कबीर ग्रंथावली भाग 2 — साखी 273–540 मूल पाठ, हिंदी अर्थ और भावार्थ सहित
कबीर ग्रंथावली — भाग 2
साखी 273–540 · हिंदी अर्थ सहित
मन की सजगता से सत्य, संगति और संत-स्वभाव तक—मूल पाठ, कठिन शब्दार्थ, सरल हिंदी अर्थ और स्वतंत्र भावार्थ का विस्तृत अध्ययन।
मन को समझने से सार ग्रहण करने तक
पहले भाग में गुरुदेव से चितावणी तक अंग १–१२ की २७२ साखियाँ थीं। इस दूसरे भाग में मन कौ अंग से सारग्राही कौ अंग तक, अंग १३–३२ की २६८ मुख्य साखियाँ हैं। पहले भाग का संयुक्त क्रम आगे बढ़ाते हुए यहाँ २७३–५४० क्रमांक दिए गए हैं। हर अंग आरंभ से अंत तक पूरा है।
कबीर बाहरी पहचान के साथ भीतर की वास्तविक स्थिति पूछते हैं। मन कहाँ भागता है, शब्द कर्म में उतरते हैं या नहीं, संगति क्या बनाती है और अनेक भेदों में सार कैसे चुनें—ये इस भाग के प्रमुख प्रश्न हैं।
मुख्य साखी-पाठ की तीन-भागीय योजना
| भाग | अंग | पाठ का विस्तार |
|---|---|---|
| भाग १ | १–१२ | गुरुदेव से चितावणी · संयुक्त क्रम १–२७२ |
| भाग २ | १३–३२ | मन से सारग्राही · संयुक्त क्रम २७३–५४० |
| भाग ३ | ३३–५९ | विचार से अबिहड़ · मुख्य साखी-पाठ का अगला और अंतिम भाग |
यह योजना संदर्भ-संस्करण के मुख्य साखी-पाठ के ५९ अंगों की है। पद, भजन, रमैनी और अलग परिशिष्ट इस श्रृंखला में सम्मिलित नहीं हैं। भाग ३ प्रकाशित होने पर उसका वास्तविक लिंक जोड़ा जाएगा।
दूसरे भाग के २० पूरे अंग
साखी २७३–३०२ · ३० मुख्य साखियाँ १४. सूषिम मारग कौ अंग
साखी ३०३–३१२ · १० मुख्य साखियाँ १५. सूषिम जनम कौ अंग
साखी ३१३–३१४ · २ मुख्य साखियाँ १६. माया कौ अंग
साखी ३१५–३४६ · ३२ मुख्य साखियाँ १७. चाँणक कौ अंग
साखी ३४७–३६८ · २२ मुख्य साखियाँ १८. करणीं बिना कथणीं कौ अंग
साखी ३६९–३७३ · ५ मुख्य साखियाँ १९. कथणीं बिना करणी कौ अंग
साखी ३७४–३७७ · ४ मुख्य साखियाँ २०. कामी नर कौ अंग
साखी ३७८–४०४ · २७ मुख्य साखियाँ २१. सहज कौ अंग
साखी ४०५–४०८ · ४ मुख्य साखियाँ २२. साँच कौ अंग
साखी ४०९–४२५ · १७ मुख्य साखियाँ २३. भ्रम विधौंसण कौ अंग
साखी ४२६–४३६ · ११ मुख्य साखियाँ २४. भेष कौ अंग
साखी ४३७–४६२ · २६ मुख्य साखियाँ २५. कुसंगति कौ अंग
साखी ४६३–४६९ · ७ मुख्य साखियाँ २६. संगति कौ अंग
साखी ४७०–४७७ · ८ मुख्य साखियाँ २७. असाध कौ अंग
साखी ४७८–४८० · ३ मुख्य साखियाँ २८. साध कौ अंग
साखी ४८१–४९३ · १३ मुख्य साखियाँ २९. साध साषीभूत कौ अंग
साखी ४९४–५१४ · २१ मुख्य साखियाँ ३०. साध महिमाँ कौ अंग
साखी ५१५–५२५ · ११ मुख्य साखियाँ ३१. मधि कौ अंग
साखी ५२६–५३६ · ११ मुख्य साखियाँ ३२. सारग्राही कौ अंग
साखी ५३७–५४० · ४ मुख्य साखियाँ
अपनी इच्छित साखी चुनें
क्रमांक-समूह खोलकर सीधे मूल पाठ और अर्थ पर पहुँचें। सभी साखियाँ इसी लेख में हैं।
१३. मन कौ अंग
चंचलता, आत्मपरीक्षण, मन की लगाम और सजग अभ्यास। मूल स्थानीय क्रमांक १–३०।
साखी २७३ मन कौ अंग · मूल क्रमांक १
बाँणि = आदत; अपूठा = उलटा; ताकू = तकुआ।
मन की हर इच्छा के पीछे मत चलो। तकुए का सूत उलटकर समेटने की तरह बिखरे ध्यान को भीतर लौटाओ।
चंचल विचार आदेश नहीं हैं। इच्छा और निर्णय के बीच ठहरकर विवेक से काम चुनें।
साखी २७४ मन कौ अंग · मूल क्रमांक २
चिति = चित्त में; पसर = फैलाव; सहजि = सहज भाव से।
व्यर्थ चिंता हटाओ और इंद्रियों का अनियंत्रित फैलाव समेटो; शांत चित्त में परम सत्य का परिचय सहज होगा।
ध्यान का आधार सजग संयम है। आवश्यक जिम्मेदारियाँ निभाते हुए मन की अनावश्यक दौड़ कम करें।
साखी २७५ मन कौ अंग · मूल क्रमांक ३
मनसा = इच्छाएँ; विभूति = राख; फिल = फलदायक।
आशाओं को ईंधन और इच्छाओं को राख बनाकर अपनी साधना की फेरी सफल करना चाहता हूँ।
योगी का वेश तभी सार्थक है जब लालसा की पकड़ ढीली हो। भीतर की तैयारी बाहरी यात्रा से अधिक महत्त्वपूर्ण है।
साखी २७६ मन कौ अंग · मूल क्रमांक ४
सेरी = गली; लैलीन = लीन।
भक्ति की गली सँकरी है, पर चंचल मन चोर है। मुख गुण गाता है और भीतर कुछ दूसरा चाहता है।
जप के समय अपनी वास्तविक चाह भी देखें। वाणी और हृदय का अंतर पहचानना ईमानदार साधना है।
साखी २७७ मन कौ अंग · मूल क्रमांक ५
लुणत = काटते समय; क्यारी = छोटी खेती।
मन के विकारों को तोड़ना चाहता हूँ। जब स्वयं विष की खेती बोई, तो उसका फल काटते समय पछताना कैसा?
कर्म का फल समझकर जिम्मेदारी लें। आत्मदंड के बजाय गलत आदत बदलना वास्तविक सुधार है।
साखी २७८ मन कौ अंग · मूल क्रमांक ६
बिसमल = वश में किया हुआ; अदीठ = अदृश्य; अंगीठ = आग का पात्र।
मन की अनियंत्रित सत्ता मिटाकर उसकी दिखने वाली चंचलता छिपाना चाहता हूँ; अहं बचा रहे तो तपस्या भी व्यर्थ है।
तीव्र देह-बिंब मन के अहं को साधने का रूपक हैं। लक्ष्य आत्मसंयम है, शरीर को चोट पहुँचाना नहीं।
साखी २७९ मन कौ अंग · मूल क्रमांक ७
कुसलात = चतुराई; कर = हाथ में; बैं = कूप या गड्ढे का संकेत।
मन सब जानकर भी दोष करता है। हाथ में दीपक लेकर गिरने वाले की चतुराई किस काम की?
जानकारी और आचरण का मेल आवश्यक है। जानी हुई सही बात को छोटे दैनिक निर्णयों में अपनाएँ।
साखी २८० मन कौ अंग · मूल क्रमांक ८
आरसी = दर्पण; दुविधा = द्वंद्व।
हृदय में दर्पण है, पर अपना मुख साफ नहीं दिखता। मन की दुविधा मिटे तो वास्तविक पहचान हो।
आत्मपरीक्षण में पूर्वाग्रह और स्वार्थ बाधा बनते हैं। शांत होकर अपनी बात और गलती दोनों देखने का साहस रखें।
साखी २८१ मन कौ अंग · मूल क्रमांक ९
उनमन = अंतर्मुख तन्मय; अंड = अंडा।
मन समर्पित करने से मन का सच्चा रूप मिलता है। साधक की सजगता दूर रखे अंडे पर ध्यान रखने वाले पक्षी जैसी कही गई है।
ध्यान केवल देह की निकटता नहीं, चित्त की दिशा है। अपने लक्ष्य की स्मृति को प्रेमपूर्वक सँजोएँ।
साखी २८२ मन कौ अंग · मूल क्रमांक १०
गोरख गोविंद = योग और ईश्वर के संकेत; औघड़ = सहज योगी।
मन ही योग का साधन और गोविंद की पहचान का माध्यम है। उसे सावधानी से रखें तो भीतर दिव्य क्षमता प्रकट होती है।
मन को शत्रु मानकर कुचलना उद्देश्य नहीं। उसे सजगता, विवेक और करुणा का सहयोगी बनाएँ।
साखी २८३ मन कौ अंग · मूल क्रमांक ११
कबाइ = चोगा; लाल = प्रेम का रंग।
ऐसा मित्र पाया जिसका प्रेमरंगी वस्त्र सारी दुनिया धोए, तब भी उसका रंग न जाए।
स्थिर आध्यात्मिक निष्ठा बाहरी मत और परिस्थितियों से जल्दी नहीं बदलती। उसका आधार अनुभव और निष्कपट प्रेम हो।
साखी २८४ मन कौ अंग · मूल क्रमांक १२
झींण = सूक्ष्म; बेगि = वेग में।
मेरा मित्र पानी से पतला, धुएँ से सूक्ष्म और हवा से तीव्र है—कबीर उस सूक्ष्म तत्त्व से आत्मीयता कहते हैं।
इन उपमाओं का आशय मन या चेतना की सूक्ष्मता है। उसकी दिशा सँभालना स्थूल बाहरी साधनों से अलग अभ्यास माँगता है।
साखी २८५ मन कौ अंग · मूल क्रमांक १३
तुरी = घोड़ी; पलांड़ियाँ = जीन कसी; दिवस = जीवन का अवसर।
मन की घोड़ी सजाकर संयम का चाबुक लिया है। दिन रहते स्वामी से मिल लूँ; फिर रात आ जाएगी।
अवसर रहते साधना करें। घोड़ी और चाबुक एकाग्रता तथा अनुशासन के रूपक हैं।
साखी २८६ मन कौ अंग · मूल क्रमांक १४
अधर = अंतराकाश; झीणा = सूक्ष्म; आलोकत = देखते हुए।
मन सूक्ष्म होकर भीतर की ऊँची स्थिति में ठहरा। सजग दृष्टि से सत्य मिला, जो कभी वास्तव में दूर नहीं था।
अंतर्मुखता निकट के सत्य को पहचानती है। उसका फल जीवन से पलायन नहीं, अधिक स्पष्ट और शांत व्यवहार हो।
साखी २८७ मन कौ अंग · मूल क्रमांक १५
पंच = पाँच इंद्रियाँ; सीला = शील; उद्यारि = उच्छृंखल।
मन और इंद्रियाँ वश में नहीं, न शील, सत्य और श्रद्धा विकसित हुए; ऐसे में साधना की तैयारी अधूरी है।
बाहरी अभ्यास के साथ चरित्र पर काम करें। सत्य बोलना और संयम रखना आध्यात्मिक अनुशासन के अंग हैं।
साखी २८८ मन कौ अंग · मूल क्रमांक १६
गाफिल = असावधान; गलका = निगला हुआ चारा या फंदे का संकेत।
मन स्वाद के पीछे बिखर गया। रोकने पर भी चारा निगल लिया; अब उसे सँभालना कठिन होता है।
आदत बनने से पहले आकर्षण पहचानना आसान है। आवेग के समय थोड़ा ठहराव भविष्य की उलझन बचा सकता है।
साखी २८९ मन कौ अंग · मूल क्रमांक १७
सासनाँ = दंड या कष्ट; दरगह = न्याय का स्थान।
मन असावधान है और स्मरण में नहीं लगता; उसके कर्मों का कष्ट आगे भोगना पड़ेगा।
काव्य की न्याय-छवि जिम्मेदारी जगाती है। अपने व्यवहार के परिणाम समझकर समय रहते सुधारें।
साखी २९० मन कौ अंग · मूल क्रमांक १८
कोटि कर्म = असंख्य क्रियाएँ; बादि = व्यर्थ।
विषय-स्वाद में मन क्षण भर में अनेक कर्म रचता है, पर गुरु की सीख नहीं मानता और अवसर गँवा देता है।
अंतहीन योजनाओं से अधिक सही दिशा महत्त्वपूर्ण है। मूल सीख चुनकर उसे नियमित कर्म में उतारें।
साखी २९१ मन कौ अंग · मूल क्रमांक १९
मैंमंता = मस्त हाथी; अंकुस = नियंत्रित करने का उपकरण।
मन के मस्त हाथी को भीतर घेरो; वह पीठ फेरकर भटके तो सजगता के अंकुश से लौटाओ।
ध्यान भटके तो कटुता नहीं, सतत जागरूकता काम आती है। बार-बार लौटना ही अभ्यास का हिस्सा है।
साखी २९२ मन कौ अंग · मूल क्रमांक २०
नान्हाँ = छोटा; सुंदरी = आत्मा; सीसि = भीतर के उच्च केंद्र का संकेत।
मन का फैलता अहं छोटा करो, तभी आत्मा को शांति मिले और ब्रह्म का प्रकाश झलके।
‘पीसना’ अहं की कठोरता का रूपक है। नम्रता और स्वार्थ घटाने से चित्त अधिक ग्रहणशील बनता है।
साखी २९३ मन कौ अंग · मूल क्रमांक २१
पंच कुसंगी = असंयमित इंद्रियाँ; कागद = कागज।
कागज की नाव में पानी की नदी पार करनी है और पाँच कुसंगी साथ हैं—ऐसे कैसे पार उतरूँ?
देह की अस्थिरता के बीच इंद्रियों की दिशा महत्त्वपूर्ण है। असावधानी का भार कम करके विवेक का सहारा लें।
साखी २९४ मन कौ अंग · मूल क्रमांक २२
डूंगरि = पहाड़; बूठा मेह = बरसी वर्षा; निबाँणाँ = नीचे की जगह।
कल का ऊँचा मन कहाँ गया? पहाड़ पर बरसा पानी जैसे नीचे बहता है, वैसे वह विषयों की ओर उतर गया।
क्षणिक ऊँची अवस्था स्थायी उपलब्धि नहीं। अभ्यास और सावधानी से मन की दिशा सँभालें।
साखी २९५ मन कौ अंग · मूल क्रमांक २३
बाव = हवा; बिकार = विकार।
मन को मरा हुआ मत मानो; विकारों की हवा लगे तो वह फिर अपनी पुरानी चंचलता में जीवित हो उठता है।
अहं घटने का दावा जल्दी न करें। परिस्थिति बदलने पर प्रतिक्रिया देखकर ही संयम की वास्तविक स्थिति समझ आती है।
साखी २९६ मन कौ अंग · मूल क्रमांक २४
छींका = लटकता भंडारण-पात्र; बहोड़ि = फिर।
कटी मछली छींके पर रखी थी, फिर भी भीतर बची एक प्रवृत्ति से मानो पानी में लौट पड़ी।
यह मन की छिपी वासना का अतिशयोक्तिपूर्ण रूपक है। बाहरी रोक के साथ इच्छा की जड़ समझना जरूरी है।
साखी २९७ मन कौ अंग · मूल क्रमांक २५
पंषी = पक्षी; अकास = आकाश।
मन-पक्षी बहुत ऊपर उड़ा, पर फिर माया के पास गिर पड़ा।
अनुभव या ज्ञान के बाद भी मोह लौट सकता है। उपलब्धि का अभिमान छोड़कर निरंतर सजग रहें।
साखी २९८ मन कौ अंग · मूल क्रमांक २६
दुबारा = द्वार; मैंगल = हाथी; राई = सरसों का दाना।
भक्ति का द्वार राई के अंश जैसा सूक्ष्म है, जबकि मन अहं से हाथी बना है; वह उसमें कैसे समाए?
अहं का आकार घटे तभी आत्मीय समर्पण संभव है। नम्रता साधना की मूल तैयारी है।
साखी २९९ मन कौ अंग · मूल क्रमांक २७
करता था = करते समय; बबूल = काँटेदार वृक्ष।
कर्म करते समय क्यों न सोचा? बबूल बोकर अब मनचाहा मीठा फल कहाँ से मिलेगा?
परिणाम से पहले निर्णय पर ध्यान दें। पछतावे को भविष्य के विवेकपूर्ण कर्म की प्रेरणा बनाएँ।
साखी ३०० मन कौ अंग · मूल क्रमांक २८
देवल = मंदिर; धजा = ध्वजा; विषै लहरि = विषयों की हवा।
देह मंदिर है, मन उसकी ध्वजा है, जिसे विषयों की हवा हिलाती है। मन बिगड़े तो पूरे जीवन की दिशा बिगड़ती है।
भीतर की दिशा बाहरी आचरण को प्रभावित करती है। मानसिक आदतों पर सजग काम करें।
साखी ३०१ मन कौ अंग · मूल क्रमांक २९
मनोरथ = कल्पना की इच्छाएँ; घीव = घी।
केवल कल्पना से सब नहीं होता। पानी मथने से घी निकलता तो कोई सूखी रोटी क्यों खाता?
