अवधूत गीता अध्याय 1: आत्मतत्त्व का बोध — 76 श्लोक हिंदी भावार्थ सहित
अवधूत गीता
अध्याय १ • आत्मतत्त्व का बोध
अवधूत गीता परंपरा में भगवान दत्तात्रेय से संबद्ध अद्वैत ग्रंथ है। इस अध्याय का विषय है—आत्मतत्त्व का बोध। नीचे अध्याय के सभी ७६ श्लोक मूल संस्कृत पाठ और सरल हिंदी भावार्थ के साथ क्रम से दिए गए हैं।
अध्याय १ • श्लोक १
महद्भयपरित्राणाद्विप्राणामुपजायते ॥ १॥
सरल हिंदी भावार्थ: ईश्वर की कृपा से ही विवेकी मनुष्यों में संसार के बड़े भय से पार होने के लिए अद्वैत आत्मबोध की अभिलाषा उत्पन्न होती है।
अध्याय १ • श्लोक २
निराकारं कथं वन्दे ह्यभिन्नं शिवमव्ययम् ॥ २॥
सरल हिंदी भावार्थ: जिस आत्मा ने अपने ही स्वरूप से सबको अपने में पूर्ण कर रखा है, उस निराकार, अभिन्न और अविनाशी शिवतत्त्व को अलग मानकर कैसे प्रणाम करूँ?
अध्याय १ • श्लोक ३
कस्याप्यहो नमस्कुर्यामहमेको निरञ्जनः ॥ ३॥
सरल हिंदी भावार्थ: पंचभूतों से बना विश्व मृगतृष्णा के जल जैसा है। जब शुद्ध आत्मस्वरूप में मैं एक ही हूँ, तो किसी दूसरे को अलग मानकर किसे नमस्कार करूँ?
अध्याय १ • श्लोक ४
अस्ति नास्ति कथं ब्रूयां विस्मयः प्रतिभाति मे ॥ ४॥
सरल हिंदी भावार्थ: सब केवल आत्मस्वरूप है; वहाँ भेद और अभेद का भी विभाजन नहीं। उसे “है” या “नहीं है”—कैसे कहूँ? यह बोध आश्चर्य से भर देता है।
अध्याय १ • श्लोक ५
अहमात्मा निराकारः सर्वव्यापी स्वभावतः ॥ ५॥
सरल हिंदी भावार्थ: वेदांत के समस्त ज्ञान और अनुभूति का सार यही है—मैं निराकार आत्मा हूँ और स्वभाव से सर्वव्यापी हूँ।
अध्याय १ • श्लोक ६
स्वभावनिर्मलः शुद्धः स एवायं न संशयः ॥ ६॥
सरल हिंदी भावार्थ: जो सबका आत्मस्वरूप, अंशरहित, आकाश के समान व्यापक और स्वभाव से निर्मल शुद्ध देवतत्त्व है, वही अपना वास्तविक स्वरूप है; इसमें संदेह नहीं।
अध्याय १ • श्लोक ७
सुखं दुःखं न जानामि कथं कस्यापि वर्तते ॥ ७॥
सरल हिंदी भावार्थ: मैं अविनाशी, अनंत और शुद्ध चेतनस्वरूप हूँ। आत्मस्थिति में सुख-दुःख के सीमित अनुभवों का मुझ पर आरोप नहीं होता।
अध्याय १ • श्लोक ८
न कायिकं कर्म शुभाशुभं मे ।
न वाचिकं कर्म शुभाशुभं मे
ज्ञानामृतं शुद्धमतीन्द्रियोऽहम् ॥ ८॥
सरल हिंदी भावार्थ: मन, शरीर और वाणी के शुभ-अशुभ कर्म शुद्ध आत्मा के विकार नहीं हैं। मैं ज्ञानरूपी अमृत, निर्मल और इंद्रियों से परे चेतना हूँ।
अध्याय १ • श्लोक ९
मनोऽतीतं मनः सर्वं न मनः परमार्थतः ॥ ९॥
सरल हिंदी भावार्थ: मन की कल्पना आकाश की तरह दूर-दूर फैलती है और सब ओर जाती है; पर परम सत्य मन की सीमा से परे है, वहाँ मन की स्वतंत्र सत्ता नहीं।
अध्याय १ • श्लोक १०
पश्यामि कथमात्मानं प्रत्यक्षं वा तिरोहितम् ॥ १०॥
सरल हिंदी भावार्थ: मैं एक अखंड आत्मतत्त्व ही सबका आधार हूँ और आकाश से भी परे हूँ। आत्मा को अपने सामने प्रकट या छिपी वस्तु की तरह कैसे देखूँ?
