कबीर ग्रंथावली भाग 3 — साखी 541–811 मूल पाठ, हिंदी अर्थ और भावार्थ सहित

भक्ति भावना प्रस्तुत · संत कबीरदास जी का संत साहित्य
कबीर ग्रंथावली · विस्तृत अंतिम भाग ३

कबीर ग्रंथावली — भाग 3
साखी 541–811 · हिंदी अर्थ सहित

विचार से अबिहड़ तक · २७ पूरे अंग · २७१ साखियाँ

विचार, विश्वास, प्रेम, साहस, करुणा और अखंड निष्ठा—मुख्य साखी-पाठ की इस श्रृंखला का अंतिम भाग, मूल पाठ और स्वतंत्र हिंदी व्याख्या सहित।

२७१ मुख्य साखियाँअंग ३३–५९तीन-भागीय श्रृंखला का समापन

विचार से अखंड आत्मीयता तक

इस तीसरे भाग में विचार कौ अंग से अबिहड़ कौ अंग तक, अंग ३३–५९ की २७१ मुख्य साखियाँ हैं। पहले दोनों भागों के आगे इस लेख के संयुक्त क्रमांक ५४१–८११ चलते हैं। प्रत्येक साखी के साथ उसके अंग का मूल स्थानीय क्रमांक, शब्दार्थ, सरल अर्थ और स्वतंत्र भावार्थ दिया है।

इन अंगों में कबीर पूछते हैं—नाम का वास्तविक अर्थ क्या है, विश्वास कैसे गहरा हो, अहं कैसे घटे, समय का सदुपयोग क्या है और दूसरों के दुःख में हमारा स्थान कहाँ है? अंतिम अंग उस स्थिर आश्रय की बात कहता है जहाँ आत्मीय संग अखंड अनुभव होता है।

पूरी तीन-भागीय श्रृंखला

भागअंगपाठ का विस्तार
भाग ११–१२गुरुदेव से चितावणी · २७२ पद · संयुक्त क्रम १–२७२
भाग २१३–३२मन से सारग्राही · २६८ पद · संयुक्त क्रम २७३–५४०
भाग ३३३–५९विचार से अबिहड़ · २७१ पद · संयुक्त क्रम ५४१–८११

इन तीन भागों का दायरा संदर्भ-संस्करण का मुख्य ५९-अंगीय साखी-पाठ है। पद, भजन, रमैनी, अलग परिशिष्ट और प्रति-टिप्पणियों के अतिरिक्त दोहे इस समापन में सम्मिलित नहीं हैं।

अंतिम भाग के २७ पूरे अंग

३३. विचार कौ अंग
साखी ५४१–५५१ · ११ मुख्य पद
३४. उपदेश कौ अंग
साखी ५५२–५६१ · १० मुख्य पद
३५. बेसास कौ अंग
साखी ५६२–५८२ · २१ मुख्य पद
३६. पीव पिछाँणन कौ अंग
साखी ५८३–५८६ · ४ मुख्य पद
३७. बिर्कताई कौ अंग
साखी ५८७–५९६ · १० मुख्य पद
३८. सम्रथाई कौ अंग
साखी ५९७–६०८ · १२ मुख्य पद
३९. कुसबद कौ अंग
साखी ६०९–६१२ · ४ मुख्य पद
४०. सबद कौ अंग
साखी ६१३–६२० · ८ मुख्य पद
४१. जीवन मृतक कौ अंग
साखी ६२१–६३४ · १४ मुख्य पद
४२. चित कपटी कौ अंग
साखी ६३५–६३७ · ३ मुख्य पद
४३. गुरुसिष हेरा कौ अंग
साखी ६३८–६५० · १३ मुख्य पद
४४. हेत प्रीति सनेह कौ अंग
साखी ६५१–६५४ · ४ मुख्य पद
४५. सूरा तन कौ अंग
साखी ६५५–६९५ · ४१ मुख्य पद
४६. काल कौ अंग
साखी ६९६–७२७ · ३२ मुख्य पद
४७. सजीवनी कौ अंग
साखी ७२८–७३४ · ७ मुख्य पद
४८. अपारिष कौ अंग
साखी ७३५–७३९ · ५ मुख्य पद
४९. पारिष कौ अंग
साखी ७४०–७४२ · ३ मुख्य पद
५०. उपजणि कौ अंग
साखी ७४३–७५४ · १२ मुख्य पद
५१. दया निरबैरता कौ अंग
साखी ७५५–७५७ · ३ मुख्य पद
५२. सुंदरि कौ अंग
साखी ७५८–७६२ · ५ मुख्य पद
५३. कस्तूरियाँ मृग कौ अंग
साखी ७६३–७७१ · ९ मुख्य पद
५४. निंद्या कौ अंग
साखी ७७२–७८० · ९ मुख्य पद
५५. निगुणाँ कौ अंग
साखी ७८१–७९२ · १२ मुख्य पद
५६. बीनती कौ अंग
साखी ७९३–७९९ · ७ मुख्य पद
५७. साषीभूत कौ अंग
साखी ८००–८०२ · ३ मुख्य पद
५८. बेलि कौ अंग
साखी ८०३–८०८ · ६ मुख्य पद
५९. अबिहड़ कौ अंग
साखी ८०९–८११ · ३ मुख्य पद

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साखी ५४१–५६४
साखी ५६५–५८८
साखी ५८९–६१२
साखी ६१३–६३६
साखी ६३७–६६०
साखी ६६१–६८४
साखी ६८५–७०८
साखी ७०९–७३२
साखी ७३३–७५६
साखी ७५७–७८०
साखी ७८१–८०४
साखी ८०५–८११

३३. विचार कौ अंग

नाम के अर्थ, आत्मबोध, भाषा और मन के उलझाव पर विचार। मूल स्थानीय क्रमांक १–११।

साखी ५४१ विचार कौ अंग · मूल क्रमांक १

राम नाम सब को कहै, कहिबे बहुत बिचार। सोई राम सती कहै, सोई कौतिग हार॥
कठिन शब्दार्थ

बिचार = अर्थ और भाव का विवेक; सती = पूर्ण निष्ठा का पुराना बिंब; कौतिगहार = दर्शक।

सरल हिंदी अर्थ

रामनाम सब कहते हैं, लेकिन कहने का भाव अलग है। गहरी निष्ठा वाला और केवल तमाशा देखने वाला एक ही शब्द कहते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

नाम की ध्वनि के साथ मन की दिशा भी महत्त्वपूर्ण है। अपने उच्चारण में सजगता और निष्कपट भाव जोड़ें।

साखी ५४२ विचार कौ अंग · मूल क्रमांक २

आगि कह्याँ दाझै नहीं, जे नहीं चंपै पाइ। जब लग भेद न जाँणिये, राम कह्या तौ काइ॥
कठिन शब्दार्थ

दाझै = जलता; चंपै = संपर्क में आए; भेद = वास्तविक अर्थ।

सरल हिंदी अर्थ

केवल आग कहने से पैर नहीं जलता; उसका संपर्क अलग है। वैसे ही नाम का अर्थ बिना केवल शब्द कहने से अनुभव कैसे होगा?

भावार्थ और जीवन-संदेश

कथन और अनुभूति में अंतर पहचानें। स्मरण के साथ अर्थ, मनन और आचरण का संबंध बने।

साखी ५४३ विचार कौ अंग · मूल क्रमांक ३

कबीर सोचि बिचारिया, दूजा कोई नाँहि। आपा पर जब चीन्हिया, तब उलटि समाना माँहि॥
कठिन शब्दार्थ

आपा पर = अपना और पराया; समाना = एकरस हुआ।

सरल हिंदी अर्थ

विचार से जाना कि मूल में दूसरा कोई नहीं। अपना-पराया पहचानने का भ्रम बदला तो चित्त भीतर के एकत्व में समा गया।

भावार्थ और जीवन-संदेश

विभाजन के पीछे साझा अस्तित्व देखें। आत्मबोध का फल दूसरों के प्रति सम्मान और करुणा बढ़ना हो।

साखी ५४४ विचार कौ अंग · मूल क्रमांक ४

कबीर पाणी केरा पूतला, राख्या पवन सँवारि। नाँनाँ बाँणी बोलिया, जोति धरी करतारि॥
कठिन शब्दार्थ

पूतला = पुतला; पवन = प्राणवायु; करतारि = स्रष्टा ने।

सरल हिंदी अर्थ

यह देह जल का पुतला है, जिसे प्राणवायु सँभालती है। स्रष्टा की ज्योति से यह अनेक भाषाएँ बोलती है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

अपनी क्षमता को अकेले का गर्व न मानें। जीवन के मिले अवसर के प्रति कृतज्ञ होकर उसका सदुपयोग करें।

साखी ५४५ विचार कौ अंग · मूल क्रमांक ५

नौ मण सूत अलूझिया, कबीर घर घर बारि। तिनि सुलझाया बापुड़े, जिनि जाणीं भगति मुरारि॥
कठिन शब्दार्थ

अलूझिया = उलझा; बारि = जलाता या दूर करता; मुरारि = भगवान।

सरल हिंदी अर्थ

जीवन का बहुत-सा सूत उलझा पड़ा है। सच्ची भक्ति पहचानने वाला ही उसके बंधन सुलझा पाता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

सारहीन उलझाव बढ़ाने के बजाय मूल बात पकड़ें। विवेक और नियमित साधना से जीवन में क्रम आता है।

साखी ५४६ विचार कौ अंग · मूल क्रमांक ६

आधी साषी सिरि कटैं, जोर बिचारी जाइ। मनि परतीति न ऊपजे, तौ राति दिवस मिलि गाइ॥
कठिन शब्दार्थ

साषी = साखी; परतीति = अनुभवजन्य विश्वास।

सरल हिंदी अर्थ

आधी साखी भी विचारकर अपनाएँ तो अहं का सिर कट सकता है; विश्वास न जागे तो दिन-रात गाने पर भी सार नहीं मिलता।

भावार्थ और जीवन-संदेश

बहुत पाठ से अधिक एक सीख का आचरण मूल्यवान है। सिर कटना यहाँ अहं के क्षय का रूपक है।

साखी ५४७ विचार कौ अंग · मूल क्रमांक ७

सोई अषिर सोइ बैयन, जन जू जू बाचवंत। कोई एक मेलै लवणि, अमीं रसाइण हुँत॥
कठिन शब्दार्थ

बैयन = वचन; लवणि = उचित मेल या स्वाद; अमीं = अमृत।

सरल हिंदी अर्थ

अक्षर और शब्द वही हैं, उन्हें अनेक लोग बोलते हैं। कोई विरला सही भाव मिलाकर उन्हें अमृत-रस बना देता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

वाणी का प्रभाव केवल शब्द से नहीं, सत्य और आत्मीयता से आता है। बोलने से पहले अपना उद्देश्य देखें।

साखी ५४८ विचार कौ अंग · मूल क्रमांक ८

हरि मोत्याँ की माल है, पोई काचै तागि। जतन करि झंटा घँणा, टूटेगी कहूँ लागि॥
कठिन शब्दार्थ

मोत्याँ = मोतियों; पोई = पिरोई; झंटा = झटका।

सरल हिंदी अर्थ

हरि का स्मरण मोती की माला है, पर साधक का धागा कच्चा है। असावधानी का बड़ा झटका उसे तोड़ सकता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

निष्ठा को नियमितता और चरित्र का मजबूत धागा दें। क्षणिक उत्साह पर ही भरोसा न रखें।

साखी ५४९ विचार कौ अंग · मूल क्रमांक ९

मन नहीं छाड़ै बिषै, बिषै न छाड़ै मन कौं। इनकौं इहै सुभाव, पूरि लागी जुग जन कौं॥
कठिन शब्दार्थ

बिषै = विषयों की आसक्ति; पूरि = व्यापक पकड़।

सरल हिंदी अर्थ

मन विषय नहीं छोड़ता और विषय मन को नहीं छोड़ते; इस परस्पर आदत ने लोगों को लंबे समय से बाँधा है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

केवल वस्तु हटाने से इच्छा नहीं मिटती। उसके कारण और अपनी प्रतिक्रिया समझकर धीरे-धीरे दिशा बदलें।

साखी ५५० विचार कौ अंग · मूल क्रमांक १०

खंडित मूल बिनास कहौ किम बिगतह कीजै। ज्यूँ जल में प्रतिब्यंब त्यूँ सकल रामहिं जांणीजै॥
कठिन शब्दार्थ

प्रतिब्यंब = प्रतिबिंब; सकल = सब; बिगतह = अलगाव का कठिन रूप।

सरल हिंदी अर्थ

कवि सबमें राम की उपस्थिति जल में प्रतिबिंब जैसी पहचानने को कहते हैं; मूल को खंडित मानना भ्रम है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह अद्वैत-दृष्टि का संकेत है। भिन्न रूपों के बीच समान गरिमा और साझा जीवन का बोध विकसित करें।

साखी ५५१ विचार कौ अंग · मूल क्रमांक ११

सो मन सो तन सो बिषे, सो त्रिभवन पति कहूँ कस। कहै कबीर ब्यंदहु नरा, ज्यूँ जल पूर्‌या सक रस॥
कठिन शब्दार्थ

त्रिभवन पति = परमेश्वर; ब्यंदहु = पहचानो या विचारो; सक रस = एकरस।

सरल हिंदी अर्थ

मन, तन और विषय वही हैं; उनमें त्रिभुवन के स्वामी को कैसे पहचानें? कबीर जल की एकरसता से व्यापक उपस्थिति समझाते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

आध्यात्मिक दृष्टि जीवन के बीच जागती है। अलग वस्तु खोजने से अधिक अपने देखने की रीति को निर्मल करें।

३४. उपदेश कौ अंग

कर्म, उदारता, शुभ आदत और शीतल वाणी की शिक्षा। मूल स्थानीय क्रमांक १–१०।

साखी ५५२ उपदेश कौ अंग · मूल क्रमांक १

हरि जी यहै बिचारिया, साषी कहौ कबीर। भौसागर मैं जीव है, जे कोई पकड़ैं तीर॥
कठिन शब्दार्थ

तीर = किनारा; भौसागर = संसार-सागर।

सरल हिंदी अर्थ

हरि ने मानो कबीर को साखियाँ कहने की प्रेरणा दी, ताकि संसार-सागर का जीव कोई किनारा पकड़ सके।

भावार्थ और जीवन-संदेश

हितकारी वाणी दिशा देती है। उसका लाभ तभी है जब पाठक स्वयं समझकर आचरण करे।

साखी ५५३ उपदेश कौ अंग · मूल क्रमांक २

कली काल ततकाल है, बुरा करौ जिनि कोइ। अनबावै लोहा दाहिणै बोबै सु लुणता होइ॥
कठिन शब्दार्थ

जिनि = मत; लुणता = काटता; बोबै = बोए।

सरल हिंदी अर्थ

बुरा मत करो; कर्म का परिणाम सामने आता है। गर्म लोहे के दाह की तरह हानि महसूस होती है, जो बोया वही काटना पड़ता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

गलत निर्णय के पहले उसका प्रभाव देखें। दूसरों पर दोष डालने के बजाय जिम्मेदारी लेना सुधार की शुरुआत है।

साखी ५५४ उपदेश कौ अंग · मूल क्रमांक ३

कबीर संसा जीव मैं, कोई न कहै समझाइ। बिधि बिधि बाणों बोलता सो कत गया बिलाइ॥
कठिन शब्दार्थ

संसा = संशय; बाणों = वाणियाँ; बिलाइ = विलीन।

सरल हिंदी अर्थ

जीव में संशय है कि अनेक बोल बोलने वाली चेतना आखिर कहाँ विलीन हो गई; कोई ठीक से समझाता नहीं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

जीवन और मृत्यु के प्रश्न गहरे हैं। जल्द दावा करने के बजाय विनय से अध्ययन और आत्मपरीक्षण करें।

साखी ५५५ उपदेश कौ अंग · मूल क्रमांक ४

कबीर संसा दूरि करि जाँमण मरण भरंम। पंचतत तत्तहि मिले सुरति समाना मंन॥
कठिन शब्दार्थ

पंचतत = देह के पाँच तत्त्व; सुरति = चेतना का ध्यान।

सरल हिंदी अर्थ

जन्म-मरण के भ्रम को विवेक से देखो; देह के तत्त्व तत्त्वों में मिलते हैं और चेतना अपनी सूक्ष्म स्थिति में समाती है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह संत की तत्त्व-दृष्टि है। रूप की नश्वरता समझकर जीवन रहते सदाचार और जागरूकता अपनाएँ।

साखी ५५६ उपदेश कौ अंग · मूल क्रमांक ५

ग्रिही तौ च्यंता घणीं, बैरागी तौ भीष। दुहुँ कात्याँ बिचि जीव है, दौ हमैं संतौं सीष॥
कठिन शब्दार्थ

ग्रिही = गृहस्थ; भीष = भिक्षा; सीष = शिक्षा।

सरल हिंदी अर्थ

गृहस्थ को अनेक चिंताएँ, वैरागी को भिक्षा की चिंता है। दोनों के बीच जीव उलझा है; संतों, सही सीख दो।

भावार्थ और जीवन-संदेश

बाहरी स्थिति बदलने से हर उलझन नहीं मिटती। अपने मन का आग्रह और जीवन की जिम्मेदारी समझें।

साखी ५५७ उपदेश कौ अंग · मूल क्रमांक ६

बैरागी बिरकत भला, गिरहीं चित्त उदार। दुहै चूकाँ रीता पड़ै, ताकूँ वार न पार॥
कठिन शब्दार्थ

बिरकत = आसक्ति से मुक्त; उदार = खुले हृदय वाला; रीता = सारहीन।

सरल हिंदी अर्थ

वैरागी विरक्त हो तो अच्छा, गृहस्थ उदार हो तो अच्छा। दोनों अपने आवश्यक गुण से चूकें तो जीवन खाली रह जाता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

जीवन-पद्धति से अधिक उसके भीतर का चरित्र महत्त्वपूर्ण है। अपनी भूमिका में सत्य और सेवा निभाएँ।

साखी ५५८ उपदेश कौ अंग · मूल क्रमांक ७

जैसी उपजै पेड़ मूँ, तैसी निबहै ओरि। पैका पैका जोड़ताँ, जुड़िसा लाष करोड़ि॥
कठिन शब्दार्थ

पेड़ मूँ = मूल में; ओरि = अंत तक; पैका = छोटी मुद्रा।

सरल हिंदी अर्थ

जैसी नींव और आदत बनेगी, वैसी यात्रा चलेगी। छोटी-छोटी मुद्राएँ जोड़ने से बड़ी राशि बनती है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

अच्छे छोटे कर्मों का संचय महत्त्वपूर्ण है। रोज की सावधानी और नियमित अभ्यास बड़ी दिशा बनाते हैं।

साखी ५५९ उपदेश कौ अंग · मूल क्रमांक ८

कबीर हरि के नाँव सूँ, प्रीति रहै इकतार। तौ मुख तैं मोती झड़ैं, हीरे अंत न पार॥
कठिन शब्दार्थ

इकतार = निरंतर; मुख के मोती = हितकारी वचन।

सरल हिंदी अर्थ

हरिनाम से निरंतर प्रेम रहे तो मुख से मोती जैसे वचन निकलते हैं और भीतर ज्ञानरत्न बढ़ते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

मन में जो भाव पाला जाता है, वह वाणी में उतरता है। स्मरण को सत्य और करुणा से जोड़ें।

साखी ५६० उपदेश कौ अंग · मूल क्रमांक ९

ऐसी बाँणी बोलिये, मन का आपा खोइ। अपना तन सीतल करै, औरन कौं सुख होइ॥
कठिन शब्दार्थ

आपा = अहंकार; सीतल = शांत।

सरल हिंदी अर्थ

ऐसी वाणी बोलो जिसमें मन का अहं घटे, अपना तन-मन शांत हो और दूसरों को भी सुख मिले।

भावार्थ और जीवन-संदेश

सत्य को नम्र, स्पष्ट और हितकारी ढंग से कहें। अपनी जीत से अधिक संवाद के कल्याण को महत्त्व दें।

साखी ५६१ उपदेश कौ अंग · मूल क्रमांक १०

कोइ एक राखै सावधान, चेतनि पहरै जागि। बस्तन बासन सूँ खिसै, चोर न सकई लागि॥
कठिन शब्दार्थ

चेतनि पहरै = चेतना का पहरा; बस्तन बासन = वस्त्र-पात्र के बाहरी बंधन।

सरल हिंदी अर्थ

जागकर चेतना का पहरा रखने वाला साधक बाहरी उलझनों से बचता है; भीतर का चोर उसे आसानी से नहीं घेरता।

भावार्थ और जीवन-संदेश

नियमित आत्मपरीक्षण मन की रक्षा है। लालच और क्रोध की शुरुआत पहचानकर दिशा बदलें।

३५. बेसास कौ अंग

विश्वास, संतोष, अनुग्रह और अपने प्रयत्न के बीच विनय। मूल स्थानीय क्रमांक १–२१।

साखी ५६२ बेसास कौ अंग · मूल क्रमांक १

जिनि नर हरि जठराँह, उदिकै थैं षंड प्रगट कियौ। सिरजे श्रवण कर चरन, जीव जीभ मुख तास दीयो॥ उरध पाव अरध सीस, बीस पषां इम रषियौ। अंन पान जहां जरै, तहाँ तैं अनल न चषियौ॥ इहिं भाँति भयानक उद्र में, न कबहू छंछरै। कृसन कृपाल कबीर कहि, इम प्रतिपालन क्यों करै॥
कठिन शब्दार्थ

जठराँह = गर्भ में; उदिक = जल; प्रतिपालन = सँभालना।

सरल हिंदी अर्थ

कवि गर्भ की कठिन दशा में अंग-प्रत्यंग बनने और सुरक्षित रहने को स्रष्टा की कृपा मानकर आगे भी उसके पालन पर भरोसा कहते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह भक्ति की काव्यात्मक विश्वास-प्रार्थना है, शरीर-विज्ञान का विवरण नहीं। भरोसा कृतज्ञता जगाए और जिम्मेदार प्रयत्न के साथ रहे।

पाठ-टिप्पणी: यह मूल क्रमांक १ लंबा पद है; उसे स्रोत के अनुसार एक ही क्रमांक में रखा गया है। सभी पदों को अनिवार्य रूप से दो पंक्ति का आधुनिक दोहा नहीं कहा गया है।

साखी ५६३ बेसास कौ अंग · मूल क्रमांक २

भूखा भूखा क्या करै, कहा सुनावै लोग। भांडा घड़ि जिनि मुख दिया, सोई पूरण जोग॥
कठिन शब्दार्थ

भाँडा = देहरूपी पात्र; पूरण जोग = आवश्यकता पूरी करने में समर्थ।

सरल हिंदी अर्थ

हर समय भूख की शिकायत क्यों फैलाते हो? जिसने जीवन का पात्र बनाया है, उस पर भी भरोसा रखो।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह साहस देने वाला संत-कथन है। वास्तविक जरूरत हो तो सहायता और आजीविका के उचित उपाय अपनाना भी जिम्मेदारी है।

साखी ५६४ बेसास कौ अंग · मूल क्रमांक ३

रचनहार कूँ चीन्हि लै, खैचे कूँ कहा रोइ। दिल मंदिर मैं पैसि करि, तांणि पछेवड़ा सोइ॥
कठिन शब्दार्थ

खैचे = कमी; पैसि = प्रवेश करके; पछेवड़ा = ओढ़नी।

सरल हिंदी अर्थ

रचनहार को पहचानो, हर कमी पर व्याकुल मत हो। हृदय के मंदिर में शांति का आश्रय लेकर विश्राम करो।

भावार्थ और जीवन-संदेश

व्यर्थ चिंता घटाकर भीतर भरोसा विकसित करें। संतोष अपने आवश्यक काम छोड़ना नहीं है।

साखी ५६५ बेसास कौ अंग · मूल क्रमांक ४

राम नाम करि बोहड़ा, बांही बीज अधाइ। अंति कालि सूका पड़ै, तौ निरफल कदे न जाइ॥
कठिन शब्दार्थ

बोहड़ा = संचित पूँजी या भंडार; अधाइ = पर्याप्त।

सरल हिंदी अर्थ

रामनाम का भंडार बनाकर साधना का बीज बोओ; कठिन अंतिम समय में भी उसका सार निष्फल नहीं होगा।

भावार्थ और जीवन-संदेश

नियमित अच्छी आदत संकट में आधार देती है। केवल अंतिम क्षण की तैयारी पर भरोसा न रखें।

साखी ५६६ बेसास कौ अंग · मूल क्रमांक ५

च्यंतामणि मन में बसै, सोई चित्त मैं आंणि। बिन च्यंता च्यंता करै, इहै प्रभू की बांणि॥
कठिन शब्दार्थ

च्यंतामणि = मनोवांछित फल की कल्पित मणि; बांणि = रीति।

सरल हिंदी अर्थ

मन में बसे प्रभु को याद करो; भक्त की चिंता सँभालना उनका स्वभाव कहा गया है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

स्मरण भय को दिशा दे सकता है। अपने प्रयत्न और दूसरों के सहयोग के प्रति भी कृतज्ञ रहें।

साखी ५६७ बेसास कौ अंग · मूल क्रमांक ६

कबीर का तूँ चितवै, का तेरा च्यंत्या होइ। अणच्यंत्या हरिजी करै, जो तोहि च्यंत न होइ॥
कठिन शब्दार्थ

अणच्यंत्या = जिसकी कल्पना न की; चितवै = चिंता करे।

सरल हिंदी अर्थ

तेरी हर चिंता से परिणाम तय नहीं होता; जीवन में ऐसी संभावनाएँ भी खुलती हैं जिनकी कल्पना नहीं थी।

भावार्थ और जीवन-संदेश

नियंत्रण की सीमा पहचानें। आवश्यक प्रयत्न के बाद अनिश्चितता को धैर्य से स्वीकारें।

