भक्ति भावना एक डिजिटल भक्ति मंच है, जहाँ आपको भजन, आरती, हनुमान चालीसा, मंत्र, स्तोत्र, व्रत-त्योहार, धार्मिक कथाएँ, रामचरितमानस प्रसंग, श्रीराम, हनुमान जी, शिव जी, श्रीकृष्ण एवं सनातन धर्म से जुड़ी उपयोगी और प्रमाणिक जानकारी सरल हिंदी में पढ़ने को मिलेगी। हमारा उद्देश्य भक्ति, धर्म और भारतीय संस्कृति को डिजिटल माध्यम से जन-जन तक पहुँचाना है।
श्रीरामचरितमानस अरण्यकाण्ड सम्पूर्ण | दोहा 1–46, शबरी नवधा भक्ति व सीताहरण | मूल पाठ हिंदी अर्थ सहित
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भक्ति भावना · गोस्वामी तुलसीदास कृत श्रीरामचरितमानस
अरण्यकाण्ड सम्पूर्ण
मंगलाचरण से दोहा 46 (क–ख) तक मूल पाठ और सरल हिंदी अर्थ · एक ही विस्तृत भाग
इस पाठ में क्या मिलेगा?
जयंत का उद्धार, अत्रि की स्तुति, अनुसूया–सीता संवाद, शरभंग और सुतीक्ष्ण, राम–लक्ष्मण संवाद, शूर्पणखा, खर-दूषण वध, सीताहरण, जटायु का उद्धार, शबरी की नवधा भक्ति, पंपा सरोवर और नारद-संवाद का क्रमबद्ध मूल पाठ यहाँ एक ही लेख में है।
प्रत्येक क्रमांक में आने वाली चौपाइयाँ, स्तुतियाँ, छंद तथा दोहा/सोरठा मूल क्रम में हैं। नीचे दिया अर्थ उस पूरे प्रसंग का स्वतंत्र रूप से लिखा समेकित सरल हिंदी अर्थ है, शब्द-शब्द अनुवाद नहीं। पात्रों के संवाद और उनके संदर्भ को साथ पढ़ें।
धर्म के वृक्ष की जड़, विवेक के समुद्र को आनंद देने वाले चंद्रमा, वैराग्य के कमल को खिलाने वाले सूर्य और अज्ञान-पाप का अंधकार दूर करने वाले भगवान शंकर को प्रणाम है। वे कलंक मिटाने वाले और श्रीराम को प्रिय हैं।
आनंदघन, मेघ के समान श्याम, पीत वस्त्रधारी, धनुष-बाण और तरकस से युक्त, कमल जैसे नेत्र तथा जटाजूट से शोभित श्रीराम का स्मरण है। वे सीताजी और लक्ष्मणजी सहित वनमार्ग में चल रहे हैं।
उमा राम गुन गूढ़ पंडित मुनि पावहिं बिरति।
पावहिं मोह बिमूढ़ जे हरि बिमुख न धर्म रति ॥
आरंभिक सोरठे का सरल अर्थ
शिव उमा से कहते हैं कि राम के गुण गूढ़ हैं। उन्हें समझकर ज्ञानी और मुनि वैराग्य पाते हैं, जबकि हरि से विमुख और धर्म से अनुराग न रखने वाले मोह में पड़ते हैं।
अरण्यकाण्ड · क्रमांक 1
जयंत की धृष्टता
चौपाइयाँ — मूल पाठ
पुर नर भरत प्रीति मैं गाई। मति अनुरूप अनूप सुहाई ॥
अब प्रभु चरित सुनहु अति पावन। करत जे बन सुर नर मुनि भावन ॥
एक बार चुनि कुसुम सुहाए। निज कर भूषन राम बनाए ॥
सीतहि पहिराए प्रभु सादर। बैठे फटिक सिला पर सुंदर ॥
सुरपति सुत धरि बायस बेषा। सठ चाहत रघुपति बल देखा ॥
जिमि पिपीलिका सागर थाहा। महा मंदमति पावन चाहा ॥
सीता चरन चौंच हति भागा। मूढ़ मंदमति कारन कागा ॥
चला रुधिर रघुनायक जाना। सींक धनुष सायक संधाना ॥
दोहा — मूल पाठ
अति कृपाल रघुनायक सदा दीन पर नेह।
ता सन आइ कीन्ह छलु मूरख अवगुन गेह ॥ १ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
भरत और अयोध्यावासियों के प्रेम-वर्णन के बाद वन की कथा आरंभ होती है। श्रीराम स्वयं फूलों के आभूषण बनाकर सीताजी को पहनाते हैं। इंद्रपुत्र जयंत कौए का रूप लेकर सीताजी को घायल करता है। वह करुणामय श्रीराम की शक्ति को परखने का अनुचित प्रयास करता है; प्रभु एक सींक को बाण बनाकर संधान करते हैं।
प्रेरित मंत्र ब्रह्मसर धावा। चला भाजि बायस भय पावा ॥
धरि निज रुप गयउ पितु पाहीं। राम बिमुख राखा तेहि नाहीं ॥
भा निरास उपजी मन त्रासा। जथा चक्र भय रिषि दुर्बासा ॥
ब्रह्मधाम सिवपुर सब लोका। फिरा श्रमित ब्याकुल भय सोका ॥
काहूँ बैठन कहा न ओही। राखि को सकइ राम कर द्रोही ॥
मातु मृत्यु पितु समन समाना। सुधा होइ बिष सुनु हरिजाना ॥
मित्र करइ सत रिपु कै करनी। ता कहँ बिबुधनदी बैतरनी ॥
सब जगु ताहि अनलहु ते ताता। जो रघुबीर बिमुख सुनु भ्राता ॥
नारद देखा बिकल जयंता। लागि दया कोमल चित संता ॥
पठवा तुरत राम पहिं ताही। कहेसि पुकारि प्रनत हित पाही ॥
आतुर सभय गहेसि पद जाई। त्राहि त्राहि दयाल रघुराई ॥
अतुलित बल अतुलित प्रभुताई। मैं मतिमंद जानि नहिं पाई ॥
निज कृत कर्म जनित फल पायउँ। अब प्रभु पाहि सरन तकि आयउँ ॥
सुनि कृपाल अति आरत बानी। एकनयन करि तजा भवानी ॥
सोरठा — मूल पाठ
कीन्ह मोह बस द्रोह जद्यपि तेहि कर बध उचित।
प्रभु छाड़ेउ करि छोह को कृपाल रघुबीर सम ॥ २ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
प्रभु का बाण पीछा करता है तो जयंत अपने पिता और विभिन्न लोकों में रक्षा खोजता है, पर कहीं आश्रय नहीं मिलता। नारद उसे श्रीराम की शरण में भेजते हैं। वह अपना अपराध स्वीकार कर चरण पकड़ लेता है। श्रीराम उसके अपराध के अनुरूप दंड देते हुए भी प्राण बचा देते हैं। सोरठा उनकी अद्वितीय करुणा प्रकट करता है।
रघुपति चित्रकूट बसि नाना। चरित किए श्रुति सुधा समाना ॥
बहुरि राम अस मन अनुमाना। होइहि भीर सबहिं मोहि जाना ॥
सकल मुनिन्ह सन बिदा कराई। सीता सहित चले द्वौ भाई ॥
अत्रि के आश्रम जब प्रभु गयऊ। सुनत महामुनि हरषित भयऊ ॥
पुलकित गात अत्रि उठि धाए। देखि रामु आतुर चलि आए ॥
करत दंडवत मुनि उर लाए। प्रेम बारि द्वौ जन अन्हवाए ॥
देखि राम छबि नयन जुड़ाने। सादर निज आश्रम तब आने ॥
करि पूजा कहि बचन सुहाए। दिए मूल फल प्रभु मन भाए ॥
सोरठा — मूल पाठ
प्रभु आसन आसीन भरि लोचन सोभा निरखि।
मुनिबर परम प्रबीन जोरि पानि अस्तुति करत ॥ ३ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
श्रीराम चित्रकूट से आगे चलने का विचार करते हैं और मुनियों से विदा लेते हैं। अत्रि ऋषि उनके आने पर प्रेम से दौड़ते हैं, दोनों भाइयों को हृदय से लगाते हैं और आश्रम में ले जाते हैं। सीताजी सहित प्रभु का पूजन कर फल-मूल अर्पित करते हैं। आसन पर विराजे श्रीराम का रूप निहारकर वे हाथ जोड़ स्तुति करने लगते हैं।
बिनती करि मुनि नाइ सिरु कह कर जोरि बहोरि।
चरन सरोरुह नाथ जनि कबहुँ तजै मति मोरि ॥ ४ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
अत्रि भगवान को भक्तवत्सल, कोमल स्वभाव वाले, सुंदर श्याम, दोषों का नाश करने वाले और तीनों लोकों के नायक कहकर प्रणाम करते हैं। वे सीताजी तथा लक्ष्मणजी सहित प्रभु का स्मरण करते हैं। ईर्ष्यारहित उपासना, इंद्रिय-संयम और निष्काम भक्ति की महिमा कहते हैं। अंत में उनका निवेदन है कि मन कभी प्रभु के चरणों से अलग न हो और चरण-भक्ति प्राप्त हो।
अनुसुइया के पद गहि सीता। मिली बहोरि सुसील बिनीता ॥
रिषिपतिनी मन सुख अधिकाई। आसिष देइ निकट बैठाई ॥
दिब्य बसन भूषन पहिराए। जे नित नूतन अमल सुहाए ॥
कह रिषिबधू सरस मृदु बानी। नारिधर्म कछु ब्याज बखानी ॥
मातु पिता भ्राता हितकारी। मितप्रद सब सुनु राजकुमारी ॥
अमित दानि भर्ता बयदेही। अधम सो नारि जो सेव न तेही ॥
धीरज धर्म मित्र अरु नारी। आपद काल परिखिअहिं चारी ॥
बृद्ध रोगबस जड़ धनहीना। अधं बधिर क्रोधी अति दीना ॥
ऐसेहु पति कर किएँ अपमाना। नारि पाव जमपुर दुख नाना ॥
एकइ धर्म एक ब्रत नेमा। कायँ बचन मन पति पद प्रेमा ॥
जग पति ब्रता चारि बिधि अहहिं। बेद पुरान संत सब कहहिं ॥
