श्री विनय पत्रिका भाग 7 — शरणागत-वात्सल्य, रामनाम और दास्य-प्रेम | पद 204–238 हिंदी अर्थ सहित
श्री विनय पत्रिका — भाग ७ : शरणागत-वात्सल्य, रामनाम का भरोसा और दास्य-प्रेम
पद २०४ से २३८ — मूल पाठ, कठिन शब्दार्थ, सरल हिंदी अर्थ एवं विस्तृत भावार्थ
तुलसीदास जी इस भाग में प्रभु श्रीराम को अपने जीवन का परम आश्रय मानकर भक्ति, नाम-स्मरण, दीनों के प्रति करुणा तथा मन के सुधार की विनती करते हैं। निषादराज, जटायु, शबरी, विभीषण, गजेंद्र और द्रौपदी के प्रसंग शरणागत के प्रति ईश्वरीय प्रेम को विशेष रूप से सामने लाते हैं। पूरे ३५ पद मूल क्रम में दिए गए हैं।
कैसे पढ़ें: प्रत्येक पद का मूल काव्य पहले है; फिर कठिन शब्दों के अर्थ, आधुनिक हिंदी में सरल अर्थ और अलग भावार्थ दिया गया है। भावार्थ स्वतंत्र व्याख्या है, मूल पद का अनुवाद मात्र नहीं। पुरानी प्रतियों में वर्तनी और छंद-विराम के पाठांतर मिल सकते हैं।
📖 भाग ७ की विषय-सूची
सीधे पद खोलें
खंड १ — रामचरण में मन लगाना और भक्ति का आचरण
समभाव, संतोष, निर्मल विचार, निष्कपट सेवा और शरणागति का आह्वान।
पद २०४ — जो मन लागै रामचरन अस
द्वंद्व = सुख-दुःख आदि विरोध; गत-मान = अहंकार से रहित; निर्ब्यलीक = छल-कपट रहित; सीसदस = दस सिरों वाला रावण।
कवि कहते हैं कि मन जिस सहजता से शरीर, घर, संतान और धन में रम जाता है, उसी तरह यदि श्रीराम के चरणों में लग जाए तो द्वंद्व, गर्व और विषयों का आकर्षण कम हो सकता है। निःस्वार्थ भाव से सभी प्राणियों का हित करना और प्रेममय भक्ति में स्थिर रहना प्रभु को प्रिय है।
यहाँ भक्ति का अर्थ गृहस्थी का अनादर नहीं, बल्कि उसी सहज एकाग्रता को ईश्वर-स्मरण की ओर मोड़ना है। तुलसी यह भी स्पष्ट करते हैं कि गहरी भक्ति केवल मनुष्य के अहंकारपूर्ण प्रयास से नहीं, प्रभु की कृपा से पुष्ट होती है।
पद २०५ — जो मन भज्यो चहै हरि-सुरतरु
हरि-सुरतरु = इच्छा-पूर्ति करने वाले कल्पवृक्ष के समान हरि; सम = समभाव; परिहरु = छोड़ दो; अग-जग = जड़-जंगम सारा संसार।
यदि मन हरि की उपासना करना चाहता है तो उसे विषय-विकारों को छोड़कर समभाव, संतोष, निर्मल विचार और सत्संग का सहारा लेना चाहिए। काम, क्रोध, लोभ और द्वेष दूर करके कानों से प्रभु की कथा सुननी, मुख से नाम लेना, हृदय में उनका ध्यान रखना और विनम्र सेवा करनी चाहिए।
पद आध्यात्मिक जीवन का बहुत व्यावहारिक मार्ग बताता है। सुनना, कहना, देखना, सोचना और सेवा करना—इन सबको शुभ दिशा में ले जाना ही भक्ति, वैराग्य और ज्ञान की संयुक्त साधना बन जाता है।
पद २०६ — नाहिन और कोउ सरन लायक दूजो श्रीरघुपति सम बिपति-निवारन
सरन = शरण; पतितजन-तारन = गिरे हुए को भी उबारने वाले; द्रुपदसुता = द्रौपदी; बारन = हाथी, यहाँ गजेंद्र।
तुलसी के लिए रघुपति के समान संकट निवारण और शरण देने वाला कोई दूसरा नहीं है। प्रभु भक्त के थोड़े गुण को बड़ा मानते हैं और असंख्य दोषों को क्षमा कर देते हैं। द्रौपदी और गजेंद्र की कथाओं को कवि प्रभु की त्वरित करुणा के उदाहरण के रूप में स्मरण करते हैं।
भक्त का विश्वास अपनी योग्यता से अधिक भगवान के करुणामय स्वभाव पर टिका है। यहाँ 'गुण को पर्वत समान मानना' अनुग्रह की काव्यात्मक अतिशयोक्ति है, जिसके माध्यम से आशा और समर्पण व्यक्त होते हैं।
पद २०७ — भजिबे लायक सुखदायक रघुनायक सरिस सरनप्रद दूजो नाहिन
