अवधूत गीता अध्याय 3: ज्ञानामृत की समरसता — 46 श्लोक हिंदी भावार्थ सहित
अवधूत गीता
अध्याय ३ • ज्ञानामृत की समरसता
अवधूत गीता परंपरा में भगवान दत्तात्रेय से संबद्ध अद्वैत ग्रंथ है। इस अध्याय का विषय है—ज्ञानामृत की समरसता। नीचे अध्याय के सभी ४६ श्लोक मूल संस्कृत पाठ और सरल हिंदी भावार्थ के साथ क्रम से दिए गए हैं।
अध्याय ३ • श्लोक १
रतिविरतिविहीनं निर्मलं निष्प्रपञ्चम् ।
गुणविगुणविहीनं व्यापकं विश्वरूपं
कथमहमिह वन्दे व्योमरूपं शिवं वै ॥ १॥
सरल हिंदी भावार्थ: निर्मल, प्रपंचरहित, राग-विराग और गुण-अगुण के भेद से परे व्यापक आत्मतत्त्व ही सबका स्वरूप है। उस आकाशवत शिव को अपने से अलग मानकर कैसे प्रणाम करूँ?
अध्याय ३ • श्लोक २
कार्यं हि कारणमिदं हि परं शिवश्च ।
एवं विकल्परहितोऽहमलं शिवश्च
स्वात्मानमात्मनि सुमित्र कथं नमामि ॥ २॥
सरल हिंदी भावार्थ: शिवतत्त्व रंगों से परे है और कार्य-कारण का भी मूल आधार है। मैं विकल्परहित उसी आत्मस्वरूप में हूँ; मित्र! अपने को अपने से अलग करके नमस्कार कैसे करूँ?
अध्याय ३ • श्लोक ३
निर्धूमधूमरहितो हि सदोदितोऽहम् ।
निर्दीपदीपरहितो हि सदोदितोऽहं
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ ३॥
सरल हिंदी भावार्थ: मैं मूल-अमूल, धूम-अधूम और दीपक-दीपक के अभाव से परे सदा स्वयंप्रकाश हूँ। मैं ज्ञानामृत, समरस और आकाशवत आत्मस्वरूप हूँ।
अध्याय ३ • श्लोक ४
निःसङ्गसङ्गमिह नाम कथं वदामि ।
निःसारसाररहितं च कथं वदामि
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ ४॥
सरल हिंदी भावार्थ: आत्मा को कामना-निष्कामना, संग-निस्संग या सार-असार के सीमित नामों में कैसे बाँधूँ? मैं ज्ञानामृत, समरस और आकाशवत चेतना हूँ।
अध्याय ३ • श्लोक ५
द्वैतस्वरूपमखिलं हि कथं वदामि ।
नित्यं त्वनित्यमखिलं हि कथं वदामि
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ ५॥
सरल हिंदी भावार्थ: सबको द्वैत या अद्वैत की धारणा में, नित्य या अनित्य के वर्ग में कैसे सीमित करूँ? मैं ज्ञानामृत, समरस और आकाशवत आत्मस्वरूप हूँ।
अध्याय ३ • श्लोक ६
आद्यन्तमध्यरहितं न परापरं हि ।
सत्यं वदामि खलु वै परमार्थतत्त्वं
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ ६॥
सरल हिंदी भावार्थ: परम तत्त्व न मोटा-पतला है, न आता-जाता है; न उसका आदि-मध्य-अंत है, न ऊँच-नीच। मैं उसी सत्य ज्ञानामृत और समरस चेतना का बोध कहता हूँ।
अध्याय ३ • श्लोक ७
संविद्धि सर्वविषयांश्च नभोनिभांश्च ।
संविद्धि चैकममलं न हि बन्धमुक्तं
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ ७॥
सरल हिंदी भावार्थ: सब इंद्रियों और उनके विषयों को आकाशवत अस्थायी आभास जानो। आत्मा एक, निर्मल और बंधन-मुक्ति से परे ज्ञानामृत स्वरूप है।
अध्याय ३ • श्लोक ८
दुर्लक्ष्यलक्ष्यगहनो न भवामि तात ।
आसन्नरूपगहनो न भवामि तात
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ ८॥
सरल हिंदी भावार्थ: वत्स! आत्मा कठिन या सरल ज्ञान की वस्तु, दूर का लक्ष्य या निकट का सीमित रूप नहीं है। मैं समरस, आकाशवत ज्ञानामृत हूँ।
अध्याय ३ • श्लोक ९
निर्दुःखदुःखदहनो ज्वलनो भवामि ।
निर्देहदेहदहनो ज्वलनो भवामि