उत्तम के अस बस मन माहीं। सपनेहुँ आन पुरुष जग नाहीं ॥
मध्यम परपति देखइ कैसें। भ्राता पिता पुत्र निज जैंसें ॥
धर्म बिचारि समुझि कुल रहई। सो निकिष्ट त्रिय श्रुति अस कहई ॥
बिनु अवसर भय तें रह जोई। जानेहु अधम नारि जग सोई ॥
पति बंचक परपति रति करई। रौरव नरक कल्प सत परई ॥
छन सुख लागि जनम सत कोटि। दुख न समुझ तेहि सम को खोटी ॥
बिनु श्रम नारि परम गति लहई। पतिब्रत धर्म छाड़ि छल गहई ॥
पति प्रतिकुल जनम जहँ जाई। बिधवा होई पाई तरुनाई ॥
सोरठा — मूल पाठ
सहज अपावनि नारि पति सेवत सुभ गति लहइ।
जसु गावत श्रुति चारि अजहु तुलसिका हरिहि प्रिय ॥ ५क ॥
सोरठा — मूल पाठ
सुनु सीता तव नाम सुमिर नारि पतिब्रत करहि।
तोहि प्रानप्रिय राम कहिउँ कथा संसार हित ॥ ५ख ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
सीताजी अनुसूया के चरणों में प्रणाम करती हैं। अनुसूया उन्हें स्नेह से बैठाकर दिव्य वस्त्र-आभूषण देती हैं और वैवाहिक निष्ठा का धर्म समझाती हैं। संवाद में धैर्य, धर्म, मित्र और जीवनसाथी की परीक्षा संकट में होने की बात है। वे छलरहित आचरण और मन-वचन-कर्म की निष्ठा पर बल देती हैं। अंत में सीताजी को श्रीराम की प्राणप्रिया बताकर स्पष्ट करती हैं कि यह उपदेश संसार के हित के लिए कहा गया है।
सुनि जानकीं परम सुखु पावा। सादर तासु चरन सिरु नावा ॥
तब मुनि सन कह कृपानिधाना। आयसु होइ जाउँ बन आना ॥
संतत मो पर कृपा करेहू। सेवक जानि तजेहु जनि नेहू ॥
धर्म धुरंधर प्रभु कै बानी। सुनि सप्रेम बोले मुनि ग्यानी ॥
जासु कृपा अज सिव सनकादी। चहत सकल परमारथ बादी ॥
ते तुम्ह राम अकाम पिआरे। दीन बंधु मृदु बचन उचारे ॥
अब जानी मैं श्री चतुराई। भजी तुम्हहि सब देव बिहाई ॥
जेहि समान अतिसय नहिं कोई। ता कर सील कस न अस होई ॥
केहि बिधि कहौं जाहु अब स्वामी। कहहु नाथ तुम्ह अंतरजामी ॥
अस कहि प्रभु बिलोकि मुनि धीरा। लोचन जल बह पुलक सरीरा ॥
छंद — मूल पाठ
तन पुलक निर्भर प्रेम पुरन नयन मुख पंकज दिए।
मन ग्यान गुन गोतीत प्रभु मैं दीख जप तप का किए ॥
जप जोग धर्म समूह तें नर भगति अनुपम पावई।
रघुबीर चरित पुनीत निसि दिन दास तुलसी गावई ॥
दोहा — मूल पाठ
कलिमल समन दमन मन राम सुजस सुखमूल।
सादर सुनहि जे तिन्ह पर राम रहहिं अनुकूल ॥ ६(क) ॥
सोरठा — मूल पाठ
कठिन काल मल कोस धर्म न ग्यान न जोग जप।
परिहरि सकल भरोस रामहि भजहिं ते चतुर नर ॥ ६(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
अनुसूया की बात सुनकर सीताजी आनंदित होती हैं। श्रीराम आगे जाने की अनुमति और निरंतर कृपा माँगते हैं। अत्रि उनकी विनम्रता पर प्रेम से भर उठते हैं; जिनकी कृपा देवता चाहते हैं, वे स्वयं इतनी मधुर विनती कर रहे हैं। छंद भक्ति की दुर्लभता और प्रभु-दर्शन के आनंद का वर्णन करता है। दोहा-सोरठा अन्य भरोसे छोड़कर रामभजन तथा रामयश के श्रवण का महत्त्व बताते हैं।
मुनि पद कमल नाइ करि सीसा। चले बनहि सुर नर मुनि ईसा ॥
आगे राम अनुज पुनि पाछें। मुनि बर बेष बने अति काछें ॥
उभय बीच श्री सोहइ कैसी। ब्रह्म जीव बिच माया जैसी ॥
सरिता बन गिरि अवघट घाटा। पति पहिचानी देहिं बर बाटा ॥
जहँ जहँ जाहि देव रघुराया। करहिं मेघ तहँ तहँ नभ छाया ॥
मिला असुर बिराध मग जाता। आवतहीं रघुवीर निपाता ॥
तुरतहिं रुचिर रूप तेहिं पावा। देखि दुखी निज धाम पठावा ॥
पुनि आए जहँ मुनि सरभंगा। सुंदर अनुज जानकी संगा ॥
दोहा — मूल पाठ
देखी राम मुख पंकज मुनिबर लोचन भृंग।
सादर पान करत अति धन्य जन्म सरभंग ॥ ७ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
अत्रि को प्रणाम करके आगे श्रीराम, पीछे लक्ष्मण और बीच में सीताजी चलती हैं। मार्ग, वन और बादल मानो उनकी सेवा करते हैं। मार्ग में विराध राक्षस का अंत होता है और उसे पूर्व सुंदर रूप तथा प्रभु की कृपा प्राप्त होती है। इसके बाद तीनों शरभंग ऋषि के पास पहुँचते हैं। मुनि श्रीराम के मुख को प्रेम से निहारते हुए अपने जीवन को धन्य मानते हैं।
कह मुनि सुनु रघुबीर कृपाला। संकर मानस राजमराला ॥
जात रहेउँ बिरंचि के धामा। सुनेउँ श्रवन बन ऐहहिं रामा ॥
चितवत पंथ रहेउँ दिन राती। अब प्रभु देखि जुड़ानी छाती ॥
नाथ सकल साधन मैं हीना। कीन्ही कृपा जानि जन दीना ॥
सो कछु देव न मोहि निहोरा। निज पन राखेउ जन मन चोरा ॥
तब लगि रहहु दीन हित लागी। जब लगि मिलौं तुम्हहि तनु त्यागी ॥
जोग जग्य जप तप ब्रत कीन्हा। प्रभु कहँ देइ भगति बर लीन्हा ॥
एहि बिधि सर रचि मुनि सरभंगा। बैठे हृदयँ छाड़ि सब संगा ॥
दोहा — मूल पाठ
सीता अनुज समेत प्रभु नील जलद तनु स्याम।
मम हियँ बसहु निरंतर सगुनरुप श्रीराम ॥ ८ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
शरभंग कहते हैं कि ब्रह्मलोक जाने से पहले वे श्रीराम के आगमन की प्रतीक्षा कर रहे थे। वे प्रभु की कृपा को अपनी योग्यता का फल नहीं, उनकी शरणागत-वत्सलता मानते हैं। अपने योग, यज्ञ, जप और तप के फल अर्पित कर भक्ति का वर माँगते हैं। उनकी कामना है कि सीता और लक्ष्मण सहित सगुण श्रीराम निरंतर हृदय में बसें।
अस कहि जोग अगिनि तनु जारा। राम कृपाँ बैकुंठ सिधारा ॥
ताते मुनि हरि लीन न भयऊ। प्रथमहिं भेद भगति बर लयऊ ॥
रिषि निकाय मुनिबर गति देखि। सुखी भए निज हृदयँ बिसेषी ॥
अस्तुति करहिं सकल मुनि बृंदा। जयति प्रनत हित करुना कंदा ॥
पुनि रघुनाथ चले बन आगे। मुनिबर बृंद बिपुल सँग लागे ॥
अस्थि समूह देखि रघुराया। पूछी मुनिन्ह लागि अति दाया ॥
जानतहुँ पूछिअ कस स्वामी। सबदरसी तुम्ह अंतरजामी ॥
निसिचर निकर सकल मुनि खाए। सुनि रघुबीर नयन जल छाए ॥
दोहा — मूल पाठ
निसिचर हीन करउँ महि भुज उठाइ पन कीन्ह।
सकल मुनिन्ह के आश्रमन्हि जाइ जाइ सुख दीन्ह ॥ ९ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
शरभंग योगाग्नि से शरीर त्यागकर प्रभु के धाम जाते हैं; उन्होंने सेवक और भगवान का भेद रखते हुए भक्ति का वर चुना था। आगे बढ़ते समय श्रीराम हड्डियों का समूह देखकर मुनियों से पूछते हैं। राक्षसों द्वारा ऋषियों के वध का समाचार सुनकर उनकी आँखें भर आती हैं। वे पृथ्वी को राक्षसों के अत्याचार से मुक्त करने का संकल्प करते और आश्रमों को आश्वस्त करते हैं।
मुनि अगस्ति कर सिष्य सुजाना। नाम सुतीछन रति भगवाना ॥
मन क्रम बचन राम पद सेवक। सपनेहुँ आन भरोस न देवक ॥
प्रभु आगवनु श्रवन सुनि पावा। करत मनोरथ आतुर धावा ॥
हे बिधि दीनबंधु रघुराया। मो से सठ पर करिहहिं दाया ॥
सहित अनुज मोहि राम गोसाई। मिलिहहिं निज सेवक की नाई ॥
मोरे जियँ भरोस दृढ़ नाहीं। भगति बिरति न ग्यान मन माहीं ॥
नहिं सतसंग जोग जप जागा। नहिं दृढ़ चरन कमल अनुरागा ॥
एक बानि करुनानिधान की। सो प्रिय जाकें गति न आन की ॥
होइहैं सुफल आजु मम लोचन। देखि बदन पंकज भव मोचन ॥
निर्भर प्रेम मगन मुनि ग्यानी। कहि न जाइ सो दसा भवानी ॥
दिसि अरु बिदिसि पंथ नहिं सूझा। को मैं चलेउँ कहाँ नहिं बूझा ॥
कबहुँक फिरि पाछें पुनि जाई। कबहुँक नृत्य करइ गुन गाई ॥
अबिरल प्रेम भगति मुनि पाई। प्रभु देखैं तरु ओट लुकाई ॥
