गोस्वामी तुलसीदास जी की दोहावली भाग 2 — छंद 289–573 मूल पाठ, हिंदी अर्थ एवं भावार्थ

भक्ति भावना प्रस्तुत · गोस्वामी तुलसीदास जी का संत साहित्य
श्री तुलसी दोहावली · विस्तृत भाग २

श्री तुलसी दोहावली — भाग 2
छंद 289–573 · मूल पाठ एवं हिंदी अर्थ

अनन्य प्रेम · सत्संग · नीति · राजधर्म · विवेक · सीताराम-स्मरण

प्रेम की अनन्य टेक से सीताराम-स्मरण के मंगल तक—गोस्वामी तुलसीदास जी के शेष २८५ छंद एक व्यवस्थित लेख में। हर छंद के साथ कठिन शब्दार्थ, सरल हिंदी अर्थ और स्वतंत्र भावार्थ।

२८५ मूल छंद१२ अध्ययन-खंडदोहा और सोरठादूसरा एवं अंतिम भाग

दोहावली का दूसरा और अंतिम विस्तृत भाग

इस लेख में छंद २८९–५७३ पूरे क्रम से दिए गए हैं। भाग १ के २८८ और इस भाग के २८५ छंद मिलाकर प्रचलित क्रम का संपूर्ण ५७३-छंदों का संग्रह केवल दो लेखों में पूरा होता है।

लंबे पाठ को १२ अध्ययन-खंडों में बाँटा गया है। नीचे विषय-सूची या क्रमांक चुनकर मूल पाठ, शब्दार्थ, हिंदी अर्थ और भावार्थ पर सीधे पहुँचें। खंडों के शीर्षक पढ़ने की सुविधा के लिए संपादकीय रूप से रखे गए हैं।

भाग २ की विषय-सूची

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छंद २८९–३१२
छंद ३१३–३३६
छंद ३३७–३६०
छंद ३६१–३८४
छंद ३८५–४०८
छंद ४०९–४३२
छंद ४३३–४५६
छंद ४५७–४८०
छंद ४८१–५०४
छंद ५०५–५२८
छंद ५२९–५५२
छंद ५५३–५७३

खंड १ · चातक की प्रेम-टेक और अनन्य निष्ठा

छंद २८९–३१२ · प्रेम में आत्मीयता, गरिमा और विश्वास के काव्य-चित्र।

छंद २८९ दोहा

प्रीति पपीहा पयद की प्रगट नई पहिचानि। जाचक जगत कनाउड़ो कियो कनौड़ा दानि ॥
कठिन शब्दार्थ

पयद = मेघ; जाचक = याचक; कनौड़ा = ऋणी।

सरल हिंदी अर्थ

पपीहे और मेघ के प्रेम की रीति निराली है। सामान्य याचक दाता का ऋणी होता है, पर निष्कपट चातक ने अपने प्रेम से दाता मेघ को ही अपना ऋणी बना दिया।

भावार्थ और जीवन-संदेश

भक्ति का मूल्य भेंट की मात्रा में नहीं, भाव की सत्यता में है। सच्चा प्रेम संबंध को लेन-देन से ऊपर उठाता है। सेवा और कृतज्ञता में दोनों पक्ष एक-दूसरे का सम्मान करते हैं।

छंद २९० दोहा

नहिं जाचत नहिं संग्रही सीस नाइ नहिं लेइ। ऐसे मानी मागनेहि को बारिद बिन देइ ॥
कठिन शब्दार्थ

संग्रही = संग्रह करता; मानी = स्वाभिमानी; बारिद = बादल।

सरल हिंदी अर्थ

चातक न मुख से माँगता, न संग्रह करता, न किसी के सामने सिर झुकाकर लेता है। ऐसे स्वाभिमानी प्रेमी को मेघ के सिवा कौन समझकर दे सकता है?

भावार्थ और जीवन-संदेश

रूपक प्रेम में गरिमा और संतोष दिखाता है। आवश्यकता से अधिक संग्रह न करना और सम्मानपूर्ण संबंध रखना इसकी प्रेरणा है। इसे वास्तविक सहायता लेने या जल पीने से इनकार का नियम न समझें।

छंद २९१ दोहा

को को न ज्यायो जगत में जीवन दायक दानि। भयो कनौड़ो जाचकहि पयद प्रेम पहिचानि ॥
कठिन शब्दार्थ

ज्यायो = जिलाया; जीवन दायक = जीवन देने वाला; पहिचानि = पहचानकर।

सरल हिंदी अर्थ

मेघ ने संसार के असंख्य जीवों को जीवन दिया, पर चातक का प्रेम पहचानकर उसी याचक का ऋणी बन गया।

भावार्थ और जीवन-संदेश

दाता की महानता केवल देने में नहीं, प्रेम पहचानने में भी है। किसी की निष्कपट निष्ठा को उसके साधनों से न आँकें। सेवा स्वीकार करने वाले की कृतज्ञता संबंध को और सुंदर बनाती है।

छंद २९२ दोहा

साधन साँसति सब सहत सबहि सुखद फल लाहु। तुलसी चातक जलद की रीझि बूझि बुध काहु ॥
कठिन शब्दार्थ

साँसति = कष्ट; लाहु = लाभ; रीझि-बूझि = प्रेम और पहचान।

सरल हिंदी अर्थ

चातक कष्ट सहता है और मेघ सबको सुखद फल देता है। कवि कहते हैं कि चातक की रीझ और मेघ की प्रेम-पहचान विरले समझते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह अनन्य भक्ति का साहित्यिक चित्र है। प्रेम के गहरे अनुभव को केवल बाहरी लाभ से नहीं मापा जा सकता। निष्ठा के साथ अपने स्वास्थ्य, विवेक और वास्तविक परिस्थितियों का ध्यान भी बना रहना चाहिए।

छंद २९३ दोहा

चातक जीवन दायकहि जीवन समयँ सुरीति। तुलसी अलख न लखि परै चातक प्रीति प्रतीति ॥
कठिन शब्दार्थ

अलख = अगम; प्रतीति = विश्वास; सुरीति = सुंदर रीति।

सरल हिंदी अर्थ

मेघ की जीवनदायिनी रीति जीवनकाल में दिखती है; पर चातक का प्रेम और विश्वास इतने गहरे हैं कि उनका पूरा रहस्य आसानी से नहीं समझा जाता।

भावार्थ और जीवन-संदेश

कवि निष्ठा को केवल अनुकूल समय तक सीमित नहीं रखते। कठिनाई में भी शुभ आदर्श पर टिकना साधना का अभ्यास है। दूसरे के अंतःकरण की गहराई पर जल्दबाजी से निर्णय न देना भी आवश्यक है।

छंद २९४ दोहा

जीव चराचर जहँ लगे है सब को हित मेह। तुलसी चातक मन बस्यो घन सों सहज सनेह ॥
कठिन शब्दार्थ

चराचर = चल-अचल जीव; मेह = वर्षा; सहज सनेह = स्वाभाविक प्रेम।

सरल हिंदी अर्थ

वर्षा सभी जीवों का हित करती है, पर मेघ के लिए स्वाभाविक प्रेम चातक के मन में विशेष रूप से बसा है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

सभी को उपकार मिल सकता है, किंतु कृतज्ञता सबमें समान नहीं होती। भक्ति हमें मिली सहायता और जीवन-संसाधनों के प्रति सजग करती है। उपयोग करने के साथ आदर और संरक्षण का भाव भी रखें।

छंद २९५ दोहा

डोलत बिपुल बिहंग बन पिअत पोखरनि बारि। सुजस धवल चातक नवल तुही भुवन दस चारि ॥
कठिन शब्दार्थ

बिहंग = पक्षी; पोखरनि = तालाब; धवल = उज्ज्वल।

सरल हिंदी अर्थ

वन के अनेक पक्षी तालाबों का जल पीते हैं; कवि की दृष्टि में चातक अपनी अनन्य प्रेम-टेक के कारण चौदहों लोक में निर्मल यश पाता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह पक्षियों के वास्तविक व्यवहार का वैज्ञानिक वर्णन नहीं, निष्ठा का काव्य-प्रतीक है। साधक अपने चुने हुए शुभ मार्ग में स्थिर रहे। प्रसिद्धि की चाह से अधिक निष्कपटता को महत्त्व देना इसकी सीख है।

छंद २९६ दोहा

मुख मीठे मानस मलिन कोकिल मोर चकोर। सुजस धवल चातक नवल रह्यो भुवन भरि तोर ॥
कठिन शब्दार्थ

मानस मलिन = मन से दूषित; कोकिल = कोयल; सुजस = शुभ यश।

सरल हिंदी अर्थ

कोयल, मोर और चकोर की मधुरता के सामने कवि चातक के निष्कपट प्रेम का उज्ज्वल यश रखते हैं। बाहरी सुंदरता से अधिक भीतर की निष्ठा प्रिय है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

काव्य में पक्षियों की नैतिक तुलना रूपक है। मनुष्यों के लिए संदेश है कि मीठी वाणी के साथ अच्छा मन और कर्म भी हों। केवल आकर्षक प्रस्तुति को चरित्र का पूरा प्रमाण न मानें।

छंद २९७ दोहा

बास बेस बोलनि चलनि मानस मंजु मराल। तुलसी चातक प्रेम की कीरति बिसद बिसाल ॥
कठिन शब्दार्थ

मराल = हंस; बास-बेस = निवास और रूप; बिसद = निर्मल।

सरल हिंदी अर्थ

हंस का निवास, वेश, बोली और चाल सब सुंदर हैं, फिर भी प्रेम की निर्मल और व्यापक कीर्ति में कवि चातक को विशिष्ट बताते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

बाहरी गुण महत्त्वपूर्ण हैं, लेकिन प्रेम की सच्चाई अलग मूल्य रखती है। अपने अभ्यास को केवल सौंदर्य या प्रतिष्ठा तक सीमित न रखें। विनय और सेवा से जुड़ा आंतरिक भाव ही स्थायी गरिमा देता है।

छंद २९८ दोहा

प्रेम न परखिअ परुषपन पयद सिखावन एह। जग कह चातक पातकी ऊसर बरसै मेह ॥
कठिन शब्दार्थ

परुषपन = कठोरता; ऊसर = बंजर भूमि; पातकी = पापी।

सरल हिंदी अर्थ

मेघ बंजर भूमि तक बरसता है, फिर भी चातक प्रतीक्षा करता है। कवि कहते हैं कि केवल इस कठिनाई से उसके प्रेम या मेघ की कृपा का निर्णय न करो।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह आध्यात्मिक प्रतीक्षा का रूपक है। किसी पीड़ित की कठिनाई को उसके पाप का प्रमाण न मानें। अनिश्चितता में करुणा और सहायक व्यवहार अधिक आवश्यक हैं; किसी पर दोष लगाना भक्ति का संदेश नहीं।

छंद २९९ दोहा

होइ न चातक पातकी जीवन दानि न मूढ़। तुलसी गति प्रहलाद की समुझि प्रेम पथ गूढ़ ॥
कठिन शब्दार्थ

प्रहलाद = विष्णुभक्त; मूढ़ = अविवेकी; गूढ़ = सूक्ष्म, कठिन।

सरल हिंदी अर्थ

न चातक पापी है, न जीवनदाता मेघ मूर्ख। प्रह्लाद की कठिन कथा सोचकर समझो कि भक्ति के प्रेम-पथ का रहस्य बाहरी सुख-दुःख से बड़ा है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

कवि कष्ट और निष्ठा का संबंध समझाते हैं। कठिनाई को देखकर किसी की श्रद्धा का उपहास न करें। साथ ही अन्याय रोकना और सुरक्षा देना हमारा कर्तव्य है; प्रेम का अर्थ उत्पीड़न स्वीकारना नहीं है।

छंद ३०० दोहा

गरज आपनी सबन को गरज करत उर आनि। तुलसी चातक चतुर भो जाचक जानि सुदानि ॥
कठिन शब्दार्थ

गरज = आवश्यकता; सुदानि = श्रेष्ठ दाता; जाचक = याचक।

सरल हिंदी अर्थ

लोग अपनी-अपनी आवश्यकता लेकर अनेक द्वारों पर जाते हैं। चतुर चातक एक मेघ को श्रेष्ठ दाता पहचानकर उसी में प्रेमपूर्वक आश्रय रखता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

दोहा मन की चंचलता से स्थिर साधना की ओर बुलाता है। आध्यात्मिक आश्रय में निष्ठा रखें, पर जीवन की आवश्यक सहायता लेने में संकोच न करें। अनन्यता दूसरों के प्रति द्वेष नहीं है।

छंद ३०१ दोहा

चरग चंगु गत चातकहि नेम प्रेम की पीर। तुलसी परबस हाड़ पर परिहैं पुहुमी नीर ॥
कठिन शब्दार्थ

चरग = बाज; चंगु = पंजा; पुहुमी नीर = धरती का जल।

सरल हिंदी अर्थ

बाज के पंजे में फँसा चातक मृत्यु से अधिक अपनी प्रेम-टेक की चिंता करता है कि उसके शरीर पर धरती का जल न पड़े।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह अनन्यता की अतिशयोक्तिपूर्ण कल्पना है। इसका लक्ष्य प्राण संकट में डालना नहीं, कठिन परिस्थिति में भी आदर्श न भूलना है। सुरक्षा और विवेक के साथ धर्मपूर्ण आचरण बनाए रखना उचित प्रेरणा है।

छंद ३०२ दोहा

बध्यो बधिक पर्यो पुन्य जल उलटि उठाई चोंच। तुलसी चातक प्रेमपट मरतहुँ लगी न खोंच ॥
कठिन शब्दार्थ

बधिक = शिकारी; पुन्य जल = पवित्र जल; खोंच = खरोंच।

सरल हिंदी अर्थ

शिकारी से घायल होकर जल में गिरे चातक ने चोंच ऊपर उठाई। कवि कहते हैं कि उसके प्रेमरूपी वस्त्र पर अंत तक कोई खरोंच नहीं आई।

भावार्थ और जीवन-संदेश

मूल चित्र दृढ़ निष्ठा का है, वास्तविक जल-त्याग का नियम नहीं। साधना की मर्यादा मन की निष्कपटता में है। जीवन की रक्षा करते हुए सत्य और शुभ संकल्प पर स्थिर रहना इस रूपक का संतुलित अर्थ है।

छंद ३०३ दोहा

अंड फोरि कियो चेटुवा तुष पर्यो नीर निहारि। गहि चंगुल चातक चतुर डार्यो बाहिर बारि ॥
कठिन शब्दार्थ

चेटुवा = बच्चा; तुष = अंडे का छिलका; चंगुल = पंजा।

सरल हिंदी अर्थ

अंडे से बच्चा निकलने पर छिलका जल में गिरा तो चातक ने उसे भी बाहर उठा दिया। कवि प्रेम की टेक को इतनी सूक्ष्मता तक निभाते हुए चित्रित करते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह प्राकृतिक निरीक्षण नहीं, भावप्रधान काव्य-कल्पना है। अच्छी निष्ठा में छोटी बातों का भी ध्यान रहता है। किंतु नियम को अंधी जिद बनाने के बजाय उसके पीछे का सच्चा उद्देश्य समझना आवश्यक है।

छंद ३०४ दोहा

तुलसी चातक देत सिख सुतहि बारहीं बार। तात न तर्पन कीजिऐ बिना बारिधर धार ॥
कठिन शब्दार्थ

तर्पन = जलांजलि; सुत = पुत्र; बारिधर धार = मेघ का जल।

सरल हिंदी अर्थ

चातक अपने पुत्र को बार-बार सिखाता है कि उसके लिए जलांजलि भी मेघ के जल से ही देना। प्रेम की टेक अगली पीढ़ी तक पहुँचती है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

रूपक संस्कार और निरंतरता दिखाता है। इसे किसी कर्मकाण्ड का अनिवार्य विधान न मानें। अपने बच्चों को श्रद्धा के साथ विवेक, करुणा और सत्य का संस्कार देना परंपरा को जीवंत बनाता है।

छंद ३०५ सोरठा

जिअत न नाई नारि चातक घन तजि दूसरहि। सुरसरिहू को बारि मरत न माँगेउ अरध जल ॥
कठिन शब्दार्थ

नारि = गर्दन; सुरसरि = गंगा; अरध जल = अंतिम जल।

सरल हिंदी अर्थ

चातक ने जीवित रहते मेघ छोड़ किसी अन्य ओर गर्दन नहीं झुकाई; मरते समय भी कवि उसे अन्य जल न माँगते हुए दिखाते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह अनन्य आश्रय का चरम साहित्यिक रूप है। वास्तविक जीवन में पानी या आवश्यक उपचार न लेने की सीख नहीं। साधना का सार जीवन की रक्षा करते हुए अपनी नैतिक निष्ठा और प्रभु-स्मरण बनाए रखना है।

छंद ३०६ सोरठा

सुनु रे तुलसीदास प्यास पपीहहि प्रेम की। परिहरि चारिउ मास जौ अँचवै जल स्वाति को ॥
कठिन शब्दार्थ

परिहरि = छोड़कर; चारिउ मास = वर्षा के चार महीने; अँचवै = पीए।

सरल हिंदी अर्थ

कवि कहते हैं कि पपीहे की प्यास साधारण जल की नहीं, प्रेम की है; तभी वह बरसात के अन्य जल को छोड़ स्वाति की प्रतीक्षा करता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

स्वाति-जल का चातक-विश्वास काव्यपरंपरा का रूपक है। आध्यात्मिक चाह और क्षणिक तृप्ति में भेद समझें। अपनी साधना में गहराई खोजें, पर शरीर की आवश्यकताओं की उपेक्षा न करें।

छंद ३०७ सोरठा

जाचै बारह मास पिऐ पपीहा स्वाति जल। जान्यो तुलसीदास जोगवत नेही नेह मन ॥
कठिन शब्दार्थ

जोगवत = सँभालता; नेही = प्रेमी; नेह मन = प्रेमपूर्ण चित्त।

सरल हिंदी अर्थ

पपीहा बारह महीने पुकारता है और स्वाति-जल की प्रतीक्षा करता है। तुलसी इसे प्रेमी द्वारा अपने चित्त के अनुराग को सँभालना मानते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

प्रेम केवल किसी एक अवसर का उत्साह नहीं, निरंतर स्मृति है। नियमित पाठ, सेवा और आत्मचिंतन से साधना जीवंत रहती है। परिणाम जल्दी न मिले तो भी अभ्यास का मूल्य बना रहता है।

छंद ३०८ दोहा

तुलसीं के मत चातकहि केवल प्रेम पिआस। पिअत स्वाति जल जान जग जाँचत बारह मास ॥
कठिन शब्दार्थ

जाँचत = माँगता; प्रेम पिआस = अनुराग की लालसा; जान जग = संसार समझता है।

सरल हिंदी अर्थ

संसार मानता है कि चातक वर्षभर जल माँगता है; तुलसी की दृष्टि में उसकी वास्तविक प्यास केवल प्रेम की है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

दूसरे का बाहरी व्यवहार उसके पूरे अंतःकरण को नहीं बताता। साधना में संख्या और विधि के साथ भाव का महत्त्व पहचानें। भीतर की निष्कपट चाह ही अभ्यास को यांत्रिक दोहराव से अलग करती है।

छंद ३०९ दोहा

आलबाल मुकुताहलनि हिय सनेह तरु मूल। होइ हेतु चित चातकहि स्वाति सलिलु अनुकूल ॥
कठिन शब्दार्थ

आलबाल = वृक्ष की क्यारी; मुकुताहल = मोती; सलिल = जल।

सरल हिंदी अर्थ

हृदय में प्रेमरूपी वृक्ष की जड़ है और मोतियों की क्यारी जैसी उसकी भूमि है। चातक चाहता है कि स्वाति का जल उस प्रेम-वृक्ष को पोषित करे।

भावार्थ और जीवन-संदेश

दोहा इच्छा का उद्देश्य स्पष्ट करता है: भक्ति बढ़े, केवल उपभोग न हो। जो अनुभव या साधन मिले, उसे करुणा और सदाचार विकसित करने में लगाएँ। ऐसा उपयोग आंतरिक साधना को फलता हुआ वृक्ष बनाता है।

छंद ३१० दोहा

उष्न काल अरु देह खिन मन पंथी तन ऊख। चातक बतियाँ न रुचीं अन जल सींचे रूख ॥
कठिन शब्दार्थ

उष्न = गर्मी; खिन = थका; रूख = वृक्ष।

सरल हिंदी अर्थ

गर्मी और थकान में छाया की आवश्यकता होते हुए भी चातक अन्य जल से सींचे वृक्ष के नीचे ठहरना स्वीकार नहीं करता—कवि उसकी टेक चित्रित करते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह अत्यन्त कठोर अनन्यता का रूपक है, धूप में स्वास्थ्य बिगाड़ने का सुझाव नहीं। मूल सीख सुविधा के लिए सत्य न छोड़ना है। वास्तविक जरूरतों और नैतिक आदर्श के बीच विवेकपूर्ण संतुलन रखें।

छंद ३११ दोहा

अन जल सींचे रूख की छाया तें बरु घाम। तुलसी चातक बहुत हैं यह प्रबीन को काम ॥
कठिन शब्दार्थ

प्रबीन = निपुण; घाम = धूप; बरु = बल्कि।

सरल हिंदी अर्थ

कवि कहते हैं कि चातक कहलाने वाले बहुत हैं, लेकिन दूसरे जल से सींचे वृक्ष की छाया से धूप चुनने जैसी टेक विरले निभाते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

दावा और आचरण का अंतर सामने आता है। अच्छे आदर्श के प्रति दृढ़ रहें, पर रूपक का शाब्दिक अनुकरण जरूरी नहीं। साधना की प्रामाणिकता सत्य, संयम और जिम्मेदारी निभाने में जाँची जाती है।

छंद ३१२ दोहा

एक अंग जो सनेहता निसि दिन चातक नेह। तुलसी जासों हित लगै वहि अहार वहि देह ॥
कठिन शब्दार्थ

एक अंग = एकांगी; निसि दिन = रात-दिन; अहार = भोजन।

सरल हिंदी अर्थ

चातक का प्रेम निरंतर एक ही प्रिय में लगा रहता है। जिसके प्रति उसका अनुराग है, वही उसके जीवन और पोषण का आधार है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

भक्ति में एकांगी प्रेम प्रतिदान की गणना से ऊपर है। इसे मनुष्यों के असंतुलित संबंधों का नियम न बनाएँ। ईश्वराश्रय में स्थिरता रखते हुए परिवार, स्वास्थ्य और कर्तव्य का संतुलन बनाए रखना भी आवश्यक है।

खंड २ · प्रेम, मित्रता और संबंधों की पहचान

छंद ३१३–३३६ · सच्चा हित, मधुर व्यवहार तथा संबंध निभाने का विवेक।

छंद ३१३ दोहा

बिबि रसना तनु स्याम है बंक चलनि बिष खानि। तुलसी जस श्रवननि सुन्यो सीस समरप्यो आनि ॥
कठिन शब्दार्थ

बिबि रसना = दो जीभ; बंक = टेढ़ा; बिष खानि = विष का भंडार।

सरल हिंदी अर्थ

सर्प दो जीभ वाला, टेढ़ी चाल और विष से युक्त है; फिर भी जिस प्रिय स्वर की कीर्ति सुनता है, उसके सामने अपना सिर समर्पित कर देता है—ऐसा काव्यचित्र है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

दोषों के बीच भी अनुराग की संभावना बताई गई है। इसे वास्तविक साँपों का व्यवहार न समझें। साहित्य की उपमा मनुष्य को अपने अहंकार के बजाय निष्कपट भाव और परिवर्तन की संभावना देखने को प्रेरित करती है।

छंद ३१४ दोहा

आपु ब्याध को रूप धरि कुहौ कुरंगहि राग। तुलसी जो मृग मन मुरै परै प्रेम पट दाग ॥
कठिन शब्दार्थ

ब्याध = शिकारी; कुरंग = हिरण; मुरै = मुड़ जाए।

सरल हिंदी अर्थ

प्रिय संगीत का आह्वान यदि शिकारी के रूप में भी आए, तो मृग का मन उससे न फिरे—कवि ऐसी अडिग लगन का उदाहरण देते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह प्रेम की साहित्यिक तीव्रता है, खतरे को अनदेखा करने की सलाह नहीं। आध्यात्मिक निष्ठा में स्थिरता सुंदर है, लेकिन वास्तविक छल या संकट पहचानने का विवेक भी बना रहना चाहिए।

छंद ३१५ दोहा

तुलसी मनि निज दुति फनिहि ब्याधिहि देउ दिखाइ। बिछुरत होइ नब आँधरो ताते प्रेम न जाइ ॥
कठिन शब्दार्थ

फनि = सर्प; दुति = प्रकाश; ब्याधि = शिकारी को।

सरल हिंदी अर्थ

सर्पमणि का प्रकाश शिकारी को सर्प दिखा दे और मणि छिन जाने पर जीवन अँधेरा हो जाए, फिर भी कवि सर्प और मणि का प्रेम अटल मानते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह मणिधारी सर्प की लोककाव्य-कल्पना है। प्रेम को लाभ-हानि से परे दिखाने का उद्देश्य है। वास्तविक जीवविज्ञान का दावा न मानकर निष्ठा और आत्मीयता का भाव समझें।

छंद ३१६ दोहा

जरत तुहिन लखि बनज बन रबि दै पीठि पराउ। उदय बिकस अथवत सकुच मिटै न सहज सुभाउ ॥
कठिन शब्दार्थ

तुहिन = पाला; बनज = कमल; अथवत = अस्त होते।

सरल हिंदी अर्थ

पाले से कमलवन जलता है और सूर्य उस समय अनुपस्थित रहता है; फिर भी सूर्य निकलने पर कमल खिलता और अस्त होने पर सिमटता है। उसका सहज संबंध नहीं मिटता।

भावार्थ और जीवन-संदेश

प्राकृतिक दृश्य से भरोसे की स्थिरता का रूपक लिया गया है। प्रतिकूल समय में हर संबंध को नकार देने के बजाय उसकी गहराई देखें। साथ में वास्तविक हानि और अनुचित व्यवहार के विषय में विवेक बनाए रखें।

छंद ३१७ दोहा

देउ आपनें हाथ जल मीनहि माहुर घोरि। तुलसी जिऐ जो बारि बिनु तौ तु देहि कबि खोरि ॥
कठिन शब्दार्थ

माहुर = विष; बारि = पानी; खोरि = दोष।

सरल हिंदी अर्थ

पानी में विष मिला दिया जाए तो भी मछली पानी नहीं छोड़ती। कवि कहते हैं कि वह बिना जल जीवित रह सके, तभी मेरी प्रेम-उपमा को दोष देना।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह जीवनाधार के प्रति निष्ठा की अतिशयोक्ति है। विष या खतरनाक पदार्थ ग्रहण करने का निर्देश नहीं। भक्ति में प्रभु को जीवन का आंतरिक आधार मानने का भाव ग्रहण करें, शाब्दिक जोखिम नहीं।

छंद ३१८ दोहा

मकर उरग दादुर कमठ जल जीवन जल गेह। तुलसी एकै मीन को है साँचिलो सनेह ॥
कठिन शब्दार्थ

मकर = मगर; उरग = जलसर्प; कमठ = कछुआ।

सरल हिंदी अर्थ

मगर, साँप, मेंढक और कछुए का घर भी जल है, पर कवि मछली के जल-वियोग न सह सकने को विशेष सच्चे प्रेम का प्रतीक कहते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

साथ रहना और जीवन से गहरा जुड़ना अलग अनुभव हैं। साधना केवल वातावरण या पहचान का नाम न रहे। उसके मूल्य मन, वाणी और व्यवहार में उतरें, तो आत्मीय संबंध प्रकट होता है।

छंद ३१९ दोहा

तुलसी मिटे न मरि मिटेहुँ साँचो सहज सनेह। मोरसिखा बिनु मूरिहूँ पलुहत गरजत मेह ॥
कठिन शब्दार्थ

मोरसिखा = मयूरशिखा वनस्पति; मूरि = जड़; पलुहत = हरी होती।

सरल हिंदी अर्थ

कवि लोकविश्वास के अनुसार मयूरशिखा को जड़ कट जाने पर भी मेघ की गर्जना से हरा होता बताते हैं; सच्चे सहज प्रेम के न मिटने का उदाहरण है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह वनस्पति का वैज्ञानिक निष्कर्ष नहीं, लोककाव्य का रूपक है। निर्मल प्रेम की स्मृति कठिन समय में भी आशा जगाती है। अपने संबंधों में कृतज्ञता और अच्छे संस्कार सँभालना इसकी व्यावहारिक प्रेरणा है।

छंद ३२० दोहा

सुलभ प्रीति प्रीतम सबै कहत करत सब कोइ। तुलसी मीन पुनीत ते त्रिभुवन बड़ो न कोइ ॥
कठिन शब्दार्थ

पुनीत = पवित्र; त्रिभुवन = तीन लोक; प्रीतम = प्रिय।

सरल हिंदी अर्थ

प्रेम और प्रियतम की बातें करना सबके लिए सरल है; लेकिन मछली-जैसी जीवनाधार से जुड़ी निष्ठा कवि को अद्वितीय लगती है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

प्रेम की सच्चाई केवल घोषणाओं में नहीं, व्यवहार में खुलती है। अपनी साधना को दूसरों से ऊँचा कहने के बजाय नियमित सेवा और सत्य से जाँचें। विनम्र कर्म वाणी को विश्वसनीय बनाते हैं।

