श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 16: दैवासुरसम्पद्विभागयोग — सम्पूर्ण 24 श्लोक हिंदी अर्थ सहित

भक्ति भावना • श्रीमद्भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता

अध्याय १६ • दैवासुरसम्पद्विभागयोग

सम्पूर्ण २४ श्लोक • मूल संस्कृत पाठ एवं सरल हिंदी अर्थ

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दैवी और आसुरी प्रवृत्तियों का अंतर इस अध्याय में बताया गया है। अभय, शुद्धता और करुणा की तुलना दम्भ, क्रोध और अज्ञान से करते हुए भगवान उचित आचरण के लिए शास्त्रविवेक का मार्ग देते हैं।

श्लोक १–१०

अध्याय १६ • श्लोक १

श्रीभगवानुवाच ।
अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः ।
दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम् ॥१६.१॥

सरल हिंदी अर्थ: श्रीभगवान ने कहा—निर्भयता, अन्तःकरण की शुद्धि, ज्ञानयोग में निष्ठा, दान, इन्द्रिय-संयम, यज्ञ, स्वाध्याय, तप और सरलता—

अध्याय १६ • श्लोक २

अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम् ।
दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम् ॥१६.२॥

सरल हिंदी अर्थ: अहिंसा, सत्य, क्रोध का अभाव, त्याग, शान्ति, चुगली न करना, प्राणियों पर दया, लोभरहित होना, कोमलता, लज्जा और चंचलता का अभाव—

अध्याय १६ • श्लोक ३

तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता ।
भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत ॥१६.३॥

सरल हिंदी अर्थ: तेज, क्षमा, धैर्य, शुद्धता, द्रोह न करना और अत्यधिक मान की इच्छा न रखना—हे भारत! ये दैवी सम्पत्ति के साथ जन्मे व्यक्ति के गुण हैं।

अध्याय १६ • श्लोक ४

दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च ।
अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम् ॥१६.४॥

सरल हिंदी अर्थ: हे पार्थ! दम्भ, घमण्ड, अभिमान, क्रोध, कठोरता और अज्ञान आसुरी सम्पत्ति वाले व्यक्ति के गुण हैं।

अध्याय १६ • श्लोक ५

दैवी सम्पद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता ।
मा शुचः सम्पदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव ॥१६.५॥

सरल हिंदी अर्थ: दैवी सम्पत्ति मुक्ति देने वाली और आसुरी सम्पत्ति बन्धन देने वाली मानी गई है। हे पाण्डव! शोक मत करो; तुम दैवी सम्पत्ति के साथ जन्मे हो।

अध्याय १६ • श्लोक ६

द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन्दैव आसुर एव च ।
दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ मे शृणु ॥१६.६॥

सरल हिंदी अर्थ: हे पार्थ! इस संसार में प्राणियों की दो प्रमुख प्रवृत्तियाँ हैं—दैवी और आसुरी। दैवी का विस्तार से वर्णन किया; अब आसुरी को सुनो।

अध्याय १६ • श्लोक ७

प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः ।
न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते ॥१६.७॥

सरल हिंदी अर्थ: आसुरी प्रवृत्ति वाले लोग करने योग्य और छोड़ने योग्य कर्मों को नहीं जानते। उनमें न शुद्धता, न सदाचार और न सत्य होता है।

अध्याय १६ • श्लोक ८

असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् ।
अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम् ॥१६.८॥

सरल हिंदी अर्थ: वे कहते हैं—जगत सत्य और नैतिक आधार से रहित है, इसका कोई ईश्वर नहीं; यह केवल स्त्री-पुरुष के संयोग और कामना से उत्पन्न है, अन्य कुछ नहीं।

अध्याय १६ • श्लोक ९

एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः ।
प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः ॥१६.९॥

सरल हिंदी अर्थ: ऐसी दृष्टि का आश्रय लेकर आत्मकल्याण खो चुके अल्पबुद्धि लोग उग्र कर्म करते हैं और जगत के अहित तथा विनाश का कारण बनते हैं।

अध्याय १६ • श्लोक १०

काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः ।
मोहाद्गृहीत्वासद्ग्राहान्प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रताः ॥१६.१०॥

सरल हिंदी अर्थ: कभी न भरने वाली कामनाओं पर निर्भर, दम्भ-मान-मद से भरे ये लोग मोह से गलत धारणाएँ पकड़कर अशुद्ध आचरण में प्रवृत्त रहते हैं।

श्लोक ११–२०

अध्याय १६ • श्लोक ११

चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः ।
कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिताः ॥१६.११॥

सरल हिंदी अर्थ: वे मृत्यु तक रहने वाली असीम चिन्ताओं में पड़े रहते हैं। कामभोग को ही सर्वोपरि मानकर निश्चय करते हैं कि बस इतना ही जीवन का सार है।

अध्याय १६ • श्लोक १२

आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः ।
ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसञ्चयान् ॥१६.१२॥

