अष्टावक्र गीता अध्याय 10: तृष्णा से मुक्ति — 8 श्लोक हिंदी अर्थ सहित

भक्ति भावना • अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

अध्याय १० • तृष्णा से मुक्ति

सम्पूर्ण ८ श्लोक • मूल संस्कृत पाठ एवं सरल हिंदी भावार्थ

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अष्टावक्र गीता के इस अध्याय का मुख्य विषय है—तृष्णा से मुक्ति। यहाँ अष्टावक्र और जनक के संवाद में आत्मतत्त्व का विवेचन मिलता है। नीचे सभी ८ मूल श्लोक क्रम से सरल हिंदी भावार्थ के साथ दिए गए हैं।

पाठ का संदर्भ: यह अद्वैत दर्शन का आत्मस्वरूप संबंधी संवाद है। अकर्तापन और बंधन से परे होने के कथन शुद्ध आत्मा की दृष्टि से हैं; व्यवहार में कर्तव्य, सदाचार और करुणा का महत्त्व बना रहता है। हिंदी भावार्थ भक्ति भावना द्वारा सरल भाषा में प्रस्तुत है। अध्याय का विषय-शीर्षक पाठ की सुविधा के लिए दिया गया है।

अध्याय १० • श्लोक १

अष्टावक्र उवाच ॥

विहाय वैरिणं काममर्थं चानर्थसङ्कुलम् ।
धर्ममप्येतयोर्हेतुं सर्वत्रानादरं कुरु ॥ १०-१॥

सरल हिंदी भावार्थ: अष्टावक्र कहते हैं—शत्रुरूपी कामना, अनर्थों से जुड़े धनलोभ और इन दोनों की प्राप्ति के लिए किए जाने वाले धार्मिक सौदों की आसक्ति छोड़ो। सबमें आंतरिक अनासक्ति रखो।

अध्याय १० • श्लोक २

स्वप्नेन्द्रजालवत् पश्य दिनानि त्रीणि पञ्च वा ।
मित्रक्षेत्रधनागारदारदायादिसम्पदः ॥ १०-२॥

सरल हिंदी भावार्थ: मित्र, भूमि, धन, घर, दांपत्य और उत्तराधिकार की संपत्ति को थोड़े समय तक दिखाई देने वाले स्वप्न या इंद्रजाल की तरह अनित्य समझो।

अध्याय १० • श्लोक ३

यत्र यत्र भवेत्तृष्णा संसारं विद्धि तत्र वै ।
प्रौढवैराग्यमाश्रित्य वीततृष्णः सुखी भव ॥ १०-३॥

सरल हिंदी भावार्थ: जहाँ तृष्णा है, वहीं संसारबंध है। दृढ़ वैराग्य अपनाकर तृष्णारहित और सुखी बनो।

अध्याय १० • श्लोक ४

तृष्णामात्रात्मको बन्धस्तन्नाशो मोक्ष उच्यते ।
भवासंसक्तिमात्रेण प्राप्तितुष्टिर्मुहुर्मुहुः ॥ १०-४॥

सरल हिंदी भावार्थ: बंधन का स्वरूप तृष्णा है और उसका मिटना मोक्ष कहलाता है। संसार से अनासक्त होकर जो मिले उसमें बार-बार संतोष पाओ।

अध्याय १० • श्लोक ५

त्वमेकश्चेतनः शुद्धो जडं विश्वमसत्तथा ।
अविद्यापि न किञ्चित्सा का बुभुत्सा तथापि ते ॥ १०-५॥

सरल हिंदी भावार्थ: तुम एक शुद्ध चेतना हो; जगत जड़ और परिवर्तनशील है। आत्मबोध में अविद्या भी स्वतंत्र सत्ता नहीं रखती; फिर अपने से अलग क्या जानना शेष है?

अध्याय १० • श्लोक ६

राज्यं सुताः कलत्राणि शरीराणि सुखानि च ।
संसक्तस्यापि नष्टानि तव जन्मनि जन्मनि ॥ १०-६॥

सरल हिंदी भावार्थ: आसक्ति बनी रहने पर भी अनेक जन्मों में राज्य, पुत्र, जीवनसाथी, शरीर और सुख नष्ट होते आए हैं; उन्हें स्थायी मत मानो।

अध्याय १० • श्लोक ७

अलमर्थेन कामेन सुकृतेनापि कर्मणा ।
एभ्यः संसारकान्तारे न विश्रान्तमभून् मनः ॥ १०-७॥

सरल हिंदी भावार्थ: धन, कामना और फल की आशा वाले पुण्यकर्मों के पीछे बहुत दौड़ चुके। इनसे संसाररूपी वन में मन को स्थायी विश्राम नहीं मिला।

अध्याय १० • श्लोक ८

कृतं न कति जन्मानि कायेन मनसा गिरा ।
दुःखमायासदं कर्म तदद्याप्युपरम्यताम् ॥ १०-८॥

सरल हिंदी भावार्थ: न जाने कितने जन्मों में शरीर, मन और वाणी से दुःख तथा परिश्रम देने वाले कर्म किए हैं। अब उस अहंकार और तृष्णा से चलने वाली चेष्टा को शांत करो।

भक्ति भावना • मूल संस्कृत पाठ एवं सरल हिंदी भावार्थ

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