अवधूत गीता अध्याय 4: निर्वाणस्वरूप आत्मा — 25 श्लोक हिंदी भावार्थ सहित
अवधूत गीता
अध्याय ४ • निर्वाणस्वरूप आत्मा
अवधूत गीता परंपरा में भगवान दत्तात्रेय से संबद्ध अद्वैत ग्रंथ है। इस अध्याय का विषय है—निर्वाणस्वरूप आत्मा। नीचे अध्याय के सभी २५ श्लोक मूल संस्कृत पाठ और सरल हिंदी भावार्थ के साथ क्रम से दिए गए हैं।
अध्याय ४ • श्लोक १
पुष्पाणि पत्राणि कथं भवन्ति ।
ध्यानानि मन्त्राणि कथं भवन्ति
समासमं चैव शिवार्चनं च ॥ १॥
सरल हिंदी भावार्थ: अखिल आत्मस्वरूप में किसी अलग देवता को बुलाने या विदा करने, पत्ते-फूल चढ़ाने, मंत्र-ध्यान और पूजा करने वाले-पूज्य के भेद की परम सत्ता कहाँ है?
अध्याय ४ • श्लोक २
न केवलं शुद्धविशुद्धमुक्तः ।
न केवलं योगवियोगमुक्तः
स वै विमुक्तो गगनोपमोऽहम् ॥ २॥
सरल हिंदी भावार्थ: मैं केवल बंधन-मुक्ति से ही नहीं, शुद्ध-अशुद्ध और योग-वियोग की धारणाओं से भी परे हूँ। मैं आकाशवत मुक्त आत्मस्वरूप हूँ।
अध्याय ४ • श्लोक ३
सञ्जायते सर्वमिदं वितथ्यम् ।
एवं विकल्पो मम नैव जातः
स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥ ३॥
सरल हिंदी भावार्थ: “यह सब वास्तविक उत्पन्न हुआ है” या “यह सब असत्य है”—ऐसा वैचारिक विकल्प मुझमें नहीं उठता। मैं स्वभाव से शांत, निर्वाणस्वरूप और निरामय हूँ।
अध्याय ४ • श्लोक ४
न चान्तरं वापि निरन्तरं वा ।
अन्तर्विभन्नं न हि मे विभाति
स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥ ४॥
सरल हिंदी भावार्थ: आत्मस्वरूप में लिप्त-निर्लिप्त, बीच का अंतर-अखंडता और भीतर के विभाजन नहीं दिखते। मैं नित्य शांत और निरामय आत्मस्वरूप हूँ।
अध्याय ४ • श्लोक ५
बोधस्वरूपं मम नैव जातम् ।
निर्बोधबोधं च कथं वदामि
स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥ ५॥
सरल हिंदी भावार्थ: ज्ञान या अज्ञान की कोई नई अवस्था आत्मा का जन्म नहीं है। आत्मा को उनके द्वंद्व में कैसे कहूँ? मैं नित्य शांत और निरामय हूँ।
अध्याय ४ • श्लोक ६
न बन्धयुक्तो न च मोक्षयुक्तः ।
युक्तं त्वयुक्तं न च मे विभाति
स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥ ६॥
सरल हिंदी भावार्थ: धर्म-पाप, बंधन-मोक्ष और जुड़ना-न जुड़ना शुद्ध आत्मस्वरूप को नहीं बाँधते। मैं नित्य शांत और निरामय हूँ।
अध्याय ४ • श्लोक ७
मध्यस्थभावो हि न चारिमित्रम् ।
हिताहितं चापि कथं वदामि
स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥ ७॥
सरल हिंदी भावार्थ: ऊँचा-नीचा, मध्यस्थ, शत्रु-मित्र और हित-अहित के भेद शुद्ध स्वरूप में नहीं टिकते। मैं नित्य शांत और निरामय हूँ।
अध्याय ४ • श्लोक ८
न चोपदेशो न च मे क्रिया च ।
संवित्स्वरूपं च कथं वदामि
स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥ ८॥
सरल हिंदी भावार्थ: परम स्वरूप में उपासक और उपास्य, उपदेश और क्रिया का अलग द्वैत नहीं है। उस चेतना को अलग विषय की तरह कैसे कहूँ? मैं नित्य शांत और निरामय हूँ।
