कबीर ग्रंथावली भाग 3 — साखी 541–811 मूल पाठ, हिंदी अर्थ और भावार्थ सहित
कबीर ग्रंथावली — भाग 3
साखी 541–811 · हिंदी अर्थ सहित
विचार, विश्वास, प्रेम, साहस, करुणा और अखंड निष्ठा—मुख्य साखी-पाठ की इस श्रृंखला का अंतिम भाग, मूल पाठ और स्वतंत्र हिंदी व्याख्या सहित।
विचार से अखंड आत्मीयता तक
इस तीसरे भाग में विचार कौ अंग से अबिहड़ कौ अंग तक, अंग ३३–५९ की २७१ मुख्य साखियाँ हैं। पहले दोनों भागों के आगे इस लेख के संयुक्त क्रमांक ५४१–८११ चलते हैं। प्रत्येक साखी के साथ उसके अंग का मूल स्थानीय क्रमांक, शब्दार्थ, सरल अर्थ और स्वतंत्र भावार्थ दिया है।
इन अंगों में कबीर पूछते हैं—नाम का वास्तविक अर्थ क्या है, विश्वास कैसे गहरा हो, अहं कैसे घटे, समय का सदुपयोग क्या है और दूसरों के दुःख में हमारा स्थान कहाँ है? अंतिम अंग उस स्थिर आश्रय की बात कहता है जहाँ आत्मीय संग अखंड अनुभव होता है।
पूरी तीन-भागीय श्रृंखला
| भाग | अंग | पाठ का विस्तार |
|---|---|---|
| भाग १ | १–१२ | गुरुदेव से चितावणी · २७२ पद · संयुक्त क्रम १–२७२ |
| भाग २ | १३–३२ | मन से सारग्राही · २६८ पद · संयुक्त क्रम २७३–५४० |
| भाग ३ | ३३–५९ | विचार से अबिहड़ · २७१ पद · संयुक्त क्रम ५४१–८११ |
इन तीन भागों का दायरा संदर्भ-संस्करण का मुख्य ५९-अंगीय साखी-पाठ है। पद, भजन, रमैनी, अलग परिशिष्ट और प्रति-टिप्पणियों के अतिरिक्त दोहे इस समापन में सम्मिलित नहीं हैं।
अंतिम भाग के २७ पूरे अंग
साखी ५४१–५५१ · ११ मुख्य पद ३४. उपदेश कौ अंग
साखी ५५२–५६१ · १० मुख्य पद ३५. बेसास कौ अंग
साखी ५६२–५८२ · २१ मुख्य पद ३६. पीव पिछाँणन कौ अंग
साखी ५८३–५८६ · ४ मुख्य पद ३७. बिर्कताई कौ अंग
साखी ५८७–५९६ · १० मुख्य पद ३८. सम्रथाई कौ अंग
साखी ५९७–६०८ · १२ मुख्य पद ३९. कुसबद कौ अंग
साखी ६०९–६१२ · ४ मुख्य पद ४०. सबद कौ अंग
साखी ६१३–६२० · ८ मुख्य पद ४१. जीवन मृतक कौ अंग
साखी ६२१–६३४ · १४ मुख्य पद ४२. चित कपटी कौ अंग
साखी ६३५–६३७ · ३ मुख्य पद ४३. गुरुसिष हेरा कौ अंग
साखी ६३८–६५० · १३ मुख्य पद ४४. हेत प्रीति सनेह कौ अंग
साखी ६५१–६५४ · ४ मुख्य पद ४५. सूरा तन कौ अंग
साखी ६५५–६९५ · ४१ मुख्य पद ४६. काल कौ अंग
साखी ६९६–७२७ · ३२ मुख्य पद ४७. सजीवनी कौ अंग
साखी ७२८–७३४ · ७ मुख्य पद ४८. अपारिष कौ अंग
साखी ७३५–७३९ · ५ मुख्य पद ४९. पारिष कौ अंग
साखी ७४०–७४२ · ३ मुख्य पद ५०. उपजणि कौ अंग
साखी ७४३–७५४ · १२ मुख्य पद ५१. दया निरबैरता कौ अंग
साखी ७५५–७५७ · ३ मुख्य पद ५२. सुंदरि कौ अंग
साखी ७५८–७६२ · ५ मुख्य पद ५३. कस्तूरियाँ मृग कौ अंग
साखी ७६३–७७१ · ९ मुख्य पद ५४. निंद्या कौ अंग
साखी ७७२–७८० · ९ मुख्य पद ५५. निगुणाँ कौ अंग
साखी ७८१–७९२ · १२ मुख्य पद ५६. बीनती कौ अंग
साखी ७९३–७९९ · ७ मुख्य पद ५७. साषीभूत कौ अंग
साखी ८००–८०२ · ३ मुख्य पद ५८. बेलि कौ अंग
साखी ८०३–८०८ · ६ मुख्य पद ५९. अबिहड़ कौ अंग
साखी ८०९–८११ · ३ मुख्य पद
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क्रमांक-समूह खोलें और साखी चुनें। सभी मूल पद और अर्थ इसी लेख में हैं।
३३. विचार कौ अंग
नाम के अर्थ, आत्मबोध, भाषा और मन के उलझाव पर विचार। मूल स्थानीय क्रमांक १–११।
साखी ५४१ विचार कौ अंग · मूल क्रमांक १
बिचार = अर्थ और भाव का विवेक; सती = पूर्ण निष्ठा का पुराना बिंब; कौतिगहार = दर्शक।
रामनाम सब कहते हैं, लेकिन कहने का भाव अलग है। गहरी निष्ठा वाला और केवल तमाशा देखने वाला एक ही शब्द कहते हैं।
नाम की ध्वनि के साथ मन की दिशा भी महत्त्वपूर्ण है। अपने उच्चारण में सजगता और निष्कपट भाव जोड़ें।
साखी ५४२ विचार कौ अंग · मूल क्रमांक २
दाझै = जलता; चंपै = संपर्क में आए; भेद = वास्तविक अर्थ।
केवल आग कहने से पैर नहीं जलता; उसका संपर्क अलग है। वैसे ही नाम का अर्थ बिना केवल शब्द कहने से अनुभव कैसे होगा?
कथन और अनुभूति में अंतर पहचानें। स्मरण के साथ अर्थ, मनन और आचरण का संबंध बने।
साखी ५४३ विचार कौ अंग · मूल क्रमांक ३
आपा पर = अपना और पराया; समाना = एकरस हुआ।
विचार से जाना कि मूल में दूसरा कोई नहीं। अपना-पराया पहचानने का भ्रम बदला तो चित्त भीतर के एकत्व में समा गया।
विभाजन के पीछे साझा अस्तित्व देखें। आत्मबोध का फल दूसरों के प्रति सम्मान और करुणा बढ़ना हो।
साखी ५४४ विचार कौ अंग · मूल क्रमांक ४
पूतला = पुतला; पवन = प्राणवायु; करतारि = स्रष्टा ने।
यह देह जल का पुतला है, जिसे प्राणवायु सँभालती है। स्रष्टा की ज्योति से यह अनेक भाषाएँ बोलती है।
अपनी क्षमता को अकेले का गर्व न मानें। जीवन के मिले अवसर के प्रति कृतज्ञ होकर उसका सदुपयोग करें।
साखी ५४५ विचार कौ अंग · मूल क्रमांक ५
अलूझिया = उलझा; बारि = जलाता या दूर करता; मुरारि = भगवान।
जीवन का बहुत-सा सूत उलझा पड़ा है। सच्ची भक्ति पहचानने वाला ही उसके बंधन सुलझा पाता है।
सारहीन उलझाव बढ़ाने के बजाय मूल बात पकड़ें। विवेक और नियमित साधना से जीवन में क्रम आता है।
साखी ५४६ विचार कौ अंग · मूल क्रमांक ६
साषी = साखी; परतीति = अनुभवजन्य विश्वास।
आधी साखी भी विचारकर अपनाएँ तो अहं का सिर कट सकता है; विश्वास न जागे तो दिन-रात गाने पर भी सार नहीं मिलता।
बहुत पाठ से अधिक एक सीख का आचरण मूल्यवान है। सिर कटना यहाँ अहं के क्षय का रूपक है।
साखी ५४७ विचार कौ अंग · मूल क्रमांक ७
बैयन = वचन; लवणि = उचित मेल या स्वाद; अमीं = अमृत।
अक्षर और शब्द वही हैं, उन्हें अनेक लोग बोलते हैं। कोई विरला सही भाव मिलाकर उन्हें अमृत-रस बना देता है।
वाणी का प्रभाव केवल शब्द से नहीं, सत्य और आत्मीयता से आता है। बोलने से पहले अपना उद्देश्य देखें।
साखी ५४८ विचार कौ अंग · मूल क्रमांक ८
मोत्याँ = मोतियों; पोई = पिरोई; झंटा = झटका।
हरि का स्मरण मोती की माला है, पर साधक का धागा कच्चा है। असावधानी का बड़ा झटका उसे तोड़ सकता है।
निष्ठा को नियमितता और चरित्र का मजबूत धागा दें। क्षणिक उत्साह पर ही भरोसा न रखें।
साखी ५४९ विचार कौ अंग · मूल क्रमांक ९
बिषै = विषयों की आसक्ति; पूरि = व्यापक पकड़।
मन विषय नहीं छोड़ता और विषय मन को नहीं छोड़ते; इस परस्पर आदत ने लोगों को लंबे समय से बाँधा है।
केवल वस्तु हटाने से इच्छा नहीं मिटती। उसके कारण और अपनी प्रतिक्रिया समझकर धीरे-धीरे दिशा बदलें।
साखी ५५० विचार कौ अंग · मूल क्रमांक १०
प्रतिब्यंब = प्रतिबिंब; सकल = सब; बिगतह = अलगाव का कठिन रूप।
कवि सबमें राम की उपस्थिति जल में प्रतिबिंब जैसी पहचानने को कहते हैं; मूल को खंडित मानना भ्रम है।
यह अद्वैत-दृष्टि का संकेत है। भिन्न रूपों के बीच समान गरिमा और साझा जीवन का बोध विकसित करें।
साखी ५५१ विचार कौ अंग · मूल क्रमांक ११
त्रिभवन पति = परमेश्वर; ब्यंदहु = पहचानो या विचारो; सक रस = एकरस।
मन, तन और विषय वही हैं; उनमें त्रिभुवन के स्वामी को कैसे पहचानें? कबीर जल की एकरसता से व्यापक उपस्थिति समझाते हैं।
आध्यात्मिक दृष्टि जीवन के बीच जागती है। अलग वस्तु खोजने से अधिक अपने देखने की रीति को निर्मल करें।
३४. उपदेश कौ अंग
कर्म, उदारता, शुभ आदत और शीतल वाणी की शिक्षा। मूल स्थानीय क्रमांक १–१०।
साखी ५५२ उपदेश कौ अंग · मूल क्रमांक १
तीर = किनारा; भौसागर = संसार-सागर।
हरि ने मानो कबीर को साखियाँ कहने की प्रेरणा दी, ताकि संसार-सागर का जीव कोई किनारा पकड़ सके।
हितकारी वाणी दिशा देती है। उसका लाभ तभी है जब पाठक स्वयं समझकर आचरण करे।
साखी ५५३ उपदेश कौ अंग · मूल क्रमांक २
जिनि = मत; लुणता = काटता; बोबै = बोए।
बुरा मत करो; कर्म का परिणाम सामने आता है। गर्म लोहे के दाह की तरह हानि महसूस होती है, जो बोया वही काटना पड़ता है।
गलत निर्णय के पहले उसका प्रभाव देखें। दूसरों पर दोष डालने के बजाय जिम्मेदारी लेना सुधार की शुरुआत है।
साखी ५५४ उपदेश कौ अंग · मूल क्रमांक ३
संसा = संशय; बाणों = वाणियाँ; बिलाइ = विलीन।
जीव में संशय है कि अनेक बोल बोलने वाली चेतना आखिर कहाँ विलीन हो गई; कोई ठीक से समझाता नहीं।
जीवन और मृत्यु के प्रश्न गहरे हैं। जल्द दावा करने के बजाय विनय से अध्ययन और आत्मपरीक्षण करें।
साखी ५५५ उपदेश कौ अंग · मूल क्रमांक ४
पंचतत = देह के पाँच तत्त्व; सुरति = चेतना का ध्यान।
जन्म-मरण के भ्रम को विवेक से देखो; देह के तत्त्व तत्त्वों में मिलते हैं और चेतना अपनी सूक्ष्म स्थिति में समाती है।
यह संत की तत्त्व-दृष्टि है। रूप की नश्वरता समझकर जीवन रहते सदाचार और जागरूकता अपनाएँ।
साखी ५५६ उपदेश कौ अंग · मूल क्रमांक ५
ग्रिही = गृहस्थ; भीष = भिक्षा; सीष = शिक्षा।
गृहस्थ को अनेक चिंताएँ, वैरागी को भिक्षा की चिंता है। दोनों के बीच जीव उलझा है; संतों, सही सीख दो।
बाहरी स्थिति बदलने से हर उलझन नहीं मिटती। अपने मन का आग्रह और जीवन की जिम्मेदारी समझें।
साखी ५५७ उपदेश कौ अंग · मूल क्रमांक ६
बिरकत = आसक्ति से मुक्त; उदार = खुले हृदय वाला; रीता = सारहीन।
वैरागी विरक्त हो तो अच्छा, गृहस्थ उदार हो तो अच्छा। दोनों अपने आवश्यक गुण से चूकें तो जीवन खाली रह जाता है।
जीवन-पद्धति से अधिक उसके भीतर का चरित्र महत्त्वपूर्ण है। अपनी भूमिका में सत्य और सेवा निभाएँ।
साखी ५५८ उपदेश कौ अंग · मूल क्रमांक ७
पेड़ मूँ = मूल में; ओरि = अंत तक; पैका = छोटी मुद्रा।
जैसी नींव और आदत बनेगी, वैसी यात्रा चलेगी। छोटी-छोटी मुद्राएँ जोड़ने से बड़ी राशि बनती है।
अच्छे छोटे कर्मों का संचय महत्त्वपूर्ण है। रोज की सावधानी और नियमित अभ्यास बड़ी दिशा बनाते हैं।
साखी ५५९ उपदेश कौ अंग · मूल क्रमांक ८
इकतार = निरंतर; मुख के मोती = हितकारी वचन।
हरिनाम से निरंतर प्रेम रहे तो मुख से मोती जैसे वचन निकलते हैं और भीतर ज्ञानरत्न बढ़ते हैं।
मन में जो भाव पाला जाता है, वह वाणी में उतरता है। स्मरण को सत्य और करुणा से जोड़ें।
साखी ५६० उपदेश कौ अंग · मूल क्रमांक ९
आपा = अहंकार; सीतल = शांत।
ऐसी वाणी बोलो जिसमें मन का अहं घटे, अपना तन-मन शांत हो और दूसरों को भी सुख मिले।
सत्य को नम्र, स्पष्ट और हितकारी ढंग से कहें। अपनी जीत से अधिक संवाद के कल्याण को महत्त्व दें।
साखी ५६१ उपदेश कौ अंग · मूल क्रमांक १०
चेतनि पहरै = चेतना का पहरा; बस्तन बासन = वस्त्र-पात्र के बाहरी बंधन।
जागकर चेतना का पहरा रखने वाला साधक बाहरी उलझनों से बचता है; भीतर का चोर उसे आसानी से नहीं घेरता।
नियमित आत्मपरीक्षण मन की रक्षा है। लालच और क्रोध की शुरुआत पहचानकर दिशा बदलें।
३५. बेसास कौ अंग
विश्वास, संतोष, अनुग्रह और अपने प्रयत्न के बीच विनय। मूल स्थानीय क्रमांक १–२१।
साखी ५६२ बेसास कौ अंग · मूल क्रमांक १
जठराँह = गर्भ में; उदिक = जल; प्रतिपालन = सँभालना।
कवि गर्भ की कठिन दशा में अंग-प्रत्यंग बनने और सुरक्षित रहने को स्रष्टा की कृपा मानकर आगे भी उसके पालन पर भरोसा कहते हैं।
यह भक्ति की काव्यात्मक विश्वास-प्रार्थना है, शरीर-विज्ञान का विवरण नहीं। भरोसा कृतज्ञता जगाए और जिम्मेदार प्रयत्न के साथ रहे।
पाठ-टिप्पणी: यह मूल क्रमांक १ लंबा पद है; उसे स्रोत के अनुसार एक ही क्रमांक में रखा गया है। सभी पदों को अनिवार्य रूप से दो पंक्ति का आधुनिक दोहा नहीं कहा गया है।
साखी ५६३ बेसास कौ अंग · मूल क्रमांक २
भाँडा = देहरूपी पात्र; पूरण जोग = आवश्यकता पूरी करने में समर्थ।
हर समय भूख की शिकायत क्यों फैलाते हो? जिसने जीवन का पात्र बनाया है, उस पर भी भरोसा रखो।
यह साहस देने वाला संत-कथन है। वास्तविक जरूरत हो तो सहायता और आजीविका के उचित उपाय अपनाना भी जिम्मेदारी है।
साखी ५६४ बेसास कौ अंग · मूल क्रमांक ३
खैचे = कमी; पैसि = प्रवेश करके; पछेवड़ा = ओढ़नी।
रचनहार को पहचानो, हर कमी पर व्याकुल मत हो। हृदय के मंदिर में शांति का आश्रय लेकर विश्राम करो।
व्यर्थ चिंता घटाकर भीतर भरोसा विकसित करें। संतोष अपने आवश्यक काम छोड़ना नहीं है।
साखी ५६५ बेसास कौ अंग · मूल क्रमांक ४
बोहड़ा = संचित पूँजी या भंडार; अधाइ = पर्याप्त।
रामनाम का भंडार बनाकर साधना का बीज बोओ; कठिन अंतिम समय में भी उसका सार निष्फल नहीं होगा।
नियमित अच्छी आदत संकट में आधार देती है। केवल अंतिम क्षण की तैयारी पर भरोसा न रखें।
साखी ५६६ बेसास कौ अंग · मूल क्रमांक ५
च्यंतामणि = मनोवांछित फल की कल्पित मणि; बांणि = रीति।
मन में बसे प्रभु को याद करो; भक्त की चिंता सँभालना उनका स्वभाव कहा गया है।
स्मरण भय को दिशा दे सकता है। अपने प्रयत्न और दूसरों के सहयोग के प्रति भी कृतज्ञ रहें।
साखी ५६७ बेसास कौ अंग · मूल क्रमांक ६
अणच्यंत्या = जिसकी कल्पना न की; चितवै = चिंता करे।
तेरी हर चिंता से परिणाम तय नहीं होता; जीवन में ऐसी संभावनाएँ भी खुलती हैं जिनकी कल्पना नहीं थी।
