अष्टावक्र गीता अध्याय 12: सहज आत्मस्थिति — 8 श्लोक हिंदी अर्थ सहित

भक्ति भावना • अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

अध्याय १२ • सहज आत्मस्थिति

सम्पूर्ण ८ श्लोक • मूल संस्कृत पाठ एवं सरल हिंदी भावार्थ

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अष्टावक्र गीता के इस अध्याय का मुख्य विषय है—सहज आत्मस्थिति। यहाँ जनक अपने आत्मानुभव का वर्णन करते हैं। नीचे सभी ८ मूल श्लोक क्रम से सरल हिंदी भावार्थ के साथ दिए गए हैं।

पाठ का संदर्भ: यह अद्वैत दर्शन का आत्मस्वरूप संबंधी संवाद है। अकर्तापन और बंधन से परे होने के कथन शुद्ध आत्मा की दृष्टि से हैं; व्यवहार में कर्तव्य, सदाचार और करुणा का महत्त्व बना रहता है। हिंदी भावार्थ भक्ति भावना द्वारा सरल भाषा में प्रस्तुत है। अध्याय का विषय-शीर्षक पाठ की सुविधा के लिए दिया गया है।

अध्याय १२ • श्लोक १

जनक उवाच ॥

कायकृत्यासहः पूर्वं ततो वाग्विस्तरासहः ।
अथ चिन्तासहस्तस्माद् एवमेवाहमास्थितः ॥ १२-१॥

सरल हिंदी भावार्थ: जनक कहते हैं—पहले शरीर की कर्मचेष्टाओं से, फिर वाणी के विस्तार से और अंत में चिंतन की चेष्टा से विरक्त हुआ; इसलिए अब सहज आत्मस्थिति में हूँ।

अध्याय १२ • श्लोक २

प्रीत्यभावेन शब्दादेरदृश्यत्वेन चात्मनः ।
विक्षेपैकाग्रहृदय एवमेवाहमास्थितः ॥ १२-२॥

सरल हिंदी भावार्थ: शब्द आदि विषयों में आसक्ति नहीं रही और आत्मा कोई दृश्य वस्तु नहीं है। इसलिए मन के विक्षेप और एकाग्रता दोनों का आग्रह छोड़कर अपने स्वरूप में हूँ।

अध्याय १२ • श्लोक ३

समाध्यासादिविक्षिप्तौ व्यवहारः समाधये ।
एवं विलोक्य नियममेवमेवाहमास्थितः ॥ १२-३॥

सरल हिंदी भावार्थ: समाधि आदि में मन के विचलित होने पर उसे सम करने के लिए अभ्यास किया जाता है। इस नियम को समझकर मैं सहज आत्मस्थिति में विश्राम करता हूँ।

अध्याय १२ • श्लोक ४

हेयोपादेयविरहाद् एवं हर्षविषादयोः ।
अभावादद्य हे ब्रह्मन्न् एवमेवाहमास्थितः ॥ १२-४॥

सरल हिंदी भावार्थ: हे ब्रह्मन्! अब ग्रहण और त्याग का आग्रह नहीं रहा, इसलिए हर्ष और विषाद भी नहीं रहे। मैं इसी सहज स्वरूप में स्थित हूँ।

अध्याय १२ • श्लोक ५

आश्रमानाश्रमं ध्यानं चित्तस्वीकृतवर्जनम् ।
विकल्पं मम वीक्ष्यैतैरेवमेवाहमास्थितः ॥ १२-५॥

सरल हिंदी भावार्थ: आश्रम या अनाश्रम, ध्यान तथा मन से स्वीकार या त्याग—इन सबको विकल्प जानकर मैं इनसे परे आत्मस्वरूप में स्थित हूँ।

अध्याय १२ • श्लोक ६

कर्मानुष्ठानमज्ञानाद् यथैवोपरमस्तथा ।
बुध्वा सम्यगिदं तत्त्वमेवमेवाहमास्थितः ॥ १२-६॥

सरल हिंदी भावार्थ: अज्ञान के कारण कर्म करने और कर्म छोड़ने दोनों में आग्रह हो सकता है। इस तत्त्व को ठीक समझकर मैं अपने सहज स्वरूप में स्थित हूँ।

अध्याय १२ • श्लोक ७

अचिन्त्यं चिन्त्यमानोऽपि चिन्तारूपं भजत्यसौ ।
त्यक्त्वा तद्भावनं तस्माद् एवमेवाहमास्थितः ॥ १२-७॥

सरल हिंदी भावार्थ: अचिंत्य आत्मा को विचार की वस्तु बनाने पर भी मन विचार में ही उलझता है। इसलिए ऐसी कल्पना छोड़कर मैं आत्मस्वरूप में विश्राम करता हूँ।

अध्याय १२ • श्लोक ८

एवमेव कृतं येन स कृतार्थो भवेदसौ ।
एवमेव स्वभावो यः स कृतार्थो भवेदसौ ॥ १२-८॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिसने इस प्रकार आत्मस्थिति पाई, वह कृतार्थ है; और जिसका स्वभाव ही ऐसा सहज हो गया है, वह भी कृतार्थ है।

भक्ति भावना • मूल संस्कृत पाठ एवं सरल हिंदी भावार्थ

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