अध्याय ४ • श्लोक ९
न चालयं वापि निरालयं वा ।
अशून्यशून्यं च कथं वदामि
स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥ ९॥
सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ व्याप्य-व्यापक और आश्रय-निराश्रय का विभाजन नहीं। शून्य-अशून्य का नाम कैसे दूँ? मैं नित्य शांत और निरामय आत्मा हूँ।
अध्याय ४ • श्लोक १०
न कारणं वा मम नैव कार्यम् ।
अचिन्त्यचिन्त्यं च कथं वदामि
स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥ १०॥
सरल हिंदी भावार्थ: जानने वाला और ग्रहण करने योग्य, कारण-कार्य तथा चिंत्य-अचिंत्य के भेद शुद्ध आत्मस्वरूप की सीमा नहीं हैं। मैं नित्य शांत और निरामय हूँ।
अध्याय ४ • श्लोक ११
न वेदकं वा मम नैव वेद्यम् ।
गतागतं तात कथं वदामि
स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥ ११॥
सरल हिंदी भावार्थ: भेद करने वाला और भेद का विषय, जानने वाला और ज्ञेय अलग नहीं। वत्स! आत्मा के आने-जाने की बात कैसे कहूँ? मैं नित्य शांत हूँ।
अध्याय ४ • श्लोक १२
बुद्धिर्मनो मे न हि चेन्द्रियाणि ।
रागो विरागश्च कथं वदामि
स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥ १२॥
सरल हिंदी भावार्थ: देह-अदेह, बुद्धि, मन और इंद्रियाँ मेरा नित्य स्वरूप नहीं हैं। राग-विराग से आत्मा को कैसे बाँधूँ? मैं नित्य शांत और निरामय हूँ।
अध्याय ४ • श्लोक १३
रुल्लेखमात्रं न तिरोहितं वै ।
समासमं मित्र कथं वदामि
स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥ १३॥
सरल हिंदी भावार्थ: परम स्वरूप में ऊँचा, अलग या छिपा हुआ कुछ नहीं। मित्र! समान-असमान का विभाजन कैसे कहूँ? मैं नित्य शांत और निरामय हूँ।
अध्याय ४ • श्लोक १४
न संयमो मे नियमो न जातः ।
जयाजयौ मित्र कथं वदामि
स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥ १४॥
सरल हिंदी भावार्थ: आत्मा को इंद्रियजीत या इंद्रियपराजित के अहंकारी दावे में नहीं बाँधा जा सकता। विजय-पराजय और संयम-नियम की सीमाओं से परे मैं नित्य शांत हूँ।
अध्याय ४ • श्लोक १५
दाद्यन्तमध्यं न च मे कदाचित् ।
बलाबलं मित्र कथं वदामि
स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥ १५॥
सरल हिंदी भावार्थ: मेरे नित्य स्वरूप का मूर्त-अमूर्त, आदि-मध्य-अंत या बल-दुर्बलता का विभाजन नहीं। मैं स्वभाव से शांत और निरामय हूँ।
अध्याय ४ • श्लोक १६
सञ्जायते तात न मे कदाचित् ।
अशुद्धशुद्धं च कथं वदामि
स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥ १६॥
सरल हिंदी भावार्थ: वत्स! मृत्यु-अमरता, विष-अविष और शुद्ध-अशुद्ध के द्वंद्व मेरे आत्मस्वरूप में उत्पन्न नहीं होते। मैं नित्य शांत और निरामय हूँ।
अध्याय ४ • श्लोक १७
नक्तं दिवा वापि न मे कदाचित् ।
अतुर्यतुर्यं च कथं वदामि
स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥ १७॥
