कबीर ग्रंथावली भाग 1 — 272 साखियाँ मूल पाठ, हिंदी अर्थ और भावार्थ सहित

भक्ति भावना प्रस्तुत · संत कबीरदास जी का संत साहित्य
कबीर ग्रंथावली · विस्तृत भाग १

कबीर ग्रंथावली — भाग 1
272 साखियाँ · मूल पाठ और हिंदी अर्थ

गुरुदेव से चितावणी तक · पहले १२ पूरे अंग

ज्ञान का दीप, नाम का स्मरण, विरह की पुकार और निष्काम प्रेम—कबीर की साखियों का क्रमबद्ध अध्ययन, कठिन शब्दार्थ और स्वतंत्र भावार्थ सहित।

२७२ मूल साखियाँ१२ पूरे अंगमुख्य साखी-संग्रह की ३-भागीय योजना

कबीर की वाणी का विस्तृत प्रथम भाग

इस लेख में श्यामसुंदर दास संपादित कबीर ग्रंथावली के मुख्य साखी-पाठ के पहले १२ अंगों की २७२ साखियाँ हैं। गुरुदेव कौ अंग से आरंभ करके चितावणी कौ अंग के अंतिम पद तक पाठ क्रमवार दिया गया है। प्रत्येक साखी के साथ कठिन शब्दार्थ, सरल हिंदी अर्थ तथा स्वतंत्र भावार्थ और जीवन-संदेश है।

कबीर गुरु, प्रेम, रामनाम, आत्मबोध और जीवन की नश्वरता पर छोटी साखियों में गहरी बात कहते हैं। यहाँ अर्थ पढ़ने के साथ उस संकेत को अपने व्यवहार से जोड़कर देखने का अवसर है।

मुख्य साखी-संग्रह की पूरी योजना: ३ बड़े भाग

भागअंगों की सीमापाठ का विस्तार
भाग ११–१२गुरुदेव से चितावणी · २७२ साखियाँ
भाग २१३–३२मन से सारग्राही
भाग ३३३–५९विचार से अबिहड़

यह योजना संदर्भ-संस्करण के ५९ अंगों वाले मुख्य साखी-पाठ के लिए है। पद, भजन, रमैनी और अलग परिशिष्ट इस तीन-भागीय साखी-श्रृंखला का हिस्सा नहीं हैं। अगले भाग प्रकाशित होने पर उनके वास्तविक लिंक जोड़े जाएँगे।

पहले भाग के १२ अंग

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साखी १–२४
साखी २५–४८
साखी ४९–७२
साखी ७३–९६
साखी ९७–१२०
साखी १२१–१४४
साखी १४५–१६८
साखी १६९–१९२
साखी १९३–२१६
साखी २१७–२४०
साखी २४१–२६४
साखी २६५–२७२

१. गुरुदेव कौ अंग

सद्गुरु का उपकार, ज्ञान, शिष्य की ग्रहणशीलता और प्रेम का प्रकाश। मूल स्थानीय क्रमांक १–३५।

साखी १ गुरुदेव कौ अंग · मूल क्रमांक १

सतगुर सवाँन को सगा, सोधी सईं न दाति। हरिजी सवाँन को हितू, हरिजन सईं न जाति॥
कठिन शब्दार्थ

सवाँन = समान; सोधी = शुद्ध ज्ञान; दाति = दान; हितू = हितैषी।

सरल हिंदी अर्थ

सद्गुरु जैसा आत्मीय, निर्मल ज्ञान जैसा दान, हरि जैसा हितैषी और हरिभक्त जैसा अपना समुदाय दूसरा नहीं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

कबीर जन्म की ऊँच-नीच से ऊपर सत्य और भक्ति का संबंध देखते हैं। शिक्षा का सर्वोत्तम उपहार वह है जो भीतर विवेक जगाए और मनुष्यों के बीच अपनापन बढ़ाए।

साखी २ गुरुदेव कौ अंग · मूल क्रमांक २

बलिहारी गुर आपणैं द्यौं हाड़ी कै बार। जिनि मानिष तैं देवता, करत न लागी बार॥
कठिन शब्दार्थ

बलिहारी = कृतज्ञ होकर समर्पित; आपणैं = अपने; हाड़ी = देह का संकेत; बार = देर।

सरल हिंदी अर्थ

अपने गुरु पर अपना सब कुछ अर्पित करने का भाव है, जिन्होंने मनुष्य में दिव्य गुण जागृत करने में देर नहीं की।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह कृतज्ञता की काव्यात्मक अतिशयोक्ति है। गुरु का उपकार जीवन में करुणा, सत्य और संयम लाकर चुकाएँ। देह को हानि पहुँचाना इसका अर्थ नहीं।

साखी ३ गुरुदेव कौ अंग · मूल क्रमांक ३

सतगुर की महिमा अनँत, अनँत किया उपगार। लोचन अनँत उघाड़िया, अनँत दिखावणहार॥
कठिन शब्दार्थ

अनँत = असीम; उपगार = उपकार; लोचन = दृष्टि; उघाड़िया = खोल दिए।

सरल हिंदी अर्थ

सद्गुरु की महिमा और उपकार असीम हैं; उन्होंने ऐसी दृष्टि खोली जो अनंत परम तत्त्व की पहचान कराती है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

सच्ची शिक्षा देखने की आदत बदलती है। केवल जानकारी बढ़ना पर्याप्त नहीं; अपने पूर्वाग्रह और अहंकार को पहचानकर व्यापक दृष्टि विकसित करना भी आवश्यक है।

साखी ४ गुरुदेव कौ अंग · मूल क्रमांक ४

राम नाम के पटतरे, देबे कौ कुछ नाहिं। क्या ले गुर सन्तोषिए, हौंस रही मन माहिं॥
कठिन शब्दार्थ

पटतरे = बराबरी में; संतोषिए = संतुष्ट करें; हौंस = इच्छा।

सरल हिंदी अर्थ

रामनाम का अमूल्य परिचय देने वाले गुरु को उसके बदले देने योग्य कोई वस्तु नहीं मिलती; उन्हें प्रसन्न करने की इच्छा मन में रह जाती है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

ज्ञान का मूल्य धन से पूरा नहीं चुकाया जा सकता। सीख को ईमानदारी से अपनाना, विनय रखना और दूसरों तक शुभ समझ पहुँचाना कृतज्ञता का सुंदर रूप है।

साखी ५ गुरुदेव कौ अंग · मूल क्रमांक ५

सतगुर के सदकै करूँ, दिल अपणी का साछ। कलियुग हम स्यूँ लड़ि पड़ा, महकम मेरा बाछ॥
कठिन शब्दार्थ

सदकै = न्योछावर; साछ = सच्चाई; महकम = मजबूत; बाछ = पक्ष या सहारा।

सरल हिंदी अर्थ

मैं अपना सच्चा हृदय सद्गुरु को अर्पित करता हूँ। युग की प्रतिकूलता मुझसे टकराए तो भी गुरु के ज्ञान का मेरा सहारा दृढ़ है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यहाँ निष्ठा को कठिन समय में परखा गया है। विश्वास का अर्थ विवेक छोड़ना नहीं; सत्य, धैर्य और सदाचार के आधार पर दबाव का सामना करना है।

साखी ६ गुरुदेव कौ अंग · मूल क्रमांक ६

सतगुर लई कमाँण करि, बाँहण लागा तीर। एक जु बाह्यां प्रीति सूँ, भीतरि रह्या सरीर॥
कठिन शब्दार्थ

कमाँण = धनुष; बाह्यां = चलाया; प्रीति सूँ = प्रेम से।

सरल हिंदी अर्थ

गुरु ने शिष्य को धनुष की तरह तैयार करके ज्ञान का तीर चलाया; प्रेम से लगा वह तीर भीतर गहराई तक उतर गया।

भावार्थ और जीवन-संदेश

तीर ज्ञान के प्रभाव का रूपक है। हितकारी सीख केवल कानों तक न रहे; वह गलत आदत, आत्ममुग्धता और व्यवहार की कठोरता बदल सके।

साखी ७ गुरुदेव कौ अंग · मूल क्रमांक ७

सतगुर साँचा सूरिवाँ, सबद जु बाह्या एक। लागत ही मैं मिल गया, पड़या कलेजै छेक॥
कठिन शब्दार्थ

सूरिवाँ = शूरवीर; सबद = गुरु-वचन; छेक = छेद।

सरल हिंदी अर्थ

सच्चे गुरु ने ऐसा एक शब्द-बाण चलाया कि भीतर के अहं का आवरण भेद गया और साधक का मन सत्य से जुड़ गया।

भावार्थ और जीवन-संदेश

कभी एक बात जीवन की दिशा बदल देती है। उसे सुनने के लिए विनम्रता और ग्रहणशीलता चाहिए। यहाँ घाव का चित्र शारीरिक हिंसा नहीं, अंतर्मन के जागरण का संकेत है।

साखी ८ गुरुदेव कौ अंग · मूल क्रमांक ८

सतगुर मार्‌या बाण भरि, धरि करि सूधी मूठि। अंगि उघाड़ै लागिया, गई दवा सूँ फूंटि॥
कठिन शब्दार्थ

सूधी मूठि = सीधी पकड़; अंगि = भीतर; दवा = दावानल या जलन का संकेत।

सरल हिंदी अर्थ

गुरु ने सधे हुए ज्ञान-बाण से शिष्य के भीतर का आवरण भेदा; दबा हुआ विकार और उसकी जलन बाहर फूट पड़ी।

भावार्थ और जीवन-संदेश

सीख से कभी अपने दोष तीखे दिखाई देते हैं। उस असुविधा से भागने के बजाय शांत आत्मपरीक्षण करें। आत्मज्ञान का प्रयोजन शुद्धि है, अपने को तुच्छ समझना नहीं।

साखी ९ गुरुदेव कौ अंग · मूल क्रमांक ९

हँसै न बोलै उनमनी, चंचल मेल्ह्या मारि। कहै कबीर भीतरि भिद्या, सतगुर कै हथियार॥
कठिन शब्दार्थ

उनमनी = गहन अंतर्मुख दशा; चंचल = भटकता मन; भिद्या = भीतर तक प्रभावित।

सरल हिंदी अर्थ

गुरु के ज्ञान से भीतर प्रभावित साधक की चंचलता थम गई है; वह गहरी तन्मयता में शांत हो गया है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह साधना की अंतर्मुख अनुभूति का चित्र है। मौन का मूल्य भीतर की सजगता में है। संसार से कटना आवश्यक नहीं; शांत मन से अपने दायित्व बेहतर निभाए जा सकते हैं।

साखी १० गुरुदेव कौ अंग · मूल क्रमांक १०

गूँगा हूवा बावला, बहरा हुआ कान। पाऊँ थै पंगुल भया, सतगुर मार्‌या बाण॥
कठिन शब्दार्थ

बावला = सामान्य व्यवहार से अलग तन्मय; पंगुल = चलने में असमर्थ; बाण = ज्ञान का रूपक।

सरल हिंदी अर्थ

गुरु के वचन का प्रभाव ऐसा हुआ कि साधक निरर्थक बोलने, सुनने और विषयों की ओर दौड़ने में रुचि खो बैठा—मानो अंगों की चेष्टा थम गई हो।

भावार्थ और जीवन-संदेश

मन और इंद्रियों की पुरानी विषय-दौड़ थमने को कवि देह की चेष्टाएँ रुकने की अतिशयोक्ति से कहते हैं। इसका संदेश संयम और अंतर्मुखता है; शारीरिक अक्षमता किसी की आध्यात्मिक योग्यता का माप नहीं।

साखी ११ गुरुदेव कौ अंग · मूल क्रमांक ११

पीछे लागा जाइ था, लोक वेद के साथि। आगै थैं सतगुर मिल्या, दीपक दीया हाथि॥
कठिन शब्दार्थ

लोक वेद के साथि = सुनी-सुनाई रीति के पीछे; दीपक = विवेक का प्रकाश।

सरल हिंदी अर्थ

मैं लोकाचार और परंपरागत कथनों के पीछे चला जा रहा था। आगे गुरु मिले और उन्होंने हाथ में ज्ञान का दीपक दे दिया।

भावार्थ और जीवन-संदेश

परंपरा का अध्ययन समझ के साथ हो। अंधानुकरण के स्थान पर सत्य की खोज, प्रश्न करने का साहस और स्वयं जिम्मेदार निर्णय लेना गुरु-शिक्षा का सार है।

साखी १२ गुरुदेव कौ अंग · मूल क्रमांक १२

दीपक दीया तेल भरि, बाती दई अघट्ट। पूरा किया बिसाहूणाँ, बहुरि न आँवौं हट्ट॥
कठिन शब्दार्थ

अघट्ट = अक्षय; बिसाहूणाँ = खरीददारी; हट्ट = हाट।

सरल हिंदी अर्थ

गुरु ने तेल और बाती सहित ज्ञान का दीप दिया। जीवन के हाट से आवश्यक सार मिल गया, इसलिए फिर उसी भटकाव में लौटने की जरूरत नहीं रही।

भावार्थ और जीवन-संदेश

प्रेम, साधना और ज्ञान को दीप के उपकरणों से समझाया गया है। मूल आवश्यकता पहचानने पर अनावश्यक संग्रह और असंतोष की दौड़ घट सकती है।

साखी १३ गुरुदेव कौ अंग · मूल क्रमांक १३

ग्यान प्रकास्या गुर मिल्या, सो जिनि बीसरि जाइ। जब गोबिंद कृपा करी, तब गुर मिलिया आइ॥
कठिन शब्दार्थ

प्रकास्या = प्रकाशित हुआ; बीसरि = भूल; गोबिंद = परमात्मा।

सरल हिंदी अर्थ

गुरु मिले तो ज्ञान का प्रकाश हुआ; उस उपकार को न भूलो। गोविंद की कृपा से ही ऐसा मार्गदर्शक मिला है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

आध्यात्मिक लाभ के बाद भी कृतज्ञता बनी रहे। अपने में जागी समझ को केवल अपनी श्रेष्ठता न समझें; सहयोग और मार्गदर्शन के ऋण को पहचानें।

साखी १४ गुरुदेव कौ अंग · मूल क्रमांक १४

कबीर गुर गरवा मिल्या, रलि गया आटैं लूँण। जाति पाँति कुल सब मिटै, नांव धरोगे कौण॥
कठिन शब्दार्थ

गरवा = महत्त्वपूर्ण; रलि गया = घुल गया; लूँण = नमक।

सरल हिंदी अर्थ

श्रेष्ठ गुरु मिलने पर मैं वैसे एकरस हो गया जैसे आटे में नमक मिल जाता है। जाति, कुल और अलग पहचान का अभिमान मिट गया।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह ऊँच-नीच के अहंकार से मुक्ति की शिक्षा है। भक्ति का फल सबके प्रति सम्मान और समान आत्मीयता में दिखे, जन्म के आधार पर श्रेष्ठता जताने में नहीं।

साखी १५ गुरुदेव कौ अंग · मूल क्रमांक १५

जाका गुर भी अंधला, चेला खरा निरंध। अंधा अंधा ठेलिया, दून्यूँ कूप पड़ंत॥
कठिन शब्दार्थ

अंधला = विवेकहीन; निरंध = पूरी तरह अज्ञानी; कूप = कुआँ।

सरल हिंदी अर्थ

यदि गुरु और शिष्य दोनों विवेकहीन हों, तो एक-दूसरे को धकेलते हुए दोनों पतन के कुएँ में गिर पड़ते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

रूपक शारीरिक दृष्टिहीनता पर नहीं, अज्ञान पर है। गुरु चुनते समय चरित्र, समझ और निष्कपटता देखें। अनुयायी को भी अपना विवेक जागृत रखना चाहिए।

साखी १६ गुरुदेव कौ अंग · मूल क्रमांक १६

नाँ गुर मिल्या न सिष भया, लालच खेल्या डाव। दुन्यूँ बूड़े धार मैं, चढ़ि पाथर की नाव॥
कठिन शब्दार्थ

सिष = शिष्य; डाव = दाँव; धार = प्रवाह।

सरल हिंदी अर्थ

वास्तव में न गुरु मिला, न शिष्यत्व आया; दोनों ने लोभ का खेल खेला। पत्थर की नाव में चढ़े लोगों की तरह दोनों डूब गए।

भावार्थ और जीवन-संदेश

संबंध केवल नाम और वेश से पवित्र नहीं बनता। जहाँ शिक्षण की जगह लालच और आत्मप्रचार हो, वहाँ साधना का आधार कमजोर है।

साखी १७ गुरुदेव कौ अंग · मूल क्रमांक १७

चौसठ दीवा जोइ करि, चौदह चन्दा माँहि। तिहिं धरि किसकौ चानिणौं, जिहि घरि गोबिंद नाहिं॥
कठिन शब्दार्थ

चौसठ दीवा = कलाओं-विद्याओं का संकेत; चानिणौं = उजाला; घर = अंतःकरण।

सरल हिंदी अर्थ

अनेक दीप और चंद्रमा जैसे बाहरी प्रकाश हों, लेकिन हृदय में गोविंद की पहचान न हो तो भीतर का अँधेरा कैसे मिटे?

भावार्थ और जीवन-संदेश

विद्या का सम्मान करते हुए कबीर आत्मबोध की जरूरत बताते हैं। ज्ञान का उपयोग विनय और कल्याण में हो; केवल विद्वत्ता का प्रदर्शन अंतर्मन की शांति नहीं देता।

साखी १८ गुरुदेव कौ अंग · मूल क्रमांक १८

निस अधियारी कारणैं, चौरासी लख चंद। अति आतुर ऊदै किया, तऊ दिष्टि नहिं मंद॥
कठिन शब्दार्थ

निस = रात; आतुर = शीघ्रता से; दिष्टि = दृष्टि; मंद = मंदबुद्धि या मलिनता का संकेत।

सरल हिंदी अर्थ

अँधेरी रात मिटाने के लिए लाखों चंद्रमा उदित कर दिए जाएँ, फिर भी भीतर की दृष्टि मलिन हो तो अज्ञान नहीं मिटता।

भावार्थ और जीवन-संदेश

बाहरी साधन बढ़ाते रहने से भीतर की गलत समझ अपने आप नहीं बदलती। आत्मपरीक्षण और सत्संग से अपनी देखने की रीति सुधारें।

साखी १९ गुरुदेव कौ अंग · मूल क्रमांक १९

भली भई जू गुर मिल्या, नहीं तर होती हाँणि। दीपक दिष्टि पतंग ज्यूँ, पड़ता पूरी जाँणि॥
कठिन शब्दार्थ

हाणि = हानि; दिष्टि = देखकर; पतंग = दीप की ओर जाने वाला कीट।

सरल हिंदी अर्थ

अच्छा हुआ कि गुरु मिल गए, नहीं तो दीप की लौ को देखकर उसमें गिरते पतंगे की तरह मैं मोह में नष्ट हो जाता।

भावार्थ और जीवन-संदेश

आकर्षक वस्तु हर बार हितकारी नहीं होती। अच्छा मार्गदर्शन क्षणिक लुभाव और वास्तविक कल्याण का अंतर सिखाता है।

साखी २० गुरुदेव कौ अंग · मूल क्रमांक २०

माया दीपक नर पतंग, भ्रमि भ्रमि इवै पड़ंत। कहै कबीर गुर ग्यान थैं, एक आध उबरंत॥
कठिन शब्दार्थ

माया = मोह का आकर्षण; भ्रमि भ्रमि = भटक-भटककर; उबरंत = बचते हैं।

सरल हिंदी अर्थ

माया दीपक है और मनुष्य पतंगे जैसे उसमें बार-बार गिरते हैं। गुरु के ज्ञान से कोई सजग व्यक्ति उस जाल से बचता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

धन या संसार को ही दोष देना उद्देश्य नहीं। उसके प्रति अंधी आसक्ति पर प्रश्न है। उपयोग, आवश्यकता और अनियंत्रित लालसा में अंतर पहचानें।

साखी २१ गुरुदेव कौ अंग · मूल क्रमांक २१

सतगुर बपुरा क्या करै, जे सिषही माँहै चूक। भावै त्यूँ प्रमोधि ले, ज्यूँ वंसि बजाई फूक॥
कठिन शब्दार्थ

सिष = शिष्य; प्रमोधि = समझाना; वंसि = बाँस या बाँसुरी का संकेत।

सरल हिंदी अर्थ

यदि कमी शिष्य की ग्रहणशीलता में है तो गुरु क्या कर सकता है? चाहे जितना समझाए, बिना भीतर की तैयारी के सीख नहीं टिकती।

भावार्थ और जीवन-संदेश

सुधार की जिम्मेदारी पूरी तरह मार्गदर्शक पर न डालें। नियमित अभ्यास, प्रश्न और अपनी गलती स्वीकार करने से शिक्षा फलित होती है।

साखी २२ गुरुदेव कौ अंग · मूल क्रमांक २२

संसै खाया सकल जुग, संसा किनहुँ न खद्ध। जे बेधे गुर अष्षिरां, तिनि संसा चुणि चुणि खद्ध॥
कठिन शब्दार्थ

संसै = संशय; खद्ध = खाया या नष्ट किया; अष्षिरां = अक्षरों-वचनों से।

सरल हिंदी अर्थ

संशय ने संसार को खाया है, उसे विरले ही मिटा पाए। जिन्हें गुरु की वाणी गहराई से छूती है, वे अपनी उलझनें एक-एक करके समझकर दूर करते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह विचारपूर्ण स्पष्टता का मूल्य बताता है। ईमानदार प्रश्न दबाने के बजाय विवेक और अनुभव से उनका समाधान करें; अंधविश्वास को संशय-मुक्ति न समझें।

साखी २३ गुरुदेव कौ अंग · मूल क्रमांक २३

चेतनि चौकी बैसि करि, सतगुर दीन्हाँ धीर। निरभै होइ निसंक भजि, केवल कहै कबीर॥
कठिन शब्दार्थ

चेतनि चौकी = चेतना का सजग आसन; धीर = धैर्य; निसंक = निःशंक।

सरल हिंदी अर्थ

गुरु ने चेतना को स्थिर करके धैर्य दिया। अब निर्भय और निःशंक होकर एक परम तत्त्व का भजन करो।

भावार्थ और जीवन-संदेश

मन को बार-बार संभालना साधना का हिस्सा है। भरोसा भय घटाए और जीवन में शांति, सद्भाव तथा उत्तरदायित्व बढ़ाए।

साखी २४ गुरुदेव कौ अंग · मूल क्रमांक २४

सतगुर मिल्या त का भयां, जे मनि पाड़ी भोल। पासि बिनंठा कप्पड़ा, क्या करै बिचारी चोल॥
कठिन शब्दार्थ

भोल = भूल; बिनंठा = बिगड़ा हुआ; चोल = रँगाई का पदार्थ।

सरल हिंदी अर्थ

यदि मन अपनी भूल पर अड़ा रहे तो गुरु मिलने भर से क्या होगा? जिस कपड़े की तैयारी ही खराब हो, उसमें रंग अपना काम कैसे करे?

भावार्थ और जीवन-संदेश

किसी अच्छे व्यक्ति के पास बैठना पर्याप्त नहीं। भीतर परिवर्तन की इच्छा और व्यवहार में अभ्यास हो, तभी सीख का रंग चढ़ता है।

साखी २५ गुरुदेव कौ अंग · मूल क्रमांक २५

बूड़े थे परि ऊबरे, गुर की लहरि चमंकि। भेरा देख्या जरजरा, (तब) ऊतरि पड़े फरंकि॥
कठिन शब्दार्थ

भेरा = बेड़ा; जरजरा = जर्जर; फरंकि = फुर्ती से।

सरल हिंदी अर्थ

गुरु की जागृति से डूबते हुए भी बच निकले। बेड़े को जर्जर पहचानकर समय रहते उससे उतर गए।

भावार्थ और जीवन-संदेश

गलत आदत या भरोसे की कमजोरी समझ आने पर उसे बदलना बुद्धिमानी है। केवल पुरानी पहचान के कारण हानिकारक रास्ते पर टिके न रहें।

साखी २६ गुरुदेव कौ अंग · मूल क्रमांक २६

गुरु गोविन्द तौ एक है, दूजा यह आकार। आपा मेट जीवत मरै, तो पावै करतार॥
कठिन शब्दार्थ

आकार = बाहरी रूप; आपा = अहंकार; जीवत मरै = अहं का क्षय।

सरल हिंदी अर्थ

गुरु और गोविंद में ज्ञान का एक ही प्रकाश है, बाहर का रूप अलग है। अहंकार मिटाकर जीने वाला परम तत्त्व को पहचानता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह गुरु में सत्य-दृष्टि की अनुभूति का कथन है। ‘जीते जी मरना’ आत्महानि नहीं, स्वार्थ और अहं की पकड़ कम करना है।

साखी २७ गुरुदेव कौ अंग · मूल क्रमांक २७

कबीर सतगुर नाँ मिल्या, रही अधूरी सीप। स्वांग जती का पहरि करि, घरि घरि माँगै भीष॥
कठिन शब्दार्थ

सीप = इस संदर्भ में अधूरी सीख या साधना का संकेत; जती = संयमी साधु; भीष = भिक्षा।

सरल हिंदी अर्थ

सच्चा गुरु न मिलने से सीख अधूरी रही। केवल साधु का वेश पहनकर घर-घर भिक्षा माँगना भीतर की पूर्णता नहीं देता।

भावार्थ और जीवन-संदेश

आलोचना भिक्षा या किसी व्यक्ति की गरीबी की नहीं, साधना के खोखले प्रदर्शन की है। बाहरी पहचान के साथ भीतर विवेक और चरित्र भी विकसित हों।

साखी २८ गुरुदेव कौ अंग · मूल क्रमांक २८

सतगुर साँचा सूरिवाँ, तातै लोहिं लुहार। कसणो दे कंचन किया, ताई लिया ततसार॥
कठिन शब्दार्थ

लोहिं = लोहे को; कसणो = कसौटी या कसना; कंचन = सोना; ततसार = सार।

सरल हिंदी अर्थ

गुरु कुशल लोहार जैसे हैं; तपाकर और कसौटी पर कसकर साधक के भीतर के सार को उज्ज्वल कर देते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

साधक का निखार लोहे को सोना बनाने के रूपक में व्यक्त हुआ है। सीख, अनुशासन और आत्मपरीक्षण तभी सार्थक हैं जब उनसे चरित्र में सत्य, विनय और करुणा बढ़े।

साखी २९ गुरुदेव कौ अंग · मूल क्रमांक २९

थापणि पाई थिति भई, सतगुर दीन्हीं धीर। कबीर हीरा बणजिया, मानसरोवर तीर॥
कठिन शब्दार्थ

थापणि = स्थिर आधार; थिति = स्थिरता; बणजिया = व्यापार किया।

सरल हिंदी अर्थ

गुरु ने स्थिरता और धैर्य दिया। अब कबीर निर्मल मानसरोवर के तट पर हीरे जैसा अमूल्य आत्मज्ञान प्राप्त करने में लगे हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

साधना का लाभ क्षणिक प्रदर्शन नहीं, चित्त की स्पष्टता है। निर्मल मन में अपने मूल्य और उद्देश्य अधिक साफ पहचाने जाते हैं।