छंद ३२१ दोहा

तुलसी जप तप नेम ब्रत सब सबहीं तें होइ। लहै बड़ाई देवता इष्टदेव जब होइ ॥
कठिन शब्दार्थ

नेम ब्रत = नियम और व्रत; इष्टदेव = अपना प्रिय उपास्य; बड़ाई = विशेष प्रतिष्ठा।

सरल हिंदी अर्थ

जप, तप, नियम और व्रत अनेक लोग कर सकते हैं; पर आराध्य से आत्मीय इष्ट-संबंध बनने पर उपासना का विशेष महत्त्व प्रकट होता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

साधन संबंध बनाने के लिए हैं, केवल प्रदर्शन के लिए नहीं। अपने आराध्य के नाम और चरित्र पर मन लगाएँ। व्यक्तिगत निष्ठा रखते हुए अन्य उपासना-मार्गों का आदर करना भक्ति की उदारता है।

छंद ३२२ दोहा

कुदिन हितू सो हित सुदिन हित अनहित किन होइ। ससि छबि हर रबि सदन तउ मित्र कहत सब कोइ ॥
कठिन शब्दार्थ

कुदिन = कठिन समय; हितू = हितैषी; ससि = चंद्रमा।

सरल हिंदी अर्थ

सुख के दिनों में बहुत लोग मित्र बन जाते हैं; कठिन समय में जो हित करे वही सच्चा मित्र है। कवि सूर्य-चंद्रमा के संबंध की उपमा से पहचान की बात कहते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

मित्रता को केवल उत्सव और सुविधा से न मापें। संकट में सहायता, गोपनीयता और ईमानदार सलाह उसका आधार हैं। स्वयं भी किसी मित्र के लिए ऐसे ही भरोसेमंद और मर्यादित सहायक बनें।

छंद ३२३ दोहा

कै लघुकै बड़ मीत भल सम सनेह दुख सोइ। तुलसी ज्यों घृत मधु सरिस मिलें महाबिष होइ ॥
कठिन शब्दार्थ

घृत = घी; मधु = शहद; सरिस = बराबर।

सरल हिंदी अर्थ

कवि अपने समय की औषधीय मान्यता से समान घी-मधु के मिश्रण की उपमा लेकर बराबरी की होड़ वाली मित्रता में दुःख का संकेत करते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

इसे आज का चिकित्सकीय नियम न मानें। संबंध में समान गरिमा अच्छी है; हानिकारक तत्व प्रतिस्पर्धी अहंकार है। कौन बड़ा है इसकी जिद छोड़कर परस्पर सम्मान और सहयोग रखना अधिक सार्थक संदेश है।

छंद ३२४ दोहा

मान्य मीत सों सुख चहैं सो न छुऐ छल छाहँ। ससि त्रिसंकु कैकेइ गति लखि तुलसी मन माहँ ॥
कठिन शब्दार्थ

छल छाहँ = कपट की छाया; त्रिसंकु = त्रिशंकु; गति = परिणाम।

सरल हिंदी अर्थ

सम्मानित मित्र से सुख चाहो तो छल की छाया भी न आने दो। चंद्रमा, त्रिशंकु और कैकेयी के कथा-संकेत छल के दुष्परिणाम याद दिलाते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

भरोसा बनने में समय लगता है और धोखा उसे शीघ्र तोड़ सकता है। सुविधा के लिए झूठ छिपाने के बजाय स्पष्टता रखें। ईमानदार असहमति छलपूर्ण सहमति से अधिक टिकाऊ संबंध बनाती है।

छंद ३२५ दोहा

कहिअ कठिन कृत कोमलहुँ हित हठि होइ सहाइ। पलक पानि पर ओड़िअत समुझि कुघाइ सुघाइ ॥
कठिन शब्दार्थ

पलक = आँख की पलक; पानि = हाथ; ओड़िअत = रोककर अपने ऊपर लेना; कुघाइ सुघाइ = भारी या हल्की चोट।

सरल हिंदी अर्थ

सच्चा सहायक केवल कोमल वचन नहीं कहता, संकट में रक्षा करता है। आँख पर हल्की चोट पलक रोकती है और बड़ी चोट से बचाने को हाथ आगे आते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

हर असहमति शत्रुता नहीं होती। सच्ची सलाह और अपमान में अंतर उसके उद्देश्य तथा तरीके से पहचानें। प्रेम के साथ स्पष्ट बात कहने और विनम्रता से सुनने की क्षमता संबंध को सुरक्षित रखती है।

छंद ३२६ दोहा

तुलसी बैर सनेह दोउ रहित बिलोचन चारि। सुरा सेवरा आदरहिं निंदहिं सुरसरि बारि ॥
कठिन शब्दार्थ

बिलोचन = आँखें; सुरा = मदिरा; सुरसरि = गंगा।

सरल हिंदी अर्थ

वैर और आसक्ति दोनों विवेक की आँखें ढक सकते हैं; तब लोग अनुचित को आदर और पवित्र को तिरस्कार देने लगते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

अपने प्रिय या विरोधी के विषय में निर्णय करते समय पक्षपात देखें। व्यक्ति के प्रति भाव के कारण हर काम को सही या गलत न मानें। तथ्य, मर्यादा और न्याय पर आधारित दृष्टि आवश्यक है।

छंद ३२७ दोहा

रुचै मागनेहि मागिबो तुलसी दानिहि दानु। आलस अनख न आचरज प्रेम पिहानी जानु ॥
कठिन शब्दार्थ

अनख = खीझ; पिहानी = छिपा हुआ संकेत; रुचै = अच्छा लगे।

सरल हिंदी अर्थ

याचक को माँगना और दानी को देना प्रिय होता है। जहाँ खीझ या ऊब नहीं, वहाँ सहज अनुराग की पहचान हो सकती है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

देने और लेने दोनों में गरिमा बनी रहे। सहायता को नियंत्रण का साधन न बनाएं और प्राप्त सहयोग का आदर करें। प्रेमपूर्ण उदारता आवश्यकता पहचानती है, साथ ही संतोष तथा उत्तरदायित्व भी रखती है।

छंद ३२८ दोहा

अमिअ गारि गारेउ गरल गारि कीन्ह करतार। प्रेम बैर की जननि जुग जानहिं बुध न गवाँर ॥
कठिन शब्दार्थ

अमिअ = अमृत; गरल = विष; गारि = निचोड़कर, गाली; करतार = स्रष्टा।

सरल हिंदी अर्थ

कवि कल्पना करते हैं कि स्रष्टा ने अमृत और विष का सार लेकर गाली बनाई। आत्मीय हास-परिहास में वह प्रेम और द्वेष से कहने पर वैर बढ़ाती है; समझदार संदर्भ पहचानते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

किसी लोकपरंपरा या आत्मीय मजाक में भी सामने वाले की सहमति और गरिमा देखें। अपमानजनक भाषा को प्रेम कहकर उचित न ठहराएँ।

छंद ३२९ दोहा

सदा न जे सुमिरत रहहिं मिलि न कहहिं प्रिय बैन। ते पै तिन्ह के जाहिं घर जिन्ह के हिएँ न नैन ॥
कठिन शब्दार्थ

प्रिय बैन = मधुर हितकारी वचन; हिएँ न नैन = हृदय में विवेक नहीं।

सरल हिंदी अर्थ

जो न याद रखते हैं, न मिलने पर प्रेमपूर्ण बात करते हैं, उनके द्वार बार-बार जाना आत्मीयता की सही पहचान न होने का संकेत है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

संबंध में सम्मान और परस्पर ध्यान आवश्यक हैं। केवल अपेक्षा से चिपके रहने के बजाय व्यवहार देखें। प्रेमपूर्वक अपनी बात कहें और आवश्यकता हो तो मर्यादित दूरी रखें; आत्मसम्मान भी संबंध का अंग है।

छंद ३३० दोहा

हित पुनीत सब स्वारथहिं अरि असुद्ध बिनु चाड़। निज मुख मानिक सम दसन भूमि परे ते हाड़ ॥
कठिन शब्दार्थ

चाड़ = प्रयोजन; मानिक = माणिक्य; दसन = दाँत।

सरल हिंदी अर्थ

मुख में दाँत माणिक जैसे प्रिय लगते हैं, पर गिर जाने पर हड्डी कहे जाते हैं। कवि इससे उपयोग के अनुसार बदलते स्वार्थपूर्ण मूल्यांकन को दिखाते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

किसी व्यक्ति का मूल्य केवल उससे मिलने वाले लाभ से न आँकें। सहायता की क्षमता घट जाने पर भी उसका सम्मान बना रहे। कृतज्ञता और मानवीय गरिमा स्वार्थ की बदलती दृष्टि से ऊपर हैं।

छंद ३३१ दोहा

माखी काक उलूक बक दादुर से भए लोग। भले ते सुक पिक मोरसे कोउ न प्रेम पथ जोग ॥
कठिन शब्दार्थ

उलूक = उल्लू; दादुर = मेंढक; सुक-पिक = तोता-कोयल।

सरल हिंदी अर्थ

कवि विभिन्न पक्षियों की उपमाओं से संसार की आदतें गिनाकर कहते हैं कि प्रेम-पथ के सच्चे अधिकारी विरले मिलते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

ये साहित्यिक प्रतीक हैं, जीवों का नैतिक वर्गीकरण नहीं। मनुष्य को अपने भीतर स्वार्थ, प्रदर्शन और चंचलता जाँचनी चाहिए। प्रेम का अभ्यास विनय, सेवा और दूसरे के हित की वास्तविक चिंता से बनता है।

छंद ३३२ दोहा

हृदयँ कपट बर बेष धरि बचन कहहिं गढ़ि छोलि। अब के लोग मयूर ज्यों क्यों मिलिए मन खोलि ॥
कठिन शब्दार्थ

बेष = वेश; छोलि = तराशकर; मयूर = मोर।

सरल हिंदी अर्थ

मन में कपट रखकर सुंदर वेश और गढ़ी हुई वाणी बोलने वालों को कवि मोर की आकर्षक छवि से तुलना करते हैं; उनसे तुरंत मन खोलना कठिन है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

बाहरी छवि से परे निरंतर व्यवहार देखें। विश्वास धीरे-धीरे स्पष्टता और जिम्मेदारी से बनता है। स्वयं भी सुंदर प्रस्तुति के साथ ईमानदारी रखें, ताकि कथन और कर्म का अंतर संबंधों को चोट न पहुँचाए।

छंद ३३३ दोहा

चरन चोंच लोचन रँगौ चलौ मराली चाल। छीर नीर बिबरन समय बक उघरत तेहि काल ॥
कठिन शब्दार्थ

मराली चाल = हंस की चाल; छीर-नीर = दूध-पानी; बक = बगुला।

सरल हिंदी अर्थ

रंग और चाल से हंस बनने का अभिनय किया जा सकता है, पर गुणों की परीक्षा में बगुले की वास्तविकता खुल जाती है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

दिखावा वास्तविक योग्यता का विकल्प नहीं। कठिन परिस्थिति में सत्य, कौशल और चरित्र प्रकट होते हैं। किसी की नकल करने के बजाय अपने काम और सद्गुणों को विकसित करना स्थायी विश्वास दिलाता है।

छंद ३३४ दोहा

मिलै जो सरलहि सरल ह्वै कुटिल न सहज बिहाइ। सो सहेतु ज्यों बक्र गति ब्याल न बिलहिं समाइ ॥
कठिन शब्दार्थ

बक्र = टेढ़ा; ब्याल = साँप; सहेतु = प्रयोजनवश।

सरल हिंदी अर्थ

कुटिल व्यक्ति किसी सरल व्यक्ति से लाभ के लिए सीधा व्यवहार कर सकता है, जैसे टेढ़ा साँप बिल में प्रवेश करते समय सीधा होता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

एक बार की मिठास को स्थायी परिवर्तन का पूरा प्रमाण न मानें। समय के साथ व्यवहार देखें। सावधानी का अर्थ हर व्यक्ति पर संदेह नहीं, भरोसे को वास्तविक अनुभव और स्पष्ट सीमाओं पर टिकाना है।

छंद ३३५ दोहा

कृसधन सखहि न देब दुख मुएहुँ न मागब नीच। तुलसी सज्जन की रहनि पावकल पानी बीच ॥
कठिन शब्दार्थ

कृसधन = कम साधन वाला; रहनि = आचरण; पावक-पानी = आग-पानी।

सरल हिंदी अर्थ

सज्जन अपनी कठिनाई में निर्धन मित्र को कष्ट नहीं देना चाहते और अपमानजनक याचना से बचते हैं। उनकी मर्यादा कठिन संतुलन माँगती है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

मित्र की क्षमता समझना संवेदनशीलता है। सहायता माँगना अनुचित नहीं, पर दबाव और अधिकार न जताएँ। सम्मानपूर्ण सहयोग दोनों की गरिमा तथा वास्तविक परिस्थिति को ध्यान में रखता है।

छंद ३३६ दोहा

संग सरल कुटिलहि भएँ हरि हर करहिं निबाहु। ग्रह गनती गनि चतुर बिधि कियो उदर बिनु राहु ॥
कठिन शब्दार्थ

निबाहु = निभाना; बिधि = ब्रह्मा; राहु = ग्रहण का कथा-पात्र।

सरल हिंदी अर्थ

सरल और कुटिल का कठिन संग निभाने में कवि हरि-हर की सामर्थ्य का संकेत करते हैं; राहु का बिना उदर होना विचित्र संगति की उपमा है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

असंगत स्वभावों को साथ निभाने में विवेक और सीमाएँ चाहिए। केवल निकटता से सद्भाव सुनिश्चित नहीं होता। संबंध में स्पष्ट जिम्मेदारियाँ और अनुचित व्यवहार से सुरक्षा रखना आवश्यक है।

खंड ३ · सत्संग, संत और सज्जनता

छंद ३३७–३६० · संगति के प्रभाव और चरित्र की पहचान।

छंद ३३७ दोहा

नीच निचाई नहिं तजइ सज्जनहू कें संग। तुलसी चंदन बिटप बसि बिनु बिष भए न भुअंग ॥
कठिन शब्दार्थ

भुअंग = साँप; बिटप = वृक्ष; निचाई = बुरी प्रवृत्ति।

सरल हिंदी अर्थ

चंदन पर रहने से साँप का विष नहीं मिटता। वैसे ही केवल सज्जनों के पास बैठने से किसी की बुरी आदत अपने आप नहीं बदलती।

भावार्थ और जीवन-संदेश

संगति अवसर देती है, परिवर्तन के लिए ग्रहणशीलता चाहिए। सत्संग सुनते हुए अपना व्यवहार भी जाँचें। नियमित आत्मसुधार और जिम्मेदार कर्म के बिना अच्छी पहचान भी खाली आवरण बन सकती है।

छंद ३३८ दोहा

भलो भलाइहि पै लहइ लहइ निचाइहि नीचु। सुधा सराहिअ अमरताँ गरल सराहिअ मीचु ॥
कठिन शब्दार्थ

सुधा = अमृत; गरल = विष; अमरता = जीवनदायी प्रभाव।

सरल हिंदी अर्थ

भले को भलाई और दुष्ट को बुराई के फल से पहचाना जाता है, जैसे अमृत जीवनदायी और विष प्राणघातक प्रभाव से जाना जाता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

मूल्यांकन के लिए कार्य का वास्तविक परिणाम देखें। मीठा नाम या बड़ा दावा पर्याप्त नहीं। जो व्यवहार दूसरों का हित बढ़ाए और गरिमा बचाए, उसका आदर करें; हानिकारक प्रभाव के प्रति सजग रहें।

छंद ३३९ दोहा

मिथ्या माहुर सज्जनहि खलहि गरल सम साँच। तुलसी छुअत पराइ ज्यों पारद पावक आँच ॥
कठिन शब्दार्थ

मिथ्या = झूठ; माहुर = विष; पारद = पारा।

सरल हिंदी अर्थ

सज्जन के लिए झूठ विष जैसा है, जबकि छल में लगे व्यक्ति को सत्य चुभता है। कवि पारे और आग की उपमा से यह विरोध बताते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

सत्य का मूल्य उस समय खुलता है जब वह अपने स्वार्थ के प्रतिकूल हो। असुविधाजनक तथ्य सुनकर उसे दबाने के बजाय जाँचें। विनम्र सत्यवादिता संबंध और कार्य दोनों में भरोसा विकसित करती है।

छंद ३४० दोहा

संत संग अपबर्ग कर कामी भव कर पंथ। कहहि संत कबि कोबिद श्रुति पुरान सदग्रंथ ॥
कठिन शब्दार्थ

अपबर्ग = मुक्ति; भव पंथ = बंधन का मार्ग; कोबिद = विद्वान।

सरल हिंदी अर्थ

संतों की संगति मुक्ति की दिशा देती है और अनियंत्रित विषयासक्ति की संगति बंधन बढ़ाती है—संत और ग्रंथ ऐसा कहते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

संगति मन की रुचि बनाती है। ऐसे साथ और सामग्री चुनें जो विवेक, संयम और करुणा बढ़ाएँ। किसी समूह के नाम के बजाय उसके व्यवहार और अपने ऊपर पड़ते प्रभाव को देखकर निर्णय करें।

छंद ३४१ दोहा

सुकृत न सुकृती परिहरइ कपट न कपटी नीच। मरत सिखावन देइ चले गीधराज मारीच ॥
कठिन शब्दार्थ

सुकृत = अच्छा कर्म; गीधराज = जटायु; मारीच = रामकथा का पात्र।

सरल हिंदी अर्थ

सज्जन अपना अच्छा कर्म और कपटी अपना छल नहीं छोड़ते। जटायु और मारीच के अंतिम आचरण से कवि दोनों प्रवृत्तियों का अंतर समझाते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

कठिन समय में आदतें स्पष्ट होती हैं। रोज छोटे सत्य और सेवा के अभ्यास से चरित्र मजबूत बनता है। अपनी प्रवृत्ति को अपरिवर्तनीय मानने के बजाय सजग अभ्यास से अच्छी दिशा देना आवश्यक है।

छंद ३४२ दोहा

सुजन सुतरु बन ऊख सम खल टंकिका रुखान। परहित अनहित लागि सब साँसति सहर समान ॥
कठिन शब्दार्थ

ऊख = गन्ना; टंकिका = काटने का औजार; साँसति = कष्ट।

सरल हिंदी अर्थ

सज्जन गन्ने की तरह अपना कष्ट सहकर भी दूसरों को रस देते हैं; दुष्ट औजार की तरह दूसरों को काटने में कठिनाई सहते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

दोनों श्रम करते हैं, लेकिन उद्देश्य अलग होता है। मेहनत का मूल्य उसके हितकारी उपयोग से है। अपनी ऊर्जा ऐसे कार्य में लगाएँ जिससे निर्माण और सहयोग हो, केवल दूसरे को नीचा दिखाने में नहीं।

छंद ३४३ दोहा

पिअहि सुमन रस अलिल बिटप काटि कोल फल खात। तुलसी तरुजीवी जुगल सुमति कुमति की बात ॥
कठिन शब्दार्थ

अलिल = भौंरा; कोल = वनवासी का पुराना संकेत; सुमति-कुमति = अच्छी-बुरी समझ।

सरल हिंदी अर्थ

एक वृक्ष से भौंरा फूलों का रस लेता है, दूसरा फल पाने को वृक्ष ही काट देता है। समान लाभ-इच्छा में भी विवेक और अविवेक का अंतर है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

संसाधन का उपयोग उसके भविष्य को नष्ट करके न करें। व्यक्ति या प्रकृति से लाभ लेते समय संरक्षण और कृतज्ञता रखें। कथा की पुरानी सामाजिक उपमा को किसी समुदाय का सामान्य चरित्र न मानें।

छंद ३४४ दोहा

अवसर कौड़ी जो चुकै बहुरि दिएँ का लाख। दुइज न चंदा देखिऐ उदौ कहा भरि पाख ॥
कठिन शब्दार्थ

दुइज = द्वितीया; पाख = पक्ष; अवसर = उचित समय।

सरल हिंदी अर्थ

जरूरत के समय एक कौड़ी न दी तो बाद में लाख देने से वही काम नहीं बनता। द्वितीया का चंद्रमा न देखा तो पूरे पक्ष का उदय उस अवसर का विकल्प नहीं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

समय पर छोटी सहायता बड़ी देरी से मिले संसाधन से अधिक उपयोगी हो सकती है। सामने वाले की वास्तविक जरूरत पहचानें। केवल देने की मात्रा नहीं, सही समय और उचित तरीका भी सेवा का मूल्य तय करते हैं।

छंद ३४५ दोहा

ग्यान अनभले को सबहि भले भलेहू काउ। सींग सूँड़ रद लूम नख करत जीव जड़ घाउ ॥
कठिन शब्दार्थ

पोच = बुरा; रद = दाँत; लूम = पूँछ।

सरल हिंदी अर्थ

हानि पहुँचाने के अनेक साधन सभी जानते हैं; वास्तविक भलाई करना विरले समझते हैं। कवि पशुओं के सींग, दाँत और नख से चोट की उपमा देते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

किसी को दुख देना आसान, हितकारी सहायता करना विवेक माँगता है। अच्छी नीयत के साथ सही समझ भी जरूरी है। निर्णय से प्रभावित व्यक्ति की जरूरत सुनना और परिणाम देखना सेवा को सार्थक बनाता है।

छंद ३४६ दोहा

तुलसी जग जीवन अहित कतहुँ कोउ हित जानि। सोषक भानु कृसानु महि पवन एक घन दानि ॥
कठिन शब्दार्थ

सोषक = सोखने वाला; कृसानु = आग; घन = मेघ।

सरल हिंदी अर्थ

सूर्य, आग, धरती और हवा सोखते हैं, जबकि मेघ जल देता है—कवि इससे संसार में निःस्वार्थ हितैषियों की विरलता दिखाते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह प्रकृति का पूरा वैज्ञानिक विवरण नहीं, दानशीलता का रूपक है। लेने के साथ लौटाना सीखें। समय, श्रम या ज्ञान से किसी का हित करना भी उदारता है और समुदाय को संतुलित बनाता है।

छंद ३४७ दोहा

सुनिअ सुधा देखिअहिं गरल सब करतूति कराल। जहँ तहँ काक उलूक बक मानस सकृत मराल ॥
कठिन शब्दार्थ

सुधा = अमृत; गरल = विष; सकृत = कभी-कभार।

सरल हिंदी अर्थ

अमृत की चर्चा बहुत, विष का अनुभव अधिक; कौवे-बगुले अनेक, हंस विरले—कवि कथन और वास्तविक सद्गुण के अंतर पर ध्यान देते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

सुंदर विचार सुनना पर्याप्त नहीं; उनका व्यवहार में उतरना आवश्यक है। दूसरों की कमी गिनने से पहले अपने कर्म देखें। छोटे, नियमित हितकारी काम अच्छे समाज के निर्माण में वास्तविक योगदान हैं।

छंद ३४८ दोहा

जलचर थलचर गगनचर देव दनुज नर नाग। उत्तम मध्यम अधम खल दस गुन बढ़त बिभाग ॥
कठिन शब्दार्थ

देव दनुज = देवता-असुर; अधम = निम्न आचरण; बिभाग = श्रेणी।

सरल हिंदी अर्थ

कवि विभिन्न जीवों और प्राणियों की तुलना से कहते हैं कि उत्तम आचरण कम और बुरे स्वभाव अधिक दिखते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

अतिशयोक्ति नैतिक सजगता के लिए है, संसार से घृणा करने के लिए नहीं। अपने छोटे क्षेत्र में भलाई बढ़ाने का प्रयास करें। निराशाजनक अनुभव के बीच भी सत्य, करुणा और योग्य संगति की संभावना बनी रहती है।

छंद ३४९ दोहा

बलि मिस देखे देवता कर मिस मानव देव। मुए मार सुबिचार हत स्वारथ साधन एव ॥
कठिन शब्दार्थ

बलि मिस = बलि के बहाने; कर = कर-वसूली; स्वारथ = निजी लाभ।

सरल हिंदी अर्थ

देवता बलि के बहाने और शासक कर के बहाने अपना प्रयोजन साधते हैं—कवि कहते हैं कि लोकव्यवहार में स्वार्थ अनेक रूप छिपा लेता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

किसी कार्य का नाम अच्छा होने से उसका प्रभाव स्वतः अच्छा नहीं होता। उद्देश्य और परिणाम दोनों देखें। अधिकार का उपयोग अपने लाभ के बजाय जिम्मेदारी और जनहित के लिए करना सच्चा नैतिक मूल्य है।

छंद ३५० दोहा

सुजन कहत भल पोच पथ पापि न परखइ भेद। करमनास सुरसरित मिस बिधि निषेध बद बेद ॥
कठिन शब्दार्थ

पोच पथ = अनुचित मार्ग; करमनास = कर्मनाशा नदी; बिधि निषेध = करणीय-अकरणीय।

सरल हिंदी अर्थ

सज्जन अच्छे-बुरे मार्ग का अंतर बताते हैं, पर पाप में लगा मन उसे नहीं परखता। कवि नदियों के धार्मिक भेद की उपमा से विवेक की आवश्यकता रखते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

किसी नाम से अधिक कर्म का परिणाम देखें। शुभ-अशुभ की चर्चा का उद्देश्य सही चुनाव है, दूसरों का अपमान नहीं। समझकर लिया निर्णय तथा गलती पर लौटने की तैयारी साधना का आवश्यक पक्ष हैं।

छंद ३५१ दोहा

मनि भाजन मधु पारई पूरन अमी निहारि। का छाँड़िअ का संग्रहिअ कहहु बिबेक बिचारि ॥
कठिन शब्दार्थ

मनि भाजन = रत्नों का पात्र; मधु = यहाँ मदिरा; पारई = मिट्टी का पात्र; अमी = अमृत।

सरल हिंदी अर्थ

रत्न-पात्र में मदिरा और साधारण मिट्टी के पात्र में अमृत हो तो क्या छोड़ना और क्या ग्रहण करना चाहिए? कवि विवेक से उत्तर चाहते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

मूल्य बाहरी आवरण में नहीं, भीतर के गुण में है। प्रतिष्ठा, वेश और चमक देखकर निर्णय न करें। साधारण व्यक्ति की सच्ची बात तथा उपयोगी सहायता को भी उचित सम्मान दें।

छंद ३५२ दोहा

उत्तम मध्यम नीच गति पाहन सिकता पानि। प्रीति परिच्छा तिहुन की बैर बितिक्रम जानि ॥
कठिन शब्दार्थ

पाहन = पत्थर; सिकता = रेत; बितिक्रम = उलटा क्रम।

सरल हिंदी अर्थ

उत्तम, मध्यम और निम्न की प्रीति क्रमशः पत्थर, रेत और जल की रेखा जैसी टिकाऊ होती है; वैर का क्रम उलटा समझो।

भावार्थ और जीवन-संदेश

श्रेष्ठ मनुष्य प्रेम निभाता और रंजिश जल्दी छोड़ता है। अपने संबंधों में इसी दिशा का अभ्यास करें। भलाई याद रखना तथा क्षमा के साथ आवश्यक सीमाएँ रखना मन की उदारता और विवेक दोनों को सुरक्षित करता है।

छंद ३५३ दोहा

पुन्य प्रीति पति प्रापतिउ परमारथ पथ पाँच। लहहिं सुजन परिहरहिं खल सुनहु सिखावन साँच ॥
कठिन शब्दार्थ

पति = प्रतिष्ठा; परमारथ पथ = उच्च कल्याण का मार्ग; सुजन = सज्जन।

सरल हिंदी अर्थ

पुण्य, प्रेम, प्रतिष्ठा, उचित प्राप्ति और परमार्थ के मार्ग सज्जन ग्रहण करते हैं; बुरे आचरण वाले उनसे विमुख होते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

जीवन की उपलब्धि केवल निजी लाभ नहीं। नैतिक कर्म, आत्मीय संबंध और व्यापक हित भी उसकी संपदा हैं। किसी चुनाव में इन सभी पहलुओं को देखना व्यक्तित्व को संतुलित दिशा देता है।

छंद ३५४ दोहा

नीच निरादरहीं सुखद आदर सुखद बिसाल। कदरी बदरी बिटप गति पेखहु पनस रसाल ॥
कठिन शब्दार्थ

कदरी = केला; बदरी = बेर; पनस = कटहल; रसाल = आम।

सरल हिंदी अर्थ

कवि वृक्षों के पालन और फलने की भिन्न रीति से कहते हैं कि हर स्वभाव के साथ एक जैसा व्यवहार उचित नहीं होता।

भावार्थ और जीवन-संदेश

सभी के प्रति मानवीय सम्मान समान रहे, लेकिन सहयोग का तरीका परिस्थिति के अनुसार चुनें। जहाँ अनुचित छूट नुकसान करे वहाँ स्पष्ट सीमा और जहाँ प्रोत्साहन उपयोगी हो वहाँ स्नेह दें।

छंद ३५५ दोहा

तुलसी अपनो आचरन भलो न लागत कासु। तेहि न बसात जो खात नित लहसुनहू को बासु ॥
कठिन शब्दार्थ

आचरन = व्यवहार; बासु = गंध; बसात = गंध लगना।

सरल हिंदी अर्थ

अपना व्यवहार किसे अच्छा नहीं लगता? रोज लहसुन खाने वाले को उसकी गंध महसूस नहीं होती; वैसे ही आदत के दोष स्वयं को छिप सकते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

