श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 14: गुणत्रयविभागयोग — सम्पूर्ण 27 श्लोक हिंदी अर्थ सहित
श्रीमद्भगवद्गीता
अध्याय १४ • गुणत्रयविभागयोग
सत्त्व, रज और तम—प्रकृति के तीन गुण—मनुष्य को किस प्रकार बाँधते हैं, यह इस अध्याय का विषय है। भगवान इन गुणों के लक्षण, उनके फल और उनसे ऊपर उठने वाले साधक की स्थिति बताते हैं।
श्लोक १–१०
अध्याय १४ • श्लोक १
परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम् ।
यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः ॥१४.१॥
सरल हिंदी अर्थ: श्रीभगवान ने कहा—मैं फिर सभी ज्ञानों में उत्तम परम ज्ञान बताऊँगा, जिसे जानकर सभी मुनि इस संसार से परम सिद्धि प्राप्त कर चुके हैं।
अध्याय १४ • श्लोक २
सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ॥१४.२॥
सरल हिंदी अर्थ: इस ज्ञान का आश्रय लेकर मेरे समान धर्मस्वरूप को प्राप्त हुए साधक सृष्टि के आरम्भ में जन्म नहीं लेते और प्रलय में व्यथित नहीं होते।
अध्याय १४ • श्लोक ३
सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत ॥१४.३॥
सरल हिंदी अर्थ: हे भारत! महान प्रकृति मेरी सृष्टि की योनि है। उसमें मैं चेतन बीज स्थापित करता हूँ और उससे सभी प्राणियों की उत्पत्ति होती है।
अध्याय १४ • श्लोक ४
तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता ॥१४.४॥
सरल हिंदी अर्थ: हे कुन्तीपुत्र! सभी योनियों में जितने शरीर उत्पन्न होते हैं, उनकी उत्पत्तिभूमि महान प्रकृति है और बीज देने वाला पिता मैं हूँ।
अध्याय १४ • श्लोक ५
निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम् ॥१४.५॥
सरल हिंदी अर्थ: हे महाबाहु! सत्त्व, रज और तम—प्रकृति से उत्पन्न ये गुण शरीर में अविनाशी देहधारी को बाँधते हैं।
अध्याय १४ • श्लोक ६
सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ ॥१४.६॥
सरल हिंदी अर्थ: हे निष्पाप अर्जुन! सत्त्व निर्मल होने से प्रकाश देने वाला और विकाररहित है, फिर भी सुख तथा ज्ञान की आसक्ति से बाँधता है।
अध्याय १४ • श्लोक ७
तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम् ॥१४.७॥
सरल हिंदी अर्थ: रजोगुण को रागमय तथा तृष्णा और आसक्ति से उत्पन्न जानो। हे कुन्तीपुत्र! वह देहधारी को कर्म की आसक्ति से बाँधता है।
अध्याय १४ • श्लोक ८
प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत ॥१४.८॥
सरल हिंदी अर्थ: हे भारत! तमोगुण अज्ञान से उत्पन्न और सभी देहधारियों को मोहित करने वाला है। वह प्रमाद, आलस्य और निद्रा से बाँधता है।
अध्याय १४ • श्लोक ९
ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे सञ्जयत्युत ॥१४.९॥
सरल हिंदी अर्थ: हे भारत! सत्त्व सुख में लगाता है, रज कर्म में और तम ज्ञान को ढककर प्रमाद में लगाता है।
अध्याय १४ • श्लोक १०
रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा ॥१४.१०॥
सरल हिंदी अर्थ: कभी रज और तम को दबाकर सत्त्व बढ़ता है, कभी सत्त्व और तम को दबाकर रज तथा कभी सत्त्व और रज को दबाकर तम बढ़ता है।
श्लोक ११–२०
अध्याय १४ • श्लोक ११
ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत ॥१४.११॥
सरल हिंदी अर्थ: जब शरीर के सभी इन्द्रिय-द्वारों में ज्ञान का प्रकाश प्रकट हो, तब समझना चाहिए कि सत्त्व बढ़ा है।
अध्याय १४ • श्लोक १२
रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ ॥१४.१२॥
सरल हिंदी अर्थ: हे भरतश्रेष्ठ! रजोगुण बढ़ने पर लोभ, गतिविधि, अनेक कर्मों का आरम्भ, अशान्ति और लालसा उत्पन्न होती हैं।
अध्याय १४ • श्लोक १३
तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन ॥१४.१३॥
सरल हिंदी अर्थ: हे कुरुनन्दन! तमोगुण बढ़ने पर विवेक के प्रकाश का अभाव, कर्म में जड़ता, प्रमाद और मोह उत्पन्न होते हैं।
अध्याय १४ • श्लोक १४
तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते ॥१४.१४॥