सरल हिंदी अर्थ: सैकड़ों आशाओं के पाशों से बँधे, काम और क्रोध में डूबे वे भोगों के लिए अन्यायपूर्वक धन जुटाने की चेष्टा करते हैं।

अध्याय १६ • श्लोक १३

इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम् ।
इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम् ॥१६.१३॥

सरल हिंदी अर्थ: वे सोचते हैं—आज मैंने यह पा लिया, अब यह मनोरथ पूरा करूँगा; इतना धन मेरे पास है, और भी धन आगे हो जाएगा।

अध्याय १६ • श्लोक १४

असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि ।
ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी ॥१६.१४॥

सरल हिंदी अर्थ: यह शत्रु मेरे द्वारा मारा गया, दूसरे भी मारूँगा। मैं स्वामी हूँ, भोग करने वाला, सफल, बलवान और सुखी हूँ।

अध्याय १६ • श्लोक १५

आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया ।
यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः ॥१६.१५॥

सरल हिंदी अर्थ: मैं धनवान और कुलीन हूँ; मेरे समान दूसरा कौन है? मैं यज्ञ करूँगा, दान दूँगा और मौज करूँगा—ऐसे विचारों से वे अज्ञान में मोहित रहते हैं।

अध्याय १६ • श्लोक १६

अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः ।
प्रसक्ताः कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौ ॥१६.१६॥

सरल हिंदी अर्थ: अनेक चिन्ताओं से भ्रमित, मोहजाल में घिरे और कामभोगों में आसक्त होकर वे अशुद्ध नरक में गिरते हैं।

अध्याय १६ • श्लोक १७

आत्मसम्भाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः ।
यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम् ॥१६.१७॥

सरल हिंदी अर्थ: अपने को बड़ा मानने वाले, हठी और धन-मान के मद से भरे वे दम्भ से, उचित विधि के बिना, केवल नाम के यज्ञ करते हैं।

अध्याय १६ • श्लोक १८

अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः ।
मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः ॥१६.१८॥

सरल हिंदी अर्थ: अहंकार, बल, घमण्ड, काम और क्रोध का आश्रय लेकर वे अपने और दूसरों के शरीर में स्थित मुझसे द्वेष करते हैं और दोष देखते हैं।

अध्याय १६ • श्लोक १९

तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान् ।
क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु ॥१६.१९॥

सरल हिंदी अर्थ: ऐसे द्वेषपूर्ण, क्रूर, अशुभ कर्म वाले अधम मनुष्यों को मैं संसार में बार-बार आसुरी योनियों में भेजता हूँ।

अध्याय १६ • श्लोक २०

आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि ।
मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम् ॥१६.२०॥

सरल हिंदी अर्थ: हे कुन्तीपुत्र! जन्म-जन्म में आसुरी योनियों को पाकर वे अज्ञानी मुझे प्राप्त किए बिना और भी अधम गति पाते हैं।

श्लोक २१–२४

अध्याय १६ • श्लोक २१

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः ।
कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत् ॥१६.२१॥

सरल हिंदी अर्थ: काम, क्रोध और लोभ—ये आत्मकल्याण का नाश करने वाले नरक के तीन द्वार हैं। इसलिए इन तीनों को छोड़ देना चाहिए।

अध्याय १६ • श्लोक २२

एतैर्विमुक्तः कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः ।
आचरत्यात्मनः श्रेयस्ततो याति परां गतिम् ॥१६.२२॥

सरल हिंदी अर्थ: हे कुन्तीपुत्र! इन अन्धकार के तीन द्वारों से मुक्त मनुष्य अपने कल्याण का आचरण करता है और परम गति पाता है।

अध्याय १६ • श्लोक २३

यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः ।
न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम् ॥१६.२३॥

सरल हिंदी अर्थ: जो शास्त्र की विधि छोड़कर अपनी कामनाओं के अनुसार आचरण करता है, वह न सिद्धि पाता है, न सुख और न परम गति।

अध्याय १६ • श्लोक २४

तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ ।
ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि ॥१६.२४॥

सरल हिंदी अर्थ: इसलिए कर्तव्य और अकर्तव्य के निर्णय में शास्त्र को प्रमाण मानो। शास्त्र की विधि को समझकर तुम्हें यहाँ उचित कर्म करना चाहिए।

अध्याय का सार

  1. दैवी गुण मुक्ति की ओर और आसुरी प्रवृत्तियाँ बन्धन की ओर ले जाती हैं।
  2. काम, क्रोध और लोभ आत्मकल्याण के विरोधी हैं।
  3. कर्तव्य-अकर्तव्य का निर्णय विवेक और शास्त्र से करें।
पाठ-संदर्भ: श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय १६, श्लोक १–२४। संस्कृत मूल पाठ के साथ हिंदी अर्थ स्वतंत्र सरल शब्दों में प्रस्तुत हैं।
भक्ति भावना • संस्थापक: बबलू प्रसाद द्विवेदी
श्रीकृष्णार्पणमस्तु

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