अध्याय १ • श्लोक ११
समं हि सर्वेषु विमृष्टमव्ययम् ।
सदोदितोऽसि त्वमखण्डितः प्रभो
दिवा च नक्तं च कथं हि मन्यसे ॥ ११॥
सरल हिंदी भावार्थ: तुम स्वयं को सबमें समान, निर्मल और अविनाशी एक आत्मतत्त्व क्यों नहीं पहचानते? तुम सदा प्रकाशित और अखंड हो; दिन-रात के भेद तुम्हें कैसे सीमित करें?
अध्याय १ • श्लोक १२
अहं ध्याता परं ध्येयमखण्डं खण्ड्यते कथम् ॥ १२॥
सरल हिंदी भावार्थ: अपने को सर्वत्र एक और अखंड आत्मा जानो। “मैं ध्याता हूँ और परम तत्त्व अलग ध्येय है”—ऐसा मानकर अखंड में खंड कैसे कर सकते हो?
अध्याय १ • श्लोक १३
सर्वं ब्रह्मेति विख्यातं ब्रवीति बहुधा श्रुतिः ॥ १३॥
सरल हिंदी भावार्थ: शुद्ध आत्मस्वरूप में न तुम्हारा जन्म हुआ, न मृत्यु होती है; देह तुम्हारा नित्य स्वरूप नहीं। श्रुतियाँ अनेक प्रकार से कहती हैं कि सब ब्रह्म ही है।
अध्याय १ • श्लोक १४
इतस्ततः कथं भ्रान्तः प्रधावसि पिशाचवत् ॥ १४॥
सरल हिंदी भावार्थ: तुम सदा भीतर-बाहर और सर्वत्र कल्याणस्वरूप आत्मा हो। फिर भ्रमित होकर बेचैन व्यक्ति की तरह इधर-उधर क्यों दौड़ते हो?
अध्याय १ • श्लोक १५
न त्वं नाहं जगन्नेदं सर्वमात्मैव केवलम् ॥ १५॥
सरल हिंदी भावार्थ: आत्मस्वरूप में न तुम्हारा संयोग-वियोग है, न मेरा। वहाँ अलग तुम, मैं और जगत नहीं; सब केवल आत्मा है।
अध्याय १ • श्लोक १६
त्वमेव परमं तत्त्वमतः किं परितप्यसे ॥ १६॥
सरल हिंदी भावार्थ: शब्द आदि पाँच इंद्रियविषय न तुम्हारा स्वरूप हैं, न तुम उनके स्वामित्व से बँधे हो। तुम परम तत्त्व हो; फिर संताप क्यों करते हो?
अध्याय १ • श्लोक १७
कथं रोदिषि रे वत्स नामरूपं न ते न मे ॥ १७॥
सरल हिंदी भावार्थ: वत्स! शुद्ध स्वरूप में जन्म-मृत्यु, मन, बंधन-मोक्ष और शुभ-अशुभ के द्वंद्व तुम्हारे नहीं। नाम-रूप की पहचान से चिपककर क्यों रोते हो?
अध्याय १ • श्लोक १८
अभिन्नं पश्य चात्मानं रागत्यागात्सुखी भव ॥ १८॥
सरल हिंदी भावार्थ: हे चित्त! भ्रम में इतना व्याकुल क्यों दौड़ता है? आत्मा को अभिन्न जान और आसक्ति छोड़कर सुखी हो जा।
अध्याय १ • श्लोक १९
निष्कम्पमेकं हि विमोक्षविग्रहम् ।
न ते च रागो ह्यथवा विरागः
कथं हि सन्तप्यसि कामकामतः ॥ १९॥
सरल हिंदी भावार्थ: तुम विकाररहित, अचल, एक और मुक्तिस्वरूप तत्त्व हो। आत्मा राग-विराग के द्वंद्व से परे है; फिर कामनाओं के पीछे संताप क्यों करते हो?
