अवधूत गीता अध्याय 2: गुरु, विवेक और आत्मानुभव — 40 श्लोक हिंदी भावार्थ सहित

भक्ति भावना • अवधूत गीता

अवधूत गीता

अध्याय २ • गुरु, विवेक और आत्मानुभव

सम्पूर्ण ४० श्लोक • मूल संस्कृत पाठ एवं सरल हिंदी भावार्थ

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अवधूत गीता परंपरा में भगवान दत्तात्रेय से संबद्ध अद्वैत ग्रंथ है। इस अध्याय का विषय है—गुरु, विवेक और आत्मानुभव। नीचे अध्याय के सभी ४० श्लोक मूल संस्कृत पाठ और सरल हिंदी भावार्थ के साथ क्रम से दिए गए हैं।

पाठ और भावार्थ का संदर्भ: यहाँ आठ अध्यायों वाला २७१-श्लोक पाठ अपनाया गया है। विभिन्न संस्करणों में पाठ और श्लोक-संख्या में अंतर मिलता है। संस्कृत पाठ का मिलान संस्कृत डॉक्यूमेंट्स संग्रह से किया गया है। हिंदी भावार्थ भक्ति भावना द्वारा सरल भाषा में प्रस्तुत है; विषय-शीर्षक पढ़ने की सुविधा के लिए हैं। अद्वैत में अकर्तापन और भेदों के निषेध के कथन शुद्ध आत्मा की दृष्टि से हैं। व्यवहार में कर्तव्य, सदाचार, गुरु के प्रति सम्मान और करुणा का महत्त्व बना रहता है।

अध्याय २ • श्लोक १

बालस्य वा विषयभोगरतस्य वापि
मूर्खस्य सेवकजनस्य गृहस्थितस्य ।
एतद्गुरोः किमपि नैव न चिन्तनीयं
रत्नं कथं त्यजति कोऽप्यशुचौ प्रविष्टम् ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: गुरु बालक हों, गृहस्थ हों, सेवक हों या बाहरी व्यवहार से साधारण दिखें—केवल इन बातों से आत्मज्ञान का सार न ठुकराओ। अशुद्ध स्थान में पड़ा रत्न भी त्यागा नहीं जाता।

अध्याय २ • श्लोक २

नैवात्र काव्यगुण एव तु चिन्तनीयो
ग्राह्यः परं गुणवता खलु सार एव ।
सिन्दूरचित्ररहिता भुवि रूपशून्या
पारं न किं नयति नौरिह गन्तुकामान् ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: यहाँ केवल काव्य की सजावट न देखो; विवेकी उसके सार को ग्रहण करे। बिना रंग-चित्र और सुंदर रूप की नाव भी पार जाने वालों को पार पहुँचा देती है।

अध्याय २ • श्लोक ३

प्रयत्नेन विना येन निश्चलेन चलाचलम् ।
ग्रस्तं स्वभावतः शान्तं चैतन्यं गगनोपमम् ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: अचल चेतना बिना प्रयास ही समस्त चराचर को अपने में आधार देती है। वह स्वभाव से शांत और आकाशवत व्यापक है।

अध्याय २ • श्लोक ४

अयत्नाछालयेद्यस्तु एकमेव चराचरम् ।
सर्वगं तत्कथं भिन्नमद्वैतं वर्तते मम ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो एक तत्त्व बिना अपने में परिवर्तन आए चराचर के व्यवहार का आधार है, वह सर्वव्यापी चेतना अलग कैसे हो सकती है? मेरे बोध में वही अद्वैत है।

अध्याय २ • श्लोक ५

अहमेव परं यस्मात्सारात्सारतरं शिवम् ।
गमागमविनिर्मुक्तं निर्विकल्पं निराकुलम् ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैं सार से भी परम सार, कल्याणस्वरूप तत्त्व हूँ; आने-जाने, विकल्प और व्याकुलता से रहित हूँ।

