कबीर ग्रंथावली भाग 2 — साखी 273–540 मूल पाठ, हिंदी अर्थ और भावार्थ सहित

भक्ति भावना प्रस्तुत · संत कबीरदास जी का संत साहित्य
कबीर ग्रंथावली · विस्तृत भाग २

कबीर ग्रंथावली — भाग 2
साखी 273–540 · हिंदी अर्थ सहित

मन से सारग्राही तक · २० पूरे अंग · २६८ साखियाँ

मन की सजगता से सत्य, संगति और संत-स्वभाव तक—मूल पाठ, कठिन शब्दार्थ, सरल हिंदी अर्थ और स्वतंत्र भावार्थ का विस्तृत अध्ययन।

२६८ मूल साखियाँअंग १३–३२तीन-भागीय साखी-श्रृंखला

मन को समझने से सार ग्रहण करने तक

पहले भाग में गुरुदेव से चितावणी तक अंग १–१२ की २७२ साखियाँ थीं। इस दूसरे भाग में मन कौ अंग से सारग्राही कौ अंग तक, अंग १३–३२ की २६८ मुख्य साखियाँ हैं। पहले भाग का संयुक्त क्रम आगे बढ़ाते हुए यहाँ २७३–५४० क्रमांक दिए गए हैं। हर अंग आरंभ से अंत तक पूरा है।

कबीर बाहरी पहचान के साथ भीतर की वास्तविक स्थिति पूछते हैं। मन कहाँ भागता है, शब्द कर्म में उतरते हैं या नहीं, संगति क्या बनाती है और अनेक भेदों में सार कैसे चुनें—ये इस भाग के प्रमुख प्रश्न हैं।

मुख्य साखी-पाठ की तीन-भागीय योजना

भागअंगपाठ का विस्तार
भाग ११–१२गुरुदेव से चितावणी · संयुक्त क्रम १–२७२
भाग २१३–३२मन से सारग्राही · संयुक्त क्रम २७३–५४०
भाग ३३३–५९विचार से अबिहड़ · मुख्य साखी-पाठ का अगला और अंतिम भाग

यह योजना संदर्भ-संस्करण के मुख्य साखी-पाठ के ५९ अंगों की है। पद, भजन, रमैनी और अलग परिशिष्ट इस श्रृंखला में सम्मिलित नहीं हैं। भाग ३ प्रकाशित होने पर उसका वास्तविक लिंक जोड़ा जाएगा।

दूसरे भाग के २० पूरे अंग

१३. मन कौ अंग
साखी २७३–३०२ · ३० मुख्य साखियाँ
१४. सूषिम मारग कौ अंग
साखी ३०३–३१२ · १० मुख्य साखियाँ
१५. सूषिम जनम कौ अंग
साखी ३१३–३१४ · २ मुख्य साखियाँ
१६. माया कौ अंग
साखी ३१५–३४६ · ३२ मुख्य साखियाँ
१७. चाँणक कौ अंग
साखी ३४७–३६८ · २२ मुख्य साखियाँ
१८. करणीं बिना कथणीं कौ अंग
साखी ३६९–३७३ · ५ मुख्य साखियाँ
१९. कथणीं बिना करणी कौ अंग
साखी ३७४–३७७ · ४ मुख्य साखियाँ
२०. कामी नर कौ अंग
साखी ३७८–४०४ · २७ मुख्य साखियाँ
२१. सहज कौ अंग
साखी ४०५–४०८ · ४ मुख्य साखियाँ
२२. साँच कौ अंग
साखी ४०९–४२५ · १७ मुख्य साखियाँ
२३. भ्रम विधौंसण कौ अंग
साखी ४२६–४३६ · ११ मुख्य साखियाँ
२४. भेष कौ अंग
साखी ४३७–४६२ · २६ मुख्य साखियाँ
२५. कुसंगति कौ अंग
साखी ४६३–४६९ · ७ मुख्य साखियाँ
२६. संगति कौ अंग
साखी ४७०–४७७ · ८ मुख्य साखियाँ
२७. असाध कौ अंग
साखी ४७८–४८० · ३ मुख्य साखियाँ
२८. साध कौ अंग
साखी ४८१–४९३ · १३ मुख्य साखियाँ
२९. साध साषीभूत कौ अंग
साखी ४९४–५१४ · २१ मुख्य साखियाँ
३०. साध महिमाँ कौ अंग
साखी ५१५–५२५ · ११ मुख्य साखियाँ
३१. मधि कौ अंग
साखी ५२६–५३६ · ११ मुख्य साखियाँ
३२. सारग्राही कौ अंग
साखी ५३७–५४० · ४ मुख्य साखियाँ

अपनी इच्छित साखी चुनें

क्रमांक-समूह खोलकर सीधे मूल पाठ और अर्थ पर पहुँचें। सभी साखियाँ इसी लेख में हैं।

साखी २७३–२९६
साखी २९७–३२०
साखी ३२१–३४४
साखी ३४५–३६८
साखी ३६९–३९२
साखी ३९३–४१६
साखी ४१७–४४०
साखी ४४१–४६४
साखी ४६५–४८८
साखी ४८९–५१२
साखी ५१३–५३६
साखी ५३७–५४०

१३. मन कौ अंग

चंचलता, आत्मपरीक्षण, मन की लगाम और सजग अभ्यास। मूल स्थानीय क्रमांक १–३०।

साखी २७३ मन कौ अंग · मूल क्रमांक १

मन कै मते न चालिये, छाड़ि जीव की बाँणि। ताकू केरे सूत ज्यूँ, उलटि अपूठा आँणि॥
कठिन शब्दार्थ

बाँणि = आदत; अपूठा = उलटा; ताकू = तकुआ।

सरल हिंदी अर्थ

मन की हर इच्छा के पीछे मत चलो। तकुए का सूत उलटकर समेटने की तरह बिखरे ध्यान को भीतर लौटाओ।

भावार्थ और जीवन-संदेश

चंचल विचार आदेश नहीं हैं। इच्छा और निर्णय के बीच ठहरकर विवेक से काम चुनें।

साखी २७४ मन कौ अंग · मूल क्रमांक २

चिंता चिति निबारिए, फिर बूझिए न कोइ। इंद्री पसर मिटाइए, सहजि मिलैगा सोइ॥
कठिन शब्दार्थ

चिति = चित्त में; पसर = फैलाव; सहजि = सहज भाव से।

सरल हिंदी अर्थ

व्यर्थ चिंता हटाओ और इंद्रियों का अनियंत्रित फैलाव समेटो; शांत चित्त में परम सत्य का परिचय सहज होगा।

भावार्थ और जीवन-संदेश

ध्यान का आधार सजग संयम है। आवश्यक जिम्मेदारियाँ निभाते हुए मन की अनावश्यक दौड़ कम करें।

साखी २७५ मन कौ अंग · मूल क्रमांक ३

आसा का ईंधन करूँ, मनसा करुँ विभूति। जोगी फेरी फिल करौं, यों बिनवाँ वै सूति॥
कठिन शब्दार्थ

मनसा = इच्छाएँ; विभूति = राख; फिल = फलदायक।

सरल हिंदी अर्थ

आशाओं को ईंधन और इच्छाओं को राख बनाकर अपनी साधना की फेरी सफल करना चाहता हूँ।

भावार्थ और जीवन-संदेश

योगी का वेश तभी सार्थक है जब लालसा की पकड़ ढीली हो। भीतर की तैयारी बाहरी यात्रा से अधिक महत्त्वपूर्ण है।

साखी २७६ मन कौ अंग · मूल क्रमांक ४

कबीर सेरी साँकड़ी चंचल मनवाँ चोर। गुण गावै लैलीन होइ, कछू एक मन मैं और॥
कठिन शब्दार्थ

सेरी = गली; लैलीन = लीन।

सरल हिंदी अर्थ

भक्ति की गली सँकरी है, पर चंचल मन चोर है। मुख गुण गाता है और भीतर कुछ दूसरा चाहता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

जप के समय अपनी वास्तविक चाह भी देखें। वाणी और हृदय का अंतर पहचानना ईमानदार साधना है।

साखी २७७ मन कौ अंग · मूल क्रमांक ५

कबीर मारूँ मन कूँ, टूक टूक ह्नै जाइ। विष की क्यारी बोई करि, लुणत कहा पछिताइ॥
कठिन शब्दार्थ

लुणत = काटते समय; क्यारी = छोटी खेती।

सरल हिंदी अर्थ

मन के विकारों को तोड़ना चाहता हूँ। जब स्वयं विष की खेती बोई, तो उसका फल काटते समय पछताना कैसा?

भावार्थ और जीवन-संदेश

कर्म का फल समझकर जिम्मेदारी लें। आत्मदंड के बजाय गलत आदत बदलना वास्तविक सुधार है।

साखी २७८ मन कौ अंग · मूल क्रमांक ६

इस मन कौ बिसमल करौं, दीठा करौं अदीठ। जै सिर राखौं आपणां, तौ पर सिरिज अंगीठ॥
कठिन शब्दार्थ

बिसमल = वश में किया हुआ; अदीठ = अदृश्य; अंगीठ = आग का पात्र।

सरल हिंदी अर्थ

मन की अनियंत्रित सत्ता मिटाकर उसकी दिखने वाली चंचलता छिपाना चाहता हूँ; अहं बचा रहे तो तपस्या भी व्यर्थ है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

तीव्र देह-बिंब मन के अहं को साधने का रूपक हैं। लक्ष्य आत्मसंयम है, शरीर को चोट पहुँचाना नहीं।

साखी २७९ मन कौ अंग · मूल क्रमांक ७

मन जाणैं सब बात, जाणत ही औगुण करै। काहे की कुसलात, कर दीपक कूँ बैं पड़ै॥
कठिन शब्दार्थ

कुसलात = चतुराई; कर = हाथ में; बैं = कूप या गड्ढे का संकेत।

सरल हिंदी अर्थ

मन सब जानकर भी दोष करता है। हाथ में दीपक लेकर गिरने वाले की चतुराई किस काम की?

भावार्थ और जीवन-संदेश

जानकारी और आचरण का मेल आवश्यक है। जानी हुई सही बात को छोटे दैनिक निर्णयों में अपनाएँ।

साखी २८० मन कौ अंग · मूल क्रमांक ८

हिरदा भीतरि आरसी, मुख देषणाँ न जाइ। मुख तौ तौपरि देखिए, जे मन की दुविधा जाइ॥
कठिन शब्दार्थ

आरसी = दर्पण; दुविधा = द्वंद्व।

सरल हिंदी अर्थ

हृदय में दर्पण है, पर अपना मुख साफ नहीं दिखता। मन की दुविधा मिटे तो वास्तविक पहचान हो।

भावार्थ और जीवन-संदेश

आत्मपरीक्षण में पूर्वाग्रह और स्वार्थ बाधा बनते हैं। शांत होकर अपनी बात और गलती दोनों देखने का साहस रखें।

साखी २८१ मन कौ अंग · मूल क्रमांक ९

मन दीया मन पाइए, मन बिन मन नहीं होइ। मन उनमन उस अंड ज्यूँ, खनल अकासाँ जोइ॥
कठिन शब्दार्थ

उनमन = अंतर्मुख तन्मय; अंड = अंडा।

सरल हिंदी अर्थ

मन समर्पित करने से मन का सच्चा रूप मिलता है। साधक की सजगता दूर रखे अंडे पर ध्यान रखने वाले पक्षी जैसी कही गई है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

ध्यान केवल देह की निकटता नहीं, चित्त की दिशा है। अपने लक्ष्य की स्मृति को प्रेमपूर्वक सँजोएँ।

साखी २८२ मन कौ अंग · मूल क्रमांक १०

मन गोरख मन गोविंदो, मन हीं औघड़ होइ। जे मन राखै जतन करि, तौ आपै करता सोइ॥
कठिन शब्दार्थ

गोरख गोविंद = योग और ईश्वर के संकेत; औघड़ = सहज योगी।

सरल हिंदी अर्थ

मन ही योग का साधन और गोविंद की पहचान का माध्यम है। उसे सावधानी से रखें तो भीतर दिव्य क्षमता प्रकट होती है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

मन को शत्रु मानकर कुचलना उद्देश्य नहीं। उसे सजगता, विवेक और करुणा का सहयोगी बनाएँ।

साखी २८३ मन कौ अंग · मूल क्रमांक ११

एक ज दोसत हम किया, जिस गलि लाल कबाइ। एक जग धोबी धोइ मरै, तौ भी रंग न जाइ॥
कठिन शब्दार्थ

कबाइ = चोगा; लाल = प्रेम का रंग।

सरल हिंदी अर्थ

ऐसा मित्र पाया जिसका प्रेमरंगी वस्त्र सारी दुनिया धोए, तब भी उसका रंग न जाए।

भावार्थ और जीवन-संदेश

स्थिर आध्यात्मिक निष्ठा बाहरी मत और परिस्थितियों से जल्दी नहीं बदलती। उसका आधार अनुभव और निष्कपट प्रेम हो।

साखी २८४ मन कौ अंग · मूल क्रमांक १२

पाँणी ही तैं पातला, धूवाँ ही तै झींण। पवनाँ बेगि उतावला, सो दोसत कबीरै कीन्ह॥
कठिन शब्दार्थ

झींण = सूक्ष्म; बेगि = वेग में।

सरल हिंदी अर्थ

मेरा मित्र पानी से पतला, धुएँ से सूक्ष्म और हवा से तीव्र है—कबीर उस सूक्ष्म तत्त्व से आत्मीयता कहते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

इन उपमाओं का आशय मन या चेतना की सूक्ष्मता है। उसकी दिशा सँभालना स्थूल बाहरी साधनों से अलग अभ्यास माँगता है।

साखी २८५ मन कौ अंग · मूल क्रमांक १३

कबीर तुरी पलांड़ियाँ, चाबक लीया हाथि। दिवस थकाँ साँई मिलौं, पीछे पड़िहै राति॥
कठिन शब्दार्थ

तुरी = घोड़ी; पलांड़ियाँ = जीन कसी; दिवस = जीवन का अवसर।

सरल हिंदी अर्थ

मन की घोड़ी सजाकर संयम का चाबुक लिया है। दिन रहते स्वामी से मिल लूँ; फिर रात आ जाएगी।

भावार्थ और जीवन-संदेश

अवसर रहते साधना करें। घोड़ी और चाबुक एकाग्रता तथा अनुशासन के रूपक हैं।

साखी २८६ मन कौ अंग · मूल क्रमांक १४

मनवां तो अधर बस्या, बहुतक झीणां होइ। आलोकत सचु पाइया, कबहूँ न न्यारा सोइ॥
कठिन शब्दार्थ

अधर = अंतराकाश; झीणा = सूक्ष्म; आलोकत = देखते हुए।

सरल हिंदी अर्थ

मन सूक्ष्म होकर भीतर की ऊँची स्थिति में ठहरा। सजग दृष्टि से सत्य मिला, जो कभी वास्तव में दूर नहीं था।

भावार्थ और जीवन-संदेश

अंतर्मुखता निकट के सत्य को पहचानती है। उसका फल जीवन से पलायन नहीं, अधिक स्पष्ट और शांत व्यवहार हो।

साखी २८७ मन कौ अंग · मूल क्रमांक १५

मन न मार्‌या मन करि, सके न पंच प्रहारि। सीला साच सरधा नहीं, इंद्री अजहुँ उद्यारि॥
कठिन शब्दार्थ

पंच = पाँच इंद्रियाँ; सीला = शील; उद्यारि = उच्छृंखल।

सरल हिंदी अर्थ

मन और इंद्रियाँ वश में नहीं, न शील, सत्य और श्रद्धा विकसित हुए; ऐसे में साधना की तैयारी अधूरी है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

बाहरी अभ्यास के साथ चरित्र पर काम करें। सत्य बोलना और संयम रखना आध्यात्मिक अनुशासन के अंग हैं।

साखी २८८ मन कौ अंग · मूल क्रमांक १६

कबीर मन बिकरै पड़ा, गया स्वादि के साथ। गलका खाया बरज्ताँ, अब क्यूँ आवै हाथि॥
कठिन शब्दार्थ

गाफिल = असावधान; गलका = निगला हुआ चारा या फंदे का संकेत।

सरल हिंदी अर्थ

मन स्वाद के पीछे बिखर गया। रोकने पर भी चारा निगल लिया; अब उसे सँभालना कठिन होता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

आदत बनने से पहले आकर्षण पहचानना आसान है। आवेग के समय थोड़ा ठहराव भविष्य की उलझन बचा सकता है।

साखी २८९ मन कौ अंग · मूल क्रमांक १७

कबीर मन गाफिल भया, सुमिरण लागै नाहिं। घणीं सहैगा सासनाँ, जम की दरगह माहिं॥
कठिन शब्दार्थ

सासनाँ = दंड या कष्ट; दरगह = न्याय का स्थान।

सरल हिंदी अर्थ

मन असावधान है और स्मरण में नहीं लगता; उसके कर्मों का कष्ट आगे भोगना पड़ेगा।

भावार्थ और जीवन-संदेश

काव्य की न्याय-छवि जिम्मेदारी जगाती है। अपने व्यवहार के परिणाम समझकर समय रहते सुधारें।

साखी २९० मन कौ अंग · मूल क्रमांक १८

कोटि कर्म पल मैं करै, यहु मन बिषिया स्वादि। सतगुर सबद न मानई, जनम गँवाया बादि॥
कठिन शब्दार्थ

कोटि कर्म = असंख्य क्रियाएँ; बादि = व्यर्थ।

सरल हिंदी अर्थ

विषय-स्वाद में मन क्षण भर में अनेक कर्म रचता है, पर गुरु की सीख नहीं मानता और अवसर गँवा देता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

अंतहीन योजनाओं से अधिक सही दिशा महत्त्वपूर्ण है। मूल सीख चुनकर उसे नियमित कर्म में उतारें।

साखी २९१ मन कौ अंग · मूल क्रमांक १९

मैंमंता मन मारि रे, घटहीं माँहै घेरि। जबहीं चालै पीठि दै, अंकुस दे दे फेरि॥
कठिन शब्दार्थ

मैंमंता = मस्त हाथी; अंकुस = नियंत्रित करने का उपकरण।

सरल हिंदी अर्थ

मन के मस्त हाथी को भीतर घेरो; वह पीठ फेरकर भटके तो सजगता के अंकुश से लौटाओ।

भावार्थ और जीवन-संदेश

ध्यान भटके तो कटुता नहीं, सतत जागरूकता काम आती है। बार-बार लौटना ही अभ्यास का हिस्सा है।

साखी २९२ मन कौ अंग · मूल क्रमांक २०

मैंमंता मन मारि रे, नान्हाँ करि करि पीसि। तब सुख पावै सुंदरी, ब्रह्म झलकै सीसि॥
कठिन शब्दार्थ

नान्हाँ = छोटा; सुंदरी = आत्मा; सीसि = भीतर के उच्च केंद्र का संकेत।

सरल हिंदी अर्थ

मन का फैलता अहं छोटा करो, तभी आत्मा को शांति मिले और ब्रह्म का प्रकाश झलके।

भावार्थ और जीवन-संदेश

‘पीसना’ अहं की कठोरता का रूपक है। नम्रता और स्वार्थ घटाने से चित्त अधिक ग्रहणशील बनता है।

साखी २९३ मन कौ अंग · मूल क्रमांक २१

कागद केरी नाँव री, पाँणी केरी गंग। कहै कबीर कैसे तिरूँ, पंच कुसंगी संग॥
कठिन शब्दार्थ

पंच कुसंगी = असंयमित इंद्रियाँ; कागद = कागज।

सरल हिंदी अर्थ

कागज की नाव में पानी की नदी पार करनी है और पाँच कुसंगी साथ हैं—ऐसे कैसे पार उतरूँ?

भावार्थ और जीवन-संदेश

देह की अस्थिरता के बीच इंद्रियों की दिशा महत्त्वपूर्ण है। असावधानी का भार कम करके विवेक का सहारा लें।

साखी २९४ मन कौ अंग · मूल क्रमांक २२

कबीर यह मन कत गया, जो मन होता काल्हि। डूंगरि बूठा मेह ज्यूँ, गया निबाँणाँ चालि॥
कठिन शब्दार्थ

डूंगरि = पहाड़; बूठा मेह = बरसी वर्षा; निबाँणाँ = नीचे की जगह।

सरल हिंदी अर्थ

कल का ऊँचा मन कहाँ गया? पहाड़ पर बरसा पानी जैसे नीचे बहता है, वैसे वह विषयों की ओर उतर गया।

भावार्थ और जीवन-संदेश

क्षणिक ऊँची अवस्था स्थायी उपलब्धि नहीं। अभ्यास और सावधानी से मन की दिशा सँभालें।

साखी २९५ मन कौ अंग · मूल क्रमांक २३

मृतक कूँ धी जौ नहीं, मेरा मन बी है। बाजै बाव बिकार की, भी मूवा जीवै॥
कठिन शब्दार्थ

बाव = हवा; बिकार = विकार।

सरल हिंदी अर्थ

मन को मरा हुआ मत मानो; विकारों की हवा लगे तो वह फिर अपनी पुरानी चंचलता में जीवित हो उठता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

अहं घटने का दावा जल्दी न करें। परिस्थिति बदलने पर प्रतिक्रिया देखकर ही संयम की वास्तविक स्थिति समझ आती है।

साखी २९६ मन कौ अंग · मूल क्रमांक २४

काटि कूटि मछली, छींकै धरी चहोड़ि। कोइ एक अषिर मन बस्या, दह मैं पड़ी बहोड़ि॥
कठिन शब्दार्थ

छींका = लटकता भंडारण-पात्र; बहोड़ि = फिर।

सरल हिंदी अर्थ

कटी मछली छींके पर रखी थी, फिर भी भीतर बची एक प्रवृत्ति से मानो पानी में लौट पड़ी।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह मन की छिपी वासना का अतिशयोक्तिपूर्ण रूपक है। बाहरी रोक के साथ इच्छा की जड़ समझना जरूरी है।

साखी २९७ मन कौ अंग · मूल क्रमांक २५

कबीर मन पंषी भया, बहुतक चढ़ा अकास। उहाँ ही तैं गिरि पड़ा, मन माया के पास॥
कठिन शब्दार्थ

पंषी = पक्षी; अकास = आकाश।

सरल हिंदी अर्थ

मन-पक्षी बहुत ऊपर उड़ा, पर फिर माया के पास गिर पड़ा।

भावार्थ और जीवन-संदेश

अनुभव या ज्ञान के बाद भी मोह लौट सकता है। उपलब्धि का अभिमान छोड़कर निरंतर सजग रहें।

साखी २९८ मन कौ अंग · मूल क्रमांक २६

भगति दुबारा सकड़ा राई दसवैं भाइ। मन तौ मैंगल ह्नै रह्यो, क्यूँ करि सकै समाइ॥
कठिन शब्दार्थ

दुबारा = द्वार; मैंगल = हाथी; राई = सरसों का दाना।

सरल हिंदी अर्थ

भक्ति का द्वार राई के अंश जैसा सूक्ष्म है, जबकि मन अहं से हाथी बना है; वह उसमें कैसे समाए?

भावार्थ और जीवन-संदेश

अहं का आकार घटे तभी आत्मीय समर्पण संभव है। नम्रता साधना की मूल तैयारी है।

साखी २९९ मन कौ अंग · मूल क्रमांक २७

करता था तो क्यूँ रह्या, अब करि क्यूँ पछताइ। बोवै पेड़ बबूल का, अब कहाँ तैं खाइ॥
कठिन शब्दार्थ

करता था = करते समय; बबूल = काँटेदार वृक्ष।

सरल हिंदी अर्थ

कर्म करते समय क्यों न सोचा? बबूल बोकर अब मनचाहा मीठा फल कहाँ से मिलेगा?

भावार्थ और जीवन-संदेश

परिणाम से पहले निर्णय पर ध्यान दें। पछतावे को भविष्य के विवेकपूर्ण कर्म की प्रेरणा बनाएँ।

साखी ३०० मन कौ अंग · मूल क्रमांक २८

काया देवल मन धजा, विष्रै लहरि फरराइ। मन चाल्याँ देवल चलै, ताका सर्बस जाइ॥
कठिन शब्दार्थ

देवल = मंदिर; धजा = ध्वजा; विषै लहरि = विषयों की हवा।

सरल हिंदी अर्थ

देह मंदिर है, मन उसकी ध्वजा है, जिसे विषयों की हवा हिलाती है। मन बिगड़े तो पूरे जीवन की दिशा बिगड़ती है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

भीतर की दिशा बाहरी आचरण को प्रभावित करती है। मानसिक आदतों पर सजग काम करें।

साखी ३०१ मन कौ अंग · मूल क्रमांक २९

मनह मनोरथ छाँड़ि दे, तेरा किया न होइ। पाँणी मैं घीव गीकसै, तो रूखा खाइ न कोइ॥
कठिन शब्दार्थ

मनोरथ = कल्पना की इच्छाएँ; घीव = घी।

सरल हिंदी अर्थ

केवल कल्पना से सब नहीं होता। पानी मथने से घी निकलता तो कोई सूखी रोटी क्यों खाता?