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ ९॥
सरल हिंदी भावार्थ: कर्म-अकर्म, दुःख-दुःखरहितता और देह-अदेह के भेद मेरे ज्ञानप्रकाश में मिट जाते हैं। मैं समरस और आकाशवत ज्ञानामृत हूँ।
अध्याय ३ • श्लोक १०
निर्धर्मधर्मदहनो हि हुताशनोऽहम् ।
निर्बन्धबन्धदहनो हि हुताशनोऽहं
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ १०॥
सरल हिंदी भावार्थ: पाप-पापरहितता, धर्म-अधर्म और बंधन-मुक्ति के द्वंद्व ज्ञानाग्नि में समाप्त होते हैं। मैं समरस, आकाशवत आत्मस्वरूप हूँ।
अध्याय ३ • श्लोक ११
निर्योगयोगरहितो न भवामि वत्स ।
निश्चित्तचित्तरहितो न भवामि वत्स
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ ११॥
सरल हिंदी भावार्थ: वत्स! आत्मा भाव-अभाव, योग-अयोग और चित्त-चित्तरहितता की मानसिक धारणाओं में सीमित नहीं है। मैं समरस, आकाशवत ज्ञानामृत हूँ।
अध्याय ३ • श्लोक १२
निःशोकशोकपदवीति न मे विकल्पः ।
निर्लोभलोभपदवीति न मे विकल्पो
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ १२॥
सरल हिंदी भावार्थ: मेरे आत्मस्वरूप में मोह-अमोह, शोक-अशोक और लोभ-अलोभ की अलग अवस्था का विकल्प नहीं है। मैं समरस, आकाशवत ज्ञानामृत हूँ।
अध्याय ३ • श्लोक १३
सन्तोषसन्ततिसुखो न च मे कदाचित् ।
अज्ञानबन्धनमिदं न च मे कदाचित्
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ १३॥
सरल हिंदी भावार्थ: संसार की फैलती लता, किसी वस्तु से मिलने वाला सीमित संतोष और अज्ञान का बंधन मेरे नित्य आत्मस्वरूप के गुण नहीं हैं। मैं समरस ज्ञानामृत हूँ।
अध्याय ३ • श्लोक १४
सन्तापसन्ततितमो न च मे विकारः ।
सत्त्वं स्वधर्मजनकं न च मे विकारो
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ १४॥
सरल हिंदी भावार्थ: संसार की प्रवृत्ति बढ़ाने वाला रजस, संताप से जुड़ा तमस और सात्त्विक धर्म पैदा करने वाला सत्त्व—ये प्रकृति के गुण आत्मा के विकार नहीं हैं।
अध्याय ३ • श्लोक १५
सन्तापयोगजनितं न मनः कदाचित् ।
यस्मादहङ्कृतिरियं न च मे कदाचित्
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ १५॥
सरल हिंदी भावार्थ: दुःख देने वाला भाग्य, संतापग्रस्त मन और अहंकार शुद्ध आत्मस्वरूप में कभी उत्पन्न नहीं होते। मैं समरस, आकाशवत ज्ञानामृत हूँ।
अध्याय ३ • श्लोक १६
स्वप्नप्रबोधनिधनं न हिताहितं हि ।
निःसारसारनिधनं न चराचरं हि
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ १६॥
सरल हिंदी भावार्थ: आत्मा चंचलता-स्थिरता, कल्पना-विकल्प, स्वप्न-जागरण, हित-अहित और सार-असार के द्वंद्व से परे है। मैं वही समरस ज्ञानामृत हूँ।
अध्याय ३ • श्लोक १७
वाचामगोचरमिदं न मनो न बुद्धिः ।
एवं कथं हि भवतः कथयामि तत्त्वं
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ १७॥
सरल हिंदी भावार्थ: यह तत्त्व ज्ञाता-ज्ञेय या तर्क के निष्कर्ष की वस्तु नहीं; मन, बुद्धि और वाणी से परे है। इसे पूरी तरह कैसे कहूँ? मैं समरस, आकाशवत ज्ञानामृत हूँ।
अध्याय ३ • श्लोक १८
मन्तर्बहिर्न हि कथं परमार्थतत्त्वम् ।
प्राक्सम्भवं न च रतं न हि वस्तु किञ्चित्
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ १८॥