अध्याय २ • श्लोक ६

सर्वावयवनिर्मुक्तं तथाहं त्रिदशार्चितम् ।
सम्पूर्णत्वान्न गृह्णामि विभागं त्रिदशादिकम् ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: मेरा आत्मस्वरूप अंशों से रहित और देवताओं द्वारा पूजनीय है। उसकी पूर्णता में देवता आदि की अलग सीमित सत्ता का आग्रह नहीं रहता।

अध्याय २ • श्लोक ७

प्रमादेन न सन्देहः किं करिष्यामि वृत्तिमान् ।
उत्पद्यन्ते विलीयन्ते बुद्बुदाश्च यथा जले ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: मन में वृत्तियाँ उठें तो उनसे आत्मस्वरूप में संदेह न करो। वे जल के बुलबुलों की तरह उत्पन्न होकर विलीन होती हैं।

अध्याय २ • श्लोक ८

महदादीनि भूतानि समाप्यैवं सदैव हि ।
मृदुद्रव्येषु तीक्ष्णेषु गुडेषु कटुकेषु च ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: महत् आदि तत्त्व और उनसे बने कोमल, कठोर, मीठे तथा कड़वे पदार्थ—सबका मूल आधार वही एक चेतन तत्त्व है।

अध्याय २ • श्लोक ९

कटुत्वं चैव शैत्यत्वं मृदुत्वं च यथा जले ।
प्रकृतिः पुरुषस्तद्वदभिन्नं प्रतिभाति मे ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: जैसे जल में ठंडक, कोमलता या स्वाद अनुभव होते हैं पर उससे अलग सत्ता नहीं बनते, वैसे ही प्रकृति और पुरुष मूल आत्मतत्त्व में अभिन्न दिखते हैं।

अध्याय २ • श्लोक १०

सर्वाख्यारहितं यद्यत्सूक्ष्मात्सूक्ष्मतरं परम् ।
मनोबुद्धीन्द्रियातीतमकलङ्कं जगत्पतिम् ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: परम तत्त्व सभी नामों से रहित, सूक्ष्म से भी सूक्ष्म, मन-बुद्धि-इंद्रियों से परे, निष्कलंक और जगत का अधिष्ठान है।

अध्याय २ • श्लोक ११

ईदृशं सहजं यत्र अहं तत्र कथं भवेत् ।
त्वमेव हि कथं तत्र कथं तत्र चराचरम् ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: ऐसे सहज परम स्वरूप में अलग “मैं”, “तुम” और चराचर जगत की स्वतंत्र सत्ता कैसे बन सकती है?

अध्याय २ • श्लोक १२

गगनोपमं तु यत्प्रोक्तं तदेव गगनोपमम् ।
चैतन्यं दोषहीनं च सर्वज्ञं पूर्णमेव च ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: आकाश की उपमा केवल उसकी असीमता समझाने के लिए है। वह चेतना दोषरहित, सर्वज्ञ और पूर्ण है।

अध्याय २ • श्लोक १३

पृथिव्यां चरितं नैव मारुतेन च वाहितम् ।
वरिणा पिहितं नैव तेजोमध्ये व्यवस्थितम् ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: वह आत्मतत्त्व पृथ्वी पर चलने, वायु से बहने, जल से ढकने या अग्नि में सीमित होने वाली वस्तु नहीं है।

अध्याय २ • श्लोक १४

आकाशं तेन संव्याप्तं न तद्व्याप्तं च केनचित् ।
स बाह्याभ्यन्तरं तिष्ठत्यवच्छिन्नं निरन्तरम् ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: उससे आकाश भी व्याप्त है, लेकिन कोई वस्तु उसे सीमित नहीं करती। वह भीतर-बाहर अखंड और अविभाज्य है।

अध्याय २ • श्लोक १५

सूक्ष्मत्वात्तददृश्यत्वान्निर्गुणत्वाच्च योगिभिः ।
आलम्बनादि यत्प्रोक्तं क्रमादालम्बनं भवेत् ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: वह अत्यंत सूक्ष्म, अदृश्य और निर्गुण है; इसलिए योगियों ने साधक की सहायता के लिए ध्यान के आधार बताए हैं, जिनसे क्रमशः आगे बढ़ा जाता है।