रघुनायक = श्रीराम; आरत = पीड़ित; सुगति = उत्तम आध्यात्मिक स्थिति; मुनि-मधुकर = भौंरों के समान मुनिजन।
रघुनायक के समान सुख देने वाले और शरण में लेने वाले प्रभु दूसरा कोई नहीं है। वे दुःख का निवारण करते हैं और संकट में पड़े, भयभीत तथा समाज द्वारा उपेक्षित लोगों को भी अपनाते हैं। उनके चरणों का रस श्रेष्ठ मुनिजन भी चाहते हैं।
प्रभु की शरण सबके लिए खुली बताई गई है। कवि अपने ही चंचल मन से पूछते हैं कि ऐसे अनाथों के सहायक भगवान को छोड़कर तू कहाँ भटकेगा? इस प्रश्न में सच्चे भरोसे की पुकार है।
पद २०८ — नाथ सों कौन बिनती कहि सुनावौं
अघ = दोष/पाप; बेष = बाहरी वेश; कपट-दल = छल के पत्ते; बझावौं = फँसाता हूँ; बिरद = प्रतिष्ठित करुणामय स्वभाव।
तुलसी स्वीकारते हैं कि वे भक्ति का सुंदर वेश तो बना लेते हैं, किंतु भीतर कपट, मोह और विषयों का आकर्षण बना रहता है। वे अपने को ज्ञानी और सज्जन दिखाने की प्रवृत्ति पहचानकर कहते हैं—हे नाथ, ऐसी दशा में आपसे क्या विनती करूँ? मुझे अपनी शरण में स्वीकार कर लीजिए।
यह पद आत्म-निरीक्षण का तीखा उदाहरण है। आत्मनिंदा कवि का साहित्यिक विनय-स्वर है; इसका उद्देश्य पाठक को निराश करना नहीं, बल्कि दिखावे की जगह सत्यनिष्ठ आचरण अपनाने की प्रेरणा देना है।
पद २०९ — नाहिनै नाथ अवलंब मोहिं आन की
अवलंब = सहारा; पदत्रान = चरणों की रक्षा/शरण; बासन = वासनाएँ; अमरपुर = देवलोक; गुह = निषादराज।
कवि कहते हैं कि मेरे कर्म, मन और वचन की सीमा आप जानते हैं। क्रोध, मोह और इच्छा से घिरे मन में मेरा स्वतंत्र सामर्थ्य कितना कम है, यह भी मुझे मालूम है। फिर भी आश्रय केवल आपके चरण हैं। गुह, जटायु, गजेंद्र और हनुमान जैसे भक्तों को याद करके वे निराश नहीं होते।
विनय की विशेषता है कि अपनी कमियाँ देखकर भी कृपा की आशा बनी रहती है। पद बाहरी सिद्धियों से अधिक निर्मल भक्ति का महत्व प्रकट करता है और स्वयं की असमर्थता को प्रभु-प्रेम की ओर मोड़ता है।
खंड २ — करुणामय प्रभु का अद्भुत शरणागत-वत्सल स्वभाव
गजेंद्र, द्रौपदी, शबरी, निषादराज, जटायु और विभीषण के माध्यम से कृपा की महिमा।
पद २१० — और कहँ ठौर, रघुबंस-मनि मेरे? पतित-पावन प्रनत-पाल असरन-सरन, बाँकुरे बिरुद
ठौर = स्थान/आश्रय; असरन-सरन = निराश्रितों का आश्रय; अपवर्ग = मोक्ष; बिकल = व्याकुल; खेरे = बसावट/परिवार।
तुलसी पूछते हैं—हे रघुवंश-मणि, आपके अलावा मेरी दूसरी जगह कहाँ है? यदि मेरे दोषों के कारण आप मुख फेर लें तो यह असहाय जीव कहाँ जाएगा? मैं स्वर्ग या मोक्ष की बड़ी उपलब्धियों से अधिक आपके धाम और आपकी कृपा का आश्रय चाहता हूँ।
इस पद का भाव 'अधिकार' नहीं, 'अपनेपन' की विनती है। भक्त प्रभु के सामने साधनहीनता को स्वीकारते हुए उनका घर माँगता है—ऐसा घर जहाँ जटायु और दूसरे शरणागत पहले ही स्थान पा चुके हैं।
पद २११ — कबहुँ रघुबंस-मनि सो कृपा करहुगे? जेहि कृपा ब्याध गज बिप्र खल नर तरे तिन्
रघुबंस-मनि = रघुवंश के रत्न श्रीराम; प्रनतपाल = शरणागत-रक्षक; निरमूल = जड़ से दूर; अमल = निर्मल।
कवि पुकारते हैं कि जिस कृपा से अनेक पतित और पीड़ित उबरे, क्या उसी कृपा से मुझे भी नहीं अपनाएँगे? मेरे विकारों को मिटाकर मुझे शुद्ध और दृढ़ भक्ति प्रदान कीजिए। प्रभु के दयालु स्वभाव पर विश्वास ही उनकी विनती का आधार है।
