श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 7: ज्ञानविज्ञानयोग — सम्पूर्ण 30 श्लोक हिंदी अर्थ सहित
श्रीमद्भगवद्गीता
अध्याय ७ • ज्ञानविज्ञानयोग
भगवान इस अध्याय में अपनी प्रकृति, जगत के आधार और अपने सर्वव्यापी स्वरूप को बताते हैं। माया, भक्तों के भेद और ज्ञानयुक्त भक्ति का विवेचन ज्ञान तथा उसके अनुभव को जोड़ता है।
श्लोक १–१०
अध्याय ७ • श्लोक १
मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः ।
असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु ॥७.१॥
सरल हिंदी अर्थ: श्रीभगवान ने कहा—हे पार्थ! मुझमें मन लगाकर, मेरा आश्रय लेकर योगाभ्यास करते हुए तुम मुझे संशयरहित और समग्र रूप से कैसे जानोगे, यह सुनो।
अध्याय ७ • श्लोक २
यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते ॥७.२॥
सरल हिंदी अर्थ: मैं तुम्हें अनुभव सहित यह ज्ञान पूरी तरह बताऊँगा, जिसे जान लेने पर इस विषय में और कुछ जानना शेष नहीं रहेगा।
अध्याय ७ • श्लोक ३
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः ॥७.३॥
सरल हिंदी अर्थ: हजारों मनुष्यों में कोई एक सिद्धि के लिए प्रयत्न करता है। प्रयत्नशील सिद्धों में भी कोई एक मुझे तत्त्व से जानता है।
अध्याय ७ • श्लोक ४
अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥७.४॥
सरल हिंदी अर्थ: पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार—यह मेरी आठ भागों में विभक्त प्रकृति है।
अध्याय ७ • श्लोक ५
जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् ॥७.५॥
सरल हिंदी अर्थ: यह मेरी अपरा प्रकृति है। हे महाबाहु! इससे अलग मेरी परा प्रकृति को जानो, जो जीवस्वरूप होकर इस जगत को धारण करती है।
अध्याय ७ • श्लोक ६
अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा ॥७.६॥
सरल हिंदी अर्थ: समझो कि सभी प्राणी इन दोनों प्रकृतियों से उत्पन्न हैं। मैं सम्पूर्ण जगत की उत्पत्ति और लय का मूल हूँ।
अध्याय ७ • श्लोक ७
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव ॥७.७॥
सरल हिंदी अर्थ: हे धनञ्जय! मुझसे बढ़कर दूसरा कोई आधार नहीं है। यह सब मुझमें ऐसे पिरोया है जैसे धागे में मणियाँ।
अध्याय ७ • श्लोक ८
प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु ॥७.८॥
सरल हिंदी अर्थ: हे कुन्तीपुत्र! मैं जल का रस, सूर्य और चन्द्रमा का प्रकाश, सभी वेदों में ॐ, आकाश में शब्द और मनुष्यों में पुरुषार्थ हूँ।
अध्याय ७ • श्लोक ९
जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु ॥७.९॥
सरल हिंदी अर्थ: मैं पृथ्वी की पवित्र सुगन्ध, अग्नि का तेज, सभी प्राणियों का जीवन और तपस्वियों का तप हूँ।
अध्याय ७ • श्लोक १०
बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् ॥७.१०॥
सरल हिंदी अर्थ: हे पार्थ! मुझे सभी प्राणियों का सनातन बीज जानो। मैं बुद्धिमानों की बुद्धि और तेजस्वियों का तेज हूँ।
श्लोक ११–२०
अध्याय ७ • श्लोक ११
धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ ॥७.११॥
सरल हिंदी अर्थ: मैं बलवानों का कामना और आसक्ति से रहित बल हूँ। हे भरतश्रेष्ठ! प्राणियों में धर्म के विरुद्ध न होने वाली कामना भी मैं हूँ।
अध्याय ७ • श्लोक १२
मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि ॥७.१२॥
सरल हिंदी अर्थ: सात्त्विक, राजस और तामस सभी भाव मुझसे ही उत्पन्न होते हैं। वे मुझ पर आश्रित हैं, पर मैं उन पर आश्रित नहीं हूँ।
अध्याय ७ • श्लोक १३
मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम् ॥७.१३॥
सरल हिंदी अर्थ: इन तीन गुणों से बने भावों से मोहित यह सारा जगत मुझ अविनाशी और इनसे परे परम तत्त्व को नहीं जानता।
अध्याय ७ • श्लोक १४
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ॥७.१४॥
सरल हिंदी अर्थ: मेरी यह तीन गुणों वाली दैवी माया कठिनाई से पार होती है। जो केवल मेरी शरण लेते हैं, वे इस माया को पार कर जाते हैं।
अध्याय ७ • श्लोक १५
माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः ॥७.१५॥
सरल हिंदी अर्थ: दुष्कर्म में लगे, विवेकहीन और आसुरी प्रवृत्ति वाले लोग मेरी शरण नहीं आते; माया ने उनके ज्ञान को ढक रखा है।
