श्री विनय पत्रिका भाग 7 — शरणागत-वात्सल्य, रामनाम और दास्य-प्रेम | पद 204–238 हिंदी अर्थ सहित

भक्ति भावना प्रस्तुत • संत साहित्य एवं भक्ति ग्रंथ संग्रह
गोस्वामी तुलसीदास कृत • विनय पत्रिका पाठ श्रृंखला
भाग ७ • संपूर्ण पद २०४–२३८

श्री विनय पत्रिका — भाग ७ : शरणागत-वात्सल्य, रामनाम का भरोसा और दास्य-प्रेम

पद २०४ से २३८ — मूल पाठ, कठिन शब्दार्थ, सरल हिंदी अर्थ एवं विस्तृत भावार्थ

तुलसीदास जी इस भाग में प्रभु श्रीराम को अपने जीवन का परम आश्रय मानकर भक्ति, नाम-स्मरण, दीनों के प्रति करुणा तथा मन के सुधार की विनती करते हैं। निषादराज, जटायु, शबरी, विभीषण, गजेंद्र और द्रौपदी के प्रसंग शरणागत के प्रति ईश्वरीय प्रेम को विशेष रूप से सामने लाते हैं। पूरे ३५ पद मूल क्रम में दिए गए हैं।

पद २०४–२३८संपूर्ण ३५ पद५ विषय खंडबिना चित्र • मोबाइल-अनुकूल
विनय पत्रिका की कुल २७९ पदों की पारंपरिक गणना के अनुसार यह भाग २०४–२३८ को प्रस्तुत करता है। श्रृंखला का अंतिम भाग ८ : पद २३९–२७९ आगे प्रकाशित होगा।

कैसे पढ़ें: प्रत्येक पद का मूल काव्य पहले है; फिर कठिन शब्दों के अर्थ, आधुनिक हिंदी में सरल अर्थ और अलग भावार्थ दिया गया है। भावार्थ स्वतंत्र व्याख्या है, मूल पद का अनुवाद मात्र नहीं। पुरानी प्रतियों में वर्तनी और छंद-विराम के पाठांतर मिल सकते हैं।

📖 भाग ७ की विषय-सूची

सीधे पद खोलें

पद २०४ — जो मन लागै रामचरन अस पद २०५ — जो मन भज्यो चहै हरि-सुरतरु पद २०६ — नाहिन और कोउ सरन लायक दूजो श्रीरघुपति सम बिपति-निवारन पद २०७ — भजिबे लायक सुखदायक रघुनायक सरिस सरनप्रद दूजो नाहिन पद २०८ — नाथ सों कौन बिनती कहि सुनावौं पद २०९ — नाहिनै नाथ अवलंब मोहिं आन की पद २१० — और कहँ ठौर, रघुबंस-मनि मेरे? पतित-पावन प्रनत-पाल असरन-सरन, बाँ… पद २११ — कबहुँ रघुबंस-मनि सो कृपा करहुगे? जेहि कृपा ब्याध गज बिप्र खल न… पद २१२ — रघुपति बिपति-दवन पद २१३ — हरि सम आपदा-हरन पद २१४ — ऐसी कौन प्रभु की रीति? बिरद हेतु पुनीत परिहरि पाँवरनि पर प्रीत… पद २१५ — श्री रघुबीर की यह बानि पद २१६ — हरि तज और भजिये काहि? नाहिनै कोउ राम सो ममता प्रनत पर जाहि पद २१७ — जो पै दूसरो कोउ होइ पद २१८ — कबहि देखाइहौ हरि चरन? समन सकल कलेस कलि-मल, सकल-मंगल-करन पद २१९ — द्वार हौं भोर ही को आज पद २२० — करिय सँभार, कोसलराय! और ठौर, न और गति, अवलंब नाम बिहाय पद २२१ — नाथ-कृपा ही को पंथ चितवत दीन हौं दिन राति पद २२२ — बलि जाउँ, और कासों कहौं? सदगुन-सिंधु स्वामि सेवक-हित कहुँ न कृ… पद २२३ — आपनो कबहुँ करि जानिहौ पद २२४ — रघुबरहि कबहुँ मन लागिहै? कुपथ, कुचाल, कुमति, कुमनोरथ, कुटिल कप… पद २२५ — भरोसो और आइहै उर ताके पद २२६ — भरोसो जाहि दूसरो सो करो पद २२७ — नाम राम रावरोई हित मेरे पद २२८ — प्रिय रामनाम तें जाहि न रामो पद २२९ — गरैगी जीह जो कहौं और को हौं पद २३० — अकारन को हितू और को है? बिरद गरीब-निवाज कौन की भौंह जासु जन जो… पद २३१ — और मोहि को है काहि कहिहौं? रंक-राज ज्यों मन को मनोरथ केहि सुना… पद २३२ — दीनबंधु दूसरो कहँ पावो? को तुम बिनु पर-पीर पाइहै? केहि दीनता स… पद २३३ — मनोरथ मन को एकै भाँति पद २३४ — जनम गयो बादिहिं बर बीति पद २३५ — ऐसेहि जनम-समूह सिराने पद २३६ — जो पै जिय जानकी-नाथ न जाने पद २३७ — काहे न रसना रामहि गावहि? निसि दिन पर-अपवाद बृथा कत रटि-रटि राग… पद २३८ — आपनो हित रावरे सों जो पै सूझै

खंड १ — रामचरण में मन लगाना और भक्ति का आचरण

समभाव, संतोष, निर्मल विचार, निष्कपट सेवा और शरणागति का आह्वान।

पद २०४ — जो मन लागै रामचरन अस

जो मन लागै रामचरन अस। देह, गेह, सुत, बित, कलत्र महँ मगन होत बिनु जतन किए जस॥ द्वंद्व-रहित, गत-मान, ज्ञानरत, बिषय-बिरत खटाइ नाना कस। सुखनिधान सुजान कोसलपति ह्वै प्रसन्न कहु, क्यों न होंहि बस?॥ सर्व भूत-हित निर्ब्यलीक चित भगति प्रेम दृढ़ नेम एक-रस। तुलसिदास यह होइ तबहिं जब द्रवै ईस जेहि हतो सीसदस॥
कठिन शब्दार्थ

द्वंद्व = सुख-दुःख आदि विरोध; गत-मान = अहंकार से रहित; निर्ब्यलीक = छल-कपट रहित; सीसदस = दस सिरों वाला रावण।

सरल हिंदी अर्थ

कवि कहते हैं कि मन जिस सहजता से शरीर, घर, संतान और धन में रम जाता है, उसी तरह यदि श्रीराम के चरणों में लग जाए तो द्वंद्व, गर्व और विषयों का आकर्षण कम हो सकता है। निःस्वार्थ भाव से सभी प्राणियों का हित करना और प्रेममय भक्ति में स्थिर रहना प्रभु को प्रिय है।

विस्तृत भावार्थ एवं संदेश

यहाँ भक्ति का अर्थ गृहस्थी का अनादर नहीं, बल्कि उसी सहज एकाग्रता को ईश्वर-स्मरण की ओर मोड़ना है। तुलसी यह भी स्पष्ट करते हैं कि गहरी भक्ति केवल मनुष्य के अहंकारपूर्ण प्रयास से नहीं, प्रभु की कृपा से पुष्ट होती है।

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पद २०५ — जो मन भज्यो चहै हरि-सुरतरु

जो मन भज्यो चहै हरि-सुरतरु। तौ तज बिषय-बिकार सार भजु, अजहूँ जो मैं कहौं सोइ करु॥ सम, संतोष, बिचार बिमल अति, सतसंगति, ए चारि दृढ़ करि धरु। काम क्रोध अरु लोभ मोह मद राग द्वेष निसेष करि परिहरु॥ स्रवन कथा, मुख नाम, हृदय हरि, सिर प्रनाम, सेवा कर अनुसरु। नयनन निरखि कृपा-समुद्र हरि अग-जग-रूप भूप सीताबरु॥ इहै भगति, बैराग्य-ज्ञान यह हरि-तोषन यह सुभ ब्रत आचरु। तुलसिदास सिव-मत मारग यहि चलत सदा सपनेहुँ नाहिन डरु॥
कठिन शब्दार्थ

हरि-सुरतरु = इच्छा-पूर्ति करने वाले कल्पवृक्ष के समान हरि; सम = समभाव; परिहरु = छोड़ दो; अग-जग = जड़-जंगम सारा संसार।

सरल हिंदी अर्थ

यदि मन हरि की उपासना करना चाहता है तो उसे विषय-विकारों को छोड़कर समभाव, संतोष, निर्मल विचार और सत्संग का सहारा लेना चाहिए। काम, क्रोध, लोभ और द्वेष दूर करके कानों से प्रभु की कथा सुननी, मुख से नाम लेना, हृदय में उनका ध्यान रखना और विनम्र सेवा करनी चाहिए।

विस्तृत भावार्थ एवं संदेश

पद आध्यात्मिक जीवन का बहुत व्यावहारिक मार्ग बताता है। सुनना, कहना, देखना, सोचना और सेवा करना—इन सबको शुभ दिशा में ले जाना ही भक्ति, वैराग्य और ज्ञान की संयुक्त साधना बन जाता है।

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पद २०६ — नाहिन और कोउ सरन लायक दूजो श्रीरघुपति सम बिपति-निवारन