भावार्थ और जीवन-संदेश

इच्छा के साथ उचित साधन और परिश्रम चाहिए। कल्पना को काम समझने की भूल न करें।

साखी ३०२ मन कौ अंग · मूल क्रमांक ३०

काया कसूं कमाण ज्यूँ, पंचतत्त करि बांण। मारौं तो मन मृग को, नहीं तो मिथ्या जाँण॥
कठिन शब्दार्थ

कसूं = कसूँ; पंचतत्त = देह के पाँच तत्त्व; मन मृग = चंचल मन।

सरल हिंदी अर्थ

देह को धनुष और उसकी शक्तियों को बाण बनाकर चंचल मन-मृग को साधूँ; वरना साधना का दावा खोखला है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

शरीर और ऊर्जा का संयमित उपयोग करें। रूपक का लक्ष्य चंचलता पर विवेकपूर्ण नियंत्रण है।

१४. सूषिम मारग कौ अंग

अगम तत्त्व की खोज, हलकापन, गुरु की सीख और अंतर्मुख यात्रा। मूल स्थानीय क्रमांक १–१०।

साखी ३०३ सूषिम मारग कौ अंग · मूल क्रमांक १

कौंण देस कहाँ आइया, कहु क्यूँ जाँण्याँ जाइ। उहू मार्ग पावै नहीं, भूलि पड़े इस माँहि॥
कठिन शब्दार्थ

कौंण देस = कौन मूल स्थान; भूलि = विस्मृत होकर।

सरल हिंदी अर्थ

हम कहाँ से आए और अपने मूल को कैसे पहचानें? उस मार्ग की खबर नहीं, इसी संसार में भूल गए।

भावार्थ और जीवन-संदेश

साधना जीवन के मूल प्रश्न पूछती है। तैयार उत्तरों से पहले अपनी खोज को ईमानदारी दें।

साखी ३०४ सूषिम मारग कौ अंग · मूल क्रमांक २

उतीथैं कोइ न आवई, जाकूँ बूझौं धाइ। इतथैं सबै पठाइये, भार लदाइ लदाइ॥
कठिन शब्दार्थ

उतीथैं = उस ओर से; पठाइये = भेजे जाते; भार = कर्म या आसक्ति।

सरल हिंदी अर्थ

उस ओर से कोई लौटकर नहीं आता जिससे दौड़कर पूछूँ; यहाँ से सब बोझ लादे जाते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

अज्ञात के बारे में दावे सीमित रखें। वर्तमान जीवन में अपना कर्म और अनावश्यक भार सँभालना हमारे हाथ में है।

साखी ३०५ सूषिम मारग कौ अंग · मूल क्रमांक ३

सबकूँ बूझत मैं फिरौं, रहण कहै नहीं कोइ। प्रीति न जोड़ी राम सूँ, रहण कहाँ थैं होइ॥
कठिन शब्दार्थ

रहण = स्थायी निवास; प्रीति = प्रेम।

सरल हिंदी अर्थ

सबसे स्थायी ठहराव पूछता हूँ, कोई नहीं बताता। राम से प्रेम नहीं जोड़ा तो सच्चा आश्रय कहाँ मिलेगा?

भावार्थ और जीवन-संदेश

बाहरी स्थान बदलते हैं। अपने मूल्यों और परम आश्रय में चित्त की स्थिरता विकसित करें।

साखी ३०६ सूषिम मारग कौ अंग · मूल क्रमांक ४

चलो चलौं सबको कहे, मोहि अँदेसा और। साहिब सूँ पर्चा नहीं, ए जांहिगें किस ठौर॥
कठिन शब्दार्थ

परचा = परिचय; ठौर = जगह।

सरल हिंदी अर्थ

सब चलने की बात कहते हैं, पर मेरा प्रश्न है—स्वामी का परिचय बिना वे वास्तव में किस आश्रय को जा रहे हैं?

भावार्थ और जीवन-संदेश

परंपरागत कथन दोहराने से अधिक आत्मबोध जरूरी है। अपनी साधना की दिशा समझकर चलें।

साखी ३०७ सूषिम मारग कौ अंग · मूल क्रमांक ५

जाइबे को जागा नहीं, रहिबे कौं नहीं ठौर। कहै कबीरा संत हौ, अबिगति की गति और॥
कठिन शब्दार्थ

अविगति = अगम परम तत्त्व; गति = स्थिति।

सरल हिंदी अर्थ

न साधारण जाने का स्थान है, न स्थूल रहने की जगह; अगम सत्य की स्थिति इन सीमाओं से अलग है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

आध्यात्मिक आश्रय को केवल भौतिक स्थान न मानें। यह चेतना और अनुभव की बात भी है।

साखी ३०८ सूषिम मारग कौ अंग · मूल क्रमांक ६

कबीरा मारिग कठिन है, कोइ न सकई जाइ। गए ते बहुडे़ नहीं, कुसल कहै को आइ॥
कठिन शब्दार्थ

बहुड़े = लौटे; कुसल = समाचार।

सरल हिंदी अर्थ

मार्ग कठिन है; जो गए, लौटे नहीं कि उसका समाचार कहें।

भावार्थ और जीवन-संदेश

कठिन और अज्ञात विषय पर विनय रखें। यात्रा का दावा करने से अधिक सही अभ्यास महत्त्वपूर्ण है।

साखी ३०९ सूषिम मारग कौ अंग · मूल क्रमांक ७

जन कबीर का सिषर घर, बाट सलैली सैल। पाव न टिकै पपीलका, लोगनि लादे बैल॥
कठिन शब्दार्थ

सिषर = शिखर; सलैली = फिसलनभरी; पपीलका = चींटी।

सरल हिंदी अर्थ

मेरा घर शिखर पर है, रास्ता फिसलनभरा है; चींटी का पैर नहीं टिकता और लोग बैल लादकर चढ़ना चाहते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

सूक्ष्म साधना भारी अहं और संग्रह से कठिन होती है। सरलता और सजगता यात्रा में सहायक हैं।

साखी ३१० सूषिम मारग कौ अंग · मूल क्रमांक ८

जहाँ न चींटी चढ़ि सकै, राइ न ठहराइ। मन पवन का गमि नहीं, तहाँ पहूँचे जाइ॥
कठिन शब्दार्थ

राइ = राई; गमि = पहुँच।

सरल हिंदी अर्थ

जहाँ चींटी नहीं चढ़ती, राई नहीं टिकती और मन-वायु की पहुँच नहीं, साधक उस सूक्ष्म अवस्था तक जाता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह स्थूल क्षमता से परे अंतर्बोध की प्रतीक-भाषा है। इसे किसी भौतिक जगह का विवरण न समझें।

साखी ३११ सूषिम मारग कौ अंग · मूल क्रमांक ९

कबीर मारग अगम है, सब मुनिजन बैठे थाकि। तहाँ कबीरा चलि गया गहि सतगुर कीसाषि॥
कठिन शब्दार्थ

साषि = सीख या साक्षी; अगम = कठिन पहुँच।

सरल हिंदी अर्थ

जिस अगम मार्ग पर मुनि थक गए, कबीर गुरु की सीख का सहारा लेकर बढ़े।

भावार्थ और जीवन-संदेश

अच्छा मार्गदर्शन कठिनाई में दिशा देता है। उसका फल अपने अभ्यास और विवेक के जागने में हो।

साखी ३१२ सूषिम मारग कौ अंग · मूल क्रमांक १०

सुर न थाके मुनि जनां, जहाँ न कोई जाइ। मोटे भाग कबीर के, तहाँ रहे घर छाइ॥
कठिन शब्दार्थ

मोटे भाग = बड़ा सौभाग्य; घर छाइ = निवास बना।

सरल हिंदी अर्थ

देव-मुनियों के लिए भी दुर्लभ अवस्था में कबीर को स्थिर आश्रय मिला—वे इसे अपना सौभाग्य कहते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

अनुभव को अनुग्रह मानने से विनय रहती है। उपलब्धि दूसरों को छोटा दिखाने का आधार न बने।

१५. सूषिम जनम कौ अंग

चेतना की सूक्ष्म गति और जीवित रहते भीतर जन्मते-मिटते भाव। मूल स्थानीय क्रमांक १–२।

साखी ३१३ सूषिम जनम कौ अंग · मूल क्रमांक १

कबीर सूषिम सुरति का, जीव न जाँणै जाल। कहै कबीरा दूरि करि, आतम अदिष्टि काल॥
कठिन शब्दार्थ

सूषिम सुरति = ध्यान की सूक्ष्म गति; अदिष्टि = न दिखना।

सरल हिंदी अर्थ

जीव अपनी सूक्ष्म चेतना के जाल को नहीं पहचानता; भीतर की दृष्टिहीनता दूर करके आत्मा का विचार करो।

भावार्थ और जीवन-संदेश

मन की बारीक इच्छाएँ भी बंधन बना सकती हैं। सजग आत्मपरीक्षण से उनका काम करना पहचानें।

साखी ३१४ सूषिम जनम कौ अंग · मूल क्रमांक २

प्राण पंड को तजि चलै, मूवा कहै सब कोइ। जीव छताँ जांमैं मरै, सूषिम लखै न कोइ॥
कठिन शब्दार्थ

प्राण पंड = देह के प्राण; जीव छताँ = जीवित रहते।

सरल हिंदी अर्थ

देह से प्राण जाएँ तो सब मृत्यु कहते हैं, पर जीवित रहते मन में जन्मते-मरते भावों की सूक्ष्म गति कौन देखता है?

भावार्थ और जीवन-संदेश

अहं और इच्छाओं का निरंतर बनना-मिटना भी ध्यान का विषय है। अपने भीतर के परिवर्तन सजगता से देखें।

१६. माया कौ अंग

मोह, तृष्णा, धन, प्रतिष्ठा और साधनों के विवेकपूर्ण उपयोग पर विचार। मूल स्थानीय क्रमांक १–३२।

साखी ३१५ माया कौ अंग · मूल क्रमांक १

जग हठवाड़ा स्वाद ठग, माया बेसाँ लाइ। रामचरण नीकाँ गही, जिनि जाइ जनम ठगाइ॥
कठिन शब्दार्थ

हठवाड़ा = हाट-बाज़ार; बेसाँ = प्रलोभन का पुराना रूपक।

सरल हिंदी अर्थ

संसार बाज़ार है, स्वाद ठग है और माया प्रलोभन सजाती है। रामचरण का सहारा पकड़ो, जीवन ठगा न जाए।

भावार्थ और जीवन-संदेश

हर आकर्षक वस्तु हितकारी नहीं। आनंद लेते हुए विवेक और अपने मूल उद्देश्य की रक्षा करें।

साखी ३१६ माया कौ अंग · मूल क्रमांक २

कबीर माया पापणीं, फंध ले बैठि हाटि। सब जग तो फंधै पड़ा, गया कबीरा काटि॥
कठिन शब्दार्थ

फंध = जाल; हाटि = बाज़ार में।

सरल हिंदी अर्थ

माया जाल लेकर बैठी है; जग उसमें फँसा है, पर कबीर पहचानकर अपना बंधन काट निकलते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

मोह का जाल पहचानना मुक्ति की शुरुआत है। अपनी निर्भरता और अनावश्यक लालसा को ईमानदारी से देखें।

साखी ३१७ माया कौ अंग · मूल क्रमांक ३

कबीर माया पापणीं, लालै लाया लोंग। पूरी कीनहूँ न भोगई, इनका इहै बिजोग॥
कठिन शब्दार्थ

लालै = लालच में; बिजोग = विडंबना।

सरल हिंदी अर्थ

माया सबको लालच में रखती है, पर कोई उसके सभी भोग पूरे नहीं कर पाता—यही उसकी विडंबना है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

हर इच्छा पूरी करने की दौड़ अंतहीन है। पर्याप्तता पहचानना संतोष का आधार बनता है।

साखी ३१८ माया कौ अंग · मूल क्रमांक ४

कबीरा माया पापणीं, हरि सूँ करे हराम। मुखि कड़ियाली कुमति की, कहण न देईं राम॥
कठिन शब्दार्थ

कड़ियाली = लगाम; कुमति = दूषित बुद्धि।

सरल हिंदी अर्थ

माया गलत समझ की लगाम लगाकर हरि से दूर करती है और मुख को सच्चे स्मरण से रोकती है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

मन में जमी गलत मान्यता व्यवहार नियंत्रित करती है। उसे प्रश्न और आत्मपरीक्षण से पहचानें।

साखी ३१९ माया कौ अंग · मूल क्रमांक ५

जाँणी जे हरि को भजौ, मो मनि मोटी आस। हरि बिचि घालै अंतरा, माया बड़ी बिसास॥
कठिन शब्दार्थ

अंतरा = दूरी; बिसास = प्रबल मोह का संकेत।

सरल हिंदी अर्थ

मन में हरि-भजन की बड़ी आशा है, लेकिन माया बीच में दूरी डाल देती है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

अच्छा संकल्प पर्याप्त नहीं; बाधा बनने वाली आदतें भी देखें। नियमित अभ्यास के लिए समय और ध्यान बचाएँ।

साखी ३२० माया कौ अंग · मूल क्रमांक ६

कबीर माया मोहनी, मोहे जाँण सुजाँण। भागाँ ही छूटै नहीं, भरि भरि मारै बाँण॥
कठिन शब्दार्थ

सुजाँण = समझदार; बाँण = आकर्षण के बाण।

सरल हिंदी अर्थ

माया ज्ञानी और समझदार को भी मोहती है। केवल भाग जाने से नहीं छूटती, बार-बार आकर्षण भेजती है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

स्थान बदलने के साथ वृत्ति बदलना जरूरी है। अपने को मोह से पूरी तरह ऊपर मानने का अहं न पालें।

साखी ३२१ माया कौ अंग · मूल क्रमांक ७

कबीर माया मोहनी, जैसी मीठी खाँड़। सतगुर की कृपा भई, नहीं तो करती भाँड़॥
कठिन शब्दार्थ

खाँड़ = चीनी; भाँड़ = उपहास का पात्र।

सरल हिंदी अर्थ

माया मीठी चीनी जैसी लुभाती है। गुरु की कृपा न होती तो उसका बहलावा मुझे उपहास का पात्र बना देता।

भावार्थ और जीवन-संदेश

हितकारी मार्गदर्शन क्षणिक मिठास और दीर्घ कल्याण का अंतर दिखाता है। सीख को व्यवहार में अपनाएँ।

साखी ३२२ माया कौ अंग · मूल क्रमांक ८

कबीर माया मोहनी, सब जग घाल्या घाँणि। कोइ एक जन ऊबरै, जिनि तोड़ी कुल की काँणि॥
कठिन शब्दार्थ

घाँणि = कोल्हू; कुल की काँणि = वंश-प्रतिष्ठा का दबाव।

सरल हिंदी अर्थ

माया ने संसार को कोल्हू में डाल दिया है। विरला व्यक्ति झूठी कुल-प्रतिष्ठा का बंधन तोड़कर बचता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

दिखावे और जन्मगत श्रेष्ठता के दबाव से मुक्त हों। निर्णय गुण, सत्य और विवेक के आधार पर लें।

साखी ३२३ माया कौ अंग · मूल क्रमांक ९

कबीर माया मोहनी, माँगी मिलै न हाथि। मनह उतारी झूठ करि, तब लागी डौलै साथि॥
कठिन शब्दार्थ

झूठ करि = अस्थायी समझकर; डौलै = घूमती है।

सरल हिंदी अर्थ

माँगने से माया हाथ नहीं आती; मन से उसका सर्वोच्च महत्त्व उतारा तो वह पीछे चलने लगी।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह धन मिलने की गारंटी नहीं, आसक्ति का व्यंग्य है। साधन को लक्ष्य न बनाने से उसका दबाव घटता है।

साखी ३२४ माया कौ अंग · मूल क्रमांक १०

माया दासी संत की, ऊँभी देइ असीस। बिलसी अरु लातौं छड़ी सुमरि सुमरि जगदीस॥
कठिन शब्दार्थ

ऊँभी = खड़ी; जगदीस = परमेश्वर।

सरल हिंदी अर्थ

संत के लिए माया सेविका है; वह उसका उपयोग करता है, पर स्मरण रखते हुए उसकी दासता छोड़ देता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

संसार के साधन छोड़ना हमेशा आवश्यक नहीं। उनका विवेकपूर्ण उपयोग करें और स्वामित्व का अहं न बढ़ाएँ।

साखी ३२५ माया कौ अंग · मूल क्रमांक ११

माया मुई न मन मुवा, मरि मरि गया सरीर। आसा त्रिस्नाँ ना मुई, यों कहि गया कबीर॥
कठिन शब्दार्थ

त्रिस्नाँ = तृष्णा; सरीर = शरीर।

सरल हिंदी अर्थ

शरीर बार-बार नष्ट हुए, पर मन का मोह, आशा और तृष्णा समाप्त नहीं हुई।

भावार्थ और जीवन-संदेश

केवल बाहरी परिवर्तन से आदत नहीं मिटती। लालसा की जड़ पर सजग काम करना जरूरी है।

साखी ३२६ माया कौ अंग · मूल क्रमांक १२

आसा जीवै जग मरै, लोग मरे मरि जाइ। सोइ मूबे धन संचते, सो उबरे जे खाइ॥
कठिन शब्दार्थ

संचते = संग्रह करते; उबरे = बच निकले।

सरल हिंदी अर्थ

लोग मरते हैं, आशाएँ बनी रहती हैं। संग्रह में डूबे खो गए; उचित उपयोग और संतोष वाले बच निकले।

भावार्थ और जीवन-संदेश

धन का मूल्य केवल जमा होने में नहीं। आवश्यक उपयोग, सेवा और पर्याप्तता का विवेक भी विकसित करें।

साखी ३२७ माया कौ अंग · मूल क्रमांक १३

कबीर सो धन संचिए, जो आगै कूँ होइ। सीस चढ़ाए पोटली, ले जात न देख्या कोइ॥
कठिन शब्दार्थ

आगै कूँ = आगे काम आने वाला; पोटली = गठरी।

सरल हिंदी अर्थ

वही धन सँजोओ जो आगे सार्थक हो; सिर पर धन की गठरी रखकर किसी को जाते नहीं देखा।

भावार्थ और जीवन-संदेश

कर्म, ज्ञान और उपकार जीवन का गहरा अर्जन हैं। संपत्ति को भी इन्हीं उद्देश्यों में लगाएँ।

साखी ३२८ माया कौ अंग · मूल क्रमांक १४

त्रीया त्रिण्णाँ पापणी, तासूँ प्रीति न जोड़ि। पैड़ी चढ़ि पाछाँ पड़े, लागै मोटी खोड़ि॥
कठिन शब्दार्थ

त्रिण्णाँ = तृष्णा; खोड़ि = चोट या हानि।

सरल हिंदी अर्थ

तृष्णा से प्रेम मत जोड़ो; ऊँचाई पर चढ़कर पीछे गिरने जैसी बड़ी हानि हो सकती है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

पुराने स्त्री-रूपक का केंद्र अनियंत्रित इच्छा है। इसे किसी स्त्री के स्वभाव का सार्वभौमिक निर्णय न मानें।

साखी ३२९ माया कौ अंग · मूल क्रमांक १५

त्रिष्णाँ सींची नाँ बुझे, दिन दिन बढ़ती जाइ। जबासा के रूप ज्यूँ, घण मेहाँ कुमिलाइ॥
कठिन शब्दार्थ

जबासा = गर्मी में पनपने वाला पौधा; घण मेह = घनी वर्षा।

सरल हिंदी अर्थ

तृष्णा को तृप्त करने से वह और बढ़ती है; उसका स्वभाव जबासे जैसा उलटा है, जो वर्षा में कुम्हला जाता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

इच्छा की हर माँग मानना संतोष नहीं लाता। सीमा, विवेक और अंतर की तृप्ति से उसका बल घटाएँ।

साखी ३३० माया कौ अंग · मूल क्रमांक १६

कबीर जग की को कहे, भौ जलि बूड़ै दास। पारब्रह्म पति छाड़ि कर, करैं मानि की आस॥
कठिन शब्दार्थ

भौ जलि = संसार-सागर में; मानि = प्रतिष्ठा।

सरल हिंदी अर्थ

संसारियों की क्या कहें, भक्त भी परम आश्रय छोड़कर सम्मान की चाह में डूब सकते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

आध्यात्मिक पहचान के भीतर भी प्रशंसा की भूख छिपती है। सेवा को अपने प्रचार का साधन न बनाएँ।

साखी ३३१ माया कौ अंग · मूल क्रमांक १७

माया तजी तौ का भया, मानि तजी नहीं जाइ। मानि बड़े गुनियर मिले, मानि सबनि की खाइ॥
कठिन शब्दार्थ

मानि = अभिमान; गुनियर = गुणवान।

सरल हिंदी अर्थ

माया छोड़ दी तो क्या, यदि मान नहीं छोड़ा? अभिमान गुणवान को भी अपनी पकड़ में ले लेता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

त्याग का प्रदर्शन भी नया अहं बन सकता है। अपने गुण पर गर्व से अधिक कृतज्ञता रखें।

साखी ३३२ माया कौ अंग · मूल क्रमांक १८

रामहिं थोड़ा जाँणि करि, दुनियाँ आगैं दीन। जीवाँ कौ राजा कहै, माया के आधीन॥
कठिन शब्दार्थ

दीन = अधीन; आधीन = वश में।

सरल हिंदी अर्थ

राम को छोटा समझकर मनुष्य दुनिया के सामने झुकता है; अपने को राजा कहता है, पर माया का दास है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

पद से अधिक भीतर की स्वतंत्रता देखें। लालच के वश निर्णय लेने वाला बाहरी अधिकार के बावजूद बँधा है।

साखी ३३३ माया कौ अंग · मूल क्रमांक १९

रज बीरज की कली, तापरि साज्या रूप। राम नाम बिन बूड़ि है, कनक काँमणी कूप॥
कठिन शब्दार्थ

रज बीरज = देह-उत्पत्ति के पदार्थ; कनक = सोना।

सरल हिंदी अर्थ

देह से सुंदर रूप बना है, लेकिन रामनाम का सार बिना वह धन और कामना के कुएँ में डूब सकती है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

देह-सौंदर्य और संपदा अस्थायी हैं। उन्हें ही जीवन की पूरी पहचान न मानें।

साखी ३३४ माया कौ अंग · मूल क्रमांक २०

माया तरवर त्रिविध का, साखा दुख संताप। सीतलता सुपिनै नहीं, फल फीको तनि ताप॥
कठिन शब्दार्थ

त्रिविध = तीन गुणों या तापों से संबंधित; संताप = दुःख।

सरल हिंदी अर्थ

माया का वृक्ष दुःख की शाखाएँ फैलाता है; उसमें शीतलता नहीं, फीका फल और देह-मन की तपन है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

मोह का परिणाम पहचानें। जो चाह बार-बार असंतोष बढ़ाए, उसकी दिशा बदलना विवेक है।

साखी ३३५ माया कौ अंग · मूल क्रमांक २१

कबीर माया ढाकड़ी, सब किसही कौ खाइ। दाँत उपाणौं पापड़ी, जे संतौं नेड़ी जाइ॥
कठिन शब्दार्थ

ढाकड़ी = डाकिनी का रूप; उपाणौं = उखाड़ देना।

सरल हिंदी अर्थ

माया सबको निगलने वाली डाकिनी जैसी है; संत की सजगता के पास उसका दाँत नहीं चलता।

भावार्थ और जीवन-संदेश

भयानक रूपक आसक्ति की शक्ति बताता है। विवेक और स्मरण से उसके प्रभाव को सीमित किया जा सकता है।

साखी ३३६ माया कौ अंग · मूल क्रमांक २२

नलनी सायर घर किया, दौं लागी बहुतेणि। जलही माँहै जलि मुई, पूरब जनम लिपेणि॥
कठिन शब्दार्थ

नलनी = कमलिनी; सायर = सरोवर; लिपेणि = संस्कार का प्रभाव।

सरल हिंदी अर्थ

जल में घर बनाकर भी कमलिनी तीव्र दाह से नहीं बची; पुराने संस्कार उसका कारण कहे गए हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

बाहरी सुरक्षित स्थान भीतर की प्रवृत्ति नहीं बदलता। कर्म और संस्कारों की समीक्षा भी आवश्यक है।

साखी ३३७ माया कौ अंग · मूल क्रमांक २३

कबीर गुण की बादली, ती तरबानी छाँहिं। बाहरि रहे ते ऊबरे, भीगें मंदिर माँहिं॥
कठिन शब्दार्थ

गुण की बादली = प्रकृति-गुणों का मेघ; ऊबरे = बचे।

सरल हिंदी अर्थ

गुणों की माया-बादली की छाँह उलटी है—भीतर आश्रय मानने वाले भीगते हैं, बाहर रहने वाले बचते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

जिसे सुरक्षा समझते हैं, वही मोह बन सकता है। आकर्षण की शर्तें और परिणाम विवेक से जाँचें।

साखी ३३८ माया कौ अंग · मूल क्रमांक २४

कबीर माया मोह की, भई अँधारी लोइ। जे सूते ते मुसि लिये, रहे बसत कूँ रोइ॥
कठिन शब्दार्थ

लोइ = संसार; मुसि लिये = लूट लिए गए।

सरल हिंदी अर्थ

मोह की अँधेरी रात में सोए लोग अपना सार खोकर बाद में रोते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

असावधानी में समय और विवेक दोनों छूट सकते हैं। दिन के छोटे निर्णय सजगता से लें।

साखी ३३९ माया कौ अंग · मूल क्रमांक २५

संकल ही तैं सब लहे, माया इहि संसार। ते क्यूँ छूटे बापुड़े, बाँधे सिरजनहार॥
कठिन शब्दार्थ

संकल = संकल्प; सिरजनहार = स्रष्टा।

सरल हिंदी अर्थ

संकल्प से माया का संसार फैलता है; सृजन की इसी व्यवस्था में बँधा जीव आसानी से कैसे छूटे?