अध्याय १ • श्लोक २०
अशरीरं समं तत्त्वं तन्मां विद्धि न संशयः ॥ २०॥
सरल हिंदी भावार्थ: श्रुतियाँ जिस निर्गुण, निर्मल, अविनाशी, अशरीरी और सम तत्त्व का वर्णन करती हैं, वही मेरा शुद्ध आत्मस्वरूप है—इसे निश्चय से जानो।
अध्याय १ • श्लोक २१
एतत्तत्त्वोपदेशेन न पुनर्भवसम्भवः ॥ २१॥
सरल हिंदी भावार्थ: आकारयुक्त रूप को परिवर्तनशील आभास और निराकार आत्मतत्त्व को अखंड जानो। इस तत्त्वबोध से पुनर्जन्म का बंधन समाप्त होता है।
अध्याय १ • श्लोक २२
रागत्यागात्पुनश्चित्तमेकानेकं न विद्यते ॥ २२॥
सरल हिंदी भावार्थ: विवेकी एक सम आत्मतत्त्व कहते हैं। आसक्ति छूटने पर मन एक-अनेक की कल्पनाओं में बँधा नहीं रहता।
अध्याय १ • श्लोक २३
रात्मस्वरूपं च कथं समाधिः ।
अस्तीति नास्तीति कथं समाधि-
र्मोक्षस्वरूपं यदि सर्वमेकम् ॥ २३॥
सरल हिंदी भावार्थ: जब सब एक मुक्त आत्मस्वरूप है, तो समाधि को आत्मा से अलग या आत्मा में नई उपलब्धि कैसे कहा जाए? “है-नहीं है” के विकल्प भी वहाँ नहीं टिकते।
अध्याय १ • श्लोक २४
जानामीह न जानामीत्यात्मानं मन्यसे कथम् ॥ २४॥
सरल हिंदी भावार्थ: तुम शुद्ध, सम, देह से परे, अजन्मा और अविनाशी तत्त्व हो। अपने को “मैं जानता हूँ” या “मैं नहीं जानता”—इन सीमित धारणाओं में कैसे बाँधते हो?
अध्याय १ • श्लोक २५
नेति नेति श्रुतिर्ब्रूयादनृतं पाञ्चभौतिकम् ॥ २५॥
सरल हिंदी भावार्थ: “तत्त्वमसि” आदि महावाक्य अपने आत्मस्वरूप का बोध कराते हैं। “नेति-नेति” कहते हुए श्रुति पंचभूतों के परिवर्तनशील रूप को अंतिम आत्मसत्य मानने से रोकती है।
अध्याय १ • श्लोक २६
ध्याता ध्यानं न ते चित्तं निर्लज्जं ध्यायते कथम् ॥ २६॥
सरल हिंदी भावार्थ: सब तुमसे, आत्मा द्वारा आत्मा में ही अखंड रूप से पूर्ण है। तब अलग ध्याता और ध्यान कहाँ हैं? मन किस अलग वस्तु को आत्मा मानकर ध्यान करे?
अध्याय १ • श्लोक २७
शिवं न जानामि कथं भजामि ।
अहं शिवश्चेत्परमार्थतत्त्वं
समस्वरूपं गगनोपमं च ॥ २७॥
सरल हिंदी भावार्थ: यदि मैं ही परम सत्य, समान और आकाशवत शिवस्वरूप हूँ, तो शिव को अपने से अलग जानने, कहने या भजने का परम स्तर पर भेद कैसे बने?