इच्छा के साथ उचित साधन और परिश्रम चाहिए। कल्पना को काम समझने की भूल न करें।
साखी ३०२ मन कौ अंग · मूल क्रमांक ३०
कसूं = कसूँ; पंचतत्त = देह के पाँच तत्त्व; मन मृग = चंचल मन।
देह को धनुष और उसकी शक्तियों को बाण बनाकर चंचल मन-मृग को साधूँ; वरना साधना का दावा खोखला है।
शरीर और ऊर्जा का संयमित उपयोग करें। रूपक का लक्ष्य चंचलता पर विवेकपूर्ण नियंत्रण है।
१४. सूषिम मारग कौ अंग
अगम तत्त्व की खोज, हलकापन, गुरु की सीख और अंतर्मुख यात्रा। मूल स्थानीय क्रमांक १–१०।
साखी ३०३ सूषिम मारग कौ अंग · मूल क्रमांक १
कौंण देस = कौन मूल स्थान; भूलि = विस्मृत होकर।
हम कहाँ से आए और अपने मूल को कैसे पहचानें? उस मार्ग की खबर नहीं, इसी संसार में भूल गए।
साधना जीवन के मूल प्रश्न पूछती है। तैयार उत्तरों से पहले अपनी खोज को ईमानदारी दें।
साखी ३०४ सूषिम मारग कौ अंग · मूल क्रमांक २
उतीथैं = उस ओर से; पठाइये = भेजे जाते; भार = कर्म या आसक्ति।
उस ओर से कोई लौटकर नहीं आता जिससे दौड़कर पूछूँ; यहाँ से सब बोझ लादे जाते हैं।
अज्ञात के बारे में दावे सीमित रखें। वर्तमान जीवन में अपना कर्म और अनावश्यक भार सँभालना हमारे हाथ में है।
साखी ३०५ सूषिम मारग कौ अंग · मूल क्रमांक ३
रहण = स्थायी निवास; प्रीति = प्रेम।
सबसे स्थायी ठहराव पूछता हूँ, कोई नहीं बताता। राम से प्रेम नहीं जोड़ा तो सच्चा आश्रय कहाँ मिलेगा?
बाहरी स्थान बदलते हैं। अपने मूल्यों और परम आश्रय में चित्त की स्थिरता विकसित करें।
साखी ३०६ सूषिम मारग कौ अंग · मूल क्रमांक ४
परचा = परिचय; ठौर = जगह।
सब चलने की बात कहते हैं, पर मेरा प्रश्न है—स्वामी का परिचय बिना वे वास्तव में किस आश्रय को जा रहे हैं?
परंपरागत कथन दोहराने से अधिक आत्मबोध जरूरी है। अपनी साधना की दिशा समझकर चलें।
साखी ३०७ सूषिम मारग कौ अंग · मूल क्रमांक ५
अविगति = अगम परम तत्त्व; गति = स्थिति।
न साधारण जाने का स्थान है, न स्थूल रहने की जगह; अगम सत्य की स्थिति इन सीमाओं से अलग है।
आध्यात्मिक आश्रय को केवल भौतिक स्थान न मानें। यह चेतना और अनुभव की बात भी है।
साखी ३०८ सूषिम मारग कौ अंग · मूल क्रमांक ६
बहुड़े = लौटे; कुसल = समाचार।
मार्ग कठिन है; जो गए, लौटे नहीं कि उसका समाचार कहें।
कठिन और अज्ञात विषय पर विनय रखें। यात्रा का दावा करने से अधिक सही अभ्यास महत्त्वपूर्ण है।
साखी ३०९ सूषिम मारग कौ अंग · मूल क्रमांक ७
सिषर = शिखर; सलैली = फिसलनभरी; पपीलका = चींटी।
मेरा घर शिखर पर है, रास्ता फिसलनभरा है; चींटी का पैर नहीं टिकता और लोग बैल लादकर चढ़ना चाहते हैं।
सूक्ष्म साधना भारी अहं और संग्रह से कठिन होती है। सरलता और सजगता यात्रा में सहायक हैं।
साखी ३१० सूषिम मारग कौ अंग · मूल क्रमांक ८
राइ = राई; गमि = पहुँच।
जहाँ चींटी नहीं चढ़ती, राई नहीं टिकती और मन-वायु की पहुँच नहीं, साधक उस सूक्ष्म अवस्था तक जाता है।
यह स्थूल क्षमता से परे अंतर्बोध की प्रतीक-भाषा है। इसे किसी भौतिक जगह का विवरण न समझें।
साखी ३११ सूषिम मारग कौ अंग · मूल क्रमांक ९
साषि = सीख या साक्षी; अगम = कठिन पहुँच।
जिस अगम मार्ग पर मुनि थक गए, कबीर गुरु की सीख का सहारा लेकर बढ़े।
अच्छा मार्गदर्शन कठिनाई में दिशा देता है। उसका फल अपने अभ्यास और विवेक के जागने में हो।
साखी ३१२ सूषिम मारग कौ अंग · मूल क्रमांक १०
मोटे भाग = बड़ा सौभाग्य; घर छाइ = निवास बना।
देव-मुनियों के लिए भी दुर्लभ अवस्था में कबीर को स्थिर आश्रय मिला—वे इसे अपना सौभाग्य कहते हैं।
अनुभव को अनुग्रह मानने से विनय रहती है। उपलब्धि दूसरों को छोटा दिखाने का आधार न बने।
१५. सूषिम जनम कौ अंग
चेतना की सूक्ष्म गति और जीवित रहते भीतर जन्मते-मिटते भाव। मूल स्थानीय क्रमांक १–२।
साखी ३१३ सूषिम जनम कौ अंग · मूल क्रमांक १
सूषिम सुरति = ध्यान की सूक्ष्म गति; अदिष्टि = न दिखना।
जीव अपनी सूक्ष्म चेतना के जाल को नहीं पहचानता; भीतर की दृष्टिहीनता दूर करके आत्मा का विचार करो।
मन की बारीक इच्छाएँ भी बंधन बना सकती हैं। सजग आत्मपरीक्षण से उनका काम करना पहचानें।
साखी ३१४ सूषिम जनम कौ अंग · मूल क्रमांक २
प्राण पंड = देह के प्राण; जीव छताँ = जीवित रहते।
देह से प्राण जाएँ तो सब मृत्यु कहते हैं, पर जीवित रहते मन में जन्मते-मरते भावों की सूक्ष्म गति कौन देखता है?
अहं और इच्छाओं का निरंतर बनना-मिटना भी ध्यान का विषय है। अपने भीतर के परिवर्तन सजगता से देखें।
१६. माया कौ अंग
मोह, तृष्णा, धन, प्रतिष्ठा और साधनों के विवेकपूर्ण उपयोग पर विचार। मूल स्थानीय क्रमांक १–३२।
साखी ३१५ माया कौ अंग · मूल क्रमांक १
हठवाड़ा = हाट-बाज़ार; बेसाँ = प्रलोभन का पुराना रूपक।
संसार बाज़ार है, स्वाद ठग है और माया प्रलोभन सजाती है। रामचरण का सहारा पकड़ो, जीवन ठगा न जाए।
हर आकर्षक वस्तु हितकारी नहीं। आनंद लेते हुए विवेक और अपने मूल उद्देश्य की रक्षा करें।
साखी ३१६ माया कौ अंग · मूल क्रमांक २
फंध = जाल; हाटि = बाज़ार में।
माया जाल लेकर बैठी है; जग उसमें फँसा है, पर कबीर पहचानकर अपना बंधन काट निकलते हैं।
मोह का जाल पहचानना मुक्ति की शुरुआत है। अपनी निर्भरता और अनावश्यक लालसा को ईमानदारी से देखें।
साखी ३१७ माया कौ अंग · मूल क्रमांक ३
लालै = लालच में; बिजोग = विडंबना।
माया सबको लालच में रखती है, पर कोई उसके सभी भोग पूरे नहीं कर पाता—यही उसकी विडंबना है।
हर इच्छा पूरी करने की दौड़ अंतहीन है। पर्याप्तता पहचानना संतोष का आधार बनता है।
साखी ३१८ माया कौ अंग · मूल क्रमांक ४
कड़ियाली = लगाम; कुमति = दूषित बुद्धि।
माया गलत समझ की लगाम लगाकर हरि से दूर करती है और मुख को सच्चे स्मरण से रोकती है।
मन में जमी गलत मान्यता व्यवहार नियंत्रित करती है। उसे प्रश्न और आत्मपरीक्षण से पहचानें।
साखी ३१९ माया कौ अंग · मूल क्रमांक ५
अंतरा = दूरी; बिसास = प्रबल मोह का संकेत।
मन में हरि-भजन की बड़ी आशा है, लेकिन माया बीच में दूरी डाल देती है।
अच्छा संकल्प पर्याप्त नहीं; बाधा बनने वाली आदतें भी देखें। नियमित अभ्यास के लिए समय और ध्यान बचाएँ।
साखी ३२० माया कौ अंग · मूल क्रमांक ६
सुजाँण = समझदार; बाँण = आकर्षण के बाण।
माया ज्ञानी और समझदार को भी मोहती है। केवल भाग जाने से नहीं छूटती, बार-बार आकर्षण भेजती है।
स्थान बदलने के साथ वृत्ति बदलना जरूरी है। अपने को मोह से पूरी तरह ऊपर मानने का अहं न पालें।
साखी ३२१ माया कौ अंग · मूल क्रमांक ७
खाँड़ = चीनी; भाँड़ = उपहास का पात्र।
माया मीठी चीनी जैसी लुभाती है। गुरु की कृपा न होती तो उसका बहलावा मुझे उपहास का पात्र बना देता।
हितकारी मार्गदर्शन क्षणिक मिठास और दीर्घ कल्याण का अंतर दिखाता है। सीख को व्यवहार में अपनाएँ।
साखी ३२२ माया कौ अंग · मूल क्रमांक ८
घाँणि = कोल्हू; कुल की काँणि = वंश-प्रतिष्ठा का दबाव।
माया ने संसार को कोल्हू में डाल दिया है। विरला व्यक्ति झूठी कुल-प्रतिष्ठा का बंधन तोड़कर बचता है।
दिखावे और जन्मगत श्रेष्ठता के दबाव से मुक्त हों। निर्णय गुण, सत्य और विवेक के आधार पर लें।
साखी ३२३ माया कौ अंग · मूल क्रमांक ९
झूठ करि = अस्थायी समझकर; डौलै = घूमती है।
माँगने से माया हाथ नहीं आती; मन से उसका सर्वोच्च महत्त्व उतारा तो वह पीछे चलने लगी।
यह धन मिलने की गारंटी नहीं, आसक्ति का व्यंग्य है। साधन को लक्ष्य न बनाने से उसका दबाव घटता है।
साखी ३२४ माया कौ अंग · मूल क्रमांक १०
ऊँभी = खड़ी; जगदीस = परमेश्वर।
संत के लिए माया सेविका है; वह उसका उपयोग करता है, पर स्मरण रखते हुए उसकी दासता छोड़ देता है।
संसार के साधन छोड़ना हमेशा आवश्यक नहीं। उनका विवेकपूर्ण उपयोग करें और स्वामित्व का अहं न बढ़ाएँ।
साखी ३२५ माया कौ अंग · मूल क्रमांक ११
त्रिस्नाँ = तृष्णा; सरीर = शरीर।
शरीर बार-बार नष्ट हुए, पर मन का मोह, आशा और तृष्णा समाप्त नहीं हुई।
केवल बाहरी परिवर्तन से आदत नहीं मिटती। लालसा की जड़ पर सजग काम करना जरूरी है।
साखी ३२६ माया कौ अंग · मूल क्रमांक १२
संचते = संग्रह करते; उबरे = बच निकले।
लोग मरते हैं, आशाएँ बनी रहती हैं। संग्रह में डूबे खो गए; उचित उपयोग और संतोष वाले बच निकले।
धन का मूल्य केवल जमा होने में नहीं। आवश्यक उपयोग, सेवा और पर्याप्तता का विवेक भी विकसित करें।
साखी ३२७ माया कौ अंग · मूल क्रमांक १३
आगै कूँ = आगे काम आने वाला; पोटली = गठरी।
वही धन सँजोओ जो आगे सार्थक हो; सिर पर धन की गठरी रखकर किसी को जाते नहीं देखा।
कर्म, ज्ञान और उपकार जीवन का गहरा अर्जन हैं। संपत्ति को भी इन्हीं उद्देश्यों में लगाएँ।
साखी ३२८ माया कौ अंग · मूल क्रमांक १४
त्रिण्णाँ = तृष्णा; खोड़ि = चोट या हानि।
तृष्णा से प्रेम मत जोड़ो; ऊँचाई पर चढ़कर पीछे गिरने जैसी बड़ी हानि हो सकती है।
पुराने स्त्री-रूपक का केंद्र अनियंत्रित इच्छा है। इसे किसी स्त्री के स्वभाव का सार्वभौमिक निर्णय न मानें।
साखी ३२९ माया कौ अंग · मूल क्रमांक १५
जबासा = गर्मी में पनपने वाला पौधा; घण मेह = घनी वर्षा।
तृष्णा को तृप्त करने से वह और बढ़ती है; उसका स्वभाव जबासे जैसा उलटा है, जो वर्षा में कुम्हला जाता है।
इच्छा की हर माँग मानना संतोष नहीं लाता। सीमा, विवेक और अंतर की तृप्ति से उसका बल घटाएँ।
साखी ३३० माया कौ अंग · मूल क्रमांक १६
भौ जलि = संसार-सागर में; मानि = प्रतिष्ठा।
संसारियों की क्या कहें, भक्त भी परम आश्रय छोड़कर सम्मान की चाह में डूब सकते हैं।
आध्यात्मिक पहचान के भीतर भी प्रशंसा की भूख छिपती है। सेवा को अपने प्रचार का साधन न बनाएँ।
साखी ३३१ माया कौ अंग · मूल क्रमांक १७
मानि = अभिमान; गुनियर = गुणवान।
माया छोड़ दी तो क्या, यदि मान नहीं छोड़ा? अभिमान गुणवान को भी अपनी पकड़ में ले लेता है।
त्याग का प्रदर्शन भी नया अहं बन सकता है। अपने गुण पर गर्व से अधिक कृतज्ञता रखें।
साखी ३३२ माया कौ अंग · मूल क्रमांक १८
दीन = अधीन; आधीन = वश में।
राम को छोटा समझकर मनुष्य दुनिया के सामने झुकता है; अपने को राजा कहता है, पर माया का दास है।
पद से अधिक भीतर की स्वतंत्रता देखें। लालच के वश निर्णय लेने वाला बाहरी अधिकार के बावजूद बँधा है।
साखी ३३३ माया कौ अंग · मूल क्रमांक १९
रज बीरज = देह-उत्पत्ति के पदार्थ; कनक = सोना।
देह से सुंदर रूप बना है, लेकिन रामनाम का सार बिना वह धन और कामना के कुएँ में डूब सकती है।
देह-सौंदर्य और संपदा अस्थायी हैं। उन्हें ही जीवन की पूरी पहचान न मानें।
साखी ३३४ माया कौ अंग · मूल क्रमांक २०
त्रिविध = तीन गुणों या तापों से संबंधित; संताप = दुःख।
माया का वृक्ष दुःख की शाखाएँ फैलाता है; उसमें शीतलता नहीं, फीका फल और देह-मन की तपन है।
मोह का परिणाम पहचानें। जो चाह बार-बार असंतोष बढ़ाए, उसकी दिशा बदलना विवेक है।
साखी ३३५ माया कौ अंग · मूल क्रमांक २१
ढाकड़ी = डाकिनी का रूप; उपाणौं = उखाड़ देना।
माया सबको निगलने वाली डाकिनी जैसी है; संत की सजगता के पास उसका दाँत नहीं चलता।
भयानक रूपक आसक्ति की शक्ति बताता है। विवेक और स्मरण से उसके प्रभाव को सीमित किया जा सकता है।
साखी ३३६ माया कौ अंग · मूल क्रमांक २२
नलनी = कमलिनी; सायर = सरोवर; लिपेणि = संस्कार का प्रभाव।
जल में घर बनाकर भी कमलिनी तीव्र दाह से नहीं बची; पुराने संस्कार उसका कारण कहे गए हैं।
बाहरी सुरक्षित स्थान भीतर की प्रवृत्ति नहीं बदलता। कर्म और संस्कारों की समीक्षा भी आवश्यक है।
साखी ३३७ माया कौ अंग · मूल क्रमांक २३
गुण की बादली = प्रकृति-गुणों का मेघ; ऊबरे = बचे।
गुणों की माया-बादली की छाँह उलटी है—भीतर आश्रय मानने वाले भीगते हैं, बाहर रहने वाले बचते हैं।
जिसे सुरक्षा समझते हैं, वही मोह बन सकता है। आकर्षण की शर्तें और परिणाम विवेक से जाँचें।
साखी ३३८ माया कौ अंग · मूल क्रमांक २४
लोइ = संसार; मुसि लिये = लूट लिए गए।
मोह की अँधेरी रात में सोए लोग अपना सार खोकर बाद में रोते हैं।
असावधानी में समय और विवेक दोनों छूट सकते हैं। दिन के छोटे निर्णय सजगता से लें।
साखी ३३९ माया कौ अंग · मूल क्रमांक २५
संकल = संकल्प; सिरजनहार = स्रष्टा।
संकल्प से माया का संसार फैलता है; सृजन की इसी व्यवस्था में बँधा जीव आसानी से कैसे छूटे?