अध्याय २ • श्लोक १६

सतताऽभ्यासयुक्तस्तु निरालम्बो यदा भवेत् ।
तल्लयाल्लीयते नान्तर्गुणदोषविवर्जितः ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: निरंतर अभ्यास करने वाला जब आधार की पकड़ से मुक्त होता है, तब गुण-दोष से परे आत्मस्थिति पाता है; आत्मस्वरूप का नाश नहीं होता।

अध्याय २ • श्लोक १७

विषविश्वस्य रौद्रस्य मोहमूर्च्छाप्रदस्य च ।
एकमेव विनाशाय ह्यमोघं सहजामृतम् ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: भ्रम और अचेतन मोह पैदा करने वाले संसाररूपी विष का अचूक उपाय सहज आत्मबोध का एक अमृत है।

अध्याय २ • श्लोक १८

भावगम्यं निराकारं साकारं दृष्टिगोचरम् ।
भावाभावविनिर्मुक्तमन्तरालं तदुच्यते ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: साकार रूप दृष्टि का विषय है और निराकार की धारणा मन का विषय बन सकती है। परम तत्त्व दोनों के होने-न होने से परे अंतरतम सत्य है।

अध्याय २ • श्लोक १९

बाह्यभावं भवेद्विश्वमन्तः प्रकृतिरुच्यते ।
अन्तरादन्तरं ज्ञेयं नारिकेलफलाम्बुवत् ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: बाहरी दृश्य जगत के भीतर प्रकृति के सूक्ष्म आधार को समझो और उससे भी भीतर आत्मतत्त्व को जानो; जैसे नारियल का जल उसके भीतर रहता है।

अध्याय २ • श्लोक २०

भ्रान्तिज्ञानं स्थितं बाह्यं सम्यग्ज्ञानं च मध्यगम् ।
मध्यान्मध्यतरं ज्ञेयं नारिकेलफलाम्बुवत् ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: बाहरी रूपों की भ्रामक पहचान से भीतर सही विवेक तक जाओ और उससे भी अंतरतम स्वरूप को पहचानो; जैसे नारियल के भीतर का जल।

अध्याय २ • श्लोक २१

पौर्णमास्यां यथा चन्द्र एक एवातिनिर्मलः ।
तेन तत्सदृशं पश्येद्द्विधादृष्टिर्विपर्ययः ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: पूर्णिमा का चंद्रमा एक और निर्मल होता है। उसी तरह आत्मतत्त्व को एक जानो; दो देखना दृष्टि का भ्रम है।

अध्याय २ • श्लोक २२

अनेनैव प्रकारेण बुद्धिभेदो न सर्वगः ।
दाता च धीरतामेति गीयते नामकोटिभिः ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: सर्वव्यापी आत्मतत्त्व में बुद्धि से बनाए भेद वास्तविक नहीं हैं। वही अनेक नामों से गाया जाता है और उसका बोध मनुष्य को धीर बनाता है।

अध्याय २ • श्लोक २३

गुरुप्रज्ञाप्रसादेन मूर्खो वा यदि पण्डितः ।
यस्तु सम्बुध्यते तत्त्वं विरक्तो भवसागरात् ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: गुरु के ज्ञान और कृपा से पंडित हो या अनपढ़, जो तत्त्व को पहचान लेता है वह संसारसागर की आसक्ति से विरक्त हो जाता है।

अध्याय २ • श्लोक २४

रागद्वेषविनिर्मुक्तः सर्वभूतहिते रतः ।
दृढबोधश्च धीरश्च स गच्छेत्परमं पदम् ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: राग-द्वेष से मुक्त, सभी प्राणियों के हित में लगा हुआ, दृढ़ आत्मबोध वाला और धीर पुरुष परम पद पाता है।

अध्याय २ • श्लोक २५

घटे भिन्ने घटाकाश आकाशे लीयते यथा ।
देहाभावे तथा योगी स्वरूपे परमात्मनि ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: जैसे घड़ा टूटने पर घटाकाश आकाश से अलग नहीं रहता, वैसे ही देह के अभाव में योगी अपने परमात्मस्वरूप से अभिन्न रहता है।