अध्याय १ • श्लोक २८
ग्राह्यग्राहकनिर्मुक्तं स्वसंवेद्यं कथं भवेत् ॥ २८॥
सरल हिंदी भावार्थ: यह सम तत्त्व सीमित अहंभाव और कल्पना के कारणों से रहित है। जानने वाला और जानने योग्य के भेद से मुक्त आत्मा को किसी विषय की तरह कैसे जाना जाए?
अध्याय १ • श्लोक २९
त्तत्त्वस्वरूपं न हि वस्तु किञ्चित् ।
आत्मैकरूपं परमार्थतत्त्वं
न हिंसको वापि न चाप्यहिंसा ॥ २९॥
सरल हिंदी भावार्थ: परम तत्त्व अनेक अलग वस्तुओं का समूह नहीं; वह एक आत्मस्वरूप है। उसमें हिंसा करने वाले और अहिंसा की मानसिक पहचान का भी द्वैत नहीं है।
अध्याय १ • श्लोक ३०
विभ्रमं कथमात्मार्थे विभ्रान्तोऽहं कथं पुनः ॥ ३०॥
सरल हिंदी भावार्थ: तुम निर्मल, सम, अशरीरी, अजन्मा और अविनाशी तत्त्व हो। शुद्ध आत्मा में भ्रम कैसे हो, और उसी दृष्टि से स्वयं को भ्रमित कैसे कहा जाए?
अध्याय १ • श्लोक ३१
शिवेन मनसा शुद्धो न भेदः प्रतिभाति मे ॥ ३१॥
सरल हिंदी भावार्थ: घड़ा टूटने पर उसके भीतर का आकाश बाहरी आकाश से अलग नहीं रहता। वैसे ही शुद्ध बोध में मुझे आत्मा और शिव का भेद नहीं दिखता।
अध्याय १ • श्लोक ३२
केवलं ब्रह्म संविद्धि वेद्यवेदकवर्जितम् ॥ ३२॥
सरल हिंदी भावार्थ: वास्तविकता में न घड़े की सीमा, न घड़े के आकाश की अलग सत्ता और न जीव-शरीर की स्वतंत्र पहचान है। जानने वाले और विषय के भेद से परे केवल ब्रह्म जानो।
अध्याय १ • श्लोक ३३
सर्वं शून्यमशून्यं च तन्मां विद्धि न संशयः ॥ ३३॥
सरल हिंदी भावार्थ: सर्वत्र, सदा और सबमें जो अचल आत्मतत्त्व है, वही मैं हूँ। शून्य और अशून्य दोनों धारणाओं का आधार वही है; इसमें संदेह नहीं।
अध्याय १ • श्लोक ३४
वर्णाश्रमो नैव कुलं न जातिः ।
न धूममार्गो न च दीप्तिमार्गो
ब्रह्मैकरूपं परमार्थतत्त्वम् ॥ ३४॥
सरल हिंदी भावार्थ: परम आत्मतत्त्व में वेद, लोक, देवता, यज्ञ, वर्णाश्रम, कुल, जाति और मृत्यु के बाद के मार्गों का अलग विभाजन नहीं; वहाँ एक ब्रह्मस्वरूप सत्य है।
अध्याय १ • श्लोक ३५
प्रत्यक्षं चापरोक्षं च ह्यात्मानं मन्यसे कथम् ॥ ३५॥
सरल हिंदी भावार्थ: जब तुम व्याप्त वस्तु और व्यापने वाले के भेद से मुक्त एक आत्मा हो, तो उसे प्रत्यक्ष या परोक्ष विषय के रूप में कैसे मानते हो?
अध्याय १ • श्लोक ३६
समं तत्त्वं न विन्दन्ति द्वैताद्वैतविवर्जितम् ॥ ३६॥
सरल हिंदी भावार्थ: कुछ अद्वैत की धारणा चाहते हैं और कुछ द्वैत की। किंतु सम परम तत्त्व इन दोनों वैचारिक आग्रहों से परे है।
अध्याय १ • श्लोक ३७
कथयन्ति कथं तत्त्वं मनोवाचामगोचरम् ॥ ३७॥
सरल हिंदी भावार्थ: जो श्वेत आदि रंगों और शब्द आदि गुणों से रहित तथा मन-वाणी से परे है, उस तत्त्व को गुणों वाली वस्तु की तरह कैसे बताया जाए?