नियंत्रण की सीमा पहचानें। आवश्यक प्रयत्न के बाद अनिश्चितता को धैर्य से स्वीकारें।
साखी ५६८ बेसास कौ अंग · मूल क्रमांक ७
करम करीमां = कृपालु का लिखा भाग्य; मासा तिल = छोटी मात्राएँ।
कवि कहते हैं कि कृपालु का लिखा विधान इच्छामात्र से न घटता-बढ़ता है, चाहे अनेक उपाय किए जाएँ।
यह नियति के सामने विनय का भाव है। इसे प्रयास छोड़ने का नियम न बनाएँ; अपने कर्तव्य निभाएँ।
साखी ५६९ बेसास कौ अंग · मूल क्रमांक ८
निरमया = स्रष्टा; रती = छोटी मात्रा।
स्रष्टा ने जिसका जितना विधान किया, जिद और व्यथा से उसे मनचाहा बदलना संभव नहीं—कवि ऐसा भरोसा कहते हैं।
अपरिवर्तनीय बात पर व्यर्थ क्रोध घटाएँ। जहाँ सुधार संभव है, वहाँ शांत और जिम्मेदार काम करें।
साखी ५७० बेसास कौ अंग · मूल क्रमांक ९
अच्यंत = अनावश्यक चिंता से मुक्त; संभ्रथ = समर्थ।
व्यर्थ चिंता छोड़ो, स्वामी समर्थ हैं; पशु-पक्षी और जीव कोई शास्त्र की गठरी लेकर अपना जीवन नहीं चलाते।
अतिविचार की जगह सहज भरोसा और उचित कर्म रखें। विद्या का सम्मान रहे, उसका बोझ चिंता न बन जाए।
साखी ५७१ बेसास कौ अंग · मूल क्रमांक १०
गाँठड़ी = संग्रह की गठरी; सनमुख = भरोसे से सामने।
संत आवश्यकता भर लेता है, अनंत संग्रह नहीं बाँधता; स्वामी के भरोसे जीवन की जरूरत सँभालता है।
सादगी का केंद्र पर्याप्तता है। अपने और आश्रितों के आवश्यक दायित्व निभाते हुए लोभ सीमित रखें।
साखी ५७२ बेसास कौ अंग · मूल क्रमांक ११
दिल मिलि = हृदय से जुड़; बिराइ = उलाहना या विरोध।
हृदय राम से जोड़कर कबीर विरोध के बीच अपने इष्ट के भरोसे स्थिर हैं और आध्यात्मिक कल्याण की आशा रखते हैं।
आस्था नैतिक साहस दे। उसे दूसरों पर श्रेष्ठता या किसी परिणाम की सार्वभौमिक गारंटी न बनाएँ।
साखी ५७३ बेसास कौ अंग · मूल क्रमांक १२
हस्ती = हाथी; भूसैं = भौंकें।
सिर पर हरि का हाथ है तो क्यों डरते हो? हाथी पर बैठे को असंख्य कुत्तों के भौंकने से डगमगाना नहीं चाहिए।
उपमा आलोचना के बीच स्थिरता सिखाती है। उचित सुझाव सुनें, पर निरर्थक विरोध को अपना पूरा मन न सौंपें।
साखी ५७४ बेसास कौ अंग · मूल क्रमांक १३
मधूकरी = थोड़ी-थोड़ी मिली भिक्षा; बित = धन; दावा = स्वामित्व का आग्रह।
विभिन्न घरों से मिली थोड़ी अन्न-भिक्षा मधुर है; किसी एक पर दावा नहीं, व्यापक जीवन में स्वतंत्रता है।
यह साधु-जीवन की सादगी का चित्र है। ग्रहणयोग्य भाव है कि लोभ और अधिकार की जिद कम हो।
साखी ५७५ बेसास कौ अंग · मूल क्रमांक १४
मोनि = मौन; गरवा = महत्त्व; अह लागया = आघात लगा।
मौन, प्रेम, गरिमा, गुण और स्नेह—स्वार्थ से ‘कुछ दो’ कहने पर इन सबको चोट लग सकती है।
संबंध को केवल लाभ का साधन न बनाएँ। साथ ही वास्तविक जरूरत में विनम्र सहायता माँगना अपमान नहीं।
साखी ५७६ बेसास कौ अंग · मूल क्रमांक १५
माँगण = लोभ से याचना; वंचै = बचता।
माँगने की विवशता को कवि मृत्यु-जैसा कठिन कहते हैं और रघुनाथ से ऐसी पराधीनता से बचाने की विनती करते हैं।
यह आत्मसम्मान और संतोष की प्रार्थना है। सहायता लेने वाले की गरिमा बनी रहे और सक्षम व्यक्ति उदार रहे।
साखी ५७७ बेसास कौ अंग · मूल क्रमांक १६
पंजर = देह; अँमी = अमृत; वेसास = विश्वास।
देह और मन के फूल-भँवरे वाले बिंब में रामनाम का अमृत सींचा गया, जिसका फल विश्वास के रूप में लगा।
निष्ठा छोटे नियमित पोषण से बढ़ती है। स्मरण के साथ सत्य और निष्कपट कर्म उसके जल हैं।
साखी ५७८ बेसास कौ अंग · मूल क्रमांक १७
मेर = मेरा-पन; मुकता = मुक्त; बिसास = भरोसा।
मेरा-पन मिटा, मुक्त होने का अनुभव हुआ और ब्रह्म पर भरोसा मिला; अब अंतिम आशा उसी में है।
आसक्ति घटने से संबंधों में अधिकार का दबाव कम हो। स्वतंत्रता का फल करुणा और सरलता बने।
साखी ५७९ बेसास कौ अंग · मूल क्रमांक १८
कलपै = व्याकुल हो; दलिद्र = अभाव।
हृदय में हरि बसे तो इतना व्याकुल क्यों? अनुग्रह की एक लहर दुःख-अभाव का बोझ हलका कर सकती है।
यह भक्त की आशा है, धन या समस्या मिटने की गारंटी नहीं। भरोसे के साथ उचित सहायता और प्रयत्न भी हों।
साखी ५८० बेसास कौ अंग · मूल क्रमांक १९
लैलीन = तल्लीन; पास = फंदा; थोथरे = सारहीन।
तल्लीन होकर पद गाए, फिर भी संशय का फंदा न कटा; दृढ़ विश्वास बिना प्रदर्शन का सार अधूरा है।
अभ्यास के साथ अपनी वास्तविक उलझन देखें। प्रश्न समझकर और आचरण में बदलाव से निष्ठा गहरी होती है।
साखी ५८१ बेसास कौ अंग · मूल क्रमांक २०
रोज = व्यथा; राग = लगाव; ग्रिह = घर।
गाने में भी दुःख छिप सकता है, रोने में भी आसक्ति; कोई घर में रहकर विरक्त है, कोई वैरागी होकर गृह-मोह में।
बाहरी रूप से भीतर की स्थिति पूरी नहीं समझती। अपने उद्देश्य का निष्पक्ष आत्मपरीक्षण करें।
साखी ५८२ बेसास कौ अंग · मूल क्रमांक २१
अणगाँयाँ = न गाने वाले; बिसवास = निष्ठापूर्ण भरोसा।
केवल गाने वाले सब नहीं पाते, पर बिना स्मरण भी दूरी है। विश्वास से गाने वाले भीतर राम की पूर्णता अनुभव करते हैं।
कवि साधन और भाव का मेल कहते हैं। न यांत्रिक पाठ पर रुकें, न अभ्यास को ही छोड़ दें।
३६. पीव पिछाँणन कौ अंग
सीमित रूप से परे व्यापक और सूक्ष्म परम आश्रय की पहचान। मूल स्थानीय क्रमांक १–४।
साखी ५८३ पीव पिछाँणन कौ अंग · मूल क्रमांक १
संपटि = सीमित पात्र; मांड = विश्व का विस्तार।
जो केवल एक छोटे पात्र में सीमित समझा जाए, वह पूर्ण स्वामी कैसे? सर्वत्र रमने वाले को ही परम आश्रय कहो।
परम तत्त्व की व्यापकता पर विचार करें। अपनी सीमित धारणा को संपूर्ण सत्य न मानें।
साखी ५८४ पीव पिछाँणन कौ अंग · मूल क्रमांक २
निराला = निर्लिप्त; सकल मांड = समस्त जगत।
परम सत्ता जगत से निर्लिप्त भी है और समस्त जगत उसमें है; कबीर उसी की सेवा करते हैं।
यह व्यापकता और निर्लिप्तता का दर्शन है। जीवन में सहभागिता के साथ आसक्ति से स्वतंत्रता सीखी जा सकती है।
साखी ५८५ पीव पिछाँणन कौ अंग · मूल क्रमांक ३
खसम = स्वामी; बिभचार = निष्ठा से भटकना; भरतार = प्रिय।
अपने मूल स्वामी को भूलकर अनेक आश्रयों में भटका; सद्गुरु ने उस सनातन प्रिय का परिचय कराया।
मार्गदर्शन बिखरे उद्देश्य को एकाग्र कर सकता है। पराधीनता के बजाय विवेकपूर्ण निष्ठा विकसित हो।
साखी ५८६ पीव पिछाँणन कौ अंग · मूल क्रमांक ४
पुहुप बास = फूल की सुगंध; अनूप = अतुलनीय।
उस परम तत्त्व का न मुख-माथा है, न स्थूल रूप; वह फूल की सुगंध से भी सूक्ष्म और अनुपम है।
निर्गुण अनुभूति को रूपातीत उपमा से समझाया गया है। भाषा की सीमा पहचानते हुए विनय रखें।
३७. बिर्कताई कौ अंग
संबंधों की संवेदनशीलता, स्वामित्व का आग्रह और भीतर की स्वतंत्रता। मूल स्थानीय क्रमांक १–१०।
साखी ५८७ बिर्कताई कौ अंग · मूल क्रमांक १
दरार = टूटन; फटक पषाँण = स्फटिक पत्थर।
मन में ऐसी दरार पड़ी कि फटे स्फटिक की तरह पहले-सा जोड़ नहीं बनता।
विश्वास और आत्मीयता की रक्षा करें। कटुता या छल से बनी टूटन सुधारने में समय और सच्चा प्रयास लगता है।
साखी ५८८ बिर्कताई कौ अंग · मूल क्रमांक २
बाइक = वचन से; सगाई साक = संबंध; ऊकटि = फटकर।
बुरे वचन से मन फटा तो संबंध मिट गया; दूध फट जाए तो पहले जैसा नहीं रहता।
वाणी से हुई चोट हलकी न मानें। समय रहते संवेदनशील संवाद और गलती की जिम्मेदारी लें।
साखी ५८९ बिर्कताई कौ अंग · मूल क्रमांक ३
माफों = चूर्ण या लेप; मुकताहल = मोती।
चंदन घिसकर या टुकड़ों में भी सुगंध देता है, पर टूटा मोती और टूटा मन आसानी से पहले जैसे नहीं मिलते।
हर क्षति एक जैसी नहीं। संबंध के विश्वास को उपयोग की वस्तु की तरह न बरतें।
साखी ५९० बिर्कताई कौ अंग · मूल क्रमांक ४
पासि बिनंठा = पहले से बिगड़ा; सुरांग = सुंदर रंग।
बिगड़ी तैयारी वाले कपड़े पर रंग नहीं चढ़ता; विवेक से कबीर ने धन और कामना की आसक्ति छोड़ी।
बाहरी त्याग के साथ भीतर की भूमि तैयार हो। लालसा और अहं पर काम करना आवश्यक है।
साखी ५९१ बिर्कताई कौ अंग · मूल क्रमांक ५
गरक = डूबा; सालि = चुभन; सहर = देह-नगर।
चित्त चेतना में इतना रमा कि बाहरी उलझनों की अंतहीन चुभन पर उसका पुराना ध्यान नहीं रहा।
यह अंतर्मुख स्थिरता की कठिन प्रतीक-भाषा है। केंद्रीय भाव व्यर्थ प्रतिक्रिया घटाकर मूल पर टिकना है।
साखी ५९२ बिर्कताई कौ अंग · मूल क्रमांक ६
दसा = आध्यात्मिक स्थिति; खेवटिया = नाविक; धणों = अनेक।
जो जाता है उसे जाने दो; अपनी मूल स्थिति न खोओ। नाविक की नाव में यात्रियों की तरह अनेक आते-जाते रहेंगे।
संबंध में आदर रहे, पर हर परिवर्तन पर चित्त न टूटे। विवेकपूर्ण स्थिरता और स्वीकार सीखें।
साखी ५९३ बिर्कताई कौ अंग · मूल क्रमांक ७
सायर = सागर; त्रिषावंत = प्यासा।
घर-घर सागर है, फिर पानी पिलाने का प्रदर्शन क्यों? वास्तविक प्यास वाला स्वयं आगे बढ़कर पीएगा।
ग्रहणशीलता सीखने में महत्त्वपूर्ण है। सहायता आत्मीय हो, पर अपना उपदेश दूसरों पर थोपना जरूरी नहीं।
साखी ५९४ बिर्कताई कौ अंग · मूल क्रमांक ८
कोपीन = साधु का छोटा वस्त्र; अमलि = प्रेमरस में मस्त।
पुराने गाँठदार वस्त्र में भी साधक संकोच नहीं करता; रामरस की तृप्ति में इंद्र का वैभव भी छोटा लगता है।
सादगी में आत्मसम्मान संभव है। अपने मूल्य को पोशाक और संपदा की तुलना पर निर्भर न रखें।
साखी ५९५ बिर्कताई कौ अंग · मूल क्रमांक ९
दावा = अधिकार और स्वामित्व की जिद; निरसंक = निःशंक।
दावा रखने से जलन आती है; दावा छोड़ने वाला निश्चिंत है और बड़े वैभव को भी तुच्छ समझता है।
अनावश्यक अधिकार-आग्रह कम करने से संबंध सहज होते हैं। जिम्मेदारी और स्वामित्व के अहं का अंतर देखें।
साखी ५९६ बिर्कताई कौ अंग · मूल क्रमांक १०
हंडिया = घूम आया; मंदिल = यात्रा की गठरी या वाद्य का कठिन रूप।
सारा जग घूमकर और सबको परखकर कबीर ने पाया कि हरि जैसा स्थिर अपना आश्रय नहीं।
बाहरी खोज अंततः भीतर की निष्ठा पर लौटती है। अनुभव से सार लें और व्यर्थ भटकाव सीमित करें।
३८. सम्रथाई कौ अंग
अपनी क्षमता की सीमा तथा दिव्य अनुग्रह की असीमता। मूल स्थानीय क्रमांक १–१२।
साखी ५९७ सम्रथाई कौ अंग · मूल क्रमांक १
ताथै = उसी से; करणे जोग = करने में समर्थ।
अपने बल से न कुछ कर सका, न देह पूरी समर्थ थी; जो शुभ हुआ, हरि के अनुग्रह से हुआ।
यह कृतज्ञता की भाषा है। प्रयत्न करते हुए भी सहयोग, अवसर और मिली क्षमता का ऋण पहचानें।
साखी ५९८ सम्रथाई कौ अंग · मूल क्रमांक २
अनकीया = अपने अहं से बिना किए; करता = मूल कर्ता।
केवल मेरे करने से सब नहीं होता; जो होता है उसके पीछे व्यापक कारण और मूल कर्ता है।
सफलता पर पूरा स्वामित्व न जताएँ। अपने कर्म की जिम्मेदारी और परिणाम के प्रति विनय साथ रहें।
साखी ५९९ सम्रथाई कौ अंग · मूल क्रमांक ३
दरिगह = दरबार; हरू मन = हलका मन।
जिसका कोई नहीं, उसका भी सहारा तुम हो; जिसे तुम्हारा भरोसा है, उसे भीतर व्यापक साथ मिलता है।
आस्था अकेलेपन में साहस दे सकती है। साथ ही वास्तविक मानवीय सहयोग को ग्रहण करें।
साखी ६०० सम्रथाई कौ अंग · मूल क्रमांक ४
बिललाइ = व्याकुल पुकारे; सुलषना = सद्गुणी।
किसी को खड़े-खड़े मिलता है, कोई पुकारता रहता है; मेरा स्वामी सोए को भी जगाकर देता है—भक्त का ऐसा भरोसा है।
अनुग्रह को अपनी तुलना का विषय न बनाएँ। जागने का अवसर पहचानकर कृतज्ञता और प्रयत्न बढ़ाएँ।
साखी ६०१ सम्रथाई कौ अंग · मूल क्रमांक ५
मसि = स्याही; बनराइ = वनस्पति।
सात समुद्र स्याही, सारे वन लेखनी और धरती कागज हो, तब भी हरि के गुण पूरे नहीं लिखे जा सकते।
असीमता की यह काव्य-अतिशयोक्ति विनय जगाती है। प्रकृति और जीवन की व्यापकता के प्रति कृतज्ञ रहें।
साखी ६०२ सम्रथाई कौ अंग · मूल क्रमांक ६
अबरन = अवर्णनीय; बाना = रूप या वेश।
जिसका पूरा वर्णन संभव नहीं, उसका वर्णन कैसे करूँ? लोग अपने-अपने रूप कहकर थक जाते हैं।
अपने कथन की सीमा पहचानें। अलग अनुभव सुनें और सत्य पर पूर्ण स्वामित्व का दावा न करें।
साखी ६०३ सम्रथाई कौ अंग · मूल क्रमांक ७
झल = ज्वाला; ब्यौहार = जीवन का लेन-देन।
दाएँ-बाएँ और आगे-पीछे मोह की आग है; उसके बीच रचनहार का सहारा रक्षा देता है।
कठिन संसार में विवेक और आस्था आधार बनें। खतरे को पहचानकर उचित कर्म करना भी आवश्यक है।
साखी ६०४ सम्रथाई कौ अंग · मूल क्रमांक ८
बाँणियाँ = व्यापारी; डाँडी पालड़ा = तराजू।
मेरा स्वामी ऐसा व्यापारी है जो बिना भौतिक तराजू समस्त जगत का मोल जानता है।
दिव्य न्याय की उपमा बाहरी दिखावे से आगे का मूल्य बताती है। अपने कर्म निष्कपट और न्यायपूर्ण रखें।
साखी ६०५ सम्रथाई कौ अंग · मूल क्रमांक ९
वार्या = न्योछावर; राई लूँण = न्यौछावर के पदार्थ।
मैं नाम पर न्योछावर हूँ; जिसे तुम सही मार्ग दो, उसे भ्रमित कौन कर सकता है?
