श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 6: आत्मसंयमयोग — सम्पूर्ण 47 श्लोक हिंदी अर्थ सहित
श्रीमद्भगवद्गीता
अध्याय ६ • आत्मसंयमयोग
इस अध्याय में मन के संयम, ध्यान की विधि, संतुलित आहार-विहार और अभ्यास-वैराग्य का महत्त्व बताया गया है। अर्जुन चंचल मन तथा अधूरी रह गई साधना के विषय में प्रश्न करते हैं और भगवान उनका समाधान करते हैं।
श्लोक १–१०
अध्याय ६ • श्लोक १
अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः ।
स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः ॥६.१॥
सरल हिंदी अर्थ: श्रीभगवान ने कहा—जो कर्मफल का आश्रय न लेकर अपना कर्तव्य करता है, वही संन्यासी और योगी है; केवल अग्नि या क्रियाएँ छोड़ देने वाला नहीं।
अध्याय ६ • श्लोक २
न ह्यसंन्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन ॥६.२॥
सरल हिंदी अर्थ: हे पाण्डव! जिसे संन्यास कहते हैं, उसे ही योग जानो। फल की इच्छा वाले संकल्पों का त्याग किए बिना कोई योगी नहीं होता।
अध्याय ६ • श्लोक ३
योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते ॥६.३॥
सरल हिंदी अर्थ: योग में आगे बढ़ने के इच्छुक मुनि के लिए कर्म साधन है; योग में स्थित हो चुके साधक के लिए मन की शान्ति साधन है।
अध्याय ६ • श्लोक ४
सर्वसङ्कल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते ॥६.४॥
सरल हिंदी अर्थ: जब मनुष्य इन्द्रिय-विषयों और कर्मों में आसक्त नहीं होता तथा सभी कामनापूर्ण संकल्प छोड़ देता है, तब वह योगारूढ़ कहलाता है।
अध्याय ६ • श्लोक ५
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥६.५॥
सरल हिंदी अर्थ: अपने द्वारा अपना उद्धार करे, स्वयं को नीचे न गिराए। मनुष्य स्वयं अपना मित्र है और स्वयं अपना शत्रु भी।
अध्याय ६ • श्लोक ६
अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत् ॥६.६॥
सरल हिंदी अर्थ: जिसने अपने मन को वश में कर लिया है, उसका मन मित्र है। जिसका मन असंयमित है, वही मन उसके साथ शत्रु के समान व्यवहार करता है।
अध्याय ६ • श्लोक ७
शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः ॥६.७॥
सरल हिंदी अर्थ: मन को जीत चुके शान्त साधक के लिए सर्दी-गर्मी, सुख-दुःख और मान-अपमान में परमात्मा का अनुभव स्थिर रहता है।
अध्याय ६ • श्लोक ८
युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनः ॥६.८॥
सरल हिंदी अर्थ: ज्ञान और अनुभूति से तृप्त, निर्विकार और इन्द्रियों को जीत चुका योगी मिट्टी, पत्थर तथा सोने को समान दृष्टि से देखता है।
अध्याय ६ • श्लोक ९
साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते ॥६.९॥
सरल हिंदी अर्थ: सुहृद, मित्र, शत्रु, उदासीन, मध्यस्थ, द्वेष करने वाले, सम्बन्धी, सज्जन और पापी—सबके प्रति समबुद्धि वाला श्रेष्ठ है।
अध्याय ६ • श्लोक १०
एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः ॥६.१०॥
सरल हिंदी अर्थ: योगी एकान्त में अकेला रहकर, मन और शरीर संयमित करके, आशा और संग्रह का मोह छोड़कर निरन्तर ध्यान का अभ्यास करे।
श्लोक ११–२०
अध्याय ६ • श्लोक ११
नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम् ॥६.११॥
सरल हिंदी अर्थ: शुद्ध स्थान में अपना स्थिर आसन लगाए, जो न अधिक ऊँचा हो न अधिक नीचा; उस पर कुश, मृगचर्म और वस्त्र क्रम से बिछे हों।