अतिसय प्रीति देखि रघुबीरा। प्रगटे हृदयँ हरन भव भीरा ॥
मुनि मग माझ अचल होइ बैसा। पुलक सरीर पनस फल जैसा ॥
तब रघुनाथ निकट चलि आए। देखि दसा निज जन मन भाए ॥
मुनिहि राम बहु भाँति जगावा। जाग न ध्यानजनित सुख पावा ॥
भूप रूप तब राम दुरावा। हृदयँ चतुर्भुज रूप देखावा ॥
मुनि अकुलाइ उठा तब कैसें। बिकल हीन मनि फनि बर जैसें ॥
आगें देखि राम तन स्यामा। सीता अनुज सहित सुख धामा ॥
परेउ लकुट इव चरनन्हि लागी। प्रेम मगन मुनिबर बड़भागी ॥
भुज बिसाल गहि लिए उठाई। परम प्रीति राखे उर लाई ॥
मुनिहि मिलत अस सोह कृपाला। कनक तरुहि जनु भेंट तमाला ॥
राम बदनु बिलोक मुनि ठाढ़ा। मानहुँ चित्र माझ लिखि काढ़ा ॥
दोहा — मूल पाठ
तब मुनि हृदयँ धीर धरि गहि पद बारहिं बार।
निज आश्रम प्रभु आनि करि पूजा बिबिध प्रकार ॥ १० ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
अगस्त्य के शिष्य सुतीक्ष्ण मन, वचन और कर्म से श्रीराम के सेवक हैं। प्रभु के आने का समाचार पाकर वे प्रेम में इतने मग्न होते हैं कि दिशा और मार्ग का ध्यान नहीं रहता। प्रभु उनके हृदय में दर्शन देते हैं और फिर सामने प्रकट होते हैं। मुनि चरणों में गिरते हैं; श्रीराम उन्हें उठाकर हृदय से लगा लेते हैं। सुतीक्ष्ण उन्हें आश्रम ले जाकर पूजन करते हैं।
कह मुनि प्रभु सुनु बिनती मोरी। अस्तुति करौं कवन बिधि तोरी ॥
महिमा अमित मोरि मति थोरी। रबि सन्मुख खद्योत अँजोरी ॥
श्याम तामरस दाम शरीरं। जटा मुकुट परिधन मुनिचीरं ॥
पाणि चाप शर कटि तूणीरं। नौमि निरंतर श्रीरघुवीरं ॥
मोह विपिन घन दहन कृशानुः। संत सरोरुह कानन भानुः ॥
निशिचर करि वरूथ मृगराजः। त्रातु सदा नो भव खग बाजः ॥
अरुण नयन राजीव सुवेशं। सीता नयन चकोर निशेशं ॥
हर ह्रदि मानस बाल मरालं। नौमि राम उर बाहु विशालं ॥
संशय सर्प ग्रसन उरगादः। शमन सुकर्कश तर्क विषादः ॥
भव भंजन रंजन सुर यूथः। त्रातु सदा नो कृपा वरूथः ॥
निर्गुण सगुण विषम सम रूपं। ज्ञान गिरा गोतीतमनूपं ॥
अमलमखिलमनवद्यमपारं। नौमि राम भंजन महि भारं ॥
भक्त कल्पपादप आरामः। तर्जन क्रोध लोभ मद कामः ॥
अति नागर भव सागर सेतुः। त्रातु सदा दिनकर कुल केतुः ॥
अतुलित भुज प्रताप बल धामः। कलि मल विपुल विभंजन नामः ॥
धर्म वर्म नर्मद गुण ग्रामः। संतत शं तनोतु मम रामः ॥
जदपि बिरज ब्यापक अबिनासी। सब के हृदयँ निरंतर बासी ॥
तदपि अनुज श्री सहित खरारी। बसतु मनसि मम काननचारी ॥
जे जानहिं ते जानहुँ स्वामी। सगुन अगुन उर अंतरजामी ॥
जो कोसल पति राजिव नयना। करउ सो राम हृदय मम अयना।
अस अभिमान जाइ जनि भोरे। मैं सेवक रघुपति पति मोरे ॥
सुनि मुनि बचन राम मन भाए। बहुरि हरषि मुनिबर उर लाए ॥
परम प्रसन्न जानु मुनि मोही। जो बर मागहु देउ सो तोही ॥
मुनि कह मै बर कबहुँ न जाचा। समुझि न परइ झूठ का साचा ॥
तुम्हहि नीक लागै रघुराई। सो मोहि देहु दास सुखदाई ॥
अबिरल भगति बिरति बिग्याना। होहु सकल गुन ग्यान निधाना ॥
प्रभु जो दीन्ह सो बरु मैं पावा। अब सो देहु मोहि जो भावा ॥
दोहा — मूल पाठ
अनुज जानकी सहित प्रभु चाप बान धर राम।
मम हिय गगन इंदु इव बसहु सदा निहकाम ॥ ११ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
सुतीक्ष्ण अपनी छोटी बुद्धि और भगवान की अनंत महिमा का अंतर स्वीकार कर स्तुति करते हैं। वे श्रीराम को मोह का नाशक, संतों का आनंद, संसार-सागर का सेतु और भक्ति के आश्रय के रूप में प्रणाम करते हैं। वे निर्गुण व्यापक प्रभु को सीता-लक्ष्मण सहित अपने हृदय में देखना चाहते हैं। श्रीराम भक्ति, वैराग्य और ज्ञान का वर देते हैं; मुनि फिर उनके सगुण रूप का निरंतर हृदय-निवास माँगते हैं।
एवमस्तु करि रमानिवासा। हरषि चले कुंभज रिषि पासा ॥
बहुत दिवस गुर दरसन पाएँ। भए मोहि एहिं आश्रम आएँ ॥
अब प्रभु संग जाउँ गुर पाहीं। तुम्ह कहँ नाथ निहोरा नाहीं ॥
देखि कृपानिधि मुनि चतुराई। लिए संग बिहसै द्वौ भाई ॥
पंथ कहत निज भगति अनूपा। मुनि आश्रम पहुँचे सुरभूपा ॥
तुरत सुतीछन गुर पहिं गयऊ। करि दंडवत कहत अस भयऊ ॥
नाथ कौसलाधीस कुमारा। आए मिलन जगत आधारा ॥
राम अनुज समेत बैदेही। निसि दिनु देव जपत हहु जेही ॥
सुनत अगस्ति तुरत उठि धाए। हरि बिलोकि लोचन जल छाए ॥
मुनि पद कमल परे द्वौ भाई। रिषि अति प्रीति लिए उर लाई ॥
सादर कुसल पूछि मुनि ग्यानी। आसन बर बैठारे आनी ॥
पुनि करि बहु प्रकार प्रभु पूजा। मोहि सम भाग्यवंत नहिं दूजा ॥
जहँ लगि रहे अपर मुनि बृंदा। हरषे सब बिलोकि सुखकंदा ॥
दोहा — मूल पाठ
मुनि समूह महँ बैठे सन्मुख सब की ओर।
सरद इंदु तन चितवत मानहुँ निकर चकोर ॥ १२ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
प्रभु सुतीक्ष्ण की प्रार्थना स्वीकार करके अगस्त्य के आश्रम की ओर चलते हैं। सुतीक्ष्ण साथ जाने की अनुमति पाकर अपने गुरु को श्रीराम के आने की सूचना देते हैं। अगस्त्य तुरंत उठकर आते हैं और दोनों भाइयों को प्रेम से गले लगाते हैं। आश्रम के सभी मुनि आनंदित हैं। वे प्रभु को वैसे निहारते हैं जैसे चकोर शरद के चंद्रमा को देखता है।
तब रघुबीर कहा मुनि पाहीं। तुम्ह सन प्रभु दुराव कछु नाही ॥
तुम्ह जानहु जेहि कारन आयउँ। ताते तात न कहि समुझायउँ ॥
अब सो मंत्र देहु प्रभु मोही। जेहि प्रकार मारौं मुनिद्रोही ॥
मुनि मुसकाने सुनि प्रभु बानी। पूछेहु नाथ मोहि का जानी ॥
तुम्हरेइँ भजन प्रभाव अघारी। जानउँ महिमा कछुक तुम्हारी ॥
ऊमरि तरु बिसाल तव माया। फल ब्रह्मांड अनेक निकाया ॥
जीव चराचर जंतु समाना। भीतर बसहि न जानहिं आना ॥
ते फल भच्छक कठिन कराला। तव भयँ डरत सदा सोउ काला ॥
ते तुम्ह सकल लोकपति साईं। पूँछेहु मोहि मनुज की नाईं ॥
यह बर मागउँ कृपानिकेता। बसहु हृदयँ श्री अनुज समेता ॥
अबिरल भगति बिरति सतसंगा। चरन सरोरुह प्रीति अभंगा ॥
जद्यपि ब्रह्म अखंड अनंता। अनुभव गम्य भजहिं जेहि संता ॥
अस तव रूप बखानउँ जानउँ। फिरि फिरि सगुन ब्रह्म रति मानउँ ॥
संतत दासन्ह देहु बड़ाई। तातें मोहि पूँछेहु रघुराई ॥
है प्रभु परम मनोहर ठाऊँ। पावन पंचबटी तेहि नाऊँ ॥
दंडक बन पुनीत प्रभु करहू। उग्र साप मुनिबर कर हरहू ॥
बास करहु तहँ रघुकुल राया। कीजे सकल मुनिन्ह पर दाया ॥
चले राम मुनि आयसु पाई। तुरतहिं पंचबटी निअराई ॥
दोहा — मूल पाठ
गीधराज सैं भैंट भइ बहु बिधि प्रीति बढ़ाइ ॥
गोदावरी निकट प्रभु रहे परन गृह छाइ ॥ १३ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
श्रीराम मुनियों के शत्रुओं का नाश करने का मार्ग पूछते हैं। अगस्त्य उनकी सर्वज्ञता जानते हुए भी उनकी विनम्रता का सम्मान करते हैं और हृदय-निवास, भक्ति, वैराग्य तथा सत्संग माँगते हैं। वे दंडक वन को पवित्र करने और पंचवटी में रहने का निवेदन करते हैं। वहाँ जाते हुए जटायु से स्नेहपूर्ण भेंट होती है। प्रभु गोदावरी के निकट पर्णकुटी में निवास करते हैं।
जब ते राम कीन्ह तहँ बासा। सुखी भए मुनि बीती त्रासा ॥
गिरि बन नदीं ताल छबि छाए। दिन दिन प्रति अति हौहिं सुहाए ॥
खग मृग बृंद अनंदित रहहीं। मधुप मधुर गंजत छबि लहहीं ॥