नाहिन और कोउ सरन लायक दूजो श्रीरघुपति सम बिपति-निवारन। काको सहज सुभाउ सेवक-बस, काहि प्रनत पर प्रीति अकारन?॥ जन-गुन अलप गनत सुमेरु करि, अवगुन कोटि बिलोकि बिसारन। परम कृपालु, भगत-चिंतामनि बिरद पुनीत पतितजन-तारन॥ सुमिरत सुलभ, दास दुख सुनि हरि चलत तुरत पट पीत सँभारन। साखि पुरान-निगम अगम सब, जानत द्रुपद-सुता अरु बारन॥ जाको जस गावत कबि-कोबिद, जिन्हके लोभ मोह मद मारन। तुलसिदास तजि आस सकल भजु कोसलपति मुनिबधू-उधारन॥
कठिन शब्दार्थ

सरन = शरण; पतितजन-तारन = गिरे हुए को भी उबारने वाले; द्रुपदसुता = द्रौपदी; बारन = हाथी, यहाँ गजेंद्र।

सरल हिंदी अर्थ

तुलसी के लिए रघुपति के समान संकट निवारण और शरण देने वाला कोई दूसरा नहीं है। प्रभु भक्त के थोड़े गुण को बड़ा मानते हैं और असंख्य दोषों को क्षमा कर देते हैं। द्रौपदी और गजेंद्र की कथाओं को कवि प्रभु की त्वरित करुणा के उदाहरण के रूप में स्मरण करते हैं।

विस्तृत भावार्थ एवं संदेश

भक्त का विश्वास अपनी योग्यता से अधिक भगवान के करुणामय स्वभाव पर टिका है। यहाँ 'गुण को पर्वत समान मानना' अनुग्रह की काव्यात्मक अतिशयोक्ति है, जिसके माध्यम से आशा और समर्पण व्यक्त होते हैं।

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पद २०७ — भजिबे लायक सुखदायक रघुनायक सरिस सरनप्रद दूजो नाहिन

भजिबे लायक सुखदायक रघुनायक सरिस सरनप्रद दूजो नाहिन। आनँदभवन दुखदवन सोकसमन रमारमन गुन गनत सिराहिं न॥ आरत अधम कुजाति कुटिल खल पतित सभीत कहुँ जे समाहिं न। सुमिरत नाम बिबस हू बारक पावत सो पद जहाँ सुर जाहिं न॥ जाके पद-कमल लुब्ध मुनि-मधुकर बिरत जे परम सुगतिहु लुभाहिं न। तुलसिदास सठ तेहि न भजसि कस कारुनिक जो अनाथहिं दाहिन॥
कठिन शब्दार्थ

रघुनायक = श्रीराम; आरत = पीड़ित; सुगति = उत्तम आध्यात्मिक स्थिति; मुनि-मधुकर = भौंरों के समान मुनिजन।

सरल हिंदी अर्थ

रघुनायक के समान सुख देने वाले और शरण में लेने वाले प्रभु दूसरा कोई नहीं है। वे दुःख का निवारण करते हैं और संकट में पड़े, भयभीत तथा समाज द्वारा उपेक्षित लोगों को भी अपनाते हैं। उनके चरणों का रस श्रेष्ठ मुनिजन भी चाहते हैं।

विस्तृत भावार्थ एवं संदेश

प्रभु की शरण सबके लिए खुली बताई गई है। कवि अपने ही चंचल मन से पूछते हैं कि ऐसे अनाथों के सहायक भगवान को छोड़कर तू कहाँ भटकेगा? इस प्रश्न में सच्चे भरोसे की पुकार है।

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पद २०८ — नाथ सों कौन बिनती कहि सुनावौं

नाथ सों कौन बिनती कहि सुनावौं। बिबिध अनगनित अवलोकि अघ आपने सरन सनमुख होत सकुचि सिर नावौं॥ बिरचि हरिभगति को बेष बर टाटिका, कपट-दल हरित पल्लवनि छावौं। नाम-लगि लाइ, लासा-ललित-बचन कहि, ब्याध ज्यों बिषय-बिहँगनि बझावौं॥ कुटिल सत कोटि मेरे रोम पर वारियहि, साधु-गनती में पहलेहि गनावौं। परम बर्बर खर्ब-गर्ब-पर्बत चढ़्यो, अज्ञ सर्बज्ञ जन-मनि जनावौं॥ साँच किधौं झूठ मोको कहत कोउ कोउ राम रावरो हौंहुँ तुम्हरो कहावौं। बिरद की लाज करि दास तुलसिहिं, देव! लेहु अपनाइ अब देहु जनि बावौ॥
कठिन शब्दार्थ

अघ = दोष/पाप; बेष = बाहरी वेश; कपट-दल = छल के पत्ते; बझावौं = फँसाता हूँ; बिरद = प्रतिष्ठित करुणामय स्वभाव।

सरल हिंदी अर्थ

तुलसी स्वीकारते हैं कि वे भक्ति का सुंदर वेश तो बना लेते हैं, किंतु भीतर कपट, मोह और विषयों का आकर्षण बना रहता है। वे अपने को ज्ञानी और सज्जन दिखाने की प्रवृत्ति पहचानकर कहते हैं—हे नाथ, ऐसी दशा में आपसे क्या विनती करूँ? मुझे अपनी शरण में स्वीकार कर लीजिए।

विस्तृत भावार्थ एवं संदेश

यह पद आत्म-निरीक्षण का तीखा उदाहरण है। आत्मनिंदा कवि का साहित्यिक विनय-स्वर है; इसका उद्देश्य पाठक को निराश करना नहीं, बल्कि दिखावे की जगह सत्यनिष्ठ आचरण अपनाने की प्रेरणा देना है।

↑ विषय-सूची  ·  पद २०८ / २३८

पद २०९ — नाहिनै नाथ अवलंब मोहिं आन की

नाहिनै नाथ अवलंब मोहिं आन की। करम-मन-बचन पन सत्य, करुनानिधे! एक गति राम भवदीय पदत्रान की॥ कोह मद मोह ममतायतन जानि मन, बात नहि जाति कहि ज्ञान-बिज्ञान की। काम-संकल्प उर निरखि बहु बासनहिं, आस नहिं एक हू आँक निरबान की॥ बेद-बोधित करम धरम बिनु, अगम अति जदपि, जिय लालसा अमरपुर जान की। सिद्ध सुर मनुज दनुजादि सेवत कठिन द्रवहिं हठजोग दिए भोग बलि प्रान की॥ भगति दुरलभ परम, संभु सुक मुनि मधुप, प्यास पदकंज-मकरंद-मधुपान की। पतित-पावन सुनत नाम बिस्रामकृत भ्रमित पुनि समझि चित ग्रंथि अभिमान की॥ नरक-अधिकार मम घोर संसार-तम-कूपकहीं, भूप! मोहि सक्ति आपान की। दासतुलसी सोउ त्रास नहि गनत मन, सुमिरि गुह गीध गज ज्ञाति हनुमान की॥
कठिन शब्दार्थ

अवलंब = सहारा; पदत्रान = चरणों की रक्षा/शरण; बासन = वासनाएँ; अमरपुर = देवलोक; गुह = निषादराज।

सरल हिंदी अर्थ

कवि कहते हैं कि मेरे कर्म, मन और वचन की सीमा आप जानते हैं। क्रोध, मोह और इच्छा से घिरे मन में मेरा स्वतंत्र सामर्थ्य कितना कम है, यह भी मुझे मालूम है। फिर भी आश्रय केवल आपके चरण हैं। गुह, जटायु, गजेंद्र और हनुमान जैसे भक्तों को याद करके वे निराश नहीं होते।

विस्तृत भावार्थ एवं संदेश

विनय की विशेषता है कि अपनी कमियाँ देखकर भी कृपा की आशा बनी रहती है। पद बाहरी सिद्धियों से अधिक निर्मल भक्ति का महत्व प्रकट करता है और स्वयं की असमर्थता को प्रभु-प्रेम की ओर मोड़ता है।

↑ विषय-सूची  ·  पद २०९ / २३८

खंड २ — करुणामय प्रभु का अद्भुत शरणागत-वत्सल स्वभाव

गजेंद्र, द्रौपदी, शबरी, निषादराज, जटायु और विभीषण के माध्यम से कृपा की महिमा।

पद २१० — और कहँ ठौर, रघुबंस-मनि मेरे? पतित-पावन प्रनत-पाल असरन-सरन, बाँकुरे बिरुद

और कहँ ठौर, रघुबंस-मनि मेरे? पतित-पावन प्रनत-पाल असरन-सरन, बाँकुरे बिरुद बिरुदैत केहि केरे॥ समुझि जिय दोष अति रोष करि राम कै, करत नहिं कान बिनती बदन फेरे। तदपि ह्वै निडर हौं कहौं, करुना-सिंधु! क्योंऽब रहि जात सुनि बात बिनु हेरे॥ मुख्य रुचि बसिबे की पुर रावरे, राम तेहि रुचिहि कामादि गन घेरे। अगम अपवर्ग, अरु स्वर्ग सुकृतैक फल, नाम-बल क्यों बसौं जम-नगर नेरे?॥ कतहुँ नहिं ठाउँ कहँ जाउँ, कोसलनाथ! दीन बितहीन हौं बिकल बिनु डेरे। दास तुलसिहि बास देहु अब करि कृपा, बसत गज गीध ब्याधादि जेहि खेरे॥
कठिन शब्दार्थ

ठौर = स्थान/आश्रय; असरन-सरन = निराश्रितों का आश्रय; अपवर्ग = मोक्ष; बिकल = व्याकुल; खेरे = बसावट/परिवार।

