्यक्त प्रकृति से भी परे एक दूसरा सनातन अव्यक्त तत्त्व है, जो सभी प्राणियों के नष्ट होने पर भी नष्ट नहीं होता।
श्लोक २१–२८
अध्याय ८ • श्लोक २१
यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥८.२१॥
सरल हिंदी अर्थ: उस अव्यक्त को अक्षर और परम गति कहते हैं। जिसे पाकर लौटना नहीं पड़ता, वही मेरा परम धाम है।
अध्याय ८ • श्लोक २२
यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम् ॥८.२२॥
सरल हिंदी अर्थ: हे पार्थ! वह परम पुरुष अनन्य भक्ति से प्राप्त होता है, जिसके भीतर सभी प्राणी स्थित हैं और जिससे यह सम्पूर्ण जगत व्याप्त है।
अध्याय ८ • श्लोक २३
प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ ॥८.२३॥
सरल हिंदी अर्थ: हे भरतश्रेष्ठ! अब मैं वे मार्ग बताऊँगा जिनसे प्रयाण करने वाले योगियों को पुनरावृत्ति या पुनरावृत्ति से मुक्ति प्राप्त होती है।
अध्याय ८ • श्लोक २४
तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः ॥८.२४॥
सरल हिंदी अर्थ: अग्नि, ज्योति, दिन, शुक्लपक्ष और उत्तरायण के छह महीनों से सम्बद्ध प्रकाशमार्ग से प्रयाण करने वाले ब्रह्मज्ञानी ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।
अध्याय ८ • श्लोक २५
तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते ॥८.२५॥
सरल हिंदी अर्थ: धूम, रात्रि, कृष्णपक्ष और दक्षिणायन के छह महीनों से सम्बद्ध मार्ग से जाने वाला साधक चन्द्रलोक की ज्योति प्राप्त करके लौटता है।
अध्याय ८ • श्लोक २६
एकया यात्यनावृत्तिमन्ययावर्तते पुनः ॥८.२६॥
सरल हिंदी अर्थ: प्रकाश और अन्धकार के ये दो मार्ग जगत के सनातन मार्ग माने गए हैं। एक से लौटना नहीं होता, दूसरे से फिर लौटना पड़ता है।
अध्याय ८ • श्लोक २७
तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन ॥८.२७॥
सरल हिंदी अर्थ: हे पार्थ! इन दोनों मार्गों को जानकर कोई योगी मोहित नहीं होता। इसलिए हे अर्जुन! हर समय योगयुक्त रहो।
अध्याय ८ • श्लोक २८
दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम् ।
अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा
योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम् ॥८.२८॥
सरल हिंदी अर्थ: वेदाध्ययन, यज्ञ, तप और दान में जो पुण्यफल बताया गया है, योगी इस तत्त्व को जानकर उससे ऊपर उठता है और परम आद्य स्थान पाता है।
अध्याय का सार
- जीवनभर का चिन्तन अन्तकाल के स्मरण को दिशा देता है।
- भगवान का निरन्तर स्मरण करते हुए कर्तव्य निभाएँ।
- परम गति सृष्टि के आवागमन से परे है।
॥ अक्षरब्रह्मयोग — अध्याय ८ सम्पूर्ण ॥
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