अध्याय ६ • श्लोक १२
उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये ॥६.१२॥
सरल हिंदी अर्थ: उस आसन पर बैठकर मन को एकाग्र करे और चित्त तथा इन्द्रियों की क्रियाएँ संयमित करके अन्तःकरण की शुद्धि के लिए योगाभ्यास करे।
अध्याय ६ • श्लोक १३
सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन् ॥६.१३॥
सरल हिंदी अर्थ: शरीर, सिर और गर्दन को एक सीध में स्थिर रखे; दृष्टि नासिका के अग्रभाग पर रखकर इधर-उधर न देखे।
अध्याय ६ • श्लोक १४
मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः ॥६.१४॥
सरल हिंदी अर्थ: मन शान्त हो, भय न रहे और ब्रह्मचर्य के व्रत में स्थित होकर, मन को संयमित करते हुए मुझमें चित्त लगाकर मुझे परम लक्ष्य बनाए।
अध्याय ६ • श्लोक १५
शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति ॥६.१५॥
सरल हिंदी अर्थ: इस प्रकार सदा अभ्यास करने वाला संयमित मन का योगी मुझमें स्थित, निर्वाण तक पहुँचाने वाली परम शान्ति प्राप्त करता है।
अध्याय ६ • श्लोक १६
न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन ॥६.१६॥
सरल हिंदी अर्थ: हे अर्जुन! बहुत अधिक खाने वाले, बिल्कुल न खाने वाले, बहुत सोने वाले या सदा जागते रहने वाले के लिए योग सिद्ध नहीं होता।
अध्याय ६ • श्लोक १७
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥६.१७॥
सरल हिंदी अर्थ: आहार-विहार, कर्मों की चेष्टा तथा सोने-जागने में संतुलन रखने वाले का योग दुःखों का नाश करता है।
अध्याय ६ • श्लोक १८
निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा ॥६.१८॥
सरल हिंदी अर्थ: जब पूर्ण संयमित चित्त आत्मा में ही स्थिर रहता है और सभी कामनाओं की लालसा मिट जाती है, तब साधक योगयुक्त कहलाता है।
अध्याय ६ • श्लोक १९
योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः ॥६.१९॥
सरल हिंदी अर्थ: वायुरहित स्थान में दीपक की लौ जैसे नहीं डोलती, उसी की उपमा आत्मध्यान में लगे संयमित चित्त वाले योगी के लिए दी गई है।
अध्याय ६ • श्लोक २०
यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति ॥६.२०॥
सरल हिंदी अर्थ: जिस अवस्था में योगाभ्यास से संयमित चित्त शान्त होता है और साधक अपने द्वारा अपने आत्मस्वरूप को देखकर उसी में सन्तुष्ट होता है—
श्लोक २१–३०
अध्याय ६ • श्लोक २१
वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः ॥६.२१॥
सरल हिंदी अर्थ: जहाँ वह इन्द्रियों से परे, बुद्धि से अनुभव योग्य परम सुख को जानता है और उसमें स्थित होकर सत्य से विचलित नहीं होता—
अध्याय ६ • श्लोक २२
यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते ॥६.२२॥
सरल हिंदी अर्थ: जिसे पाकर वह किसी दूसरे लाभ को उससे अधिक नहीं मानता और जिसमें स्थित होकर बड़े दुःख से भी विचलित नहीं होता—
अध्याय ६ • श्लोक २३
स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा ॥६.२३॥
सरल हिंदी अर्थ: दुःख के संयोग से उस वियोग को योग जानो। इस योग का अभ्यास दृढ़ निश्चय से, निराश हुए बिना करना चाहिए।
अध्याय ६ • श्लोक २४
मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः ॥६.२४॥
सरल हिंदी अर्थ: संकल्पों से उत्पन्न सभी कामनाओं को पूरी तरह छोड़कर और मन से इन्द्रियों के समूह को सब ओर से संयमित करके—
अध्याय ६ • श्लोक २५
