अवधूत गीता अध्याय 5: मन को समत्व का उपदेश — 32 श्लोक हिंदी भावार्थ सहित
अवधूत गीता
अध्याय ५ • मन को समत्व का उपदेश
अवधूत गीता परंपरा में भगवान दत्तात्रेय से संबद्ध अद्वैत ग्रंथ है। इस अध्याय का विषय है—मन को समत्व का उपदेश। नीचे अध्याय के सभी ३२ श्लोक मूल संस्कृत पाठ और सरल हिंदी भावार्थ के साथ क्रम से दिए गए हैं।
अध्याय ५ • श्लोक १
न परापरसारविचार इति ।
अविलासविलासनिराकरणं
कथमक्षरबिन्दुसमुच्चरणम् ॥ १॥
सरल हिंदी भावार्थ: “ॐ” से जिसका संकेत किया गया है, वह आकाशवत तत्त्व ऊँच-नीच और सार-असार की धारणाओं से परे है। प्रकट-अप्रकट के भेद से रहित उसे अक्षर और बिंदु के उच्चारण में कैसे सीमित करें?
अध्याय ५ • श्लोक २
प्रतिपादितमात्मनि तत्त्वमसि ।
त्वमुपाधिविवर्जितसर्वसमं
किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥ २॥
सरल हिंदी भावार्थ: “तत्त्वमसि” आदि श्रुतियाँ कहती हैं कि तुम वही आत्मतत्त्व हो। तुम उपाधिरहित और सबमें समान हो; हे मन! फिर क्यों शोक करता है?
अध्याय ५ • श्लोक ३
बहिरन्तरवर्जितसर्वसमम् ।
यदि चैकविवर्जितसर्वसमं
किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥ ३॥
सरल हिंदी भावार्थ: जो नीचे-ऊपर, बाहर-भीतर और सीमित एकत्व की धारणा से भी परे सबमें सम है, वही तुम्हारा स्वरूप है। हे मन! फिर क्यों रोता है?
अध्याय ५ • श्लोक ४
न हि कारणकार्यविचार इति ।
पदसन्धिविवर्जितसर्वसमं
किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥ ४॥
सरल हिंदी भावार्थ: परम तत्त्व कल्पनाओं, कारण-कार्य के विचार और शब्दों के जोड़ से परे सम है। हे मन! उस आत्मस्वरूप में स्थित होकर शोक क्यों करता है?
अध्याय ५ • श्लोक ५
न हि देशविदेशसमाधिरिति ।
न हि कालविकालसमाधिरिति
किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥ ५॥
सरल हिंदी भावार्थ: आत्मा की पूर्णता ज्ञान-अज्ञान, देश-विदेश और समय-असमय की किसी विशेष समाधि में सीमित नहीं। हे मन! सम स्वरूप को जानकर शोक छोड़।
अध्याय ५ • श्लोक ६
न हि जीववपुर्न हि जीव इति ।
न हि कारणकार्यविभाग इति
किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥ ६॥
सरल हिंदी भावार्थ: घड़ा और घटाकाश, जीव और जीव का शरीर, कारण और कार्य—इनका अलग विभाजन परम तत्त्व नहीं है। हे मन! फिर क्यों शोक करता है?
अध्याय ५ • श्लोक ७
लघुदीर्घविचारविहीन इति ।
न हि वर्तुलकोणविभाग इति
किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥ ७॥
सरल हिंदी भावार्थ: मुक्त आत्मपद सबमें अखंड है; वह छोटा-बड़ा, गोल या कोणदार नहीं। हे मन! सम आत्मस्वरूप को जानकर शोक छोड़।
अध्याय ५ • श्लोक ८
इह शुद्धविशुद्धविहीन इति ।
इह सर्वविसर्वविहीन इति
किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥ ८॥
सरल हिंदी भावार्थ: आत्मतत्त्व शून्य-अशून्य, शुद्ध-अशुद्ध और सर्व-असर्व की धारणाओं से परे है। हे मन! उस सम स्वरूप में शोक क्यों करता है?
अध्याय ५ • श्लोक ९
बहिरन्तरसन्धिविचार इति ।
अरिमित्रविवर्जितसर्वसमं
किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥ ९॥
सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ भिन्न-अभिन्न, बाहर-भीतर और शत्रु-मित्र का आग्रह नहीं है। हे मन! सबमें सम आत्मा को जानकर शोक छोड़।
अध्याय ५ • श्लोक १०
न चराचरभेदविचार इति ।
इह सर्वनिरन्तरमोक्षपदं
किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥ १०॥
सरल हिंदी भावार्थ: शिष्य और अशिष्य या चर-अचर के भेद अखंड मुक्त आत्मपद को सीमित नहीं करते। हे मन! फिर क्यों शोक करता है?