आत्मपरीक्षण के लिए बाहर की ईमानदार प्रतिक्रिया उपयोगी है। आलोचना पर तुरंत नाराज होने के बजाय उसमें तथ्य देखें। विनम्रता से सुधार करना अपने सम्मान को घटाना नहीं, चरित्र को मजबूत बनाना है।

छंद ३५६ दोहा

बुध सो बिबेकी बिमलमति जिन्ह के रोष न राग। सुहृद सराहत साधु जेहि तुलसी ताको भाग ॥
कठिन शब्दार्थ

बिमलमति = निर्मल बुद्धि; रोष-राग = क्रोध-पक्षपात; सुहृद = हितैषी।

सरल हिंदी अर्थ

जिसकी बुद्धि निर्मल है और निर्णय राग-द्वेष से मुक्त, वही वास्तविक विवेकी है। ऐसे व्यक्ति की सज्जन प्रशंसा करें तो वह सौभाग्य है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

चतुराई और विवेक अलग हैं। निष्पक्षता, सत्य और हितबुद्धि निर्णय को अच्छा बनाते हैं। प्रशंसा पाने से अधिक ऐसा आचरण विकसित करें जिसे विश्वसनीय और सदाचारी लोग भी सम्मान दें।

छंद ३५७ दोहा

आपु आपु कहँ सब भलो अपने कहँ कोइ कोइ। तुलसी सब कहँ जो भलो सुजन सराहिअ सोइ ॥
कठिन शब्दार्थ

आपु = स्वयं; सुजन = सज्जन; सब कहँ = सभी के लिए।

सरल हिंदी अर्थ

अपने लिए अच्छा लगभग हर व्यक्ति होता है; अपनों का हित करने वाले भी मिलते हैं। जो सभी का भला चाहे, वही विशेष रूप से प्रशंसनीय सज्जन है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

करुणा का क्षेत्र परिवार से आगे बढ़ाएँ। दूसरे की गरिमा और आवश्यकता को भी महत्त्व दें। सार्वजनिक संसाधनों, कार्यस्थल और समुदाय में निष्पक्ष व्यवहार व्यापक भलाई का दैनिक रूप है।

छंद ३५८ दोहा

तुलसी भलो सुसंग तें पोच कुसंगति सोइ। नाउ किंनरी तीर असि लोह बिलोकहु लोइ ॥
कठिन शब्दार्थ

कुसंगति = बुरी संगति; नाउ = नाव; असि = तलवार।

सरल हिंदी अर्थ

एक ही लोहा नाव, वाद्य के तार, तीर या तलवार बनकर अलग उपयोग पाता है। संगति भी मनुष्य को भलाई या हानि की दिशा दे सकती है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

अपने वातावरण का प्रभाव पहचानें। ऐसा साथ चुनें जहाँ सीख, संयम और सेवा बढ़े। अच्छी संगति की पहचान केवल नाम से नहीं, उसके परिणामस्वरूप बदलते विचार और व्यवहार से करें।

छंद ३५९ दोहा

गुरु संगति गुरु होइ सो लघु संगति लघु नाम। चार पदारथ में गनै नरक द्वारहू काम ॥
कठिन शब्दार्थ

गुरु = बड़ा, महत्त्वपूर्ण; लघु = छोटा; चार पदारथ = चार पुरुषार्थ।

सरल हिंदी अर्थ

कामना बंधन का द्वार भी बन सकती है और धर्मपूर्ण संदर्भ में पुरुषार्थ का अंग भी। किसी तत्व का अर्थ उसकी संगति और मर्यादा से बदलता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

इच्छाओं को न अंधाधुंध सही मानें, न हर रूप में गलत। उद्देश्य, तरीका और परिणाम देखें। विवेकपूर्ण मर्यादा जीवन की स्वाभाविक आवश्यकताओं को जिम्मेदार तथा संतुलित रूप देती है।

छंद ३६० दोहा

तुलसी गुरु लघुता लहत लघु संगति परिनाम। देवी देव पुकारिअत नीच नारि नर नाम ॥
कठिन शब्दार्थ

गुरु-लघुता = महत्त्व का घटना; पुकारिअत = संबोधित किया जाता; परिनाम = प्रभाव।

सरल हिंदी अर्थ

कवि संबोधनों की लोकरीति से बताते हैं कि बुरी संगति प्रतिष्ठित नाम और व्यक्ति का महत्त्व भी घटा सकती है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह पुराने समाज की भाषा का निरीक्षण है। किसी का लिंग या जन्म सम्मान घटाने का कारण नहीं। व्यावहारिक शिक्षा है कि अपने नाम से अधिक आचरण और संगति की गुणवत्ता पर ध्यान रखें।

खंड ४ · सज्जन-दुर्जन का विवेक

छंद ३६१–३८४ · बाहरी दिखावे तथा भीतर के गुणों का अंतर।

छंद ३६१ दोहा

तुलसी किएँ कुसंग थिति होहिं दाहिने बाम। कहि सुनि सकुचिअ सूम खल गत हरि संकर नाम ॥
कठिन शब्दार्थ

सूम = कंजूस; दाहिने-बाम = अनुकूल-प्रतिकूल; सकुचिअ = संकोच हो।

सरल हिंदी अर्थ

यदि सुंदर हरि-शंकर जैसे नाम भी कंजूस या छलपूर्ण व्यक्ति से जुड़ें, तो बोलते-सुनते संकोच हो सकता है। बुरी संगति शुभ पहचान को धूमिल करती है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

धार्मिक नाम या परिचय अच्छे आचरण का विकल्प नहीं। अपनी पहचान की गरिमा सत्य और उदार व्यवहार से निभाएँ। दूसरों के भरोसे का उपयोग छल के लिए करना आध्यात्मिकता के मूल उद्देश्य से दूर ले जाता है।

छंद ३६२ दोहा

बसि कुसंग चह सुजनता ताकी आस निरास। तीरथहू को नाम भो गया मगह के पास ॥
कठिन शब्दार्थ

थिति = स्थिति; निरास = निष्फल; मगह = मगध।

सरल हिंदी अर्थ

बुरी संगति में रहकर सज्जनता चाहना कठिन है। कवि गया और मगध के पुराने धार्मिक संकेत से वातावरण के प्रभाव की उपमा देते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

ऐतिहासिक स्थान-मूल्यांकन को आज के लोगों का चरित्र न समझें। मुख्य संदेश अपने परिवेश की समीक्षा है। जो साथ दोषों को बढ़ावा दे, उससे उचित दूरी और अच्छे अभ्यास का समर्थन आवश्यक है।

छंद ३६३ दोहा

राम कृपाँ तुलसी सुलभ गंग सुसंग समान। जो जल परै जो जन मिलै कीजै आपु समान ॥
कठिन शब्दार्थ

सुसंग = सत्संग; आपु समान = अपने समान; कृपाँ = कृपा से।

सरल हिंदी अर्थ

गंगा जिस जल को ग्रहण करती है उसे अपने जैसा पवित्र मानती है; सच्चा सत्संग भी मिलने वाले को अच्छी दिशा देने में समर्थ है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

संगति का श्रेष्ठ रूप दूसरे को छोटा नहीं करता, उठाता है। ज्ञान और सेवा साझा करें। स्वयं भी सीखने की विनम्रता रखें, ताकि शुभ संगति केवल निकट बैठने के बजाय चरित्र में परिवर्तन ला सके।

छंद ३६४ दोहा

ग्रह भेषज जल पवन पट पाइ कुजोग सुजोग। होहिं कुबस्तु सुबस्तु जल लखहिं सुलच्छन लोग ॥
कठिन शब्दार्थ

भेषज = औषधि; पट = वस्त्र; कुजोग-सुजोग = खराब-अच्छा मेल।

सरल हिंदी अर्थ

ग्रह, औषधि, जल, हवा और वस्त्र भी उचित या अनुचित मेल से हितकारी अथवा हानिकारक हो सकते हैं। विवेकी व्यक्ति संबंध और परिस्थिति देखता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

किसी चीज पर अकेला नाम देखकर निर्णय न करें। मात्रा, संदर्भ और उपयोग का महत्त्व है। यह सामान्य विवेक का संदेश है; स्वास्थ्य संबंधी वास्तविक निर्णय योग्य मार्गदर्शन से ही करें।

छंद ३६५ दोहा

जनम जोग में जानिअत जग बिचित्र गति देखि। तुलसी आखर अंक रस रंग बिभेद बिसेषि ॥
कठिन शब्दार्थ

जनम जोग = बनने का मेल; बिभेद = अंतर; अंक रस रंग = संख्या, स्वाद और रंग।

सरल हिंदी अर्थ

अक्षर, अंक, रस और रंगों के संयोग बदलने से अर्थ तथा प्रभाव बदलते हैं। संसार की विचित्रता समझने के लिए इन मेलों को देखो।

भावार्थ और जीवन-संदेश

छोटे तत्वों का संयोजन बड़ा परिणाम बनाता है। संगति और परिस्थिति को समझना निर्णय की गुणवत्ता बढ़ाता है। किसी व्यक्ति को एक गुण से पूरी तरह न आँककर उसके संपूर्ण व्यवहार का संदर्भ देखें।

छंद ३६६ दोहा

आखर जोरि बिचार करु सुमति अंक लिखि लेखु। जोग कुजोग सुजोग मय जग गति समुझि बिसेषु ॥
कठिन शब्दार्थ

आखर = अक्षर; लेखु = गणना; जोग = मेल।

सरल हिंदी अर्थ

अक्षर जोड़कर और अंक लिखकर विचार करो कि अच्छे-बुरे संयोग से अर्थ तथा परिणाम कैसे बदलते हैं। यही समझ जगत के व्यवहार में भी काम आती है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

विवेक का अभ्यास ठोस उदाहरणों से हो सकता है। निर्णय से पहले संबंध, क्रम और परिणाम देखें। जानकारी के टुकड़े जोड़ते समय सावधानी रखने से भ्रम और जल्दबाजी के निष्कर्ष घटते हैं।

छंद ३६७ दोहा

करु बिचार चलु सुपथ भल आदि मध्य परिनाम। उलटि जपें 'जारा मरा' सूधें'राजा राम' ॥
कठिन शब्दार्थ

सुपथ = अच्छा मार्ग; सूधें = सीधे; परिनाम = अंत का फल।

सरल हिंदी अर्थ

सोचकर अच्छा मार्ग चुनो, जिसका आरंभ, मध्य और अंत हितकारी हो। कवि अक्षरों के उलटने-सीधे होने से बने नामों द्वारा दिशा का महत्त्व बताते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

भक्ति में शब्द के साथ आशय भी देखना चाहिए। केवल चतुर जोड़-तोड़ के बजाय लक्ष्य और आचरण शुभ हों। किसी कार्य की शुरुआत ही नहीं, आगे पड़ने वाला प्रभाव भी विचारना बुद्धिमानी है।

छंद ३६८ दोहा

होइ भले के अनभलो होइ दानि के सूम। होइ कपूत सपूत कें ज्यों पावक में धूम ॥
कठिन शब्दार्थ

सूम = कंजूस; कपूत = दुर्गुणी पुत्र; पावक = आग।

सरल हिंदी अर्थ

भले से बुरा, दानी से कंजूस और अच्छे परिवार में भी दुर्गुणी संतान हो सकती है, जैसे उज्ज्वल आग से धुआँ निकलता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

वंश या संबंध से चरित्र की गारंटी नहीं होती। प्रत्येक व्यक्ति को अपने कर्म से समझें। परिवार का अच्छा नाम अपने आचरण में उतारना व्यक्तिगत जिम्मेदारी है, केवल उसका दावा करना पर्याप्त नहीं।

छंद ३६९ दोहा

जड़ चेतन गुन दोष मय बिस्व कीन्ह करतार। संत हंक गुन गहहिं पय परिहरि बारि बिकार ॥
कठिन शब्दार्थ

हंक = स्रोत में हंस का रूप; पय = दूध; बारि बिकार = जलरूपी विकार।

सरल हिंदी अर्थ

संसार गुण-दोष दोनों से बना है। संत हंस की उपमा में दूध लेते और पानी छोड़ते हैं, अर्थात गुण ग्रहण कर दोष से बचते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

विवेक का अर्थ सब कुछ नकारना नहीं, उपयोगी को पहचानना है। किसी व्यक्ति या पाठ में अच्छाई मिले तो सीखें, किंतु हानिकारक बात को स्वीकारना आवश्यक नहीं। संतुलित दृष्टि मन को कटुता से बचाती है।

छंद ३७० सोरठा

पाट कीट तें होइ तेहि तें पाटंबर रुचिर। कृमि पालइ सबु कोइ परम अपावन प्रान सम ॥
कठिन शब्दार्थ

पाट कीट = रेशम का कीड़ा; पाटंबर = रेशमी वस्त्र; रुचिर = सुंदर।

सरल हिंदी अर्थ

रेशम के कीड़े से सुंदर वस्त्र बनते हैं, इसलिए साधारण समझा गया जीव भी लोग आदर से पालते हैं। गुण का उपयोग बाहरी हीनता की धारणा बदल सकता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

किसी की उपयोगिता और गरिमा को पुराने पूर्वाग्रह से न आँकें। छोटे योगदान भी बड़े कार्य का आधार होते हैं। श्रम और कौशल को सम्मान देना अच्छे समाज की आवश्यक पहचान है।

छंद ३७१ दोहा

जो जो जेहिं जेहिं रल मगन तहँ सो मुदित मन मानि। रसगुन दोष बिचारिबो रसिक रीति पहिचानि ॥
कठिन शब्दार्थ

रस = रुचि; मुदित = प्रसन्न; रसिक रीति = विवेकपूर्ण रस-समझ।

सरल हिंदी अर्थ

हर व्यक्ति अपनी रुचि में आनंद अनुभव करता है। लेकिन रुचि के गुण-दोष पर विचार करना वास्तविक रसिकता और समझ की पहचान है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

पसंद होना और हितकारी होना हमेशा समान नहीं। मनोरंजन, संगति या अभ्यास चुनते समय उनका प्रभाव देखें। अच्छा स्वाद संवेदनशीलता और विवेक से विकसित होता है, केवल आदत से नहीं।

छंद ३७२ दोहा

सम प्रकास तम पाख दुहुँ नाम भेद बिधि कीन्ह। ससि सोषक पोषक समुझि जग जस अपजस दीन्ह ॥
कठिन शब्दार्थ

पाख = पक्ष; सोषक-पोषक = घटाने-बढ़ाने वाला; जस-अपजस = यश-अपयश।

सरल हिंदी अर्थ

दोनों पक्षों में उजाले-अँधेरे का चक्र है, फिर भी चंद्रमा के घटने-बढ़ने से उनके नाम और प्रतिष्ठा अलग बनी। मूल्यांकन में प्रभाव महत्त्व रखता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

किसी वस्तु की केवल उपस्थिति नहीं, उसकी दिशा और भूमिका भी देखें। जो विकास, सहयोग और आशा बढ़ाए उसका मूल्य अलग होता है। निर्णय में एक पक्ष देखकर पूरा निष्कर्ष न निकालें।

छंद ३७३ दोहा

लोक बेदहू लौं दगो नाम भले को पोच। धर्मराज जम गाज पबि कहत सकोच न सोच ॥
कठिन शब्दार्थ

दगो = दाग; धर्मराज-जम = एक देवता के दो नाम; पबि = वज्र।

सरल हिंदी अर्थ

लोक और वेद में भी अच्छे नाम वाले को कठोर नाम से पुकारा जा सकता है। धर्मराज को यम कहने जैसी रीति दिखाती है कि शब्दों में धारणाएँ जुड़ जाती हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

किसी संबोधन से अधिक व्यक्ति के कार्य का सत्य देखें। अच्छा-बुरा कह देना आसान है, न्यायपूर्वक समझना कठिन। दूसरों के बारे में बोलते समय संदर्भ और गरिमा का ध्यान रखें।

छंद ३७४ दोहा

बिरुचि परखिऐ सुजन जन राखि परखिऐ मंद। बड़वानल सोषत उदधि हरष बढ़ावत चंद ॥
कठिन शब्दार्थ

बिरुचि = स्वार्थ या रुचि के विरुद्ध; बड़वानल = समुद्र की आग; उदधि = समुद्र।

सरल हिंदी अर्थ

सज्जन की परीक्षा अपने स्वार्थ के प्रतिकूल परिस्थिति में होती है; दुष्ट अनुकूलता में भी हानि कर सकता है। समुद्र को सोखती आग और बढ़ाता चंद्रमा अलग प्रभाव देते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

संबंध का मूल्य सुविधा में ही न आँकें। असहमति में भी सम्मान रखने वाला व्यक्ति भरोसेमंद होता है। अपने व्यवहार की परीक्षा भी वहीं करें जहाँ निजी अपेक्षा पूरी न हो।

छंद ३७५ दोहा

प्रभु सनमुख भएँ नीच नर होत निपट बिकराल। रबिरुख लखि दरपन फटिक उगिलत ज्वालाजाल ॥
कठिन शब्दार्थ

प्रभु सनमुख = शक्तिशाली के निकट; फटिक = स्फटिक; ज्वालाजाल = आग की लपटें।

सरल हिंदी अर्थ

सत्ता के निकट पहुँचकर बुरा व्यक्ति और उग्र हो सकता है, जैसे सूर्य की किरण पाकर कोई स्फटिक आग प्रकट करता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

अधिकार मिलने से चरित्र की जिम्मेदारी बढ़ती है। किसी बड़े का संरक्षण दूसरों को दबाने का अधिकार नहीं। शक्ति का उपयोग नियंत्रित, निष्पक्ष और जनहितकारी हो, तभी उसका मूल्य है।

छंद ३७६ दोहा

प्रभु समीप गत सुजन जन होत सुखद सुबिचार। लवन जलधि जीवन जलद बरषत सुधा सुबारि ॥
कठिन शब्दार्थ

लवन जलधि = खारा समुद्र; जीवन जलद = जल देने वाला बादल; सुबारि = अच्छा जल।

सरल हिंदी अर्थ

सज्जन शक्तिशाली के निकट होकर सुख देता है, जैसे खारे समुद्र से जल लेकर बादल मीठी वर्षा करता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

संसाधन या पद मिलने पर उनका रूपांतरण लोकहित में होना चाहिए। सच्ची योग्यता उपलब्ध अवसर को दूसरों तक उपयोगी रूप में पहुँचाती है। उदार व्यवहार शक्ति को सेवा में बदल देता है।

छंद ३७७ दोहा

नीच निरावहिं निरस तरु तुलसी सींचहिं ऊख। पोषत पयद समान सब बिष पियूष के रूख ॥
कठिन शब्दार्थ

निरावहिं = हटाते या नष्ट करते; ऊख = गन्ना; पियूष = अमृत।

सरल हिंदी अर्थ

मनुष्य कभी उपयोगी पौधे सींचता और अनुपयोगी हटाता है, पर मेघ विष और अमृत जैसे सभी वृक्षों पर समान वर्षा करता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

कवि उदारता और व्यापक संरक्षण की छवि रखते हैं। समान मानवीय गरिमा के साथ सहायता दें, पर व्यवहार के हानिकारक परिणाम भी देखें। करुणा और विवेक का संतुलन ही जिम्मेदार सेवा है।

छंद ३७८ दोहा

बरषि बिस्व हरषित करत हरत ताप अघ प्यास। तुलसी दोष न जलद को जो जल जरै जवास ॥
कठिन शब्दार्थ

जवास = वर्षा में सूखने वाला पौधा, काव्यविश्वास; ताप-अघ = संताप।

सरल हिंदी अर्थ

वर्षा संसार को प्रसन्न और प्यास शांत करती है; यदि उससे जवास सूखता है, तो कवि बादल को दोषी नहीं मानते।

भावार्थ और जीवन-संदेश

व्यापक भलाई का मूल्य किसी एक अपवाद से समाप्त नहीं होता। फिर भी वास्तविक नुकसान दिखे तो उसकी देखभाल जरूरी है। निर्णय में समग्र हित और विशेष प्रभावित व्यक्ति दोनों की स्थिति समझें।

छंद ३७९ दोहा

अमर दानि जाचक मरहिं मरि मरि फिरि फिरि लेहिं। तुलसी जाचक पातकी दातहि दूषन देहिं ॥
कठिन शब्दार्थ

अमर दानि = देवदाता; दूषन = दोष; जाचक = याचक।

सरल हिंदी अर्थ

दाता निरंतर देता रहता है और याचक बार-बार माँगते हैं; फिर भी अपनी अतृप्त चाह के कारण वे दाता को दोष दे सकते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

कृतज्ञता का अभाव अपेक्षा को अंतहीन बनाता है। जो मिला है उसका मूल्य समझें और आवश्यक प्रयास स्वयं करें। सहायता को अधिकार मान लेने के बजाय संतोष तथा जिम्मेदारी के साथ ग्रहण करें।

छंद ३८० दोहा

लखि गयंद लै चलत भजि स्वान सुखानो हाड़। गज गुन मोल अहार बल महिमा जान कि राड़ ॥
कठिन शब्दार्थ

गयंद = हाथी; स्वान = कुत्ता; सुखानो हाड़ = सूखी हड्डी।

सरल हिंदी अर्थ

सूखी हड्डी लिए कुत्ता हाथी को देखकर डरता है कि वह उसका भोजन छीन लेगा; वह हाथी का आहार और सामर्थ्य नहीं समझता।

भावार्थ और जीवन-संदेश

अपनी छोटी चाह के आधार पर दूसरों के उद्देश्य न मान लें। संदेह कई बार अज्ञान से बनता है। व्यक्ति की वास्तविक स्थिति और जरूरत समझना भ्रम तथा अनावश्यक वैर को घटाता है।

छंद ३८१ दोहा

कै निदरहुँ कै आदरहुँ सिंघहि स्वान सिआर। हरष बिषाद न केसरिहि कुंजर गंजनिहार ॥
कठिन शब्दार्थ

केसरी = सिंह; कुंजर = हाथी; निदरहुँ = अनादर करो।

सरल हिंदी अर्थ

कुत्ते-सियार सिंह का सम्मान करें या अपमान, हाथी को परास्त करने वाला सिंह उससे विचलित नहीं होता।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह आत्मविश्वास का रूपक है। हर आलोचना से अपनी दिशा न बदलें, लेकिन उपयोगी प्रतिक्रिया सुनें। योग्यता और सत्य पर आधारित स्थिरता प्रशंसा की लत तथा निराधार निंदा के भय से बचाती है।

छंद ३८२ दोहा

ठाढ़ो द्वार न दै सकैं तुलसी जे नर नीच। निंदहि बलिल हरिचंद को का कियो करन दधीच ॥
कठिन शब्दार्थ

बलि-हरिचंद = प्रसिद्ध दानी; करन-दधीच = दान के आदर्श; द्वार = घर का प्रवेश।

सरल हिंदी अर्थ

जो सामने आए जरूरतमंद को कुछ नहीं दे सकते, वे भी बड़े दानियों की आलोचना करते हैं कि उन्होंने क्या किया।

भावार्थ और जीवन-संदेश

सिर्फ दूसरों के कार्य पर टीका करना सरल है। अपनी क्षमता के अनुसार छोटा वास्तविक योगदान देना अधिक उपयोगी है। सेवा का मूल्य अनावश्यक तुलना के बजाय उसके सच्चे हितकारी प्रभाव से आँकें।

छंद ३८३ दोहा

ईस सीस बिलसत बिमल तुलसी तरल तरंग। स्वान सरावग के कहें लघुता लहै न गंग ॥
कठिन शब्दार्थ

ईस सीस = शिव का सिर; तरल तरंग = प्रवाहमान लहर; लघुता = महत्त्व घटना।

सरल हिंदी अर्थ

शिव के मस्तक पर सुशोभित गंगा की महिमा किसी अनुचित टिप्पणी से नहीं घटती। कवि स्थापित पवित्रता को निराधार निंदा से अलग रखते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

सत्य गुण दूसरों के कथन से तुरंत नष्ट नहीं होता। अपमान का हर बार प्रतिशोध लेने के बजाय उचित कर्म जारी रखें। प्रमाणयुक्त आलोचना और केवल तिरस्कार के बीच विवेक करना आवश्यक है।

छंद ३८४ दोहा

तुलसी देवल देव को लागे लाख करोरि। काक अभागें हगि भर्यो महिमा भई कि थोरि ॥
कठिन शब्दार्थ

देवल = मंदिर; काक = कौवा; थोरि = कम।

सरल हिंदी अर्थ

बहुमूल्य मंदिर को कौवा गंदा कर दे तो उसके आराध्य या वास्तविक महत्त्व की कमी नहीं होती।

भावार्थ और जीवन-संदेश

छोटी अशुद्धि या आलोचना से मूल मूल्य नकारना उचित नहीं। सफाई और सुधार करें, पर पूरे कार्य को तुच्छ न मानें। अच्छे उद्देश्य के साथ नियमित देखभाल भी सम्मान का व्यावहारिक रूप है।

खंड ५ · वाणी, स्वभाव और व्यवहार

छंद ३८५–४०८ · उचित बात, अवसर तथा संबंधों की सावधानी।

छंद ३८५ दोहा

निज गुन घटत न नाग नग परखि परिहरत कोल। तुलसी प्रभु भूषन किए गुंजा बढ़े न मोल ॥
कठिन शब्दार्थ

नाग नग = सर्पमणि; गुंजा = गुंजा बीज; परिहरत = छोड़ देना।

सरल हिंदी अर्थ

कोई मणि पहचान न सके तो उसका गुण नहीं घटता, और आभूषण में लग जाने मात्र से साधारण बीज रत्न नहीं हो जाता।

भावार्थ और जीवन-संदेश

प्रतिष्ठित स्थान या किसी की स्वीकृति गुण का पूरा प्रमाण नहीं। वास्तविक क्षमता, ईमानदारी और उपयोगिता देखें। स्वयं को भी पद से अधिक अपने काम की गुणवत्ता से विकसित करें।

छंद ३८६ दोहा

राकापति षोड़स उअहिं तारा गन समुदाइ। सकल गिरिन्ह दव लाइअ बिनु रबि राति न जाइ ॥
कठिन शब्दार्थ

राकापति = पूर्ण चंद्रमा; दव = वनाग्नि; रबि = सूर्य।

सरल हिंदी अर्थ

कई चंद्रमा, असंख्य तारे और पहाड़ों पर आग भी सूर्य का स्थान नहीं ले सकते; उसके बिना रात की स्थिति नहीं बदलती।

भावार्थ और जीवन-संदेश

सही साधन का विकल्प केवल अधिक मात्रा नहीं होती। समस्या का मूल समझकर उपयुक्त उपाय चुनें। साधना में भी बाहरी विस्तार से अधिक सही दिशा और आवश्यक आधार महत्त्व रखते हैं।

छंद ३८७ दोहा

भलो कहहिं बिनु जानेहूँ बिनु जानें अपबाद। ते नर गादुर जानि जियँ करिय न हरष बिषाद ॥
कठिन शब्दार्थ

अपबाद = निंदा; गादुर = चमगादड़; हरष-बिषाद = खुशी-दुःख।

सरल हिंदी अर्थ

जो बिना जाने प्रशंसा या निंदा करते हैं, उनके कथन से अत्यधिक प्रसन्न या दुखी नहीं होना चाहिए।

भावार्थ और जीवन-संदेश

समीक्षा का मूल्य उसकी समझ और प्रमाण पर है। अनजान राय से आत्ममूल्य तय न करें। योग्य प्रतिक्रिया ग्रहण करें और निराधार कथन के बीच अपने कर्तव्य पर स्थिर रहें।

छंद ३८८ दोहा

पर सुख संपति देखि सुनि जरहिं जे जड़ बिनु आगि। तुलसी तिन के भागते चलै भलाई भागि ॥
कठिन शब्दार्थ

जरहिं = जलते हैं; जड़ = अविवेकी; भलाई भागि = शुभता दूर होना।

सरल हिंदी अर्थ

दूसरों के सुख और संपन्नता को देखकर ईर्ष्या में जलने वाले अपने जीवन की भलाई से ही दूर होते जाते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

ईर्ष्या मन का समय और शांति दोनों लेती है। दूसरे की उपलब्धि से सीखें, अपने प्रयास की दिशा सुधारें। साझा आनंद और उदार प्रशंसा संबंध मजबूत करती है तथा भीतर कड़वाहट घटाती है।

छंद ३८९ दोहा

तुलसी जे कीरति चहहिं पर की कीरति खोइ। तिनके मुहँ मसि लागिहैं मिटहि न मरिहै धोइ ॥
कठिन शब्दार्थ

कीरति = यश; मसि = कालिख; खोइ = नष्ट करके।

सरल हिंदी अर्थ

दूसरे का यश मिटाकर अपनी प्रतिष्ठा चाहने वालों के मुख पर उलटे अपयश की कालिख लगती है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

अपनी प्रगति के लिए दूसरे को गिराना आवश्यक नहीं। बेहतर काम, सत्य और सहयोग से पहचान बनाएँ। झूठी निंदा से मिला लाभ अस्थिर है और विश्वास खोने की कीमत बहुत बड़ी हो सकती है।

छंद ३९० दोहा

तन गुन धन महिमा धरम तेहि बिनु जेहि अभिमान। तुलसी जिअत बिडंबना परिनामहु गत जान ॥
कठिन शब्दार्थ