तुलसी की प्रार्थना केवल कठिनाई दूर करने की नहीं, भीतर के लोभ, अहंकार और मोह को बदलने की भी है। इस प्रकार कृपा का अर्थ जीवन-चरित्र में वास्तविक सुधार बन जाता है।
पद २१२ — रघुपति बिपति-दवन
बिपति-दवन = संकट का विनाश करने वाले; प्रनत-प्रतिपालक = आश्रितों के पालक; पिंगला = भक्ति-कथाओं की पिंगला; गति = उद्धार।
श्रीराम को संकट मिटाने वाले, अत्यंत कृपालु और शरणागतों की रक्षा करने वाले रूप में वंदना की गई है। गजेंद्र, पिंगला और अजामिल जैसे उदाहरण देकर कवि कहते हैं कि ईश्वर की स्मृति जीवन की दिशा बदल सकती है।
पद छोटा है, पर संदेश बड़ा है: किसी की पूर्व भूलें उसके लिए भक्ति का मार्ग सदा के लिए बंद नहीं कर देतीं। प्रभु के नाम से आशा, आत्मबोध और नए जीवन की प्रेरणा मिलती है।
पद २१३ — हरि सम आपदा-हरन
आपदा-हरन = विपत्ति दूर करने वाले; द्रुपदसुता = द्रौपदी; पाहि = रक्षा कीजिए; नृग = राजा नृग।
हरि के समान संकट-सागर से पार कराने वाला दूसरा दयालु नहीं है। गजेंद्र ने अपना बल निष्फल देखकर शरण ली; द्रौपदी ने संकट में हरि को पुकारा। तुलसी इन उदाहरणों में प्रभु की रक्षा और निडरता देने वाली करुणा देखते हैं।
भक्तिपरंपरा की कथाएँ यहाँ संकट में प्रार्थना, भरोसे और विनम्रता का प्रतीक हैं। उनका केंद्रीय संदेश यह है कि असहाय समय में मनुष्य को आशा और धैर्य से खाली नहीं होना चाहिए।
पद २१४ — ऐसी कौन प्रभु की रीति? बिरद हेतु पुनीत परिहरि पाँवरनि पर प्रीति॥ गई मारन
बिरद = स्वभाव से जुड़ी ख्याति; पूतना = कृष्णकथा की पूतना; सिसुपाल = शिशुपाल; ब्याध = शिकारी; पाँवर = तुच्छ समझा गया।
कवि हरि की अद्भुत करुणा का वर्णन करते हैं। पूतना, शिशुपाल और शिकारी से जुड़े पौराणिक प्रसंगों में भी वे इस बात को रेखांकित करते हैं कि ईश्वर के भीतर सामान्य प्रतिशोध से परे अनुग्रह की शक्ति है। तुलसी स्वयं को भी उसी शरण का याचक बताते हैं।
यह विनय-पद केवल दंड और पुरस्कार के सामान्य गणित पर आधारित नहीं है। ईश्वरीय करुणा की सीमा न बाँध पाने का विस्मय इसमें बोलता है। ऐसे प्रसंगों को उनकी धार्मिक-काव्यात्मक परंपरा में समझना उचित है।
पद २१५ — श्री रघुबीर की यह बानि
निषाद = निषादराज गुह; गीध = जटायु; सबरी = शबरी; रजनिचर = राक्षस, यहाँ विभीषण; बानर = वानर समुदाय।
यह पद श्रीराम के दीनवत्सल स्वभाव का अत्यंत सुंदर चित्र है। राम ने निषादराज को हृदय से लगाया, जटायु का पिता-सा सम्मान किया, शबरी के प्रेम से दिए फल स्वीकारे, शरण आए विभीषण को गले लगाया और वानरों को सखा बनाया।
इन प्रसंगों का सामूहिक संदेश है कि सच्ची श्रद्धा, सेवा और प्रेम बाहरी भेदभाव से ऊपर हैं। तुलसी पाठक को मन का कपट त्यागकर ऐसी ही सरल भक्ति अपनाने के लिए कहते हैं।
पद २१६ — हरि तज और भजिये काहि? नाहिनै कोउ राम सो ममता प्रनत पर जाहि॥ कनक-कसिपु बि
कनक-कसिपु = हिरण्यकशिपु; बिरंचि = ब्रह्मा; दस सीस = रावण के दस सिर; प्रनत = विनम्र शरणागत।
कवि अन्य देवताओं की वरदान-कथाओं से तुलना करके श्रीराम की शरणागत-रक्षा को सबसे अधिक भरोसेमंद बताते हैं। हिरण्यकशिपु और रावण के प्रसंगों का उल्लेख करते हुए वे कहते हैं कि शक्ति या वरदान से बढ़कर दीन भक्त के प्रति स्नेह है।
यह तुलसी की अनन्य रामभक्ति की दृष्टि है, किसी अन्य आराधना को अपमानित करने का निर्देश नहीं। पद का भाव भक्त की अपनी निष्ठा और उस कृपालु स्वामी में अडिग विश्वास को व्यक्त करना है।