यह मार्गदर्शन पर भक्त का भरोसा है। भरोसा अपने विवेक और सदाचार से जुड़ा रहे।
साखी ६०६ सम्रथाई कौ अंग · मूल क्रमांक १०
नवि = झुकती; करणी = प्रयास।
हरि की सहायता बिना प्रयास कैसे टिके? जिस डाल पर पैर रखता हूँ, वही झुकती जाती है।
यह अपनी असमर्थता का आत्मीय कथन है। कठिनाई में सहायता लें और धैर्य से उचित उपाय खोजें।
साखी ६०७ सम्रथाई कौ अंग · मूल क्रमांक ११
डाली पाती = अलग-अलग बाहरी आश्रय।
जन्म से अब तक स्थायी सुख नहीं मिला; डाल-डाल और पत्ते-पत्ते के आश्रय में दुःख पाया।
लगातार नया आकर्षण खोजने से संतोष नहीं आता। अपनी गहरी जरूरत और जीवन की दिशा समझें।
साखी ६०८ सम्रथाई कौ अंग · मूल क्रमांक १२
राई परबत = छोटे-बड़े का बिंब; बंदे = मनुष्य।
साईं छोटे को बड़ा और बड़े को छोटा कर सकते हैं; भक्त अपने अकेले अहं को अंतिम कर्ता नहीं मानता।
यह अनुग्रह और परिवर्तन की शक्ति का काव्य है। क्षमता के साथ नम्रता और जिम्मेदार प्रयत्न रखें।
३९. कुसबद कौ अंग
कटु वचन के बीच धैर्य, समता और निष्पक्षता। मूल स्थानीय क्रमांक १–४।
साखी ६०९ कुसबद कौ अंग · मूल क्रमांक १
अणी = नोक; सेल = भाला; उसास = कराह।
भाले की चोट पर मनुष्य कराहता है, पर कटु वचन की चोट धैर्य से सहने वाला मेरा आदरणीय गुरु है।
वाणी का घाव गहरा होता है। संयम का आदर करें, साथ ही अपमान को सामान्य नियम मानकर सहते रहना जरूरी नहीं।
पाठ-टिप्पणी: स्रोत में पहले ख-प्रति का वैकल्पिक पहला पद है। यहाँ मुख्य क्रमांक १ “अणी सुहेली सेल की…” रखा गया है।
साखी ६१० कुसबद कौ अंग · मूल क्रमांक २
खूंदन = खोदना; बाढ़ = काटना; कुसबद = कटु वचन।
धरती खुदाई और वन कटाई सहता है; हरि-प्रेमी भी कठोर वचन धैर्य से सह सकता है।
धैर्य प्रतिशोध की आग घटाता है। अपने सम्मान की सीमा रखते हुए प्रतिक्रिया में कटुता न बढ़ाएँ।
साखी ६११ कुसबद कौ अंग · मूल क्रमांक ३
समिता = समता; पष = पक्षपात; निरपष = निष्पक्ष।
भीतर की शीतलता तब जानो जब समता बनी रहे, पक्षपात छूटे और शब्द से चित्त तुरंत दूषित न हो।
आलोचना सुनकर ठहरें और उसका सत्य जाँचें। हर चोट का उत्तर चोट से देना आवश्यक नहीं।
साखी ६१२ कुसबद कौ अंग · मूल क्रमांक ४
बैसंदर = अग्नि; उदिक = जल।
ब्रह्मज्ञान से ऐसी शीतलता आई कि जिस अग्नि में जग जलता है, वही मेरे लिए जल-जैसी शांत हुई।
दृष्टि बदलने से प्रतिक्रिया बदल सकती है। भीतर की स्थिरता कठिन परिस्थिति सँभालने में सहायक बनती है।
४०. सबद कौ अंग
गुरु-वाणी की अंतर्मुख शक्ति, निर्मलता और अनुभव। मूल स्थानीय क्रमांक १–८।
साखी ६१३ सबद कौ अंग · मूल क्रमांक १
बिनि गुण = बिना स्थूल तार; तंति = तार का स्वर; भरंति = भ्रम।
भीतर शब्द का ऐसा संगीत है जो साधारण तार के बिना बजता है और बाहर-भीतर व्यापक अनुभव होकर भ्रम मिटाता है।
यह सूक्ष्म अनुभूति की प्रतीक-भाषा है। उसके सार को अंतर्मुख सजगता और व्यापक अपनापन समझें।
साखी ६१४ सबद कौ अंग · मूल क्रमांक २
सती = सत्यनिष्ठ; सील = शील; प्रसाद = कृपा।
सत्यनिष्ठ, संतोषी और सावधान मन शब्द का भेद समझता है; गुरु की सीख से सहज शील और सही बुद्धि जागती है।
ज्ञान और चरित्र साथ विकसित हों। केवल अनुभव की चर्चा से अधिक नम्र आचरण महत्त्वपूर्ण है।
साखी ६१५ सबद कौ अंग · मूल क्रमांक ३
सिकलीगर = हथियार चमकाने वाला कारीगर; मसकला = घिसकर चमकाने का उपकरण।
गुरु ऐसा हो जो सिकलीगर की तरह शब्द की कसौटी से साधक को दर्पण-जैसा निर्मल करे।
मार्गदर्शन अपनी गलतियाँ देखने की क्षमता जगाए। आश्रित बनाने से अधिक विवेक और सत्यनिष्ठा बढ़ाए।
साखी ६१६ सबद कौ अंग · मूल क्रमांक ४
सूरिवाँ = शूरवीर; छेक = छेद; सबद = जागृत करने वाली वाणी।
सच्चे गुरु का एक शब्द-बाण भीतर लगा और अहं के आवरण में छेद हो गया।
कभी एक सीख दिशा बदलती है। उसे अपनाने के लिए विनय और आत्मपरीक्षण की तैयारी चाहिए।
साखी ६१७ सबद कौ अंग · मूल क्रमांक ५
बेधिया = भीतर तक छुआ; करक = कसक।
हरि-प्रेम से भीतर बेधा व्यक्ति अपना अनुभव हर बार गिना नहीं पाता; शब्द की चोट हृदय में बनी रहती है।
गहरा अनुभव प्रदर्शन नहीं माँगता। उसका मूल्य जीवन की संवेदनशीलता और परिवर्तन में देखें।
साखी ६१८ सबद कौ अंग · मूल क्रमांक ६
साँभलूँ = स्मरण करूँ; साँठी = पुराने आवरण का संकेत।
जितना हरि के गुण स्मरण करता हूँ, उतना ज्ञान-बाण लगता है और पुराने आवरण झड़ते हैं।
स्मरण स्वयं को निर्दोष मानना नहीं। वह दोष पहचानकर सुधार करने की शक्ति दे।
साखी ६१९ सबद कौ अंग · मूल क्रमांक ७
साहणहार = सहने वाला; लागै = प्रभाव पड़े।
हरिगुण स्मरण से भीतर की कसक बढ़ती है, पर कबीर उस जागृति से भागते नहीं।
सच्ची सीख कभी अपनी गलती स्पष्ट कर असुविधा देती है। उस बोध को धैर्यपूर्वक सुधार में बदलें।
साखी ६२० सबद कौ अंग · मूल क्रमांक ८
सारा = सकुशल व्यक्ति; ठौर = स्थिर स्थान।
बिना चोट वाला बहुत कहता है, पीड़ित की पुकार अलग होती है; शब्द से बेधे कबीर भीतर स्थिर हुए।
चर्चा और अनुभूति का अंतर पहचानें। दूसरों के अनुभव पर निर्णय से पहले संवेदनशील होकर सुनें।
४१. जीवन मृतक कौ अंग
जीते जी अहं, ममता और अभिमान छोड़ने की प्रतीक-भाषा। मूल स्थानीय क्रमांक १–१४।
साखी ६२१ जीवन मृतक कौ अंग · मूल क्रमांक १
जीवन मृतक = जीते जी अहं की पकड़ छोड़ना; आस = अपेक्षा।
जीते जी संसार से स्वार्थी अपेक्षा छोड़ो; तब हरि स्वयं भक्त की सेवा करते हैं—कवि ऐसा आत्मीय भरोसा कहते हैं।
‘जीवन मृतक’ आत्महानि नहीं, अहं का क्षय है। विनम्रता के साथ कर्तव्य और अपने जीवन का सम्मान बनाए रखें।
साखी ६२२ जीवन मृतक कौ अंग · मूल क्रमांक २
मृतक मन = अहं का शांत होना; पैडे = पीछे।
मन का अहं मरा और देह का अभिमान घटा तो मानो हरि स्वयं कबीर को पुकारते पीछे आए।
यह अनुग्रह की अतिशयोक्ति है। विनय और निष्कपटता से विकसित आत्मीयता इसका मूल भाव है।
साखी ६२३ जीवन मृतक कौ अंग · मूल क्रमांक ३
मड़हट = श्मशान; बछ = बछड़ा; लार = पीछे।
जब जग ने कवि की पुरानी प्रतिष्ठा छोड़ दी, हरि ने गाय-बछड़े जैसी आत्मीयता से अपनाया।
लोकमान्यता से परे भी मनुष्य की गरिमा है। भीतर का भरोसा और सच्चे संबंध कठिन समय में आधार बनते हैं।
साखी ६२४ जीवन मृतक कौ अंग · मूल क्रमांक ४
घर = अहं-मोह का घर; मड़ा = अहंरहित साधक।
मोह का घर जलाने पर सच्चा आश्रय बचता है; उसे बचाए रखने पर सार खोता है। अहंरहित साधक काल से निर्भय कहा गया है।
उलटबाँसी का विषय भीतर की आसक्ति है। किसी वास्तविक घर या देह को नुकसान पहुँचाना इसका अर्थ नहीं।
साखी ६२५ जीवन मृतक कौ अंग · मूल क्रमांक ५
औसर मरण = समय रहते अहं का क्षय; बहूरि = फिर।
देह से सब मरते हैं, पर समय रहते अहं छोड़ना विरला करता है। कबीर ऐसी मुक्ति की मृत्यु कहते हैं जिसमें बार-बार का भय घटे।
मृत्यु का बिंब आत्मिक परिवर्तन का है। जीवन रहते विनय, प्रेम और जागरूकता बढ़ाएँ।
साखी ६२६ जीवन मृतक कौ अंग · मूल क्रमांक ६
बैद = वैद्य; अधार = आश्रय।
वैद्य, रोगी और संसार सब नश्वर हैं; राम-आश्रय वाला कबीर अपने मूल की अमरता का अनुभव कहते हैं।
यह आध्यात्मिक निर्भयता है, देह अमर रहने का दावा नहीं। नश्वरता के बीच सार्थक जीवन जिएँ।
साखी ६२७ जीवन मृतक कौ अंग · मूल क्रमांक ७
ममता = मेरा-पन; विभूति = राख।
मन का अहं, ममता और गर्व छूटे; योगी मूल में रमा, आसन पर पुरानी पहचान की राख रही।
वेश और पद के प्रति आसक्ति ढीली हो। साधना दूसरों के प्रति सरलता और करुणा में प्रकट हो।
साखी ६२८ जीवन मृतक कौ अंग · मूल क्रमांक ८
मरिबो = अहं की मृत्यु; अजरावर = नश्वर भय से परे स्थिति।
जीवित रहते अहं मरना जानो; देह की मृत्यु से पहले यह परिवर्तन हो तो आत्मिक निर्भयता मिले।
‘मरना’ यहाँ अपने स्वार्थ का आग्रह छोड़ना है। आत्मसम्मान और जीवन-रक्षा उसके विरोधी नहीं।
साखी ६२९ जीवन मृतक कौ अंग · मूल क्रमांक ९
कसौटी = परखने का पत्थर; खोटा = मिश्रित या असच्चा।
राम की सच्ची कसौटी पर छल नहीं टिकता; अहं छोड़कर जीने वाला ही उस पर स्थिर रहता है।
भक्ति की परीक्षा कर्म और निष्ठा में होती है। दिखावे से अधिक अपने भीतर की सच्चाई देखें।
साखी ६३० जीवन मृतक कौ अंग · मूल क्रमांक १०
आपा = अहं; अकथ = पूरी तरह न कही जा सकने वाली।
अहं मिटे तो हरि का परिचय हो; हरि के सार को भुला दो तो सब खो जाए। प्रेम की यह कहानी शब्दों से पूरी नहीं कही जाती।
स्वयं को केंद्र मानने की आदत घटाएँ। आत्मीयता और कृतज्ञता संबंधों में उसका अभ्यास हैं।
साखी ६३१ जीवन मृतक कौ अंग · मूल क्रमांक ११
निगु = निःसहाय; थाघी = सहारा; दीन गरीबी = विनम्रता।
जिसका कोई बाहरी सहारा नहीं, वह नम्रता और बंदगी से कर्ता का आश्रय लेकर आगे बढ़ता है।
अपने अभाव पर लज्जित न हों। विनय, उचित सहयोग और प्रयत्न से जीवन की दिशा बनाएँ।
साखी ६३२ जीवन मृतक कौ अंग · मूल क्रमांक १२
दुँदर = द्वंद्व या झगड़ा; दीन = विनम्र।
विनम्र व्यक्ति सरलता रखता है, झगड़ालू अभिमान और विष भरता है; कबीर नम्रता को राम के निकट कहते हैं।
सादगी आर्थिक अभाव का महिमामंडन नहीं। व्यवहार में अहं और कटुता कम करना इसका सार है।
साखी ६३३ जीवन मृतक कौ अंग · मूल क्रमांक १३
चेरा = सेवक; परदास = सेवकों का भी सेवक।
कबीर संतों के सेवक और सेवकों के भी सेवक बनकर पाँव तले घास जैसी नम्रता कहते हैं।
सेवा में पद की होड़ कम हो। नम्रता के साथ अपनी और दूसरों की गरिमा भी सुरक्षित रखें।
साखी ६३४ जीवन मृतक कौ अंग · मूल क्रमांक १४
रोड़ा = छोटा पत्थर; पादंड = पाखंड।
रास्ते के साधारण पत्थर जैसे हो जाओ; पाखंड और अभिमान छोड़ने वाले को भगवान का परिचय मिलता है।
असाधारण दिखने की चाह घटाएँ। सरल, उपयोगी और निष्कपट व्यवहार आध्यात्मिक अभ्यास है।
४२. चित कपटी कौ अंग
धार्मिक रूप और वास्तविक चरित्र के बीच की कसौटी। मूल स्थानीय क्रमांक १–३।
साखी ६३५ चित कपटी कौ अंग · मूल क्रमांक १
हेत = उद्देश्य; कनीर = कनेर; रातो सेत = लाल-सफेद का बिंब।
जहाँ कपट का उद्देश्य हो, वहाँ मत जाओ; रंगीन कनेर की कली जैसे बाहरी रूप से भीतर की सच्चाई छिप सकती है।
विश्वास रूप और चापलूसी से नहीं, कर्म से बनाएँ। छलपूर्ण वातावरण से उचित सीमा रखें।
साखी ६३६ चित कपटी कौ अंग · मूल क्रमांक २
साषत = भक्ति-विमुख व्यक्ति का पुराना संबोधन; दुराचारी = गलत आचरण वाला।
सादा संसारी व्यक्ति उस धार्मिक पहचान वाले से भला है जो दुराचार करता है; भक्त ऐसे छलपूर्ण संग से बचे।
नाम और मत नैतिक छूट नहीं देते। चरित्र को पहचानें और समुदाय के आधार पर दोष न थोपें।
साखी ६३७ चित कपटी कौ अंग · मूल क्रमांक ३
सुध भाइ = निर्मल भाव; मण = भार की मात्रा।
हरिनाम और निर्मल भाव से भीतर शुद्धि होती है; बहुत साबुन लगाने से मन की कालिमा नहीं मिटती।
शारीरिक स्वच्छता के साथ विचार और कर्म की ईमानदारी भी आवश्यक है।