भावार्थ और जीवन-संदेश

मन की कल्पना अनुभव को आकार देती है। इच्छाओं और पहचान के बंधन समझना साधना का सूक्ष्म काम है।

साखी ३४० माया कौ अंग · मूल क्रमांक २६

बाड़ि चढ़ती बेलि ज्यूँ, उलझी, आसा फंध। तूटै पणि छूटै नहीं, भई ज बाना बंध॥
कठिन शब्दार्थ

बाना बंध = पक्का बंधन; बेलि = लता।

सरल हिंदी अर्थ

आशा की लता बाड़ पर चढ़कर उलझती जाती है; शाखा टूटे तब भी उसकी गाँठ आसानी से नहीं छूटती।

भावार्थ और जीवन-संदेश

लालसा एक इच्छा तक सीमित नहीं रहती। उसकी परस्पर जुड़ी आदतों को धैर्य से समझकर बदलें।

साखी ३४१ माया कौ अंग · मूल क्रमांक २७

सब आसण आस तणाँ, त्रिबर्तिकै को नाहिं। थिवरिति कै निबहै नहीं, परिवर्ति परपंच माँहि॥
कठिन शब्दार्थ

आसण = आश्रय या अवस्था; परिवर्ति = बदलना; परपंच = सांसारिक विस्तार।

सरल हिंदी अर्थ

अनेक अवस्थाएँ आशा से संचालित हैं; स्थिर रहने का दावा भी बदलते प्रपंच के बीच टिक नहीं पाता।

भावार्थ और जीवन-संदेश

इस कठिन पुराने पाठ का संकेत आशा की छिपी निर्भरता है। बाहरी अवस्था से अधिक भीतर का आग्रह देखें।

साखी ३४२ माया कौ अंग · मूल क्रमांक २८

कबीर इस संसार का, झूठा माया मोह। जिहि घरि जिता बधावणाँ, तिहि घरि तिता अँदोह॥
कठिन शब्दार्थ

बधावणाँ = उत्सव; अँदोह = शोक।

सरल हिंदी अर्थ

संसार का मोह अस्थायी है; जिस घर में जितना उत्सव, वहीं उतना शोक भी आ सकता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

सुख-दुःख बदलते हैं। आनंद में विनय और कठिनाई में धैर्य रखकर दोनों के बीच संतुलन सीखें।

साखी ३४३ माया कौ अंग · मूल क्रमांक २९

माया हमगौ यों कह्या, तू मति दे रे पूठि। और हमारा हम बलू गया कबीरा रूठि॥
कठिन शब्दार्थ

पूठि = पीठ; रूठि = विमुख होकर।

सरल हिंदी अर्थ

माया कहती है—मुझसे पीठ मत फेरो। कबीर उसके आग्रह से हटकर स्वतंत्र राह लेते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

प्रलोभन अक्सर आत्मीय भाषा में रोकता है। लक्ष्य स्पष्ट हो तो हर बुलावे को स्वीकारना आवश्यक नहीं।

साखी ३४४ माया कौ अंग · मूल क्रमांक ३०

बुगली नीर बिटालिया, सायर चढ़ा कलंक। और पँखेरू पी गए, हंस न बोवै चंच॥
कठिन शब्दार्थ

बुगली = बगुली; बिटालिया = दूषित किया; चंच = चोंच।

सरल हिंदी अर्थ

बगुली ने जल दूषित किया; अन्य पक्षी पीते हैं, पर विवेकी हंस चोंच नहीं डुबोता।

भावार्थ और जीवन-संदेश

संगति और वातावरण में चयन का विवेक रखें। सब कर रहे हों, इससे कोई आदत हितकारी नहीं बनती।

साखी ३४५ माया कौ अंग · मूल क्रमांक ३१

कबीर माया जिनि मिलैं, सो बरियाँ दे बाँह। नारद से मुनियर मिले, किसौ भरोसे त्याँह॥
कठिन शब्दार्थ

बरियाँ = सामना करके; नारद = कथा में मोह से परीक्षित मुनि।

सरल हिंदी अर्थ

माया का सामना सजगता से करो; नारद जैसे मुनि भी मोहित हुए, तो असावधान भरोसा कैसा?

भावार्थ और जीवन-संदेश

कथा-संकेत आत्मविश्वास के साथ विनय सिखाता है। अपने को हर प्रलोभन से ऊपर न समझें।

साखी ३४६ माया कौ अंग · मूल क्रमांक ३२

माया की झल जग जल्या, कनक काँमणीं लागि। कहुँ धौं किहि विधि राखिये, रूई पलेटी आगि॥
कठिन शब्दार्थ

झल = ज्वाला; कनक काँमणी = धन और कामना।

सरल हिंदी अर्थ

धन और कामना के मोह की आग में जग जलता है; रूई में लिपटी आग को कैसे सुरक्षित रखें?

भावार्थ और जीवन-संदेश

इच्छा का दबा आवेग भी हानि कर सकता है। उसे पहचानकर संयम और उचित दिशा दें।

१७. चाँणक कौ अंग

लोभ, दिखावा, शास्त्र-अभिमान और आध्यात्मिक नेतृत्व की कसौटी। मूल स्थानीय क्रमांक १–२२।

साखी ३४७ चाँणक कौ अंग · मूल क्रमांक १

जीव बिलव्या जीव सों, अलप न लखिया जाइ। गोबिंद मिलै न झल बुझै, रही बुझाइ बुझाइ॥
कठिन शब्दार्थ

बिलव्या = उलझा; अलप = सूक्ष्म; झल = जलन।

सरल हिंदी अर्थ

जीव दूसरे जीवों की उलझनों में फँसा सूक्ष्म सत्य नहीं पहचानता; न गोविंद मिलते, न भीतर की तपन मिटती है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

निरंतर बाहरी उलझाव से थोड़ा विराम लें। अंतःकरण की स्थिति देखना भी आवश्यक काम है।

साखी ३४८ चाँणक कौ अंग · मूल क्रमांक २

इही उदर के कारणै, जग जाँच्यो निस जाम। स्वामी पणौ जु सिर चढ़ो, सर्‌या न एको काम॥
कठिन शब्दार्थ

उदर = पेट; जाँच्यो = माँगते फिरा; स्वामीपण = गुरु होने का मान।

सरल हिंदी अर्थ

पेट के लिए जग से माँगा, ऊपर से स्वामी होने का अहं चढ़ा; पर मूल साधना का काम नहीं बना।

भावार्थ और जीवन-संदेश

जीविका और आध्यात्मिक प्रतिष्ठा को छल में न मिलाएँ। भीतर की सच्चाई बाहरी पद से अधिक महत्त्वपूर्ण है।

साखी ३४९ चाँणक कौ अंग · मूल क्रमांक ३

स्वामी हूँणाँ सोहरा, दोद्धा हूँणाँ दास। गाडर आँणीं ऊन कूँ, बाँधी चरै कपास॥
कठिन शब्दार्थ

सोहरा = सरल; दोद्धा = कठिन; गाडर = भेड़।

सरल हिंदी अर्थ

स्वामी कहलाना आसान, सेवक बनना कठिन है। ऊन के लिए लाई भेड़ उलटे कपास खा गई।

भावार्थ और जीवन-संदेश

जिस व्यवस्था से लाभ की आशा हो, वह लोभ में उलटा नुकसान कर सकती है। सेवा का उद्देश्य स्पष्ट रखें।

साखी ३५० चाँणक कौ अंग · मूल क्रमांक ४

स्वामी हूवा सीतका, पैका कार पचास। राम नाँम काँठै रह्या, करै सिषां की आस॥
कठिन शब्दार्थ

सीतका = सस्ते में; पैका कार = पैसे का काम।

सरल हिंदी अर्थ

स्वामी का नाम आसानी से मिला, धन के काम बढ़े; रामनाम केवल कंठ में रहा और आशा शिष्यों पर टिकी।

भावार्थ और जीवन-संदेश

अनुयायियों की संख्या साधना का प्रमाण नहीं। अपनी निर्भरता और स्वार्थ जाँचना आवश्यक है।

साखी ३५१ चाँणक कौ अंग · मूल क्रमांक ५

कबीर तष्टा टोकणीं, लीए फिरै सुभाइ। रामनाम चीन्हें नहीं, पीतलि ही कै चाइ॥
कठिन शब्दार्थ

तष्टा टोकणी = भिक्षा के पात्र; पीतलि = तुच्छ धन का संकेत।

सरल हिंदी अर्थ

पात्र लेकर घूमता व्यक्ति रामनाम का सार नहीं पहचानता, केवल धन की चमक चाहता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

वेश और उपकरण से अधिक उद्देश्य देखें। आजीविका की जरूरत को लोभ और प्रदर्शन से अलग रखें।

साखी ३५२ चाँणक कौ अंग · मूल क्रमांक ६

कलि का स्वामी लोभिया, पीतलि धरी षटाइ। राज दुबाराँ यौं फिरै, ज्यूँ हरिहाई गाइ॥
कठिन शब्दार्थ

षटाइ = खटाई; हरिहाई = पराए खेत की ओर दौड़ती गाय।

सरल हिंदी अर्थ

लोभी स्वामी धन की चमक के लिए राजद्वारों पर ऐसे घूमता है जैसे गाय दूसरे की हरियाली पर लपके।

भावार्थ और जीवन-संदेश

सत्ता और लाभ का आकर्षण आध्यात्मिक स्वतंत्रता घटा सकता है। हितकारी मार्गदर्शक का चरित्र उसके संबंधों से भी परखें।

साखी ३५३ चाँणक कौ अंग · मूल क्रमांक ७

कलि का स्वामी लोभिया, मनसा धरी बधाइ। दैहिं पईसा ब्याज कौं, लेखाँ करताँ जाइ॥
कठिन शब्दार्थ

मनसा बधाइ = इच्छाएँ बढ़ाईं; लेखाँ = हिसाब।

सरल हिंदी अर्थ

लोभी धार्मिक नेता इच्छाएँ बढ़ाकर धन के ब्याज और हिसाब में लगा है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

आलोचना लोभ में खोई साधना की है। धन का व्यवहार पारदर्शी और जिम्मेदार हो; आध्यात्मिक प्रतिष्ठा उसका आवरण न बने।

साखी ३५४ चाँणक कौ अंग · मूल क्रमांक ८

कबीर कलि खोटी भई, मुनियर मिलै न कोइ। लालच लोभी मसकरा, तिनकूँ आदर होइ॥
कठिन शब्दार्थ

मुनियर = मननशील साधु; मसकरा = खुशामदी।

सरल हिंदी अर्थ

समय ऐसा बिगड़ा कि सच्चा मननशील दुर्लभ है और लोभी, लालची, खुशामदी आदर पाते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

लोकप्रियता को सत्य का एकमात्र माप न बनाएँ। निष्कपटता और आचरण पहचानने का विवेक रखें।

साखी ३५५ चाँणक कौ अंग · मूल क्रमांक ९

चारिउ बेद पढ़ाइ करि, हरि सूँ न लाया हेत। बालि कबीरा ले गया, पंडित ढूँढ़ै खेत॥
कठिन शब्दार्थ

बाली = फसल की बालियाँ; हेत = प्रेम।

सरल हिंदी अर्थ

चारों वेद पढ़कर भी हरि से प्रेम न जोड़ा। कबीर सार की बालियाँ ले गए, पंडित खाली खेत खोजता रहा।

भावार्थ और जीवन-संदेश

शिक्षा का मूल्य उसके सार ग्रहण करने में है। विद्या के साथ विनय और प्रेम विकसित हों।

साखी ३५६ चाँणक कौ अंग · मूल क्रमांक १०

बाँम्हण गुरु जगत का, साधू का गुरु नाहिं। उरझि पुरझि करि मरि रह्या, चारिउँ बेदाँ माहिं॥
कठिन शब्दार्थ

बाँम्हण = ब्राह्मण; उरझि पुरझि = उलझते हुए।

सरल हिंदी अर्थ

कबीर कहते हैं कि केवल जन्म और शास्त्रज्ञान से कोई अनुभवी साधक का गुरु नहीं हो जाता, यदि स्वयं शब्दों में उलझा हो।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह जन्मगत अधिकार पर प्रश्न है। मार्गदर्शक का माप चरित्र, अनुभव और विवेक हो, जाति नहीं।

साखी ३५७ चाँणक कौ अंग · मूल क्रमांक ११

साषित सण का जेवणा, भीगाँ सूँ कठठाइ। दोइ अषिर गुरु बाहिरा, बाँध्या जमपुरि जाइ॥
कठिन शब्दार्थ

साषित = यहाँ भक्ति-विमुख कर्मकांडी; जेवणा = रस्सी; कठठाइ = कसती है।

सरल हिंदी अर्थ

प्रेम से रहित कर्मकांड सन की रस्सी जैसा है, जो भीगकर कसता है; गुरु के सार बिना बंधन बना रहता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

पुराना मत-सूचक शब्द किसी समुदाय का सार्वभौमिक दोष नहीं। सीख है कि अनुष्ठान भीतर विवेक जगाए, भय न बढ़ाए।

साखी ३५८ चाँणक कौ अंग · मूल क्रमांक १२

पाड़ोसी सू रूसणाँ, तिल तिल सुख की हाँणि। पंडित भए सरावगी, पाँणी पीवें छाँणि॥
कठिन शब्दार्थ

रूसणाँ = रूठना; सरावगी = श्रावक का पुराना संबोधन।

सरल हिंदी अर्थ

पड़ोसी से झगड़ा सुख घटाता है; केवल पानी छानने जैसी बाहरी सावधानी से धर्म पूरा नहीं होता।

भावार्थ और जीवन-संदेश

सूक्ष्म नियम के साथ मानवीय संबंधों में अहिंसा और सद्भाव भी आवश्यक हैं।

साखी ३५९ चाँणक कौ अंग · मूल क्रमांक १३

पंडित सेती कहि रह्या, भीतरि भेद्या नाहिं। औरूँ कौ परमोधतां, गया मुहरकाँ माँहि॥
कठिन शब्दार्थ

परमोधतां = उपदेश देते; मुहरकाँ = भटकाव का संकेत।

सरल हिंदी अर्थ

पंडित को समझाया, पर भीतर बात न उतरी; दूसरों को उपदेश देते हुए वह स्वयं भ्रम में चला गया।

भावार्थ और जीवन-संदेश

ज्ञान देने से पहले अपना आचरण देखें। सुनना और सीखते रहना शिक्षक की भी जिम्मेदारी है।

साखी ३६० चाँणक कौ अंग · मूल क्रमांक १४

चतुराई सूवै पढ़ी, सोई पंजर माँहि। फिरि प्रमोधै आन कौ, आपण समझै नाहिं॥
कठिन शब्दार्थ

सूवा = तोता; पंजर = पिंजरा।

सरल हिंदी अर्थ

तोते ने चतुर बातें सीखीं, फिर भी पिंजरे में है; दूसरों को सुनाता है, स्वयं अर्थ नहीं समझता।

भावार्थ और जीवन-संदेश

रटना और आत्मसात करना अलग हैं। सीखी बात को जीवन से जोड़कर समझें।

साखी ३६१ चाँणक कौ अंग · मूल क्रमांक १५

रासि पराई राषताँ, खाया घर का खेत। औरौं कौ प्रमोधतां, मुख मैं पड़िया रेत॥
कठिन शब्दार्थ

रासि = जमा संपदा; प्रमोधतां = समझाते।

सरल हिंदी अर्थ

दूसरों की पूँजी सँभालते अपना खेत खो दिया; दूसरों को शिक्षा देते अपनी साधना बिगाड़ ली।

भावार्थ और जीवन-संदेश

सेवा के साथ आत्मपरीक्षण भी रहे। दूसरों की गलतियाँ गिनते अपनी जिम्मेदारी न भूलें।

साखी ३६२ चाँणक कौ अंग · मूल क्रमांक १६

तारा मंडल बैसि करि, चंद बड़ाई खाइ। उदै भया जब सूर का, स्यूँ ताराँ छिपि जाइ॥
कठिन शब्दार्थ

उदै = उदय; बड़ाई = प्रतिष्ठा।

सरल हिंदी अर्थ

तारों के बीच चंद्रमा चमकता है, लेकिन सूर्य निकलते ही सबकी अलग चमक छिप जाती है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

तुलना से मिली श्रेष्ठता सीमित है। सच्ची समझ आने पर बाहरी दंभ का आकर्षण घटता है।

साखी ३६३ चाँणक कौ अंग · मूल क्रमांक १७

देषण के सबको भले, जिसे सीत के कोट। रवि के उदै न दीसहीं, बँधे न जल की पोट॥
कठिन शब्दार्थ

सीत के कोट = हिम के किले; रवि = सूर्य।

सरल हिंदी अर्थ

बर्फ के किले सुंदर दिखते हैं, पर सूर्य उगते ही मिट जाते हैं और उनका जल बाँधा नहीं रहता।

भावार्थ और जीवन-संदेश

प्रदर्शन की चमक स्थायी आधार नहीं। किसी विचार और नेतृत्व को कठिन परिस्थिति में भी परखें।

साखी ३६४ चाँणक कौ अंग · मूल क्रमांक १८

तीरथ करि करि जग मुवा, डूँधै पाँणी न्हाइ। राँमहि राम जपंतड़ाँ, काल घसीट्याँ जाइ॥
कठिन शब्दार्थ

डूँधै = शरीर का बाहरी भाग; जपंतड़ाँ = जपते हुए।

सरल हिंदी अर्थ

तीर्थ घूमने, शरीर धोने और नाम बोलने भर से काल की पकड़ नहीं छूटती, यदि भीतर परिवर्तन न हो।

भावार्थ और जीवन-संदेश

साधन का सम्मान करें, साथ ही उसका उद्देश्य याद रखें। स्मरण आचरण और चेतना तक पहुँचे।

साखी ३६५ चाँणक कौ अंग · मूल क्रमांक १९

कासी काँठै घर करैं, पीवैं निर्मल नीर। मुकति नहीं हरि नाँव बिन, यों कहें दास कबीर॥
कठिन शब्दार्थ

कासी काँठै = काशी के पास; मुकति = मुक्ति।

सरल हिंदी अर्थ

काशी में घर और निर्मल जल पीना भी हरिनाम के अंतर्बोध का विकल्प नहीं है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

पवित्र स्थान प्रेरणा दे सकते हैं; सच्ची साधना में अपना मन और कर्म बदलना भी आवश्यक है।

साखी ३६६ चाँणक कौ अंग · मूल क्रमांक २०

कबीर इस संसार को, समझाऊँ कै बार। पूँछ जु पकड़ै भेड़ की, उतर्‌या चाहै पार॥
कठिन शब्दार्थ

भेड़ की पूँछ = अनुचित आश्रय; पार = संसार-सागर से पार।

सरल हिंदी अर्थ

लोग भेड़ की पूँछ पकड़कर नदी पार करना चाहते हैं; उन्हें बार-बार कैसे समझाऊँ?

भावार्थ और जीवन-संदेश

अंधानुकरण से सुरक्षित दिशा नहीं मिलती। मार्गदर्शक और उपाय को विवेक से चुनें।

साखी ३६७ चाँणक कौ अंग · मूल क्रमांक २१

कबीर मन फूल्या फिरै, करता हूँ मैं ध्रंम। कोटि क्रम सिरि ले चल्या, चेत न देखै भ्रंम॥
कठिन शब्दार्थ

ध्रंम = धर्म; क्रम = कर्मकांड; भ्रंम = भ्रम।

सरल हिंदी अर्थ

मन धर्म करने के गर्व में फूला है, अनगिनत कर्मों का बोझ उठाता है, पर अपना भ्रम नहीं देखता।

भावार्थ और जीवन-संदेश

धार्मिक अभ्यास अहं बढ़ाए तो आत्मपरीक्षण करें। विनय और करुणा उसके परिणाम बनें।

साखी ३६८ चाँणक कौ अंग · मूल क्रमांक २२

मोर तोर की जेवड़ी, बलि बंध्या संसार। काँ सिकडूँ बासुत कलित, दाझड़ बारंबार॥
कठिन शब्दार्थ

मोर तोर = मेरा-तेरा; जेवड़ी = रस्सी; दाझड़ = दाह।

सरल हिंदी अर्थ

मेरा-तेरा की रस्सी ने संसार बाँध रखा है और जीव उसमें बार-बार जलता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

अधिकार की जिद संबंधों को कठोर करती है। जिम्मेदारी निभाते हुए स्वामित्व का अहं कम करें।

१८. करणीं बिना कथणीं कौ अंग

वचन और कर्म का मेल; गीत और कीर्तन से आगे जीवन का परिवर्तन। मूल स्थानीय क्रमांक १–५।

साखी ३६९ करणीं बिना कथणीं कौ अंग · मूल क्रमांक १

कथणीं कथी तो क्या भया, जे करणी नाँ ठहराइ। कालबूत के कोट ज्यूँ, देषतहीं ढहि जाइ॥
कठिन शब्दार्थ

करणी = आचरण; कालबूत = अस्थायी ढाँचा; कोट = दुर्ग।

सरल हिंदी अर्थ

कहने से क्या हुआ यदि आचरण साथ न हो? ऐसी बात अस्थायी ढाँचे के किले की तरह ढह जाती है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

विश्वास व्यवहार से बनता है। अपने उपदेश को छोटे दैनिक कर्म में निभाएँ।

साखी ३७० करणीं बिना कथणीं कौ अंग · मूल क्रमांक २

जैसी मुख तैं नीकसै, तैसी चालै चाल। पारब्रह्म नेड़ा रहै, पल में करै निहाल॥
कठिन शब्दार्थ

नेड़ा = निकट; निहाल = आनंदित।

सरल हिंदी अर्थ

मुख से जैसी बात निकलती है, चाल भी वैसी हो तो परम सत्य निकट अनुभव होता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

सत्यनिष्ठा कथन और कर्म की एकता है। केवल ऊँची बात से अधिक उसका नियमित पालन महत्त्वपूर्ण है।

साखी ३७१ करणीं बिना कथणीं कौ अंग · मूल क्रमांक ३

जैसी मुष तें नीकसै, तैसी चालै नाहिं। मानिष नहीं ते स्वान गति, बाँध्या जमपुर जाँहिं॥
कठिन शब्दार्थ

स्वान गति = तीखी पशु-उपमा; जमपुर = कर्मफल का क्षेत्र।

सरल हिंदी अर्थ

जो कहता कुछ और, करता कुछ और है, उसकी असंगति को कवि कठोर उपमा देकर दोषपूर्ण कहते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

व्यक्ति का अपमान सीख नहीं है। सकारात्मक संदेश अपने वचन के प्रति उत्तरदायी होना है।

साखी ३७२ करणीं बिना कथणीं कौ अंग · मूल क्रमांक ४

पद गांएँ मन हरषिया, साषी कह्यां अनंद। सो तत नांव न जांणियां, गल मैं पड़िया फंध॥
कठिन शब्दार्थ

साषी = साखी; तत = मूल तत्त्व; फंध = बंधन।

सरल हिंदी अर्थ

पद गाकर मन प्रसन्न हुआ और साखी कहकर आनंद आया, पर भीतर नाम का सार न जाना तो बंधन बना रहा।

भावार्थ और जीवन-संदेश

साहित्य और संगीत साधन हैं। उनके भाव को अपने जीवन में उतारना अगला आवश्यक कदम है।

पाठ-टिप्पणी: वेब-प्रतिलिपि के “सापी” और “सों तन” के स्थान पर मुद्रित संदर्भ पृष्ठ १२२ से “साषी” और “सो तत” पाठ लिया गया है।

साखी ३७३ करणीं बिना कथणीं कौ अंग · मूल क्रमांक ५

करता दीसै कीरतन, ऊँचा करि करि तूंड। जाँणै बूझे कुछ नहीं, यौं ही आँधां रूंड॥
कठिन शब्दार्थ

तूंड = मुख; रूंड = चेतन सारविहीन देह का रूपक।

सरल हिंदी अर्थ

ऊँचा मुख करके कीर्तन करता दिखता है, लेकिन अर्थ और अनुभव की समझ नहीं—ऐसा प्रदर्शन खोखला है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

स्वर और उत्साह के साथ अर्थ, विनय और सजगता जुड़ें। भक्ति केवल दूसरों को प्रभावित करने के लिए न हो।

१९. कथणीं बिना करणी कौ अंग

पुस्तक के अक्षर से प्रेम के अनुभव तक पहुँचने का आग्रह। मूल स्थानीय क्रमांक १–४।

साखी ३७४ कथणीं बिना करणी कौ अंग · मूल क्रमांक १

मैं जान्यूँ पढ़िबौ भलो, पढ़िवा थें भलो जोग। राँम नाँम सूँ प्रीति करि, भल भल नींदी लोग॥
कठिन शब्दार्थ

जोग = साधना; नींदी = निंदा की।

सरल हिंदी अर्थ

पहले पढ़ना श्रेष्ठ लगा, फिर योग। रामनाम से सच्चा प्रेम जोड़ा तो लोग उस मार्ग की भी निंदा करने लगे।

भावार्थ और जीवन-संदेश

लोकमत बदलता रहता है। अध्ययन और साधना को भीतर की सत्यनिष्ठा से दिशा दें।

साखी ३७५ कथणीं बिना करणी कौ अंग · मूल क्रमांक २

कबिरा पढ़िबा दूरि करि, पुस्तक देइ बहाइ। बांवन अषिर सोधि करि, ररै ममैं चित लाइ॥
कठिन शब्दार्थ

बांवन अषिर = वर्णमाला; ररै ममैं = रामनाम का अक्षर-संकेत।

सरल हिंदी अर्थ

केवल पुस्तक-संग्रह में न उलझो; अक्षरों का सार समझकर रामनाम में चित्त लगाओ।

भावार्थ और जीवन-संदेश

पुस्तक बहाने का चित्र अतिशयोक्ति है। शिक्षा की निंदा नहीं, ज्ञान को जीवन में अपनाने का आग्रह है।

साखी ३७६ कथणीं बिना करणी कौ अंग · मूल क्रमांक ३

कबीर पढ़िया दूरि करि, आथि पढ़ा संसार। पीड़ न उपजी प्रीति सूँद्द, तो क्यूँ करि करै पुकार॥
कठिन शब्दार्थ

आथि = बहुत या पर्याप्त; पीड़ = प्रेम की कसक।

सरल हिंदी अर्थ

संसार ने बहुत पढ़ लिया; यदि प्रेम की कसक न जागी तो भीतर से पुकार कैसे निकलेगी?