सरल हिंदी अर्थ

तुलसी पूछते हैं—हे रघुवंश-मणि, आपके अलावा मेरी दूसरी जगह कहाँ है? यदि मेरे दोषों के कारण आप मुख फेर लें तो यह असहाय जीव कहाँ जाएगा? मैं स्वर्ग या मोक्ष की बड़ी उपलब्धियों से अधिक आपके धाम और आपकी कृपा का आश्रय चाहता हूँ।

विस्तृत भावार्थ एवं संदेश

इस पद का भाव 'अधिकार' नहीं, 'अपनेपन' की विनती है। भक्त प्रभु के सामने साधनहीनता को स्वीकारते हुए उनका घर माँगता है—ऐसा घर जहाँ जटायु और दूसरे शरणागत पहले ही स्थान पा चुके हैं।

↑ विषय-सूची  ·  पद २१० / २३८

पद २११ — कबहुँ रघुबंस-मनि सो कृपा करहुगे? जेहि कृपा ब्याध गज बिप्र खल नर तरे तिन्

कबहुँ रघुबंस-मनि सो कृपा करहुगे? जेहि कृपा ब्याध गज बिप्र खल नर तरे तिन्हहि सम मानि मोहि नाथ उद्धरहुगे॥ जोनि बहु जनमि किए करम खल बिबिध बिधि, अधम आचरन कछु हृदय नहि धरहुगे। दीनहित अजित सर्बज्ञ समरथ प्रनतपाल, चित मृदुल निज गुननि अनुसरहुगे॥ मोह मद मान कामादि खल-मंडली, सकुल निरमूल करि दुसह दुख हरहुगे। जोग जप ज्ञान बिज्ञान तें अधिक अति, अमल दृढ़ भगति दै परम सुख भरहुगे॥ मंदजन-मौलि-मनि सकल साधनहीन, कुटिल मन, मलिन-जिय जानि जो डरहुगे। दासतुलसी बेद-बिदित बिरुदावली, बिमल जस नाथ केहि भाँति बिस्तरहुगे?॥
कठिन शब्दार्थ

रघुबंस-मनि = रघुवंश के रत्न श्रीराम; प्रनतपाल = शरणागत-रक्षक; निरमूल = जड़ से दूर; अमल = निर्मल।

सरल हिंदी अर्थ

कवि पुकारते हैं कि जिस कृपा से अनेक पतित और पीड़ित उबरे, क्या उसी कृपा से मुझे भी नहीं अपनाएँगे? मेरे विकारों को मिटाकर मुझे शुद्ध और दृढ़ भक्ति प्रदान कीजिए। प्रभु के दयालु स्वभाव पर विश्वास ही उनकी विनती का आधार है।

विस्तृत भावार्थ एवं संदेश

तुलसी की प्रार्थना केवल कठिनाई दूर करने की नहीं, भीतर के लोभ, अहंकार और मोह को बदलने की भी है। इस प्रकार कृपा का अर्थ जीवन-चरित्र में वास्तविक सुधार बन जाता है।

↑ विषय-सूची  ·  पद २११ / २३८

पद २१२ — रघुपति बिपति-दवन

रघुपति बिपति-दवन। परम कृपालु प्रनत-प्रतिपालक पतित-पावन॥ कूर कुटिल कुलहीन दीन अति मलिन जवन। सुमिरत नाम राम पठए सब अपने भवन॥ गज पिंगला अजामिल से खल गनै धौं कवन। तुलसिदास प्रभु केहि न दीन्हि गति जानकी-रवन॥
कठिन शब्दार्थ

बिपति-दवन = संकट का विनाश करने वाले; प्रनत-प्रतिपालक = आश्रितों के पालक; पिंगला = भक्ति-कथाओं की पिंगला; गति = उद्धार।

सरल हिंदी अर्थ

श्रीराम को संकट मिटाने वाले, अत्यंत कृपालु और शरणागतों की रक्षा करने वाले रूप में वंदना की गई है। गजेंद्र, पिंगला और अजामिल जैसे उदाहरण देकर कवि कहते हैं कि ईश्वर की स्मृति जीवन की दिशा बदल सकती है।

विस्तृत भावार्थ एवं संदेश

पद छोटा है, पर संदेश बड़ा है: किसी की पूर्व भूलें उसके लिए भक्ति का मार्ग सदा के लिए बंद नहीं कर देतीं। प्रभु के नाम से आशा, आत्मबोध और नए जीवन की प्रेरणा मिलती है।

↑ विषय-सूची  ·  पद २१२ / २३८

पद २१३ — हरि सम आपदा-हरन

हरि सम आपदा-हरन। नहि कोउ सहज कृपालु दुसह दुख-सागर-तरन॥ गज निज बल अवलोकि कमल गहि गयो सरन। दीन बचन सुनि चले गरुड़ तजि सुनाभ-धरन॥ द्रुपदसुता को लग्यो दुसासन नगन करन। ‘हा हरि पाहि’ कहत पूरे पट बिबिध बरन॥ इहे जानि सुर नर मुनि कोबिद सेवत चरन। तुलसिदास प्रभु को न अभय कियो नृग-उद्धरन॥
कठिन शब्दार्थ

आपदा-हरन = विपत्ति दूर करने वाले; द्रुपदसुता = द्रौपदी; पाहि = रक्षा कीजिए; नृग = राजा नृग।

सरल हिंदी अर्थ

हरि के समान संकट-सागर से पार कराने वाला दूसरा दयालु नहीं है। गजेंद्र ने अपना बल निष्फल देखकर शरण ली; द्रौपदी ने संकट में हरि को पुकारा। तुलसी इन उदाहरणों में प्रभु की रक्षा और निडरता देने वाली करुणा देखते हैं।

विस्तृत भावार्थ एवं संदेश

भक्तिपरंपरा की कथाएँ यहाँ संकट में प्रार्थना, भरोसे और विनम्रता का प्रतीक हैं। उनका केंद्रीय संदेश यह है कि असहाय समय में मनुष्य को आशा और धैर्य से खाली नहीं होना चाहिए।

↑ विषय-सूची  ·  पद २१३ / २३८

पद २१४ — ऐसी कौन प्रभु की रीति? बिरद हेतु पुनीत परिहरि पाँवरनि पर प्रीति॥ गई मारन

ऐसी कौन प्रभु की रीति? बिरद हेतु पुनीत परिहरि पाँवरनि पर प्रीति॥ गई मारन पूतना कुच कालकूट लगाई। मातु की गति दई ताहि कृपालु जादवराइ॥ काम-मोहित गोपिकनि पर कृपा अतुलित कीन्ह। जगत-पिता बिरंचि जिन्हके चरनकी रज लीन्ह॥ नेम तें सिसुपाल दिन प्रति देत गनि गनि गारि। कियो लीन सु आप में हरि राज-सभा मँझारि॥ ब्याध चित दै चरन मार्यो मूढ़मति मृग जानि। सो सदेह सुलोक पठयो प्रगट करि निज बानि॥ कौन तिन्हकी कहै जिन्हके सुकृत अरु अघ दोउ। प्रगट पातक-रूप तुलसी सरन राख्यो सोउ॥
कठिन शब्दार्थ

बिरद = स्वभाव से जुड़ी ख्याति; पूतना = कृष्णकथा की पूतना; सिसुपाल = शिशुपाल; ब्याध = शिकारी; पाँवर = तुच्छ समझा गया।

सरल हिंदी अर्थ

कवि हरि की अद्भुत करुणा का वर्णन करते हैं। पूतना, शिशुपाल और शिकारी से जुड़े पौराणिक प्रसंगों में भी वे इस बात को रेखांकित करते हैं कि ईश्वर के भीतर सामान्य प्रतिशोध से परे अनुग्रह की शक्ति है। तुलसी स्वयं को भी उसी शरण का याचक बताते हैं।

विस्तृत भावार्थ एवं संदेश

यह विनय-पद केवल दंड और पुरस्कार के सामान्य गणित पर आधारित नहीं है। ईश्वरीय करुणा की सीमा न बाँध पाने का विस्मय इसमें बोलता है। ऐसे प्रसंगों को उनकी धार्मिक-काव्यात्मक परंपरा में समझना उचित है।

↑ विषय-सूची  ·  पद २१४ / २३८

पद २१५ — श्री रघुबीर की यह बानि

श्री रघुबीर की यह बानि। नीचहूँ सों करत नेह सुप्रीति मन अनुमानि॥ परम अधम निषाद पाँवर, कौन ताकी कानि? लियो सो उर लाइ सुत ज्यौं प्रेम को पहिचानि॥ गीध कौन दयालु जो बिधि रच्यो हिंसा सानि? जनक ज्यों रघुनाथ ता कहँ दियो जल निज पानि॥ प्रकृति-मलिन कुजाति सबरी सकल अवगुन-खानि। खात ताके दिए फल अति रुचि बखानि बखानि॥ रजनिचर अरु रिपु बिभीषन सरन आयो जानि। भरत ज्यों उठि ताहि भेंटत देह-दसा भुलानि॥ कौन सुभग सुसील बानर जिनहिं सुमिरत हानि। किए ते सब सखा, पूजे भवन अपने आनि॥ राम सहज कृपालु कोमल दीनहित दिन दानि। भजहि ऐसे प्रभुहि तुलसी कुटिल कपट न ठानि॥
कठिन शब्दार्थ

निषाद = निषादराज गुह; गीध = जटायु; सबरी = शबरी; रजनिचर = राक्षस, यहाँ विभीषण; बानर = वानर समुदाय।