बिडंबना = उपहासपूर्ण दुर्दशा; अभिमान = घमंड; परिनाम = अंत।

सरल हिंदी अर्थ

शरीर, गुण, धन, महिमा या धर्म वास्तव में न हो और व्यक्ति उनका घमंड करे, तो जीवन में उपहास और अंत में दुःख मिलता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

दावा और वास्तविकता का मेल रखें। कमी स्वीकारना सुधार का पहला कदम है। सीखने, श्रम और विनय से विकसित गुण बिना आधार की बड़ी छवि से अधिक स्थायी सम्मान देते हैं।

छंद ३९१ दोहा

सासु ससुर गुरु मातु पितु प्रभु भयो चहै सब कोइ। होनी दूजी ओर को सुजन सराहिअ सोइ ॥
कठिन शब्दार्थ

दूजी ओर = दूसरे की भूमिका; सुजन = सज्जन; प्रभु = स्वामी।

सरल हिंदी अर्थ

सभी बड़ा संबंध और अधिकार चाहते हैं; जो सेवक, शिष्य या आश्रित की जिम्मेदारी भी निभाए, वही विशेष प्रशंसनीय है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

अधिकार के साथ कर्तव्य समझें। संबंध में केवल निर्देश देना नहीं, सुनना और सहयोग करना भी आवश्यक है। दूसरों की भूमिका का अनुभव विनय और न्यायपूर्ण नेतृत्व विकसित करता है।

छंद ३९२ दोहा

सठ सहि साँसति पति लहत सुजन कलेस न कायँ। गढ़ि गुढ़ि पाहन पूजिऐ गंडकि सिला सुभायँ ॥
कठिन शब्दार्थ

साँसति = तराशने का कष्ट; गंडकि सिला = शालिग्राम-परंपरा की शिला; सुभायँ = स्वभाव से।

सरल हिंदी अर्थ

कुछ पत्थर तराशे जाने पर पूजनीय बनते हैं, जबकि गंडकी की शिला अपनी प्राकृतिक पहचान से सम्मान पाती है। कवि सहज गुण और कठिन बनावट का अंतर दिखाते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

बाहरी आकार और मूल चरित्र अलग हो सकते हैं। सहज सद्गुण का सम्मान करें और अपने सुधार का श्रम भी स्वीकारें। दूसरे की प्रतिष्ठा से ईर्ष्या करने के बजाय अपनी योग्य दिशा पहचानना उचित है।

छंद ३९३ दोहा

बड़े बिबुध दरबार तें भूमि भूप दरबार। जापक पूजत पेखिअत सहत निरादर भार ॥
कठिन शब्दार्थ

बिबुध दरबार = देवसभा; भूप दरबार = राजसभा; निरादर = उपेक्षा।

सरल हिंदी अर्थ

कवि कहते हैं कि राजदरबार की तुलना में देवाश्रय श्रेष्ठ है; वहाँ प्रार्थना का भाव रहता है, यहाँ याचक को अपमान सहना पड़ सकता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह भक्त की आध्यात्मिक स्वाधीनता की घोषणा है। वास्तविक सहायता लेना गलत नहीं, पर गरिमा को अनावश्यक चापलूसी में न खोएँ। सम्मानपूर्ण संबंध और अपने श्रम पर भरोसा बनाए रखना उपयोगी संदेश है।

छंद ३९४ दोहा

बिनु प्रपंच छल भीख भलि लहिअ न दिएँ कलेस। बावन बलि सों छल कियो दियो उचित उपदेस ॥
कठिन शब्दार्थ

प्रपंच = छल; बावन = वामन; कलेस = पीड़ा।

सरल हिंदी अर्थ

बिना छल की सरल भिक्षा अच्छी है; किसी को दुख देकर प्राप्ति उचित नहीं। वामन और बलि के प्रसंग से कवि लेने की नैतिकता पर विचार करते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

लक्ष्य अच्छा हो तो भी तरीका जाँचना चाहिए। किसी के विश्वास का लाभ उठाकर वस्तु या अधिकार लेना मन को ऋणी बनाता है। पारदर्शिता और सम्मान सहायता के संबंध में आवश्यक हैं।

छंद ३९५ दोहा

भलो भले सों छल किएँ जनम कनौड़ो होइ। श्रीपति सिर तुलसी लसति बलि बावन गति सोइ ॥
कठिन शब्दार्थ

कनौड़ो = ऋणी; श्रीपति = विष्णु; लसति = शोभती।

सरल हिंदी अर्थ

भले व्यक्ति को छलने वाला स्वयं उसके प्रति ऋणी हो जाता है। बलि-वामन के प्रसंग में कवि भगवान की विनम्र स्वीकार्यता का संकेत देते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

कथा दाता की निष्ठा का आदर करती है। दूसरे की उदारता को कमजोरी न मानें। यदि अपने आचरण से किसी का विश्वास टूटा हो तो जिम्मेदारी स्वीकारना और सुधार करना सम्मान का मार्ग है।

छंद ३९६ दोहा

बिबुध काज बावन बलिहि छलो भलो जिय जानि। प्रभुता तजि बस भे तदपि मन की गइ न गलानि ॥
कठिन शब्दार्थ

बिबुध काज = देवताओं का कार्य; प्रभुता = अधिकार; गलानि = संकोच।

सरल हिंदी अर्थ

देवकार्य के लिए बलि को छलना हितकारी माना गया, फिर भी वामन का संकोच नहीं मिटा और उन्होंने अपनी प्रभुता छोड़कर संबंध निभाया—कवि ऐसा भाव देखते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

बड़े उद्देश्य के नाम पर अपने साधन की समीक्षा बंद न करें। नैतिक संवेदनशीलता सफलता के बाद भी रहती है। विनय, प्रतिपूर्ति और विश्वास का सम्मान नेतृत्व की वास्तविक कसौटी हैं।

छंद ३९७ दोहा

सरल बक्र गति पंच ग्रह चपरि न चितवत काहु। तुलसी सूधे सूर ससि समय बिडंबित राहु ॥
कठिन शब्दार्थ

पंच ग्रह = पाँच ग्रहों का पारंपरिक संकेत; बक्र = वक्री; बिडंबित = पीड़ित।

सरल हिंदी अर्थ

टेढ़े-सीधे चलते ग्रहों को राहु नहीं छूता, जबकि सीधे चलते सूर्य-चंद्रमा ग्रहण सहते हैं—कवि इससे सज्जनों की कठिनाइयों का रूपक देते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह ज्योतिषीय-काव्य उपमा है, सदाचार छोड़ने का कारण नहीं। कठिनाई आने से सत्य का मूल्य नहीं घटता। सावधानी के साथ सीधा आचरण और उचित सहायता बनाए रखें।

छंद ३९८ दोहा

खल उपकार बिकार फल तुलसी जान जहान। मेढुक मर्कट बनिक बक्र कथा सत्य उपखान ॥
कठिन शब्दार्थ

खल = दुष्ट प्रवृत्ति; मेढुक-मर्कट = मेंढक-बंदर; उपखान = दृष्टांत।

सरल हिंदी अर्थ

कवि कथाओं के उदाहरणों से कहते हैं कि दुष्ट पर उपकार का फल कभी विपरीत भी मिल सकता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

करुणा के साथ सीमा और विवेक आवश्यक हैं। किसी की सहायता करते समय अपनी तथा दूसरों की सुरक्षा देखें। बार-बार नुकसान देने वाले व्यवहार को केवल सद्भाव से अनदेखा करना जिम्मेदार सेवा नहीं है।

छंद ३९९ दोहा

तुलसी खल बानी मधुर सुनि समुझिअ हियँ हेरि। राम राज बाधक भई मूढ़ मंथरा चेरि ॥
कठिन शब्दार्थ

हियँ हेरि = भीतर की भावना देखो; चेरि = दासी; बाधक = रुकावट।

सरल हिंदी अर्थ

मंथरा की मधुर लगती सलाह राम के राज्याभिषेक में बाधा बनी। इसलिए बुरे उद्देश्य वाली मीठी वाणी को विचारकर समझना चाहिए।

भावार्थ और जीवन-संदेश

हर मनभावन सुझाव हितकारी नहीं। सलाह देने वाले का उद्देश्य, तथ्य और परिणाम जाँचें। भय, ईर्ष्या या लाभ की उत्तेजना में लिया निर्णय लंबे संबंधों और अच्छे कार्य को नुकसान पहुँचा सकता है।

छंद ४०० दोहा

जोंक सूधि मन कुटिल गति खल बिपरीत बिचारु। अनहित सोनित सोष सो सो हित सोषनिहारु ॥
कठिन शब्दार्थ

सोनित = रक्त; हित = लाभ; बिपरीत = उलटा।

सरल हिंदी अर्थ

जोंक की चाल टेढ़ी पर उसका मनुष्य-हित कुछ माना जाता है; दुष्ट बाहर से सीधा लगकर भीतर से हानि कर सकता है। कवि रूप और उद्देश्य का भेद बताते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

दिखने वाली सरलता से अधिक परिणाम महत्त्वपूर्ण हैं। संबंध में स्पष्टता तथा निरंतर आचरण देखें। यह पुराने चिकित्सा-रूपक का उपयोग है, जोंक से स्वयं उपचार करने की सलाह नहीं।

छंद ४०१ दोहा

नीच गुड़ि ज्यों जानिबो सुनि लखि तुलसीदास। ढीलि दिएँ गिरि परत महि खैंचत चढ़त अकास ॥
कठिन शब्दार्थ

गुड़ि = पतंग; ढीलि = डोर ढीली; खैंचत = नियंत्रित खींचना।

सरल हिंदी अर्थ

पतंग की डोर बिल्कुल छोड़ देने पर वह गिरती है, उचित नियंत्रण से ऊपर जाती है। कवि अनुशासन की आवश्यकता समझाते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

किसी व्यक्ति को जन्म या पहचान से नीचा न मानें। व्यवहार में जहाँ छूट से हानि हो वहाँ स्पष्ट सीमा रखें। अनुशासन गरिमा और जिम्मेदारी के साथ हो, अपमान या अत्याचार के रूप में नहीं।

छंद ४०२ दोहा

भरदर बरसत कोस सत बचै जे बूँद बराइ। तुलसी तेउ खल बचन कर हए गए न पराइ ॥
कठिन शब्दार्थ

भरदर = घनघोर; खल बचन = कटु दुर्भावनापूर्ण वचन; हए = घायल।

सरल हिंदी अर्थ

भारी वर्षा की बूँदों से बचने वाला भी दुर्भावनापूर्ण वाणी से आहत हो सकता है। कवि शब्दों की चोट को गंभीर मानते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

वाणी का प्रभाव शरीर की चोट से कम नहीं हो सकता। असहमति में अपमान से बचें। आहत व्यक्ति को संवेदनशील सहायता दें और अपनी प्रतिक्रिया में संयम तथा आवश्यक दूरी रखें।

छंद ४०३ दोहा

पेरत कोल्हू मेलि तिल तिली सनेही जानि। देखि प्रीति की रीति यह अब देखिबी रिसानि ॥
कठिन शब्दार्थ

तिल-तिली = तिल के दाने; सनेही = स्नेहयुक्त; पेरत = दबाकर तेल निकालना।

सरल हिंदी अर्थ

तिल स्नेह अर्थात तेल से भरे हैं, फिर भी उन्हें कोल्हू में पेरा जाता है। शब्द के दो अर्थों से कवि प्रेम और कठोर व्यवहार की विडंबना दिखाते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

सच्चे स्नेह का उपयोग शोषण के लिए न करें। किसी का समर्पण उसकी सीमा मिटा नहीं देता। संबंध में सहमति, सम्मान और जिम्मेदारी रहें तो प्रेम दबाव का साधन नहीं बनता।

छंद ४०४ दोहा

सहबासी काचो गिलहिं पुरजन पाक प्रबीन। कालछेप केहि मिलि करहिं तुलसी खग मृग मीन ॥
कठिन शब्दार्थ

सहबासी = साथ रहने वाले; कालछेप = समय बिताना; पुरजन = नगरवासी।

सरल हिंदी अर्थ

पक्षी, पशु और मछलियाँ भी मनुष्य से डरें कि कोई उन्हें कच्चा या पकाकर खा जाएगा, तो वे किसके साथ निश्चिंत रहें? कवि असुरक्षा का चित्र देते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

दूसरे जीवों की दृष्टि से अपने व्यवहार को देखना करुणा जगाता है। अपनी सुविधा से आगे उनके भय और जीवन का सम्मान करें। संबंध का अच्छा आधार भरोसा है, केवल सामर्थ्य का उपयोग नहीं।

छंद ४०५ दोहा

जासु भरोसें सोइऐ राखि गोद में सीस। तुलसी तासु कुचाल तें रखवारो जगदीस ॥
कठिन शब्दार्थ

कुचाल = विश्वासघात; रखवारो = रक्षा करने वाला; भरोसें = विश्वास से।

सरल हिंदी अर्थ

जिसकी गोद में सिर रखकर निश्चिंत सोते हैं, उसी से धोखा हो तो रक्षा का अंतिम आश्रय जगदीश्वर ही लगता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

निकट संबंध में छल गहरी चोट देता है। भरोसे को जिम्मेदारी से निभाएँ। यदि विश्वास टूटे तो अकेले न रहें; उचित सहायता और सुरक्षित सीमाएँ लें, और अपने भीतर कटुता को अंतिम पहचान न बनने दें।

छंद ४०६ दोहा

मार खोज लै सौंह करि करि मत लाज न त्रास। मुए नीच ते मीच बिनु जे इन कें बिस्वास ॥
कठिन शब्दार्थ

सौंह = शपथ; त्रास = भय; मत = सलाह।

सरल हिंदी अर्थ

कवि ऐसे धोखेबाज से सावधान करते हैं जो शपथ लेकर भी हमला या छल करे और लज्जा न माने। बिना परखे विश्वास जीवन को संकट में डाल सकता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

विश्वास का अर्थ प्रमाण और अनुभव की उपेक्षा नहीं। शब्दों के साथ आचरण देखें। बार-बार धोखा मिले तो स्पष्ट दूरी, उचित सहायता और जिम्मेदार निर्णय लेना विवेक है।

छंद ४०७ दोहा

परद्रोही परदार रत परधन पर अपबाद। ते नर पावँर पापमय देह धरें मनुजाद ॥
कठिन शब्दार्थ

परदार = दूसरे का जीवनसाथी; अपबाद = निंदा; मनुजाद = मनुष्यभक्षी का रूपक।

सरल हिंदी अर्थ

दूसरों से वैर, संबंधों का उल्लंघन, धन पर लोभ और निंदा में लगे व्यक्ति को कवि कठोर रूपक में अमानवीय कहते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

नैतिकता का आधार दूसरे की गरिमा, संबंध और अधिकार का सम्मान है। अपनी इच्छा को सब पर थोपना विनाशकारी है। भक्ति मन, वाणी और कर्म में संयम तथा न्याय की प्रेरणा देनी चाहिए।

छंद ४०८ दोहा

बचन बेष क्यों जानिए मन मलीन नर नारि। सूपनखा मृग पूतना दसमुख प्रमुख बिचारि ॥
कठिन शब्दार्थ

बेष = वेश; मलीन मन = दूषित उद्देश्य; सूपनखा-पूतना = कथा-पात्र।

सरल हिंदी अर्थ

शूर्पणखा, मायामृग, पूतना और रावण के प्रसंग दिखाते हैं कि वाणी या रूप देखकर भीतर का उद्देश्य पूरा नहीं जाना जा सकता।

भावार्थ और जीवन-संदेश

आकर्षक आवरण पर तुरंत भरोसा न करें। व्यवहार, तथ्य और निरंतरता जाँचें। स्वयं भी बाहर की सुंदरता के साथ भीतर की सत्यता बनाएँ, जिससे संबंध छल के बजाय सम्मान पर टिके हों।

खंड ६ · क्षमा, संगति और मन का संयम

छंद ४०९–४३२ · क्रोध, अभिमान और दुष्प्रभाव से बचने की नीति।

छंद ४०९ दोहा

हँसनि मिलनि बोलनि मधुर कटु करतब मन माँह। छुवत जो सकुचइ सुमति सो तुलसी तिन्ह कि छाहँ ॥
कठिन शब्दार्थ

करतब = कर्म; छाहँ = छाया; सुमति = अच्छी बुद्धि।

सरल हिंदी अर्थ

हँसना, मिलना और बोलना मधुर हो, पर मन और कर्म कटु हों, तो विवेकी व्यक्ति ऐसे व्यवहार से दूरी रखता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

मधुरता की पहचान उसके परिणाम से करें। सम्मानपूर्ण वाणी अच्छी है, लेकिन साथ में सत्य और जिम्मेदारी भी हों। विश्वास धीरे-धीरे निरंतर अच्छे व्यवहार से बनने दें।

छंद ४१० दोहा

कपट सार सूची सहस बाँधि बचन परबास। कियो दुराउ चहौ चातुरीं सो सठ तुलसीदास ॥
कठिन शब्दार्थ

सूची = सुई; सार = लोहे का; परबास = वश में करना।

सरल हिंदी अर्थ

कपट की अनेक सूइयाँ छिपाकर मधुर वाणी से दूसरे को बाँधना चतुराई नहीं। कवि ऐसे छल को अंततः मूर्खता कहते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

दूसरे की भावना या भरोसे का उपयोग अपने स्वार्थ के लिए न करें। संबंध का स्थायी लाभ स्पष्टता और सम्मान में है। अल्पकालीन छल लंबे समय का विश्वास नष्ट कर सकता है।

छंद ४११ दोहा

बचन बिचार अचार तन मन करतब छल छूति। तुलसी क्यों सुख पाइऐ अंतरजामिहि धूति ॥
कठिन शब्दार्थ

अचार = आचरण; अंतरजामी = भीतर की बात जानने वाले; धूति = धोखा।

सरल हिंदी अर्थ

वाणी, विचार, शरीर और कर्म में छल रखकर अंतःकरण के ज्ञाता प्रभु को धोखा देकर सुख कैसे पाया जा सकता है?

भावार्थ और जीवन-संदेश

भक्ति का पहला क्षेत्र अपना मन है। दूसरों से छिपी बात भी अपने अंतःकरण को ज्ञात रहती है। ईमानदार आत्मस्वीकृति और सुधार का प्रयास धार्मिक प्रदर्शन से अधिक महत्त्वपूर्ण हैं।

छंद ४१२ दोहा

सारदूल को स्वाँग करि कूकर की करतूति। तुलसी तापर चाहिऐ कीरति बिजय बिभूति ॥
कठिन शब्दार्थ

सारदूल = सिंह; कूकर = कुत्ता; बिभूति = ऐश्वर्य।

सरल हिंदी अर्थ

सिंह का वेश रखकर कायर या अनुचित कर्म करने वाला व्यक्ति फिर भी कीर्ति और विजय चाहता है—कवि इस विरोधाभास पर व्यंग्य करते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

बड़ी पहचान के अनुरूप कर्म आवश्यक हैं। पोशाक, पद या दावे से योग्यता सिद्ध नहीं होती। अपनी भूमिका की गरिमा सीख, श्रम और जिम्मेदारी से निभाएँ।

छंद ४१३ दोहा

बड़े पाप बाढ़े किए छोटे किए लजात। तुलसी ता पर सुख चहत बिधि सों बहुत रिसात ॥
कठिन शब्दार्थ

बाढ़े = बढ़कर; लजात = संकोच करते; बिधि = विधाता।

सरल हिंदी अर्थ

बड़े पाप साहस से करना, छोटे अच्छे कर्म में लज्जा और फिर सुख न मिलने पर भाग्य से नाराज होना अनुचित है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

अपने परिणाम में आचरण की भूमिका पहचानें। केवल परिस्थितियों को दोष देने से सुधार नहीं होता। छोटे शुभ कार्य में संकोच छोड़ना और गलती की जिम्मेदारी लेना सही शुरुआत है।

छंद ४१४ दोहा

देस काल करता करम बचन बिचार बिहीन। ते सुरतरु तर दारिदी सुरसरि तीर मलीन ॥
कठिन शब्दार्थ

देस-काल = स्थान-समय; करता-करम = कर्ता-कर्म; मलीन = अशुद्ध।

सरल हिंदी अर्थ

स्थान, समय, काम और वाणी का विवेक न हो तो कल्पवृक्ष के नीचे भी अभाव और गंगा किनारे भी मलिनता बनी रह सकती है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

अवसर अपने आप फल नहीं देता। ज्ञान, तैयारी और सही व्यवहार आवश्यक हैं। शुभ परिवेश का लाभ तभी है जब व्यक्ति सक्रिय समझ के साथ उसका उपयोग करे।

छंद ४१५ दोहा

साहस ही कै कोप बस किएँ कठिन परिपाक। सठ संकट भाजन भए हठि कुजाति कपि काक ॥
कठिन शब्दार्थ

साहस ही = बिना विचार दुस्साहस; परिपाक = परिणाम; हठि = जिद से।

सरल हिंदी अर्थ

क्रोध या दुस्साहस में किया काम कठिन परिणाम देता है। कवि जिद से संकट में पड़ने वाले कथा-पात्रों और जीव-उपमाओं का स्मरण कराते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

साहस और उतावलेपन में भेद रखें। निर्णय से पहले अपनी क्षमता, लक्ष्य और दूसरों पर प्रभाव सोचें। संयम के साथ किया प्रयास अधिक उपयोगी तथा टिकाऊ होता है।

छंद ४१६ दोहा

राज करत बिनु काजहीं करहिं कुचालि कुसाजि। तुलसी ते दसकंध ज्यों जइहैं सहित समाज ॥
कठिन शब्दार्थ

कुसाजि = गलत व्यवस्था; दसकंध = रावण; समाज = अनुचर समुदाय।

सरल हिंदी अर्थ

अधिकार पाकर बिना कारण छल और बुरी व्यवस्था करने वाले रावण की तरह अपने साथियों सहित हानि उठा सकते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

नेतृत्व का दुरुपयोग अकेले व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता। उससे परिवार और समुदाय भी प्रभावित होते हैं। शक्ति के साथ आत्मसंयम, योग्य सलाह और न्यायपूर्ण जिम्मेदारी आवश्यक हैं।

छंद ४१७ दोहा

राज करत बिनु काजहीं ठटहिं जे कूर कुठाट। तुलसी ते कुरुराज ज्यों जइहै बारह बाट ॥
कठिन शब्दार्थ

कूर कुठाट = क्रूर प्रबंध; कुरुराज = दुर्योधन; बारह बाट = बिखर जाना।

सरल हिंदी अर्थ

सत्ता में रहकर अनावश्यक क्रूर योजनाएँ बनाने वाले दुर्योधन की तरह अपना आधार खो सकते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

शासन या नेतृत्व केवल नियंत्रण नहीं, संरक्षण की जिम्मेदारी है। अन्यायपूर्ण लाभ और प्रतिशोध से संस्थाएँ कमजोर होती हैं। समय रहते सुधार तथा सत्य सलाह स्वीकारना विवेक है।

छंद ४१८ दोहा

सभा सुयोधन की सकुनि सुमति सराहन जोग। द्रोन बिदुर भीषम हरिहि कहहिं प्रपंची लोग ॥
कठिन शब्दार्थ

सकुनि = शकुनि; सुयोधन = दुर्योधन; प्रपंची = छलपूर्ण कहे गए।

सरल हिंदी अर्थ

दुर्योधन की सभा में शकुनि की चालें अच्छी लगती थीं और द्रोण, विदुर, भीष्म तथा कृष्ण की बातों को छल कहा जाता था।

भावार्थ और जीवन-संदेश

बिगड़ा हुआ समूह अपने पूर्वाग्रह की पुष्टि करने वाली सलाह पसंद करता है। असुविधाजनक सत्य को तुरंत शत्रुता न मानें। निर्णय में योग्य असहमति का स्थान रखना आवश्यक है।

छंद ४१९ दोहा

पांडु सुअन की सदसि ते नीको रिपु हित जानि। हरि हर सम सब मानिअत मोह ग्यान की बानि ॥
कठिन शब्दार्थ

सदसि = सभा; रिपु हित = विरोधी का हित; मोह-ग्यान = भ्रम-विवेक।

सरल हिंदी अर्थ

पांडवों की सभा में विरोधी का भी उचित हित कहने वाले को सम्मान मिल सकता था। कवि इसे ज्ञानपूर्ण और मोहपूर्ण दृष्टि का अंतर बताते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

सच्चा न्याय केवल अपने पक्ष के लाभ का नाम नहीं। विरोधी के प्रति भी तथ्य और गरिमा बनाए रखें। समूह की श्रेष्ठता उसकी ईमानदार सलाह सुनने की क्षमता से प्रकट होती है।

छंद ४२० दोहा

हित पर बढ़इ बिरोध जब अनहित पर अनुराग। राम बिमुख बिधि बाम गति सगुन अघाइ अभाग ॥
कठिन शब्दार्थ

अनहित = अहित; बिधि बाम = प्रतिकूल दशा; अभाग = दुर्भाग्य।

सरल हिंदी अर्थ

जब हितकारी बात से विरोध और अहितकारी बात से प्रेम बढ़ने लगे, तो वह जीवन की बिगड़ती दिशा का संकेत है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

ऐसे समय रुककर अपनी पसंद की समीक्षा करें। जो सुनने में अच्छा लगे वह हमेशा हितकारी नहीं। विश्वसनीय सलाह, आत्मपरीक्षण और तथ्यपूर्ण निर्णय मन को सही दिशा में लौटा सकते हैं।

छंद ४२१ दोहा

सहज सुहृद गुर स्वामि सिख जो न करइ सिर मानि। सो पछिताइ अघाइ उर अवसि होइ हित हानि ॥
कठिन शब्दार्थ

सहज सुहृद = निष्कपट हितैषी; सिख = शिक्षा; अघाइ = बहुत।

सरल हिंदी अर्थ

सच्चे हितैषी, गुरु और योग्य स्वामी की अच्छी सीख आदर से न मानने वाला बाद में पछताता और अपना हित खोता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

हर निर्देश अंधे होकर मानना नहीं, हितकारी सलाह पहचानना आवश्यक है। विनय से सुनें, समझें और उचित बात पर अमल करें। सीख स्वीकारना आत्मसम्मान की कमी नहीं।

छंद ४२२ दोहा

भरुहाए नट भाँट के चपरि चढ़े संग्राम। कै वै भाजे आइहै के बाँधे परिनाम ॥
कठिन शब्दार्थ

भरुहाए = भड़काए; भाँट = प्रशंसक; चपरि = उतावलेपन से।

सरल हिंदी अर्थ

चापलूसों की प्रशंसा से भड़ककर युद्ध में कूदने वाला अंत में भागता या बँधता है। खाली उत्साह वास्तविक सामर्थ्य का विकल्प नहीं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

निर्णय दूसरों के उकसावे पर न लें। अपनी तैयारी और परिणाम देखें। विवेकयुक्त साहस अनावश्यक टकराव से बचाता है और आवश्यक कार्य के लिए शक्ति बचाए रखता है।

छंद ४२३ दोहा

लोक रीति फूटी सहहिं आँजी सहइ न कोइ। तुलसी जो आँजी सहइ सो आँधरो न होइ ॥
कठिन शब्दार्थ

फूटी = फूटी आँख; आँजी = अंजन लगाई आँख; आँधरो = अंधा।

सरल हिंदी अर्थ

लोग आँख की हानि सह लेते हैं, पर सुधार के लिए अंजन लगने की थोड़ी चुभन नहीं सहते। जो सुधार की कठिनाई स्वीकारे, वह अज्ञान से बच सकता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

रूपक सीख और आत्मसुधार की असुविधा बताता है, उपचार की विधि नहीं। हितकारी प्रतिक्रिया पहले अप्रिय लग सकती है। उसे समझकर स्वीकारना भविष्य की बड़ी हानि से बचा सकता है।

छंद ४२४ दोहा

भागें भल ओड़ेहुँ भलो भलो न घालें घाउ। तुलसी सब के सीस पर रखवारो रघुराउ ॥
कठिन शब्दार्थ

ओड़ेहुँ = बचाव करने पर; घाउ = चोट; रघुराउ = श्रीराम।

सरल हिंदी अर्थ

हानिकारक संघर्ष से हटना या अपना बचाव करना अच्छा है; अनावश्यक चोट देना अच्छा नहीं। कवि सबके ऊपर श्रीराम का संरक्षण मानते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

संयम को कायरता न समझें। उचित सुरक्षा और शांत समाधान का प्रयत्न करें। अपनी तथा दूसरे की गरिमा बचाते हुए टकराव कम करना साहस का परिपक्व रूप है।

छंद ४२५ दोहा

सुमति बिचारहिं परिहरहिं दल सुमनहुँ संग्राम। सकुल गए तनु बिनु भए साखी जादौ काम ॥
कठिन शब्दार्थ

सुमन = फूल; जादौ = यादव; तनु बिनु = कामदेव।

सरल हिंदी अर्थ

विवेकी व्यक्ति फूलों जैसे हल्के साधनों से भी संघर्ष करने से बचता है; यादवों और कामदेव के प्रसंग उसके गंभीर परिणाम याद दिलाते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

टकराव का आरंभ छोटा दिख सकता है, पर परिणाम बड़े हों। मजाक या अहंकार में विवाद न बढ़ाएँ। स्पष्ट संवाद और समय पर रुकना कई संबंधों को टूटने से बचा सकता है।

छंद ४२६ दोहा

ऊलह न जानब छोट करि कलह कठिन परिनाम। लगति अगिनि लघु नीच गृह जरत धनिक धन धाम ॥
कठिन शब्दार्थ