सरल हिंदी अर्थ: सत्त्व की वृद्धि में देहधारी मृत्यु को प्राप्त हो, तो उत्तम ज्ञानीजनों के निर्मल लोकों को पाता है।
अध्याय १४ • श्लोक १५
तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते ॥१४.१५॥
सरल हिंदी अर्थ: रजोगुण की वृद्धि में मरने वाला कर्मासक्त लोगों में जन्म लेता है; तमोगुण की वृद्धि में मरने वाला अज्ञानप्रधान योनियों में जन्म लेता है।
अध्याय १४ • श्लोक १६
रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम् ॥१४.१६॥
सरल हिंदी अर्थ: सत्कर्म का फल सात्त्विक और निर्मल कहा गया है; राजस कर्म का फल दुःख और तामस कर्म का फल अज्ञान है।
अध्याय १४ • श्लोक १७
प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च ॥१४.१७॥
सरल हिंदी अर्थ: सत्त्व से ज्ञान, रज से लोभ तथा तम से प्रमाद, मोह और अज्ञान उत्पन्न होते हैं।
अध्याय १४ • श्लोक १८
जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः ॥१४.१८॥
सरल हिंदी अर्थ: सत्त्व में स्थित लोग उच्च गति पाते हैं, राजस लोग मध्य में रहते हैं और निम्न वृत्तियों वाले तामस लोग अधोगति पाते हैं।
अध्याय १४ • श्लोक १९
गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति ॥१४.१९॥
सरल हिंदी अर्थ: जब द्रष्टा गुणों के अतिरिक्त अन्य किसी को कर्ता नहीं देखता और गुणों से परे तत्त्व को जानता है, तब वह मेरे भाव को प्राप्त होता है।
अध्याय १४ • श्लोक २०
जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते ॥१४.२०॥
सरल हिंदी अर्थ: देह की उत्पत्ति से जुड़े इन तीन गुणों को पार करके देहधारी जन्म, मृत्यु, बुढ़ापे और दुःख से मुक्त होकर अमृतत्व पाता है।
श्लोक २१–२७
अध्याय १४ • श्लोक २१
किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन्गुणानतिवर्तते ॥१४.२१॥
सरल हिंदी अर्थ: अर्जुन ने पूछा—हे प्रभु! इन तीन गुणों को पार कर चुका व्यक्ति किन लक्षणों से पहचाना जाता है? उसका आचरण कैसा है और वह गुणों से कैसे ऊपर उठता है?
अध्याय १४ • श्लोक २२
प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव ।
न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति ॥१४.२२॥
सरल हिंदी अर्थ: श्रीभगवान ने कहा—हे पाण्डव! प्रकाश, गतिविधि और मोह के उत्पन्न होने पर वह उनसे द्वेष नहीं करता और उनके हटने पर उनकी इच्छा नहीं करता।
अध्याय १४ • श्लोक २३
गुणा वर्तन्त इत्येवं योऽवतिष्ठति नेङ्गते ॥१४.२३॥
सरल हिंदी अर्थ: जो उदासीन के समान असंग रहकर गुणों से विचलित नहीं होता और “गुण ही अपना कार्य कर रहे हैं” जानकर स्थिर रहता है—
अध्याय १४ • श्लोक २४
तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः ॥१४.२४॥
सरल हिंदी अर्थ: जो सुख-दुःख में सम, आत्मनिष्ठ, मिट्टी-पत्थर-सोने में समदृष्टि, प्रिय-अप्रिय में समान, धैर्यवान और निन्दा-स्तुति में सम रहता है—
अध्याय १४ • श्लोक २५
सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते ॥१४.२५॥
सरल हिंदी अर्थ: जो मान-अपमान और मित्र-शत्रु के पक्ष में समान है तथा स्वार्थपूर्ण आरम्भों को छोड़ चुका है, वह गुणातीत कहलाता है।
अध्याय १४ • श्लोक २६
स गुणान्समतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥१४.२६॥
सरल हिंदी अर्थ: जो अव्यभिचारी भक्तियोग से मेरी सेवा करता है, वह इन गुणों को पार करके ब्रह्मभाव की प्राप्ति के योग्य हो जाता है।
अध्याय १४ • श्लोक २७
शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च ॥१४.२७॥
सरल हिंदी अर्थ: क्योंकि मैं अविनाशी और अमृतस्वरूप ब्रह्म, शाश्वत धर्म और अखण्ड परम सुख का आधार हूँ।
अध्याय का सार
- तीनों गुण अपने-अपने ढंग से बाँधते हैं।
- गुणों की क्रिया को पहचानकर उनसे असंग रहें।
- अव्यभिचारी भक्ति गुणातीत स्थिति की ओर ले जाती है।
॥ गुणत्रयविभागयोग — अध्याय १४ सम्पूर्ण ॥
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