४३. गुरुसिष हेरा कौ अंग
हितकारी मार्गदर्शक, निष्कपट साथी और आत्मीय श्रोता की खोज। मूल स्थानीय क्रमांक १–१३।
साखी ६३८ गुरुसिष हेरा कौ अंग · मूल क्रमांक १
कर गहि = हाथ पकड़कर; भौसागर = जीवन की उलझनें।
ऐसा मार्गदर्शक खोजता हूँ जो डूबते को हाथ पकड़कर निकाले और सार्थक शिक्षा दे।
अच्छा सहयोग संकट से उबारने के साथ अपना विवेक जगाता है। केवल बड़े वचन मार्गदर्शन नहीं।
साखी ६३९ गुरुसिष हेरा कौ अंग · मूल क्रमांक २
पिछानि = पहचानकर; मैदानि = सुरक्षित खुले स्थान में।
कोई ऐसा मिले जो मुझे समझे, अपनाकर कृपा करे और कठिनाई से सुरक्षित राह पर उतारे।
मार्गदर्शन में सुनना और व्यक्ति की परिस्थिति समझना आवश्यक है। आत्मीयता के साथ जिम्मेदारी हो।
साखी ६४० गुरुसिष हेरा कौ अंग · मूल क्रमांक ३
मृग = हिरन; बधिक = शिकारी।
भक्ति का ऐसा गीत सुनाने वाला खोजता हूँ कि मन हिरन के आकर्षित होने जैसा पूरी तन्मयता से जुड़ जाए।
शिकारी का बिंब आकर्षण की तीव्रता कहता है। वास्तविक सीख में विवेक बना रहे, किसी को अंधसमर्पण न करें।
साखी ६४१ गुरुसिष हेरा कौ अंग · मूल क्रमांक ४
घर = मोह का घर; पंच लरिका = पाँच इंद्रियों का बिंब।
ऐसा साधक मिले जो मोह का घर छोड़कर पाँचों इंद्रियों को साधे और राम में ध्यान रखे।
घर जलाना और बच्चों को पटकना रूपक हैं। उनका अर्थ किसी घर या बच्चे को हानि नहीं, भीतर के मोह का संयम है।
साखी ६४२ गुरुसिष हेरा कौ अंग · मूल क्रमांक ५
अपणीं आगि = अपनी लालसा और क्रोध।
ऐसा आत्मीय साथी नहीं मिलता जिससे जुड़ सकूँ; जग अपने-अपने स्वार्थ की आग में जलता दिखाई देता है।
सच्चे संबंध में दूसरे का हित भी स्थान पाए। अपने दुःख के साथ उसकी परिस्थिति सुनें।
साखी ६४३ गुरुसिष हेरा कौ अंग · मूल क्रमांक ६
निसंक = निःसंकोच; कंक = विवाद या कटुता।
ऐसा कोई मिले जिससे मन की बात निडर होकर कहूँ; जिसे कहता हूँ, वही आगे विवाद खड़ा कर देता है।
अंतरंगता के लिए विश्वास और गोपनीयता आवश्यक हैं। दूसरे की कही बात को हथियार न बनाएँ।
पाठ-टिप्पणी: इसी क्रमांक ६ से पहले “ढोल बजंता…” ख-प्रति का अतिरिक्त पद है; मुख्य पाठ “जासूँ कहूँ निसंक…” है।
साखी ६४४ गुरुसिष हेरा कौ अंग · मूल क्रमांक ७
सुनि मण्डल = सूक्ष्म अंतराकाश; पुरिष = परम सत्ता।
ऐसा मार्गदर्शक मिले जो सूक्ष्म साधना का रास्ता समझाए और उस एक परम सत्ता में ध्यान लगवाए।
कठिन प्रतीक अनुभव की भाषा हैं। मार्गदर्शन स्पष्टता और आचरण-सुधार में सहायक होना चाहिए।
साखी ६४५ गुरुसिष हेरा कौ अंग · मूल क्रमांक ८
पकड़ि छुड़ावै = सहारा देकर बंधन से निकाले।
मैं जग को जाते देखता हूँ, जग मुझे जाता देखता है; ऐसा सहायक दुर्लभ है जो इस असावधानी से छुड़ाए।
नश्वरता पहचानने वाला हितैषी मूल्यवान है। अपने संबंधों में भी सत्य और सजगता की याद बनाएँ।
साखी ६४६ गुरुसिष हेरा कौ अंग · मूल क्रमांक ९
तीनि चौथे = त्रिगुण और उससे परे की अवस्था का संकेत; परबसि = वश में।
संसार के तीन गुणों में रमे अनेक मिले, पर उनसे परे स्थिर साथी विरला है; सब किसी न किसी प्रभाव में बैठे हैं।
योगिक संकेतों की व्याख्या भिन्न हो सकती है। मुख्य भाव बाहरी समानता से आगे वास्तविक आत्मीय अनुभव खोजना है।
साखी ६४७ गुरुसिष हेरा कौ अंग · मूल क्रमांक १०
महोर्बती = मोह-प्रेम दिखाने वाले; सैण = मित्र; बेध्या = भीतर छुआ।
मोह के साथी बहुत मिले, पर प्रिय की कसक से भीतर बेधा हुआ सच्चा साथी नहीं मिला।
समान शब्द और पहचान पर्याप्त नहीं। निष्कपटता तथा साझा मूल्यों से संबंध गहरा होता है।
साखी ६४८ गुरुसिष हेरा कौ अंग · मूल क्रमांक ११
सारा = सकुशल; घाइल = प्रेम-जागृति से छुआ; दिढ़ = दृढ़।
बहादुरी का दावा करने वाले अनेक, प्रेम से भीतर बदले विरले हैं। ऐसे अनुभवी मिलें तो भक्ति दृढ़ होती है।
अनुभव बाँटना सहारा देता है। आत्मप्रदर्शन से अधिक संवेदनशील सुनवाई और ईमानदार संगति महत्त्वपूर्ण हैं।
साखी ६४९ गुरुसिष हेरा कौ अंग · मूल क्रमांक १२
बिष अमृत = कटुता का मधुरता में बदलना।
प्रेमी खोजता फिरता हूँ, प्रेमी विरला मिलता है। प्रेम से प्रेम मिले तो विष जैसी कटुता भी अमृत हो जाती है।
आत्मीयता मन की कठोरता बदल सकती है। निष्कपट संबंध में विश्वास और परस्पर हित बढ़ाएँ।
पाठ-टिप्पणी: स्रोत की टिप्पणी के बाद अलग पंक्ति में आई “प्रेमी ढूँढ़त मैं फिरौं…” इस मुख्य साखी की पहली पंक्ति है; दोनों पंक्तियाँ जोड़ी गई हैं।
साखी ६५० गुरुसिष हेरा कौ अंग · मूल क्रमांक १३
मुराड़ा = जलती लकड़ी; घर = अहं-मोह की संरचना।
मैंने अपना मोह-घर जलाया; जो साथ चले, उसका भी मोह मिटाने का संकल्प कहता हूँ।
यह प्रसिद्ध आत्मपरिवर्तन का रूपक है। वास्तविक घर जलाना नहीं, असत्य और अहं की जड़ छोड़ना इसकी सीख है।
पाठ-टिप्पणी: यह मुख्य स्थानीय क्रमांक १३ है। इसके बाद ख-प्रति के अतिरिक्त पद १५ और १६ आते हैं; वे मुख्य गिनती में नहीं हैं।
४४. हेत प्रीति सनेह कौ अंग
दूरी के बीच स्मृति, निष्ठा और सच्चे भाव का संबंध। मूल स्थानीय क्रमांक १–४।
साखी ६५१ हेत प्रीति सनेह कौ अंग · मूल क्रमांक १
कमोदनी = कुमुदिनी; भावता = प्रिय।
कुमुदिनी जल में और चंद्रमा आकाश में हैं, फिर भी प्रेम का संबंध दूरी के बीच निकटता बनाता है।
सच्ची आत्मीयता केवल भौतिक पास होने पर निर्भर नहीं। निष्ठा और स्मृति दूरी में भी जुड़ाव रखती हैं।
साखी ६५२ हेत प्रीति सनेह कौ अंग · मूल क्रमांक २
सिष = शिष्य; गुंण = संस्कार और सीख।
गुरु बनारस में हों और शिष्य समुद्र-तट पर, फिर भी सीख भीतर हो तो उन्हें भुलाया नहीं जाता।
मार्गदर्शन की वास्तविक उपस्थिति जीवन में अपनाए गुण हैं। केवल निकट बैठना पर्याप्त नहीं।
साखी ६५३ हेत प्रीति सनेह कौ अंग · मूल क्रमांक ३
जदि तदि = कभी न कभी; सौंपिया = आत्मीय समर्पण किया।
जिससे सच्चा प्रेम है, उससे मिलन की आशा रहती है; तन-मन से जुड़े प्रिय को मन सहज नहीं छोड़ता।
यह भक्त का भरोसा है। संबंध में निष्ठा का अर्थ सम्मान और जिम्मेदारी निभाना भी है।
साखी ६५४ हेत प्रीति सनेह कौ अंग · मूल क्रमांक ४
भाइ = भाव; रीझै = प्रसन्न हो।
स्वामी और सेवक एक भाव हों तो मन में ही मिलते हैं; चतुराई से नहीं, निष्कपट भाव से आत्मीयता बनती है।
छल और दिखावे के बजाय सत्य रखें। संबंधों में भी सच्चा उद्देश्य शब्दों से अधिक प्रभाव डालता है।
४५. सूरा तन कौ अंग
अंतर्मन के संघर्ष, दृढ़ता और अहं-समर्पण का वीररस। मूल स्थानीय क्रमांक १–४१।
इस अंग का युद्ध मुख्यतः काम, क्रोध और अहं से भीतर का संघर्ष है। स्थानीय ३३–३७ के ऐतिहासिक सती-दाह बिंबों को ऊपर दी टिप्पणी के संदर्भ में पढ़ें; उनके हिंसक कर्म का समर्थन या अनुकरण इस पाठ की सीख नहीं है।
साखी ६५५ सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक १
सूरा तन = साहस धारण करना; सेल = भाला; सँबाहि = सँभाल।
कायरता में छूट नहीं मिलेगी; साहस रखो, भ्रम दूर करो और स्मरण के भाले को सँभालो।
युद्ध का क्षेत्र भीतर की गलत प्रवृत्तियाँ हैं। कठिन आत्मपरीक्षण के लिए धैर्य और निष्ठा विकसित करें।
साखी ६५६ सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक २
षूँड़ै = कोने में; झूझ = संघर्ष; इंद्राँ = इंद्रियाँ।
कोने में छिपने से समस्या नहीं मिटती; भीतर के मैदान में इंद्रियों की दासता से सामना करो।
पलायन के बजाय इच्छा और आदत समझें। संयम आत्मदंड नहीं, सजग निर्णय लेने की क्षमता है।
साखी ६५७ सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक ३
सूरिवाँ = शूरवीर; पंच पयादा = पाँच इंद्रियाँ; दूज = अलगाव।
सच्चा साधक मन से संघर्ष करता है, पाँच इंद्रियों को साधता है और भीतर का द्वंद्व घटाता है।
अपनी कमजोरी मानना भी साहस है। अभ्यास से प्रतिक्रिया के बजाय विवेक चुनना सीखें।
साखी ६५८ सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक ४
गिरदा = चारों ओर से; इक दिसि = एक दिशा।
वीर केवल एक ओर से नहीं, चारों ओर से आने वाली बाधाओं का सामना करता है।
एक दोष पर जीत पर्याप्त नहीं। लोभ, क्रोध, अहं और छल के अनेक रूपों को सजगता से देखें।
साखी ६५९ सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक ५
आरणि = रणभूमि; हजूर = निकट उपस्थिति।
कठिन मैदान में उतरकर पीछे न हटने वाला सच्चा होता है और स्वामी की निकटता पाता है।
यह आत्मिक दृढ़ता का चित्र है। शुभ संकल्प कठिन होने पर भी छोटे नियमित कदम जारी रखें।
साखी ६६० सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक ६
दमाँमाँ = नगाड़ा; खेत = साधना का रणक्षेत्र।
आकाश का नगाड़ा बजा, निशाने पर चोट लगी और साधक ने मैदान सँभाला; अहं की मृत्यु का उत्साह जागा।
भाषा वीररस की है, लक्ष्य आत्मपरिवर्तन है। वास्तविक मृत्यु का नहीं, मोह के छूटने का भाव ग्रहण करें।
साखी ६६१ सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक ७
हेत = प्रेम; चौड़े खेत = खुला आंतरिक मैदान।
हरि से प्रेम जुड़ने पर संशय घटा; अब काम और क्रोध से जूझने का स्पष्ट मैदान मिला।
यह पद संघर्ष का विषय स्वयं बताता है। दूसरों को शत्रु बनाने के बजाय अपने दोष सुधारें।
साखी ६६२ सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक ८
सार = शस्त्र; सहज संजोग = सहज कवच; गयंद = हाथी।
साधक ने संयम का शस्त्र और सहजता का कवच सँभाला; ज्ञान के हाथी पर बैठ भीतर के मैदान में उतरता है।
समझ और संतुलन साथ हों तो कठिन प्रतिक्रिया सँभलती है। केवल आवेग को साहस न मानें।
साखी ६६३ सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक ९
धणीं = स्वामी; पुरिजा = टुकड़ा।
वीर वह जो अपने स्वामी के हेतु दृढ़ रहे, टुकड़े होने की अतिशयोक्ति में भी संकल्प न छोड़े।
आध्यात्मिक अर्थ सत्य के प्रति स्थिरता है। इस उग्र बिंब को स्वयं या दूसरे की देह को हानि की प्रेरणा न बनाएँ।
साखी ६६४ सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक १०
द्वै दल = दो पक्षों का संघर्ष; आस = निजी लाभ की अपेक्षा।
वीर दो दलों के बीच जूझकर मैदान नहीं छोड़ता और अपने लाभ-हानि की चिंता में नहीं डूबता।
कर्म के समय भय और लालच निर्णय न चलाएँ। विवेकपूर्ण उद्देश्य पर स्थिर रहते परिस्थिति भी समझें।
साखी ६६५ सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक ११
बणौं = निभेगा; सूरि = वीर।
अब भीतर के संघर्ष से गुजरना ही होगा; पुरानी अवस्था में लौटना दूर हो गया। स्वामी को अहं सौंपकर दृढ़ रहो।
परिवर्तन शुरू हो तो असुविधा के कारण हर बार पीछे न हटें। जिम्मेदार प्रयास और धैर्य रखें।
साखी ६६६ सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक १२
स्यँधौरा = सिंदूर-पात्र, पुरानी सती-छवि का संकेत; मनकारु = संकल्प।
कवि पुरानी समर्पण-छवि से कहते हैं कि दृढ़ संकल्प कर लिया तो मृत्यु का भय क्यों दिखाया जाए?
