अष्टावक्र गीता अध्याय 11: आत्मनिश्चय और शांति — 8 श्लोक हिंदी अर्थ सहित

भक्ति भावना • अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

अध्याय ११ • आत्मनिश्चय और शांति

सम्पूर्ण ८ श्लोक • मूल संस्कृत पाठ एवं सरल हिंदी भावार्थ

☰ ग्रंथालय में अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता के इस अध्याय का मुख्य विषय है—आत्मनिश्चय और शांति। यहाँ अष्टावक्र और जनक के संवाद में आत्मतत्त्व का विवेचन मिलता है। नीचे सभी ८ मूल श्लोक क्रम से सरल हिंदी भावार्थ के साथ दिए गए हैं।

पाठ का संदर्भ: यह अद्वैत दर्शन का आत्मस्वरूप संबंधी संवाद है। अकर्तापन और बंधन से परे होने के कथन शुद्ध आत्मा की दृष्टि से हैं; व्यवहार में कर्तव्य, सदाचार और करुणा का महत्त्व बना रहता है। हिंदी भावार्थ भक्ति भावना द्वारा सरल भाषा में प्रस्तुत है। अध्याय का विषय-शीर्षक पाठ की सुविधा के लिए दिया गया है।

अध्याय ११ • श्लोक १

अष्टावक्र उवाच ॥

भावाभावविकारश्च स्वभावादिति निश्चयी ।
निर्विकारो गतक्लेशः सुखेनैवोपशाम्यति ॥ ११-१॥

सरल हिंदी भावार्थ: अष्टावक्र कहते हैं—उत्पत्ति, नाश और परिवर्तन प्रकृति के स्वभाव से होते हैं। यह निश्चय रखने वाला आत्मस्वरूप में निर्विकार रहकर क्लेशरहित और सहज शांत हो जाता है।

अध्याय ११ • श्लोक २

ईश्वरः सर्वनिर्माता नेहान्य इति निश्चयी ।
अन्तर्गलितसर्वाशः शान्तः क्वापि न सज्जते ॥ ११-२॥

सरल हिंदी भावार्थ: ईश्वर ही सबके निर्माता हैं, कोई अलग स्वतंत्र कर्ता नहीं—इस निश्चय से जिसकी सभी अपेक्षाएँ गल गई हैं, वह शांत होकर कहीं आसक्त नहीं होता।

अध्याय ११ • श्लोक ३

आपदः सम्पदः काले दैवादेवेति निश्चयी ।
तृप्तः स्वस्थेन्द्रियो नित्यं न वाञ्छति न शोचति ॥ ११-३॥

सरल हिंदी भावार्थ: आपत्ति और संपत्ति समय पर दैवयोग से आती हैं—यह जानने वाला तृप्त और संयत इंद्रियों वाला व्यक्ति न तृष्णा करता है, न शोक।

अध्याय ११ • श्लोक ४

सुखदुःखे जन्ममृत्यू दैवादेवेति निश्चयी ।
साध्यादर्शी निरायासः कुर्वन्नपि न लिप्यते ॥ ११-४॥

सरल हिंदी भावार्थ: सुख-दुःख और जन्म-मृत्यु दैवयोग के अधीन हैं—यह समझने वाला फल का हठ छोड़कर सहज कर्म करता है और उनमें लिप्त नहीं होता।

अध्याय ११ • श्लोक ५

चिन्तया जायते दुःखं नान्यथेहेति निश्चयी ।
तया हीनः सुखी शान्तः सर्वत्र गलितस्पृहः ॥ ११-५॥

सरल हिंदी भावार्थ: चिंता से दुःख उत्पन्न होता है—यह दृढ़ता से जानकर चिंता और तृष्णा से रहित व्यक्ति सुखी और शांत रहता है।

अध्याय ११ • श्लोक ६

नाहं देहो न मे देहो बोधोऽहमिति निश्चयी ।
कैवल्यमिव सम्प्राप्तो न स्मरत्यकृतं कृतम् ॥ ११-६॥

सरल हिंदी भावार्थ: “मैं देह नहीं, देह मेरा स्वरूप नहीं; मैं बोध हूँ”—इस निश्चय से आत्मस्थिति पाए व्यक्ति को किए और न किए कामों का मानसिक बोझ नहीं रहता।

अध्याय ११ • श्लोक ७

आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तमहमेवेति निश्चयी ।
निर्विकल्पः शुचिः शान्तः प्राप्ताप्राप्तविनिर्वृतः ॥ ११-७॥

सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मा से लेकर तिनके तक सबमें एक मेरा ही आत्मस्वरूप है—यह जानने वाला भेदरहित, पवित्र और शांत होकर प्राप्ति-अप्राप्ति में तृप्त रहता है।

अध्याय ११ • श्लोक ८

नानाश्चर्यमिदं विश्वं न किञ्चिदिति निश्चयी ।
निर्वासनः स्फूर्तिमात्रो न किञ्चिदिव शाम्यति ॥ ११-८॥

सरल हिंदी भावार्थ: आश्चर्यों से भरा यह विश्व आत्मा से अलग स्वतंत्र सत्य नहीं—यह जानने वाला वासनारहित और केवल चेतन प्रकाशस्वरूप होकर शांत हो जाता है।

भक्ति भावना • मूल संस्कृत पाठ एवं सरल हिंदी भावार्थ

टिप्पणियाँ

लोकप्रिय भक्ति सामग्री

ओ मेरे रघुवर तू ही सहारा है | राम भजन लिरिक्स | Bhakti Bhavna

श्रीरामचरितमानस की 24 प्रसिद्ध चौपाइयाँ | सरल अर्थ सहित

जय जय गिरिवरराज किशोरी | सीता जी की गौरी स्तुति | रामचरितमानस अर्थ सहित