सरल हिंदी अर्थ

यह पद श्रीराम के दीनवत्सल स्वभाव का अत्यंत सुंदर चित्र है। राम ने निषादराज को हृदय से लगाया, जटायु का पिता-सा सम्मान किया, शबरी के प्रेम से दिए फल स्वीकारे, शरण आए विभीषण को गले लगाया और वानरों को सखा बनाया।

विस्तृत भावार्थ एवं संदेश

इन प्रसंगों का सामूहिक संदेश है कि सच्ची श्रद्धा, सेवा और प्रेम बाहरी भेदभाव से ऊपर हैं। तुलसी पाठक को मन का कपट त्यागकर ऐसी ही सरल भक्ति अपनाने के लिए कहते हैं।

↑ विषय-सूची  ·  पद २१५ / २३८

पद २१६ — हरि तज और भजिये काहि? नाहिनै कोउ राम सो ममता प्रनत पर जाहि॥ कनक-कसिपु बि

हरि तज और भजिये काहि? नाहिनै कोउ राम सो ममता प्रनत पर जाहि॥ कनक-कसिपु बिरंचि को जन करम मन अरु बात। सुतहिं दुखवत बिधि न बरज्यो काल के घर जात॥ संभु-सेवक जान जग, बहु बार दिए दस सीस। करत राम-बिरोध सो सपनेहु न हटक्यो ईस॥ और देवन की कहा कहौं, स्वारथहि के मीत। कबहुँ काहु न राख लियो कोउ सरन गयउ सभीत॥ को न सेवत देत संपति? लोक हू यह रीति। दास तुलसी दीन पर एक राम ही की प्रीति॥
कठिन शब्दार्थ

कनक-कसिपु = हिरण्यकशिपु; बिरंचि = ब्रह्मा; दस सीस = रावण के दस सिर; प्रनत = विनम्र शरणागत।

सरल हिंदी अर्थ

कवि अन्य देवताओं की वरदान-कथाओं से तुलना करके श्रीराम की शरणागत-रक्षा को सबसे अधिक भरोसेमंद बताते हैं। हिरण्यकशिपु और रावण के प्रसंगों का उल्लेख करते हुए वे कहते हैं कि शक्ति या वरदान से बढ़कर दीन भक्त के प्रति स्नेह है।

विस्तृत भावार्थ एवं संदेश

यह तुलसी की अनन्य रामभक्ति की दृष्टि है, किसी अन्य आराधना को अपमानित करने का निर्देश नहीं। पद का भाव भक्त की अपनी निष्ठा और उस कृपालु स्वामी में अडिग विश्वास को व्यक्त करना है।

↑ विषय-सूची  ·  पद २१६ / २३८

खंड ३ — प्रभु के द्वार पर दीन विनय एवं करुणा की प्रतीक्षा

अपनेपन की याचना, हनुमान–लक्ष्मण-सहित राम-दरबार की काव्य-छवि और भरोसे की धारा।

पद २१७ — जो पै दूसरो कोउ होइ

जो पै दूसरो कोउ होइ। तौ हौं बारहि बार प्रभु कत दुख सुनावौं रोइ॥ काहि ममता दीन पर, को पतितपावन नाम? पापमूल अजामिलहि केहि दियो अपनो धाम?॥ रहे संभु बिरंचि सुरपति लोकपाल अनेक। सोक-सरि बूड़त करीसहि दई काहु न टेक॥ बिपुल भूपति-सदसि मह नर-नारि कह्यो ‘प्रभु पाहि’। सकल समरथ रहे काहु न बसन दीन्हों ताहि॥ एक मुख क्यों कहौं करुनासिंधु के गुन-गाथ? भगतहित धरि देह काह न कियो कोसलनाथ॥ आप से कहुँ सौंपिये मोहि जो पै अतिहि घिनात। दासतुलसी और बिधि क्यों चरन परिहरि जात?॥
कठिन शब्दार्थ

पतितपावन = पतितों को पवित्र करने वाला; करीस = हाथी, गजेंद्र; प्रभु पाहि = प्रभु रक्षा कीजिए; कोसलनाथ = श्रीराम।

सरल हिंदी अर्थ

तुलसी कहते हैं कि यदि आपके समान कोई दूसरा सहारा होता तो मैं बार-बार रोकर विनती क्यों करता? अजामिल, गजेंद्र और द्रौपदी के उद्धार की याद दिलाकर वे प्रभु की दया का गुणगान करते हैं। अंत में वे अपने को उसी करुणा को सौंप देते हैं।

विस्तृत भावार्थ एवं संदेश

विश्वास जब तर्क की अंतिम सीमा पर पहुँचता है, तब प्रार्थना का रूप लेता है। पद बताता है कि भक्ति में 'तुम ही मेरे अपने हो' का भाव किसी सौदे या शर्त पर नहीं टिका होता।

↑ विषय-सूची  ·  पद २१७ / २३८

पद २१८ — कबहि देखाइहौ हरि चरन? समन सकल कलेस कलि-मल, सकल-मंगल-करन॥ सरद-भव सुंदर तर

कबहि देखाइहौ हरि चरन? समन सकल कलेस कलि-मल, सकल-मंगल-करन॥ सरद-भव सुंदर तरुनतर अरुन-बारिज-बरन। लच्छि लालित ललित करतल छबि अनूपम धरन॥ गंग-जनक, अनंग-अरि-प्रिय, कपट बटु बलि-छरन। बिप्रतिय, नृग, बधिक के दुख दोष दारुन दरन॥ सिद्ध-सुर-मुनि-बृंद-बंदित सुखद सब कहँ सरन। सकृत उर आनत जिनहिं जन होत तारन-तरन॥ कृपासिंधु सुजान रघुबर प्रनत-आरति-हरन। दरस-आस-पियास तुलसीदास चाहत मरन॥
कठिन शब्दार्थ

कलि-मल = कलियुग के दोष; अरुन-बारिज = लाल कमल; अनंग-अरि = कामदेव का शत्रु शिव; प्रनत-आरति-हरन = शरणागत की पीड़ा दूर करने वाले।

सरल हिंदी अर्थ

कवि भगवान के चरणों के दर्शन की आकांक्षा व्यक्त करते हैं। उन चरणों को वे कमल के समान सुंदर, शुभ और संताप दूर करने वाला मानते हैं। देवी-देवताओं और मुनियों द्वारा वंदित इन्हीं चरणों में सभी जीवों को आश्रय का अनुभव होता है।

विस्तृत भावार्थ एवं संदेश

'चरण-दर्शन' केवल भौतिक दृश्य नहीं, भीतर विनम्रता, शांति और प्रेम के जागने का भी प्रतीक है। इस पद की कविता में दर्शन की प्यास तथा करुणा की आशा एक साथ चलती हैं।

↑ विषय-सूची  ·  पद २१८ / २३८

पद २१९ — द्वार हौं भोर ही को आज

द्वार हौं भोर ही को आज। रटत रिरिहा आरि और न कौर ही तें काज॥ कलि कराल दुकाल दारुन सब कुभाँति कुसाज। नीच जन, मन ऊँच जैसी कोढ़ में की खाज॥ हहरि हिय मैं सदय बूझ्यो जाइ साधु-समाज। मोहुँ से कहुँ कतहुँ कोउ तिन्ह कह्यो कोसलराज॥ दीनता दारिद दलै को कृपा-बारिधि बाज। दानि दसरथ राय के तुम बानइत सिरताज॥ जनम को भूखो भिखारी हौं गरीब-नेवाज। पेट भरि तुलसिहिं जेंवाइय भगति-सुधा सुनाज॥
कठिन शब्दार्थ

भोर ही को = प्रातःकाल से; गरीब-नेवाज = दीनों पर कृपा करने वाले; दारिद = दरिद्रता; भगति-सुधा = भक्ति का अमृत।

सरल हिंदी अर्थ

भक्त कहता है—हे प्रभु, मैं सुबह से आपके द्वार पर खड़ा हूँ। सांसारिक अभावों और मन की उलझनों से पीड़ित होकर संतों से पूछने पर आपकी शरण का पता मिला। मैं जन्म-जन्म का भूखा भिखारी हूँ; मुझे भक्ति-अमृत का भरपूर भोजन दीजिए।

विस्तृत भावार्थ एवं संदेश

यहाँ भूख का अर्थ आत्मा की आध्यात्मिक प्यास है। अपनी गरीबी और कमियों के रूपकों के भीतर तुलसी भक्ति-संपदा की याचना करते हैं—यही पद का मर्म है।

↑ विषय-सूची  ·  पद २१९ / २३८

पद २२० — करिय सँभार, कोसलराय! और ठौर, न और गति, अवलंब नाम बिहाय॥ बूझि अपनी आपनौ ह