साखी ३० गुरुदेव कौ अंग · मूल क्रमांक ३०

निहचल निधि मिलाइ तत, सतगुर साहस धीर। निपजी मैं साझी घणाँ, बांटै नहीं कबीर॥
कठिन शब्दार्थ

निहचल निधि = अचल आध्यात्मिक संपदा; तत = परम सार; साझी = सहभागी।

सरल हिंदी अर्थ

गुरु ने साहस और धैर्य देकर स्थायी आत्मधन से जोड़ दिया। उसकी अनुभूति में अनेक सहभागी हो सकते हैं, पर उसे वस्तु की तरह बाँटा नहीं जा सकता।

भावार्थ और जीवन-संदेश

ज्ञान बताया जा सकता है, अनुभव दूसरे के स्थान पर नहीं किया जा सकता। हर साधक को स्वयं मनन, अभ्यास और ईमानदार आचरण करना होता है।

साखी ३१ गुरुदेव कौ अंग · मूल क्रमांक ३१

चौपड़ि माँडी चौहटै, अरध उरध बाजार। कहै कबीरा राम जन, खेलौ संत विचार॥
कठिन शब्दार्थ

चौपड़ि = चौपड़ का खेल; चौहटै = चौराहे पर; अरध उरध = नीचे-ऊपर।

सरल हिंदी अर्थ

जीवन का खेल सबके सामने बिछा है। कबीर राम के भक्तों से संतों के विवेक के साथ इस खेल में उतरने को कहते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

जीवन की बिसात पर निर्णयों का परिणाम पड़ता है। संत-विचार का अर्थ है आवेग और लोभ के बजाय सजगता, प्रेम तथा उत्तरदायित्व से अपना अगला कदम चुनना।

साखी ३२ गुरुदेव कौ अंग · मूल क्रमांक ३२

पासा पकड़ा प्रेम का, सारी किया सरीर। सतगुर दावा बताइया, खेलै दास कबीर॥
कठिन शब्दार्थ

सारी = खेल की गोटी; दावा = दाँव या चाल।

सरल हिंदी अर्थ

मैंने प्रेम का पासा लिया और अपना जीवन गोटी बनाया। गुरु ने सही चाल समझाई; अब कबीर प्रेम और विवेक से जीवन का खेल खेलते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

समर्पण केवल बोलने की बात नहीं; कर्म और जीवन में उसका अभ्यास हो। साथ ही विवेक बनाए रखें और अपनी जिम्मेदारियों से पीछे न हटें।

साखी ३३ गुरुदेव कौ अंग · मूल क्रमांक ३३

सतगुर हम सूँ रीझि करि, एक कह्या प्रसंग। बरस्या बादल प्रेम का भीजि गया अब अंग॥
कठिन शब्दार्थ

रीझि = प्रसन्न होकर; प्रसंग = रहस्यपूर्ण सीख; अंग = पूरा अस्तित्व।

सरल हिंदी अर्थ

गुरु ने प्रसन्न होकर ऐसी आत्मीय सीख दी कि प्रेम का बादल बरस पड़ा और पूरा अस्तित्व भीग गया।

भावार्थ और जीवन-संदेश

सत्य की पहचान मन को रूखा बनाने के बजाय करुणामय करती है। सीख का सुंदर परिणाम दूसरों के प्रति उदारता और भीतर सहज आनंद है।

साखी ३४ गुरुदेव कौ अंग · मूल क्रमांक ३४

कबीर बादल प्रेम का, हम परि बरष्या आइ। अंतरि भीगी आत्माँ, हरी भई बनराइ॥
कठिन शब्दार्थ

बरष्या = बरसा; अंतरि = भीतर; बनराइ = वनस्पति।

सरल हिंदी अर्थ

प्रेम का बादल मुझ पर बरसा; आत्मा भीतर से भीग गई और जीवन की वनराशि हरी हो उठी।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह प्रेम से आने वाले नवीनीकरण का चित्र है। साधना से व्यवहार में ताजगी, संवेदनशीलता और जीवों के प्रति अपनापन बढ़े।

साखी ३५ गुरुदेव कौ अंग · मूल क्रमांक ३५

पूरे सूँ परचा भया, सब दुख मेल्या दूरि। निर्मल कीन्हीं आत्माँ ताथैं सदा हजूरि॥
कठिन शब्दार्थ

पूरे = पूर्ण परम तत्त्व; परचा = परिचय या अनुभूति; हजूरि = सन्निकट उपस्थिति।

सरल हिंदी अर्थ

पूर्ण परम तत्त्व का परिचय मिला तो दुःख की पकड़ ढीली हुई। अंतःकरण निर्मल हुआ और उसकी उपस्थिति का अनुभव निरंतर होने लगा।

भावार्थ और जीवन-संदेश

कवि की आध्यात्मिक अनुभूति को सभी सांसारिक समस्याएँ तत्काल मिटने की गारंटी न मानें। भीतरी स्पष्टता दुःख सँभालने की दृष्टि और धैर्य दे सकती है।

२. सुमिरण कौ अंग

नाम-स्मरण, जागृति, एकाग्रता और जीवन का समय रहते सदुपयोग। मूल स्थानीय क्रमांक १–३२।

साखी ३६ सुमिरण कौ अंग · मूल क्रमांक १

कबीर कहता जात हूँ, सुणता है सब कोइ। राम कहें भला होइगा, नहिं तर भला न होइ॥
कठिन शब्दार्थ

सुणता = सुनता; नहिं तर = नहीं तो।

सरल हिंदी अर्थ

कबीर सबको पुकारकर कहते हैं कि राम का स्मरण कल्याणकारी है; उसे छोड़ने से साधना का हित कैसे होगा?

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह संत का प्रेमपूर्ण आह्वान है। सुनकर आगे बढ़ जाने के बजाय स्मरण को दैनिक जीवन की सचेत आदत बनाएँ। दूसरे की आस्था का सम्मान भी साथ रहे।

साखी ३७ सुमिरण कौ अंग · मूल क्रमांक २

कबीर कहै मैं कथि गया, कथि गया ब्रह्म महेस। राम नाँव सतसार है, सब काहू उपदेस॥
कठिन शब्दार्थ

ब्रह्म महेस = ब्रह्मा और शिव; सतसार = सत्य का सार।

सरल हिंदी अर्थ

कबीर कहते हैं कि मैंने और ब्रह्मा-शिव ने भी यही शिक्षा कही: रामनाम परम सत्य का सार है और सबके लिए उपदेश है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

नाम की महिमा को कवि ब्रह्मा और महेश के संकेत से व्यापक बनाते हैं। पाठक के लिए सीख यह है कि कथन सुनने के साथ उसके सार को अपने जीवन में भी उतारे।

साखी ३८ सुमिरण कौ अंग · मूल क्रमांक ३

तत तिलक तिहूँ लोक मैं, राम नाँव निज सार। जब कबीर मस्तक दिया सोभा अधिक अपार॥
कठिन शब्दार्थ

तत = तत्त्व; तिलक = श्रेष्ठ चिह्न; मस्तक दिया = अहं समर्पित किया।

सरल हिंदी अर्थ

तीनों लोकों में रामनाम सारभूत और श्रेष्ठ है। कबीर ने अपना अहं उसके चरणों में रखा तो जीवन की शोभा बढ़ गई।

भावार्थ और जीवन-संदेश

सच्ची शोभा पद और प्रशंसा से अधिक नम्रता में है। समर्पण का अर्थ विवेक छोड़ना या शरीर को नुकसान पहुँचाना नहीं।

साखी ३९ सुमिरण कौ अंग · मूल क्रमांक ४

भगति भजन हरि नाँव है, दूजा दुक्ख अपार। मनसा बचा क्रमनाँ, कबीर सुमिरण सार॥
कठिन शब्दार्थ

मनसा बचा क्रमनाँ = मन, वचन और कर्म से; सार = श्रेष्ठ आधार।

सरल हिंदी अर्थ

हरिनाम ही भक्ति-भजन का केंद्र है। मन, वाणी और कर्म से किया सुमिरन जीवन का सार है; उससे अलग भटकाव दुःख बढ़ाता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

स्मरण केवल जीभ तक सीमित न हो। जिसके गुण गाएँ, उनके अनुरूप सत्य, दया और संयम का अभ्यास भी करें।

साखी ४० सुमिरण कौ अंग · मूल क्रमांक ५

कबीर सुमिरण सार है, और सकल जंजाल। आदि अंति सब सोधिया दूजा देखौं काल॥
कठिन शब्दार्थ

जंजाल = उलझाव; सोधिया = जाँचा; काल = नश्वरता का अधीन।

सरल हिंदी अर्थ

कबीर ने आरंभ से अंत तक विचारकर सुमिरन को सार पाया; शेष सांसारिक उलझनें समय के साथ नष्ट होने वाली हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

कर्तव्य छोड़ना इसका आशय नहीं। नश्वर साधनों को अंतिम लक्ष्य मानने के बजाय उन्हें सदाचार और आत्मविकास के लिए उपयोग करें।

साखी ४१ सुमिरण कौ अंग · मूल क्रमांक ६

चिंता तौ हरि नाँव की, और न चिंता दास। जे कछु चितवैं राम बिन, सोइ काल कौ पास॥
कठिन शब्दार्थ

चिंता = यहाँ मनन या ध्यान; पास = फंदा।

सरल हिंदी अर्थ

भक्त का मुख्य ध्यान हरिनाम में है। राम से विमुख कर देने वाली चिंताएँ समय और मोह के बंधन में उलझाती हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

भक्ति चिंता को सजग दिशा दे। परिवार और आजीविका की जिम्मेदारी निभाते हुए अनावश्यक भय तथा लालसा घटाना संभव है।

साखी ४२ सुमिरण कौ अंग · मूल क्रमांक ७

पंच संगी पिव पिव करै, छठा जु सुमिरे मंन। आई सृति कबीर की, पाया राम रतंन॥
कठिन शब्दार्थ

पंच संगी = पाँच इंद्रियाँ; पिव = प्रिय; छठा = मन; सृति = स्मृति या चेतना; रतंन = रत्न।

सरल हिंदी अर्थ

पाँच इंद्रियाँ प्रिय को पुकारती हैं और छठा मन भी उसका स्मरण करता है। जब चेतना जागी तो कबीर ने रामरूपी अमूल्य रत्न पाया।

भावार्थ और जीवन-संदेश

साधना में मन और इंद्रियों की दिशा एक हो। प्रेम से किया स्मरण बिखरे ध्यान को समेटता है और भीतर के मूल्यवान सत्य की पहचान कराता है।

पाठ-टिप्पणी: कुछ वेब-प्रतिलिपियों में दूसरी पंक्ति अगले पद से दोहर गई है। यहाँ मुद्रित ग्रंथ के उपलब्ध पृष्ठ से “आई सृति कबीर की…” पाठ लिया गया है।

साखी ४३ सुमिरण कौ अंग · मूल क्रमांक ८

मेरा मन सुमिरै राम कूँ, मेरा मन रामहिं आहि। अब मन रामहिं ह्नै रह्या, सीस नवावौं काहि॥
कठिन शब्दार्थ

आहि = है; ह्नै = होकर; सीस नवावौं = सिर झुकाऊँ।

सरल हिंदी अर्थ

मेरा मन राम का स्मरण करते-करते राममय हो गया है; अब वह प्रिय सत्ता से अलग कोई दूर का आश्रय नहीं देखता।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह अंतर्मुख एकत्व का भक्तिपूर्ण अनुभव है। उससे अहंकार नहीं, विनय और सबमें दिव्यता देखने की दृष्टि विकसित हो।

साखी ४४ सुमिरण कौ अंग · मूल क्रमांक ९

तूँ तूँ करता तूँ भया, मुझ मैं रही न हूँ। वारी फेरी बलि गई, जित देखौं तित तूँ॥
कठिन शब्दार्थ

हूँ = मैंपन; वारी फेरी = बार-बार न्योछावर; जित तित = जहाँ-तहाँ।

सरल हिंदी अर्थ

‘तू ही तू’ कहते-कहते मेरा मैंपन मिट गया। अब जिधर देखता हूँ, उधर उसी प्रिय की उपस्थिति अनुभव करता हूँ।

भावार्थ और जीवन-संदेश

नाम-स्मरण का सुंदर फल अहं की कठोरता कम होना है। दूसरों पर श्रेष्ठता जताने के बजाय सबके प्रति करुणा और आदर बढ़े।

साखी ४५ सुमिरण कौ अंग · मूल क्रमांक १०

कबीर निरभै राम जपि, जब लग दीवै बाति। तेल घट्या बाती बुझी, (तब) सोवैगा दिन राति॥
कठिन शब्दार्थ

दीवै बाति = दीपक की बाती; तेल = जीवन का रूपक।

सरल हिंदी अर्थ

जब तक जीवन का दीप जल रहा है, निर्भय होकर राम का जप करो। तेल समाप्त और बाती बुझने पर देह की चेष्टा थम जाएगी।

भावार्थ और जीवन-संदेश

समय सीमित है; शुभ अभ्यास को अनिश्चित भविष्य पर न टालें। स्मरण को जीवन की गुणवत्ता, अच्छे व्यवहार और सजग कर्म से जोड़ें।

साखी ४६ सुमिरण कौ अंग · मूल क्रमांक ११

कबीर सूता क्या करै, जागि न जपै मुरारि। एक दिनाँ भी सोवणाँ, लंबे पाँव पसारि॥
कठिन शब्दार्थ

सूता = आध्यात्मिक असावधानी में पड़ा; मुरारि = भगवान; सोवणाँ = अंतिम निद्रा।

सरल हिंदी अर्थ

कबीर पूछते हैं कि असावधानी में क्यों पड़े हो? जागकर भगवान को याद करो; एक दिन मृत्यु की लंबी नींद आनी ही है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह सामान्य नींद छोड़ने का निर्देश नहीं। स्वस्थ विश्राम रखते हुए आलस्य और टालमटोल से बाहर निकलने का आह्वान है।

साखी ४७ सुमिरण कौ अंग · मूल क्रमांक १२

कबीर सूता क्या करै, काहे न देखै जागि। जाका संग तैं बीछुड़ा, ताही के संग लागि॥
कठिन शब्दार्थ

बीछुड़ा = बिछुड़ा; संग लागि = उससे जुड़।

सरल हिंदी अर्थ

जागकर पहचानो कि जिस मूल प्रिय से बिछुड़ गए हो, उसी से फिर जुड़ना है; केवल बेखबर पड़े रहने से क्या होगा?

भावार्थ और जीवन-संदेश

अपनी प्राथमिकताओं की समीक्षा करें। बिखरे ध्यान को नाम, आत्मपरीक्षण और अर्थपूर्ण कर्म की ओर लौटाएँ।

साखी ४८ सुमिरण कौ अंग · मूल क्रमांक १३

कबीर सूता क्या करै उठि न रोवै दुक्ख। जाका बासा गोर मैं, सो क्यूँ सोवै सुक्ख॥
कठिन शब्दार्थ

गोर = कब्र; बासा = निवास; दुक्ख = बिछोह का दुःख।

सरल हिंदी अर्थ

जिसे अंततः मिट्टी में लौटना है, वह अनजान निश्चिंतता में क्यों पड़ा है? अपने बिछोह का बोध करके जागे।

भावार्थ और जीवन-संदेश

मृत्यु-स्मरण डराने के लिए नहीं, समय का मूल्य समझाने के लिए है। जीवित रहते प्रेम, सदाचार और आवश्यक जिम्मेदारियाँ निभाएँ।

साखी ४९ सुमिरण कौ अंग · मूल क्रमांक १४

कबीर सूता क्या करै, गुण गोबिंद के गाइ। तेरे सिर परि जम खड़ा, खरच कदे का खाइ॥
कठिन शब्दार्थ

जम = यम, मृत्यु; खरच = उपलब्ध जीवन-पूँजी।

सरल हिंदी अर्थ

गोविंद के गुण गाओ; मृत्यु सिर पर खड़ी है। जो जीवन-पूँजी मिली है, उसे कितने समय तक बिना सदुपयोग खर्च करते रहोगे?

भावार्थ और जीवन-संदेश

मनुष्य को मिला समय बहुमूल्य है। उसे केवल सुविधा में न गँवाकर सीखने, सेवा और आत्मीय संबंधों में भी लगाएँ।

साखी ५० सुमिरण कौ अंग · मूल क्रमांक १५

कबीर सूता क्या करै, सुताँ होइ अकाज। ब्रह्मा का आसण खिस्या, सुणत काल को गाज॥
कठिन शब्दार्थ

अकाज = हानि; आसण = आसन; गाज = गर्जना।

सरल हिंदी अर्थ

असावधानी से जीवन का हित बिगड़ता है। काल की गर्जना सुनकर ब्रह्मा का आसन भी डगमगा जाता है—नश्वरता से कोई पद बचाता नहीं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह काल की व्यापकता की अतिशयोक्ति है। अपने पद और उपलब्धि के बीच नम्र रहें तथा आवश्यक शुभ कार्य आज ही करें।

साखी ५१ सुमिरण कौ अंग · मूल क्रमांक १६

केसो कहि कहि कूकिये, नाँ सोइयै असरार। राति दिवस के कूकणौ, (मत) कबहूँ लगै पुकार॥
कठिन शब्दार्थ

केसो = केशव; असरार = हठ या जड़ता; कूकणौ = पुकारना।

सरल हिंदी अर्थ

केशव को आत्मीय पुकारते रहो और जड़ असावधानी में मत सोओ। दिन-रात की सच्ची पुकार कभी सुन ली जाए—ऐसा भक्त का विश्वास है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

आत्मीय पुकार और नियमितता भक्ति को गहराती है। मन की जड़ता टूटे और स्मरण व्यवहार तक पहुँचे—इसलिए साधक बार-बार अपने प्रिय की ओर ध्यान लौटाता है।

साखी ५२ सुमिरण कौ अंग · मूल क्रमांक १७

जिहि घटि प्रीति न प्रेम रस, फुनि रसना नहीं राम। ते नर इस संसार में, उपजि षये बेकाम॥
कठिन शब्दार्थ

घटि = हृदय में; फुनि = फिर; रसना = जीभ; षये = नष्ट हुए।

सरल हिंदी अर्थ

जिस हृदय में प्रेम नहीं और वाणी में राम-स्मरण नहीं, उसके जीवन को कवि आध्यात्मिक दृष्टि से निष्फल कहते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह प्रेम और जागरूकता की आवश्यकता पर तीखा संत-कथन है। इसे किसी व्यक्ति की मानव-गरिमा घटाने का निर्णय न बनाएँ; अपना जीवन अधिक करुणामय करें।

साखी ५३ सुमिरण कौ अंग · मूल क्रमांक १८

कबीर प्रेम न चाषिया, चषि न लीया साव। सूने घर का पाहुणाँ, ज्यूँ आया त्यूँ जाव॥
कठिन शब्दार्थ

चाषिया = चखा; साव = स्वाद; पाहुणाँ = अतिथि।

सरल हिंदी अर्थ

जिसने प्रेम का स्वाद नहीं जाना, वह सूने घर के अतिथि जैसा है—बिना कुछ पाए आया और चला गया।

भावार्थ और जीवन-संदेश

जीवन की संपन्नता केवल वस्तुओं में नहीं। आत्मीयता, संवेदना और निष्कपट संबंधों से भीतर का खालीपन भरता है।

साखी ५४ सुमिरण कौ अंग · मूल क्रमांक १९

पहली बुरा कमाइ करि, बाँधी विष की पोट। कोटि करम फिल पलक मैं, (जब) आया हरि की वोट॥
कठिन शब्दार्थ

पोट = पोटली; वोट = ओट, शरण।

सरल हिंदी अर्थ

पहले बुरे कर्म करके विष की पोटली बाँध ली थी; हरि की शरण आने पर पुराने बंधन क्षीण होने की आशा जागती है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

पश्चात्ताप का अर्थ जिम्मेदारी से बचना नहीं। गलत काम बंद करें, जहाँ संभव हो सुधार करें और आगे सचेत जीवन अपनाएँ।

साखी ५५ सुमिरण कौ अंग · मूल क्रमांक २०

कोटि क्रम पेलै पलक मैं, जे रंचक आवै नाउँ। अनेक जुग जे पुन्नि करै, नहीं राम बिन ठाउँ॥
कठिन शब्दार्थ

क्रम = कर्म; रंचक = थोड़ा-सा; ठाउँ = ठिकाना।

सरल हिंदी अर्थ

नाम का थोड़ा सच्चा अनुभव भी कर्मबंध की पकड़ ढीली कर सकता है। केवल युगों के बाहरी पुण्यकर्म, भीतर की भक्ति बिना, अंतिम आश्रय नहीं देते।

भावार्थ और जीवन-संदेश

गिनती के साथ भाव और आचरण भी देखें। धार्मिक कर्म के कारण दूसरों पर अधिकार जताना या दोष छिपाना भक्ति का उद्देश्य नहीं।

साखी ५६ सुमिरण कौ अंग · मूल क्रमांक २१

जिहि हरि जैसा जाणियाँ, तिन कूँ तैसा लाभ। ओसों प्यास न भाजई, जब लग धसै न आभ॥
कठिन शब्दार्थ

भाजई = मिटती; आभ = आकाश या मेघ; धसै = भरकर बरसे।

सरल हिंदी अर्थ

जिसने हरि को जितनी गहराई से जाना, उसका लाभ भी वैसा हुआ। जैसे ओस से प्यास नहीं बुझती; भरपूर वर्षा चाहिए।

भावार्थ और जीवन-संदेश

ऊपरी परिचय और गहरी साधना में अंतर है। केवल शब्द याद करने के बजाय नियमित मनन और व्यवहार से समझ को परिपक्व करें।

साखी ५७ सुमिरण कौ अंग · मूल क्रमांक २२

राम पियारा छाड़ि करि, करै आन का जाप। बेस्वाँ केरा पूत ज्यूँ, कहे कौन सूँ बाप॥
कठिन शब्दार्थ

आन = अन्य; बेस्वाँ = पुराना अपमानसूचक शब्द; जाप = स्मरण।

सरल हिंदी अर्थ

कवि एकनिष्ठ आश्रय छोड़कर लगातार भटकने पर कठोर सामाजिक उपमा देते हैं—ऐसी अस्थिरता अपना निश्चित आधार पहचानने नहीं देती।

भावार्थ और जीवन-संदेश

इस उपमा के पुराने अपमानसूचक स्वर को स्वीकार करना आवश्यक नहीं। सकारात्मक संदेश अपनी साधना में स्पष्टता है; किसी स्त्री, बच्चे या दूसरे मत का अपमान नहीं।

साखी ५८ सुमिरण कौ अंग · मूल क्रमांक २३

कबीर आपण राम कहि, औरां राम कहाइ। जिहि मुखि राम न ऊचरे, तिहि मुख फेरि कहाइ॥
कठिन शब्दार्थ

आपण = स्वयं; औरां = दूसरों को; फेरि = फिर से।

सरल हिंदी अर्थ

स्वयं राम का स्मरण करो और दूसरों को भी प्रेम से प्रेरित करो। स्मरण भूल जाएँ तो फिर याद दिलाओ।

भावार्थ और जीवन-संदेश

प्रेरणा आत्मीय हो, दबाव नहीं। किसी की मान्यता का सम्मान रखते हुए अपने अच्छे आचरण से भक्ति का परिचय दें।

साखी ५९ सुमिरण कौ अंग · मूल क्रमांक २४

जैसे माया मन रमै, यूँ जे राम रमाइ। (तौ) तारा मण्डल छाँड़ि करि, जहाँ के सो तहाँ जाइ॥
कठिन शब्दार्थ

माया मन रमै = विषयों में मन डूबता है; तारा मण्डल = ऊँचे लोकों का संकेत।

सरल हिंदी अर्थ

जैसा मन संसार के आकर्षण में रम जाता है, वैसा राम में रम जाए तो साधक सीमित आसक्ति से आगे अपने मूल आध्यात्मिक आश्रय की ओर लौट सकता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

ध्यान की शक्ति नई दिशा पा सकती है। थोड़ा समय नियमित स्मरण और मनन के लिए रखें; संसार का काम करते हुए भीतर संतुलन बनाएँ।

साखी ६० सुमिरण कौ अंग · मूल क्रमांक २५

लूटि सकै तो लूटियो, राम नाम है लूटि। पीछै ही पछिताहुगे, यहु तन जैहै छूटि॥
कठिन शब्दार्थ

लूटि = यहाँ सुलभ अवसर; पीछै = बाद में; तन छूटि = मृत्यु।

सरल हिंदी अर्थ

रामनाम का धन सबके लिए खुला है—जितना ग्रहण कर सकते हो, अभी करो। जीवन बीत जाने पर अवसर छूटने का पछतावा होगा।

भावार्थ और जीवन-संदेश

‘लूट’ उस आध्यात्मिक संपदा की उपमा है जो सबके लिए उपलब्ध है। शुभ अभ्यास को टालने के बजाय आज से सीखने, स्मरण और सदाचार का अवसर ग्रहण करें।

साखी ६१ सुमिरण कौ अंग · मूल क्रमांक २६

लूटि सकै तो लूटियो, राम नाम भण्डार। काल कंठ तै गहैगा, रूंधे दसूँ दुवार॥
कठिन शब्दार्थ

भण्डार = कोष; कंठ तै गहैगा = गला पकड़ लेगा; दसूँ दुवार = देह के द्वार।

सरल हिंदी अर्थ

रामनाम के खुले भंडार से अभी लाभ लो; मृत्यु आने पर देह के कार्य रुक जाएँगे और वर्तमान अवसर समाप्त होगा।

भावार्थ और जीवन-संदेश

काव्य देह को द्वारों वाला घर मानता है। जीवन की चेतना रहते प्रेम और सत्य की साधना करें, केवल अंतिम क्षण पर भरोसा न छोड़ें।

साखी ६२ सुमिरण कौ अंग · मूल क्रमांक २७

लम्बा मारग दूरि घर, विकट पंथ बहु मार। कहौ संतो क्यूँ पाइये, दुर्लभ हरिदीदार॥
कठिन शब्दार्थ

मारग = मार्ग; विकट = कठिन; हरिदीदार = हरि का दर्शन।

सरल हिंदी अर्थ

मंजिल दूर और मार्ग कठिन है, उसमें अनेक बाधाएँ हैं। संतों से प्रश्न है कि दुर्लभ हरिदर्शन कैसे पाया जाए?

भावार्थ और जीवन-संदेश

विनम्र प्रश्न साधना का आरंभ है। कठिनाई स्वीकारकर मार्गदर्शन लें और छोटे नियमित अभ्यास से आगे बढ़ें; केवल अधीर आकांक्षा पर्याप्त नहीं।

साखी ६३ सुमिरण कौ अंग · मूल क्रमांक २८

गुण गाये गुण ना कटै, रटै न राम बियोग। अह निसि हरि ध्यावै नहीं, क्यूँ पावै दुरलभ जोग॥
कठिन शब्दार्थ

गुण = यहाँ बंधनकारी प्रकृति-गुण का भी संकेत; अह निसि = दिन-रात; बियोग = वियोग।

सरल हिंदी अर्थ

केवल गुण गाने या शब्द रटने से वियोग नहीं मिटता। यदि भीतर निरंतर हरि का ध्यान न हो तो गहरा मिलन कैसे होगा?