मन की कल्पना अनुभव को आकार देती है। इच्छाओं और पहचान के बंधन समझना साधना का सूक्ष्म काम है।
साखी ३४० माया कौ अंग · मूल क्रमांक २६
बाना बंध = पक्का बंधन; बेलि = लता।
आशा की लता बाड़ पर चढ़कर उलझती जाती है; शाखा टूटे तब भी उसकी गाँठ आसानी से नहीं छूटती।
लालसा एक इच्छा तक सीमित नहीं रहती। उसकी परस्पर जुड़ी आदतों को धैर्य से समझकर बदलें।
साखी ३४१ माया कौ अंग · मूल क्रमांक २७
आसण = आश्रय या अवस्था; परिवर्ति = बदलना; परपंच = सांसारिक विस्तार।
अनेक अवस्थाएँ आशा से संचालित हैं; स्थिर रहने का दावा भी बदलते प्रपंच के बीच टिक नहीं पाता।
इस कठिन पुराने पाठ का संकेत आशा की छिपी निर्भरता है। बाहरी अवस्था से अधिक भीतर का आग्रह देखें।
साखी ३४२ माया कौ अंग · मूल क्रमांक २८
बधावणाँ = उत्सव; अँदोह = शोक।
संसार का मोह अस्थायी है; जिस घर में जितना उत्सव, वहीं उतना शोक भी आ सकता है।
सुख-दुःख बदलते हैं। आनंद में विनय और कठिनाई में धैर्य रखकर दोनों के बीच संतुलन सीखें।
साखी ३४३ माया कौ अंग · मूल क्रमांक २९
पूठि = पीठ; रूठि = विमुख होकर।
माया कहती है—मुझसे पीठ मत फेरो। कबीर उसके आग्रह से हटकर स्वतंत्र राह लेते हैं।
प्रलोभन अक्सर आत्मीय भाषा में रोकता है। लक्ष्य स्पष्ट हो तो हर बुलावे को स्वीकारना आवश्यक नहीं।
साखी ३४४ माया कौ अंग · मूल क्रमांक ३०
बुगली = बगुली; बिटालिया = दूषित किया; चंच = चोंच।
बगुली ने जल दूषित किया; अन्य पक्षी पीते हैं, पर विवेकी हंस चोंच नहीं डुबोता।
संगति और वातावरण में चयन का विवेक रखें। सब कर रहे हों, इससे कोई आदत हितकारी नहीं बनती।
साखी ३४५ माया कौ अंग · मूल क्रमांक ३१
बरियाँ = सामना करके; नारद = कथा में मोह से परीक्षित मुनि।
माया का सामना सजगता से करो; नारद जैसे मुनि भी मोहित हुए, तो असावधान भरोसा कैसा?
कथा-संकेत आत्मविश्वास के साथ विनय सिखाता है। अपने को हर प्रलोभन से ऊपर न समझें।
साखी ३४६ माया कौ अंग · मूल क्रमांक ३२
झल = ज्वाला; कनक काँमणी = धन और कामना।
धन और कामना के मोह की आग में जग जलता है; रूई में लिपटी आग को कैसे सुरक्षित रखें?
इच्छा का दबा आवेग भी हानि कर सकता है। उसे पहचानकर संयम और उचित दिशा दें।
१७. चाँणक कौ अंग
लोभ, दिखावा, शास्त्र-अभिमान और आध्यात्मिक नेतृत्व की कसौटी। मूल स्थानीय क्रमांक १–२२।
साखी ३४७ चाँणक कौ अंग · मूल क्रमांक १
बिलव्या = उलझा; अलप = सूक्ष्म; झल = जलन।
जीव दूसरे जीवों की उलझनों में फँसा सूक्ष्म सत्य नहीं पहचानता; न गोविंद मिलते, न भीतर की तपन मिटती है।
निरंतर बाहरी उलझाव से थोड़ा विराम लें। अंतःकरण की स्थिति देखना भी आवश्यक काम है।
साखी ३४८ चाँणक कौ अंग · मूल क्रमांक २
उदर = पेट; जाँच्यो = माँगते फिरा; स्वामीपण = गुरु होने का मान।
पेट के लिए जग से माँगा, ऊपर से स्वामी होने का अहं चढ़ा; पर मूल साधना का काम नहीं बना।
जीविका और आध्यात्मिक प्रतिष्ठा को छल में न मिलाएँ। भीतर की सच्चाई बाहरी पद से अधिक महत्त्वपूर्ण है।
साखी ३४९ चाँणक कौ अंग · मूल क्रमांक ३
सोहरा = सरल; दोद्धा = कठिन; गाडर = भेड़।
स्वामी कहलाना आसान, सेवक बनना कठिन है। ऊन के लिए लाई भेड़ उलटे कपास खा गई।
जिस व्यवस्था से लाभ की आशा हो, वह लोभ में उलटा नुकसान कर सकती है। सेवा का उद्देश्य स्पष्ट रखें।
साखी ३५० चाँणक कौ अंग · मूल क्रमांक ४
सीतका = सस्ते में; पैका कार = पैसे का काम।
स्वामी का नाम आसानी से मिला, धन के काम बढ़े; रामनाम केवल कंठ में रहा और आशा शिष्यों पर टिकी।
अनुयायियों की संख्या साधना का प्रमाण नहीं। अपनी निर्भरता और स्वार्थ जाँचना आवश्यक है।
साखी ३५१ चाँणक कौ अंग · मूल क्रमांक ५
तष्टा टोकणी = भिक्षा के पात्र; पीतलि = तुच्छ धन का संकेत।
पात्र लेकर घूमता व्यक्ति रामनाम का सार नहीं पहचानता, केवल धन की चमक चाहता है।
वेश और उपकरण से अधिक उद्देश्य देखें। आजीविका की जरूरत को लोभ और प्रदर्शन से अलग रखें।
साखी ३५२ चाँणक कौ अंग · मूल क्रमांक ६
षटाइ = खटाई; हरिहाई = पराए खेत की ओर दौड़ती गाय।
लोभी स्वामी धन की चमक के लिए राजद्वारों पर ऐसे घूमता है जैसे गाय दूसरे की हरियाली पर लपके।
सत्ता और लाभ का आकर्षण आध्यात्मिक स्वतंत्रता घटा सकता है। हितकारी मार्गदर्शक का चरित्र उसके संबंधों से भी परखें।
साखी ३५३ चाँणक कौ अंग · मूल क्रमांक ७
मनसा बधाइ = इच्छाएँ बढ़ाईं; लेखाँ = हिसाब।
लोभी धार्मिक नेता इच्छाएँ बढ़ाकर धन के ब्याज और हिसाब में लगा है।
आलोचना लोभ में खोई साधना की है। धन का व्यवहार पारदर्शी और जिम्मेदार हो; आध्यात्मिक प्रतिष्ठा उसका आवरण न बने।
साखी ३५४ चाँणक कौ अंग · मूल क्रमांक ८
मुनियर = मननशील साधु; मसकरा = खुशामदी।
समय ऐसा बिगड़ा कि सच्चा मननशील दुर्लभ है और लोभी, लालची, खुशामदी आदर पाते हैं।
लोकप्रियता को सत्य का एकमात्र माप न बनाएँ। निष्कपटता और आचरण पहचानने का विवेक रखें।
साखी ३५५ चाँणक कौ अंग · मूल क्रमांक ९
बाली = फसल की बालियाँ; हेत = प्रेम।
चारों वेद पढ़कर भी हरि से प्रेम न जोड़ा। कबीर सार की बालियाँ ले गए, पंडित खाली खेत खोजता रहा।
शिक्षा का मूल्य उसके सार ग्रहण करने में है। विद्या के साथ विनय और प्रेम विकसित हों।
साखी ३५६ चाँणक कौ अंग · मूल क्रमांक १०
बाँम्हण = ब्राह्मण; उरझि पुरझि = उलझते हुए।
कबीर कहते हैं कि केवल जन्म और शास्त्रज्ञान से कोई अनुभवी साधक का गुरु नहीं हो जाता, यदि स्वयं शब्दों में उलझा हो।
यह जन्मगत अधिकार पर प्रश्न है। मार्गदर्शक का माप चरित्र, अनुभव और विवेक हो, जाति नहीं।
साखी ३५७ चाँणक कौ अंग · मूल क्रमांक ११
साषित = यहाँ भक्ति-विमुख कर्मकांडी; जेवणा = रस्सी; कठठाइ = कसती है।
प्रेम से रहित कर्मकांड सन की रस्सी जैसा है, जो भीगकर कसता है; गुरु के सार बिना बंधन बना रहता है।
पुराना मत-सूचक शब्द किसी समुदाय का सार्वभौमिक दोष नहीं। सीख है कि अनुष्ठान भीतर विवेक जगाए, भय न बढ़ाए।
साखी ३५८ चाँणक कौ अंग · मूल क्रमांक १२
रूसणाँ = रूठना; सरावगी = श्रावक का पुराना संबोधन।
पड़ोसी से झगड़ा सुख घटाता है; केवल पानी छानने जैसी बाहरी सावधानी से धर्म पूरा नहीं होता।
सूक्ष्म नियम के साथ मानवीय संबंधों में अहिंसा और सद्भाव भी आवश्यक हैं।
साखी ३५९ चाँणक कौ अंग · मूल क्रमांक १३
परमोधतां = उपदेश देते; मुहरकाँ = भटकाव का संकेत।
पंडित को समझाया, पर भीतर बात न उतरी; दूसरों को उपदेश देते हुए वह स्वयं भ्रम में चला गया।
ज्ञान देने से पहले अपना आचरण देखें। सुनना और सीखते रहना शिक्षक की भी जिम्मेदारी है।
साखी ३६० चाँणक कौ अंग · मूल क्रमांक १४
सूवा = तोता; पंजर = पिंजरा।
तोते ने चतुर बातें सीखीं, फिर भी पिंजरे में है; दूसरों को सुनाता है, स्वयं अर्थ नहीं समझता।
रटना और आत्मसात करना अलग हैं। सीखी बात को जीवन से जोड़कर समझें।
साखी ३६१ चाँणक कौ अंग · मूल क्रमांक १५
रासि = जमा संपदा; प्रमोधतां = समझाते।
दूसरों की पूँजी सँभालते अपना खेत खो दिया; दूसरों को शिक्षा देते अपनी साधना बिगाड़ ली।
सेवा के साथ आत्मपरीक्षण भी रहे। दूसरों की गलतियाँ गिनते अपनी जिम्मेदारी न भूलें।
साखी ३६२ चाँणक कौ अंग · मूल क्रमांक १६
उदै = उदय; बड़ाई = प्रतिष्ठा।
तारों के बीच चंद्रमा चमकता है, लेकिन सूर्य निकलते ही सबकी अलग चमक छिप जाती है।
तुलना से मिली श्रेष्ठता सीमित है। सच्ची समझ आने पर बाहरी दंभ का आकर्षण घटता है।
साखी ३६३ चाँणक कौ अंग · मूल क्रमांक १७
सीत के कोट = हिम के किले; रवि = सूर्य।
बर्फ के किले सुंदर दिखते हैं, पर सूर्य उगते ही मिट जाते हैं और उनका जल बाँधा नहीं रहता।
प्रदर्शन की चमक स्थायी आधार नहीं। किसी विचार और नेतृत्व को कठिन परिस्थिति में भी परखें।
साखी ३६४ चाँणक कौ अंग · मूल क्रमांक १८
डूँधै = शरीर का बाहरी भाग; जपंतड़ाँ = जपते हुए।
तीर्थ घूमने, शरीर धोने और नाम बोलने भर से काल की पकड़ नहीं छूटती, यदि भीतर परिवर्तन न हो।
साधन का सम्मान करें, साथ ही उसका उद्देश्य याद रखें। स्मरण आचरण और चेतना तक पहुँचे।
साखी ३६५ चाँणक कौ अंग · मूल क्रमांक १९
कासी काँठै = काशी के पास; मुकति = मुक्ति।
काशी में घर और निर्मल जल पीना भी हरिनाम के अंतर्बोध का विकल्प नहीं है।
पवित्र स्थान प्रेरणा दे सकते हैं; सच्ची साधना में अपना मन और कर्म बदलना भी आवश्यक है।
साखी ३६६ चाँणक कौ अंग · मूल क्रमांक २०
भेड़ की पूँछ = अनुचित आश्रय; पार = संसार-सागर से पार।
लोग भेड़ की पूँछ पकड़कर नदी पार करना चाहते हैं; उन्हें बार-बार कैसे समझाऊँ?
अंधानुकरण से सुरक्षित दिशा नहीं मिलती। मार्गदर्शक और उपाय को विवेक से चुनें।
साखी ३६७ चाँणक कौ अंग · मूल क्रमांक २१
ध्रंम = धर्म; क्रम = कर्मकांड; भ्रंम = भ्रम।
मन धर्म करने के गर्व में फूला है, अनगिनत कर्मों का बोझ उठाता है, पर अपना भ्रम नहीं देखता।
धार्मिक अभ्यास अहं बढ़ाए तो आत्मपरीक्षण करें। विनय और करुणा उसके परिणाम बनें।
साखी ३६८ चाँणक कौ अंग · मूल क्रमांक २२
मोर तोर = मेरा-तेरा; जेवड़ी = रस्सी; दाझड़ = दाह।
मेरा-तेरा की रस्सी ने संसार बाँध रखा है और जीव उसमें बार-बार जलता है।
अधिकार की जिद संबंधों को कठोर करती है। जिम्मेदारी निभाते हुए स्वामित्व का अहं कम करें।
१८. करणीं बिना कथणीं कौ अंग
वचन और कर्म का मेल; गीत और कीर्तन से आगे जीवन का परिवर्तन। मूल स्थानीय क्रमांक १–५।
साखी ३६९ करणीं बिना कथणीं कौ अंग · मूल क्रमांक १
करणी = आचरण; कालबूत = अस्थायी ढाँचा; कोट = दुर्ग।
कहने से क्या हुआ यदि आचरण साथ न हो? ऐसी बात अस्थायी ढाँचे के किले की तरह ढह जाती है।
विश्वास व्यवहार से बनता है। अपने उपदेश को छोटे दैनिक कर्म में निभाएँ।
साखी ३७० करणीं बिना कथणीं कौ अंग · मूल क्रमांक २
नेड़ा = निकट; निहाल = आनंदित।
मुख से जैसी बात निकलती है, चाल भी वैसी हो तो परम सत्य निकट अनुभव होता है।
सत्यनिष्ठा कथन और कर्म की एकता है। केवल ऊँची बात से अधिक उसका नियमित पालन महत्त्वपूर्ण है।
साखी ३७१ करणीं बिना कथणीं कौ अंग · मूल क्रमांक ३
स्वान गति = तीखी पशु-उपमा; जमपुर = कर्मफल का क्षेत्र।
जो कहता कुछ और, करता कुछ और है, उसकी असंगति को कवि कठोर उपमा देकर दोषपूर्ण कहते हैं।
व्यक्ति का अपमान सीख नहीं है। सकारात्मक संदेश अपने वचन के प्रति उत्तरदायी होना है।
साखी ३७२ करणीं बिना कथणीं कौ अंग · मूल क्रमांक ४
साषी = साखी; तत = मूल तत्त्व; फंध = बंधन।
पद गाकर मन प्रसन्न हुआ और साखी कहकर आनंद आया, पर भीतर नाम का सार न जाना तो बंधन बना रहा।
साहित्य और संगीत साधन हैं। उनके भाव को अपने जीवन में उतारना अगला आवश्यक कदम है।
पाठ-टिप्पणी: वेब-प्रतिलिपि के “सापी” और “सों तन” के स्थान पर मुद्रित संदर्भ पृष्ठ १२२ से “साषी” और “सो तत” पाठ लिया गया है।
साखी ३७३ करणीं बिना कथणीं कौ अंग · मूल क्रमांक ५
तूंड = मुख; रूंड = चेतन सारविहीन देह का रूपक।
ऊँचा मुख करके कीर्तन करता दिखता है, लेकिन अर्थ और अनुभव की समझ नहीं—ऐसा प्रदर्शन खोखला है।
स्वर और उत्साह के साथ अर्थ, विनय और सजगता जुड़ें। भक्ति केवल दूसरों को प्रभावित करने के लिए न हो।
१९. कथणीं बिना करणी कौ अंग
पुस्तक के अक्षर से प्रेम के अनुभव तक पहुँचने का आग्रह। मूल स्थानीय क्रमांक १–४।
साखी ३७४ कथणीं बिना करणी कौ अंग · मूल क्रमांक १
जोग = साधना; नींदी = निंदा की।
पहले पढ़ना श्रेष्ठ लगा, फिर योग। रामनाम से सच्चा प्रेम जोड़ा तो लोग उस मार्ग की भी निंदा करने लगे।
लोकमत बदलता रहता है। अध्ययन और साधना को भीतर की सत्यनिष्ठा से दिशा दें।
साखी ३७५ कथणीं बिना करणी कौ अंग · मूल क्रमांक २
बांवन अषिर = वर्णमाला; ररै ममैं = रामनाम का अक्षर-संकेत।
केवल पुस्तक-संग्रह में न उलझो; अक्षरों का सार समझकर रामनाम में चित्त लगाओ।
पुस्तक बहाने का चित्र अतिशयोक्ति है। शिक्षा की निंदा नहीं, ज्ञान को जीवन में अपनाने का आग्रह है।
साखी ३७६ कथणीं बिना करणी कौ अंग · मूल क्रमांक ३
आथि = बहुत या पर्याप्त; पीड़ = प्रेम की कसक।
संसार ने बहुत पढ़ लिया; यदि प्रेम की कसक न जागी तो भीतर से पुकार कैसे निकलेगी?