भावार्थ और जीवन-संदेश

सूचना के साथ संवेदना विकसित हो। समझ का मूल्य मनुष्यों और जीवन के प्रति व्यवहार में भी दिखे।

साखी ३७७ कथणीं बिना करणी कौ अंग · मूल क्रमांक ४

पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुवा, पंडित भया न कोइ। एकै आषिर पीव का, पढ़ै सु पंडित होइ॥
कठिन शब्दार्थ

पोथी = पुस्तक; एकै आषिर = प्रेम का मूल अक्षर।

सरल हिंदी अर्थ

पुस्तकें पढ़ते जीवन बीत गया, पर सच्चा पांडित्य दुर्लभ रहा। प्रिय के सार को समझने वाला वास्तविक ज्ञानी है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

लोकप्रिय पाठांतर से अलग यहाँ संदर्भ-पाठ का ‘एकै आषिर’ है। शिक्षा का सार प्रेम और विवेक में खोजें।

२०. कामी नर कौ अंग

ऐतिहासिक वैराग्य की कठोर भाषा में अनियंत्रित कामना की आलोचना। मूल स्थानीय क्रमांक १–२७।

साखी ३७८ कामी नर कौ अंग · मूल क्रमांक १

कामणि काली नागणीं, तीन्यूँ लोक मँझारि। रांम सनेही ऊबरे, बिषई खाये झारि॥
कठिन शब्दार्थ

काँमणि = स्त्री-रूप में कामासक्ति का बिंब; नागणी = सर्पिणी।

सरल हिंदी अर्थ

कामासक्ति को काली नागिन कहकर कवि बताते हैं कि विषय-लोलुप उसके विष में फँसते हैं, जबकि ईश्वर-प्रेमी बचते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह ऐतिहासिक पुरुष-वैराग्य की भाषा है। उपयोगी शिक्षा सभी लिंगों के लिए संयम है; स्त्री स्वयं दोष या विष नहीं।

पाठ-टिप्पणी: वेब-पाठ के “राग सनेही” को मुद्रित पृष्ठ १२३ के “रांम सनेही” से मिलाया गया है।

साखी ३७९ कामी नर कौ अंग · मूल क्रमांक २

काँमणि मीनीं पाँणि की, जे छेड़ौं तौ खाइ। जे हरि चरणाँ राचियाँ, तिनके निकटि न जाइ॥
कठिन शब्दार्थ

मीनीं = मछली; छेड़ौं = आसक्ति से उलझूँ।

सरल हिंदी अर्थ

वासना को ऐसी मछली कहा है जिससे छेड़छाड़ करने वाला फँसता है; हरिचरण में स्थिर मन उसके वश नहीं होता।

भावार्थ और जीवन-संदेश

आकर्षण को अनियंत्रित आदत बनने से पहले पहचानें। संबंध में सम्मान और संयम रखें।

साखी ३८० कामी नर कौ अंग · मूल क्रमांक ३

परनारी राता फिरै, चोरी बिढता खाँहिं। दिवस चारि सरसा रहै, अंति समूला जाँहिं॥
कठिन शब्दार्थ

परनारी = दूसरे के वैवाहिक संबंध की स्त्री; बिढता = अनुचित लाभ।

सरल हिंदी अर्थ

पर-संबंध और चोरी के लाभ कुछ दिन आनंद देते हैं, पर अंत में जीवन का आधार बिगाड़ सकते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

क्षणिक सुख के लिए विश्वास और मर्यादा न तोड़ें। यह जिम्मेदारी हर व्यक्ति पर समान है।

साखी ३८१ कामी नर कौ अंग · मूल क्रमांक ४

पर नारी पर सुंदरी बिरला बंचै कोइ। खाताँ मीठी खाँड सी, अंति कालि विष होइ॥
कठिन शब्दार्थ

बंचै = बचता; खाँड = चीनी।

सरल हिंदी अर्थ

अनुचित संबंध पहले चीनी जैसे मीठे लगते हैं, लेकिन बाद का परिणाम विष जैसा कष्टकारी हो सकता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

संबंधों में विश्वास, सहमति और जिम्मेदारी आवश्यक हैं। आकर्षण के साथ उसके प्रभाव भी देखें।

साखी ३८२ कामी नर कौ अंग · मूल क्रमांक ५

पर नारी कै राचणै, औगुण है गुण नाँहि। षार समंद मैं मंछला, केता बहि बहि जाँहि॥
कठिन शब्दार्थ

राचणै = आसक्त होना; षार समंद = खारा समुद्र; मंछला = मछली।

सरल हिंदी अर्थ

अनुचित संबंध की आसक्ति गुण नहीं, हानि है; खारे समुद्र की मछली की तरह अनेक उसके भीतर ही भटकते रहते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

रूपक बँधी हुई लालसा का संकेत है। आकर्षण के साथ उसके परिणाम देखें और संबंधों में विश्वास, सम्मान तथा मर्यादा रखें।

पाठ-टिप्पणी: वेब-पाठ में दूसरी पंक्ति विकृत है। मुद्रित पृष्ठ १२३ से खारे समुद्र की मछली वाला “षार समंद मैं मंछला” पाठ लिया गया है।

साखी ३८३ कामी नर कौ अंग · मूल क्रमांक ६

पर नारी को राचणौं, जिसी ल्हसण की पाँनि। पूणैं बैसि रषाइए परगट होइ दिवानि॥
कठिन शब्दार्थ

पाँनि = गंध; पूणैं = कोने में; दिवानि = खुले में।

सरल हिंदी अर्थ

अनुचित संबंध लहसुन की गंध जैसे हैं; छिपाकर किए जाएँ, तब भी उनका प्रभाव प्रकट हो जाता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

गोपनीयता से गलत काम सही नहीं होता। विश्वास को चोट पहुँचाने वाले निर्णय से पहले विवेक करें।

साखी ३८४ कामी नर कौ अंग · मूल क्रमांक ७

नर नारी सब नरक है, जब लग देह सकाम। कहै कबीर ते राँम के, जे सुमिरै निहकाम॥
कठिन शब्दार्थ

सकाम = वासना या फल-इच्छा से भरा; निहकाम = निष्काम।

सरल हिंदी अर्थ

स्त्री और पुरुष दोनों देह की अनियंत्रित कामना में बँधे हैं; निष्काम स्मरण करने वाले राम के सच्चे भक्त हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह पद आलोचना को दोनों लिंगों तक फैलाता है। दोष लिंग नहीं, आसक्ति और स्वार्थ है।

साखी ३८५ कामी नर कौ अंग · मूल क्रमांक ८

नारी सेती नेह, बुधि बबेक सबही हरै। काँढ गमावै देह, कारिज कोई नाँ सरै॥
कठिन शब्दार्थ

बबेक = विवेक; कारिज = सार्थक कार्य।

सरल हिंदी अर्थ

कामासक्ति में डूबा लगाव बुद्धि और विवेक को ढकता है; जीवन की शक्ति घटती है और मूल काम अधूरे रहते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

प्रेम और वासना की दासता अलग हैं। स्वस्थ संबंध विवेक, सम्मान और जिम्मेदारी बढ़ाते हैं।

साखी ३८६ कामी नर कौ अंग · मूल क्रमांक ९

नाना भोजन स्वाद सुख, नारी सेती रंग। बेगि छाँड़ि पछताइगा, ह्नै है मूरति भंग॥
कठिन शब्दार्थ

बेगि = शीघ्र; मूरति भंग = देह का नाश।

सरल हिंदी अर्थ

भोजन, स्वाद और काम-सुख की अनियंत्रित दौड़ छोड़ो; देह नश्वर है, समय खोने का पछतावा हो सकता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

सुख लेते हुए संतुलन रखें। जीवन का पूरा समय केवल उपभोग में न समेटें।

साखी ३८७ कामी नर कौ अंग · मूल क्रमांक १०

नारि नसावै तीनि सुख, जा नर पासैं होइ। भगति मुकति निज ग्यान मैं, पैसि न सकई कोइ॥
कठिन शब्दार्थ

तीनि सुख = भक्ति, मुक्ति, आत्मज्ञान; पैसि = प्रवेश।

सरल हिंदी अर्थ

कवि कामासक्ति को भक्ति, स्वतंत्रता और आत्मज्ञान में बाधा बताते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

पुरानी स्त्री-केंद्रित भाषा को सार्वभौमिक निर्णय न बनाएँ। सभी के लिए सीख है कि मनुष्य को वस्तु बनाकर न देखें।

साखी ३८८ कामी नर कौ अंग · मूल क्रमांक ११

एक कनक अरु काँमनी, विष फल कीएउ पाइ। देखै ही थे विष चढ़े, खायै सूँ मरि जाइ॥
कठिन शब्दार्थ

कनक = सोना; काँमनी = काम-आकर्षण का प्रतीक।

सरल हिंदी अर्थ

सोना और कामना विषफल जैसे कहे गए हैं—देखते ही लालसा उठती है और उनमें डूबना हानि करता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

धन और संबंध अपने आप दोष नहीं। उनकी अनियंत्रित चाह विवेक को ढकती है।

साखी ३८९ कामी नर कौ अंग · मूल क्रमांक १२

एक कनक अरु काँमनी दोऊ अंगनि की झाल। देखें ही तन प्रजलै, परस्याँ ह्नै पैमाल॥
कठिन शब्दार्थ

झाल = ज्वाला; परस्याँ = छूने या उलझने पर।

सरल हिंदी अर्थ

धन और वासना की लालसा आग जैसी है; आकर्षण मन को जलाता है, आसक्ति जीवन को व्याकुल करती है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

अपनी चाह की तीव्रता पहचानें। सीमा और संतोष से मन का संतुलन बचाएँ।

साखी ३९० कामी नर कौ अंग · मूल क्रमांक १३

कबीर भग की प्रीतड़ी, केते गए गड़ंत। केते अजहूँ जायसी, नरकि हसंत हसंत॥
कठिन शब्दार्थ

भग = जननांग का पुराना स्पष्ट शब्द; गड़ंत = गिरते हुए।

सरल हिंदी अर्थ

केवल यौन-सुख की लिप्सा में अनेक गिरे और आगे भी गिरते रहेंगे—कवि ऐसी बेखबर दौड़ पर चेताते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

आलोचना अनियंत्रित लिप्सा की है। किसी देह या लिंग की अवमानना के बजाय सम्मानपूर्ण, जिम्मेदार संबंध अपनाएँ।

साखी ३९१ कामी नर कौ अंग · मूल क्रमांक १४

जोरू जूठणि जगत की, भले बुरे का बीच। उत्यम ते अलगे रहै, निकटि रहै तैं नीच॥
कठिन शब्दार्थ

जोरू = पत्नी या स्त्री का पुराना संबोधन; जूठणि = अपमानकारी उपमा।

सरल हिंदी अर्थ

कवि वैराग्य की कठोर भाषा में कामासक्त संग से दूर रहने वाले को श्रेष्ठ और उसमें डूबे को अधम कहते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह उपमा आज स्त्री के अपमान का आधार नहीं हो सकती। ग्रहणयोग्य सीख अपनी इच्छाओं का संयम है।

साखी ३९२ कामी नर कौ अंग · मूल क्रमांक १५

नारी कुण्ड नरक का, बिरला थंभै बाग। कोई साधू जन ऊबरै, सब जग मूँवा लाग॥
कठिन शब्दार्थ

कुण्ड = गहरा गड्ढा; थंभै बाग = लगाम सँभाले।

सरल हिंदी अर्थ

कामना का आकर्षण नरक-कुंड जैसा कठिन फंदा कहा गया है; विरला साधक अपनी लगाम सँभालता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

ऐतिहासिक स्त्री-बिंब का आशय अनियंत्रित वासना से सावधानी है। किसी स्त्री को संकट का मूल न ठहराएँ।

साखी ३९३ कामी नर कौ अंग · मूल क्रमांक १६

सुंदरि थे सूली भली, बिरला बचै कोय। लोह निहाला अगनि मैं, जलि बलि कोइला होय॥
कठिन शब्दार्थ

निहाला = तपकर बदला; सूली = घोर कष्ट का बिंब।

सरल हिंदी अर्थ

कवि कामासक्ति के प्रभाव को सूली से भी कठिन कहते हैं; जैसे आग में लोहा तपकर अपना रूप खोता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

अतिशयोक्ति मोह की तीव्रता दिखाती है। सकारात्मक संदेश संयम है, कष्ट देने या सहने का आदेश नहीं।

साखी ३९४ कामी नर कौ अंग · मूल क्रमांक १७

अंधा नर चैते नहीं, कटै ने संसे सूल। और गुनह हरि बकससी, काँमी डाल न मूल॥
कठिन शब्दार्थ

चैते = चेतता; संसे सूल = संशय की पीड़ा।

सरल हिंदी अर्थ

असावधान कामी चेतता नहीं और संशय का काँटा नहीं मिटता; कवि उसकी दशा को गंभीर नैतिक हानि कहते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

धार्मिक क्षमा का भरोसा गलत आचरण जारी रखने का बहाना न बने। अपनी जिम्मेदारी लेकर सुधार करें।

साखी ३९५ कामी नर कौ अंग · मूल क्रमांक १८

भगति बिगाड़ी काँमियाँ, इंद्री केरै स्वादि। हीरा खोया हाथ थैं, जनम गँवाया बादि॥
कठिन शब्दार्थ

इंद्री केरै स्वादि = इंद्रिय-तृप्ति में; बादि = व्यर्थ।

सरल हिंदी अर्थ

इंद्रिय-सुख की दासता ने भक्ति बिगाड़ी; हाथ का ज्ञान-हीरा खोकर जीवन का अवसर गँवाया।

भावार्थ और जीवन-संदेश

क्षणिक तृप्ति और दीर्घ मूल्य में चुनाव करें। अपना समय और संबंध केवल लालसा को न सौंपें।

साखी ३९६ कामी नर कौ अंग · मूल क्रमांक १९

कामी अमीं न भावई, विषई कौं ले सोधि। कुबधि न जाई जीव की, भावै स्यंभ रहो प्रमोधि॥
कठिन शब्दार्थ

अमीं = अमृत; प्रमोधि = समझाओ; स्यंभ = परम सत्ता का संकेत।

सरल हिंदी अर्थ

कामी को अमृत जैसी हितकारी बात नहीं भाती; गलत रुचि जमी हो तो बार-बार समझाने पर भी बदलना कठिन है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

सीख फलने के लिए ग्रहणशीलता चाहिए। अपनी प्रतिरोधी आदत पहचानना परिवर्तन की शुरुआत है।

साखी ३९७ कामी नर कौ अंग · मूल क्रमांक २०

विषै विलंबी आत्माँ, मजकण खाया सोधि। ग्याँन अंकूर न ऊगई, भावै निज प्रमोध॥
कठिन शब्दार्थ

विलंबी = उलझी; मजकण = कुतरने वाले जीव का बिंब।

सरल हिंदी अर्थ

विषयों में अटकी चेतना भीतर से कुतरी जाती है; ऐसे मन में ज्ञान का बीज नहीं उगता।

भावार्थ और जीवन-संदेश

गहरी आदत ध्यान और समझ की भूमि प्रभावित करती है। अभ्यास के साथ वातावरण तथा दिनचर्या भी सुधारें।

साखी ३९८ कामी नर कौ अंग · मूल क्रमांक २१

विषै कर्म की कंचुली, पहरि हुआ नर नाग। सिर फोड़ै, सूझै नहीं, को आगिला अभाग॥
कठिन शब्दार्थ

कंचुली = केंचुली; आगिला = आगे का।

सरल हिंदी अर्थ

विषय-कर्म की केंचुली पहनकर मनुष्य सर्प जैसा बनता है और अपने भविष्य का अहित नहीं देखता।

भावार्थ और जीवन-संदेश

व्यवहार की पुनरावृत्ति पहचान बन सकती है। उसे बदलने के लिए परिणाम समझकर ठोस कदम उठाएँ।

साखी ३९९ कामी नर कौ अंग · मूल क्रमांक २२

कामी कदे न हरि भजै, जपै न कैसो जाप। राम कह्याँ थैं जलि मरे, को पूरिबला पाप॥
कठिन शब्दार्थ

कैसो = केशव; पूरिबला = पुराना।

सरल हिंदी अर्थ

वासना में डूबा मन न हरि-भजन में लगता है, न नाम सुनना चाहता है; उसे पुराने दोषों की पकड़ कहा गया है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

जिस बात से भीतर प्रतिरोध उठे, उसे शांत होकर देखें। दोषारोपण के बजाय अपनी रुचि का कारण समझें।

साखी ४०० कामी नर कौ अंग · मूल क्रमांक २३

काँमी लज्जा ना करै, मन माँहें अहिलाद। नीद न माँगैं साँथरा, भूष न माँगै स्वाद॥
कठिन शब्दार्थ

अहिलाद = आनंद; साँथरा = बिछौना।

सरल हिंदी अर्थ

अनियंत्रित कामना लज्जा और विवेक नहीं देखती, जैसे नींद बिछौना और भूख स्वाद नहीं माँगती।

भावार्थ और जीवन-संदेश

प्रबल आवेग निर्णय को सीमित कर सकता है। ऐसे समय ठहरकर मर्यादा और दूसरे की सहमति याद रखें।

साखी ४०१ कामी नर कौ अंग · मूल क्रमांक २४

नारि पराई आपणीं, भुगत्या नरकहिं जाइ। आगि आगि सबरो कहै, तामै हाथ न बाहि॥
कठिन शब्दार्थ

आपणीं = अपनी; भुगत्या = भोग-वस्तु मानकर उपभोग।

सरल हिंदी अर्थ

चाहे अपना संबंध हो या पराया, वासनामात्र में डूबना हानिकारक है; आग पहचानकर उसमें हाथ न डालो।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह वैराग्य का तीखा कथन है। सामान्य दांपत्य को दोषी ठहराने के बजाय वस्तुकरण और अनियंत्रित आसक्ति से बचें।

साखी ४०२ कामी नर कौ अंग · मूल क्रमांक २५

कबीर कहता जात हौं, चेतै नहीं गँवार। बैरागी गिरही कहा, काँमी वार न पार॥
कठिन शब्दार्थ

गिरही = गृहस्थ; वार न पार = अंत नहीं।

सरल हिंदी अर्थ

चेतावनी सुनकर भी असावधान व्यक्ति नहीं सँभलता। कामना का दास चाहे वैरागी हो या गृहस्थ, उलझन से नहीं निकलता।

भावार्थ और जीवन-संदेश

वेश या जीवन-स्थिति नैतिक छूट नहीं देती। संयम और सम्मान सबके लिए हैं।

साखी ४०३ कामी नर कौ अंग · मूल क्रमांक २६

ग्यानी तो नींडर भया, माँने नाँही संक। इंद्री केरे बसि पड़ा, भूंचै विषै निसंक॥
कठिन शब्दार्थ

नींडर = निर्भय; संक = संकोच; भूंचै = भोगता।

सरल हिंदी अर्थ

अपने को ज्ञानी कहने वाला यदि इंद्रियों के वश होकर बिना विचार भोग में डूबे, तो उसकी निर्भयता अहं है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

ज्ञान का दावा अपने ऊपर जिम्मेदारी बढ़ाता है। उसे गलती उचित ठहराने का साधन न बनाएँ।

साखी ४०४ कामी नर कौ अंग · मूल क्रमांक २७

ग्याँनी मूल गँवाइया, आपण भये करंता। ताथै संसारी भला, मन मैं रहे डरंता॥
कठिन शब्दार्थ

करंता = स्वयं को सर्वकर्ता मानने वाला; डरंता = सजग संकोची।

सरल हिंदी अर्थ

ज्ञानी ने अपने को सबका कर्ता मानकर मूल खोया; उससे वह साधारण व्यक्ति भला है जिसमें गलत काम का संकोच है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

आध्यात्मिक अहं साधारण विवेक से भी दूर कर सकता है। विनय और नैतिक सावधानी सँजोएँ।

२१. सहज कौ अंग

सहज निर्मलता, इंद्रियों का संतुलन और स्मरण का स्वभाव बनना। मूल स्थानीय क्रमांक १–४।

साखी ४०५ सहज कौ अंग · मूल क्रमांक १

सहज सहज सबकौ कहै, सहज न चीन्है कोइ। जिन्ह सहजै विषिया तजी, सहज कही जै सोइ॥
कठिन शब्दार्थ

सहज = स्वाभाविक निर्मलता; विषिया = विषयासक्ति।

सरल हिंदी अर्थ

सब सहज कहते हैं, पर अर्थ नहीं जानते। जिसकी विषयों की पकड़ स्वाभाविक रूप से ढीली हुई, वही सहज है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

सहजता मनमानी नहीं। अभ्यास से संयम बोझ के बजाय स्थिर स्वभाव बनने लगे।

साखी ४०६ सहज कौ अंग · मूल क्रमांक २

सहज सहज सबको कहै, सहज न चीन्हें कोइ। पाँचू राखै परसती, सहज कही जै सोइ॥
कठिन शब्दार्थ

पाँचू = पाँच इंद्रियाँ; परसती = वश या संतुलन में।

सरल हिंदी अर्थ

सहज वही है जो पाँचों इंद्रियों को सजग संतुलन में रखता है; केवल सहज कहने से नहीं होता।

भावार्थ और जीवन-संदेश

भीतर की स्वतंत्रता प्रतिक्रियाओं पर विवेक से दिखती है। आकर्षण और निर्णय के बीच स्थान बनाएँ।

साखी ४०७ सहज कौ अंग · मूल क्रमांक ३

सहजै सहजै सब गए, सुत बित कांमणि कांम। एकमेक ह्नै मिलि रह्या, दास, कबीरा रांम॥
कठिन शब्दार्थ

सुत बित = संतान और संपत्ति; एकमेक = एकरस।

सरल हिंदी अर्थ

संतान, धन और कामना की आसक्ति सहज ढली; कबीर का चित्त राम में एकरस हुआ।

भावार्थ और जीवन-संदेश

कर्तव्य निभाते हुए स्वामित्व का आग्रह कम हो सकता है। त्याग का केंद्र मोह है, संबंधों की उपेक्षा नहीं।

साखी ४०८ सहज कौ अंग · मूल क्रमांक ४

सहज सहज सबको कहै, सहज न चीन्हैं कोइ। जिन्ह सहजै हरिजी मिलै, सहज कहीजै सोइ॥
कठिन शब्दार्थ