खंड ३ — प्रभु के द्वार पर दीन विनय एवं करुणा की प्रतीक्षा
अपनेपन की याचना, हनुमान–लक्ष्मण-सहित राम-दरबार की काव्य-छवि और भरोसे की धारा।
पद २१७ — जो पै दूसरो कोउ होइ
पतितपावन = पतितों को पवित्र करने वाला; करीस = हाथी, गजेंद्र; प्रभु पाहि = प्रभु रक्षा कीजिए; कोसलनाथ = श्रीराम।
तुलसी कहते हैं कि यदि आपके समान कोई दूसरा सहारा होता तो मैं बार-बार रोकर विनती क्यों करता? अजामिल, गजेंद्र और द्रौपदी के उद्धार की याद दिलाकर वे प्रभु की दया का गुणगान करते हैं। अंत में वे अपने को उसी करुणा को सौंप देते हैं।
विश्वास जब तर्क की अंतिम सीमा पर पहुँचता है, तब प्रार्थना का रूप लेता है। पद बताता है कि भक्ति में 'तुम ही मेरे अपने हो' का भाव किसी सौदे या शर्त पर नहीं टिका होता।
पद २१८ — कबहि देखाइहौ हरि चरन? समन सकल कलेस कलि-मल, सकल-मंगल-करन॥ सरद-भव सुंदर तर
कलि-मल = कलियुग के दोष; अरुन-बारिज = लाल कमल; अनंग-अरि = कामदेव का शत्रु शिव; प्रनत-आरति-हरन = शरणागत की पीड़ा दूर करने वाले।
कवि भगवान के चरणों के दर्शन की आकांक्षा व्यक्त करते हैं। उन चरणों को वे कमल के समान सुंदर, शुभ और संताप दूर करने वाला मानते हैं। देवी-देवताओं और मुनियों द्वारा वंदित इन्हीं चरणों में सभी जीवों को आश्रय का अनुभव होता है।
'चरण-दर्शन' केवल भौतिक दृश्य नहीं, भीतर विनम्रता, शांति और प्रेम के जागने का भी प्रतीक है। इस पद की कविता में दर्शन की प्यास तथा करुणा की आशा एक साथ चलती हैं।
पद २१९ — द्वार हौं भोर ही को आज
भोर ही को = प्रातःकाल से; गरीब-नेवाज = दीनों पर कृपा करने वाले; दारिद = दरिद्रता; भगति-सुधा = भक्ति का अमृत।
भक्त कहता है—हे प्रभु, मैं सुबह से आपके द्वार पर खड़ा हूँ। सांसारिक अभावों और मन की उलझनों से पीड़ित होकर संतों से पूछने पर आपकी शरण का पता मिला। मैं जन्म-जन्म का भूखा भिखारी हूँ; मुझे भक्ति-अमृत का भरपूर भोजन दीजिए।
यहाँ भूख का अर्थ आत्मा की आध्यात्मिक प्यास है। अपनी गरीबी और कमियों के रूपकों के भीतर तुलसी भक्ति-संपदा की याचना करते हैं—यही पद का मर्म है।
पद २२० — करिय सँभार, कोसलराय! और ठौर, न और गति, अवलंब नाम बिहाय॥ बूझि अपनी आपनौ ह
सँभार = रक्षा/सुधि; साँसति = कष्ट; उरुगाय = महान यश वाले प्रभु; समीर को बीर = पवनपुत्र हनुमान।
इस विस्तृत पद में कवि श्रीराम से अपने दीन सेवक की सुधि लेने की प्रार्थना करते हैं। वे कलियुग के कठिन वातावरण और मन के कपट का वर्णन कर आश्रय माँगते हैं। आगे हनुमान और लक्ष्मण की उपस्थिति वाली एक सुंदर कल्पित भक्तिपूर्ण दरबार-छवि के द्वारा प्रभु का अनुग्रह प्रकट होता है।
पद की नाटकीय रचना में भय से आश्वासन तक की यात्रा है। अंत में संकट के हटने का दृश्य उस आंतरिक विश्वास को रूप देता है कि प्रभु की सभा से निराश लौटना अंतिम सत्य नहीं है।
पद २२१ — नाथ-कृपा ही को पंथ चितवत दीन हौं दिन राति
पंथ चितवत = राह देखते हुए; सु-साधन = अच्छे साधन; कुरीति = बुरी रीति; स्यामघन = श्याम मेघ, यहाँ श्रीराम।
भक्त दिन-रात प्रभु की कृपा की राह देखता है। वह ज्ञान, वैराग्य और भक्ति के आदर्श जानता है, पर अपने दोषों तथा अशांत संसार से व्याकुल है। वह श्याम मेघ समान राम से कहता है—सूखती हुई तुलसी की खेती पर कृपा-वर्षा कीजिए।
'सूखती खेती' का रूपक भक्त के निर्जीव होते मन का मार्मिक चित्र है। भगवान की कृपा उस मन को नया जीवन देने वाली वर्षा बन जाती है।