सूचना के साथ संवेदना विकसित हो। समझ का मूल्य मनुष्यों और जीवन के प्रति व्यवहार में भी दिखे।
साखी ३७७ कथणीं बिना करणी कौ अंग · मूल क्रमांक ४
पोथी = पुस्तक; एकै आषिर = प्रेम का मूल अक्षर।
पुस्तकें पढ़ते जीवन बीत गया, पर सच्चा पांडित्य दुर्लभ रहा। प्रिय के सार को समझने वाला वास्तविक ज्ञानी है।
लोकप्रिय पाठांतर से अलग यहाँ संदर्भ-पाठ का ‘एकै आषिर’ है। शिक्षा का सार प्रेम और विवेक में खोजें।
२०. कामी नर कौ अंग
ऐतिहासिक वैराग्य की कठोर भाषा में अनियंत्रित कामना की आलोचना। मूल स्थानीय क्रमांक १–२७।
साखी ३७८ कामी नर कौ अंग · मूल क्रमांक १
काँमणि = स्त्री-रूप में कामासक्ति का बिंब; नागणी = सर्पिणी।
कामासक्ति को काली नागिन कहकर कवि बताते हैं कि विषय-लोलुप उसके विष में फँसते हैं, जबकि ईश्वर-प्रेमी बचते हैं।
यह ऐतिहासिक पुरुष-वैराग्य की भाषा है। उपयोगी शिक्षा सभी लिंगों के लिए संयम है; स्त्री स्वयं दोष या विष नहीं।
पाठ-टिप्पणी: वेब-पाठ के “राग सनेही” को मुद्रित पृष्ठ १२३ के “रांम सनेही” से मिलाया गया है।
साखी ३७९ कामी नर कौ अंग · मूल क्रमांक २
मीनीं = मछली; छेड़ौं = आसक्ति से उलझूँ।
वासना को ऐसी मछली कहा है जिससे छेड़छाड़ करने वाला फँसता है; हरिचरण में स्थिर मन उसके वश नहीं होता।
आकर्षण को अनियंत्रित आदत बनने से पहले पहचानें। संबंध में सम्मान और संयम रखें।
साखी ३८० कामी नर कौ अंग · मूल क्रमांक ३
परनारी = दूसरे के वैवाहिक संबंध की स्त्री; बिढता = अनुचित लाभ।
पर-संबंध और चोरी के लाभ कुछ दिन आनंद देते हैं, पर अंत में जीवन का आधार बिगाड़ सकते हैं।
क्षणिक सुख के लिए विश्वास और मर्यादा न तोड़ें। यह जिम्मेदारी हर व्यक्ति पर समान है।
साखी ३८१ कामी नर कौ अंग · मूल क्रमांक ४
बंचै = बचता; खाँड = चीनी।
अनुचित संबंध पहले चीनी जैसे मीठे लगते हैं, लेकिन बाद का परिणाम विष जैसा कष्टकारी हो सकता है।
संबंधों में विश्वास, सहमति और जिम्मेदारी आवश्यक हैं। आकर्षण के साथ उसके प्रभाव भी देखें।
साखी ३८२ कामी नर कौ अंग · मूल क्रमांक ५
राचणै = आसक्त होना; षार समंद = खारा समुद्र; मंछला = मछली।
अनुचित संबंध की आसक्ति गुण नहीं, हानि है; खारे समुद्र की मछली की तरह अनेक उसके भीतर ही भटकते रहते हैं।
रूपक बँधी हुई लालसा का संकेत है। आकर्षण के साथ उसके परिणाम देखें और संबंधों में विश्वास, सम्मान तथा मर्यादा रखें।
पाठ-टिप्पणी: वेब-पाठ में दूसरी पंक्ति विकृत है। मुद्रित पृष्ठ १२३ से खारे समुद्र की मछली वाला “षार समंद मैं मंछला” पाठ लिया गया है।
साखी ३८३ कामी नर कौ अंग · मूल क्रमांक ६
पाँनि = गंध; पूणैं = कोने में; दिवानि = खुले में।
अनुचित संबंध लहसुन की गंध जैसे हैं; छिपाकर किए जाएँ, तब भी उनका प्रभाव प्रकट हो जाता है।
गोपनीयता से गलत काम सही नहीं होता। विश्वास को चोट पहुँचाने वाले निर्णय से पहले विवेक करें।
साखी ३८४ कामी नर कौ अंग · मूल क्रमांक ७
सकाम = वासना या फल-इच्छा से भरा; निहकाम = निष्काम।
स्त्री और पुरुष दोनों देह की अनियंत्रित कामना में बँधे हैं; निष्काम स्मरण करने वाले राम के सच्चे भक्त हैं।
यह पद आलोचना को दोनों लिंगों तक फैलाता है। दोष लिंग नहीं, आसक्ति और स्वार्थ है।
साखी ३८५ कामी नर कौ अंग · मूल क्रमांक ८
बबेक = विवेक; कारिज = सार्थक कार्य।
कामासक्ति में डूबा लगाव बुद्धि और विवेक को ढकता है; जीवन की शक्ति घटती है और मूल काम अधूरे रहते हैं।
प्रेम और वासना की दासता अलग हैं। स्वस्थ संबंध विवेक, सम्मान और जिम्मेदारी बढ़ाते हैं।
साखी ३८६ कामी नर कौ अंग · मूल क्रमांक ९
बेगि = शीघ्र; मूरति भंग = देह का नाश।
भोजन, स्वाद और काम-सुख की अनियंत्रित दौड़ छोड़ो; देह नश्वर है, समय खोने का पछतावा हो सकता है।
सुख लेते हुए संतुलन रखें। जीवन का पूरा समय केवल उपभोग में न समेटें।
साखी ३८७ कामी नर कौ अंग · मूल क्रमांक १०
तीनि सुख = भक्ति, मुक्ति, आत्मज्ञान; पैसि = प्रवेश।
कवि कामासक्ति को भक्ति, स्वतंत्रता और आत्मज्ञान में बाधा बताते हैं।
पुरानी स्त्री-केंद्रित भाषा को सार्वभौमिक निर्णय न बनाएँ। सभी के लिए सीख है कि मनुष्य को वस्तु बनाकर न देखें।
साखी ३८८ कामी नर कौ अंग · मूल क्रमांक ११
कनक = सोना; काँमनी = काम-आकर्षण का प्रतीक।
सोना और कामना विषफल जैसे कहे गए हैं—देखते ही लालसा उठती है और उनमें डूबना हानि करता है।
धन और संबंध अपने आप दोष नहीं। उनकी अनियंत्रित चाह विवेक को ढकती है।
साखी ३८९ कामी नर कौ अंग · मूल क्रमांक १२
झाल = ज्वाला; परस्याँ = छूने या उलझने पर।
धन और वासना की लालसा आग जैसी है; आकर्षण मन को जलाता है, आसक्ति जीवन को व्याकुल करती है।
अपनी चाह की तीव्रता पहचानें। सीमा और संतोष से मन का संतुलन बचाएँ।
साखी ३९० कामी नर कौ अंग · मूल क्रमांक १३
भग = जननांग का पुराना स्पष्ट शब्द; गड़ंत = गिरते हुए।
केवल यौन-सुख की लिप्सा में अनेक गिरे और आगे भी गिरते रहेंगे—कवि ऐसी बेखबर दौड़ पर चेताते हैं।
आलोचना अनियंत्रित लिप्सा की है। किसी देह या लिंग की अवमानना के बजाय सम्मानपूर्ण, जिम्मेदार संबंध अपनाएँ।
साखी ३९१ कामी नर कौ अंग · मूल क्रमांक १४
जोरू = पत्नी या स्त्री का पुराना संबोधन; जूठणि = अपमानकारी उपमा।
कवि वैराग्य की कठोर भाषा में कामासक्त संग से दूर रहने वाले को श्रेष्ठ और उसमें डूबे को अधम कहते हैं।
यह उपमा आज स्त्री के अपमान का आधार नहीं हो सकती। ग्रहणयोग्य सीख अपनी इच्छाओं का संयम है।
साखी ३९२ कामी नर कौ अंग · मूल क्रमांक १५
कुण्ड = गहरा गड्ढा; थंभै बाग = लगाम सँभाले।
कामना का आकर्षण नरक-कुंड जैसा कठिन फंदा कहा गया है; विरला साधक अपनी लगाम सँभालता है।
ऐतिहासिक स्त्री-बिंब का आशय अनियंत्रित वासना से सावधानी है। किसी स्त्री को संकट का मूल न ठहराएँ।
साखी ३९३ कामी नर कौ अंग · मूल क्रमांक १६
निहाला = तपकर बदला; सूली = घोर कष्ट का बिंब।
कवि कामासक्ति के प्रभाव को सूली से भी कठिन कहते हैं; जैसे आग में लोहा तपकर अपना रूप खोता है।
अतिशयोक्ति मोह की तीव्रता दिखाती है। सकारात्मक संदेश संयम है, कष्ट देने या सहने का आदेश नहीं।
साखी ३९४ कामी नर कौ अंग · मूल क्रमांक १७
चैते = चेतता; संसे सूल = संशय की पीड़ा।
असावधान कामी चेतता नहीं और संशय का काँटा नहीं मिटता; कवि उसकी दशा को गंभीर नैतिक हानि कहते हैं।
धार्मिक क्षमा का भरोसा गलत आचरण जारी रखने का बहाना न बने। अपनी जिम्मेदारी लेकर सुधार करें।
साखी ३९५ कामी नर कौ अंग · मूल क्रमांक १८
इंद्री केरै स्वादि = इंद्रिय-तृप्ति में; बादि = व्यर्थ।
इंद्रिय-सुख की दासता ने भक्ति बिगाड़ी; हाथ का ज्ञान-हीरा खोकर जीवन का अवसर गँवाया।
क्षणिक तृप्ति और दीर्घ मूल्य में चुनाव करें। अपना समय और संबंध केवल लालसा को न सौंपें।
साखी ३९६ कामी नर कौ अंग · मूल क्रमांक १९
अमीं = अमृत; प्रमोधि = समझाओ; स्यंभ = परम सत्ता का संकेत।
कामी को अमृत जैसी हितकारी बात नहीं भाती; गलत रुचि जमी हो तो बार-बार समझाने पर भी बदलना कठिन है।
सीख फलने के लिए ग्रहणशीलता चाहिए। अपनी प्रतिरोधी आदत पहचानना परिवर्तन की शुरुआत है।
साखी ३९७ कामी नर कौ अंग · मूल क्रमांक २०
विलंबी = उलझी; मजकण = कुतरने वाले जीव का बिंब।
विषयों में अटकी चेतना भीतर से कुतरी जाती है; ऐसे मन में ज्ञान का बीज नहीं उगता।
गहरी आदत ध्यान और समझ की भूमि प्रभावित करती है। अभ्यास के साथ वातावरण तथा दिनचर्या भी सुधारें।
साखी ३९८ कामी नर कौ अंग · मूल क्रमांक २१
कंचुली = केंचुली; आगिला = आगे का।
विषय-कर्म की केंचुली पहनकर मनुष्य सर्प जैसा बनता है और अपने भविष्य का अहित नहीं देखता।
व्यवहार की पुनरावृत्ति पहचान बन सकती है। उसे बदलने के लिए परिणाम समझकर ठोस कदम उठाएँ।
साखी ३९९ कामी नर कौ अंग · मूल क्रमांक २२
कैसो = केशव; पूरिबला = पुराना।
वासना में डूबा मन न हरि-भजन में लगता है, न नाम सुनना चाहता है; उसे पुराने दोषों की पकड़ कहा गया है।
जिस बात से भीतर प्रतिरोध उठे, उसे शांत होकर देखें। दोषारोपण के बजाय अपनी रुचि का कारण समझें।
साखी ४०० कामी नर कौ अंग · मूल क्रमांक २३
अहिलाद = आनंद; साँथरा = बिछौना।
अनियंत्रित कामना लज्जा और विवेक नहीं देखती, जैसे नींद बिछौना और भूख स्वाद नहीं माँगती।
प्रबल आवेग निर्णय को सीमित कर सकता है। ऐसे समय ठहरकर मर्यादा और दूसरे की सहमति याद रखें।
साखी ४०१ कामी नर कौ अंग · मूल क्रमांक २४
आपणीं = अपनी; भुगत्या = भोग-वस्तु मानकर उपभोग।
चाहे अपना संबंध हो या पराया, वासनामात्र में डूबना हानिकारक है; आग पहचानकर उसमें हाथ न डालो।
यह वैराग्य का तीखा कथन है। सामान्य दांपत्य को दोषी ठहराने के बजाय वस्तुकरण और अनियंत्रित आसक्ति से बचें।
साखी ४०२ कामी नर कौ अंग · मूल क्रमांक २५
गिरही = गृहस्थ; वार न पार = अंत नहीं।
चेतावनी सुनकर भी असावधान व्यक्ति नहीं सँभलता। कामना का दास चाहे वैरागी हो या गृहस्थ, उलझन से नहीं निकलता।
वेश या जीवन-स्थिति नैतिक छूट नहीं देती। संयम और सम्मान सबके लिए हैं।
साखी ४०३ कामी नर कौ अंग · मूल क्रमांक २६
नींडर = निर्भय; संक = संकोच; भूंचै = भोगता।
अपने को ज्ञानी कहने वाला यदि इंद्रियों के वश होकर बिना विचार भोग में डूबे, तो उसकी निर्भयता अहं है।
ज्ञान का दावा अपने ऊपर जिम्मेदारी बढ़ाता है। उसे गलती उचित ठहराने का साधन न बनाएँ।
साखी ४०४ कामी नर कौ अंग · मूल क्रमांक २७
करंता = स्वयं को सर्वकर्ता मानने वाला; डरंता = सजग संकोची।
ज्ञानी ने अपने को सबका कर्ता मानकर मूल खोया; उससे वह साधारण व्यक्ति भला है जिसमें गलत काम का संकोच है।
आध्यात्मिक अहं साधारण विवेक से भी दूर कर सकता है। विनय और नैतिक सावधानी सँजोएँ।
२१. सहज कौ अंग
सहज निर्मलता, इंद्रियों का संतुलन और स्मरण का स्वभाव बनना। मूल स्थानीय क्रमांक १–४।
साखी ४०५ सहज कौ अंग · मूल क्रमांक १
सहज = स्वाभाविक निर्मलता; विषिया = विषयासक्ति।
सब सहज कहते हैं, पर अर्थ नहीं जानते। जिसकी विषयों की पकड़ स्वाभाविक रूप से ढीली हुई, वही सहज है।
सहजता मनमानी नहीं। अभ्यास से संयम बोझ के बजाय स्थिर स्वभाव बनने लगे।
साखी ४०६ सहज कौ अंग · मूल क्रमांक २
पाँचू = पाँच इंद्रियाँ; परसती = वश या संतुलन में।
सहज वही है जो पाँचों इंद्रियों को सजग संतुलन में रखता है; केवल सहज कहने से नहीं होता।
भीतर की स्वतंत्रता प्रतिक्रियाओं पर विवेक से दिखती है। आकर्षण और निर्णय के बीच स्थान बनाएँ।
साखी ४०७ सहज कौ अंग · मूल क्रमांक ३
सुत बित = संतान और संपत्ति; एकमेक = एकरस।
संतान, धन और कामना की आसक्ति सहज ढली; कबीर का चित्त राम में एकरस हुआ।
कर्तव्य निभाते हुए स्वामित्व का आग्रह कम हो सकता है। त्याग का केंद्र मोह है, संबंधों की उपेक्षा नहीं।
साखी ४०८ सहज कौ अंग · मूल क्रमांक ४
चीन्हैं = पहचानें; सहजै = सहज भाव से।
सब सहज की चर्चा करते हैं; सहज वह है जिसमें हरि का आत्मीय परिचय स्वाभाविक हो जाए।
साधना जीवन से अलग प्रदर्शन न रहे। स्मरण, सत्य और करुणा स्वभाव में उतरें।
२२. साँच कौ अंग
सत्य, कर्म का लेखा, करुणा और अनुष्ठान के साथ नैतिक जिम्मेदारी। मूल स्थानीय क्रमांक १–१७।
साखी ४०९ साँच कौ अंग · मूल क्रमांक १
साह = स्वामी; ष्वार = नष्ट; बिगूचनि = लज्जा।
स्वामी की दी जीवन-पूँजी मत गँवाओ; अपने कर्म का हिसाब सामने आने पर कठिन लज्जा होगी।
समय, क्षमता और विश्वास अमानत जैसे हैं। उनका उपयोग जिम्मेदारी और ईमानदारी से करें।
साखी ४१० साँच कौ अंग · मूल क्रमांक २
सोहरा = सरल; दीवाँन = न्यायालय; पला = पल्ला।
हृदय सच्चा हो तो हिसाब देना सरल है; उस निष्पक्ष न्याय में कोई पल्ला नहीं पकड़ता।
पारदर्शी जीवन अनावश्यक भय घटाता है। कथन और कर्म साफ हों तो उत्तरदायित्व निभाना सहज होता है।
साखी ४११ साँच कौ अंग · मूल क्रमांक ३
पयाना = प्रस्थान; काइथि = लेखा रखने वाला; दरिगह = न्याय-स्थान।
दूर की यात्रा का समय आया तो चित्त चौंका; लेखाकार ने कर्मों का कागज खोल दिया।
मृत्यु और न्याय की छवि जीवन-समीक्षा जगाती है। देर होने से पहले अपना हिसाब ईमानदारी से देखें।
साखी ४१२ साँच कौ अंग · मूल क्रमांक ४
वार न पार = अंतहीन; सँभार = स्मरण कर।
कर्मों का लेखा खुलने पर उसका अंत नहीं दिखता। जब तक साँस है, राम को सँभालो।
सुधार का अवसर वर्तमान है। स्मरण के साथ गलती रोकना और जहाँ संभव हो भरपाई करना भी जुड़ें।
साखी ४१३ साँच कौ अंग · मूल क्रमांक ५
पंच निवाज = पाँच नमाज़; अकाज = अहित।
सत्य दबाकर झूठ का साथ देने वाले काजी की बाहरी बंदगी को कबीर निष्फल कहते हैं।
आलोचना किसी धर्म की प्रार्थना की नहीं, अनुष्ठान और अन्यायी कर्म के विरोध की है। न्याय सभी आस्थाओं का नैतिक प्रश्न है।
साखी ४१४ साँच कौ अंग · मूल क्रमांक ६
हतै = मारता; मसीति = मस्जिद; एकै = एक ईश्वर।
स्वाद के लिए जीव मारकर ऊपर एक ईश्वर की घोषणा करने में कबीर नैतिक विरोध देखते हैं।
यह कवि की अहिंसा-दृष्टि है। उनके तर्क का केंद्र कथन और करुणा का मेल है, किसी समुदाय का अपमान नहीं।
साखी ४१५ साँच कौ अंग · मूल क्रमांक ७
दीन = धर्म; करद = छुरी।
काजी-मुल्ला सांसारिक स्वाद में उलझकर धर्म भूलते हैं, जब हाथ में छुरी लेकर हिंसा करते हैं—कवि ऐसा प्रतिवाद कहते हैं।
ऐतिहासिक मत-विवाद को संदर्भ में पढ़ें। अपने धर्मपालन में करुणा और आत्मपरीक्षण की जगह रखें।
साखी ४१६ साँच कौ अंग · मूल क्रमांक ८
जोरी = बलपूर्वक; जिबहै = वध करते; दई = दैवी सत्ता; हवाल = दशा।
बल से जीव मारकर उसे उचित कहने वाले से कवि पूछते हैं—दिव्य न्याय के सामने उसकी दशा क्या होगी?
