अष्टावक्र गीता अध्याय 8: बंध और मोक्ष — 4 श्लोक हिंदी अर्थ सहित

भक्ति भावना • अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

अध्याय ८ • बंध और मोक्ष

सम्पूर्ण ४ श्लोक • मूल संस्कृत पाठ एवं सरल हिंदी भावार्थ

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अष्टावक्र गीता के इस अध्याय का मुख्य विषय है—बंध और मोक्ष। यहाँ अष्टावक्र और जनक के संवाद में आत्मतत्त्व का विवेचन मिलता है। नीचे सभी ४ मूल श्लोक क्रम से सरल हिंदी भावार्थ के साथ दिए गए हैं।

पाठ का संदर्भ: यह अद्वैत दर्शन का आत्मस्वरूप संबंधी संवाद है। अकर्तापन और बंधन से परे होने के कथन शुद्ध आत्मा की दृष्टि से हैं; व्यवहार में कर्तव्य, सदाचार और करुणा का महत्त्व बना रहता है। हिंदी भावार्थ भक्ति भावना द्वारा सरल भाषा में प्रस्तुत है। अध्याय का विषय-शीर्षक पाठ की सुविधा के लिए दिया गया है।

अध्याय ८ • श्लोक १

अष्टावक्र उवाच ॥

तदा बन्धो यदा चित्तं किञ्चिद् वाञ्छति शोचति ।
किञ्चिन् मुञ्चति गृह्णाति किञ्चिद्धृष्यति कुप्यति ॥ ८-१॥

सरल हिंदी भावार्थ: अष्टावक्र कहते हैं—जब चित्त कुछ चाहता है, शोक करता है, छोड़ता है, पकड़ता है, उल्लसित होता है या क्रोध करता है, तब बंधन है।

अध्याय ८ • श्लोक २

तदा मुक्तिर्यदा चित्तं न वाञ्छति न शोचति ।
न मुञ्चति न गृह्णाति न हृष्यति न कुप्यति ॥ ८-२॥

सरल हिंदी भावार्थ: जब चित्त न चाहता है, न शोक करता है, न आग्रह से छोड़ता या पकड़ता है, न हर्ष या क्रोध में बहता है, तब मुक्ति है।

अध्याय ८ • श्लोक ३

तदा बन्धो यदा चित्तं सक्तं कास्वपि दृष्टिषु ।
तदा मोक्षो यदा चित्तमसक्तं सर्वदृष्टिषु ॥ ८-३॥

सरल हिंदी भावार्थ: जब चित्त किसी विशेष दृष्टिकोण में आसक्त हो जाता है, तब बंधन है। जब वह सभी दृष्टियों के प्रति आसक्तिरहित होता है, तब मोक्ष है।

अध्याय ८ • श्लोक ४

यदा नाहं तदा मोक्षो यदाहं बन्धनं तदा ।
मत्वेति हेलया किञ्चिन्मा गृहाण विमुञ्च मा ॥ ८-४॥

सरल हिंदी भावार्थ: जब अहंकार नहीं है, तब मोक्ष है; जब अहंकार है, तब बंधन है। इसे जानकर सहज रहो; किसी वस्तु को आग्रह से पकड़ो या छोड़ो मत।

भक्ति भावना • मूल संस्कृत पाठ एवं सरल हिंदी भावार्थ

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