सरल हिंदी भावार्थ: परम तत्त्व भिन्न-अभिन्न और भीतर-बाहर के भेद से मुक्त है; वह पहले उत्पन्न हुई कोई वस्तु नहीं। मैं समरस, आकाशवत ज्ञानामृत हूँ।
अध्याय ३ • श्लोक १९
दैवादिदोषरहितं त्वहमेव तत्त्वम् ।
संसारशोकरहितं त्वहमेव तत्त्वं
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ १९॥
सरल हिंदी भावार्थ: मैं राग आदि दोषों, भाग्यजनित सीमाओं और संसार के शोक से परे आत्मतत्त्व हूँ। मेरा स्वरूप ज्ञानामृत, समरस और आकाशवत है।
अध्याय ३ • श्लोक २०
कालत्रयं यदि च नेति कथं दिशश्च ।
शान्तं पदं हि परमं परमार्थतत्त्वं
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ २०॥
सरल हिंदी भावार्थ: जहाँ तीन अवस्थाएँ ही परम सीमा नहीं, वहाँ चौथी का विभाजन कैसे हो? जहाँ तीन काल नहीं, वहाँ दिशाएँ कैसे सीमित करें? परम तत्त्व शांत ज्ञानामृत है।
अध्याय ३ • श्लोक २१
विस्तारसंकटमितीह न मे विभागः ।
कोणं हि वर्तुलमितीह न मे विभागो
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ २१॥
सरल हिंदी भावार्थ: मेरे आत्मस्वरूप में लंबा-छोटा, विस्तृत-संकुचित और कोणदार-गोल का भेद नहीं। मैं समरस और आकाशवत ज्ञानामृत हूँ।
अध्याय ३ • श्लोक २२
जातं मृतं न च मनो न च मे कदाचित् ।
निर्व्याकुलं स्थिरमिदं परमार्थतत्त्वं
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ २२॥
सरल हिंदी भावार्थ: माता-पिता, संतान, जन्म-मृत्यु और मन की पहचान शुद्ध आत्मा को सीमित नहीं करती। परम तत्त्व स्थिर, निराकुल और समरस ज्ञानामृत है।
अध्याय ३ • श्लोक २३
निर्लेपलेपमविचारमनन्तरूपम् ।
निष्खण्डखण्डमविचारमनन्तरूपं
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ २३॥
सरल हिंदी भावार्थ: शुद्ध-अशुद्ध, लिप्त-निर्लिप्त और खंड-अखंड की सीमित विचारधारणाओं से परे अनंत आत्मस्वरूप है। मैं समरस, आकाशवत ज्ञानामृत हूँ।
अध्याय ३ • श्लोक २४
स्वर्गादयो वसतयः कथमत्र सन्ति ।
यद्येकरूपममलं परमार्थतत्त्वं
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ २४॥
सरल हिंदी भावार्थ: जब परम तत्त्व एक और निर्मल है, तो ब्रह्मा आदि देवताओं और स्वर्ग आदि लोकों को उससे अलग स्वतंत्र सत्ता कैसे मानूँ? मैं समरस ज्ञानामृत हूँ।
अध्याय ३ • श्लोक २५
निःशेषशेषविमलो हि कथं वदामि ।
निर्लिङ्गलिङ्गविमलो हि कथं वदामि
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ २५॥
सरल हिंदी भावार्थ: आत्मा को “यह नहीं”, शेष-निःशेष या चिह्न-चिह्नरहित जैसी धारणाओं में भी पूरी तरह कैसे कहूँ? मैं समरस, आकाशवत ज्ञानामृत हूँ।
अध्याय ३ • श्लोक २६
निःसङ्गसङ्गरहितं परमं विनोदम् ।
निर्देहदेहरहितं सततं विनोदं
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ २६॥
सरल हिंदी भावार्थ: परम आत्मस्थिति में कर्म-अकर्म, संग-निस्संग और देह-अदेह के आग्रह से परे सहज आनंद है। मैं समरस, आकाशवत ज्ञानामृत हूँ।
अध्याय ३ • श्लोक २७
कौटिल्यदम्भरचना न च मे विकारः ।
सत्यानृतेति रचना न च मे विकारो
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ २७॥
सरल हिंदी भावार्थ: माया का प्रपंच, कुटिलता-दंभ और सत्य-असत्य की मानसिक रचना मेरे आत्मस्वरूप में विकार नहीं करती। मैं समरस ज्ञानामृत हूँ।
अध्याय ३ • श्लोक २८