पद २२२ — बलि जाउँ, और कासों कहौं? सदगुन-सिंधु स्वामि सेवक-हित कहुँ न कृपानिधि सो
सदगुन-सिंधु = गुणों का समुद्र; लोल = चंचल/लालायित; उलूक = उल्लू; राजीव-बिलोचन = कमलनयन।
तुलसी पूछते हैं कि अपने लोभ, संकल्पों और दुखों की बात प्रभु को छोड़कर और किससे कहें। वे मानते हैं कि उनका मन स्वार्थ के पीछे उलझता है, जैसे दिन के प्रकाश से बचता उल्लू अँधेरी कोटर में जा बैठता है। तब वे कमलनयन श्रीराम से अपने जीवन का निर्वाह करने की प्रार्थना करते हैं।
यह पद मनुष्य की आत्मवंचना की पहचान कराता है: हित सामने होते हुए भी आदतें हमें उलटी दिशा में ले जाती हैं। सचाई स्वीकारकर सहायता माँगना बदलाव का आरंभ हो सकता है।
पद २२३ — आपनो कबहुँ करि जानिहौ
गरीब-निवाज = दीनों को सम्मान देने वाला; सील-सिंधु = शील का समुद्र; प्रनत = शरणागत; परिनाम = अंत/फल।
कवि निवेदन करते हैं—प्रभु, कभी तो मुझे अपना मानिए। आप दीनदयालु हैं और शरणागत का पालन करना आपका सहज धर्म है। आपने मुझे अब तक सँभाला है, आगे भी सँभालेंगे; इस विश्वास से मैं अपने जीवन का अंत कल्याणकारी मानता हूँ।
समर्पण का यह स्वर बहुत घरेलू और आत्मीय है। तुलसी कृपा की माँग प्रभु की ख्याति के आधार पर करते हैं, लेकिन उस माँग में विनम्र प्रेम और जीवन-भर का भरोसा है।
खंड ४ — रामनाम में अटल विश्वास और चंचल मन को समझाना
नाम-स्मरण, जीवन के बदलते साधन और श्रीराम की निष्काम कृपा का वर्णन।
पद २२४ — रघुबरहि कबहुँ मन लागिहै? कुपथ, कुचाल, कुमति, कुमनोरथ, कुटिल कपट कब त्याग
कुपथ = गलत रास्ता; गरल = विष; अमिय = अमृत; अनुराग = गहरा स्नेह; सुख-सयन = शांति की निद्रा।
मन से पूछा गया है—तू कब श्रीराम में लगेगा और गलत चाल, छल तथा विकृत इच्छाओं को छोड़ेगा? मोह के कारण तू विष को अमृत और अमृत को विष समझ बैठा है। राम के प्रेम में पगे शब्द गाकर यदि मन जागे तो उसकी जलन दूर होकर शांति मिलेगी।
कविता भक्ति को भावनात्मक सजावट नहीं, दृष्टि-सुधार मानती है। जब सही और गलत की पहचान बदलती है, तभी सच्ची साधना का अवसर आता है।
पद २२५ — भरोसो और आइहै उर ताके
उपल = पत्थर, अहिल्या-प्रसंग; भील = शबरी; खग = जटायु; सुरतरु = कल्पवृक्ष; निसोच = निश्चिंत।
तुलसी का विश्वास है कि राम के समान समर्थ स्वामी उन्हें कहीं नहीं मिल सकता और उनका अपना बल भी पर्याप्त नहीं। वे अहिल्या, शबरी, जटायु आदि के प्रसंगों से देख चुके हैं कि प्रभु का स्नेह साधारण जीवन को बदल देता है। उनके लिए रामनाम कल्पवृक्ष-समान आश्रय है।
पद में निश्चिंतता का सुंदर उदाहरण है—माता-पिता की गोद में सुरक्षित बालक। यहाँ निश्चिंत होना प्रयत्न छोड़ना नहीं, बल्कि कृपा पर भरोसे से भय और अकेलेपन का बोझ हल्का करना है।
पद २२६ — भरोसो जाहि दूसरो सो करो
कल्पतरु = मनोकामना-पूर्ति का वृक्ष; स्वारथ = लौकिक हित; परमारथ = आत्मिक कल्याण; पयोधि = समुद्र; प्रीति-प्रतीति = प्रेम और विश्वास।
कवि कहते हैं कि जिसे किसी और साधन पर भरोसा हो, वह उसे माने; मेरे लिए तो कलियुग में राम का नाम ही कल्पतरु है। वे वेद के कर्म, उपासना और ज्ञानमार्गों का सम्मान करते हुए भी अपने सरल हृदय को नाम-जप का सहारा बताते हैं। रामनाम उनके माता-पिता के समान है।
यहाँ दो अक्षरों वाले 'राम' नाम में व्यक्तिगत आस्था की गहनता है। पद का सौंदर्य उस आत्मीय स्वीकृति में है कि साधक का मार्ग उसके प्रेम, अभ्यास और विश्वास से पुष्ट होता है।