भावार्थ और जीवन-संदेश

वाणी और अंतःकरण में मेल रखें। यांत्रिक पाठ के साथ अर्थ, प्रेम और एकाग्रता जुड़ें तो अभ्यास अधिक सार्थक होता है।

साखी ६४ सुमिरण कौ अंग · मूल क्रमांक २९

कबीर कठिनाई खरी, सुमिरतां हरि नाम। सूली ऊपरि नट विद्या, गिरूँ तं नाहीं ठाम॥
कठिन शब्दार्थ

खरी = बहुत बड़ी; सूली = ऊँचा नुकीला आधार; नट विद्या = संतुलन का कौशल।

सरल हिंदी अर्थ

सच्चे नाम-स्मरण की सजगता कठिन है—मानो ऊँचे नुकीले आधार पर नट का संतुलन, जहाँ चूकने पर टिकने की जगह नहीं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

कठिन उपमा साधना की सजगता और संतुलन बताती है। मन का भटकना पहचानकर धैर्य से उसे लौटाएँ; एकाग्रता नियमित अभ्यास से विकसित होती है।

साखी ६५ सुमिरण कौ अंग · मूल क्रमांक ३०

कबीर राम ध्याइ लै, जिभ्या सौं करि मंत। हरि साग जिनि बीसरै, छीलर देखि अनंत॥
कठिन शब्दार्थ

मंत = मंत्र या परामर्श; हरि साग = हरि-सागर; छीलर = छोटे जलाशय।

सरल हिंदी अर्थ

राम का ध्यान और वाणी से स्मरण करो। असंख्य छोटे जलाशय देखकर हरि के विशाल सागर को मत भूलो।

भावार्थ और जीवन-संदेश

छोटे आकर्षणों में जीवन का बड़ा उद्देश्य ओझल न होने दें। उपयोगी साधन अपनाएँ, लेकिन उन्हें ही साधना का अंतिम फल न समझें।

साखी ६६ सुमिरण कौ अंग · मूल क्रमांक ३१

कबीर राम रिझाइ लै, मुखि अमृत गुण गाइ। फूटा नग ज्यूँ जोड़ि मन, संधे संधि मिलाइ॥
कठिन शब्दार्थ

नग = रत्न; संधे संधि = जोड़ से जोड़ मिलाकर।

सरल हिंदी अर्थ

मुख से अमृत जैसे गुण गाकर राम को प्रसन्न करो। बिखरे मन को टूटे रत्न की तरह सावधानी से जोड़कर एकाग्र करो।

भावार्थ और जीवन-संदेश

मन की मरम्मत कोमल और नियमित अभ्यास से होती है। ध्यान भटके तो क्रोध न करें; प्रेम से फिर स्मरण और उचित कर्म की ओर लौटें।

साखी ६७ सुमिरण कौ अंग · मूल क्रमांक ३२

कबीर चित्त चमंकिया, चहुँ दिस लागी लाइ। हरि सुमिरण हाथूं घड़ा, बेगे लेहु बुझाइ॥
कठिन शब्दार्थ

चमंकिया = चौंक उठा; लाइ = आग; बेगे = जल्दी।

सरल हिंदी अर्थ

मन चौंक गया है—चारों ओर विकारों की आग लगी है। हाथ में हरि-सुमिरन का घड़ा है; उससे शीघ्र इस भीतर की जलन को शांत करो।

भावार्थ और जीवन-संदेश

लोभ, ईर्ष्या और क्रोध की आग पहचानना पहला कदम है। सुमिरन मन को ठहराव दे और आत्मपरीक्षण के साथ जुड़े, तभी भीतर की शांति आचरण में भी उतरती है।

३. बिरह कौ अंग

परम प्रिय की प्रतीक्षा, मिलन की प्यास और आत्मा की अंतःपुकार। मूल स्थानीय क्रमांक १–४५।

साखी ६८ बिरह कौ अंग · मूल क्रमांक १

रात्यूँ रूँनी बिरहनीं, ज्यूँ बंचौ कूँ कुंज। कबीर अंतर प्रजल्या, प्रगट्या बिरहा पुंज॥
कठिन शब्दार्थ

रात्यूँ = रात में; बिरहनी = विरहिणी; कुंज = क्रौंच पक्षी।

सरल हिंदी अर्थ

विरहिणी रात भर क्रौंच की तरह रोती रही। कबीर के भीतर भी प्रिय से बिछोह की तीव्र ज्वाला प्रकट हुई।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह आत्मा की अपने परम प्रिय के लिए आकुलता है। बाहरी उपलब्धियों के बीच भीतर के अधूरेपन को पहचानना आध्यात्मिक खोज की शुरुआत हो सकता है।

साखी ६९ बिरह कौ अंग · मूल क्रमांक २

अबंर कुँजाँ कुरलियाँ, गरिज भरे सब ताल। जिनि थे गोविंद बीछुटे, तिनके कौण हवाल॥
कठिन शब्दार्थ

कुरलियाँ = करुण स्वर किया; हवाल = दशा।

सरल हिंदी अर्थ

आकाश में क्रौंच पुकारते हैं और बादलों से ताल भरते हैं। जिनका गोविंद से बिछोह है, उनकी दशा कितनी व्याकुल होगी!

भावार्थ और जीवन-संदेश

प्रकृति के विरह-स्वर से भक्त की तड़प व्यक्त हुई है। प्रेम में दूसरे के दुःख को सुनने और अपने भीतर की पुकार समझने की संवेदनशीलता बढ़ती है।

साखी ७० बिरह कौ अंग · मूल क्रमांक ३

चकवी बिछुटी रैणि की, आइ मिली परभाति। जे जन बिछुटे राम सूँ, ते दिन मिले न राति॥
कठिन शब्दार्थ

रैणि = रात; परभाति = सुबह।

सरल हिंदी अर्थ

रात में बिछुड़ी चकवी सुबह अपने साथी से मिल जाती है; राम से बिछुड़े साधक को दिन-रात कहीं चैन नहीं मिलता।

भावार्थ और जीवन-संदेश

लौकिक बिछोह और आध्यात्मिक दूरी का अंतर उपमा से बताया गया है। साधक का लक्ष्य समय काटना नहीं, अपने मूल आश्रय की खोज है।

साखी ७१ बिरह कौ अंग · मूल क्रमांक ४

बासुरि सुख नाँ रैणि सुख, ना सुख सुपिनै माँहि। कबीर बिछुट्या राम सूँ ना सुख धूप न छाँह॥
कठिन शब्दार्थ

बासुरि = दिन में; सुपिनै = स्वप्न में।

सरल हिंदी अर्थ

राम से बिछुड़े कबीर को न दिन में सुख है, न रात में; न स्वप्न में विश्राम है, न धूप-छाँह में।

भावार्थ और जीवन-संदेश

प्रिय की अनुपस्थिति जीवन के हर अनुभव पर छा गई है। यह विरह की काव्यात्मक चरम अवस्था है, जिससे खोज की गहराई समझ आती है।

साखी ७२ बिरह कौ अंग · मूल क्रमांक ५

बिरहनि ऊभी पंथ सिरि, पंथी बूझै धाइ। एक सबद कहि पीव का, कब रे मिलैगे आइ॥
कठिन शब्दार्थ

ऊभी = खड़ी; बूझै = पूछती है; पीव = प्रिय।

सरल हिंदी अर्थ

विरहिणी मार्ग पर खड़ी है। हर यात्री से दौड़कर पूछती है—प्रिय का कोई समाचार कहो, वे मिलने कब आएँगे?

भावार्थ और जीवन-संदेश

साधक हर ओर संकेत खोजता है। सही मार्गदर्शन मिलने की चाह के साथ धैर्य, विवेक और स्वयं साधना करने की तैयारी भी आवश्यक है।

साखी ७३ बिरह कौ अंग · मूल क्रमांक ६

बहुत दिनन की जोवती, बाट तुम्हारी राम। जिव तरसै तुझ मिलन कूँ, मनि नाहीं विश्राम॥
कठिन शब्दार्थ

जोवती = प्रतीक्षा करती; जिव = प्राण।

सरल हिंदी अर्थ

हे राम, बहुत दिनों से तुम्हारा मार्ग देख रही हूँ। मिलने के लिए प्राण तरसते हैं और मन को विश्राम नहीं मिलता।

भावार्थ और जीवन-संदेश

भक्ति में प्रतीक्षा भी आत्मीय संवाद बनती है। अपनी बेचैनी को प्रार्थना, मनन और सदाचार की नियमित दिशा देना उसके भाव को गहरा करता है।

साखी ७४ बिरह कौ अंग · मूल क्रमांक ७

बिरहिन ऊठै भी पड़े, दरसन कारनि राम। मूवाँ पीछे देहुगे, सो दरसन किहिं काम॥
कठिन शब्दार्थ

दरसन कारनि = दर्शन के लिए; मूवाँ = मरने पर।

सरल हिंदी अर्थ

विरहिणी दर्शन की चाह में उठती और गिर पड़ती है। जीवित रहते न मिलकर मृत्यु के बाद मिलने वाले दर्शन से अभी की प्यास कैसे बुझेगी?

भावार्थ और जीवन-संदेश

कबीर अनुभव को अनिश्चित भविष्य पर टालने के विरुद्ध हैं। जागरण का अवसर वर्तमान जीवन है; साधना की शुरुआत अभी करें।

साखी ७५ बिरह कौ अंग · मूल क्रमांक ८

मूवाँ पीछै जिनि मिलै, कहै कबीरा राम। पाथर घाटा लोह सब, (तब) पारस कौंणे काम॥
कठिन शब्दार्थ

घाटा = घिसकर या गलकर नष्ट हुआ; पारस = स्पर्श से लोहा सोना करने की कल्पित मणि।

सरल हिंदी अर्थ

हे राम, मृत्यु के बाद मत मिलना। जब लोहा ही घिसकर समाप्त हो गया, तब पारस मिलने का क्या उपयोग?

भावार्थ और जीवन-संदेश

समय पर मिला सहारा मूल्यवान होता है। अपने जीवन में सत्य, प्रेम और भक्ति को बाद के लिए टालना अवसर खोना है।

साखी ७६ बिरह कौ अंग · मूल क्रमांक ९

अंदेसड़ा न भाजिसी, संदेसो कहियाँ। कै हरि आयां भाजिसी, कै हरि ही पासि गयां॥
कठिन शब्दार्थ

अंदेसड़ा = संशय या चिंता; भाजिसी = मिटेगी।

सरल हिंदी अर्थ

केवल समाचार सुनने से मन की चिंता नहीं मिटेगी। वह प्रिय के आने से या स्वयं उसके पास पहुँचने से ही दूर होगी।

भावार्थ और जीवन-संदेश

दूसरे के अनुभव का वर्णन प्रेरणा देता है, लेकिन अपनी अनुभूति का स्थान नहीं लेता। ज्ञान के साथ व्यक्तिगत मनन और अभ्यास जुड़ें।

साखी ७७ बिरह कौ अंग · मूल क्रमांक १०

आइ न सकौ तुझ पै, सकूँ न तूझ बुझाइ। जियरा यौही लेहुगे, बिरह तपाइ तपाइ॥
कठिन शब्दार्थ

बुझाइ = समझा पाना; जियरा = हृदय या प्राण।

सरल हिंदी अर्थ

मैं तुम्हारे पास आ नहीं पाती, अपना दुःख समझा भी नहीं पाती। क्या विरह में तपाकर मेरे प्राण ऐसे ही ले लोगे?

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह भक्त की आत्मीय उलाहना है। प्रार्थना में केवल प्रशंसा नहीं, अपनी असहायता और अधूरी समझ भी निष्कपट रूप से रखी जा सकती है।

साखी ७८ बिरह कौ अंग · मूल क्रमांक ११

यहु तन जालौं मसि करूँ, ज्यूँ धूवाँ जाइ सरग्गि। मति वै राम दया, करै, बरसि बुझावै अग्गि॥
कठिन शब्दार्थ

मसि = राख या कालिख; सरग्गि = आकाश में; अग्गि = आग।

सरल हिंदी अर्थ

कवि देह को जलकर धुआँ बनने की कल्पना करते हैं, ताकि राम उस धुएँ को देखकर दया की वर्षा से विरह की आग बुझाएँ।

भावार्थ और जीवन-संदेश

देह-दहन की कल्पना प्रेम की अतिशयोक्ति है। उसका भाव है कि भीतर की व्याकुलता प्रिय तक पहुँचे; यह शरीर को हानि पहुँचाने का निर्देश नहीं।

साखी ७९ बिरह कौ अंग · मूल क्रमांक १२

यहु तन जालै मसि करौं, लिखौं राम का नाउँ। लेखणिं करूँ करंक की, लिखि लिखि राम पठाउँ॥
कठिन शब्दार्थ

करंक = अस्थि-पंजर; लेखणि = लेखनी।

सरल हिंदी अर्थ

कवि कल्पना करते हैं कि देह की स्याही और हड्डियों की लेखनी से राम का नाम लिख-लिखकर उन्हें संदेश भेजें।

भावार्थ और जीवन-संदेश

पूरा अस्तित्व प्रार्थना बन जाए—यह उसका आशय है। देह संबंधी तीव्र चित्रों को समर्पण का काव्य-रूपक समझें।

साखी ८० बिरह कौ अंग · मूल क्रमांक १३

कबीर पीर पिरावनीं, पंजर पीड़ न जाइ। एक ज पीड़ परीति की, रही कलेजा छाइ॥
कठिन शब्दार्थ

पीर पिरावनी = तीव्र पीड़ा; पंजर = देह।

सरल हिंदी अर्थ

देह की दूसरी पीड़ाएँ भुला देने वाली प्रेम की एक पीड़ा हृदय पर छा गई है और हटती नहीं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

प्रेम साधक की प्राथमिकता बदल देता है। क्षणिक सुविधा से आगे वह जीवन के गहरे अर्थ और अपने परम आश्रय की खोज करता है।

साखी ८१ बिरह कौ अंग · मूल क्रमांक १४

चोट सताड़ी बिरह की, सब तन जर जर होइ। मारणहारा जाँणिहै, कै जिहिं लागी सोइ॥
कठिन शब्दार्थ

सताड़ी = सताने वाली; जरजर = व्याकुल या जीर्ण।

सरल हिंदी अर्थ

विरह की चोट से पूरा तन व्याकुल है। उसकी गहराई या तो चोट देने वाला प्रिय जानता है या उसे सहने वाला।

भावार्थ और जीवन-संदेश

भीतर की अनुभूति हमेशा बाहर से समझ नहीं आती। किसी के दुःख को छोटा मानने के बजाय सहानुभूति और विनम्रता रखें।

साखी ८२ बिरह कौ अंग · मूल क्रमांक १५

कर कमाण सर साँधि करि, खैचि जू मार्‌या माँहि। भीतरि भिद्या सुमार ह्नै जीवै कि जीवै नाँहि॥
कठिन शब्दार्थ

सर = बाण; सुमार = अच्छा या मर्मस्थ प्रभाव।

सरल हिंदी अर्थ

प्रिय ने धनुष पर बाण चढ़ाकर भीतर ऐसा साधा है कि हृदय घायल है; साधक मानो जीवन और मृत्यु के बीच ठहरा है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

बाण प्रेम की पैठ का रूपक है। जो सत्य भीतर तक छूता है, वह पुरानी निश्चितताओं को हिलाकर जीवन की दिशा बदल सकता है।

साखी ८३ बिरह कौ अंग · मूल क्रमांक १६

जबहूँ मार्‌या खैंचि करि, तब मैं पाई जाँणि। लांगी चोट मरम्म की, गई कलेजा जाँणि॥
कठिन शब्दार्थ

मरम्म = मर्म; जाँणि = जानना या प्राण का संकेत।

सरल हिंदी अर्थ

जब वह बाण खींचकर लगा, तभी उसके प्रभाव को पहचाना। चोट मर्म पर लगी और हृदय की गहराई तक उतर गई।

भावार्थ और जीवन-संदेश

अनुभव से मिली समझ केवल सुने हुए ज्ञान से अलग होती है। अपनी प्रतिक्रिया को देखना और परिवर्तन स्वीकारना साधना का हिस्सा है।

साखी ८४ बिरह कौ अंग · मूल क्रमांक १७

जिहि सर मारी काल्हि सो सर मेरे मन बस्या। तिहि सरि अजहूँ मारि, सर बिन सच पाऊँ नहीं॥
कठिन शब्दार्थ

काल्हि = कल; सरि = उसी बाण से।

सरल हिंदी अर्थ

कल जिस बाण ने मुझे बेधा, वही मन में बसा है। उसी से फिर बेधो; उसके बिना मैं सत्य नहीं पा सकता।

भावार्थ और जीवन-संदेश

साधक उस जागृति को फिर चाहता है जिसने मोह की नींद तोड़ी। यह आध्यात्मिक स्पर्श की याचना है, शारीरिक चोट की नहीं।

साखी ८५ बिरह कौ अंग · मूल क्रमांक १८

बिरह भुवंगम तन बसै, मंत्रा न लागै कोइ। राम बियोगी ना जिवै, जिवै त बीरा होइ॥
कठिन शब्दार्थ

भुवंगम = सर्प; बीरा = बावला या व्याकुल।

सरल हिंदी अर्थ

विरह सर्प की तरह भीतर बस गया है; कोई मंत्र उसकी व्यथा नहीं मिटाता। राम-वियोगी जीता भी है तो व्याकुल रहता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

जिस कमी का संबंध भीतर के प्रेम से है, उसे सतही उपाय नहीं भरते। काव्य का सर्प उस गहरी बेचैनी का प्रतीक है।

साखी ८६ बिरह कौ अंग · मूल क्रमांक १९

बिरह भुवंगम पैसि करि, किया कलेजै घाव। साधू अंग न मोड़ही, ज्यूँ भावै त्यूँ खाव॥
कठिन शब्दार्थ

पैसि = प्रवेश करके; मोड़ही = हटाता।

सरल हिंदी अर्थ

विरह-सर्प ने भीतर आकर हृदय में घाव किया है। साधक उससे अंग नहीं बचाता; वह प्रेम की इस कसौटी को स्वीकार करता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह समर्पण की तीव्र छवि है। भाव है कि सत्य की खोज में असुविधाजनक आत्मपरीक्षण से भी न भागें।

साखी ८७ बिरह कौ अंग · मूल क्रमांक २०

सब रग तंत रबाब तन, बिरह बजावै नित्त। और न कोई सुणि सकै, कै साई के चित्त॥
कठिन शब्दार्थ

तंत = तार; रबाब = तार वाला वाद्य; साई = स्वामी।

सरल हिंदी अर्थ

देह रबाब बन गई है, नसें उसके तार हैं और विरह उन्हें निरंतर बजाता है। वह संगीत साधक या उसका स्वामी ही समझता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

अंतरंग अनुभूति सूक्ष्म होती है। दूसरों के अनुभव पर अधिकार जताने के बजाय अपने भीतर की सजग सुनवाई विकसित करें।

साखी ८८ बिरह कौ अंग · मूल क्रमांक २१

बिरहा बिरहा जिनि कहौ, बिरहा है सुलितान। जिह घटि बिरह न संचरै, सो घट सदा मसान॥
कठिन शब्दार्थ

सुलितान = सम्राट; मसान = श्मशान।

सरल हिंदी अर्थ

विरह को साधारण मत समझो; वह अनुभवों का सम्राट है। जिस हृदय में उसकी चाह नहीं जागती, कवि उसे निर्जीव श्मशान जैसा कहते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

परम सत्य की प्यास मनुष्य को भीतर से जगाती है। तीखी उपमा प्रेम-विहीन जड़ता पर है, किसी व्यक्ति की गरिमा पर निर्णय नहीं।

साखी ८९ बिरह कौ अंग · मूल क्रमांक २२

अंषड़ियाँ झाई पड़ी, पंथ निहारि निहारि। जीभड़ियाँ छाला पड़्या, राम पुकारि पुकारि॥
कठिन शब्दार्थ

अंषड़ियाँ = आँखें; पंथ = रास्ता; जीभड़ियाँ = जीभ।

सरल हिंदी अर्थ

रास्ता देखते-देखते आँखों पर झाईं पड़ गई और राम को पुकारते-पुकारते जीभ पर छाले पड़ गए।

भावार्थ और जीवन-संदेश

प्रतीक्षा और पुकार की अतिशयोक्ति भक्त की अखंड चाह दिखाती है। धैर्यपूर्ण प्रेम में बाहरी दिखावे से अधिक भीतर की निरंतरता महत्त्व रखती है।

साखी ९० बिरह कौ अंग · मूल क्रमांक २३

इस तन का दीवा करौं, बाती मेल्यूँ जीव। लोही सींचौ तेल ज्यूँ, कब मुख देखौं पीव॥
कठिन शब्दार्थ

लोही = रक्त; पीव = प्रिय; मेल्यूँ = रखूँ।

सरल हिंदी अर्थ

कवि तन को दीपक, जीवन को बाती और रक्त को तेल बनाकर प्रिय का मुख देखने की उत्कट इच्छा कहते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

अपने संपूर्ण अस्तित्व को प्रेम में प्रकाशित करना इस दीपक-रूपक का आशय है। इसकी शारीरिक कल्पना को वास्तविक क्रिया न समझें।

साखी ९१ बिरह कौ अंग · मूल क्रमांक २४

नैंना नीझर लाइया, रहट बहै निस जाम। पपीहा ज्यूँ पिव पिव करौं, कबरू मिलहुगे राम॥
कठिन शब्दार्थ

नीझर = झरना; रहट = पानी निकालने का चक्र; निस जाम = रात के पहर।

सरल हिंदी अर्थ

आँखों में आँसुओं का झरना है, जो रहट जैसा निरंतर चलता है। पपीहे की तरह प्रिय को पुकारता हूँ—हे राम, कब मिलोगे?

भावार्थ और जीवन-संदेश

प्रकृति और दैनिक जीवन की उपमाएँ विरह को निकट लाती हैं। सच्ची प्रार्थना शब्दों से अधिक हृदय की निरंतर दिशा में होती है।

साखी ९२ बिरह कौ अंग · मूल क्रमांक २५

अंषड़िया प्रेम कसाइयाँ, लोग जाँणे दुखड़ियाँ। साँई अपणैं कारणै, रोइ रोइ रतड़िया॥
कठिन शब्दार्थ

कसाइयाँ = प्रेम से कसकती; रतड़िया = लाल हो गईं।

सरल हिंदी अर्थ

प्रेम में रोती आँखों को लोग रोगग्रस्त समझते हैं; वे तो अपने स्वामी की याद में रो-रोकर लाल हुई हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

भीतर का कारण बाहरी रूप से हमेशा नहीं पहचाना जाता। भक्त के अनुभव को संवेदना से पढ़ें और जल्दबाजी में निर्णय न करें।

साखी ९३ बिरह कौ अंग · मूल क्रमांक २६

सोई आँसू सजणाँ, सोई लोक बिड़ाँहि। जे लोइण लोंहीं चुवै, तौ जाँणों हेत हियाँहि॥
कठिन शब्दार्थ

लोइण = आँखें; हेत = प्रेम; हियाँहि = हृदय में।

सरल हिंदी अर्थ

सामान्य आँसू दुनिया भी बहाती है; कवि रक्त जैसे गहरे आँसू की अतिशयोक्ति से हृदय के सच्चे प्रेम की पहचान बताते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

प्रेम की प्रामाणिकता केवल आँसू दिखाने से सिद्ध नहीं होती। उसका वास्तविक माप भीतर की निष्ठा और व्यवहार की संवेदनशीलता है।

साखी ९४ बिरह कौ अंग · मूल क्रमांक २७

कबीर हसणाँ दूरि करि, करि रोवण सौं चित्त। बिन रोयाँ क्यूँ पाइये, प्रेम पियारा मित्त॥
कठिन शब्दार्थ

रोवण = रोना; मित्त = मित्र या प्रिय।

सरल हिंदी अर्थ

कबीर कहते हैं कि केवल हँसी-मनोरंजन में न डूबो; प्रिय को पाने की गंभीर तड़प के बिना गहरा प्रेम कैसे मिलेगा?

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह दुःख को लक्ष्य बनाने की बात नहीं। सतही मनबहलाव से आगे आत्मपरीक्षण और अपने प्रिय लक्ष्य के प्रति गंभीरता आवश्यक है।

साखी ९५ बिरह कौ अंग · मूल क्रमांक २८

जौ रोऊँ तो बल घटे, हँसौं तो राम रिसाइ। मनही माँहि बिसूरणाँ, ज्यूँ घुंण काठहि खाइ॥
कठिन शब्दार्थ

रिसाइ = रुष्ट हो; बिसूरणाँ = भीतर व्यथा करना; घुंण = घुन।

सरल हिंदी अर्थ

रोने से बल घटता है, हँसने पर प्रिय की उपेक्षा का भय है। इसलिए भीतर ही विरह ऐसे लगता है जैसे घुन लकड़ी को खाता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह प्रेम की दुविधा का मार्मिक चित्र है। मन की सच्ची व्यथा को पहचानना उसके प्रदर्शन से अधिक महत्त्वपूर्ण है।

साखी ९६ बिरह कौ अंग · मूल क्रमांक २९

हंसि हंसि कंत न पाइए, जिनि पाया तिनि रोइ। जो हाँसेही हरि मिलै, तो नहीं दुहागनि कोइ॥
कठिन शब्दार्थ

कंत = प्रियतम; दुहागनि = वियोगिनी।

सरल हिंदी अर्थ

प्रिय केवल हँसी-खेल से नहीं मिलता; उसे पाने वालों ने गहरी तड़प सही है। सहज मनोरंजन से मिल जाता तो कोई वियोगिनी न रहती।

भावार्थ और जीवन-संदेश

आध्यात्मिक खोज में लगन और परिश्रम चाहिए। उपमा की शिक्षा गंभीर साधना है, सामान्य प्रसन्नता छोड़ देना नहीं।

साखी ९७ बिरह कौ अंग · मूल क्रमांक ३०

हाँसी खेलौ हरि मिलै, तौ कौण सहे षरसान। काम क्रोध त्रिष्णाँ तजै, ताहि मिलैं भगवान॥
कठिन शब्दार्थ

षरसान = कठिन कसौटी; त्रिष्णाँ = तृष्णा।

सरल हिंदी अर्थ

यदि भगवान केवल हँसी-खेल में मिलते, तो कठिन कसौटी कौन सहता? काम, क्रोध और तृष्णा छोड़ने वाले उन्हें पाते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

भक्ति का आग्रह आचरण-सुधार पर है। भावुकता के साथ वासनाओं, क्रोध और लालसा की पकड़ घटाना भी आवश्यक है।

साखी ९८ बिरह कौ अंग · मूल क्रमांक ३१

पूत पियारो पिता कौं, गौंहनि लागा धाइ। लोभ मिठाई हाथ दे, आपण गया भुलाइ॥
कठिन शब्दार्थ

पूत = पुत्र; गौंहनि = गले लगने; लोभ = आकर्षक प्रलोभन।

सरल हिंदी अर्थ

प्रिय पुत्र पिता से मिलने दौड़ा, पर पिता ने हाथ में मिठाई दे दी और वह मिठाई में उलझकर पिता को भूल गया।

भावार्थ और जीवन-संदेश

आत्मा परम आश्रय को खोजती है, पर आकर्षणों में मूल लक्ष्य भूल सकती है। साधन और अंतिम उद्देश्य का अंतर पहचानें।

साखी ९९ बिरह कौ अंग · मूल क्रमांक ३२

डारि खाँड़ पटकि करि, अंतरि रोस उपाइ। रोवत रोवत मिलि गया, पिता पियारे जाइ॥
कठिन शब्दार्थ

खाँड़ = मिठाई; रोस = असंतोष।

सरल हिंदी अर्थ

बालक ने मिठाई फेंक दी और उस बहलावे से असंतुष्ट होकर रोता हुआ अपने प्यारे पिता से जा मिला।

भावार्थ और जीवन-संदेश

वस्तुएँ संबंध का स्थान नहीं ले सकतीं। जब लक्ष्य स्पष्ट होता है, मन असली आत्मीयता के लिए छोटे आकर्षण छोड़ सकता है।

साखी १०० बिरह कौ अंग · मूल क्रमांक ३३

नैना अंतरि आचरूँ, निस दिन निरषौं तोहि। कब हरि दरसन देहुगे सो दिन आवै मोंहि॥
कठिन शब्दार्थ

आचरूँ = भीतर अंकित करूँ; निरषौं = देखूँ।

सरल हिंदी अर्थ

प्रिय को आँखों के भीतर बसाकर दिन-रात देखना चाहता हूँ। हे हरि, दर्शन का वह दिन मुझे कब मिलेगा?