यह ऐतिहासिक रूपक आज देह-दाह का समर्थन नहीं है। सकारात्मक भाव निष्ठा और अहं छोड़ना है।
साखी ६६७ सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक १३
मरनै = अहं-मोह का मिटना; परमाँनंद = गहरा आत्मिक आनंद।
जिस मृत्यु से जग डरता है, उसी बिंब में कवि अहं मिटने और पूर्ण आनंद से मिलने की उत्कंठा कहते हैं।
भक्ति में ‘मरना’ जीवन का अंत करने का आदेश नहीं। अपने स्वार्थ और भय की पकड़ कम करना उसका उपयोगी अर्थ है।
साखी ६६८ सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक १४
पमाँवही = बढ़-चढ़कर बोलते; नूर = तेज।
कायर बहुत डींग मारते हैं, सच्चा वीर बहककर नहीं बोलता; काम पड़ने पर वास्तविक साहस पहचाना जाता है।
दावे से अधिक कर्म पर भरोसा रखें। जिम्मेदारी आने पर शांत, स्पष्ट और उपयोगी बनना साहस है।
साखी ६६९ सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक १५
घाइल = भीतर प्रेम से छुआ; निस = रात।
जिसके भीतर चोट लगी है, उससे पूछो—दिन पीड़ा और रात जागरण है। उसे अनुभव करने वाला या प्रिय ही जानता है।
अनुभव की गहराई बाहरी दिखावे से नहीं मापी जाती। दूसरों की व्यथा संवेदना से सुनें।
साखी ६७० सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक १६
मरम = मर्म; ओट = छिपाव।
प्रेम की मर्मस्थ चोट छिपाने से छिपती नहीं; बाहरी उपाय उसकी भीतर की कसक नहीं हटाते।
साधक की चाह अंतःकरण से जुड़ी है। उसे केवल बाहरी उपलब्धि से भरने का आग्रह न करें।
साखी ६७१ सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक १७
विरष = वृक्ष; झूरि = व्याकुल होकर; निरमल फल = आत्मज्ञान।
वृक्ष ऊँचा, फल दूर है; पक्षी व्याकुल हैं और अनेक चतुर लोग प्रयास में उलझे रह गए।
लक्ष्य की ऊँचाई केवल चतुराई से नहीं सधती। विनय, सही मार्गदर्शन और धैर्य जरूरी हैं।
साखी ६७२ सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक १८
नेड़ा = निकट; कारिज सिधि = काम की सिद्धि।
लक्ष्य दूर है तो क्या? अहं समर्पित करो तो निकटता आएगी; अपने आग्रह छोड़े बिना पूरा काम नहीं होता।
सिर देना अहं का रूपक है। सीखने और बदलने की तैयारी आध्यात्मिक प्रगति का आधार है।
साखी ६७३ सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक १९
खाला = मौसी; पैसै = प्रवेश करे।
प्रेम का घर केवल सहज मेहमाननवाजी का घर नहीं; अहं का सिर उतारने वाला उसमें प्रवेश करता है।
आत्मीयता केवल सुविधा नहीं, जिम्मेदारी भी माँगती है। स्वार्थ और अपनी ही शर्तों का आग्रह कम करें।
साखी ६७४ सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक २०
अगाध = अथाह; पग तलि = पाँव के नीचे।
प्रेम का मार्ग गहरा और कठिन है; अपना अहं नीचे रखो तो उसके स्वाद के निकट पहुँचोगे।
नम्रता स्वयं को तुच्छ समझना नहीं। दूसरों का सम्मान और अपनी गलती मानने की क्षमता विकसित करें।
साखी ६७५ सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक २१
हाटि = बाजार; राजा परजा = सभी वर्ग।
प्रेम न खेत में पैदा होता, न बाजार में बिकता। राजा हो या साधारण जन, अहं छोड़कर ही उसका रस मिलता है।
धन और पद से प्रेम खरीदा नहीं जा सकता। निष्कपटता, आदर और जिम्मेदारी उसके आधार हैं।
साखी ६७६ सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक २२
पासंग = तराजू का छोटा संतुलन-भार; सरभरि = बराबर।
कवि प्रेम की हाट में अहं का सिर पासंग और पूरा जीवन उसके बराबर अर्पित करने का बिंब कहते हैं।
व्यापार की उपमा प्रेम में पूर्ण सहभागिता दिखाती है। यह वास्तविक अंग काटने का निर्देश नहीं।
साखी ६७७ सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक २३
मुल किया = स्वागत या मोल लिया; दास = समर्पित साधक।
वीर ने अहं छोड़ा, देहाभिमान घटाया और आगे प्रिय ने उसे अपनाया—कवि ऐसा मिलन कहते हैं।
सच्चा समर्पण व्यवहार में विनय लाता है। उसे बाहरी यातना या प्रदर्शन से सिद्ध करने की जरूरत नहीं।
साखी ६७८ सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक २४
दुहेली = कठिन; कायर = संकल्प से पलायन करने वाला।
राम की भक्ति कठिन है; अहं छोड़ने का साहस वाला ही नाम का सार ग्रहण करता है।
भक्ति केवल सुख माँगना नहीं, अपने दोष बदलना भी है। यह परिवर्तन धैर्यपूर्ण अभ्यास से करें।
साखी ६७९ सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक २५
खाँडा = तलवार; धार = महीन किनारा।
भक्ति तलवार की धार जैसी सूक्ष्म सावधानी माँगती है; डगमगाहट हानि और स्थिरता पार का बिंब है।
यह सजगता की अतिशयोक्ति है। भूल होने पर आत्मदंड नहीं, समझ और अभ्यास से फिर संतुलन पाएँ।
पाठ-टिप्पणी: वेब-पाठ में पहले चरण के बाद अतिरिक्त “नहिं” मिला हुआ है। मुद्रित संदर्भ पृष्ठ १५४ के अनुसार “जैसि खाँडे की धार” पाठ लिया गया है।
साखी ६८० सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक २६
झाल = ज्वाला; कौतिगहार = दर्शक।
भक्ति आग की ज्वाला जैसी कही गई है—पूरे मन से उतरने वाले पार होते, केवल बाहर तमाशा देखने वाले तपते हैं।
मुख्य सीख पूर्ण सहभागिता है। वास्तविक आग में कूदने या कष्ट देने का अर्थ न लें।
साखी ६८१ सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक २७
चेतनि = जागी चेतना; षड़ग = तलवार; काल = नश्वरता का भय।
प्रेम के घोड़े पर चेतना सवार है, ज्ञान की तलवार से काल-भय का सामना करती है।
प्रेम, सजगता और ज्ञान साथ हों तो भय घटता है। इस युद्ध-रूपक का क्षेत्र अंतःकरण है।
साखी ६८२ सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक २८
हीरा वणजिया = अमूल्य ज्ञान का व्यापार; सिर साटै = अहं के बदले।
कबीर ने अनमोल हीरे का व्यापार किया; देह की नश्वरता के बीच अहं छोड़ना उसकी कीमत बना।
सच्चे मूल्य पाने में पुराना आग्रह छोड़ना पड़ता है। रूपक की कीमत चरित्र-परिवर्तन है, देहहानि नहीं।
साखी ६८३ सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक २९
रैणि = रात; कंगुरै = ऊँचे कंगूरे पर।
रात के तारों जितने विरोधी हों और देह पर घोर संकट आए, तब भी प्रिय को न भूलने का संकल्प है।
कवि निष्ठा की चरम अतिशयोक्ति कहते हैं। जीवन की रक्षा करते हुए भी अपने नैतिक मूल्य बनाए रखे जा सकते हैं।
साखी ६८४ सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक ३०
सवाँ = समान या अपनी ओर; डाव = दाँव।
हार हो तो हरि का आश्रय है, जीत हो तो प्रयास का फल; सेवा में अहं का सिर जाए तो जाने दो।
लाभ-हानि से ऊपर सत्य का मूल्य पहचानें। समर्पण में विवेक और अपने जीवन के प्रति सम्मान बना रहे।
साखी ६८५ सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक ३१
बाँणि = पुरानी आदत; सिर दीया = अहं छोड़ा।
पुरानी स्वार्थी आदत छोड़कर हरि की सेवा करो; अहं देने से प्रिय मिले तो उसे हानि मत समझो।
हर त्याग नुकसान नहीं। झूठा अभिमान छोड़ना संबंध और भीतर की शांति को समृद्ध कर सकता है।
साखी ६८६ सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक ३२
अणी = नोक; साध सती सूर = निष्ठा और वीरता की पुरानी त्रयी।
आकाश से टूटते प्रहार की तरह कठिन कसौटी सहना दुर्लभ है; कवि साधक, सती और वीर के जीवन को नोक का खेल कहते हैं।
यह ऐतिहासिक आदर्श-भाषा है। आज उसके भीतर की दृढ़ता लें, हिंसक प्रथा या देह-दंड नहीं।
साखी ६८७ सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक ३३
सलि = चिता; मसाँन = श्मशान; निदान = अंत में।
ऐतिहासिक सती-दाह के बिंब में स्त्री श्मशान से कहती है—लोग चले गए, अंत में हम तुम्हारे पास रह गए।
इस हिंसक प्रथा का अनुमोदन नहीं किया जा सकता। पाठ ऐतिहासिक साक्ष्य है; आत्मिक अर्थ में अकेलेपन के बीच निष्ठा का प्रश्न पढ़ें।
साखी ६८८ सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक ३४
काठौं सेज = चिता की लकड़ियाँ; पीव = पति-प्रिय।
पद में स्त्री पति के साथ लकड़ी की चिता पर लेटती और चारों ओर अग्नि लगने का ऐतिहासिक चित्र है।
इस दृश्य को आदर्श आचरण या अनुकरण का निर्देश न मानें। किसी संबंध में प्रेम की कसौटी जीवन, सहमति और गरिमा की रक्षा है।
साखी ६८९ सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक ३५
घाँण = कोल्हू या पूर्ण समर्पण का बिंब; महौल = देह-घर।
कवि सती और वीर के उग्र बिंब से तन-मन के पूर्ण समर्पण की बात कहते हैं, जिसे श्मशान तक कथित कीर्ति मिलती है।
ऐतिहासिक प्रशंसात्मक भाषा को आलोचनात्मक संदर्भ में पढ़ें। आध्यात्मिक निष्ठा को हिंसा या आत्मविनाश से सिद्ध नहीं करना चाहिए।
साखी ६९० सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक ३६
सबद सुनन = शब्द के अनुभव का क्षण; भूति = देह की पहचान।
दाह को जाती सती का बिंब प्रिय-स्मरण में देह की सुध भुलाने की चरम तन्मयता दिखाने के लिए आया है।
तन्मयता का सकारात्मक सार निष्कपट प्रेम है। ऐतिहासिक देह-दाह को आज स्वीकार्य क्रिया या आध्यात्मिक आवश्यकता न मानें।
साखी ६९१ सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक ३७
एकबमेख = एकरस; रेख = अलगाव की रेखा।
सती-दाह के पुराने चित्र में प्रिय से एकरस ध्यान और तन-मन अर्पण करके अलगाव मिटने की बात कही गई है।
मूल रूपक ऐतिहासिक है और उसका हिंसक कर्म अनुकरणीय नहीं। आंतरिक अर्थ अहं की दूरी मिटाकर प्रेम और करुणा बढ़ाना है।
साखी ६९२ सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक ३८
जीवत मरना = जीते जी अहं त्यागना; सत = सत्यनिष्ठा।
हे सखी, जीवित रहते अपना अहं क्यों नहीं छोड़ती? मृत्यु के बाद सत्य का प्रदर्शन करने से पहले जीवन में उसे अपनाओ।
यह पद ध्यान को जीते जी परिवर्तन पर लौटाता है। जीवित रहते सत्य, सेवा और करुणा अपनाना आवश्यक है।
साखी ६९३ सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक ३९
छाँनै = छिपकर; फूस कौ जोड़ा = जल्दी जलने वाला मोह।
राम का स्पष्ट स्मरण करो; भीतर के सूखे मोह का ढेर हटाओ, ताकि आग फिर न लगे।
जो कमजोरी बार-बार विकार जगाती है, उसकी जड़ पर काम करें। दिखावे से अधिक स्पष्ट और ईमानदार साधना महत्त्वपूर्ण है।
पाठ-टिप्पणी: वेब-प्रतिलिपि में अंतिम चरण से “न” छूटा है। मुद्रित पृष्ठ १५५ के अनुसार फिर आग न लगने वाला पाठ रखा गया है।
साखी ६९४ सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक ४०
आस सरीर की = देह-सुख का अनन्य आग्रह; भजै = सँभालता या स्मरण करता।
हरि सबको सँभालते हैं, पर निष्काम भाव से उन्हें विरला भजता है; केवल देह-सुविधा की चाह में सेवा अधूरी है।
अपने उद्देश्य की जाँच करें। देह की आवश्यक देखभाल रहे, साथ में स्वार्थ से व्यापक सेवा भी हो।
साखी ६९५ सूरा तन कौ अंग · मूल क्रमांक ४१
मेदनी = दुनिया; सवारथ = उद्देश्य या लगाव।
दुनिया का उद्देश्य अपना लाभ है, भक्त का अपने प्रिय की सेवा; कबीर राम से ऐसा लगाव कहते हैं जिसमें अहं का आग्रह छूटे।
स्वार्थ और आत्मीय उद्देश्य में अंतर देखें। सेवा में दूसरों का कल्याण और समान गरिमा भी सम्मिलित हो।
४६. काल कौ अंग
समय की अनिश्चितता, देह की नश्वरता और शुभ कार्य में विलंब न करना। मूल स्थानीय क्रमांक १–३२।
साखी ६९६ काल कौ अंग · मूल क्रमांक १
मोद = आनंद; खलक = संसार; चवीणाँ = चबैना।
अस्थायी सुख को स्थायी मानकर मन खुश है, जबकि संसार काल का चबैना है—कुछ अभी, कुछ आगे उसकी पकड़ में है।
नश्वरता याद रखकर सुख का सदुपयोग करें। समय को केवल उपभोग में न गँवाएँ।
साखी ६९७ काल कौ अंग · मूल क्रमांक २
सिचाणाँ = बाज; चिड़ा = चिड़िया; औच्यंताँ = अचानक।
आज-कल करते यात्री को काल बाज की तरह अचानक पकड़ सकता है, जैसे राह में चिड़िया को झपटे।
अज्ञात समय के कारण शुभ कार्य न टालें। जीवन की जरूरी जिम्मेदारियाँ आज सँभालें।
साखी ६९८ काल कौ अंग · मूल क्रमांक ३
सिहाँणै = सिरहाने; म्यंत = मित्र; नच्यंत = निश्चिंत।
प्रिय मित्र, काल सिरहाने खड़ा है; राम की आत्मीयता भूले होकर इतनी असावधानी में क्यों सोते हो?
यह आध्यात्मिक जागरण का आह्वान है। सामान्य विश्राम रखते हुए विवेक और स्मरण न छोड़ें।
साखी ६९९ काल कौ अंग · मूल क्रमांक ४
बींद = दूल्हा; तोरणि = द्वार की सजावट।
जग असावधानी में सोता है, संत जागता है; काल सिर पर ऐसे खड़ा है जैसे दूल्हा द्वार पर आ पहुँचे।
विवाह की उलटी उपमा अंतिम बुलावे की निश्चितता कहती है। वर्तमान जीवन में प्रेम और सत्कर्म अपनाएँ।
साखी ७०० काल कौ अंग · मूल क्रमांक ५
औसर = अवसर; चालि = निकलकर।
आज कहता है कल भजूँगा, कल फिर अगले दिन पर टालता है; ऐसा करते अवसर निकल जाएगा।
शुभ अभ्यास के लिए अनुकूल दिन की अंतहीन प्रतीक्षा न करें। आज से छोटा नियमित कदम शुरू करें।
साखी ७०१ काल कौ अंग · मूल क्रमांक ६
अच्यंता = अनपेक्षित; साज = तैयारी; बाज = शिकारी पक्षी।
अगले पल की खबर नहीं, फिर भी दूर की तैयारी में सब भरोसा है; काल अचानक बाज जैसा झपट सकता है।
योजना उपयोगी है, पर वर्तमान संबंध और कर्तव्य न भूलें। अनिश्चितता नम्रता सिखाए।
साखी ७०२ काल कौ अंग · मूल क्रमांक ७
टग टग चोघताँ = चुगते हुए; बिहाइ = बीत गया।
दाने चुगते पक्षी की तरह भोग जुटाते पल-पल समय बीत गया; जंजाल न छूटा और अंतिम नगाड़ा बज उठा।
संग्रह की दौड़ के बीच समय का मूल्य देखें। आत्मपरीक्षण और सेवा को भी दिनचर्या में स्थान दें।
साखी ७०३ काल कौ अंग · मूल क्रमांक ८
जम = मृत्यु; जुरा = बुढ़ापा; ऊबरो = बचूँ।
मैं अकेला हूँ, सामने मृत्यु और बुढ़ापा दो हैं; एक से बचूँ तो दूसरा सामने आ जाता है।
नश्वरता की सीमाएँ स्वीकारें। उनसे भयभीत होकर ठहरने के बजाय शेष अवसर का उचित उपयोग करें।
साखी ७०४ काल कौ अंग · मूल क्रमांक ९
बारी = क्रम; नेड़ी = निकट; म्यंत = मित्र।
प्रियजन अपनी-अपनी बारी से चले गए; हे जीव, तेरी बारी भी रोज निकट आती है।
साथ की अस्थिरता प्रेम को अधिक मूल्यवान बनाती है। रहते हुए आदर और संवाद निभाएँ।
साखी ७०५ काल कौ अंग · मूल क्रमांक १०
दों = वनाग्नि; दाधी = जली; लुहार = भट्ठी में फिर जलाने वाला।
आग में जली लकड़ी मानो पुकारती है—लुहार के हाथ न पड़ूँ कि फिर जलाई जाऊँ।
कवि बार-बार के मोह-दुःख से बचने की चाह कहते हैं। एक अनुभव से सीखकर उसी हानि का चक्र न दोहराएँ।
साखी ७०६ काल कौ अंग · मूल क्रमांक ११
आँथवै = अस्त होगा; चिणियाँ = बनाया।
जो उगा वह अस्त होगा, फूल मुरझाएगा, बना ढहेगा और आया जाएगा।
परिवर्तन जीवन का नियम है। उपलब्धि के साथ विनय तथा हानि के बीच धैर्य रखें।
साखी ७०७ काल कौ अंग · मूल क्रमांक १२
फाटिसी = फटेगा; तत्त = सार; गुरि = गुरु ने।
पहनावा फटेगा, नाम और देह मिटेंगे; गुरु ने जो स्थिर सार बताया, उसे ग्रहण करो।
बाहरी पहचान के साथ सत्य, करुणा और विवेक जैसे मूल्य विकसित करें।
साखी ७०८ काल कौ अंग · मूल क्रमांक १३
निधड़क = असावधान निडर; बुदबुदा = बुलबुला।
चेतना पुकारती है—राम का सार भूले बेफिक्र क्यों हो? यह देह जल का बुलबुला है, टूटने में देर नहीं।
कवि आत्मिक तैयारी का आग्रह करते हैं। शरीर की नश्वरता जीवन की जिम्मेदारी से विमुख न करे।
साखी ७०९ काल कौ अंग · मूल क्रमांक १४
जाति = प्रकार या प्रकृति; परभाति = सुबह।
हमारा देह-रूप पानी के बुलबुले जैसा है; एक दिन सुबह के तारों की तरह ओझल हो जाएगा।
अस्थिरता समझकर आज की आत्मीयता और सार्थक कर्म का सम्मान करें।
साखी ७१० काल कौ अंग · मूल क्रमांक १५
खारा मीठ = दुःख-सुख; माड़ियां = बड़े भवन; नसाँणाँ = श्मशान।
यह जग क्षण में खारा, क्षण में मीठा है। कल महल में बैठा व्यक्ति आज श्मशान में दिखाई दिया।
परिस्थिति का परिवर्तन तेज हो सकता है। सफलता में विनय और कठिनाई में सहानुभूति बनाए रखें।
साखी ७११ काल कौ अंग · मूल क्रमांक १६
आलि = सजावट; मड़हट = श्मशान; जालि = जली अवस्था।
देहरूपी घर को रोज सजाती आत्मा श्मशान देखकर डरती है, जहाँ उसी देह का अंतिम रूप प्रकट है।
देखभाल के साथ नश्वरता का विवेक रखें। बाहरी सजावट जीवन की पूरी तैयारी नहीं।
साखी ७१२ काल कौ अंग · मूल क्रमांक १७
झबूकती = झिलमिलाती; हंस बटाऊ = यात्री चेतना; छोति = निष्प्राण घर का अवशेष।
देह-मंदिर में दीप-जैसी चेतना झिलमिलाती थी; यात्री हंस चला गया तो देह खाली घर रह गई।
जीवन की चेतना रहते अवसर अपनाएँ। व्यक्तियों को केवल देह या संपत्ति तक सीमित न समझें।
साखी ७१३ काल कौ अंग · मूल क्रमांक १८
धौलहर = महल; पौलि = द्वार; रौलि = उथल-पुथल।
ऊँचा महल और चित्रित द्वार भी अंतिम समय की उथल-पुथल नहीं रोकते; भीतर का आश्रय आवश्यक है।
धन और भवन साधन हैं। उनके साथ जीवन के नैतिक तथा आत्मिक मूल्य भी सँजोएँ।
साखी ७१४ काल कौ अंग · मूल क्रमांक १९
केस = बाल; काल = मृत्यु।
काल बाल पकड़कर ले जा सकता है; पता नहीं अंतिम क्षण घर आए या परदेस।
अहं छोड़कर अपने संबंध और जिम्मेदारियाँ समय रहते सँभालें। अनिश्चितता वर्तमान का मूल्य बताती है।
साखी ७१५ काल कौ अंग · मूल क्रमांक २०
जंत्रा = वाद्य; बजावणहार = वादक।
तार टूट गए तो वाद्य नहीं बजता; वादक चला जाए तो उसका उपकरण अकेला क्या करे?