पद २२७ — नाम राम रावरोई हित मेरे
रावरोई = आपका ही; भुज उठाइ = हाथ उठाकर; उदर लगि = पेट भरने के लिए; अवलंब = सहारा।
तुलसी हाथ उठाकर कहते हैं कि प्रभु, आपका नाम ही मेरा लौकिक तथा आध्यात्मिक हित है। वे अपने पूर्व जीवन के संघर्षों को याद कर कहते हैं कि नाम के प्रसाद से उनका जीवन बेहतर दिशा में मुड़ा। अन्य साधक अनेक उपाय करते हैं; मेरे पास नाम का एक ही भरोसा है।
एकाग्र भक्ति को यहाँ 'एक गाँठ' के रूपक से समझाया गया है। कवि उस नाम को ऐसा संबल मानते हैं जो साधारण जीवन के अनुभव को भी अर्थ प्रदान कर सकता है।
पद २२८ — प्रिय रामनाम तें जाहि न रामो
कलिकाल = कलियुग; सुकृतसील भील-भामो = सद्भाव रखने वाली शबरी; बालमीकि = वाल्मीकि; अजामिल = अजामिल।
कवि रामनाम की महिमा बताते हुए कहते हैं कि उसका स्मरण करने वाले सज्जन की रक्षा कठिन परिस्थितियों में भी होती है। शबरी, वाल्मीकि और अजामिल के प्रसंगों में वे नाम और भगवद्-स्मृति की परिवर्तनकारी शक्ति देखते हैं।
नाम को राम से भी अधिक प्रभावकारी कहना भक्ति-काव्य की अतिशयोक्तिपूर्ण प्रेमभाषा है। इसका भाव यही है कि ईश्वर का स्मरण व्यक्ति को बार-बार अच्छे कर्म, विनम्रता और विश्वास की ओर ले जा सकता है।
पद २२९ — गरैगी जीह जो कहौं और को हौं
जानकी-जीवन = श्रीसीता के प्राणप्रिय राम; सुहृद = सच्चा मित्र; ठौर = आश्रय; सीतल = शीतल/शांत।
तुलसी घोषणा करते हैं कि वे स्वयं को राम का ही सेवक मानते हैं। जन्मों से उन्हीं के आश्रित होने का भाव उनके मन में है और वे तीनों लोकों तथा तीनों कालों में उनसे बढ़कर सुहृद नहीं देखते। मन की चंचलता के बावजूद यही संबंध उन्हें शांत रखता है।
पद समर्पण की दृढ़ प्रतिज्ञा है। इसमें कठोर रूपक अपनी निष्ठा की तीव्रता दिखाने के लिए आए हैं; मुख्य संदेश भीतर के सच्चे संबंध को पहचानना और उससे शक्ति पाना है।
पद २३० — अकारन को हितू और को है? बिरद गरीब-निवाज कौन की भौंह जासु जन जोहै?॥ छोटो
अकारन हितू = बिना स्वार्थ भलाई चाहने वाला; गरीब-निवाज = दीनजन का आदरकर्ता; कोल = वनवासी समुदाय; संग्रह्यो = स्वीकार किया।
कवि पूछते हैं—बिना किसी कारण या लाभ के भलाई चाहने वाला आपके सिवा कौन है? संसार में अधिकतर लोग अपना हित देखते हैं, लेकिन श्रीराम ने कोल, वानर और भालुओं तक को स्नेह से अपनाया। तुलसी स्वयं को भी कमियों वाला सेवक कहकर कृपा के योग्य बनाने की प्रार्थना करते हैं।
यहाँ करुणा का माप पद, संपत्ति या प्रतिष्ठा नहीं है। अनुग्रह की इस भावना से समाज में भी असहाय और उपेक्षित लोगों के प्रति आदरपूर्ण व्यवहार की प्रेरणा ली जा सकती है।
खंड ५ — दास्यप्रेम, आत्मचिंतन और सत्संग की सीख
वाणी की शुद्धता, जीवन के मूल्यवान समय और मन के उचित आचरण पर विचार।
पद २३१ — और मोहि को है काहि कहिहौं? रंक-राज ज्यों मन को मनोरथ केहि सुनाइ सुख लहिह
रंक = दरिद्र; फल चारि = धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष; खग-मृग = पक्षी-पशु; पन = प्रतिज्ञा।
तुलसी कहते हैं कि वे अपनी मनोकामना किससे कहें—उनका अपना तो राम ही है। वे चार पुरुषार्थों की प्राप्ति से भी अधिक प्रभु के अपनेपन को चाहते हैं। उनका भाव है कि संसार में किसी भी रूप में रहना पड़े, राम से संबंध बना रहे।