ऊलह = छोटी चिंगारी या आरंभ; कलह = झगड़ा; धन धाम = संपत्ति-घर।

सरल हिंदी अर्थ

छोटे झगड़े को तुच्छ न समझो; साधारण घर में लगी आग भी बड़े घरों को जला सकती है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

समस्या बढ़ने से पहले सुलझाना आवश्यक है। किसी कमजोर व्यक्ति का दुःख अपना विषय न मानना गलत हो सकता है। सहयोग और न्यायपूर्ण समाधान व्यापक सुरक्षा का आधार हैं।

छंद ४२७ दोहा

छमा रोष के दोष गुन सुनि मनु मानहिं सीख। अबिचल श्रीपति हरि भए भूसुर लहै न भीख ॥
कठिन शब्दार्थ

छमा = क्षमा; भूसुर = भृगु जैसे ब्राह्मण का संकेत; श्रीपति = विष्णु।

सरल हिंदी अर्थ

क्षमा और क्रोध के फल समझो। विष्णु-भृगु के कथा-संकेत से कवि क्षमाशीलता की स्थिर प्रतिष्ठा और क्रोध की हानि बताते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

क्षमा दुर्बलता नहीं, संयम है। फिर भी अन्याय रोकने की आवश्यकता बनी रहती है। प्रतिशोधपूर्ण क्रोध से अलग होकर उचित सीमा तथा न्यायपूर्ण उपाय चुनना अधिक हितकारी है।

छंद ४२८ दोहा

कौरव पांडव जानिऐ क्रोध छमा के सीम। पाँचहि मारि न सौ सके सयौ सँघारे भीम ॥
कठिन शब्दार्थ

सीम = चरम उदाहरण; सँघारे = परास्त किए; सौ-पाँच = कौरव-पांडव।

सरल हिंदी अर्थ

कौरव और पांडव के प्रसंग में कवि क्रोध और धैर्य के परिणाम दिखाते हैं: बड़ी संख्या भी धर्म और संयम का स्थान नहीं ले सकी।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह महाभारत का नैतिक उदाहरण है, संख्या से विजय का नियम नहीं। शक्ति के साथ विवेक और उचित उद्देश्य आवश्यक हैं। अन्यायपूर्ण हठ अंततः अपने पक्ष को भी हानि पहुँचा सकता है।

छंद ४२९ दोहा

बोल न मोटे मारिऐ मोटी रोटी मारु। जीति सहस सम हारिबो जीतें हारि निहारु ॥
कठिन शब्दार्थ

मोटे बोल = कठोर वचन; मोटी रोटी = उदार आतिथ्य; जीत = संबंध जीतना।

सरल हिंदी अर्थ

कठोर शब्द से चोट देने के बजाय भोजन और अपनापन दो। कई बाहरी जीत वास्तविक संबंध की हार बन जाती हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

विवाद में केवल दूसरे को चुप कराना सफलता नहीं। सहानुभूति और उपयोगी सहायता मन बदल सकती है। अपनी जीत की कीमत संबंध और गरिमा के नुकसान में न चुकाएँ।

छंद ४३० दोहा

जो परि पायँ मनाइए तासों रूठि बिचारि। तुलसी तहाँ न जीतिऐ जहँ जीतेहूँ हारि ॥
कठिन शब्दार्थ

परि पायँ = पैर पड़कर; मनाइए = मनाना पड़े; रूठि = रुष्ट होकर।

सरल हिंदी अर्थ

जिससे बाद में विनम्र होकर संबंध जोड़ना ही है, उससे नाराज होने से पहले सोचो। जहाँ जीतकर भी हार हो, वहाँ विवाद की जीत उपयोगी नहीं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

संबंध की दीर्घकालीन आवश्यकता देखें। आवेश में अपमान करना बाद में कठिन पश्चाताप दे सकता है। शांत बातचीत और समय पर विनम्रता असफलता नहीं, बुद्धिमानी है।

छंद ४३१ दोहा

जूझे ते भल बूझिबो भली जीति तें हार। डहकें तें डहकाइबो भलो जो करिअ बिचार ॥
कठिन शब्दार्थ

बूझिबो = समझौते से समझना; जूझिबो = लड़ना; डहकाइबो = छलना।

सरल हिंदी अर्थ

विचार करने पर समझना लड़ने से और कभी हार स्वीकारना कठोर जीत से अच्छा हो सकता है। छल से मिली सफलता भी वास्तविक हित नहीं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

स्थिति के अनुसार शांत मार्ग चुनें। अपनी जिद के बजाय परिणाम देखें। न्याय और सम्मान बचाते हुए समझौता करना कई बार सभी के लिए अधिक उपयोगी सिद्ध होता है।

छंद ४३२ दोहा

जा रिपु सों हारेहुँ हँसी जिते पाप परितापु। तासों रारि निवारिऐ समयँ सँभारिअ आपु ॥
कठिन शब्दार्थ

रारि = झगड़ा; परिताप = पश्चाताप; सँभारिअ = सँभालो।

सरल हिंदी अर्थ

जिससे हारने पर अपमान और जीतने पर पाप तथा दुःख हो, उससे अनावश्यक झगड़ा टालकर स्वयं को सँभालना उचित है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

हर चुनौती स्वीकारना साहस नहीं। विवाद का उद्देश्य और कीमत समझें। जहाँ शांति और सुरक्षित दूरी अधिक हितकारी हो, वहाँ अपनी ऊर्जा सार्थक कार्य में लगाएँ।

खंड ७ · विवाद से समाधान और प्रेम की विजय

छंद ४३३–४५६ · हितकारी वचन, उपकार तथा व्यवहार की स्पष्टता।

छंद ४३३ दोहा

जो मधु मरै न मारिऐ माहुर देइ सो काउ। जग जिति हारे परसुधर हारि जिते रघुराउ ॥
कठिन शब्दार्थ

माहुर = विष; मधु = शहद; परसुधर = परशुराम।

सरल हिंदी अर्थ

जो मधुरता से मान जाए उसे कठोर उपाय से दबाना क्यों? परशुराम और राम के प्रसंग में कवि विनम्रता से मिलने वाली श्रेष्ठ विजय बताते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

उद्देश्य समाधान हो, प्रतिद्वंद्वी का अपमान नहीं। कोमल संवाद से काम बने तो अधिक पीड़ा देना अनुचित है। वास्तविक सामर्थ्य अपना संयम दिखाने में भी प्रकट होती है।

छंद ४३४ दोहा

बैर मूल हर हित बचन प्रेम मूल उपकार। दो हा सुभ संदोह सो तुलसी किएँ बिचार ॥
कठिन शब्दार्थ

बैर मूल हर = वैर की जड़ काटने वाला; दो हा = हाहा, विनती का संकेत; संदोह = समूह।

सरल हिंदी अर्थ

हितकारी वचन वैर की जड़ काटते हैं और उपकार प्रेम की जड़ है। कवि विचारकर विनती और नम्रता को भी अनेक शुभ फलों का साधन बताते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

कठोर संबंध सुधारने के लिए केवल तर्क पर्याप्त नहीं। उचित वाणी के साथ वास्तविक सहायता भी हो। निःस्वार्थ व्यवहार विश्वास लौटाने का मार्ग खोल सकता है।

छंद ४३५ दोहा

रोष न रसना खोलिऐ बरु खोलिअ तरवारि। सुनत मधुर परिनाम हित बोलिअ बचन बिचारि ॥
कठिन शब्दार्थ

रसना = जीभ; रोष = क्रोध; परिनाम हित = अंत में हितकारी।

सरल हिंदी अर्थ

क्रोध में वाणी अनियंत्रित मत करो; कवि उसकी चोट को तलवार से भी तीखा बताते हैं। सोचकर ऐसा बोलो जो सुनने में अच्छा और परिणाम में हितकारी हो।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह हथियार उठाने का निर्देश नहीं, वाणी-संयम की तीव्र उपमा है। बोलने से पहले ठहरना उपयोगी है। सत्य को भी सम्मानपूर्वक कहा जाए तो समझने का अवसर बढ़ता है।

छंद ४३६ दोहा

मधुर बचन कटु बोलिबो बिनु श्रम भाग अभाग। कुहू कुहू कलकंठ रव का का कररत काग ॥
कठिन शब्दार्थ

कलकंठ = कोयल; रव = आवाज; भाग-अभाग = अनुकूल-प्रतिकूल फल।

सरल हिंदी अर्थ

मीठे और कटु बोल में विशेष श्रम नहीं, पर प्रभाव अलग है। कोयल की कूक और कौवे की ध्वनि से कवि यह अंतर दिखाते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

वाणी के छोटे चुनाव बड़े संबंध बनाते हैं। असहमति में भी शिष्टता संभव है। मधुरता का अर्थ असत्य नहीं; स्पष्ट और आदरपूर्ण शब्द चुनना सीखी जा सकने वाली अच्छी आदत है।

छंद ४३७ दोहा

पेट न फूलत बिनु कहें कहत न लागइ ढेर। सुमति बिचारें बोलिऐ समुझि कुफेर सुफेर ॥
कठिन शब्दार्थ

कुफेर-सुफेर = बुरा-अच्छा अवसर; ढेर = देर; सुमति = विवेक।

सरल हिंदी अर्थ

बात न कहने से पेट नहीं फूलता और कहने में देर नहीं लगती; इसलिए सही-बुरे अवसर को समझकर विचारपूर्वक बोलो।

भावार्थ और जीवन-संदेश

हर विचार तुरंत व्यक्त करना जरूरी नहीं। समय, स्थान और सामने वाले की दशा देखें। आवश्यक बात को सही समय पर कहना वाणी को उपयोगी और संबंध को सुरक्षित बनाता है।

छंद ४३८ दोहा

छिद्यो न तरुनि कटाच्छ सर करेउ न कठिन सनेहु। तुलसी तिन की देह को जगत कवच करि लेहु ॥
कठिन शब्दार्थ

कटाच्छ सर = कटाक्ष के बाण; कठिन सनेह = गहरा प्रेम; कवच = रक्षा का आवरण।

सरल हिंदी अर्थ

कवि विनोद में कहते हैं कि जिसे न आकर्षण छुए, न गहरा प्रेम, उसके शरीर को जगत का कवच बना लो—वह इतना कठोर है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह मानवीय संवेदनशीलता का काव्यात्मक संकेत है। दृढ़ होना और भावशून्य होना अलग हैं। विवेक के साथ कोमलता और करुणा रखने से चरित्र अधिक पूर्ण बनता है।

छंद ४३९ दोहा

सूर समर करनी करहिं कहि न जनावहिं आपु। बिद्यमान रन पाइ रिपु कायर कथहिं प्रतापु ॥
कठिन शब्दार्थ

सूर = वीर; समर = युद्ध; प्रतापु = पराक्रम की बातें।

सरल हिंदी अर्थ

वीर कठिन समय में कार्य करके दिखाते हैं; कायर सामने चुनौती आने पर अपनी बड़ाई सुनाते रहते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

दावे से अधिक परिणाम और जिम्मेदारी महत्त्वपूर्ण हैं। शांत तैयारी तथा समय पर उपयोगी कर्म करें। आत्मविश्वास के लिए निरंतर घोषणा आवश्यक नहीं होती।

छंद ४४० दोहा

बचन कहे अभिमान के पारथ पेखत सेतु। प्रभु तिय लूटत नीच भर जय न मीचु तेहिं हेतु ॥
कठिन शब्दार्थ

पारथ = अर्जुन; प्रभु तिय = कृष्ण की रानियाँ; मीचु = मृत्यु।

सरल हिंदी अर्थ

सेतु देखकर अभिमानी वचन कहने वाले अर्जुन भी बाद में कृष्ण के परिवार की रक्षा में असहाय हुए—कवि समय और गर्व की सीमा दिखाते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

पुरानी सफलता स्थायी सामर्थ्य की गारंटी नहीं। विनय बनाएँ और परिस्थिति की नई जरूरत समझें। अपनी सीमा स्वीकारना सहायता तथा सीख ग्रहण करने का द्वार है।

छंद ४४१ दोहा

राम लखन बिजई भए बनहुँ गरीब निवाज। मुखर बालि रावन गए घरहीं सहित समाज ॥
कठिन शब्दार्थ

मुखर = बहुत बोलने वाला; निबाज = पालन करने वाला; समाज = परिवार-अनुचर।

सरल हिंदी अर्थ

वन में रहते राम-लक्ष्मण विजयी हुए; अपने घर में गर्व करने वाले बाली और रावण पतन को पहुँचे।

भावार्थ और जीवन-संदेश

स्थान और साधन महत्त्वपूर्ण हैं, पर नैतिक दिशा तथा विवेक भी आवश्यक हैं। अहंकार में सुरक्षा निश्चित मानना ठीक नहीं। कठिन परिस्थिति में धैर्य और उचित सहयोग सफलता की संभावना बढ़ाते हैं।

छंद ४४२ दोहा

खग मृग मीत पुनीत किय बनहुँ राम नयपाल। कुमति बालि दसकंठ घर सुहद बंधु कियो काल ॥
कठिन शब्दार्थ

नयपाल = नीति-पालक; सुहद = सुहृद; काल = विनाश का कारण।

सरल हिंदी अर्थ

राम ने वन में भी पशु-पक्षियों को मित्र बनाकर सम्मान दिया; बाली और रावण ने अपने हितैषियों को ही प्रतिकूल कर लिया।

भावार्थ और जीवन-संदेश

नेतृत्व का बल भरोसेमंद संबंधों में है। छोटे सहायक का भी आदर करें और सच्ची सलाह को अपमान न मानें। अनावश्यक कठोरता अपने ही आधार को कमजोर कर सकती है।

छंद ४४३ दोहा

लखइ अघानो भूख ज्यों लखइ जीतिमें हारि। तुलसी सुमति सराहिऐ मग पग धरइ बिचारि ॥
कठिन शब्दार्थ

अघानो = तृप्त; मग = मार्ग; सुमति = अच्छी समझ।

सरल हिंदी अर्थ

जैसे तृप्त व्यक्ति भूख का विचार करे, वैसे विजयी व्यक्ति संभावित हार भी देखे। कदम सोचकर रखने वाली बुद्धि प्रशंसनीय है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

सफलता के समय जोखिम और दूसरों की स्थिति न भूलें। पहले से विचार करने से लापरवाही घटती है। विनम्र तैयारी आत्मविश्वास को अधिक स्थिर बनाती है।

छंद ४४४ दोहा

लाभ समय को पालिबो हानि समय की चूक। सदा बिचारहिं चारुमति सुदिन कुदिन दिन दूक ॥
कठिन शब्दार्थ

समय पालिबो = अवसर का सही उपयोग; चूक = अवसर खोना; चारुमति = सुंदर विवेक।

सरल हिंदी अर्थ

लाभ सही समय का उपयोग करना है और हानि उचित अवसर चूकना। विवेकी सुख-दुःख दोनों समय इस बात पर विचार करता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

कार्य को केवल जल्दी नहीं, सही अवसर पर करना महत्त्वपूर्ण है। तैयारी रखें और जरूरी निर्णय अनावश्यक टालें नहीं। कठिन समय में भी छोटी उपयोगी कार्रवाई का मूल्य पहचानें।

छंद ४४५ दोहा

सिंधु तरन कपि गिरि हरन काज साइँ हित दोउ। तुलसी समयहिं सब बड़ो बूझत कहुँ कोउ कोउ ॥
कठिन शब्दार्थ

सिंधु तरन = समुद्र लाँघना; गिरि हरन = पर्वत उठाना; साइँ = स्वामी।

सरल हिंदी अर्थ

हनुमान का समुद्र लाँघना और संजीवनी-पर्वत लाना दोनों रामकार्य थे; उनकी महत्ता उचित समय पर सेवा पूरी होने में भी थी।

भावार्थ और जीवन-संदेश

सेवा में समय की समझ आवश्यक है। देर से मिली सहायता अवसर खो सकती है। अपनी तत्परता और संसाधन इस तरह रखें कि जरूरत के समय उपयोगी योगदान दे सकें।

छंद ४४६ दोहा

तुलसी मीठी अमी तें मागी मिलै जो मीच। सुधा सुधाकर समय बिनु काललकूट तें नीच ॥
कठिन शब्दार्थ

अमी-सुधा = अमृत; कालकूट = विष; मीच = मृत्यु।

सरल हिंदी अर्थ

कवि कहते हैं कि सही समय पर अपेक्षित कठिन चीज भी प्रिय हो सकती है, और असमय अमृत-जैसी वस्तु भी अनुपयोगी।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह समयानुकूलता की अतिशयोक्तिपूर्ण उपमा है, मृत्यु या विष की चाह का निर्देश नहीं। सहायता देते समय सामने वाले की वास्तविक अवस्था समझें। सही वस्तु के साथ सही समय भी आवश्यक है।

छंद ४४७ दोहा

तुलसी असमय के सखा धीरज धरम बिबेक। साहित साहस सत्यब्रत राम भरोसो एक ॥
कठिन शब्दार्थ

असमय = विपत्ति; साहस = साहसिक दृढ़ता; सत्यब्रत = सत्य का संकल्प।

सरल हिंदी अर्थ

कठिन समय के वास्तविक साथी धैर्य, धर्म, विवेक, साहस, सत्यनिष्ठा और श्रीराम पर भरोसा हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह दोहा संकट का संक्षिप्त मार्गदर्शन है। भय में घबराकर निर्णय न लें। सत्य और जिम्मेदारी बनाए रखते हुए उचित सहायता तथा प्रयास करें; आध्यात्मिक आश्रय मन को स्थिर रहने का सहारा देता है।

छंद ४४८ दोहा

समरथ कोउ न राम सों तीय हरन अपराधु। समयहिं साधे काज सब समय सराहहिं साधु ॥
कठिन शब्दार्थ

समरथ = समर्थ; तीय हरन = सीताहरण का प्रसंग; साधे = सिद्ध किए।

सरल हिंदी अर्थ

श्रीराम से अधिक समर्थ कौन, फिर भी उन्होंने सीताहरण के बाद उचित समय और साधन से कार्य साधा। संत समय की समझ की प्रशंसा करते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

सामर्थ्य होते हुए भी प्रक्रिया और परिस्थिति का आदर आवश्यक है। अधीरता हर समस्या नहीं सुलझाती। तैयारी, सहयोग और सही अवसर के साथ कार्य करना दृढ़ता का विवेकपूर्ण रूप है।

छंद ४४९ दोहा

तुलसी तीरहु के चलें समय पाइबी थाह। धाइज न जाइ थहाइबी सर सरिता अवगाह ॥
कठिन शब्दार्थ

तीर = किनारा; थाह = गहराई या पार; अवगाह = गहरे उतरना।

सरल हिंदी अर्थ

नदी के किनारे चलते हुए उचित समय पर घाट और गहराई समझी जाती है; उतावले होकर गहरे जल में उतरना बुद्धिमानी नहीं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

नई परिस्थिति में पहले समझें, फिर कदम बढ़ाएँ। सीमाएँ और साधन पहचानने से जोखिम घटता है। धैर्यपूर्ण निरीक्षण कई बार अंधे उत्साह से अधिक उपयोगी होता है।

छंद ४५० दोहा

तुलसी जसि भवतब्यता तैसी मिलइ सहाइ। आपुनु आवइ ताहि पै ताहि तहाँ लै जाइ ॥
कठिन शब्दार्थ

भवतब्यता = होनहार; सहाइ = सहायता; आपुनु = स्वयं।

सरल हिंदी अर्थ

कवि मानते हैं कि जैसी आगे की गति होती है, वैसा सहयोग मिलता है—कभी व्यक्ति वहाँ पहुँचता है, कभी सहायता उसके पास आती है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह भाग्य की काव्यदृष्टि है, निष्क्रिय रहने की शिक्षा नहीं। अवसर और सहयोग की पहचान करते हुए अपना प्रयास जारी रखें। परिणाम के प्रति विनम्रता और कर्म के प्रति जिम्मेदारी साथ रह सकती हैं।

छंद ४५१ दोहा

कै जूझीबो कै बूझिबो दान कि काय कलेस। चारि चारु परलोक पथ जथा जोग उपदेस ॥
कठिन शब्दार्थ

जूझीबो = धर्मपूर्ण संघर्ष; बूझिबो = विवेकपूर्वक समझना; काय कलेस = तप का श्रम।

सरल हिंदी अर्थ

धर्मपूर्ण पराक्रम, ज्ञान-विवेक, दान और तप—कवि इन्हें व्यक्ति की योग्यता के अनुसार परमार्थ के मार्ग बताते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

सबके लिए एक ही अभ्यास आवश्यक नहीं। अपनी क्षमता और जिम्मेदारी देखकर मार्ग चुनें। किसी भी मार्ग में सत्य, करुणा और विनय बने रहें, तभी साधन अपने उद्देश्य के अनुकूल होते हैं।

छंद ४५२ दोहा

पात पात को सींचिबो न करु सरग तरु हेत। कुटिल कटुक फर फरैगो तुलसी करत अचेत ॥
कठिन शब्दार्थ

सरग तरु = कल्पवृक्ष की चाह; कटुक फर = कड़वा फल; अचेत = अविवेकी।

सरल हिंदी अर्थ

गलत वृक्ष की पत्तियाँ सींचकर कल्पवृक्ष का फल नहीं मिलता। कारण अनुचित हो तो परिणाम भी अपेक्षा जैसा नहीं होगा।

भावार्थ और जीवन-संदेश

लक्ष्य और साधन का मेल देखें। केवल परिश्रम बढ़ाना पर्याप्त नहीं, सही दिशा भी हो। हानिकारक आदतों को पोषित करके शांति और भक्ति की आशा करना विरोधाभास है।

छंद ४५३ दोहा

गठिबँध ते परतीति बड़ि जेहिं सबको सब काज। कहब थोर समुझब बहुत गाड़े बढ़त अनाज ॥
कठिन शब्दार्थ

गठिबँध = गाँठ में बँधा धन; परतीति = विश्वास; गाड़े = बोने पर।

सरल हिंदी अर्थ

संसाधन अपने पास बाँधने से बढ़कर उचित विश्वास है; जैसे बीज मिट्टी में डालने पर ही बढ़ता है। संबंध और काम भरोसे पर चलते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

भरोसा विवेकपूर्ण हो, अंधा नहीं। योग्य सहयोग और साझा जिम्मेदारी संसाधन को उपयोगी बनाते हैं। केवल संग्रह के बजाय सही प्रयोजन में लगाने से व्यापक लाभ बनता है।

छंद ४५४ दोहा

अपनो ऐपन निज हथा तिय पूजहिं निज भीति। फरइ सकल मन कामना तुलसी प्रीति प्रतीति ॥
कठिन शब्दार्थ

ऐपन = पूजा का चित्रण; निज भीति = अपनी दीवार; प्रतीति = श्रद्धापूर्ण विश्वास।

सरल हिंदी अर्थ

स्त्री अपने हाथ से दीवार पर पूजा का चित्र बनाकर उसी में श्रद्धा रखती है। कवि इससे प्रेम और विश्वास की आंतरिक शक्ति दिखाते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

पूजा का भाव बाहरी वैभव से बड़ा हो सकता है। सरल साधन से भी आत्मीय उपासना संभव है। परिणाम की गारंटी के बजाय श्रद्धा, संयम और सदाचार के विकास को उसका सार मानें।

छंद ४५५ दोहा

बरषत करषत आपु जल हरषत अरघनि भानु। तुलसी चाहत साधु सुर सब सनेह सनमानु ॥
कठिन शब्दार्थ

करषत = खींचना; अरघ = अर्घ्य; सनमानु = सम्मान।

सरल हिंदी अर्थ

सूर्य अपना ही जल पृथ्वी से खींचकर बादल द्वारा लौटाता है, फिर भी अर्घ्य का सम्मान प्रिय है; कवि कहते हैं कि साधु और देव भी स्नेहपूर्ण सम्मान चाहते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

कृतज्ञता केवल वस्तु लौटाना नहीं, भाव व्यक्त करना भी है। सहायता देने वाले का सम्मान करें, पर चापलूसी न करें। सरल धन्यवाद संबंध की आत्मीयता और परस्पर गरिमा बढ़ाता है।

छंद ४५६ दोहा

श्रुति गुन कर गुन पु जुग मृग हर रेवती सखाउ। देहि लेहि धन धरनि धरु गएहुँ न जाइहि काउ ॥
कठिन शब्दार्थ

श्रुति = श्रवण; कर = हस्त; गुन = तीन; रेवती सखाउ = नक्षत्र-संकेत।

सरल हिंदी अर्थ

परंपरागत मुहूर्त-संकेत में श्रवण-धनिष्ठा-शतभिषा, हस्त-चित्रा-स्वाती, पुनर्वसु-पुष्य, मृगशिरा, अश्विनी, रेवती और अनुराधा को धन या भूमि के लेन-देन के लिए शुभ कहा गया है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह ऐतिहासिक ज्योतिषीय मान्यता है, लाभ या हानि की सुनिश्चित भविष्यवाणी नहीं। आधुनिक आर्थिक व्यवहार में दस्तावेज, क्षमता और वास्तविक जोखिम देखकर निर्णय लें। मूल छंद का अध्ययन सांस्कृतिक संदर्भ के साथ करें।

खंड ८ · पुरुषार्थ, विश्वास और शुभाशुभ के संकेत

छंद ४५७–४८० · प्रयत्न, परमार्थ तथा ऐतिहासिक मान्यताओं का संदर्भ।

छंद ४५७ दोहा

ऊगुन पूगुन बि अज कृ म आ भ अ मू गुनु साथ। हरो धरो गाड़ो दियो धन फिरि चढ़इ न हाथ ॥
कठिन शब्दार्थ

ऊगुन-पूगुन = तीन उत्तरा और तीन पूर्वा; अज = रोहिणी; हरो-धरो = छिना या रखा।

सरल हिंदी अर्थ

छंद कुछ नक्षत्रों के संकेताक्षर देकर उनमें हाथ से निकली संपत्ति के न लौटने का पारंपरिक मत बताता है। इनमें उत्तरा-पूर्वा समूह, विशाखा, रोहिणी, कृत्तिका, मघा, आर्द्रा, भरणी, अश्लेषा और मूल के संकेत हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह प्राचीन मुहूर्त-विचार है, किसी वास्तविक धन की स्थिति का प्रमाण नहीं। हानि या वसूली की संभावना तथ्य, अनुबंध और उचित प्रयास से जाँची जाती है। अध्ययन करते समय मान्यता और सुनिश्चित परिणाम का अंतर रखें।

छंद ४५८ दोहा

रबि हर दिसि गुन रस नयन मुनि प्रथमादिक बार। तिथि सब काज नसावनी होइ कुजोग बिचार ॥
कठिन शब्दार्थ

रबि = रविवार; हर = ग्यारह; दिसि = दस; मुनि = सात।

सरल हिंदी अर्थ

कवि वार-तिथि के कुछ मेलों को प्रतिकूल बताने वाला सांकेतिक ज्योतिषीय सूत्र देते हैं। पारंपरिक क्रम में रविवार-१२, सोमवार-११, मंगलवार-१०, बुधवार-३, गुरुवार-६, शुक्रवार-२ और शनिवार-७ के संकेत हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

इसे वर्तमान पंचांग या निश्चित अपशकुन की घोषणा न मानें। छंद अपने युग की मुहूर्त-परंपरा सँजोता है। जरूरी कार्यों में तथ्य, तैयारी और जिम्मेदारी का स्थान बना रहता है।

छंद ४५९ दोहा

ससि सर नव दुइ छ दस गुन मुनि फल बसु हर भानु। मेषादिक क्रम तें गनहिं घात चंद्र जियँ जानु ॥
कठिन शब्दार्थ

ससि = एक; सर = पाँच; गुन = तीन; बसु = आठ; भानु = बारह।

सरल हिंदी अर्थ

मेष से मीन तक क्रमशः १, ५, ९, २, ६, १०, ३, ७, ४, ८, ११ और १२ के सांकेतिक क्रम को परंपरा में घात-चंद्र का विचार कहा गया है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह ज्योतिषीय सांस्कृतिक सूत्र है, किसी व्यक्ति के लिए वर्तमान भविष्यवाणी नहीं। आज का निष्कर्ष निकालने के लिए केवल यह दोहा पर्याप्त नहीं। पाठ के अर्थ और निजी निर्णय के बीच संदर्भ का विवेक रखें।

छंद ४६० दोहा

नकुल सुदरसनु दरसनी छेमकरी चक चाष। दस दिसि देखत सगुन सुभ पूजहिं मन अभिलाष ॥
कठिन शब्दार्थ

नकुल = नेवला; छेमकरी = क्षेमकरी पक्षी; चाष = नीलकंठ पक्षी।

सरल हिंदी अर्थ

नेवला और कुछ पक्षियों के दर्शन को लोकपरंपरा शुभ मानती है; कवि उनसे मनोकामना की मंगलभावना जोड़ते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह शकुन-संबंधी ऐतिहासिक विश्वास है। किसी जीव को पकड़ना या परेशान करना इसका उद्देश्य नहीं। प्रकृति का सम्मान करते हुए मन में शुभ भाव रखें और कार्य अपनी तैयारी तथा विवेक से करें।

छंद ४६१ दोहा

सुधा साधु सुरतरु सुमन सुफल सुहावनि बात। तुलसी सीतापति भगति सगुन सुमंगल सात ॥
कठिन शब्दार्थ

