अष्टावक्र गीता अध्याय 6: ज्ञान में अद्वैत स्थिति — 4 श्लोक हिंदी अर्थ सहित

भक्ति भावना • अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

अध्याय ६ • ज्ञान में अद्वैत स्थिति

सम्पूर्ण ४ श्लोक • मूल संस्कृत पाठ एवं सरल हिंदी भावार्थ

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अष्टावक्र गीता के इस अध्याय का मुख्य विषय है—ज्ञान में अद्वैत स्थिति। यहाँ जनक अपने आत्मानुभव का वर्णन करते हैं। नीचे सभी ४ मूल श्लोक क्रम से सरल हिंदी भावार्थ के साथ दिए गए हैं।

पाठ का संदर्भ: यह अद्वैत दर्शन का आत्मस्वरूप संबंधी संवाद है। अकर्तापन और बंधन से परे होने के कथन शुद्ध आत्मा की दृष्टि से हैं; व्यवहार में कर्तव्य, सदाचार और करुणा का महत्त्व बना रहता है। हिंदी भावार्थ भक्ति भावना द्वारा सरल भाषा में प्रस्तुत है। अध्याय का विषय-शीर्षक पाठ की सुविधा के लिए दिया गया है।

अध्याय ६ • श्लोक १

जनक उवाच ॥

आकाशवदनन्तोऽहं घटवत् प्राकृतं जगत् ।
इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः ॥ ६-१॥

सरल हिंदी भावार्थ: जनक कहते हैं—मैं आकाश की तरह अनंत हूँ और प्रकृति से बना जगत घड़े की तरह सीमित है। इस बोध में जगत को न पकड़ना है, न छोड़ना है, न मिटाना है।

अध्याय ६ • श्लोक २

महोदधिरिवाहं स प्रपञ्चो वीचिसन्निभः ।
इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः ॥ ६-२॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैं महासागर के समान हूँ और जगत तरंग के समान। इस ज्ञान में ग्रहण, त्याग और लय का आग्रह नहीं रहता।

अध्याय ६ • श्लोक ३

अहं स शुक्तिसङ्काशो रूप्यवद् विश्वकल्पना ।
इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः ॥ ६-३॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैं सीप के समान वास्तविक आधार हूँ और विश्व की अलग सत्ता उसमें कल्पित चाँदी के समान है। इस बोध में ग्रहण, त्याग या लय का प्रश्न नहीं रहता।

अध्याय ६ • श्लोक ४

अहं वा सर्वभूतेषु सर्वभूतान्यथो मयि ।
इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः ॥ ६-४॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैं सभी प्राणियों में हूँ और सभी प्राणी मुझमें हैं। इस ज्ञान में कुछ पकड़ने, छोड़ने या मिटाने की आवश्यकता नहीं रहती।

भक्ति भावना • मूल संस्कृत पाठ एवं सरल हिंदी भावार्थ

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