करिय सँभार, कोसलराय! और ठौर, न और गति, अवलंब नाम बिहाय॥ बूझि अपनी आपनौ हित आप बाप न माय। राम राउर नाम गुरु सुर स्वामि सखा सहाय॥ रामराज न चले मानस-मलिन के छल-छाय। कोप तेहि कलिकाल कायर मुएहि घायल घाय॥ लेत के हरि को बयर ज्यों भैक हनि गोमाय। त्योंहि राम-गुलाम जानि निकाम देत कुदाय॥ अकनि याके कपट-करतब, अमित अनय-अपाय। सुखि हरिपुर बसत होत परीछितहि पछिताय॥ कृपासिंधु बिलोकिए जन-मन की साँसति साय। सरन आयो, देव दीनदयालु! देखन पाय॥ निकट बोलि न बरजिए, बलि जाउँ हनिय न हाय। देखिहैं हनुमान गोमुख नाहरनि के न्याय॥ अरुन मुख भ्रू बिकट, पिंगल नयन रोष कषाय। बीर सुमिरि समीर को घटिहै चपल चित चाय॥ बिनय सुनि बिहँसे अनुज सों बचन केहि कहि भाय। भली कही कह्यो लषन हूँ हँसि, बने सकल बनाय॥ दई दीनहिं दादि सो सुनि सुजन-सदन बधाय। मिटे संकट सोच पोच प्रपंच पाप-निकाय॥ पेखि प्रीति प्रतीति जन पर अगुन अनघ अमाय। दास तुलसी कहत मुनिगन, ‘जयति जय उरुगाय’॥
कठिन शब्दार्थ

सँभार = रक्षा/सुधि; साँसति = कष्ट; उरुगाय = महान यश वाले प्रभु; समीर को बीर = पवनपुत्र हनुमान।

सरल हिंदी अर्थ

इस विस्तृत पद में कवि श्रीराम से अपने दीन सेवक की सुधि लेने की प्रार्थना करते हैं। वे कलियुग के कठिन वातावरण और मन के कपट का वर्णन कर आश्रय माँगते हैं। आगे हनुमान और लक्ष्मण की उपस्थिति वाली एक सुंदर कल्पित भक्तिपूर्ण दरबार-छवि के द्वारा प्रभु का अनुग्रह प्रकट होता है।

विस्तृत भावार्थ एवं संदेश

पद की नाटकीय रचना में भय से आश्वासन तक की यात्रा है। अंत में संकट के हटने का दृश्य उस आंतरिक विश्वास को रूप देता है कि प्रभु की सभा से निराश लौटना अंतिम सत्य नहीं है।

↑ विषय-सूची  ·  पद २२० / २३८

पद २२१ — नाथ-कृपा ही को पंथ चितवत दीन हौं दिन राति

नाथ-कृपा ही को पंथ चितवत दीन हौं दिन राति। होइ धौं केहि काल दीनदयालु जानि न जाति॥ सुगुन, ज्ञान, बिराग, भगति सु-साधननि की पाँति। भजे बिकल बिलोकि कलि अघ-अवगुननि की थाति॥ अति अनीति कुरीति भइ भुइँ तरनि हूँ तें ताति। जाउँ कहँ बलि जाउँ? कहूँ न ठाउँ मति अकुलाति॥ आप सहित न आपनो कोउ, बाप! कठिन कुभाँति। स्यामघन सींचिये तुलसी सालि सफल सुखाति॥
कठिन शब्दार्थ

पंथ चितवत = राह देखते हुए; सु-साधन = अच्छे साधन; कुरीति = बुरी रीति; स्यामघन = श्याम मेघ, यहाँ श्रीराम।

सरल हिंदी अर्थ

भक्त दिन-रात प्रभु की कृपा की राह देखता है। वह ज्ञान, वैराग्य और भक्ति के आदर्श जानता है, पर अपने दोषों तथा अशांत संसार से व्याकुल है। वह श्याम मेघ समान राम से कहता है—सूखती हुई तुलसी की खेती पर कृपा-वर्षा कीजिए।

विस्तृत भावार्थ एवं संदेश

'सूखती खेती' का रूपक भक्त के निर्जीव होते मन का मार्मिक चित्र है। भगवान की कृपा उस मन को नया जीवन देने वाली वर्षा बन जाती है।

↑ विषय-सूची  ·  पद २२१ / २३८

पद २२२ — बलि जाउँ, और कासों कहौं? सदगुन-सिंधु स्वामि सेवक-हित कहुँ न कृपानिधि सो

बलि जाउँ, और कासों कहौं? सदगुन-सिंधु स्वामि सेवक-हित कहुँ न कृपानिधि सो लहौं॥ जहँ जहँ लोभ लोल लालचबस निजहित चित चाहनि चहौं। तहँ तहँ तरनि तकत उलूक ज्यों भटकि कुतरु-कोटर गहौं॥ काल सुभाव करम बिचित्र फलदायक सुनि सिर धुनि रहौं। मोको तौ सकल सदा एकहि रस दुसह दाह दारुन दहौं॥ उचित अनाथ होइ दुखभाजन, भयो नाथ किंकर न हौं। अब रावरो कहाइ न बूझिये सरनपाल साँसति सहौं॥ महाराज राजीव-बिलोचन मगन-पाप संताप हौं। तुलसी-प्रभु जब तब जेहि तेहि बिधि राम निरबहौं॥
कठिन शब्दार्थ

सदगुन-सिंधु = गुणों का समुद्र; लोल = चंचल/लालायित; उलूक = उल्लू; राजीव-बिलोचन = कमलनयन।

सरल हिंदी अर्थ

तुलसी पूछते हैं कि अपने लोभ, संकल्पों और दुखों की बात प्रभु को छोड़कर और किससे कहें। वे मानते हैं कि उनका मन स्वार्थ के पीछे उलझता है, जैसे दिन के प्रकाश से बचता उल्लू अँधेरी कोटर में जा बैठता है। तब वे कमलनयन श्रीराम से अपने जीवन का निर्वाह करने की प्रार्थना करते हैं।

विस्तृत भावार्थ एवं संदेश

यह पद मनुष्य की आत्मवंचना की पहचान कराता है: हित सामने होते हुए भी आदतें हमें उलटी दिशा में ले जाती हैं। सचाई स्वीकारकर सहायता माँगना बदलाव का आरंभ हो सकता है।

↑ विषय-सूची  ·  पद २२२ / २३८

पद २२३ — आपनो कबहुँ करि जानिहौ

आपनो कबहुँ करि जानिहौ। राम गरीब-निवाज राजमनि बिरद-लाज उर आनिहौ॥ सील सिंधु सुंदर सब लायक समरथ सदगुन-खानि हौ। पाल्यो है, पालत, पालहुगे प्रभु प्रनत प्रेम पहिचानिहौ॥ बेद पुरान कहत, जग जानत, दीनदयालु दिन दानि हौ। कहि आवत, बलि जाऊँ, मनहुँ मेरी बार बिसारे बानि हौ॥ आरत दीन अनाथनि के हित मानत लौकिक कानि हौ। है परिनाम भलो तुलसी को सरनागत-भय भानिहौ॥
कठिन शब्दार्थ

गरीब-निवाज = दीनों को सम्मान देने वाला; सील-सिंधु = शील का समुद्र; प्रनत = शरणागत; परिनाम = अंत/फल।

सरल हिंदी अर्थ

कवि निवेदन करते हैं—प्रभु, कभी तो मुझे अपना मानिए। आप दीनदयालु हैं और शरणागत का पालन करना आपका सहज धर्म है। आपने मुझे अब तक सँभाला है, आगे भी सँभालेंगे; इस विश्वास से मैं अपने जीवन का अंत कल्याणकारी मानता हूँ।

विस्तृत भावार्थ एवं संदेश

समर्पण का यह स्वर बहुत घरेलू और आत्मीय है। तुलसी कृपा की माँग प्रभु की ख्याति के आधार पर करते हैं, लेकिन उस माँग में विनम्र प्रेम और जीवन-भर का भरोसा है।

↑ विषय-सूची  ·  पद २२३ / २३८

खंड ४ — रामनाम में अटल विश्वास और चंचल मन को समझाना

नाम-स्मरण, जीवन के बदलते साधन और श्रीराम की निष्काम कृपा का वर्णन।

पद २२४ — रघुबरहि कबहुँ मन लागिहै? कुपथ, कुचाल, कुमति, कुमनोरथ, कुटिल कपट कब त्याग

रघुबरहि कबहुँ मन लागिहै? कुपथ, कुचाल, कुमति, कुमनोरथ, कुटिल कपट कब त्यागिहै?॥ जानत गरल अमिय बिमोहबस, अमिय गनत करि आगिहै। उलटी रीति प्रीति अपने की तजि प्रभुपद अनुरागिहै॥ आखर अरथ मंजु मृदु मोदक राम-प्रेम-पगि पागिहै। ऐसे गुन गाइ रिझाइ स्वामि सों पाइहै जो मुँह माँगिहै॥ तू यहि बिधि सुख-सयन सोइहै जिय की जरनि भूरि भागिहै। राम-प्रसाद दासतुलसी-उर राम-भगति-जोग जागिहै॥
कठिन शब्दार्थ

कुपथ = गलत रास्ता; गरल = विष; अमिय = अमृत; अनुराग = गहरा स्नेह; सुख-सयन = शांति की निद्रा।

सरल हिंदी अर्थ

मन से पूछा गया है—तू कब श्रीराम में लगेगा और गलत चाल, छल तथा विकृत इच्छाओं को छोड़ेगा? मोह के कारण तू विष को अमृत और अमृत को विष समझ बैठा है। राम के प्रेम में पगे शब्द गाकर यदि मन जागे तो उसकी जलन दूर होकर शांति मिलेगी।

विस्तृत भावार्थ एवं संदेश

कविता भक्ति को भावनात्मक सजावट नहीं, दृष्टि-सुधार मानती है। जब सही और गलत की पहचान बदलती है, तभी सच्ची साधना का अवसर आता है।