भावार्थ और जीवन-संदेश

मन में प्रिय की स्मृति को स्थिर करना साधना का केंद्र है। निरंतरता का अर्थ हर काम के बीच अपने मूल मूल्य याद रखना भी है।

पाठ-टिप्पणी: वेब-पाठ में इससे पहले जुड़ी अतिरिक्त अर्धपंक्ति मुद्रित ग्रंथ की वैकल्पिक प्रति-टिप्पणी से है; मुख्य क्रमांक ३३ की साखी यहाँ अलग रखी गई है।

साखी १०१ बिरह कौ अंग · मूल क्रमांक ३४

कबीर देखत दिन गया, निस भी देखत जाइ। बिरहणि पीव पावे नहीं, जियरा तलपै भाइ॥
कठिन शब्दार्थ

तलपै = तड़पता; निस = रात।

सरल हिंदी अर्थ

देखते-देखते दिन बीता, रात भी बीत रही है; विरहिणी को प्रिय नहीं मिलता और हृदय तड़पता रहता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

समय का बीतना खोज की गहराई दिखाता है। अधीरता में भटकने के बजाय धैर्य और सही अभ्यास का सहारा लें।

साखी १०२ बिरह कौ अंग · मूल क्रमांक ३५

कै बिरहनि कूं मींच दे, कै आपा दिखलाइ। आठ पहर का दाझणां, मोपै सह्या न जाइ॥
कठिन शब्दार्थ

मींच = मृत्यु; दाझणां = जलन।

सरल हिंदी अर्थ

विरहिणी प्रिय से कहती है—या दर्शन दो या यह असह्य विरह समाप्त करो; आठों पहर की जलन मुझसे नहीं सही जाती।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह वियोग की चरम काव्यात्मक पुकार है। इसका भाव मिलन की उत्कट आकांक्षा है; जीवन समाप्त करना इसकी व्यावहारिक शिक्षा नहीं।

साखी १०३ बिरह कौ अंग · मूल क्रमांक ३६

बिरहणि थी तो क्यूँ रही, जली न पीव के नालि। रहु रहु मुगध गहेलड़ी, प्रेम न लाजूँ मारि॥
कठिन शब्दार्थ

नालि = साथ; मुगध = भोली; गहेलड़ी = प्रेम में डूबी।

सरल हिंदी अर्थ

विरहिणी से प्रश्न है कि प्रिय के बिना जीती कैसे हो। फिर स्वयं को सँभालती है—हे भोली, धैर्य रखो और प्रेम को लज्जित न करो।

भावार्थ और जीवन-संदेश

प्रेम की परीक्षा केवल व्यथा में नहीं, धैर्य में भी है। भीतर की पीड़ा के बीच निष्ठा और संतुलन बनाए रखना उसका परिपक्व रूप है।

साखी १०४ बिरह कौ अंग · मूल क्रमांक ३७

हौं बिरहा की लाकड़ी, समझि समझि धूंधाउँ। छूटि पड़ौं यों बिरह तें, जे सारीही जलि जाउँ॥
कठिन शब्दार्थ

लाकड़ी = लकड़ी; धूंधाउँ = सुलगती हूँ।

सरल हिंदी अर्थ

मैं विरह की लकड़ी हूँ, जो धीरे-धीरे सुलगती है। पूरी जल जाऊँ तो शायद इस अधूरे दाह से छूटूँ।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह अपूर्ण समर्पण की बेचैनी का रूपक है। अहं की पकड़ पूरी छूटने की आकांक्षा को देह-दहन की वास्तविक इच्छा न समझें।

साखी १०५ बिरह कौ अंग · मूल क्रमांक ३८

कबीर तन मन यों जल्या, बिरह अगनि सूँ लागि। मृतक पीड़ न जाँणई, जाँणैगि यहूँ आगि॥
कठिन शब्दार्थ

मृतक = संवेदनहीन; बिरह अगनि = प्रेम-वियोग की आग।

सरल हिंदी अर्थ

विरह की आग से तन-मन जल उठा है। निष्प्राण व्यक्ति उसकी पीड़ा नहीं जान सकता; इसे अनुभव करने वाला ही समझेगा।

भावार्थ और जीवन-संदेश

जीवंत आध्यात्मिक अनुभव बाहर से पूरी तरह नहीं मापा जा सकता। संवेदनशीलता और विनम्र सुनवाई दूसरों को समझने में सहायक हैं।

साखी १०६ बिरह कौ अंग · मूल क्रमांक ३९

बिरह जलाई मैं जलौं, जलती जल हरि जाउँ। मो देख्याँ जल हरि जलै, संतौं कहीं बुझाउँ॥
कठिन शब्दार्थ

जल हरि = जलाशय; बुझाउँ = शांत करूँ।

सरल हिंदी अर्थ

विरह में जलती मैं जलाशय तक जाऊँ, तो मेरी ज्वाला से पानी भी जलता प्रतीत होता है। संतों से पूछती हूँ—इसे कहाँ बुझाऊँ?

भावार्थ और जीवन-संदेश

बाहरी शीतलता भीतर की अधूरी चाह नहीं मिटाती। यह अतिशयोक्ति मन की गहरी खोज और उसके उचित मार्गदर्शन की जरूरत बताती है।

साखी १०७ बिरह कौ अंग · मूल क्रमांक ४०

परबति परबति में फिर्‌या, नैन गँवाये रोइ। सो बूटी पाऊँ नहीं, जातें जीवनि होइ॥
कठिन शब्दार्थ

परबति = पहाड़; बूटी = जीवनदायी औषधि।

सरल हिंदी अर्थ

मैं पर्वत-पर्वत भटका और रोते-रोते आँखें थक गईं, पर वह बूटी नहीं मिली जिससे जीवन का वास्तविक संतोष मिले।

भावार्थ और जीवन-संदेश

केवल स्थान बदलने से भीतर की खोज पूरी नहीं होती। विवेकपूर्ण मार्गदर्शन और अंतर्मुख अभ्यास की ओर लौटना आवश्यक है।

साखी १०८ बिरह कौ अंग · मूल क्रमांक ४१

फाड़ि फुटोला धज करौं, कामलड़ी पहिराउँ। जिहि जिहिं भेषा हरि मिलैं, सोइ सोइ भेष कराउँ॥
कठिन शब्दार्थ

फुटोला = वस्त्र; कामलड़ी = कंबल; भेष = वेश।

सरल हिंदी अर्थ

मैं वस्त्र फाड़कर ध्वजा बना दूँ, कंबल पहनूँ—जिस भी रूप में हरि मिलें, वह रूप अपनाने को तैयार हूँ।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह प्रिय के लिए तत्परता है। आगे का विवेक यह है कि बाहरी वेश से अधिक अंतःकरण की सच्चाई और आचरण को महत्त्व दें।

साखी १०९ बिरह कौ अंग · मूल क्रमांक ४२

नैन हमारे जलि गये, छिन छिन लोड़ै तुझ। नां तूं मिलै न मैं खुसी, ऐसी बेदन मुझ॥
कठिन शब्दार्थ

लोड़ै = खोजती हैं; बेदन = वेदना।

सरल हिंदी अर्थ

आँखें हर क्षण तुम्हें खोजते-खोजते थक गईं। न तुम मिलते हो, न मुझे प्रसन्नता मिलती है—यह मेरी व्यथा है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

प्रार्थना में अपनी अधूरी स्थिति को सच कहना भी आत्मीयता है। मन की गहरी चाह को सतही उपलब्धियों से दबाने के बजाय समझें।

साखी ११० बिरह कौ अंग · मूल क्रमांक ४३

भेला पाया श्रम सों, भौसागर के माँह। जो छाँड़ौ तौ डूबिहौ, गहौं त डसिये बाँह॥
कठिन शब्दार्थ

भेला = बेड़ा; भौसागर = संसार-सागर; डसिये = डसती है।

सरल हिंदी अर्थ

संसार-सागर में कठिनाई से बेड़ा मिला, पर छोड़ूँ तो डूबने का डर है और पकड़ूँ तो बाँह को डसता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह साधक की उलझन का चित्र है। हर आश्रय पर आँख मूँदकर निर्भर होने के बजाय उसकी वास्तविक उपयोगिता और दोष पहचानें।

साखी १११ बिरह कौ अंग · मूल क्रमांक ४४

रैणा दूर बिछोहिया, रह रे संषम झूरि। देवलि देवलि धाहड़ी, देखी ऊगै सूरि॥
कठिन शब्दार्थ

रैणा = रात; संषम = शंख; देवलि = मंदिर पर।

सरल हिंदी अर्थ

रात में समुद्र से बिछुड़ा शंख मंदिर-मंदिर पुकारता है और सूर्योदय देखता है; फिर भी अपने मूल से दूरी बनी है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

ऊँचा स्थान और सार्वजनिक प्रतिष्ठा मूल आत्मीयता की कमी नहीं भरते। बाहरी सम्मान के बीच भीतर के संबंध को न भूलें।

साखी ११२ बिरह कौ अंग · मूल क्रमांक ४५

सुखिया सब संसार है, खाये अरु सोवै। दुखिया दास कबीर है, जागे अरु रोवै॥
कठिन शब्दार्थ

सुखिया = अपने को सुखी मानने वाला; जागे = सजग रहता।

सरल हिंदी अर्थ

दुनिया खाकर और सोकर अपने को सुखी मानती है; कबीर जागते हैं और भीतर की स्थिति पर व्याकुल होते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह सामान्य भोजन या नींद की आलोचना नहीं। दूसरों की बेफिक्री के बीच साधक जीवन के गहरे प्रश्नों और जगत के दुःख के प्रति जागता है।

४. ग्यान बिरह कौ अंग

ज्ञान की अग्नि में मोह का परिवर्तन और साधना की उलटबाँसियाँ। मूल स्थानीय क्रमांक १–१०।

साखी ११३ ग्यान बिरह कौ अंग · मूल क्रमांक १

दीपक पावक आंणिया, तेल भी आंण्या संग। तीन्यूं मिलि करि जोइया, (तब) उड़ि उड़ि पड़ैं पतंग॥
कठिन शब्दार्थ

पावक = आग; जोइया = प्रज्वलित किया; पतंग = कीट।

सरल हिंदी अर्थ

दीपक, अग्नि और तेल मिलने पर प्रकाश हुआ; उसकी ओर पतंगे उड़-उड़कर गिरते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

ज्ञान, प्रेम और साधना का संग अंतर्ज्योति जगाता है। उस प्रकाश में मोह की पतंगवत वृत्तियाँ अपने आधार खोती हैं।

साखी ११४ ग्यान बिरह कौ अंग · मूल क्रमांक २

मार्‌या है जे मरेगा, बिन सर थोथी भालि। पड्या पुकारे ब्रिछ तरि, आजि मरै कै काल्हि॥
कठिन शब्दार्थ

सर = बाण; थोथी = खोखली; भालि = बाण की नोक या चोट।

सरल हिंदी अर्थ

सच्चे बाण से बेधा व्यक्ति उसके प्रभाव से बच नहीं सकता; बिना बाण की चोट का दावा खोखला है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

कबीर अनुभव की प्रामाणिकता पर जोर देते हैं। ज्ञान की चर्चा से अधिक देखें कि भीतर सचमुच कोई परिवर्तन हुआ है या नहीं।

साखी ११५ ग्यान बिरह कौ अंग · मूल क्रमांक ३

हिरदा भीतरि दौ बलै, धूंवां प्रगट न होइ। जाके लागी सो लखे, के जिहि लाई सोइ॥
कठिन शब्दार्थ

दौ = दावानल; लखे = पहचानता।

सरल हिंदी अर्थ

हृदय के भीतर आग जलती है, पर बाहर धुआँ नहीं दिखता। उसे वही जानता है जिसे लगी है या जिसने लगाई है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

आंतरिक परिवर्तन और व्यथा हमेशा बाहरी संकेत नहीं देते। दूसरों के अनुभव का सम्मान करें और अपनी स्थिति को ईमानदारी से पहचानें।

साखी ११६ ग्यान बिरह कौ अंग · मूल क्रमांक ४

झल उठा झोली जली, खपरा फूटिम फूटि। जोगी था सो रमि गया, आसणि रही बिभूत॥
कठिन शब्दार्थ

झोली = साधु की थैली; खपरा = भिक्षापात्र; बिभूत = राख।

सरल हिंदी अर्थ

ज्ञान की ज्वाला उठी, झोली जल गई और भिक्षापात्र टूट गया। योगी भीतर रम गया; आसन पर केवल राख रह गई।

भावार्थ और जीवन-संदेश

बाहरी साधन अंतिम लक्ष्य नहीं। सच्चा बोध आते ही वेश और संग्रह के प्रति पहचान की पकड़ ढीली होती है।

साखी ११७ ग्यान बिरह कौ अंग · मूल क्रमांक ५

अगनि जू लागि नीर में, कंदू जलिया झारि। उतर दषिण के पंडिता, रहे विचारि बिचारि॥
कठिन शब्दार्थ

कंदू = कीचड़ या तल का मैल; झारि = पूरी तरह।

सरल हिंदी अर्थ

पानी में ऐसी आग लगी कि तल का मैल भी जल गया। उत्तर-दक्षिण के पंडित इस उलट बात का अर्थ सोचते रह गए।

भावार्थ और जीवन-संदेश

विरोधी चित्र भीतर की ज्ञानाग्नि का संकेत है। शांति के भीतर छिपी आसक्ति मिटना अनुभव का विषय है, केवल शब्द-विवाद का नहीं।

साखी ११८ ग्यान बिरह कौ अंग · मूल क्रमांक ६

दौं लागी साइर जल्या, पंषी बैठे आइ। दाधी देह न पालवै सतगुर गया लगाइ॥
कठिन शब्दार्थ

साइर = समुद्र; दाधी = जली हुई; पालवै = टिक पाती।

सरल हिंदी अर्थ

समुद्र में दावानल लगा, पक्षी आ बैठे; सद्गुरु की लगाई ज्वाला से पुरानी देह-दृष्टि टिक नहीं पाती।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह साधना की उलटबाँसी है। ज्ञान के प्रभाव से मन के पुराने आश्रय और अहं की संरचनाएँ बदलती हैं।

साखी ११९ ग्यान बिरह कौ अंग · मूल क्रमांक ७

गुर दाधा चेल्या जल्या, बिरहा लागी आगि। तिणका बपुड़ा ऊबर्‌या, गलि पूरे के लागि॥
कठिन शब्दार्थ

दाधा = जलाया; तिणका = तिनका; पूरे = पूर्ण परम तत्त्व।

सरल हिंदी अर्थ

गुरु ने ज्ञान की अग्नि जगाई और शिष्य विरह में तपा। पूर्ण सत्ता से लिपटकर नम्र तिनके जैसा साधक बच गया।

भावार्थ और जीवन-संदेश

अहं की कठोरता के बदले विनय और सत्य का सहारा काम आता है। आध्यात्मिक परिवर्तन का आधार यही आत्मीय समर्पण है।

साखी १२० ग्यान बिरह कौ अंग · मूल क्रमांक ८

आहेड़ी दौ लाइया, मृग पुकारै रोइ। जा बन में क्रीला करी, दाझत है बन सोइ॥
कठिन शब्दार्थ

आहेड़ी = शिकारी; क्रीला = खेल; दाझत = जलता।

सरल हिंदी अर्थ

शिकारी ने जंगल में आग लगा दी; जिस वन में मृग खेलता था, वही अब जल रहा है और वह पुकारता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

मन के पुराने भोग-वन में जागृति आने पर उसकी आदतें अस्थिर होती हैं। रूपक भीतर के मोह से निकलने की कठिन घड़ी दिखाता है।

साखी १२१ ग्यान बिरह कौ अंग · मूल क्रमांक ९

पाणी मांहे प्रजली, भई अप्रबल आगि। बहती सलिता रहि गई, मेछ रहे जल त्यागि॥
कठिन शब्दार्थ

प्रजली = जल उठी; सलिता = नदी; मेछ = मछलियाँ।

सरल हिंदी अर्थ

पानी में प्रबल आग लगी, नदी का बहाव थम गया और मछलियों ने जल छोड़ दिया।

भावार्थ और जीवन-संदेश

उलटबाँसी सामान्य अनुभूति से अलग स्थिति कहती है। ज्ञान से चित्त की विषय-दौड़ थमती है और उसकी आश्रित वृत्तियाँ रूप बदलती हैं।

साखी १२२ ग्यान बिरह कौ अंग · मूल क्रमांक १०

समंदर लागी आगि, नदियां जलि कोइला भई। देखि कबीरा जागि, मंछी रूषां चढ़ि गई॥
कठिन शब्दार्थ

रूषां = वृक्षों पर; जागि = जागकर।

सरल हिंदी अर्थ

समुद्र में आग लगी, नदियाँ कोयला हुईं और मछलियाँ पेड़ों पर चढ़ गईं—कबीर जागकर यह उलटा दृश्य देखते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

असंभव प्राकृतिक चित्र आत्मिक परिवर्तन के संकेत हैं। उनका आशय भीतर की जागृति है; उन्हें वास्तविक भूगोल या घटना का विवरण न मानें।

५. परचा कौ अंग

अंतर्ज्योति, एकत्व, गुरु-सहायता और अनुभव का परिचय। मूल स्थानीय क्रमांक १–४८।

साखी १२३ परचा कौ अंग · मूल क्रमांक १

कबीर तेज अनंत का, मानी ऊगी सूरज सेणि। पति संगि जागी सूंदरी, कौतिग दीठा तेणि॥
कठिन शब्दार्थ

सेणि = पंक्ति; कौतिग = आश्चर्य; तेणि = उसने।

सरल हिंदी अर्थ

अनंत का प्रकाश मानो सूर्य-पंक्तियों जैसा उदित हुआ। प्रिय के साथ जागी आत्मारूपी सुंदरी ने अद्भुत दृश्य देखा।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह अंतर्बोध की दीप्ति का काव्य है। प्रेम और सजगता मिलकर जीवन को देखने की दृष्टि बदल देते हैं।

साखी १२४ परचा कौ अंग · मूल क्रमांक २

कोतिग दीठा देह बिन, मसि बिना उजास। साहिब सेवा मांहि है, बेपरवांही दास॥
कठिन शब्दार्थ

उजास = प्रकाश; बेपरवांही = सांसारिक चिंता से मुक्त।

सरल हिंदी अर्थ

देह से परे अद्भुत प्रकाश का अनुभव हुआ। स्वामी की सेवा में रमा भक्त बाहरी चिंताओं की पकड़ से मुक्त है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

अनुभव का केंद्र प्रदर्शन नहीं, आत्मीय सेवा है। भीतर के भरोसे से व्यर्थ चिंता घटे और व्यवहार में सहजता आए।

साखी १२५ परचा कौ अंग · मूल क्रमांक ३

पारब्रह्म के तेज का, कैसा है उनमान। कहिबे कूं सोभा नहीं, देख्याही परवान॥
कठिन शब्दार्थ

उनमान = तुलना या अनुमान; परवान = प्रमाण।

सरल हिंदी अर्थ

परब्रह्म के तेज की तुलना किससे करें? उसका ठीक वर्णन शब्दों से नहीं होता; प्रत्यक्ष अनुभूति ही उसका प्रमाण है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

आध्यात्मिक भाषा की सीमा पहचानना विनय है। वर्णन को अनुभव का विकल्प न मानकर मनन और साधना की ओर बढ़ें।

साखी १२६ परचा कौ अंग · मूल क्रमांक ४

अगम अगोचर गमि नहीं, तहां जगमगै जोति। जहाँ कबीरा बंदिगी, ‘तहां’ पाप पुन्य नहीं छोति॥
कठिन शब्दार्थ

अगोचर = इंद्रियों से परे; छोति = स्पर्श या बंधन।

सरल हिंदी अर्थ

जहाँ इंद्रिय और कल्पना की पहुँच नहीं, वहाँ ज्योति है। उस साधना-अवस्था को कबीर पाप-पुण्य की गणना से परे कहते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह अहंरहित अनुभूति का कथन है। इसे नैतिक जिम्मेदारी से छूट न समझें; व्यवहार में सत्य और करुणा आवश्यक बने रहते हैं।

साखी १२७ परचा कौ अंग · मूल क्रमांक ५

हदे छाड़ि बेहदि गया, हुवा निरंतर बास। कवल ज फूल्या फूल बिन, को निरषै निज दास॥
कठिन शब्दार्थ

हद = सीमा; बेहद = असीमता; कवल = कमल।

सरल हिंदी अर्थ

सीमा छोड़ असीम में निरंतर निवास हुआ। वहाँ साधारण फूल के बिना खिले कमल जैसे अद्भुत अनुभव को विरला साधक देखता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

कमल अंतःचेतना के विकास का प्रतीक है। बाहरी सहारे से आगे अनुभव की सूक्ष्मता और अंतर्मुखता का संकेत मिलता है।

साखी १२८ परचा कौ अंग · मूल क्रमांक ६

कबीर मन मधुकर भया, रह्या निरंतर बास। कवल ज फूल्या जलह बिन, को देखै निज दास॥
कठिन शब्दार्थ

मधुकर = भौंरा; बास = निवास या सुगंध।

सरल हिंदी अर्थ

मन भौंरा होकर भीतर निरंतर रमा है। जल बिना खिले कमल को विरला निज भक्त देख पाता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

मन की रुचि विषयों से हटकर अंतर्ज्योति में लगती है। यह योगिक प्रतीक है, वास्तविक वनस्पति का वर्णन नहीं।

साखी १२९ परचा कौ अंग · मूल क्रमांक ७

अंतर कवल प्रकासिया, ब्रह्म बास तहां होइ। मन भवरा तहां लुबधिया, जांणैगा जन कोइ॥
कठिन शब्दार्थ

अंतर कवल = हृदय-कमल; लुबधिया = आकृष्ट हुआ।

सरल हिंदी अर्थ

भीतर का कमल प्रकाशित है; उसमें ब्रह्म का निवास अनुभव होता है। मन-भौंरा उसी में मोहित हो गया है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

मन जहाँ रस पाता है, उधर लौटता है। सत्संग, स्मरण और शांत मनन से उसकी रुचि निर्मल दिशा में विकसित करें।

साखी १३० परचा कौ अंग · मूल क्रमांक ८

सायर नाहीं सीप बिन, स्वाति बूँद भी नाहिं। कबीर मोती नीपजै, सुन्नि सिषर गढ़ माँहिं॥
कठिन शब्दार्थ

सायर = समुद्र; सुन्नि सिषर = शून्य का शिखर; नीपजै = उत्पन्न हो।

सरल हिंदी अर्थ

न समुद्र, न सीप, न स्वाति की बूँद—फिर भी सूक्ष्म अंतराकाश में ज्ञान का मोती जन्म लेता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

पुरानी मोती-उत्पत्ति की कल्पना से आत्मज्ञान की विशिष्टता कही गई है। वह बाहरी वस्तु नहीं, चेतना की जागृति है।

साखी १३१ परचा कौ अंग · मूल क्रमांक ९

घट माँहे औघट लह्या, औघट माँहैं घाट। कहि कबीर परचा भया, गुरु दिखाई बाट॥
कठिन शब्दार्थ

घट = देह या अंतःकरण; औघट = कठिन-अगम; बाट = मार्ग।

सरल हिंदी अर्थ

देह में अगम तत्त्व मिला और अगम में अपना घाट पहचाना। गुरु ने मार्ग दिखाया तो यह परिचय हुआ।

भावार्थ और जीवन-संदेश

जिसे दूर खोजते हैं, उसका संकेत अपने अंतःकरण में मिल सकता है। मार्गदर्शन आत्मपरीक्षण की दिशा खोले।

साखी १३२ परचा कौ अंग · मूल क्रमांक १०

सूर समांणो चंद में, दहूँ किया घर एक। मनका च्यंता तब भया, कछू पूरबला लेख॥
कठिन शब्दार्थ

सूर चंद = सूर्य-चंद्र के योगिक प्रतीक; दहूँ = दोनों।

सरल हिंदी अर्थ

सूर्य और चंद्र एक घर में समा गए। दो धाराओं का मेल हुआ और मन की चिंता शांत हुई।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह भीतर की विरोधी प्रवृत्तियों के संतुलन की प्रतीक-भाषा है। गहरी साधना में चित्त की एकता महत्त्वपूर्ण होती है।

साखी १३३ परचा कौ अंग · मूल क्रमांक ११

हद छाड़ि बेहद गया, किया सुन्नि असनान। मुनि जन महल न पावई, तहाँ किया विश्राम॥
कठिन शब्दार्थ

सुन्नि = शून्य, निर्विकार अंतःस्थिति; महल = परम आश्रय।

सरल हिंदी अर्थ

सीमा से असीम में जाकर निर्विकारता का स्नान किया। जिस अवस्था को मुनि कठिनाई से पाते हैं, वहाँ विश्राम मिला।

भावार्थ और जीवन-संदेश

साधना का फल केवल उत्तेजक अनुभव नहीं, मन की गहरी स्थिरता है। उसके साथ विनय और करुणा बनी रहें।

साखी १३४ परचा कौ अंग · मूल क्रमांक १२

देखौ कर्म कबीर का, कछु पूरब जनम का लेख। जाका महल न मुनि लहैं, सो दोसत किया अलेख॥
कठिन शब्दार्थ

अलेख = वर्णनातीत; लेख = पूर्व संस्कार का संकेत।

सरल हिंदी अर्थ

कबीर अपने सौभाग्य पर आश्चर्य करते हैं कि जिसे मुनि भी दुर्लभ पाते हैं, वही वर्णनातीत तत्त्व उनका मित्र हो गया।