अध्याय २ • श्लोक २६

उक्तेयं कर्मयुक्तानां मतिर्यान्तेऽपि सा गतिः ।
न चोक्ता योगयुक्तानां मतिर्यान्तेऽपि सा गतिः ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: अंत समय की धारणा के अनुसार अगली गति होने का नियम कर्मासक्त लोगों के लिए कहा गया है; आत्मबोध में स्थित योगी पर वही सीमित नियम लागू नहीं किया गया।

अध्याय २ • श्लोक २७

या गतिः कर्मयुक्तानां सा च वागिन्द्रियाद्वदेत् ।
योगिनां या गतिः क्वापि ह्यकथ्या भवतोर्जिता ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: कर्म से बँधे लोगों की गति शब्दों में बताई जा सकती है; योगी की परम आत्मस्थिति इंद्रियों और कथन की सीमा से परे है।

अध्याय २ • श्लोक २८

एवं ज्ञात्वा त्वमुं मार्गं योगिनां नैव कल्पितम् ।
विकल्पवर्जनं तेषां स्वयं सिद्धिः प्रवर्तते ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: योगियों का यह मार्ग केवल कल्पना का निर्माण नहीं है। विकल्पों का आग्रह छूटने पर आत्मसिद्धि स्वयं प्रकट होती है।

अध्याय २ • श्लोक २९

तीर्थे वान्त्यजगेहे वा यत्र कुत्र मृतोऽपि वा ।
न योगी पश्यते गर्भं परे ब्रह्मणि लीयते ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: योगी तीर्थ में शरीर छोड़े या किसी अन्य स्थान पर, आत्मबोध से जन्मबंध में वापस नहीं पड़ता; वह परब्रह्मस्वरूप में स्थित है।

अध्याय २ • श्लोक ३०

सहजमजमचिन्त्यं यस्तु पश्येत्स्वरूपं
घटति यदि यथेष्टं लिप्यते नैव दोषैः ।
सकृदपि तदभावात्कर्म किञ्चिन्नकुर्यात्
तदपि न च विबद्धः संयमी वा तपस्वी ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो सहज, अजन्मा और अचिंत्य आत्मस्वरूप को जानता है, वह व्यवहार में रहते हुए भी दोषों से आत्मतः नहीं लिप्त होता। केवल बाहरी कर्मत्याग या तपस्या से यह बोध नहीं बनता।

अध्याय २ • श्लोक ३१

निरामयं निष्प्रतिमं निराकृतिं
निराश्रयं निर्वपुषं निराशिषम् ।
निर्द्वन्द्वनिर्मोहमलुप्तशक्तिकं
तमीशमात्मानमुपैति शाश्वतम् ॥ ३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: योगी उस शाश्वत ईश्वरस्वरूप आत्मा को पहचानता है जो निरामय, अनुपम, निराकार, निराश्रय, अशरीरी, अपेक्षारहित और द्वंद्व-मोह से परे है।

अध्याय २ • श्लोक ३२

वेदो न दीक्षा न च मुण्डनक्रिया
गुरुर्न शिष्यो न च यन्त्रसम्पदः ।
मुद्रादिकं चापि न यत्र भासते
तमीशमात्मानमुपैति शाश्वतम् ॥ ३२॥

सरल हिंदी भावार्थ: वेद, दीक्षा, सिर मुँडाना, गुरु-शिष्य की बाहरी पहचान, यंत्र और मुद्राएँ जिस परम स्वरूप को सीमित नहीं करतीं, उसी शाश्वत आत्मा का बोध होता है।

अध्याय २ • श्लोक ३३

न शाम्भवं शाक्तिकमानवं न वा
पिण्डं च रूपं च पदादिकं न वा ।
आरम्भनिष्पत्तिघटादिकं च नो
तमीशमात्मानमुपैति शाश्वतम् ॥ ३३॥

सरल हिंदी भावार्थ: शांभव, शाक्त या आणव साधना के भेद, पिंड-रूप-पद और आरंभ-समाप्ति की धारणाओं से परे उस शाश्वत ईश्वरस्वरूप आत्मा को जाना जाता है।

