अष्टावक्र गीता अध्याय 9: वैराग्य और समता — 8 श्लोक हिंदी अर्थ सहित

भक्ति भावना • अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

अध्याय ९ • वैराग्य और समता

सम्पूर्ण ८ श्लोक • मूल संस्कृत पाठ एवं सरल हिंदी भावार्थ

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अष्टावक्र गीता के इस अध्याय का मुख्य विषय है—वैराग्य और समता। यहाँ अष्टावक्र और जनक के संवाद में आत्मतत्त्व का विवेचन मिलता है। नीचे सभी ८ मूल श्लोक क्रम से सरल हिंदी भावार्थ के साथ दिए गए हैं।

पाठ का संदर्भ: यह अद्वैत दर्शन का आत्मस्वरूप संबंधी संवाद है। अकर्तापन और बंधन से परे होने के कथन शुद्ध आत्मा की दृष्टि से हैं; व्यवहार में कर्तव्य, सदाचार और करुणा का महत्त्व बना रहता है। हिंदी भावार्थ भक्ति भावना द्वारा सरल भाषा में प्रस्तुत है। अध्याय का विषय-शीर्षक पाठ की सुविधा के लिए दिया गया है।

अध्याय ९ • श्लोक १

अष्टावक्र उवाच ॥

कृताकृते च द्वन्द्वानि कदा शान्तानि कस्य वा ।
एवं ज्ञात्वेह निर्वेदाद् भव त्यागपरोऽव्रती ॥ ९-१॥

सरल हिंदी भावार्थ: अष्टावक्र कहते हैं—किए और न किए कामों के द्वंद्व किसके और कब पूरी तरह शांत हुए हैं? यह समझकर बाहरी आग्रहों के स्थान पर वैराग्य और आंतरिक त्याग अपनाओ।

अध्याय ९ • श्लोक २

कस्यापि तात धन्यस्य लोकचेष्टावलोकनात् ।
जीवितेच्छा बुभुक्षा च बुभुत्सोपशमं गताः ॥ ९-२॥

सरल हिंदी भावार्थ: वत्स! किसी विरले धन्य व्यक्ति की जीवन को पकड़े रहने, भोग पाने और केवल जानकारियाँ जुटाने की इच्छाएँ संसार की गतिविधियाँ देखकर शांत हो जाती हैं।

अध्याय ९ • श्लोक ३

अनित्यं सर्वमेवेदं तापत्रितयदूषितम् ।
असारं निन्दितं हेयमिति निश्चित्य शाम्यति ॥ ९-३॥

सरल हिंदी भावार्थ: यह सब अनित्य है, तीन प्रकार के तापों से ग्रस्त है और स्थायी सार नहीं रखता—ऐसा निश्चित जानकर विवेकी शांत होता है।

अध्याय ९ • श्लोक ४

कोऽसौ कालो वयः किं वा यत्र द्वन्द्वानि नो नृणाम् ।
तान्युपेक्ष्य यथाप्राप्तवर्ती सिद्धिमवाप्नुयात् ॥ ९-४॥

सरल हिंदी भावार्थ: ऐसा कौन-सा समय या उम्र है, जिसमें मनुष्यों को द्वंद्व नहीं होते? उन्हें अत्यधिक महत्त्व न देकर प्राप्त परिस्थिति में समभाव से रहने वाला सिद्धि पाता है।

अध्याय ९ • श्लोक ५

नाना मतं महर्षीणां साधूनां योगिनां तथा ।
दृष्ट्वा निर्वेदमापन्नः को न शाम्यति मानवः ॥ ९-५॥

सरल हिंदी भावार्थ: महर्षियों, साधुओं और योगियों के अलग-अलग मत देखकर, आग्रहों से विरक्त मनुष्य शांत क्यों नहीं होगा?

अध्याय ९ • श्लोक ६

कृत्वा मूर्तिपरिज्ञानं चैतन्यस्य न किं गुरुः ।
निर्वेदसमतायुक्त्या यस्तारयति संसृतेः ॥ ९-६॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो चेतना का यथार्थ परिचय कराकर वैराग्य और समता के द्वारा संसार से पार कराता है, वही गुरु है।

अध्याय ९ • श्लोक ७

पश्य भूतविकारांस्त्वं भूतमात्रान् यथार्थतः ।
तत्क्षणाद् बन्धनिर्मुक्तः स्वरूपस्थो भविष्यसि ॥ ९-७॥

सरल हिंदी भावार्थ: पंचभूतों से बने सभी परिवर्तनशील रूपों को वास्तव में पंचभूतों के विकार जानो। इस विवेक से बंधन छूटेगा और तुम आत्मस्वरूप में स्थित होगे।

अध्याय ९ • श्लोक ८

वासना एव संसार इति सर्वा विमुञ्च ताः ।
तत्त्यागो वासनात्यागात्स्थितिरद्य यथा तथा ॥ ९-८॥

सरल हिंदी भावार्थ: वासनाएँ ही संसारबंध का आधार हैं; उन्हें छोड़ो। वासनाओं के त्याग से संसार की पकड़ छूटती है, फिर बाहरी स्थिति जैसी हो वैसी रहने दो।

भक्ति भावना • मूल संस्कृत पाठ एवं सरल हिंदी भावार्थ

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