धार्मिक नाम किसी कर्म की नैतिक समीक्षा समाप्त नहीं करता। शक्ति के उपयोग पर करुणापूर्वक विचार करें।
पाठ-टिप्पणी: वेब-प्रतिलिपि में “जोरी कलिर जिहै” जैसे मिले हुए अक्षर हैं। मुद्रित पृष्ठ १२६ के स्पष्ट पाठ से पंक्ति व्यवस्थित की गई है।
साखी ४१७ साँच कौ अंग · मूल क्रमांक ९
जुलम = अत्याचार; न्याव = न्याय; खालिक = स्रष्टा।
बलपूर्वक किया अत्याचार पीड़ित की न्याय-पुकार बनता है; स्रष्टा के सामने हिंसा का उत्तर देना होगा।
दूसरे की पीड़ा को अपनी सुविधा से छोटा न करें। न्याय में निर्बल की आवाज भी सुनी जाए।
साखी ४१८ साँच कौ अंग · मूल क्रमांक १०
गुझ = गुप्त मिलीभगत; जीवड़ा = जीव।
स्वामी से चोरी और चोरों से गुप्त समझौता अंत में छिपा नहीं रहेगा; उसका परिणाम सामने आएगा।
गलत साथ में मिला लाभ अस्थायी है। ईमानदारी का हिसाब अपनी अंतरात्मा से भी छिपाया नहीं जा सकता।
साखी ४१९ साँच कौ अंग · मूल क्रमांक ११
सेष = शेख; सबूरी = धैर्य; स्याबति = स्थिर।
धैर्य और हृदय की स्थिरता बिना हज या काबा जाने से भीतर ईश्वर का बोध कैसे होगा?
तीर्थ की उपयोगिता अंतःपरिवर्तन में है। बाहरी यात्रा के साथ विनय और सद्भाव विकसित हों।
साखी ४२० साँच कौ अंग · मूल क्रमांक १२
खुब खांड़ = बहुत स्वादिष्ट; खीचड़ी = खिचड़ी; टुक लूंण = थोड़ा नमक।
थोड़ा नमक पड़ी सादी खिचड़ी भी स्वादिष्ट है। समृद्ध भोजन के लोभ में अपने ऊपर घोर संकट क्यों बुलाएँ?
संतोष जीवन को अनैतिक लाभ और निर्भरता से बचाता है। सादगी का मूल्य उसकी स्वतंत्रता में है। अनुचित लोभ के बदले सादगी और ईमानदारी चुनें।
पाठ-टिप्पणी: वेब-प्रतिलिपि का “खोपड़ी” यहाँ “खीचड़ी” है। मुद्रित पृष्ठ १२७ और वियोगी हरि के साखी-संकलन से तुलना की गई है।
साखी ४२१ साँच कौ अंग · मूल क्रमांक १३
भषै = खाता; मद = मदिरा; दष्या = दीक्षा या बाहरी चिह्न।
पूजा में बैठकर भी हिंसा और मद में डूबे व्यक्ति को बाहरी धार्मिक चिह्न मुक्त नहीं करते—कवि का मत है।
इसे पूरे समुदाय पर निर्णय न बनाएँ। केंद्रीय संदेश अनुष्ठान के साथ चरित्र और संयम की आवश्यकता है।
साखी ४२२ साँच कौ अंग · मूल क्रमांक १४
सकति पूजि = शक्ति-उपासना का तत्कालीन संदर्भ; भ्रांति = दिखावा या विरोध।
कवि ऐसे सामूहिक कर्मकांड की आलोचना करते हैं जिसमें भोग का मेल है, पर भक्तिपूर्ण आचरण का सार नहीं।
यह ऐतिहासिक संप्रदाय-विवाद है। आज किसी उपासना-पद्धति या भक्त का अवमूल्यन नहीं, अपने कर्म का परीक्षण ग्रहण करें।
साखी ४२३ साँच कौ अंग · मूल क्रमांक १५
लज्या लोक = लोगों के कहने का डर; काठा = पकड़ा हुआ।
लोकलाज से सत्य का स्मरण नहीं करता; जान-बूझकर सोना छोड़कर काँच पकड़ता है।
भीड़ की स्वीकृति के लिए मूल मूल्य न खोएँ। नम्रता से अपनी सत्यनिष्ठ दिशा निभाएँ।
साखी ४२४ साँच कौ अंग · मूल क्रमांक १६
लार = पीछे चलना; सार = मूल तत्त्व।
जिसने मूल सत्य जाना, वह झूठे जग के पीछे क्यों भागेगा?
सत्य की पहचान निर्णयों में दिखाई दे। दूसरों की नकल से अधिक विवेकपूर्ण स्वतंत्रता विकसित करें।
साखी ४२५ साँच कौ अंग · मूल क्रमांक १७
दूणाँ = दोगुना; नेह = मेल।
झूठे को झूठा मिले तो उनका मेल बढ़ता है; सच्चे से सामना हो तो झूठ पर टिका संबंध टूटने लगता है।
सत्य असुविधाजनक हो सकता है, पर सुधार का अवसर भी देता है। गलत संग को केवल अपनापन मानकर न बचाएँ।
२३. भ्रम विधौंसण कौ अंग
निर्गुण साधना की दृष्टि से बाहरी आश्रय और अंतर्बोध का प्रश्न। मूल स्थानीय क्रमांक १–११।
साखी ४२६ भ्रम विधौंसण कौ अंग · मूल क्रमांक १
पांहण = पत्थर; पूतला = प्रतिमा; काली धार = कठिन संसार-धारा।
कबीर निर्जीव रूप को ही सर्वस्व मानकर भीतर का सत्य भूलने वाले को अस्थिर आश्रय पर निर्भर बताते हैं।
यह उनकी निर्गुण साधना की दृष्टि है। इसे दूसरे की श्रद्धा का अपमान बनाने के बजाय अपने अंतःभाव की समीक्षा करें।
साखी ४२७ भ्रम विधौंसण कौ अंग · मूल क्रमांक २
मसि = कालिख; कपाट = दरवाजे; बाट = मार्ग।
कालिख की कोठरी और काले कर्मों के द्वार की छवि से कवि भ्रमपूर्ण धार्मिक मार्ग का प्रतिवाद करते हैं।
रूप और व्यवस्था के साथ उनके नैतिक परिणाम भी जाँचें। अज्ञान बढ़ाने वाली परंपरा पर प्रश्न संभव है।
साखी ४२८ भ्रम विधौंसण कौ अंग · मूल क्रमांक ३
आसामुषी = आशा की ओर मुँह किए; आब = गरिमा या जीवन-रस।
जो अपने प्रश्न का उत्तर ही न दे सके, उससे अंधी अपेक्षा रखकर मनुष्य अपना जीवन-सार खोता है—कवि का तर्क है।
कबीर की उपासना-समीक्षा को संदर्भ सहित पढ़ें। मुख्य सीख विवेक और अनुभव को निष्क्रिय न करना है।
साखी ४२९ भ्रम विधौंसण कौ अंग · मूल क्रमांक ४
रन के रोझ = जंगल के नीलगाय जैसे भटकने वाले; बोझ = अंधानुकरण।
मैं भी बाहर भटकता रहता, यदि गुरु की कृपा से सिर का अज्ञान-बोझ न उतरता।
मार्गदर्शन का फल प्रश्न और अंतर्बोध का जागना है। केवल अनुष्ठान बदलना पर्याप्त नहीं।
साखी ४३० भ्रम विधौंसण कौ अंग · मूल क्रमांक ५
जेती आत्मा = जितने जीव; सालिगराँम = पूज्य परम उपस्थिति।
जितने जीव देखता हूँ, उनमें दिव्यता है। संत प्रत्यक्ष जीवन में ईश्वर की याद दिलाते हैं।
कवि पूजा को जीवंत करुणा की ओर मोड़ते हैं। मनुष्य और प्राणी की गरिमा उपासना से अलग न रहे।
साखी ४३१ भ्रम विधौंसण कौ अंग · मूल क्रमांक ६
भ्रांति = भ्रम; लाइ = आग; सुषिनै = स्वप्न में।
शालिग्राम की सेवा के बाद भी यदि भ्रम और जलन बढ़ें, तो भीतर शीतलता नहीं आई।
उपासना का फल आचरण में देखें। ईर्ष्या और क्रोध घटें तो साधन अपना उद्देश्य पूरा करता है।
साखी ४३२ भ्रम विधौंसण कौ अंग · मूल क्रमांक ७
सेत = सफेद; बोढ़े = ओढ़े।
शालिग्राम की सेवा करते हुए माया से प्रेम रखना काला कपड़ा ओढ़कर उसे सफेद नाम देने जैसा है।
नाम बदलने से अंतःस्थिति नहीं बदलती। अपने उद्देश्य और वास्तविक व्यवहार का मेल जाँचें।
पाठ-टिप्पणी: यह मुख्य मूल क्रमांक ७ है। स्रोत में इसी से पहले जुड़ा “माला फेरत जुग भया…” ख-प्रति का अतिरिक्त पाठ है; उसे यहाँ मुख्य गिनती में नहीं जोड़ा गया है।
साखी ४३३ भ्रम विधौंसण कौ अंग · मूल क्रमांक ८
थोथरा = सारहीन; सूवा = तोता; सैबल = सेमल।
भीतर का सार न हो तो जप-तप और तीर्थ सूखे सेमल से फल की आशा करने वाले तोते जैसे हैं।
अनुष्ठान का मूल्य भाव और परिवर्तन में है। संख्या के साथ सजगता, प्रेम और नैतिकता जोड़ें।
साखी ४३४ भ्रम विधौंसण कौ अंग · मूल क्रमांक ९
बेलड़ी = फैलती लता; हलाहल = घोर विष; निकंदिया = जड़ काटी।
तीर्थ-आसक्ति की फैलती लता को कवि बंधन कहते हैं; उसके भ्रम की जड़ काटने पर विष क्यों लें?
आलोचना बाहरी साधन को अंतिम मानने की है। यात्रा और रीति अंतर्बोध में सहायक बनें।
साखी ४३५ भ्रम विधौंसण कौ अंग · मूल क्रमांक १०
दसवाँ द्वारा = चेतना का सूक्ष्म द्वार; देहुरा = मंदिर।
मन को मथुरा, हृदय को द्वारका और देह को काशी जानो; भीतर के मंदिर में ज्योति पहचानो।
बाहरी पवित्रता का आंतरिक आयाम है। चित्त की निर्मलता और जीवंत करुणा को उपासना में स्थान दें।
साखी ४३६ भ्रम विधौंसण कौ अंग · मूल क्रमांक ११
सोस = सीस का पाठ-रूप; ल्यौ = ध्यान।
जग बाहर मंदिरों में सिर झुकाता है, पर हरि हृदय में हैं; भीतर भी ध्यान लगाओ।
बाहरी प्रणाम के साथ मन का समर्पण हो। दैनिक व्यवहार में विनय उसकी सच्चाई दिखाए।
२४. भेष कौ अंग
माला, वेश और धार्मिक चिह्नों के साथ हृदय की सच्चाई की कसौटी। मूल स्थानीय क्रमांक १–२६।
साखी ४३७ भेष कौ अंग · मूल क्रमांक १
डंडूल = भटकाव या चंचलता; सूल = पीड़ा।
हाथ माला जपते हैं, पर हृदय भटकता है; बाहरी साधन के साथ भीतर की असंगति दुःख देती है।
माला ध्यान का सहायक बने। हाथ की गति के साथ मन और अर्थ को भी स्मरण में जोड़ें।
साखी ४३८ भेष कौ अंग · मूल क्रमांक २
चहुँ वीर = चारों ओर; काठ की ठौर = लकड़ी का बाहरी सहारा।
अँगुलियों से गिनती चलती है, मन दिशाओं में दौड़ता है। भीतर फेरना था, उसे छोड़ केवल लकड़ी का सहारा रह गया।
जप की संख्या के साथ सजगता महत्त्वपूर्ण है। भटके मन को प्रेम से फिर नाम की ओर लौटाएँ।
साखी ४३९ भेष कौ अंग · मूल क्रमांक ३
मनमुषी = मन की मनमानी करने वाला; मन माला = अंतःस्मरण।
मनमाना व्यक्ति माला पहने तो क्या हुआ? मन की माला फेरने वाला भीतर उजाला करता है।
धार्मिक पहचान से अधिक मन की दिशा देखें। साधन का फल व्यवहार और चित्त की निर्मलता में हो।
साखी ४४० भेष कौ अंग · मूल क्रमांक ४
अचेत = असावधान; हेत = प्रेम।
माला पहनकर भी असावधान रहा, भीड़ के प्रवाह में बह गया और हरि से प्रेम नहीं जुड़ा।
दूसरों को देखकर अभ्यास करने के साथ उसका अर्थ समझें। व्यक्तिगत निष्ठा और नियमितता आवश्यक हैं।
साखी ४४१ भेष कौ अंग · मूल क्रमांक ५
आपणों = अपना; फिरावै = बदले या फेरे।
काठ की माला मानो कहती है—अपना मन नहीं बदलते, मुझे क्यों फेरते रहते हो?
साधन पर सारी जिम्मेदारी न डालें। मन की आदत और कर्म का परिवर्तन साधक का अपना काम है।
साखी ४४२ भेष कौ अंग · मूल क्रमांक ६
अरहट = रहट; संसारी भेष = बाहरी पहचान।
सच्ची माला मन की है; केवल गले की माला से हरि मिलते तो रहट की घूमती माला को भी मिल जाते।
यांत्रिक पुनरावृत्ति के साथ भाव और अर्थ जरूरी हैं। उपकरण सहायक है, अनुभव का विकल्प नहीं।
साखी ४४३ भेष कौ अंग · मूल क्रमांक ७
हींगलू = हिंगुल, लाल रंग; भँगारि = कचरा।
माला का भार उठाने से क्या हुआ, यदि बाहर लाल रंग और भीतर कचरा भरा है?