सो बन बरनि न सक अहिराजा। जहाँ प्रगट रघुबीर बिराजा ॥
एक बार प्रभु सुख आसीना। लछिमन बचन कहे छलहीना ॥
सुर नर मुनि सचराचर साईं। मैं पूछउँ निज प्रभु की नाई ॥
मोहि समुझाइ कहहु सोइ देवा। सब तजि करौं चरन रज सेवा ॥
कहहु ग्यान बिराग अरु माया। कहहु सो भगति करहु जेहिं दाया ॥
दोहा — मूल पाठ
ईस्वर जीव भेद प्रभु सकल कहौ समुझाइ ॥
जातें होइ चरन रति सोक मोह भ्रम जाइ ॥ १४ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
पंचवटी में श्रीराम के रहने से मुनियों का भय दूर होता और प्रकृति आनंदमयी हो उठती है। एक दिन लक्ष्मण छलरहित भाव से पूछते हैं कि ज्ञान, वैराग्य, माया और वह भक्ति क्या है जिससे प्रभु कृपा करते हैं। वे ईश्वर और जीव का भेद भी जानना चाहते हैं। प्रश्न का उद्देश्य केवल चर्चा नहीं, शोक-मोह मिटाकर प्रभु के चरणों में दृढ़ प्रेम पाना है।
थोरेहि महँ सब कहउँ बुझाई। सुनहु तात मति मन चित लाई ॥
मैं अरु मोर तोर तैं माया। जेहिं बस कीन्हे जीव निकाया ॥
गो गोचर जहँ लगि मन जाई। सो सब माया जानेहु भाई ॥
तेहि कर भेद सुनहु तुम्ह सोऊ। बिद्या अपर अबिद्या दोऊ ॥
एक दुष्ट अतिसय दुखरूपा। जा बस जीव परा भवकूपा ॥
एक रचइ जग गुन बस जाकें। प्रभु प्रेरित नहिं निज बल ताकें ॥
ग्यान मान जहँ एकउ नाहीं। देख ब्रह्म समान सब माही ॥
कहिअ तात सो परम बिरागी। तृन सम सिद्धि तीनि गुन त्यागी ॥
दोहा — मूल पाठ
माया ईस न आपु कहुँ जान कहिअ सो जीव।
बंध मोच्छ प्रद सर्बपर माया प्रेरक सीव ॥ १५ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
श्रीराम कहते हैं कि ‘मैं-मेरा’ और ‘तू-तेरा’ का भेद माया का प्रभाव है। वे विद्या और अविद्या के रूप समझाते हैं। वास्तविक ज्ञान में अहंकार का अभाव और सबमें ब्रह्मदृष्टि होती है; वैराग्य में सिद्धियों और गुणों तक की आसक्ति छोड़ी जाती है। जीव अपने स्वरूप, माया और ईश्वर को ठीक से नहीं जानता; ईश्वर माया के प्रेरक और बंधन-मुक्ति के अधिपति हैं।
धर्म तें बिरति जोग तें ग्याना। ग्यान मोच्छप्रद बेद बखाना ॥
जातें बेगि द्रवउँ मैं भाई। सो मम भगति भगत सुखदाई ॥
सो सुतंत्र अवलंब न आना। तेहि आधीन ग्यान बिग्याना ॥
भगति तात अनुपम सुखमूला। मिलइ जो संत होइँ अनुकूला ॥
भगति कि साधन कहउँ बखानी। सुगम पंथ मोहि पावहिं प्रानी ॥
प्रथमहिं बिप्र चरन अति प्रीती। निज निज कर्म निरत श्रुति रीती ॥
एहि कर फल पुनि बिषय बिरागा। तब मम धर्म उपज अनुरागा ॥
श्रवनादिक नव भक्ति दृढ़ाहीं। मम लीला रति अति मन माहीं ॥
संत चरन पंकज अति प्रेमा। मन क्रम बचन भजन दृढ़ नेमा ॥
गुरु पितु मातु बंधु पति देवा। सब मोहि कहँ जाने दृढ़ सेवा ॥
मम गुन गावत पुलक सरीरा। गदगद गिरा नयन बह नीरा ॥
काम आदि मद दंभ न जाकें। तात निरंतर बस मैं ताकें ॥
दोहा — मूल पाठ
बचन कर्म मन मोरि गति भजनु करहिं निःकाम ॥
तिन्ह के हृदय कमल महुँ करउँ सदा बिश्राम ॥ १६ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
धर्म से वैराग्य और योग से ज्ञान की प्राप्ति का संबंध बताकर श्रीराम भक्ति की स्वतंत्र महिमा कहते हैं। संतों की कृपा, अपने कर्तव्य का आचरण, विषयों से विरक्ति, प्रभु-कथा का प्रेम और मन-वचन-कर्म का भजन इसके साधन हैं। गुरु, माता-पिता और सभी संबंधों के आश्रय के रूप में प्रभु को मानने वाले, दंभ तथा वासनाओं से रहित निष्काम भक्त के हृदय में वे निवास करते हैं।
भगति जोग सुनि अति सुख पावा। लछिमन प्रभु चरनन्हि सिरु नावा ॥
एहि बिधि गए कछुक दिन बीती। कहत बिराग ग्यान गुन नीती ॥
सूपनखा रावन कै बहिनी। दुष्ट हृदय दारुन जस अहिनी ॥
पंचबटी सो गइ एक बारा। देखि बिकल भइ जुगल कुमारा ॥
भ्राता पिता पुत्र उरगारी। पुरुष मनोहर निरखत नारी ॥
होइ बिकल सक मनहि न रोकी। जिमि रबिमनि द्रव रबिहि बिलोकी ॥
रुचिर रुप धरि प्रभु पहिं जाई। बोली बचन बहुत मुसुकाई ॥
तुम्ह सम पुरुष न मो सम नारी। यह सँजोग बिधि रचा बिचारी ॥
मम अनुरूप पुरुष जग माहीं। देखेउँ खोजि लोक तिहु नाहीं ॥
ताते अब लगि रहिउँ कुमारी। मनु माना कछु तुम्हहि निहारी ॥
सीतहि चितइ कही प्रभु बाता। अहइ कुआर मोर लघु भ्राता ॥
गइ लछिमन रिपु भगिनी जानी। प्रभु बिलोकि बोले मृदु बानी ॥
सुंदरि सुनु मैं उन्ह कर दासा। पराधीन नहिं तोर सुपासा ॥
प्रभु समर्थ कोसलपुर राजा। जो कछु करहिं उनहि सब छाजा ॥
सेवक सुख चह मान भिखारी। ब्यसनी धन सुभ गति बिभिचारी ॥
लोभी जसु चह चार गुमानी। नभ दुहि दूध चहत ए प्रानी ॥
पुनि फिरि राम निकट सो आई। प्रभु लछिमन पहिं बहुरि पठाई ॥
लछिमन कहा तोहि सो बरई। जो तृन तोरि लाज परिहरई ॥
तब खिसिआनि राम पहिं गई। रूप भयंकर प्रगटत भई ॥
सीतहि सभय देखि रघुराई। कहा अनुज सन सयन बुझाई ॥
दोहा — मूल पाठ
लछिमन अति लाघवँ सो नाक कान बिनु कीन्हि।
ताके कर रावन कहँ मनौ चुनौती दीन्हि ॥ १७ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
लक्ष्मण उपदेश सुनकर आनंदित होते हैं। बाद में रावण की बहन शूर्पणखा दोनों भाइयों को देखकर आकर्षित होती और सुंदर रूप धरकर विवाह का प्रस्ताव रखती है। श्रीराम और लक्ष्मण के उत्तरों में पराधीनता, सेवा और असंगत इच्छाओं की चर्चा आती है। क्रुद्ध होकर वह अपना भयंकर रूप प्रकट करती है। सीताजी को भयभीत देखकर प्रभु संकेत करते हैं और लक्ष्मण उसके नाक-कान काट देते हैं।
आइ गए बगमेल धरहु धरहु धावत सुभट।
जथा बिलोकि अकेल बाल रबिहि घेरत दनुज ॥ १८ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
अपमानित शूर्पणखा खर-दूषण के पास शिकायत करती है। वे विविध अस्त्रों और वाहनों वाली राक्षस-सेना लेकर बढ़ते हैं और अशुभ संकेतों की उपेक्षा करते हैं। श्रीराम लक्ष्मण को सीताजी सहित सुरक्षित पर्वत-कंदरा में जाने तथा सतर्क रहने को कहते हैं। स्वयं धनुष चढ़ाकर युद्ध के लिए खड़े होते हैं। छंद उनके शौर्यपूर्ण रूप और अकेले प्रभु को घेरती सेना का चित्र प्रस्तुत करता है।
प्रभु बिलोकि सर सकहिं न डारी। थकित भई रजनीचर धारी ॥
सचिव बोलि बोले खर दूषन। यह कोउ नृपबालक नर भूषन ॥
नाग असुर सुर नर मुनि जेते। देखे जिते हते हम केते ॥
हम भरि जन्म सुनहु सब भाई। देखी नहिं असि सुंदरताई ॥
जद्यपि भगिनी कीन्ह कुरूपा। बध लायक नहिं पुरुष अनूपा ॥
देहु तुरत निज नारि दुराई। जीअत भवन जाहु द्वौ भाई ॥
मोर कहा तुम्ह ताहि सुनावहु। तासु बचन सुनि आतुर आवहु ॥
दूतन्ह कहा राम सन जाई। सुनत राम बोले मुसकाई ॥
हम छत्री मृगया बन करहीं। तुम्ह से खल मृग खौजत फिरहीं ॥
रिपु बलवंत देखि नहिं डरहीं। एक बार कालहु सन लरहीं ॥
जद्यपि मनुज दनुज कुल घालक। मुनि पालक खल सालक बालक ॥
जौं न होइ बल घर फिरि जाहू। समर बिमुख मैं हतउँ न काहू ॥
रन चढ़ि करिअ कपट चतुराई। रिपु पर कृपा परम कदराई ॥
दूतन्ह जाइ तुरत सब कहेऊ। सुनि खर दूषन उर अति दहेऊ ॥
छंद — मूल पाठ
उर दहेउ कहेउ कि धरहु धाए बिकट भट रजनीचरा।
सर चाप तोमर सक्ति सूल कृपान परिघ परसु धरा ॥
प्रभु कीन्ह धनुष टकोर प्रथम कठोर घोर भयावहा।
भए बधिर ब्याकुल जातुधान न ग्यान तेहि अवसर रहा ॥