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत् ॥६.२५॥
सरल हिंदी अर्थ: धैर्ययुक्त बुद्धि से धीरे-धीरे शान्त हो। मन को आत्मा में स्थिर करके अन्य किसी विषय का चिन्तन न करे।
अध्याय ६ • श्लोक २६
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥६.२६॥
सरल हिंदी अर्थ: यह चंचल और अस्थिर मन जहाँ-जहाँ भटके, वहाँ-वहाँ से रोककर उसे आत्मा में ही स्थिर करे।
अध्याय ६ • श्लोक २७
उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम् ॥६.२७॥
सरल हिंदी अर्थ: शान्त मन वाले, रजोगुण का वेग शान्त कर चुके, कलुषरहित और ब्रह्मभाव में स्थित योगी को उत्तम सुख प्राप्त होता है।
अध्याय ६ • श्लोक २८
सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते ॥६.२८॥
सरल हिंदी अर्थ: इस प्रकार निरन्तर अभ्यास करने वाला पापमल से मुक्त योगी सहज ही ब्रह्म के सम्पर्क का अनन्त सुख पाता है।
अध्याय ६ • श्लोक २९
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ॥६.२९॥
सरल हिंदी अर्थ: योगयुक्त और सर्वत्र समदृष्टि वाला साधक अपने आत्मा को सब प्राणियों में और सब प्राणियों को अपने आत्मा में देखता है।
अध्याय ६ • श्लोक ३०
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥६.३०॥
सरल हिंदी अर्थ: जो मुझे सबमें और सबको मुझमें देखता है, उसके लिए मैं कभी अदृश्य नहीं होता और वह मुझसे कभी दूर नहीं होता।
श्लोक ३१–४०
अध्याय ६ • श्लोक ३१
सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते ॥६.३१॥
सरल हिंदी अर्थ: जो एकत्वभाव में स्थित होकर सभी प्राणियों में रहने वाले मुझे भजता है, वह योगी सभी अवस्थाओं में मुझमें ही रहता है।
अध्याय ६ • श्लोक ३२
सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः ॥६.३२॥
सरल हिंदी अर्थ: हे अर्जुन! जो अपने समान सबके सुख-दुःख को समान दृष्टि से देखता है, वह मेरे मत में परम योगी है।
अध्याय ६ • श्लोक ३३
एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात्स्थितिं स्थिराम् ॥६.३३॥
सरल हिंदी अर्थ: अर्जुन ने कहा—हे मधुसूदन! आपने समभाव का जो योग बताया है, मन की चंचलता के कारण उसकी स्थिर स्थिति मुझे सम्भव नहीं दिखती।
अध्याय ६ • श्लोक ३४
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ॥६.३४॥
सरल हिंदी अर्थ: हे कृष्ण! मन बहुत चंचल, मथने वाला, बलवान और हठी है। इसे रोकना मुझे वायु को रोकने के समान अत्यन्त कठिन लगता है।
अध्याय ६ • श्लोक ३५
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् ।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥६.३५॥
सरल हिंदी अर्थ: श्रीभगवान ने कहा—हे महाबाहु! निश्चय ही मन चंचल है और कठिनाई से वश में आता है; पर अभ्यास और वैराग्य से इसे संयमित किया जा सकता है।
अध्याय ६ • श्लोक ३६
वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः ॥६.३६॥
सरल हिंदी अर्थ: असंयमित मन वाले के लिए योग कठिन है, यह मेरा मत है; पर मन को वश में करके उचित उपाय से प्रयत्न करने वाला इसे प्राप्त कर सकता है।
अध्याय ६ • श्लोक ३७
अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति ॥६.३७॥
सरल हिंदी अर्थ: अर्जुन ने पूछा—हे कृष्ण! जो श्रद्धावान होते हुए भी पर्याप्त संयम न रख सके और जिसका मन योग से हट जाए, वह योगसिद्धि पाए बिना किस गति को जाता है?
