अष्टावक्र गीता अध्याय 7: अनंत आत्मस्वरूप — 5 श्लोक हिंदी अर्थ सहित
अष्टावक्र गीता
अध्याय ७ • अनंत आत्मस्वरूप
अष्टावक्र गीता के इस अध्याय का मुख्य विषय है—अनंत आत्मस्वरूप। यहाँ जनक अपने आत्मानुभव का वर्णन करते हैं। नीचे सभी ५ मूल श्लोक क्रम से सरल हिंदी भावार्थ के साथ दिए गए हैं।
अध्याय ७ • श्लोक १
जनक उवाच ॥
भ्रमति स्वान्तवातेन न ममास्त्यसहिष्णुता ॥ ७-१॥
सरल हिंदी भावार्थ: जनक कहते हैं—मुझ अनंत महासागर में विश्वरूपी नाव अपने चित्तरूपी पवन से इधर-उधर घूमती है; इससे मुझमें अधीरता नहीं होती।
अध्याय ७ • श्लोक २
उदेतु वास्तमायातु न मे वृद्धिर्न च क्षतिः ॥ ७-२॥
सरल हिंदी भावार्थ: मुझ अनंत महासागर में जगतरूपी लहर स्वभाव से उठे या शांत हो जाए, उससे न मेरी वृद्धि होती है, न हानि।
अध्याय ७ • श्लोक ३
अतिशान्तो निराकार एतदेवाहमास्थितः ॥ ७-३॥
सरल हिंदी भावार्थ: मुझ अनंत महासागर में विश्व नाम का भेद एक कल्पना है। मैं अत्यंत शांत और निराकार हूँ; इसी बोध में स्थित हूँ।
अध्याय ७ • श्लोक ४
इत्यसक्तोऽस्पृहः शान्त एतदेवाहमास्थितः ॥ ७-४॥
सरल हिंदी भावार्थ: आत्मा वस्तुओं में सीमित नहीं और अनंत निर्मल आत्मा में वस्तुओं की स्वतंत्र सत्ता नहीं। यह जानकर मैं आसक्तिरहित, इच्छारहित और शांत हूँ।
अध्याय ७ • श्लोक ५
इति मम कथं कुत्र हेयोपादेयकल्पना ॥ ७-५॥
सरल हिंदी भावार्थ: आश्चर्य! मैं केवल चेतना हूँ और जगत इंद्रजाल जैसा है। तब मेरे लिए क्या छोड़ना है और क्या ग्रहण करना है—ऐसी कल्पना कहाँ रह जाती है?
॥ अष्टावक्र गीता — अध्याय ७ सम्पूर्ण ॥
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