दोहा — मूल पाठ
सावधान होइ धाए जानि सबल आराति।
लागे बरषन राम पर अस्त्र सस्त्र बहु भाँति ॥ १९(क) ॥
प्रभु का रूप देखकर राक्षस कुछ क्षण स्तब्ध हो जाते हैं। खर-दूषण दूतों द्वारा सीताजी को छोड़ देने का अहंकारी संदेश भेजते हैं। श्रीराम स्पष्ट करते हैं कि वे अत्याचारियों से नहीं डरते और युद्ध से विमुख व्यक्ति को नहीं मारते। राक्षस अनेक अस्त्रों से आक्रमण करते हैं। प्रभु उनके शस्त्र काटकर अपना धनुष कान तक खींचते और बाण छोड़ते हैं।
छंदों में भीषण युद्ध का विस्तार है। श्रीराम के बाण राक्षसों की शक्ति और मायावी प्रहारों का नाश करते हैं; राक्षस भागने वालों को रोककर फिर युद्ध करते हैं। अंत में प्रभु की लीला से वे एक-दूसरे को राम के रूप में देखकर आपस में लड़ मरते हैं। दोहे बताते हैं कि राम का नाम लेते हुए उन्हें गति मिलती है। देवता पुष्प-वर्षा और स्तुति करते हैं।
सभा माझ परि ब्याकुल बहु प्रकार कह रोइ।
तोहि जिअत दसकंधर मोरि कि असि गति होइ ॥ २१(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
युद्ध समाप्त होने पर लक्ष्मण सीताजी को वापस लाते हैं और प्रभु उन्हें हृदय से लगाते हैं। शूर्पणखा लंका पहुँचकर रावण की असावधानी पर रोष करती है। संवाद में नीति, धर्म, विवेक और संयम के बिना शक्ति-संपत्ति की निष्फलता बताई गई है। शत्रु, रोग, आग, पाप, स्वामी और सर्प को छोटा मानकर उपेक्षित न करने की नीति कही जाती है। वह सभा में अपनी दुर्दशा सुनाती है।
सुनत सभासद उठे अकुलाई। समुझाई गहि बाहँ उठाई ॥
कह लंकेस कहसि निज बाता। केँइँ तव नासा कान निपाता ॥
अवध नृपति दसरथ के जाए। पुरुष सिंघ बन खेलन आए ॥
समुझि परी मोहि उन्ह कै करनी। रहित निसाचर करिहहिं धरनी ॥
जिन्ह कर भुजबल पाइ दसानन। अभय भए बिचरत मुनि कानन ॥
देखत बालक काल समाना। परम धीर धन्वी गुन नाना ॥
अतुलित बल प्रताप द्वौ भ्राता। खल बध रत सुर मुनि सुखदाता ॥
सोभाधाम राम अस नामा। तिन्ह के संग नारि एक स्यामा ॥
रुप रासि बिधि नारि सँवारी। रति सत कोटि तासु बलिहारी ॥
तासु अनुज काटे श्रुति नासा। सुनि तव भगिनि करहिं परिहासा ॥
खर दूषन सुनि लगे पुकारा। छन महुँ सकल कटक उन्ह मारा ॥
खर दूषन तिसिरा कर घाता। सुनि दससीस जरे सब गाता ॥
दोहा — मूल पाठ
सुपनखहि समुझाइ करि बल बोलेसि बहु भाँति।
गयउ भवन अति सोचबस नीद परइ नहिं राति ॥ २२ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
सभा के लोग शूर्पणखा को उठाकर सांत्वना देते हैं। रावण के पूछने पर वह दशरथ के दोनों पुत्रों के अनुपम रूप, महान बल और मुनियों को दिए अभय का वर्णन करती है। सीताजी का सौंदर्य और खर-दूषण-त्रिशिरा के वध का समाचार सुनकर रावण क्रोध से भर जाता है। बहन को समझाने के बाद भी उसका मन चिंता में डूबा रहता है और उसे नींद नहीं आती।
सुर नर असुर नाग खग माहीं। मोरे अनुचर कहँ कोउ नाहीं ॥
खर दूषन मोहि सम बलवंता। तिन्हहि को मारइ बिनु भगवंता ॥
सुर रंजन भंजन महि भारा। जौं भगवंत लीन्ह अवतारा ॥
तौ मै जाइ बैरु हठि करऊँ। प्रभु सर प्रान तजें भव तरऊँ ॥
होइहि भजनु न तामस देहा। मन क्रम बचन मंत्र दृढ़ एहा ॥
जौं नररुप भूपसुत कोऊ। हरिहउँ नारि जीति रन दोऊ ॥
चला अकेल जान चढि तहवाँ। बस मारीच सिंधु तट जहवाँ ॥
इहाँ राम जसि जुगुति बनाई। सुनहु उमा सो कथा सुहाई ॥
दोहा — मूल पाठ
लछिमन गए बनहिं जब लेन मूल फल कंद।
जनकसुता सन बोले बिहसि कृपा सुख बृंद ॥ २३ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
रावण सोचता है कि खर-दूषण जैसे बलवानों को साधारण मनुष्य नहीं मार सकता। यदि श्रीराम भगवान हैं तो उनके बाण से मरकर मुक्ति पाने का और यदि मनुष्य हैं तो सीताहरण का विकृत विचार करता है। वह मारीच के पास जाता है। दूसरी ओर, लक्ष्मण के फल-मूल लेने बाहर होने पर श्रीराम सीताजी से आगामी नरलीला का रहस्य कहते हैं।
सुनहु प्रिया ब्रत रुचिर सुसीला। मैं कछु करबि ललित नरलीला ॥
तुम्ह पावक महुँ करहु निवासा। जौ लगि करौं निसाचर नासा ॥
जबहिं राम सब कहा बखानी। प्रभु पद धरि हियँ अनल समानी ॥
निज प्रतिबिंब राखि तहँ सीता। तैसइ सील रुप सुबिनीता ॥
लछिमनहूँ यह मरमु न जाना। जो कछु चरित रचा भगवाना ॥
दसमुख गयउ जहाँ मारीचा। नाइ माथ स्वारथ रत नीचा ॥
नवनि नीच कै अति दुखदाई। जिमि अंकुस धनु उरग बिलाई ॥
भयदायक खल कै प्रिय बानी। जिमि अकाल के कुसुम भवानी ॥
दोहा — मूल पाठ
करि पूजा मारीच तब सादर पूछी बात।
कवन हेतु मन ब्यग्र अति अकसर आयहु तात ॥ २४ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
रामचरितमानस के इस वर्णन में श्रीराम सीताजी से अग्नि में निवास करने को कहते हैं और उनकी समान प्रतिबिंब-छवि बाहर रहती है। लक्ष्मण भी इस लीला का रहस्य नहीं जानते। उधर रावण स्वार्थवश मारीच के सामने विनम्र बनता है। कथा सावधान करती है कि दुष्ट की विनम्रता और मधुर वाणी के पीछे भी भयकारी उद्देश्य हो सकता है। मारीच रावण की व्यग्रता का कारण पूछता है।
दसमुख सकल कथा तेहि आगें। कही सहित अभिमान अभागें ॥
होहु कपट मृग तुम्ह छलकारी। जेहि बिधि हरि आनौ नृपनारी ॥
तेहिं पुनि कहा सुनहु दससीसा। ते नररुप चराचर ईसा ॥
तासों तात बयरु नहिं कीजे। मारें मरिअ जिआएँ जीजै ॥
मुनि मख राखन गयउ कुमारा। बिनु फर सर रघुपति मोहि मारा ॥
सत जोजन आयउँ छन माहीं। तिन्ह सन बयरु किएँ भल नाहीं ॥
भइ मम कीट भृंग की नाई। जहँ तहँ मैं देखउँ दोउ भाई ॥
जौं नर तात तदपि अति सूरा। तिन्हहि बिरोधि न आइहि पूरा ॥
दोहा — मूल पाठ
जेहिं ताड़का सुबाहु हति खंडेउ हर कोदंड ॥
खर दूषन तिसिरा बधेउ मनुज कि अस बरिबंड ॥ २५ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
रावण मारीच को कपटमृग बनकर सीताहरण में सहायता देने को कहता है। मारीच श्रीराम को चराचर के स्वामी बताकर विरोध से रोकता है। वह विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा के समय उनके निष्फल बाण से बहुत दूर जा पड़ने का अपना अनुभव सुनाता है। ताड़का, सुबाहु, शिवधनुष और खर-दूषण के प्रसंग याद दिलाकर कहता है कि ऐसे प्रभु से बैर लाभकारी नहीं होगा।
जाहु भवन कुल कुसल बिचारी। सुनत जरा दीन्हिसि बहु गारी ॥
गुरु जिमि मूढ़ करसि मम बोधा। कहु जग मोहि समान को जोधा ॥
तब मारीच हृदयँ अनुमाना। नवहि बिरोधें नहिं कल्याना ॥
सस्त्री मर्मी प्रभु सठ धनी। बैद बंदि कबि भानस गुनी ॥
उभय भाँति देखा निज मरना। तब ताकिसि रघुनायक सरना ॥
उतरु देत मोहि बधब अभागें। कस न मरौं रघुपति सर लागें ॥
अस जियँ जानि दसानन संगा। चला राम पद प्रेम अभंगा ॥
मन अति हरष जनाव न तेही। आजु देखिहउँ परम सनेही ॥
छंद — मूल पाठ
निज परम प्रीतम देखि लोचन सुफल करि सुख पाइहौं।
श्री सहित अनुज समेत कृपानिकेत पद मन लाइहौं ॥
निर्बान दायक क्रोध जा कर भगति अबसहि बसकरी।
निज पानि सर संधानि सो मोहि बधिहि सुखसागर हरी ॥
दोहा — मूल पाठ
मम पाछें धर धावत धरें सरासन बान।
फिरि फिरि प्रभुहि बिलोकिहउँ धन्य न मो सम आन ॥ २६ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