अध्याय ५ • श्लोक ११
ननु भिन्नविभिन्नविहीन इति ।
ननु सर्गविसर्गविहीन इति
किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥ ११॥
सरल हिंदी भावार्थ: परम आत्मा रूप-विरूप, भिन्न-अभिन्न और सृष्टि-विसर्जन के द्वंद्व से परे है। हे मन! उस सम स्वरूप में शोक क्यों करता है?
अध्याय ५ • श्लोक १२
मृतजीवनकर्म करोमि कथम् ।
इति शुद्धनिरञ्जनसर्वसमं
किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥ १२॥
सरल हिंदी भावार्थ: शुद्ध आत्मा गुण-अगुण के पाश से नहीं बँधती। उसके नित्य स्वरूप में जीवन-मृत्यु के कर्म का कर्ता कौन? हे मन! शोक छोड़।
अध्याय ५ • श्लोक १३
इह कामविकामविहीन इति ।
इह बोधतमं खलु मोक्षसमं
किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥ १३॥
सरल हिंदी भावार्थ: आत्मतत्त्व भाव-अभाव और कामना-निष्कामना के भेद से परे परम बोध तथा मुक्तिस्वरूप है। हे मन! सम आत्मा को जानकर शोक छोड़।
अध्याय ५ • श्लोक १४
न हि सन्धिविसन्धिविहीन इति ।
यदि सर्वविवर्जितसर्वसमं
किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥ १४॥
सरल हिंदी भावार्थ: एक अखंड तत्त्व को जोड़ने-तोड़ने का कोई वास्तविक बंधन नहीं। वह सभी सीमाओं से परे सम है; हे मन! फिर क्यों शोक करता है?
अध्याय ५ • श्लोक १५
इहसङ्गविसङ्गविहीनपरम् ।
इह बोधविबोधविहीनपरं
किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥ १५॥
सरल हिंदी भावार्थ: बेघर अवस्था, कुटिया या परिवार—इन बाहरी स्थितियों में आत्मा सम है। वह संग-निस्संग और ज्ञान-अज्ञान की मानसिक पहचान से परे है; हे मन! शोक छोड़।
अध्याय ५ • श्लोक १६
अविलक्षविलक्षमसत्यमिति ।
यदि केवलमात्मनि सत्यमिति
किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥ १६॥
सरल हिंदी भावार्थ: विकार-अविकार और लक्ष्य-अलक्ष्य की धारणाएँ अंतिम आत्मसत्य नहीं। जब केवल आत्मा ही परम सत्य है, तब हे मन! शोक क्यों करता है?
अध्याय ५ • श्लोक १७
इह सर्वनिरन्तरजीव इति ।
इह केवलनिश्चलजीव इति
किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥ १७॥
सरल हिंदी भावार्थ: सब जीवों का अंतरतम जीवन एक, अखंड और अचल आत्मतत्त्व है। हे मन! उस सम स्वरूप को पहचानकर शोक छोड़।
अध्याय ५ • श्लोक १८
अविकल्पविकल्पमबोध इति ।
यदि चैकनिरन्तरबोध इति
किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥ १८॥
सरल हिंदी भावार्थ: विवेक-अविवेक और विकल्प-निर्विकल्प के वैचारिक वर्ग अंतिम बोध नहीं हैं। वास्तविक चेतना एक और अखंड है; हे मन! फिर शोक क्यों?
अध्याय ५ • श्लोक १९
न हि पुण्यपदं न हि पापपदम् ।
न हि पूर्णपदं न हि रिक्तपदं
किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥ १९॥
सरल हिंदी भावार्थ: परम आत्मा बंधन-मोक्ष, पुण्य-पाप और पूर्ण-रिक्त की सीमित पहचान से परे है। हे मन! उस सम स्वरूप में शोक छोड़।
अध्याय ५ • श्लोक २०
यदि कारणकार्यविहीनसमम् ।
यदिभेदविभेदविहीनसमं
किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥ २०॥
सरल हिंदी भावार्थ: आत्मा वर्ण-अवर्ण, कारण-कार्य और भेद-अभेद से परे समान तत्त्व है। हे मन! फिर क्यों रोता है?
अध्याय ५ • श्लोक २१
इह केवलनिश्चलसर्वचिते ।
द्विपदादिविवर्जितसर्वचिते
किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥ २१॥
सरल हिंदी भावार्थ: अखंड चेतना सर्वत्र है, अपने में अचल है और दोपायों आदि शरीरगत वर्गों से सीमित नहीं। हे मन! सम आत्मस्वरूप को जानकर शोक छोड़।
अध्याय ५ • श्लोक २२
अतिनिर्मलनिश्चलसर्वगतम् ।
दिनरात्रिविवर्जितसर्वगतं
किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥ २२॥
सरल हिंदी भावार्थ: परम आत्मा सर्वव्यापी, अत्यंत निर्मल, अचल और दिन-रात के भेद से परे है। हे मन! फिर शोक क्यों करता है?