साखी ५६८ बेसास कौ अंग · मूल क्रमांक ७

करम करीमां लिखि रह्या, अब कछू लिख्या न जाइ। मासा घट न तिल बथै, जौ कोटिक करै उपाइ॥
कठिन शब्दार्थ

करम करीमां = कृपालु का लिखा भाग्य; मासा तिल = छोटी मात्राएँ।

सरल हिंदी अर्थ

कवि कहते हैं कि कृपालु का लिखा विधान इच्छामात्र से न घटता-बढ़ता है, चाहे अनेक उपाय किए जाएँ।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह नियति के सामने विनय का भाव है। इसे प्रयास छोड़ने का नियम न बनाएँ; अपने कर्तव्य निभाएँ।

साखी ५६९ बेसास कौ अंग · मूल क्रमांक ८

जाकौ चेता निरमया, ताकौ तेता होइ। रती घटै न तिल बधै, जौ सिर कूटै कोइ॥
कठिन शब्दार्थ

निरमया = स्रष्टा; रती = छोटी मात्रा।

सरल हिंदी अर्थ

स्रष्टा ने जिसका जितना विधान किया, जिद और व्यथा से उसे मनचाहा बदलना संभव नहीं—कवि ऐसा भरोसा कहते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

अपरिवर्तनीय बात पर व्यर्थ क्रोध घटाएँ। जहाँ सुधार संभव है, वहाँ शांत और जिम्मेदार काम करें।

साखी ५७० बेसास कौ अंग · मूल क्रमांक ९

च्यंता न करि अच्यंत रहु, सांई है संभ्रथ। पसु पंषरू जीव जंत, तिनको गांडि किसा ग्रंथ॥
कठिन शब्दार्थ

अच्यंत = अनावश्यक चिंता से मुक्त; संभ्रथ = समर्थ।

सरल हिंदी अर्थ

व्यर्थ चिंता छोड़ो, स्वामी समर्थ हैं; पशु-पक्षी और जीव कोई शास्त्र की गठरी लेकर अपना जीवन नहीं चलाते।

भावार्थ और जीवन-संदेश

अतिविचार की जगह सहज भरोसा और उचित कर्म रखें। विद्या का सम्मान रहे, उसका बोझ चिंता न बन जाए।

साखी ५७१ बेसास कौ अंग · मूल क्रमांक १०

संत न बांधै गाँठड़ी, पेट समाता लेइ। सांई सूँ सनमुख रहै, जहाँ माँगै तहाँ देइ॥
कठिन शब्दार्थ

गाँठड़ी = संग्रह की गठरी; सनमुख = भरोसे से सामने।

सरल हिंदी अर्थ

संत आवश्यकता भर लेता है, अनंत संग्रह नहीं बाँधता; स्वामी के भरोसे जीवन की जरूरत सँभालता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

सादगी का केंद्र पर्याप्तता है। अपने और आश्रितों के आवश्यक दायित्व निभाते हुए लोभ सीमित रखें।

साखी ५७२ बेसास कौ अंग · मूल क्रमांक ११

राँम राँम सूँ दिल मिलि, जन हम पड़ी बिराइ। मोहि भरोसा इष्ट का, बंदा नरकि न जाइ॥
कठिन शब्दार्थ

दिल मिलि = हृदय से जुड़; बिराइ = उलाहना या विरोध।

सरल हिंदी अर्थ

हृदय राम से जोड़कर कबीर विरोध के बीच अपने इष्ट के भरोसे स्थिर हैं और आध्यात्मिक कल्याण की आशा रखते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

आस्था नैतिक साहस दे। उसे दूसरों पर श्रेष्ठता या किसी परिणाम की सार्वभौमिक गारंटी न बनाएँ।

साखी ५७३ बेसास कौ अंग · मूल क्रमांक १२

कबीर तूँ काहे डरै, सिर परि हरि का हाथ। हस्ती चढ़ि नहीं डोलिये, कूकर भूसैं जु लाष॥
कठिन शब्दार्थ

हस्ती = हाथी; भूसैं = भौंकें।

सरल हिंदी अर्थ

सिर पर हरि का हाथ है तो क्यों डरते हो? हाथी पर बैठे को असंख्य कुत्तों के भौंकने से डगमगाना नहीं चाहिए।

भावार्थ और जीवन-संदेश

उपमा आलोचना के बीच स्थिरता सिखाती है। उचित सुझाव सुनें, पर निरर्थक विरोध को अपना पूरा मन न सौंपें।

साखी ५७४ बेसास कौ अंग · मूल क्रमांक १३

मीठा खाँण मधूकरी, भाँति भाँति कौ नाज। दावा किसही का नहीं, बित बिलाइति बड़ राज॥
कठिन शब्दार्थ

मधूकरी = थोड़ी-थोड़ी मिली भिक्षा; बित = धन; दावा = स्वामित्व का आग्रह।

सरल हिंदी अर्थ

विभिन्न घरों से मिली थोड़ी अन्न-भिक्षा मधुर है; किसी एक पर दावा नहीं, व्यापक जीवन में स्वतंत्रता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह साधु-जीवन की सादगी का चित्र है। ग्रहणयोग्य भाव है कि लोभ और अधिकार की जिद कम हो।

साखी ५७५ बेसास कौ अंग · मूल क्रमांक १४

मोनि महातम प्रेम रस, गरवा तण गुण नेह। ए सबहीं अह लागया, जबहीं कह्या कुछ देह॥
कठिन शब्दार्थ

मोनि = मौन; गरवा = महत्त्व; अह लागया = आघात लगा।

सरल हिंदी अर्थ

मौन, प्रेम, गरिमा, गुण और स्नेह—स्वार्थ से ‘कुछ दो’ कहने पर इन सबको चोट लग सकती है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

संबंध को केवल लाभ का साधन न बनाएँ। साथ ही वास्तविक जरूरत में विनम्र सहायता माँगना अपमान नहीं।

साखी ५७६ बेसास कौ अंग · मूल क्रमांक १५

माँगण मरण समान है, बिरला वंचै कोइ। कहै कबीर रघुनाथ सूँ, मतिर मँगावै माहि॥
कठिन शब्दार्थ

माँगण = लोभ से याचना; वंचै = बचता।

सरल हिंदी अर्थ

माँगने की विवशता को कवि मृत्यु-जैसा कठिन कहते हैं और रघुनाथ से ऐसी पराधीनता से बचाने की विनती करते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह आत्मसम्मान और संतोष की प्रार्थना है। सहायता लेने वाले की गरिमा बनी रहे और सक्षम व्यक्ति उदार रहे।

साखी ५७७ बेसास कौ अंग · मूल क्रमांक १६

पांडल पंजर मन भवर, अरथ अनूपम बास। राँम नाँम सींच्या अँमी, फल लागा वेसास॥
कठिन शब्दार्थ

पंजर = देह; अँमी = अमृत; वेसास = विश्वास।

सरल हिंदी अर्थ

देह और मन के फूल-भँवरे वाले बिंब में रामनाम का अमृत सींचा गया, जिसका फल विश्वास के रूप में लगा।

भावार्थ और जीवन-संदेश

निष्ठा छोटे नियमित पोषण से बढ़ती है। स्मरण के साथ सत्य और निष्कपट कर्म उसके जल हैं।

साखी ५७८ बेसास कौ अंग · मूल क्रमांक १७

मेर मिटी मुकता भया, पाया ब्रह्म बिसास। अब मेरे दूजा को नहीं, एक तुम्हारी आस॥
कठिन शब्दार्थ

मेर = मेरा-पन; मुकता = मुक्त; बिसास = भरोसा।

सरल हिंदी अर्थ

मेरा-पन मिटा, मुक्त होने का अनुभव हुआ और ब्रह्म पर भरोसा मिला; अब अंतिम आशा उसी में है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

आसक्ति घटने से संबंधों में अधिकार का दबाव कम हो। स्वतंत्रता का फल करुणा और सरलता बने।

साखी ५७९ बेसास कौ अंग · मूल क्रमांक १८

जाकी दिल में हरि बसै, सो नर कलपै काँइ। एक लहरि समंद की, दुख दलिद्र सब जाँइ॥
कठिन शब्दार्थ

कलपै = व्याकुल हो; दलिद्र = अभाव।

सरल हिंदी अर्थ

हृदय में हरि बसे तो इतना व्याकुल क्यों? अनुग्रह की एक लहर दुःख-अभाव का बोझ हलका कर सकती है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह भक्त की आशा है, धन या समस्या मिटने की गारंटी नहीं। भरोसे के साथ उचित सहायता और प्रयत्न भी हों।

साखी ५८० बेसास कौ अंग · मूल क्रमांक १९

पद गाये लैलीन ह्नै, कटी न संसै पास। सबै पिछीड़ै, थोथरे, एक बिनाँ बेसास॥
कठिन शब्दार्थ

लैलीन = तल्लीन; पास = फंदा; थोथरे = सारहीन।

सरल हिंदी अर्थ

तल्लीन होकर पद गाए, फिर भी संशय का फंदा न कटा; दृढ़ विश्वास बिना प्रदर्शन का सार अधूरा है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

अभ्यास के साथ अपनी वास्तविक उलझन देखें। प्रश्न समझकर और आचरण में बदलाव से निष्ठा गहरी होती है।

साखी ५८१ बेसास कौ अंग · मूल क्रमांक २०

गावण हीं मैं रोज है, रोवण हीं में राग। इक वैरागी ग्रिह मैं, इक गृही मैं वैराग॥
कठिन शब्दार्थ

रोज = व्यथा; राग = लगाव; ग्रिह = घर।

सरल हिंदी अर्थ

गाने में भी दुःख छिप सकता है, रोने में भी आसक्ति; कोई घर में रहकर विरक्त है, कोई वैरागी होकर गृह-मोह में।

भावार्थ और जीवन-संदेश

बाहरी रूप से भीतर की स्थिति पूरी नहीं समझती। अपने उद्देश्य का निष्पक्ष आत्मपरीक्षण करें।

साखी ५८२ बेसास कौ अंग · मूल क्रमांक २१

गाया तिनि पाया नहीं, अणगाँयाँ थैं दूरि। जिनि गाया बिसवास सूँ, तिन राम रह्या भरिपूरि॥
कठिन शब्दार्थ

अणगाँयाँ = न गाने वाले; बिसवास = निष्ठापूर्ण भरोसा।

सरल हिंदी अर्थ

केवल गाने वाले सब नहीं पाते, पर बिना स्मरण भी दूरी है। विश्वास से गाने वाले भीतर राम की पूर्णता अनुभव करते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

कवि साधन और भाव का मेल कहते हैं। न यांत्रिक पाठ पर रुकें, न अभ्यास को ही छोड़ दें।

३६. पीव पिछाँणन कौ अंग

सीमित रूप से परे व्यापक और सूक्ष्म परम आश्रय की पहचान। मूल स्थानीय क्रमांक १–४।

साखी ५८३ पीव पिछाँणन कौ अंग · मूल क्रमांक १

संपटि माँहि समाइया, सो साहिब नहीसीं होइ। सफल मांड मैं रमि रह्या, साहिब कहिए सोइ॥
कठिन शब्दार्थ

संपटि = सीमित पात्र; मांड = विश्व का विस्तार।

सरल हिंदी अर्थ

जो केवल एक छोटे पात्र में सीमित समझा जाए, वह पूर्ण स्वामी कैसे? सर्वत्र रमने वाले को ही परम आश्रय कहो।

भावार्थ और जीवन-संदेश

परम तत्त्व की व्यापकता पर विचार करें। अपनी सीमित धारणा को संपूर्ण सत्य न मानें।

साखी ५८४ पीव पिछाँणन कौ अंग · मूल क्रमांक २

रहै निराला माँड थै, सकल माँड ता माँहि। कबीर सेवै तास कूँ, दूजा कोई नाँहि॥
कठिन शब्दार्थ

निराला = निर्लिप्त; सकल मांड = समस्त जगत।

सरल हिंदी अर्थ

परम सत्ता जगत से निर्लिप्त भी है और समस्त जगत उसमें है; कबीर उसी की सेवा करते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह व्यापकता और निर्लिप्तता का दर्शन है। जीवन में सहभागिता के साथ आसक्ति से स्वतंत्रता सीखी जा सकती है।

साखी ५८५ पीव पिछाँणन कौ अंग · मूल क्रमांक ३

भोलै भूली खसम कै, बहुत किया बिभचार। सतगुर गुरु बताइया, पूरिबला भरतार॥
कठिन शब्दार्थ

खसम = स्वामी; बिभचार = निष्ठा से भटकना; भरतार = प्रिय।

सरल हिंदी अर्थ

अपने मूल स्वामी को भूलकर अनेक आश्रयों में भटका; सद्गुरु ने उस सनातन प्रिय का परिचय कराया।

भावार्थ और जीवन-संदेश

मार्गदर्शन बिखरे उद्देश्य को एकाग्र कर सकता है। पराधीनता के बजाय विवेकपूर्ण निष्ठा विकसित हो।

साखी ५८६ पीव पिछाँणन कौ अंग · मूल क्रमांक ४

जाकै मह माथा नहीं, नहीं रूपक रूप। पुहुप बास थैं पतला ऐसा तत अनूप॥
कठिन शब्दार्थ

पुहुप बास = फूल की सुगंध; अनूप = अतुलनीय।

सरल हिंदी अर्थ

उस परम तत्त्व का न मुख-माथा है, न स्थूल रूप; वह फूल की सुगंध से भी सूक्ष्म और अनुपम है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

निर्गुण अनुभूति को रूपातीत उपमा से समझाया गया है। भाषा की सीमा पहचानते हुए विनय रखें।

३७. बिर्कताई कौ अंग

संबंधों की संवेदनशीलता, स्वामित्व का आग्रह और भीतर की स्वतंत्रता। मूल स्थानीय क्रमांक १–१०।

साखी ५८७ बिर्कताई कौ अंग · मूल क्रमांक १

मेरे मन मैं पड़ि गई, ऐसी एक दरार। फटा फटक पषाँण ज्यूँ, मिल्या न दूजी बार॥
कठिन शब्दार्थ

दरार = टूटन; फटक पषाँण = स्फटिक पत्थर।

सरल हिंदी अर्थ

मन में ऐसी दरार पड़ी कि फटे स्फटिक की तरह पहले-सा जोड़ नहीं बनता।

भावार्थ और जीवन-संदेश

विश्वास और आत्मीयता की रक्षा करें। कटुता या छल से बनी टूटन सुधारने में समय और सच्चा प्रयास लगता है।

साखी ५८८ बिर्कताई कौ अंग · मूल क्रमांक २

मन फाटा बाइक बुरै, मिटी सगाई साक। जौ परि दूध तिवास का, ऊकटि हूवा आक॥
कठिन शब्दार्थ

बाइक = वचन से; सगाई साक = संबंध; ऊकटि = फटकर।

सरल हिंदी अर्थ

बुरे वचन से मन फटा तो संबंध मिट गया; दूध फट जाए तो पहले जैसा नहीं रहता।

भावार्थ और जीवन-संदेश

वाणी से हुई चोट हलकी न मानें। समय रहते संवेदनशील संवाद और गलती की जिम्मेदारी लें।

साखी ५८९ बिर्कताई कौ अंग · मूल क्रमांक ३

चंदन माफों गुण करै, जैसे चोली पंन। दोइ जनाँ भागां न मिलै, मुकताहल अरु मंन॥
कठिन शब्दार्थ

माफों = चूर्ण या लेप; मुकताहल = मोती।

सरल हिंदी अर्थ

चंदन घिसकर या टुकड़ों में भी सुगंध देता है, पर टूटा मोती और टूटा मन आसानी से पहले जैसे नहीं मिलते।

भावार्थ और जीवन-संदेश

हर क्षति एक जैसी नहीं। संबंध के विश्वास को उपयोग की वस्तु की तरह न बरतें।

साखी ५९० बिर्कताई कौ अंग · मूल क्रमांक ४

पासि बिनंठा कपड़ा, कदे सुरांग न होइ। कबीर त्याग्या ग्यान करि, कनक कामनी दोइ॥
कठिन शब्दार्थ

पासि बिनंठा = पहले से बिगड़ा; सुरांग = सुंदर रंग।

सरल हिंदी अर्थ

बिगड़ी तैयारी वाले कपड़े पर रंग नहीं चढ़ता; विवेक से कबीर ने धन और कामना की आसक्ति छोड़ी।

भावार्थ और जीवन-संदेश

बाहरी त्याग के साथ भीतर की भूमि तैयार हो। लालसा और अहं पर काम करना आवश्यक है।

साखी ५९१ बिर्कताई कौ अंग · मूल क्रमांक ५

चित चेतनि मैं गरक ह्नै, चेत्य न देखैं मंत। कत कत की सालि पाड़िये, गल बल सहर अनंत॥
कठिन शब्दार्थ

गरक = डूबा; सालि = चुभन; सहर = देह-नगर।

सरल हिंदी अर्थ

चित्त चेतना में इतना रमा कि बाहरी उलझनों की अंतहीन चुभन पर उसका पुराना ध्यान नहीं रहा।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह अंतर्मुख स्थिरता की कठिन प्रतीक-भाषा है। केंद्रीय भाव व्यर्थ प्रतिक्रिया घटाकर मूल पर टिकना है।

साखी ५९२ बिर्कताई कौ अंग · मूल क्रमांक ६

जाता है सो जाँण दे, तेरी दसा न जाइ। खेवटिया की नाव ज्यूँ, धणों मिलैंगे आइ॥
कठिन शब्दार्थ

दसा = आध्यात्मिक स्थिति; खेवटिया = नाविक; धणों = अनेक।

सरल हिंदी अर्थ

जो जाता है उसे जाने दो; अपनी मूल स्थिति न खोओ। नाविक की नाव में यात्रियों की तरह अनेक आते-जाते रहेंगे।

भावार्थ और जीवन-संदेश

संबंध में आदर रहे, पर हर परिवर्तन पर चित्त न टूटे। विवेकपूर्ण स्थिरता और स्वीकार सीखें।

साखी ५९३ बिर्कताई कौ अंग · मूल क्रमांक ७

नीर पिलावत क्या फिरै, सायर घर घर बारि। जो त्रिषावंत होइगा, तो पीवेगा झष मारि॥
कठिन शब्दार्थ

सायर = सागर; त्रिषावंत = प्यासा।

सरल हिंदी अर्थ

घर-घर सागर है, फिर पानी पिलाने का प्रदर्शन क्यों? वास्तविक प्यास वाला स्वयं आगे बढ़कर पीएगा।

भावार्थ और जीवन-संदेश

ग्रहणशीलता सीखने में महत्त्वपूर्ण है। सहायता आत्मीय हो, पर अपना उपदेश दूसरों पर थोपना जरूरी नहीं।

साखी ५९४ बिर्कताई कौ अंग · मूल क्रमांक ८

सत गंठी कोपीन है, साध न मानै संक। राँम अमलि माता रहै, गिणैं इंद्र कौ रंक॥
कठिन शब्दार्थ

कोपीन = साधु का छोटा वस्त्र; अमलि = प्रेमरस में मस्त।

सरल हिंदी अर्थ

पुराने गाँठदार वस्त्र में भी साधक संकोच नहीं करता; रामरस की तृप्ति में इंद्र का वैभव भी छोटा लगता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

सादगी में आत्मसम्मान संभव है। अपने मूल्य को पोशाक और संपदा की तुलना पर निर्भर न रखें।

साखी ५९५ बिर्कताई कौ अंग · मूल क्रमांक ९

दावै दाझण होत है, निरदावै निरसंक। जे नर निरदावै रहैं, ते गणै इंद्र कौ रंक॥
कठिन शब्दार्थ

दावा = अधिकार और स्वामित्व की जिद; निरसंक = निःशंक।

सरल हिंदी अर्थ

दावा रखने से जलन आती है; दावा छोड़ने वाला निश्चिंत है और बड़े वैभव को भी तुच्छ समझता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

अनावश्यक अधिकार-आग्रह कम करने से संबंध सहज होते हैं। जिम्मेदारी और स्वामित्व के अहं का अंतर देखें।

साखी ५९६ बिर्कताई कौ अंग · मूल क्रमांक १०

कबीर सब जग हंडिया, मंदिल कंधि चढ़ाइ। हरि बिन अपनाँ को नहीं, देखे ठोकि बजाइ॥
कठिन शब्दार्थ

हंडिया = घूम आया; मंदिल = यात्रा की गठरी या वाद्य का कठिन रूप।

सरल हिंदी अर्थ

सारा जग घूमकर और सबको परखकर कबीर ने पाया कि हरि जैसा स्थिर अपना आश्रय नहीं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

बाहरी खोज अंततः भीतर की निष्ठा पर लौटती है। अनुभव से सार लें और व्यर्थ भटकाव सीमित करें।

३८. सम्रथाई कौ अंग

अपनी क्षमता की सीमा तथा दिव्य अनुग्रह की असीमता। मूल स्थानीय क्रमांक १–१२।

साखी ५९७ सम्रथाई कौ अंग · मूल क्रमांक १

नाँ कुछ किया न करि सक्या, नाँ करणे जोग सरीर। जे कुछ किया सु हरि किया, ताथै भया कबीर कबीर॥
कठिन शब्दार्थ

ताथै = उसी से; करणे जोग = करने में समर्थ।

सरल हिंदी अर्थ

अपने बल से न कुछ कर सका, न देह पूरी समर्थ थी; जो शुभ हुआ, हरि के अनुग्रह से हुआ।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह कृतज्ञता की भाषा है। प्रयत्न करते हुए भी सहयोग, अवसर और मिली क्षमता का ऋण पहचानें।

साखी ५९८ सम्रथाई कौ अंग · मूल क्रमांक २

कबीर किया कछू न होत है, अनकीया सब होइ। जे किया कछु होत है, तो करता औरे कोइ॥
कठिन शब्दार्थ

अनकीया = अपने अहं से बिना किए; करता = मूल कर्ता।

सरल हिंदी अर्थ

केवल मेरे करने से सब नहीं होता; जो होता है उसके पीछे व्यापक कारण और मूल कर्ता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

सफलता पर पूरा स्वामित्व न जताएँ। अपने कर्म की जिम्मेदारी और परिणाम के प्रति विनय साथ रहें।

साखी ५९९ सम्रथाई कौ अंग · मूल क्रमांक ३

जिसहि न कोई तिसहि तूँ, जिस तूँ तिस सब कोइ। दरिगह तेरी साँईंयाँ, नाँव हरू मन होइ॥
कठिन शब्दार्थ

दरिगह = दरबार; हरू मन = हलका मन।

सरल हिंदी अर्थ

जिसका कोई नहीं, उसका भी सहारा तुम हो; जिसे तुम्हारा भरोसा है, उसे भीतर व्यापक साथ मिलता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

आस्था अकेलेपन में साहस दे सकती है। साथ ही वास्तविक मानवीय सहयोग को ग्रहण करें।

साखी ६०० सम्रथाई कौ अंग · मूल क्रमांक ४

एक खड़े ही लहैं, और खड़ा बिललाइ। साईं मेरा सुलषना, सूता देइ जगाइ॥
कठिन शब्दार्थ

बिललाइ = व्याकुल पुकारे; सुलषना = सद्गुणी।

सरल हिंदी अर्थ

किसी को खड़े-खड़े मिलता है, कोई पुकारता रहता है; मेरा स्वामी सोए को भी जगाकर देता है—भक्त का ऐसा भरोसा है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

अनुग्रह को अपनी तुलना का विषय न बनाएँ। जागने का अवसर पहचानकर कृतज्ञता और प्रयत्न बढ़ाएँ।

साखी ६०१ सम्रथाई कौ अंग · मूल क्रमांक ५

सात समंद की मसि करौं, लेखनि सब बनराइ। धरती सब कागद करौं, तऊ हरि गुण लिख्या न जाइ॥
कठिन शब्दार्थ

मसि = स्याही; बनराइ = वनस्पति।

सरल हिंदी अर्थ

सात समुद्र स्याही, सारे वन लेखनी और धरती कागज हो, तब भी हरि के गुण पूरे नहीं लिखे जा सकते।

भावार्थ और जीवन-संदेश

असीमता की यह काव्य-अतिशयोक्ति विनय जगाती है। प्रकृति और जीवन की व्यापकता के प्रति कृतज्ञ रहें।

साखी ६०२ सम्रथाई कौ अंग · मूल क्रमांक ६

अबरन कौं का बरनिये, मोपै लख्या न जाइ। अपना बाना बाहिया, कहि कहि थाके माइ॥
कठिन शब्दार्थ

अबरन = अवर्णनीय; बाना = रूप या वेश।

सरल हिंदी अर्थ

जिसका पूरा वर्णन संभव नहीं, उसका वर्णन कैसे करूँ? लोग अपने-अपने रूप कहकर थक जाते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

अपने कथन की सीमा पहचानें। अलग अनुभव सुनें और सत्य पर पूर्ण स्वामित्व का दावा न करें।

साखी ६०३ सम्रथाई कौ अंग · मूल क्रमांक ७

झल बाँवे झल दाँहिनैं, झलहिं माँहि ब्यौहार। आगैं पीछै झलमई, राखै सिरजनहार॥
कठिन शब्दार्थ

झल = ज्वाला; ब्यौहार = जीवन का लेन-देन।

सरल हिंदी अर्थ

दाएँ-बाएँ और आगे-पीछे मोह की आग है; उसके बीच रचनहार का सहारा रक्षा देता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

कठिन संसार में विवेक और आस्था आधार बनें। खतरे को पहचानकर उचित कर्म करना भी आवश्यक है।

साखी ६०४ सम्रथाई कौ अंग · मूल क्रमांक ८

साईं मेरा बाँणियाँ, सहजि करै ब्यौपार। बिन डाँडी बिन पालड़ै, तोलै सब संसार॥
कठिन शब्दार्थ

बाँणियाँ = व्यापारी; डाँडी पालड़ा = तराजू।

सरल हिंदी अर्थ

मेरा स्वामी ऐसा व्यापारी है जो बिना भौतिक तराजू समस्त जगत का मोल जानता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

दिव्य न्याय की उपमा बाहरी दिखावे से आगे का मूल्य बताती है। अपने कर्म निष्कपट और न्यायपूर्ण रखें।

साखी ६०५ सम्रथाई कौ अंग · मूल क्रमांक ९

कबीर वार्‌या नाँव परि, कीया राई लूँण। जिसहिं चलावै पंथ तूँ, तिसहिं भुलावै कौंण॥
कठिन शब्दार्थ

वार्‌या = न्योछावर; राई लूँण = न्यौछावर के पदार्थ।

सरल हिंदी अर्थ

मैं नाम पर न्योछावर हूँ; जिसे तुम सही मार्ग दो, उसे भ्रमित कौन कर सकता है?