↑ विषय-सूची  ·  पद २२४ / २३८

पद २२५ — भरोसो और आइहै उर ताके

भरोसो और आइहै उर ताके। कै कहुँ लहै जो रामहि सो साहिब, कै अपनो बल जाके॥ के कलिकाल कराल न सूझत मोह-मार-मद छाके। कै सुनि स्वामि-सुभाउ न रह्यो चित जो हित सब अँग थाके॥ हौं जानत भलि भाँति अपनपौ, प्रभु सो सुन्यो न साके। उपल, भील, खग, मृग, रजनीचर भले भए करतब काके?॥ मोको भलो राम-नाम सुरतरु सो रामप्रसाद कृपालु कृपा के। तुलसी सुखी निसोच राज ज्यों बालक माय बबा के॥
कठिन शब्दार्थ

उपल = पत्थर, अहिल्या-प्रसंग; भील = शबरी; खग = जटायु; सुरतरु = कल्पवृक्ष; निसोच = निश्चिंत।

सरल हिंदी अर्थ

तुलसी का विश्वास है कि राम के समान समर्थ स्वामी उन्हें कहीं नहीं मिल सकता और उनका अपना बल भी पर्याप्त नहीं। वे अहिल्या, शबरी, जटायु आदि के प्रसंगों से देख चुके हैं कि प्रभु का स्नेह साधारण जीवन को बदल देता है। उनके लिए रामनाम कल्पवृक्ष-समान आश्रय है।

विस्तृत भावार्थ एवं संदेश

पद में निश्चिंतता का सुंदर उदाहरण है—माता-पिता की गोद में सुरक्षित बालक। यहाँ निश्चिंत होना प्रयत्न छोड़ना नहीं, बल्कि कृपा पर भरोसे से भय और अकेलेपन का बोझ हल्का करना है।

↑ विषय-सूची  ·  पद २२५ / २३८

पद २२६ — भरोसो जाहि दूसरो सो करो

भरोसो जाहि दूसरो सो करो। मोको तो राम को नाम कल्पतरु कलि कल्यान फरो॥ करम, उपासन, ज्ञान बेदमत सो सब भाँति खरो। मोहि तो सावन के अंधहि ज्यों सूझत रंग हरों॥ चाटत रह्यो स्वान पातरि ज्यों कबहुँ न पेट भरो। सो हौं सुमिरत नाम सुधारस पेखत फरुसि धरो॥ स्वारथ औ परमारथ हू को नहि कुंजरौ नरो। सुनियत सेतु पयोधि पषाननि करि कपि कटक तरो॥ प्रीति-प्रतीति जहाँ जाकी तहँ ताको काज सरो। मेरे तो माय-बाप दोउ आखर हौं सिसु-अरनि अरो॥ संकर साखि जो राखि कहौं कछु तौ जरि जीह गरो। अपनो भलो राम नामहि ते तुलसिहि समुझि परो॥
कठिन शब्दार्थ

कल्पतरु = मनोकामना-पूर्ति का वृक्ष; स्वारथ = लौकिक हित; परमारथ = आत्मिक कल्याण; पयोधि = समुद्र; प्रीति-प्रतीति = प्रेम और विश्वास।

सरल हिंदी अर्थ

कवि कहते हैं कि जिसे किसी और साधन पर भरोसा हो, वह उसे माने; मेरे लिए तो कलियुग में राम का नाम ही कल्पतरु है। वे वेद के कर्म, उपासना और ज्ञानमार्गों का सम्मान करते हुए भी अपने सरल हृदय को नाम-जप का सहारा बताते हैं। रामनाम उनके माता-पिता के समान है।

विस्तृत भावार्थ एवं संदेश

यहाँ दो अक्षरों वाले 'राम' नाम में व्यक्तिगत आस्था की गहनता है। पद का सौंदर्य उस आत्मीय स्वीकृति में है कि साधक का मार्ग उसके प्रेम, अभ्यास और विश्वास से पुष्ट होता है।

↑ विषय-सूची  ·  पद २२६ / २३८

पद २२७ — नाम राम रावरोई हित मेरे

नाम राम रावरोई हित मेरे। स्वारथ परमारथ साथिन्ह सों भुज उठाइ कहौं टेरे॥ जननी जनक तज्यो जनमि, करम बिनु बिधिहु सृज्यो अवडेरे। मोहुँ से कोउ कोउ कहत रामहि को सो प्रसंग केहि केरे?॥ फिर्यौ ललात बिनु नाम उदर लगि, दुखउ दुखित मोहि हेरे। नाम-प्रसाद लहत रसाल फल अब हौं बबुर बहेरे॥ साधत साधु लोक परलोकहि, मुनि गुनि जतन घनेरे। तुलसी के अवलंब नाम को एक गाँठि कई फेरे॥
कठिन शब्दार्थ

रावरोई = आपका ही; भुज उठाइ = हाथ उठाकर; उदर लगि = पेट भरने के लिए; अवलंब = सहारा।

सरल हिंदी अर्थ

तुलसी हाथ उठाकर कहते हैं कि प्रभु, आपका नाम ही मेरा लौकिक तथा आध्यात्मिक हित है। वे अपने पूर्व जीवन के संघर्षों को याद कर कहते हैं कि नाम के प्रसाद से उनका जीवन बेहतर दिशा में मुड़ा। अन्य साधक अनेक उपाय करते हैं; मेरे पास नाम का एक ही भरोसा है।

विस्तृत भावार्थ एवं संदेश

एकाग्र भक्ति को यहाँ 'एक गाँठ' के रूपक से समझाया गया है। कवि उस नाम को ऐसा संबल मानते हैं जो साधारण जीवन के अनुभव को भी अर्थ प्रदान कर सकता है।

↑ विषय-सूची  ·  पद २२७ / २३८

पद २२८ — प्रिय रामनाम तें जाहि न रामो

प्रिय रामनाम तें जाहि न रामो। ताको भलो कठिन कलिकालहुँ आदि मध्य-परिनामो॥ सकुचत समुझि नाम-महिमा मद लोभ मोह कोह कामो। राम-नाम-जप-निरत सुजन पर करत छाँह घोर घामो॥ नाम प्रभाउ सही जो कहै कोउ सिला सरोरुह जामो। जो सुनि सुमिरि भाग-भाजन भइ सुकृतसील भील-भामो॥ बालमीकि अजामिल के कछु हुतो न साधन सामो। उलटे पलटे नाम-महातम गुंजनि जितो ललामो॥ राम तें अधिक नाम-करतब जेहि किए नगर-गत गामो। भए बजाइ दाहिने जो जपि तुलसिदास से बामो॥
कठिन शब्दार्थ

कलिकाल = कलियुग; सुकृतसील भील-भामो = सद्भाव रखने वाली शबरी; बालमीकि = वाल्मीकि; अजामिल = अजामिल।

सरल हिंदी अर्थ

कवि रामनाम की महिमा बताते हुए कहते हैं कि उसका स्मरण करने वाले सज्जन की रक्षा कठिन परिस्थितियों में भी होती है। शबरी, वाल्मीकि और अजामिल के प्रसंगों में वे नाम और भगवद्-स्मृति की परिवर्तनकारी शक्ति देखते हैं।

विस्तृत भावार्थ एवं संदेश

नाम को राम से भी अधिक प्रभावकारी कहना भक्ति-काव्य की अतिशयोक्तिपूर्ण प्रेमभाषा है। इसका भाव यही है कि ईश्वर का स्मरण व्यक्ति को बार-बार अच्छे कर्म, विनम्रता और विश्वास की ओर ले जा सकता है।

↑ विषय-सूची  ·  पद २२८ / २३८

पद २२९ — गरैगी जीह जो कहौं और को हौं

गरैगी जीह जो कहौं और को हौं। जानकी-जीवन! जनम-जनम जग ज्यायो तिहारेहि कौर को हौं॥ तीनि लोक तिहुँ काल न देखत सुहृद रावरे जोर को हौं। तुम्ह सों कपट करि कलप कलप कृमि ह्वैहौं नरक घोर को हौं॥ कहा भयो जो मन मिलि कलिकालहिं कियो भौंतुवा भौंर को हौं। तुलसिदास सीतल नित यहि बल बड़े ठेकाने ठौर को हौं॥
कठिन शब्दार्थ

जानकी-जीवन = श्रीसीता के प्राणप्रिय राम; सुहृद = सच्चा मित्र; ठौर = आश्रय; सीतल = शीतल/शांत।

सरल हिंदी अर्थ

तुलसी घोषणा करते हैं कि वे स्वयं को राम का ही सेवक मानते हैं। जन्मों से उन्हीं के आश्रित होने का भाव उनके मन में है और वे तीनों लोकों तथा तीनों कालों में उनसे बढ़कर सुहृद नहीं देखते। मन की चंचलता के बावजूद यही संबंध उन्हें शांत रखता है।

विस्तृत भावार्थ एवं संदेश

पद समर्पण की दृढ़ प्रतिज्ञा है। इसमें कठोर रूपक अपनी निष्ठा की तीव्रता दिखाने के लिए आए हैं; मुख्य संदेश भीतर के सच्चे संबंध को पहचानना और उससे शक्ति पाना है।

↑ विषय-सूची  ·  पद २२९ / २३८

पद २३० — अकारन को हितू और को है? बिरद गरीब-निवाज कौन की भौंह जासु जन जोहै?॥ छोटो

अकारन को हितू और को है? बिरद गरीब-निवाज कौन की भौंह जासु जन जोहै?॥ छोटो बड़ो चहत सब स्वारथ जो बिरंचि बिरचो है। कोल कुटिल कपि-भालु पालिबो कौन कृपालुहि सोहै?॥ काको नाम अनख आलस कहें अघ अवगुननि बिछोहै? को तुलसी से कुसेवक संग्रह्यो, सठ सब दिन साईं द्रोहै?॥
कठिन शब्दार्थ