अध्याय १ • श्लोक ३८
तदा हि ब्रह्म संवेत्ति न ते द्वैतपरम्परा ॥ ३८॥
सरल हिंदी भावार्थ: जब देह आदि पूरे दृश्य जगत को आकाशवत अस्थायी आभास जाना जाता है, तब ब्रह्म का बोध होता है और द्वैत की पकड़ छूटती है।
अध्याय १ • श्लोक ३९
व्योमाकारं तथैवैकं ध्याता ध्यानं कथं भवेत् ॥ ३९॥
सरल हिंदी भावार्थ: सहज आत्मा परम तत्त्व से अभिन्न और आकाश की तरह एक जान पड़ती है। तब अलग ध्याता और ध्यान की वास्तविकता कहाँ है?
अध्याय १ • श्लोक ४०
एतत्सर्वं न मे किञ्चिद्विशुद्धोऽहमजोऽव्ययः ॥ ४०॥
सरल हिंदी भावार्थ: मैं जो करता, खाता, हवन करता या देता हूँ, उन क्रियाओं से शुद्ध आत्मस्वरूप बँधता नहीं। आत्मा अजन्मा और अविनाशी है।
अध्याय १ • श्लोक ४१
सर्वं जगद्विद्धि विकारहीनम् ।
सर्वं जगद्विद्धि विशुद्धदेहं
सर्वं जगद्विद्धि शिवैकरूपम् ॥ ४१॥
सरल हिंदी भावार्थ: संपूर्ण जगत के मूल तत्त्व को निराकार, निर्विकार, निर्मल और एक शिवस्वरूप जानो।
अध्याय १ • श्लोक ४२
असंवेद्यं स्वसंवेद्यमात्मानं मन्यसे कथम् ॥ ४२॥
सरल हिंदी भावार्थ: निस्संदेह तुम वही तत्त्व हो। आत्मा को अपने से अलग जानने या न जानने योग्य वस्तु क्यों मानते हो?
अध्याय १ • श्लोक ४३
तत्त्वमेकमिदं सर्वं व्योमाकारं निरञ्जनम् ॥ ४३॥
सरल हिंदी भावार्थ: वत्स! माया-अमाया और छाया-अछाया का भेद परम स्तर पर कहाँ है? यह सब एक निर्मल, आकाशवत आत्मतत्त्व है।
अध्याय १ • श्लोक ४४
स्वभावनिर्मलः शुद्ध इति मे निश्चिता मतिः ॥ ४४॥
सरल हिंदी भावार्थ: मेरा शुद्ध स्वरूप आदि, मध्य और अंत से रहित है। मैं कभी बँधा नहीं; स्वभाव से निर्मल और शुद्ध हूँ—यही मेरा दृढ़ निश्चय है।
अध्याय १ • श्लोक ४५
ब्रह्मैव केवलं सर्वं कथं वर्णाश्रमस्थितिः ॥ ४५॥
सरल हिंदी भावार्थ: महत् आदि से बना जगत आत्मा से अलग स्वतंत्र सत्य नहीं दिखता। सब केवल ब्रह्म है; उस स्वरूप में वर्णाश्रम की सीमाएँ कहाँ हैं?
अध्याय १ • श्लोक ४६
निरालम्बमशून्यं च शून्यं व्योमादिपञ्चकम् ॥ ४६॥
सरल हिंदी भावार्थ: मैं सर्वत्र एक अखंड आत्मतत्त्व को जानता हूँ। वह किसी सहारे पर निर्भर नहीं; आकाश आदि पंचभूतों की अलग सत्ता उसके सामने स्थायी नहीं है।
अध्याय १ • श्लोक ४७
सानन्दो वा निरानन्दमात्मानं मन्यसे कथम् ॥ ४७॥
सरल हिंदी भावार्थ: आत्मस्वरूप स्त्री, पुरुष या अन्य देहगत पहचान नहीं; वह विचार और कल्पना से परे है। उसे आनंदयुक्त या आनंदरहित वस्तु की तरह कैसे सीमित करो?