यह दास्य-भक्ति की चरम आत्मीयता दिखाता है। बाहरी पुरस्कार की अपेक्षा संबंध अधिक मूल्यवान हो उठता है और भगवान से केवल इतना वचन माँगा जाता है कि भक्त को हृदय में स्थान दें।
पद २३२ — दीनबंधु दूसरो कहँ पावो? को तुम बिनु पर-पीर पाइहै? केहि दीनता सुनावों?॥ प
दीनबंधु = असहायों का मित्र; गोपद = गाय के खुर जितना जल; किंकर = सेवक; जिय = हृदय।
भक्त कहता है—प्रभु, मेरा दुःख और मेरे मन की दशा आपसे बढ़कर कौन समझ सकता है? मैं बातों से बड़ी उपलब्धियाँ गिनाता हूँ पर कर्म छोटे हैं; कामनाओं में फँसकर भी स्वयं को आपका सेवक कहता हूँ। फिर भी आपके द्वार पर खड़ा होकर छल छोड़ना चाहता हूँ।
वाणी और आचरण के अंतर को पहचानना इस पद का केंद्र है। स्वयं को सही ठहराने के बजाय खुलकर कमियाँ मान लेना ही उस विनय को प्रामाणिक बनाता है।
पद २३३ — मनोरथ मन को एकै भाँति
मनोरथ = मन की इच्छा; परमारथ = परम कल्याण; कुसंगति = बुरी संगति; बाजी ताँति = खेल की डोरी; सुरतरु = कल्पवृक्ष।
मन उत्तम आध्यात्मिक फल तो चाहता है, पर उसके कर्म और संगति उसके विपरीत चलते हैं। तुलसी कहते हैं कि कुसंग और मोह में फँसे रहकर शांति कैसे मिले? संतों और गुरु की सेवा, धर्मग्रंथों का श्रवण और प्रभु के करुणामय स्वभाव का स्मरण ही उचित दिशा दे सकते हैं।
पद इच्छा और कर्म के बीच की दूरी पर प्रकाश डालता है। सुंदर लक्ष्य केवल चाहने से नहीं, दिन-प्रतिदिन के चुनाव सुधारने से पास आता है।
पद २३४ — जनम गयो बादिहिं बर बीति
बादिहिं = व्यर्थ; लरिकपन = बाल्यावस्था; बड़ि बय = वृद्धावस्था; इरषा = ईर्ष्या; परमारथ = आत्मिक जीवन का श्रेष्ठ लक्ष्य।
कवि व्यथित होकर कहते हैं कि बचपन खेल में, युवावस्था आकर्षणों में और वृद्धावस्था रोग, शोक तथा थकान में बीत गई। ईर्ष्या, क्रोध और मोह के कारण सत्संग तथा प्रभु के गुणगान में मन न लगा। अब वे करुणामय प्रभु से अपने बचे हुए जीवन को सार्थक बनाने की विनती करते हैं।
यह समय का स्मरण कराने वाला पद है, न कि किसी आयु को छोटा दिखाने वाला कथन। इसकी प्रेरणा है—जब भी चेतना जागे, उसी क्षण से भले कार्य और साधना शुरू किए जा सकते हैं।
पद २३५ — ऐसेहि जनम-समूह सिराने
जनम-समूह = अनेक जन्म; चरन बिराने = दूसरों के चरण; मलीन = अशुद्ध; चिंतामनि = चिंताओं का निवारण करने वाली दिव्य मणि, यहाँ प्रभु-आश्रय।
कवि कहते हैं कि अनेक जन्म इधर-उधर के आश्रयों को श्रेष्ठ मानते बीत गए। दूसरों की प्रशंसा और सांसारिक उपायों में सुख खोजने पर भी मन स्थिर नहीं हो पाया। अब वे पहचानते हैं कि अंतर की चिंता का समाधान प्रभु-सम्बंध में है।
पद बाहरी दुनिया का त्याग करने की आज्ञा नहीं देता; इसका जोर चंचल आशाओं से परे स्थिरता खोजने पर है। चिंतामणि का रूपक उस स्थायी आध्यात्मिक शांति की आकांक्षा को दिखाता है।
पद २३६ — जो पै जिय जानकी-नाथ न जाने
जानकी-नाथ = श्रीराम; श्रमदायक = थकाने वाला; पातक-पुंज = पापों का समूह; रेनु = धूलकण; अयाने = अज्ञानी।
कवि कहते हैं कि सीतापति की करुणा को पहचाने बिना अनेक साधन मात्र बाहरी परिश्रम बन सकते हैं। उन्हें वह प्रभु प्रिय है जो शरणागत के बड़े दोष दूर समझते हैं और छोटे गुण भी हृदय में रखते हैं। तुलसी अपने मन को अन्य भ्रम छोड़कर उसी का भजन करने को कहते हैं।
ईश्वर के गुणों पर ध्यान मन में विनम्रता और विश्वास पैदा करता है। इस पद का उद्देश्य कर्म और धर्म का निरादर नहीं, बल्कि उनमें प्रेम, सत्य और निष्कपट भाव का महत्व याद कराना है।