चीन्हैं = पहचानें; सहजै = सहज भाव से।

सरल हिंदी अर्थ

सब सहज की चर्चा करते हैं; सहज वह है जिसमें हरि का आत्मीय परिचय स्वाभाविक हो जाए।

भावार्थ और जीवन-संदेश

साधना जीवन से अलग प्रदर्शन न रहे। स्मरण, सत्य और करुणा स्वभाव में उतरें।

२२. साँच कौ अंग

सत्य, कर्म का लेखा, करुणा और अनुष्ठान के साथ नैतिक जिम्मेदारी। मूल स्थानीय क्रमांक १–१७।

साखी ४०९ साँच कौ अंग · मूल क्रमांक १

कबीर पूँजी साह की, तूँ जिनि खोवै ष्वार। खरी बिगूचनि होइगी, लेखा देती बार॥
कठिन शब्दार्थ

साह = स्वामी; ष्वार = नष्ट; बिगूचनि = लज्जा।

सरल हिंदी अर्थ

स्वामी की दी जीवन-पूँजी मत गँवाओ; अपने कर्म का हिसाब सामने आने पर कठिन लज्जा होगी।

भावार्थ और जीवन-संदेश

समय, क्षमता और विश्वास अमानत जैसे हैं। उनका उपयोग जिम्मेदारी और ईमानदारी से करें।

साखी ४१० साँच कौ अंग · मूल क्रमांक २

लेखा देणाँ सोहरा, जे दिल साँचा होइ। उस चंगे दीवाँन मैं, पला न पकड़े कोइ॥
कठिन शब्दार्थ

सोहरा = सरल; दीवाँन = न्यायालय; पला = पल्ला।

सरल हिंदी अर्थ

हृदय सच्चा हो तो हिसाब देना सरल है; उस निष्पक्ष न्याय में कोई पल्ला नहीं पकड़ता।

भावार्थ और जीवन-संदेश

पारदर्शी जीवन अनावश्यक भय घटाता है। कथन और कर्म साफ हों तो उत्तरदायित्व निभाना सहज होता है।

साखी ४११ साँच कौ अंग · मूल क्रमांक ३

कबीर चित्त चमंकिया, किया पयाना दूरि। काइथि कागद काढ़िया, तब दरिगह लेखा पूरि॥
कठिन शब्दार्थ

पयाना = प्रस्थान; काइथि = लेखा रखने वाला; दरिगह = न्याय-स्थान।

सरल हिंदी अर्थ

दूर की यात्रा का समय आया तो चित्त चौंका; लेखाकार ने कर्मों का कागज खोल दिया।

भावार्थ और जीवन-संदेश

मृत्यु और न्याय की छवि जीवन-समीक्षा जगाती है। देर होने से पहले अपना हिसाब ईमानदारी से देखें।

साखी ४१२ साँच कौ अंग · मूल क्रमांक ४

काइथि कागद काढ़ियां, तब लेखैं वार न पार। जब लग साँस सरीर मैं, तब लग राम सँभार॥
कठिन शब्दार्थ

वार न पार = अंतहीन; सँभार = स्मरण कर।

सरल हिंदी अर्थ

कर्मों का लेखा खुलने पर उसका अंत नहीं दिखता। जब तक साँस है, राम को सँभालो।

भावार्थ और जीवन-संदेश

सुधार का अवसर वर्तमान है। स्मरण के साथ गलती रोकना और जहाँ संभव हो भरपाई करना भी जुड़ें।

साखी ४१३ साँच कौ अंग · मूल क्रमांक ५

यहु सब झूठी बंदिगी, बरियाँ पंच निवाज। साचै मारै झूठ पढ़ि, काजी करै अकाज॥
कठिन शब्दार्थ

पंच निवाज = पाँच नमाज़; अकाज = अहित।

सरल हिंदी अर्थ

सत्य दबाकर झूठ का साथ देने वाले काजी की बाहरी बंदगी को कबीर निष्फल कहते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

आलोचना किसी धर्म की प्रार्थना की नहीं, अनुष्ठान और अन्यायी कर्म के विरोध की है। न्याय सभी आस्थाओं का नैतिक प्रश्न है।

साखी ४१४ साँच कौ अंग · मूल क्रमांक ६

कबीर काजी स्वादि बसि, ब्रह्म हतै तब दोइ। चढ़ि मसीति एकै कहै, दरि क्यूँ साचा होइ॥
कठिन शब्दार्थ

हतै = मारता; मसीति = मस्जिद; एकै = एक ईश्वर।

सरल हिंदी अर्थ

स्वाद के लिए जीव मारकर ऊपर एक ईश्वर की घोषणा करने में कबीर नैतिक विरोध देखते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह कवि की अहिंसा-दृष्टि है। उनके तर्क का केंद्र कथन और करुणा का मेल है, किसी समुदाय का अपमान नहीं।

साखी ४१५ साँच कौ अंग · मूल क्रमांक ७

काजी मुलाँ भ्रमियाँ, चल्या दुनीं कै साथि। दिल थैं दीन बिसारिया, करद लई जब हाथि॥
कठिन शब्दार्थ

दीन = धर्म; करद = छुरी।

सरल हिंदी अर्थ

काजी-मुल्ला सांसारिक स्वाद में उलझकर धर्म भूलते हैं, जब हाथ में छुरी लेकर हिंसा करते हैं—कवि ऐसा प्रतिवाद कहते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

ऐतिहासिक मत-विवाद को संदर्भ में पढ़ें। अपने धर्मपालन में करुणा और आत्मपरीक्षण की जगह रखें।

साखी ४१६ साँच कौ अंग · मूल क्रमांक ८

जोरी करि जिबहै करैं, कहते हैं ज हलाल। जब दफतर देखैगा दई, तब हैगा कौंण हवाल॥
कठिन शब्दार्थ

जोरी = बलपूर्वक; जिबहै = वध करते; दई = दैवी सत्ता; हवाल = दशा।

सरल हिंदी अर्थ

बल से जीव मारकर उसे उचित कहने वाले से कवि पूछते हैं—दिव्य न्याय के सामने उसकी दशा क्या होगी?

भावार्थ और जीवन-संदेश

धार्मिक नाम किसी कर्म की नैतिक समीक्षा समाप्त नहीं करता। शक्ति के उपयोग पर करुणापूर्वक विचार करें।

पाठ-टिप्पणी: वेब-प्रतिलिपि में “जोरी कलिर जिहै” जैसे मिले हुए अक्षर हैं। मुद्रित पृष्ठ १२६ के स्पष्ट पाठ से पंक्ति व्यवस्थित की गई है।

साखी ४१७ साँच कौ अंग · मूल क्रमांक ९

जोरी कीयाँ जुलम है, माँगे न्याव खुदाइ। खालिक दरि खूनी खड़ा, मार मुहे मुहि खाइ॥
कठिन शब्दार्थ

जुलम = अत्याचार; न्याव = न्याय; खालिक = स्रष्टा।

सरल हिंदी अर्थ

बलपूर्वक किया अत्याचार पीड़ित की न्याय-पुकार बनता है; स्रष्टा के सामने हिंसा का उत्तर देना होगा।

भावार्थ और जीवन-संदेश

दूसरे की पीड़ा को अपनी सुविधा से छोटा न करें। न्याय में निर्बल की आवाज भी सुनी जाए।

साखी ४१८ साँच कौ अंग · मूल क्रमांक १०

साँई सेती चोरियाँ, चोराँ सेती गुझ। जाँणैगा रे जीवड़ा, मार पड़ैगी तुझ॥
कठिन शब्दार्थ

गुझ = गुप्त मिलीभगत; जीवड़ा = जीव।

सरल हिंदी अर्थ

स्वामी से चोरी और चोरों से गुप्त समझौता अंत में छिपा नहीं रहेगा; उसका परिणाम सामने आएगा।

भावार्थ और जीवन-संदेश

गलत साथ में मिला लाभ अस्थायी है। ईमानदारी का हिसाब अपनी अंतरात्मा से भी छिपाया नहीं जा सकता।

साखी ४१९ साँच कौ अंग · मूल क्रमांक ११

सेष सबूरी बाहिरा, क्या हज काबैं जाइ। जिनकी दिल स्याबति नहीं, तिनकौं कहाँ खुदाइ॥
कठिन शब्दार्थ

सेष = शेख; सबूरी = धैर्य; स्याबति = स्थिर।

सरल हिंदी अर्थ

धैर्य और हृदय की स्थिरता बिना हज या काबा जाने से भीतर ईश्वर का बोध कैसे होगा?

भावार्थ और जीवन-संदेश

तीर्थ की उपयोगिता अंतःपरिवर्तन में है। बाहरी यात्रा के साथ विनय और सद्भाव विकसित हों।

साखी ४२० साँच कौ अंग · मूल क्रमांक १२

खुब खांड़ है खीचड़ी, मांहि पड़ै टुक लूंण। पेड़ा रोटी खाइ करि, गला कटावै कौंण॥
कठिन शब्दार्थ

खुब खांड़ = बहुत स्वादिष्ट; खीचड़ी = खिचड़ी; टुक लूंण = थोड़ा नमक।

सरल हिंदी अर्थ

थोड़ा नमक पड़ी सादी खिचड़ी भी स्वादिष्ट है। समृद्ध भोजन के लोभ में अपने ऊपर घोर संकट क्यों बुलाएँ?

भावार्थ और जीवन-संदेश

संतोष जीवन को अनैतिक लाभ और निर्भरता से बचाता है। सादगी का मूल्य उसकी स्वतंत्रता में है। अनुचित लोभ के बदले सादगी और ईमानदारी चुनें।

पाठ-टिप्पणी: वेब-प्रतिलिपि का “खोपड़ी” यहाँ “खीचड़ी” है। मुद्रित पृष्ठ १२७ और वियोगी हरि के साखी-संकलन से तुलना की गई है।

साखी ४२१ साँच कौ अंग · मूल क्रमांक १३

पापी पूजा बैसि करि, भषै माँस मद दोइ। तिनकी दष्या मुकति नहीं, कोटि नरक फल होइ॥
कठिन शब्दार्थ

भषै = खाता; मद = मदिरा; दष्या = दीक्षा या बाहरी चिह्न।

सरल हिंदी अर्थ

पूजा में बैठकर भी हिंसा और मद में डूबे व्यक्ति को बाहरी धार्मिक चिह्न मुक्त नहीं करते—कवि का मत है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

इसे पूरे समुदाय पर निर्णय न बनाएँ। केंद्रीय संदेश अनुष्ठान के साथ चरित्र और संयम की आवश्यकता है।

साखी ४२२ साँच कौ अंग · मूल क्रमांक १४

सकल बरण इकत्रा है, सकति पूजि मिलि खाँहिं। हरि दासनि की भ्रांति करि, केवल जमपुरि जाँहिं॥
कठिन शब्दार्थ

सकति पूजि = शक्ति-उपासना का तत्कालीन संदर्भ; भ्रांति = दिखावा या विरोध।

सरल हिंदी अर्थ

कवि ऐसे सामूहिक कर्मकांड की आलोचना करते हैं जिसमें भोग का मेल है, पर भक्तिपूर्ण आचरण का सार नहीं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह ऐतिहासिक संप्रदाय-विवाद है। आज किसी उपासना-पद्धति या भक्त का अवमूल्यन नहीं, अपने कर्म का परीक्षण ग्रहण करें।

साखी ४२३ साँच कौ अंग · मूल क्रमांक १५

कबीर लज्या लोक की, सुमिरै नाँही साच। जानि बूझि कंचन तजै, काठा पकड़े काच॥
कठिन शब्दार्थ

लज्या लोक = लोगों के कहने का डर; काठा = पकड़ा हुआ।

सरल हिंदी अर्थ

लोकलाज से सत्य का स्मरण नहीं करता; जान-बूझकर सोना छोड़कर काँच पकड़ता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

भीड़ की स्वीकृति के लिए मूल मूल्य न खोएँ। नम्रता से अपनी सत्यनिष्ठ दिशा निभाएँ।

साखी ४२४ साँच कौ अंग · मूल क्रमांक १६

कबीर जिनि जिनि जाँणियाँ, करत केवल सार। सो प्राणी काहै चलै, झूठे जग की लार॥
कठिन शब्दार्थ

लार = पीछे चलना; सार = मूल तत्त्व।

सरल हिंदी अर्थ

जिसने मूल सत्य जाना, वह झूठे जग के पीछे क्यों भागेगा?

भावार्थ और जीवन-संदेश

सत्य की पहचान निर्णयों में दिखाई दे। दूसरों की नकल से अधिक विवेकपूर्ण स्वतंत्रता विकसित करें।

साखी ४२५ साँच कौ अंग · मूल क्रमांक १७

झूठे को झूठा मिलै, दूणाँ बधै सनेह। झूठे कूँ साचा मिलै, तब ही तूटै नेह॥
कठिन शब्दार्थ

दूणाँ = दोगुना; नेह = मेल।

सरल हिंदी अर्थ

झूठे को झूठा मिले तो उनका मेल बढ़ता है; सच्चे से सामना हो तो झूठ पर टिका संबंध टूटने लगता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

सत्य असुविधाजनक हो सकता है, पर सुधार का अवसर भी देता है। गलत संग को केवल अपनापन मानकर न बचाएँ।

२३. भ्रम विधौंसण कौ अंग

निर्गुण साधना की दृष्टि से बाहरी आश्रय और अंतर्बोध का प्रश्न। मूल स्थानीय क्रमांक १–११।

साखी ४२६ भ्रम विधौंसण कौ अंग · मूल क्रमांक १

पांहण केरा पूतला, करि पूजै करतार। इही भरोसै जे रहे, ते बूड़े काली धार॥
कठिन शब्दार्थ

पांहण = पत्थर; पूतला = प्रतिमा; काली धार = कठिन संसार-धारा।

सरल हिंदी अर्थ

कबीर निर्जीव रूप को ही सर्वस्व मानकर भीतर का सत्य भूलने वाले को अस्थिर आश्रय पर निर्भर बताते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह उनकी निर्गुण साधना की दृष्टि है। इसे दूसरे की श्रद्धा का अपमान बनाने के बजाय अपने अंतःभाव की समीक्षा करें।

साखी ४२७ भ्रम विधौंसण कौ अंग · मूल क्रमांक २

काजल केरी कोठरी, मसि के कर्म कपाट। पांहनि बोई पृथमी, पंडित पाड़ी बाट॥
कठिन शब्दार्थ

मसि = कालिख; कपाट = दरवाजे; बाट = मार्ग।

सरल हिंदी अर्थ

कालिख की कोठरी और काले कर्मों के द्वार की छवि से कवि भ्रमपूर्ण धार्मिक मार्ग का प्रतिवाद करते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

रूप और व्यवस्था के साथ उनके नैतिक परिणाम भी जाँचें। अज्ञान बढ़ाने वाली परंपरा पर प्रश्न संभव है।

साखी ४२८ भ्रम विधौंसण कौ अंग · मूल क्रमांक ३

पाँहिन फूँका पूजिए, जे जनम न देई जाब। आँधा नर आसामुषी, यौंही खोवै आब॥
कठिन शब्दार्थ

आसामुषी = आशा की ओर मुँह किए; आब = गरिमा या जीवन-रस।

सरल हिंदी अर्थ

जो अपने प्रश्न का उत्तर ही न दे सके, उससे अंधी अपेक्षा रखकर मनुष्य अपना जीवन-सार खोता है—कवि का तर्क है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

कबीर की उपासना-समीक्षा को संदर्भ सहित पढ़ें। मुख्य सीख विवेक और अनुभव को निष्क्रिय न करना है।

साखी ४२९ भ्रम विधौंसण कौ अंग · मूल क्रमांक ४

हम भी पाहन पूजते, होते रन के रोझ। सतगुर की कृपा भई, डार्‌या सिर थैं बोझ॥
कठिन शब्दार्थ

रन के रोझ = जंगल के नीलगाय जैसे भटकने वाले; बोझ = अंधानुकरण।

सरल हिंदी अर्थ

मैं भी बाहर भटकता रहता, यदि गुरु की कृपा से सिर का अज्ञान-बोझ न उतरता।

भावार्थ और जीवन-संदेश

मार्गदर्शन का फल प्रश्न और अंतर्बोध का जागना है। केवल अनुष्ठान बदलना पर्याप्त नहीं।

साखी ४३० भ्रम विधौंसण कौ अंग · मूल क्रमांक ५

जेती देषौं आत्मा, तेता सालिगराँम। साथू प्रतषि देव हैं, नहीं पाथर सू काँम॥
कठिन शब्दार्थ

जेती आत्मा = जितने जीव; सालिगराँम = पूज्य परम उपस्थिति।

सरल हिंदी अर्थ

जितने जीव देखता हूँ, उनमें दिव्यता है। संत प्रत्यक्ष जीवन में ईश्वर की याद दिलाते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

कवि पूजा को जीवंत करुणा की ओर मोड़ते हैं। मनुष्य और प्राणी की गरिमा उपासना से अलग न रहे।

साखी ४३१ भ्रम विधौंसण कौ अंग · मूल क्रमांक ६

सेवैं सालिगराँम कूँ, मन की भ्रांति न जाइ। सीतलता सुषिनै नहीं, दिन दिन अधकी लाइ॥
कठिन शब्दार्थ

भ्रांति = भ्रम; लाइ = आग; सुषिनै = स्वप्न में।

सरल हिंदी अर्थ

शालिग्राम की सेवा के बाद भी यदि भ्रम और जलन बढ़ें, तो भीतर शीतलता नहीं आई।

भावार्थ और जीवन-संदेश

उपासना का फल आचरण में देखें। ईर्ष्या और क्रोध घटें तो साधन अपना उद्देश्य पूरा करता है।

साखी ४३२ भ्रम विधौंसण कौ अंग · मूल क्रमांक ७

सेवैं सालिगराँम कूँ, माया सेती हेत। बोढ़े काला कापड़ा, नाँव धरावैं सेत॥
कठिन शब्दार्थ

सेत = सफेद; बोढ़े = ओढ़े।

सरल हिंदी अर्थ

शालिग्राम की सेवा करते हुए माया से प्रेम रखना काला कपड़ा ओढ़कर उसे सफेद नाम देने जैसा है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

नाम बदलने से अंतःस्थिति नहीं बदलती। अपने उद्देश्य और वास्तविक व्यवहार का मेल जाँचें।

पाठ-टिप्पणी: यह मुख्य मूल क्रमांक ७ है। स्रोत में इसी से पहले जुड़ा “माला फेरत जुग भया…” ख-प्रति का अतिरिक्त पाठ है; उसे यहाँ मुख्य गिनती में नहीं जोड़ा गया है।

साखी ४३३ भ्रम विधौंसण कौ अंग · मूल क्रमांक ८

जप तप दीसै थोथरा, तीरथ ब्रत बेसास। सूवै सैबल सेविया, यों जग चल्या निरास॥
कठिन शब्दार्थ

थोथरा = सारहीन; सूवा = तोता; सैबल = सेमल।

सरल हिंदी अर्थ

भीतर का सार न हो तो जप-तप और तीर्थ सूखे सेमल से फल की आशा करने वाले तोते जैसे हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

अनुष्ठान का मूल्य भाव और परिवर्तन में है। संख्या के साथ सजगता, प्रेम और नैतिकता जोड़ें।

साखी ४३४ भ्रम विधौंसण कौ अंग · मूल क्रमांक ९

तीरथ त सब बेलड़ी, सब जग मेल्या छाइ। कबीर मूल निकंदिया, कोण हलाहल खाइ॥
कठिन शब्दार्थ

बेलड़ी = फैलती लता; हलाहल = घोर विष; निकंदिया = जड़ काटी।

सरल हिंदी अर्थ

तीर्थ-आसक्ति की फैलती लता को कवि बंधन कहते हैं; उसके भ्रम की जड़ काटने पर विष क्यों लें?

भावार्थ और जीवन-संदेश

आलोचना बाहरी साधन को अंतिम मानने की है। यात्रा और रीति अंतर्बोध में सहायक बनें।

साखी ४३५ भ्रम विधौंसण कौ अंग · मूल क्रमांक १०

मन मथुरा दिल द्वारिका, काया कासी जाँणि। दसवाँ द्वारा देहुरा, तामै जोति पिछाँणि॥
कठिन शब्दार्थ

दसवाँ द्वारा = चेतना का सूक्ष्म द्वार; देहुरा = मंदिर।

सरल हिंदी अर्थ

मन को मथुरा, हृदय को द्वारका और देह को काशी जानो; भीतर के मंदिर में ज्योति पहचानो।

भावार्थ और जीवन-संदेश

बाहरी पवित्रता का आंतरिक आयाम है। चित्त की निर्मलता और जीवंत करुणा को उपासना में स्थान दें।

साखी ४३६ भ्रम विधौंसण कौ अंग · मूल क्रमांक ११

कबीर दुनियाँ देहुरै, सोस नवाँवण जाइ। हिरदा भीतर हरि बसै, तूँ ताही सौ ल्यौ लाइ॥
कठिन शब्दार्थ

सोस = सीस का पाठ-रूप; ल्यौ = ध्यान।

सरल हिंदी अर्थ

जग बाहर मंदिरों में सिर झुकाता है, पर हरि हृदय में हैं; भीतर भी ध्यान लगाओ।

भावार्थ और जीवन-संदेश

बाहरी प्रणाम के साथ मन का समर्पण हो। दैनिक व्यवहार में विनय उसकी सच्चाई दिखाए।

२४. भेष कौ अंग

माला, वेश और धार्मिक चिह्नों के साथ हृदय की सच्चाई की कसौटी। मूल स्थानीय क्रमांक १–२६।

साखी ४३७ भेष कौ अंग · मूल क्रमांक १

कर सेती माला जपै, हिरदै बहै डंडूल। पग तौ पाला मैं गिल्या, भाजण लागी सूल॥
कठिन शब्दार्थ

डंडूल = भटकाव या चंचलता; सूल = पीड़ा।

सरल हिंदी अर्थ

हाथ माला जपते हैं, पर हृदय भटकता है; बाहरी साधन के साथ भीतर की असंगति दुःख देती है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

माला ध्यान का सहायक बने। हाथ की गति के साथ मन और अर्थ को भी स्मरण में जोड़ें।

साखी ४३८ भेष कौ अंग · मूल क्रमांक २

कर पकरै अँगुरी गिनै, मन धावै चहुँ वीर। जाहि फिराँयाँ हरि मिलै, सो भया काठ की ठौर॥
कठिन शब्दार्थ

चहुँ वीर = चारों ओर; काठ की ठौर = लकड़ी का बाहरी सहारा।

सरल हिंदी अर्थ

अँगुलियों से गिनती चलती है, मन दिशाओं में दौड़ता है। भीतर फेरना था, उसे छोड़ केवल लकड़ी का सहारा रह गया।

भावार्थ और जीवन-संदेश

जप की संख्या के साथ सजगता महत्त्वपूर्ण है। भटके मन को प्रेम से फिर नाम की ओर लौटाएँ।

साखी ४३९ भेष कौ अंग · मूल क्रमांक ३

माला पहरैं मनमुषी, ताथैं कछु न होइ। मन माला कौं फेरताँ, जुग उजियारा सोइ॥
कठिन शब्दार्थ

मनमुषी = मन की मनमानी करने वाला; मन माला = अंतःस्मरण।

सरल हिंदी अर्थ

मनमाना व्यक्ति माला पहने तो क्या हुआ? मन की माला फेरने वाला भीतर उजाला करता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

धार्मिक पहचान से अधिक मन की दिशा देखें। साधन का फल व्यवहार और चित्त की निर्मलता में हो।

साखी ४४० भेष कौ अंग · मूल क्रमांक ४

माला पहरे मनमुषी, बहुतैं फिरै अचेत। गाँगी रोले बहि गया, हरि सूँ नाँहीं हेत॥
कठिन शब्दार्थ

अचेत = असावधान; हेत = प्रेम।

सरल हिंदी अर्थ

माला पहनकर भी असावधान रहा, भीड़ के प्रवाह में बह गया और हरि से प्रेम नहीं जुड़ा।

भावार्थ और जीवन-संदेश

दूसरों को देखकर अभ्यास करने के साथ उसका अर्थ समझें। व्यक्तिगत निष्ठा और नियमितता आवश्यक हैं।

साखी ४४१ भेष कौ अंग · मूल क्रमांक ५

कबीर माला काठ की, कहि समझावै तोहि। मन न फिरावै आपणों, कहा फिरावै मोहि॥
कठिन शब्दार्थ

आपणों = अपना; फिरावै = बदले या फेरे।

सरल हिंदी अर्थ

काठ की माला मानो कहती है—अपना मन नहीं बदलते, मुझे क्यों फेरते रहते हो?