सलाह सुनकर रावण गाली और धमकी देता है। मारीच देखता है कि विरोध करने पर रावण मारेगा और साथ जाने पर श्रीराम का बाण मिलेगा। वह प्रभु की शरण का आंतरिक भाव रखकर उनके हाथों मृत्यु स्वीकार करता है। छंद में उसकी इच्छा है कि सीता और लक्ष्मण सहित प्रभु के दर्शन से नेत्र सफल हों। वह मृग बनकर भागते हुए भी बार-बार श्रीराम को देख पाने को अपना सौभाग्य मानता है।
तेहि बन निकट दसानन गयऊ। तब मारीच कपटमृग भयऊ ॥
अति बिचित्र कछु बरनि न जाई। कनक देह मनि रचित बनाई ॥
सीता परम रुचिर मृग देखा। अंग अंग सुमनोहर बेषा ॥
सुनहु देव रघुबीर कृपाला। एहि मृग कर अति सुंदर छाला ॥
सत्यसंध प्रभु बधि करि एही। आनहु चर्म कहति बैदेही ॥
तब रघुपति जानत सब कारन। उठे हरषि सुर काजु सँवारन ॥
मृग बिलोकि कटि परिकर बाँधा। करतल चाप रुचिर सर साँधा ॥
प्रभु लछिमनिहि कहा समुझाई। फिरत बिपिन निसिचर बहु भाई ॥
सीता केरि करेहु रखवारी। बुधि बिबेक बल समय बिचारी ॥
प्रभुहि बिलोकि चला मृग भाजी। धाए रामु सरासन साजी ॥
निगम नेति सिव ध्यान न पावा। मायामृग पाछें सो धावा ॥
कबहुँ निकट पुनि दूरि पराई। कबहुँक प्रगटइ कबहुँ छपाई ॥
प्रगटत दुरत करत छल भूरी। एहि बिधि प्रभुहि गयउ लै दूरी ॥
तब तकि राम कठिन सर मारा। धरनि परेउ करि घोर पुकारा ॥
लछिमन कर प्रथमहिं लै नामा। पाछें सुमिरेसि मन महुँ रामा ॥
प्रान तजत प्रगटेसि निज देहा। सुमिरेसि रामु समेत सनेहा ॥
अंतर प्रेम तासु पहिचाना। मुनि दुर्लभ गति दीन्हि सुजाना ॥
दोहा — मूल पाठ
बिपुल सुमन सुर बरषहिं गावहिं प्रभु गुन गाथ।
निज पद दीन्ह असुर कहुँ दीनबंधु रघुनाथ ॥ २७ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
मारीच अद्भुत स्वर्णमृग बनकर आता है। सीताजी उसे देखकर उसकी सुंदर छाला लाने को कहती हैं। श्रीराम लक्ष्मण को सीताजी की सावधानी से रक्षा का निर्देश देकर मृग के पीछे जाते हैं। मारीच छल से उन्हें दूर ले जाता है। बाण लगने पर वह लक्ष्मण का नाम लेकर पुकारता, फिर भीतर से राम-स्मरण करता है। प्रभु उसका अंतःप्रेम पहचानकर उसे दुर्लभ गति देते हैं।
खल बधि तुरत फिरे रघुबीरा। सोह चाप कर कटि तूनीरा ॥
आरत गिरा सुनी जब सीता। कह लछिमन सन परम सभीता ॥
जाहु बेगि संकट अति भ्राता। लछिमन बिहसि कहा सुनु माता ॥
भृकुटि बिलास सृष्टि लय होई। सपनेहुँ संकट परइ कि सोई ॥
मरम बचन जब सीता बोला। हरि प्रेरित लछिमन मन डोला ॥
बन दिसि देव सौंपि सब काहू। चले जहाँ रावन ससि राहू ॥
सून बीच दसकंधर देखा। आवा निकट जती कें बेषा ॥
जाकें डर सुर असुर डेराहीं। निसि न नीद दिन अन्न न खाहीं ॥
सो दससीस स्वान की नाई। इत उत चितइ चला भड़िहाई ॥
इमि कुपंथ पग देत खगेसा। रह न तेज बुधि बल लेसा ॥
नाना बिधि करि कथा सुहाई। राजनीति भय प्रीति देखाई ॥
कह सीता सुनु जती गोसाईं। बोलेहु बचन दुष्ट की नाईं ॥
तब रावन निज रूप देखावा। भई सभय जब नाम सुनावा ॥
कह सीता धरि धीरजु गाढ़ा। आइ गयउ प्रभु रहु खल ठाढ़ा ॥
जिमि हरिबधुहि छुद्र सस चाहा। भएसि कालबस निसिचर नाहा ॥
सुनत बचन दससीस रिसाना। मन महुँ चरन बंदि सुख माना ॥
दोहा — मूल पाठ
क्रोधवंत तब रावन लीन्हिसि रथ बैठाइ।
चला गगनपथ आतुर भयँ रथ हाँकि न जाइ ॥ २८ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
मारीच की व्याकुल पुकार सुनकर सीताजी चिंतित होती हैं। लक्ष्मण प्रभु के अजेय स्वरूप का भरोसा देते हैं, पर कठोर वचन सुनकर वन के देवताओं को रक्षा सौंपकर चले जाते हैं। रावण संन्यासी का वेश धरकर आता और छलपूर्ण बातें करता है। सीताजी उसकी दुष्टता पहचानकर निर्भय उत्तर देती हैं। रावण असली रूप दिखाकर उन्हें रथ में बैठाता है और भयभीत होकर आकाशमार्ग से ले जाता है।
हा जग एक बीर रघुराया। केहिं अपराध बिसारेहु दाया ॥
आरति हरन सरन सुखदायक। हा रघुकुल सरोज दिननायक ॥
हा लछिमन तुम्हार नहिं दोसा। सो फलु पायउँ कीन्हेउँ रोसा ॥
बिबिध बिलाप करति बैदेही। भूरि कृपा प्रभु दूरि सनेही ॥
बिपति मोरि को प्रभुहि सुनावा। पुरोडास चह रासभ खावा ॥
सीता कै बिलाप सुनि भारी। भए चराचर जीव दुखारी ॥
गीधराज सुनि आरत बानी। रघुकुलतिलक नारि पहिचानी ॥
अधम निसाचर लीन्हे जाई। जिमि मलेछ बस कपिला गाई ॥
सीते पुत्रि करसि जनि त्रासा। करिहउँ जातुधान कर नासा ॥
धावा क्रोधवंत खग कैसें। छूटइ पबि परबत कहुँ जैसे ॥
रे रे दुष्ट ठाढ़ किन होही। निर्भय चलेसि न जानेहि मोही ॥
आवत देखि कृतांत समाना। फिरि दसकंधर कर अनुमाना ॥
की मैनाक कि खगपति होई। मम बल जान सहित पति सोई ॥
जाना जरठ जटायू एहा। मम कर तीरथ छाँड़िहि देहा ॥
सुनत गीध क्रोधातुर धावा। कह सुनु रावन मोर सिखावा ॥
तजि जानकिहि कुसल गृह जाहू। नाहिं त अस होइहि बहुबाहू ॥
राम रोष पावक अति घोरा। होइहि सकल सलभ कुल तोरा ॥
उतरु न देत दसानन जोधा। तबहिं गीध धावा करि क्रोधा ॥
धरि कच बिरथ कीन्ह महि गिरा। सीतहि राखि गीध पुनि फिरा ॥
चौचन्ह मारि बिदारेसि देही। दंड एक भइ मुरुछा तेही ॥
तब सक्रोध निसिचर खिसिआना। काढ़ेसि परम कराल कृपाना ॥
काटेसि पंख परा खग धरनी। सुमिरि राम करि अदभुत करनी ॥
सीतहि जानि चढ़ाइ बहोरी। चला उताइल त्रास न थोरी ॥
करति बिलाप जाति नभ सीता। ब्याध बिबस जनु मृगी सभीता ॥
गिरि पर बैठे कपिन्ह निहारी। कहि हरि नाम दीन्ह पट डारी ॥
एहि बिधि सीतहि सो लै गयऊ। बन असोक महँ राखत भयऊ ॥
दोहा — मूल पाठ
हारि परा खल बहु बिधि भय अरु प्रीति देखाइ।
तब असोक पादप तर राखिसि जतन कराइ ॥ २९(क) ॥
दोहा — मूल पाठ
जेहि बिधि कपट कुरंग सँग धाइ चले श्रीराम।
सो छबि सीता राखि उर रटति रहति हरिनाम ॥ २९(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
सीताजी राम-लक्ष्मण को पुकारती और अपने रोष पर दुख करती हैं। जटायु उन्हें पहचानकर पुत्री कह आश्वस्त करते हैं और रावण को रोकते हैं। वे उसका रथ नष्ट कर घायल करते हैं, पर रावण तलवार से उनके पंख काट देता है। रास्ते में सीताजी पर्वत पर वानरों को देखकर अपना वस्त्र गिराती हैं। रावण उन्हें अशोकवन में रखता है; वे प्रभु की छवि हृदय में रख रामनाम जपती रहती हैं।
रघुपति अनुजहि आवत देखी। बाहिज चिंता कीन्हि बिसेषी ॥
जनकसुता परिहरिहु अकेली। आयहु तात बचन मम पेली ॥
निसिचर निकर फिरहिं बन माहीं। मम मन सीता आश्रम नाहीं ॥
गहि पद कमल अनुज कर जोरी। कहेउ नाथ कछु मोहि न खोरी ॥
अनुज समेत गए प्रभु तहवाँ। गोदावरि तट आश्रम जहवाँ ॥
आश्रम देखि जानकी हीना। भए बिकल जस प्राकृत दीना ॥
हा गुन खानि जानकी सीता। रूप सील ब्रत नेम पुनीता ॥
लछिमन समुझाए बहु भाँती। पूछत चले लता तरु पाँती ॥
हे खग मृग हे मधुकर श्रेनी। तुम्ह देखी सीता मृगनैनी ॥
खंजन सुक कपोत मृग मीना। मधुप निकर कोकिला प्रबीना ॥
कुंद कली दाड़िम दामिनी। कमल सरद ससि अहिभामिनी ॥
बरुन पास मनोज धनु हंसा। गज केहरि निज सुनत प्रसंसा ॥
श्रीफल कनक कदलि हरषाहीं। नेकु न संक सकुच मन माहीं ॥
सुनु जानकी तोहि बिनु आजू। हरषे सकल पाइ जनु राजू ॥
किमि सहि जात अनख तोहि पाहीं । प्रिया बेगि प्रगटसि कस नाहीं ॥
