अवधूत गीता अध्याय 8: अवधूत के लक्षण — 10 श्लोक हिंदी भावार्थ सहित
अवधूत गीता
अध्याय ८ • अवधूत के लक्षण
अवधूत गीता परंपरा में भगवान दत्तात्रेय से संबद्ध अद्वैत ग्रंथ है। इस अध्याय का विषय है—अवधूत के लक्षण। नीचे अध्याय के सभी १० श्लोक मूल संस्कृत पाठ और सरल हिंदी भावार्थ के साथ क्रम से दिए गए हैं।
अध्याय ८ • श्लोक १
ध्यानेन चेतःपरता हता ते ।
स्तुत्या मया वाक्परता हता ते
क्षमस्व नित्यं त्रिविधापराधान् ॥ १॥
सरल हिंदी भावार्थ: प्रभो! आपको किसी एक स्थान पर पाने के लिए यात्रा करके आपकी सर्वव्यापकता को, मन में सीमित ध्यान करके मन से परे स्वरूप को और स्तुति करके वाणी से परे महिमा को सीमित माना। मेरे ये तीन अपराध क्षमा करें।
अध्याय ८ • श्लोक २
अनीहो मितभुक् शान्तः स्थिरो मच्छरणो मुनिः ॥ २॥
सरल हिंदी भावार्थ: मुनि की बुद्धि कामनाओं से आहत नहीं होती। वह संयमी, कोमल, पवित्र, अपरिग्रही, निष्काम, मिताहारी, शांत, स्थिर और परमात्मशरण होता है।
अध्याय ८ • श्लोक ३
अमानी मानदः कल्पो मैत्रः कारुणिकः कविः ॥ ३॥
सरल हिंदी भावार्थ: वह सजग, गंभीर, धैर्यवान और आंतरिक शत्रुओं पर विजय पाने वाला होता है। स्वयं मान नहीं चाहता, दूसरों को मान देता है और योग्य, मैत्रीपूर्ण, करुणामय तथा विवेकी होता है।
अध्याय ८ • श्लोक ४
सत्यसारोऽनवद्यात्मा समः सर्वोपकारकः ॥ ४॥
सरल हिंदी भावार्थ: वह कृपालु है, किसी से द्रोह नहीं करता, सब प्राणियों के प्रति सहनशील है, सत्यनिष्ठ, दोषरहित अंतःकरण वाला, समदर्शी और सबका उपकार करने वाला है।
अध्याय ८ • श्लोक ५
वेदवर्णार्थतत्त्वज्ञैर्वेदवेदान्तवादिभिः ॥ ५॥
सरल हिंदी भावार्थ: वेद-वेदांत और उनके अक्षरों के तात्पर्य को जानने वाले श्रेष्ठ भक्त “अवधूत” शब्द के अक्षरों से उसके लक्षण समझें।
अध्याय ८ • श्लोक ६
आनन्दे वर्तते नित्यमकारं तस्य लक्षणम् ॥ ६॥
सरल हिंदी भावार्थ: जो आशाओं के पाश से मुक्त, आदि-मध्य-अंत में निर्मल और नित्य आत्मानंद में स्थित है, यह “अ” अक्षर से सूचित अवधूत का लक्षण है।
अध्याय ८ • श्लोक ७
वर्तमानेषु वर्तेत वकारं तस्य लक्षणम् ॥ ७॥
सरल हिंदी भावार्थ: जिसने वासनाएँ छोड़ दी हैं, जिसकी वाणी निरामय है और जो वर्तमान परिस्थिति में सहज रहता है, यह “व” अक्षर से सूचित लक्षण है।
अध्याय ८ • श्लोक ८
धारणाध्याननिर्मुक्तो धूकारस्तस्य लक्षणम् ॥ ८॥
सरल हिंदी भावार्थ: धूल से शरीर धूसर हो सकता है, पर जिसका चित्त निर्मल और निरामय है तथा जो धारणा-ध्यान के आग्रह से परे है, यह “धू” अक्षर का लक्षण है।
अध्याय ८ • श्लोक ९
तमोऽहंकारनिर्मुक्तस्तकारस्तस्य लक्षणम् ॥ ९॥
सरल हिंदी भावार्थ: जिसकी निष्ठा तत्त्वचिंतन में है, जो चिंता और अहंकारपूर्ण चेष्टा से रहित तथा तमस-अहंकार से मुक्त है, यह “त” अक्षर का लक्षण है।
अध्याय ८ • श्लोक १०
ये पठन्ति च शृण्वन्ति तेषां नैव पुनर्भवः ॥ १०॥
सरल हिंदी भावार्थ: ग्रंथ की फलश्रुति कहती है कि आनंदस्वरूप अवधूत दत्तात्रेय की इस वाणी को पढ़ने और सुनने वाले आत्मबोध के द्वारा पुनर्जन्म के बंधन से पार होते हैं।
॥ अवधूत गीता — अध्याय ८ सम्पूर्ण ॥
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