देह को वाद्य की उपमा देकर जीवन की चेतना का मूल्य कहा गया है। क्षमता रहते उसका सार्थक उपयोग करें।
साखी ७१६ काल कौ अंग · मूल क्रमांक २१
धवणि = धौंकनी; अहरणि = निहाई; ठमूकड़ा = अचल।
लोहार चला गया तो धौंकनी थमी, अंगारे बुझे और निहाई स्थिर रही।
जीवन की सक्रियता अपने मूल आधार पर निर्भर है। काम करते समय उसकी अस्थिरता और कृतज्ञता याद रखें।
साखी ७१७ काल कौ अंग · मूल क्रमांक २२
बुगचा = गठरी; पूठि = पीठ; पंथी = यात्री।
यात्री राह पर गठरी बाँधे खड़ा है, सामने मृत्यु है; स्थायी रहने का उसका भरोसा भ्रम है।
जीवन को यात्रा मानकर अनावश्यक बोझ घटाएँ। आवश्यक जिम्मेदारी, प्रेम और सत्कर्म साथ रखें।
साखी ७१८ काल कौ अंग · मूल क्रमांक २३
अजौ = आगे; बिच का बासा = बीच का ठहराव।
जीव दूर से आया और आगे दूर जाएगा; बीच के पड़ाव में ऐसा रमा कि सिर पर खड़े काल को भूल गया।
अस्थायी अवस्था को अंतिम मानकर न अटकें। वर्तमान का उपयोग करें, उससे चिपककर विवेक न खोएँ।
साखी ७१९ काल कौ अंग · मूल क्रमांक २४
जुरा = बुढ़ापा; द्वार = निकास का रूपक।
जिसने पहले स्मरण किया, उसने कर लिया; बुढ़ापा और अंतिम घड़ी द्वार रोक दें तो नया अर्जन कठिन हो जाता है।
अच्छी आदतें समय रहते विकसित करें। साथ ही देर से शुरू करने वाले का भी उत्साह बनाए रखें।
साखी ७२० काल कौ अंग · मूल क्रमांक २५
बरिया = समय; बरन = रूप-रंग; बाहुणै = वापस आए।
समय बीता, बल घटा और रूप बदल गया। हाथ से छूटा अवसर आसानी से वापस नहीं आता।
भूत की हानि स्वीकारकर उपलब्ध समय का उपयोग करें। केवल पछतावे में शेष अवसर न खोएँ।
साखी ७२१ काल कौ अंग · मूल क्रमांक २६
नेड़ा = निकट; हेत = प्रेम।
समय और बल बीते, ऊपर से बुरे कर्म किए; फिर भी हरि का सहारा मत छोड़ो, जीवन की घड़ी निकट है।
ग्लानि को सुधार का कारण बनाएँ। गलत काम रोकें और जहाँ संभव हो उसका परिणाम सँभालें।
साखी ७२२ काल कौ अंग · मूल क्रमांक २७
षटीक = खटिक, बध करने वाले का पुराना संबोधन; तापसु = तपस्वी।
असार चाह में मत फँसो; बंधन के बाद बचाने की देर हो सकती है, इसलिए हरि से प्रेम अभी जोड़ो।
उपमा विलंब के खतरे की है। समय रहते अपना आचरण और जीवन की दिशा सँभालें।
साखी ७२३ काल कौ अंग · मूल क्रमांक २८
बिष का बन = हानिकारक आसक्ति; रैणि = रात।
विषैले वन में घर और लिपटे साँपों के बीच मन भय से रात भर जागता है।
अपने ही चुने वातावरण का प्रभाव देखें। लगातार भय और दोष बढ़ाने वाली आदतों से उचित दूरी बनाएँ।
साखी ७२४ काल कौ अंग · मूल क्रमांक २९
रासि = समूह; पासि = फंदा।
राम का आश्रय सार-सुख है; देव, मनुष्य, मुनि और असुर सभी काल की सीमा में हैं।
पद और उपलब्धि नश्वरता नहीं मिटाते। भीतर का स्थिर आधार और नैतिक जीवन विकसित करें।
साखी ७२५ काल कौ अंग · मूल क्रमांक ३०
काची काया = नश्वर देह; अथिर = चंचल।
देह नश्वर, मन चंचल है, फिर भी स्थायी अधिकार जैसे काम करता है; असावधानी देखकर काल मानो हँसता है।
योजना बनाएँ, पर परिणाम का अहं न पालें। नम्रता और वर्तमान के प्रति सजगता रखें।
साखी ७२६ काल कौ अंग · मूल क्रमांक ३१
कासनि = किससे; जलाँवणहार = अंतिम संस्कार करने वाला।
रोने वाले, जलाने वाले और विलाप करने वाले भी चले गए; अब किसे पुकारूँ?
नश्वरता सभी की है। शोक के बीच मानवीय सहारा और जीवन के प्रति करुणा का मूल्य समझें।
साखी ७२७ काल कौ अंग · मूल क्रमांक ३२
जाए = जन्म दिया; चालणहार = जाने वाले; मार = काल का प्रभाव।
जिन्होंने जन्म दिया वे चले गए, हम भी जाने वाले हैं; जो आगे मिलेंगे, वे भी उसी काल-सीमा में हैं।
साथ का समय सीमित है। रहते हुए सेवा, सम्मान और जरूरी बातों को पूरा करें।
४७. सजीवनी कौ अंग
आत्मिक निर्भयता, निर्मल आश्रय और उपकार का जीवन। मूल स्थानीय क्रमांक १–७।
साखी ७२८ सजीवनी कौ अंग · मूल क्रमांक १
जुरा = बुढ़ापा; देसड़ा = आध्यात्मिक आश्रय; बैद = वैद्य।
कबीर उस आश्रय की ओर चलने को कहते हैं जहाँ बुढ़ापे-मृत्यु का भय नहीं और विधाता स्वयं वैद्य हैं।
यह आत्मिक निर्भयता की कल्पना है, देह की अमरता का दावा नहीं। जीवन की सीमाओं के बीच सार पहचानें।
साखी ७२९ सजीवनी कौ अंग · मूल क्रमांक २
कंद मूल = वन का साधारण आहार; असथूल = स्थूलता से परे।
वनवासी योगी कंद-मूल खाता रहा; कवि पूछते हैं किस जड़ी से वह मानो स्थूल बंधन से मुक्त अमर हुआ?
यह योगिक बिंब है। किसी वनस्पति को अमरता की औषधि मानकर उपयोग करने का निर्देश नहीं।
साखी ७३० सजीवनी कौ अंग · मूल क्रमांक ३
गगन मंडल = सूक्ष्म अंतराकाश; आसण = ध्यान की स्थिति।
मोह से टूटकर हरिचरण की ओर चला और अंतराकाश में स्थिर हुआ; काल का भय व्यर्थ रह गया।
भीतर की स्वतंत्रता भय का दबाव घटा सकती है। नश्वर देह की जिम्मेदार देखभाल फिर भी आवश्यक है।
साखी ७३१ सजीवनी कौ अंग · मूल क्रमांक ४
पछाड़ि = वश में कर; आपा = अहं; पिवपिव = प्रिय का स्मरण।
मन का अहं वश में करो; उसकी विषय-दौड़ थमे और प्रिय का स्मरण बने, तो काल का भय पीछे छूटे।
मन को कुचलना नहीं, उसे सजग सहयोगी बनाना सीखें। धैर्यपूर्ण अभ्यास से चंचलता घटती है।
साखी ७३२ सजीवनी कौ अंग · मूल क्रमांक ५
तीषा = तीक्ष्ण; षरसाँण = सान; पाण = पहुँच।
विरह की सान पर मन तीक्ष्ण हुआ और चरणों में ध्यान चुभकर स्थिर हुआ; वहाँ काल का भय नहीं पहुँचता।
एकाग्र प्रेम चित्त को दिशा देता है। रूपक की तीक्ष्णता का अर्थ स्पष्टता है, देह-दंड नहीं।
साखी ७३३ सजीवनी कौ अंग · मूल क्रमांक ६
बिलंबिए = आश्रय लें; फलंत = फल देने वाला; केलि = आनंद।
ऐसे वृक्ष का आश्रय लो जो बारहों महीने फल दे, गहरी छाया रखे और जिसमें पक्षी आनंद पाएँ।
स्थायी हितकारी संग चुनें। जो संकट में भी सद्गुण और सहारा दे, वह वास्तविक आश्रय है।
साखी ७३४ सजीवनी कौ अंग · मूल क्रमांक ७
दाता तरवर = उदार वृक्ष; दिसावराँ = दूसरे प्रदेश।
उदार वृक्ष का फल दया और जीवन उपकार है। पक्षी चले जाएँ, फिर भी वृक्ष फल देता रहता है।
सेवा प्रतिदान की शर्त पर न हो। क्षमता के अनुसार दूसरों के काम आना जीवन की सार्थकता है।
४८. अपारिष कौ अंग
गुण का मूल्य न पहचानने और सार छोड़कर असार चुनने की भूल। मूल स्थानीय क्रमांक १–५।
साखी ७३५ अपारिष कौ अंग · मूल क्रमांक १
पदारथ = मूल्यवान सार; पेलि = फेंककर; बगाँ = बगुलों।
अमूल्य वस्तु छोड़कर कंकड़ लिया, हंस का साथ छोड़ बगुलों में जा बैठा।
क्षणिक चमक के लिए सही संग और मूल मूल्य न गँवाएँ। चुनाव का परिणाम समझें।
साखी ७३६ अपारिष कौ अंग · मूल क्रमांक २
परिषणहारे = पारखी; कौड़ी = बहुत छोटा मूल्य।
हीरा बाजार में बिक रहा है, पर पारखी न होने से कौड़ी के बदले चला जाता है।
गुण का मूल्य हर जगह तुरंत नहीं पहचाना जाता। अपने और दूसरों के सार को सतही लोकप्रियता से न आँकें।
साखी ७३७ अपारिष कौ अंग · मूल क्रमांक ३
गुदड़ी = साधारण कपड़ा; खोटा = असार संग्रह।
जीवन की गुदड़ी बिखरी और सार का सौदा निकल गया; खोट बाँधे रहे तो अंत में कुछ लेने का अवसर नहीं रहा।
संग्रह की गुणवत्ता देखें। समय रहते सत्य और उपयोगी सीख चुनें, केवल बोझ न जोड़ें।
साखी ७३८ अपारिष कौ अंग · मूल क्रमांक ४
पैड़ै = रास्ते में; जोति = विवेक का प्रकाश।
रास्ते में मोती बिखरे हैं, पर देखने की दृष्टि बिना मनुष्य उन्हें पार कर जाता है।
अच्छे अवसर पहचानने के लिए ग्रहणशीलता चाहिए। अहं और जल्दबाजी घटाकर सीख को देखें।
साखी ७३९ अपारिष कौ अंग · मूल क्रमांक ५
चाँम = खाल; अंधी गाइ = विवेकहीन आसक्ति की उपमा।
बछड़ा मर गया, फिर भी गाय उसकी खाल चाटती है; कवि संसार की असावधान आसक्ति को ऐसा कहते हैं।
आत्मीय स्मृति और असत्य पर अटकना अलग हैं। वास्तविक स्थिति स्वीकारकर करुणापूर्वक आगे बढ़ें।
४९. पारिष कौ अंग
विवेक, गुणग्राहक दृष्टि और उचित संग में ज्ञान का आदान-प्रदान। मूल स्थानीय क्रमांक १–३।
साखी ७४० पारिष कौ अंग · मूल क्रमांक १
गाहक = ग्राहक या गुण-पारखी; लाख कौड़ी = मूल्य का अंतर।
गुण का सच्चा पारखी मिले तो उसका बड़ा मूल्य है; न मिले तो वही गुण कौड़ी में आँका जाता है।
बाहरी मूल्यांकन हमेशा न्यायपूर्ण नहीं। अपने कर्म सँवारें और सही सीखने-सिखाने का वातावरण खोजें।
साखी ७४१ पारिष कौ अंग · मूल क्रमांक २
जुणे चुणि = चुन-चुनकर; समंद = समुद्र।
समुद्र की लहर मोती लाती है; बगुला नहीं पहचानता, हंस चुनकर ग्रहण करता है।
ज्ञान उपलब्ध हो तो भी विवेक आवश्यक है। जानकारी में से सत्य और उपयोगी सार चुनना सीखें।
साखी ७४२ पारिष कौ अंग · मूल क्रमांक ३
जौहरी = रत्न-पारखी; साटि = विनिमय; हाटि = बाजार।
हरि हीरा हैं, भक्त जौहरी है; सच्चा पारखी मिले तभी ज्ञानरत्न का उचित विनिमय होगा।
आध्यात्मिक संवाद अनुभव और निष्कपटता से गहरा होता है। केवल प्रचार उसका मूल्य नहीं दिखाता।
५०. उपजणि कौ अंग
खोज, अनुभव, कृतज्ञता और भीतर के नए मूल्य का उदय। मूल स्थानीय क्रमांक १–१२।
साखी ७४३ उपजणि कौ अंग · मूल क्रमांक १
मारगि = मार्ग पर; खड़ाउँ = रोकूँ या सँभालूँ।
जिस गाँव का नाम नहीं जानता, उसी की राह चला हूँ; कल की रुकावट पहले क्यों न पहचानूँ?
लक्ष्य और साधन समझकर आगे बढ़ें। तैयार दावे के बजाय उचित प्रश्न करना विवेक है।
साखी ७४४ उपजणि कौ अंग · मूल क्रमांक २
सीप = सीख या अलग होने का कठिन पाठ; अबिनासी = परम आश्रय।
संसार की आसक्ति से हटकर स्वामी के पास चला; अविनाशी का सहारा मिला और मूल आशा पूरी हुई।
अस्पष्ट पुराने शब्द से अधिक केंद्रीय दिशा समझें। साधना स्वार्थी बंधन घटाकर स्थिर आधार की खोज है।
साखी ७४५ उपजणि कौ अंग · मूल क्रमांक ३
कौतिगहार = आश्चर्य से देखने वाले; इंद्रलोक = दिव्य वैभव का संकेत।
कबीर राम की ओर बढ़े तो इंद्रलोक और ब्रह्मा भी आश्चर्य में पड़ गए—कवि ऐसी विशाल कल्पना करते हैं।
आत्मबोध का मूल्य बाहरी वैभव से ऊपर बताया गया है। कथा-बिंब को विनय के साथ पढ़ें।
साखी ७४६ उपजणि कौ अंग · मूल क्रमांक ४
मेरु = पर्वत; मेर = मेरा-पन; ऊलंधे = पार करके।
साधक ऊँचा उड़कर मेरु का बिंब पार करता है, जबकि जीव मेरा-पन में डूबे रहते हैं।
पर्वत और मेरा-पन की शब्द-क्रीड़ा अहं से आगे बढ़ना कहती है। जन्म या पद की ऊँचाई साधना नहीं।
साखी ७४७ उपजणि कौ अंग · मूल क्रमांक ५
सद पाँणी = ताजा गहरा जल; पावस = बरसाती जल; विलंबे = अटके।
गहरे स्रोत का ताजा जल निकालकर पियो; सतही बासी जल पर निर्भर विषयासक्त जीव संतोष नहीं पाते।
उपमा गहरे ज्ञान और सतही रस का अंतर बताती है। तथ्य समझकर और नियमित अभ्यास से सार ग्रहण करें।
साखी ७४८ उपजणि कौ अंग · मूल क्रमांक ६
मीचौं = मूँदूँ; सुपिनै = स्वप्न में।
स्वप्न में हरि मिले और सोए को जगा दिया। आँख मूँदने से डरता हूँ कि कहीं मिलन स्वप्न बनकर न मिट जाए।
प्रिय अनुभव को सँजोने की कोमल अतिशयोक्ति है। वास्तविक जागरण उसे आचरण और अंतःशांति में टिकाना है।
साखी ७४९ उपजणि कौ अंग · मूल क्रमांक ७
हिरदै = हृदय में; मति = कहीं ऐसा न हो।
गोविंद के गुण हृदय पर लिखे हैं; कवि पानी पीने से भी डरने की कल्पना करते हैं कि वे धुल न जाएँ।
यह स्मृति की आत्मीयता का रूपक है। इसका अर्थ वास्तव में पानी छोड़ना नहीं।
साखी ७५० उपजणि कौ अंग · मूल क्रमांक ८
निरमोलिक = अनमोल; कथीर = साधारण धातु का तुलनात्मक रूप।
पहले साधारण धातु-सा इधर-उधर भटकता था; अब अपने मूल का अनमोल परिचय मिला है।
सच्चा परिवर्तन आत्मसम्मान देता है। उसे दूसरों से श्रेष्ठ होने का अहं न बनने दें।
पाठ-टिप्पणी: वेब में “काच कबीर” है; मुद्रित पृष्ठ १६३ में “काच कथीर” है। कथीर साधारण धातु की तुलना है।
साखी ७५१ उपजणि कौ अंग · मूल क्रमांक ९
भौ समंद = संसार-सागर; सबल सनेही = समर्थ प्रिय।
संसार-सागर विषम जल से भरा है, मन धैर्य नहीं बाँधता; समर्थ प्रिय का सहारा मिला तो कबीर पार हुए।
संकट में सही आश्रय और सहयोग मूल्यवान हैं। भरोसे के साथ विवेकपूर्ण कर्म भी करें।
साखी ७५२ उपजणि कौ अंग · मूल क्रमांक १०
सुहेला = सहज सुख से; पंक = कीचड़; नौका = सहारे का रूपक।
रामनाम की नाव पकड़कर सरलता से पार उतरने का अनुभव हुआ; मोह का जल और कीचड़ भीतर न लगा।
स्मरण जीवन से भागना नहीं। संसार का काम करते हुए आसक्ति और छल से बचना उसका व्यावहारिक सार है।
पाठ-टिप्पणी: वेब में पहले चरण के अंत में विदेशी अक्षर मिल गया है। मुद्रित पृष्ठ १६३ का स्पष्ट “भला सुहेला ऊतरया…” पाठ लिया गया है।
साखी ७५३ उपजणि कौ अंग · मूल क्रमांक ११
केसौ = केशव; सालै = कसकते हैं।
केशव की कृपा से संशय गया; अब वे दिन कसकते हैं जो सार्थक भक्ति के बिना बीत गए।
बीते समय की सीख लें, पर केवल पछतावे में न रहें। वर्तमान में नियमित शुभ अभ्यास अपनाएँ।
साखी ७५४ उपजणि कौ अंग · मूल क्रमांक १२
जाचण = माँगने; अंच = संदर्भ का कठिन रूप; संच = संचय।
याचना को निकला था, आगे प्रिय मिले और अपने आश्रय ले गए; वहाँ बड़ा आत्मिक संचय मिला।
कठिन प्रतिलिपि-पाठ का केंद्रीय भाव अनुग्रह से पूर्णता मिलना है। चाह को कृतज्ञता और सेवा की दिशा दें।
पाठ-टिप्पणी: वेब-पाठ का अंत “भारी खाया खंच” है; मुद्रित पृष्ठ १६३ में “भारी पाया संच” मिलता है। आरंभ का “अंच” कठिन रूप है; उसे अनुमान से नहीं बदला गया है।
५१. दया निरबैरता कौ अंग
जगत की पीड़ा देखना और अपने साथ से धीरज पहुँचाना। मूल स्थानीय क्रमांक १–३।
साखी ७५५ दया निरबैरता कौ अंग · मूल क्रमांक १
दरिया प्रजल्या = समुद्र जल उठा; झोल = चारों ओर; रतन = अमूल्य जीवन।
समुद्र तक जलता और जल-थल दहकता दिखता है; जीवों का अमूल्य रत्न मिटता देख कवि गोपाल से व्यथा कहते हैं।
यह जगत के दुःख की करुण दृष्टि है। साधना दूसरों की पीड़ा के प्रति संवेदनशील और सहायक बनाए।
साखी ७५६ दया निरबैरता कौ अंग · मूल क्रमांक २
ऊँनमि = झुककर या उमड़कर; धाह = दाह; अँगार = जलते कण।
मेघ से जल के बदले अंगारे बरसते हैं; कवि जलते जगत को देखकर उस दाह से उठने को कहते हैं।
उलटी वर्षा संसार के कष्ट की छवि है। हिंसा और द्वेष बढ़ाने के बजाय शांति तथा सहयोग का काम करें।
साखी ७५७ दया निरबैरता कौ अंग · मूल क्रमांक ३
दाध बली = जलते संताप; टुक = थोड़ा।
सब दुःख और तपन से घिरे दिखाई देते हैं; कबीर जहाँ जाएँ, वहाँ कुछ धीरज पहुँचे।
करुणा का फल दूसरों को राहत देना है। अपनी साधना से आसपास का जीवन थोड़ा सरल और सुरक्षित बनाएँ।
५२. सुंदरि कौ अंग
आत्मारूपी नायिका की निष्ठा, मिलन की प्यास और सहज आनंद। मूल स्थानीय क्रमांक १–५।
साखी ७५८ सुंदरि कौ अंग · मूल क्रमांक १
सुंदरि = आत्मारूपी नायिका; कंत = प्रिय; बेगि = शीघ्र।
आत्मारूपी सुंदरी प्रिय से शीघ्र मिलने की उत्कट पुकार करती है और प्राण छोड़ने की चरम काव्य-अतिशयोक्ति कहती है।
भाव विरह की गहराई है, जीवन त्यागने का निर्देश नहीं। प्रेम जीवन की रक्षा, करुणा और सार्थक कर्म में उतरे।
साखी ७५९ सुंदरि कौ अंग · मूल क्रमांक २
विभचार = निष्ठा से भटकना; भरतार = प्रिय स्वामी।
जो सुंदरी जान-बूझकर अपने प्रिय से भटकती है, उसे निष्कपट प्रेम का पूरा आदर कैसे मिले?