भावार्थ और जीवन-संदेश

उपलब्धि को अहंकार के बजाय अनुग्रह मानना भक्त की दृष्टि है। आत्मीयता और कृतज्ञता उसका सुंदर परिणाम हैं।

साखी १३५ परचा कौ अंग · मूल क्रमांक १३

पिंजर प्रेमे प्रकासिया, जाग्या जोग अनंत। संसा खूटा सुख भया, मिल्या पियारा कंत॥
कठिन शब्दार्थ

पिंजर = देह; संसा = संशय; कंत = प्रिय।

सरल हिंदी अर्थ

प्रेम से देह-घर प्रकाशित हुआ, अनंत योग जागा, संशय मिटा और प्रिय से मिलन का सुख मिला।

भावार्थ और जीवन-संदेश

प्रेम और समझ का मेल भीतर के द्वंद्व घटाता है। उसका फल सहजता और दूसरों के प्रति उदार व्यवहार में भी दिखे।

साखी १३६ परचा कौ अंग · मूल क्रमांक १४

प्यंजर प्रेम प्रकासिया, अंतरि भया उजास। मुख कसतूरी महमहीं, बांणीं फूटी बास॥
कठिन शब्दार्थ

महमहीं = सुगंधित हुआ; बास = सुगंध।

सरल हिंदी अर्थ

प्रेम ने भीतर उजाला किया। मुख मानो कस्तूरी से महक उठा और वाणी में उसकी सुगंध फैल गई।

भावार्थ और जीवन-संदेश

भीतर की निर्मलता बोलने के ढंग में झलकती है। कठोरता और दिखावे के बजाय आत्मीय, सत्य और हितकारी वचन निकलें।

साखी १३७ परचा कौ अंग · मूल क्रमांक १५

मन लागा उन मन्न सों, गगन पहुँचा जाइ। देख्या चंदबिहूँणाँ, चाँदिणाँ, तहाँ अलख निरंजन राइ॥
कठिन शब्दार्थ

उन मन्न = उन्मनी, अंतर्मुख अवस्था; अलख = अदृश्य।

सरल हिंदी अर्थ

मन उन्मनी अवस्था में अंतराकाश तक पहुँचा। वहाँ चंद्रमा के बिना उजाला है और निर्मल परम सत्ता का अनुभव है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

अंतरज्योति बाहरी प्रकाश की उपमा से समझाई गई है। इन प्रतीकों को अनुभव की भाषा मानें, आकाश-यात्रा का दावा नहीं।

साखी १३८ परचा कौ अंग · मूल क्रमांक १६

मन लागा उन मन सों, उन मन मनहि बिलग। लूँण बिलगा पाणियाँ, पाँणीं लूँणा बिलग॥
कठिन शब्दार्थ

बिलग = घुलकर मिला; लूँण = नमक।

सरल हिंदी अर्थ

मन अंतर्मुख तत्त्व में ऐसे मिल गया जैसे नमक पानी में घुलता है और पानी नमकीन हो जाता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह आत्मीय एकरसता की उपमा है। अहंकार की कठोर अलगाव-दृष्टि घटे और जीवन में व्यापक अपनापन बढ़े।

साखी १३९ परचा कौ अंग · मूल क्रमांक १७

पाँणी ही तें हिम भया, हिम ह्नै गया बिलाइ। जो कुछ था सोई भया, अब कछू कह्या न जाइ॥
कठिन शब्दार्थ

हिम = बर्फ; बिलाइ = गलकर विलीन।

सरल हिंदी अर्थ

पानी से बर्फ बनी और बर्फ गलकर फिर पानी हुई। मूल तत्त्व वही रहा; आगे शब्दों से कहना कठिन है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

रूप बदलने पर भी आधार की एकता का संकेत है। देह और नाम की विविधता के बीच साझा अस्तित्व समझने की दृष्टि विकसित होती है।

साखी १४० परचा कौ अंग · मूल क्रमांक १८

भली भई जु भै पड्या, गई दशा सब भूलि। पाला गलि पाँणी भया, ढुलि मिलिया उस कूलि॥
कठिन शब्दार्थ

पाला = बर्फ; कूलि = किनारे या मूल आश्रय में।

सरल हिंदी अर्थ

कठोर अवस्था गलकर पानी हुई और अपने मूल प्रवाह से मिल गई। पुरानी अलग पहचान भुला देने का यह अनुभव शुभ हुआ।

भावार्थ और जीवन-संदेश

अहं का जमाव पिघलना प्रेम की शक्ति है। इससे आत्ममुग्धता घटे और संबंधों में लचीलापन आए।

साखी १४१ परचा कौ अंग · मूल क्रमांक १९

चौहटै च्यंतामणि चढ़ी, हाडी मारत हाथि। मीरा मुझसूँ मिहर करि, इब मिलौं न काहू साथि॥
कठिन शब्दार्थ

च्यंतामणि = मनोवांछित फल की कल्पित मणि; मीरा = स्वामी; मिहर = कृपा।

सरल हिंदी अर्थ

चौराहे पर अमूल्य चिंतामणि है, पर लोग तुच्छ वस्तु में उलझे हैं। हे स्वामी, कृपा करो कि मैं ऐसे भटकाव में न पड़ूँ।

भावार्थ और जीवन-संदेश

मूल्यवान सत्य सामने होने पर भी आदतें उसे ओझल कर देती हैं। अपनी प्राथमिकताएँ जाँचें और सार पहचानें।

साखी १४२ परचा कौ अंग · मूल क्रमांक २०

पंषि उडाणी गगन कूँ, प्यंड रह्या परदेस। पाँणी पीया चंच बिन, भूलि गया यहु देस॥
कठिन शब्दार्थ

पंषि = चेतना का पक्षी; प्यंड = देह; चंच = चोंच।

सरल हिंदी अर्थ

चेतना-पक्षी अंतराकाश में उड़ा, देह पीछे रही। उसने बिना चोंच आध्यात्मिक रस पिया और पुरानी पहचान भूल गया।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह देहाभिमान से आगे की तन्मयता का चित्र है। प्रतीक का केंद्र अंतःअनुभव है, शरीर छोड़ने की वास्तविक प्रक्रिया नहीं।

साखी १४३ परचा कौ अंग · मूल क्रमांक २१

पंषि उड़ानी गगन कूँ, उड़ी चढ़ी असमान। जिहिं सर मण्डल भेदिया, सो सर लागा कान॥
कठिन शब्दार्थ

सर = बाण या स्वर का संकेत; मण्डल = अंतराकाश का क्षेत्र।

सरल हिंदी अर्थ

चेतना-पक्षी आकाश में ऊपर उठा; जिस सूक्ष्म स्वर-बाण ने उस क्षेत्र को भेदा, वही कान में गूँजा।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह योगानुभूति की संकेतात्मक भाषा है। उसके कई व्याख्या-पथ हैं; मुख्य भाव चित्त का गहरा अंतर्मुख होना है।

साखी १४४ परचा कौ अंग · मूल क्रमांक २२

सुरति समाँणो निरति मैं, निरति रही निरधार। सुरति निरति परचा भया, तब खूले स्यंभ दुवार॥
कठिन शब्दार्थ

सुरति = सजग ध्यान; निरति = निरासक्त तन्मयता; स्यंभ = स्वयंभू।

सरल हिंदी अर्थ

ध्यान निरासक्त तन्मयता में मिला, जो बाहरी सहारे पर नहीं टिकी। दोनों का परिचय होने पर अंतर का द्वार खुला।

भावार्थ और जीवन-संदेश

स्मरण के साथ आसक्ति ढीली होती है। सजगता और सहजता का मेल भीतर स्पष्टता विकसित करता है।

साखी १४५ परचा कौ अंग · मूल क्रमांक २३

सुरति समाँणो निरति मैं, अजपा माँहै जाप। लेख समाँणाँ अलेख मैं, यूँ आपा माँहै आप॥
कठिन शब्दार्थ

अजपा = सहज निरंतर स्मरण; अलेख = वर्णनातीत।

सरल हिंदी अर्थ

ध्यान तन्मयता में, उच्चरित जप सहज स्मरण में और सीमित पहचान वर्णनातीत में समा गई। अपने भीतर अपना मूल मिला।

भावार्थ और जीवन-संदेश

अभ्यास परिपक्व होकर जीवन की सहज दिशा बन सकता है। उसका माप केवल गिनती नहीं, चित्त की निर्मलता भी है।

साखी १४६ परचा कौ अंग · मूल क्रमांक २४

आया था संसार में, देषण कौं बहु रूप। कहै कबीरा संत ही, पड़ि गया नजरि अनूप॥
कठिन शब्दार्थ

देषण = देखने; अनूप = अनुपम।

सरल हिंदी अर्थ

मैं संसार में अनेक रूप देखने आया था; संत-संग से दृष्टि उस अनुपम सत्य पर पड़ गई।

भावार्थ और जीवन-संदेश

जीवन की यात्रा में अच्छा मार्गदर्शन लक्ष्य बदल सकता है। अनेक आकर्षणों के बीच अर्थपूर्ण और स्थायी मूल्य पहचानें।

साखी १४७ परचा कौ अंग · मूल क्रमांक २५

अंक भरे भरि भेटिया, मन मैं नाँहीं धीर। कहै कबीर ते क्यूँ मिलैं, जब लग दोइ सरीर॥
कठिन शब्दार्थ

अंक = गोद; भेटिया = मिला; दोइ = दो।

सरल हिंदी अर्थ

बार-बार आलिंगन की कल्पना से भी मन नहीं भरता। कबीर पूछते हैं—जब तक अलगाव की दो सत्ता बनी हैं, पूरा मिलन कैसे हो?

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह प्रेम में अभेद की आकांक्षा है। अपना अहं और स्वार्थ कम किए बिना केवल निकटता का प्रदर्शन पर्याप्त नहीं।

साखी १४८ परचा कौ अंग · मूल क्रमांक २६

सचु पाया सुख ऊपनाँ, अरु दिल दरिया पूरि। सकल पाप सहजै गये, जब साँई मिल्या हजूरि॥
कठिन शब्दार्थ

दिल दरिया = हृदय-सागर; हजूरि = समीप।

सरल हिंदी अर्थ

सत्य मिला तो सुख जागा, हृदय का सागर भर गया और स्वामी की निकटता में पुराने दोषों की पकड़ छूटने लगी।

भावार्थ और जीवन-संदेश

आध्यात्मिक बोध का फल प्रसन्नता के साथ चरित्र में परिवर्तन हो। केवल अनुभव का दावा गलत व्यवहार मिटा नहीं देता।

साखी १४९ परचा कौ अंग · मूल क्रमांक २७

धरती गगन पवन नहीं होता, नहीं तोया, नहीं तारा। तब हरि हरि के जन होते, कहै कबीर बिचारा॥
कठिन शब्दार्थ

तोया = जल; जन = भक्त।

सरल हिंदी अर्थ

धरती, आकाश, वायु, जल और तारों से भी पहले हरि तथा उनके जन थे—कबीर ऐसा विचार कहते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह भक्त और परम तत्त्व के सनातन संबंध की काव्य-कल्पना है। इसे वैज्ञानिक सृष्टि-काल की गणना न समझें।

साखी १५० परचा कौ अंग · मूल क्रमांक २८

जा दिन कृतमनां हुता, होता हट न पट। हुता कबीरा राम जन, जिनि देखै औघट घट॥
कठिन शब्दार्थ

कृतमनां = सृष्टि-रचना का संकेत; हट पट = हाट और नगर; औघट = अगम।

सरल हिंदी अर्थ

जब संसार का हाट-नगर नहीं बना था, तब भी राम और उनका भक्त-संबंध था—अगम तत्त्व का अनुभव यही कहता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

भक्त अपनी मूल पहचान बाहरी व्यवस्थाओं से परे देखता है। उसकी भाषा नित्य संबंध को व्यक्त करती है।

साखी १५१ परचा कौ अंग · मूल क्रमांक २९

थिति पाई मन थिर भया, सतगुर करी सहाइ। अनिन कथा तनि आचरी, हिरदै त्रिभुवन राइ॥
कठिन शब्दार्थ

थिति = स्थिरता; अनिन = अनिर्वचनीय; त्रिभुवन राइ = परमेश्वर।

सरल हिंदी अर्थ

गुरु की सहायता से मन स्थिर हुआ। अकथ अनुभव जीवन में उतरा और हृदय में त्रिभुवन के स्वामी का बोध हुआ।

भावार्थ और जीवन-संदेश

समझ का स्थायी प्रभाव व्यवहार में उतरता है। शांति, संयम और सद्भाव अनुभव की परिपक्वता दिखाते हैं।

साखी १५२ परचा कौ अंग · मूल क्रमांक ३०

हरि संगति सीतल भया, मिटा मोह की ताप। निस बासुरि सुख निध्य लह्या, जब अंतरि प्रकट्या आप॥
कठिन शब्दार्थ

निस बासुरि = रात-दिन; ताप = जलन।

सरल हिंदी अर्थ

हरि-संगति से भीतर शीतलता आई, मोह की तपन मिटी और अपने अंतःप्रकाश में निरंतर सुख का आधार मिला।

भावार्थ और जीवन-संदेश

मन की शांति बाहरी इच्छाएँ पूरी करने से अलग भी संभव है। आसक्ति घटाकर वर्तमान में सजग जीवन अपनाएँ।

साखी १५३ परचा कौ अंग · मूल क्रमांक ३१

तन भीतरि मन मानियाँ, बाहरि कहा न जाइ। ज्वाला तै फिरि जल भया, बुझी बलंती लाइ॥
कठिन शब्दार्थ

मानियाँ = संतुष्ट हुआ; बलंती = जलती।

सरल हिंदी अर्थ

भीतर मन ऐसा तृप्त हुआ जिसका बाहरी वर्णन कठिन है। जलती ज्वाला शीतल जल बनी और भीतर की आग बुझ गई।

भावार्थ और जीवन-संदेश

मोह और असंतोष का बदलना वास्तविक राहत देता है। अंतर की तृप्ति दिखावे से अधिक महत्त्वपूर्ण है।

साखी १५४ परचा कौ अंग · मूल क्रमांक ३२

तत पाया तन बीसर्‌या, जब मुनि धरिया ध्यान। तपनि गई सीतल भया, जब सुनि किया असनान॥
कठिन शब्दार्थ

तत = परम सार; सुनि = शून्य; असनान = स्नान।

सरल हिंदी अर्थ

ध्यान में सार मिला तो देहाभिमान भुला। निर्विकार स्थिति में मन की तपन मिटी और शीतलता आई।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह ध्यान की तन्मयता का चित्र है। उद्देश्य देह की उपेक्षा नहीं, अहं और व्यर्थ द्वंद्व की पकड़ कम होना है।

साखी १५५ परचा कौ अंग · मूल क्रमांक ३३

जिनि पाया तिनि सू गह्या गया, रसनाँ लागी स्वादि। रतन निराला पाईया, जगत ढंढाल्या बादि॥
कठिन शब्दार्थ

रतन निराला = अद्वितीय ज्ञानरत्न; बादि = व्यर्थ।

सरल हिंदी अर्थ

जिसे सत्य मिला, उसी को उसका स्वाद आया। अनोखा रत्न भीतर पाकर बाहर की निरर्थक खोज समाप्त हुई।

भावार्थ और जीवन-संदेश

बाहरी सूचना उपयोगी है, पर अंतहीन भटकाव साधना नहीं। विवेक से सार लेकर नियमित मनन में स्थिर हों।

साखी १५६ परचा कौ अंग · मूल क्रमांक ३४

कबीर दिल स्याबति भया, पाया फल सम्रथ्थ। सायर माँहि ढंढोलताँ, हीरै पड़ि गया हथ्थ॥
कठिन शब्दार्थ

स्याबति = स्थिर या संतुष्ट; सम्रथ्थ = समर्थ; सायर = समुद्र।

सरल हिंदी अर्थ

हृदय स्थिर हुआ और खोज का समर्थ फल मिला; जैसे समुद्र में ढूँढ़ते हुए हाथ में हीरा आ जाए।

भावार्थ और जीवन-संदेश

धैर्यपूर्ण खोज का मूल्य है। अनुभव को अपनी श्रेष्ठता का प्रमाण बनाने के बजाय कृतज्ञता और विनय रखें।

साखी १५७ परचा कौ अंग · मूल क्रमांक ३५

जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि है मैं नाँहि। सब अँधियारा मिटि गया, जब दीपक देख्या माँहि॥
कठिन शब्दार्थ

मैं = अहंकार; दीपक = ज्ञान का प्रकाश।

सरल हिंदी अर्थ

जब मैंपन छाया था, हरि की पहचान नहीं थी। अब हरि का बोध है तो वह अहं नहीं रहा; भीतर दीप जला और अँधेरा मिटा।

भावार्थ और जीवन-संदेश

अहंकार सत्य को देखने में बाधा बनता है। विनम्र आत्मपरीक्षण से अपने को केंद्र मानने की आदत ढीली करें।

साखी १५८ परचा कौ अंग · मूल क्रमांक ३६

जा कारणि मैं ढूंढता, सनमुख मिलिया आइ। धन मैली पिव ऊजला, लागि न सकौं पाइ॥
कठिन शब्दार्थ

सनमुख = सामने; धन = विरहिणी आत्मा; ऊजला = निर्मल।

सरल हिंदी अर्थ

जिसे खोज रहा था, वह सामने मिला; पर आत्मा अपने को मैली और प्रिय को निर्मल देखकर निकट जाने में संकोच करती है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

सत्य का परिचय अपने दोष भी स्पष्ट करता है। संकोच को निराशा न बनने दें; उसे आचरण-सुधार की प्रेरणा बनाएँ।

साखी १५९ परचा कौ अंग · मूल क्रमांक ३७

जा कारणि मैं जाइ था, सोई पाई ठौर। सोई फिर आपण भया, जासूँ कहता और॥
कठिन शब्दार्थ

ठौर = स्थान; आपण = स्वयं।

सरल हिंदी अर्थ

जिसके लिए निकला था, वही आश्रय मिला। जिसे पहले दूसरा कहता था, वह अपने ही मूल से अभिन्न अनुभव हुआ।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह द्वैत से एकत्व की अनुभूति का कथन है। उसका नैतिक फल अपने और पराए के बीच की कठोर दीवार कम होना है।

साखी १६० परचा कौ अंग · मूल क्रमांक ३८

कबीर देख्या एक अंग, महिमा कही न जाइ। तेज पुंज पारस धणों, नैनूँ रहा समाइ॥
कठिन शब्दार्थ

तेज पुंज = प्रकाश-समूह; धणों = बहुत।

सरल हिंदी अर्थ

कबीर ने ऐसा अनोखा दर्शन पाया जिसकी महिमा कही नहीं जाती; पारस जैसा तेज आँखों में समा गया।

भावार्थ और जीवन-संदेश

कवि उपमाओं से अकथ अनुभव का संकेत देते हैं। पाठक वर्णन से प्रेरणा ले, उसे वस्तुगत माप समझने का आग्रह न करे।

साखी १६१ परचा कौ अंग · मूल क्रमांक ३९

मानसरोवर सुभर जल, हंसा केलि कराहिं। मुकताहल मुकता चुगैं, अब उड़ि अनत न जाहिं॥
कठिन शब्दार्थ

मुकताहल = मोती; मुकता = मुक्त हंस; अनत = अन्यत्र।

सरल हिंदी अर्थ

भरे मानसरोवर में हंस आनंद से मोती चुनते हैं; अब वे अन्यत्र उड़कर जाना नहीं चाहते।

भावार्थ और जीवन-संदेश

मानसरोवर निर्मल चेतना और मोती सारज्ञान के प्रतीक हैं। सच्चा रस मिलने पर अनावश्यक भटकाव घटता है।

साखी १६२ परचा कौ अंग · मूल क्रमांक ४०

गगन गरिजि अमृत चवै, कदली कंवल प्रकास। तहाँ कबीरा बंदिगी, कै कोई निज दास॥
कठिन शब्दार्थ

चवै = टपकता; कदली कंवल = योगिक संकेत; बंदिगी = उपासना।

सरल हिंदी अर्थ

अंतराकाश में गर्जना और अमृत-रस का अनुभव है, सूक्ष्म कमल प्रकाशित है; वहाँ कबीर या विरला भक्त साधना करता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह रहस्यात्मक अनुभव की प्रतीक-भाषा है। मुख्य संदेश भीतर की एकाग्र उपासना है, बाहरी दृश्य की नकल नहीं।

साखी १६३ परचा कौ अंग · मूल क्रमांक ४१

नींव बिहुणां देहुरा, देह बिहूँणाँ देव। कबीर तहाँ बिलंबिया करे अलप की सेव॥
कठिन शब्दार्थ

देहुरा = मंदिर; अलप = अलक्ष्य सूक्ष्म तत्त्व।

सरल हिंदी अर्थ

बिना नींव का मंदिर और बिना देह का देव है। कबीर उसी सूक्ष्म निराकार की सेवा में ठहरे हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

उपासना का आंतरिक आयाम रूप और भवन से आगे है। बाहरी साधन प्रेम तथा अंतर्बोध की दिशा में सहायक बनें।

साखी १६४ परचा कौ अंग · मूल क्रमांक ४२

देवल माँहै देहुरी, तिल जेहैं बिसतार। माँहैं पाती माँहिं जल, माँहे पुजणहार॥
कठिन शब्दार्थ

देहुरी = छोटा देवालय; पाती = पूजा के पत्ते।

सरल हिंदी अर्थ

भीतर तिल जितना सूक्ष्म देवालय है; वहीं पत्ते, जल और पूजने वाला—संपूर्ण पूजा का भाव उपस्थित है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

मन की श्रद्धा उपासना का मूल है। साधन के साथ सजगता हो तो दैनिक जीवन भी समर्पण का क्षेत्र बनता है।

साखी १६५ परचा कौ अंग · मूल क्रमांक ४३

कबीर कवल प्रकासिया, ऊग्या निर्मल सूर। निस अँधियारी मिटि गई, बाजै अनहद तूर॥
कठिन शब्दार्थ

तूर = वाद्य; अनहद = आघात के बिना सूक्ष्म नाद।

सरल हिंदी अर्थ

हृदय-कमल खुला, निर्मल सूर्य उगा और अज्ञान की रात मिटी; भीतर अनहद का संगीत गूँज उठा।

भावार्थ और जीवन-संदेश

जागृति को प्रकाश और संगीत की संयुक्त उपमा दी गई है। उसका प्रभाव स्पष्ट दृष्टि और अंतःशांति में समझें।

साखी १६६ परचा कौ अंग · मूल क्रमांक ४४

अनहद बाजै नीझर झरै, उपजै ब्रह्म गियान। अविगति अंतरि प्रगटै, लागै प्रेम धियान॥
कठिन शब्दार्थ

नीझर = झरना; अविगति = अगम सत्ता।

सरल हिंदी अर्थ

भीतर सूक्ष्म नाद और आनंद का झरना है। ब्रह्मज्ञान जागता है, अगम का परिचय होता है और प्रेमपूर्ण ध्यान लगता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

ज्ञान और प्रेम यहाँ अलग नहीं हैं। समझ जितनी गहरी हो, व्यवहार उतना करुणामय और संतुलित बने।

साखी १६७ परचा कौ अंग · मूल क्रमांक ४५

आकासै मुखि औंधा कुवाँ, पाताले पनिहारि। ताका पाँणीं को हंसा पीवै, बिरला आदि बिचारि॥
कठिन शब्दार्थ

औंधा कुवाँ = उलटा कुआँ; पनिहारि = पानी भरने वाली; हंसा = जीव।

सरल हिंदी अर्थ

आकाशमुखी उलटा कुआँ और नीचे पनिहारिन है; उसका सूक्ष्म जल चेतना-हंस पीता है, जिसे विरला विचारवान समझता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

योगिक उलटबाँसी बाहर से भीतर की यात्रा कहती है। इसे सामान्य कुएँ का वर्णन न मानकर अंतर्मुख अनुभव का संकेत समझें।

साखी १६८ परचा कौ अंग · मूल क्रमांक ४६

सिव सकती दिसि कौंण जु जोवै, पछिम दिस उठै धूरि। जल मैं स्यंघ जु घर करै, मछली चढ़ै खजूरि॥
कठिन शब्दार्थ

सिव सकती = चेतना-शक्ति के प्रतीक; स्यंघ = सिंह।

सरल हिंदी अर्थ

कवि दिशाओं, जल में सिंह और पेड़ पर मछली के उलटे चित्र से साधना की असाधारण स्थिति कहते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

इन बिंबों की अनेक योगिक व्याख्याएँ हैं। सामान्य प्रवृत्तियों का उलटना और चेतना का नया संतुलन इनका केंद्रीय संकेत है।

साखी १६९ परचा कौ अंग · मूल क्रमांक ४७

अमृत बरसै हीरा निपजै, घंटा पड़ै टकसाल। कबीर जुलाहा भया पारषू, अगभै उतर्‌या पार॥
कठिन शब्दार्थ

पारषू = पारखी; अनभै = अनुभव; टकसाल = सिक्का ढालने का स्थान।

सरल हिंदी अर्थ

अमृत बरसता है, ज्ञान-हीरा जन्म लेता है और भीतर कसौटी चलती है। कबीर जुलाहा होकर भी अनुभव से पारखी बना।

भावार्थ और जीवन-संदेश

ज्ञान का अधिकार जन्म या पेशे तक सीमित नहीं। सच्ची साधना और अनुभव हर व्यक्ति में विवेक जगा सकते हैं।

साखी १७० परचा कौ अंग · मूल क्रमांक ४८

ममिता मेरा क्या करै, प्रेम उघाड़ी पौलि। दरसन भया दयाल का, सूल भई सुख सौड़ि॥
कठिन शब्दार्थ

ममिता = ममता या मेरा-पन; पौलि = द्वार; सौड़ि = बिछौना।

सरल हिंदी अर्थ

प्रेम ने द्वार खोल दिया; दयालु प्रिय का दर्शन हुआ तो मेरा-पन बेअसर हुआ और काँटे जैसा दुःख सुख के बिछौने में बदल गया।

भावार्थ और जीवन-संदेश

परिस्थिति बदलने से पहले भी दृष्टि बदल सकती है। आसक्ति घटने और प्रेम बढ़ने से वही जीवन अधिक सहज महसूस होता है।

६. रस कौ अंग

प्रेम की तृप्ति, अहं का समर्पण और भीतर का स्थायी रस। मूल स्थानीय क्रमांक १–८।

साखी १७१ रस कौ अंग · मूल क्रमांक १

कबीर हरि रस यौं पिया बाकी रही न थाकि। पाका कलस कुँभार का, बहुरि न चढ़हिं चाकि॥
कठिन शब्दार्थ

थाकि = थकान या शेष कसर; पाका कलस = पका घड़ा।

सरल हिंदी अर्थ

हरि-प्रेम का रस ऐसा पिया कि अधूरापन नहीं रहा। पके घड़े की तरह साधक फिर पुराने निर्माण-चक्र में नहीं लौटना चाहता।