ह्यन्तः प्रबोधरहितं बधिरो न मूकः ।
एवं विकल्परहितं न च भावशुद्धं
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ २८॥
सरल हिंदी भावार्थ: मेरा आत्मस्वरूप संध्या आदि समय और वियोग से परे है। उसे बोलने-सुनने या मन की किसी विशेष अवस्था से नहीं मापा जा सकता; वह समरस ज्ञानामृत है।
अध्याय ३ • श्लोक २९
निश्चित्तचित्तविगतं हि निराकुलं वै ।
संविद्धि सर्वविगतं हि निराकुलं वै
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ २९॥
सरल हिंदी भावार्थ: मुझे आश्रयदाता-आश्रयरहितता और चित्त-अचित्त के भेद से परे निराकुल आत्मतत्त्व जानो। मैं समरस, आकाशवत ज्ञानामृत हूँ।
अध्याय ३ • श्लोक ३०
संसिद्धसंशयमिदं हि कथं वदामि ।
एवं निरन्तरसमं हि निराकुलं वै
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ ३०॥
सरल हिंदी भावार्थ: आत्मा को वन या मंदिर, सिद्धि या संशय का नाम देकर कैसे सीमित करूँ? वह अखंड, सम और निराकुल ज्ञानामृत है।
अध्याय ३ • श्लोक ३१
निर्बीजबीजरहितं सततं विभाति ।
निर्वाणबन्धरहितं सततं विभाति
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ ३१॥
सरल हिंदी भावार्थ: आत्मतत्त्व जीव-जीवरहितता, बीज-बीजरहितता तथा निर्वाण-बंधन के भेद से परे निरंतर प्रकाशित है। मैं समरस, आकाशवत ज्ञानामृत हूँ।
अध्याय ३ • श्लोक ३२
संसारवर्जितमिदं सततं विभाति ।
संहारवर्जितमिदं सततं विभाति
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ ३२॥
सरल हिंदी भावार्थ: आत्मस्वरूप उत्पत्ति, संसारबंध और विनाश से रहित सदा प्रकाशित है। मैं वही समरस, आकाशवत ज्ञानामृत हूँ।
अध्याय ३ • श्लोक ३३
निर्भिन्नभिन्नमपि ते न हि वस्तु किञ्चित् ।
निर्लज्जमानस करोषि कथं विषादं
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ ३३॥
सरल हिंदी भावार्थ: तुम्हारे नित्य स्वरूप को नाम-रूप और भिन्न-अभिन्न के उल्लेख भी सीमित नहीं करते। हे मन! फिर विषाद क्यों करता है? आत्मा समरस ज्ञानामृत है।
अध्याय ३ • श्लोक ३४
किं नाम रोदिषि सखे न च जन्म दुःखम् ।
किं नाम रोदिषि सखे न च ते विकारो
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ ३४॥
सरल हिंदी भावार्थ: मित्र! शुद्ध आत्मा में बुढ़ापा, मृत्यु, जन्मजनित दुःख और विकार नहीं हैं। फिर क्यों रोते हो? तुम समरस, आकाशवत ज्ञानामृत हो।
अध्याय ३ • श्लोक ३५
किं नाम रोदिषि सखे न च ते विरूपम् ।
किं नाम रोदिषि सखे न च ते वयांसि
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ ३५॥
सरल हिंदी भावार्थ: मित्र! आत्मा किसी सुंदर या विकृत शारीरिक रूप में सीमित नहीं और उसकी उम्र नहीं होती। फिर क्यों शोक करते हो? वह समरस ज्ञानामृत है।
अध्याय ३ • श्लोक ३६
किं नाम रोदिषि सखे न च ते मनांसि ।
किं नाम रोदिषि सखे न तवेन्द्रियाणि
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ ३६॥
सरल हिंदी भावार्थ: मित्र! उम्र, मन और इंद्रियाँ तुम्हारा नित्य आत्मस्वरूप नहीं हैं। उनके कारण आत्मा को दुःखी क्यों मानते हो? वह समरस, आकाशवत ज्ञानामृत है।
अध्याय ३ • श्लोक ३७
किं नाम रोदिषि सखे न च ते प्रलोभः ।
किं नाम रोदिषि सखे न च ते विमोहो
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ ३७॥
