अवधूत गीता अध्याय 6: अखंड शिवतत्त्व — 27 श्लोक हिंदी भावार्थ सहित
अवधूत गीता
अध्याय ६ • अखंड शिवतत्त्व
अवधूत गीता परंपरा में भगवान दत्तात्रेय से संबद्ध अद्वैत ग्रंथ है। इस अध्याय का विषय है—अखंड शिवतत्त्व। नीचे अध्याय के सभी २७ श्लोक मूल संस्कृत पाठ और सरल हिंदी भावार्थ के साथ क्रम से दिए गए हैं।
अध्याय ६ • श्लोक १
वियदादिरिदं मृगतोयसमम् ।
यदि चैकनिरन्तरसर्वशिव-
मुपमेयमथोह्युपमा च कथम् ॥ १॥
सरल हिंदी भावार्थ: श्रुतियाँ अनेक प्रकार से आकाश आदि दृश्य जगत को मृगतृष्णा के जल जैसा कहती हैं। जब सब एक अखंड शिवतत्त्व है, तब अलग उपमा और उपमेय कहाँ हैं?
अध्याय ६ • श्लोक २
ननु कार्यविकार्यविहीनपरम् ।
यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं
यजनं च कथं तपनं च कथम् ॥ २॥
सरल हिंदी भावार्थ: परम तत्त्व विभाजन-अविभाजन और कार्य-अकार्य के भेद से परे है। जब सब एक अखंड शिवस्वरूप है, तब अलग यज्ञ और तप का परम स्तर पर विभाजन कहाँ है?
अध्याय ६ • श्लोक ३
ह्यविशालविशालविहीनपरम् ।
मन एव निरन्तरसर्वशिवं
मनसापि कथं वचसा च कथम् ॥ ३॥
सरल हिंदी भावार्थ: मन का वास्तविक आधार अखंड, सर्वव्यापी और छोटे-बड़े से परे चेतना है। उस एक शिवतत्त्व को मन और वाणी की सीमा में कैसे बाँधें?
अध्याय ६ • श्लोक ४
मुदितानुदितस्य निराकरणम् ।
यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं
रविचन्द्रमसौ ज्वलनश्च कथम् ॥ ४॥
सरल हिंदी भावार्थ: जहाँ दिन-रात और उदय-अनुदय का भेद पार हो गया, उस अखंड शिवतत्त्व में सूर्य, चंद्र और अग्नि अलग स्वतंत्र सत्ता कैसे रखें?
अध्याय ६ • श्लोक ५
गतचेष्टविचेष्टविभेद इति ।
यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं
बहिरन्तरभिन्नमतिश्च कथम् ॥ ५॥
सरल हिंदी भावार्थ: कामना-निष्कामना और चेष्टा-अचेष्टा के भेद परम आत्मा को नहीं बाँधते। जब सब अखंड शिवतत्त्व है, तो भीतर-बाहर का वास्तविक अंतर कैसे हो?
अध्याय ६ • श्लोक ६
यदि शून्यविशून्यविहीन इति ।
यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं
प्रथमं च कथं चरमं च कथम् ॥ ६॥
सरल हिंदी भावार्थ: जो सार-असार और शून्य-अशून्य से परे एक अखंड शिवतत्त्व है, उसमें प्रथम और अंतिम का भेद कैसे हो?
अध्याय ६ • श्लोक ७
यदि वेदकवेद्यनिराकरणम् ।
यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं
तृतीयं च कथं तुरीयं च कथम् ॥ ७॥
सरल हिंदी भावार्थ: जहाँ भेद-अभेद और ज्ञाता-ज्ञेय की धारणाएँ मिटती हैं, उस अखंड शिवतत्त्व में तीसरी और चौथी अवस्था का सीमांकन कैसे हो?
अध्याय ६ • श्लोक ८
विदिताविदितं न हि सत्यमिति ।
यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं
विषयेन्द्रियबुद्धिमनांसि कथम् ॥ ८॥
सरल हिंदी भावार्थ: कही-अनकही और जानी-अनजानी धारणाएँ अंतिम सत्य नहीं। जब सब एक अखंड शिवतत्त्व है, तो विषय, इंद्रियाँ, बुद्धि और मन उससे अलग कैसे हों?