अध्याय ६ • श्लोक ३८
अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि ॥६.३८॥
सरल हिंदी अर्थ: हे महाबाहु! क्या ब्रह्म के मार्ग में भ्रमित और आश्रयहीन वह व्यक्ति दोनों ओर से चूककर छिन्न बादल की तरह नष्ट हो जाता है?
अध्याय ६ • श्लोक ३९
त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते ॥६.३९॥
सरल हिंदी अर्थ: हे कृष्ण! आप मेरे इस संशय को पूरी तरह दूर कीजिए। आपके अतिरिक्त कोई इसे दूर कर सके, ऐसा मुझे नहीं दिखता।
अध्याय ६ • श्लोक ४०
पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते ।
न हि कल्याणकृत्कश्चिद् दुर्गतिं तात गच्छति ॥६.४०॥
सरल हिंदी अर्थ: श्रीभगवान ने कहा—हे पार्थ! उसका न इस लोक में न परलोक में विनाश होता है। प्रिय अर्जुन! कल्याणकारी प्रयत्न करने वाला कभी दुर्गति को नहीं जाता।
श्लोक ४१–४७
अध्याय ६ • श्लोक ४१
शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते ॥६.४१॥
सरल हिंदी अर्थ: योग से विचलित साधक पुण्यात्माओं के लोकों को पाकर वहाँ बहुत समय तक रहता है और फिर पवित्र, समृद्ध परिवार में जन्म लेता है।
अध्याय ६ • श्लोक ४२
एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम् ॥६.४२॥
सरल हिंदी अर्थ: अथवा वह बुद्धिमान योगियों के ही परिवार में जन्म लेता है। ऐसा जन्म संसार में और भी दुर्लभ है।
अध्याय ६ • श्लोक ४३
यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन ॥६.४३॥
सरल हिंदी अर्थ: हे कुरुनन्दन! वहाँ उसे पूर्वजन्म की साधना से प्राप्त बुद्धि का सम्बन्ध मिलता है और वह फिर सिद्धि के लिए पहले से अधिक प्रयत्न करता है।
अध्याय ६ • श्लोक ४४
जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते ॥६.४४॥
सरल हिंदी अर्थ: अपने पहले के अभ्यास से वह अनायास ही साधना की ओर खिंचता है। योग का जिज्ञासु भी वेदों के फलपरक कर्मकाण्ड से ऊपर उठने लगता है।
अध्याय ६ • श्लोक ४५
अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम् ॥६.४५॥
सरल हिंदी अर्थ: प्रयत्नपूर्वक अभ्यास करने वाला योगी पापों से शुद्ध होता है और अनेक जन्मों की साधना से पूर्ण होकर परम गति प्राप्त करता है।
अध्याय ६ • श्लोक ४६
कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन ॥६.४६॥
सरल हिंदी अर्थ: योगी तपस्वियों से श्रेष्ठ, केवल शास्त्रज्ञान रखने वालों से श्रेष्ठ और सकाम कर्म करने वालों से श्रेष्ठ माना गया है। इसलिए हे अर्जुन! योगी बनो।
अध्याय ६ • श्लोक ४७
श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः ॥६.४७॥
सरल हिंदी अर्थ: सभी योगियों में भी जो भीतर से मुझमें चित्त लगाकर श्रद्धा से मुझे भजता है, वह मेरे मत में सबसे अधिक योगयुक्त है।
अध्याय का सार
- मन स्वयं का मित्र भी बन सकता है और शत्रु भी।
- संतुलित जीवन, अभ्यास और वैराग्य ध्यान के आधार हैं।
- कल्याण के लिए किया गया प्रयत्न व्यर्थ नहीं जाता।
॥ आत्मसंयमयोग — अध्याय ६ सम्पूर्ण ॥
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