एहि बिधि खौजत बिलपत स्वामी। मनहुँ महा बिरही अति कामी ॥
पूरनकाम राम सुख रासी। मनुज चरित कर अज अबिनासी ॥
आगे परा गीधपति देखा। सुमिरत राम चरन जिन्ह रेखा ॥
दोहा — मूल पाठ
कर सरोज सिर परसेउ कृपासिंधु रघुबीर ॥
निरखि राम छबि धाम मुख बिगत भई सब पीर ॥ ३० ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
श्रीराम लक्ष्मण को लौटते देखकर सीताजी की सुरक्षा की चिंता प्रकट करते हैं। कुटिया में जानकी को न पाकर दोनों भाई खोजते हैं। प्रभु की विरह-लीला में पेड़, लताएँ, पशु-पक्षी और प्रकृति से सीताजी का पता पूछा जाता है। कवि स्पष्ट करते हैं कि पूर्णकाम, अविनाशी प्रभु मनुष्य जैसी लीला कर रहे हैं। घायल जटायु को देखकर श्रीराम उनके सिर पर हाथ रखते हैं और उनकी पीड़ा दूर होती है।
तब कह गीध बचन धरि धीरा । सुनहु राम भंजन भव भीरा ॥
नाथ दसानन यह गति कीन्ही। तेहि खल जनकसुता हरि लीन्ही ॥
लै दच्छिन दिसि गयउ गोसाई। बिलपति अति कुररी की नाई ॥
दरस लागी प्रभु राखेंउँ प्राना। चलन चहत अब कृपानिधाना ॥
राम कहा तनु राखहु ताता। मुख मुसकाइ कही तेहिं बाता ॥
जा कर नाम मरत मुख आवा। अधमउ मुकुत होई श्रुति गावा ॥
सो मम लोचन गोचर आगें। राखौं देह नाथ केहि खाँगेँ ॥
जल भरि नयन कहहिँ रघुराई। तात कर्म निज ते गतिं पाई ॥
परहित बस जिन्ह के मन माहीँ। तिन्ह कहुँ जग दुर्लभ कछु नाहीँ ॥
तनु तजि तात जाहु मम धामा। देउँ काह तुम्ह पूरनकामा ॥
दोहा — मूल पाठ
सीता हरन तात जनि कहहु पिता सन जाइ ॥
जौँ मैँ राम त कुल सहित कहिहि दसानन आइ ॥ ३१ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
जटायु बताते हैं कि रावण सीताजी को दक्षिण दिशा में ले गया है और वे दर्शन के लिए ही प्राण रोके हुए थे। प्रभु उन्हें शरीर बनाए रखने को कहते हैं, पर जटायु उनके सामने ही देह त्यागना चाहते हैं। श्रीराम परहित में लगे जीवन की महिमा कहते और उन्हें अपना धाम देते हैं। पिता दशरथ को सीताहरण का समाचार न बताने का वचन उनके रावण-विनाश के संकल्प को प्रकट करता है।
जय राम रूप अनूप निर्गुन सगुन गुन प्रेरक सही।
दससीस बाहु प्रचंड खंडन चंड सर मंडन मही ॥
पाथोद गात सरोज मुख राजीव आयत लोचनं।
नित नौमि रामु कृपाल बाहु बिसाल भव भय मोचनं ॥ १ ॥
छंद — मूल पाठ
बलमप्रमेयमनादिमजमब्यक्तमेकमगोचरं।
गोबिंद गोपर द्वंद्वहर बिग्यानघन धरनीधरं ॥
जे राम मंत्र जपंत संत अनंत जन मन रंजनं।
नित नौमि राम अकाम प्रिय कामादि खल दल गंजनं ॥ २।
छंद — मूल पाठ
जेहि श्रुति निरंजन ब्रह्म ब्यापक बिरज अज कहि गावहीं ॥
करि ध्यान ग्यान बिराग जोग अनेक मुनि जेहि पावहीं ॥
सो प्रगट करुना कंद सोभा बृंद अग जग मोहई।
मम हृदय पंकज भृंग अंग अनंग बहु छबि सोहई ॥ ३ ॥
छंद — मूल पाठ
जो अगम सुगम सुभाव निर्मल असम सम सीतल सदा।
पस्यंति जं जोगी जतन करि करत मन गो बस सदा ॥
सो राम रमा निवास संतत दास बस त्रिभुवन धनी।
मम उर बसउ सो समन संसृति जासु कीरति पावनी ॥ ४ ॥
दोहा — मूल पाठ
अबिरल भगति मागि बर गीध गयउ हरिधाम।
तेहि की क्रिया जथोचित निज कर कीन्ही राम ॥ ३२ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
जटायु दिव्य रूप पाकर श्रीराम की स्तुति करते हैं। चार छंदों में सगुण-निर्गुण प्रभु, करुणा, अनुपम सौंदर्य, अनंत शक्ति और संसार-भय के नाश का गुणगान है। वे निष्काम भक्तों के प्रिय और कामादि विकारों के विजेता भगवान को हृदय में बसाना चाहते हैं। अखंड भक्ति का वर माँगकर वे हरिधाम जाते हैं। श्रीराम स्वयं उनकी यथोचित अंतिम क्रिया करते हैं।
कोमल चित अति दीनदयाला। कारन बिनु रघुनाथ कृपाला ॥
गीध अधम खग आमिष भोगी। गति दीन्हि जो जाचत जोगी ॥
सुनहु उमा ते लोग अभागी। हरि तजि होहिं बिषय अनुरागी ॥
पुनि सीतहि खोजत द्वौ भाई। चले बिलोकत बन बहुताई ॥
संकुल लता बिटप घन कानन। बहु खग मृग तहँ गज पंचानन ॥
आवत पंथ कबंध निपाता। तेहिं सब कही साप कै बाता ॥
दुरबासा मोहि दीन्ही सापा। प्रभु पद पेखि मिटा सो पापा ॥
सुनु गंधर्ब कहउँ मै तोही। मोहि न सोहाइ ब्रह्मकुल द्रोही ॥
दोहा — मूल पाठ
मन क्रम बचन कपट तजि जो कर भूसुर सेव।
मोहि समेत बिरंचि सिव बस ताकें सब देव ॥ ३३ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
कवि प्रभु की अकारण करुणा का स्मरण करते हैं: जटायु को वह गति मिली जिसे योगी चाहते हैं। आगे खोजते हुए श्रीराम और लक्ष्मण कबंध का अंत करते हैं। वह अपना शाप बताता है और प्रभु के दर्शन से उससे मुक्त होता है। संवाद में ऋषियों तथा ब्राह्मणों के प्रति कपट छोड़ मन-वचन-कर्म से सम्मान और सेवा करने की बात कही गई है।
सापत ताड़त परुष कहंता। बिप्र पूज्य अस गावहिं संता ॥
पूजिअ बिप्र सील गुन हीना। सूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना ॥
कहि निज धर्म ताहि समुझावा। निज पद प्रीति देखि मन भावा ॥
रघुपति चरन कमल सिरु नाई। गयउ गगन आपनि गति पाई ॥
ताहि देइ गति राम उदारा। सबरी कें आश्रम पगु धारा ॥
सबरी देखि राम गृहँ आए। मुनि के बचन समुझि जियँ भाए ॥
सरसिज लोचन बाहु बिसाला। जटा मुकुट सिर उर बनमाला ॥
स्याम गौर सुंदर दोउ भाई। सबरी परी चरन लपटाई ॥
प्रेम मगन मुख बचन न आवा। पुनि पुनि पद सरोज सिर नावा ॥
सादर जल लै चरन पखारे। पुनि सुंदर आसन बैठारे ॥
दोहा — मूल पाठ
कंद मूल फल सुरस अति दिए राम कहुँ आनि।
प्रेम सहित प्रभु खाए बारंबार बखानि ॥ ३४ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
कबंध से संवाद में उस समय की वर्ण-संबंधी मान्यताओं के अनुसार ब्राह्मण-पूजन का उल्लेख आता है। उसके बाद प्रभु शबरी के आश्रम पहुँचते हैं। शबरी अपने गुरु का वचन पूरा हुआ जानकर आनंद से भर जाती हैं। वे दोनों भाइयों के चरण पकड़तीं, जल से धोतीं और आसन देती हैं। उनके लाए स्वादिष्ट कंद-मूल-फल श्रीराम प्रेम से खाते और बार-बार उनकी प्रशंसा करते हैं।
पानि जोरि आगें भइ ठाढ़ी। प्रभुहि बिलोकि प्रीति अति बाढ़ी ॥
केहि बिधि अस्तुति करौ तुम्हारी। अधम जाति मैं जड़मति भारी ॥
अधम ते अधम अधम अति नारी। तिन्ह महँ मैं मतिमंद अघारी ॥
कह रघुपति सुनु भामिनि बाता। मानउँ एक भगति कर नाता ॥
जाति पाँति कुल धर्म बड़ाई। धन बल परिजन गुन चतुराई ॥
भगति हीन नर सोहइ कैसा। बिनु जल बारिद देखिअ जैसा ॥
नवधा भगति कहउँ तोहि पाहीं। सावधान सुनु धरु मन माहीं ॥
प्रथम भगति संतन्ह कर संगा। दूसरि रति मम कथा प्रसंगा ॥
दोहा — मूल पाठ
गुर पद पंकज सेवा तीसरि भगति अमान।
चौथि भगति मम गुन गन करइ कपट तजि गान ॥ ३५ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
शबरी अपनी सामाजिक स्थिति और अल्प बुद्धि कहकर विनम्रता प्रकट करती हैं। श्रीराम कहते हैं कि वे केवल भक्ति का नाता मानते हैं; भक्ति के बिना कुल, धन, शक्ति और चतुराई शोभा नहीं देते। वे नवधा भक्ति बताते हैं: संतों का संग, प्रभु-कथा का प्रेम, अहंकार छोड़ गुरु-सेवा और कपट त्यागकर भगवान के गुणों का गान।
मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा। पंचम भजन सो बेद प्रकासा ॥