अध्याय १ • श्लोक ४८
मनोविनाशान्न तु नैव शुद्धम् ।
गुरूपदेशान्न तु नैव शुद्धं
स्वयं च तत्त्वं स्वयमेव बुद्धम् ॥ ४८॥
सरल हिंदी भावार्थ: आत्मा योग के अंगों, मन के निरोध या गुरु के उपदेश से नई शुद्ध नहीं बनती। वह स्वयं नित्य शुद्ध और स्वयंप्रकाश बोधस्वरूप है।
अध्याय १ • श्लोक ४९
आत्मैव केवलं सर्वं तुरीयं च त्रयं कथम् ॥ ४९॥
सरल हिंदी भावार्थ: परम दृष्टि में पंचभूतों की देह और देहरहित होने का भेद भी आत्मा से अलग नहीं। सब आत्मा है; तब तीन अवस्थाओं और चौथी अवस्था का विभाजन कहाँ है?
अध्याय १ • श्लोक ५०
न कर्ता न च भोक्ताहं व्याप्यव्यापकवर्जितः ॥ ५०॥
सरल हिंदी भावार्थ: मैं न बँधा हूँ, न मुक्ति पाने वाला अलग जीव और न ब्रह्म से भिन्न हूँ। न कर्ता-भोक्ता हूँ, न व्याप्य-व्यापक के द्वंद्व में सीमित हूँ।
अध्याय १ • श्लोक ५१
प्रकृतिं पुरुषं तद्वदभिन्नं प्रतिभाति मे ॥ ५१॥
सरल हिंदी भावार्थ: जैसे जल में मिला जल अलग नहीं रहता, वैसे ही मूल तत्त्व में प्रकृति और पुरुष अभिन्न दिखाई देते हैं।
अध्याय १ • श्लोक ५२
साकारं च निराकारमात्मानं मन्यसे कथम् ॥ ५२॥
सरल हिंदी भावार्थ: जब आत्मा न कभी बँधी और न कोई नई मुक्ति प्राप्त करती है, तो उसे साकार या निराकार की मानसिक सीमा में कैसे बाँधो?
अध्याय १ • श्लोक ५३
यथा परं हि रूपं यन्मरीचिजलसन्निभम् ॥ ५३॥
सरल हिंदी भावार्थ: तुम्हारा परम स्वरूप आकाशवत व्यापक और स्वयंप्रकाश है। उससे अलग दिखाई देने वाले रूप मृगतृष्णा के जल जैसे अस्थायी आभास हैं।
अध्याय १ • श्लोक ५४
विदेहं गगनं विद्धि विशुद्धोऽहं स्वभावतः ॥ ५४॥
सरल हिंदी भावार्थ: शुद्ध आत्मदृष्टि में गुरु-उपदेश, उपाधि और क्रिया का अलग बंधन नहीं रहता। मुझे अशरीरी, आकाशवत और स्वभाव से निर्मल जानो।
अध्याय १ • श्लोक ५५
अहं चात्मा परं तत्त्वमिति वक्तुं न लज्जसे ॥ ५५॥
सरल हिंदी भावार्थ: तुम निर्मल, अशरीरी और मन से परे परम आत्मा हो। फिर “मैं आत्मा हूँ, मैं परम तत्त्व हूँ”—इसका भी अहंकारी दावा क्यों पकड़ते हो?