सरल हिंदी भावार्थ: मित्र! शुद्ध आत्मा कामना, लोभ और मोह का विकार नहीं है। इनसे अपने को एक मानकर क्यों रोते हो? तुम समरस ज्ञानामृत हो।
अध्याय ३ • श्लोक ३८
ऐश्वर्यमिच्छसि कथं न च ते हि पत्नी ।
ऐश्वर्यमिच्छसि कथं न च ते ममेति
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ ३८॥
सरल हिंदी भावार्थ: आत्मस्वरूप में धन, दांपत्य और “मेरा” की पकड़ नहीं है। फिर उन्हीं से पूर्णता देने वाला ऐश्वर्य क्यों खोजते हो? तुम समरस ज्ञानामृत हो।
अध्याय ३ • श्लोक ३९
निर्लज्जमानसमिदं च विभाति भिन्नम् ।
निर्भेदभेदरहितं न च ते न मे च
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ ३९॥
सरल हिंदी भावार्थ: सूक्ष्म पहचान और जगत की उत्पत्ति के भेद शुद्ध आत्मा में तुम्हारे-मेरे नहीं हैं। मन ही उन्हें अलग दिखाता है; आत्मा भेद-अभेद से परे समरस है।
अध्याय ३ • श्लोक ४०
नो वाणुमात्रमपि ते हि सरागरूपम् ।
नो वाणुमात्रमपि ते हि सकामरूपं
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ ४०॥
सरल हिंदी भावार्थ: शुद्ध आत्मा में राग, विराग या कामना की सीमित पहचान अणुमात्र भी नहीं है। वह समरस, आकाशवत ज्ञानामृत है।
अध्याय ३ • श्लोक ४१
र्ध्यानं न ते हि हृदये न बहिः प्रदेशः ।
ध्येयं न चेति हृदये न हि वस्तु कालो
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ ४१॥
सरल हिंदी भावार्थ: आत्मस्वरूप में ध्याता, ध्यान, ध्येय, समाधि और बाहर का स्थान या समय अलग वास्तविक सत्ता नहीं रखते। मैं समरस, आकाशवत ज्ञानामृत हूँ।
अध्याय ३ • श्लोक ४२
न त्वं न मे न महतो न गुरुर्न न शिष्यः ।
स्वच्छन्दरूपसहजं परमार्थतत्त्वं
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ ४२॥
सरल हिंदी भावार्थ: मैंने समस्त उपदेश का सार कहा—परम तत्त्व में अलग तुम-मैं, गुरु-शिष्य की सीमाएँ नहीं। वही स्वतंत्र, सहज, समरस और आकाशवत ज्ञानामृत है।
अध्याय ३ • श्लोक ४३
कथमिह परमार्थं नैवमानन्दरूपम् ।
कथमिह परमार्थं ज्ञानविज्ञानरूपं
यदि परमहमेकं वर्तते व्योमरूपम् ॥ ४३॥
सरल हिंदी भावार्थ: जब एक ही आकाशवत परम आत्मा है, तो उसे आनंदयुक्त-आनंदरहित या ज्ञान-विज्ञान की किसी सीमित परिभाषा में कैसे बाँधूँ?
अध्याय ३ • श्लोक ४४
मवनिजलविहीनं विद्धि विज्ञानरूपम् ।
समगमनविहीनं विद्धि विज्ञानमेकं
गगनमिव विशालं विद्धि विज्ञानमेकम् ॥ ४४॥
सरल हिंदी भावार्थ: एक चेतन तत्त्व को अग्नि-वायु, पृथ्वी-जल और आने-जाने से परे जानो। वह आकाश के समान असीम ज्ञानस्वरूप है।
अध्याय ३ • श्लोक ४५
न शुद्धरूपं न विशुद्धरूपम् ।
रूपं विरूपं न भवामि किञ्चित्
स्वरूपरूपं परमार्थतत्त्वम् ॥ ४५॥
सरल हिंदी भावार्थ: परम तत्त्व न शून्य-अशून्य की धारणा है, न शुद्ध-अशुद्ध की वस्तुगत पहचान। मैं किसी रूप-विरूप में सीमित नहीं; अपने ही आत्मस्वरूप में हूँ।
अध्याय ३ • श्लोक ४६
त्यागात्यागविषं शुद्धममृतं सहजं ध्रुवम् ॥ ४६॥
सरल हिंदी भावार्थ: संसार की आसक्ति छोड़ो और त्याग का अभिमान भी छोड़ो। पकड़ने-छोड़ने का द्वंद्व विष जैसा है; सहज शुद्ध आत्मतत्त्व अचल अमृत है।
॥ अवधूत गीता — अध्याय ३ सम्पूर्ण ॥
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