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह मार्गदर्शन पर भक्त का भरोसा है। भरोसा अपने विवेक और सदाचार से जुड़ा रहे।

साखी ६०६ सम्रथाई कौ अंग · मूल क्रमांक १०

कबीर करणी क्या करै, जे राँम न कर सहाइ। जिहिं जिहिं डाली पग धरै, सोई नवि नवि जाइ॥
कठिन शब्दार्थ

नवि = झुकती; करणी = प्रयास।

सरल हिंदी अर्थ

हरि की सहायता बिना प्रयास कैसे टिके? जिस डाल पर पैर रखता हूँ, वही झुकती जाती है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह अपनी असमर्थता का आत्मीय कथन है। कठिनाई में सहायता लें और धैर्य से उचित उपाय खोजें।

साखी ६०७ सम्रथाई कौ अंग · मूल क्रमांक ११

जदि का माइ जनमियाँ, कहूँ न पाया सुख। डाली डाली मैं फिरौं, पाती पाती दुख॥
कठिन शब्दार्थ

डाली पाती = अलग-अलग बाहरी आश्रय।

सरल हिंदी अर्थ

जन्म से अब तक स्थायी सुख नहीं मिला; डाल-डाल और पत्ते-पत्ते के आश्रय में दुःख पाया।

भावार्थ और जीवन-संदेश

लगातार नया आकर्षण खोजने से संतोष नहीं आता। अपनी गहरी जरूरत और जीवन की दिशा समझें।

साखी ६०८ सम्रथाई कौ अंग · मूल क्रमांक १२

साईं सूँ सब होत है, बंदे थै कछु नाहिं। राई थैं परबत करै, परबत राई माहिं॥
कठिन शब्दार्थ

राई परबत = छोटे-बड़े का बिंब; बंदे = मनुष्य।

सरल हिंदी अर्थ

साईं छोटे को बड़ा और बड़े को छोटा कर सकते हैं; भक्त अपने अकेले अहं को अंतिम कर्ता नहीं मानता।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह अनुग्रह और परिवर्तन की शक्ति का काव्य है। क्षमता के साथ नम्रता और जिम्मेदार प्रयत्न रखें।

३९. कुसबद कौ अंग

कटु वचन के बीच धैर्य, समता और निष्पक्षता। मूल स्थानीय क्रमांक १–४।

साखी ६०९ कुसबद कौ अंग · मूल क्रमांक १

अणी सुहेली सेल की, पड़ताँ लेइ उसास। चोट सहारै सबद की, तास गुरु मैं दास॥
कठिन शब्दार्थ

अणी = नोक; सेल = भाला; उसास = कराह।

सरल हिंदी अर्थ

भाले की चोट पर मनुष्य कराहता है, पर कटु वचन की चोट धैर्य से सहने वाला मेरा आदरणीय गुरु है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

वाणी का घाव गहरा होता है। संयम का आदर करें, साथ ही अपमान को सामान्य नियम मानकर सहते रहना जरूरी नहीं।

पाठ-टिप्पणी: स्रोत में पहले ख-प्रति का वैकल्पिक पहला पद है। यहाँ मुख्य क्रमांक १ “अणी सुहेली सेल की…” रखा गया है।

साखी ६१० कुसबद कौ अंग · मूल क्रमांक २

खूंदन तो धरती सहै, बाढ़ सहै बनराइ। कुसबद तो हरिजन सहै, दूजै सह्या न जाइ॥
कठिन शब्दार्थ

खूंदन = खोदना; बाढ़ = काटना; कुसबद = कटु वचन।

सरल हिंदी अर्थ

धरती खुदाई और वन कटाई सहता है; हरि-प्रेमी भी कठोर वचन धैर्य से सह सकता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

धैर्य प्रतिशोध की आग घटाता है। अपने सम्मान की सीमा रखते हुए प्रतिक्रिया में कटुता न बढ़ाएँ।

साखी ६११ कुसबद कौ अंग · मूल क्रमांक ३

सीतलता तब जाणिए, समिता रहे समाइ। पष छाड़ै निरपष रहै, सबद न दूष्या जाइ॥
कठिन शब्दार्थ

समिता = समता; पष = पक्षपात; निरपष = निष्पक्ष।

सरल हिंदी अर्थ

भीतर की शीतलता तब जानो जब समता बनी रहे, पक्षपात छूटे और शब्द से चित्त तुरंत दूषित न हो।

भावार्थ और जीवन-संदेश

आलोचना सुनकर ठहरें और उसका सत्य जाँचें। हर चोट का उत्तर चोट से देना आवश्यक नहीं।

साखी ६१२ कुसबद कौ अंग · मूल क्रमांक ४

कबीर सीतलता भई, पाया ब्रह्म गियान। जिहिं बैसंदर जग जल्या, सो मेरे उदिक समान॥
कठिन शब्दार्थ

बैसंदर = अग्नि; उदिक = जल।

सरल हिंदी अर्थ

ब्रह्मज्ञान से ऐसी शीतलता आई कि जिस अग्नि में जग जलता है, वही मेरे लिए जल-जैसी शांत हुई।

भावार्थ और जीवन-संदेश

दृष्टि बदलने से प्रतिक्रिया बदल सकती है। भीतर की स्थिरता कठिन परिस्थिति सँभालने में सहायक बनती है।

४०. सबद कौ अंग

गुरु-वाणी की अंतर्मुख शक्ति, निर्मलता और अनुभव। मूल स्थानीय क्रमांक १–८।

साखी ६१३ सबद कौ अंग · मूल क्रमांक १

कबीर सबद सरीर मैं, बिनि गुण बाजै तंति। बाहरि भीतरि भरि रह्या, ताथैं छूटि भरंति॥
कठिन शब्दार्थ

बिनि गुण = बिना स्थूल तार; तंति = तार का स्वर; भरंति = भ्रम।

सरल हिंदी अर्थ

भीतर शब्द का ऐसा संगीत है जो साधारण तार के बिना बजता है और बाहर-भीतर व्यापक अनुभव होकर भ्रम मिटाता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह सूक्ष्म अनुभूति की प्रतीक-भाषा है। उसके सार को अंतर्मुख सजगता और व्यापक अपनापन समझें।

साखी ६१४ सबद कौ अंग · मूल क्रमांक २

सती संतोषी सावधान, सबद भेद सुबिचार। सतगुर के प्रसाद थैं, सहज सील मत सार॥
कठिन शब्दार्थ

सती = सत्यनिष्ठ; सील = शील; प्रसाद = कृपा।

सरल हिंदी अर्थ

सत्यनिष्ठ, संतोषी और सावधान मन शब्द का भेद समझता है; गुरु की सीख से सहज शील और सही बुद्धि जागती है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

ज्ञान और चरित्र साथ विकसित हों। केवल अनुभव की चर्चा से अधिक नम्र आचरण महत्त्वपूर्ण है।

साखी ६१५ सबद कौ अंग · मूल क्रमांक ३

सतगुर ऐसा चाहिए, जैसा सिकलीगर होइ। सबद मसकला फेरि करि, देह द्रपन करे सोइ॥
कठिन शब्दार्थ

सिकलीगर = हथियार चमकाने वाला कारीगर; मसकला = घिसकर चमकाने का उपकरण।

सरल हिंदी अर्थ

गुरु ऐसा हो जो सिकलीगर की तरह शब्द की कसौटी से साधक को दर्पण-जैसा निर्मल करे।

भावार्थ और जीवन-संदेश

मार्गदर्शन अपनी गलतियाँ देखने की क्षमता जगाए। आश्रित बनाने से अधिक विवेक और सत्यनिष्ठा बढ़ाए।

साखी ६१६ सबद कौ अंग · मूल क्रमांक ४

सतगुर साँचा सूरिवाँ, सबद जु बाह्या एक। लागत ही में मिलि गया, पड़ा कलेजे छेक॥
कठिन शब्दार्थ

सूरिवाँ = शूरवीर; छेक = छेद; सबद = जागृत करने वाली वाणी।

सरल हिंदी अर्थ

सच्चे गुरु का एक शब्द-बाण भीतर लगा और अहं के आवरण में छेद हो गया।

भावार्थ और जीवन-संदेश

कभी एक सीख दिशा बदलती है। उसे अपनाने के लिए विनय और आत्मपरीक्षण की तैयारी चाहिए।

साखी ६१७ सबद कौ अंग · मूल क्रमांक ५

हरि रस जे जन बेधिया, सतगुण सी गणि नाहि। लागी चोट सरीर में, करक कलेजे माँहि॥
कठिन शब्दार्थ

बेधिया = भीतर तक छुआ; करक = कसक।

सरल हिंदी अर्थ

हरि-प्रेम से भीतर बेधा व्यक्ति अपना अनुभव हर बार गिना नहीं पाता; शब्द की चोट हृदय में बनी रहती है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

गहरा अनुभव प्रदर्शन नहीं माँगता। उसका मूल्य जीवन की संवेदनशीलता और परिवर्तन में देखें।

साखी ६१८ सबद कौ अंग · मूल क्रमांक ६

ज्यूँ ज्यूँ हरिगुण साभलूँ, त्यूँ त्यूँ लागै तीर। साँठी साँठी झड़ि पड़ि, झलका रह्या सरीर॥
कठिन शब्दार्थ

साँभलूँ = स्मरण करूँ; साँठी = पुराने आवरण का संकेत।

सरल हिंदी अर्थ

जितना हरि के गुण स्मरण करता हूँ, उतना ज्ञान-बाण लगता है और पुराने आवरण झड़ते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

स्मरण स्वयं को निर्दोष मानना नहीं। वह दोष पहचानकर सुधार करने की शक्ति दे।

साखी ६१९ सबद कौ अंग · मूल क्रमांक ७

ज्यूँ ज्यूँ हरिगुण साभलूँ, त्यूँ त्यूँ लागै तीर। लागै थैं भागा नहीं, साहणहार कबीर॥
कठिन शब्दार्थ

साहणहार = सहने वाला; लागै = प्रभाव पड़े।

सरल हिंदी अर्थ

हरिगुण स्मरण से भीतर की कसक बढ़ती है, पर कबीर उस जागृति से भागते नहीं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

सच्ची सीख कभी अपनी गलती स्पष्ट कर असुविधा देती है। उस बोध को धैर्यपूर्वक सुधार में बदलें।

साखी ६२० सबद कौ अंग · मूल क्रमांक ८

सारा बहुत पुकारिया, पीड़ पुकारै और। लागी चोट सबद की, रह्या कबीरा ठौर॥
कठिन शब्दार्थ

सारा = सकुशल व्यक्ति; ठौर = स्थिर स्थान।

सरल हिंदी अर्थ

बिना चोट वाला बहुत कहता है, पीड़ित की पुकार अलग होती है; शब्द से बेधे कबीर भीतर स्थिर हुए।

भावार्थ और जीवन-संदेश

चर्चा और अनुभूति का अंतर पहचानें। दूसरों के अनुभव पर निर्णय से पहले संवेदनशील होकर सुनें।

४१. जीवन मृतक कौ अंग

जीते जी अहं, ममता और अभिमान छोड़ने की प्रतीक-भाषा। मूल स्थानीय क्रमांक १–१४।

साखी ६२१ जीवन मृतक कौ अंग · मूल क्रमांक १

जीवन मृतक ह्नै रहै, तजै जगत की आस। तब हरि सेवा आपण करै, मति दुख पावै दास॥
कठिन शब्दार्थ

जीवन मृतक = जीते जी अहं की पकड़ छोड़ना; आस = अपेक्षा।

सरल हिंदी अर्थ

जीते जी संसार से स्वार्थी अपेक्षा छोड़ो; तब हरि स्वयं भक्त की सेवा करते हैं—कवि ऐसा आत्मीय भरोसा कहते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

‘जीवन मृतक’ आत्महानि नहीं, अहं का क्षय है। विनम्रता के साथ कर्तव्य और अपने जीवन का सम्मान बनाए रखें।

साखी ६२२ जीवन मृतक कौ अंग · मूल क्रमांक २

कबीर मन मृतक भया, दुरबल भया सरीर। तब पैडे लागा हरि फिरै, कहत कबीर कबीर॥
कठिन शब्दार्थ

मृतक मन = अहं का शांत होना; पैडे = पीछे।

सरल हिंदी अर्थ

मन का अहं मरा और देह का अभिमान घटा तो मानो हरि स्वयं कबीर को पुकारते पीछे आए।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह अनुग्रह की अतिशयोक्ति है। विनय और निष्कपटता से विकसित आत्मीयता इसका मूल भाव है।

साखी ६२३ जीवन मृतक कौ अंग · मूल क्रमांक ३

कबीर मरि मड़हट रह्या, तब कोइ न बूझै सार। हरि आदर आगै लिया, ज्यूँ गउ बछ की लार॥
कठिन शब्दार्थ

मड़हट = श्मशान; बछ = बछड़ा; लार = पीछे।

सरल हिंदी अर्थ

जब जग ने कवि की पुरानी प्रतिष्ठा छोड़ दी, हरि ने गाय-बछड़े जैसी आत्मीयता से अपनाया।

भावार्थ और जीवन-संदेश

लोकमान्यता से परे भी मनुष्य की गरिमा है। भीतर का भरोसा और सच्चे संबंध कठिन समय में आधार बनते हैं।

साखी ६२४ जीवन मृतक कौ अंग · मूल क्रमांक ४

घर जालौं घर उबरे, घर राखौं घर जाइ। एक अचंभा देखिया, मड़ा काल कौं खाइ॥
कठिन शब्दार्थ

घर = अहं-मोह का घर; मड़ा = अहंरहित साधक।

सरल हिंदी अर्थ

मोह का घर जलाने पर सच्चा आश्रय बचता है; उसे बचाए रखने पर सार खोता है। अहंरहित साधक काल से निर्भय कहा गया है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

उलटबाँसी का विषय भीतर की आसक्ति है। किसी वास्तविक घर या देह को नुकसान पहुँचाना इसका अर्थ नहीं।

साखी ६२५ जीवन मृतक कौ अंग · मूल क्रमांक ५

मरताँ मरताँ जग मुवा, औसर मुवा न कोइ। कबीर ऐसैं मरि मुवा, ज्यूँ बहूरि न मरना होइ॥
कठिन शब्दार्थ

औसर मरण = समय रहते अहं का क्षय; बहूरि = फिर।

सरल हिंदी अर्थ

देह से सब मरते हैं, पर समय रहते अहं छोड़ना विरला करता है। कबीर ऐसी मुक्ति की मृत्यु कहते हैं जिसमें बार-बार का भय घटे।

भावार्थ और जीवन-संदेश

मृत्यु का बिंब आत्मिक परिवर्तन का है। जीवन रहते विनय, प्रेम और जागरूकता बढ़ाएँ।

साखी ६२६ जीवन मृतक कौ अंग · मूल क्रमांक ६

बैद मुवा रोगी मुवा, मुवा सकल संसार। एक कबीरा ना मुवा, जिनि के राम अधार॥
कठिन शब्दार्थ

बैद = वैद्य; अधार = आश्रय।

सरल हिंदी अर्थ

वैद्य, रोगी और संसार सब नश्वर हैं; राम-आश्रय वाला कबीर अपने मूल की अमरता का अनुभव कहते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह आध्यात्मिक निर्भयता है, देह अमर रहने का दावा नहीं। नश्वरता के बीच सार्थक जीवन जिएँ।

साखी ६२७ जीवन मृतक कौ अंग · मूल क्रमांक ७

मन मार्‌या ममता मुई, अहं गई सब छूटि। जोगी था सो रमि गया, आसणि रही विभूति॥
कठिन शब्दार्थ

ममता = मेरा-पन; विभूति = राख।

सरल हिंदी अर्थ

मन का अहं, ममता और गर्व छूटे; योगी मूल में रमा, आसन पर पुरानी पहचान की राख रही।

भावार्थ और जीवन-संदेश

वेश और पद के प्रति आसक्ति ढीली हो। साधना दूसरों के प्रति सरलता और करुणा में प्रकट हो।

साखी ६२८ जीवन मृतक कौ अंग · मूल क्रमांक ८

जीवन थै मरिबो भलौ, जौ मरि जानै कोइ। मरनै पहली जे मरे, तौ कलि अजरावर होइ॥
कठिन शब्दार्थ

मरिबो = अहं की मृत्यु; अजरावर = नश्वर भय से परे स्थिति।

सरल हिंदी अर्थ

जीवित रहते अहं मरना जानो; देह की मृत्यु से पहले यह परिवर्तन हो तो आत्मिक निर्भयता मिले।

भावार्थ और जीवन-संदेश

‘मरना’ यहाँ अपने स्वार्थ का आग्रह छोड़ना है। आत्मसम्मान और जीवन-रक्षा उसके विरोधी नहीं।

साखी ६२९ जीवन मृतक कौ अंग · मूल क्रमांक ९

खरी कसौटी राम की, खोटा टिकैं न कोइ। राम कसौटी सो टिकै, जो जीवन मृतक होइ॥
कठिन शब्दार्थ

कसौटी = परखने का पत्थर; खोटा = मिश्रित या असच्चा।

सरल हिंदी अर्थ

राम की सच्ची कसौटी पर छल नहीं टिकता; अहं छोड़कर जीने वाला ही उस पर स्थिर रहता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

भक्ति की परीक्षा कर्म और निष्ठा में होती है। दिखावे से अधिक अपने भीतर की सच्चाई देखें।

साखी ६३० जीवन मृतक कौ अंग · मूल क्रमांक १०

आपा मेट्या हरि मिलै, हरि मेट्या सब जाइ। अकथ कहाणी प्रेम की, कह्या न को पत्याइ॥
कठिन शब्दार्थ

आपा = अहं; अकथ = पूरी तरह न कही जा सकने वाली।

सरल हिंदी अर्थ

अहं मिटे तो हरि का परिचय हो; हरि के सार को भुला दो तो सब खो जाए। प्रेम की यह कहानी शब्दों से पूरी नहीं कही जाती।

भावार्थ और जीवन-संदेश

स्वयं को केंद्र मानने की आदत घटाएँ। आत्मीयता और कृतज्ञता संबंधों में उसका अभ्यास हैं।

साखी ६३१ जीवन मृतक कौ अंग · मूल क्रमांक ११

निगु साँवाँ वहि जायगा, जाकै थाघी नहीं कोइ। दीन गरीबी बंदिगी, करता होइ सु होइ॥
कठिन शब्दार्थ

निगु = निःसहाय; थाघी = सहारा; दीन गरीबी = विनम्रता।

सरल हिंदी अर्थ

जिसका कोई बाहरी सहारा नहीं, वह नम्रता और बंदगी से कर्ता का आश्रय लेकर आगे बढ़ता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

अपने अभाव पर लज्जित न हों। विनय, उचित सहयोग और प्रयत्न से जीवन की दिशा बनाएँ।

साखी ६३२ जीवन मृतक कौ अंग · मूल क्रमांक १२

दीन गरीबी दीन कौ, दुँदर को अभिमान। दुँदर दिल विष सूँ भरी, दीन गरीबी राम॥
कठिन शब्दार्थ

दुँदर = द्वंद्व या झगड़ा; दीन = विनम्र।

सरल हिंदी अर्थ

विनम्र व्यक्ति सरलता रखता है, झगड़ालू अभिमान और विष भरता है; कबीर नम्रता को राम के निकट कहते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

सादगी आर्थिक अभाव का महिमामंडन नहीं। व्यवहार में अहं और कटुता कम करना इसका सार है।

साखी ६३३ जीवन मृतक कौ अंग · मूल क्रमांक १३

कबीर चेरा संत का, दासिन का परदास। कबीर ऐसे ह्नै रह्या, ज्यूँ पांऊँ तलि घास॥
कठिन शब्दार्थ

चेरा = सेवक; परदास = सेवकों का भी सेवक।

सरल हिंदी अर्थ

कबीर संतों के सेवक और सेवकों के भी सेवक बनकर पाँव तले घास जैसी नम्रता कहते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

सेवा में पद की होड़ कम हो। नम्रता के साथ अपनी और दूसरों की गरिमा भी सुरक्षित रखें।

साखी ६३४ जीवन मृतक कौ अंग · मूल क्रमांक १४

रोड़ा ह्नै रही बाट का, तजि पादंड अभिमान। ऐसा जे जन ह्नै रहे, ताहि मिले भगवान॥
कठिन शब्दार्थ

रोड़ा = छोटा पत्थर; पादंड = पाखंड।

सरल हिंदी अर्थ

रास्ते के साधारण पत्थर जैसे हो जाओ; पाखंड और अभिमान छोड़ने वाले को भगवान का परिचय मिलता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

असाधारण दिखने की चाह घटाएँ। सरल, उपयोगी और निष्कपट व्यवहार आध्यात्मिक अभ्यास है।

४२. चित कपटी कौ अंग

धार्मिक रूप और वास्तविक चरित्र के बीच की कसौटी। मूल स्थानीय क्रमांक १–३।

साखी ६३५ चित कपटी कौ अंग · मूल क्रमांक १

कबीर तहाँ न जाइए, जहाँ कपट का हेत। जालूँ कली कनीर की, तन रातो मन सेत॥
कठिन शब्दार्थ

हेत = उद्देश्य; कनीर = कनेर; रातो सेत = लाल-सफेद का बिंब।

सरल हिंदी अर्थ

जहाँ कपट का उद्देश्य हो, वहाँ मत जाओ; रंगीन कनेर की कली जैसे बाहरी रूप से भीतर की सच्चाई छिप सकती है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

विश्वास रूप और चापलूसी से नहीं, कर्म से बनाएँ। छलपूर्ण वातावरण से उचित सीमा रखें।

साखी ६३६ चित कपटी कौ अंग · मूल क्रमांक २

संसारी साषत भला, कँवारी कै भाइ। दुराचारी वेश्नों बुरा, हरिजन तहाँ न जाइ॥
कठिन शब्दार्थ

साषत = भक्ति-विमुख व्यक्ति का पुराना संबोधन; दुराचारी = गलत आचरण वाला।

सरल हिंदी अर्थ

सादा संसारी व्यक्ति उस धार्मिक पहचान वाले से भला है जो दुराचार करता है; भक्त ऐसे छलपूर्ण संग से बचे।

भावार्थ और जीवन-संदेश

नाम और मत नैतिक छूट नहीं देते। चरित्र को पहचानें और समुदाय के आधार पर दोष न थोपें।

साखी ६३७ चित कपटी कौ अंग · मूल क्रमांक ३

निरमल हरि का नाव सों, के निरमल सुध भाइ। के ले दूणी कालिमा, भावें सों मण साबण लाइ॥
कठिन शब्दार्थ

सुध भाइ = निर्मल भाव; मण = भार की मात्रा।

सरल हिंदी अर्थ

हरिनाम और निर्मल भाव से भीतर शुद्धि होती है; बहुत साबुन लगाने से मन की कालिमा नहीं मिटती।

भावार्थ और जीवन-संदेश

शारीरिक स्वच्छता के साथ विचार और कर्म की ईमानदारी भी आवश्यक है।

४३. गुरुसिष हेरा कौ अंग

हितकारी मार्गदर्शक, निष्कपट साथी और आत्मीय श्रोता की खोज। मूल स्थानीय क्रमांक १–१३।

साखी ६३८ गुरुसिष हेरा कौ अंग · मूल क्रमांक १

ऐसा कोई न मिले, हम कों दे उपदेस। भौसागर में डूबता, कर गहि काढ़े केस॥
कठिन शब्दार्थ

कर गहि = हाथ पकड़कर; भौसागर = जीवन की उलझनें।

सरल हिंदी अर्थ

ऐसा मार्गदर्शक खोजता हूँ जो डूबते को हाथ पकड़कर निकाले और सार्थक शिक्षा दे।

भावार्थ और जीवन-संदेश

अच्छा सहयोग संकट से उबारने के साथ अपना विवेक जगाता है। केवल बड़े वचन मार्गदर्शन नहीं।

साखी ६३९ गुरुसिष हेरा कौ अंग · मूल क्रमांक २

ऐसा कोई न मिले, हम को लेइ पिछानि। अपना करि किरपा करे, ले उतारै मैदानि॥
कठिन शब्दार्थ

पिछानि = पहचानकर; मैदानि = सुरक्षित खुले स्थान में।

सरल हिंदी अर्थ

कोई ऐसा मिले जो मुझे समझे, अपनाकर कृपा करे और कठिनाई से सुरक्षित राह पर उतारे।

भावार्थ और जीवन-संदेश

मार्गदर्शन में सुनना और व्यक्ति की परिस्थिति समझना आवश्यक है। आत्मीयता के साथ जिम्मेदारी हो।

साखी ६४० गुरुसिष हेरा कौ अंग · मूल क्रमांक ३

ऐसा कोई ना मिले, राम भगति का गीत। तनमन सौपे मृग ज्यूँ, सुने बधिक का गीत॥
कठिन शब्दार्थ

मृग = हिरन; बधिक = शिकारी।

सरल हिंदी अर्थ

भक्ति का ऐसा गीत सुनाने वाला खोजता हूँ कि मन हिरन के आकर्षित होने जैसा पूरी तन्मयता से जुड़ जाए।

भावार्थ और जीवन-संदेश

शिकारी का बिंब आकर्षण की तीव्रता कहता है। वास्तविक सीख में विवेक बना रहे, किसी को अंधसमर्पण न करें।

