अष्टावक्र गीता अध्याय 5: स्वरूप में विश्राम — 4 श्लोक हिंदी अर्थ सहित
अष्टावक्र गीता
अध्याय ५ • स्वरूप में विश्राम
अष्टावक्र गीता के इस अध्याय का मुख्य विषय है—स्वरूप में विश्राम। यहाँ अष्टावक्र और जनक के संवाद में आत्मतत्त्व का विवेचन मिलता है। नीचे सभी ४ मूल श्लोक क्रम से सरल हिंदी भावार्थ के साथ दिए गए हैं।
अध्याय ५ • श्लोक १
अष्टावक्र उवाच ॥
सङ्घातविलयं कुर्वन्नेवमेव लयं व्रज ॥ ५-१॥
सरल हिंदी भावार्थ: अष्टावक्र कहते हैं—तुम्हारा किसी से वास्तविक बंधन नहीं है। शुद्ध आत्मा होकर क्या त्यागना चाहते हो? देह-मन के संघात से तादात्म्य मिटाकर अपने स्वरूप में विश्राम करो।
अध्याय ५ • श्लोक २
इति ज्ञात्वैकमात्मानमेवमेव लयं व्रज ॥ ५-२॥
सरल हिंदी भावार्थ: जैसे समुद्र से बुलबुला उठता है, वैसे ही विश्व तुमसे प्रकट होता है। आत्मा को एक जानकर अपने स्वरूप में विश्राम करो।
अध्याय ५ • श्लोक ३
रज्जुसर्प इव व्यक्तमेवमेव लयं व्रज ॥ ५-३॥
सरल हिंदी भावार्थ: जगत दिखाई देने पर भी निर्मल आत्मा में उसकी स्वतंत्र सत्ता नहीं; जैसे रस्सी में स्पष्ट दिखाई देने वाले साँप की वास्तविक सत्ता नहीं। इसे जानकर आत्मस्वरूप में विश्राम करो।
अध्याय ५ • श्लोक ४
समजीवितमृत्युः सन्नेवमेव लयं व्रज ॥ ५-४॥
सरल हिंदी भावार्थ: सुख-दुःख, आशा-निराशा और जीवन-मृत्यु में समान रहकर अपनी पूर्णता में स्थित हो जाओ।
॥ अष्टावक्र गीता — अध्याय ५ सम्पूर्ण ॥
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