अध्याय १ • श्लोक ५६
पिब वत्स कलातीतमद्वैतं परमामृतम् ॥ ५६॥
सरल हिंदी भावार्थ: हे चित्त! क्यों रोता है? अपने आत्मस्वरूप में स्थिर हो। वत्स! अंशों से परे अद्वैत का परम अमृत पियो।
अध्याय १ • श्लोक ५७
यस्येदृशः सदा बोधः स बोधो नान्यथा भवेत् ॥ ५७॥
सरल हिंदी भावार्थ: बोध, अबोध और इन दोनों के मिश्रण से परे जो चेतना है, वही सत्य बोध है। वह मन की बदलती अवस्थाओं से बदलता नहीं।
अध्याय १ • श्लोक ५८
न देशकालौ न गुरूपदेशः ।
स्वभावसंवित्तरहं च तत्त्व-
माकाशकल्पं सहजं ध्रुवं च ॥ ५८॥
सरल हिंदी भावार्थ: मेरा तत्त्व केवल सूचना, तर्क, समाधि की क्रिया, देशकाल या उपदेश नहीं है। मैं सहज, अचल और आकाशवत स्वयंप्रकाश चेतना हूँ।
अध्याय १ • श्लोक ५९
विशुद्धं निर्गुणं ब्रह्म बन्धो मुक्तिः कथं मम ॥ ५९॥
सरल हिंदी भावार्थ: आत्मस्वरूप में न मेरा जन्म है, न मृत्यु और न शुभ-अशुभ कर्म का विकार। मैं शुद्ध निर्गुण ब्रह्म हूँ; फिर मेरा बंधन या मोक्ष कैसे?
अध्याय १ • श्लोक ६०
अन्तरं हि न पश्यामि स बाह्याभ्यन्तरः कथम् ॥ ६०॥
सरल हिंदी भावार्थ: यदि दिव्य आत्मतत्त्व सर्वव्यापी, स्थिर, पूर्ण और अखंड है, तो उसके भीतर-बाहर का भेद कैसे हो? मुझे कोई अलगाव नहीं दिखता।
अध्याय १ • श्लोक ६१
अहो मायामहामोहो द्वैताद्वैतविकल्पना ॥ ६१॥
सरल हिंदी भावार्थ: पूरा जगत एक अखंड तत्त्व में प्रकाशित है। द्वैत और अद्वैत के आग्रहपूर्ण विकल्प भी माया का बड़ा भ्रम बन सकते हैं।
अध्याय १ • श्लोक ६२
भेदाभेदविनिर्मुक्तो वर्तते केवलः शिवः ॥ ६२॥
सरल हिंदी भावार्थ: “नेति-नेति” से साकार और निराकार की सीमित धारणाएँ भी पार की जाती हैं। भेद-अभेद से मुक्त एक शिवतत्त्व ही रहता है।
अध्याय १ • श्लोक ६३
न ते च पत्नी न सुतश्च मित्रम् ।
न पक्षपाती न विपक्षपातः
कथं हि सन्तप्तिरियं हि चित्ते ॥ ६३॥
सरल हिंदी भावार्थ: परम आत्मस्वरूप माता-पिता, बंधु, पत्नी, पुत्र या मित्र की संबंधगत सीमाओं से परे है। उसमें पक्ष-विपक्ष नहीं; फिर मन में इतना संताप क्यों है?
अध्याय १ • श्लोक ६४
विदेहस्य शरीरत्वं कल्पयन्ति कथं बुधाः ॥ ६४॥
सरल हिंदी भावार्थ: आत्मा के लिए दिन-रात और उदय-अस्त का बंधन नहीं। विवेकी अशरीरी तत्त्व को शरीर की सीमा में कैसे मान सकते हैं?