अध्याय ६ • श्लोक ९
धरणी दहनो न हि सत्यमिति ।
यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं
जलदश्च कथं सलिलं च कथम् ॥ ९॥
सरल हिंदी भावार्थ: आकाश, वायु, पृथ्वी और अग्नि स्वतंत्र परम सत्य नहीं हैं। जब सब एक अखंड शिवतत्त्व है, तब मेघ और जल भी उससे अलग कैसे हों?
अध्याय ६ • श्लोक १०
यदि कल्पितदेवनिराकरणम् ।
यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं
गुणदोषविचारमतिश्च कथम् ॥ १०॥
सरल हिंदी भावार्थ: कल्पित लोकों और देवताओं की अलग स्वतंत्र सत्ता का आग्रह छोड़ने पर, एक अखंड शिवतत्त्व में गुण-दोष का सीमित विचार कैसे टिके?
अध्याय ६ • श्लोक ११
करणाकरणं हि निराकरणम् ।
यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं
गमनागमनं हि कथं वदति ॥ ११॥
सरल हिंदी भावार्थ: जहाँ मृत्यु-अमरता और करना-न करना का द्वंद्व मिट गया, वहाँ अखंड शिवतत्त्व का आना-जाना कैसे कहा जाए?
अध्याय ६ • श्लोक १२
न हि कारणकार्यविभेद इति ।
यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं
पुरुषापुरुषं च कथं वदति ॥ १२॥
सरल हिंदी भावार्थ: प्रकृति-पुरुष और कारण-कार्य में मूल तत्त्व का अलगाव नहीं। जब सब एक अखंड शिवस्वरूप है, तो पुरुष-अपुरुष का भेद कैसे हो?
अध्याय ६ • श्लोक १३
न गुणाद्द्वितीयस्य समागमनम् ।
यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं
स्थविरश्च युवा च शिशुश्च कथम् ॥ १३॥
सरल हिंदी भावार्थ: अद्वैत आत्मा को गुणों से उत्पन्न द्वैत या किसी तीसरी अवस्था का दुःख नहीं घेरता। वहाँ बूढ़े, युवा और शिशु की देहगत सीमाएँ कैसे हों?
अध्याय ६ • श्लोक १४
ननु कारणकर्तृविहीनपरम् ।
यदि चैकनिरन्तरसर्वशिव-
मविनष्टविनष्टमतिश्च कथम् ॥ १४॥
सरल हिंदी भावार्थ: परम तत्त्व वर्णाश्रम, कारण और कर्ता की पहचान से परे है। जब सब अखंड शिवस्वरूप है, तो नष्ट-अनष्ट की धारणा कैसे बाँधे?
अध्याय ६ • श्लोक १५
जनिताजनितं च वितथ्यमिति ।
यदि चैकनिरन्तरसर्वशिव-
मविनाशि विनाशि कथं हि भवेत् ॥ १५॥
सरल हिंदी भावार्थ: ग्रस्त-अग्रस्त और उत्पन्न-अनुत्पन्न की धारणाएँ आत्मा का अंतिम स्वरूप नहीं। एक अखंड शिवतत्त्व को नाशवान-अविनाशी के द्वंद्व में कैसे बाँधें?
अध्याय ६ • श्लोक १६
वनितावनितस्य विनष्टमिति ।
यदि चैकनिरन्तरसर्वशिव-
मविनोदविनोदमतिश्च कथम् ॥ १६॥
सरल हिंदी भावार्थ: पुरुष-अपुरुष और स्त्री-अस्त्री के भेद आत्मस्वरूप में मिट जाते हैं। एक अखंड शिवतत्त्व में आनंदपूर्ण-अनानंदपूर्ण का द्वंद्व कैसे बने?
अध्याय ६ • श्लोक १७
यदि संशयशोकविहीनपरः ।
यदि चैकनिरन्तरसर्वशिव-
महमत्र ममेति कथं च पुनः ॥ १७॥
पाठ-टिप्पणी: उपलब्ध संस्कृत पाठ में श्लोक-संख्या के बाद “महमेति” भी दर्ज है; उसे यहाँ अलग दिखाया गया है।
सरल हिंदी भावार्थ: परम स्वरूप मोह, विषाद, संशय और शोक से परे है। जब सब एक अखंड शिवतत्त्व है, तो अलग “मैं यहाँ हूँ” और “यह मेरा है”—ऐसी पकड़ कैसे बने?
अध्याय ६ • श्लोक १८
ननु बन्धविबन्धविनाश इति ।
यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं-
मिहदुःखविदुःखमतिश्च कथम् ॥ १८॥
सरल हिंदी भावार्थ: धर्म-अधर्म और बंधन-मुक्ति के द्वंद्व शांत होने पर, एक अखंड शिवतत्त्व में दुःख-दुःखरहितता का अलग भेद कैसे टिके?