बाहरी सजावट के साथ भीतर ईर्ष्या, छल और अहं देखें। निर्मलता का काम अंतःकरण में भी हो।
साखी ४४४ भेष कौ अंग · मूल क्रमांक ८
काती = गाँठ या उलझन का संदर्भ; पड़ता हाथि = अभ्यास की बाहरी गति।
माला पहनना पर्याप्त नहीं; मन की उलझन साथ है तो हाथ चलते रहते हैं, भीतर प्रभु का परिचय नहीं होता।
अभ्यास में बाधा पहचानना उपयोगी है। मनन और चरित्र-सुधार को जप से अलग न करें।
साखी ४४५ भेष कौ अंग · मूल क्रमांक ९
गाँठि = भीतर का बंधन; अमरापुर = मुक्ति का आश्रय।
माला से पहले हृदय की गाँठ खोलो और हरिचरण में चित्त रखो; तभी मुक्ति की दिशा खुलेगी।
द्वेष और स्वार्थ ढीले होने पर स्मरण गहरा होता है। सरलता और क्षमा भी साधना के काम हैं।
साखी ४४६ भेष कौ अंग · मूल क्रमांक १०
भगति = प्रेमपूर्ण साधना; माथौ मूँछ = सिर और मूँछ।
माला पहनी, सिर-मूँछ मुँडाई और भीड़ के साथ चले, लेकिन भक्ति का सार हाथ नहीं आया।
रूप बदलने के साथ दृष्टि बदलना जरूरी है। अनुकरण से आगे स्वयं समझकर अभ्यास करें।
साखी ४४७ भेष कौ अंग · मूल क्रमांक ११
सुध भाइ = निर्मल भाव; घुरड़ि = पूरा मुँडाकर।
स्वामी के प्रति सच्चे और दूसरों के प्रति निर्मल रहो; बाल लंबे हों या सिर मुँडा हो, मूल बात यही है।
आध्यात्मिकता का माप वेश नहीं, सत्य और सद्भाव है। बाहरी अंतर के कारण मनुष्य की गरिमा न घटाएँ।
साखी ४४८ भेष कौ अंग · मूल क्रमांक १२
मूड़े = मुँडाए; बिषै विकार = विषयासक्ति के दोष।
बालों ने क्या बिगाड़ा कि सौ बार मुँडाते हो? विकारों से भरा मन क्यों नहीं सँवारते?
बाहरी प्रतीक याद दिलाएँ, पर भीतर का काम स्वयं करना होगा। ईर्ष्या और लालसा की जड़ देखें।
साखी ४४९ भेष कौ अंग · मूल क्रमांक १३
मेवासी = हठी, अवश; काँइ = क्यों।
अपने हठी मन को साधो; बाल मुँडाने से क्या? कर्म मन ने किए, बालों ने नहीं।
गलती के वास्तविक कारण पर काम करें। रूप बदलना तभी उपयोगी है जब आचरण भी बदले।
साखी ४५० भेष कौ अंग · मूल क्रमांक १४
मूँड़ = सिर; औरे काँम = दूसरी, विरोधी इच्छाएँ।
सिर मुँडाते दिन बीते, राम नहीं मिले। मन में दूसरे स्वार्थ हों तो नाम कहने का गहरा फल कैसे हो?
वाणी और भीतर की चाह का अंतर देखें। निष्कपटता स्मरण की शक्ति बढ़ाती है।
साखी ४५१ भेष कौ अंग · मूल क्रमांक १५
सोरहा = सबके सामने प्रतिष्ठित; सेरी = गली।
साधु-वेश से सुविधा और भोजन मिला, लेकिन जिस आंतरिक मार्ग से संत निकले, वही बंद रखा।
धार्मिक जीवन को सुविधा की व्यवस्था न बनाएँ। सत्य के लिए आवश्यक अनुशासन भी स्वीकारें।
साखी ४५२ भेष कौ अंग · मूल क्रमांक १६
बेसनों = वैष्णव; छापा = धार्मिक चिह्न; बबेक = विवेक।
वैष्णव कहलाकर भी विवेक न समझा, तो तिलक और छाप से दूसरों को भ्रमित करना भक्ति नहीं है।
किसी मत का नाम चरित्र का स्वतः प्रमाण नहीं। ईमानदारी और करुणा से पहचान सार्थक होती है।
साखी ४५३ भेष कौ अंग · मूल क्रमांक १७
जोगी = संयमी साधक; सिधि = साधना का फल।
देह का योगी-वेश सब बना लेते हैं, मन का योगी विरला है। मन सँवरे तो साधना का सार सहज मिलता है।
अनुशासन मन, वाणी और कर्म तक पहुँचे। केवल शरीर की मुद्रा या पोशाक पर न रुकें।
साखी ४५४ भेष कौ अंग · मूल क्रमांक १८
अलेष = अलक्ष्य; पड़दा = आवरण।
परम तत्त्व एक है; भेष ने उसके ऊपर आवरण डाल दिया। भ्रम हटे तो सबमें वही अदृश्य आधार दिखे।
पहचान के बाहरी भेद अंतिम सत्य नहीं। मनुष्यों के प्रति समान आदर और व्यापक दृष्टि विकसित करें।
साखी ४५५ भेष कौ अंग · मूल क्रमांक १९
अनंतहि = अनेक; परचा = परिचय।
अनेक वेश धारण किए, लेकिन भ्रम न गया। गुरु के वास्तविक परिचय बिना भीतर का सत्य अनपहचाना रहा।
बाहरी नवीनता को प्रगति न समझें। देखें कि समझ, संयम और करुणा वास्तव में बढ़ रहे हैं या नहीं।
साखी ४५६ भेष कौ अंग · मूल क्रमांक २०
जहंदम = नरक-जैसा उलझाव; जिहाज = पार ले जाने का साधन।
झूठी कुल-प्रतिष्ठा में जग उलझा है; देह और वंश दोनों नश्वर हैं, फिर भी राम का सहारा नहीं लिया।
जन्मगत अहं से ऊपर उठें। परिवार का सम्मान सत्य और सेवा से करें।
साखी ४५७ भेष कौ अंग · मूल क्रमांक २१
पष = पक्षपात; लार = पीछे दौड़; अलष = अलख।
पक्षपात, कुल की झूठी प्रतिष्ठा और वेश में उलझकर संसार मूल सत्य भूलता और कठिन धारा में डूबता है।
समूह की पहचान विवेक पर भारी न हो। अपने पक्ष की गलती भी देखने का साहस रखें।
साखी ४५८ भेष कौ अंग · मूल क्रमांक २२
निसप्रेही = निःस्वार्थ; निरधार = बाहरी सहारे से मुक्त।
चतुर बातों से हरि नहीं मिलते; निःस्वार्थ और निष्कपट मन का मूल्य गोपीनाथ पहचानते हैं।
प्रभावशाली भाषा से अधिक सच्चा उद्देश्य महत्त्वपूर्ण है। साधना को लाभ का सौदा न बनाएँ।
साखी ४५९ भेष कौ अंग · मूल क्रमांक २३
नवसत = अनेक श्रृंगार; पटम = बाहरी सजावट।
नायिका ने तन-मन सजाया, पर प्रिय के मन को न भाए तो श्रृंगार से क्या लाभ?
दांपत्य-उपमा भीतर के प्रेम पर जोर देती है। पूजा की सजावट के साथ हृदय की निष्कपटता भी हो।
साखी ४६० भेष कौ अंग · मूल क्रमांक २४
हथलेवा = विवाह का हाथ-मिलन; परचा = अनुभव।
प्रिय का अनुभव न हुआ तो बाहरी संबंध अधूरा है। वास्तविक मिलन हो तो उसकी गहरी पहचान कठिन कसौटी पर होती है।
नाम और संस्कार आरंभ हैं, पूरा अनुभव नहीं। निष्ठा निभाने से संबंध का सार खुलता है।
साखी ४६१ भेष कौ अंग · मूल क्रमांक २५
मैंवासा = अहं का हठी दुर्ग; हूण मतै = होना चाहता।
मन में हरि-भक्ति का उत्साह है और सेवक बनना चाहता हूँ, पर अहं का हठी दुर्ग टूटता नहीं।
उत्साह के साथ भीतर की बाधा पहचानें। सेवा का भाव विनय और अपने आग्रह छोड़ने से गहराता है।
पाठ-टिप्पणी: वेब में अलग लिखे “मैं वासा” का संयुक्त रूप “मैंवासा” मुद्रित पृष्ठ १३१ में है; अगले पद में भी यही अहं-दुर्ग का संकेत है।
साखी ४६२ भेष कौ अंग · मूल क्रमांक २६
दुरिजन = बुरी प्रवृत्तियाँ; भरिपूरि = परिपूर्ण।
अहं का दुर्ग जीत लिया, बुरी प्रवृत्तियाँ दूर हुईं और प्रिय राम का राज्य मन-नगर में भर गया।
साधना का सकारात्मक फल अंतःशांति और सद्गुण हैं। केवल दोष दबाने के बजाय करुणा, सत्य और प्रेम विकसित हों।
२५. कुसंगति कौ अंग
बुरे प्रभाव, लालच और जन्म के बदले कर्म का मूल्य। मूल स्थानीय क्रमांक १–७।
साखी ४६३ कुसंगति कौ अंग · मूल क्रमांक १
भोमि = भूमि; बिनंठा = बिगड़ा; भठछार = नष्ट।
आकाश की निर्मल बूँद दूषित भूमि में गिरकर बदल जाती है; बुरी संगति मनुष्य के मूल गुण बिगाड़ सकती है।
परिवेश का प्रभाव पहचानें। ऐसे संबंध और आदत चुनें जो विवेक तथा सदाचार बढ़ाएँ।
साखी ४६४ कुसंगति कौ अंग · मूल क्रमांक २
भवंग = सर्प; तिहुँ भाइ = तीन अलग रूप।
मूर्ख संग से बचो; लोहा पानी में नहीं तैरता। एक बूँद अलग पात्रों में अलग प्रभाव पाती है।
कदली, सीप और सर्प का प्रसंग पुरानी लोकमान्यता है। मुख्य सीख ग्रहणकर्ता और संगति का प्रभाव समझना है।
साखी ४६५ कुसंगति कौ अंग · मूल क्रमांक ३
कालर = ऊसर; नीपजै = उपजता।
हितकारी भक्त से रूठकर केवल स्वार्थी संग से लगाव रखने वाला ऊसर खेत जैसा फलहीन हो सकता है।
जो गलती पर सच कहे, उससे केवल असुविधा के कारण दूर न हों। संबंध में हित पहचानें।
साखी ४६६ कुसंगति कौ अंग · मूल क्रमांक ४
काँठै = पास; बेरि = काँटेदार वृक्ष।
काँटेदार बेर के पास केला हिले तो उसकी पत्ती फटती है; ऐसी ही हानि बुरी संगति से होती है।
निकटता का प्रभाव रोज पड़ता है। अपने समय और विश्वास को बार-बार चोट पहुँचाने वाले संग से सीमा रखें।
पाठ-टिप्पणी: वेब-पाठ के पहले शब्द “नारी” का पाठ मुद्रित संदर्भ में “मारी” मिलता है। उपमा केले और काँटेदार बेर की कुसंगति की है।
साखी ४६७ कुसंगति कौ अंग · मूल क्रमांक ५
मीच = मृत्यु; नसाँणी = नष्ट करने वाली; बाँणी = वाणी।
कुसंगति आध्यात्मिक जीवन का नाश करती है; हे प्राणी, ब्रह्म की हितकारी वाणी सँभालो।
सही सीख कठिन वातावरण में आधार देती है। उसे स्मरण के साथ व्यवहार में भी अपनाएँ।
साखी ४६८ कुसंगति कौ अंग · मूल क्रमांक ६
माषी = मक्खी; लपटाइ = चिपककर।
मक्खी गुड़ में फँसी, पंख चिपके और फिर छूटने को पछताई; मिठास ही उसका जाल बनी।
आनंद में सीमा भूलना निर्भरता बना सकता है। आकर्षण के साथ उसकी कीमत भी देखें।
साखी ४६९ कुसंगति कौ अंग · मूल क्रमांक ७
सुरे = मदिरा; सोवन = सोना; करणी = कर्म।
ऊँचे कुल में जन्म से क्या, यदि कर्म ऊँचे नहीं? सोने का पात्र भी मदिरा से भरा हो तो सम्मान का आधार नहीं।
जन्म के बजाय गुण और आचरण से मनुष्य को परखें। श्रेष्ठता का अहं सच्चे धर्म से दूर करता है।
२६. संगति कौ अंग
समझकर चुनी निष्ठा और संसार में रहते निर्मलता। मूल स्थानीय क्रमांक १–८।
साखी ४७० संगति कौ अंग · मूल क्रमांक १
अपरचे = बिना परिचय; साँमी मूठि = दृढ़ पकड़।
देखादेखी पकड़ा संबंध अनुभव बिना छूट जाता है; विरला गुरु की सीख को दृढ़ता से थामता है।
समझकर चुनी निष्ठा कठिन समय में टिकती है। अनुकरण के साथ अपनी अनुभूति और विचार जोड़ें।
साखी ४७१ संगति कौ अंग · मूल क्रमांक २
कंचुली = केंचुली; बिपति = कठिनाई।
देखादेखी की भक्ति में पक्का रंग नहीं चढ़ता; विपत्ति आए तो साँप की केंचुली की तरह छूट जाती है।
अभ्यास केवल अनुकूल समय का शौक न हो। नियमितता और समझ उसके आधार हैं।
साखी ४७२ संगति कौ अंग · मूल क्रमांक ३
सारीपा = अच्छे पक्के रंग का संकेत; लीर लीर = टुकड़े-टुकड़े।
ऐसी संगति करो जिसका रंग सच्चा हो; कपड़ा फट जाए, तब भी वह रंग न छोड़े।
निष्ठा का माप कठिन परिस्थिति है। मित्रता और साधना में निष्कपट स्थिरता विकसित करें।
साखी ४७३ संगति कौ अंग · मूल क्रमांक ४
सुठि = बहुत अच्छे से; आरास = आरा।
मन ऐसे सच्चे आश्रय को दो जो कठिनतम कसौटी पर भी दूसरी ओर न मुड़े।
आरा और सिर का चित्र निष्ठा की अतिशयोक्ति है। उपयोगी भाव सत्य के प्रति दृढ़ता है, आत्महानि नहीं।
साखी ४७४ संगति कौ अंग · मूल क्रमांक ५
पाँहण = पत्थर; हाडि = हड्डी; वेह = घाव या भेद।
कठोर पत्थर और हड्डी के बिंब से कवि कहते हैं कि मोह में डूबे हृदय से आत्मीय समझ पाना कठिन है।
संबंध में ग्रहणशीलता देखें। किसी को अपमानित किए बिना अपनी अपेक्षा और सीमा स्पष्ट रखें।
साखी ४७५ संगति कौ अंग · मूल क्रमांक ६
ओड़ि = अंत तक; बनिता बिबिध = अनेक आकर्षणों का रूपक।
उससे प्रेम करो जो अंत तक निभाए; अनेक आकर्षणों में बिखरने से संबंध में दोष और चोट आती है।
स्थिरता, सम्मान और जिम्मेदारी आत्मीयता का आधार हैं। दूसरे को केवल मनबहलाव का साधन न बनाएँ।
साखी ४७६ संगति कौ अंग · मूल क्रमांक ७
तन पंषी = देह या जीवन पक्षी जैसा; फल = परिणाम।
जीवन-पक्षी मन की दिशा में उड़ता है; जैसी संगति करेगा, वैसा फल पाएगा।
अपने वातावरण का चयन सजगता से करें। नियमित संग धीरे-धीरे विचार और व्यवहार बनाता है।
साखी ४७७ संगति कौ अंग · मूल क्रमांक ८
काजल की कोठढ़ी = दूषित वातावरण; पैसि = प्रवेश करके।
संसार काजल की कोठरी जैसा है; धन्य वह जो उसमें रहकर भी निर्मल निकलता है।
कर्तव्य से भागना आवश्यक नहीं। दबावों के बीच सत्य और संयम बनाए रखना साधना है।
२७. असाध कौ अंग
छलपूर्ण वेश, मीठी बात और वास्तविक चरित्र का अंतर। मूल स्थानीय क्रमांक १–३।
साखी ४७८ असाध कौ अंग · मूल क्रमांक १
अतीत = वैरागी; करतूति = कर्म; असाध = असज्जन।
वैरागी का वेश है, कर्म अपराधपूर्ण हैं; बाहर साधु दिखता है, भीतर विपरीत वृत्ति है।
वेश के साथ व्यवहार परखें। विश्वास का आधार निष्कपटता और जिम्मेदारी हो।