नायिका का रूपक साधक की निष्ठा कहता है। इसे स्त्री पर सामाजिक नियंत्रण नहीं, अपने उद्देश्य की समीक्षा समझें।
साखी ७६० सुंदरि कौ अंग · मूल क्रमांक ३
परहरै = छोड़े; आन की आस = अन्य स्वार्थी आश्रय।
जो आत्मा दूसरे स्वार्थों की आशा छोड़ स्वामी को भजती है, प्रिय उसे पलभर अलग नहीं मानते।
यह आध्यात्मिक आत्मीयता का भरोसा है। एकनिष्ठता का फल विनय और निष्काम आचरण बने।
साखी ७६१ सुंदरि कौ अंग · मूल क्रमांक ४
मैदा = महीन आटा; नान्हाँ = सूक्ष्म; सीस = भीतर का उच्च केंद्र।
मन के अहं को मैदे जैसा महीन करो; तब आत्मा को सुख और ब्रह्म का प्रकाश अनुभव हो।
पीसना भीतर की कठोरता का रूपक है। आत्मदंड के बजाय नम्रता और ग्रहणशीलता विकसित करें।
साखी ७६२ सुंदरि कौ अंग · मूल क्रमांक ५
हिंडोलना = झूला; सुलषणी = सद्गुणी।
प्रिय ने हरियाली में झूला सजाया; गुणवान आत्मारूपी नायिका प्रतिदिन वहाँ आत्मीय आनंद लेने जाती है।
प्रेम कोमल नियमितता में भी है। साधना केवल कठिन संघर्ष नहीं, अंतःशांति और कृतज्ञ आनंद का क्षेत्र है।
५३. कस्तूरियाँ मृग कौ अंग
बाहरी भटकाव से अपने भीतर की व्यापक उपस्थिति की ओर लौटना। मूल स्थानीय क्रमांक १–९।
साखी ७६३ कस्तूरियाँ मृग कौ अंग · मूल क्रमांक १
कुंडलि = मृग की नाभि का सुगंध-स्रोत; घटि = हृदय में।
कस्तूरी अपने भीतर है, फिर भी मृग वन में खोजता है; वैसे ही राम सबके भीतर हैं, पर दुनिया पहचानती नहीं।
निकट के सत्य को बाहरी भटकाव ढक सकता है। भीतर की सजगता और आत्मपरीक्षण विकसित करें।
साखी ७६४ कस्तूरियाँ मृग कौ अंग · मूल क्रमांक २
पाँचूँ हाथि = पाँच इंद्रियाँ वश में; संत = सजग साधक।
विरला सजग व्यक्ति भीतर की उपस्थिति देखता है; इंद्रियों के वश मन को उसका साथ स्पष्ट नहीं होता।
संयम ध्यान को दिशा देता है। इंद्रियाँ दमन की वस्तु नहीं, विवेकपूर्ण उपयोग की क्षमता हैं।
साखी ७६५ कस्तूरियाँ मृग कौ अंग · मूल क्रमांक ३
भ्रम्यों = भटकता; तास = उसका।
स्वामी तन के भीतर हैं, लेकिन भटका मन नहीं जानता; कस्तूरी-मृग की तरह घास सूँघता फिरता है।
हर नया आकर्षण मूल संतोष नहीं देता। रुककर अपनी वास्तविक आवश्यकता और मूल्य पहचानें।
साखी ७६६ कस्तूरियाँ मृग कौ अंग · मूल क्रमांक ४
सिंघल दीप = दूर देश का बिंब; परतीत = विश्वास और पहचान।
राम को खोजने दूर द्वीप गया, जबकि वे घट के भीतर हैं; सच्ची पहचान जागे तो दूरी मिटे।
यात्रा उपयोगी हो सकती है, पर भीतर की तैयारी उसका विकल्प नहीं। आत्मबोध की खोज निकट भी है।
साखी ७६७ कस्तूरियाँ मृग कौ अंग · मूल क्रमांक ५
घटि बधि = कम-अधिक; भरपूरि = व्यापक।
ब्रह्म की उपस्थिति को कहीं कम, कहीं अधिक मत समझो; जिसने जाना उसे निकट है, दूरी मानने वाले दूर कहते हैं।
सभी प्राणियों के प्रति समान गरिमा का भाव रखें। ज्ञान का उपयोग ऊँच-नीच बढ़ाने में न हो।
साखी ७६८ कस्तूरियाँ मृग कौ अंग · मूल क्रमांक ६
नेड़ा = निकट; आप पिछाँणै = स्वयं को पहचानना।
मैंने हरि को दूर समझा, पर वे सर्वत्र हैं। अपनी पहचान न होने से निकट का भी दूर लगा।
देखने की रीति बदलना कभी खोज का बड़ा परिवर्तन है। पूर्वाग्रह और अहं का आत्मपरीक्षण करें।
साखी ७६९ कस्तूरियाँ मृग कौ अंग · मूल क्रमांक ७
ओल्हे = आड़ में; तिणका = छोटा आवरण; परचा = परिचय।
राम पर तिनके-जितना आवरण है, पर मन पर्वतों में खोजता है; गुरु से परिचय हुआ तो भीतर मिले।
बड़ी बाहरी बाधा से पहले छोटे आंतरिक आग्रह देखें। सही सीख दृष्टि का आवरण हटा सकती है।
साखी ७७० कस्तूरियाँ मृग कौ अंग · मूल क्रमांक ८
चतुराई = केवल बौद्धिक चतुरता; तिहूँ लोक = समस्त विस्तार।
राम का सार सर्वत्र भरा है; उसे दूर ढूँढ़ते रहने वाली चतुराई से क्या लाभ?
बहुत जानकारी के साथ सरल ग्रहणशीलता भी हो। जीवन के निकट सत्य और करुणा को अनदेखा न करें।
साखी ७७१ कस्तूरियाँ मृग कौ अंग · मूल क्रमांक ९
पूतली = पुतली; खालिक = स्रष्टा; घट = अंतःकरण।
जैसे आँख में पुतली है, वैसे अंतःकरण में स्रष्टा की उपस्थिति है; असावधान लोग बाहर ही ढूँढ़ते हैं।
बाहरी उपासना के साथ भीतर विनय, ध्यान और निर्मल व्यवहार का अभ्यास करें।
५४. निंद्या कौ अंग
दोष-दर्शन, आत्मपरीक्षण, आलोचना से सीख और दूसरों को न ठगना। मूल स्थानीय क्रमांक १–९।
साखी ७७२ निंद्या कौ अंग · मूल क्रमांक १
नींदई = निंदा करता; आँन = दूसरी असार बात।
जिसे गहरी समझ नहीं मिली, वह निंदा करता है; रामनाम में रमे साधक का मन ऐसी असार बात में नहीं लगता।
हर आलोचना अज्ञान नहीं। सत्य सुझाव ग्रहण करें, लेकिन निरर्थक विवाद में अपना अभ्यास न खोएँ।
साखी ७७३ निंद्या कौ अंग · मूल क्रमांक २
दोख = दोष; च्यँति = ध्यान में; आदि न अंत = बहुत।
दूसरे के दोष देखकर हँसता चलता है, पर अपने अनगिनत दोष ध्यान में नहीं आते।
दूसरों की समीक्षा से पहले आत्मपरीक्षण करें। गलती पहचानने का उद्देश्य सुधार हो, अपमान का आनंद नहीं।
साखी ७७४ निंद्या कौ अंग · मूल क्रमांक ३
नेड़ा = पास; आँगणि = आँगन; सुभाइ = स्वभाव।
निंदक को पास रखो, वह बिना साबुन-पानी स्वभाव की सफाई में सहायता करता है।
आलोचना से उपयोगी सत्य चुनें। इस अतिशयोक्ति का अर्थ लगातार अपमान या उत्पीड़न सहना नहीं है।
साखी ७७५ निंद्या कौ अंग · मूल क्रमांक ४
आँनहिं आँन = तरह-तरह की बातें; माँन = सम्मान।
कटु बातें कहने वाला भी दोष दिखाकर मन-तन को निर्मल करने का अवसर दे सकता है; उसे तुरंत दूर मत धकेलो।
सुनकर तथ्य परखें और उचित सुधार करें। गलत आरोप को स्वीकारना आवश्यक नहीं।
साखी ७७६ निंद्या कौ अंग · मूल क्रमांक ५
संकटि = संकट में; नींदे = निरर्थक निंदा करे।
कवि सज्जन की दुर्भावनापूर्ण निंदा को गंभीर कर्मदोष कहते हैं, जिसका फल संकट की छवि में बताते हैं।
यह नैतिक चेतावनी है। सही प्रश्न और तथ्यपरक आलोचना को निंदा कहकर दबाना भी उचित नहीं।
साखी ७७७ निंद्या कौ अंग · मूल क्रमांक ६
नींदिये = तुच्छ समझें; दुहेली = पीड़ादायक।
पैर तले घास को भी तुच्छ न मानो; उड़कर आँख में पड़े तो कठिन पीड़ा देती है।
छोटे समझे जाने वाले का भी सम्मान करें। विनय और संवेदनशीलता अहं के अनावश्यक टकराव बचाती है।
साखी ७७८ निंद्या कौ अंग · मूल क्रमांक ७
रंक = निर्धन या तुच्छ; करंक = अस्थि-पंजर।
अपने को बढ़ाकर और दूसरों को तुच्छ कहकर मत बोलो; अंत में अपना शरीर किस पेड़ तले धूल होगा, नहीं जानते।
समान नश्वरता विनय सिखाती है। पद और संपत्ति के कारण दूसरे की गरिमा कम न करें।
साखी ७७९ निंद्या कौ अंग · मूल क्रमांक ८
ठगाइये = हानि सह लेना; ठगिये = छल करना।
दूसरे को छलने के बजाय स्वयं छोटी हानि सह लेना भला है; छल करने से मन का दुःख बढ़ता है।
यह ईमानदारी का आग्रह है, शोषण का निमंत्रण नहीं। बिना छल के भी उचित सीमा और अपना अधिकार रखा जा सकता है।
साखी ७८० निंद्या कौ अंग · मूल क्रमांक ९
आपौ रोइ = आत्मीय होकर कहूँ; चरनूँ = चरणों पर।
अब स्वामी मिलें तो चरणों में सिर रखकर भीतर की सारी व्यथा कहूँ।
प्रार्थना में मन की वास्तविक स्थिति रखने का स्थान है। आत्मीयता के साथ सहायता और सुधार के उचित कदम भी उठाएँ।
५५. निगुणाँ कौ अंग
ग्रहणशीलता और कठोरता; गुण, विनय तथा सीख का वास्तविक प्रभाव। मूल स्थानीय क्रमांक १–१२।
साखी ७८१ निगुणाँ कौ अंग · मूल क्रमांक १
रूषड़ा = वृक्ष; बूठा मेह = बरसी वर्षा।
हरा वृक्ष पानी का प्रेम जानता है, सूखी लकड़ी वर्षा का वही रस नहीं लेती।
सीख ग्रहण करने की जीवंतता महत्त्वपूर्ण है। भीतर रुचि और विनय हों तो मार्गदर्शन फलता है।
साखी ७८२ निगुणाँ कौ अंग · मूल क्रमांक २
झिरिमिरि = धीमी वर्षा; सैंजल = भीगी; तेह = उसी दशा में।
पत्थर पर वर्षा हुई, मिट्टी भीगकर नरम हुई, पर पत्थर कठोर ही रहा।
एक ही सीख का प्रभाव अलग हो सकता है। अपने मन की कठोरता और ग्रहणशीलता पहचानें।
साखी ७८३ निगुणाँ कौ अंग · मूल क्रमांक ३
सगुराँ = मार्गदर्शन ग्रहण करने वाले; निगुराँ = सीख से विमुख; सिषराँह = शिखरों पर।
परब्रह्म के मोती बरसे; योग्य मार्गदर्शन वाले उन्हें चुन पाए, असजग अवसर चूक गए।
यह जन्मगत श्रेष्ठता नहीं, सीख की तैयारी का बिंब है। गुरु चुनने और सीख अपनाने दोनों में विवेक रखें।
साखी ७८४ निगुणाँ कौ अंग · मूल क्रमांक ४
गिर डूँगर = पहाड़; मिबाणाँ = नीचे ठहरने का कठिन पुराना रूप।
हरिरस पर्वतों पर बरसा, पर जल नीचे ठहरता है; ऊँचा खड़ा रहना ग्रहण करने का आधार नहीं।
विनम्रता में सीख टिकती है। ज्ञान या पद का अभिमान भीतर का पात्र खाली रख सकता है।
साखी ७८५ निगुणाँ कौ अंग · मूल क्रमांक ५
मूँडठ = मूढ़; पाषर = कवच; बाँहणहारा = बाण चलाने वाला।
अज्ञान का कवच इतना कठोर हो तो हितकारी बाण भी भीतर नहीं लगता; समझाने वाला क्या करे?
परिवर्तन के लिए स्वयं ग्रहणशील होना जरूरी है। अपनी रक्षा में हर सुझाव न ठुकराएँ।
साखी ७८६ निगुणाँ कौ अंग · मूल क्रमांक ६
उरझि सुरझा = उलझन सुलझी; सुपहला दिन = अभी शुभ अवसर।
कहते-सुनते दिन बीत गए, मन की उलझन न सुलझी। फिर भी अभी चेतने का अच्छा अवसर है।
बीते समय पर अटकने के बजाय आज से अभ्यास शुरू करें। थोड़ी सच्ची सीख भी दिशा बदल सकती है।
साखी ७८७ निगुणाँ कौ अंग · मूल क्रमांक ७
कठोर कै = कठोर हृदय में; सार = प्रभाव; सुधबुध = सजग विवेक।
कठोर मन में शब्द का सार नहीं उतरता; सजग हृदय में वह भेदकर विवेकपूर्ण विचार जगाता है।
सीखने के लिए नम्रता रखें। असुविधाजनक सत्य सुनकर शांत मन से उसकी उपयोगिता जाँचें।
साखी ७८८ निगुणाँ कौ अंग · मूल क्रमांक ८
सीतलता = शांति; बिलंबे = आश्रय लिया; बिष = विकार।
शांति पाने आए, पर रोम-रोम में विकार भरे हैं; ऐसे भरे पात्र में अमृत कहाँ समाए?