सुधा = अमृत; सुरतरु = कल्पवृक्ष; सुफल = सुंदर फल।

सरल हिंदी अर्थ

अमृत, संत, कल्पवृक्ष, फूल, अच्छा फल, सुहावनी बात और सीतापति की भक्ति—कवि इन्हें सात मंगलकारी संकेत कहते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

बाहरी शुभता के साथ सच्ची भक्ति और अच्छी वाणी को स्थान दिया गया है। रोज के जीवन में सद्भाव, संत-संग और हितकारी कर्म बढ़ाना मंगल को व्यवहार में उतारने का सरल तरीका है।

छंद ४६२ दोहा

भरत सत्रुसूदन लखन सहित सुमिरि रघुनाथ। करहु काज सुभ साज सब मिलिहि सुमंगल साथ ॥
कठिन शब्दार्थ

सत्रुसूदन = शत्रुघ्न; साज = तैयारी; सुमंगल = शुभता।

सरल हिंदी अर्थ

भरत, शत्रुघ्न और लक्ष्मण सहित श्रीराम का स्मरण करके शुभ कार्य करो; कवि संयुक्त रामपरिवार से मंगल की प्रार्थना करते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

स्मरण में सहयोग, सेवा और मर्यादा के आदर्श भी जुड़े हैं। कार्य आरंभ करते समय मन की दिशा शुभ रखें और तैयारी पूरी करें। आस्था प्रयास का सहारा बने, उसका विकल्प नहीं।

छंद ४६३ दोहा

राम लखन कौसिक सहित सुमिरहु करहु पयान। लच्छि लाभ लै जगत जसु मंगल सगुन प्रमान ॥
कठिन शब्दार्थ

कौसिक = विश्वामित्र; पयान = यात्रा; लच्छि = लक्ष्मी, समृद्धि।

सरल हिंदी अर्थ

राम-लक्ष्मण और विश्वामित्र का स्मरण कर यात्रा आरंभ करने में कवि लाभ, यश और मंगल की भावना रखते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

कथा में गुरु-मार्गदर्शन और साहसी यात्रा साथ हैं। यात्रा की वास्तविक तैयारी तथा सुरक्षा का ध्यान रखें। स्मरण मन को विनय और सदुद्देश्य से जोड़ने का आध्यात्मिक सहारा है।

छंद ४६४ दोहा

अतुलित महिमा बेद की तुलसी किएँ बिचार। जो निंदत निंदित भयो बिदित बुद्ध अवतार ॥
कठिन शब्दार्थ

श्रुति-बेद = वेद; निंदित = आलोचित; बुद्ध अवतार = पुराणपरंपरा का संकेत।

सरल हिंदी अर्थ

कवि वेदों की महिमा के पक्ष में उस पुराणपरंपरा का उल्लेख करते हैं जिसमें बुद्धावतार के वेद-विरोध का वर्णन मिलता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह परंपरागत धार्मिक दृष्टि है, ऐतिहासिक बुद्ध या बौद्धों का अपमान करने का निर्देश नहीं। विभिन्न परंपराओं के संदर्भ समझते हुए सम्मान रखें। अपने ग्रंथ का आदर दूसरे धर्म के प्रति द्वेष के बिना संभव है।

छंद ४६५ दोहा

बुध किसान सर बेद निज मतें खेत सब सींच। तुलसी कृषि लखि जानिबो उत्तम मध्यम नीच ॥
कठिन शब्दार्थ

बुध किसान = विचारक किसान; सर = जलाशय; निज मत = अपना विचार।

सरल हिंदी अर्थ

वेदरूपी सरोवर से अलग-अलग विचारक अपने मतरूपी खेत सींचते हैं। खेती के वास्तविक फल देखकर उनके उत्तम-मध्यम स्वरूप को पहचानो।

भावार्थ और जीवन-संदेश

विचार की परीक्षा उसके जीवन-प्रभाव से करें। जो करुणा, सत्य और संयम बढ़ाए वह उपयोगी है। केवल वाद की चतुराई के बजाय आचरण का फल देखना विवेकपूर्ण अध्ययन है।

छंद ४६६ दोहा

सहि कुबोल साँसति सकल अँगइ अनट अपमान। तुलसी धरम न परिहरिअ कहि करि गए सुजान ॥
कठिन शब्दार्थ

कुबोल = कटु वचन; अनट = असह्य; सुजान = विवेकी।

सरल हिंदी अर्थ

कटु वचन, कष्ट और अपमान सहने पर भी धर्मपूर्ण आचरण न छोड़ने की सीख ज्ञानी अपने जीवन से देते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

धर्म पर स्थिरता का अर्थ अन्याय में चुप रहना नहीं। उचित रक्षा और सहायता लेते हुए स्वयं अनुचित कर्म से बचें। कठिन समय में चरित्र की मर्यादा बचाना बड़ी आंतरिक शक्ति है।

छंद ४६७ दोहा

अनहित भय परहित किएँ पर अनहित हित हानि। तुलसी चारु बिचारु भल करिअ काज सुनि जानि ॥
कठिन शब्दार्थ

परहित = दूसरे का हित; अनहित = हानि; चारु बिचार = सुंदर विवेक।

सरल हिंदी अर्थ

दूसरे का हित करने में अपने अहित की केवल आशंका हो सकती है; पर दूसरे को हानि पहुँचाने से अपना वास्तविक हित भी बिगड़ता है। सोच-समझकर काम करो।

भावार्थ और जीवन-संदेश

परोपकार में विवेक और सुरक्षा आवश्यक हैं, लेकिन स्वार्थ को ही एकमात्र कसौटी न बनाएँ। सहयोग का जिम्मेदार तरीका चुनें। दूसरों को जानबूझकर दुख देकर स्थायी भलाई नहीं बनती।

छंद ४६८ दोहा

पुरुषारथ पूरब करम परमेस्वर परधान। तुलसी पैरत सरित ज्यों सबहिं काज अनुमान ॥
कठिन शब्दार्थ

पुरुषारथ = अपना प्रयास; पूरब करम = पूर्व कर्म; परमेस्वर = ईश्वर।

सरल हिंदी अर्थ

काम में अपना प्रयास, पूर्व परिस्थितियाँ और परमेश्वर—तीनों का विचार है; जैसे नदी पार करते समय तैरना, प्रवाह और सहारा साथ प्रभाव डालते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

न तो सब परिणाम अपने नियंत्रण में हैं, न प्रयास व्यर्थ है। जो कर सकते हैं उसे जिम्मेदारी से करें और अनियंत्रित पक्ष के सामने विनम्र रहें। यही कर्म तथा आस्था का संतुलन है।

छंद ४६९ दोहा

चलब नीति मग राम पग नेह निबाहब नीक। तुलसी पहिरिअ सो बसन जो न पखारें फीक ॥
कठिन शब्दार्थ

नीति मग = नीति का मार्ग; पखारें = धोने से; फीक = फीका।

सरल हिंदी अर्थ

नीति के मार्ग पर चलना और रामचरणों का प्रेम अच्छी तरह निभाना चाहिए। ऐसा वस्त्र पहनें जिसका रंग धुलने से फीका न हो।

भावार्थ और जीवन-संदेश

वस्त्र के पक्के रंग की तरह भक्ति और सदाचार कठिन अनुभवों में भी स्थिर रहें; अवसर देखकर बदलने वाली निष्ठा अधूरी है।

छंद ४७० दोहा

दोहा चारु बिचारु चलु परिहरि बाद बिबाद। सुकृत सीवँ स्वारथ अवधि परमारथ मरजाद ॥
कठिन शब्दार्थ

चारु = सुंदर; बाद बिबाद = व्यर्थ वाद-विवाद; सीवँ = सीमा।

सरल हिंदी अर्थ

इन सुंदर दोहों पर विचार करके चलो और निरर्थक विवाद छोड़ो। इनमें सुकर्म, सांसारिक हित और परमार्थ की मर्यादा का विवेचन है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

पाठ की सार्थकता तर्क जीतने में नहीं, समझ को व्यवहार में उतारने में है। अध्ययन से अपने निर्णय और संबंध सुधारें।

छंद ४७१ दोहा

तुलसी सो समरथ सुमति सुकृती साधु सयान। जो बिचारि ब्यवहरइ जग खरच लाभ अनुमान ॥
कठिन शब्दार्थ

समरथ = समर्थ; सुकृती = पुण्यकर्मी; खरच लाभ = व्यय और प्राप्ति।

सरल हिंदी अर्थ

वही समर्थ, बुद्धिमान, सत्कर्मी और समझदार है जो संसार में व्यवहार करते समय व्यय और लाभ का विचार करता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

लाभ का अर्थ केवल धन नहीं। समय, श्रम, प्रतिष्ठा और दूसरों के हित पर पड़ने वाले प्रभाव को भी समझकर निर्णय लें।

छंद ४७२ दोहा

जाय जोग जग छेम बिनु तुलसी के हित राखि। बिनुऽपराध भृगुपति नहुष बेनु बृकासुर साखि ॥
कठिन शब्दार्थ

जोग = प्राप्ति; छेम = प्राप्त वस्तु की रक्षा; साखि = साक्षी।

सरल हिंदी अर्थ

प्राप्ति की रक्षा न हो तो मिली हुई संपदा भी चली जाती है। परशुराम, नहुष, वेन और वृकासुर की कथाएँ उपलब्ध शक्ति के दुरुपयोग की साक्षी हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

सफलता मिलने के बाद संयम और उत्तरदायित्व अधिक आवश्यक होते हैं। अधिकार को मनमानी का अवसर मानना पतन बुलाता है।

छंद ४७३ दोहा

बड़ि प्रतीति गठिबंध तें बड़ो जोग तें छेम। बड़ो सुसेवक साइँ तें बड़ो नेम तें प्रेम ॥
कठिन शब्दार्थ

प्रतीति = विश्वास; गठिबंध = बाहरी बंधन; नेम = नियम।

सरल हिंदी अर्थ

बाहरी बंधन से विश्वास बड़ा है, प्राप्ति से उसकी रक्षा बड़ी है, स्वामी से सुयोग्य सेवक का महत्त्व बड़ा है और नियम से प्रेम बड़ा है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

संबंध केवल अनुबंध या पद से नहीं चलते। भरोसा, देखभाल और आत्मीयता उनके वास्तविक आधार हैं।

छंद ४७४ दोहा

सिष्य सखा सेवक सचिव सुतिय सिखावन साँच। सुनि समुझिअ पुनि परिहरिअ पर मन रंजन पाँच ॥
कठिन शब्दार्थ

सुतिय = अच्छी पत्नी; सिखावन = समझाने की बात; परिहरिअ = छोड़ना।

सरल हिंदी अर्थ

शिष्य, मित्र, सेवक, मंत्री और पत्नी की सच्ची सीख सुनकर समझनी चाहिए; केवल दूसरे का मन रखने वाली बात को छोड़ देना चाहिए।

भावार्थ और जीवन-संदेश

कम पद वाले या निकट संबंधी की उपयोगी बात भी स्वीकार करें। सलाह का मूल्य सत्य और हित से तय करें, चापलूसी से नहीं।

छंद ४७५ दोहा

नगर नारि भोजन सचिव सेवक सखा अगार। सरस परिहरें रंग रस निरस बिषाद बिकार ॥
कठिन शब्दार्थ

सरस = अनुकूल और सुखद; अगार = घर; निरस = रसहीन।

सरल हिंदी अर्थ

नगर, पत्नी, भोजन, मंत्री, सेवक, मित्र और घर अनुकूल हों तो जीवन में आनंद देते हैं; प्रतिकूल हों तो विषाद और विकार बढ़ाते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह संबंधों और वातावरण के प्रभाव का वर्णन है। किसी को उपभोग की वस्तु न मानें; सहयोग, सम्मान और स्वस्थ परिस्थितियाँ विकसित करें।

छंद ४७६ दोहा

तूठहिं निज रुचि काज करि रूठहिं काज बिगारि। तीय तनय सेवक सखा मन के कंटक चारि ॥
कठिन शब्दार्थ

तूठहिं = प्रसन्न होते हैं; तनय = पुत्र; कंटक = काँटे।

सरल हिंदी अर्थ

पत्नी, पुत्र, सेवक और मित्र अपने मन का काम होने पर खुश और काम बिगड़ने पर रूठें, तो वे मन के लिए काँटों जैसे हो जाते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

आलोचना संबंध की नहीं, स्वार्थपूर्ण अपेक्षा की है। अपने निकटजनों को केवल इच्छा पूरी करने का साधन समझने से बचें।

छंद ४७७ दोहा

दीरघ रोगी दारिदी कटुबच लोलुप लोग। तुलसी प्रान समान तउ होहिं निरादर जोग ॥
कठिन शब्दार्थ

दारिदी = निर्धन; कटुबच = कटु बोलने वाले; लोलुप = लालची।

सरल हिंदी अर्थ

कवि कहते हैं कि लंबी बीमारी, निर्धनता, कठोर वाणी या लोभ के कारण अत्यंत प्रिय व्यक्ति भी सामाजिक उपेक्षा झेल सकता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह कठोर सामाजिक अनुभव हमें करुणा की जरूरत याद दिलाता है। बीमारी और गरीबी किसी के सम्मान को कम नहीं करतीं; सहयोग दें और कटुता व लोभ सुधारें।

छंद ४७८ दोहा

पाही खेती लगन बट रिन कुब्याज मग खेत। बैर बड़े सों आपने किए पाँच दुख हेत ॥
कठिन शब्दार्थ

पाही खेती = दूर की खेती; लगन बट = रास्ते में आसक्ति; कुब्याज = भारी ब्याज।

सरल हिंदी अर्थ

दूर की खेती, मार्ग में अनुचित लगाव, भारी ब्याज का ऋण, रास्ते का खेत और शक्तिशाली से वैर—कवि इन्हें स्वयं बुलाए दुःख के कारण कहते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

परिस्थिति, रखरखाव, ऋण की शर्तों और संघर्ष की कीमत का विचार करें। पुरानी नीति को आज विवेकपूर्ण जोखिम-आकलन के रूप में समझें।

छंद ४७९ दोहा

धाइ लगै लोहा ललकि खैंचि लेइ नइ नीचु। समरथ पापी सों बयर जानि बिसाही मीचु ॥
कठिन शब्दार्थ

ललकि = लपककर; नइ = झुककर; बिसाही = खरीदी; मीचु = मृत्यु।

सरल हिंदी अर्थ

चुंबक की ओर लोहा लपककर लगता है और चुंबक उसे खींच लेता है। बलवान दुष्ट से वैर करना मानो मृत्यु मोल लेना है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

आवेग में ऐसी लड़ाई न चुनें जिसमें भारी नुकसान हो। अन्याय का सामना तैयारी, सहयोग और उचित उपाय से करें।

छंद ४८० दोहा

सोचिअ गृही जो मोह बस करइ करम पथ त्याग। सोचिअ जती प्रपंच रत बिगत बिबेक बिराग ॥
कठिन शब्दार्थ

सोचिअ = जिसके लिए चिंता हो; जती = संन्यासी; प्रपंच = सांसारिक उलझाव।

सरल हिंदी अर्थ

चिंता उस गृहस्थ की है जो मोह में कर्तव्य छोड़ दे, और उस त्यागी की जो विवेक-वैराग्य खोकर प्रपंच में रम जाए।

भावार्थ और जीवन-संदेश

गृहस्थ और संन्यास दोनों में अपने दायित्व की सच्चाई चाहिए। वेश या पहचान से अधिक आचरण का महत्त्व है।

खंड ९ · विवेक, उपदेश और लोकापवाद

छंद ४८१–५०४ · सीखने की तैयारी, स्वार्थ और प्रतिष्ठा का मूल्य।

छंद ४८१ दोहा

तुलसी स्वारथ सामुहो परमारथ तन पीठि। अंध कहें दुख पाइहै डिठिआरो केहि डीठि ॥
कठिन शब्दार्थ

सामुहो = सामने; परमारथ = उच्च लोकहित और आत्महित; डिठिआरो = आँख वाला।

सरल हिंदी अर्थ

जो स्वार्थ की ओर मुख और परमार्थ की ओर पीठ किए है, उसे अंधा कहो तो बुरा मानेगा; पर उसकी दृष्टि आखिर कैसी है?

भावार्थ और जीवन-संदेश

देखना और सही पहचानना अलग बातें हैं। अपना लाभ देखते हुए दूसरों के हित और जीवन के बड़े उद्देश्य को ओझल न होने दें।

छंद ४८२ दोहा

बिन आँखिन की पानहीं पहिचानत लखि पाय। चारि नयन के नारि नर सूझत मीचु न माय ॥
कठिन शब्दार्थ

पानहीं = जूती; चारि नयन = बाहरी आँखें और विवेक-दृष्टि; मीचु = मृत्यु।

सरल हिंदी अर्थ

आँख न होने पर भी जूती अपने योग्य पैर से जुड़ती है; आँख और विवेक रखने वाले मनुष्य भी मृत्यु और माया को नहीं पहचानते।

भावार्थ और जीवन-संदेश

रूपक जागरूकता की कमी पर व्यंग्य करता है। नश्वरता को याद रखने से आसक्ति और अहंकार पर लगाम लगती है।

छंद ४८३ दोहा

जौ पै मूढ़ उपदेस के होते जोग जहान। क्यों न सुजोधन बोध कै आए स्याम सुजान ॥
कठिन शब्दार्थ

मूढ़ = हठी अज्ञानी; जोग = योग्य; सुजोधन = दुर्योधन; स्याम = श्रीकृष्ण।

सरल हिंदी अर्थ

यदि केवल उपदेश से सभी हठी लोग समझदार हो जाते, तो सुजान कृष्ण दुर्योधन को समझाकर क्यों न लौटा लाते?

भावार्थ और जीवन-संदेश

समझाने वाले की योग्यता पर्याप्त नहीं; सुनने वाले की खुली दृष्टि भी चाहिए। सुधार के लिए अपनी जिद पहचानें।

छंद ४८४ सोरठा

फुलइ फरइ न बेत जदपि सुधा बरषहिं जलद। मूरुख हृदयँ न चेत जौं गुर मिलहिं बिरंचि सम ॥
कठिन शब्दार्थ

बेत = बेंत; सुधा = अमृत; बिरंचि = ब्रह्मा; चेत = समझना।

सरल हिंदी अर्थ

बादल अमृत बरसाएँ तब भी बेंत में फूल-फल नहीं आते। इसी तरह हठी मूर्ख का मन ब्रह्मा जैसे गुरु मिलने पर भी नहीं चेतता।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह काव्यात्मक अतिशयोक्ति सीखने की ग्रहणशीलता पर है। परिवर्तन का आरंभ अपनी कमी स्वीकार करने से होता है।

छंद ४८५ दोहा

रीझि आपनी बूझि पर खीझि बिचार बिहीन। ते उपदेस न मानहीं मोह महोदधि मीन ॥
कठिन शब्दार्थ

रीझि = प्रसन्न होकर; खीझि = चिढ़कर; महोदधि = महासागर।

सरल हिंदी अर्थ

अपनी ही समझ पर रीझने और बिना विचार दूसरों पर चिढ़ने वाले लोग उपदेश नहीं मानते; वे मोह-सागर की मछलियों जैसे हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

आत्ममुग्धता और क्रोध सीखने के रास्ते बंद करते हैं। असहमति सुनते समय पहले उसका तर्क समझें।

छंद ४८६ दोहा

अनसमुझें अनुसोचनो अवसि समुझिऐ आपु। तुलसी आपु न समुझिऐ पल पल पर परितापु ॥
कठिन शब्दार्थ

अनसमुझें = न समझने से; अनुसोचनो = पछताना; परितापु = संताप।

सरल हिंदी अर्थ

बिना समझे काम करने पर पछताना पड़ता है, इसलिए स्वयं समझना आवश्यक है। अपनी दशा न समझने वाला बार-बार दुःख पाता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

अनुभव की समीक्षा करें और गलती का कारण जानें। केवल दूसरों को दोष देने से वही संकट लौटता रहता है।

छंद ४८७ दोहा

कूप खनत मंदिर जरत आएँ धारि बबूर। बवहिं नवहिं निज काज सिर कुमति सिरोमनि कूर ॥
कठिन शब्दार्थ

कूप = कुआँ; धारि = शत्रु का आक्रमण; बवहिं = बोते हैं; नवहिं = झुकते हैं।

सरल हिंदी अर्थ

घर जलने पर कुआँ खोदना, शत्रु आ जाने पर रक्षा के लिए बबूल बोना और स्वार्थ साधने को सिर झुकाते फिरना—कवि इन्हें अविवेकी देरी और गलत आश्रय के उदाहरण कहते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

संकट आने से पहले तैयारी करें। सहयोग और नम्रता को मजबूरी के अंतिम क्षण तक टालना बुद्धिमानी नहीं।

छंद ४८८ दोहा

निडर ईस तें बीस कै बीस बाहु सो होइ। गयो गयो कहैं सुमति सब भयो कुमति कह कोइ ॥
कठिन शब्दार्थ

ईस = ईश्वर; बीस बाहु = रावण; सुमति = अच्छी बुद्धि।

सरल हिंदी अर्थ

ईश्वर से निडर होकर कोई बीस भुजाओं वाले रावण जैसा बन जाए, तो सज्जन उसका नाश निकट बताते हैं; दुर्बुद्धि उसे सफलता समझती है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

शक्ति का बढ़ना हर बार कल्याण का संकेत नहीं। अन्याय पर मिली विजय भी भविष्य के पतन की भूमिका हो सकती है।

छंद ४८९ दोहा

जो सुनि समुझि अनीति रत जागत रहे जु सोइ। उपदेसिबो जगाइबो तुलसी उचित न होइ ॥
कठिन शब्दार्थ

अनीति रत = अन्याय में लगा; जागत सोइ = जानबूझकर सोना।

सरल हिंदी अर्थ

जो सुन-समझकर भी अन्याय में लगा रहे, वह जागते हुए सो रहा है। ऐसे को उपदेश देकर जगाना उचित अवसर न मिलने पर व्यर्थ है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

बात समझने और मानने में अंतर है। निष्फल बहस के बदले अपनी ऊर्जा उपयोगी काम और आवश्यक सीमाएँ तय करने में लगाएँ।

छंद ४९० दोहा

बहु सुत बहु रुचि बहु बचन बहु अचार ब्यवहार। इनको भलो मनाइबो यह अग्यान अपार ॥
कठिन शब्दार्थ

बहु रुचि = अनेक पसंद; अचार = आचरण; भलो मनाइबो = सबको प्रसन्न करना।

सरल हिंदी अर्थ

लोगों की इच्छाएँ, बातें, आचार और व्यवहार अनेक प्रकार के हैं। उन सबको एक साथ प्रसन्न करने की कोशिश अज्ञान है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

हर अपेक्षा पूरी नहीं की जा सकती। न्यायपूर्ण सिद्धांत चुनें और अलग पसंदों के अस्तित्व को स्वीकारें।

छंद ४९१ दोहा

लोगनि भलो मनाव जो भलो होन की आस। करत गगन को गेंडुँआ सो सठ तुलसीदास ॥
कठिन शब्दार्थ

गेंडुँआ = गेंद रखने का गोल आधार; सठ = मूर्ख।

सरल हिंदी अर्थ

जो अच्छा बनने की आशा केवल लोगों को प्रसन्न करने में रखता है, वह मानो आकाश के लिए टेक बनाने चला है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

जनमत बदलता रहता है। ईमानदार आत्मपरीक्षण और उचित कर्म पर अपना आधार रखें।

छंद ४९२ दोहा

अपजस जोग कि जानकी मनि चोरी की कान्ह। तुलसी लोग रिझाइबो करषि कातिबो नान्ह ॥
कठिन शब्दार्थ

अपजस = अपयश; कान्ह = कृष्ण; करषि कातिबो = कर्षण और कताई।

सरल हिंदी अर्थ

क्या सीता अपयश की योग्य थीं, या कृष्ण ने मणि चुराई थी? फिर भी उन पर आरोप लगे; सबको प्रसन्न करना अत्यंत दुष्कर है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

सीता के लोकापवाद और स्यमंतक-मणि की कथा से कवि बताते हैं कि निर्दोषता भी अफवाह रोक नहीं पाती। सत्य और धैर्य बनाए रखें।

छंद ४९३ दोहा

तुलसी जु पै गुमान को होतो कछू उपाउ। तौ कि जानकिहि जानि जियँ परिहरते रघुराउ ॥
कठिन शब्दार्थ

गुमान = लोकापवाद या संदेह की धारणा; परिहरते = छोड़ते।

सरल हिंदी अर्थ

यदि लोगों के संदेह मिटाने का सहज उपाय होता, तो राम सीता की पवित्रता मन में जानते हुए भी उन्हें क्यों त्यागते?

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह रामकथा के दुःखद प्रसंग में लोकापवाद की शक्ति का प्रश्न है। आज इसका मनन निर्दोष व्यक्ति पर सामाजिक दबाव के अन्याय को पहचानकर करें।

छंद ४९४ दोहा

मागि मधुकरी खात ते सोवत गोड़ पसारि। पाप प्रतिष्ठा बढ़ि परी ताते बाढ़ी रारि ॥
कठिन शब्दार्थ

मधुकरी = थोड़ी-थोड़ी भिक्षा; रारि = झगड़ा।

सरल हिंदी अर्थ

जब भिक्षा माँगकर खाते थे तो निश्चिंत सोते थे। प्रतिष्ठा बढ़ी तो उसके साथ विवाद और उलझन भी बढ़ गई।

भावार्थ और जीवन-संदेश

सम्मान के साथ अपेक्षाएँ और अहंकार बढ़ सकते हैं। सादगी तथा शांत जीवन का मूल्य पद से कम नहीं।

छंद ४९५ दोहा

तुलसी भेड़ी की धँसनि जड़ जनता सनमान। उपजत ही अभिमान भो खोवत मूढ़ अपान ॥
कठिन शब्दार्थ

भेड़ी की धँसनि = भेड़ों का बिना विवेक पीछे चलना; अपान = अपना हित।

सरल हिंदी अर्थ

अविवेकी भीड़ का सम्मान भेड़चाल जैसा है। उसे पाते ही मूर्ख अभिमानी होकर अपना ही हित खो देता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

लोकप्रियता को योग्यता का अंतिम प्रमाण न मानें। प्रशंसा के बीच विनम्रता और स्वतंत्र विवेक बचाएँ।

छंद ४९६ दोहा

लही आँखि कब आँधरे बाँझ पूत कब ल्याइ। कब कोढ़ी काया लही जग बहराइच जाइ ॥
कठिन शब्दार्थ

बाँझ = संतान न होने वाली; कोढ़ी = कुष्ठरोगी; बहराइच = स्थान-संकेत।

सरल हिंदी अर्थ

कवि प्रश्न करते हैं कि केवल बहराइच जाने से किस अंधे को आँख, निःसंतान को पुत्र या रोगी को स्वस्थ देह मिल गई?

