श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 15: पुरुषोत्तमयोग — सम्पूर्ण 20 श्लोक हिंदी अर्थ सहित

भक्ति भावना • श्रीमद्भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता

अध्याय १५ • पुरुषोत्तमयोग

सम्पूर्ण २० श्लोक • मूल संस्कृत पाठ एवं सरल हिंदी अर्थ

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उलटे अश्वत्थ वृक्ष के रूपक से संसार के बन्धन और वैराग्य का विवेचन होता है। भगवान जीव, परमात्मा तथा क्षर-अक्षर से परे पुरुषोत्तम के स्वरूप को स्पष्ट करते हैं।

श्लोक १–१०

अध्याय १५ • श्लोक १

श्रीभगवानुवाच ।
ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् ।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥१५.१॥

सरल हिंदी अर्थ: श्रीभगवान ने कहा—ऊपर मूल और नीचे शाखाओं वाले अव्यय अश्वत्थ वृक्ष का वर्णन किया जाता है, जिसके पत्ते वैदिक छन्द हैं। जो इसे जानता है, वह वेद के तत्त्व को जानता है।

अध्याय १५ • श्लोक २

अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा
गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः ।
अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि
कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके ॥१५.२॥

सरल हिंदी अर्थ: उसकी शाखाएँ ऊपर और नीचे फैली हैं, गुणों से बढ़ी हैं और विषय उनके नए अंकुर हैं। नीचे मनुष्यलोक में कर्मों से बाँधने वाली जड़ें भी फैली हुई हैं।

अध्याय १५ • श्लोक ३

न रूपमस्येह तथोपलभ्यते
नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा ।
अश्वत्थमेनं सुविरूढमूलं
असङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा ॥१५.३॥

सरल हिंदी अर्थ: यहाँ उसका वास्तविक रूप, आदि, अन्त और स्थायी आधार इस प्रकार नहीं जाना जाता। गहरी जड़ों वाले इस अश्वत्थ को दृढ़ असंगतारूपी शस्त्र से काटकर—

अध्याय १५ • श्लोक ४

ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं
यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः ।
तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये ।
यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी ॥१५.४॥

सरल हिंदी अर्थ: फिर उस पद की खोज करनी चाहिए, जहाँ पहुँचकर लौटना नहीं होता। उसी आदि पुरुष की शरण लेनी चाहिए, जिससे यह पुरातन सृष्टिप्रवाह फैला है।

अध्याय १५ • श्लोक ५

निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा
अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः ।
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञै-
र्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत् ॥१५.५॥

सरल हिंदी अर्थ: मान और मोह से मुक्त, आसक्ति को जीत चुके, अध्यात्म में नित्य स्थित, कामनारहित और सुख-दुःख के द्वन्द्वों से मुक्त विवेकी उस अविनाशी पद को पाते हैं।

अध्याय १५ • श्लोक ६

न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः ।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥१५.६॥

सरल हिंदी अर्थ: न सूर्य उसे प्रकाशित करता है, न चन्द्रमा और न अग्नि। जहाँ पहुँचकर लौटना नहीं होता, वही मेरा परम धाम है।

अध्याय १५ • श्लोक ७

ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः ।
मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥१५.७॥

सरल हिंदी अर्थ: जीवलोक में जीव बना हुआ मेरा ही सनातन अंश प्रकृति में स्थित मन सहित छह इन्द्रियों को अपनी ओर खींचता है।

अध्याय १५ • श्लोक ८

शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः ।
गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात् ॥१५.८॥

सरल हिंदी अर्थ: जब जीव किसी शरीर को ग्रहण करता या छोड़ता है, तब इन मन-इन्द्रियों को साथ ले जाता है, जैसे वायु गन्ध को उसके स्थान से ले जाती है।

अध्याय १५ • श्लोक ९

श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च ।
अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते ॥१५.९॥

सरल हिंदी अर्थ: कान, आँख, त्वचा, जीभ, नाक और मन का आश्रय लेकर यह जीव विषयों का अनुभव करता है।

अध्याय १५ • श्लोक १०

उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम् ।
विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः ॥१५.१०॥