साखी ६४१ गुरुसिष हेरा कौ अंग · मूल क्रमांक ४

ऐसा कोई ना मिले, अपना घर देइ जराइ। पंचूँ लरिका पटिक करि, रहै राम ल्यौ लाइ॥
कठिन शब्दार्थ

घर = मोह का घर; पंच लरिका = पाँच इंद्रियों का बिंब।

सरल हिंदी अर्थ

ऐसा साधक मिले जो मोह का घर छोड़कर पाँचों इंद्रियों को साधे और राम में ध्यान रखे।

भावार्थ और जीवन-संदेश

घर जलाना और बच्चों को पटकना रूपक हैं। उनका अर्थ किसी घर या बच्चे को हानि नहीं, भीतर के मोह का संयम है।

साखी ६४२ गुरुसिष हेरा कौ अंग · मूल क्रमांक ५

ऐसा कोई ना मिले, जासौ रहिये लागि। सब जग जलता देखिये, अपणीं अपणीं आगि॥
कठिन शब्दार्थ

अपणीं आगि = अपनी लालसा और क्रोध।

सरल हिंदी अर्थ

ऐसा आत्मीय साथी नहीं मिलता जिससे जुड़ सकूँ; जग अपने-अपने स्वार्थ की आग में जलता दिखाई देता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

सच्चे संबंध में दूसरे का हित भी स्थान पाए। अपने दुःख के साथ उसकी परिस्थिति सुनें।

साखी ६४३ गुरुसिष हेरा कौ अंग · मूल क्रमांक ६

ऐसा कोई ना मिले, जासूँ कहूँ निसंक। जासूँ हिरदे की कहूँ, सो फिरि माडै कंक॥
कठिन शब्दार्थ

निसंक = निःसंकोच; कंक = विवाद या कटुता।

सरल हिंदी अर्थ

ऐसा कोई मिले जिससे मन की बात निडर होकर कहूँ; जिसे कहता हूँ, वही आगे विवाद खड़ा कर देता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

अंतरंगता के लिए विश्वास और गोपनीयता आवश्यक हैं। दूसरे की कही बात को हथियार न बनाएँ।

पाठ-टिप्पणी: इसी क्रमांक ६ से पहले “ढोल बजंता…” ख-प्रति का अतिरिक्त पद है; मुख्य पाठ “जासूँ कहूँ निसंक…” है।

साखी ६४४ गुरुसिष हेरा कौ अंग · मूल क्रमांक ७

ऐसा कोई ना मिले, सब बिधि देइ बताइ। सुनि मण्डल मैं पुरिष एक, ताहि रहै ल्यो लाइ॥
कठिन शब्दार्थ

सुनि मण्डल = सूक्ष्म अंतराकाश; पुरिष = परम सत्ता।

सरल हिंदी अर्थ

ऐसा मार्गदर्शक मिले जो सूक्ष्म साधना का रास्ता समझाए और उस एक परम सत्ता में ध्यान लगवाए।

भावार्थ और जीवन-संदेश

कठिन प्रतीक अनुभव की भाषा हैं। मार्गदर्शन स्पष्टता और आचरण-सुधार में सहायक होना चाहिए।

साखी ६४५ गुरुसिष हेरा कौ अंग · मूल क्रमांक ८

हम देखत जग जात है, जग देखत हम जाँह। ऐसा कोई ना मिले, पकड़ि छुड़ावै बाँह॥
कठिन शब्दार्थ

पकड़ि छुड़ावै = सहारा देकर बंधन से निकाले।

सरल हिंदी अर्थ

मैं जग को जाते देखता हूँ, जग मुझे जाता देखता है; ऐसा सहायक दुर्लभ है जो इस असावधानी से छुड़ाए।

भावार्थ और जीवन-संदेश

नश्वरता पहचानने वाला हितैषी मूल्यवान है। अपने संबंधों में भी सत्य और सजगता की याद बनाएँ।

साखी ६४६ गुरुसिष हेरा कौ अंग · मूल क्रमांक ९

तीनि सनेही बहु मिले, चौथे मिले न कोइ। सबे पियारे राम के, बैठे परबसि होइ॥
कठिन शब्दार्थ

तीनि चौथे = त्रिगुण और उससे परे की अवस्था का संकेत; परबसि = वश में।

सरल हिंदी अर्थ

संसार के तीन गुणों में रमे अनेक मिले, पर उनसे परे स्थिर साथी विरला है; सब किसी न किसी प्रभाव में बैठे हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

योगिक संकेतों की व्याख्या भिन्न हो सकती है। मुख्य भाव बाहरी समानता से आगे वास्तविक आत्मीय अनुभव खोजना है।

साखी ६४७ गुरुसिष हेरा कौ अंग · मूल क्रमांक १०

माया मिले महोर्बती, कूड़े आखै बेउ। कोइ घाइल बेध्या ना मिलै, साईं हंदा सैण॥
कठिन शब्दार्थ

महोर्बती = मोह-प्रेम दिखाने वाले; सैण = मित्र; बेध्या = भीतर छुआ।

सरल हिंदी अर्थ

मोह के साथी बहुत मिले, पर प्रिय की कसक से भीतर बेधा हुआ सच्चा साथी नहीं मिला।

भावार्थ और जीवन-संदेश

समान शब्द और पहचान पर्याप्त नहीं। निष्कपटता तथा साझा मूल्यों से संबंध गहरा होता है।

साखी ६४८ गुरुसिष हेरा कौ अंग · मूल क्रमांक ११

सारा सूरा बहु मिलें, घाइला मिले न कोइ। घाइल ही घाइल मिले, तब राम भगति दिढ़ होइ॥
कठिन शब्दार्थ

सारा = सकुशल; घाइल = प्रेम-जागृति से छुआ; दिढ़ = दृढ़।

सरल हिंदी अर्थ

बहादुरी का दावा करने वाले अनेक, प्रेम से भीतर बदले विरले हैं। ऐसे अनुभवी मिलें तो भक्ति दृढ़ होती है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

अनुभव बाँटना सहारा देता है। आत्मप्रदर्शन से अधिक संवेदनशील सुनवाई और ईमानदार संगति महत्त्वपूर्ण हैं।

साखी ६४९ गुरुसिष हेरा कौ अंग · मूल क्रमांक १२

प्रेमी ढूँढ़त मैं फिरौं, प्रेमी मिलै न कोइ। प्रेमी कौं प्रेमी मिलै, तब सब बिष अमृत होइ॥
कठिन शब्दार्थ

बिष अमृत = कटुता का मधुरता में बदलना।

सरल हिंदी अर्थ

प्रेमी खोजता फिरता हूँ, प्रेमी विरला मिलता है। प्रेम से प्रेम मिले तो विष जैसी कटुता भी अमृत हो जाती है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

आत्मीयता मन की कठोरता बदल सकती है। निष्कपट संबंध में विश्वास और परस्पर हित बढ़ाएँ।

पाठ-टिप्पणी: स्रोत की टिप्पणी के बाद अलग पंक्ति में आई “प्रेमी ढूँढ़त मैं फिरौं…” इस मुख्य साखी की पहली पंक्ति है; दोनों पंक्तियाँ जोड़ी गई हैं।

साखी ६५० गुरुसिष हेरा कौ अंग · मूल क्रमांक १३

हम घर जाल्या आपणाँ, लिया मुराड़ा हाथि। अब घर जालौं तास का, जै चलै हमारे साथि॥
कठिन शब्दार्थ

मुराड़ा = जलती लकड़ी; घर = अहं-मोह की संरचना।

सरल हिंदी अर्थ

मैंने अपना मोह-घर जलाया; जो साथ चले, उसका भी मोह मिटाने का संकल्प कहता हूँ।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह प्रसिद्ध आत्मपरिवर्तन का रूपक है। वास्तविक घर जलाना नहीं, असत्य और अहं की जड़ छोड़ना इसकी सीख है।

पाठ-टिप्पणी: यह मुख्य स्थानीय क्रमांक १३ है। इसके बाद ख-प्रति के अतिरिक्त पद १५ और १६ आते हैं; वे मुख्य गिनती में नहीं हैं।

४४. हेत प्रीति सनेह कौ अंग

दूरी के बीच स्मृति, निष्ठा और सच्चे भाव का संबंध। मूल स्थानीय क्रमांक १–४।

साखी ६५१ हेत प्रीति सनेह कौ अंग · मूल क्रमांक १

कमोदनी जलहरि बसै, चंदा बसै अकासि। जो जाही का भावता, सो ताही कै पास॥
कठिन शब्दार्थ

कमोदनी = कुमुदिनी; भावता = प्रिय।

सरल हिंदी अर्थ

कुमुदिनी जल में और चंद्रमा आकाश में हैं, फिर भी प्रेम का संबंध दूरी के बीच निकटता बनाता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

सच्ची आत्मीयता केवल भौतिक पास होने पर निर्भर नहीं। निष्ठा और स्मृति दूरी में भी जुड़ाव रखती हैं।

साखी ६५२ हेत प्रीति सनेह कौ अंग · मूल क्रमांक २

कबीर गुर बसै बनारसी, सिष समंदा तीर। बिसार्‌या नहीं बीसरे, जे गुंण होइ सरीर॥
कठिन शब्दार्थ

सिष = शिष्य; गुंण = संस्कार और सीख।

सरल हिंदी अर्थ

गुरु बनारस में हों और शिष्य समुद्र-तट पर, फिर भी सीख भीतर हो तो उन्हें भुलाया नहीं जाता।

भावार्थ और जीवन-संदेश

मार्गदर्शन की वास्तविक उपस्थिति जीवन में अपनाए गुण हैं। केवल निकट बैठना पर्याप्त नहीं।

साखी ६५३ हेत प्रीति सनेह कौ अंग · मूल क्रमांक ३

जो है जाका भावता, जदि तदि मिलसी आइ। जाकी तन मन सौंपिया, सो कबहूँ छाँड़ि न जाइ॥
कठिन शब्दार्थ

जदि तदि = कभी न कभी; सौंपिया = आत्मीय समर्पण किया।

सरल हिंदी अर्थ

जिससे सच्चा प्रेम है, उससे मिलन की आशा रहती है; तन-मन से जुड़े प्रिय को मन सहज नहीं छोड़ता।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह भक्त का भरोसा है। संबंध में निष्ठा का अर्थ सम्मान और जिम्मेदारी निभाना भी है।

साखी ६५४ हेत प्रीति सनेह कौ अंग · मूल क्रमांक ४

स्वामी सेवक एक मत, मन ही मैं मिलि जाइ। चतुराई रीझै नहीं, रीझै मन कै भाइ॥
कठिन शब्दार्थ

भाइ = भाव; रीझै = प्रसन्न हो।

सरल हिंदी अर्थ

स्वामी और सेवक एक भाव हों तो मन में ही मिलते हैं; चतुराई से नहीं, निष्कपट भाव से आत्मीयता बनती है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

छल और दिखावे के बजाय सत्य रखें। संबंधों में भी सच्चा उद्देश्य शब्दों से अधिक प्रभाव डालता है।

४५. सूरा तन कौ अंग

अंतर्मन के संघर्ष, दृढ़ता और अहं-समर्पण का वीररस। मूल स्थानीय क्रमांक १–४१।

इस अंग का युद्ध मुख्यतः काम, क्रोध और अहं से भीतर का संघर्ष है। स्थानीय ३३–३७ के ऐतिहासिक सती-दाह बिंबों को ऊपर दी टिप्पणी के संदर्भ में पढ़ें; उनके हिंसक कर्म का समर्थन या अनुकरण इस पाठ की सीख नहीं है।

साखी ६५५ सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक १

काइर हुवाँ न छूटिये, कछु सूरा तन साहि। भरम भलका दूरि करि, सुमिरण सेल सँबाहि॥
कठिन शब्दार्थ

सूरा तन = साहस धारण करना; सेल = भाला; सँबाहि = सँभाल।

सरल हिंदी अर्थ

कायरता में छूट नहीं मिलेगी; साहस रखो, भ्रम दूर करो और स्मरण के भाले को सँभालो।

भावार्थ और जीवन-संदेश

युद्ध का क्षेत्र भीतर की गलत प्रवृत्तियाँ हैं। कठिन आत्मपरीक्षण के लिए धैर्य और निष्ठा विकसित करें।

साखी ६५६ सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक २

षूँड़ै षड़ा न छूटियो, सुणि रे जीव अबूझ। कबीर मरि मैदान मैं, करि इंद्राँ सूँ झूझ॥
कठिन शब्दार्थ

षूँड़ै = कोने में; झूझ = संघर्ष; इंद्राँ = इंद्रियाँ।

सरल हिंदी अर्थ

कोने में छिपने से समस्या नहीं मिटती; भीतर के मैदान में इंद्रियों की दासता से सामना करो।

भावार्थ और जीवन-संदेश

पलायन के बजाय इच्छा और आदत समझें। संयम आत्मदंड नहीं, सजग निर्णय लेने की क्षमता है।

साखी ६५७ सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक ३

कबीर साईं सूरिवाँ, मन सूँ माँडै झूझ। पंच पयादा पाड़ि ले, दूरि करै सब दूज॥
कठिन शब्दार्थ

सूरिवाँ = शूरवीर; पंच पयादा = पाँच इंद्रियाँ; दूज = अलगाव।

सरल हिंदी अर्थ

सच्चा साधक मन से संघर्ष करता है, पाँच इंद्रियों को साधता है और भीतर का द्वंद्व घटाता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

अपनी कमजोरी मानना भी साहस है। अभ्यास से प्रतिक्रिया के बजाय विवेक चुनना सीखें।

साखी ६५८ सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक ४

सूरा झूझै गिरदा सूँ, इक दिसि सूर न होइ। कबीर यौं बिन सूरिवाँ, भला न कहिसी कोइ॥
कठिन शब्दार्थ

गिरदा = चारों ओर से; इक दिसि = एक दिशा।

सरल हिंदी अर्थ

वीर केवल एक ओर से नहीं, चारों ओर से आने वाली बाधाओं का सामना करता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

एक दोष पर जीत पर्याप्त नहीं। लोभ, क्रोध, अहं और छल के अनेक रूपों को सजगता से देखें।

साखी ६५९ सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक ५

कबीर आरणि पैसि करि, पीछै रहै सु सूर। सांईं सूँ साचा भया, रहसी सदा हजूर॥
कठिन शब्दार्थ

आरणि = रणभूमि; हजूर = निकट उपस्थिति।

सरल हिंदी अर्थ

कठिन मैदान में उतरकर पीछे न हटने वाला सच्चा होता है और स्वामी की निकटता पाता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह आत्मिक दृढ़ता का चित्र है। शुभ संकल्प कठिन होने पर भी छोटे नियमित कदम जारी रखें।

साखी ६६० सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक ६

गगन दमाँमाँ बाजिया, पड़ा निसानै घाव। खेत बुहार्‌या सूरिवै, मुझ मरणे का चाव॥
कठिन शब्दार्थ

दमाँमाँ = नगाड़ा; खेत = साधना का रणक्षेत्र।

सरल हिंदी अर्थ

आकाश का नगाड़ा बजा, निशाने पर चोट लगी और साधक ने मैदान सँभाला; अहं की मृत्यु का उत्साह जागा।

भावार्थ और जीवन-संदेश

भाषा वीररस की है, लक्ष्य आत्मपरिवर्तन है। वास्तविक मृत्यु का नहीं, मोह के छूटने का भाव ग्रहण करें।

साखी ६६१ सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक ७

कबीर मेरै संसा को नहीं, हरि सूँ लागा हेत। काम क्रोध सूँ झूझणाँ, चौड़े माँड्या खेत॥
कठिन शब्दार्थ

हेत = प्रेम; चौड़े खेत = खुला आंतरिक मैदान।

सरल हिंदी अर्थ

हरि से प्रेम जुड़ने पर संशय घटा; अब काम और क्रोध से जूझने का स्पष्ट मैदान मिला।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह पद संघर्ष का विषय स्वयं बताता है। दूसरों को शत्रु बनाने के बजाय अपने दोष सुधारें।

साखी ६६२ सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक ८

सूरै सार सँबाहिया, पहर्‌या सहज संजोग। अब कै ग्याँन गयंद चढ़ि, खेत पड़न का जोग॥
कठिन शब्दार्थ

सार = शस्त्र; सहज संजोग = सहज कवच; गयंद = हाथी।

सरल हिंदी अर्थ

साधक ने संयम का शस्त्र और सहजता का कवच सँभाला; ज्ञान के हाथी पर बैठ भीतर के मैदान में उतरता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

समझ और संतुलन साथ हों तो कठिन प्रतिक्रिया सँभलती है। केवल आवेग को साहस न मानें।

साखी ६६३ सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक ९

सूरा तबही परषिये, लडै धणीं के हेत। पुरिजा पुरिजा ह्नै पड़ै, तऊ न छाड़ै खेत॥
कठिन शब्दार्थ

धणीं = स्वामी; पुरिजा = टुकड़ा।

सरल हिंदी अर्थ

वीर वह जो अपने स्वामी के हेतु दृढ़ रहे, टुकड़े होने की अतिशयोक्ति में भी संकल्प न छोड़े।

भावार्थ और जीवन-संदेश

आध्यात्मिक अर्थ सत्य के प्रति स्थिरता है। इस उग्र बिंब को स्वयं या दूसरे की देह को हानि की प्रेरणा न बनाएँ।

साखी ६६४ सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक १०

खेत न छाड़ै सूरिवाँ, झूझै द्वै दल माँहि। आसा जीवन मरण की, मन आँणे नाहि॥
कठिन शब्दार्थ

द्वै दल = दो पक्षों का संघर्ष; आस = निजी लाभ की अपेक्षा।

सरल हिंदी अर्थ

वीर दो दलों के बीच जूझकर मैदान नहीं छोड़ता और अपने लाभ-हानि की चिंता में नहीं डूबता।

भावार्थ और जीवन-संदेश

कर्म के समय भय और लालच निर्णय न चलाएँ। विवेकपूर्ण उद्देश्य पर स्थिर रहते परिस्थिति भी समझें।

साखी ६६५ सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक ११

अब तो झूझ्याँही वणौं, मुढ़ि चाल्या घर दूरि। सिर साहिब कौ सौंपता, सोच न कीजै सूरि॥
कठिन शब्दार्थ

बणौं = निभेगा; सूरि = वीर।

सरल हिंदी अर्थ

अब भीतर के संघर्ष से गुजरना ही होगा; पुरानी अवस्था में लौटना दूर हो गया। स्वामी को अहं सौंपकर दृढ़ रहो।

भावार्थ और जीवन-संदेश

परिवर्तन शुरू हो तो असुविधा के कारण हर बार पीछे न हटें। जिम्मेदार प्रयास और धैर्य रखें।

साखी ६६६ सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक १२

अब तो ऐसी ह्नै पड़ी, मनकारु चित कीन्ह। मरनै कहा डराइये, हाथि स्यँधौरा लीन्ह॥
कठिन शब्दार्थ

स्यँधौरा = सिंदूर-पात्र, पुरानी सती-छवि का संकेत; मनकारु = संकल्प।

सरल हिंदी अर्थ

कवि पुरानी समर्पण-छवि से कहते हैं कि दृढ़ संकल्प कर लिया तो मृत्यु का भय क्यों दिखाया जाए?

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह ऐतिहासिक रूपक आज देह-दाह का समर्थन नहीं है। सकारात्मक भाव निष्ठा और अहं छोड़ना है।

साखी ६६७ सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक १३

जिस मरनै थे जग डरै, सो मरे आनंद। कब मारिहूँ कब देखिहूँ, पूरन परमाँनंद॥
कठिन शब्दार्थ

मरनै = अहं-मोह का मिटना; परमाँनंद = गहरा आत्मिक आनंद।

सरल हिंदी अर्थ

जिस मृत्यु से जग डरता है, उसी बिंब में कवि अहं मिटने और पूर्ण आनंद से मिलने की उत्कंठा कहते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

भक्ति में ‘मरना’ जीवन का अंत करने का आदेश नहीं। अपने स्वार्थ और भय की पकड़ कम करना उसका उपयोगी अर्थ है।

साखी ६६८ सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक १४

कायर बहुत पमाँवही बहकि न बोलै सूर। कॉम पड्याँ ही जाँणिहै, किसके मुख परि नूर॥
कठिन शब्दार्थ

पमाँवही = बढ़-चढ़कर बोलते; नूर = तेज।

सरल हिंदी अर्थ

कायर बहुत डींग मारते हैं, सच्चा वीर बहककर नहीं बोलता; काम पड़ने पर वास्तविक साहस पहचाना जाता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

दावे से अधिक कर्म पर भरोसा रखें। जिम्मेदारी आने पर शांत, स्पष्ट और उपयोगी बनना साहस है।

साखी ६६९ सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक १५

जाइ पूछौ उस घाइलै, दिवस पीड निस जाग। बाँहणहारा जाणिहै, कै जाँणै जिस लाग॥
कठिन शब्दार्थ

घाइल = भीतर प्रेम से छुआ; निस = रात।

सरल हिंदी अर्थ

जिसके भीतर चोट लगी है, उससे पूछो—दिन पीड़ा और रात जागरण है। उसे अनुभव करने वाला या प्रिय ही जानता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

अनुभव की गहराई बाहरी दिखावे से नहीं मापी जाती। दूसरों की व्यथा संवेदना से सुनें।

साखी ६७० सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक १६

घाइल घूमै गहि भर्‌या, राख्या रहे न ओट। जतन कियाँ जावै नहीं, बणीं मरम की चोट॥
कठिन शब्दार्थ

मरम = मर्म; ओट = छिपाव।

सरल हिंदी अर्थ

प्रेम की मर्मस्थ चोट छिपाने से छिपती नहीं; बाहरी उपाय उसकी भीतर की कसक नहीं हटाते।

भावार्थ और जीवन-संदेश

साधक की चाह अंतःकरण से जुड़ी है। उसे केवल बाहरी उपलब्धि से भरने का आग्रह न करें।

साखी ६७१ सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक १७

ऊँचा विरष अकासि फल, पंषी मूए झूरि। बहुत सयाँने पचि रहे, फल निरमल परि दूरि॥
कठिन शब्दार्थ

विरष = वृक्ष; झूरि = व्याकुल होकर; निरमल फल = आत्मज्ञान।

सरल हिंदी अर्थ

वृक्ष ऊँचा, फल दूर है; पक्षी व्याकुल हैं और अनेक चतुर लोग प्रयास में उलझे रह गए।

भावार्थ और जीवन-संदेश

लक्ष्य की ऊँचाई केवल चतुराई से नहीं सधती। विनय, सही मार्गदर्शन और धैर्य जरूरी हैं।

साखी ६७२ सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक १८

दूरि भया तौ का भया, सिर दे नेड़ा होइ। जब लग सिर सौपे नहीं, कारिज सिधि न होइ॥
कठिन शब्दार्थ

नेड़ा = निकट; कारिज सिधि = काम की सिद्धि।

सरल हिंदी अर्थ

लक्ष्य दूर है तो क्या? अहं समर्पित करो तो निकटता आएगी; अपने आग्रह छोड़े बिना पूरा काम नहीं होता।

भावार्थ और जीवन-संदेश

सिर देना अहं का रूपक है। सीखने और बदलने की तैयारी आध्यात्मिक प्रगति का आधार है।

साखी ६७३ सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक १९

कबीर यहु घर प्रेम का, खाला का घर नाहिं। सीस उतारै हाथि करि, सो पैसे घर माँहि॥
कठिन शब्दार्थ

खाला = मौसी; पैसै = प्रवेश करे।

सरल हिंदी अर्थ

प्रेम का घर केवल सहज मेहमाननवाजी का घर नहीं; अहं का सिर उतारने वाला उसमें प्रवेश करता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

आत्मीयता केवल सुविधा नहीं, जिम्मेदारी भी माँगती है। स्वार्थ और अपनी ही शर्तों का आग्रह कम करें।

साखी ६७४ सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक २०

कबीर निज घर प्रेम का, मारग अगम अगाध। सीर उतारि पग तलि धरै, तब निकटि प्रेम का स्वाद॥
कठिन शब्दार्थ

अगाध = अथाह; पग तलि = पाँव के नीचे।

सरल हिंदी अर्थ

प्रेम का मार्ग गहरा और कठिन है; अपना अहं नीचे रखो तो उसके स्वाद के निकट पहुँचोगे।

भावार्थ और जीवन-संदेश

नम्रता स्वयं को तुच्छ समझना नहीं। दूसरों का सम्मान और अपनी गलती मानने की क्षमता विकसित करें।

साखी ६७५ सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक २१

प्रेम न खेती नींपजे, प्रेम न हाटि बिकाइ। राजा परजा जिस रुचै, सिर दे सो ले जाइ॥
कठिन शब्दार्थ

हाटि = बाजार; राजा परजा = सभी वर्ग।

सरल हिंदी अर्थ

प्रेम न खेत में पैदा होता, न बाजार में बिकता। राजा हो या साधारण जन, अहं छोड़कर ही उसका रस मिलता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

धन और पद से प्रेम खरीदा नहीं जा सकता। निष्कपटता, आदर और जिम्मेदारी उसके आधार हैं।

साखी ६७६ सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक २२

सीस काटि पासंग दिया, जीव सरभरि लीन्ह। जाहि भावे सो आइ ल्यौ, प्रेम आट हँम कीन्ह॥
कठिन शब्दार्थ

पासंग = तराजू का छोटा संतुलन-भार; सरभरि = बराबर।

सरल हिंदी अर्थ

कवि प्रेम की हाट में अहं का सिर पासंग और पूरा जीवन उसके बराबर अर्पित करने का बिंब कहते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

व्यापार की उपमा प्रेम में पूर्ण सहभागिता दिखाती है। यह वास्तविक अंग काटने का निर्देश नहीं।

साखी ६७७ सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक २३

सूरै सीस उतारिया, छाड़ी तन की आस। आगै थैं हरि मुल किया, आवत देख्या दास॥
कठिन शब्दार्थ