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह स्थान-मात्र से चमत्कारी लाभ मिलने के दावे पर प्रश्न है। श्रद्धा के साथ विवेक रखें; रोग में उचित चिकित्सा लें और किसी की दशा को दोष न मानें।

छंद ४९७ दोहा

तुलसी निरभय होत नर सुनिअत सुरपुर जाइ। सो गति लखि ब्रत अछत तनु सुख संपति गति पाइ ॥
कठिन शब्दार्थ

सुरपुर = स्वर्ग; अछत तनु = शरीर रहते; सुख संपति = समृद्धि।

सरल हिंदी अर्थ

सुना जाता है कि स्वर्ग जाकर मनुष्य निर्भय होता है; पर कवि व्यंग्य करते हैं कि सुख-संपत्ति मिलते ही लोग जीवित रहते अपने को उतना निडर मान बैठते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

संपदा से मिला सुरक्षा-बोध मनमानी का अधिकार नहीं है। समृद्धि के बीच नश्वरता, मर्यादा और उत्तरदायित्व याद रखें।

छंद ४९८ दोहा

तुलसी तोरत तीर तरु बक हित हंस बिडारि। बिगत नलिन अलि मलिन जल सुरसरिहू बढ़िआरि ॥
कठिन शब्दार्थ

बक = बगुले; बिडारि = भगाकर; बढ़िआरि = बाढ़।

सरल हिंदी अर्थ

बाढ़ में गंगा भी किनारे के वृक्ष तोड़ती, बगुलों को अनुकूलता देती, हंसों को भगाती और कमलों-मधुपों को हानि पहुँचाती है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

अत्यधिक उभार हितकारी साधन को भी हानिकारक बना सकता है। परिणाम देखकर व्यवस्था सँभालें और केवल नाम की पवित्रता पर निर्भर न रहें।

छंद ४९९ दोहा

अधिकरी बस औसरा भलेउ जानिबे मंद। सुधा सदन बसु बारहें चउथें चउथिउ चंद ॥
कठिन शब्दार्थ

अधिकरी = अधिकारी; औसरा = अवसर; बसु = आठ; बारहें = बारहवें।

सरल हिंदी अर्थ

अधिकारी, समय और परिस्थिति के प्रभाव से अच्छी वस्तु भी अनुकूल फल नहीं देती। कवि चंद्रमा के संबंध में परंपरागत ज्योतिषीय उदाहरण देते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

किसी की मूल अच्छाई के साथ परिस्थितियाँ भी परिणाम बदलती हैं। यहाँ ज्योतिषीय संकेत ऐतिहासिक मान्यता हैं; व्यवहार में वास्तविक परिस्थिति जाँचें।

छंद ५०० दोहा

त्रिबिध एक बिधि प्रभु अनुग अवसर करहिं कुठाट। सूधे टेढ़े सम बिषम सब महँ बारहबाट ॥
कठिन शब्दार्थ

अनुग = अनुचर; कुठाट = खराब व्यवस्था; बारहबाट = बिखराव।

सरल हिंदी अर्थ

स्वामी के भिन्न-भिन्न प्रकार के अनुचर अवसर पाकर गड़बड़ी करते हैं; सीधी-टेढ़ी और समान-असमान सभी दशाओं में अव्यवस्था फैला सकते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

केवल शीर्ष नेतृत्व अच्छा होना पर्याप्त नहीं। उत्तरदायित्व, निरीक्षण और स्पष्ट कार्य-नियम भी जरूरी हैं।

छंद ५०१ दोहा

प्रभु तें प्रभु गन दुखद लखि प्रजहिं सँभारै राउ। कर तें होत कृपानको कठिन घोर घन घाउ ॥
कठिन शब्दार्थ

प्रभु गन = शासक के कर्मचारी; कृपान = तलवार; कर = हाथ।

सरल हिंदी अर्थ

शासक को प्रजा सँभालनी चाहिए, क्योंकि उसके कर्मचारी उससे भी अधिक दुःख दे सकते हैं। हाथ से चलने वाली तलवार का घाव हाथ से अधिक घोर होता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

अधीनस्थों की ज्यादती के लिए शासन की जवाबदेही रहती है। शिकायत सुनने और अत्याचार रोकने की व्यवस्था बनाएँ।

छंद ५०२ दोहा

ब्यालहु तें बिकराल बड़ ब्यालफेन जियँ जानु। वहि के खाए मरत है वहि खाए बिनु प्रानु ॥
कठिन शब्दार्थ

ब्याल = साँप; ब्यालफेन = साँप का विषैला फेन; बिनु प्रानु = निर्जीव।

सरल हिंदी अर्थ

साँप से भी उसके विषैले फेन को अधिक घातक कहा गया है: साँप के खाने वाला मरता है, फेन को खाने वाला प्राण खोता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

पिछले छंद के क्रम में यह रूपक सत्ता के खतरनाक अनुचरों का संकेत है। मूल शक्ति से निकली चीज को छोटा समझकर उपेक्षित न करें।

छंद ५०३ दोहा

कारन तें कारजु कठिन होइ दोसु नहिं मोर। कुलिस अस्थि तें उपल तें लोह कराल कठोर ॥
कठिन शब्दार्थ

कारन = कारण; कारजु = कार्य या परिणाम; कुलिस = वज्र; अस्थि = हड्डी।

सरल हिंदी अर्थ

कारण से निकली वस्तु उससे अधिक कठोर हो सकती है। हड्डी से बना वज्र और पत्थर से निकला लोहा उसके उदाहरण हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

किसी व्यवस्था के परिणाम उसकी शुरुआत से अधिक शक्तिशाली हो सकते हैं। यह कारण-कार्य संबंध का काव्यात्मक उदाहरण है।

छंद ५०४ दोहा

काल बिलोकत ईस रुख भानु काल अनुहारि ॥ रबिहि राउ राजहिं प्रजा बुध ब्यवहरहिं बिचारि ॥
कठिन शब्दार्थ

ईस रुख = ईश्वर की इच्छा का संकेत; अनुहारि = अनुकूल होकर; बुध = बुद्धिमान।

सरल हिंदी अर्थ

काल ईश्वर की इच्छा देखता है, सूर्य काल का अनुसरण करता है, राजा सूर्य के और प्रजा राजा के अनुसार चलती है; बुद्धिमान विचारकर व्यवहार करते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

कवि व्यापक व्यवस्था में परिस्थिति के अनुसार आचरण की बात कहते हैं। विवेकशीलता में समय पहचानना और अपनी जिम्मेदारी निभाना दोनों हैं।

खंड १० · राजधर्म और प्रजा का कल्याण

छंद ५०५–५२८ · नेतृत्व, कराधान, न्याय और उत्तरदायित्व।

छंद ५०५ दोहा

जथा अमल पावन पवन पाइ कुसंग सुसंग। कहिअ कुबास सुबास तिमि काल महीस प्रसंग ॥
कठिन शब्दार्थ

अमल = निर्मल; कुबास = दुर्गंध; महीस = राजा।

सरल हिंदी अर्थ

निर्मल हवा संगति के अनुसार दुर्गंधित या सुगंधित कही जाती है। इसी तरह समय और शासक की संगति से वातावरण प्रभावित होता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

सामाजिक परिस्थितियों का असर व्यक्ति पर पड़ता है। अनुकूल संगति चुनें और संस्था के वातावरण को सुधारने में योगदान दें।

छंद ५०६ दोहा

भलेहु चलत पथ पोच भय नृप नियोग नय नेम। सुतिय सुभूपति भूषिअत लोह सँवारित हेम ॥
कठिन शब्दार्थ

पोच = बुरा; नृप नियोग = राजकीय आदेश; सुतिय = सद्गुणवती स्त्री; हेम = सोना।

सरल हिंदी अर्थ

बुरे व्यक्ति भी अच्छे शासक के नियम और न्याय के भय से उचित मार्ग पर चलते हैं। जैसे सोने को आकार देने में लोहे का औजार सहायक होता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

नियम तभी उपयोगी हैं जब वे न्याय और सदाचरण को सहारा दें। यह अनुशासन का रूपक है; पारिवारिक संबंधों में परस्पर सम्मान आवश्यक है।

छंद ५०७ दोहा

माली भानु किसान सम नीति निपुन नरपाल। प्रजा भाग बस होहिंगे कबहुँ कबहुँ कलिकाल ॥
कठिन शब्दार्थ

नरपाल = राजा; प्रजा भाग = प्रजा का सौभाग्य।

सरल हिंदी अर्थ

माली, सूर्य और किसान जैसे नीति-कुशल राजा कलियुग में कभी-कभी प्रजा के सौभाग्य से मिलते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

अच्छा नेतृत्व पोषण करता, आवश्यकता पहचानता और परिश्रम का सम्मान करता है। शासन का मूल्य जनता के कल्याण से आँकें।

छंद ५०८ दोहा

बरषत हरषत लोग सब करषत लखै न कोइ। तुलसी प्रजा सुभाग ते भूप भानु सो होइ ॥
कठिन शब्दार्थ

करषत = खींचते समय; भानु = सूर्य; सुभाग = सौभाग्यशाली।

सरल हिंदी अर्थ

सूर्य जब वर्षा कराता है तब सब हर्षित होते हैं, पर जल खींचते उसे कोई नहीं देखता। सूर्य जैसे राजा की प्रजा सौभाग्यशाली है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

राजस्व का भार संयमित हो और उसका सार्वजनिक लाभ स्पष्ट दिखे। यह कर-संग्रह और लोककल्याण का सुंदर रूपक है।

छंद ५०९ दोहा

सुधा सुजान कुजान फल आम असन सम जानि। सुप्रभु प्रजा हित लेहिं कर सामादिक अनुमानि ॥
कठिन शब्दार्थ

सुधा = रस या अमृत; असन = कठोर वृक्ष; कर = कराधान; सामादिक = समझाने आदि उपाय।

सरल हिंदी अर्थ

समझदार व्यक्ति आम से रस पाता है, नासमझ कठोर वृक्ष से फल चाहता है। अच्छा शासक प्रजा की स्थिति समझकर उचित उपाय से कर लेता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

कराधान में आय की क्षमता और आजीविका का ध्यान रखें। दमन से संसाधन निकालना स्थायी कल्याण नहीं देता।

छंद ५१० दोहा

पाके पकए बिटप दल उत्तम मध्यम नीच। फल नर लहैं नरेस त्यों करि बिचारि मन बीच ॥
कठिन शब्दार्थ

बिटप = पेड़; दल = पत्ते; नरेस = राजा।

सरल हिंदी अर्थ

पके फल लेना श्रेष्ठ, अधपके फल लेना मध्यम और पत्ते तोड़ लेना निम्न है; राजा को कर लेते समय इसी तरह विचार करना चाहिए।

भावार्थ और जीवन-संदेश

उत्पादन पूरा होने से पहले अत्यधिक वसूली आजीविका को चोट पहुँचाती है। आय के स्रोत को सुरक्षित रखकर न्यायपूर्ण हिस्सा लें।

छंद ५११ दोहा

रीझि खीझि गुरु देत सिख सखा सुसाहिब साधु। तोरि खाइ फल होइ भल तरु काटें अपराधु ॥
कठिन शब्दार्थ

रीझि खीझि = प्रसन्नता या अप्रसन्नता में; सुसाहिब = अच्छा स्वामी।

सरल हिंदी अर्थ

गुरु, मित्र, अच्छे स्वामी और संत कभी प्रसन्न होकर, कभी अप्रसन्न होकर सिखाते हैं। फल तोड़कर खाना उचित है, पेड़ काट डालना अपराध है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

उपयोग और विनाश का अंतर समझें। मार्गदर्शन का उद्देश्य व्यक्ति और संसाधन को नष्ट करना नहीं, उनका हित सँभालना हो।

छंद ५१२ दोहा

धरनि धेनु चारितु चरत प्रजा सुबच्छ पेन्हाइ। हाथ कछू नहिं लागिहै किएँ गोड़ कि गाइ ॥
कठिन शब्दार्थ

धरनि धेनु = धरती रूपी गाय; सुबच्छ = अच्छा बछड़ा; पेन्हाइ = दूध उतारती।

सरल हिंदी अर्थ

धरती रूपी गाय अच्छे आचरण का चारा चरकर, प्रजा रूपी बछड़े से प्रसन्न होकर दूध देती है; पैर बाँधकर दुहने से लाभ नहीं मिलता।

भावार्थ और जीवन-संदेश

समृद्धि सहयोग, उचित संरक्षण और जनता के संतोष से आती है। शोषण से उत्पादन और विश्वास दोनों घटते हैं।

छंद ५१३ दोहा

चढ़े बधूरें चंग ज्यों ग्यान ज्यों सोक समाज। करम धरम सुख संपदा त्यों जानिबे कुराज ॥
कठिन शब्दार्थ

बधूरें = हवा के सहारे; चंग = पतंग; कुराज = बुरा शासन।

सरल हिंदी अर्थ

हवा चढ़ने पर पतंग बढ़ती है और ज्ञान बढ़ने पर शोक घटता है; उसी तरह बुरे शासन के बढ़ने पर कर्म, धर्म, सुख और संपत्ति नष्ट होते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

शासन की खराबी जीवन के अनेक क्षेत्रों को प्रभावित करती है। व्यवस्था का आकलन केवल बाहरी विस्तार से नहीं, जनता के सुख से करें।

छंद ५१४ दोहा

कंटक करि करि परत गिरि साखा सहस खजूरि। मरहिं कृनृप करि करि कुनय सों कुचालि भव भूरि ॥
कठिन शब्दार्थ

कंटक = काँटा; कृनृप = दुष्ट राजा; कुनय = अन्यायपूर्ण नीति।

सरल हिंदी अर्थ

खजूर की काँटेदार शाखाएँ बढ़कर अंततः गिरती हैं। इसी तरह दुष्ट राजा कुनीति और कुचाल से जन्म-मरण के दुःख में पड़ते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

दमनकारी विस्तार स्थायी उन्नति नहीं। अन्यायपूर्ण उपाय अंततः शासक की नींव कमजोर करते हैं।

छंद ५१५ दोहा

काल तोपची तुपक महि दारू अनय कराल। पाप पलीता कठिन गुरु गोला पुहुमी पाल ॥
कठिन शब्दार्थ

तोपची = तोप चलाने वाला; तुपक = तोप; दारू = बारूद; पुहुमी पाल = राजा।

सरल हिंदी अर्थ

काल तोपची, पृथ्वी तोप, अन्याय बारूद, पाप पलीता और राजा उसका भारी गोला है—यह शासन के पतन का रूपक है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

जब अन्याय और पाप जमा होते हैं, समय का एक झटका सत्ता को उड़ा सकता है। जवाबदेही और सुधार को देर तक न टालें।

छंद ५१६ दोहा

भूमि रुचिर रावन सभा अंगद पद महिपाल। धरम राम नय सीय बल अचल होत सुभ काल ॥
कठिन शब्दार्थ

रुचिर = सुंदर; महिपाल = राजा; नय = नीति; अचल = स्थिर।

सरल हिंदी अर्थ

सुंदर धरती रावण की सभा जैसी और राजा अंगद के पाँव जैसा है; धर्म रूपी राम तथा नीति रूपी सीता के बल से वह शुभ समय में अचल रहता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

अंगद के अडिग पाँव की कथा स्थिर शासन का रूपक है। नैतिकता और न्यायपूर्ण नीति अधिकार को टिकाऊ आधार देती हैं।

छंद ५१७ दोहा

प्रीति राम पद नीति रति धरम प्रतीति सुभायँ। प्रभुहि न प्रभुता परिहरै कबहुँ बचन मन कायँ ॥
कठिन शब्दार्थ

नीति रति = नीति में अनुराग; प्रतीति = विश्वास; प्रभुता = प्रतिष्ठित अधिकार।

सरल हिंदी अर्थ

रामचरणों का प्रेम, नीति में अनुराग और धर्म पर सहज विश्वास रखने वाले शासक को मन, वचन और कर्म की दृढ़ता से प्रभुता नहीं छोड़ती।

भावार्थ और जीवन-संदेश

स्थायी प्रतिष्ठा सद्भाव, न्याय और आचरण की एकरूपता से आती है। केवल सत्ता पाने की चतुराई पर्याप्त नहीं।

छंद ५१८ दोहा

कर के कर मन के मनहिं बचन बचन गुन जानि। भूपहि भूलि न परिहरै बिजय बिभूति सयानि ॥
कठिन शब्दार्थ

कर = हाथ; गुन जानि = गुण और उपयुक्तता पहचानकर; बिभूति = ऐश्वर्य।

सरल हिंदी अर्थ

जो शासक हाथ के काम हाथ से, मन के विचार मन से और वचन के काम उचित वचन से करता है, उसे समझदार विजय और समृद्धि नहीं छोड़ती।

भावार्थ और जीवन-संदेश

कार्य के अनुकूल साधन चुनें। बोलने, सोचने और करने की अपनी-अपनी भूमिका पहचानना अच्छे नेतृत्व का गुण है।

छंद ५१९ दोहा

गोली बान सुमंत्र सर समुझि उलटि मन देखु। उत्तम मध्यम नीच प्रभु बचन बिचारि बिसेषु ॥
कठिन शब्दार्थ

सुमंत्र सर = मंत्रयुक्त बाण; उत्तम मध्यम नीच = श्रेष्ठ, मध्यम, निकृष्ट।

सरल हिंदी अर्थ

शासकों के वचन को गोली, साधारण बाण और मंत्रयुक्त बाण के उदाहरण से परखो; उनकी गंभीरता और प्रभाव में अंतर होता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

बात का मूल्य उसके शोर से नहीं, प्रभाव और जिम्मेदारी से समझें। कथनी से पहले उसके परिणाम पर विचार करें।

छंद ५२० दोहा

सत्रु सयानो सलिल ज्यों राख सीस रिपु नाव। बूड़त लखि पग डगत लखि चपरि चहूँ दिसि घाव ॥
कठिन शब्दार्थ

सलिल = जल; रिपु = शत्रु; चपरि = तेजी से।

सरल हिंदी अर्थ

समझदार शत्रु पानी की तरह व्यवहार करता है: वह नाव को ऊपर उठाए रखता है, पर उसके डूबने या डगमगाने पर चारों ओर से चोट करता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

बाहरी सहारा हर बार सद्भाव का प्रमाण नहीं। जोखिम, निर्भरता और दूसरे पक्ष के उद्देश्य को ध्यान से समझें।

छंद ५२१ दोहा

रैअत राज समाज घर तन धन धरम सुबाहु। सांत सुसचिवन सौंपि सुख बिलसइ नित नरनाहु ॥
कठिन शब्दार्थ

रैअत = प्रजा; सचिव = मंत्री; नरनाहु = राजा।

सरल हिंदी अर्थ

प्रजा, राजकाज, समाज, घर, शरीर, धन, धर्म और सेना को शांतचित्त योग्य मंत्रियों के जिम्मे देकर राजा सुखपूर्वक रह सकता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

विश्वसनीय लोगों को उचित जिम्मेदारी देना नेतृत्व का गुण है। कार्य सौंपने के साथ उत्तरदायित्व और देखरेख भी रखें।

छंद ५२२ दोहा

मुखिआ मुखु सो चाहिऐ खान पान कहुँ एक। पालइ पोषइ सकल अँग तुलसी सहित बिबेक ॥
कठिन शब्दार्थ

मुखिआ = प्रधान; पालइ पोषइ = पालन-पोषण करे; बिबेक = विवेक।

सरल हिंदी अर्थ

मुखिया मुख जैसा होना चाहिए: भोजन अकेला मुख ग्रहण करता है, लेकिन विवेकपूर्वक पूरे शरीर के अंगों को पोषण मिलता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

नेतृत्व को मिले संसाधन सबके हित में लगें। प्रधान का विशेष स्थान सामूहिक उत्तरदायित्व भी है।

छंद ५२३ दोहा

सेवक कर पद नयन से मुख सो साहिबु होइ। तुलसी प्रीति कि रीति सुनि सुकबि सराहहिं सोइ ॥
कठिन शब्दार्थ

कर पद नयन = हाथ, पैर, आँख; साहिबु = स्वामी।

सरल हिंदी अर्थ

सेवक हाथ, पैर और आँख के समान तथा स्वामी मुख के समान हो; अच्छे कवि इस परस्पर प्रेम की रीति को सराहते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

संगठन के अलग-अलग काम एक-दूसरे पर निर्भर हैं। सहयोग और सम्मान से पूरा समुदाय स्वस्थ रहता है।

छंद ५२४ दोहा

सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस। राज धर्म तन तीनी कर होइ बेगिहीं नास ॥
कठिन शब्दार्थ

सचिव = मंत्री; बैद = वैद्य; प्रिय = मनभावन; आस = लाभ की आशा।

सरल हिंदी अर्थ

मंत्री, वैद्य और गुरु यदि भय या लाभ की आशा से केवल मनभावन बात कहें, तो राज्य, शरीर और धर्म तीनों शीघ्र नष्ट होते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

सच्ची सलाह कभी अप्रिय हो सकती है। सलाहकार को सच कहने की स्वतंत्रता और स्वयं को उसे सुनने का साहस दें।

छंद ५२५ दोहा

रसना मन्त्री दसन जन तोष पोष निज काज। प्रभु कर सेन पदादिका बालक राज समाज ॥
कठिन शब्दार्थ

रसना = जीभ; दसन = दाँत; जन = सहायक; पदादिका = अन्य अंग।

सरल हिंदी अर्थ

जीभ मंत्री, दाँत सहायक और हाथ-पाँव सेना आदि के रूपक हैं। उनके समन्वय से शरीर की तरह शासन-समाज का पोषण होता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

सहयोगियों को प्रतिद्वंद्वी समझने के बजाय एक उद्देश्य से जोड़ें। हर भूमिका की उपयोगिता अलग है।

छंद ५२६ दोहा

लकड़ी डौआ करछुली सरस काज अनुहारि। सुप्रभु संग्रहहिं परिहरहिं सेवक सखा बिचारि ॥
कठिन शब्दार्थ

डौआ = लकड़ी का बड़ा चम्मच; करछुली = परोसने का उपकरण; संग्रहहिं = अपनाते हैं।

सरल हिंदी अर्थ

लकड़ी, डोंगा और करछुली काम के अनुसार उपयोगी होते हैं। अच्छे स्वामी भी सेवक और मित्र को उनकी योग्यता और काम देखकर रखते या अलग करते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

व्यक्ति का मूल्य केवल पद से न आँकें। जिम्मेदारी उसकी क्षमता के अनुसार दें और निर्णय न्यायपूर्ण रखें।

छंद ५२७ दोहा

प्रभु समीप छोटे बड़े रहत निबल बलवान। तुलसी प्रगट बिलोकिऐ कर अँगुली अनुमान ॥
कठिन शब्दार्थ

प्रभु समीप = स्वामी के निकट; निबल = निर्बल; कर अँगुली = हाथ की उँगलियाँ।

सरल हिंदी अर्थ

स्वामी के पास छोटे-बड़े और निर्बल-बलवान साथ रहते हैं; इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हाथ की अलग-अलग उँगलियाँ हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

सबकी क्षमता एक जैसी नहीं, फिर भी सामूहिक काम में सबकी जगह होती है। छोटे पद का अर्थ अनुपयोगी होना नहीं।

छंद ५२८ दोहा

साहब तें सेवक बड़ो जो निज धरम सुजान। राम बाँधि उतरे उदधि लाँघि गए हनुमान ॥
कठिन शब्दार्थ

निज धरम = अपना सेवा-कर्तव्य; उदधि = समुद्र।

सरल हिंदी अर्थ

अपने कर्तव्य को भली तरह जानने वाला सेवक कभी स्वामी से भी बड़ा कार्य कर देता है: राम पुल बाँधकर समुद्र पार गए, हनुमान उसे लाँघ गए।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह हनुमान की सेवा-निष्ठा का गुणगान है। अच्छे नेतृत्व को सहयोगियों की उपलब्धि का आदर करना चाहिए।

खंड ११ · सहयोग, कर्तव्य और समय की पहचान

छंद ५२९–५५२ · सेवाभाव, सही सलाह और जीवन के आधार।

छंद ५२९ दोहा

तुलसी भल बरतरु बढ़त निज मूलहिं अनुकुल। सबहि भाँति सब कहँ सुखद दलनि फलनि बिनु फूल ॥
कठिन शब्दार्थ

बरतरु = बरगद; निज मूल = अपनी जड़ें; दलनि = पत्तों से।

सरल हिंदी अर्थ

बरगद अपनी जड़ों का सहारा लेकर बढ़ता है और पत्तों तथा फलों से सबको सुख देता है, भले उसके फूल दिखाई नहीं पड़ते।

भावार्थ और जीवन-संदेश

जड़ों से जुड़कर बढ़ने और बिना दिखावे उपयोगी बनने की प्रेरणा लें। महानता दूसरों को मिलने वाले लाभ में दिखती है।

छंद ५३० दोहा

सघन सगुन सधरम सगन सबल सुसाइँ महीप। तुलसी जे अभिमान बिनु ते तिभुवन के दीप ॥
कठिन शब्दार्थ

सगुन = गुणवान; सधरम = धर्मयुक्त; सुसाइँ = अच्छे स्वामी; तिभुवन = तीनों लोक।

सरल हिंदी अर्थ

संगठित, गुणवान, धर्मशील और बलवान अच्छे राजा यदि अभिमानरहित हों, तो वे तीनों लोकों के दीपक जैसे हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

सामर्थ्य और सद्गुण का प्रकाश नम्रता से बढ़ता है। अहंकार के बिना अधिकार निभाना आदर्श है।

छंद ५३१ दोहा

तुलसी निज करतूति बिनु मुकुत जात जब कोइ। गयो अजामिल लोक हरि नाम सक्यो नहिं धोइ ॥
कठिन शब्दार्थ

करतूति = कर्म; मुकुत = मुक्त; अजामिल = भागवत-कथा का पात्र।

सरल हिंदी अर्थ

अपने अच्छे कर्म बिना भी मुक्ति मिल जाए तो कर्मों की स्मृति मिटती नहीं। अजामिल हरिलोक गए, पर उनके पुराने आचरण का उल्लेख आज भी होता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

कथा में नाम की कृपा का महत्त्व है, पर उसे गलत कर्म की छूट न समझें। आचरण का सामाजिक प्रभाव बना रहता है।

छंद ५३२ दोहा

बड़ो गहे ते होत बड़ ज्यों बावन कर दंड। श्रीप्रभु के सँग सों बढ़ो गयो अखिल ब्रह्मंड ॥
कठिन शब्दार्थ

बावन = वामन; दंड = हाथ का दंड; अखिल = समस्त।

सरल हिंदी अर्थ

बड़े का सहारा मिलने से छोटी वस्तु भी बड़ी हो जाती है। वामन के हाथ का दंड प्रभु के विश्वरूप के साथ पूरे ब्रह्मांड तक बढ़ गया।

भावार्थ और जीवन-संदेश

पौराणिक रूपक में संगति और आश्रय की महिमा है। अच्छे उद्देश्य से जुड़कर छोटी क्षमता भी विस्तृत उपयोग पा सकती है।

छंद ५३३ दोहा

तुलसी दान जो देत हैं जल में हाथ उठाइ। प्रतिग्राही जीवै नहीं दाता नरकै जाइ ॥
कठिन शब्दार्थ

प्रतिग्राही = दान लेने वाला; जल में हाथ उठाइ = मछली पकड़ने का संकेत।

सरल हिंदी अर्थ

यहाँ दाता और प्राप्तकर्ता का रूपक मछली पकड़ने वाले और मछली के लिए है: जल में डाला चारा लेने वाली मछली मरती है और छलपूर्ण दाता पाप पाता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

हर दिखाई देने वाला उपहार परोपकार नहीं। छिपे स्वार्थ और फँसाने वाले लाभ से सावधान रहें।

छंद ५३४ दोहा

आपन छोड़ो साथ जब ता दिन हितू न कोइ। तुलसी अंबुज अंबु बिनु तरनि तासु रिपु होइ ॥
कठिन शब्दार्थ

हितू = हितैषी; अंबुज = कमल; तरनि = सूर्य।

सरल हिंदी अर्थ

जब अपना आधार साथ छोड़ देता है, तब सहायक भी विरोधी हो सकता है। पानी के बिना कमल के लिए वही सूर्य हानिकारक बन जाता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

अपनी बुनियादी शक्ति, साधन और संबंध सँभालें। परिस्थिति बदलने पर पुराने सहारे का प्रभाव भी बदल सकता है।

छंद ५३५ दोहा

उरबी परि कलहीन होइ ऊपर कलाप्रधान। तुलसी देखु कलाप गति साधन घन पहिचान ॥
कठिन शब्दार्थ

उरबी = पृथ्वी; कलहीन = शोभारहित; कलाप = मोर का पंख-समूह; घन = बादल।

सरल हिंदी अर्थ

मोर की नीचे गिरी पाँख शोभाहीन लगती है, लेकिन ऊपर उठी पूँछ सुंदरता बिखेरती है। बादल देखकर नाचते मोर से उचित साधन और परिस्थिति का महत्त्व समझो।

भावार्थ और जीवन-संदेश

योग्यता को उचित स्थान और साधन मिलना आवश्यक है। किसी की क्षमता केवल उसकी वर्तमान असहाय दशा से न आँकें।

छंद ५३६ दोहा

तुलसी संगति पोच की सुजनहि होति म-दानि। ज्यों हरि रूप सुताहि तें कीनि गोहारि आनि ॥
कठिन शब्दार्थ

पोच = अनुचित; म-दानि = मंगलदायिनी का संक्षिप्त पाठ-रूप; गोहारि = पुकार।

सरल हिंदी अर्थ

कथा-संकेत में छल से विष्णु-रूप धारण करने वाले से जुड़ी राजकन्या की सच्ची पुकार भगवान सुनते हैं। कवि कहते हैं कि सज्जन के लिए प्रतिकूल संगति भी अंततः मंगल का अवसर बन सकती है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह आशा और सच्ची प्रार्थना का कथा-रूपक है; इससे जानबूझकर बुरी संगति चुनने की शिक्षा न लें। संकट में विवेकपूर्ण सहायता भी खोजें।

छंद ५३७ दोहा

कलि कुचालि सुभ मति हरनि सरलै दंडै चक्र। तुलसी यह निहचय भई बाढ़ि लेति नव बक्र ॥
कठिन शब्दार्थ

कुचालि = खोटी चाल; सरलै = सीधे को; नव बक्र = नए टेढ़े।

सरल हिंदी अर्थ

कवि कहते हैं कि कलियुग की उलटी रीति सरल को दंड देती है और टेढ़ेपन को बढ़ाती है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह भ्रष्ट वातावरण पर व्यंग्य है। अन्याय देखकर स्वयं कपटी बनने के बजाय ईमानदार लोगों के लिए सहारा और सुरक्षा बनाएँ।

छंद ५३८ दोहा

गो खग खे खग बारि खग तीनों माहिं बिसेक। तुलसी पीवैं फिरि चलैं रहैं फिरै सँग एक ॥
कठिन शब्दार्थ

गो खग = भूमि के पक्षी; खे खग = आकाश-पक्षी; बारि खग = जल-पक्षी।

सरल हिंदी अर्थ

भूमि, आकाश और जल के पक्षियों में एक समान विशेषता है: वे अपने दल के साथ जल पीते, चलते, रहते और घूमते हैं। कवि उनसे एकता सीखने को कहते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

साथ निभाना और सहयोग करना समाज की शक्ति है। मतभेद के बीच भी साझा हित पहचानें और अपने समूह से बाहर के लोगों की गरिमा बनाए रखें।

छंद ५३९ दोहा

साधन समय सुसिद्धि लहि उभय मूल अनुकूल। तुलसी तीनिउ समय सम ते महि मंगल मूल ॥
कठिन शब्दार्थ

साधन = प्रयत्न का समय; सुसिद्धि = सफलता; उभय मूल = दोनों के आधार।

सरल हिंदी अर्थ

प्रयत्न करते समय, सफलता मिलने पर और दोनों स्थितियों के आधार में जो समान भाव रखते हैं, वे पृथ्वी पर मंगल के मूल हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