अध्याय ७ • श्लोक १६
आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ ॥७.१६॥
सरल हिंदी अर्थ: हे अर्जुन! चार प्रकार के पुण्यकर्मी लोग मुझे भजते हैं—दुःखी, जानने के इच्छुक, धन या अन्य लाभ चाहने वाले और ज्ञानी।
अध्याय ७ • श्लोक १७
प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः ॥७.१७॥
सरल हिंदी अर्थ: इनमें सदा मुझमें स्थित और अनन्य भक्ति वाला ज्ञानी श्रेष्ठ है। मैं उसे अत्यन्त प्रिय हूँ और वह मुझे प्रिय है।
अध्याय ७ • श्लोक १८
आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम् ॥७.१८॥
सरल हिंदी अर्थ: ये सभी भक्त उदार और श्रेष्ठ हैं, पर ज्ञानी मुझे अपने ही स्वरूप के समान प्रिय है, क्योंकि वह युक्त होकर मुझे ही सर्वोत्तम गति मानता है।
अध्याय ७ • श्लोक १९
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः ॥७.१९॥
सरल हिंदी अर्थ: अनेक जन्मों के बाद ज्ञानवान “सब कुछ वासुदेव ही हैं” यह जानकर मेरी शरण लेता है। ऐसा महात्मा अत्यन्त दुर्लभ है।
अध्याय ७ • श्लोक २०
तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया ॥७.२०॥
सरल हिंदी अर्थ: अनेक कामनाओं से जिनका विवेक खिंच गया है, वे अपने स्वभाव के अनुसार अलग-अलग नियम अपनाकर अन्य देवताओं की शरण लेते हैं।
श्लोक २१–३०
अध्याय ७ • श्लोक २१
तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम् ॥७.२१॥
सरल हिंदी अर्थ: जो भक्त जिस देवस्वरूप की श्रद्धा से आराधना करना चाहता है, मैं उसकी उसी श्रद्धा को स्थिर करता हूँ।
अध्याय ७ • श्लोक २२
लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान् ॥७.२२॥
सरल हिंदी अर्थ: उस श्रद्धा से युक्त होकर वह उस देवता की आराधना करता है और इच्छित फल पाता है; उन फलों का विधान वास्तव में मैं ही करता हूँ।
अध्याय ७ • श्लोक २३
देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि ॥७.२३॥
सरल हिंदी अर्थ: परन्तु सीमित दृष्टि वाले ऐसे उपासकों का फल नाशवान होता है। देवताओं के उपासक देवताओं को पाते हैं और मेरे भक्त मुझे पाते हैं।
अध्याय ७ • श्लोक २४
परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम् ॥७.२४॥
सरल हिंदी अर्थ: मेरे अविनाशी और सर्वोत्तम स्वरूप को न जानने वाले अल्पबुद्धि लोग मुझे पहले अप्रकट और अब व्यक्ति के रूप में उत्पन्न हुआ मानते हैं।
अध्याय ७ • श्लोक २५
मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम् ॥७.२५॥
सरल हिंदी अर्थ: योगमाया से आवृत रहने के कारण मैं सबके लिए प्रकट नहीं हूँ। यह मोहित संसार मुझे अजन्मा और अविनाशी नहीं जानता।
अध्याय ७ • श्लोक २६
भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन ॥७.२६॥
सरल हिंदी अर्थ: हे अर्जुन! मैं भूतकाल, वर्तमान और भविष्य के सभी प्राणियों को जानता हूँ, पर मुझे समग्र रूप से कोई नहीं जानता।
अध्याय ७ • श्लोक २७
सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परन्तप ॥७.२७॥
सरल हिंदी अर्थ: हे भारत! इच्छा और द्वेष से उत्पन्न द्वन्द्व के मोह के कारण सभी प्राणी जन्म लेते ही भ्रमित हो जाते हैं।
अध्याय ७ • श्लोक २८
ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः ॥७.२८॥
सरल हिंदी अर्थ: परन्तु जिन पुण्यकर्म करने वालों के पाप क्षीण हो गए हैं, वे द्वन्द्व के मोह से मुक्त होकर दृढ़ निश्चय से मुझे भजते हैं।
अध्याय ७ • श्लोक २९
ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम् ॥७.२९॥
सरल हिंदी अर्थ: जो जरा और मृत्यु से मुक्ति के लिए मेरा आश्रय लेकर प्रयत्न करते हैं, वे ब्रह्म, सम्पूर्ण अध्यात्म और समस्त कर्म का तत्त्व जानते हैं।
अध्याय ७ • श्लोक ३०
प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः ॥७.३०॥
सरल हिंदी अर्थ: जो मुझे अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ सहित जानते हैं, वे युक्तचित्त होकर अन्तकाल में भी मुझे जानते और स्मरण करते हैं।
अध्याय का सार
- जगत का आधार परमात्मा है।
- गुणमयी माया से पार होने के लिए ईश्वराश्रय आवश्यक है।
- ज्ञानयुक्त अनन्य भक्ति भगवान की ओर ले जाती है।
॥ ज्ञानविज्ञानयोग — अध्याय ७ सम्पूर्ण ॥
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