मुल किया = स्वागत या मोल लिया; दास = समर्पित साधक।

सरल हिंदी अर्थ

वीर ने अहं छोड़ा, देहाभिमान घटाया और आगे प्रिय ने उसे अपनाया—कवि ऐसा मिलन कहते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

सच्चा समर्पण व्यवहार में विनय लाता है। उसे बाहरी यातना या प्रदर्शन से सिद्ध करने की जरूरत नहीं।

साखी ६७८ सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक २४

भगति दुहेली राम की, नहिं कायर का काम। सीस उतारै हाथि करि, सो लेसी हरि नाम॥
कठिन शब्दार्थ

दुहेली = कठिन; कायर = संकल्प से पलायन करने वाला।

सरल हिंदी अर्थ

राम की भक्ति कठिन है; अहं छोड़ने का साहस वाला ही नाम का सार ग्रहण करता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

भक्ति केवल सुख माँगना नहीं, अपने दोष बदलना भी है। यह परिवर्तन धैर्यपूर्ण अभ्यास से करें।

साखी ६७९ सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक २५

भगति दुहेली राँम की, जैसि खाँडे की धार। जे डोलै तो कटि पड़े, नहीं तो उतरै पार॥
कठिन शब्दार्थ

खाँडा = तलवार; धार = महीन किनारा।

सरल हिंदी अर्थ

भक्ति तलवार की धार जैसी सूक्ष्म सावधानी माँगती है; डगमगाहट हानि और स्थिरता पार का बिंब है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह सजगता की अतिशयोक्ति है। भूल होने पर आत्मदंड नहीं, समझ और अभ्यास से फिर संतुलन पाएँ।

पाठ-टिप्पणी: वेब-पाठ में पहले चरण के बाद अतिरिक्त “नहिं” मिला हुआ है। मुद्रित संदर्भ पृष्ठ १५४ के अनुसार “जैसि खाँडे की धार” पाठ लिया गया है।

साखी ६८० सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक २६

भगति दुहेली राँम की, जैसी अगनि की झाल। डाकि पड़ै ते ऊबरे, दाधे कौतिगहार॥
कठिन शब्दार्थ

झाल = ज्वाला; कौतिगहार = दर्शक।

सरल हिंदी अर्थ

भक्ति आग की ज्वाला जैसी कही गई है—पूरे मन से उतरने वाले पार होते, केवल बाहर तमाशा देखने वाले तपते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

मुख्य सीख पूर्ण सहभागिता है। वास्तविक आग में कूदने या कष्ट देने का अर्थ न लें।

साखी ६८१ सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक २७

कबीर घोड़ा प्रेम का, चेतनि चढ़ि असवार। ग्याँन षड़ग गहि काल सिरि, भली मचाई मार॥
कठिन शब्दार्थ

चेतनि = जागी चेतना; षड़ग = तलवार; काल = नश्वरता का भय।

सरल हिंदी अर्थ

प्रेम के घोड़े पर चेतना सवार है, ज्ञान की तलवार से काल-भय का सामना करती है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

प्रेम, सजगता और ज्ञान साथ हों तो भय घटता है। इस युद्ध-रूपक का क्षेत्र अंतःकरण है।

साखी ६८२ सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक २८

कबीरा हीरा वणजिया, महँगे मोल अपार। हाड़ गला माटी गली, सिर साटै ब्यौहार॥
कठिन शब्दार्थ

हीरा वणजिया = अमूल्य ज्ञान का व्यापार; सिर साटै = अहं के बदले।

सरल हिंदी अर्थ

कबीर ने अनमोल हीरे का व्यापार किया; देह की नश्वरता के बीच अहं छोड़ना उसकी कीमत बना।

भावार्थ और जीवन-संदेश

सच्चे मूल्य पाने में पुराना आग्रह छोड़ना पड़ता है। रूपक की कीमत चरित्र-परिवर्तन है, देहहानि नहीं।

साखी ६८३ सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक २९

जेते तारे रैणि के, तेते बैरी मुझ। घड़ सूली सिर कंगुरै, तऊ न बिसारौं तुझ॥
कठिन शब्दार्थ

रैणि = रात; कंगुरै = ऊँचे कंगूरे पर।

सरल हिंदी अर्थ

रात के तारों जितने विरोधी हों और देह पर घोर संकट आए, तब भी प्रिय को न भूलने का संकल्प है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

कवि निष्ठा की चरम अतिशयोक्ति कहते हैं। जीवन की रक्षा करते हुए भी अपने नैतिक मूल्य बनाए रखे जा सकते हैं।

साखी ६८४ सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक ३०

जे हारर्‌या तौ हरि सवां, जे जीत्या तो डाव। पारब्रह्म कूँ सेवता, जे सिर जाइ त जाव॥
कठिन शब्दार्थ

सवाँ = समान या अपनी ओर; डाव = दाँव।

सरल हिंदी अर्थ

हार हो तो हरि का आश्रय है, जीत हो तो प्रयास का फल; सेवा में अहं का सिर जाए तो जाने दो।

भावार्थ और जीवन-संदेश

लाभ-हानि से ऊपर सत्य का मूल्य पहचानें। समर्पण में विवेक और अपने जीवन के प्रति सम्मान बना रहे।

साखी ६८५ सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक ३१

सिर माटै हरि सेविए, छाड़ि जीव की बाँणि। जे सिर दीया हरि मिलै, तब लगि हाँणि न जाणि॥
कठिन शब्दार्थ

बाँणि = पुरानी आदत; सिर दीया = अहं छोड़ा।

सरल हिंदी अर्थ

पुरानी स्वार्थी आदत छोड़कर हरि की सेवा करो; अहं देने से प्रिय मिले तो उसे हानि मत समझो।

भावार्थ और जीवन-संदेश

हर त्याग नुकसान नहीं। झूठा अभिमान छोड़ना संबंध और भीतर की शांति को समृद्ध कर सकता है।

साखी ६८६ सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक ३२

टूटी बरत अकास थै, कोई न सकै झड़ झेल। साथ सती अरु सूर का, अँणी ऊपिला खेल॥
कठिन शब्दार्थ

अणी = नोक; साध सती सूर = निष्ठा और वीरता की पुरानी त्रयी।

सरल हिंदी अर्थ

आकाश से टूटते प्रहार की तरह कठिन कसौटी सहना दुर्लभ है; कवि साधक, सती और वीर के जीवन को नोक का खेल कहते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह ऐतिहासिक आदर्श-भाषा है। आज उसके भीतर की दृढ़ता लें, हिंसक प्रथा या देह-दंड नहीं।

साखी ६८७ सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक ३३

सती पुकारै सलि चढ़ी, सुनी रे मीत मसाँन। लोग बटाऊ चलि गए, हम तुझ रहे निदान॥
कठिन शब्दार्थ

सलि = चिता; मसाँन = श्मशान; निदान = अंत में।

सरल हिंदी अर्थ

ऐतिहासिक सती-दाह के बिंब में स्त्री श्मशान से कहती है—लोग चले गए, अंत में हम तुम्हारे पास रह गए।

भावार्थ और जीवन-संदेश

इस हिंसक प्रथा का अनुमोदन नहीं किया जा सकता। पाठ ऐतिहासिक साक्ष्य है; आत्मिक अर्थ में अकेलेपन के बीच निष्ठा का प्रश्न पढ़ें।

साखी ६८८ सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक ३४

सती बिचारी सत किया, काठौं सेज बिछाइ। ले सूती पीव आपणा, चहुँ दिसि अगनि लगाइ॥
कठिन शब्दार्थ

काठौं सेज = चिता की लकड़ियाँ; पीव = पति-प्रिय।

सरल हिंदी अर्थ

पद में स्त्री पति के साथ लकड़ी की चिता पर लेटती और चारों ओर अग्नि लगने का ऐतिहासिक चित्र है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

इस दृश्य को आदर्श आचरण या अनुकरण का निर्देश न मानें। किसी संबंध में प्रेम की कसौटी जीवन, सहमति और गरिमा की रक्षा है।

साखी ६८९ सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक ३५

सती सूरा तन साहि करि, तन मन कीया घाँण। दिया महौल पीव कूँ, तब मड़हट करै बषाँण॥
कठिन शब्दार्थ

घाँण = कोल्हू या पूर्ण समर्पण का बिंब; महौल = देह-घर।

सरल हिंदी अर्थ

कवि सती और वीर के उग्र बिंब से तन-मन के पूर्ण समर्पण की बात कहते हैं, जिसे श्मशान तक कथित कीर्ति मिलती है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

ऐतिहासिक प्रशंसात्मक भाषा को आलोचनात्मक संदर्भ में पढ़ें। आध्यात्मिक निष्ठा को हिंसा या आत्मविनाश से सिद्ध नहीं करना चाहिए।

साखी ६९० सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक ३६

सती जलन कूँ नीकली, पीव का सुमरि सनेह। सबद सुनन जीव निकल्या, भूति गई सब देह॥
कठिन शब्दार्थ

सबद सुनन = शब्द के अनुभव का क्षण; भूति = देह की पहचान।

सरल हिंदी अर्थ

दाह को जाती सती का बिंब प्रिय-स्मरण में देह की सुध भुलाने की चरम तन्मयता दिखाने के लिए आया है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

तन्मयता का सकारात्मक सार निष्कपट प्रेम है। ऐतिहासिक देह-दाह को आज स्वीकार्य क्रिया या आध्यात्मिक आवश्यकता न मानें।

साखी ६९१ सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक ३७

सती जलन कूँ नीकली, चित धरि एकबमेख। तन मन सौंप्या पीव कूँ, तब अंतर रही न रेख॥
कठिन शब्दार्थ

एकबमेख = एकरस; रेख = अलगाव की रेखा।

सरल हिंदी अर्थ

सती-दाह के पुराने चित्र में प्रिय से एकरस ध्यान और तन-मन अर्पण करके अलगाव मिटने की बात कही गई है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

मूल रूपक ऐतिहासिक है और उसका हिंसक कर्म अनुकरणीय नहीं। आंतरिक अर्थ अहं की दूरी मिटाकर प्रेम और करुणा बढ़ाना है।

साखी ६९२ सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक ३८

हौं तोहि पूछौं हे सखी, जीवत क्यूँ न मराइ। मूंवा पीछे सत करै, जीवत क्यूँ न कराइ॥
कठिन शब्दार्थ

जीवत मरना = जीते जी अहं त्यागना; सत = सत्यनिष्ठा।

सरल हिंदी अर्थ

हे सखी, जीवित रहते अपना अहं क्यों नहीं छोड़ती? मृत्यु के बाद सत्य का प्रदर्शन करने से पहले जीवन में उसे अपनाओ।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह पद ध्यान को जीते जी परिवर्तन पर लौटाता है। जीवित रहते सत्य, सेवा और करुणा अपनाना आवश्यक है।

साखी ६९३ सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक ३९

कबीर प्रगट राम कहि, छाँनै राँम न गाइ। फूस कौ जोड़ा दूरि करि, ज्यूँ बहुरि न लागै लाइ॥
कठिन शब्दार्थ

छाँनै = छिपकर; फूस कौ जोड़ा = जल्दी जलने वाला मोह।

सरल हिंदी अर्थ

राम का स्पष्ट स्मरण करो; भीतर के सूखे मोह का ढेर हटाओ, ताकि आग फिर न लगे।

भावार्थ और जीवन-संदेश

जो कमजोरी बार-बार विकार जगाती है, उसकी जड़ पर काम करें। दिखावे से अधिक स्पष्ट और ईमानदार साधना महत्त्वपूर्ण है।

पाठ-टिप्पणी: वेब-प्रतिलिपि में अंतिम चरण से “न” छूटा है। मुद्रित पृष्ठ १५५ के अनुसार फिर आग न लगने वाला पाठ रखा गया है।

साखी ६९४ सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक ४०

कबीर हरि सबकूँ भजै, हरि कूँ भजै न कोइ। जब लग आस सरीर की, तब लग दास न होइ॥
कठिन शब्दार्थ

आस सरीर की = देह-सुख का अनन्य आग्रह; भजै = सँभालता या स्मरण करता।

सरल हिंदी अर्थ

हरि सबको सँभालते हैं, पर निष्काम भाव से उन्हें विरला भजता है; केवल देह-सुविधा की चाह में सेवा अधूरी है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

अपने उद्देश्य की जाँच करें। देह की आवश्यक देखभाल रहे, साथ में स्वार्थ से व्यापक सेवा भी हो।

साखी ६९५ सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक ४१

आप सवारथ मेदनी, भगत सवारथ दास। कबीर राँम सवारथी, जिनि छाड़ीतन की आस॥
कठिन शब्दार्थ

मेदनी = दुनिया; सवारथ = उद्देश्य या लगाव।

सरल हिंदी अर्थ

दुनिया का उद्देश्य अपना लाभ है, भक्त का अपने प्रिय की सेवा; कबीर राम से ऐसा लगाव कहते हैं जिसमें अहं का आग्रह छूटे।

भावार्थ और जीवन-संदेश

स्वार्थ और आत्मीय उद्देश्य में अंतर देखें। सेवा में दूसरों का कल्याण और समान गरिमा भी सम्मिलित हो।

४६. काल कौ अंग

समय की अनिश्चितता, देह की नश्वरता और शुभ कार्य में विलंब न करना। मूल स्थानीय क्रमांक १–३२।

साखी ६९६ काल कौ अंग · मूल क्रमांक १

झूठे सुख कौ सुख कहैं, मानत है मन मोद। खलक चवीणाँ काल का, कुछ मुख मैं कुछ गोद॥
कठिन शब्दार्थ

मोद = आनंद; खलक = संसार; चवीणाँ = चबैना।

सरल हिंदी अर्थ

अस्थायी सुख को स्थायी मानकर मन खुश है, जबकि संसार काल का चबैना है—कुछ अभी, कुछ आगे उसकी पकड़ में है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

नश्वरता याद रखकर सुख का सदुपयोग करें। समय को केवल उपभोग में न गँवाएँ।

साखी ६९७ काल कौ अंग · मूल क्रमांक २

आज काल्हिक जिस हमैं, मारगि माल्हंता। काल सिचाणाँ नर चिड़ा, औझड़ औच्यंताँ॥
कठिन शब्दार्थ

सिचाणाँ = बाज; चिड़ा = चिड़िया; औच्यंताँ = अचानक।

सरल हिंदी अर्थ

आज-कल करते यात्री को काल बाज की तरह अचानक पकड़ सकता है, जैसे राह में चिड़िया को झपटे।

भावार्थ और जीवन-संदेश

अज्ञात समय के कारण शुभ कार्य न टालें। जीवन की जरूरी जिम्मेदारियाँ आज सँभालें।

साखी ६९८ काल कौ अंग · मूल क्रमांक ३

काल सिहाँणै यों खड़ा, जागि पियारो म्यंत। रामसनेही बाहिरा तूँ क्यूँ सोवै नच्यंत॥
कठिन शब्दार्थ

सिहाँणै = सिरहाने; म्यंत = मित्र; नच्यंत = निश्चिंत।

सरल हिंदी अर्थ

प्रिय मित्र, काल सिरहाने खड़ा है; राम की आत्मीयता भूले होकर इतनी असावधानी में क्यों सोते हो?

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह आध्यात्मिक जागरण का आह्वान है। सामान्य विश्राम रखते हुए विवेक और स्मरण न छोड़ें।

साखी ६९९ काल कौ अंग · मूल क्रमांक ४

सब जग सूता नींद भरि, संत न आवै नींद। काल खड़ा सिर उपरै, ज्यूँ तोरणि आया बींद॥
कठिन शब्दार्थ

बींद = दूल्हा; तोरणि = द्वार की सजावट।

सरल हिंदी अर्थ

जग असावधानी में सोता है, संत जागता है; काल सिर पर ऐसे खड़ा है जैसे दूल्हा द्वार पर आ पहुँचे।

भावार्थ और जीवन-संदेश

विवाह की उलटी उपमा अंतिम बुलावे की निश्चितता कहती है। वर्तमान जीवन में प्रेम और सत्कर्म अपनाएँ।

साखी ७०० काल कौ अंग · मूल क्रमांक ५

आज कहै हरि काल्हि भजौगा, काल्हि कहे फिरि काल्हि। आज ही काल्हि करंतड़ाँ, औसर जासि चालि॥
कठिन शब्दार्थ

औसर = अवसर; चालि = निकलकर।

सरल हिंदी अर्थ

आज कहता है कल भजूँगा, कल फिर अगले दिन पर टालता है; ऐसा करते अवसर निकल जाएगा।

भावार्थ और जीवन-संदेश

शुभ अभ्यास के लिए अनुकूल दिन की अंतहीन प्रतीक्षा न करें। आज से छोटा नियमित कदम शुरू करें।

साखी ७०१ काल कौ अंग · मूल क्रमांक ६

कबीर पल की सुधि नहीं, करै काल्हि का साज। काल अच्यंता झड़पसी, ज्यूँ तीतर को बाज॥
कठिन शब्दार्थ

अच्यंता = अनपेक्षित; साज = तैयारी; बाज = शिकारी पक्षी।

सरल हिंदी अर्थ

अगले पल की खबर नहीं, फिर भी दूर की तैयारी में सब भरोसा है; काल अचानक बाज जैसा झपट सकता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

योजना उपयोगी है, पर वर्तमान संबंध और कर्तव्य न भूलें। अनिश्चितता नम्रता सिखाए।

साखी ७०२ काल कौ अंग · मूल क्रमांक ७

कबीर टग टग चोघताँ, पल पल गई बिहाइ। जीव जँजाल न छाड़ई, जम दिया दमामा आइ॥
कठिन शब्दार्थ

टग टग चोघताँ = चुगते हुए; बिहाइ = बीत गया।

सरल हिंदी अर्थ

दाने चुगते पक्षी की तरह भोग जुटाते पल-पल समय बीत गया; जंजाल न छूटा और अंतिम नगाड़ा बज उठा।

भावार्थ और जीवन-संदेश

संग्रह की दौड़ के बीच समय का मूल्य देखें। आत्मपरीक्षण और सेवा को भी दिनचर्या में स्थान दें।

साखी ७०३ काल कौ अंग · मूल क्रमांक ८

मैं अकेला ए दोइ जणाँ छेती नाँहीं काँइ। जे जम आगै ऊबरो, तो जुरा पहूँती आइ॥
कठिन शब्दार्थ

जम = मृत्यु; जुरा = बुढ़ापा; ऊबरो = बचूँ।

सरल हिंदी अर्थ

मैं अकेला हूँ, सामने मृत्यु और बुढ़ापा दो हैं; एक से बचूँ तो दूसरा सामने आ जाता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

नश्वरता की सीमाएँ स्वीकारें। उनसे भयभीत होकर ठहरने के बजाय शेष अवसर का उचित उपयोग करें।

साखी ७०४ काल कौ अंग · मूल क्रमांक ९

बारी-बारी आपणीं, चेले पियारे म्यंत। तेरी बारी रे जिया, नेड़ी आवै निंत॥
कठिन शब्दार्थ

बारी = क्रम; नेड़ी = निकट; म्यंत = मित्र।

सरल हिंदी अर्थ

प्रियजन अपनी-अपनी बारी से चले गए; हे जीव, तेरी बारी भी रोज निकट आती है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

साथ की अस्थिरता प्रेम को अधिक मूल्यवान बनाती है। रहते हुए आदर और संवाद निभाएँ।

साखी ७०५ काल कौ अंग · मूल क्रमांक १०

दों की दाधी लाकड़ी, ठाढ़ी करै पुकार। मति बसि पड़ौं लुहार के, जालै दूजी बार॥
कठिन शब्दार्थ

दों = वनाग्नि; दाधी = जली; लुहार = भट्ठी में फिर जलाने वाला।

सरल हिंदी अर्थ

आग में जली लकड़ी मानो पुकारती है—लुहार के हाथ न पड़ूँ कि फिर जलाई जाऊँ।

भावार्थ और जीवन-संदेश

कवि बार-बार के मोह-दुःख से बचने की चाह कहते हैं। एक अनुभव से सीखकर उसी हानि का चक्र न दोहराएँ।

साखी ७०६ काल कौ अंग · मूल क्रमांक ११

जो ऊग्या सो आँथवै, फूल्या सो कुमिलाइ। जो चिणियाँ सो ढहि पड़ै, जो आया सो जाइ॥
कठिन शब्दार्थ

आँथवै = अस्त होगा; चिणियाँ = बनाया।

सरल हिंदी अर्थ

जो उगा वह अस्त होगा, फूल मुरझाएगा, बना ढहेगा और आया जाएगा।

भावार्थ और जीवन-संदेश

परिवर्तन जीवन का नियम है। उपलब्धि के साथ विनय तथा हानि के बीच धैर्य रखें।

साखी ७०७ काल कौ अंग · मूल क्रमांक १२

जो पहर्‌या सो फाटिसी, नाँव धर्‌या सो जाइ। कबीर सोइ तत्त गहि, जो गुरि दिया बताइ॥
कठिन शब्दार्थ

फाटिसी = फटेगा; तत्त = सार; गुरि = गुरु ने।

सरल हिंदी अर्थ

पहनावा फटेगा, नाम और देह मिटेंगे; गुरु ने जो स्थिर सार बताया, उसे ग्रहण करो।

भावार्थ और जीवन-संदेश

बाहरी पहचान के साथ सत्य, करुणा और विवेक जैसे मूल्य विकसित करें।

साखी ७०८ काल कौ अंग · मूल क्रमांक १३

निधड़क बैठा राम बिन, चेतनि करै पुकार। यहु तन जल का बुदबुदा, बिनसत नाहीं बार॥
कठिन शब्दार्थ

निधड़क = असावधान निडर; बुदबुदा = बुलबुला।

सरल हिंदी अर्थ

चेतना पुकारती है—राम का सार भूले बेफिक्र क्यों हो? यह देह जल का बुलबुला है, टूटने में देर नहीं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

कवि आत्मिक तैयारी का आग्रह करते हैं। शरीर की नश्वरता जीवन की जिम्मेदारी से विमुख न करे।

साखी ७०९ काल कौ अंग · मूल क्रमांक १४

पाँणी केरा बुदबुदा, इसी हमारी जाति। एक दिनाँ छिप जाँहिंगे, तारे ज्यूँ परभाति॥
कठिन शब्दार्थ

जाति = प्रकार या प्रकृति; परभाति = सुबह।

सरल हिंदी अर्थ

हमारा देह-रूप पानी के बुलबुले जैसा है; एक दिन सुबह के तारों की तरह ओझल हो जाएगा।

भावार्थ और जीवन-संदेश

अस्थिरता समझकर आज की आत्मीयता और सार्थक कर्म का सम्मान करें।

साखी ७१० काल कौ अंग · मूल क्रमांक १५

कबीर यहु जग कुछ नहीं, षिन षारा षिन मीठ। काल्हि जु बैठा माड़ियां, आज नसाँणाँ दीठ॥
कठिन शब्दार्थ

खारा मीठ = दुःख-सुख; माड़ियां = बड़े भवन; नसाँणाँ = श्मशान।

सरल हिंदी अर्थ

यह जग क्षण में खारा, क्षण में मीठा है। कल महल में बैठा व्यक्ति आज श्मशान में दिखाई दिया।

भावार्थ और जीवन-संदेश

परिस्थिति का परिवर्तन तेज हो सकता है। सफलता में विनय और कठिनाई में सहानुभूति बनाए रखें।

साखी ७११ काल कौ अंग · मूल क्रमांक १६

कबीर मंदिर आपणै, नित उठि करती आलि। मड़हट देष्याँ डरपती, चौड़े दीन्हीं जालि॥
कठिन शब्दार्थ

आलि = सजावट; मड़हट = श्मशान; जालि = जली अवस्था।

सरल हिंदी अर्थ

देहरूपी घर को रोज सजाती आत्मा श्मशान देखकर डरती है, जहाँ उसी देह का अंतिम रूप प्रकट है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

देखभाल के साथ नश्वरता का विवेक रखें। बाहरी सजावट जीवन की पूरी तैयारी नहीं।

साखी ७१२ काल कौ अंग · मूल क्रमांक १७

मंदिर माँहि झबूकती, दीवा केसी जोति। हंस बटाऊ चलि गया, काढ़ौ घर की छोति॥
कठिन शब्दार्थ

झबूकती = झिलमिलाती; हंस बटाऊ = यात्री चेतना; छोति = निष्प्राण घर का अवशेष।

सरल हिंदी अर्थ

देह-मंदिर में दीप-जैसी चेतना झिलमिलाती थी; यात्री हंस चला गया तो देह खाली घर रह गई।

भावार्थ और जीवन-संदेश

जीवन की चेतना रहते अवसर अपनाएँ। व्यक्तियों को केवल देह या संपत्ति तक सीमित न समझें।

साखी ७१३ काल कौ अंग · मूल क्रमांक १८

ऊँचा मंदिर धौलहर, माटी चित्री पौलि। एक राम के नाँव बिन, जँम पाड़गा रौलि॥
कठिन शब्दार्थ

धौलहर = महल; पौलि = द्वार; रौलि = उथल-पुथल।

सरल हिंदी अर्थ

ऊँचा महल और चित्रित द्वार भी अंतिम समय की उथल-पुथल नहीं रोकते; भीतर का आश्रय आवश्यक है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

धन और भवन साधन हैं। उनके साथ जीवन के नैतिक तथा आत्मिक मूल्य भी सँजोएँ।

साखी ७१४ काल कौ अंग · मूल क्रमांक १९

कबीर कहा गरबियो, काल गहै कर केस। नाँ जाँणै कहाँ मारिसी, कै घर कै परदेस॥
कठिन शब्दार्थ

केस = बाल; काल = मृत्यु।

सरल हिंदी अर्थ

काल बाल पकड़कर ले जा सकता है; पता नहीं अंतिम क्षण घर आए या परदेस।

भावार्थ और जीवन-संदेश

अहं छोड़कर अपने संबंध और जिम्मेदारियाँ समय रहते सँभालें। अनिश्चितता वर्तमान का मूल्य बताती है।

साखी ७१५ काल कौ अंग · मूल क्रमांक २०

कबीर जंत्रा न बाजई, टूटि गए सब तार। जंत्रा बिचारा क्या करै, चलै बजावणहार॥
कठिन शब्दार्थ

जंत्रा = वाद्य; बजावणहार = वादक।

सरल हिंदी अर्थ

तार टूट गए तो वाद्य नहीं बजता; वादक चला जाए तो उसका उपकरण अकेला क्या करे?