असफलता में धैर्य और सफलता में नम्रता रखें। परिस्थिति से परे स्थिर सद्भाव विश्वसनीय चरित्र बनाता है।

छंद ५४० दोहा

मातु पिता गुरु स्वामि सिख सिर धरि करहिं सुभायँ। लहेउ लाभु तिन्ह जनम कर नतरु जनमु जग जायँ ॥
कठिन शब्दार्थ

सिख = शिक्षा; सिर धरि = आदरपूर्वक स्वीकारकर; जग जायँ = व्यर्थ जाना।

सरल हिंदी अर्थ

जो माता-पिता, गुरु और स्वामी की हितकारी शिक्षा आदर से निभाते हैं, वे जन्म का लाभ पाते हैं; कवि इसके विपरीत जीवन को निष्फल कहते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

कृतज्ञता और सीखने की विनम्रता आवश्यक हैं। शिक्षा को विवेक से समझकर ऐसे अपनाएँ जिससे अपना और दूसरों का कल्याण हो।

छंद ५४१ दोहा

अनुचित उचित बिचारु तजि जे पालहिं पितु बैन। ते भाजन सुख सुजस के बसहिं अमरपति ऐन ॥
कठिन शब्दार्थ

पितु बैन = पिता का वचन; भाजन = पात्र; अमरपति ऐन = इंद्र का निवास।

सरल हिंदी अर्थ

कथा-परंपरा में पिता का वचन निभाने वालों को सुख और यश का अधिकारी तथा स्वर्गवासी बताया गया है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह आज्ञापालन का प्राचीन आदर्श है। वर्तमान व्यवहार में सम्मान के साथ विवेक रखें; हानिकारक या अन्यायपूर्ण आदेश का अंधानुकरण आवश्यक नहीं।

छंद ५४२ सोरठा

सहज अपावनि नारि पति सेवत सुभ गति लहइ। जसु गावत श्रुति चारि अजहुँ तुलसिका हरिहि प्रिय ॥
कठिन शब्दार्थ

सुभ गति = अच्छी आध्यात्मिक दशा; श्रुति = वेद; तुलसिका = तुलसी।

सरल हिंदी अर्थ

पुराने सामाजिक दृष्टिकोण में स्त्री को अपवित्र कहकर पतिसेवा से सद्गति का दावा किया गया है; तुलसी की हरिप्रियता का उदाहरण भी दिया गया है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

मूल पद अपने युग की धारणा रखता है। स्त्री को स्वभाव से अपवित्र मानना उचित नहीं; आज इसका सकारात्मक मनन पारस्परिक निष्ठा और गरिमा में करें।

छंद ५४३ दोहा

सरनागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि। ते नर पावँर पापमय तिन्हहिं बिलोकत हानि ॥
कठिन शब्दार्थ

सरनागत = शरण लेने वाला; अनहित = अपनी हानि; पावँर = अधम।

सरल हिंदी अर्थ

जो अपनी हानि की आशंका से शरण में आए व्यक्ति को छोड़ देते हैं, कवि उन्हें अत्यंत पापमय और निंदनीय कहते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

संकटग्रस्त व्यक्ति की रक्षा करुणा का बड़ा आदर्श है। सहायता करते समय जिम्मेदार उपाय और उपलब्ध सामर्थ्य का ध्यान रखें।

छंद ५४४ दोहा

तुलसी तृन जलकूल को निरबल निपट निकाज। कै राखे कै सँग चलै बाँह गहे की लाज ॥
कठिन शब्दार्थ

जलकूल = नदी का किनारा; निकाज = काम का न होना; बाँह गहे = आश्रय देने पर।

सरल हिंदी अर्थ

नदी किनारे का तिनका निर्बल और अनुपयोगी है, फिर भी नदी उसे किनारे रखती या अपने साथ ले चलती है; आश्रय की लाज निभाती है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

शक्ति का सौंदर्य निर्बल को सहारा देने में है। आश्रित का मूल्य केवल उसकी उपयोगिता से न आँकें।

छंद ५४५ दोहा

रामायन अनुहरत सिख जग भयो भारत रीति। तुलसी सठ की को सुनै कलि कुचालि पर प्रीति ॥
कठिन शब्दार्थ

अनुहरत = अनुसरण करना; भारत रीति = महाभारत के संघर्ष जैसी चाल; सठ = हठी।

सरल हिंदी अर्थ

कवि कहते हैं कि रामायण की शिक्षा छोड़कर जगत संघर्षपूर्ण महाभारत जैसी रीति पर चल पड़ा है; कलियुग की कुचालप्रियता में सीख कौन सुने?

भावार्थ और जीवन-संदेश

दो महाकाव्यों का संकेत मर्यादा और संघर्ष की तुलना के लिए है। परिवार और समाज में न्यायपूर्ण सहयोग को बढ़ाएँ।

छंद ५४६ दोहा

पात पात कै सींचिबो बरी बरी कै लोन। तुलसी खोटें चतुरपन कलि डहके कहु को न ॥
कठिन शब्दार्थ

बरी = पकवान की बड़ियाँ; लोन = नमक; डहके = ठगे गए।

सरल हिंदी अर्थ

एक-एक पत्ते को सींचना या हर बड़ि में अलग नमक भरना उलटी चतुराई है। ऐसी खोटी चतुराई से कलियुग में कौन नहीं ठगता?

भावार्थ और जीवन-संदेश

जड़ और मुख्य कारण सँभालने के बजाय छोटे दिखावटी उपायों में न उलझें। व्यवस्थित काम समय और श्रम बचाता है।

छंद ५४७ दोहा

प्रीति सगाई सकल बिधि बनिज उपायँ अनेक। कल बल छल कलि मल मलिन डहकत एकहि एक ॥
कठिन शब्दार्थ

सगाई = संबंध; बनिज = व्यापार; कल बल छल = युक्ति, दबाव और धोखा।

सरल हिंदी अर्थ

प्रेम, संबंध और व्यापार के अनेक उपाय कलियुग में छल-दबाव से मलिन हो गए हैं; लोग एक-दूसरे को ठगते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

विश्वास का आधार स्पष्ट शर्तें, ईमानदारी और जिम्मेदारी हैं। निकट संबंध में भी छल को सामान्य न मानें।

छंद ५४८ दोहा

दंभ सहित कलि धरम सब छल समेत ब्यवहार। स्वारथ सहित सनेह सब रूचि अनुहरत अचार ॥
कठिन शब्दार्थ

दंभ = दिखावा; रुचि अनुहरत = अपनी पसंद के अनुसार।

सरल हिंदी अर्थ

कवि कलियुग में धर्म के साथ दिखावा, व्यवहार के साथ छल, स्नेह के साथ स्वार्थ और आचार के साथ मनमानी देख रहे हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

धार्मिक पहचान से आगे अपने उद्देश्यों की जाँच करें। प्रेम, व्यवहार और उपासना में निष्कपटता लाएँ।

छंद ५४९ दोहा

चोर चतुर बटमार नट प्रभु प्रिय भँडुआ भंड। सब भच्छक परमारथी कलि सुपंथ पाषंड ॥
कठिन शब्दार्थ

बटमार = लुटेरा; भंड = अश्लील या भद्दा मनोरंजन करने वाला; पाषंड = धार्मिक कपट।

सरल हिंदी अर्थ

कवि के व्यंग्य में चोर चतुर, लुटेरे कलाकार, भाँड शासकों के प्रिय और ढोंगी परमार्थी कहलाते हैं; गलत मार्ग को सही कहा जाता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

जब भाषा से दोषों को गुण का नाम दिया जाए तो वास्तविक कर्म देखें। चमकदार उपाधियाँ नैतिक मूल्यांकन का विकल्प नहीं।

छंद ५५० दोहा

असुभ बेष भूषन धरें भच्छाभच्छ जे खाहीं। तेइ जोगी तेइ सिद्ध नर पूज्य ते कलिजुग माहिं ॥
कठिन शब्दार्थ

असुभ बेष = अशुभ दिखने वाला वेश; भच्छाभच्छ = खाने योग्य-अयोग्य का भेद।

सरल हिंदी अर्थ

कवि कहते हैं कि उलटे युग में विचित्र वेश और निषेधहीन खानपान वाले भी योगी तथा सिद्ध मानकर पूजे जाते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

आलोचना बाहरी प्रदर्शन से सिद्धता मान लेने की है। व्यक्ति की आध्यात्मिकता उसके संयम, करुणा और सत्य से परखें, वेश से नहीं।

छंद ५५१ सोरठा

जे अपकारी चार तिन्ह कर गौरव मान्य तेइ। मन क्रम बचन लबार ते बकता कलिकाल महुँ ॥
कठिन शब्दार्थ

अपकारी = हानि करने वाले; लबार = झूठा; बकता = वक्ता।

सरल हिंदी अर्थ

कलियुग के व्यंग्यचित्र में दूसरों को हानि पहुँचाने वाले सम्मान पाते हैं और मन, कर्म, वचन के झूठे श्रेष्ठ वक्ता कहलाते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

वाक्पटुता के साथ सत्य और आचरण की परीक्षा करें। लोकप्रियता को नैतिकता का प्रमाण न बनाएँ।

छंद ५५२ दोहा

ब्रह्मग्यान बिनु नारि नर कहहिं न दूसरि बात। कौड़ी लागि लोभ बस करहिं बिप्र गुर घात ॥
कठिन शब्दार्थ

ब्रह्मग्यान = परम तत्त्व का ज्ञान; बिप्र = ब्राह्मण; घात = प्रहार या हत्या।

सरल हिंदी अर्थ

लोग ब्रह्मज्ञान के सिवा कोई बात नहीं करते, पर थोड़े धन के लोभ में गुरु और ब्राह्मण पर भी प्रहार कर बैठते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

कवि कथनी-करनी के विरोध को उजागर करते हैं। उच्च विचार तभी सार्थक हैं जब लोभ घटे और हर व्यक्ति की रक्षा व गरिमा बढ़े।

खंड १२ · कलियुग-वर्णन और सीताराम-स्मरण

छंद ५५३–५७३ · युगीन आलोचना, सरल भक्ति और ग्रंथ का मंगल समापन।

छंद ५५३ दोहा

बादहिं सूद्र द्विजन्ह सन हम तुम्ह ते कछु घाटि। जानइ ब्रह्म सो बिप्रबर आँखि देखावहिं डाटि ॥
कठिन शब्दार्थ

बादहिं = विवाद करते हैं; द्विज = पारंपरिक द्विज समुदाय; बिप्रबर = श्रेष्ठ ब्राह्मण।

सरल हिंदी अर्थ

यह पद युगीन जाति-विवाद का चित्र देता है: शूद्र द्विजों से कहते हैं कि हम कम नहीं, ब्रह्म जानने वाला ही श्रेष्ठ ब्राह्मण है, और विवाद बढ़ता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

मूल में सामाजिक पदक्रम का तनाव है। आज इसे किसी जाति की हीनता का आधार न बनाएँ; ज्ञान, संवाद और मानवीय गरिमा सबके लिए समान महत्त्व रखते हैं।

छंद ५५४ दोहा

साखी सबदी दोहरा कहि कहनी उपखान। भगति निरूपहिं भगत कलि निंदहिं बेद पुरान ॥
कठिन शब्दार्थ

साखी सबदी = संत-वाणी के रूप; उपखान = आख्यान; निरूपहिं = समझाते हैं।

सरल हिंदी अर्थ

कवि उन भक्तों की आलोचना करते हैं जो साखी, सबद, दोहे और कथाओं से भक्ति बताते हुए वेद-पुराणों की निंदा करते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह अपने समय के धार्मिक मतभेदों का पद है। अपनी आस्था बताते समय दूसरों की परंपरा का अपमान करने की आवश्यकता नहीं।

छंद ५५५ दोहा

श्रुति संमत हरिभगति पथ संजुत बिरति बिबेक। तेहि परिहरिहिं बिमोह बस कल्पहिं पंथ अनेक ॥
कठिन शब्दार्थ

श्रुति संमत = वेदों से समर्थित; बिरति = वैराग्य; बिमोह = भ्रम।

सरल हिंदी अर्थ

कवि वैराग्य और विवेक से युक्त वेदसम्मत हरिभक्ति का समर्थन करते हैं तथा भ्रम में उससे हटकर अनेक पंथ गढ़ने की आलोचना करते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

कवि का अपना धार्मिक मत यहाँ स्पष्ट है। उसका अध्ययन सम्मान से करें और विविध आस्थाओं के लोगों से भी सौहार्द रखें।

छंद ५५६ दोहा

सकल धरम बिपरीत कलि कल्पित कोटि कुपंथ। पुन्य पराय पहार बन दुरे पुरान सुग्रन्थ ॥
कठिन शब्दार्थ

कुपंथ = कुमार्ग; दुरे = छिप गए; सुग्रन्थ = अच्छे ग्रंथ।

सरल हिंदी अर्थ

कवि कहते हैं कि कलियुग में धर्मविरोधी मार्ग बहुत बढ़ गए और पुण्य, पुराण तथा अच्छे ग्रंथ मानो पर्वतों-वनों में छिप गए हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह सद्ज्ञान की उपेक्षा पर अतिशयोक्ति है। उपयोगी ग्रंथों का अध्ययन करें और उनकी सीख को विवेकपूर्ण कर्म से जोड़ें।

छंद ५५७ दोहा

धातुबाद निरुपाधि बर सद्गुरू लाभ सुमीत। देव दरस कलिकाल में पोथिन दुरे सभीत ॥
कठिन शब्दार्थ

धातुबाद = धातु बदलने की विद्या; निरुपाधि = निष्कपट; सुमीत = अच्छा मित्र।

सरल हिंदी अर्थ

धातु बदलने की विद्या, निष्कपट श्रेष्ठ गुरु, सच्चा मित्र और देवदर्शन—कवि कहते हैं कि कलियुग में ये मानो केवल पुस्तकों में छिप गए हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह दुर्लभता और अविश्वास का काव्यात्मक कथन है। चमत्कारी दावों के बजाय गुरु-मित्र के चरित्र और विश्वसनीयता को परखें।

छंद ५५८ दोहा

सुर सदननि तीरथ पुरिन निपट कुचालि कुसाज। मनहुँ मवा से मारि कलि राजत सहित समाज ॥
कठिन शब्दार्थ

सुर सदन = देवालय; तीरथ पुरि = तीर्थनगर; मवा = दबंग मवासियों जैसा।

सरल हिंदी अर्थ

देवालयों और तीर्थों में भी अनुचित चाल और अव्यवस्था देखकर कवि कहते हैं कि कलियुग मानो वहाँ अधिकार जमाकर बैठा है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

पवित्र स्थान की गरिमा अच्छे आचरण से बनी रहती है। स्वच्छता, ईमानदार प्रबंधन और श्रद्धालुओं के सम्मान को महत्त्व दें।

छंद ५५९ दोहा

गोंड़ गवाँर नृपाल महि जमन महा महिपाल। साम न दान न भेद कलि केवल दंड कराल ॥
कठिन शब्दार्थ

नृपाल = राजा; जमन = यवन का पुराना रूप; साम दान भेद = नीति के उपाय।

सरल हिंदी अर्थ

कवि अपने युग के शासन को ऐसे चित्रित करते हैं जिसमें समझाने, सहयोग और नीति की जगह केवल कठोर दंड रह गया है; पुराने समुदाय-सूचक शब्द भी आते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह ऐतिहासिक राजनीतिक असंतोष का पद है। समुदायों पर सामान्य आरोप न लगाएँ; न्यायपूर्ण शासन में संवाद और समान गरिमा जरूरी हैं।

छंद ५६० दोहा

फोरहिं सिल लोढ़ा सदन लागें अढुक पहार। कायर कूर कुपूत कलि घष घर सहस डहार ॥
कठिन शब्दार्थ

सिल लोढ़ा = पीसने का पत्थर; अढुक पहार = अडिग पहाड़; कूर = क्रूर।

सरल हिंदी अर्थ

कवि कहते हैं कि कायर और क्रूर लोग घर की सिल-लोढ़ी तोड़ते हैं, पर पहाड़ सामने आ जाए तो असहाय हैं; घर में अनेक तरह की हिंसा करते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

कमजोर पर शक्ति दिखाना वीरता नहीं। घरेलू हिंसा और निकटजनों पर अत्याचार रोकना वास्तविक साहस है।

छंद ५६१ दोहा

प्रगट चारि पद धर्म के कलि महुँ एक प्रधान। जेन केन बिधि दीन्हे दान करइ कल्यान ॥
कठिन शब्दार्थ

चारि पद धर्म = धर्म के चार आधार; प्रधान = प्रमुख; जेन केन बिधि = जैसे भी संभव हो।

सरल हिंदी अर्थ

धर्म के चार आधारों में कलियुग में दान को विशेष प्रधानता दी गई है। सामर्थ्य के अनुसार किया दान कल्याणकारी बताया गया है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

दान में ईमानदार साधन और प्राप्तकर्ता की गरिमा रखें। छोटी सहायता भी उपयोगी है; ‘जैसे भी’ को छल से कमाने की अनुमति न समझें।

छंद ५६२ दोहा

कलिजुग सम जुग आन नहिं जौं नर कर बिस्वास। गाइ राम गुन गन बिमल भव तर बिनहिं प्रयास ॥
कठिन शब्दार्थ

बिस्वास = विश्वास; बिमल = निर्मल; भव = संसार-सागर।

सरल हिंदी अर्थ

यदि मनुष्य विश्वास रखे तो कलियुग जैसा अवसर नहीं: राम के निर्मल गुण गाकर सहज भाव से संसार-सागर पार करने की आशा है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

युग की आलोचना के बीच कवि आशा देते हैं। सरल नाम-स्मरण और सदाचरण का मार्ग सबके लिए खुला है।

छंद ५६३ दोहा

श्रवन घटहुँ पुनि दृग घटहुँ घटउ सकल बल देह। इते घटें घटिहै कहा जौं न घटै हरिनेह ॥
कठिन शब्दार्थ

श्रवन = सुनने की शक्ति; दृग = आँख; हरिनेह = भगवान से प्रेम।

सरल हिंदी अर्थ

सुनने की शक्ति, दृष्टि और देह का बल घट जाए, पर यदि हरि का प्रेम न घटे तो साधक का मूल धन सुरक्षित है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

उम्र और बीमारी से क्षमता बदल सकती है, किंतु आत्मीयता और आंतरिक निष्ठा बनी रह सकती है। शरीर की सीमा को आध्यात्मिक हीनता न मानें।

छंद ५६४ दोहा

तुलसी पावस के समय धरी कोकिलन मौन। अब तो दादुर बोलिहैं हमें पूछिहै कौन ॥
कठिन शब्दार्थ

पावस = वर्षा ऋतु; दादुर = मेंढक; कोकिल = कोयल।

सरल हिंदी अर्थ

वर्षा आते ही कोयल मौन हो गई—अब मेंढक बोलेंगे, हमारी सुनने वाला कौन है? कवि इससे उलटे समय की स्थिति दिखाते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

हर वातावरण में शोर के साथ प्रतिस्पर्धा आवश्यक नहीं। अवसर देखकर सार्थक वाणी बोलें और मौन का विवेक रखें।

छंद ५६५ दोहा

कुपथ कुतरक कुचालि कलि कपट दंभ पाषंड। दहन राम गुन ग्राम जिमि ईंधन अनल प्रचंड ॥
कठिन शब्दार्थ

कुतरक = भ्रमित तर्क; पाषंड = कपटपूर्ण धर्म; अनल = आग।

सरल हिंदी अर्थ

कलियुग के कुमार्ग, कुतर्क, कुचाल, कपट और दंभ को राम के गुणों का समूह वैसे जला सकता है जैसे प्रचंड अग्नि ईंधन को।

भावार्थ और जीवन-संदेश

गुणगान का फल तभी दिखता है जब करुणा, सत्य और मर्यादा अपने व्यवहार में आएँ। भीतर की बुराई पर विजय प्राथमिक है।

छंद ५६६ सोरठा

कलि पाषंड प्रचार प्रबल पाप पावँर पतित। तुलसी उभय अधार राम नाम सुरसरि सलिल ॥
कठिन शब्दार्थ

पावँर = अधम आचरण वाला; उभय अधार = दो सहारे; सुरसरि सलिल = गंगाजल।

सरल हिंदी अर्थ

पाखंड और पाप के प्रबल प्रचार वाले समय में कवि अपने दो सहारे बताते हैं—रामनाम और गंगा का जल।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह भक्त का व्यक्तिगत आध्यात्मिक आश्रय है। नाम-स्मरण से आचरण सुधरे और गंगा के प्रति श्रद्धा उसकी स्वच्छता की जिम्मेदारी में बदले।

छंद ५६७ दोहा

रामचंद्र मुख चंद्रमा चित चकोर जब होइ। राम राज सब काज सुभ समय सुहावन सोइ ॥
कठिन शब्दार्थ

चित चकोर = चकोर जैसा चित्त; सुभ = मंगलमय।

सरल हिंदी अर्थ

जब मन चकोर की तरह रामचंद्र के चंद्रमा-समान मुख में लग जाता है, तब रामराज्य, शुभ कार्य और सुहावने समय का अनुभव होता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

प्रेमपूर्ण दृष्टि मन को शांत और कर्म को मंगलमय करती है। यह भक्त की आंतरिक अनुभूति का काव्य-चित्र है।

छंद ५६८ दोहा

बीज राम गुन गन नयन जल अंकुर पुलकालि। सुकृती सुतन सुखेत बर बिलसत तुलसी सालि ॥
कठिन शब्दार्थ

पुलकालि = रोमांच की पंक्ति; सुकृती = सत्कर्मी; सालि = धान।

सरल हिंदी अर्थ

राम के गुण बीज, आँखों का प्रेमजल सिंचाई, रोमांच अंकुर और सत्कर्मी की देह अच्छा खेत है; उसमें तुलसी की धान-रूपी भक्ति लहलहाती है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

श्रवण, संवेदना और सदाचरण मिलकर भक्ति विकसित करते हैं। केवल भावुकता नहीं, जीवन की भूमि भी तैयार करें।

छंद ५६९ दोहा

तुलसी सहित सनेह नित सुमिरहु सीता राम। सगुन सुमंगल सुभ सदा आदि मध्य परिनाम ॥
कठिन शब्दार्थ

सुमिरहु = स्मरण करो; आदि मध्य परिनाम = आरंभ, बीच, अंत।

सरल हिंदी अर्थ

स्नेहपूर्वक नित्य सीताराम का स्मरण करो; कवि उसे आरंभ, मध्य और अंत में शुभ तथा मंगलकारी बताते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

साधना में नियमितता और प्रेम दोनों रखें। दैनिक स्मरण को सत्य, सेवा और अच्छे निर्णय की प्रेरणा बनाएँ।

छंद ५७० दोहा

पुरुषारथ स्वारथ सकल परमारथ परिनाम। सुलभ सिद्धि सब साहिबी सुमिरत सीता राम ॥
कठिन शब्दार्थ

पुरुषारथ = जीवन के उद्देश्य; परमारथ = परम हित; साहिबी = समर्थता।

सरल हिंदी अर्थ

सीताराम के स्मरण से जीवन के प्रयोजन, सांसारिक हित और अंततः परमार्थ की सिद्धि सुलभ होने का भक्तिपूर्ण विश्वास व्यक्त किया गया है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

इसे बिना प्रयास लाभ की गारंटी न मानें। स्मरण से मिली शांति और दिशा को जिम्मेदार परिश्रम में लगाएँ।

छंद ५७१ दोहा

मनिमय दोहा दीप जहँ उर घर प्रगट प्रकास। तहँ न मोह तम भय तमी कलि कज्जली बिलास ॥
कठिन शब्दार्थ

मनिमय = मणि से बने; उर घर = हृदय का घर; तमी = अंधेरी रात।

सरल हिंदी अर्थ

जहाँ हृदय-घर में इन दोहों के मणिमय दीप उजाला करते हैं, वहाँ मोह का अँधेरा, भय की रात और कलियुग की कालिमा नहीं टिकती।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह पूरे ग्रंथ के ज्ञान और भक्ति का रूपक है। पढ़े हुए सूत्रों से भ्रम घटे और विवेक बढ़े, तभी भीतर प्रकाश होता है।

छंद ५७२ दोहा

का भाषा का संसकृत प्रेम चाहिऐ साँच। काम जु आवै कामरी का लै करिअ कुमाच ॥
कठिन शब्दार्थ

संसकृत = संस्कृत; कामरी = साधारण कंबल; कुमाच = कीमती दुशाला।

सरल हिंदी अर्थ

भाषा हो या संस्कृत, आवश्यक सच्चा प्रेम है। काम साधारण कंबल से चल जाए तो कीमती दुशाला लेकर क्या करना?

भावार्थ और जीवन-संदेश

भक्ति की कसौटी भाषा का वैभव नहीं, हृदय की सच्चाई है। सरल जनभाषा में भी गहरा आध्यात्मिक भाव संभव है।

छंद ५७३ दोहा

मनि मानिक महँगे किए सहँगे तृन जल नाज। तुलसी एते जानिऐ राम गरीब नेवाज ॥
कठिन शब्दार्थ

सहँगे = सस्ते और सुलभ; नाज = अन्न; गरीब नेवाज = गरीबों पर कृपा करने वाले।

सरल हिंदी अर्थ

मणि-माणिक महँगे और तृण, जल, अन्न अपेक्षाकृत सुलभ बनाए—तुलसी इसी से राम को गरीबों का हितकारी पहचानते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह आवश्यक जीवन-साधनों की महत्ता का भक्तिपूर्ण निष्कर्ष है। आज इसका आचरण भोजन, पानी और मूल जरूरतों की सबके लिए उपलब्धता बढ़ाने में करें।

इस भाग का मनन

  1. प्रेम में निष्कपटता: संबंध को केवल लाभ और लेन-देन तक सीमित न रखें।
  2. संगति और विवेक: वेश, पद और प्रसिद्धि से अधिक आचरण देखें।
  3. वाणी का संयम: हितकारी सत्य बोलें और व्यर्थ विवाद से बचें।
  4. नेतृत्व में उत्तरदायित्व: संसाधन सबके पोषण में लगें और सच कहने वालों को स्थान मिले।
  5. समता और करुणा: निर्बल की रक्षा तथा हर व्यक्ति की गरिमा को अपने व्यवहार का हिस्सा बनाएँ।
  6. भक्ति में सरलता: भाषा या वैभव से अधिक प्रेम, नियमित स्मरण और सदाचरण को महत्त्व दें।

संपूर्ण दोहावली — दोनों भाग

भागछंदकुल
भाग १ खोलें१–२८८२८८
भाग २ · यह लेख२८९–५७३२८५
संपूर्ण संग्रह१–५७३५७३

सामान्य प्रश्न

क्या यह अंतिम भाग है?

हाँ। भाग १ में छंद १–२८८ और इस भाग में २८९–५७३ हैं। इस दो-भाग योजना में तीसरा भाग आवश्यक नहीं है।

क्या सभी छंदों के अलग अर्थ दिए हैं?

हाँ, सभी २८५ क्रमांकित छंदों के साथ कठिन शब्दार्थ, सरल हिंदी अर्थ और स्वतंत्र भावार्थ दिया गया है।

क्या पुराने सामाजिक कथन आज के नियम हैं?

वे अपने ऐतिहासिक काव्य-संदर्भ में हैं। आधुनिक मनन में समान मानवीय गरिमा, न्याय और करुणा रखें।

दोहा और सोरठा क्यों अलग लिखे हैं?

दोनों छंद-रूप ग्रंथ में आते हैं। संदर्भ-पाठ की पहचान रखते हुए मूल क्रम सुरक्षित रखा गया है।

क्या पाठांतर मिल सकते हैं?

हाँ। अवधी वर्तनी, विराम-चिह्न और कुछ शब्दों में संस्करणभेद संभव हैं। अर्थ सरल अध्ययन के लिए स्वतंत्र रूप से लिखा गया है।

मूल पाठ, संदर्भ और श्रेय

रचनाकार: गोस्वामी तुलसीदास जी। ग्रंथ: दोहावली। प्रचलित ५७३-छंदों वाले क्रम का दूसरा भाग: २८९–५७३। मूल पाठ संस्कृत डॉक्यूमेंट्स के संकलन से और कठिन संदर्भों का चयनित मिलान उपलब्ध क्रमांकित पाठ एवं गीताप्रेस संदर्भ से किया गया है। आधुनिक हिंदी अर्थ और जीवन-संदेश स्वतंत्र व्याख्या हैं।

प्राचीन वर्तनी और कुछ ऑनलाइन पाठ-रूप सुरक्षित रखे गए हैं; उन्हें आज की मानक हिंदी की वर्तनी न समझें। काव्य के प्राकृतिक रूपक वैज्ञानिक विवरण नहीं हैं। चुनिंदा कठिन संदर्भ जाँचे गए हैं; इसे किसी मुद्रित संस्करण का आलोचनात्मक संपादन न समझें।

॥ जय श्री सीताराम ॥

सच्चे प्रेम, हितकारी वाणी, न्याय और निष्कपट भक्ति के साथ दोहावली का यह अध्ययन पूरा होता है। अंतिम छंद की प्रेरणा के अनुरूप जीवन की आवश्यक वस्तुएँ सबके लिए सुलभ बनाने का संकल्प रखें।

संपूर्ण पाठ: भाग १ और भाग २ में कुल ५७३ छंद।

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