अध्याय १ • श्लोक ६५
न हि सर्वमसर्वं च विद्धि चात्मानमव्ययम् ॥ ६५॥
सरल हिंदी भावार्थ: आत्मा को अविनाशी जानो। वह विभाजन-अविभाजन, सुख-दुःख और सब-कुछ या कुछ-भी-नहीं की धारणाओं से परे है।
अध्याय १ • श्लोक ६६
न मे देहो विदेहो वा निर्ममेति ममेति किम् ॥ ६६॥
सरल हिंदी भावार्थ: मैं शुद्ध आत्मा न कर्ता हूँ, न भोक्ता; पुराने या वर्तमान कर्म मेरे स्वरूप के विकार नहीं। देह-अदेह और मेरा-मेरा-नहीं का द्वंद्व भी वहाँ नहीं।
अध्याय १ • श्लोक ६७
आत्मानं विद्धि मामेकं विशालं गगनोपमम् ॥ ६७॥
सरल हिंदी भावार्थ: आत्मा में राग आदि दोष, देहभाव और दुःख के विकार नहीं। मुझे एक, विशाल और आकाशवत आत्मस्वरूप जानो।
अध्याय १ • श्लोक ६८
सखे मनः सर्वमिदं वितर्क्यम् ।
यत्सारभूतं कथितं मया ते
त्वमेव तत्त्वं गगनोपमोऽसि ॥ ६८॥
सरल हिंदी भावार्थ: हे मित्र मन! बहुत बोलने से क्या लाभ? विचारों के इस विस्तार का सार मैंने कह दिया—तुम स्वयं तत्त्व हो और आकाशवत असीम हो।
अध्याय १ • श्लोक ६९
योगिनस्तत्र लीयन्ते घटाकाशमिवाम्बरे ॥ ६९॥
सरल हिंदी भावार्थ: आत्मबोध में स्थित योगी किसी भी बाहरी दशा या स्थान में शरीर छोड़ें, वे घड़े के आकाश की तरह अविभाज्य परमात्मस्वरूप में ही स्थित हैं।
अध्याय १ • श्लोक ७०
समकाले तनुं मुक्तः कैवल्यव्यापको भवेत् ॥ ७०॥
सरल हिंदी भावार्थ: तीर्थ हो या समाज में उपेक्षित व्यक्ति का घर, स्मृति रहे या न रहे—मुक्त योगी के देहत्याग पर उसका आत्मस्वरूप अखंड ही रहता है।
अध्याय १ • श्लोक ७१
मन्यन्ते योगिनः सर्वं मरीचिजलसन्निभम् ॥ ७१॥
सरल हिंदी भावार्थ: योगी धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष और समस्त चराचर जगत के अलग स्थायी रूपों को मृगतृष्णा के जल के समान जानता है।
अध्याय १ • श्लोक ७२
न करोमि न भुञ्जामि इति मे निश्चला मतिः ॥ ७२॥
सरल हिंदी भावार्थ: भूत, भविष्य और वर्तमान के कर्मों का शुद्ध आत्मा न कर्ता है, न भोक्ता—यह मेरा अचल निश्चय है।
अध्याय १ • श्लोक ७३
स्तिष्ठन्नेकः सुखमवधूतः ।
चरति हि नग्नस्त्यक्त्वा गर्वं
विन्दति केवलमात्मनि सर्वम् ॥ ७३॥
सरल हिंदी भावार्थ: अवधूत एकांत में समभाव से निर्मल होकर सुखी रहता है। गर्व और बाहरी आवरणों की आसक्ति छोड़कर वह सबको आत्मस्वरूप में पाता है।
अध्याय १ • श्लोक ७४
विन्दति केवलमात्मनि तत्र ।
धर्माधर्मौ न हि नहि यत्र
बद्धो मुक्तः कथमिह तत्र ॥ ७४॥
सरल हिंदी भावार्थ: जहाँ केवल आत्मस्वरूप का बोध है, वहाँ तीन अवस्थाओं, तुरीय, धर्म-अधर्म या बँधे-मुक्त होने की अलग सीमाएँ नहीं टिकतीं।
अध्याय १ • श्लोक ७५
छन्दोलक्षणं न हि नहि तन्त्रम् ।
समरसमग्नो भावितपूतः
प्रलपितमेतत्परमवधूतः ॥ ७५॥
सरल हिंदी भावार्थ: परम अवधूत समरसता में निमग्न होकर निर्मल आत्मानुभव कहता है; उस अनुभव को केवल मंत्र, छंद या तंत्र की परिभाषाओं में नहीं बाँधा जा सकता।
अध्याय १ • श्लोक ७६
स्वभावभावतः प्रोक्तं शास्त्रसंवित्तिपूर्वकम् ॥ ७६॥
सरल हिंदी भावार्थ: परम स्वरूप में शून्य-अशून्य और सत्य-असत्य का द्वंद्व नहीं है। यह कथन शास्त्रबोध के अनुरूप सहज आत्मानुभव से कहा गया है।
॥ अवधूत गीता — अध्याय १ सम्पूर्ण ॥
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