भावार्थ और जीवन-संदेश

देह को वाद्य की उपमा देकर जीवन की चेतना का मूल्य कहा गया है। क्षमता रहते उसका सार्थक उपयोग करें।

साखी ७१६ काल कौ अंग · मूल क्रमांक २१

धवणि धवंती रहि गई, बुझि गए अंगार। अहरणि रह्या ठमूकड़ा, जब उठि चले लुहार॥
कठिन शब्दार्थ

धवणि = धौंकनी; अहरणि = निहाई; ठमूकड़ा = अचल।

सरल हिंदी अर्थ

लोहार चला गया तो धौंकनी थमी, अंगारे बुझे और निहाई स्थिर रही।

भावार्थ और जीवन-संदेश

जीवन की सक्रियता अपने मूल आधार पर निर्भर है। काम करते समय उसकी अस्थिरता और कृतज्ञता याद रखें।

साखी ७१७ काल कौ अंग · मूल क्रमांक २२

पंथी ऊभा पंथ सिरि, बुगचा बाँध्या पूठि। मरणाँ मुँह आगै खड़ा, जीवण का सब झूठ॥
कठिन शब्दार्थ

बुगचा = गठरी; पूठि = पीठ; पंथी = यात्री।

सरल हिंदी अर्थ

यात्री राह पर गठरी बाँधे खड़ा है, सामने मृत्यु है; स्थायी रहने का उसका भरोसा भ्रम है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

जीवन को यात्रा मानकर अनावश्यक बोझ घटाएँ। आवश्यक जिम्मेदारी, प्रेम और सत्कर्म साथ रखें।

साखी ७१८ काल कौ अंग · मूल क्रमांक २३

यहु जिव आया दूर थैं, अजौ भी जासी दूरि। बिच कै बासै रमि रह्या, काल रह्या सर पूरि॥
कठिन शब्दार्थ

अजौ = आगे; बिच का बासा = बीच का ठहराव।

सरल हिंदी अर्थ

जीव दूर से आया और आगे दूर जाएगा; बीच के पड़ाव में ऐसा रमा कि सिर पर खड़े काल को भूल गया।

भावार्थ और जीवन-संदेश

अस्थायी अवस्था को अंतिम मानकर न अटकें। वर्तमान का उपयोग करें, उससे चिपककर विवेक न खोएँ।

साखी ७१९ काल कौ अंग · मूल क्रमांक २४

राम कह्या तिनि कहि लिया, जुरा पहूँती आइ। मंदिर लागै द्वार यै, तब कुछ काढणां न जाइ॥
कठिन शब्दार्थ

जुरा = बुढ़ापा; द्वार = निकास का रूपक।

सरल हिंदी अर्थ

जिसने पहले स्मरण किया, उसने कर लिया; बुढ़ापा और अंतिम घड़ी द्वार रोक दें तो नया अर्जन कठिन हो जाता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

अच्छी आदतें समय रहते विकसित करें। साथ ही देर से शुरू करने वाले का भी उत्साह बनाए रखें।

साखी ७२० काल कौ अंग · मूल क्रमांक २५

बरिया बीती बल गया, बरन पलट्या और। बिगड़ीबात न बाहुणै, कर छिटक्याँ कत ठौर॥
कठिन शब्दार्थ

बरिया = समय; बरन = रूप-रंग; बाहुणै = वापस आए।

सरल हिंदी अर्थ

समय बीता, बल घटा और रूप बदल गया। हाथ से छूटा अवसर आसानी से वापस नहीं आता।

भावार्थ और जीवन-संदेश

भूत की हानि स्वीकारकर उपलब्ध समय का उपयोग करें। केवल पछतावे में शेष अवसर न खोएँ।

साखी ७२१ काल कौ अंग · मूल क्रमांक २६

बरिया बीती बल गया, अरू बुरा कमाया। हरि जिन छाड़ै हाथ थैं, दिन नेड़ा आया॥
कठिन शब्दार्थ

नेड़ा = निकट; हेत = प्रेम।

सरल हिंदी अर्थ

समय और बल बीते, ऊपर से बुरे कर्म किए; फिर भी हरि का सहारा मत छोड़ो, जीवन की घड़ी निकट है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

ग्लानि को सुधार का कारण बनाएँ। गलत काम रोकें और जहाँ संभव हो उसका परिणाम सँभालें।

साखी ७२२ काल कौ अंग · मूल क्रमांक २७

कबीर हरि सूँ हेत करि, कूड़ै चित्त न लाव। बाँध्या बार षटीक कै, तापसु किती एक आव॥
कठिन शब्दार्थ

षटीक = खटिक, बध करने वाले का पुराना संबोधन; तापसु = तपस्वी।

सरल हिंदी अर्थ

असार चाह में मत फँसो; बंधन के बाद बचाने की देर हो सकती है, इसलिए हरि से प्रेम अभी जोड़ो।

भावार्थ और जीवन-संदेश

उपमा विलंब के खतरे की है। समय रहते अपना आचरण और जीवन की दिशा सँभालें।

साखी ७२३ काल कौ अंग · मूल क्रमांक २८

बिष के बन मैं घर किया, सरप रहे लपटाइ। ताथैं जियरे डरैं गह्या, जागत रैणि बिहाइ॥
कठिन शब्दार्थ

बिष का बन = हानिकारक आसक्ति; रैणि = रात।

सरल हिंदी अर्थ

विषैले वन में घर और लिपटे साँपों के बीच मन भय से रात भर जागता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

अपने ही चुने वातावरण का प्रभाव देखें। लगातार भय और दोष बढ़ाने वाली आदतों से उचित दूरी बनाएँ।

साखी ७२४ काल कौ अंग · मूल क्रमांक २९

कबीर सब सुख राम है, और दुखाँ की रासि। सुर नर मुनिवर असुर सब, पड़े काल की पासि॥
कठिन शब्दार्थ

रासि = समूह; पासि = फंदा।

सरल हिंदी अर्थ

राम का आश्रय सार-सुख है; देव, मनुष्य, मुनि और असुर सभी काल की सीमा में हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

पद और उपलब्धि नश्वरता नहीं मिटाते। भीतर का स्थिर आधार और नैतिक जीवन विकसित करें।

साखी ७२५ काल कौ अंग · मूल क्रमांक ३०

काची काया मन अथिर, थिर थिर काँम करंत। ज्यूँ ज्यूँ नर निधड़क फिरै, त्यूँ त्यूँ काल हसंत॥
कठिन शब्दार्थ

काची काया = नश्वर देह; अथिर = चंचल।

सरल हिंदी अर्थ

देह नश्वर, मन चंचल है, फिर भी स्थायी अधिकार जैसे काम करता है; असावधानी देखकर काल मानो हँसता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

योजना बनाएँ, पर परिणाम का अहं न पालें। नम्रता और वर्तमान के प्रति सजगता रखें।

साखी ७२६ काल कौ अंग · मूल क्रमांक ३१

रोवणहारे भी मुए, मुए जलाँवणहार। हा हा करते ते मुए, कासनि करौं पुकार॥
कठिन शब्दार्थ

कासनि = किससे; जलाँवणहार = अंतिम संस्कार करने वाला।

सरल हिंदी अर्थ

रोने वाले, जलाने वाले और विलाप करने वाले भी चले गए; अब किसे पुकारूँ?

भावार्थ और जीवन-संदेश

नश्वरता सभी की है। शोक के बीच मानवीय सहारा और जीवन के प्रति करुणा का मूल्य समझें।

साखी ७२७ काल कौ अंग · मूल क्रमांक ३२

जिनि हम जाए ते मुए, हम भी चालणहार। जे हमको आगै मिलै, तिन भी बंध्या मार॥
कठिन शब्दार्थ

जाए = जन्म दिया; चालणहार = जाने वाले; मार = काल का प्रभाव।

सरल हिंदी अर्थ

जिन्होंने जन्म दिया वे चले गए, हम भी जाने वाले हैं; जो आगे मिलेंगे, वे भी उसी काल-सीमा में हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

साथ का समय सीमित है। रहते हुए सेवा, सम्मान और जरूरी बातों को पूरा करें।

४७. सजीवनी कौ अंग

आत्मिक निर्भयता, निर्मल आश्रय और उपकार का जीवन। मूल स्थानीय क्रमांक १–७।

साखी ७२८ सजीवनी कौ अंग · मूल क्रमांक १

जहाँ जुरा मरण ब्यापै नहीं, मुवा न सुणिये कोइ। चलि कबीर तिहि देसड़ै, जहाँ बैद विधाता होइ॥
कठिन शब्दार्थ

जुरा = बुढ़ापा; देसड़ा = आध्यात्मिक आश्रय; बैद = वैद्य।

सरल हिंदी अर्थ

कबीर उस आश्रय की ओर चलने को कहते हैं जहाँ बुढ़ापे-मृत्यु का भय नहीं और विधाता स्वयं वैद्य हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह आत्मिक निर्भयता की कल्पना है, देह की अमरता का दावा नहीं। जीवन की सीमाओं के बीच सार पहचानें।

साखी ७२९ सजीवनी कौ अंग · मूल क्रमांक २

कबीर जोगी बनि बस्या, षणि खाये कंद मूल। नाँ जाणौ किस जड़ी थैं, अमर गए असथूल॥
कठिन शब्दार्थ

कंद मूल = वन का साधारण आहार; असथूल = स्थूलता से परे।

सरल हिंदी अर्थ

वनवासी योगी कंद-मूल खाता रहा; कवि पूछते हैं किस जड़ी से वह मानो स्थूल बंधन से मुक्त अमर हुआ?

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह योगिक बिंब है। किसी वनस्पति को अमरता की औषधि मानकर उपयोग करने का निर्देश नहीं।

साखी ७३० सजीवनी कौ अंग · मूल क्रमांक ३

कबीर हरि चरणौं चल्या, माया मोह थैं टूटि। गगन मंडल आसण किया, काल गया सिर कूटि॥
कठिन शब्दार्थ

गगन मंडल = सूक्ष्म अंतराकाश; आसण = ध्यान की स्थिति।

सरल हिंदी अर्थ

मोह से टूटकर हरिचरण की ओर चला और अंतराकाश में स्थिर हुआ; काल का भय व्यर्थ रह गया।

भावार्थ और जीवन-संदेश

भीतर की स्वतंत्रता भय का दबाव घटा सकती है। नश्वर देह की जिम्मेदार देखभाल फिर भी आवश्यक है।

साखी ७३१ सजीवनी कौ अंग · मूल क्रमांक ४

यहु मन पटकि पछाड़ि लै, सब आपा मिटि जाइ। पंगुल ह्नै पिवपिव करै, पीछै काल न खाइ॥
कठिन शब्दार्थ

पछाड़ि = वश में कर; आपा = अहं; पिवपिव = प्रिय का स्मरण।

सरल हिंदी अर्थ

मन का अहं वश में करो; उसकी विषय-दौड़ थमे और प्रिय का स्मरण बने, तो काल का भय पीछे छूटे।

भावार्थ और जीवन-संदेश

मन को कुचलना नहीं, उसे सजग सहयोगी बनाना सीखें। धैर्यपूर्ण अभ्यास से चंचलता घटती है।

साखी ७३२ सजीवनी कौ अंग · मूल क्रमांक ५

कबीर मन तीषा किया, बिरह लाइ षरसाँड़। चित चणूँ मैं चुभि रह्या तहाँ नहीं काल का पाण॥
कठिन शब्दार्थ

तीषा = तीक्ष्ण; षरसाँण = सान; पाण = पहुँच।

सरल हिंदी अर्थ

विरह की सान पर मन तीक्ष्ण हुआ और चरणों में ध्यान चुभकर स्थिर हुआ; वहाँ काल का भय नहीं पहुँचता।

भावार्थ और जीवन-संदेश

एकाग्र प्रेम चित्त को दिशा देता है। रूपक की तीक्ष्णता का अर्थ स्पष्टता है, देह-दंड नहीं।

साखी ७३३ सजीवनी कौ अंग · मूल क्रमांक ६

तरवर तास बिलंबिए, बारह मास फलंत। सीतल छाया गहर फल, पंषी केलि करंत॥
कठिन शब्दार्थ

बिलंबिए = आश्रय लें; फलंत = फल देने वाला; केलि = आनंद।

सरल हिंदी अर्थ

ऐसे वृक्ष का आश्रय लो जो बारहों महीने फल दे, गहरी छाया रखे और जिसमें पक्षी आनंद पाएँ।

भावार्थ और जीवन-संदेश

स्थायी हितकारी संग चुनें। जो संकट में भी सद्गुण और सहारा दे, वह वास्तविक आश्रय है।

साखी ७३४ सजीवनी कौ अंग · मूल क्रमांक ७

दाता तरवर दया फल, उपगारी जीवंत। पंषी चले दिसावराँ, बिरषा सुफल फलंत॥
कठिन शब्दार्थ

दाता तरवर = उदार वृक्ष; दिसावराँ = दूसरे प्रदेश।

सरल हिंदी अर्थ

उदार वृक्ष का फल दया और जीवन उपकार है। पक्षी चले जाएँ, फिर भी वृक्ष फल देता रहता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

सेवा प्रतिदान की शर्त पर न हो। क्षमता के अनुसार दूसरों के काम आना जीवन की सार्थकता है।

४८. अपारिष कौ अंग

गुण का मूल्य न पहचानने और सार छोड़कर असार चुनने की भूल। मूल स्थानीय क्रमांक १–५।

साखी ७३५ अपारिष कौ अंग · मूल क्रमांक १

पाइ पदारथ पेलि करि, कंकर लीया हाथि। जोड़ी बिछुटी हंस की, पड़ा बगाँ के साथि॥
कठिन शब्दार्थ

पदारथ = मूल्यवान सार; पेलि = फेंककर; बगाँ = बगुलों।

सरल हिंदी अर्थ

अमूल्य वस्तु छोड़कर कंकड़ लिया, हंस का साथ छोड़ बगुलों में जा बैठा।

भावार्थ और जीवन-संदेश

क्षणिक चमक के लिए सही संग और मूल मूल्य न गँवाएँ। चुनाव का परिणाम समझें।

साखी ७३६ अपारिष कौ अंग · मूल क्रमांक २

एक अचंभा देखिया, हीरा हाटि बिकाइ। परिषणहारे बाहिरा, कौड़ी बदले जाइ॥
कठिन शब्दार्थ

परिषणहारे = पारखी; कौड़ी = बहुत छोटा मूल्य।

सरल हिंदी अर्थ

हीरा बाजार में बिक रहा है, पर पारखी न होने से कौड़ी के बदले चला जाता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

गुण का मूल्य हर जगह तुरंत नहीं पहचाना जाता। अपने और दूसरों के सार को सतही लोकप्रियता से न आँकें।

साखी ७३७ अपारिष कौ अंग · मूल क्रमांक ३

कबीर गुदड़ी बीषरी, सौदा गया बिकाइ। खोटा बाँध्याँ गाँठड़ी, इब कुछ लिया न जाइ॥
कठिन शब्दार्थ

गुदड़ी = साधारण कपड़ा; खोटा = असार संग्रह।

सरल हिंदी अर्थ

जीवन की गुदड़ी बिखरी और सार का सौदा निकल गया; खोट बाँधे रहे तो अंत में कुछ लेने का अवसर नहीं रहा।

भावार्थ और जीवन-संदेश

संग्रह की गुणवत्ता देखें। समय रहते सत्य और उपयोगी सीख चुनें, केवल बोझ न जोड़ें।

साखी ७३८ अपारिष कौ अंग · मूल क्रमांक ४

पैड़ै मोती बिखर्‌या, अंधा निकस्या आइ। जोति बिनाँ जगदीश की, जगत उलंघ्या जाइ॥
कठिन शब्दार्थ

पैड़ै = रास्ते में; जोति = विवेक का प्रकाश।

सरल हिंदी अर्थ

रास्ते में मोती बिखरे हैं, पर देखने की दृष्टि बिना मनुष्य उन्हें पार कर जाता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

अच्छे अवसर पहचानने के लिए ग्रहणशीलता चाहिए। अहं और जल्दबाजी घटाकर सीख को देखें।

साखी ७३९ अपारिष कौ अंग · मूल क्रमांक ५

कबीर यहु जग अंधला, जैसी अंधी गाइ। बछा था सो मरि गया, ऊभी चाँम चटाइ॥
कठिन शब्दार्थ

चाँम = खाल; अंधी गाइ = विवेकहीन आसक्ति की उपमा।

सरल हिंदी अर्थ

बछड़ा मर गया, फिर भी गाय उसकी खाल चाटती है; कवि संसार की असावधान आसक्ति को ऐसा कहते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

आत्मीय स्मृति और असत्य पर अटकना अलग हैं। वास्तविक स्थिति स्वीकारकर करुणापूर्वक आगे बढ़ें।

४९. पारिष कौ अंग

विवेक, गुणग्राहक दृष्टि और उचित संग में ज्ञान का आदान-प्रदान। मूल स्थानीय क्रमांक १–३।

साखी ७४० पारिष कौ अंग · मूल क्रमांक १

जग गुण कूँ गाहक मिलै, तब गुण लाख बिकाइ। जब गुण कौ गाहक नहीं, तब कौड़ी बदले जाइ॥
कठिन शब्दार्थ

गाहक = ग्राहक या गुण-पारखी; लाख कौड़ी = मूल्य का अंतर।

सरल हिंदी अर्थ

गुण का सच्चा पारखी मिले तो उसका बड़ा मूल्य है; न मिले तो वही गुण कौड़ी में आँका जाता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

बाहरी मूल्यांकन हमेशा न्यायपूर्ण नहीं। अपने कर्म सँवारें और सही सीखने-सिखाने का वातावरण खोजें।

साखी ७४१ पारिष कौ अंग · मूल क्रमांक २

कबीर लहरि समंद की मोती बिखरे आइ। बगुला मंझ न जाँणई, हंस जुणे चुणि खाइ॥
कठिन शब्दार्थ

जुणे चुणि = चुन-चुनकर; समंद = समुद्र।

सरल हिंदी अर्थ

समुद्र की लहर मोती लाती है; बगुला नहीं पहचानता, हंस चुनकर ग्रहण करता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

ज्ञान उपलब्ध हो तो भी विवेक आवश्यक है। जानकारी में से सत्य और उपयोगी सार चुनना सीखें।

साखी ७४२ पारिष कौ अंग · मूल क्रमांक ३

हरि हीराजन जौहरी, ले ले माँडिय हाटि। जबर मिलैगा पारिषु, तब हीराँ की साटि॥
कठिन शब्दार्थ

जौहरी = रत्न-पारखी; साटि = विनिमय; हाटि = बाजार।

सरल हिंदी अर्थ

हरि हीरा हैं, भक्त जौहरी है; सच्चा पारखी मिले तभी ज्ञानरत्न का उचित विनिमय होगा।

भावार्थ और जीवन-संदेश

आध्यात्मिक संवाद अनुभव और निष्कपटता से गहरा होता है। केवल प्रचार उसका मूल्य नहीं दिखाता।

५०. उपजणि कौ अंग

खोज, अनुभव, कृतज्ञता और भीतर के नए मूल्य का उदय। मूल स्थानीय क्रमांक १–१२।

साखी ७४३ उपजणि कौ अंग · मूल क्रमांक १

नाव न जाणै गाँव का, मारगि लागा जाँउँ। काल्हि जु काटा भाजिसी, पहिली क्यों न खड़ाउँ॥
कठिन शब्दार्थ

मारगि = मार्ग पर; खड़ाउँ = रोकूँ या सँभालूँ।

सरल हिंदी अर्थ

जिस गाँव का नाम नहीं जानता, उसी की राह चला हूँ; कल की रुकावट पहले क्यों न पहचानूँ?

भावार्थ और जीवन-संदेश

लक्ष्य और साधन समझकर आगे बढ़ें। तैयार दावे के बजाय उचित प्रश्न करना विवेक है।

साखी ७४४ उपजणि कौ अंग · मूल क्रमांक २

सीप भई संसार थैं, चले जु साईं पास। अबिनासी मोहिं ले चल्या, पुरई मेरी आस॥
कठिन शब्दार्थ

सीप = सीख या अलग होने का कठिन पाठ; अबिनासी = परम आश्रय।

सरल हिंदी अर्थ

संसार की आसक्ति से हटकर स्वामी के पास चला; अविनाशी का सहारा मिला और मूल आशा पूरी हुई।

भावार्थ और जीवन-संदेश

अस्पष्ट पुराने शब्द से अधिक केंद्रीय दिशा समझें। साधना स्वार्थी बंधन घटाकर स्थिर आधार की खोज है।

साखी ७४५ उपजणि कौ अंग · मूल क्रमांक ३

इंद्रलोक अचरिज भया, ब्रह्मा पड्या बिचार। कबीर चाल्या राम पै, कौतिगहार अपार॥
कठिन शब्दार्थ

कौतिगहार = आश्चर्य से देखने वाले; इंद्रलोक = दिव्य वैभव का संकेत।

सरल हिंदी अर्थ

कबीर राम की ओर बढ़े तो इंद्रलोक और ब्रह्मा भी आश्चर्य में पड़ गए—कवि ऐसी विशाल कल्पना करते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

आत्मबोध का मूल्य बाहरी वैभव से ऊपर बताया गया है। कथा-बिंब को विनय के साथ पढ़ें।

साखी ७४६ उपजणि कौ अंग · मूल क्रमांक ४

ऊँचा चढ़ि असमान कू, मेरु ऊलंधे ऊड़ि। पसू पंषेरू जीव जंत, सब रहे मेर में बूड़ि॥
कठिन शब्दार्थ

मेरु = पर्वत; मेर = मेरा-पन; ऊलंधे = पार करके।

सरल हिंदी अर्थ

साधक ऊँचा उड़कर मेरु का बिंब पार करता है, जबकि जीव मेरा-पन में डूबे रहते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

पर्वत और मेरा-पन की शब्द-क्रीड़ा अहं से आगे बढ़ना कहती है। जन्म या पद की ऊँचाई साधना नहीं।

साखी ७४७ उपजणि कौ अंग · मूल क्रमांक ५

सद पाँणी पाताल का, काढ़ि कबीरा पीव। बासी पावस पड़ि मुए, बिषै बिलंबे जीव॥
कठिन शब्दार्थ

सद पाँणी = ताजा गहरा जल; पावस = बरसाती जल; विलंबे = अटके।

सरल हिंदी अर्थ

गहरे स्रोत का ताजा जल निकालकर पियो; सतही बासी जल पर निर्भर विषयासक्त जीव संतोष नहीं पाते।

भावार्थ और जीवन-संदेश

उपमा गहरे ज्ञान और सतही रस का अंतर बताती है। तथ्य समझकर और नियमित अभ्यास से सार ग्रहण करें।

साखी ७४८ उपजणि कौ अंग · मूल क्रमांक ६

कबीर सुपिनै हरि मिल्या, सूताँ लिया जगाइ। आषि न मीचौं डरपता, मति सुपिनाँ ह्नै जाइ॥
कठिन शब्दार्थ

मीचौं = मूँदूँ; सुपिनै = स्वप्न में।

सरल हिंदी अर्थ

स्वप्न में हरि मिले और सोए को जगा दिया। आँख मूँदने से डरता हूँ कि कहीं मिलन स्वप्न बनकर न मिट जाए।

भावार्थ और जीवन-संदेश

प्रिय अनुभव को सँजोने की कोमल अतिशयोक्ति है। वास्तविक जागरण उसे आचरण और अंतःशांति में टिकाना है।

साखी ७४९ उपजणि कौ अंग · मूल क्रमांक ७

गोब्यंद कै गुण बहुत है, लिखे जु हरिदै माँहि। डरता पाँणी ना पिऊँ, मति वे धोये जाँहि॥
कठिन शब्दार्थ

हिरदै = हृदय में; मति = कहीं ऐसा न हो।

सरल हिंदी अर्थ

गोविंद के गुण हृदय पर लिखे हैं; कवि पानी पीने से भी डरने की कल्पना करते हैं कि वे धुल न जाएँ।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह स्मृति की आत्मीयता का रूपक है। इसका अर्थ वास्तव में पानी छोड़ना नहीं।

साखी ७५० उपजणि कौ अंग · मूल क्रमांक ८

कबीर अब तौ ऐसा भया, निरमोलिक निज नाउँ। पहली काच कथीर था, फिरता ठाँव ठाँवै ठाउँ॥
कठिन शब्दार्थ

निरमोलिक = अनमोल; कथीर = साधारण धातु का तुलनात्मक रूप।

सरल हिंदी अर्थ

पहले साधारण धातु-सा इधर-उधर भटकता था; अब अपने मूल का अनमोल परिचय मिला है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

सच्चा परिवर्तन आत्मसम्मान देता है। उसे दूसरों से श्रेष्ठ होने का अहं न बनने दें।

पाठ-टिप्पणी: वेब में “काच कबीर” है; मुद्रित पृष्ठ १६३ में “काच कथीर” है। कथीर साधारण धातु की तुलना है।

साखी ७५१ उपजणि कौ अंग · मूल क्रमांक ९

भौ समंद विष जल भर्‌या, मन नहीं बाँधै धीर। सबल सनेही हरि मिले, तब उतरे पारि कबीर॥
कठिन शब्दार्थ

भौ समंद = संसार-सागर; सबल सनेही = समर्थ प्रिय।

सरल हिंदी अर्थ

संसार-सागर विषम जल से भरा है, मन धैर्य नहीं बाँधता; समर्थ प्रिय का सहारा मिला तो कबीर पार हुए।