सरल हिंदी भावार्थ: स्वप्न-जागरण, योगमुद्रा, दिन-रात और तुरीय-अतुरीय की अवस्था आत्मा को सीमित नहीं करती। मैं नित्य शांत और निरामय हूँ।
अध्याय ४ • श्लोक १८
माया विमाया न च मे कदाचित् ।
सन्ध्यादिकं कर्म कथं वदामि
स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥ १८॥
सरल हिंदी भावार्थ: मुझे सब-कुछ और उससे परे की मानसिक सीमाओं से मुक्त जानो। माया-अमाया और समयबद्ध क्रियाएँ मेरे नित्य आत्मस्वरूप को नहीं बाँधतीं।
अध्याय ४ • श्लोक १९
संविद्धि मां लक्ष्यविलक्ष्यमुक्तम् ।
योगं वियोगं च कथं वदामि
स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥ १९॥
सरल हिंदी भावार्थ: मुझे समस्त समाधि का आधार और लक्ष्य-अलक्ष्य के भेद से मुक्त जानो। योग-वियोग का विभाजन कैसे कहूँ? मैं नित्य शांत और निरामय हूँ।
अध्याय ४ • श्लोक २०
मौनं विमौनं न च मे कदाचित् ।
तर्कं वितर्कं च कथं वदामि
स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥ २०॥
सरल हिंदी भावार्थ: मैं शुद्ध आत्मा न मूर्ख की पहचान हूँ, न पंडित की। मौन-वाणी और तर्क-वितर्क से परे मैं नित्य शांत और निरामय हूँ।
अध्याय ४ • श्लोक २१
र्जन्मादि मृत्युर्न च मे कदाचित् ।
स्नेहं विमोहं च कथं वदामि
स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥ २१॥
सरल हिंदी भावार्थ: माता-पिता, कुल-जाति और जन्म-मृत्यु शुद्ध आत्मा की सीमाएँ नहीं। आसक्ति और मोह के भेद से परे मैं नित्य शांत और निरामय हूँ।
अध्याय ४ • श्लोक २२
तेजोवितेजो न च मे कदाचित् ।
सन्ध्यादिकं कर्म कथं वदामि
स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥ २२॥
सरल हिंदी भावार्थ: मेरा आत्मप्रकाश कभी अस्त नहीं होता। प्रकाश-अप्रकाश और संध्या आदि समय की क्रियाएँ उसे नहीं बाँधतीं; मैं नित्य शांत और निरामय हूँ।
अध्याय ४ • श्लोक २३
असंशयं विद्धि निरन्तरं माम् ।
असंशयं विद्धि निरञ्जनं मां
स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥ २३॥
सरल हिंदी भावार्थ: निस्संदेह मुझे निराकुल, अखंड और निर्मल आत्मस्वरूप जानो। मैं स्वभाव से निर्वाणमय और निरामय हूँ।
अध्याय ४ • श्लोक २४
शुभाशुभं कर्म परित्यजन्ति ।
त्यागामृतं तात पिबन्ति धीराः
स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥ २४॥
सरल हिंदी भावार्थ: धीर पुरुष ध्यान की प्राप्ति का हठ और शुभ-अशुभ कर्मफल की आसक्ति छोड़कर त्याग का अमृत पीते हैं। आत्मस्वरूप नित्य शांत और निरामय है।
अध्याय ४ • श्लोक २५
छन्दोलक्षणं न हि न हि तत्र ।
समरसमग्नो भावितपूतः
प्रलपति तत्त्वं परमवधूतः ॥ २५॥
सरल हिंदी भावार्थ: जहाँ प्राप्ति-अप्राप्ति और छंद की परिभाषा का आग्रह नहीं, उस समरसता में निमग्न निर्मल परम अवधूत सहज तत्त्वानुभव व्यक्त करता है।
॥ अवधूत गीता — अध्याय ४ सम्पूर्ण ॥
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