भावार्थ और जीवन-संदेश

साधन पर सारी जिम्मेदारी न डालें। मन की आदत और कर्म का परिवर्तन साधक का अपना काम है।

साखी ४४२ भेष कौ अंग · मूल क्रमांक ६

कबीर माला मन की, और संसारी भेष। माला पहर्‌या हरि मिलै, तौ अरहट कै गलि देष॥
कठिन शब्दार्थ

अरहट = रहट; संसारी भेष = बाहरी पहचान।

सरल हिंदी अर्थ

सच्ची माला मन की है; केवल गले की माला से हरि मिलते तो रहट की घूमती माला को भी मिल जाते।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यांत्रिक पुनरावृत्ति के साथ भाव और अर्थ जरूरी हैं। उपकरण सहायक है, अनुभव का विकल्प नहीं।

साखी ४४३ भेष कौ अंग · मूल क्रमांक ७

माला पहर्‌याँ कुछ नहीं, रुल्य मूवा इहि भारि। बाहरि ढोल्या हींगलू भीतरि भरी भँगारि॥
कठिन शब्दार्थ

हींगलू = हिंगुल, लाल रंग; भँगारि = कचरा।

सरल हिंदी अर्थ

माला का भार उठाने से क्या हुआ, यदि बाहर लाल रंग और भीतर कचरा भरा है?

भावार्थ और जीवन-संदेश

बाहरी सजावट के साथ भीतर ईर्ष्या, छल और अहं देखें। निर्मलता का काम अंतःकरण में भी हो।

साखी ४४४ भेष कौ अंग · मूल क्रमांक ८

माला पहर्‌याँ कुछ नहीं, काती मन कै साथि। जब लग हरि प्रकटै नहीं, तब लग पड़ता हाथि॥
कठिन शब्दार्थ

काती = गाँठ या उलझन का संदर्भ; पड़ता हाथि = अभ्यास की बाहरी गति।

सरल हिंदी अर्थ

माला पहनना पर्याप्त नहीं; मन की उलझन साथ है तो हाथ चलते रहते हैं, भीतर प्रभु का परिचय नहीं होता।

भावार्थ और जीवन-संदेश

अभ्यास में बाधा पहचानना उपयोगी है। मनन और चरित्र-सुधार को जप से अलग न करें।

साखी ४४५ भेष कौ अंग · मूल क्रमांक ९

माला पहर्‌याँ कुछ नहीं, गाँठि हिरदा की खोइ। हरि चरनूँ चित्त राखिये, तौ अमरापुर होइ॥
कठिन शब्दार्थ

गाँठि = भीतर का बंधन; अमरापुर = मुक्ति का आश्रय।

सरल हिंदी अर्थ

माला से पहले हृदय की गाँठ खोलो और हरिचरण में चित्त रखो; तभी मुक्ति की दिशा खुलेगी।

भावार्थ और जीवन-संदेश

द्वेष और स्वार्थ ढीले होने पर स्मरण गहरा होता है। सरलता और क्षमा भी साधना के काम हैं।

साखी ४४६ भेष कौ अंग · मूल क्रमांक १०

माला पहर्‌या कुछ नहीं, भगति न आई हाथि। माथौ मूँछ मुँड़ाइ करि, चल्या जगत कै साथि॥
कठिन शब्दार्थ

भगति = प्रेमपूर्ण साधना; माथौ मूँछ = सिर और मूँछ।

सरल हिंदी अर्थ

माला पहनी, सिर-मूँछ मुँडाई और भीड़ के साथ चले, लेकिन भक्ति का सार हाथ नहीं आया।

भावार्थ और जीवन-संदेश

रूप बदलने के साथ दृष्टि बदलना जरूरी है। अनुकरण से आगे स्वयं समझकर अभ्यास करें।

साखी ४४७ भेष कौ अंग · मूल क्रमांक ११

साँईं सेती साँच चलि, औराँ सूँ सुध भाइ। भावै लम्बे केस करि, भावै घुरड़ि मुड़ाइ॥
कठिन शब्दार्थ

सुध भाइ = निर्मल भाव; घुरड़ि = पूरा मुँडाकर।

सरल हिंदी अर्थ

स्वामी के प्रति सच्चे और दूसरों के प्रति निर्मल रहो; बाल लंबे हों या सिर मुँडा हो, मूल बात यही है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

आध्यात्मिकता का माप वेश नहीं, सत्य और सद्भाव है। बाहरी अंतर के कारण मनुष्य की गरिमा न घटाएँ।

साखी ४४८ भेष कौ अंग · मूल क्रमांक १२

केसौं कहा बिगाड़िया, जे मूड़े सौ बार। मन कौं न काहे मूड़िए, जामै बिषै विकार॥
कठिन शब्दार्थ

मूड़े = मुँडाए; बिषै विकार = विषयासक्ति के दोष।

सरल हिंदी अर्थ

बालों ने क्या बिगाड़ा कि सौ बार मुँडाते हो? विकारों से भरा मन क्यों नहीं सँवारते?

भावार्थ और जीवन-संदेश

बाहरी प्रतीक याद दिलाएँ, पर भीतर का काम स्वयं करना होगा। ईर्ष्या और लालसा की जड़ देखें।

साखी ४४९ भेष कौ अंग · मूल क्रमांक १३

मन मेवासी मूँड़ि ले, केसौं मूड़े काँइ। जे कुछ किया सु मन किया, केसौं कीया नाँहि॥
कठिन शब्दार्थ

मेवासी = हठी, अवश; काँइ = क्यों।

सरल हिंदी अर्थ

अपने हठी मन को साधो; बाल मुँडाने से क्या? कर्म मन ने किए, बालों ने नहीं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

गलती के वास्तविक कारण पर काम करें। रूप बदलना तभी उपयोगी है जब आचरण भी बदले।

साखी ४५० भेष कौ अंग · मूल क्रमांक १४

मूँड़ मुँड़ावत दिन गए, अजहूँ न मिलिया राम। राँम नाम कहु क्या करैं, जे मन के औरे काँम॥
कठिन शब्दार्थ

मूँड़ = सिर; औरे काँम = दूसरी, विरोधी इच्छाएँ।

सरल हिंदी अर्थ

सिर मुँडाते दिन बीते, राम नहीं मिले। मन में दूसरे स्वार्थ हों तो नाम कहने का गहरा फल कैसे हो?

भावार्थ और जीवन-संदेश

वाणी और भीतर की चाह का अंतर देखें। निष्कपटता स्मरण की शक्ति बढ़ाती है।

साखी ४५१ भेष कौ अंग · मूल क्रमांक १५

स्वाँग पहरि सोरहा भया, खाया पीया षूँदि। जिहि सेरी साधू नीकले, सो तौ मेल्ही मूँदि॥
कठिन शब्दार्थ

सोरहा = सबके सामने प्रतिष्ठित; सेरी = गली।

सरल हिंदी अर्थ

साधु-वेश से सुविधा और भोजन मिला, लेकिन जिस आंतरिक मार्ग से संत निकले, वही बंद रखा।

भावार्थ और जीवन-संदेश

धार्मिक जीवन को सुविधा की व्यवस्था न बनाएँ। सत्य के लिए आवश्यक अनुशासन भी स्वीकारें।

साखी ४५२ भेष कौ अंग · मूल क्रमांक १६

बेसनों भया तौ क्या भया, बूझा नहीं बबेक। छापा तिलक बनाइ करि, दगध्या लोक अनेक॥
कठिन शब्दार्थ

बेसनों = वैष्णव; छापा = धार्मिक चिह्न; बबेक = विवेक।

सरल हिंदी अर्थ

वैष्णव कहलाकर भी विवेक न समझा, तो तिलक और छाप से दूसरों को भ्रमित करना भक्ति नहीं है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

किसी मत का नाम चरित्र का स्वतः प्रमाण नहीं। ईमानदारी और करुणा से पहचान सार्थक होती है।

साखी ४५३ भेष कौ अंग · मूल क्रमांक १७

तन कौं जोगी सब करैं, मन कों बिरला कोइ। सब सिधि सहजै पाइए, जे मन जोगी होइ॥
कठिन शब्दार्थ

जोगी = संयमी साधक; सिधि = साधना का फल।

सरल हिंदी अर्थ

देह का योगी-वेश सब बना लेते हैं, मन का योगी विरला है। मन सँवरे तो साधना का सार सहज मिलता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

अनुशासन मन, वाणी और कर्म तक पहुँचे। केवल शरीर की मुद्रा या पोशाक पर न रुकें।

साखी ४५४ भेष कौ अंग · मूल क्रमांक १८

कबीर यहु तौ एक है, पड़दा दीया भेष। भरम करम सब दूरि करि, सबहीं माँहि अलेष॥
कठिन शब्दार्थ

अलेष = अलक्ष्य; पड़दा = आवरण।

सरल हिंदी अर्थ

परम तत्त्व एक है; भेष ने उसके ऊपर आवरण डाल दिया। भ्रम हटे तो सबमें वही अदृश्य आधार दिखे।

भावार्थ और जीवन-संदेश

पहचान के बाहरी भेद अंतिम सत्य नहीं। मनुष्यों के प्रति समान आदर और व्यापक दृष्टि विकसित करें।

साखी ४५५ भेष कौ अंग · मूल क्रमांक १९

भरम न भागा जीव का, अनंतहि धरिया भेष। सतगुर परचे बाहिरा, अंतरि रह्या अलेष॥
कठिन शब्दार्थ

अनंतहि = अनेक; परचा = परिचय।

सरल हिंदी अर्थ

अनेक वेश धारण किए, लेकिन भ्रम न गया। गुरु के वास्तविक परिचय बिना भीतर का सत्य अनपहचाना रहा।

भावार्थ और जीवन-संदेश

बाहरी नवीनता को प्रगति न समझें। देखें कि समझ, संयम और करुणा वास्तव में बढ़ रहे हैं या नहीं।

साखी ४५६ भेष कौ अंग · मूल क्रमांक २०

जगत जहंदम राचिया, झूठे कुल की लाज। तन बिनसे कुल बिनसि है, गह्या न राँम जिहाज॥
कठिन शब्दार्थ

जहंदम = नरक-जैसा उलझाव; जिहाज = पार ले जाने का साधन।

सरल हिंदी अर्थ

झूठी कुल-प्रतिष्ठा में जग उलझा है; देह और वंश दोनों नश्वर हैं, फिर भी राम का सहारा नहीं लिया।

भावार्थ और जीवन-संदेश

जन्मगत अहं से ऊपर उठें। परिवार का सम्मान सत्य और सेवा से करें।

साखी ४५७ भेष कौ अंग · मूल क्रमांक २१

पष ले बूडी पृथमीं, झूठी कुल की लार। अलष बिसारौं भेष मैं, बूड़े काली धार॥
कठिन शब्दार्थ

पष = पक्षपात; लार = पीछे दौड़; अलष = अलख।

सरल हिंदी अर्थ

पक्षपात, कुल की झूठी प्रतिष्ठा और वेश में उलझकर संसार मूल सत्य भूलता और कठिन धारा में डूबता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

समूह की पहचान विवेक पर भारी न हो। अपने पक्ष की गलती भी देखने का साहस रखें।

साखी ४५८ भेष कौ अंग · मूल क्रमांक २२

चतुराई हरि नाँ मिले, ऐ बाताँ की बात। एक निसप्रेही निरधार का, गाहक गोपीनाथ॥
कठिन शब्दार्थ

निसप्रेही = निःस्वार्थ; निरधार = बाहरी सहारे से मुक्त।

सरल हिंदी अर्थ

चतुर बातों से हरि नहीं मिलते; निःस्वार्थ और निष्कपट मन का मूल्य गोपीनाथ पहचानते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

प्रभावशाली भाषा से अधिक सच्चा उद्देश्य महत्त्वपूर्ण है। साधना को लाभ का सौदा न बनाएँ।

साखी ४५९ भेष कौ अंग · मूल क्रमांक २३

नवसत साजे काँमनीं, तन मन रही सँजोइ। पीव कै मन भावे नहीं, पटम कीयें क्या होइ॥
कठिन शब्दार्थ

नवसत = अनेक श्रृंगार; पटम = बाहरी सजावट।

सरल हिंदी अर्थ

नायिका ने तन-मन सजाया, पर प्रिय के मन को न भाए तो श्रृंगार से क्या लाभ?

भावार्थ और जीवन-संदेश

दांपत्य-उपमा भीतर के प्रेम पर जोर देती है। पूजा की सजावट के साथ हृदय की निष्कपटता भी हो।

साखी ४६० भेष कौ अंग · मूल क्रमांक २४

जब लग पीव परचा नहीं, कन्याँ कँवारी जाँणि। हथलेवा होसै लिया, मुसकल पड़ी पिछाँणि॥
कठिन शब्दार्थ

हथलेवा = विवाह का हाथ-मिलन; परचा = अनुभव।

सरल हिंदी अर्थ

प्रिय का अनुभव न हुआ तो बाहरी संबंध अधूरा है। वास्तविक मिलन हो तो उसकी गहरी पहचान कठिन कसौटी पर होती है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

नाम और संस्कार आरंभ हैं, पूरा अनुभव नहीं। निष्ठा निभाने से संबंध का सार खुलता है।

साखी ४६१ भेष कौ अंग · मूल क्रमांक २५

कबीर हरि की भगति का, मन मैं परा उल्लास। मैंवासा भाजै नहीं, हूँण मतै निज दास॥
कठिन शब्दार्थ

मैंवासा = अहं का हठी दुर्ग; हूण मतै = होना चाहता।

सरल हिंदी अर्थ

मन में हरि-भक्ति का उत्साह है और सेवक बनना चाहता हूँ, पर अहं का हठी दुर्ग टूटता नहीं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

उत्साह के साथ भीतर की बाधा पहचानें। सेवा का भाव विनय और अपने आग्रह छोड़ने से गहराता है।

पाठ-टिप्पणी: वेब में अलग लिखे “मैं वासा” का संयुक्त रूप “मैंवासा” मुद्रित पृष्ठ १३१ में है; अगले पद में भी यही अहं-दुर्ग का संकेत है।

साखी ४६२ भेष कौ अंग · मूल क्रमांक २६

मैंवासा मोई किया, दुरिजिन काढ़े दूरि। राज पियारे राँम का, नगर बस्या भरिपूरि॥
कठिन शब्दार्थ

दुरिजन = बुरी प्रवृत्तियाँ; भरिपूरि = परिपूर्ण।

सरल हिंदी अर्थ

अहं का दुर्ग जीत लिया, बुरी प्रवृत्तियाँ दूर हुईं और प्रिय राम का राज्य मन-नगर में भर गया।

भावार्थ और जीवन-संदेश

साधना का सकारात्मक फल अंतःशांति और सद्गुण हैं। केवल दोष दबाने के बजाय करुणा, सत्य और प्रेम विकसित हों।

२५. कुसंगति कौ अंग

बुरे प्रभाव, लालच और जन्म के बदले कर्म का मूल्य। मूल स्थानीय क्रमांक १–७।

साखी ४६३ कुसंगति कौ अंग · मूल क्रमांक १

निरमल बूँद अकास की, पड़ि गइ भोमि बिकार। मूल विनंठा माँनबी, बिन संगति भठछार॥
कठिन शब्दार्थ

भोमि = भूमि; बिनंठा = बिगड़ा; भठछार = नष्ट।

सरल हिंदी अर्थ

आकाश की निर्मल बूँद दूषित भूमि में गिरकर बदल जाती है; बुरी संगति मनुष्य के मूल गुण बिगाड़ सकती है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

परिवेश का प्रभाव पहचानें। ऐसे संबंध और आदत चुनें जो विवेक तथा सदाचार बढ़ाएँ।

साखी ४६४ कुसंगति कौ अंग · मूल क्रमांक २

मूरिष संग न कीजिए, लोहा जलि न तिराइ। कदली सीप भवंग मुषी, एक बूँद तिहुँ भाइ॥
कठिन शब्दार्थ

भवंग = सर्प; तिहुँ भाइ = तीन अलग रूप।

सरल हिंदी अर्थ

मूर्ख संग से बचो; लोहा पानी में नहीं तैरता। एक बूँद अलग पात्रों में अलग प्रभाव पाती है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

कदली, सीप और सर्प का प्रसंग पुरानी लोकमान्यता है। मुख्य सीख ग्रहणकर्ता और संगति का प्रभाव समझना है।

साखी ४६५ कुसंगति कौ अंग · मूल क्रमांक ३

हरिजन सेती रूसणाँ, संसारी सूँ हेत। ते नर कदे न नीपजै, ज्यूँ कालर का खेत॥
कठिन शब्दार्थ

कालर = ऊसर; नीपजै = उपजता।

सरल हिंदी अर्थ

हितकारी भक्त से रूठकर केवल स्वार्थी संग से लगाव रखने वाला ऊसर खेत जैसा फलहीन हो सकता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

जो गलती पर सच कहे, उससे केवल असुविधा के कारण दूर न हों। संबंध में हित पहचानें।

साखी ४६६ कुसंगति कौ अंग · मूल क्रमांक ४

मारी मरूँ कुसंग की, केला काँठै बेरि। वो हालै वो चीरिये, साषित संग न बेरि॥
कठिन शब्दार्थ

काँठै = पास; बेरि = काँटेदार वृक्ष।

सरल हिंदी अर्थ

काँटेदार बेर के पास केला हिले तो उसकी पत्ती फटती है; ऐसी ही हानि बुरी संगति से होती है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

निकटता का प्रभाव रोज पड़ता है। अपने समय और विश्वास को बार-बार चोट पहुँचाने वाले संग से सीमा रखें।

पाठ-टिप्पणी: वेब-पाठ के पहले शब्द “नारी” का पाठ मुद्रित संदर्भ में “मारी” मिलता है। उपमा केले और काँटेदार बेर की कुसंगति की है।

साखी ४६७ कुसंगति कौ अंग · मूल क्रमांक ५

मेर नसाँणी मीच की, कुसंगति ही काल। कबीर कहै रे प्राँणिया, बाँणी ब्रह्म सँभाल॥
कठिन शब्दार्थ

मीच = मृत्यु; नसाँणी = नष्ट करने वाली; बाँणी = वाणी।

सरल हिंदी अर्थ

कुसंगति आध्यात्मिक जीवन का नाश करती है; हे प्राणी, ब्रह्म की हितकारी वाणी सँभालो।

भावार्थ और जीवन-संदेश

सही सीख कठिन वातावरण में आधार देती है। उसे स्मरण के साथ व्यवहार में भी अपनाएँ।

साखी ४६८ कुसंगति कौ अंग · मूल क्रमांक ६

माषी गुड़ मैं गड़ि रही, पंष रही लपटाइ। ताली पीटै सिरि धुनै, मीठै बोई माइ॥
कठिन शब्दार्थ

माषी = मक्खी; लपटाइ = चिपककर।

सरल हिंदी अर्थ

मक्खी गुड़ में फँसी, पंख चिपके और फिर छूटने को पछताई; मिठास ही उसका जाल बनी।

भावार्थ और जीवन-संदेश

आनंद में सीमा भूलना निर्भरता बना सकता है। आकर्षण के साथ उसकी कीमत भी देखें।

साखी ४६९ कुसंगति कौ अंग · मूल क्रमांक ७

ऊँचे कुल क्या जनमियाँ, जे करणीं ऊँच न होइ। सोवन कलस सुरे भर्या, साथूँ निंद्या सोइ॥
कठिन शब्दार्थ

सुरे = मदिरा; सोवन = सोना; करणी = कर्म।

सरल हिंदी अर्थ

ऊँचे कुल में जन्म से क्या, यदि कर्म ऊँचे नहीं? सोने का पात्र भी मदिरा से भरा हो तो सम्मान का आधार नहीं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

जन्म के बजाय गुण और आचरण से मनुष्य को परखें। श्रेष्ठता का अहं सच्चे धर्म से दूर करता है।

२६. संगति कौ अंग

समझकर चुनी निष्ठा और संसार में रहते निर्मलता। मूल स्थानीय क्रमांक १–८।

साखी ४७० संगति कौ अंग · मूल क्रमांक १

देखा देखी पाकड़े, जाइ अपरचे छूटि। बिरला कोई ठाहरे, सतगुर साँमी मूठि॥
कठिन शब्दार्थ

अपरचे = बिना परिचय; साँमी मूठि = दृढ़ पकड़।

सरल हिंदी अर्थ

देखादेखी पकड़ा संबंध अनुभव बिना छूट जाता है; विरला गुरु की सीख को दृढ़ता से थामता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

समझकर चुनी निष्ठा कठिन समय में टिकती है। अनुकरण के साथ अपनी अनुभूति और विचार जोड़ें।

साखी ४७१ संगति कौ अंग · मूल क्रमांक २

देखा देखी भगति है, कदे न चढ़ई रंग। बिपति पढ्या यूँ छाड़सी, ज्यूं कंचुली भवंग॥
कठिन शब्दार्थ

कंचुली = केंचुली; बिपति = कठिनाई।

सरल हिंदी अर्थ

देखादेखी की भक्ति में पक्का रंग नहीं चढ़ता; विपत्ति आए तो साँप की केंचुली की तरह छूट जाती है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

अभ्यास केवल अनुकूल समय का शौक न हो। नियमितता और समझ उसके आधार हैं।

साखी ४७२ संगति कौ अंग · मूल क्रमांक ३

करिए तौ करि जाँणिये, सारीपा सूँ संग। लीर लीर लोइ थई, तऊ न छाड़ै रंग॥
कठिन शब्दार्थ

सारीपा = अच्छे पक्के रंग का संकेत; लीर लीर = टुकड़े-टुकड़े।

सरल हिंदी अर्थ

ऐसी संगति करो जिसका रंग सच्चा हो; कपड़ा फट जाए, तब भी वह रंग न छोड़े।

भावार्थ और जीवन-संदेश

निष्ठा का माप कठिन परिस्थिति है। मित्रता और साधना में निष्कपट स्थिरता विकसित करें।

साखी ४७३ संगति कौ अंग · मूल क्रमांक ४

यहु मन दीजे तास कौं, सुठि सेवग भल सोइ। सिर ऊपरि आरास है, तऊ न दूजा होइ॥
कठिन शब्दार्थ

सुठि = बहुत अच्छे से; आरास = आरा।

सरल हिंदी अर्थ

मन ऐसे सच्चे आश्रय को दो जो कठिनतम कसौटी पर भी दूसरी ओर न मुड़े।

भावार्थ और जीवन-संदेश

आरा और सिर का चित्र निष्ठा की अतिशयोक्ति है। उपयोगी भाव सत्य के प्रति दृढ़ता है, आत्महानि नहीं।

साखी ४७४ संगति कौ अंग · मूल क्रमांक ५

पाँहण टाँकि न तौलिए, हाडि न कीजै वेह। माया राता मानवी, तिन सूँ किसा सनेह॥
कठिन शब्दार्थ

पाँहण = पत्थर; हाडि = हड्डी; वेह = घाव या भेद।

सरल हिंदी अर्थ

कठोर पत्थर और हड्डी के बिंब से कवि कहते हैं कि मोह में डूबे हृदय से आत्मीय समझ पाना कठिन है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

संबंध में ग्रहणशीलता देखें। किसी को अपमानित किए बिना अपनी अपेक्षा और सीमा स्पष्ट रखें।

साखी ४७५ संगति कौ अंग · मूल क्रमांक ६

कबीर तासूँ प्रीति करि, जो निरबाहे ओड़ि। बनिता बिबिध न राचिये, दोषत लागे षोड़ि॥
कठिन शब्दार्थ

ओड़ि = अंत तक; बनिता बिबिध = अनेक आकर्षणों का रूपक।

सरल हिंदी अर्थ

उससे प्रेम करो जो अंत तक निभाए; अनेक आकर्षणों में बिखरने से संबंध में दोष और चोट आती है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

स्थिरता, सम्मान और जिम्मेदारी आत्मीयता का आधार हैं। दूसरे को केवल मनबहलाव का साधन न बनाएँ।

साखी ४७६ संगति कौ अंग · मूल क्रमांक ७

कबीर तन पंषी भया, जहाँ मन तहाँ उड़ि जाइ। जो जैसी संगति करे, सो तैसे फल खाइ॥
कठिन शब्दार्थ

तन पंषी = देह या जीवन पक्षी जैसा; फल = परिणाम।

सरल हिंदी अर्थ

जीवन-पक्षी मन की दिशा में उड़ता है; जैसी संगति करेगा, वैसा फल पाएगा।

भावार्थ और जीवन-संदेश

अपने वातावरण का चयन सजगता से करें। नियमित संग धीरे-धीरे विचार और व्यवहार बनाता है।

साखी ४७७ संगति कौ अंग · मूल क्रमांक ८

काजल केरी कोठढ़ी, तैसा यहु संसार। बलिहारी ता दास की, पैसि रे निकसणहार॥
कठिन शब्दार्थ

काजल की कोठढ़ी = दूषित वातावरण; पैसि = प्रवेश करके।

सरल हिंदी अर्थ

संसार काजल की कोठरी जैसा है; धन्य वह जो उसमें रहकर भी निर्मल निकलता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