भावार्थ और जीवन-संदेश

संकट में सही आश्रय और सहयोग मूल्यवान हैं। भरोसे के साथ विवेकपूर्ण कर्म भी करें।

साखी ७५२ उपजणि कौ अंग · मूल क्रमांक १०

भला सुहेला ऊतरया, पूरा मेरा भाग। राँम नाँव नौका गह्या, तब पाँणीं पंक न लाग॥
कठिन शब्दार्थ

सुहेला = सहज सुख से; पंक = कीचड़; नौका = सहारे का रूपक।

सरल हिंदी अर्थ

रामनाम की नाव पकड़कर सरलता से पार उतरने का अनुभव हुआ; मोह का जल और कीचड़ भीतर न लगा।

भावार्थ और जीवन-संदेश

स्मरण जीवन से भागना नहीं। संसार का काम करते हुए आसक्ति और छल से बचना उसका व्यावहारिक सार है।

पाठ-टिप्पणी: वेब में पहले चरण के अंत में विदेशी अक्षर मिल गया है। मुद्रित पृष्ठ १६३ का स्पष्ट “भला सुहेला ऊतरया…” पाठ लिया गया है।

साखी ७५३ उपजणि कौ अंग · मूल क्रमांक ११

कबीर केसौ की दया, संसा घाल्या खोइ। जे दिन गए भगति बिन, ते दिन सालै मोहि॥
कठिन शब्दार्थ

केसौ = केशव; सालै = कसकते हैं।

सरल हिंदी अर्थ

केशव की कृपा से संशय गया; अब वे दिन कसकते हैं जो सार्थक भक्ति के बिना बीत गए।

भावार्थ और जीवन-संदेश

बीते समय की सीख लें, पर केवल पछतावे में न रहें। वर्तमान में नियमित शुभ अभ्यास अपनाएँ।

साखी ७५४ उपजणि कौ अंग · मूल क्रमांक १२

कबीर जाचण जाइया, आगै मिल्या अंच। ले चाल्या घर आपणै, भारी पाया संच॥
कठिन शब्दार्थ

जाचण = माँगने; अंच = संदर्भ का कठिन रूप; संच = संचय।

सरल हिंदी अर्थ

याचना को निकला था, आगे प्रिय मिले और अपने आश्रय ले गए; वहाँ बड़ा आत्मिक संचय मिला।

भावार्थ और जीवन-संदेश

कठिन प्रतिलिपि-पाठ का केंद्रीय भाव अनुग्रह से पूर्णता मिलना है। चाह को कृतज्ञता और सेवा की दिशा दें।

पाठ-टिप्पणी: वेब-पाठ का अंत “भारी खाया खंच” है; मुद्रित पृष्ठ १६३ में “भारी पाया संच” मिलता है। आरंभ का “अंच” कठिन रूप है; उसे अनुमान से नहीं बदला गया है।

५१. दया निरबैरता कौ अंग

जगत की पीड़ा देखना और अपने साथ से धीरज पहुँचाना। मूल स्थानीय क्रमांक १–३।

साखी ७५५ दया निरबैरता कौ अंग · मूल क्रमांक १

कबीर दरिया प्रजल्या, दाझै जल थल झोल। बस नाँहीं गोपाल सौ, बिनसै रतन अमोल॥
कठिन शब्दार्थ

दरिया प्रजल्या = समुद्र जल उठा; झोल = चारों ओर; रतन = अमूल्य जीवन।

सरल हिंदी अर्थ

समुद्र तक जलता और जल-थल दहकता दिखता है; जीवों का अमूल्य रत्न मिटता देख कवि गोपाल से व्यथा कहते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह जगत के दुःख की करुण दृष्टि है। साधना दूसरों की पीड़ा के प्रति संवेदनशील और सहायक बनाए।

साखी ७५६ दया निरबैरता कौ अंग · मूल क्रमांक २

ऊँनमि बिआई बादली, बर्सण लगे अँगार। उठि कबीरा धाह थे, दाझत है संसार॥
कठिन शब्दार्थ

ऊँनमि = झुककर या उमड़कर; धाह = दाह; अँगार = जलते कण।

सरल हिंदी अर्थ

मेघ से जल के बदले अंगारे बरसते हैं; कवि जलते जगत को देखकर उस दाह से उठने को कहते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

उलटी वर्षा संसार के कष्ट की छवि है। हिंसा और द्वेष बढ़ाने के बजाय शांति तथा सहयोग का काम करें।

साखी ७५७ दया निरबैरता कौ अंग · मूल क्रमांक ३

दाध बली ता सब दुखी, सुखी न देखौ कोइ। जहाँ कबीरा पग धरै, तहाँ टुक धीरज होइ॥
कठिन शब्दार्थ

दाध बली = जलते संताप; टुक = थोड़ा।

सरल हिंदी अर्थ

सब दुःख और तपन से घिरे दिखाई देते हैं; कबीर जहाँ जाएँ, वहाँ कुछ धीरज पहुँचे।

भावार्थ और जीवन-संदेश

करुणा का फल दूसरों को राहत देना है। अपनी साधना से आसपास का जीवन थोड़ा सरल और सुरक्षित बनाएँ।

५२. सुंदरि कौ अंग

आत्मारूपी नायिका की निष्ठा, मिलन की प्यास और सहज आनंद। मूल स्थानीय क्रमांक १–५।

साखी ७५८ सुंदरि कौ अंग · मूल क्रमांक १

कबीर सुंदरि यों कहै, सुणि हो कंत सुजाँण। बेगि मिलौ तुम आइ करि, नहीं तर तजौं पराँण॥
कठिन शब्दार्थ

सुंदरि = आत्मारूपी नायिका; कंत = प्रिय; बेगि = शीघ्र।

सरल हिंदी अर्थ

आत्मारूपी सुंदरी प्रिय से शीघ्र मिलने की उत्कट पुकार करती है और प्राण छोड़ने की चरम काव्य-अतिशयोक्ति कहती है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

भाव विरह की गहराई है, जीवन त्यागने का निर्देश नहीं। प्रेम जीवन की रक्षा, करुणा और सार्थक कर्म में उतरे।

साखी ७५९ सुंदरि कौ अंग · मूल क्रमांक २

कबीर जाकी सुंदरी, जाँणि करै विभचार। ताहि न कबहूँ आदरै, प्रेम पुरिष भरतार॥
कठिन शब्दार्थ

विभचार = निष्ठा से भटकना; भरतार = प्रिय स्वामी।

सरल हिंदी अर्थ

जो सुंदरी जान-बूझकर अपने प्रिय से भटकती है, उसे निष्कपट प्रेम का पूरा आदर कैसे मिले?

भावार्थ और जीवन-संदेश

नायिका का रूपक साधक की निष्ठा कहता है। इसे स्त्री पर सामाजिक नियंत्रण नहीं, अपने उद्देश्य की समीक्षा समझें।

साखी ७६० सुंदरि कौ अंग · मूल क्रमांक ३

जे सुंदरि साईं भजै, तजै आन की आस। ताहि न कबहूँ परहरै, पलक न छाड़ै पास॥
कठिन शब्दार्थ

परहरै = छोड़े; आन की आस = अन्य स्वार्थी आश्रय।

सरल हिंदी अर्थ

जो आत्मा दूसरे स्वार्थों की आशा छोड़ स्वामी को भजती है, प्रिय उसे पलभर अलग नहीं मानते।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह आध्यात्मिक आत्मीयता का भरोसा है। एकनिष्ठता का फल विनय और निष्काम आचरण बने।

साखी ७६१ सुंदरि कौ अंग · मूल क्रमांक ४

इस मन को मैदा करौ, नान्हाँ करि करि पीसि। तब सुख पावै सुंदरी, ब्रह्म झलकै सीस॥
कठिन शब्दार्थ

मैदा = महीन आटा; नान्हाँ = सूक्ष्म; सीस = भीतर का उच्च केंद्र।

सरल हिंदी अर्थ

मन के अहं को मैदे जैसा महीन करो; तब आत्मा को सुख और ब्रह्म का प्रकाश अनुभव हो।

भावार्थ और जीवन-संदेश

पीसना भीतर की कठोरता का रूपक है। आत्मदंड के बजाय नम्रता और ग्रहणशीलता विकसित करें।

साखी ७६२ सुंदरि कौ अंग · मूल क्रमांक ५

हरिया पारि हिंडोलना, मेल्या, कंत मचाइ। सोई नारि सुलषणी, नित प्रति झूलण जाइ॥
कठिन शब्दार्थ

हिंडोलना = झूला; सुलषणी = सद्गुणी।

सरल हिंदी अर्थ

प्रिय ने हरियाली में झूला सजाया; गुणवान आत्मारूपी नायिका प्रतिदिन वहाँ आत्मीय आनंद लेने जाती है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

प्रेम कोमल नियमितता में भी है। साधना केवल कठिन संघर्ष नहीं, अंतःशांति और कृतज्ञ आनंद का क्षेत्र है।

५३. कस्तूरियाँ मृग कौ अंग

बाहरी भटकाव से अपने भीतर की व्यापक उपस्थिति की ओर लौटना। मूल स्थानीय क्रमांक १–९।

साखी ७६३ कस्तूरियाँ मृग कौ अंग · मूल क्रमांक १

कस्तूरी कुंडलि बसै, मृग ढूँढै बन माँहि। ऐसै घटि घटि राँम हैं, दुनियाँ देखै नाँहि॥
कठिन शब्दार्थ

कुंडलि = मृग की नाभि का सुगंध-स्रोत; घटि = हृदय में।

सरल हिंदी अर्थ

कस्तूरी अपने भीतर है, फिर भी मृग वन में खोजता है; वैसे ही राम सबके भीतर हैं, पर दुनिया पहचानती नहीं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

निकट के सत्य को बाहरी भटकाव ढक सकता है। भीतर की सजगता और आत्मपरीक्षण विकसित करें।

साखी ७६४ कस्तूरियाँ मृग कौ अंग · मूल क्रमांक २

कोइ एक देखै संत जन, जाँकै पाँचूँ हाथि। जाके पाँचूँ बस नहीं, ता हरि संग न साथि॥
कठिन शब्दार्थ

पाँचूँ हाथि = पाँच इंद्रियाँ वश में; संत = सजग साधक।

सरल हिंदी अर्थ

विरला सजग व्यक्ति भीतर की उपस्थिति देखता है; इंद्रियों के वश मन को उसका साथ स्पष्ट नहीं होता।

भावार्थ और जीवन-संदेश

संयम ध्यान को दिशा देता है। इंद्रियाँ दमन की वस्तु नहीं, विवेकपूर्ण उपयोग की क्षमता हैं।

साखी ७६५ कस्तूरियाँ मृग कौ अंग · मूल क्रमांक ३

सो साईं तन में बसै, भ्रम्यों न जाणै तास। कस्तूरी के मृग ज्यूँ फिरि फिरि सूँघै घास॥
कठिन शब्दार्थ

भ्रम्यों = भटकता; तास = उसका।

सरल हिंदी अर्थ

स्वामी तन के भीतर हैं, लेकिन भटका मन नहीं जानता; कस्तूरी-मृग की तरह घास सूँघता फिरता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

हर नया आकर्षण मूल संतोष नहीं देता। रुककर अपनी वास्तविक आवश्यकता और मूल्य पहचानें।

साखी ७६६ कस्तूरियाँ मृग कौ अंग · मूल क्रमांक ४

कबीर खोजी राम का, गया जु सिंघल दीप। राम तौ घट भीतर रमि रह्या, जो आवै परतीत॥
कठिन शब्दार्थ

सिंघल दीप = दूर देश का बिंब; परतीत = विश्वास और पहचान।

सरल हिंदी अर्थ

राम को खोजने दूर द्वीप गया, जबकि वे घट के भीतर हैं; सच्ची पहचान जागे तो दूरी मिटे।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यात्रा उपयोगी हो सकती है, पर भीतर की तैयारी उसका विकल्प नहीं। आत्मबोध की खोज निकट भी है।

साखी ७६७ कस्तूरियाँ मृग कौ अंग · मूल क्रमांक ५

घटि बधि कहीं न देखिए, ब्रह्म रह्या भरपूरि। जिनि जान्या तिनि निकट है, दूरि कहैं थे दूरि॥
कठिन शब्दार्थ

घटि बधि = कम-अधिक; भरपूरि = व्यापक।

सरल हिंदी अर्थ

ब्रह्म की उपस्थिति को कहीं कम, कहीं अधिक मत समझो; जिसने जाना उसे निकट है, दूरी मानने वाले दूर कहते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

सभी प्राणियों के प्रति समान गरिमा का भाव रखें। ज्ञान का उपयोग ऊँच-नीच बढ़ाने में न हो।

साखी ७६८ कस्तूरियाँ मृग कौ अंग · मूल क्रमांक ६

मैं जाँण्याँ हरि दूरि है, हरि रह्या सकल भरपूरि। आप पिछाँणै बाहिरा, नेड़ा ही थैं दूरि॥
कठिन शब्दार्थ

नेड़ा = निकट; आप पिछाँणै = स्वयं को पहचानना।

सरल हिंदी अर्थ

मैंने हरि को दूर समझा, पर वे सर्वत्र हैं। अपनी पहचान न होने से निकट का भी दूर लगा।

भावार्थ और जीवन-संदेश

देखने की रीति बदलना कभी खोज का बड़ा परिवर्तन है। पूर्वाग्रह और अहं का आत्मपरीक्षण करें।

साखी ७६९ कस्तूरियाँ मृग कौ अंग · मूल क्रमांक ७

तिणकै ओल्हे राम है, परबत मेहैं भाइ। सतगुर मिलि परचा भया, तब हरि पाया घट माँहि॥
कठिन शब्दार्थ

ओल्हे = आड़ में; तिणका = छोटा आवरण; परचा = परिचय।

सरल हिंदी अर्थ

राम पर तिनके-जितना आवरण है, पर मन पर्वतों में खोजता है; गुरु से परिचय हुआ तो भीतर मिले।

भावार्थ और जीवन-संदेश

बड़ी बाहरी बाधा से पहले छोटे आंतरिक आग्रह देखें। सही सीख दृष्टि का आवरण हटा सकती है।

साखी ७७० कस्तूरियाँ मृग कौ अंग · मूल क्रमांक ८

राँम नाँम तिहूँ लोक मैं, सकलहु रह्या भरपूरि। यह चतुराई जाहु जलि, खोजत डोलैं दूरि॥
कठिन शब्दार्थ

चतुराई = केवल बौद्धिक चतुरता; तिहूँ लोक = समस्त विस्तार।

सरल हिंदी अर्थ

राम का सार सर्वत्र भरा है; उसे दूर ढूँढ़ते रहने वाली चतुराई से क्या लाभ?

भावार्थ और जीवन-संदेश

बहुत जानकारी के साथ सरल ग्रहणशीलता भी हो। जीवन के निकट सत्य और करुणा को अनदेखा न करें।

साखी ७७१ कस्तूरियाँ मृग कौ अंग · मूल क्रमांक ९

ज्यूँ नैनूँ मैं पूतली, त्यूँ खालिक घट माँहि। मूरखि लोग न जाँणहिं, बाहरि ढूँढण जाँहि॥
कठिन शब्दार्थ

पूतली = पुतली; खालिक = स्रष्टा; घट = अंतःकरण।

सरल हिंदी अर्थ

जैसे आँख में पुतली है, वैसे अंतःकरण में स्रष्टा की उपस्थिति है; असावधान लोग बाहर ही ढूँढ़ते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

बाहरी उपासना के साथ भीतर विनय, ध्यान और निर्मल व्यवहार का अभ्यास करें।

५४. निंद्या कौ अंग

दोष-दर्शन, आत्मपरीक्षण, आलोचना से सीख और दूसरों को न ठगना। मूल स्थानीय क्रमांक १–९।

साखी ७७२ निंद्या कौ अंग · मूल क्रमांक १

लोगे विचारा नींदई, जिन्ह न पाया ग्याँन। राँम नाँव राता रहै, तिनहूँ, न भावै आँन॥
कठिन शब्दार्थ

नींदई = निंदा करता; आँन = दूसरी असार बात।

सरल हिंदी अर्थ

जिसे गहरी समझ नहीं मिली, वह निंदा करता है; रामनाम में रमे साधक का मन ऐसी असार बात में नहीं लगता।

भावार्थ और जीवन-संदेश

हर आलोचना अज्ञान नहीं। सत्य सुझाव ग्रहण करें, लेकिन निरर्थक विवाद में अपना अभ्यास न खोएँ।

साखी ७७३ निंद्या कौ अंग · मूल क्रमांक २

दोख पराये देखि करि, चल्या हसंत हसंत। अपने च्यँति न आवई, जिनकी आदि न अंत॥
कठिन शब्दार्थ

दोख = दोष; च्यँति = ध्यान में; आदि न अंत = बहुत।

सरल हिंदी अर्थ

दूसरे के दोष देखकर हँसता चलता है, पर अपने अनगिनत दोष ध्यान में नहीं आते।

भावार्थ और जीवन-संदेश

दूसरों की समीक्षा से पहले आत्मपरीक्षण करें। गलती पहचानने का उद्देश्य सुधार हो, अपमान का आनंद नहीं।

साखी ७७४ निंद्या कौ अंग · मूल क्रमांक ३

निंदक नेड़ा राखिये, आँगणि कुटी बँधाइ। बिन साबण पाँणी बिना, निरमल करै सुभाइ॥
कठिन शब्दार्थ

नेड़ा = पास; आँगणि = आँगन; सुभाइ = स्वभाव।

सरल हिंदी अर्थ

निंदक को पास रखो, वह बिना साबुन-पानी स्वभाव की सफाई में सहायता करता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

आलोचना से उपयोगी सत्य चुनें। इस अतिशयोक्ति का अर्थ लगातार अपमान या उत्पीड़न सहना नहीं है।

साखी ७७५ निंद्या कौ अंग · मूल क्रमांक ४

न्यंदक दूरि न कीजिये, दीजै आदर माँन। निरमल तन मन सब करै, बकि बकि आँनहिं आँन॥
कठिन शब्दार्थ

आँनहिं आँन = तरह-तरह की बातें; माँन = सम्मान।

सरल हिंदी अर्थ

कटु बातें कहने वाला भी दोष दिखाकर मन-तन को निर्मल करने का अवसर दे सकता है; उसे तुरंत दूर मत धकेलो।

भावार्थ और जीवन-संदेश

सुनकर तथ्य परखें और उचित सुधार करें। गलत आरोप को स्वीकारना आवश्यक नहीं।

साखी ७७६ निंद्या कौ अंग · मूल क्रमांक ५

जे को नींदे साध कूँ, संकटि आवै सोइ। नरक माँहि जाँमैं मरैं, मुकति न कबहूँ होइ॥
कठिन शब्दार्थ

संकटि = संकट में; नींदे = निरर्थक निंदा करे।

सरल हिंदी अर्थ

कवि सज्जन की दुर्भावनापूर्ण निंदा को गंभीर कर्मदोष कहते हैं, जिसका फल संकट की छवि में बताते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह नैतिक चेतावनी है। सही प्रश्न और तथ्यपरक आलोचना को निंदा कहकर दबाना भी उचित नहीं।

साखी ७७७ निंद्या कौ अंग · मूल क्रमांक ६

कबीर घास न नींदिये, जो पाऊँ तलि होइ। उड़ि पड़ै जब आँखि में, खरा दुहेली होइ॥
कठिन शब्दार्थ

नींदिये = तुच्छ समझें; दुहेली = पीड़ादायक।

सरल हिंदी अर्थ

पैर तले घास को भी तुच्छ न मानो; उड़कर आँख में पड़े तो कठिन पीड़ा देती है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

छोटे समझे जाने वाले का भी सम्मान करें। विनय और संवेदनशीलता अहं के अनावश्यक टकराव बचाती है।

साखी ७७८ निंद्या कौ अंग · मूल क्रमांक ७

आपन यौं न सराहिए, और न कहिए रंक। नाँ जाँणौं किस ब्रिष तलि, कूड़ा होइ करंक॥
कठिन शब्दार्थ

रंक = निर्धन या तुच्छ; करंक = अस्थि-पंजर।

सरल हिंदी अर्थ

अपने को बढ़ाकर और दूसरों को तुच्छ कहकर मत बोलो; अंत में अपना शरीर किस पेड़ तले धूल होगा, नहीं जानते।

भावार्थ और जीवन-संदेश

समान नश्वरता विनय सिखाती है। पद और संपत्ति के कारण दूसरे की गरिमा कम न करें।

साखी ७७९ निंद्या कौ अंग · मूल क्रमांक ८

कबीर आप ठगाइये, और न ठगिये कोइ। आप ठग्याँ सुख ऊपजै, और ठग्याँ दुख होइ॥
कठिन शब्दार्थ

ठगाइये = हानि सह लेना; ठगिये = छल करना।

सरल हिंदी अर्थ

दूसरे को छलने के बजाय स्वयं छोटी हानि सह लेना भला है; छल करने से मन का दुःख बढ़ता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह ईमानदारी का आग्रह है, शोषण का निमंत्रण नहीं। बिना छल के भी उचित सीमा और अपना अधिकार रखा जा सकता है।

साखी ७८० निंद्या कौ अंग · मूल क्रमांक ९

अब कै जे साईं मिलैं, तौ सब दुख आपौ रोइ। चरनूँ ऊपर सीस धरि, कहूँ ज कहणाँ होइ॥
कठिन शब्दार्थ

आपौ रोइ = आत्मीय होकर कहूँ; चरनूँ = चरणों पर।

सरल हिंदी अर्थ

अब स्वामी मिलें तो चरणों में सिर रखकर भीतर की सारी व्यथा कहूँ।

भावार्थ और जीवन-संदेश

प्रार्थना में मन की वास्तविक स्थिति रखने का स्थान है। आत्मीयता के साथ सहायता और सुधार के उचित कदम भी उठाएँ।

५५. निगुणाँ कौ अंग

ग्रहणशीलता और कठोरता; गुण, विनय तथा सीख का वास्तविक प्रभाव। मूल स्थानीय क्रमांक १–१२।

साखी ७८१ निगुणाँ कौ अंग · मूल क्रमांक १

हरिया जाँणै रूषड़ा, उस पाँणीं का नेह। सूका काठ न जाणई, कबहू बूठा मेह॥
कठिन शब्दार्थ

रूषड़ा = वृक्ष; बूठा मेह = बरसी वर्षा।

सरल हिंदी अर्थ

हरा वृक्ष पानी का प्रेम जानता है, सूखी लकड़ी वर्षा का वही रस नहीं लेती।

भावार्थ और जीवन-संदेश

सीख ग्रहण करने की जीवंतता महत्त्वपूर्ण है। भीतर रुचि और विनय हों तो मार्गदर्शन फलता है।

साखी ७८२ निगुणाँ कौ अंग · मूल क्रमांक २

झिरिमिरि झिरिमिरि बरषिया, पाँहण ऊपरि मेह। माटी गलि सैंजल भई, पाँहण वोही तेह॥
कठिन शब्दार्थ

झिरिमिरि = धीमी वर्षा; सैंजल = भीगी; तेह = उसी दशा में।

सरल हिंदी अर्थ

पत्थर पर वर्षा हुई, मिट्टी भीगकर नरम हुई, पर पत्थर कठोर ही रहा।

भावार्थ और जीवन-संदेश

एक ही सीख का प्रभाव अलग हो सकता है। अपने मन की कठोरता और ग्रहणशीलता पहचानें।

साखी ७८३ निगुणाँ कौ अंग · मूल क्रमांक ३

पार ब्रह्म बूठा मोतियाँ, बाँधी सिषराँह। सगुराँ सगुराँ चुणि लिया, चूक पड़ी निगुराँह॥
कठिन शब्दार्थ

सगुराँ = मार्गदर्शन ग्रहण करने वाले; निगुराँ = सीख से विमुख; सिषराँह = शिखरों पर।

सरल हिंदी अर्थ

परब्रह्म के मोती बरसे; योग्य मार्गदर्शन वाले उन्हें चुन पाए, असजग अवसर चूक गए।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह जन्मगत श्रेष्ठता नहीं, सीख की तैयारी का बिंब है। गुरु चुनने और सीख अपनाने दोनों में विवेक रखें।

साखी ७८४ निगुणाँ कौ अंग · मूल क्रमांक ४

कबीर हरि रस बरषिया, गिर डूँगर सिषराँह। नीर मिबाणाँ ठाहरै, नाऊँ छा परड़ाँह॥
कठिन शब्दार्थ

गिर डूँगर = पहाड़; मिबाणाँ = नीचे ठहरने का कठिन पुराना रूप।

सरल हिंदी अर्थ

हरिरस पर्वतों पर बरसा, पर जल नीचे ठहरता है; ऊँचा खड़ा रहना ग्रहण करने का आधार नहीं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

विनम्रता में सीख टिकती है। ज्ञान या पद का अभिमान भीतर का पात्र खाली रख सकता है।

साखी ७८५ निगुणाँ कौ अंग · मूल क्रमांक ५

कबीर मूँडठ करमिया, नव सिष पाषर ज्याँह। बाँहणहारा क्या करै, बाँण न लागै त्याँह॥
कठिन शब्दार्थ

मूँडठ = मूढ़; पाषर = कवच; बाँहणहारा = बाण चलाने वाला।

सरल हिंदी अर्थ

अज्ञान का कवच इतना कठोर हो तो हितकारी बाण भी भीतर नहीं लगता; समझाने वाला क्या करे?