अध्याय २ • श्लोक ३४

यस्य स्वरूपात्सचराचरं जग-
दुत्पद्यते तिष्ठति लीयतेऽपि वा ।
पयोविकारादिव फेनबुद्बुदा-
स्तमीशमात्मानमुपैति शाश्वतम् ॥ ३४॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिस आत्मस्वरूप से चराचर जगत प्रकट होकर टिकता और लीन होता है, जैसे जल से झाग-बुलबुले उठते हैं, उसी शाश्वत अधिष्ठान का बोध होता है।

अध्याय २ • श्लोक ३५

नासानिरोधो न च दृष्टिरासनं
बोधोऽप्यबोधोऽपि न यत्र भासते ।
नाडीप्रचारोऽपि न यत्र किञ्चि-
त्तमीशमात्मानमुपैति शाश्वतम् ॥ ३५॥

सरल हिंदी भावार्थ: श्वास का निरोध, दृष्टि की विधि, आसन, ज्ञान-अज्ञान की मानसिक अवस्था और नाड़ियों की गति से परे उस शाश्वत आत्मा को पहचाना जाता है।

अध्याय २ • श्लोक ३६

नानात्वमेकत्वमुभत्वमन्यता
अणुत्वदीर्घत्वमहत्त्वशून्यता ।
मानत्वमेयत्वसमत्ववर्जितं
तमीशमात्मानमुपैति शाश्वतम् ॥ ३६॥

सरल हिंदी भावार्थ: अनेकता-एकता, भिन्नता, छोटापन-बड़ापन, शून्यता तथा मापने वाले और मापे जाने वाले के भेद से परे वह शाश्वत आत्मतत्त्व है।

अध्याय २ • श्लोक ३७

सुसंयमी वा यदि वा न संयमी
सुसङ्ग्रही वा यदि वा न सङ्ग्रही ।
निष्कर्मको वा यदि वा सकर्मक-
स्तमीशमात्मानमुपैति शाश्वतम् ॥ ३७॥

सरल हिंदी भावार्थ: व्यक्ति संयमी हो या न हो, संग्रह करता हो या न करता हो, बाहरी कर्म करे या न करे—परम आत्मतत्त्व उसका नित्य आधार है; उसका बोध बाहरी पहचान में सीमित नहीं।

अध्याय २ • श्लोक ३८

मनो न बुद्धिर्न शरीरमिन्द्रियं
तन्मात्रभूतानि न भूतपञ्चकम् ।
अहङ्कृतिश्चापि वियत्स्वरूपकं
तमीशमात्मानमुपैति शाश्वतम् ॥ ३८॥

सरल हिंदी भावार्थ: वह शाश्वत आत्मा मन, बुद्धि, शरीर, इंद्रियाँ, तन्मात्राएँ, पंचभूत और अहंकार की सीमा से परे आकाशवत है।

अध्याय २ • श्लोक ३९

विधौ निरोधे परमात्मतां गते
न योगिनश्चेतसि भेदवर्जिते ।
शौचं न वाशौचमलिङ्गभावना
सर्वं विधेयं यदि वा निषिध्यते ॥ ३९॥

सरल हिंदी भावार्थ: भेदरहित चित्त वाले योगी को विधि और निषेध में एक परमात्मतत्त्व का बोध होता है। शौच-अशौच और सभी बाहरी चिह्न आत्मस्वरूप को सीमित नहीं करते।

अध्याय २ • श्लोक ४०

मनो वचो यत्र न शक्तमीरितुं
नूनं कथं तत्र गुरूपदेशता ।
इमां कथामुक्तवतो गुरोस्त-
द्युक्तस्य तत्त्वं हि समं प्रकाशते ॥ ४०॥

सरल हिंदी भावार्थ: जहाँ मन और वाणी पहुँचकर भी तत्त्व को पूर्ण व्यक्त नहीं कर सकते, वहाँ उपदेश भी संकेत है। गुरु के संकेत से युक्त शिष्य में वही सम आत्मतत्त्व प्रकाशित होता है।

भक्ति भावना • मूल संस्कृत पाठ एवं सरल हिंदी भावार्थ

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