साखी ४७९ असाध कौ अंग · मूल क्रमांक २
धीजिये = भरोसा कीजिए; बग = बगुला।
सफेद रूप और शांत मुद्रा देखकर भरोसा न करो; बगुला ध्यान का रूप धरकर शिकार झपटता है।
मधुर रूप के पीछे उद्देश्य भी देखें। धीरे-धीरे परखा चरित्र जल्द बनी छवि से अधिक भरोसेमंद है।
साखी ४८० असाध कौ अंग · मूल क्रमांक ३
थाह = उथला स्थान; ऊँड़ै = गहरे में।
मीठा बोलने से ही साधु मत मानो; पहले उथला दिखाकर कोई गहरे संकट में ले जा सकता है।
विश्वास समय और कर्म से बनाएँ। चापलूसी तथा वास्तविक हित में अंतर पहचानें।
२८. साध कौ अंग
हितकारी संगति, सत्संग और भीतर के गुणों का विकास। मूल स्थानीय क्रमांक १–१३।
साखी ४८१ साध कौ अंग · मूल क्रमांक १
बाँवना = चंदन का वृक्ष; नीब = नीम।
सज्जन की संगति निष्फल नहीं; उसके प्रभाव से कड़वी नीम भी रूपक में चंदन-सी हो जाती है।
अच्छा वातावरण बदलने की क्षमता जगाता है। दूसरों के गुण सीखकर अपने व्यवहार में उतारें।
साखी ४८२ साध कौ अंग · मूल क्रमांक २
बेगि = शीघ्र; दुरमति = गलत समझ; सुमति = विवेक।
सज्जन-संगति शीघ्र अपनाओ; वह गलत समझ दूर करके हितकारी बुद्धि दिखाएगी।
ऐसा साथ खोजें जो केवल प्रशंसा नहीं, सुधार का अवसर भी दे।
साखी ४८३ साध कौ अंग · मूल क्रमांक ३
जगनाथ = जगन्नाथ; कछू = कुछ।
मथुरा, द्वारका या जगन्नाथ जाओ, पर सत्संग और भीतर की भक्ति बिना मूल लाभ नहीं मिलेगा।
यात्रा प्रेरणा दे, उसका फल आचरण में हो। पवित्र स्थान के साथ मन की तैयारी भी आवश्यक है।
साखी ४८४ साध कौ अंग · मूल क्रमांक ४
बैष्णों = ईश्वरभक्त; सुमिरावै = स्मरण कराए।
मेरे दो साथी हैं—राम और भक्त। एक मुक्ति का दाता है, दूसरा नाम की याद दिलाता है।
हितकारी संग मन को अपने मूल लक्ष्य पर लौटाता है। ऐसे संबंध के प्रति कृतज्ञ रहें।
साखी ४८५ साध कौ अंग · मूल क्रमांक ५
कारणि = खोज के लिए; सारे = सँवारे।
राम को खोजते वन-वन भटका; राम जैसे गुणों वाले भक्त मिले तो मेरे काम सँवर गए।
ईश्वर की खोज जीवंत सद्गुणों की संगति से दिशा पा सकती है। प्रेम और सेवा में उसका स्पर्श पहचानें।
साखी ४८६ साध कौ अंग · मूल क्रमांक ६
अंक = गोद; भेटिया = मिला।
वह दिन शुभ है जब संत मिलें; आत्मीय मिलन से भीतर के दोषों की पकड़ घटती है।
मिलना मात्र चमत्कार नहीं। उनकी अच्छी सीख अपनाने से ही स्थायी परिवर्तन होगा।
साखी ४८७ साध कौ अंग · मूल क्रमांक ७
बिड़ा = समूह; आक पलास = दूसरे वृक्ष।
चंदन के पास आक-पलाश बैठे तो उसकी सुगंध से प्रभावित हुए; चंदन ने निकट वालों को अपने जैसा बनाया।
सज्जनता का प्रभाव उदार होता है। अपने आसपास के वातावरण में भी हितकारी व्यवहार फैलाएँ।
साखी ४८८ साध कौ अंग · मूल क्रमांक ८
खाईं = खाई; कोट = दुर्ग; गंगोदिक = गंगाजल।
किले की खाई का जल कोई न पीए, पर गंगा से मिले तो वही गंगाजल कहलाता है।
सत्संग से जीवन की दिशा बदल सकती है। पुरानी गलती को स्थायी पहचान न मानकर सुधार का अवसर दें।
साखी ४८९ साध कौ अंग · मूल क्रमांक ९
सुपिनै = स्वप्न में; नेह = लगाव।
जो जान-बूझकर सत्य छोड़ झूठ से प्रेम करता है, उसका संग मुझे स्वप्न में भी न मिले।
जानकारी के बाद भी छल चुनना गंभीर बात है। आत्मीयता के साथ नैतिक सीमा बनाए रखें।
साखी ४९० साध कौ अंग · मूल क्रमांक १०
हियाली = हृदय में; गंजन = बार-बार की पीड़ा।
हे राम, उससे मिलाओ जिसके हृदय में तुम हो; रोज की असार पीड़ा से निकालकर सही आश्रय दो।
प्रार्थना सही संगति की याचना है। ऐसा साथ चुनें जो मन को सत्य और करुणा की ओर ले जाए।
साखी ४९१ साध कौ अंग · मूल क्रमांक ११
कत = कहाँ; उलटी = मूल की ओर लौटी।
समुद्र की असंख्य लहरें उठती-मिटती हैं; धन्य वह जो बाहरी दौड़ उलटकर अपने मूल में समा जाए।
विचारों के प्रवाह के पीछे उनका आधार देखें। कुछ शांत मनन मन की अनावश्यक प्रतिक्रिया घटाता है।
साखी ४९२ साध कौ अंग · मूल क्रमांक १२
ओट = आश्रय; कोट = दुर्ग।
चारों ओर कालिख का संसार है; राम का आश्रय लेकर निर्मल रहने वाला साधक धन्य है।
कठिन वातावरण में अपने मूल्य याद रखें। बाहरी दबाव सत्यनिष्ठा छोड़ने का कारण न बने।
साखी ४९३ साध कौ अंग · मूल क्रमांक १३
हजारी कपड़ा = उत्तम रंग का कपड़ा; काँवली = कंबल; साषित = भक्ति-विमुख व्यक्ति का पुराना संबोधन।
भक्ति पक्के निर्मल रंग का वस्त्र है; प्रेम-विहीन कर्मकांड काले कंबल जैसा अपना अँधेरा फैलाता है—कवि की उपमा है।
रूपक के मत-सूचक शब्द को समुदाय पर न थोपें। भीतर प्रेम और विवेक का रंग चढ़ाना मुख्य सीख है।
२९. साध साषीभूत कौ अंग
संत के लक्षण, निष्काम प्रेम, संवेदना और सबमें दिव्यता की पहचान। मूल स्थानीय क्रमांक १–२१।
साखी ४९४ साध साषीभूत कौ अंग · मूल क्रमांक १
निरबैरी = वैररहित; निहकाँमता = निष्कामता; अँग = लक्षण।
संत के लक्षण हैं—किसी से वैर न रखना, निष्काम होना, स्वामी से प्रेम और विषयों की दासता से दूरी।
साधुता का माप व्यवहार है। धर्म के नाम पर द्वेष और स्वार्थ बढ़े तो आत्मपरीक्षण करें।
साखी ४९५ साध साषीभूत कौ अंग · मूल क्रमांक २
संतई = सज्जनता; भुवंगा = सर्प।
करोड़ों असंत मिलें, संत अपनी सज्जनता नहीं छोड़ता; सर्प लिपटें तो भी चंदन शीतलता नहीं त्यागता।
दूसरे का दोष अपनी कठोरता का बहाना न बने। सीमा रखते हुए भी सद्भाव बचाया जा सकता है।
साखी ४९६ साध साषीभूत कौ अंग · मूल क्रमांक ३
भाँवता = प्रिय; उनमनाँ = अंतर्मुख; रूठड़ा = जग के मोह से अलग।
हरि का प्रिय दूर से अपनी अंतर्मुखता और विषयों से विरक्ति में पहचाना जाता है।
देह का दुबलापन योग्यता का माप नहीं। मूल भाव प्रदर्शन से दूरी और भीतर की सच्ची निष्ठा है।
साखी ४९७ साध साषीभूत कौ अंग · मूल क्रमांक ४
झीणाँ = दुबला; पंजर = देह।
कवि हरि-प्रेमी की तड़प को दुबली देह, कम नींद और क्षीण अंगों के चित्र में कहते हैं।
यह विरह-काव्य की अतिशयोक्ति है। साधना का प्रमाण स्वास्थ्य बिगाड़ना नहीं; उसका सार प्रेम और सजगता है।
साखी ४९८ साध साषीभूत कौ अंग · मूल क्रमांक ५
अणरता = प्रेम में न रमा; रातै = प्रेमरंगी; बेलंत = व्याकुल।
प्रेम से अनजान चैन से सोता है; प्रेम में रमा जल-विहीन मछली जैसी व्याकुलता से समय बिताता है।
यह साधक की गहरी चाह का रूपक है। सामान्य विश्राम छोड़ना इसका निर्देश नहीं।
साखी ४९९ साध साषीभूत कौ अंग · मूल क्रमांक ६
अबूझी = कठिन समझ; बलाइ = विपत्ति।
जो गहरा प्रश्न नहीं जानते, निश्चिंत सोते हैं; मैंने कठिन सत्य समझा तो नई जिम्मेदारी और व्याकुलता जागी।
समझ कभी असुविधा लाती है। उससे भागने के बजाय विनय, धैर्य और सही कर्म विकसित करें।
साखी ५०० साध साषीभूत कौ अंग · मूल क्रमांक ७
नित मरण = अहं का निरंतर क्षय; सर अपसर = उचित-अनुचित अवसर।
सजग भक्त रोज अपने अहं से जूझता है; असावधान केवल पेट भरने का राज्य देखता है और अवसर नहीं समझता।
जीवन केवल उपभोग तक सीमित नहीं। ज्ञान के साथ अपने कर्म की जिम्मेदारी भी बढ़ती है।
साखी ५०१ साध साषीभूत कौ अंग · मूल क्रमांक ८
बिनाँण = विवेकपूर्ण पहचान; आवटणाँ = तीव्र मंथन; षंडै = बिना रुके।
जिस हृदय में समझ जागी, उसमें गहरा मंथन है; उसे अपने मन से रोज सामना करना पड़ता है।
आत्मज्ञान निष्क्रिय आराम नहीं। अपनी प्रतिक्रिया और आदत पर ईमानदार काम उसका हिस्सा है।
साखी ५०२ साध साषीभूत कौ अंग · मूल क्रमांक ९
बिकल = व्याकुल; तंबोली = पान बेचने वाला।
राम-वियोगी की देह की व्याकुलता लोग नहीं पहचानते; वह पान-पत्ते की तरह दिन-दिन पीली पड़ती कही गई है।
देह-चित्र आंतरिक विरह की कविता है। वास्तविक अस्वस्थता को केवल आध्यात्मिक स्थिति मानकर उपेक्षित न करें।
साखी ५०३ साध साषीभूत कौ अंग · मूल क्रमांक १०
पीलक = पीलापन; लंघण = उपवास; जोग = मिलन हेतु।
लोग प्रेम-विरह के पीलेपन को देह-रोग कहते हैं; साधक छिपकर प्रिय के लिए संयम करता है—कवि का चित्र है।
भावार्थ भीतर की आत्मीयता है। उपवास या देह-कष्ट साधना की अनिवार्य कसौटी नहीं हैं।
साखी ५०४ साध साषीभूत कौ अंग · मूल क्रमांक ११
काम = गहरी चाह, यहाँ साधना की ओर मोड़ी; सुखदेव = शुकदेव का संकेत।
इच्छा की शक्ति सही ढंग से साधी जाए तो राम की खोज में लगा सकती है; शुकदेव का प्रसंग साक्षी कहा गया है।
ऊर्जा का दमन ही एक मार्ग नहीं। उसे सजगता, सेवा और उच्च उद्देश्य की दिशा भी दी जा सकती है।
साखी ५०५ साध साषीभूत कौ अंग · मूल क्रमांक १२
बिरकत = विरक्त; रत = रमा; साषी = साक्षी।
कामासक्ति से विरक्त होकर मन हरिनाम में रमा; गोरखनाथ की साधना को उसके स्थायित्व का उदाहरण कहा गया है।
कथा-संकेत आत्मसंयम की प्रतिष्ठा करता है। ‘अमर’ को देह की गारंटी नहीं, साधना की कीर्ति और चेतना का बिंब समझें।
साखी ५०६ साध साषीभूत कौ अंग · मूल क्रमांक १३
विषै = विषयों की आसक्ति; अंतर = अंतःकरण।
जब विषयों की आसक्ति सर्वोच्च है, हरि का बोध ओझल है; हरि बसें तो विषयों की दासता घटती है।
जीवन की प्राथमिकता चित्त बनाती है। आवश्यक उपयोग और अनियंत्रित लालसा में अंतर रखें।
साखी ५०७ साध साषीभूत कौ अंग · मूल क्रमांक १४
संसौ = संशय; तिणाँ = तिनके जितना भी अंतर।
संशय में बँधा मन राम को नहीं पहचानता; प्रेमपूर्ण भक्त और प्रिय के बीच तिनका-जितनी दूरी भी नहीं रहती।
यह आत्मीय भरोसे की उपमा है। प्रश्न दबाने के बजाय समझ और अभ्यास से स्पष्टता विकसित करें।
साखी ५०८ साध साषीभूत कौ अंग · मूल क्रमांक १५
सगलाही = सभी; पिछाँणि = पहचान।
स्वार्थ के लिए सब अपना बनते हैं; बिना स्वार्थ सम्मान करे तो उसमें हरि-प्रेम की पहचान करो।
निष्काम आदर संबंध का गहरा मूल्य है। दूसरों को उनके उपयोग से परे भी गरिमा दें।
साखी ५०९ साध साषीभूत कौ अंग · मूल क्रमांक १६
छाँनाँ = छिपा; उजाजा = उजाला।
जिस हृदय में हरि का प्रकाश जागा, वह छिपता नहीं; दबाने पर भी उसकी आभा प्रकट होती है।
असली भक्ति का प्रमाण ऊँचा दावा नहीं। सत्य, करुणा और नम्र व्यवहार उसकी पहचान कराते हैं।
साखी ५१० साध साषीभूत कौ अंग · मूल क्रमांक १७
फाटै दीदे = खुली आँखें; छाना = छिपा।
खुली आँखों से खोजता फिरता हूँ; जिस हृदय में मेरा स्वामी प्रकट है, वह अनपहचाना कैसे रह सकता है?
साधक जीवंत सद्गुणों में प्रिय की पहचान खोजता है। रूप से आगे चरित्र को देखने की दृष्टि विकसित करें।
साखी ५११ साध साषीभूत कौ अंग · मूल क्रमांक १८
सूनी सेज = रिक्त हृदय; परगड = प्रकट।
स्वामी सभी हृदयों में हैं, कोई सेज सूनी नहीं; भाग्य उस हृदय का जहाँ उनका बोध प्रकट हो।
सभी में दिव्यता का भाव समान सम्मान जगाता है। साधना उस संभावना को चेतना और कर्म में प्रकट करे।
साखी ५१२ साध साषीभूत कौ अंग · मूल क्रमांक १९
पावक = अग्नि; चकमक = अग्नि उत्पन्न करने वाला पत्थर।
राम अग्नि की तरह हर हृदय में हैं; चित्त की चकमक न जुड़े तो केवल धुआँ-सा भ्रम उठता है।
संभावना के साथ सजग प्रयास चाहिए। ध्यान, मनन और अच्छे आचरण से भीतर की स्पष्टता विकसित करें।
साखी ५१३ साध साषीभूत कौ अंग · मूल क्रमांक २०
खालिक = स्रष्टा; बिसई = विषय-लोलुप; बंदगी = उपासना।
सच्चा जागरण परम चेतना का है। साधारण जागना कोई चिंता या विषयों के कारण जागता है, भक्त उपासना से।
रात जागना अपने आप साधना नहीं। चित्त की दिशा और सजगता उसके अर्थ तय करती है।
साखी ५१४ साध साषीभूत कौ अंग · मूल क्रमांक २१
मीराँ = स्वामी; किनि फुरमाई = किसने कहा।
कबीर जा रहे थे, सामने खुदा मिले और पूछा—किसके कहने से गा रहे हो?