भावार्थ और जीवन-संदेश

स्थिर अनुभूति चंचल लालसाएँ घटाती है। उसका संकेत संतोष, संयम और जीवन की स्पष्ट दिशा में मिलता है।

साखी १७२ रस कौ अंग · मूल क्रमांक २

राम रसाइन प्रेम रस पीवत, अधिक रसाल। कबीर पीवण दुलभ है, माँगै सीस कलाल॥
कठिन शब्दार्थ

रसाइन = जीवन बदलने वाला रस; कलाल = रस पिलाने वाला; सीस = अहं।

सरल हिंदी अर्थ

राम का प्रेमरस मधुर है, पर पीना कठिन; उसे देने वाला सिर अर्थात अहं का समर्पण माँगता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

प्रेम केवल आनंद लेना नहीं, अपने स्वार्थ और अभिमान को ढीला करना भी है। ‘सिर देना’ यहाँ समर्पण का रूपक है।

साखी १७३ रस कौ अंग · मूल क्रमांक ३

कबीर भाठी कलाल की, बहुतक बैठे आइ। सिर सौंपे सोई पिवै, नहीं तो पिया न जाइ॥
कठिन शब्दार्थ

भाठी = रस तैयार करने की भट्ठी; सिर सौंपे = अहं छोड़े।

सरल हिंदी अर्थ

प्रेमरस की भट्ठी पर अनेक बैठे हैं, पर उसे वही पीता है जो अपना अहं समर्पित करता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

दर्शक बने रहने और साधक बनने में अंतर है। बदलाव की कीमत अभ्यास, विनय और पुरानी जिद छोड़ना है।

साखी १७४ रस कौ अंग · मूल क्रमांक ४

हरि रस पीया जाँणिये, जे कबहूँ न जाइ खुमार। मैंमंता घूँमत रहै, नाँही तन की सार॥
कठिन शब्दार्थ

खुमार = गहरी तन्मयता; मैंमंता = मस्त हाथी।

सरल हिंदी अर्थ

हरि-रस का प्रभाव क्षणिक नहीं उतरता। साधक मस्त हाथी जैसा आत्मीय आनंद में रहता है और देहाभिमान भूलता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह नशे की सलाह नहीं, प्रेम की स्थायी तृप्ति की उपमा है। साधना का आनंद सजगता और उत्तरदायित्व बढ़ाए।

साखी १७५ रस कौ अंग · मूल क्रमांक ५

मैंमंता तिण नां चरै, सालै चिता सनेह। बारि जु बाँध्या प्रेम कै, डारि रह्या सिरि षेह॥
कठिन शब्दार्थ

तिण = तिनका; सालै = चुभती है; षेह = धूल।

सरल हिंदी अर्थ

प्रेम में मस्त हाथी साधारण चारे में नहीं रमता; स्नेह की व्याकुलता है, प्रेम के बंधन में बँधकर अभिमान की धूल झाड़ता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

गहरा प्रेम रुचियों का मूल्य बदलता है। छोटे प्रलोभन घटें और अंतःकरण में नम्रता तथा अपने प्रिय लक्ष्य की निष्ठा बढ़े।

साखी १७६ रस कौ अंग · मूल क्रमांक ६

मैंमंता अविगत रहा, अकलप आसा जीति। राम अमलि माता रहै, जीवन मुकति अतीकि॥
कठिन शब्दार्थ

अविगत = अगम तत्त्व; अकलप = कल्पना से परे; अमलि = रस में मस्त।

सरल हिंदी अर्थ

साधक अगम में रमा है, कल्पनाओं की आशाएँ जीत चुका है और रामरस की तृप्ति में जीवित मुक्ति अनुभव करता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

मुक्ति का भाव मोह और अहं की पकड़ से छूटना है। उसका व्यावहारिक फल भीतर स्वतंत्रता और बाहर करुणामय आचरण हो।

साखी १७७ रस कौ अंग · मूल क्रमांक ७

जिहि सर घड़ा न डूबता, अब मैं गल मलि न्हाइ। देवल बूड़ा कलस सूँ, पंषि तिसाई जाइ॥
कठिन शब्दार्थ

सर = सरोवर; देवल = मंदिर; तिसाई = प्यासी।

सरल हिंदी अर्थ

पहले जिसमें घड़ा भी न डूबता था, वहाँ अब गले तक स्नान है और मंदिर कलश सहित डूबा है, फिर भी पक्षी प्यासा जाता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

भीतर आनंद का भराव हो सकता है, जबकि भटकती वृत्ति उसका रस नहीं लेती। उपलब्ध साधन के साथ ग्रहणशीलता आवश्यक है।

साखी १७८ रस कौ अंग · मूल क्रमांक ८

सबै रसाइण मैं किया, हरि सा और न कोइ। तिल इक घट मैं संचरे, तौ सब तन कंचन होइ॥
कठिन शब्दार्थ

रसाइण = रस या रसायन; तिल इक = थोड़ा-सा; कंचन = सोना।

सरल हिंदी अर्थ

सब रसों को परखकर हरि-प्रेम जैसा कोई नहीं मिला। उसका थोड़ा अंश भी भीतर उतरे तो पूरा जीवन कंचन जैसा निखरता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

प्रेम का मूल्य मात्रा से अधिक उसके परिवर्तन में है। व्यवहार की कटुता कम होना और परोपकार बढ़ना उसकी सच्ची पहचान है।

७. लांबि कौ अंग

अंतहीन खोज, अंतर्मुखता और बूँद-समुद्र के अद्वैत बिंब। मूल स्थानीय क्रमांक १–४।

साखी १७९ लांबि कौ अंग · मूल क्रमांक १

कया कमंडल भरि लिया, उज्जल निर्मल नीर। तन मन जोबन भरि पिया, प्यास न मिटी सरीर॥
कठिन शब्दार्थ

कया कमंडल = देहरूपी पात्र; जोबन = यौवन।

सरल हिंदी अर्थ

देह के पात्र में निर्मल जल भरकर तन-मन और यौवन तक तृप्त किया, फिर भी गहरी प्यास नहीं मिटी।

भावार्थ और जीवन-संदेश

बाहरी भोग और सुविधा से हर तरह की प्यास नहीं बुझती। आत्मा की अर्थपूर्णता की खोज अलग पहचाननी होती है।

साखी १८० लांबि कौ अंग · मूल क्रमांक २

मन उलट्या दरिया मिल्या, लागा मलि मलि न्हांन। थाहत थाह न आवई, तूँ पूरा रहिमान॥
कठिन शब्दार्थ

मन उलट्या = भीतर लौटा; थाह = गहराई।

सरल हिंदी अर्थ

मन भीतर लौटा तो असीम दरिया मिला। उसमें स्नान करता हूँ, पर उसकी थाह नहीं आती—हे रहमान, तुम पूर्ण हो।

भावार्थ और जीवन-संदेश

अंतर्मुखता सीमित स्वार्थ से व्यापकता की ओर ले जाती है। कवि के विविध ईश्वर-संबोधन उस प्रेम की खुली दृष्टि दिखाते हैं।

साखी १८१ लांबि कौ अंग · मूल क्रमांक ३

हेरत हेरत हे सखी, रह्या कबीर हिराइ। बूँद समानी समंद मैं, सो कत हेरी जाइ॥
कठिन शब्दार्थ

हेरत = खोजते; हिराइ = खो गया।

सरल हिंदी अर्थ

खोजते-खोजते कबीर की अलग पहचान खो गई; बूँद समुद्र में समा जाए तो उसे अलग कहाँ खोजें?

भावार्थ और जीवन-संदेश

साधक और साध्य का अलगाव मिटने की उपमा है। अहं घटने पर अपना अस्तित्व व्यापक जीवन से जुड़ा अनुभव होता है।

साखी १८२ लांबि कौ अंग · मूल क्रमांक ४

हेरत हेरत हे सखी, रह्या कबीर हिराइ। समंद समाना बूँद मैं, सो कत हेरह्या जाइ॥
कठिन शब्दार्थ

समंद = समुद्र; हेरह्या = खोजा जाए।

सरल हिंदी अर्थ

खोज में कबीर का अहं खोया; अब तो समुद्र ही बूँद में समा गया—उसे कहीं बाहर कैसे खोजें?

भावार्थ और जीवन-संदेश

पिछली उपमा उलटकर असीम की भीतर उपस्थिति कही गई है। अपने अंतःकरण की क्षमता को तुच्छ न समझें।

८. जर्णा कौ अंग

अनुभव की मर्यादा, अकथ सत्य और धैर्यपूर्ण साधना। मूल स्थानीय क्रमांक १–५।

साखी १८३ जर्णा कौ अंग · मूल क्रमांक १

भारी कहौं त बहु डरौ, हलका कहूँ तो झूठ। मैं का जाँणौं राम कूं, नैनूं कबहुं न दीठ॥
कठिन शब्दार्थ

दीठ = देखा; भारी हलका = सीमित गुणों के संकेत।

सरल हिंदी अर्थ

राम को भारी कहूँ तो सीमा बाँध दूँ, हलका कहूँ तो झूठ हो। मैंने उन्हें आँखों से वस्तु की तरह देखा नहीं, क्या निश्चित कहूँ?

भावार्थ और जीवन-संदेश

अज्ञात पर बढ़ा-चढ़ाकर दावा करने के बजाय विनय रखें। अध्यात्म में अपनी समझ की सीमा पहचानना भी विवेक है।

साखी १८४ जर्णा कौ अंग · मूल क्रमांक २

दीठा है तो कस कहूँ, कह्या न को पतियाइ। हरि जैसा है तैसा रहौ, तूं हरिषि हरिषि गुण गाइ॥
कठिन शब्दार्थ

पतियाइ = विश्वास करे; हरिषि = हर्ष से।

सरल हिंदी अर्थ

देखा भी हो तो उसे कैसे कहूँ कि दूसरा मान ले? हरि जैसे हैं वैसे रहें; तुम आनंद से उनके गुण गाओ।

भावार्थ और जीवन-संदेश

हर अनुभव को तर्क में पूरा बाँधना संभव नहीं। विवाद के बजाय विनम्र साधना और अच्छे आचरण पर ध्यान दें।

साखी १८५ जर्णा कौ अंग · मूल क्रमांक ३

ऐसा अद्भूत जिनि कथै, अद्भुत राखि लुकाइ। बेद कुरानों गमि नहीं, कह्याँ न को पतियाइ॥
कठिन शब्दार्थ

गमि = पहुँच; लुकाइ = भीतर सँजोकर।

सरल हिंदी अर्थ

अद्भुत अनुभव को व्यर्थ चर्चा में मत उड़ाओ। वेद-कुरान की भाषा भी उसका पूरा विस्तार नहीं पकड़ती और कथन से सबको विश्वास नहीं होता।

भावार्थ और जीवन-संदेश

अंतरंगता का सम्मान करें। अनुभव का प्रदर्शन घटे और उसकी सीख जीवन में शांति तथा सदाचार के रूप में उतरे।

साखी १८६ जर्णा कौ अंग · मूल क्रमांक ४

करता की गति अगम है, तूँ चलि अपणैं उनमान। धीरैं धीरैं पाव दे, पहुँचैगे परवान॥
कठिन शब्दार्थ

अगम = समझ से परे; उनमान = अपनी समझ; परवान = मंजिल।

सरल हिंदी अर्थ

कर्ता की गति अगम है। अपनी समझ के अनुसार धैर्य से कदम बढ़ाओ, धीरे-धीरे लक्ष्य तक पहुँचोगे।

भावार्थ और जीवन-संदेश

न विनय छोड़ें, न प्रयत्न। छोटा नियमित अभ्यास बड़े दावे और अधीर छलाँग से अधिक उपयोगी होता है।

साखी १८७ जर्णा कौ अंग · मूल क्रमांक ५

पहुँचैगे तब कहैंगे, अमड़ैगे उस ठाँइ। अजहूँ बेरा समंद मैं, बोलि बिगूचै काँइ॥
कठिन शब्दार्थ

अमड़ैगे = पहुँचेंगे; बेरा = बेड़ा; बिगूचै = लज्जित हो।

सरल हिंदी अर्थ

मंजिल पर पहुँचकर वहाँ की बात कहेंगे। अभी बेड़ा समुद्र में है; समय से पहले दावा करके लज्जित क्यों हों?

भावार्थ और जीवन-संदेश

अधूरी यात्रा को पूरी उपलब्धि न कहें। प्रमाण और अनुभव के अनुरूप बोलना आध्यात्मिक ईमानदारी है।

९. हैरान कौ अंग

अथाह परम तत्त्व और अपने भीतर उसकी अनपहचानी उपस्थिति। मूल स्थानीय क्रमांक १–२।

साखी १८८ हैरान कौ अंग · मूल क्रमांक १

पंडित सेती कहि रहे, कह्या न मानै कोइ। ओ अगाध एका कहै, भारी अचिरज होइ॥
कठिन शब्दार्थ

अगाध = अथाह; अचिरज = आश्चर्य।

सरल हिंदी अर्थ

पंडितों से समझाने पर भी बात नहीं मानी जाती; जो अथाह है, उसे सीमित एक वस्तु जैसा कहना आश्चर्यजनक है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

तत्त्व की व्यापकता शब्द की सीमा से बड़ी है। विद्वत्ता के साथ विनय और दूसरे के अनुभव को सुनने की क्षमता भी हो।

साखी १८९ हैरान कौ अंग · मूल क्रमांक २

बसे अपंडी पंड मैं, ता गति लषै न कोइ। कहै कबीरा संत हौ, बड़ा अचम्भा मोहि॥
कठिन शब्दार्थ

अपंडी पंड = अपना देह-पिंड; लषै = पहचानता।

सरल हिंदी अर्थ

वह अपने ही देह-पिंड में है, फिर भी उसकी गति कोई पहचान नहीं पाता; कबीर को यह बड़ा आश्चर्य है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

निकट की सच्चाई भी असावधान मन से छूट जाती है। बाहर खोजने के साथ भीतर की सजगता और आत्मपरीक्षण विकसित करें।

१०. लै कौ अंग

ध्यान का अंतर्मुख प्रवाह और हृदय का प्रेम-घाट। मूल स्थानीय क्रमांक १–३।

साखी १९० लै कौ अंग · मूल क्रमांक १

जिहि बन सोह न संचरै, पंषि उड़ै नहिं जाइ। रैनि दिवस का गमि नहीं, तहां कबीर रह्या ल्यो आइ॥
कठिन शब्दार्थ

सीह = सिंह का पाठ-रूप; ल्यो = ध्यान।

सरल हिंदी अर्थ

ऐसा सूक्ष्म वन है जहाँ पशु-पक्षी नहीं पहुँचते और दिन-रात का भेद नहीं; कबीर वहाँ ध्यान लगाए हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह अंतःचेतना का रूपक है। बाहरी व्यस्तता से विराम लेकर शांत, सजग मनन का स्थान बनाएँ।

साखी १९१ लै कौ अंग · मूल क्रमांक २

सुरति ढीकुली ले जल्यो, मन नित ढोलन हार। कँवल कुवाँ मैं प्रेम रस, पीवै बारंबार॥
कठिन शब्दार्थ

ढीकुली = पानी खींचने का उपकरण; ढोलन हार = खींचने वाला।

सरल हिंदी अर्थ

ध्यान डोल की व्यवस्था है, मन जल खींचता है और हृदय-कमल के कुएँ से बार-बार प्रेमरस पीया जाता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

अभ्यास से मन अपने भीतर के निर्मल रस की ओर लौटता है। नियमितता ध्यान को केवल अवसर का उत्साह नहीं रहने देती।

साखी १९२ लै कौ अंग · मूल क्रमांक ३

गंग जमुन उर अंतरै, सहज सुंनि ल्यौ घाट। तहाँ कबीरै मठ रच्या, मुनि जन जोवैं बाट॥
कठिन शब्दार्थ

उर = हृदय; सहज सुंनि = सहज निर्विकारता; मठ = साधना का आश्रय।

सरल हिंदी अर्थ

हृदय में गंगा-जमुना के प्रतीक प्रवाह हैं और सहज शून्य का घाट है; कबीर ने वहीं अपना साधना-आश्रय बनाया है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

बाहरी तीर्थ का एक आंतरिक अर्थ भी है। चित्त की निर्मलता और सजगता को उपासना के केंद्र में रखें।

११. निहकर्मी पतिब्रता कौ अंग

निष्काम प्रेम, एकनिष्ठता, कृतज्ञता और सहज समर्पण। मूल स्थानीय क्रमांक १–१८।

साखी १९३ निहकर्मी पतिब्रता कौ अंग · मूल क्रमांक १

कबीर प्रीतडी तौ तुझ सौं, बहु गुणियाले कंत। जे हँसि बोलौं और सौं, तौं नील रँगाउँ दंत॥
कठिन शब्दार्थ

प्रीतड़ी = आत्मीय प्रेम; कंत = प्रिय; नील दंत = लज्जा का पुराना संकेत।

सरल हिंदी अर्थ

हे गुणवान प्रिय, मेरा प्रेम तुम्हीं से है; दूसरे की ओर प्रेम बाँटने को कवि अपनी लज्जा का कारण कहते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

नायिका की उपमा से साधना की एकनिष्ठता कही गई है। इसे सामाजिक नियंत्रण के बजाय साधक के अपने संकल्प के रूप में समझें।

साखी १९४ निहकर्मी पतिब्रता कौ अंग · मूल क्रमांक २

नैना अंतरि आव तूँ, ज्यूँ हौं नैन झँपेउँ। नाँ हौं देखौं और कूं, नाँ तुझ देखन देउँ॥
कठिन शब्दार्थ

झँपेउँ = मूँद लूँ; अंतरि = भीतर।

सरल हिंदी अर्थ

प्रिय आँखों में आ जाए तो मैं उन्हें मूँद लूँ—न स्वयं किसी और को देखूँ, न प्रिय को दूसरे से ओझल होने दूँ।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह प्रेम की गहरी आत्मीयता की कल्पना है। ध्यान में प्रिय की स्मृति स्थिर रखने का भाव ग्रहण करें।

साखी १९५ निहकर्मी पतिब्रता कौ अंग · मूल क्रमांक ३

मेरा मुझ में कुछ नहीं, जो कुछ है सो तेरा। तेरा तुझको सौंपता, क्या लागै है मेरा॥
कठिन शब्दार्थ

सौंपता = समर्पित करता; तेरा = परम आश्रय से प्राप्त।

सरल हिंदी अर्थ

मुझमें अपना कुछ नहीं; जो है तुम्हारा दिया है। तुम्हीं को तुम्हारा अर्पित करने में मेरा क्या घटता है?

भावार्थ और जीवन-संदेश

कृतज्ञता से स्वामित्व का अहं कम होता है। प्रतिभा, समय और साधन का सदुपयोग सेवा में करना समर्पण का रूप है।

साखी १९६ निहकर्मी पतिब्रता कौ अंग · मूल क्रमांक ४

कबीर रेख स्यंदूर की, काजल दिया न जाइ। नैनूं रमइया रमि रह्या, दूजा कहाँ समाइ॥
कठिन शब्दार्थ

स्यंदूर = सिंदूर; रमइया = प्रिय राम।

सरल हिंदी अर्थ

प्रेम की सिंदूर-रेखा पर दूसरा रंग नहीं चढ़ता; आँखों में राम बसे हैं तो विरोधी आसक्ति कहाँ समाए?

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह स्पष्ट प्राथमिकता का बिंब है। जिस मूल्य को अपनाया है, उसी के विपरीत लालच और छल को मन में न पालें।

साखी १९७ निहकर्मी पतिब्रता कौ अंग · मूल क्रमांक ५

कबीर सीप समंद की, रटै पियास पियास। संमदहि तिणका बरि गिणै स्वाँति बूँद की आस॥
कठिन शब्दार्थ

तिणका = तुच्छ; स्वाँति = स्वाति नक्षत्र की बूँद।

सरल हिंदी अर्थ

सीप समुद्र में होकर भी प्यास पुकारती है; सारे जल को तुच्छ मानकर स्वाति-बूँद की प्रतीक्षा करती है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

पुरानी लोकमान्यता से अनन्य प्रेम कहा गया है। साधक अपने सार्थक लक्ष्य पर स्थिर रहे और छोटे प्रलोभन पहचान सके।

साखी १९८ निहकर्मी पतिब्रता कौ अंग · मूल क्रमांक ६

कबीर सुख कौ जाइ था, आगै आया दुख। जाहि सुख घरि आपणै हम जाणैं अरु दुख॥
कठिन शब्दार्थ

जाहि = जाओ; आपणै = अपने।

सरल हिंदी अर्थ

मैं सुख लेने चला था, सामने दुःख मिला। मैंने सुख से कहा—तुम अपने घर जाओ; अब मैं और दुःख एक-दूसरे को समझेंगे।

भावार्थ और जीवन-संदेश

साधक सुविधा की शर्त पर प्रेम नहीं करता। कठिनाई से भागने के बजाय उससे विवेक और धैर्य सीखता है।

साखी १९९ निहकर्मी पतिब्रता कौ अंग · मूल क्रमांक ७

दो जग तो हम अंगिया, यहु डर नाहीं मुझ। भिस्त न मेरे चाहिये, बाझ पियारे तुझ॥
कठिन शब्दार्थ

दो जग = दोनों लोक; अंगिया = त्यागे; भिस्त = स्वर्ग।

सरल हिंदी अर्थ

मैं दोनों लोकों के लाभ से निर्भय हूँ; प्यारे तुम्हारे बिना मुझे स्वर्ग भी नहीं चाहिए।

भावार्थ और जीवन-संदेश

निष्काम प्रेम पुरस्कार के लिए नहीं होता। साधना का केंद्र सत्य और आत्मीयता हो, लाभों का सौदा नहीं।

साखी २०० निहकर्मी पतिब्रता कौ अंग · मूल क्रमांक ८

जे वो एकै न जाँणियाँ तो जाँण्याँ सब जाँण। जो वो एक न जाँणियाँ, तो सबहीं जाँण अजाँण॥
कठिन शब्दार्थ

एकै = मूल परम तत्त्व; अजाँण = अज्ञान।

सरल हिंदी अर्थ

यदि उस एक सत्य को जाना तो सारी जानकारी सार पाती है; उसे न समझा तो बहुत जानकर भी मूल बात अनजानी रही।

भावार्थ और जीवन-संदेश

सूचना और जीवन-दृष्टि अलग हैं। ज्ञान को अपने आचरण, संबंध और अंतःकरण की स्पष्टता से जोड़ें।

साखी २०१ निहकर्मी पतिब्रता कौ अंग · मूल क्रमांक ९

कबीर एक न जाँणियाँ, तो बहु जाँण्याँ क्या होइ। एक तैं सब होत है, सब तैं एक न होइ॥
कठिन शब्दार्थ

बहु जाँण्याँ = अनेक बातें जानने से; एक तैं = एक मूल से।

सरल हिंदी अर्थ

एक मूल सत्य नहीं जाना तो बहुत जानने से क्या हुआ? उसी एक से सब प्रकट है, अनेक वस्तुएँ जोड़ने से वह स्वतः नहीं मिलता।

भावार्थ और जीवन-संदेश

विस्तार के साथ आधार पहचानना आवश्यक है। विषयों का संग्रह करते हुए जीवन के मूल प्रश्न न भूलें।

साखी २०२ निहकर्मी पतिब्रता कौ अंग · मूल क्रमांक १०

जब लगि भगति सकांमता, तब लग निर्फल सेव। कहै कबीर वै क्यूं मिलैं, निहकामी निज देव॥
कठिन शब्दार्थ

सकांमता = फल की इच्छा; निहकामी = निष्काम।

सरल हिंदी अर्थ

जब तक भक्ति लाभ की इच्छा से है, सेवा का गहरा फल नहीं मिलता; निष्काम प्रभु से मिलन स्वार्थ की शर्तों पर कैसे हो?

भावार्थ और जीवन-संदेश

उपासना में अपनी माँगें पहचानें। प्रेम, सत्य और सेवा को केवल इच्छापूर्ति का साधन न बनाएँ।

साखी २०३ निहकर्मी पतिब्रता कौ अंग · मूल क्रमांक ११

आसा एक जू राम की, दूजी आस निरास। पाँणी माँहै घर करैं, ते भी मरै पियास॥
कठिन शब्दार्थ

निरास = निष्फल आशा; पियास = प्यास।

सरल हिंदी अर्थ

आशा का अंतिम आधार राम हैं; अन्य आश्रय निराश कर सकते हैं। पानी में रहकर भी भीतर की प्यास बनी रह सकती है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

साधन उपलब्ध होना और तृप्त होना अलग बातें हैं। चित्त को सही दिशा देने के लिए भीतर की आवश्यकता समझें।

साखी २०४ निहकर्मी पतिब्रता कौ अंग · मूल क्रमांक १२

जे मन लागै एक सूँ, तो निरबाल्या जाइ। तूरा दुइ मुखि बाजणाँ न्याइ तमाचे खाइ॥
कठिन शब्दार्थ

निरबाल्या = निभ जाता है; तूरा = दो मुखों वाला वाद्य।

सरल हिंदी अर्थ

मन एक लक्ष्य से लगे तो निभ जाता है। दो दिशाओं में बजने वाला वाद्य दोनों ओर से चोट खाता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

परस्पर विरोधी लालसाएँ मन को खींचती हैं। स्पष्ट संकल्प बनाकर अपने निर्णयों में संगति रखें।

साखी २०५ निहकर्मी पतिब्रता कौ अंग · मूल क्रमांक १३

कबीर कलिजुग आइ करि, कीये बहुतज मीत। जिन दिल बँधी एक सूँ, ते सुखु सोवै नचींत॥
कठिन शब्दार्थ

दिल बँधी = हृदय की निष्ठा; नचींत = निश्चिंत।

सरल हिंदी अर्थ

संसार में अनेक मित्र बनाए, पर जिनका हृदय एक परम आश्रय से बँधा है, वे भीतर निश्चिंत सोते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

संबंध निभाते हुए मन का मूल आधार स्थिर हो। हर व्यक्ति की स्वीकृति पर आत्मविश्वास निर्भर न रखें।

साखी २०६ निहकर्मी पतिब्रता कौ अंग · मूल क्रमांक १४

कबीर कुता राम का, मुतिया मेरा नाउँ। गलै राम की जेवडी, जित खैचे तित जाउँ॥
कठिन शब्दार्थ

मुतिया = कुत्ते का नाम; जेवडी = रस्सी।

सरल हिंदी अर्थ

कबीर अपने को राम का मुतिया नामक कुत्ता कहते हैं; गले में उनके प्रेम की डोर है, जिधर खींचें उधर जाता हूँ।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह अत्यंत विनम्र आत्मसमर्पण की उपमा है। भक्त अपने अभिमान से अधिक प्रिय के गुणों और धर्मपूर्ण दिशा को महत्त्व देता है।

साखी २०७ निहकर्मी पतिब्रता कौ अंग · मूल क्रमांक १५

तो तो करै त बाहुड़ों, दुरि दुरि करै तो जाउँ। ज्यूँ हरि राखैं त्यूँ रहौं, जो देवै सो खाउँ॥
कठिन शब्दार्थ

तो तो = बुलाने का स्वर; बाहुड़ौं = लौटूँ।

सरल हिंदी अर्थ

प्रिय बुलाएँ तो लौटूँ, दूर करें तो चला जाऊँ; जैसे रखें वैसे रहूँ और जो दें उसे संतोष से ग्रहण करूँ।

भावार्थ और जीवन-संदेश

समर्पण में अनुकूल-प्रतिकूल दोनों दशाओं का धैर्य है। संतोष का अभ्यास अपने कर्तव्य और विवेक के साथ करें।

साखी २०८ निहकर्मी पतिब्रता कौ अंग · मूल क्रमांक १६

मन प्रतीति न प्रेम रस, नां इस तन मैं ढंग। क्या जाणौं उस पीव सूं, कैसे रहसी रंग॥
कठिन शब्दार्थ

प्रतीति = विश्वास; रंग = प्रेम का संबंध।

सरल हिंदी अर्थ

न मन में दृढ़ विश्वास है, न प्रेम का रस, न साधना का सधा रूप; ऐसे में प्रिय से संबंध कैसे निभेगा?