अध्याय ६ • श्लोक १९
न हुताशनवस्तुविभाग इति ।
यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं
वद कर्मफलानि भवन्ति कथम् ॥ १९॥
सरल हिंदी भावार्थ: जहाँ यज्ञकर्ता और यज्ञ, अग्नि और आहुति की अलग परम सत्ता नहीं, वहाँ अखंड शिवतत्त्व के लिए अलग कर्मफल कैसे माना जाए?
अध्याय ६ • श्लोक २०
ननु दर्पविदर्पविमुक्त इति ।
यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं
ननु रागविरागमतिश्च कथम् ॥ २०॥
सरल हिंदी भावार्थ: परम आत्मा शोक-अशोक और गर्व-अगर्व से मुक्त है। जब सब एक अखंड शिवस्वरूप है, तो राग-विराग की सीमित धारणा कैसे हो?
अध्याय ६ • श्लोक २१
न हि लोभविलोभविकार इति ।
यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं
ह्यविवेकविवेकमतिश्च कथम् ॥ २१॥
सरल हिंदी भावार्थ: परम स्वरूप में मोह-अमोह और लोभ-अलोभ के विकार नहीं। एक अखंड शिवतत्त्व को विवेक-अविवेक के मानसिक द्वंद्व में कैसे सीमित करें?
अध्याय ६ • श्लोक २२
कुलजातिविचारमसत्यमिति ।
अहमेव शिवः परमार्थ इति
अभिवादनमत्र करोमि कथम् ॥ २२॥
सरल हिंदी भावार्थ: परम आत्मदृष्टि में अलग तुम और मैं नहीं; कुल-जाति की सीमाएँ अंतिम सत्य नहीं। मैं स्वयं शिवस्वरूप हूँ, तो किसी दूसरे को अलग मानकर प्रणाम कैसे करूँ?
अध्याय ६ • श्लोक २३
उपदेशविचारविशीर्ण इति ।
अहमेव शिवः परमार्थ इति
अभिवादनमत्र करोमि कथम् ॥ २३॥
सरल हिंदी भावार्थ: गुरु-शिष्य और उपदेश की अलग पहचान का आग्रह परम बोध में शांत होता है। मैं ही शिवस्वरूप हूँ, तो दूसरे का अलग अभिवादन कैसे करूँ?
अध्याय ६ • श्लोक २४
न हि कल्पितलोकविभाग इति ।
अहमेव शिवः परमार्थ इति
अभिवादनमत्र करोमि कथम् ॥ २४॥
सरल हिंदी भावार्थ: कल्पित देहों और लोकों का अलगाव परम सत्य नहीं। मैं वही शिवस्वरूप तत्त्व हूँ; वहाँ अपने से अलग किसका अभिवादन करूँ?
अध्याय ६ • श्लोक २५
ननु निर्मलनिश्चलशुद्ध इति ।
अहमेव शिवः परमार्थ इति
अभिवादनमत्र करोमि कथम् ॥ २५॥
सरल हिंदी भावार्थ: परम आत्मा रजसयुक्त-रजसरहित के वर्ग से परे निर्मल, अचल और शुद्ध है। मैं वही शिवतत्त्व हूँ; अलग किसे प्रणाम करूँ?
अध्याय ६ • श्लोक २६
अनृतं चरितं न हि सत्यमिति ।
अहमेव शिवः परमार्थ इति
अभिवादनमत्र करोमि कथम् ॥ २६॥
सरल हिंदी भावार्थ: देह-अदेह के विकल्प और परिवर्तनशील व्यवहार परम आत्मसत्य नहीं हैं। मैं स्वयं शिवस्वरूप हूँ; वहाँ अलग किसका अभिवादन करूँ?
अध्याय ६ • श्लोक २७
छन्दोलक्षणं न हि न हि तत्र ।
समरसमग्नो भावितपूतः
प्रलपति तत्त्वं परमवधूतः ॥ २७॥
सरल हिंदी भावार्थ: जहाँ प्राप्ति-अप्राप्ति और छंद की सीमित परिभाषाएँ नहीं, उस समरसता में निमग्न निर्मल परम अवधूत सहज तत्त्वानुभव व्यक्त करता है।
॥ अवधूत गीता — अध्याय ६ सम्पूर्ण ॥
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