अकारन हितू = बिना स्वार्थ भलाई चाहने वाला; गरीब-निवाज = दीनजन का आदरकर्ता; कोल = वनवासी समुदाय; संग्रह्यो = स्वीकार किया।

सरल हिंदी अर्थ

कवि पूछते हैं—बिना किसी कारण या लाभ के भलाई चाहने वाला आपके सिवा कौन है? संसार में अधिकतर लोग अपना हित देखते हैं, लेकिन श्रीराम ने कोल, वानर और भालुओं तक को स्नेह से अपनाया। तुलसी स्वयं को भी कमियों वाला सेवक कहकर कृपा के योग्य बनाने की प्रार्थना करते हैं।

विस्तृत भावार्थ एवं संदेश

यहाँ करुणा का माप पद, संपत्ति या प्रतिष्ठा नहीं है। अनुग्रह की इस भावना से समाज में भी असहाय और उपेक्षित लोगों के प्रति आदरपूर्ण व्यवहार की प्रेरणा ली जा सकती है।

↑ विषय-सूची  ·  पद २३० / २३८

खंड ५ — दास्यप्रेम, आत्मचिंतन और सत्संग की सीख

वाणी की शुद्धता, जीवन के मूल्यवान समय और मन के उचित आचरण पर विचार।

पद २३१ — और मोहि को है काहि कहिहौं? रंक-राज ज्यों मन को मनोरथ केहि सुनाइ सुख लहिह

और मोहि को है काहि कहिहौं? रंक-राज ज्यों मन को मनोरथ केहि सुनाइ सुख लहिहौं?॥ जम-जातना जोनि-संकट सब सहे दुसह अरु सहिहौं। मोको अगम, सुगम तुम्हको प्रभु! तउ फल चारि न चहिहौं॥ खेलिबेको खग-मृग, तरु-कंकर है रावरो राम हौं रहिहौं। यहि नाते नरकहुँ सचु पैहौं, या बिनु परमपदहुँ दुख दहिहौं॥ इतनी जिय लालसा दास के कहत पानही गहिहौं। दीजै बचन कि हृदय आनिये तुलसि को पन निर्बहिहौ॥
कठिन शब्दार्थ

रंक = दरिद्र; फल चारि = धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष; खग-मृग = पक्षी-पशु; पन = प्रतिज्ञा।

सरल हिंदी अर्थ

तुलसी कहते हैं कि वे अपनी मनोकामना किससे कहें—उनका अपना तो राम ही है। वे चार पुरुषार्थों की प्राप्ति से भी अधिक प्रभु के अपनेपन को चाहते हैं। उनका भाव है कि संसार में किसी भी रूप में रहना पड़े, राम से संबंध बना रहे।

विस्तृत भावार्थ एवं संदेश

यह दास्य-भक्ति की चरम आत्मीयता दिखाता है। बाहरी पुरस्कार की अपेक्षा संबंध अधिक मूल्यवान हो उठता है और भगवान से केवल इतना वचन माँगा जाता है कि भक्त को हृदय में स्थान दें।

↑ विषय-सूची  ·  पद २३१ / २३८

पद २३२ — दीनबंधु दूसरो कहँ पावो? को तुम बिनु पर-पीर पाइहै? केहि दीनता सुनावों?॥ प

दीनबंधु दूसरो कहँ पावो? को तुम बिनु पर-पीर पाइहै? केहि दीनता सुनावों?॥ प्रभु अकृपालु, कृपालु अलायक जहँ जहँ चितहिं डोलावों। इहै समुझि सुनि रहौं मौन ही, कहि भ्रम कहाँ गँवावों?॥ गोपद बूड़िबे जोग करम करौं बातनि जलधि थहावों। अति लालची काम-किंकर मन, मुख रावरो कहावों॥ तुलसी प्रभु जिय की जानत सब, अपनौ कछुक जनावों। सो कीजै जेहि भाँति छाँडि छल द्वार परो गुन गावों॥
कठिन शब्दार्थ

दीनबंधु = असहायों का मित्र; गोपद = गाय के खुर जितना जल; किंकर = सेवक; जिय = हृदय।

सरल हिंदी अर्थ

भक्त कहता है—प्रभु, मेरा दुःख और मेरे मन की दशा आपसे बढ़कर कौन समझ सकता है? मैं बातों से बड़ी उपलब्धियाँ गिनाता हूँ पर कर्म छोटे हैं; कामनाओं में फँसकर भी स्वयं को आपका सेवक कहता हूँ। फिर भी आपके द्वार पर खड़ा होकर छल छोड़ना चाहता हूँ।

विस्तृत भावार्थ एवं संदेश

वाणी और आचरण के अंतर को पहचानना इस पद का केंद्र है। स्वयं को सही ठहराने के बजाय खुलकर कमियाँ मान लेना ही उस विनय को प्रामाणिक बनाता है।

↑ विषय-सूची  ·  पद २३२ / २३८

पद २३३ — मनोरथ मन को एकै भाँति

मनोरथ मन को एकै भाँति। चाहत मुनि-मन-अगम सुकृत-फल, मनसा अघ न अघाति॥ करमभूमि कलि जनम कुसंगति मति बिमोह मद माति। करत कुजोग कोटि कयों पैयत परमारथ-पद-सांति॥ सेइ साधु गुरु, सुनि पुरान स्रुति बूझ्यो राग बाजी ताँति। तुलसी प्रभु सुभाउ सुरतरु सो ज्यों दरपन मुख-काँति॥
कठिन शब्दार्थ

मनोरथ = मन की इच्छा; परमारथ = परम कल्याण; कुसंगति = बुरी संगति; बाजी ताँति = खेल की डोरी; सुरतरु = कल्पवृक्ष।

सरल हिंदी अर्थ

मन उत्तम आध्यात्मिक फल तो चाहता है, पर उसके कर्म और संगति उसके विपरीत चलते हैं। तुलसी कहते हैं कि कुसंग और मोह में फँसे रहकर शांति कैसे मिले? संतों और गुरु की सेवा, धर्मग्रंथों का श्रवण और प्रभु के करुणामय स्वभाव का स्मरण ही उचित दिशा दे सकते हैं।

विस्तृत भावार्थ एवं संदेश

पद इच्छा और कर्म के बीच की दूरी पर प्रकाश डालता है। सुंदर लक्ष्य केवल चाहने से नहीं, दिन-प्रतिदिन के चुनाव सुधारने से पास आता है।

↑ विषय-सूची  ·  पद २३३ / २३८

पद २३४ — जनम गयो बादिहिं बर बीति

जनम गयो बादिहिं बर बीति। परमारथ पाले न पर्यो कछु, अनुदिन अधिक अनीति॥ खेलत खात लरिकपन गो चलि, जौबन जुवतिन लियो जीति। रोग-बियोग-सोग-स्रम-संकुल बड़ि बय बृथहि अतीति॥ राग-रोष-इरषा-बिमोह-बस रुची न साधु-समीति। कहे न सुने गुनगन रघुबर के, भइ न रामपद-प्रीति॥ हृदय दहत पछिताय-अनल अब सुनत दुसह भवभीति। तुलसी प्रभु तें होइ सो कीजिय समुझि बिरद की रीति॥
कठिन शब्दार्थ

बादिहिं = व्यर्थ; लरिकपन = बाल्यावस्था; बड़ि बय = वृद्धावस्था; इरषा = ईर्ष्या; परमारथ = आत्मिक जीवन का श्रेष्ठ लक्ष्य।

सरल हिंदी अर्थ

कवि व्यथित होकर कहते हैं कि बचपन खेल में, युवावस्था आकर्षणों में और वृद्धावस्था रोग, शोक तथा थकान में बीत गई। ईर्ष्या, क्रोध और मोह के कारण सत्संग तथा प्रभु के गुणगान में मन न लगा। अब वे करुणामय प्रभु से अपने बचे हुए जीवन को सार्थक बनाने की विनती करते हैं।

विस्तृत भावार्थ एवं संदेश

यह समय का स्मरण कराने वाला पद है, न कि किसी आयु को छोटा दिखाने वाला कथन। इसकी प्रेरणा है—जब भी चेतना जागे, उसी क्षण से भले कार्य और साधना शुरू किए जा सकते हैं।

↑ विषय-सूची  ·  पद २३४ / २३८

पद २३५ — ऐसेहि जनम-समूह सिराने

ऐसेहि जनम-समूह सिराने। प्राननाथ रघुनाथ से प्रभु तजि सेवत चरन बिराने॥ जे जड़ जीव कुटिल कायर खल केवल कलिमल-साने। सूखत बदन प्रसंसत तिन्ह कहँ, हरि तें अधिक करि माने॥ सुख हित कोटि उपाय निरंतर करत न पायँ पिराने। सदा मलीन पंथ के जल ज्यो कबहुँ न हृदय थिराने॥ यह दीनता दूर करिबे को अमित जतन उर आने। तुलसी चित चिंता न मिटै बिनु चिंतामनि पहिचाने॥
कठिन शब्दार्थ

जनम-समूह = अनेक जन्म; चरन बिराने = दूसरों के चरण; मलीन = अशुद्ध; चिंतामनि = चिंताओं का निवारण करने वाली दिव्य मणि, यहाँ प्रभु-आश्रय।