भावार्थ और जीवन-संदेश

दोष दूसरों पर डालने से पहले अपनी तैयारी देखें। निष्ठा, नियमितता और सत्यनिष्ठ व्यवहार से संबंध गहराता है।

साखी २०९ निहकर्मी पतिब्रता कौ अंग · मूल क्रमांक १७

उस संम्रथ का दास हौं, कदे न होइ अकाज। पतिब्रता नाँगी रहै, तो उसही पुरिस कौ लाज॥
कठिन शब्दार्थ

सम्रथ = समर्थ; अकाज = अहित; पतिब्रता = निष्ठावान नायिका।

सरल हिंदी अर्थ

मैं समर्थ स्वामी का सेवक हूँ। निष्ठावान पत्नी की दशा पति की प्रतिष्ठा से जुड़ती है—इस उपमा से कवि अपने आश्रय का भरोसा कहते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह ऐतिहासिक दांपत्य-रूपक है। सकारात्मक भाव भक्त का विश्वास है; इसे किसी स्त्री की निर्भरता का सामाजिक नियम न बनाएँ।

साखी २१० निहकर्मी पतिब्रता कौ अंग · मूल क्रमांक १८

धरि परमेसुर पाँहुणाँ, सुणौं सनेही दास। षट रस भोजन भगति करि, ज्यूँ कदे न छाड़ैपास॥
कठिन शब्दार्थ

पाँहुणाँ = अतिथि; षट रस = छह स्वाद; भगति = प्रेमपूर्ण सेवा।

सरल हिंदी अर्थ

हे प्रेमी भक्त, परमेश्वर को अतिथि मानकर हृदय में बसाओ और भक्ति के छह-रस भोजन से ऐसी सेवा करो कि निकटता बनी रहे।

भावार्थ और जीवन-संदेश

अतिथि-सेवा की आत्मीयता को अंतःउपासना में उतारें। प्रेम, सजगता और सत्कार का भाव दैनिक आचरण को भी सुंदर बनाता है।

१२. चितावणी कौ अंग

नश्वरता, विवेक, मानवीय अवसर, विनम्रता और कर्म की जिम्मेदारी। मूल स्थानीय क्रमांक १–६२।

साखी २११ चितावणी कौ अंग · मूल क्रमांक १

कबीर नौबति आपणी, दिन दस लेहु बजाइ। ए पुर पटन ए गली, बहुरि न देखै आइ॥
कठिन शब्दार्थ

नौबति = राजकीय वाद्य; दिन दस = थोड़े दिन; पुर पटन = नगर।

सरल हिंदी अर्थ

अपनी नौबत थोड़े दिन बजा लो; ये नगर और गलियाँ फिर इसी रूप में देखने लौटना निश्चित नहीं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

वैभव और अवसर अस्थायी हैं। वर्तमान जीवन को केवल प्रदर्शन में न बिताकर प्रेम, सेवा और आत्मविकास में भी लगाएँ।

साखी २१२ चितावणी कौ अंग · मूल क्रमांक २

जिनके नौबति बाजती, मैंगल बँधते बारि। एकै हरि के नाँव बिन, गए जन्म सब हारि॥
कठिन शब्दार्थ

मैंगल = हाथी; बारि = द्वार पर; हारि = व्यर्थ करके।

सरल हिंदी अर्थ

जिनके द्वार हाथी बँधते और नौबत बजती थी, वे भी हरिनाम के सार बिना जीवन की उपलब्धि खोकर चले गए।

भावार्थ और जीवन-संदेश

प्रतिष्ठा भीतर की पूर्णता का प्रमाण नहीं। समृद्धि के साथ विनय और अर्थपूर्ण आचरण आवश्यक हैं।

साखी २१३ चितावणी कौ अंग · मूल क्रमांक ३

ढोल दमामा दड़बड़ी, सहनाई संगि भेरि। औसर चल्या बजाइ करि, है कोइ राखै फेरि॥
कठिन शब्दार्थ

दमामा भेरि = बड़े वाद्य; औसर = समय।

सरल हिंदी अर्थ

ढोल, दमामे और शहनाई बजती रहीं, पर समय अपना संकेत बजाकर चला गया; उसे लौटाकर कौन रख सकता है?

भावार्थ और जीवन-संदेश

समय के बीतने पर किसी का नियंत्रण नहीं। शुभ काम और आवश्यक जिम्मेदारियाँ टालने के बजाय आज सँभालें।

साखी २१४ चितावणी कौ अंग · मूल क्रमांक ४

सातो सबद जु बाजते, घरि घरि होते राग। ते मंदिर खाली पड़े, बैसण लागे काग॥
कठिन शब्दार्थ

सातो सबद = अनेक प्रकार के संगीत; मंदिर = भवन।

सरल हिंदी अर्थ

जिन घरों में सुर और राग गूँजते थे, वे खाली पड़े हैं और उन पर कौए बैठते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

जीवन की चहल-पहल स्थायी नहीं। घर की शोभा के साथ उसमें बसने वालों के प्रति आत्मीयता को मूल्य दें।

साखी २१५ चितावणी कौ अंग · मूल क्रमांक ५

कबीर थोड़ा जीवणा माड़े बहुत मँडाण। सबही ऊभा मेल्हि गया, राव रंक सुलितान॥
कठिन शब्दार्थ

मँडाण = सजावट और तैयारी; राव रंक = राजा और निर्धन।

सरल हिंदी अर्थ

जीवन थोड़ा है, पर मनुष्य बहुत आयोजन करता है। राजा, निर्धन और सुलतान सब अपनी तैयारी छोड़कर चले जाते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

योजना बनाएँ, पर नश्वरता याद रहे। संग्रह की अनंत दौड़ में वर्तमान संबंध और सत्कर्म न खोएँ।

साखी २१६ चितावणी कौ अंग · मूल क्रमांक ६

इक दिन ऐसा होइगा, सब सूँ पड़ै बिछोइ। राजा राणा छत्रापति, सावधान किन होइ॥
कठिन शब्दार्थ

बिछोइ = बिछोह; छत्रापति = सम्राट।

सरल हिंदी अर्थ

एक दिन सबसे बिछोह होगा। राजा और सम्राट भी इससे नहीं बचते; फिर अभी सावधान कौन होता है?

भावार्थ और जीवन-संदेश

मृत्यु का स्मरण निराशा नहीं, प्राथमिकता की स्पष्टता दे। जो बात वास्तव में महत्त्वपूर्ण है, उसे समय दें।

साखी २१७ चितावणी कौ अंग · मूल क्रमांक ७

कबीर पटल कारिवाँ, पंच चोर दस द्वार। जन राँणौं गढ़ भेलिसी, सुमिरि लै करतार॥
कठिन शब्दार्थ

कारिवाँ = यात्रा का पड़ाव; पंच चोर = विषयाकर्षित इंद्रियाँ; दस द्वार = देह के मार्ग।

सरल हिंदी अर्थ

जीवन थोड़े समय का पड़ाव है। देह-दुर्ग और उसके चोरों के बीच रहने वाले, यह किला ढहे उससे पहले कर्ता को याद कर।

भावार्थ और जीवन-संदेश

शरीर और इंद्रियों का उपयोग सजगता से करें। जीवन की अस्थिरता समझकर भक्ति और सदाचार का आधार मजबूत करें।

साखी २१८ चितावणी कौ अंग · मूल क्रमांक ८

कबीर कहा गरबियौ, इस जीवन की आस। टेसू फूले दिवस चारि, खंखर भये पलास॥
कठिन शब्दार्थ

टेसू पलास = अल्पकाल फूलने वाला वृक्ष; खंखर = फूलरहित सूखा रूप।

सरल हिंदी अर्थ

जीवन की आशा पर इतना गर्व क्यों? पलाश कुछ दिन फूलता है और फिर उसका खिलाव समाप्त हो जाता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यौवन और सफलता बदलते हैं। उनके रहते नम्रता, सहयोग और सदुपयोग की आदत बनाएँ।

साखी २१९ चितावणी कौ अंग · मूल क्रमांक ९

कबीर कहा गरबियो, देही देखि सुरंग। बिछड़ियाँ मिलिनौ नहीं, ज्यूँ काँचली भुवंग॥
कठिन शब्दार्थ

सुरंग = सुंदर रंग वाला; काँचली = साँप की केंचुली।

सरल हिंदी अर्थ

सुंदर देह पर अभिमान क्यों? छूटी हुई देह फिर उसी रूप में नहीं मिलती, जैसे साँप छोड़ी केंचुली में नहीं लौटता।

भावार्थ और जीवन-संदेश

देह का सम्मान करें, पर उसे स्थायी पहचान न मानें। सौंदर्य के साथ चरित्र और व्यवहार भी सँवारें।

साखी २२० चितावणी कौ अंग · मूल क्रमांक १०

कबीर कहा गरिबियो, ऊँचे देखि अवास। काल्हि पर्‌यूँ भ्वै लेटणाँ, ऊपरि जामैं घास॥
कठिन शब्दार्थ

अवास = भवन; भ्वै = भूमि; जामैं = उगेगी।

सरल हिंदी अर्थ

ऊँचे भवन देखकर गर्व क्यों? अंत में धरती पर ही विश्राम होगा और ऊपर घास उग सकती है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

पद और संपत्ति मृत्यु की समानता नहीं मिटाते। विनम्र रहें तथा उपलब्ध साधनों का कल्याणकारी उपयोग करें।

साखी २२१ चितावणी कौ अंग · मूल क्रमांक ११

कबीर कहा गरबियौ, चाँम लपेटे हड। हैबर ऊपरि छत्रा सिरि, ते भी देबा खड॥
कठिन शब्दार्थ

हड = हड्डियाँ; हैबर = श्रेष्ठ घोड़ा; खड = गड्ढा।

सरल हिंदी अर्थ

देह चमड़े में लिपटी हड्डियाँ है। घोड़े और छत्र का राजवैभव रखने वाले भी अंततः मिट्टी में जाते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह देह के प्रति घृणा नहीं, अहं का प्रतिवाद है। बाहरी सम्मान से मनुष्य की मूल नश्वरता नहीं बदलती।

साखी २२२ चितावणी कौ अंग · मूल क्रमांक १२

कबीर कहा गरबियो, काल गहै कर केस। नां जाँणों कहाँ मारिसी, कै घरि कै परदेस॥
कठिन शब्दार्थ

केस = बाल; काल = मृत्यु; परदेस = घर से दूर।

सरल हिंदी अर्थ

काल मानो बाल पकड़कर ले जाता है; नहीं जानते कि अंतिम समय घर आएगा या परदेस में।

भावार्थ और जीवन-संदेश

अनिश्चितता को समझकर आज के कर्तव्य और आत्मीय संवाद पूरे करें। जीवन की तैयारी केवल दूर भविष्य पर न छोड़ें।

साखी २२३ चितावणी कौ अंग · मूल क्रमांक १३

यहु ऐसा संसार है जैसा सैबल फूल। दिन दस के व्योहार को, झूठै रंगि न भूल॥
कठिन शब्दार्थ

सैबल = सेमल; व्योहार = थोड़े समय का संबंध।

सरल हिंदी अर्थ

संसार सेमल के फूल जैसा आकर्षक और अल्पस्थायी है; कुछ दिन की चमक को अंतिम सत्य समझकर मत भूलो।

भावार्थ और जीवन-संदेश

आकर्षण का उपयोग करें, उसके वश में न हों। अस्थायी सुख के साथ स्थायी नैतिक मूल्य भी पहचानें।

साखी २२४ चितावणी कौ अंग · मूल क्रमांक १४

जाँभण मरण बिचारि करि, कूडे काँम निहारि। जिनि पंथू तुझ चालणां, सोई पंथ सँवारि॥
कठिन शब्दार्थ

जाँभण = जन्म; कूडे = व्यर्थ या झूठे; पंथ = मार्ग।

सरल हिंदी अर्थ

जन्म-मरण पर विचार करके व्यर्थ काम छोड़ो और जिस मार्ग पर आगे चलना है, उसे अभी सँवारो।

भावार्थ और जीवन-संदेश

भविष्य की तैयारी वर्तमान कर्म से होती है। ईमानदारी, संबंध-सुधार और नियमित साधना जीवन की दिशा बनाते हैं।

साखी २२५ चितावणी कौ अंग · मूल क्रमांक १५

बिन रखवाले बहिरा, चिड़ियैं खाया खेत। आधा प्रधा ऊबरै, चेति कै तो चेति॥
कठिन शब्दार्थ

बहिरा = बिना सुरक्षा; चेति = चेत जा।

सरल हिंदी अर्थ

बिना रखवाले खेत को पक्षी खाते हैं। जो कुछ अभी बच सकता है, उसे सावधान होकर बचा लो।

भावार्थ और जीवन-संदेश

समय और मन की रक्षा स्वयं करनी होती है। देर हुई हो तब भी सुधार का शेष अवसर पहचानें।

साखी २२६ चितावणी कौ अंग · मूल क्रमांक १६

हाड़ जलै ज्यूँ लाकड़ी, केस जलै ज्यूँ घास। सब तन जलता देखि करि, भया कबीर उदास॥
कठिन शब्दार्थ

उदास = वैराग्ययुक्त या गंभीर; केस = बाल।

सरल हिंदी अर्थ

हड्डियाँ लकड़ी और बाल घास जैसे जलते देखकर कबीर जीवन की नश्वरता पर गंभीर हो गए।

भावार्थ और जीवन-संदेश

अंतिम परिणाम का बोध अभिमान कम कर सकता है। उससे उदासीनता के बजाय करुणा और सार्थक कर्म की प्रेरणा लें।

साखी २२७ चितावणी कौ अंग · मूल क्रमांक १७

कबीर मंदिर ढहि पड़ा, सेंट भई सैबार। कोई मंदिर चिणि गया, मिल्या न दूजी बार॥
कठिन शब्दार्थ

सेंट सैबार = ढही ईंटों का ढेर; चिणि = चिनकर।

सरल हिंदी अर्थ

देहरूपी भवन ढह गया और ईंटों का ढेर रह गया। उसे बनाने वाला कुशल शिल्पी फिर उसी अवसर पर नहीं मिला।

भावार्थ और जीवन-संदेश

मानव जीवन की उपलब्ध क्षमता दुर्लभ है। उसके रहते सीखने और आचरण सुधारने का अवसर न गँवाएँ।

साखी २२८ चितावणी कौ अंग · मूल क्रमांक १८

कबीर देवल ढहि पड़ा, ईंट भई सैवार। करि चेजारा सौ प्रीतिड़ी, ज्यौं ढहै न दूजी बार॥
कठिन शब्दार्थ

चेजारा = राजमिस्त्री, रूपक में स्रष्टा; प्रीतिड़ी = प्रेम।

सरल हिंदी अर्थ

देहरूपी मंदिर ढहकर ईंटों का ढेर बना। उस मूल निर्माता से प्रेम करो, जिससे भीतर का आश्रय फिर न टूटे।

भावार्थ और जीवन-संदेश

अस्थायी देह के बीच परम आश्रय की खोज है। प्रेम और विवेक से ऐसा जीवन जिएँ जिसका मूल्य केवल बाहरी रूप पर न टिका हो।

पाठ-टिप्पणी: चितावणी में कुछ अतिरिक्त प्रति-पाठ समान १८–२० क्रमांक के साथ जुड़े हैं। यहाँ मुख्य क्रम के १८–२० पद हैं; वे अतिरिक्त पाठ इस मुख्य गिनती में नहीं हैं।

साखी २२९ चितावणी कौ अंग · मूल क्रमांक १९

कबीर मंदिर लाष का, जड़िया हीरै लालि। दिवस चारि का पेषणां, विनस जाइगा काल्हि॥
कठिन शब्दार्थ

लाष = लाख; पेषणां = प्रदर्शन या तमाशा।

सरल हिंदी अर्थ

हीरे-मोती जड़ा लाख का भवन कुछ दिनों का दृश्य है; समय की आग में उसकी चमक नष्ट हो जाएगी।

भावार्थ और जीवन-संदेश

सजावट और धन जीवन का अंतिम आधार नहीं। उनके बीच नश्वरता और उत्तरदायित्व याद रखें।

साखी २३० चितावणी कौ अंग · मूल क्रमांक २०

कबीर धूलि सकेलि करि, पुड़ी ज बाँधी एह। दिवस चारि का पेषणाँ, अंति षेह का षेह॥
कठिन शब्दार्थ

सकेलि = समेटकर; पुड़ी = पोटली; षेह = धूल।

सरल हिंदी अर्थ

देह धूल समेटकर बँधी पोटली जैसी है। कुछ दिन का यह रूप अंत में फिर धूल हो जाएगा।

भावार्थ और जीवन-संदेश

देह की देखभाल के साथ आत्ममुग्धता घटाएँ। मनुष्य की गरिमा उसके सत्य, करुणा और कर्म में भी है।

साखी २३१ चितावणी कौ अंग · मूल क्रमांक २१

कबीर जे धंधै तौ धूलि, बिन धंधे धूलै नहीं। ते नर बिनठे मूलि, जिनि धंधे मैं ध्याया नहीं॥
कठिन शब्दार्थ

धंधै = सांसारिक कार्य; बिनठे मूलि = मूल अवसर खोया।

सरल हिंदी अर्थ

काम में उलझकर मन धूल-धूसरित होता है, पर केवल काम छोड़ने से निर्मल नहीं बनता; कार्य के बीच स्मरण भूलना मूल हानि है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

कबीर काम और सजगता का मेल सुझाते हैं। रोजी-रोटी निभाते हुए सत्य और आत्मपरीक्षण का धागा बना रहे।

साखी २३२ चितावणी कौ अंग · मूल क्रमांक २२

कबीर सुपनै रैनि कै, ऊघड़ि आयै नैन। जीव पड्या बहु लूटि मैं, जागै तो लैण न दैण॥
कठिन शब्दार्थ

सुपनै = स्वप्न; ऊघड़ि = खुलकर; लैण दैण = लेन-देन।

सरल हिंदी अर्थ

स्वप्न की लूट और हिसाब जागने पर मिट जाते हैं। जीवन के मोह भी जागी दृष्टि में अपना अंतिम अधिकार खोते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

मन जिन बातों को सर्वस्व मानता है, उन्हें विवेक से परखें। मूल्यवान कर्म करें, पर मोह में अपनी शांति न सौंपें।

साखी २३३ चितावणी कौ अंग · मूल क्रमांक २३

कबीर सुपनै रैनि के, पारस जीय मैं छेक। जे सोऊँ तो दोइ जणाँ, जे जागूँ तो एक॥
कठिन शब्दार्थ

छेक = भेद या चोट का संकेत; दोइ एक = द्वैत और अद्वैत।

सरल हिंदी अर्थ

स्वप्नवत अज्ञान में दो दिखाई देते हैं; जागने पर एक मूल सत्य पहचाना जाता है। इस बोध से हृदय का भेद खुलता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

विभाजन की आदत से आगे साझा आधार देखें। आत्मज्ञान का फल दूसरों के प्रति कठोर परायापन कम होना है।

साखी २३४ चितावणी कौ अंग · मूल क्रमांक २४

कबीर इस संसार में घणै मनिप मतिहींण। राम नाम जाँणौं नहीं, आये टापी दीन॥
कठिन शब्दार्थ

मनिप = मनुष्य का पाठ-रूप; टापी दीन = अवसर गँवाया।

सरल हिंदी अर्थ

अनेक मनुष्य समझ के अभाव में रामनाम का सार नहीं पहचानते और जीवन का अवसर व्यर्थ जाने देते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

अपनी प्राथमिकताएँ सजगता से चुनें। केवल भीड़ की दिशा में चलते रहने से जीवन का अर्थ नहीं मिलता।

साखी २३५ चितावणी कौ अंग · मूल क्रमांक २५

कहा कियौ हम आइ करि, कहा करेंगे जाइ। इत के भए न उत के, चाले मूल गँवाइ॥
कठिन शब्दार्थ

इत उत = यहाँ और वहाँ; मूल = जीवन की पूँजी।

सरल हिंदी अर्थ

यहाँ आकर क्या किया और जाते समय क्या साथ होगा? न इधर का सार लिया, न उधर का; मूल अवसर ही गँवाया।

भावार्थ और जीवन-संदेश

जीवन की उपलब्धियों का मूल्यांकन केवल संग्रह से न करें। देखें कि सीख, सेवा और आत्मीयता कितनी बढ़ी।

साखी २३६ चितावणी कौ अंग · मूल क्रमांक २६

आया अणआया भया, जे बहुरता संसार। पड़ा भुलाँवा गफिलाँ, गये कुबंधी हारि॥
कठिन शब्दार्थ

अणआया = मानो आया ही नहीं; गफिलाँ = असावधान।

सरल हिंदी अर्थ

यदि मन फिर उसी मोह में लौट गया, तो जीवन में आना अनआना जैसा हुआ। असावधान होकर भ्रम में मूल बाजी हार दी।

भावार्थ और जीवन-संदेश

ज्ञान मिलने के बाद व्यवहार न बदले तो सीख अधूरी है। पुरानी आदत पहचानकर छोटे ठोस सुधार करें।

साखी २३७ चितावणी कौ अंग · मूल क्रमांक २७

कबीर हरि की भगति बिन, धिगि जीमण संसार। धूँवाँ केरा धौलहर जात न लागै वार॥
कठिन शब्दार्थ

धिगि = धिक्कार; धौलहर = महल; धूँवाँ = धुआँ।

सरल हिंदी अर्थ

हरि-भक्ति रहित जीवन को कवि निष्फल कहते हैं; उसका वैभव धुएँ के महल जैसा है, जो तुरंत मिट सकता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

तीखा कथन भीतर के सार पर ध्यान दिलाता है। बाहरी सफलता के साथ प्रेम और नैतिकता भी विकसित करें।

साखी २३८ चितावणी कौ अंग · मूल क्रमांक २८

जिहि हरि की चोरी करि, गये राम गुण भूलि। ते बिंधना बागुल रचे, रहे अरध मुखि झूलि॥
कठिन शब्दार्थ

बिधना = विधाता; बागुल = बगुला; अरध मुखि = सिर झुकाए।

सरल हिंदी अर्थ

राम के गुण भूलने वालों को कवि ऐसे बगुले से जोड़ते हैं जो मानो लज्जा में सिर झुकाए खड़ा है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह लोकविश्वास और पशु-उपमा का काव्य है। व्यवहार की सीख है कि विवेक का अवसर पाकर उसे छल और स्वार्थ में न गँवाएँ।

साखी २३९ चितावणी कौ अंग · मूल क्रमांक २९

माटी मलणि कुँभार की, घड़ीं सहै सिरि लात। इहि औसरि चेत्या नहीं, चूका अबकी घात॥
कठिन शब्दार्थ

मलणि = रौंदी जाने वाली; घात = अवसर।

सरल हिंदी अर्थ

कुम्हार की मिट्टी अनेक लातें सहकर आकार पाती है। अभी चेत न आए तो जीवन का मिला अवसर चूक जाएगा।

भावार्थ और जीवन-संदेश

कठिन अनुभव अपने आप ज्ञान नहीं बनते। उनसे सीख लेकर मन और व्यवहार को उचित दिशा देना आवश्यक है।

साखी २४० चितावणी कौ अंग · मूल क्रमांक ३०

इहि औसरि चेत्या नहीं, पसु ज्यूँ पाली देह। राम नाम जांण्यां नहीं, अंति पड़ी मुख पेह॥
कठिन शब्दार्थ

पसु = पशु; पेह = राख या धूल; औसरि = अवसर।

सरल हिंदी अर्थ

जीवन का अवसर पाकर भी केवल देह पालते रहे और रामनाम का सार न समझा, तो अंत में देह धूल ही होगी।

भावार्थ और जीवन-संदेश

देखभाल और आजीविका जरूरी हैं, पर जीवन उनसे व्यापक है। विवेक, करुणा और साधना को भी समय दें।

पाठ-टिप्पणी: ऑनलाइन पाठ में इस पद का अंत और अगले पद का क्रमांक मिल गए हैं। स्वतंत्र संदर्भ-पाठ से स्थानीय क्रमांक ३० और ३१ को अलग किया गया है।

साखी २४१ चितावणी कौ अंग · मूल क्रमांक ३१

राम नाम जाण्यो नहीं, लानी मोटी षोड़ि। काया हाँडी काठ की, ना ऊ चढ़े बहोड़ि॥
कठिन शब्दार्थ

षोड़ि = घाव या हानि; बहोड़ि = दोबारा।

सरल हिंदी अर्थ

नाम का सार न समझकर बड़ी हानि की। देह काठ की हाँडी जैसी है, जो एक बार नष्ट होकर उसी रूप में फिर काम नहीं आती।

भावार्थ और जीवन-संदेश

वर्तमान अवसर को बार-बार मिल जाने वाला न मानें। अपनी क्षमता रहते आवश्यक सुधार और शुभ काम करें।

साखी २४२ चितावणी कौ अंग · मूल क्रमांक ३२

राम नाम जाण्या नहीं, बात बिनंठी मूलि। हरत इहाँ ही हारिया, परति पड़ी मुख धूलि॥
कठिन शब्दार्थ

बिनंठी = बिगड़ी; हरत = बाजी खेलते; परति = अंत में।

सरल हिंदी अर्थ

रामनाम की पहचान न हुई तो मूल बात बिगड़ गई; जीवन की बाजी यहीं हारकर अंत में केवल धूल मिली।

भावार्थ और जीवन-संदेश

रोज की छोटी पसंद जीवन की बड़ी दिशा बनाती है। अपने कर्म को भीतर के मूल्यों से जोड़ते रहें।

साखी २४३ चितावणी कौ अंग · मूल क्रमांक ३३

राम नाम जाँण्याँ नहीं, पल्यो कटक कुटुम्ब। धंधा ही में मरि गया, बाहर हुई न बंब॥
कठिन शब्दार्थ

कटक = बड़ा दल; बंब = पुकार या प्रभाव।

सरल हिंदी अर्थ

कुटुंब का बड़ा दल पाला, पर रामनाम का सार नहीं जाना। धंधे में जीवन बीता और अंत में कोई स्थायी आश्रय न मिला।