यह भीतर से उठे प्रश्न का संवाद-रूप है। उपासना केवल आदेश या प्रदर्शन से है, या सच्चे प्रेम से—अपना उद्देश्य देखें।
३०. साध महिमाँ कौ अंग
पद, धन और वंश से ऊपर प्रेम, भक्ति तथा सज्जनता का महत्त्व। मूल स्थानीय क्रमांक १–११।
साखी ५१५ साध महिमाँ कौ अंग · मूल क्रमांक १
कुटकी = छोटा टुकड़ा; अबराँउँ = बड़ा जंगल; छपरी = झोंपड़ी।
चंदन का छोटा टुकड़ा बबूल के बड़े वन से भला; भक्त की झोंपड़ी प्रेमहीन बड़े गाँव से श्रेष्ठ कही गई है।
आकार और संपदा से अधिक गुण महत्त्वपूर्ण हैं। छोटे साधन में भी निर्मल जीवन संभव है।
साखी ५१६ साध महिमाँ कौ अंग · मूल क्रमांक २
पुरपाटण = नगर; सूबस = सुगंध या सुंदर बसावट; भाँइ = दृष्टि में।
नगर सुंदर, सुगंधित और उत्सवमय हो, पर राम-प्रेम बिना कबीर की दृष्टि में उजड़ा है।
भवनों का विकास मानवीय संवेदना का विकल्प नहीं। समुदाय में प्रेम और सेवा भी हों।
साखी ५१७ साध महिमाँ कौ अंग · मूल क्रमांक ३
मरड़हट = श्मशान; पूजिये = आदर हो।
जहाँ सज्जन का सम्मान और हरि की सेवा नहीं, वह घर कवि को श्मशान जैसा सूना लगता है।
गृह की जीवंतता आदर और करुणा में है। कठोर उपमा दूसरों को हीन कहने के बजाय अपने घर पर मनन कराए।
साखी ५१८ साध महिमाँ कौ अंग · मूल क्रमांक ४
है गै गैंवर = घोड़े, गायें, हाथी; भिष्या = भिक्षा।
घने धन, पशु और छत्र-ध्वजा वाले वैभव से वह सादा जीवन भला जिसमें दिन हरि-स्मरण में बीते।
धन की निंदा नहीं, मूल्य की तुलना है। समृद्धि मन की शांति और भक्ति को न निगले।
साखी ५१९ साध महिमाँ कौ अंग · मूल क्रमांक ५
पटंतर = तुलना; पनिहारि = पानी भरने वाली स्त्री।
राजवैभव वाली रानी भी उस साधारण पनिहारिन की भक्ति की बराबरी नहीं करती—कवि ऐसा महत्त्व बताते हैं।
आध्यात्मिक गरिमा पद और धन से स्वतंत्र है। साधारण श्रम करने वाले व्यक्ति का समान सम्मान करें।
साखी ५२० साध महिमाँ कौ अंग · मूल क्रमांक ६
वामाँग = बायाँ अंग, दांपत्य का संकेत; माँन = सम्मान।
रानी को नीचा और पनिहारिन को ऊँचा क्यों कहा? भेद पद का नहीं; एक राजसज्जा में है, दूसरी नियमित राम-स्मरण में।
उपमा की कसौटी भक्ति है, स्त्रियों की सामाजिक होड़ नहीं। हर जीवन-स्थिति में सजगता संभव है।
साखी ५२१ साध महिमाँ कौ अंग · मूल क्रमांक ७
धनि = धन्य; बैसनों = भक्त; अऊत = आध्यात्मिक फल से रिक्त।
धन्य वह माता जिसने भक्त संतान को जन्म दिया; राम-स्मरण से वह निर्भय हुआ, जबकि जग मूल सार भूलता है।
संतान के गुण प्रेम और सदाचार में दिखें। किसी परिवार को संतान के आधार पर कमतर न आँकें।
साखी ५२२ साध महिमाँ कौ अंग · मूल क्रमांक ८
दास = सच्चा भक्त; आक पलास = कम सुगंध वाले वृक्ष।
कवि वह कुल श्रेष्ठ कहते हैं जिसमें भक्त जन्मे; केवल नाम की वंश-प्रतिष्ठा को निष्फल वृक्षों से तुलना करते हैं।
वंश की सच्ची शोभा गुण और सेवा हैं। जन्मगत श्रेष्ठता का अहं इस सीख के विपरीत है।
साखी ५२३ साध महिमाँ कौ अंग · मूल क्रमांक ९
साषत = भक्ति-विमुख कर्मकांडी; चंडाल = पुराना जातिसूचक शब्द।
कबीर कहते हैं—जन्म से ऊँचा कहलाने वाले प्रेमहीन व्यक्ति से अधिक भक्त समझे जाने वाले तथाकथित निम्नजन को गले लगाओ।
पद जातिगत ऊँच-नीच का प्रतिवाद है। किसी जन्म को अपवित्र न मानें; सम्मान का आधार मानवता और गुण हैं।
साखी ५२४ साध महिमाँ कौ अंग · मूल क्रमांक १०
दालिद = निर्धन; सारँगपाँनि = विष्णु; मंदिर = बड़ा भवन।
राम-स्मरण वाला निर्धन और टूटी छत भी उस महल से अच्छे हैं जहाँ भक्ति नहीं; महल जलाने की तीखी अतिशयोक्ति है।
मुख्य संदेश धन से ऊपर गुण है। इसे किसी भवन को नुकसान पहुँचाने की प्रेरणा न समझें।
साखी ५२५ साध महिमाँ कौ अंग · मूल क्रमांक ११
केतकी = सुगंधित फूल; भवर = भक्तों का रूपक।
कबीर की भक्ति केतकी की सुगंध जैसी हुई, भक्त-भौंरे आए; जहाँ निष्कपट भक्ति है, वहीं राम की उपस्थिति है।
सच्चा गुण अपने प्रभाव से पहचाना जाता है। आत्मप्रचार के बजाय प्रेम और सदाचार की सुगंध फैलाएँ।
३१. मधि कौ अंग
द्वंद्व से आगे समता, नाम-भेद में आत्मीयता और अहं का परिवर्तन। मूल स्थानीय क्रमांक १–११।
साखी ५२६ मधि कौ अंग · मूल क्रमांक १
मधि अंग = मध्य, द्वंद्व से परे दृष्टि; दुइ दुइ = दो छोर।
मध्य की समता में स्थिर हो तो पार उतरना सहज है; परस्पर विरोधी छोरों में फँसकर संसार डूबता है।
मध्य का अर्थ अन्याय पर निष्क्रियता नहीं। लोभ-द्वेष से मुक्त होकर विवेकपूर्ण निर्णय करें।
साखी ५२७ मधि कौ अंग · मूल क्रमांक २
दुविधा = द्वंद्व; सीतल तपति = ठंडी और गरम।
दुविधा हटाकर सत्य का एक आधार पकड़ो; आसक्ति और द्वेष के दोनों छोर अलग लगें, फिर भी जलाने वाली आग हैं।
दोनों प्रतिक्रियाओं की पकड़ पहचानें। संतुलन सत्य और करुणा से बने।
साखी ५२८ मधि कौ अंग · मूल क्रमांक ३
अनल = कल्पित आकाशवासी पक्षी; बसुधा ब्यौम = धरती-आकाश।
अनल-पक्षी जैसा अंतराकाश में घर बनाकर साधक दोनों छोरों से विरक्त मध्य की निरंतरता में रहता है।
लोककल्पना भीतर की समता कहती है। अपने विश्वास को केवल बाहरी विरोधों पर निर्भर न रखें।
साखी ५२९ मधि कौ अंग · मूल क्रमांक ४
गमि = पहुँच; छाहड़ी घंम = छाँह और धूप।
जहाँ दिन-रात, स्वप्न, धूप-छाँह का सामान्य भेद नहीं, कबीर उस अंतर-स्थिति में ठहरे हैं।
यह द्वंद्वातीत ध्यान का काव्य है। व्यावहारिक जीवन में उससे स्थिरता और धैर्य ग्रहण करें।
साखी ५३० मधि कौ अंग · मूल क्रमांक ५
पैडै = रास्ते; बहीर = भीड़; औघट = कठिन।
पंडितों के रास्ते पर दुनिया की भीड़ चली; गुरु ने कठिन अंतर्मुख घाट बताया, कबीर उस ओर बढ़े।
भीड़ की दिशा ही अंतिम प्रमाण नहीं। विवेक और अनुभव से अपनी साधना की राह समझें।
साखी ५३१ मधि कौ अंग · मूल क्रमांक ६
श्रग नृक = स्वर्ग-नरक के पाठ-रूप; प्रसादि = कृपा।
गुरु-कृपा से स्वर्ग के लोभ और नरक के भय से आगे हुआ; चरण-कमल की आत्मीयता में रहना चाहता हूँ।
निष्काम भक्ति पुरस्कार और दंड के सौदे से व्यापक है। सत्य और प्रेम स्वयं साधना के मूल्य बनें।
साखी ५३२ मधि कौ अंग · मूल क्रमांक ७
दुइ = दो का कठोर भेद; जीवता = सच्चे बोध में जागा।
हिंदू राम, मुसलमान खुदा कहते हैं; कबीर के अनुसार सच्चा जागा वह है जो इस नाम-भेद में नहीं उलझता।
संबोधन अलग हों, पर ईश्वर-प्रेम द्वेष का कारण न बने। दूसरों की आस्था का आदर रखें।
साखी ५३३ मधि कौ अंग · मूल क्रमांक ८
झूरि = व्याकुल होकर; मेल्हे दूरि = प्रभाव से मुक्त किए।
दुःखी दुःख में और सुखी सुख की चाह में उलझे; राम के प्रेमी दोनों की दासता छोड़ आनंद में हैं।
समता भावनाहीनता नहीं। सुख-दुःख आते हुए भी विवेक और करुणा बनाए रखें।
साखी ५३४ मधि कौ अंग · मूल क्रमांक ९
हरदी = हल्दी; बरन = रंग।
पीली हल्दी और सफेद चूना मिलकर अपना पुराना रंग छोड़ नए रंग में आते हैं; राम-प्रेमियों का मिलन ऐसा है।
आत्मीयता में अपने अहं का कठोर रंग बदलता है। संबंध परस्पर सीखने और उदार होने का अवसर बने।
साखी ५३५ मधि कौ अंग · मूल क्रमांक १०
मोट चून = मोटा आटा; जीभ = भोजन या तृप्ति का कठिन पाठ।
काबा-काशी और राम-रहीम के भेद मिटे; जैसे मोटा आटा महीन होकर एकरस होता है, वैसी तृप्ति मिली।
यह धर्मों की आत्मीय एकता का रूपक है। भिन्न परंपराएँ मिटाना नहीं, द्वेष और श्रेष्ठता का आग्रह छोड़ना सीखें।
पाठ-टिप्पणी: अंतिम शब्द का संदर्भ-वेब-पाठ “जीभ” है; उसे अनुमान से नहीं बदला गया है। अर्थ में एकरसता और तृप्ति का केंद्रीय संकेत लिया गया है।
साखी ५३६ मधि कौ अंग · मूल क्रमांक ११
तूँबड़ा = तुंबे का पात्र; षट दरसन = छह दर्शन; सिध = सिद्ध।
धरती-आकाश के बीच अनेक पात्र और मत हैं; छह दर्शन तथा चौरासी सिद्ध भी तत्त्व की उलझन में पड़े हैं।
दार्शनिक प्रणाली उपयोगी है, पर अंतिम सत्य का संपूर्ण अधिकार नहीं। ज्ञान के साथ विनय बनाए रखें।
३२. सारग्राही कौ अंग
गुण चुनना, सार पहचानना और विविधता से मधुर सीख ग्रहण करना। मूल स्थानीय क्रमांक १–४।
साखी ५३७ सारग्राही कौ अंग · मूल क्रमांक १
षीर = दूध; नीर = पानी; तात = तत्त्व।
हरिनाम दूध का सार है, अन्य व्यवहार पानी जैसा; विवेकी हंसरूपी साधक उनका सार पहचानता है।
दूध-पानी अलग करने का लोकबिंब विवेक सिखाता है। दैनिक काम करते हुए मूल मूल्य न भूलें।
साखी ५३८ सारग्राही कौ अंग · मूल क्रमांक २
साषत = भक्ति-विमुख व्यक्ति; बैशनों = भक्त; हाँणि = हानि।
कबीर सबको भक्त की दृष्टि से पहचानने को कहते हैं; जो नाम का सार न समझे, हानि उसी के जीवन की है।
मत-सूचक पुराने शब्द को जन्मगत निर्णय न बनाएँ। हर व्यक्ति में सीखने और बदलने की संभावना देखें।
साखी ५३९ सारग्राही कौ अंग · मूल क्रमांक ३
बीनि = चुनकर; मधुप = भौंरा; पर आत्म = दूसरे में आत्मतत्त्व।
दोष न पकड़ो, गुण चुनो; भौंरे की तरह अलग-अलग हृदयों से मधु लेकर सबमें आत्मतत्त्व पहचानो।
विवेक का अर्थ दोष छिपाना नहीं। आवश्यक सीमा रखते हुए भी दूसरे के अच्छे गुण सीखें।
साखी ५४० सारग्राही कौ अंग · मूल क्रमांक ४
बसुधा = पृथ्वी; मिष्ट सुबास = मधुर सुगंध; विषमं = अप्रिय।
धरती पर अनेक वन, फल और फूल हैं; कबीर मधुर सुगंध ग्रहण करते हैं, कटुता लेकर क्यों फिरें?
विविधता में सार ग्रहण करें। संसार से सीखते हुए उपयोगी गुण अपनाना और अनावश्यक द्वेष छोड़ना साधना है।
इस भाग से मनन के छह सूत्र
- मन की दिशा देखें: हर इच्छा के पीछे चलने से पहले ठहरकर विवेक करें।
- वचन का कर्म से मेल हो: उपदेश का मूल्य उसके पालन में है।
- सत्य के साथ करुणा: धर्मपालन मनुष्य और जीव की गरिमा से अलग न हो।
- वेश के पीछे चरित्र: चिह्न और लोकप्रियता से अधिक निष्कपट आचरण देखें।
- संगति सजगता से चुनें: जो विवेक, धैर्य और गुण बढ़ाए, उससे सीखें।
- सार ग्रहण करें: विविधता में अच्छे गुण चुनें और अनावश्यक द्वेष छोड़ें।
इस भाग के सामान्य प्रश्न
भाग २ में कितनी साखियाँ हैं?
अंग १३–३२ की २६८ मुख्य साखियाँ हैं। श्रृंखला के संयुक्त क्रमांक २७३–५४० हैं; हर पद का अंग-स्थानीय क्रमांक भी साथ है।
पहला भाग कहाँ पढ़ें?
भाग १—गुरुदेव से चितावणी, साखी १–२७२ में पहले १२ अंग पूरे हैं। इसी क्रम की अगली कड़ी यह दूसरा भाग है।
कठोर पुराने सामाजिक शब्दों को कैसे पढ़ें?
उन्हें ऐतिहासिक पाठ और कवि की वैराग्य या मत-विवाद की भाषा के रूप में पढ़ें। किसी समूह की अवमानना के बजाय अपने मोह, अहं और आचरण की जाँच करें। अर्थों में जहाँ जरूरी है, यह संदर्भ स्पष्ट है।
क्या कबीर माला और कीर्तन को व्यर्थ कहते हैं?
इन अंगों की केंद्रीय कसौटी भीतर का परिवर्तन है। मन कहीं और हो और केवल बाहरी क्रिया चले, तो कवि प्रश्न करते हैं। सजग भाव, अर्थ और सदाचार के साथ साधन का उपयोग समझना चाहिए।
क्या ये सभी पाठांतर सहित पूरा आलोचनात्मक संस्करण है?
नहीं। मुख्य क्रम वाले पद लिए गए हैं। ख-प्रति की अतिरिक्त टिप्पणियाँ मुख्य गिनती से अलग हैं; आवश्यक पाठ-सुधार पर स्रोत बताया गया है। यह सरल अध्ययन-सहायक पाठक-संस्करण है।
अगला भाग कहाँ से शुरू होगा?
भाग ३ अंग ३३—विचार कौ अंग से शुरू होगा और अंग ५९—अबिहड़ तक मुख्य साखी-पाठ पूरा करेगा। प्रकाशन से पहले उसका काल्पनिक लिंक नहीं दिया गया है।
संदर्भ और पाठ-व्यवस्था
आधार: श्यामसुंदर दास संपादित कबीर ग्रंथावली का मुख्य साखी-पाठ—अंग १३–३२।
- हिंदी समय: ग्रंथावली का अनुक्रम और संपादकीय परिचय
- हिंदी समय: साखी-पाठ और प्रति-टिप्पणियाँ
- कविता कोश: भ्रम-विध्वंस अंग में मुख्य पाठ और अतिरिक्त टिप्पणी का अंतर
- मुद्रित ग्रंथ: कथन और आचरण वाले अंग
- मुद्रित ग्रंथ: कामी नर अंग का आरंभ
- मुद्रित ग्रंथ: साँच अंग का पहला पृष्ठ
- मुद्रित ग्रंथ: साँच के शेष पद और खिचड़ी की साखी
- मुद्रित ग्रंथ: भेष के अंत और कुसंगति का आरंभ
- वियोगी हरि का कबीरदास की साखियाँ संकलन: साँच अंग का तुलनात्मक पाठ
गिनती: अंगों में क्रमशः ३०, १०, २, ३२, २२, ५, ४, २७, ४, १७, ११, २६, ७, ८, ३, १३, २१, ११, ११ और ४ मुख्य साखियाँ हैं—कुल २६८। चाँणक और भेष अंग में मुख्य क्रम से बाहर जुड़ी प्रति-टिप्पणियों के दोहे अलग रखे गए हैं।
संपादन: रिक्तियाँ, अनावश्यक वेब-पंक्ति-विभाजन और स्पष्ट छूटी विराम-सीमाएँ व्यवस्थित की गई हैं। जहाँ शब्द-पाठ बदला है, संबंधित साखी पर टिप्पणी है। शेष पुराने रूप बड़े स्तर पर आधुनिक नहीं बनाए गए। कठिन शब्दों के आशय संदर्भानुसार हैं; योगिक और दुर्बोध पदों में एक से अधिक अर्थ संभव हैं।
व्याख्या: शब्दार्थ, सरल अर्थ और जीवन-संदेश स्वतंत्र व्याख्याएँ हैं। कबीर की मूल साखियों तथा बाद के टिप्पणीकारों की विस्तृत टीकाओं को इनके साथ मिला हुआ मूल पाठ न समझें।
गुण चुनें, सत्य अपनाएँ
साधना मन की दिशा, कथन और कर्म के मेल तथा संगति के चयन में उतरती है। किसी एक साखी की एक सीख दिन के व्यवहार में अपनाएँ।
अगला निर्धारित भाग: अंग ३३–५९—विचार से अबिहड़ तक।
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