पद २३७ — काहे न रसना रामहि गावहि? निसि दिन पर-अपवाद बृथा कत रटि-रटि राग बढ़ावहि॥
रसना = जीभ; पर-अपवाद = दूसरों की निंदा; जातरूप = सोना; रबिकुल-सरोज-रबि = सूर्यवंश-कमल के सूर्य श्रीराम; भव = संसार।
कवि अपनी जिह्वा को समझाते हैं—तू दिन-रात दूसरों की निंदा में समय क्यों गँवाती है? यह वाणी पवित्र मंदिर जैसी है; इसे प्रभु के गुणगान, मधुर और सार्थक शब्दों में लगाना चाहिए। सुंदर शब्दों की माला बनाकर श्रीराम को अर्पित कर।
पद हमें वाणी की जिम्मेदारी याद दिलाता है। जो ऊर्जा विवाद, कटुता और निंदा में खर्च होती है, उसे शुभ चर्चा, आत्मोन्नति, प्रार्थना और दूसरों के प्रोत्साहन में लगाया जा सकता है।
पद २३८ — आपनो हित रावरे सों जो पै सूझै
रावरे = आपके; कबंध = रामकथा का सिर-विहीन कबंध; निज अवगुन = अपने दोष; रूझै = रमे/रुके; रहनि-कहनि = आचरण और कथन।
तुलसी कहते हैं—यदि अपना कल्याण समझते हो, तो सिर होते हुए भी कबंध जैसा विवेकहीन व्यवहार क्यों करते हो? अपने दोष और प्रभु के गुणों को पहचानो, मन-बुद्धि को राम में लगाओ। कवि मानते हैं कि उनकी कहनी, करनी और समझ का पूरा हाल कृपालु भगवान ही जानते हैं।
भाग के अंत में आत्मबोध की सशक्त पुकार है। दूसरे को दोष देने से पहले अपने भीतर झाँकना, वाणी और व्यवहार में एकता लाना तथा प्रभु की कृपा पर विनम्र भरोसा रखना—यही साधना का सार बनता है।
भाग ७ से मिलने वाली पाँच जीवन-शिक्षाएँ
१. भक्ति का आधार निष्कपट व्यवहार है
समभाव, संतोष, सत्संग और करुणा के बिना उपासना अधूरी है—पद २०४–२०५ का यही मुख्य संदेश है।
२. अपने दोष पहचानकर भी आशा बनाए रखें
कवि स्वयं की कमी स्वीकारते हैं लेकिन प्रभु की करुणा पर भरोसा नहीं छोड़ते। आत्मसमीक्षा के साथ आत्मविश्वास बने रहना आवश्यक है।
३. श्रीराम की शरण सबके लिए खुली है
गुह, जटायु, शबरी, विभीषण और वानरों के प्रति राम का स्नेह मनुष्यता, आदर और करुणा की सीख देता है।
४. नाम-स्मरण मन की दिशा बदलने का साधन है
पद २२५–२२८ रामनाम में विश्वास, स्मृति और जीवन को अधिक विनम्र बनाने का संदेश देते हैं।
५. जीवन और वाणी दोनों की साधना करें
पद २३४–२३८ समय का महत्व, व्यर्थ विवाद से बचना और प्रभु-गुणों का स्मरण करना सिखाते हैं।
प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री विनय पत्रिका भाग ७ में कितने पद हैं?
पद २०४ से २३८ तक कुल ३५ पद हैं। प्रत्येक के साथ कठिन शब्दार्थ, सरल हिंदी अर्थ और स्वतंत्र भावार्थ प्रस्तुत है।
भाग ७ में श्रीराम के करुणा-प्रसंग कौन से आते हैं?
विशेष रूप से निषादराज गुह, जटायु, शबरी, विभीषण, गजेंद्र और द्रौपदी के प्रसंगों का उल्लेख आता है।
विनय पत्रिका के कुल कितने पद हैं?
प्रचलित संपूर्ण पाठ में २७९ पद माने जाते हैं। यह श्रृंखला प्रथम परिचय लेख के बाद उन्हें सात बड़े पाठ-भागों में प्रस्तुत कर रही है।
भाग ८ में किन पदों का पाठ होगा?
अंतिम भाग ८ में पद २३९ से २७९ तक कुल ४१ पद रखे जाएँगे।
सीताराम, सीताराम, जय जय सीताराम!
इस अध्याय में आत्मस्वीकार, शरणागतों के प्रति प्रभु की करुणा और रामनाम की साधना के अनेक पद पढ़े। इसे अपने परिवार और अध्ययन-संग में साझा कर सकते हैं।
पिछला भाग: विनय पत्रिका भाग ६ — पद १७१–२०३

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