भावार्थ और जीवन-संदेश

परिवार की जिम्मेदारी प्रेम से निभाएँ, लेकिन केवल विस्तार और व्यस्तता में अपनी अंतःचेतना न खोएँ।

साखी २४४ चितावणी कौ अंग · मूल क्रमांक ३४

मनिषा जनम दुर्लभ है, देह न बारम्बार। तरवर थैं फल झड़ि पड़ा बहुरि न लागै डार॥
कठिन शब्दार्थ

दुर्लभ = कठिनाई से उपलब्ध; डार = डाल।

सरल हिंदी अर्थ

मानव जन्म दुर्लभ है और यह देह बार-बार उसी रूप में नहीं मिलती। डाली से गिरा फल फिर उसी डाल पर नहीं जुड़ता।

भावार्थ और जीवन-संदेश

समय की अपरिवर्तनीयता समझें। जीवन रहते सीख, सेवा और संबंधों की मरम्मत का अवसर अपनाएँ।

साखी २४५ चितावणी कौ अंग · मूल क्रमांक ३५

कबीर हरि की भगति करि, तजि बिषिया रस चोज। बारबार नहीं पाइए, मनिषा जन्म की मौज॥
कठिन शब्दार्थ

बिषिया रस = विषय-सुख; चोज = चाव।

सरल हिंदी अर्थ

हरि-भक्ति करो और विषयों की अनियंत्रित आसक्ति छोड़ो; मानव जीवन का यह सुंदर अवसर बार-बार नहीं मिलता।

भावार्थ और जीवन-संदेश

सुख का त्याग भर उद्देश्य नहीं, उसके दास होने से बचना है। आनंद के साथ संयम और उच्च उद्देश्य बनाए रखें।

साखी २४६ चितावणी कौ अंग · मूल क्रमांक ३६

कबीर यहु तन जात है, सकै तो ठाहर लाइ। कै सेवा करि साध की, कै गुण गोविंद के गाइ॥
कठिन शब्दार्थ

ठाहर लाइ = उचित काम में लगा; साध = संत।

सरल हिंदी अर्थ

यह देह जा रही है; संभव हो तो उसे सार्थक कार्य में लगाओ—संतों की सेवा या गोविंद के गुण-स्मरण में।

भावार्थ और जीवन-संदेश

जीवन का मूल्य केवल अवधि नहीं, उसके उपयोग में है। सेवा, सत्य और प्रेम अभी से अभ्यास में आएँ।

साखी २४७ चितावणी कौ अंग · मूल क्रमांक ३७

कबीर यह तन जात है, सकै तो लेहु बहोड़ि। नागे हाथूँ ते गए, जिनके लाख करोड़ि॥
कठिन शब्दार्थ

बहोड़ि = वापस सँभाल; नागे हाथूँ = खाली हाथ।

सरल हिंदी अर्थ

यह देह बीत रही है, अभी सँभल सकते हो तो सँभलो। लाखों-करोड़ों वाले भी खाली हाथ चले गए।

भावार्थ और जीवन-संदेश

धन आवश्यक साधन हो सकता है, अंतिम उपलब्धि नहीं। उसके उपयोग से कल्याण और अपने भीतर संतोष बढ़ाएँ।

साखी २४८ चितावणी कौ अंग · मूल क्रमांक ३८

यह तनु काचा कुंभ है, चोट चहूँ दिसि खाइ। एक राम के नाँव बिन, जदि तदि प्रलै जाइ॥
कठिन शब्दार्थ

काचा कुंभ = कच्चा घड़ा; प्रलै = नष्ट।

सरल हिंदी अर्थ

देह कच्चा घड़ा है, जिसे चारों ओर चोट लगती है। परम आश्रय के बोध बिना किसी भी समय यह टूट सकता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

नश्वरता के बीच चित्त का आधार मजबूत करें। भक्ति के साथ देखभाल और विवेकपूर्ण जीवन भी अपनाएँ।

साखी २४९ चितावणी कौ अंग · मूल क्रमांक ३९

यह तन काचा कुंभ है, लिया फिरै था साथि। ढबका लागा फुटि गया, कछू न आया हाथि॥
कठिन शब्दार्थ

ढबका = धक्का; हाथि = हाथ में।

सरल हिंदी अर्थ

कच्चा घड़ा साथ लिए घूम रहा था; धक्का लगा तो टूट गया और हाथ में कुछ नहीं आया।

भावार्थ और जीवन-संदेश

अस्थायी साधन पर पूरा अभिमान रखना भूल है। अपनी उपलब्धि को केवल देह, पद और संग्रह तक सीमित न करें।

साखी २५० चितावणी कौ अंग · मूल क्रमांक ४०

काँची कारी जिनि करै, दिन दिन बधै बियाधि। राम कबीरै रुचि भई, याही ओषदि साधि॥
कठिन शब्दार्थ

काँची कारी = कच्चा, अधूरा काम; बियाधि = रोग या मोह; ओषदि = औषधि।

सरल हिंदी अर्थ

अधूरे बाहरी उपाय से भीतर की व्याधि बढ़ती है। कबीर को राम-स्मरण की रुचि हुई; वे इसी आंतरिक औषधि को साधते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह आध्यात्मिक मोह की चिकित्सा का रूपक है। वास्तविक परिवर्तन के लिए नियमित मनन और व्यवहार-सुधार आवश्यक हैं।

साखी २५१ चितावणी कौ अंग · मूल क्रमांक ४१

कबीर अपने जीवतै, ए दोइ बातैं धोइ। लोग बड़ाई कारणै, अछता मूल न खोइ॥
कठिन शब्दार्थ

अछता = शेष रहते; मूल = जीवन का सार; धोइ = साफ कर।

सरल हिंदी अर्थ

जीते जी अपनी बात साफ समझो; लोगों से बड़ाई पाने के लिए रहते हुए मूल आध्यात्मिक पूँजी मत खोओ।

भावार्थ और जीवन-संदेश

प्रशंसा की चाह विवेक को कमजोर कर सकती है। दिखावे के बजाय ईमानदार आत्ममूल्यांकन अपनाएँ।

साखी २५२ चितावणी कौ अंग · मूल क्रमांक ४२

खंभा एक गइंद दोइ, क्यूँ करि बंधिसि बारि। मानि करै तो पीव नहीं, पीव तौ मानि निवारि॥
कठिन शब्दार्थ

गइंद = हाथी; बारि = बाड़ा; मानि = अभिमान।

सरल हिंदी अर्थ

एक खंभे से दो हाथी कैसे बँधें? उसी तरह हृदय में अभिमान और प्रिय का पूरा स्थान एक साथ नहीं बनता।

भावार्थ और जीवन-संदेश

गहरा प्रेम अहं की जगह माँगता है। सम्मान की अपेक्षा छोड़कर दूसरों को सुनना और अपनी गलती मानना सीखें।

साखी २५३ चितावणी कौ अंग · मूल क्रमांक ४३

दीन गँवाया दुनी सौं, दुनी न चाली साथि। पाइ कुहाड़ा मारिया, गाफिल अपणै हाथि॥
कठिन शब्दार्थ

दीन = धर्म या आंतरिक आधार; दुनी = दुनिया; गाफिल = असावधान।

सरल हिंदी अर्थ

दुनिया के लिए अपना धर्म खोया, पर दुनिया साथ नहीं चली। असावधान होकर अपने ही पाँव पर कुल्हाड़ी मारी।

भावार्थ और जीवन-संदेश

क्षणिक लाभ के लिए सत्य और विश्वास न गँवाएँ। ऐसी कमाई अंततः आत्मसम्मान और संबंध दोनों को चोट पहुँचाती है।

साखी २५४ चितावणी कौ अंग · मूल क्रमांक ४४

यह तन तो सब बन भया, करम भए कुहाड़ि। आप आप कूँ काटिहैं, कहैं कबीर विचारि॥
कठिन शब्दार्थ

बन = वन; कुहाड़ि = कुल्हाड़ी।

सरल हिंदी अर्थ

देह और जीवन वन जैसे हैं, कर्म कुल्हाड़ी बन सकते हैं। अपने ही बुरे कर्म से मनुष्य स्वयं को काटता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

फल के लिए दूसरों को दोष देने से पहले अपने निर्णय देखें। छोटे गलत कर्म भी लगातार हों तो जीवन का आधार कमजोर करते हैं।

साखी २५५ चितावणी कौ अंग · मूल क्रमांक ४५

कुल खोया कुल ऊबरै, कुल राख्यो कुल जाइ। राम निकुल कुल भेंटि लैं, सब कुल रह्या समाइ॥
कठिन शब्दार्थ

कुल = वंश-अभिमान; निकुल = कुल-भेद से परे।

सरल हिंदी अर्थ

वंश का अभिमान छोड़ने से सच्चा कल्याण होता है। राम कुल की सीमाओं से परे हैं और सबको अपने में समेटते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

जन्म को श्रेष्ठता का आधार न बनाएँ। मनुष्य की पहचान उसके गुण और कर्म से करें।

साखी २५६ चितावणी कौ अंग · मूल क्रमांक ४६

दुनिया के धोखे मुवा, चलै जु कुल की काँण। तबकुल किसका लाजसी, जब ले धर्‌या मसाँणि॥
कठिन शब्दार्थ

काँण = मर्यादा या दबाव; मसाँणि = श्मशान।

सरल हिंदी अर्थ

दुनिया के धोखे और कुल-प्रतिष्ठा के दबाव में जीवन बीत गया; श्मशान में पहुँचने पर किस कुल की लाज साथ होगी?

भावार्थ और जीवन-संदेश

सामाजिक दिखावे के लिए विवेक न खोएँ। परिवार का सम्मान सत्य और सदाचार से हो, ऊँच-नीच के अहं से नहीं।

साखी २५७ चितावणी कौ अंग · मूल क्रमांक ४७

दुनियाँ भाँडा दुख का भरी मुँहामुह भूष। अदया अलह राम की, कुरलै ऊँणी कूष॥
कठिन शब्दार्थ

मुँहामुह = मुँह तक भरा; ऊणी कूष = खाली उदर; अदया = दया का अभाव।

सरल हिंदी अर्थ

दुनिया दुःख और भूख से भरे पात्र जैसी दिखती है; दया के अभाव में लोग व्याकुल पुकारते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह जगत की पीड़ा पर संत की करुण दृष्टि है। नश्वरता का विचार दूसरों की भूख और दुःख से मुँह मोड़ने के बजाय सहायता जगाए।

साखी २५८ चितावणी कौ अंग · मूल क्रमांक ४८

जिहि जेबड़ी जग बंधिया, तूँ जिनि बँधै कबीर। ह्नैसी आटा लूँण ज्यूँ, सोना सँवाँ शरीर॥
कठिन शब्दार्थ

जेबड़ी = रस्सी; ह्नैसी = हो जाएगी; लूँण = नमक।

सरल हिंदी अर्थ

जिस मोह-रस्सी से जग बँधा है, उसमें मत बँधो। सोने जैसा शरीर भी आटे में नमक की तरह अपना अलग रूप खो देगा।

भावार्थ और जीवन-संदेश

देह और संपत्ति को स्थायी मानकर आसक्ति न बढ़ाएँ। उनका उपयोग करें और भीतर स्वतंत्रता बनाए रखें।

साखी २५९ चितावणी कौ अंग · मूल क्रमांक ४९

कहत सुनत जग जात है, विषै न सूझै काल। कबीर प्यालै प्रेम कै, भरि भरि पिवै रसाल॥
कठिन शब्दार्थ

विषै = विषयों में; रसाल = रसयुक्त।

सरल हिंदी अर्थ

कहते-सुनते दुनिया समय खोती है और विषयों के बीच काल नहीं देखती; कबीर प्रेम का प्याला भर-भरकर पीते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

बातों से आगे अनुभव और कर्म का मूल्य है। समय को निरर्थक विवाद से बचाकर प्रेमपूर्ण साधना में लगाएँ।

साखी २६० चितावणी कौ अंग · मूल क्रमांक ५०

कबीर हद के जीव सूँ, हित करि मुखाँ न बोलि। जे लागे बेहद सूँ, तिन सूँ अंतर खोलि॥
कठिन शब्दार्थ

हद = सीमित स्वार्थ; बेहद = व्यापक सत्य; अंतर खोलि = मन खोलकर।

सरल हिंदी अर्थ

सीमित मोह में फँसे व्यक्ति के सामने अंतरंग बात व्यर्थ न खोलो; व्यापक सत्य से जुड़े सजग व्यक्ति से मन की बात कहो।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह संवाद के योग्य श्रोता चुनने का विवेक है। लोगों का तिरस्कार किए बिना अपनी अंतरंगता का सम्मान रखें।

साखी २६१ चितावणी कौ अंग · मूल क्रमांक ५१

कबीर केवल राम की, तूँ जिनि छाड़ै ओट। घण अहरणि बिचि लोह ज्यूँ, घड़ी सहे सिर चोट॥
कठिन शब्दार्थ

ओट = आश्रय; घण = हथौड़ा; अहरणि = निहाई।

सरल हिंदी अर्थ

राम का आश्रय मत छोड़ो। उसके बिना मन लोहे की तरह हथौड़े और निहाई के बीच बार-बार चोट सहता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

कठिनाई के बीच अपने मूल मूल्य स्थिर रखें। बाहरी दबाव से बचने के लिए छल और लोभ की दिशा न चुनें।

साखी २६२ चितावणी कौ अंग · मूल क्रमांक ५२

कबीर केवल राम कहि, सुध गरीबी झालि। कूड़ बड़ाई बूड़सी, भारी पड़सी काल्हि॥
कठिन शब्दार्थ

सुध गरीबी = निर्मल विनम्रता; कूड़ बड़ाई = झूठा अभिमान।

सरल हिंदी अर्थ

राम-स्मरण के साथ सच्ची नम्रता धारण करो। झूठी बड़ाई का बोझ अंत में डुबो सकता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह आर्थिक अभाव की प्रशंसा नहीं, अहंहीनता का भाव है। उपलब्धि के बीच भी सरल और आदरपूर्ण बने रहें।

साखी २६३ चितावणी कौ अंग · मूल क्रमांक ५३

काया मंजन क्या करै, कपड़ धोइम धोइ। उजल हूवा न छूटिए, सुख नींदड़ी न सोह॥
कठिन शब्दार्थ

मंजन = साफ करना; उजल = बाहरी सफेदी।

सरल हिंदी अर्थ

देह मलने और कपड़े धोने भर से भीतर की मुक्ति नहीं होती। केवल उजले दिखकर असावधान निश्चिंतता में मत रहो।

भावार्थ और जीवन-संदेश

स्वच्छता अच्छी है, पर वह चरित्र का विकल्प नहीं। विचार, वाणी और कर्म की शुद्धि भी आवश्यक है।

साखी २६४ चितावणी कौ अंग · मूल क्रमांक ५४

उजल कपड़ा पहरि करि, पान सुपारी खाँहि। एके हरि का नाँव बिन, बाँधे जमपुरि जाँहि॥
कठिन शब्दार्थ

पहरि = पहनकर; जमपुरि = मृत्यु का क्षेत्र।

सरल हिंदी अर्थ

उजले वस्त्र, पान और सुपारी से जीवन सजता है, पर हरिनाम का सार न हो तो मृत्यु के बंधन से यह सजावट नहीं बचाती।

भावार्थ और जीवन-संदेश

बाहरी सुंदरता के साथ भीतर प्रेम और विवेक रखें। सामाजिक रूप और वास्तविक अंतःस्थिति का अंतर पहचानें।

साखी २६५ चितावणी कौ अंग · मूल क्रमांक ५५

तेरा संगी कोइ नहीं, सब स्वारथ बँधी लोइ। मनि परतीति न ऊपजै, जीव बेसास न होइ॥
कठिन शब्दार्थ

लोइ = संसार; परतीति बेसास = विश्वास।

सरल हिंदी अर्थ

लोग अक्सर स्वार्थ से बँधे हैं; केवल बाहरी साथ पर पूर्ण निर्भर मन को भीतर स्थिर विश्वास नहीं मिलता।

भावार्थ और जीवन-संदेश

कथन मनुष्य-विरोध नहीं, विवेक की चेतावनी है। संबंध निभाएँ, साथ ही अपनी नैतिक स्थिरता और परम आश्रय विकसित करें।

साखी २६६ चितावणी कौ अंग · मूल क्रमांक ५६

मांइ बिड़ाणों बाप बिड़, हम भी मंझि बिड़ाह। दरिया केरी नाव ज्यूँ, संजोगे मिलियाँह॥
कठिन शब्दार्थ

बिड़ाणों = पराए या अलग यात्री; संजोगे = संयोग से।

सरल हिंदी अर्थ

माँ, पिता और हम भी अपने-अपने यात्री हैं; नदी की नावों की तरह संयोग से साथ मिले हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

साथ अस्थायी है, इसलिए उपेक्षा नहीं, अधिक कृतज्ञता उचित है। रहते हुए प्रेम, सेवा और संवाद निभाएँ।

साखी २६७ चितावणी कौ अंग · मूल क्रमांक ५७

इत प्रधर उत घर बड़जण आए हाट। करम किराणाँ बेचि करि, उठि ज लागे बाट॥
कठिन शब्दार्थ

हाट = बाज़ार; करम किराणा = कर्मों का माल; बाट = मार्ग।

सरल हिंदी अर्थ

इस जीवन को हाट में आए यात्री-व्यापारी जैसा कहा गया है। अपने कर्मों का व्यापार करके सब आगे की राह पकड़ते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

बाजार की उपमा जीवन को यात्रा मानती है। पहली पंक्ति का वेब-पाठ कठिन है; मुख्य आशय कर्म की जिम्मेदारी और अस्थायी ठहराव है।

पाठ-टिप्पणी: पहली पंक्ति का संदर्भ-वेब-पाठ “इत प्रधर उत घर…” ही है; उसे अनुमान से नहीं बदला गया है। स्रोत की ख-प्रति टिप्पणी में “एथि परिघरि उथि घरि, जोवण आए हाट” पाठांतर मिलता है।

साखी २६८ चितावणी कौ अंग · मूल क्रमांक ५८

नान्हाँ काती चित दे, महँगे मोलि बिकाइ। गाहक राजा राम है और न नेड़ा आइ॥
कठिन शब्दार्थ

नान्हाँ काती = महीन सूत कात; गाहक = ग्राहक; नेड़ा = निकट।

सरल हिंदी अर्थ

ध्यान से महीन सूत कातो, तभी वह बहुमूल्य होगा। उसका पारखी ग्राहक राम है, कोई दूसरा उसका सही मूल्य नहीं जानता।

भावार्थ और जीवन-संदेश

कबीर बुनकर के काम से साधना समझाते हैं। सूक्ष्म सजगता और ईमानदार परिश्रम को बाहरी प्रशंसा से अधिक महत्त्व दें।

साखी २६९ चितावणी कौ अंग · मूल क्रमांक ५९

डागल उपरि दौड़णां, सुख नींदड़ी न सोइ। पुनै पाए द्यौंहणे, ओछी ठौर न खोइ॥
कठिन शब्दार्थ

डागल = ऊँचा कठिन ठिकाना; ओछी ठौर = नीचे या अनुपयुक्त स्थान।

सरल हिंदी अर्थ

मार्ग कठिन है; असावधानी की नींद में मत रहो। मिला हुआ मूल्यवान अवसर किसी ओछे ठहराव में न खो दो।

भावार्थ और जीवन-संदेश

कठिन पुराने पदों का केंद्रीय संकेत सजगता है। अपने संकल्प को छोटे प्रलोभन और आलस्य के कारण कमजोर न होने दें।

साखी २७० चितावणी कौ अंग · मूल क्रमांक ६०

मैं मैं बड़ी बलाइ है, सके तो निकसी भाजि। कब लग राखौं हे सखी, रूई पलेटी आगि॥
कठिन शब्दार्थ

मैं मैं = अहं का आग्रह; बलाइ = विपत्ति।

सरल हिंदी अर्थ

‘मैं-मैं’ बड़ी विपत्ति है; संभव हो तो उससे बाहर निकलो। रूई में लिपटी आग को कब तक सुरक्षित रखोगे?

भावार्थ और जीवन-संदेश

अहंकार भीतर छिपकर संबंधों को जलाता है। उसे पहचानने के लिए नम्रता, संवाद और गलती स्वीकारने का अभ्यास करें।

साखी २७१ चितावणी कौ अंग · मूल क्रमांक ६१

मैं मैं मेरी जिनि करै, मेरी मूल बिनास। मेरी पग का पैषड़ा, मेरी गल की पास॥
कठिन शब्दार्थ

पैषड़ा = बेड़ी; पास = फंदा; मूल बिनास = आधार की हानि।

सरल हिंदी अर्थ

‘मेरी-मेरी’ का आग्रह मूल कल्याण नष्ट करता है। वही पैरों की बेड़ी और गले का फंदा बन जाता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

उपयोग और स्वामित्व की जिद अलग हैं। आवश्यक जिम्मेदारी निभाते हुए संग्रह तथा अधिकार के अहं को सीमित रखें।

साखी २७२ चितावणी कौ अंग · मूल क्रमांक ६२

कबीर नाव जरजरी, कूड़े खेवणहार। हलके हलके तिरि गए, बूड़े तिनि सिर भार॥
कठिन शब्दार्थ

जरजरी = जर्जर; कूड़े = अयोग्य; खेवणहार = नाविक।

सरल हिंदी अर्थ

नाव जर्जर है और नाविक भी भरोसेमंद नहीं। हलके लोग पार उतर गए; सिर पर बोझ रखने वाले डूब गए।

भावार्थ और जीवन-संदेश

अहं, लोभ और व्यर्थ संग्रह का बोझ यात्रा कठिन करता है। विवेकपूर्ण मार्गदर्शन और सरल जीवन से भीतर हलकापन बढ़ाएँ।

पूरे प्रथम भाग से मनन के छह सूत्र

  1. गुरु का फल विवेक: शिक्षा अपने प्रश्न और उत्तरदायित्व से जोड़े।
  2. नाम और कर्म का मेल: स्मरण मन, वाणी और आचरण में उतरे।
  3. प्रेम में अहं घटे: साधना दूसरों के प्रति करुणा तथा समान सम्मान बढ़ाए।
  4. अनुभव में विनय: अधूरी समझ को अंतिम उपलब्धि कहकर न प्रस्तुत करें।
  5. सेवा निष्काम हो: भक्ति को केवल लाभ और प्रशंसा का सौदा न बनाएँ।
  6. समय का सदुपयोग: मानव जीवन का अवसर रहते संबंध-सुधार, सीख और शुभ कर्म अपनाएँ।

इस संग्रह से जुड़े सामान्य प्रश्न

पहले भाग में कितनी साखियाँ हैं?

इस लेख में २७२ मुख्य साखियाँ हैं। पहले १२ अंग पूरे हैं—गुरुदेव कौ अंग से चितावणी कौ अंग तक। मूल अंग-क्रमांक और लेख के संयुक्त क्रमांक दोनों दिए हैं।

साखी-संग्रह कितने भागों में पूरा होगा?

मुख्य ५९ अंगों की योजना ३ बड़े भागों की है: भाग १ में अंग १–१२, भाग २ में १३–३२ और भाग ३ में ३३–५९। हर अंग को उसी भाग में पूरा रखा जाएगा।

क्या यह पूरा कबीर साहित्य है?

यह मुख्य साखी-पाठ की श्रृंखला है। कबीर के पद, भजन, रमैनी तथा विभिन्न संकलनों के अतिरिक्त पाठ अलग सामग्री हैं। उन्हें इन तीन भागों में शामिल बताना सही नहीं होगा।

‘अंग’ और ‘साखी’ क्या हैं?

अंग विषय के अनुसार बना खंड है। साखी अनुभव और जीवन-दृष्टि का संक्षिप्त उपदेशात्मक पद है; कबीर की बहुत-सी साखियाँ दोहा-रूप में प्रसिद्ध हैं।

कबीर का ‘राम’ किस अर्थ में है?

इन साखियों में राम अनेक स्थानों पर सर्वव्यापक परम तत्त्व और अंतर के प्रिय का संबोधन है। हर पद को केवल कथा-प्रसंग के सीमित अर्थ में नहीं पढ़ना चाहिए।

अलग पुस्तकों में कुल संख्या और वर्तनी अलग क्यों मिलती है?

मुख्य पाठ, वैकल्पिक पांडुलिपि-पाठ और परिशिष्ट को गिनने की पद्धति बदल सकती है। वेब-प्रतिलिपियों के संयुक्त योग में भी त्रुटियाँ हैं। यहाँ अंग का मूल स्थानीय क्रमांक प्राथमिक पहचान है; भाग की संख्या मुख्य पदों को अलग गिनकर दी गई है।

क्या शब्दार्थ और भावार्थ मूल कबीर-वाणी हैं?

नहीं। मूल साखियाँ अलग काव्य-पट्टी में हैं; अर्थ और जीवन-संदेश इस लेख की स्वतंत्र व्याख्याएँ हैं। योगिक उलटबाँसियों के एक से अधिक अर्थ संभव हैं।

संदर्भ-पाठ और संपादन की जानकारी

आधार: श्यामसुंदर दास संपादित कबीर ग्रंथावली का मुख्य साखी-पाठ। इस भाग में अंग १–१२ लिए गए हैं।

पाठ-व्यवस्था: अनावश्यक वेब-पंक्ति-विभाजन और रिक्तियाँ व्यवस्थित की गई हैं। गुरुदेव के मूल क्रमांक ५ और ७ को हिन्दवी से मिलाया गया है। सुमिरण ७, विरह ३३ और चितावणी ३०–३१ में मिले प्रतिलिपि-संबंधी मिश्रण अलग किए गए हैं। शेष मूल शब्दों की पुरानी वर्तनी बड़े स्तर पर आधुनिक नहीं बनाई गई है।

गिनती: अंगों में क्रमशः ३५, ३२, ४५, १०, ४८, ८, ४, ५, २, ३, १८ और ६२ मुख्य पद हैं—कुल २७२। वैकल्पिक प्रति-टिप्पणियों के अतिरिक्त दोहे मुख्य गिनती में नहीं जोड़े गए हैं। स्रोत में छपे कुछ संयुक्त संचयी योग अंकगणित से मेल नहीं खाते; यहाँ उनकी जगह स्पष्ट संपादकीय संयुक्त क्रमांक हैं।

व्याख्या: शब्दार्थ संदर्भानुसार हैं; कठिन, संदिग्ध या बहुअर्थी योगिक पदों का आशय अध्ययन की सहायता के लिए दिया गया है। अज्ञात शब्दों को अनुमान से नया मूल पाठ बनाकर नहीं जोड़ा गया है। यह सरल पाठक-संस्करण है, सभी पांडुलिपियों का आलोचनात्मक संस्करण नहीं।

ज्ञान को जीवन की दिशा बनाएँ

एक साखी चुनें, अर्थ समझें और उसकी एक सीख आज के व्यवहार में उतारें। गुरु का प्रकाश, प्रेम का स्मरण और समय की सजगता इसी तरह जीवन में उतरते हैं।

अगला निर्धारित भाग: अंग १३–३२—मन कौ अंग से सारग्राही कौ अंग तक। प्रकाशन के बाद यहीं उसका वास्तविक लिंक जोड़ा जाएगा।

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