कर्तव्य से भागना आवश्यक नहीं। दबावों के बीच सत्य और संयम बनाए रखना साधना है।

२७. असाध कौ अंग

छलपूर्ण वेश, मीठी बात और वास्तविक चरित्र का अंतर। मूल स्थानीय क्रमांक १–३।

साखी ४७८ असाध कौ अंग · मूल क्रमांक १

कबीर भेष अतीत का, करतूति करै अपराध। बाहरि दीसै साध गति, माँहैं महा असाध॥
कठिन शब्दार्थ

अतीत = वैरागी; करतूति = कर्म; असाध = असज्जन।

सरल हिंदी अर्थ

वैरागी का वेश है, कर्म अपराधपूर्ण हैं; बाहर साधु दिखता है, भीतर विपरीत वृत्ति है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

वेश के साथ व्यवहार परखें। विश्वास का आधार निष्कपटता और जिम्मेदारी हो।

साखी ४७९ असाध कौ अंग · मूल क्रमांक २

उज्जल देखि न धीजिये, बग ज्यूँ माँड़ै ध्यान। धीरे बैठि चपेटसी, यूँ ले बूड़ै, ग्याँन॥
कठिन शब्दार्थ

धीजिये = भरोसा कीजिए; बग = बगुला।

सरल हिंदी अर्थ

सफेद रूप और शांत मुद्रा देखकर भरोसा न करो; बगुला ध्यान का रूप धरकर शिकार झपटता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

मधुर रूप के पीछे उद्देश्य भी देखें। धीरे-धीरे परखा चरित्र जल्द बनी छवि से अधिक भरोसेमंद है।

साखी ४८० असाध कौ अंग · मूल क्रमांक ३

जेता मीठा बोलणाँ, तेता साध न जाँणि। पहली थाह दिखाई करि, ऊँड़ै देसी आँणि॥
कठिन शब्दार्थ

थाह = उथला स्थान; ऊँड़ै = गहरे में।

सरल हिंदी अर्थ

मीठा बोलने से ही साधु मत मानो; पहले उथला दिखाकर कोई गहरे संकट में ले जा सकता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

विश्वास समय और कर्म से बनाएँ। चापलूसी तथा वास्तविक हित में अंतर पहचानें।

२८. साध कौ अंग

हितकारी संगति, सत्संग और भीतर के गुणों का विकास। मूल स्थानीय क्रमांक १–१३।

साखी ४८१ साध कौ अंग · मूल क्रमांक १

कबीर संगति साध की, कदे न निरफल होइ। चंदन होसी बाँवना, नीब न कहसी कोइ॥
कठिन शब्दार्थ

बाँवना = चंदन का वृक्ष; नीब = नीम।

सरल हिंदी अर्थ

सज्जन की संगति निष्फल नहीं; उसके प्रभाव से कड़वी नीम भी रूपक में चंदन-सी हो जाती है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

अच्छा वातावरण बदलने की क्षमता जगाता है। दूसरों के गुण सीखकर अपने व्यवहार में उतारें।

साखी ४८२ साध कौ अंग · मूल क्रमांक २

कबीर संगति साध की, बेगि करीजैं जाइ। दुरमति दूरि गँवाइसी, देसी सुमति बताइ॥
कठिन शब्दार्थ

बेगि = शीघ्र; दुरमति = गलत समझ; सुमति = विवेक।

सरल हिंदी अर्थ

सज्जन-संगति शीघ्र अपनाओ; वह गलत समझ दूर करके हितकारी बुद्धि दिखाएगी।

भावार्थ और जीवन-संदेश

ऐसा साथ खोजें जो केवल प्रशंसा नहीं, सुधार का अवसर भी दे।

साखी ४८३ साध कौ अंग · मूल क्रमांक ३

मथुरा जावै द्वारिका, भावैं जावैं जगनाथ। साध संगति हरि भगति बिन, कछू न आवै हाथ॥
कठिन शब्दार्थ

जगनाथ = जगन्नाथ; कछू = कुछ।

सरल हिंदी अर्थ

मथुरा, द्वारका या जगन्नाथ जाओ, पर सत्संग और भीतर की भक्ति बिना मूल लाभ नहीं मिलेगा।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यात्रा प्रेरणा दे, उसका फल आचरण में हो। पवित्र स्थान के साथ मन की तैयारी भी आवश्यक है।

साखी ४८४ साध कौ अंग · मूल क्रमांक ४

मेरे संगी दोइ जणाँ एक बैष्णों एक राँम। वो है दाता मुकति का, वो सुमिरावै नाँम॥
कठिन शब्दार्थ

बैष्णों = ईश्वरभक्त; सुमिरावै = स्मरण कराए।

सरल हिंदी अर्थ

मेरे दो साथी हैं—राम और भक्त। एक मुक्ति का दाता है, दूसरा नाम की याद दिलाता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

हितकारी संग मन को अपने मूल लक्ष्य पर लौटाता है। ऐसे संबंध के प्रति कृतज्ञ रहें।

साखी ४८५ साध कौ अंग · मूल क्रमांक ५

कबीरा बन बन में फिरा, कारणि अपणें राँम। राम सरीखे जन मिले, तिन सारे सब काँम॥
कठिन शब्दार्थ

कारणि = खोज के लिए; सारे = सँवारे।

सरल हिंदी अर्थ

राम को खोजते वन-वन भटका; राम जैसे गुणों वाले भक्त मिले तो मेरे काम सँवर गए।

भावार्थ और जीवन-संदेश

ईश्वर की खोज जीवंत सद्गुणों की संगति से दिशा पा सकती है। प्रेम और सेवा में उसका स्पर्श पहचानें।

साखी ४८६ साध कौ अंग · मूल क्रमांक ६

कबीर सोई दिन भला, जा दिन संत मिलाहिं। अंक भरे भरि भेटिया, पाप सरीरौ जाँहिं॥
कठिन शब्दार्थ

अंक = गोद; भेटिया = मिला।

सरल हिंदी अर्थ

वह दिन शुभ है जब संत मिलें; आत्मीय मिलन से भीतर के दोषों की पकड़ घटती है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

मिलना मात्र चमत्कार नहीं। उनकी अच्छी सीख अपनाने से ही स्थायी परिवर्तन होगा।

साखी ४८७ साध कौ अंग · मूल क्रमांक ७

कबीर चन्दन का बिड़ा, बैठ्या आक पलास। आप सरीखे करि लिए जे होत उन पास॥
कठिन शब्दार्थ

बिड़ा = समूह; आक पलास = दूसरे वृक्ष।

सरल हिंदी अर्थ

चंदन के पास आक-पलाश बैठे तो उसकी सुगंध से प्रभावित हुए; चंदन ने निकट वालों को अपने जैसा बनाया।

भावार्थ और जीवन-संदेश

सज्जनता का प्रभाव उदार होता है। अपने आसपास के वातावरण में भी हितकारी व्यवहार फैलाएँ।

साखी ४८८ साध कौ अंग · मूल क्रमांक ८

कबीर खाईं कोट की, पांणी पीवे न कोइ। आइ मिलै जब गंग मैं, तब सब गंगोदिक होइ॥
कठिन शब्दार्थ

खाईं = खाई; कोट = दुर्ग; गंगोदिक = गंगाजल।

सरल हिंदी अर्थ

किले की खाई का जल कोई न पीए, पर गंगा से मिले तो वही गंगाजल कहलाता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

सत्संग से जीवन की दिशा बदल सकती है। पुरानी गलती को स्थायी पहचान न मानकर सुधार का अवसर दें।

साखी ४८९ साध कौ अंग · मूल क्रमांक ९

जाँनि बूझि साचहि तजै, करैं झूठ सूँ नेह। ताको संगति राम जी, सुपिनै हो जिनि देहु॥
कठिन शब्दार्थ

सुपिनै = स्वप्न में; नेह = लगाव।

सरल हिंदी अर्थ

जो जान-बूझकर सत्य छोड़ झूठ से प्रेम करता है, उसका संग मुझे स्वप्न में भी न मिले।

भावार्थ और जीवन-संदेश

जानकारी के बाद भी छल चुनना गंभीर बात है। आत्मीयता के साथ नैतिक सीमा बनाए रखें।

साखी ४९० साध कौ अंग · मूल क्रमांक १०

कबीर तास मिलाइ, जास हियाली तूँ बसै। वहि तर वेगि उठाइ, नित को गंजन को सहै॥
कठिन शब्दार्थ

हियाली = हृदय में; गंजन = बार-बार की पीड़ा।

सरल हिंदी अर्थ

हे राम, उससे मिलाओ जिसके हृदय में तुम हो; रोज की असार पीड़ा से निकालकर सही आश्रय दो।

भावार्थ और जीवन-संदेश

प्रार्थना सही संगति की याचना है। ऐसा साथ चुनें जो मन को सत्य और करुणा की ओर ले जाए।

साखी ४९१ साध कौ अंग · मूल क्रमांक ११

केती लहरि समंद की, कत उपजै कत जाइ। बलिहारी ता दास की, उलटी माँहि समाइ॥
कठिन शब्दार्थ

कत = कहाँ; उलटी = मूल की ओर लौटी।

सरल हिंदी अर्थ

समुद्र की असंख्य लहरें उठती-मिटती हैं; धन्य वह जो बाहरी दौड़ उलटकर अपने मूल में समा जाए।

भावार्थ और जीवन-संदेश

विचारों के प्रवाह के पीछे उनका आधार देखें। कुछ शांत मनन मन की अनावश्यक प्रतिक्रिया घटाता है।

साखी ४९२ साध कौ अंग · मूल क्रमांक १२

काजल केरी कोठढ़ी, काजल ही का कोट। बलिहारी ता दास की, जे रहै राँम की ओट॥
कठिन शब्दार्थ

ओट = आश्रय; कोट = दुर्ग।

सरल हिंदी अर्थ

चारों ओर कालिख का संसार है; राम का आश्रय लेकर निर्मल रहने वाला साधक धन्य है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

कठिन वातावरण में अपने मूल्य याद रखें। बाहरी दबाव सत्यनिष्ठा छोड़ने का कारण न बने।

साखी ४९३ साध कौ अंग · मूल क्रमांक १३

भगति हजारी कपड़ा, तामें मल न समाइ। साषित काली काँवली, भावै तहाँ बिछाइ॥
कठिन शब्दार्थ

हजारी कपड़ा = उत्तम रंग का कपड़ा; काँवली = कंबल; साषित = भक्ति-विमुख व्यक्ति का पुराना संबोधन।

सरल हिंदी अर्थ

भक्ति पक्के निर्मल रंग का वस्त्र है; प्रेम-विहीन कर्मकांड काले कंबल जैसा अपना अँधेरा फैलाता है—कवि की उपमा है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

रूपक के मत-सूचक शब्द को समुदाय पर न थोपें। भीतर प्रेम और विवेक का रंग चढ़ाना मुख्य सीख है।

२९. साध साषीभूत कौ अंग

संत के लक्षण, निष्काम प्रेम, संवेदना और सबमें दिव्यता की पहचान। मूल स्थानीय क्रमांक १–२१।

साखी ४९४ साध साषीभूत कौ अंग · मूल क्रमांक १

निरबैरी निहकाँमता, साँई सेती नेह। विषिया सूँ न्यारा रहै, संतहि का अँग एह॥
कठिन शब्दार्थ

निरबैरी = वैररहित; निहकाँमता = निष्कामता; अँग = लक्षण।

सरल हिंदी अर्थ

संत के लक्षण हैं—किसी से वैर न रखना, निष्काम होना, स्वामी से प्रेम और विषयों की दासता से दूरी।

भावार्थ और जीवन-संदेश

साधुता का माप व्यवहार है। धर्म के नाम पर द्वेष और स्वार्थ बढ़े तो आत्मपरीक्षण करें।

साखी ४९५ साध साषीभूत कौ अंग · मूल क्रमांक २

संत न छाड़ै संतई, जे कोटिक मिलै असंत। चंदन भुवंगा बैठिया, तउ सीतलता न तजंत॥
कठिन शब्दार्थ

संतई = सज्जनता; भुवंगा = सर्प।

सरल हिंदी अर्थ

करोड़ों असंत मिलें, संत अपनी सज्जनता नहीं छोड़ता; सर्प लिपटें तो भी चंदन शीतलता नहीं त्यागता।

भावार्थ और जीवन-संदेश

दूसरे का दोष अपनी कठोरता का बहाना न बने। सीमा रखते हुए भी सद्भाव बचाया जा सकता है।

साखी ४९६ साध साषीभूत कौ अंग · मूल क्रमांक ३

कबीर हरि का भाँवता, दूरैं थैं दीसंत। तन षीणा मन उनमनाँ, जग रूठड़ा फिरंत॥
कठिन शब्दार्थ

भाँवता = प्रिय; उनमनाँ = अंतर्मुख; रूठड़ा = जग के मोह से अलग।

सरल हिंदी अर्थ

हरि का प्रिय दूर से अपनी अंतर्मुखता और विषयों से विरक्ति में पहचाना जाता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

देह का दुबलापन योग्यता का माप नहीं। मूल भाव प्रदर्शन से दूरी और भीतर की सच्ची निष्ठा है।

साखी ४९७ साध साषीभूत कौ अंग · मूल क्रमांक ४

कबीर हरि का भावता, झीणाँ पंजर तास। रैणि न आवै नींदड़ी, अंगि न चढ़ई मास॥
कठिन शब्दार्थ

झीणाँ = दुबला; पंजर = देह।

सरल हिंदी अर्थ

कवि हरि-प्रेमी की तड़प को दुबली देह, कम नींद और क्षीण अंगों के चित्र में कहते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह विरह-काव्य की अतिशयोक्ति है। साधना का प्रमाण स्वास्थ्य बिगाड़ना नहीं; उसका सार प्रेम और सजगता है।

साखी ४९८ साध साषीभूत कौ अंग · मूल क्रमांक ५

अणरता सुख सोवणाँ, रातै नींद न आइ। ज्यूँ जल टूटै मंछली यूँ बेलंत बिहाइ॥
कठिन शब्दार्थ

अणरता = प्रेम में न रमा; रातै = प्रेमरंगी; बेलंत = व्याकुल।

सरल हिंदी अर्थ

प्रेम से अनजान चैन से सोता है; प्रेम में रमा जल-विहीन मछली जैसी व्याकुलता से समय बिताता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह साधक की गहरी चाह का रूपक है। सामान्य विश्राम छोड़ना इसका निर्देश नहीं।

साखी ४९९ साध साषीभूत कौ अंग · मूल क्रमांक ६

जिन्य कुछ जाँण्याँ नहीं तिन्ह, सुख नींदणी बिहाइ। मैंर अबूझी बूझिया, पूरी पड़ी बलाइ॥
कठिन शब्दार्थ

अबूझी = कठिन समझ; बलाइ = विपत्ति।

सरल हिंदी अर्थ

जो गहरा प्रश्न नहीं जानते, निश्चिंत सोते हैं; मैंने कठिन सत्य समझा तो नई जिम्मेदारी और व्याकुलता जागी।

भावार्थ और जीवन-संदेश

समझ कभी असुविधा लाती है। उससे भागने के बजाय विनय, धैर्य और सही कर्म विकसित करें।

साखी ५०० साध साषीभूत कौ अंग · मूल क्रमांक ७

जाँण भगत का नित मरण अणजाँणे का राज। सर अपसर समझै नहीं, पेट भरण सूँ काज॥
कठिन शब्दार्थ

नित मरण = अहं का निरंतर क्षय; सर अपसर = उचित-अनुचित अवसर।

सरल हिंदी अर्थ

सजग भक्त रोज अपने अहं से जूझता है; असावधान केवल पेट भरने का राज्य देखता है और अवसर नहीं समझता।

भावार्थ और जीवन-संदेश

जीवन केवल उपभोग तक सीमित नहीं। ज्ञान के साथ अपने कर्म की जिम्मेदारी भी बढ़ती है।

साखी ५०१ साध साषीभूत कौ अंग · मूल क्रमांक ८

जिहि घटिजाँण बिनाँण है, तिहि घटि आवटणाँ घणाँ। बिन षंडै संग्राम है नित उठि मन सौं झूमणाँ॥
कठिन शब्दार्थ

बिनाँण = विवेकपूर्ण पहचान; आवटणाँ = तीव्र मंथन; षंडै = बिना रुके।

सरल हिंदी अर्थ

जिस हृदय में समझ जागी, उसमें गहरा मंथन है; उसे अपने मन से रोज सामना करना पड़ता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

आत्मज्ञान निष्क्रिय आराम नहीं। अपनी प्रतिक्रिया और आदत पर ईमानदार काम उसका हिस्सा है।

साखी ५०२ साध साषीभूत कौ अंग · मूल क्रमांक ९

राम बियोगी तन बिकल, ताहि न चीन्है कोइ। तंबोली के पान ज्यूँ, दिन दिन पीला होइ॥
कठिन शब्दार्थ

बिकल = व्याकुल; तंबोली = पान बेचने वाला।

सरल हिंदी अर्थ

राम-वियोगी की देह की व्याकुलता लोग नहीं पहचानते; वह पान-पत्ते की तरह दिन-दिन पीली पड़ती कही गई है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

देह-चित्र आंतरिक विरह की कविता है। वास्तविक अस्वस्थता को केवल आध्यात्मिक स्थिति मानकर उपेक्षित न करें।

साखी ५०३ साध साषीभूत कौ अंग · मूल क्रमांक १०

पीलक दौड़ी साँइयाँ, लोग कहै पिंड रोग। छाँनै लंधण नित करै, राँम पियारे जोग॥
कठिन शब्दार्थ

पीलक = पीलापन; लंघण = उपवास; जोग = मिलन हेतु।

सरल हिंदी अर्थ

लोग प्रेम-विरह के पीलेपन को देह-रोग कहते हैं; साधक छिपकर प्रिय के लिए संयम करता है—कवि का चित्र है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

भावार्थ भीतर की आत्मीयता है। उपवास या देह-कष्ट साधना की अनिवार्य कसौटी नहीं हैं।

साखी ५०४ साध साषीभूत कौ अंग · मूल क्रमांक ११

काम मिलावै राम कूँ, जे कोई जाँणै राषि। कबीर बिचारा क्या करे, जाकी सुखदेव बोले साषि॥
कठिन शब्दार्थ

काम = गहरी चाह, यहाँ साधना की ओर मोड़ी; सुखदेव = शुकदेव का संकेत।

सरल हिंदी अर्थ

इच्छा की शक्ति सही ढंग से साधी जाए तो राम की खोज में लगा सकती है; शुकदेव का प्रसंग साक्षी कहा गया है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

ऊर्जा का दमन ही एक मार्ग नहीं। उसे सजगता, सेवा और उच्च उद्देश्य की दिशा भी दी जा सकती है।

साखी ५०५ साध साषीभूत कौ अंग · मूल क्रमांक १२

काँमणि अंग बिरकत भया, रत भया हरि नाँहि। साषी गोरखनाथ ज्यूँ, अमर भए कलि माँहि॥
कठिन शब्दार्थ

बिरकत = विरक्त; रत = रमा; साषी = साक्षी।

सरल हिंदी अर्थ

कामासक्ति से विरक्त होकर मन हरिनाम में रमा; गोरखनाथ की साधना को उसके स्थायित्व का उदाहरण कहा गया है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

कथा-संकेत आत्मसंयम की प्रतिष्ठा करता है। ‘अमर’ को देह की गारंटी नहीं, साधना की कीर्ति और चेतना का बिंब समझें।

साखी ५०६ साध साषीभूत कौ अंग · मूल क्रमांक १३

जदि विषै पियारी प्रीति सूँ, तब अंतर हरि नाँहि। जब अंतर हरि जी बसै, तब विषिया सूँ चित नाँहि॥
कठिन शब्दार्थ

विषै = विषयों की आसक्ति; अंतर = अंतःकरण।

सरल हिंदी अर्थ

जब विषयों की आसक्ति सर्वोच्च है, हरि का बोध ओझल है; हरि बसें तो विषयों की दासता घटती है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

जीवन की प्राथमिकता चित्त बनाती है। आवश्यक उपयोग और अनियंत्रित लालसा में अंतर रखें।

साखी ५०७ साध साषीभूत कौ अंग · मूल क्रमांक १४

जिहि घट मैं संसौ बसै, तिहिं घटि राम न जोइ। राम सनेही दास विचि, तिणाँ न संचर होइ॥
कठिन शब्दार्थ

संसौ = संशय; तिणाँ = तिनके जितना भी अंतर।

सरल हिंदी अर्थ

संशय में बँधा मन राम को नहीं पहचानता; प्रेमपूर्ण भक्त और प्रिय के बीच तिनका-जितनी दूरी भी नहीं रहती।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह आत्मीय भरोसे की उपमा है। प्रश्न दबाने के बजाय समझ और अभ्यास से स्पष्टता विकसित करें।

साखी ५०८ साध साषीभूत कौ अंग · मूल क्रमांक १५

स्वारथ को सबको सगा, सब सगलाही जाँणि। बिन स्वारथ आदर करै, सो हरि की प्रीति पिछाँणि॥
कठिन शब्दार्थ

सगलाही = सभी; पिछाँणि = पहचान।

सरल हिंदी अर्थ

स्वार्थ के लिए सब अपना बनते हैं; बिना स्वार्थ सम्मान करे तो उसमें हरि-प्रेम की पहचान करो।

भावार्थ और जीवन-संदेश

निष्काम आदर संबंध का गहरा मूल्य है। दूसरों को उनके उपयोग से परे भी गरिमा दें।

साखी ५०९ साध साषीभूत कौ अंग · मूल क्रमांक १६

जिहिं हिरदै हरि आइया, सो क्यूँ छाँनाँ होइ। जतन जतन करि दाबिए, तऊ उजाजा सोइ॥
कठिन शब्दार्थ

छाँनाँ = छिपा; उजाजा = उजाला।

सरल हिंदी अर्थ

जिस हृदय में हरि का प्रकाश जागा, वह छिपता नहीं; दबाने पर भी उसकी आभा प्रकट होती है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

असली भक्ति का प्रमाण ऊँचा दावा नहीं। सत्य, करुणा और नम्र व्यवहार उसकी पहचान कराते हैं।

साखी ५१० साध साषीभूत कौ अंग · मूल क्रमांक १७

फाटै दीदे मैं फिरौं, नजरि न आवै कोइ। जिहि घटि मेरा साँइयाँ, सो क्यूँ छाना होइ॥
कठिन शब्दार्थ

फाटै दीदे = खुली आँखें; छाना = छिपा।

सरल हिंदी अर्थ

खुली आँखों से खोजता फिरता हूँ; जिस हृदय में मेरा स्वामी प्रकट है, वह अनपहचाना कैसे रह सकता है?

भावार्थ और जीवन-संदेश

साधक जीवंत सद्गुणों में प्रिय की पहचान खोजता है। रूप से आगे चरित्र को देखने की दृष्टि विकसित करें।

साखी ५११ साध साषीभूत कौ अंग · मूल क्रमांक १८

सब घटि मेरा साँइयाँ, सूनी सेज न कोइ। भाग तिन्हौ का हे सखी, जिहि घटि परगड होइ॥
कठिन शब्दार्थ

सूनी सेज = रिक्त हृदय; परगड = प्रकट।

सरल हिंदी अर्थ

स्वामी सभी हृदयों में हैं, कोई सेज सूनी नहीं; भाग्य उस हृदय का जहाँ उनका बोध प्रकट हो।

भावार्थ और जीवन-संदेश

सभी में दिव्यता का भाव समान सम्मान जगाता है। साधना उस संभावना को चेतना और कर्म में प्रकट करे।

साखी ५१२ साध साषीभूत कौ अंग · मूल क्रमांक १९

पावक रूपी राँम है, घटि घटि रह्या समाइ। चित चकमक लागै नहीं, ताथैं धुँवाँ ह्नै ह्नै जाइ॥
कठिन शब्दार्थ

पावक = अग्नि; चकमक = अग्नि उत्पन्न करने वाला पत्थर।

सरल हिंदी अर्थ

राम अग्नि की तरह हर हृदय में हैं; चित्त की चकमक न जुड़े तो केवल धुआँ-सा भ्रम उठता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

संभावना के साथ सजग प्रयास चाहिए। ध्यान, मनन और अच्छे आचरण से भीतर की स्पष्टता विकसित करें।

साखी ५१३ साध साषीभूत कौ अंग · मूल क्रमांक २०

कबीर खालिक जागिया, और न जागै कोइ। कै जागै बिसई विष भर्‌या, कै दास बंदगी होइ॥
कठिन शब्दार्थ

खालिक = स्रष्टा; बिसई = विषय-लोलुप; बंदगी = उपासना।

सरल हिंदी अर्थ

सच्चा जागरण परम चेतना का है। साधारण जागना कोई चिंता या विषयों के कारण जागता है, भक्त उपासना से।

भावार्थ और जीवन-संदेश

रात जागना अपने आप साधना नहीं। चित्त की दिशा और सजगता उसके अर्थ तय करती है।

साखी ५१४ साध साषीभूत कौ अंग · मूल क्रमांक २१

कबीर चाल्या जाइ था, आगैं मिल्या खुदाइ। मीराँ मुझ सौं यौं कह्या, किनि फुरमाई गाइ॥
कठिन शब्दार्थ

मीराँ = स्वामी; किनि फुरमाई = किसने कहा।

सरल हिंदी अर्थ

कबीर जा रहे थे, सामने खुदा मिले और पूछा—किसके कहने से गा रहे हो?

