अष्टावक्र गीता अध्याय 1: आत्मबोध का उपदेश — 20 श्लोक हिंदी अर्थ सहित

भक्ति भावना • अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

अध्याय १ • आत्मबोध का उपदेश

सम्पूर्ण २० श्लोक • मूल संस्कृत पाठ एवं सरल हिंदी भावार्थ

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अष्टावक्र गीता के इस अध्याय का मुख्य विषय है—आत्मबोध का उपदेश। यहाँ अष्टावक्र और जनक के संवाद में आत्मतत्त्व का विवेचन मिलता है। नीचे सभी २० मूल श्लोक क्रम से सरल हिंदी भावार्थ के साथ दिए गए हैं।

पाठ का संदर्भ: यह अद्वैत दर्शन का आत्मस्वरूप संबंधी संवाद है। अकर्तापन और बंधन से परे होने के कथन शुद्ध आत्मा की दृष्टि से हैं; व्यवहार में कर्तव्य, सदाचार और करुणा का महत्त्व बना रहता है। हिंदी भावार्थ भक्ति भावना द्वारा सरल भाषा में प्रस्तुत है। अध्याय का विषय-शीर्षक पाठ की सुविधा के लिए दिया गया है।

अध्याय १ • श्लोक १

जनक उवाच ॥

कथं ज्ञानमवाप्नोति कथं मुक्तिर्भविष्यति ।
वैराग्यं च कथं प्राप्तमेतद् ब्रूहि मम प्रभो ॥ १-१॥

सरल हिंदी भावार्थ: जनक ने पूछा—प्रभो! ज्ञान कैसे प्राप्त होता है, मुक्ति कैसे मिलती है और वैराग्य कैसे उत्पन्न होता है? कृपया मुझे बताइए।

अध्याय १ • श्लोक २

अष्टावक्र उवाच ॥

मुक्तिमिच्छसि चेत्तात विषयान् विषवत्त्यज ।
क्षमार्जवदयातोषसत्यं पीयूषवद् भज ॥ १-२॥

सरल हिंदी भावार्थ: अष्टावक्र कहते हैं—वत्स! मुक्ति चाहते हो तो विषयों की आसक्ति को विष के समान छोड़ो और क्षमा, सरलता, दया, संतोष तथा सत्य को अमृत के समान अपनाओ।

अध्याय १ • श्लोक ३

न पृथ्वी न जलं नाग्निर्न वायुर्द्यौर्न वा भवान् ।
एषां साक्षिणमात्मानं चिद्रूपं विद्धि मुक्तये ॥ १-३॥

सरल हिंदी भावार्थ: तुम पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु या आकाश नहीं हो। मुक्ति के लिए स्वयं को इन सबका साक्षी, चेतन आत्मा जानो।

अध्याय १ • श्लोक ४

यदि देहं पृथक् कृत्य चिति विश्राम्य तिष्ठसि ।
अधुनैव सुखी शान्तो बन्धमुक्तो भविष्यसि ॥ १-४॥

सरल हिंदी भावार्थ: यदि देह से अपनी पहचान अलग करके चेतना में विश्राम करो, तो अभी सुखी, शांत और बंधन से मुक्त हो सकते हो।

अध्याय १ • श्लोक ५

न त्वं विप्रादिको वर्णो नाश्रमी नाक्षगोचरः ।
असङ्गोऽसि निराकारो विश्वसाक्षी सुखी भव ॥ १-५॥

सरल हिंदी भावार्थ: आत्मस्वरूप में तुम किसी वर्ण या आश्रम की पहचान तक सीमित नहीं हो और इंद्रियों से पकड़े नहीं जाते। तुम असंग, निराकार और विश्व के साक्षी हो; इस बोध में सुखी रहो।

अध्याय १ • श्लोक ६

धर्माधर्मौ सुखं दुःखं मानसानि न ते विभो ।
न कर्तासि न भोक्तासि मुक्त एवासि सर्वदा ॥ १-६॥

सरल हिंदी भावार्थ: धर्म-अधर्म और सुख-दुःख मन के अनुभव हैं; शुद्ध आत्मा के विकार नहीं। आत्मस्वरूप में तुम न कर्ता हो, न भोक्ता; सदा मुक्त हो।

अध्याय १ • श्लोक ७

एको द्रष्टासि सर्वस्य मुक्तप्रायोऽसि सर्वदा ।
अयमेव हि ते बन्धो द्रष्टारं पश्यसीतरम् ॥ १-७॥

सरल हिंदी भावार्थ: तुम सबके एक साक्षी हो और सदा मुक्त हो। अपने से अलग किसी दूसरे को परम द्रष्टा मानकर अपनी चेतना को सीमित समझना ही बंधन है।

अध्याय १ • श्लोक ८

अहं कर्तेत्यहंमानमहाकृष्णाहिदंशितः ।
नाहं कर्तेति विश्वासामृतं पीत्वा सुखं चर ॥ १-८॥

सरल हिंदी भावार्थ: “मैं ही कर्ता हूँ”—इस अहंकाररूपी विषधर ने तुम्हें डसा है। “शुद्ध आत्मा कर्ता नहीं है”—इस विश्वास का अमृत पीकर सुख से रहो।

अध्याय १ • श्लोक ९

एको विशुद्धबोधोऽहमिति निश्चयवह्निना ।
प्रज्वाल्याज्ञानगहनं वीतशोकः सुखी भव ॥ १-९॥

सरल हिंदी भावार्थ: “मैं एक विशुद्ध चेतना हूँ”—इस दृढ़ निश्चय की अग्नि से अज्ञानरूपी वन को जलाकर शोक से मुक्त और सुखी हो जाओ।