बाहरी शांति की इच्छा के साथ भीतर के द्वेष और लोभ पर काम करें। केवल वातावरण बदलना पर्याप्त नहीं।
साखी ७८९ निगुणाँ कौ अंग · मूल क्रमांक ९
सरपहि = सर्प को; दूध बिष = गुण का विकृति में बदलना।
सर्प को दूध दें तो भी उसकी विष-वृत्ति नहीं बदलती; उसकी जड़ का विष मिटाने वाला विरला है—कवि की लोक-उपमा है।
यह व्यवहार का रूपक है, सर्प को दूध देने का निर्देश नहीं। सहायता के साथ वास्तविक प्रवृत्ति और परिणाम देखें।
पाठ-टिप्पणी: इसी क्रमांक से पहले “पसुआ सौ पानी…” ख-प्रति का अतिरिक्त पद है। यहाँ मुख्य क्रमांक ९ सर्प-दूध की उपमा वाला है; यह लोककाव्य है, पशु-देखभाल की सलाह नहीं।
साखी ७९० निगुणाँ कौ अंग · मूल क्रमांक १०
बड़पणाँ = केवल ऊँचाई; बीसवै = बैठें या विश्राम करें।
खजूर की निष्फल बड़ाई किस काम की? पक्षी को छाया नहीं और फल भी दूर हैं।
पद और ऊँचाई का मूल्य उपयोगिता से है। अपनी क्षमता दूसरों के काम आए तो उसका सार बढ़ता है।
साखी ७९१ निगुणाँ कौ अंग · मूल क्रमांक ११
कूल = कुल; बंस = बाँस और वंश की शब्द-क्रीड़ा; बास = सुगंध।
बाँस अपने ऊँचे होने के अभिमान में चंदन की सुगंध नहीं ग्रहण करता और आग से समूह जला सकता है।
जन्म या समूह की श्रेष्ठता सीखने में बाधा न बने। अहं का नुकसान आसपास के लोगों तक पहुँचता है।
साखी ७९२ निगुणाँ कौ अंग · मूल क्रमांक १२
निड़ै = पास; नींव = नीम का पाठ-रूप; बड़ाइताँ = गर्व में।
चंदन के पास नीम भी सुगंध से प्रभावित हो सकती है; बाँस जैसा अभिमान लेकर मत डूबो।
हितकारी संगति का लाभ लेने को ग्रहणशील बनें। कठोरता छोड़कर अच्छे गुण सीखना प्रगति है।
५६. बीनती कौ अंग
क्षमा, सहायता, आत्मपरीक्षण और प्रिय से निष्कपट संवाद। मूल स्थानीय क्रमांक १–७।
साखी ७९३ बीनती कौ अंग · मूल क्रमांक १
कुसलात = हालचाल; उर = हृदय।
स्वामी मिलेंगे और कुशल पूछेंगे; तब अपने आरंभ से अंत तक हृदय की बात कहूँगा।
प्रार्थना आत्मीय संवाद है। उसमें अपनी सफलता के साथ गलती और अधूरापन भी निष्कपट रखें।
साखी ७९४ बीनती कौ अंग · मूल क्रमांक २
नफर = सेवक; गरवा = समर्थ और उदार; लोड़िये = तलाशें।
मैं भूल से काम बिगाड़ता हूँ; हे स्वामी, मन मैला न करो। सेवक चूकता है, उदार स्वामी का सहारा चाहिए।
क्षमा माँगने के साथ गलती सुधारने का प्रयत्न हो। आत्मीय भरोसा जिम्मेदारी से मुक्त नहीं करता।
साखी ७९५ बीनती कौ अंग · मूल क्रमांक ३
औगुण = दोष; दिल खोजौ = आत्मपरीक्षण करूँ।
कर्ता में अनेक गुण देखता हूँ; अपना हृदय जाँचूँ तो दोष मुझमें मिलते हैं।
यह विनय का कथन है, आत्मघृणा नहीं। अपनी गलतियाँ मानकर सुधारें और दूसरों के गुण पहचानें।
साखी ७९६ बीनती कौ अंग · मूल क्रमांक ४
अलपतन = थोड़ा जीवनकाल; केसवाँ = केशव; अंदेस = संशय।
छोटा जीवन बीता और प्रिय दूर अनुभव हुए; हे केशव, कलंक और संशय का आवरण हटाओ।
अनुग्रह की याचना के साथ अपना मन साफ करें। व्यर्थ ग्लानि के बजाय सत्य और सुधार की दिशा लें।
साखी ७९७ बीनती कौ अंग · मूल क्रमांक ५
बीनती = विनती; बरिज = रोक; भौसागर = जीवन की कठिनाई।
हे स्वामी, संसार-सागर में जीव पर भारी दबाव है; काल-भय रोककर सहायता करो—कबीर प्रार्थना करते हैं।
असहायता में प्रार्थना साहस दे सकती है। साथ ही उचित मानवीय सहायता ग्रहण करना भी महत्त्वपूर्ण है।
साखी ७९८ बीनती कौ अंग · मूल क्रमांक ६
मीराँ = स्वामी; खता = भूल; पीर = प्रिय मार्गदर्शक।
कबीर तीर्थ और हज की भाषा में पूछते हैं—इतना खोजने पर भी तुम मौन क्यों हो, मेरी क्या भूल है?
यह भक्त की आत्मीय उलाहना है। बाहरी यात्राओं के साथ अपनी भीतर की तैयारी की समीक्षा करें।
साखी ७९९ बीनती कौ अंग · मूल क्रमांक ७
ताता लोहा = तपता लोहा; संधि = जोड़।
मेरा मन जैसा तुमसे जुड़ा है, तुम्हारा भी वैसा हो तो तपे लोहे के जुड़ने की तरह कोई अलग जोड़ न दिखे।
मिलन की उपमा पूर्ण आत्मीयता कहती है। संबंध में निष्कपटता और परस्पर सम्मान उसका व्यावहारिक रूप हैं।
पाठ-टिप्पणी: वेब-पाठ के “लोबा” को मुद्रित पृष्ठ १६९ के “लोहा” से मिलाया गया है।
५७. साषीभूत कौ अंग
कार्य करते हुए साक्षीभाव, निर्लिप्तता और हितकारी वाणी। मूल स्थानीय क्रमांक १–३।
साखी ८०० साषीभूत कौ अंग · मूल क्रमांक १
साषीभूत = साक्षीभाव; भवनपति = समस्त जगत के स्वामी।
कबीर राम से पूछते हैं—सब कार्य करते हुए भीतर निर्लिप्त रहने की विधि बताओ।
कर्तव्य और आसक्ति अलग हैं। कर्म में पूरे मन से रहें, पर लाभ-हानि के अहं में न बँधें।
साखी ८०१ साषीभूत कौ अंग · मूल क्रमांक २
बरियाँ = समय; ठौर = स्थान; सबद = हितकारी वचन।
जिस क्षण स्वामी का बोध हो, उसका अंतरंग अनुभव सब नहीं जानते; अपने-अपने स्थान से सबको सुख देने वाले वचन कहो।
अंतःअनुभव का श्रेष्ठ फल उदार व्यवहार है। अपनी साधना से दूसरों के जीवन में शांति बढ़ाएँ।
साखी ८०२ साषीभूत कौ अंग · मूल क्रमांक ३
बाहुला = असंयमित मन; दह = गहरा जल या भँवर; दोस = दोष।
असावधान मन अपनी ही धारा में बहकर गहरे संकट में गिरता है; फिर किसे दोष दें?
अपने निर्णयों की जिम्मेदारी लें। दूसरों को दोष देने से पहले अपनी इच्छा और प्रतिक्रिया देखें।
पाठ-टिप्पणी: वेब में “ऊँचा” है; मुद्रित पृष्ठ १६९ में “ऊंडा” मिलता है। अर्थ में मन के असावधान बहाव और गहरे संकट का केंद्रीय संकेत है।
५८. बेलि कौ अंग
आसक्ति के बीज और परिवर्तन की कठिनाइयों की उलटबाँसियाँ। मूल स्थानीय क्रमांक १–६।
साखी ८०३ बेलि कौ अंग · मूल क्रमांक १
जालण = जलाने के लिए; कूँपल = नई कोंपल।
जिस लकड़ी को समाप्त समझकर जलाने लाया था, उसी में फिर कोंपल उठी; आसक्ति की बेल का यह उलटा स्वभाव है।
ऊपर से दबा दोष फिर उग सकता है। उसकी जड़ और पोषण समझकर धैर्य से सुधार करें।
साखी ८०४ बेलि कौ अंग · मूल क्रमांक २
दौं = वनाग्नि; विरष = वृक्ष; जड़ काटना = मोह छोड़ना।
आगे आग जलती है, पीछे हरियाली उठती है; ऐसे अनोखे वृक्ष की जड़ कटने पर भी फल का रहस्य है।
उलटबाँसी मोह और आध्यात्मिक परिवर्तन की जटिलता बताती है। केवल बाहरी नाश को वास्तविक मुक्ति न मानें।
साखी ८०५ बेलि कौ अंग · मूल क्रमांक ३
डहडही = फिर हरी हो; गुणवंती = विचित्र गुण वाली।
ऐसी बेल है जो काटने पर बढ़ती और सींचने पर कुम्हलाती है; उसके उलटे गुण साधारण कथन से नहीं समझते।
यह सीधा बागवानी निर्देश नहीं। साधना में दबाव, अहं और सही अंतर्दृष्टि के अलग प्रभावों पर मनन करें।
पाठ-टिप्पणी: इस पद से पहले गलती से जुड़ा “ख-दौं बलै” पिछले पद का पाठांतर है; उसे मुख्य साखी से अलग किया गया है।
साखी ८०६ बेलि कौ अंग · मूल क्रमांक ४
अण ब्यावर = बिना ब्याई; ससा सींग = खरगोश के सींग; बाँझ का पूत = असंभव कल्पना।
आँगन की बेल का आकाश में फल, बिना ब्याई का दूध और खरगोश के सींग जैसे असंभव चित्र दिए हैं।
उलटबाँसी साधारण तर्क की सीमा दिखाती है। उसके संकेत को ध्यान और मनन से समझें, वास्तविक घटना न बनाएँ।
साखी ८०७ बेलि कौ अंग · मूल क्रमांक ५
कड़ई बेलड़ी = कटु आसक्ति की बेल; बिछोहा = अलगाव।
कड़वी बेल का फल कड़वा होगा; उससे अलग होने पर साधना का सच्चा नाम सार्थक है।
परिणाम सुधारने के लिए कारण बदलना होगा। पुरानी हानिकारक आदत बचाकर केवल अच्छे फल की अपेक्षा न रखें।
साखी ८०८ बेलि कौ अंग · मूल क्रमांक ६
सींध = सिद्धि या सिद्ध-अवस्था का कठिन रूप; बास = प्रसिद्धि या सुगंध।
चारों ओर प्रसिद्धि फैल गई तो क्या, यदि भीतर इच्छा का बीज और फिर उगने की संभावना बाकी है?
उपलब्धि और प्रशंसा के बाद भी आत्मपरीक्षण जरूरी है। छिपा अहं और लालसा नए रूप में लौट सकते हैं।
पाठ-टिप्पणी: वेब और मुद्रित संदर्भ में “सींध” कठिन रूप है। उसके आशय को संदर्भानुसार सिद्ध-अवस्था तथा प्रसिद्धि माना गया है; मूल शब्द अनुमान से नहीं बदला गया।
५९. अबिहड़ कौ अंग
अखंड आश्रय, स्थिर हित और न बिछुड़ने वाली आध्यात्मिक आत्मीयता। मूल स्थानीय क्रमांक १–३।
साखी ८०९ अबिहड़ कौ अंग · मूल क्रमांक १
अबिहड़ = न बिछुड़ने वाला; हिलि मिलि = आत्मीय होकर।
मैंने ऐसा साथी चुना जो सुख-दुःख के बदलते द्वंद्व से परे है; उससे ऐसी आत्मीयता है जिसमें बिछोह नहीं।
अंतिम आश्रय की स्थिरता का भक्तिपूर्ण अनुभव है। उससे भीतर धैर्य और बाहर करुणामय सहभागिता बढ़े।
साखी ८१० अबिहड़ कौ अंग · मूल क्रमांक २
हितू = हितैषी; बिहड़ै = अलग हो; लोइ = संसार।
स्रष्टा जैसा स्थिर हितैषी नहीं; वह गुण-दोष में साथ नहीं छोड़ता, जबकि संसार के कई संबंध स्वार्थ से बँधे हैं।
अनुग्रह पर भरोसा सुधार का साहस दे। किसी मानवीय संबंध को निरर्थक मानने के बजाय निष्काम आत्मीयता निभाएँ।
साखी ८११ अबिहड़ कौ अंग · मूल क्रमांक ३
आदि मधि अंत = आरंभ, बीच और अंत; अभंग = अखंड।
परम आश्रय आरंभ से अंत तक अखंड और अविच्छिन्न है; उसका सेवक इस संग को नहीं छोड़ता।
श्रृंखला का समापन स्थिर निष्ठा में है। स्मरण, सत्य, प्रेम और सेवा को जीवन के बदलते समय में बनाए रखें।
अंतिम भाग से मनन के सात सूत्र
- अर्थ सहित स्मरण: नाम के शब्द के साथ उसके गुण और सीख जीवन में उतरें।
- शीतल वाणी: सत्य स्पष्ट हो और दूसरे की गरिमा भी सुरक्षित रहे।
- विश्वास में विनय: प्रयत्न करें, पर अपने अहं को अकेला कर्ता न मानें।
- अंतर का साहस: दूसरों से लड़ने से पहले अपने काम, क्रोध और छल को पहचानें।
- समय का उपयोग: शुभ कर्म और आवश्यक संवाद कल पर न टालें।
- करुणा का फल: जहाँ जाएँ, वहाँ किसी का दुःख थोड़ा हलका हो।
- अखंड निष्ठा: बदलती परिस्थितियों में सत्य, प्रेम और सेवा का संग बना रहे।
श्रृंखला के समापन पर सामान्य प्रश्न
तीसरे भाग में कितनी साखियाँ हैं?
अंग ३३–५९ के २७ पूरे अंगों में २७१ मुख्य क्रमांकित पद हैं। इस लेख-श्रृंखला के संयुक्त क्रमांक ५४१–८११ हैं। हर पद का मूल अंग-क्रमांक भी साथ है।
८०९ के बजाय अंतिम क्रमांक ८११ क्यों है?
ये हमारे लेखों के संपादकीय क्रमांक हैं। संदर्भ-वेब-पाठ के संचयी योग में अंकगणित का अंतर है: अंग ३२ के ५४० में अंग ३३ के ११ पद जोड़ने पर ५५१ बनता है, जबकि वहाँ ५४९ छपा है। हमने पद हटाकर योग मिलाने के बजाय स्पष्ट क्रम और मूल स्थानीय पहचान रखी है। गिनती की पूरी टिप्पणी पढ़ें।
क्या अब पूरा कबीर साहित्य हो गया?
यह मुख्य ५९-अंगीय साखी-पाठ की तीन-भागीय श्रृंखला का समापन है। कबीर के पद, भजन, रमैनी, अलग परिशिष्ट और अन्य पाठ-परंपराएँ व्यापक सामग्री हैं; उन्हें पूरा होने का दावा इसमें नहीं है।
पहले दो भाग कहाँ पढ़ें?
भाग १: अंग १–१२ और भाग २: अंग १३–३२ प्रकाशित हैं। ऊपर और नीचे उनके सीधे लिंक दिए गए हैं।
‘जीवन मृतक’ और ‘सिर देना’ कैसे समझें?
ये अहं, ममता और स्वार्थ का आग्रह छोड़ने के रूपक हैं। शारीरिक आत्महानि उनके व्यावहारिक अर्थ नहीं हैं। भक्ति जीवन में विनय, करुणा और जिम्मेदारी बढ़ाए।
ऐतिहासिक सती-दाह के चित्र क्यों रखे हैं?
मूल साहित्य को बदलकर छिपाने के बजाय उसका संदर्भ स्पष्ट किया गया है। यह हानिकारक ऐतिहासिक प्रथा अनुकरणीय नहीं। आध्यात्मिक निष्ठा जीवन और मानवीय गरिमा की रक्षा के साथ समझी गई है।
क्या हर व्याख्या एकमात्र अंतिम अर्थ है?
नहीं। संत-भाषा, योगिक संकेत और उलटबाँसी के अनेक अर्थ हो सकते हैं। यहाँ सरल अध्ययन-सहायक स्वतंत्र व्याख्या है; कठिन और बदले पाठ पर स्रोत-टिप्पणी दी गई है।
संदर्भ-पाठ और संपादन की जानकारी
आधार: श्यामसुंदर दास संपादित कबीर ग्रंथावली का मुख्य साखी-पाठ—अंग ३३–५९।
- हिंदी समय: ग्रंथावली का अनुक्रम और संपादकीय परिचय
- हिंदी समय: पूरा मुख्य साखी-पाठ और वैकल्पिक प्रति-टिप्पणियाँ
- कविता कोश: कुसबद के मुख्य और वैकल्पिक पहले पद का अंतर
- कविता कोश: गुरु-शिष्य अंग के मुख्य १३ पद और अतिरिक्त प्रति-पाठ
- मुद्रित ग्रंथ: प्रेम और भक्ति के रूपक, सूरा तन अंग
- मुद्रित ग्रंथ: ऐतिहासिक सती-बिंब और सूरा तन का अंत
- मुद्रित ग्रंथ: उपजणि के तुलनात्मक पद
- मुद्रित ग्रंथ: निगुणाँ के मुख्य और अतिरिक्त पाठ
- मुद्रित ग्रंथ: बीनती और साषीभूत का पाठ
- मुद्रित ग्रंथ: बेलि और अबिहड़ के समापन पद
अंगवार गिनती: क्रमशः ११, १०, २१, ४, १०, १२, ४, ८, १४, ३, १३, ४, ४१, ३२, ७, ५, ३, १२, ३, ५, ९, ९, १२, ७, ३, ६ और ३ मुख्य पद—कुल २७१। संयुक्त क्रमांक ५४१–८११ संपादकीय सुविधा के हैं।
पाठांतर की सीमा: ख-प्रति के अतिरिक्त पद मुख्य क्रम से अलग रखे गए हैं। कुसबद के पहले पद, गुरु-शिष्य के पूरे १२–१३ पद, निगुणाँ के मुख्य ८–९ और बेलि के अंतिम मुख्य क्रम की पहचान इसी आधार पर की गई है। स्रोत के भीतर विषयगत रूप से दोहराए पद जहाँ हैं, उनका मूल स्थान नहीं बदला गया।
संपादन: वेब की अनावश्यक रिक्तियाँ और पंक्ति-विभाजन व्यवस्थित किए गए हैं। स्पष्ट मिश्रित अक्षर, छूटा निषेध और शब्द-विकृति जहाँ सुधारी गई है, संबंधित पद पर मुद्रित संदर्भ दिया गया है। कठिन शेष शब्दों को अनुमान से नया मूल पाठ नहीं बनाया गया। यह सरल पाठक-संस्करण है, सभी पांडुलिपियों का आलोचनात्मक संस्करण नहीं।
अर्थ: कठिन शब्दार्थ, सरल अर्थ और जीवन-संदेश स्वतंत्र व्याख्याएँ हैं। उन्हें कबीर की अतिरिक्त मूल पंक्तियाँ या किसी अन्य टिप्पणीकार की शब्दशः टीका न समझें।
तीन भागों की यात्रा—ज्ञान, प्रेम और करुणा
गुरु के प्रकाश से आरंभ होकर यह साखी-यात्रा अखंड आत्मीय संग पर ठहरती है। पढ़े हुए शब्द तभी जीवन का सार बनते हैं जब उनसे सत्य, विवेक, नम्रता और दूसरों के प्रति करुणा बढ़े।
इस भाग के साथ मुख्य ५९-अंगीय साखी-पाठ का निर्धारित तीन-भागीय अध्ययन पूरा होता है।
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