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह भीतर से उठे प्रश्न का संवाद-रूप है। उपासना केवल आदेश या प्रदर्शन से है, या सच्चे प्रेम से—अपना उद्देश्य देखें।

३०. साध महिमाँ कौ अंग

पद, धन और वंश से ऊपर प्रेम, भक्ति तथा सज्जनता का महत्त्व। मूल स्थानीय क्रमांक १–११।

साखी ५१५ साध महिमाँ कौ अंग · मूल क्रमांक १

चंदन की कुटकी भली, नाँ बँबूर की अबराँउँ। बैश्नों की छपरी भली, नाँ साषत का बड गाउँ॥
कठिन शब्दार्थ

कुटकी = छोटा टुकड़ा; अबराँउँ = बड़ा जंगल; छपरी = झोंपड़ी।

सरल हिंदी अर्थ

चंदन का छोटा टुकड़ा बबूल के बड़े वन से भला; भक्त की झोंपड़ी प्रेमहीन बड़े गाँव से श्रेष्ठ कही गई है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

आकार और संपदा से अधिक गुण महत्त्वपूर्ण हैं। छोटे साधन में भी निर्मल जीवन संभव है।

साखी ५१६ साध महिमाँ कौ अंग · मूल क्रमांक २

पुरपाटण सूबस बसै, आनँद ठाये ठाँइ। राँम सनेही बाहिरा, ऊँजड़ मेरे भाँइ॥
कठिन शब्दार्थ

पुरपाटण = नगर; सूबस = सुगंध या सुंदर बसावट; भाँइ = दृष्टि में।

सरल हिंदी अर्थ

नगर सुंदर, सुगंधित और उत्सवमय हो, पर राम-प्रेम बिना कबीर की दृष्टि में उजड़ा है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

भवनों का विकास मानवीय संवेदना का विकल्प नहीं। समुदाय में प्रेम और सेवा भी हों।

साखी ५१७ साध महिमाँ कौ अंग · मूल क्रमांक ३

जिहिं घरि साथ न पूजिये, हरि की सेवा नाँहिं। ते घर मरड़हट सारषे, भूत बसै तिन माँहि॥
कठिन शब्दार्थ

मरड़हट = श्मशान; पूजिये = आदर हो।

सरल हिंदी अर्थ

जहाँ सज्जन का सम्मान और हरि की सेवा नहीं, वह घर कवि को श्मशान जैसा सूना लगता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

गृह की जीवंतता आदर और करुणा में है। कठोर उपमा दूसरों को हीन कहने के बजाय अपने घर पर मनन कराए।

साखी ५१८ साध महिमाँ कौ अंग · मूल क्रमांक ४

है गै गैंवर सघन घन, छत्रा धजा फहराइ। ता सुख थैं भिष्या भली, हरि सुमिरत दिन जाइ॥
कठिन शब्दार्थ

है गै गैंवर = घोड़े, गायें, हाथी; भिष्या = भिक्षा।

सरल हिंदी अर्थ

घने धन, पशु और छत्र-ध्वजा वाले वैभव से वह सादा जीवन भला जिसमें दिन हरि-स्मरण में बीते।

भावार्थ और जीवन-संदेश

धन की निंदा नहीं, मूल्य की तुलना है। समृद्धि मन की शांति और भक्ति को न निगले।

साखी ५१९ साध महिमाँ कौ अंग · मूल क्रमांक ५

हैं गै गैंवर सघन घन, छत्रापति की नारि। तास पटंतर नाँ तुलै, हरिजन की पनिहारि॥
कठिन शब्दार्थ

पटंतर = तुलना; पनिहारि = पानी भरने वाली स्त्री।

सरल हिंदी अर्थ

राजवैभव वाली रानी भी उस साधारण पनिहारिन की भक्ति की बराबरी नहीं करती—कवि ऐसा महत्त्व बताते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

आध्यात्मिक गरिमा पद और धन से स्वतंत्र है। साधारण श्रम करने वाले व्यक्ति का समान सम्मान करें।

साखी ५२० साध महिमाँ कौ अंग · मूल क्रमांक ६

क्यूँ नृप नारी नींदये, क्यूँ पनिहारी कौं माँन। वामाँग सँवारै पीव कौ, वा नित उठि सुमिरै राँम॥
कठिन शब्दार्थ

वामाँग = बायाँ अंग, दांपत्य का संकेत; माँन = सम्मान।

सरल हिंदी अर्थ

रानी को नीचा और पनिहारिन को ऊँचा क्यों कहा? भेद पद का नहीं; एक राजसज्जा में है, दूसरी नियमित राम-स्मरण में।

भावार्थ और जीवन-संदेश

उपमा की कसौटी भक्ति है, स्त्रियों की सामाजिक होड़ नहीं। हर जीवन-स्थिति में सजगता संभव है।

साखी ५२१ साध महिमाँ कौ अंग · मूल क्रमांक ७

कबीर धनि ते सुंदरी, जिनि जाया बैसनों पूत। राँम सुमिर निरभैं हुवा, सब जग गया अऊत॥
कठिन शब्दार्थ

धनि = धन्य; बैसनों = भक्त; अऊत = आध्यात्मिक फल से रिक्त।

सरल हिंदी अर्थ

धन्य वह माता जिसने भक्त संतान को जन्म दिया; राम-स्मरण से वह निर्भय हुआ, जबकि जग मूल सार भूलता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

संतान के गुण प्रेम और सदाचार में दिखें। किसी परिवार को संतान के आधार पर कमतर न आँकें।

साखी ५२२ साध महिमाँ कौ अंग · मूल क्रमांक ८

कबीर कुल तौ सो भला, जिहि कुल उपजै दास। जिहिं कुल दास न ऊपजै, सो कुल आक पलास॥
कठिन शब्दार्थ

दास = सच्चा भक्त; आक पलास = कम सुगंध वाले वृक्ष।

सरल हिंदी अर्थ

कवि वह कुल श्रेष्ठ कहते हैं जिसमें भक्त जन्मे; केवल नाम की वंश-प्रतिष्ठा को निष्फल वृक्षों से तुलना करते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

वंश की सच्ची शोभा गुण और सेवा हैं। जन्मगत श्रेष्ठता का अहं इस सीख के विपरीत है।

साखी ५२३ साध महिमाँ कौ अंग · मूल क्रमांक ९

साषत बाँभण मति मिलै, बैसनों मिलै चंडाल। अंक माल दे भटिये, माँनों मिले गोपाल॥
कठिन शब्दार्थ

साषत = भक्ति-विमुख कर्मकांडी; चंडाल = पुराना जातिसूचक शब्द।

सरल हिंदी अर्थ

कबीर कहते हैं—जन्म से ऊँचा कहलाने वाले प्रेमहीन व्यक्ति से अधिक भक्त समझे जाने वाले तथाकथित निम्नजन को गले लगाओ।

भावार्थ और जीवन-संदेश

पद जातिगत ऊँच-नीच का प्रतिवाद है। किसी जन्म को अपवित्र न मानें; सम्मान का आधार मानवता और गुण हैं।

साखी ५२४ साध महिमाँ कौ अंग · मूल क्रमांक १०

राँम जपत दालिद भला, टूटी घर की छाँनि। ऊँचे मंदिर जालि दे, जहाँ भगति न सारँगपाँनि॥
कठिन शब्दार्थ

दालिद = निर्धन; सारँगपाँनि = विष्णु; मंदिर = बड़ा भवन।

सरल हिंदी अर्थ

राम-स्मरण वाला निर्धन और टूटी छत भी उस महल से अच्छे हैं जहाँ भक्ति नहीं; महल जलाने की तीखी अतिशयोक्ति है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

मुख्य संदेश धन से ऊपर गुण है। इसे किसी भवन को नुकसान पहुँचाने की प्रेरणा न समझें।

साखी ५२५ साध महिमाँ कौ अंग · मूल क्रमांक ११

कबीर भया है केतकी, भवर गये सब दास। जहाँ जहाँ भगति कबीर की, तहाँ तहाँ राँम निवास॥
कठिन शब्दार्थ

केतकी = सुगंधित फूल; भवर = भक्तों का रूपक।

सरल हिंदी अर्थ

कबीर की भक्ति केतकी की सुगंध जैसी हुई, भक्त-भौंरे आए; जहाँ निष्कपट भक्ति है, वहीं राम की उपस्थिति है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

सच्चा गुण अपने प्रभाव से पहचाना जाता है। आत्मप्रचार के बजाय प्रेम और सदाचार की सुगंध फैलाएँ।

३१. मधि कौ अंग

द्वंद्व से आगे समता, नाम-भेद में आत्मीयता और अहं का परिवर्तन। मूल स्थानीय क्रमांक १–११।

साखी ५२६ मधि कौ अंग · मूल क्रमांक १

कबीर मधि अंग जेको रहै, तौ तिरत न लागै बार। दुइ दुइ अंग सूँ लाग करि, डूबत है संसार॥
कठिन शब्दार्थ

मधि अंग = मध्य, द्वंद्व से परे दृष्टि; दुइ दुइ = दो छोर।

सरल हिंदी अर्थ

मध्य की समता में स्थिर हो तो पार उतरना सहज है; परस्पर विरोधी छोरों में फँसकर संसार डूबता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

मध्य का अर्थ अन्याय पर निष्क्रियता नहीं। लोभ-द्वेष से मुक्त होकर विवेकपूर्ण निर्णय करें।

साखी ५२७ मधि कौ अंग · मूल क्रमांक २

कबीर दुविधा दूरि करि, एक अंग ह्नै लागि। यहु सीतल वहु तपति है दोऊ कहिये आगि॥
कठिन शब्दार्थ

दुविधा = द्वंद्व; सीतल तपति = ठंडी और गरम।

सरल हिंदी अर्थ

दुविधा हटाकर सत्य का एक आधार पकड़ो; आसक्ति और द्वेष के दोनों छोर अलग लगें, फिर भी जलाने वाली आग हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

दोनों प्रतिक्रियाओं की पकड़ पहचानें। संतुलन सत्य और करुणा से बने।

साखी ५२८ मधि कौ अंग · मूल क्रमांक ३

अनल अकाँसाँ घर किया, मधि निरंतर बास। बसुधा ब्यौम बिरकत रहै, बिनठा हर बिसवास॥
कठिन शब्दार्थ

अनल = कल्पित आकाशवासी पक्षी; बसुधा ब्यौम = धरती-आकाश।

सरल हिंदी अर्थ

अनल-पक्षी जैसा अंतराकाश में घर बनाकर साधक दोनों छोरों से विरक्त मध्य की निरंतरता में रहता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

लोककल्पना भीतर की समता कहती है। अपने विश्वास को केवल बाहरी विरोधों पर निर्भर न रखें।

साखी ५२९ मधि कौ अंग · मूल क्रमांक ४

बासुरि गमि न रैंणि गमि, नाँ सुपनै तरगंम। कबीर तहाँ बिलंबिया, जहाँ छाहड़ी न घंम॥
कठिन शब्दार्थ

गमि = पहुँच; छाहड़ी घंम = छाँह और धूप।

सरल हिंदी अर्थ

जहाँ दिन-रात, स्वप्न, धूप-छाँह का सामान्य भेद नहीं, कबीर उस अंतर-स्थिति में ठहरे हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह द्वंद्वातीत ध्यान का काव्य है। व्यावहारिक जीवन में उससे स्थिरता और धैर्य ग्रहण करें।

साखी ५३० मधि कौ अंग · मूल क्रमांक ५

जिहि पैडै पंडित गए, दुनिया परी बहीर। औघट घाटी गुर कही, तिहिं चढ़ि रह्या कबीर॥
कठिन शब्दार्थ

पैडै = रास्ते; बहीर = भीड़; औघट = कठिन।

सरल हिंदी अर्थ

पंडितों के रास्ते पर दुनिया की भीड़ चली; गुरु ने कठिन अंतर्मुख घाट बताया, कबीर उस ओर बढ़े।

भावार्थ और जीवन-संदेश

भीड़ की दिशा ही अंतिम प्रमाण नहीं। विवेक और अनुभव से अपनी साधना की राह समझें।

साखी ५३१ मधि कौ अंग · मूल क्रमांक ६

श्रग नृकथै हूँ रह्या, सतगुर के प्रसादि। चरन कँवल की मौज मैं, रहिसूँ अंतिरु आदि॥
कठिन शब्दार्थ

श्रग नृक = स्वर्ग-नरक के पाठ-रूप; प्रसादि = कृपा।

सरल हिंदी अर्थ

गुरु-कृपा से स्वर्ग के लोभ और नरक के भय से आगे हुआ; चरण-कमल की आत्मीयता में रहना चाहता हूँ।

भावार्थ और जीवन-संदेश

निष्काम भक्ति पुरस्कार और दंड के सौदे से व्यापक है। सत्य और प्रेम स्वयं साधना के मूल्य बनें।

साखी ५३२ मधि कौ अंग · मूल क्रमांक ७

हिंदू मूये राम कहि, मुसलमान खुदाइ। कहै कबीर सो जीवता, दुइ मैं कदे न जाइ॥
कठिन शब्दार्थ

दुइ = दो का कठोर भेद; जीवता = सच्चे बोध में जागा।

सरल हिंदी अर्थ

हिंदू राम, मुसलमान खुदा कहते हैं; कबीर के अनुसार सच्चा जागा वह है जो इस नाम-भेद में नहीं उलझता।

भावार्थ और जीवन-संदेश

संबोधन अलग हों, पर ईश्वर-प्रेम द्वेष का कारण न बने। दूसरों की आस्था का आदर रखें।

साखी ५३३ मधि कौ अंग · मूल क्रमांक ८

दुखिया मूवा दुख कों, सुखिया सुख कौं झूरि। सदा आनंदी राम के, जिनि सुख दुख मेल्हे दूरि॥
कठिन शब्दार्थ

झूरि = व्याकुल होकर; मेल्हे दूरि = प्रभाव से मुक्त किए।

सरल हिंदी अर्थ

दुःखी दुःख में और सुखी सुख की चाह में उलझे; राम के प्रेमी दोनों की दासता छोड़ आनंद में हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

समता भावनाहीनता नहीं। सुख-दुःख आते हुए भी विवेक और करुणा बनाए रखें।

साखी ५३४ मधि कौ अंग · मूल क्रमांक ९

कबीर हरदी पीयरी, चूना ऊजल भाइ। रामसनेही यूँ मिले, दुन्यूँ बरन गँवाइ॥
कठिन शब्दार्थ

हरदी = हल्दी; बरन = रंग।

सरल हिंदी अर्थ

पीली हल्दी और सफेद चूना मिलकर अपना पुराना रंग छोड़ नए रंग में आते हैं; राम-प्रेमियों का मिलन ऐसा है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

आत्मीयता में अपने अहं का कठोर रंग बदलता है। संबंध परस्पर सीखने और उदार होने का अवसर बने।

साखी ५३५ मधि कौ अंग · मूल क्रमांक १०

काबा फिर कासी भया, राँम भया रहीम। मोट चून मैदा भया, बैठि कबीरा जीभ॥
कठिन शब्दार्थ

मोट चून = मोटा आटा; जीभ = भोजन या तृप्ति का कठिन पाठ।

सरल हिंदी अर्थ

काबा-काशी और राम-रहीम के भेद मिटे; जैसे मोटा आटा महीन होकर एकरस होता है, वैसी तृप्ति मिली।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह धर्मों की आत्मीय एकता का रूपक है। भिन्न परंपराएँ मिटाना नहीं, द्वेष और श्रेष्ठता का आग्रह छोड़ना सीखें।

पाठ-टिप्पणी: अंतिम शब्द का संदर्भ-वेब-पाठ “जीभ” है; उसे अनुमान से नहीं बदला गया है। अर्थ में एकरसता और तृप्ति का केंद्रीय संकेत लिया गया है।

साखी ५३६ मधि कौ अंग · मूल क्रमांक ११

धरती अरु आसमान बिचि, दोइ तूँबड़ा अबध। षट दरसन संसै पड़ा, अरु चौरासी सिध॥
कठिन शब्दार्थ

तूँबड़ा = तुंबे का पात्र; षट दरसन = छह दर्शन; सिध = सिद्ध।

सरल हिंदी अर्थ

धरती-आकाश के बीच अनेक पात्र और मत हैं; छह दर्शन तथा चौरासी सिद्ध भी तत्त्व की उलझन में पड़े हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

दार्शनिक प्रणाली उपयोगी है, पर अंतिम सत्य का संपूर्ण अधिकार नहीं। ज्ञान के साथ विनय बनाए रखें।

३२. सारग्राही कौ अंग

गुण चुनना, सार पहचानना और विविधता से मधुर सीख ग्रहण करना। मूल स्थानीय क्रमांक १–४।

साखी ५३७ सारग्राही कौ अंग · मूल क्रमांक १

षीर रूप हरि नाँव है नीर आन ब्यौहार। हंस रूप कोई साध है, तात को जांनणहार॥
कठिन शब्दार्थ

षीर = दूध; नीर = पानी; तात = तत्त्व।

सरल हिंदी अर्थ

हरिनाम दूध का सार है, अन्य व्यवहार पानी जैसा; विवेकी हंसरूपी साधक उनका सार पहचानता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

दूध-पानी अलग करने का लोकबिंब विवेक सिखाता है। दैनिक काम करते हुए मूल मूल्य न भूलें।

साखी ५३८ सारग्राही कौ अंग · मूल क्रमांक २

कबीर साषत कौ नहीं, सबै बैशनों जाँणि। जा मुख राम न ऊचरै, ताही तन की हाँणि॥
कठिन शब्दार्थ

साषत = भक्ति-विमुख व्यक्ति; बैशनों = भक्त; हाँणि = हानि।

सरल हिंदी अर्थ

कबीर सबको भक्त की दृष्टि से पहचानने को कहते हैं; जो नाम का सार न समझे, हानि उसी के जीवन की है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

मत-सूचक पुराने शब्द को जन्मगत निर्णय न बनाएँ। हर व्यक्ति में सीखने और बदलने की संभावना देखें।

साखी ५३९ सारग्राही कौ अंग · मूल क्रमांक ३

कबीर औगुँण ना गहैं गुँण ही कौ ले बीनि। घट घट महु के मधुप ज्यूँ, पर आत्म ले चीन्हि॥
कठिन शब्दार्थ

बीनि = चुनकर; मधुप = भौंरा; पर आत्म = दूसरे में आत्मतत्त्व।

सरल हिंदी अर्थ

दोष न पकड़ो, गुण चुनो; भौंरे की तरह अलग-अलग हृदयों से मधु लेकर सबमें आत्मतत्त्व पहचानो।

भावार्थ और जीवन-संदेश

विवेक का अर्थ दोष छिपाना नहीं। आवश्यक सीमा रखते हुए भी दूसरे के अच्छे गुण सीखें।

साखी ५४० सारग्राही कौ अंग · मूल क्रमांक ४

बसुधा बन बहु भाँति है, फूल्यो फल्यौ अगाध। मिष्ट सुबास कबीर गहि, विषमं कहै किहि साथ॥
कठिन शब्दार्थ

बसुधा = पृथ्वी; मिष्ट सुबास = मधुर सुगंध; विषमं = अप्रिय।

सरल हिंदी अर्थ

धरती पर अनेक वन, फल और फूल हैं; कबीर मधुर सुगंध ग्रहण करते हैं, कटुता लेकर क्यों फिरें?

भावार्थ और जीवन-संदेश

विविधता में सार ग्रहण करें। संसार से सीखते हुए उपयोगी गुण अपनाना और अनावश्यक द्वेष छोड़ना साधना है।

इस भाग से मनन के छह सूत्र

  1. मन की दिशा देखें: हर इच्छा के पीछे चलने से पहले ठहरकर विवेक करें।
  2. वचन का कर्म से मेल हो: उपदेश का मूल्य उसके पालन में है।
  3. सत्य के साथ करुणा: धर्मपालन मनुष्य और जीव की गरिमा से अलग न हो।
  4. वेश के पीछे चरित्र: चिह्न और लोकप्रियता से अधिक निष्कपट आचरण देखें।
  5. संगति सजगता से चुनें: जो विवेक, धैर्य और गुण बढ़ाए, उससे सीखें।
  6. सार ग्रहण करें: विविधता में अच्छे गुण चुनें और अनावश्यक द्वेष छोड़ें।

इस भाग के सामान्य प्रश्न

भाग २ में कितनी साखियाँ हैं?

अंग १३–३२ की २६८ मुख्य साखियाँ हैं। श्रृंखला के संयुक्त क्रमांक २७३–५४० हैं; हर पद का अंग-स्थानीय क्रमांक भी साथ है।

पहला भाग कहाँ पढ़ें?

भाग १—गुरुदेव से चितावणी, साखी १–२७२ में पहले १२ अंग पूरे हैं। इसी क्रम की अगली कड़ी यह दूसरा भाग है।

कठोर पुराने सामाजिक शब्दों को कैसे पढ़ें?

उन्हें ऐतिहासिक पाठ और कवि की वैराग्य या मत-विवाद की भाषा के रूप में पढ़ें। किसी समूह की अवमानना के बजाय अपने मोह, अहं और आचरण की जाँच करें। अर्थों में जहाँ जरूरी है, यह संदर्भ स्पष्ट है।

क्या कबीर माला और कीर्तन को व्यर्थ कहते हैं?

इन अंगों की केंद्रीय कसौटी भीतर का परिवर्तन है। मन कहीं और हो और केवल बाहरी क्रिया चले, तो कवि प्रश्न करते हैं। सजग भाव, अर्थ और सदाचार के साथ साधन का उपयोग समझना चाहिए।

क्या ये सभी पाठांतर सहित पूरा आलोचनात्मक संस्करण है?

नहीं। मुख्य क्रम वाले पद लिए गए हैं। ख-प्रति की अतिरिक्त टिप्पणियाँ मुख्य गिनती से अलग हैं; आवश्यक पाठ-सुधार पर स्रोत बताया गया है। यह सरल अध्ययन-सहायक पाठक-संस्करण है।

अगला भाग कहाँ से शुरू होगा?

भाग ३ अंग ३३—विचार कौ अंग से शुरू होगा और अंग ५९—अबिहड़ तक मुख्य साखी-पाठ पूरा करेगा। प्रकाशन से पहले उसका काल्पनिक लिंक नहीं दिया गया है।

संदर्भ और पाठ-व्यवस्था

आधार: श्यामसुंदर दास संपादित कबीर ग्रंथावली का मुख्य साखी-पाठ—अंग १३–३२।

गिनती: अंगों में क्रमशः ३०, १०, २, ३२, २२, ५, ४, २७, ४, १७, ११, २६, ७, ८, ३, १३, २१, ११, ११ और ४ मुख्य साखियाँ हैं—कुल २६८। चाँणक और भेष अंग में मुख्य क्रम से बाहर जुड़ी प्रति-टिप्पणियों के दोहे अलग रखे गए हैं।

संपादन: रिक्तियाँ, अनावश्यक वेब-पंक्ति-विभाजन और स्पष्ट छूटी विराम-सीमाएँ व्यवस्थित की गई हैं। जहाँ शब्द-पाठ बदला है, संबंधित साखी पर टिप्पणी है। शेष पुराने रूप बड़े स्तर पर आधुनिक नहीं बनाए गए। कठिन शब्दों के आशय संदर्भानुसार हैं; योगिक और दुर्बोध पदों में एक से अधिक अर्थ संभव हैं।

व्याख्या: शब्दार्थ, सरल अर्थ और जीवन-संदेश स्वतंत्र व्याख्याएँ हैं। कबीर की मूल साखियों तथा बाद के टिप्पणीकारों की विस्तृत टीकाओं को इनके साथ मिला हुआ मूल पाठ न समझें।

गुण चुनें, सत्य अपनाएँ

साधना मन की दिशा, कथन और कर्म के मेल तथा संगति के चयन में उतरती है। किसी एक साखी की एक सीख दिन के व्यवहार में अपनाएँ।

अगला निर्धारित भाग: अंग ३३–५९—विचार से अबिहड़ तक।

लेख के आरंभ पर जाएँ ↑
© 2026 Bhakti Bhavna | Powered by @Bablu_dwivedi418

टिप्पणियाँ

लोकप्रिय भक्ति सामग्री

ओ मेरे रघुवर तू ही सहारा है | राम भजन लिरिक्स | Bhakti Bhavna

श्रीरामचरितमानस की 24 प्रसिद्ध चौपाइयाँ | सरल अर्थ सहित

जय जय गिरिवरराज किशोरी | सीता जी की गौरी स्तुति | रामचरितमानस अर्थ सहित