अध्याय १ • श्लोक १०

यत्र विश्वमिदं भाति कल्पितं रज्जुसर्पवत् ।
आनन्दपरमानन्दः स बोधस्त्वं सुखं भव ॥ १-१०॥

सरल हिंदी भावार्थ: जैसे रस्सी में साँप की कल्पना होती है, वैसे ही जिस चेतना में विश्व दिखाई देता है, वही परम आनंदस्वरूप बोध तुम हो। इसे जानकर सुखी रहो।

अध्याय १ • श्लोक ११

मुक्ताभिमानी मुक्तो हि बद्धो बद्धाभिमान्यपि ।
किंवदन्तीह सत्येयं या मतिः सा गतिर्भवेत् ॥ १-११॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो स्वयं को मुक्त जानता है, वह मुक्त होता है; जो अपने को बँधा मानता है, वह बंधन अनुभव करता है। जैसी दृढ़ धारणा होती है, वैसी ही गति बनती है।

अध्याय १ • श्लोक १२

आत्मा साक्षी विभुः पूर्ण एको मुक्तश्चिदक्रियः ।
असङ्गो निःस्पृहः शान्तो भ्रमात्संसारवानिव ॥ १-१२॥

सरल हिंदी भावार्थ: आत्मा साक्षी, व्यापक, पूर्ण, एक, मुक्त, चेतन और क्रियारहित है। वह असंग, इच्छारहित और शांत है; भ्रम से ही संसार में बँधी हुई प्रतीत होती है।

अध्याय १ • श्लोक १३

कूटस्थं बोधमद्वैतमात्मानं परिभावय ।
आभासोऽहं भ्रमं मुक्त्वा भावं बाह्यमथान्तरम् ॥ १-१३॥

सरल हिंदी भावार्थ: “मैं केवल देह-मन का प्रतिबिंब हूँ”—यह भ्रम छोड़ो। बाहरी और भीतरी धारणाओं से परे अपने को अविकारी, अद्वैत चेतना के रूप में पहचानो।

अध्याय १ • श्लोक १४

देहाभिमानपाशेन चिरं बद्धोऽसि पुत्रक ।
बोधोऽहं ज्ञानखड्गेन तन्निकृत्य सुखी भव ॥ १-१४॥

सरल हिंदी भावार्थ: वत्स! देह को ही अपना स्वरूप मानने के पाश में तुम बहुत समय से बँधे हो। “मैं बोधस्वरूप हूँ”—इस ज्ञानरूपी तलवार से वह पाश काटकर सुखी हो जाओ।

अध्याय १ • श्लोक १५

निःसङ्गो निष्क्रियोऽसि त्वं स्वप्रकाशो निरञ्जनः ।
अयमेव हि ते बन्धः समाधिमनुतिष्ठसि ॥ १-१५॥

सरल हिंदी भावार्थ: तुम असंग, क्रियारहित, स्वयंप्रकाश और निर्मल हो। अपने पूर्ण स्वरूप को भविष्य में किसी अवस्था से प्राप्त करने योग्य मानकर समाधि की चेष्टा में बँधे रहना भी बंधन है।

अध्याय १ • श्लोक १६

त्वया व्याप्तमिदं विश्वं त्वयि प्रोतं यथार्थतः ।
शुद्धबुद्धस्वरूपस्त्वं मा गमः क्षुद्रचित्तताम् ॥ १-१६॥

सरल हिंदी भावार्थ: यह विश्व तुमसे व्याप्त है और वास्तव में तुममें ही स्थित है। तुम शुद्ध बोधस्वरूप हो; अपने को तुच्छ और सीमित मत समझो।

अध्याय १ • श्लोक १७

निरपेक्षो निर्विकारो निर्भरः शीतलाशयः ।
अगाधबुद्धिरक्षुब्धो भव चिन्मात्रवासनः ॥ १-१७॥

सरल हिंदी भावार्थ: अपेक्षारहित, निर्विकार, आत्मतृप्त, शांतचित्त, गहन बुद्धि और अक्षुब्ध बनो। तुम्हारी अभिरुचि केवल चेतन आत्मस्वरूप में रहे।

अध्याय १ • श्लोक १८

साकारमनृतं विद्धि निराकारं तु निश्चलम् ।
एतत्तत्त्वोपदेशेन न पुनर्भवसम्भवः ॥ १-१८॥

सरल हिंदी भावार्थ: आकारयुक्त वस्तुओं को परिवर्तनशील और निराकार आत्मतत्त्व को स्थिर जानो। इस तत्त्वबोध से पुनर्जन्म का बंधन समाप्त होता है।

अध्याय १ • श्लोक १९

यथैवादर्शमध्यस्थे रूपेऽन्तः परितस्तु सः ।
तथैवाऽस्मिन् शरीरेऽन्तः परितः परमेश्वरः ॥ १-१९॥

सरल हिंदी भावार्थ: जैसे दर्पण में दिखाई देने वाले रूप के भीतर और चारों ओर दर्पण ही आधार है, वैसे ही इस शरीर के भीतर और बाहर परमेश्वर व्याप्त हैं।

अध्याय १ • श्लोक २०

एकं सर्वगतं व्योम बहिरन्तर्यथा घटे ।
नित्यं निरन्तरं ब्रह्म सर्वभूतगणे तथा ॥ १-२०॥

सरल हिंदी भावार्थ: जैसे एक ही सर्वव्यापी आकाश घड़े के भीतर और बाहर है, वैसे ही नित्य, अखंड ब्रह्म सभी प्राणियों में व्याप्त है।

भक्ति भावना • मूल संस्कृत पाठ एवं सरल हिंदी भावार्थ

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