भावार्थ और जीवन-संदेश

परिवर्तन के लिए स्वयं ग्रहणशील होना जरूरी है। अपनी रक्षा में हर सुझाव न ठुकराएँ।

साखी ७८६ निगुणाँ कौ अंग · मूल क्रमांक ६

कहत सुनत सब दिन गए, उरझि न सुरझा मन। कहि कबीर चेत्या नहीं, अजहूँ सुपहला दिन॥
कठिन शब्दार्थ

उरझि सुरझा = उलझन सुलझी; सुपहला दिन = अभी शुभ अवसर।

सरल हिंदी अर्थ

कहते-सुनते दिन बीत गए, मन की उलझन न सुलझी। फिर भी अभी चेतने का अच्छा अवसर है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

बीते समय पर अटकने के बजाय आज से अभ्यास शुरू करें। थोड़ी सच्ची सीख भी दिशा बदल सकती है।

साखी ७८७ निगुणाँ कौ अंग · मूल क्रमांक ७

कहि कबीर कठोर कै, सबद न लागै सार। सुधबुध कै हिरदै भिदै, उपजि विवेक विचार॥
कठिन शब्दार्थ

कठोर कै = कठोर हृदय में; सार = प्रभाव; सुधबुध = सजग विवेक।

सरल हिंदी अर्थ

कठोर मन में शब्द का सार नहीं उतरता; सजग हृदय में वह भेदकर विवेकपूर्ण विचार जगाता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

सीखने के लिए नम्रता रखें। असुविधाजनक सत्य सुनकर शांत मन से उसकी उपयोगिता जाँचें।

साखी ७८८ निगुणाँ कौ अंग · मूल क्रमांक ८

मा सीतलता के कारणै, माग बिलंबे आइ। रोम रोम बिष भरि रह्या, अमृत कहा समाइ॥
कठिन शब्दार्थ

सीतलता = शांति; बिलंबे = आश्रय लिया; बिष = विकार।

सरल हिंदी अर्थ

शांति पाने आए, पर रोम-रोम में विकार भरे हैं; ऐसे भरे पात्र में अमृत कहाँ समाए?

भावार्थ और जीवन-संदेश

बाहरी शांति की इच्छा के साथ भीतर के द्वेष और लोभ पर काम करें। केवल वातावरण बदलना पर्याप्त नहीं।

साखी ७८९ निगुणाँ कौ अंग · मूल क्रमांक ९

सरपहि दूध पिलाइये, दूधैं विष ह्नै जाइ। ऐसा कोई नाँ मिले, स्यूँ सरपैं विष खाइ॥
कठिन शब्दार्थ

सरपहि = सर्प को; दूध बिष = गुण का विकृति में बदलना।

सरल हिंदी अर्थ

सर्प को दूध दें तो भी उसकी विष-वृत्ति नहीं बदलती; उसकी जड़ का विष मिटाने वाला विरला है—कवि की लोक-उपमा है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह व्यवहार का रूपक है, सर्प को दूध देने का निर्देश नहीं। सहायता के साथ वास्तविक प्रवृत्ति और परिणाम देखें।

पाठ-टिप्पणी: इसी क्रमांक से पहले “पसुआ सौ पानी…” ख-प्रति का अतिरिक्त पद है। यहाँ मुख्य क्रमांक ९ सर्प-दूध की उपमा वाला है; यह लोककाव्य है, पशु-देखभाल की सलाह नहीं।

साखी ७९० निगुणाँ कौ अंग · मूल क्रमांक १०

जालौ इहै बड़पणाँ, सरलै पेड़ि खजूरि। पंखी छाँह न बीसवै, फल लागे ते दूरि॥
कठिन शब्दार्थ

बड़पणाँ = केवल ऊँचाई; बीसवै = बैठें या विश्राम करें।

सरल हिंदी अर्थ

खजूर की निष्फल बड़ाई किस काम की? पक्षी को छाया नहीं और फल भी दूर हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

पद और ऊँचाई का मूल्य उपयोगिता से है। अपनी क्षमता दूसरों के काम आए तो उसका सार बढ़ता है।

साखी ७९१ निगुणाँ कौ अंग · मूल क्रमांक ११

ऊँचा कूल के कारणै, बंस बध्या अधिकार। चंदन बास भेदै नहीं, जाल्या सब परिवार॥
कठिन शब्दार्थ

कूल = कुल; बंस = बाँस और वंश की शब्द-क्रीड़ा; बास = सुगंध।

सरल हिंदी अर्थ

बाँस अपने ऊँचे होने के अभिमान में चंदन की सुगंध नहीं ग्रहण करता और आग से समूह जला सकता है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

जन्म या समूह की श्रेष्ठता सीखने में बाधा न बने। अहं का नुकसान आसपास के लोगों तक पहुँचता है।

साखी ७९२ निगुणाँ कौ अंग · मूल क्रमांक १२

कबीर चंदन के निड़ै, नींव भि चंदन होइ। बूड़ा बंस बड़ाइताँ, यौं जिनि बूड़ै कोइ॥
कठिन शब्दार्थ

निड़ै = पास; नींव = नीम का पाठ-रूप; बड़ाइताँ = गर्व में।

सरल हिंदी अर्थ

चंदन के पास नीम भी सुगंध से प्रभावित हो सकती है; बाँस जैसा अभिमान लेकर मत डूबो।

भावार्थ और जीवन-संदेश

हितकारी संगति का लाभ लेने को ग्रहणशील बनें। कठोरता छोड़कर अच्छे गुण सीखना प्रगति है।

५६. बीनती कौ अंग

क्षमा, सहायता, आत्मपरीक्षण और प्रिय से निष्कपट संवाद। मूल स्थानीय क्रमांक १–७।

साखी ७९३ बीनती कौ अंग · मूल क्रमांक १

कबीर साँईं तो मिलहगे, पूछिहिगे कुसलात। आदि अंति की कहूँगा, उर अंतर की बात॥
कठिन शब्दार्थ

कुसलात = हालचाल; उर = हृदय।

सरल हिंदी अर्थ

स्वामी मिलेंगे और कुशल पूछेंगे; तब अपने आरंभ से अंत तक हृदय की बात कहूँगा।

भावार्थ और जीवन-संदेश

प्रार्थना आत्मीय संवाद है। उसमें अपनी सफलता के साथ गलती और अधूरापन भी निष्कपट रखें।

साखी ७९४ बीनती कौ अंग · मूल क्रमांक २

कबीर भूलि बिगाड़िया, तूँ नाँ करि मैला चित। साहिब गरवा लोड़िये, नफर बिगाड़ै नित॥
कठिन शब्दार्थ

नफर = सेवक; गरवा = समर्थ और उदार; लोड़िये = तलाशें।

सरल हिंदी अर्थ

मैं भूल से काम बिगाड़ता हूँ; हे स्वामी, मन मैला न करो। सेवक चूकता है, उदार स्वामी का सहारा चाहिए।

भावार्थ और जीवन-संदेश

क्षमा माँगने के साथ गलती सुधारने का प्रयत्न हो। आत्मीय भरोसा जिम्मेदारी से मुक्त नहीं करता।

साखी ७९५ बीनती कौ अंग · मूल क्रमांक ३

करता करै बहुत गुण, औगुँण कोई नाहिं। जे दिल खोजौ आपणीं, तो सब औगुण मुझ माँहिं॥
कठिन शब्दार्थ

औगुण = दोष; दिल खोजौ = आत्मपरीक्षण करूँ।

सरल हिंदी अर्थ

कर्ता में अनेक गुण देखता हूँ; अपना हृदय जाँचूँ तो दोष मुझमें मिलते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह विनय का कथन है, आत्मघृणा नहीं। अपनी गलतियाँ मानकर सुधारें और दूसरों के गुण पहचानें।

साखी ७९६ बीनती कौ अंग · मूल क्रमांक ४

औसर बीता अलपतन, पीव रह्या परदेस। कलंक उतारी केसवाँ, भाँना भरँम अंदेस॥
कठिन शब्दार्थ

अलपतन = थोड़ा जीवनकाल; केसवाँ = केशव; अंदेस = संशय।

सरल हिंदी अर्थ

छोटा जीवन बीता और प्रिय दूर अनुभव हुए; हे केशव, कलंक और संशय का आवरण हटाओ।

भावार्थ और जीवन-संदेश

अनुग्रह की याचना के साथ अपना मन साफ करें। व्यर्थ ग्लानि के बजाय सत्य और सुधार की दिशा लें।

साखी ७९७ बीनती कौ अंग · मूल क्रमांक ५

कबीर करत है बीनती, भौसागर के ताँई। बंदे ऊपरि जोर होत है, जँम कूँ बरिज गुसाँई॥
कठिन शब्दार्थ

बीनती = विनती; बरिज = रोक; भौसागर = जीवन की कठिनाई।

सरल हिंदी अर्थ

हे स्वामी, संसार-सागर में जीव पर भारी दबाव है; काल-भय रोककर सहायता करो—कबीर प्रार्थना करते हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

असहायता में प्रार्थना साहस दे सकती है। साथ ही उचित मानवीय सहायता ग्रहण करना भी महत्त्वपूर्ण है।

साखी ७९८ बीनती कौ अंग · मूल क्रमांक ६

हज काबै ह्नै ह्नै गया, केती बार कबीर। मीराँ मुझ मैं क्या खता, मुखाँ न बोलै पीर॥
कठिन शब्दार्थ

मीराँ = स्वामी; खता = भूल; पीर = प्रिय मार्गदर्शक।

सरल हिंदी अर्थ

कबीर तीर्थ और हज की भाषा में पूछते हैं—इतना खोजने पर भी तुम मौन क्यों हो, मेरी क्या भूल है?

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह भक्त की आत्मीय उलाहना है। बाहरी यात्राओं के साथ अपनी भीतर की तैयारी की समीक्षा करें।

साखी ७९९ बीनती कौ अंग · मूल क्रमांक ७

ज्यूँ मन मेरा तुझ सों, यौं जे तेरा होइ। ताता लोहा यौं मिले, संधि न लखई कोइ॥
कठिन शब्दार्थ

ताता लोहा = तपता लोहा; संधि = जोड़।

सरल हिंदी अर्थ

मेरा मन जैसा तुमसे जुड़ा है, तुम्हारा भी वैसा हो तो तपे लोहे के जुड़ने की तरह कोई अलग जोड़ न दिखे।

भावार्थ और जीवन-संदेश

मिलन की उपमा पूर्ण आत्मीयता कहती है। संबंध में निष्कपटता और परस्पर सम्मान उसका व्यावहारिक रूप हैं।

पाठ-टिप्पणी: वेब-पाठ के “लोबा” को मुद्रित पृष्ठ १६९ के “लोहा” से मिलाया गया है।

५७. साषीभूत कौ अंग

कार्य करते हुए साक्षीभाव, निर्लिप्तता और हितकारी वाणी। मूल स्थानीय क्रमांक १–३।

साखी ८०० साषीभूत कौ अंग · मूल क्रमांक १

कबीर पूछै राँम कूँ, सकल भवनपति राइ। सबही करि अलगा रहौ, सो विधि हमहिं बताइ॥
कठिन शब्दार्थ

साषीभूत = साक्षीभाव; भवनपति = समस्त जगत के स्वामी।

सरल हिंदी अर्थ

कबीर राम से पूछते हैं—सब कार्य करते हुए भीतर निर्लिप्त रहने की विधि बताओ।

भावार्थ और जीवन-संदेश

कर्तव्य और आसक्ति अलग हैं। कर्म में पूरे मन से रहें, पर लाभ-हानि के अहं में न बँधें।

साखी ८०१ साषीभूत कौ अंग · मूल क्रमांक २

जिहि बरियाँ साईं मिलै, तास न जाँणै और। सब कूँ सुख दे सबद करि, अपणीं अपणीं ठौर॥
कठिन शब्दार्थ

बरियाँ = समय; ठौर = स्थान; सबद = हितकारी वचन।

सरल हिंदी अर्थ

जिस क्षण स्वामी का बोध हो, उसका अंतरंग अनुभव सब नहीं जानते; अपने-अपने स्थान से सबको सुख देने वाले वचन कहो।

भावार्थ और जीवन-संदेश

अंतःअनुभव का श्रेष्ठ फल उदार व्यवहार है। अपनी साधना से दूसरों के जीवन में शांति बढ़ाएँ।

साखी ८०२ साषीभूत कौ अंग · मूल क्रमांक ३

कबीर मन का बाहुला, ऊंडा बहै असोस। देखत ही दह मैं पड़े, दई किसा कौं दोस॥
कठिन शब्दार्थ

बाहुला = असंयमित मन; दह = गहरा जल या भँवर; दोस = दोष।

सरल हिंदी अर्थ

असावधान मन अपनी ही धारा में बहकर गहरे संकट में गिरता है; फिर किसे दोष दें?

भावार्थ और जीवन-संदेश

अपने निर्णयों की जिम्मेदारी लें। दूसरों को दोष देने से पहले अपनी इच्छा और प्रतिक्रिया देखें।

पाठ-टिप्पणी: वेब में “ऊँचा” है; मुद्रित पृष्ठ १६९ में “ऊंडा” मिलता है। अर्थ में मन के असावधान बहाव और गहरे संकट का केंद्रीय संकेत है।

५८. बेलि कौ अंग

आसक्ति के बीज और परिवर्तन की कठिनाइयों की उलटबाँसियाँ। मूल स्थानीय क्रमांक १–६।

साखी ८०३ बेलि कौ अंग · मूल क्रमांक १

अब तौ ऐसी ह्नै पड़ी, नाँ तूँ बड़ी न बेलि। जालण आँणीं लाकड़ी, ऊठी कूँपल मेल्हि॥
कठिन शब्दार्थ

जालण = जलाने के लिए; कूँपल = नई कोंपल।

सरल हिंदी अर्थ

जिस लकड़ी को समाप्त समझकर जलाने लाया था, उसी में फिर कोंपल उठी; आसक्ति की बेल का यह उलटा स्वभाव है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

ऊपर से दबा दोष फिर उग सकता है। उसकी जड़ और पोषण समझकर धैर्य से सुधार करें।

साखी ८०४ बेलि कौ अंग · मूल क्रमांक २

आगै आगै दौं जलैं, पीछै हरिया होइ। बलिहारी ता विरष की, जड़ काट्याँ फल होइ॥
कठिन शब्दार्थ

दौं = वनाग्नि; विरष = वृक्ष; जड़ काटना = मोह छोड़ना।

सरल हिंदी अर्थ

आगे आग जलती है, पीछे हरियाली उठती है; ऐसे अनोखे वृक्ष की जड़ कटने पर भी फल का रहस्य है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

उलटबाँसी मोह और आध्यात्मिक परिवर्तन की जटिलता बताती है। केवल बाहरी नाश को वास्तविक मुक्ति न मानें।

साखी ८०५ बेलि कौ अंग · मूल क्रमांक ३

जे काटौ तो डहडही, सींचौं तौ कुमिलाइ। इस गुणवंती बेलि का, कुछ गुँण कहाँ न जाइ॥
कठिन शब्दार्थ

डहडही = फिर हरी हो; गुणवंती = विचित्र गुण वाली।

सरल हिंदी अर्थ

ऐसी बेल है जो काटने पर बढ़ती और सींचने पर कुम्हलाती है; उसके उलटे गुण साधारण कथन से नहीं समझते।

भावार्थ और जीवन-संदेश

यह सीधा बागवानी निर्देश नहीं। साधना में दबाव, अहं और सही अंतर्दृष्टि के अलग प्रभावों पर मनन करें।

पाठ-टिप्पणी: इस पद से पहले गलती से जुड़ा “ख-दौं बलै” पिछले पद का पाठांतर है; उसे मुख्य साखी से अलग किया गया है।

साखी ८०६ बेलि कौ अंग · मूल क्रमांक ४

आँगणि बेलि अकासि फल, अण ब्यावर का दूध। ससा सींग की धूनहड़ी, रमै बाँझ का पूत॥
कठिन शब्दार्थ

अण ब्यावर = बिना ब्याई; ससा सींग = खरगोश के सींग; बाँझ का पूत = असंभव कल्पना।

सरल हिंदी अर्थ

आँगन की बेल का आकाश में फल, बिना ब्याई का दूध और खरगोश के सींग जैसे असंभव चित्र दिए हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

उलटबाँसी साधारण तर्क की सीमा दिखाती है। उसके संकेत को ध्यान और मनन से समझें, वास्तविक घटना न बनाएँ।

साखी ८०७ बेलि कौ अंग · मूल क्रमांक ५

कबीर कड़ई बेलड़ी, कड़वा ही फल होइ। साँध नाँव तब पाइए, जे बेलि बिछोहा होइ॥
कठिन शब्दार्थ

कड़ई बेलड़ी = कटु आसक्ति की बेल; बिछोहा = अलगाव।

सरल हिंदी अर्थ

कड़वी बेल का फल कड़वा होगा; उससे अलग होने पर साधना का सच्चा नाम सार्थक है।

भावार्थ और जीवन-संदेश

परिणाम सुधारने के लिए कारण बदलना होगा। पुरानी हानिकारक आदत बचाकर केवल अच्छे फल की अपेक्षा न रखें।

साखी ८०८ बेलि कौ अंग · मूल क्रमांक ६

सींध भइ तब का भया, चहूँ दिसि फूटी बास। अजहूँ बीज अंकूर है, भीऊगण की आस॥
कठिन शब्दार्थ

सींध = सिद्धि या सिद्ध-अवस्था का कठिन रूप; बास = प्रसिद्धि या सुगंध।

सरल हिंदी अर्थ

चारों ओर प्रसिद्धि फैल गई तो क्या, यदि भीतर इच्छा का बीज और फिर उगने की संभावना बाकी है?

भावार्थ और जीवन-संदेश

उपलब्धि और प्रशंसा के बाद भी आत्मपरीक्षण जरूरी है। छिपा अहं और लालसा नए रूप में लौट सकते हैं।

पाठ-टिप्पणी: वेब और मुद्रित संदर्भ में “सींध” कठिन रूप है। उसके आशय को संदर्भानुसार सिद्ध-अवस्था तथा प्रसिद्धि माना गया है; मूल शब्द अनुमान से नहीं बदला गया।

५९. अबिहड़ कौ अंग

अखंड आश्रय, स्थिर हित और न बिछुड़ने वाली आध्यात्मिक आत्मीयता। मूल स्थानीय क्रमांक १–३।

साखी ८०९ अबिहड़ कौ अंग · मूल क्रमांक १

कबीर साथी सो किया, जाके सुख दुख नहीं कोइ। हिलि मिलि ह्नै करि खेलिस्यूँ कदे बिछोह न होइ॥
कठिन शब्दार्थ

अबिहड़ = न बिछुड़ने वाला; हिलि मिलि = आत्मीय होकर।

सरल हिंदी अर्थ

मैंने ऐसा साथी चुना जो सुख-दुःख के बदलते द्वंद्व से परे है; उससे ऐसी आत्मीयता है जिसमें बिछोह नहीं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

अंतिम आश्रय की स्थिरता का भक्तिपूर्ण अनुभव है। उससे भीतर धैर्य और बाहर करुणामय सहभागिता बढ़े।

साखी ८१० अबिहड़ कौ अंग · मूल क्रमांक २

कबीर सिरजनहार बिन, मेरा हितू न कोइ। गुण औगुण बिहड़ै नहीं, स्वारथ बंधी लोइ॥
कठिन शब्दार्थ

हितू = हितैषी; बिहड़ै = अलग हो; लोइ = संसार।

सरल हिंदी अर्थ

स्रष्टा जैसा स्थिर हितैषी नहीं; वह गुण-दोष में साथ नहीं छोड़ता, जबकि संसार के कई संबंध स्वार्थ से बँधे हैं।

भावार्थ और जीवन-संदेश

अनुग्रह पर भरोसा सुधार का साहस दे। किसी मानवीय संबंध को निरर्थक मानने के बजाय निष्काम आत्मीयता निभाएँ।

साखी ८११ अबिहड़ कौ अंग · मूल क्रमांक ३

आदि मधि अरु अंत लौं, अबिहड़ सदा अभंग। कबीर उस करता की, सेवग तजै न संग॥
कठिन शब्दार्थ

आदि मधि अंत = आरंभ, बीच और अंत; अभंग = अखंड।

सरल हिंदी अर्थ

परम आश्रय आरंभ से अंत तक अखंड और अविच्छिन्न है; उसका सेवक इस संग को नहीं छोड़ता।

भावार्थ और जीवन-संदेश

श्रृंखला का समापन स्थिर निष्ठा में है। स्मरण, सत्य, प्रेम और सेवा को जीवन के बदलते समय में बनाए रखें।

अंतिम भाग से मनन के सात सूत्र

  1. अर्थ सहित स्मरण: नाम के शब्द के साथ उसके गुण और सीख जीवन में उतरें।
  2. शीतल वाणी: सत्य स्पष्ट हो और दूसरे की गरिमा भी सुरक्षित रहे।
  3. विश्वास में विनय: प्रयत्न करें, पर अपने अहं को अकेला कर्ता न मानें।
  4. अंतर का साहस: दूसरों से लड़ने से पहले अपने काम, क्रोध और छल को पहचानें।
  5. समय का उपयोग: शुभ कर्म और आवश्यक संवाद कल पर न टालें।
  6. करुणा का फल: जहाँ जाएँ, वहाँ किसी का दुःख थोड़ा हलका हो।
  7. अखंड निष्ठा: बदलती परिस्थितियों में सत्य, प्रेम और सेवा का संग बना रहे।

श्रृंखला के समापन पर सामान्य प्रश्न

तीसरे भाग में कितनी साखियाँ हैं?

अंग ३३–५९ के २७ पूरे अंगों में २७१ मुख्य क्रमांकित पद हैं। इस लेख-श्रृंखला के संयुक्त क्रमांक ५४१–८११ हैं। हर पद का मूल अंग-क्रमांक भी साथ है।

८०९ के बजाय अंतिम क्रमांक ८११ क्यों है?

ये हमारे लेखों के संपादकीय क्रमांक हैं। संदर्भ-वेब-पाठ के संचयी योग में अंकगणित का अंतर है: अंग ३२ के ५४० में अंग ३३ के ११ पद जोड़ने पर ५५१ बनता है, जबकि वहाँ ५४९ छपा है। हमने पद हटाकर योग मिलाने के बजाय स्पष्ट क्रम और मूल स्थानीय पहचान रखी है। गिनती की पूरी टिप्पणी पढ़ें।

क्या अब पूरा कबीर साहित्य हो गया?

यह मुख्य ५९-अंगीय साखी-पाठ की तीन-भागीय श्रृंखला का समापन है। कबीर के पद, भजन, रमैनी, अलग परिशिष्ट और अन्य पाठ-परंपराएँ व्यापक सामग्री हैं; उन्हें पूरा होने का दावा इसमें नहीं है।

पहले दो भाग कहाँ पढ़ें?

भाग १: अंग १–१२ और भाग २: अंग १३–३२ प्रकाशित हैं। ऊपर और नीचे उनके सीधे लिंक दिए गए हैं।

‘जीवन मृतक’ और ‘सिर देना’ कैसे समझें?

ये अहं, ममता और स्वार्थ का आग्रह छोड़ने के रूपक हैं। शारीरिक आत्महानि उनके व्यावहारिक अर्थ नहीं हैं। भक्ति जीवन में विनय, करुणा और जिम्मेदारी बढ़ाए।

ऐतिहासिक सती-दाह के चित्र क्यों रखे हैं?

मूल साहित्य को बदलकर छिपाने के बजाय उसका संदर्भ स्पष्ट किया गया है। यह हानिकारक ऐतिहासिक प्रथा अनुकरणीय नहीं। आध्यात्मिक निष्ठा जीवन और मानवीय गरिमा की रक्षा के साथ समझी गई है।

क्या हर व्याख्या एकमात्र अंतिम अर्थ है?

नहीं। संत-भाषा, योगिक संकेत और उलटबाँसी के अनेक अर्थ हो सकते हैं। यहाँ सरल अध्ययन-सहायक स्वतंत्र व्याख्या है; कठिन और बदले पाठ पर स्रोत-टिप्पणी दी गई है।

संदर्भ-पाठ और संपादन की जानकारी

आधार: श्यामसुंदर दास संपादित कबीर ग्रंथावली का मुख्य साखी-पाठ—अंग ३३–५९।

अंगवार गिनती: क्रमशः ११, १०, २१, ४, १०, १२, ४, ८, १४, ३, १३, ४, ४१, ३२, ७, ५, ३, १२, ३, ५, ९, ९, १२, ७, ३, ६ और ३ मुख्य पद—कुल २७१। संयुक्त क्रमांक ५४१–८११ संपादकीय सुविधा के हैं।

पाठांतर की सीमा: ख-प्रति के अतिरिक्त पद मुख्य क्रम से अलग रखे गए हैं। कुसबद के पहले पद, गुरु-शिष्य के पूरे १२–१३ पद, निगुणाँ के मुख्य ८–९ और बेलि के अंतिम मुख्य क्रम की पहचान इसी आधार पर की गई है। स्रोत के भीतर विषयगत रूप से दोहराए पद जहाँ हैं, उनका मूल स्थान नहीं बदला गया।

संपादन: वेब की अनावश्यक रिक्तियाँ और पंक्ति-विभाजन व्यवस्थित किए गए हैं। स्पष्ट मिश्रित अक्षर, छूटा निषेध और शब्द-विकृति जहाँ सुधारी गई है, संबंधित पद पर मुद्रित संदर्भ दिया गया है। कठिन शेष शब्दों को अनुमान से नया मूल पाठ नहीं बनाया गया। यह सरल पाठक-संस्करण है, सभी पांडुलिपियों का आलोचनात्मक संस्करण नहीं।

अर्थ: कठिन शब्दार्थ, सरल अर्थ और जीवन-संदेश स्वतंत्र व्याख्याएँ हैं। उन्हें कबीर की अतिरिक्त मूल पंक्तियाँ या किसी अन्य टिप्पणीकार की शब्दशः टीका न समझें।

तीन भागों की यात्रा—ज्ञान, प्रेम और करुणा

गुरु के प्रकाश से आरंभ होकर यह साखी-यात्रा अखंड आत्मीय संग पर ठहरती है। पढ़े हुए शब्द तभी जीवन का सार बनते हैं जब उनसे सत्य, विवेक, नम्रता और दूसरों के प्रति करुणा बढ़े।

इस भाग के साथ मुख्य ५९-अंगीय साखी-पाठ का निर्धारित तीन-भागीय अध्ययन पूरा होता है।

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