सरल हिंदी अर्थ

कवि कहते हैं कि अनेक जन्म इधर-उधर के आश्रयों को श्रेष्ठ मानते बीत गए। दूसरों की प्रशंसा और सांसारिक उपायों में सुख खोजने पर भी मन स्थिर नहीं हो पाया। अब वे पहचानते हैं कि अंतर की चिंता का समाधान प्रभु-सम्बंध में है।

विस्तृत भावार्थ एवं संदेश

पद बाहरी दुनिया का त्याग करने की आज्ञा नहीं देता; इसका जोर चंचल आशाओं से परे स्थिरता खोजने पर है। चिंतामणि का रूपक उस स्थायी आध्यात्मिक शांति की आकांक्षा को दिखाता है।

↑ विषय-सूची  ·  पद २३५ / २३८

पद २३६ — जो पै जिय जानकी-नाथ न जाने

जो पै जिय जानकी-नाथ न जाने। तौ सब करम धरम स्रमदायक, ऐसेइ कहत सयाने॥ जे सुर, सिद्ध, मुनीस, जोगबिद बेद पुरान बखाने। पूजा लेत देत पलटे सुख हानि-लाभ अनुमाने॥ काको नाम धोखेहूँ सुमिरत पातक-पुंज सिराने। बिप्र, बधिक, गज गीध कोटि खल कौन के पेट समाने॥ मेरु से दोष दूरि करि जन के, रेनु से गुन उर आने। तुलसिदास तेहि सकल आस तजि भजहि न अजहुँ अयाने॥
कठिन शब्दार्थ

जानकी-नाथ = श्रीराम; श्रमदायक = थकाने वाला; पातक-पुंज = पापों का समूह; रेनु = धूलकण; अयाने = अज्ञानी।

सरल हिंदी अर्थ

कवि कहते हैं कि सीतापति की करुणा को पहचाने बिना अनेक साधन मात्र बाहरी परिश्रम बन सकते हैं। उन्हें वह प्रभु प्रिय है जो शरणागत के बड़े दोष दूर समझते हैं और छोटे गुण भी हृदय में रखते हैं। तुलसी अपने मन को अन्य भ्रम छोड़कर उसी का भजन करने को कहते हैं।

विस्तृत भावार्थ एवं संदेश

ईश्वर के गुणों पर ध्यान मन में विनम्रता और विश्वास पैदा करता है। इस पद का उद्देश्य कर्म और धर्म का निरादर नहीं, बल्कि उनमें प्रेम, सत्य और निष्कपट भाव का महत्व याद कराना है।

↑ विषय-सूची  ·  पद २३६ / २३८

पद २३७ — काहे न रसना रामहि गावहि? निसि दिन पर-अपवाद बृथा कत रटि-रटि राग बढ़ावहि॥

काहे न रसना रामहि गावहि? निसि दिन पर-अपवाद बृथा कत रटि-रटि राग बढ़ावहि॥ नरमुख सुंदर मंदिर पावन बसि जनि ताहि लजावहि। ससि समीप रहि त्यागि सुधा कत रबिकर-जल कहँ धावहि॥ काम-कथा कलि-कैरव-चंदनि सुनत स्रवन दै भावहि। तिनहिं हटकि कहि हरि-कल-कीरति करन कलंक नसावहि॥ जातरूप मति जुगति रुचिर मनि रचि रचि हार बनावहि। सरन-सुखद रबिकुल-सरोज-रबि राम-नृपहि पहिरावहि॥ बाद-बिबाद-स्वाद तजि भजि हरि सरस चरित चित लावहि। तुलसिदास भव तरहि, तिहुँ पुर तू पुनीत जस पावहि॥
कठिन शब्दार्थ

रसना = जीभ; पर-अपवाद = दूसरों की निंदा; जातरूप = सोना; रबिकुल-सरोज-रबि = सूर्यवंश-कमल के सूर्य श्रीराम; भव = संसार।

सरल हिंदी अर्थ

कवि अपनी जिह्वा को समझाते हैं—तू दिन-रात दूसरों की निंदा में समय क्यों गँवाती है? यह वाणी पवित्र मंदिर जैसी है; इसे प्रभु के गुणगान, मधुर और सार्थक शब्दों में लगाना चाहिए। सुंदर शब्दों की माला बनाकर श्रीराम को अर्पित कर।

विस्तृत भावार्थ एवं संदेश

पद हमें वाणी की जिम्मेदारी याद दिलाता है। जो ऊर्जा विवाद, कटुता और निंदा में खर्च होती है, उसे शुभ चर्चा, आत्मोन्नति, प्रार्थना और दूसरों के प्रोत्साहन में लगाया जा सकता है।

↑ विषय-सूची  ·  पद २३७ / २३८

पद २३८ — आपनो हित रावरे सों जो पै सूझै

आपनो हित रावरे सों जो पै सूझै। तौ जनु तनुपर अछत सीस सुधि क्यों कबंध ज्यों जूझै॥ निज अवगुन, गुन राम रावरे लखि सुनि मति मन रूझै। रहनि कहनि समुझनि तुलसी की को कृपालु बिनु बूझै॥
कठिन शब्दार्थ

रावरे = आपके; कबंध = रामकथा का सिर-विहीन कबंध; निज अवगुन = अपने दोष; रूझै = रमे/रुके; रहनि-कहनि = आचरण और कथन।

सरल हिंदी अर्थ

तुलसी कहते हैं—यदि अपना कल्याण समझते हो, तो सिर होते हुए भी कबंध जैसा विवेकहीन व्यवहार क्यों करते हो? अपने दोष और प्रभु के गुणों को पहचानो, मन-बुद्धि को राम में लगाओ। कवि मानते हैं कि उनकी कहनी, करनी और समझ का पूरा हाल कृपालु भगवान ही जानते हैं।

विस्तृत भावार्थ एवं संदेश

भाग के अंत में आत्मबोध की सशक्त पुकार है। दूसरे को दोष देने से पहले अपने भीतर झाँकना, वाणी और व्यवहार में एकता लाना तथा प्रभु की कृपा पर विनम्र भरोसा रखना—यही साधना का सार बनता है।

↑ विषय-सूची  ·  पद २३८ / २३८

भाग ७ से मिलने वाली पाँच जीवन-शिक्षाएँ

१. भक्ति का आधार निष्कपट व्यवहार है

समभाव, संतोष, सत्संग और करुणा के बिना उपासना अधूरी है—पद २०४–२०५ का यही मुख्य संदेश है।

२. अपने दोष पहचानकर भी आशा बनाए रखें

कवि स्वयं की कमी स्वीकारते हैं लेकिन प्रभु की करुणा पर भरोसा नहीं छोड़ते। आत्मसमीक्षा के साथ आत्मविश्वास बने रहना आवश्यक है।

३. श्रीराम की शरण सबके लिए खुली है

गुह, जटायु, शबरी, विभीषण और वानरों के प्रति राम का स्नेह मनुष्यता, आदर और करुणा की सीख देता है।

४. नाम-स्मरण मन की दिशा बदलने का साधन है

पद २२५–२२८ रामनाम में विश्वास, स्मृति और जीवन को अधिक विनम्र बनाने का संदेश देते हैं।

५. जीवन और वाणी दोनों की साधना करें

पद २३४–२३८ समय का महत्व, व्यर्थ विवाद से बचना और प्रभु-गुणों का स्मरण करना सिखाते हैं।

प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री विनय पत्रिका भाग ७ में कितने पद हैं?

पद २०४ से २३८ तक कुल ३५ पद हैं। प्रत्येक के साथ कठिन शब्दार्थ, सरल हिंदी अर्थ और स्वतंत्र भावार्थ प्रस्तुत है।

भाग ७ में श्रीराम के करुणा-प्रसंग कौन से आते हैं?

विशेष रूप से निषादराज गुह, जटायु, शबरी, विभीषण, गजेंद्र और द्रौपदी के प्रसंगों का उल्लेख आता है।

विनय पत्रिका के कुल कितने पद हैं?

प्रचलित संपूर्ण पाठ में २७९ पद माने जाते हैं। यह श्रृंखला प्रथम परिचय लेख के बाद उन्हें सात बड़े पाठ-भागों में प्रस्तुत कर रही है।

भाग ८ में किन पदों का पाठ होगा?

अंतिम भाग ८ में पद २३९ से २७९ तक कुल ४१ पद रखे जाएँगे।

मूल पाठ एवं पाठांतर: पाठ-क्रम गोस्वामी तुलसीदास की विनय पत्रिका के सार्वजनिक डिजिटल पाठों के आधार पर रखा गया है। अवध्य — संपूर्ण विनय पत्रिका तथा अनंत सत्संग — मूल पदों की पाठ सूची देखें। सुविधा के लिए विराम-चिह्न एवं कुछ लेखन-रूप मानकीकृत किए गए हैं; प्राचीन पाठों में पाठांतर संभव हैं। शब्दार्थ, सरल अर्थ और भावार्थ भक्ति भावना के लिए स्वतंत्र व्याख्याएँ हैं।

सीताराम, सीताराम, जय जय सीताराम!

इस अध्याय में आत्मस्वीकार, शरणागतों के प्रति प्रभु की करुणा और रामनाम की साधना के अनेक पद पढ़े। इसे अपने परिवार और अध्ययन-संग में साझा कर सकते हैं।

पिछला भाग: विनय पत्रिका भाग ६ — पद १७१–२०३

अंतिम भाग ८ — पद २३९–२७९ (प्रकाशन के बाद लिंक जोड़ा जाएगा)
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