सरल हिंदी अर्थ: शरीर छोड़ते, उसमें रहते या गुणों के साथ विषय भोगते इस जीव को मोहित लोग नहीं देख पाते; ज्ञानदृष्टि वाले देखते हैं।

श्लोक ११–२०

अध्याय १५ • श्लोक ११

यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम् ।
यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः ॥१५.११॥

सरल हिंदी अर्थ: प्रयत्नशील योगी उसे अपने भीतर स्थित देखते हैं। पर अशुद्ध अन्तःकरण और अविवेकी मन वाले लोग प्रयत्न करके भी उसे नहीं देखते।

अध्याय १५ • श्लोक १२

यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम् ।
यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम् ॥१५.१२॥

सरल हिंदी अर्थ: सूर्य में स्थित जो तेज पूरे जगत को प्रकाशित करता है और जो तेज चन्द्रमा तथा अग्नि में है, उसे मेरा ही तेज जानो।

अध्याय १५ • श्लोक १३

गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा ।
पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः ॥१५.१३॥

सरल हिंदी अर्थ: पृथ्वी में प्रवेश करके मैं अपनी शक्ति से प्राणियों को धारण करता हूँ और रसस्वरूप सोम बनकर सभी वनस्पतियों का पोषण करता हूँ।

अध्याय १५ • श्लोक १४

अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः ।
प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम् ॥१५.१४॥

सरल हिंदी अर्थ: मैं प्राणियों के शरीर में वैश्वानर अग्नि बनकर, प्राण और अपान के साथ, चार प्रकार के अन्न का पाचन करता हूँ।

अध्याय १५ • श्लोक १५

सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो
मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनञ्च ।
वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो
वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम् ॥१५.१५॥

सरल हिंदी अर्थ: मैं सभी के हृदय में स्थित हूँ; मुझसे स्मृति, ज्ञान और उनका लोप होता है। सभी वेदों द्वारा मैं ही जानने योग्य हूँ; वेदान्त का प्रवर्तक और वेद का ज्ञाता भी मैं हूँ।

अध्याय १५ • श्लोक १६

द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च ।
क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥१५.१६॥

सरल हिंदी अर्थ: संसार में दो पुरुष कहे गए हैं—क्षर और अक्षर। सभी परिवर्तनशील प्राणी क्षर हैं तथा निर्विकार तत्त्व अक्षर कहा जाता है।

अध्याय १५ • श्लोक १७

उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ।
यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥१५.१७॥

सरल हिंदी अर्थ: इनसे भिन्न उत्तम पुरुष है, जिसे परमात्मा कहते हैं। वह अविनाशी ईश्वर तीनों लोकों में प्रवेश करके उनका धारण-पोषण करता है।

अध्याय १५ • श्लोक १८

यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः ।
अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ॥१५.१८॥

सरल हिंदी अर्थ: क्योंकि मैं क्षर से परे और अक्षर से भी उत्तम हूँ, इसलिए संसार और वेद में पुरुषोत्तम के नाम से प्रसिद्ध हूँ।

अध्याय १५ • श्लोक १९

यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम् ।
स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत ॥१५.१९॥

सरल हिंदी अर्थ: हे भारत! जो मोहरहित होकर मुझे इस प्रकार पुरुषोत्तम जानता है, वह तत्त्व को जानकर सभी भावों से मुझे भजता है।

अध्याय १५ • श्लोक २०

इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ ।
एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत ॥१५.२०॥

सरल हिंदी अर्थ: हे निष्पाप भारत! मैंने यह अत्यन्त गुप्त शास्त्र कहा है। इसे समझकर मनुष्य बुद्धिमान और कृतकृत्य हो जाता है।

अध्याय का सार

  1. संसारवृक्ष के बन्धन को वैराग्य से काटना है।
  2. जीव परमात्मा का सनातन अंश कहा गया है।
  3. क्षर और अक्षर से परे पुरुषोत्तम का ज्ञान पूर्णता देता है।
पाठ-संदर्भ: श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय १५, श्लोक १–२०। संस्कृत मूल पाठ के साथ हिंदी अर्थ स्वतंत्र सरल शब्दों में प्रस्तुत हैं।
भक्ति भावना • संस्थापक: बबलू प्रसाद द्विवेदी
श्रीकृष्णार्पणमस्तु

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