अवधूत गीता अध्याय 7: अवधूत की सहज अवस्था — 15 श्लोक हिंदी भावार्थ सहित
अवधूत गीता
अध्याय ७ • अवधूत की सहज अवस्था
अवधूत गीता परंपरा में भगवान दत्तात्रेय से संबद्ध अद्वैत ग्रंथ है। इस अध्याय का विषय है—अवधूत की सहज अवस्था। नीचे अध्याय के सभी १५ श्लोक मूल संस्कृत पाठ और सरल हिंदी भावार्थ के साथ क्रम से दिए गए हैं।
अध्याय ७ • श्लोक १
पुण्यापुण्यविवर्जितपन्थः ।
शून्यागारे तिष्ठति नग्नो
शुद्धनिरञ्जनसमरसमग्नः ॥ १॥
सरल हिंदी भावार्थ: अवधूत सड़क से मिले कपड़ों की कंथा धारण कर सकता है या आवरणरहित एकांत में रह सकता है। वह पुण्य-पाप के फल की आसक्ति से परे निर्मल आत्मसमरसता में निमग्न रहता है।
अध्याय ७ • श्लोक २
युक्तायुक्तविवर्जितदक्षः ।
केवलतत्त्वनिरञ्जनपूतो
वादविवादः कथमवधूतः ॥ २॥
सरल हिंदी भावार्थ: उसका लक्ष्य लक्ष्य-अलक्ष्य के भेद से परे है और उसकी कुशलता बाहरी युक्त-अयुक्त की पहचान में सीमित नहीं। शुद्ध तत्त्व में स्थित अवधूत वाद-विवाद में क्यों उलझे?
अध्याय ७ • श्लोक ३
शौचाचारविवर्जितयुक्ताः ।
एवं सर्वविवर्जितशान्ता-
स्तत्त्वं शुद्धनिरञ्जनवन्तः ॥ ३॥
सरल हिंदी भावार्थ: आशा के पाश से मुक्त, बाहरी शुचिता के अहंकार से परे और सभी आग्रह छोड़कर शांत हुए साधक निर्मल आत्मतत्त्व में स्थित होते हैं।
अध्याय ७ • श्लोक ४
कथमिह रागविरागविचारः ।
निर्मलनिश्चलगगनाकारं
स्वयमिह तत्त्वं सहजाकारम् ॥ ४॥
सरल हिंदी भावार्थ: शुद्ध, अचल, आकाशवत और सहज आत्मस्वरूप में देह-अदेह तथा राग-विराग का सीमित विचार कहाँ रहता है?
अध्याय ७ • श्लोक ५
रूपमरूपं कथमिह तत्र ।
गगनाकारः परमो यत्र
विषयीकरणं कथमिह तत्र ॥ ५॥
सरल हिंदी भावार्थ: जहाँ परम तत्त्व आकाशवत अपने में स्थित है, वहाँ रूप-अरूप का भेद और उसे इंद्रियविषय बनाने की कल्पना कैसे हो?
अध्याय ७ • श्लोक ६
स्तत्त्वविशुद्धनिरञ्जनहंसः ।
एवं कथमिह भिन्नविभिन्नं
बन्धविबन्धविकारविभिन्नम् ॥ ६॥
सरल हिंदी भावार्थ: परम आत्मस्वरूप आकाशवत अखंड, शुद्ध और निर्मल हंस के समान है। उसमें भिन्न-अभिन्न, बंधन-मुक्ति और विकार के भेद कैसे हों?
अध्याय ७ • श्लोक ७
योगवियोगौ कथमिह गर्वम् ।
एवं परमनिरन्तरसर्व-
मेवं कथमिह सारविसारम् ॥ ७॥
सरल हिंदी भावार्थ: सब केवल अखंड आत्मतत्त्व है। तब योग-वियोग का गर्व और सार-असार का अलग आग्रह कैसे बना रहे?
अध्याय ७ • श्लोक ८
गगनाकारनिरन्तरशुद्धम् ।
एवं कथमिह सङ्गविसङ्गं
सत्यं कथमिह रङ्गविरङ्गम् ॥ ८॥
सरल हिंदी भावार्थ: सब एक निर्मल, आकाशवत और अखंड शुद्ध तत्त्व है। तब संग-निस्संग और रंग-रंगरहितता का वास्तविक विभाजन कैसे हो?
अध्याय ७ • श्लोक ९
भोगविभोगै रहितो भोगी ।
एवं चरति हि मन्दं मन्दं
मनसा कल्पितसहजानन्दम् ॥ ९॥
सरल हिंदी भावार्थ: सच्चा योगी योग-वियोग के आग्रह से और आत्मरस का भोक्ता भोग-अभोग के द्वंद्व से मुक्त होकर धीरे, सहज भाव से विचरता है।
अध्याय ७ • श्लोक १०
द्वैताद्वैतैः कथमिह मुक्तः ।
सहजो विरजः कथमिह योगी
शुद्धनिरञ्जनसमरसभोगी ॥ १०॥
सरल हिंदी भावार्थ: जो नित्य चेतनस्वरूप में स्थित है, उसे द्वैत-अद्वैत के वैचारिक वर्ग में कैसे बाँधें? वह सहज, रजोरहित और निर्मल समरसता का अनुभव करता है।
अध्याय ७ • श्लोक ११
लग्नालग्नविवर्जितलग्नः ।
एवं कथमिह सारविसारः
समरसतत्त्वं गगनाकारः ॥ ११॥
सरल हिंदी भावार्थ: टूटना-न टूटना और जुड़ना-न जुड़ना के द्वंद्व से परे आकाशवत समरस आत्मतत्त्व में सार-असार का अलग भेद कैसे हो?
अध्याय ७ • श्लोक १२
सर्वं तत्त्वविवर्जितमुक्तः ।
एवं कथमिह जीवितमरणं
ध्यानाध्यानैः कथमिह करणम् ॥ १२॥
सरल हिंदी भावार्थ: जो सदा सभी सीमित आग्रहों से मुक्त आत्मस्वरूप में स्थित है, उसे जीवन-मृत्यु और ध्यान-अध्यान की क्रियाएँ कैसे बाँध सकती हैं?
अध्याय ७ • श्लोक १३
अखण्डितमनाकारो वर्तते केवलः शिवः ॥ १३॥
सरल हिंदी भावार्थ: यह दृश्य जगत इंद्रजाल और मरुभूमि की मृगतृष्णा जैसा है। वास्तविक आधार एक अखंड, निराकार शिवतत्त्व है।
अध्याय ७ • श्लोक १४
कथं रागविरागैश्च कल्पयन्ति विपश्चितः ॥ १४॥
सरल हिंदी भावार्थ: हम धर्म से लेकर मोक्ष तक किसी निजी प्राप्ति की लालसा से रहित हैं। तब विवेकी हमें राग-विराग की पहचान में कैसे सीमित करेंगे?
अध्याय ७ • श्लोक १५
छन्दोलक्षणं न हि न हि तत्र ।
समरसमग्नो भावितपूतः
प्रलपति तत्त्वं परमवधूतः ॥ १५॥
सरल हिंदी भावार्थ: जहाँ प्राप्ति-अप्राप्ति और छंद की सीमित परिभाषाएँ नहीं, उस समरसता में निमग्न निर्मल परम अवधूत सहज तत्त्वानुभव व्यक्त करता है।
॥ अवधूत गीता — अध्याय ७ सम्पूर्ण ॥
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