अध्याय ५ • श्लोक २३
न हि योगवियोगसमागमनम् ।
न हि तर्कवितर्कसमागमनं
किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥ २३॥
सरल हिंदी भावार्थ: आत्मस्वरूप में बंधन-मुक्ति, योग-वियोग और तर्क-वितर्क का वास्तविक मेल या अलगाव नहीं। हे मन! फिर क्यों शोक करता है?
अध्याय ५ • श्लोक २४
अणुमात्रकृशानुनिराकरणम् ।
न हि केवलसत्यनिराकरणं
किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥ २४॥
सरल हिंदी भावार्थ: काल-अकाल और सूक्ष्म अग्नि आदि सीमित तत्त्वों की धारणाएँ पार की जाती हैं, लेकिन एक परम सत्य का निषेध नहीं होता। हे मन! शोक छोड़।
अध्याय ५ • श्लोक २५
ननु स्वप्नसुषुप्तिविहीनपरम् ।
अभिधानविधानविहीनपरं
किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥ २५॥
सरल हिंदी भावार्थ: आत्मतत्त्व देह-अदेह, स्वप्न-सुषुप्ति, नामकरण और विधि की सीमाओं से परे है। हे मन! उस सम स्वरूप को जानकर शोक छोड़।
अध्याय ५ • श्लोक २६
अतिसर्वविवर्जितसर्वसमम् ।
गतसारविसारविकारसमं
किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥ २६॥
सरल हिंदी भावार्थ: आकाशवत शुद्ध, विशाल और सम आत्मा सभी मानसिक सीमाओं तथा सार-असार के विकार से परे है। हे मन! फिर क्यों शोक करता है?
अध्याय ५ • श्लोक २७
मिह वस्तुविवस्तुविरागतरम् ।
इह कामविकामविरागतरं
किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥ २७॥
सरल हिंदी भावार्थ: धर्म-अधर्म के दावे, वस्तु-अवस्तु की पकड़ और कामना-निष्कामना के द्वंद्व से परे परम अनासक्ति है। हे मन! सम आत्मा में शोक छोड़।
अध्याय ५ • श्लोक २८
मिह शोकविशोकविहीनपरम् ।
गुरुशिष्यविवर्जिततत्त्वपरं
किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥ २८॥
सरल हिंदी भावार्थ: परम तत्त्व सुख-दुःख, शोक-अशोक और गुरु-शिष्य के द्वैत से परे सम है। हे मन! अपने स्वरूप को जानकर शोक क्यों करता है?
अध्याय ५ • श्लोक २९
न चलाचलसाम्यविसाम्यमिति ।
अविचारविचारविहीनमिति
किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥ २९॥
सरल हिंदी भावार्थ: अंकुर और उसके सार, चर-अचर की समानता-असमानता तथा विचार-अविचार के भेद आत्मा को नहीं बाँधते। हे मन! शोक छोड़।
अध्याय ५ • श्लोक ३०
कथितं निजभावविभेद इति ।
विषये करणत्वमसत्यमिति
किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥ ३०॥
सरल हिंदी भावार्थ: मैंने सभी सारों का सार कहा है। निज आत्मस्वरूप में भेद कल्पित है और इंद्रियविषयों को अलग कर्ता या स्थायी आधार मानना भ्रम है। हे मन! शोक छोड़।
अध्याय ५ • श्लोक ३१
वियदादिरिदं मृगतोयसमम् ।
यदि चैकनिरन्तरसर्वसमं
किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥ ३१॥
सरल हिंदी भावार्थ: श्रुतियाँ अनेक प्रकार से आकाश आदि जगत को मृगतृष्णा के जल जैसा बताती हैं। एक अखंड सम आत्मतत्त्व ही आधार है; हे मन! शोक क्यों करता है?
अध्याय ५ • श्लोक ३२
छन्दोलक्षणं न हि न हि तत्र ।
समरसमग्नो भावितपूतः
प्रलपति तत्त्वं परमवधूतः ॥ ३२॥
सरल हिंदी भावार्थ: जहाँ प्राप्ति-अप्राप्ति और छंद की सीमित परिभाषाएँ नहीं, उस समरसता में निमग्न निर्मल परम अवधूत सहज तत्त्वानुभव व्यक्त करता है।
॥ अवधूत गीता — अध्याय ५ सम्पूर्ण ॥
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