छठ दम सील बिरति बहु करमा। निरत निरंतर सज्जन धरमा ॥
सातवँ सम मोहि मय जग देखा। मोतें संत अधिक करि लेखा ॥
आठवँ जथालाभ संतोषा। सपनेहुँ नहिं देखइ परदोषा ॥
नवम सरल सब सन छलहीना। मम भरोस हियँ हरष न दीना ॥
नव महुँ एकउ जिन्ह के होई। नारि पुरुष सचराचर कोई ॥
सोइ अतिसय प्रिय भामिनि मोरे। सकल प्रकार भगति दृढ़ तोरें ॥
जोगि बृंद दुरलभ गति जोई। तो कहुँ आजु सुलभ भइ सोई ॥
मम दरसन फल परम अनूपा। जीव पाव निज सहज सरूपा ॥
जनकसुता कइ सुधि भामिनी। जानहि कहु करिबरगामिनी ॥
पंपा सरहि जाहु रघुराई। तहँ होइहि सुग्रीव मिताई ॥
सो सब कहिहि देव रघुबीरा। जानतहूँ पूछहु मतिधीरा ॥
बार बार प्रभु पद सिरु नाई। प्रेम सहित सब कथा सुनाई ॥
छंद — मूल पाठ
कहि कथा सकल बिलोकि हरि मुख हृदयँ पद पंकज धरे।
तजि जोग पावक देह हरि पद लीन भइ जहँ नहिं फिरे ॥
नर बिबिध कर्म अधर्म बहु मत सोकप्रद सब त्यागहू।
बिस्वास करि कह दास तुलसी राम पद अनुरागहू ॥
दोहा — मूल पाठ
जाति हीन अघ जन्म महि मुक्त कीन्हि असि नारि।
महामंद मन सुख चहसि ऐसे प्रभुहि बिसारि ॥ ३६ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
अगली पाँच भक्तियाँ हैं: दृढ़ विश्वास सहित मंत्र-जप; संयम, शील और सज्जनता; जगत में प्रभु को देखना व संतों का आदर; प्राप्त में संतोष और परदोष न देखना; सरलता, छलरहित व्यवहार तथा हर दशा में प्रभु पर भरोसा। प्रभु शबरी में दृढ़ भक्ति बताते हैं। वे पंपा सरोवर पर सुग्रीव से मिलने का मार्ग बताती हैं और चरणों का ध्यान कर प्रभु-पद में लीन होती हैं।
चले राम त्यागा बन सोऊ। अतुलित बल नर केहरि दोऊ ॥
बिरही इव प्रभु करत बिषादा। कहत कथा अनेक संबादा ॥
लछिमन देखु बिपिन कइ सोभा। देखत केहि कर मन नहिं छोभा ॥
नारि सहित सब खग मृग बृंदा। मानहुँ मोरि करत हहिं निंदा ॥
हमहि देखि मृग निकर पराहीं। मृगीं कहहिं तुम्ह कहँ भय नाहीं ॥
तुम्ह आनंद करहु मृग जाए। कंचन मृग खोजन ए आए ॥
संग लाइ करिनीं करि लेहीं। मानहुँ मोहि सिखावनु देहीं ॥
सास्त्र सुचिंतित पुनि पुनि देखिअ। भूप सुसेवित बस नहिं लेखिअ ॥
राखिअ नारि जदपि उर माहीं। जुबती सास्त्र नृपति बस नाहीं ॥
देखहु तात बसंत सुहावा। प्रिया हीन मोहि भय उपजावा ॥
दोहा — मूल पाठ
बिरह बिकल बलहीन मोहि जानेसि निपट अकेल।
सहित बिपिन मधुकर खग मदन कीन्ह बगमेल ॥ ३७(क) ॥
दोहा — मूल पाठ
देखि गयउ भ्राता सहित तासु दूत सुनि बात।
डेरा कीन्हेउ मनहुँ तब कटकु हटकि मनजात ॥ ३७(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
दोनों भाई शबरी के वन से आगे बढ़ते हैं। सीताजी के वियोग में प्रभु प्रकृति के युगलों को देखकर विरह की बातें कहते हैं। मृगों के प्रसंग में स्वर्णमृग की स्मृति आती है। संवाद में शास्त्र, राजा और मानवीय संबंधों को पूरी तरह अपने वश में समझने की भूल पर भी संकेत है। वसंत की सुंदरता उन्हें प्रियावियोग में मानो कामदेव की सेना जैसी प्रतीत होती है।
तात तीनि अति प्रबल खल काम क्रोध अरु लोभ।
मुनि बिग्यान धाम मन करहिं निमिष महुँ छोभ ॥ ३८(क) ॥
दोहा — मूल पाठ
लोभ कें इच्छा दंभ बल काम कें केवल नारि।
क्रोध के परुष बचन बल मुनिबर कहहिं बिचारि ॥ ३८(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
वन के वृक्ष, लताएँ, पक्षी, हवा और झरने कामदेव की सेना के अंगों के रूप में चित्रित हैं। प्रभु लक्ष्मण को धैर्य की महिमा समझाते हैं। काम, क्रोध और लोभ इतने प्रबल हैं कि ज्ञानी मुनियों का मन भी क्षणभर में विचलित कर सकते हैं। इच्छा-दंभ, विषयाकर्षण और कठोर वाणी इनके सहायक बल बताए गए हैं; इनसे सावधान रहकर संयम की रक्षा करनी चाहिए।
गुनातीत सचराचर स्वामी। राम उमा सब अंतरजामी ॥
कामिन्ह कै दीनता देखाई। धीरन्ह कें मन बिरति दृढ़ाई ॥
क्रोध मनोज लोभ मद माया। छूटहिं सकल राम कीं दाया ॥
सो नर इंद्रजाल नहिं भूला। जा पर होइ सो नट अनुकूला ॥
उमा कहउँ मैं अनुभव अपना। सत हरि भजनु जगत सब सपना ॥
पुनि प्रभु गए सरोबर तीरा। पंपा नाम सुभग गंभीरा ॥
संत हृदय जस निर्मल बारी। बाँधे घाट मनोहर चारी ॥
जहँ तहँ पिअहिं बिबिध मृग नीरा। जनु उदार गृह जाचक भीरा ॥
दोहा — मूल पाठ
पुरइनि सबन ओट जल बेगि न पाइअ मर्म।
मायाछन्न न देखिऐ जैसे निर्गुन ब्रह्म ॥ ३९(क) ॥
दोहा — मूल पाठ
सुखि मीन सब एकरस अति अगाध जल माहिं।
जथा धर्मसीलन्ह के दिन सुख संजुत जाहिं ॥ ३९(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
शिव समझाते हैं कि अंतर्यामी, गुणातीत श्रीराम इस लीला द्वारा धीर पुरुषों का वैराग्य दृढ़ करते हैं। उनकी कृपा से विकार और माया का बंधन छूटता है। इसके बाद पंपा सरोवर का वर्णन है: उसका जल संतों के हृदय जैसा निर्मल है। कमल-पत्तों से ढका जल माया से छिपे ब्रह्म की उपमा देता है और गहरे जल की सुखी मछलियाँ धर्मशील जीवन की शांति का बोध कराती हैं।
फल भारन नमि बिटप सब रहे भूमि निअराइ।
पर उपकारी पुरुष जिमि नवहिं सुसंपति पाइ ॥ ४० ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
सरोवर में रंग-बिरंगे कमल, भौंरे और अनेक जल-पक्षी हैं। निकट मुनियों के आश्रम, पुष्पित वृक्ष और शीतल सुगंधित हवा शोभा बढ़ाते हैं। कोयल का मधुर स्वर ध्यान तक आकर्षित करता है। फल लगने पर धरती की ओर झुकते वृक्षों से सीख मिलती है कि उपकारी मनुष्य संपन्न होकर और भी विनम्र होते हैं।
देखि राम अति रुचिर तलावा। मज्जनु कीन्ह परम सुख पावा ॥
देखी सुंदर तरुबर छाया। बैठे अनुज सहित रघुराया ॥
तहँ पुनि सकल देव मुनि आए। अस्तुति करि निज धाम सिधाए ॥
बैठे परम प्रसन्न कृपाला। कहत अनुज सन कथा रसाला ॥
बिरहवंत भगवंतहि देखी। नारद मन भा सोच बिसेषी ॥
मोर साप करि अंगीकारा। सहत राम नाना दुख भारा ॥
ऐसे प्रभुहि बिलोकउँ जाई। पुनि न बनिहि अस अवसरु आई ॥
यह बिचारि नारद कर बीना। गए जहाँ प्रभु सुख आसीना ॥
गावत राम चरित मृदु बानी। प्रेम सहित बहु भाँति बखानी ॥
करत दंडवत लिए उठाई। राखे बहुत बार उर लाई ॥
स्वागत पूँछि निकट बैठारे। लछिमन सादर चरन पखारे ॥
दोहा — मूल पाठ
नाना बिधि बिनती करि प्रभु प्रसन्न जियँ जानि।
नारद बोले बचन तब जोरि सरोरुह पानि ॥ ४१ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
श्रीराम स्नान करके लक्ष्मण सहित वृक्ष की छाया में बैठते हैं। देवता और मुनि स्तुति कर लौट जाते हैं। प्रभु को विरह की लीला करते देखकर नारद को अपने पूर्व शाप का स्मरण होता है और वे मिलने आते हैं। वीणा पर रामचरित गाते हुए वे प्रणाम करते हैं। श्रीराम प्रेम से गले लगाकर बैठाते हैं; लक्ष्मण चरण धोते हैं। नारद हाथ जोड़कर विनती आरंभ करते हैं।
सुनहु उदार सहज रघुनायक। सुंदर अगम सुगम बर दायक ॥
देहु एक बर मागउँ स्वामी। जद्यपि जानत अंतरजामी ॥
जानहु मुनि तुम्ह मोर सुभाऊ। जन सन कबहुँ कि करउँ दुराऊ ॥
कवन बस्तु असि प्रिय मोहि लागी। जो मुनिबर न सकहु तुम्ह मागी ॥
जन कहुँ कछु अदेय नहिं मोरें। अस बिस्वास तजहु जनि भोरें ॥
तब नारद बोले हरषाई । अस बर मागउँ करउँ ढिठाई ॥
जद्यपि प्रभु के नाम अनेका। श्रुति कह अधिक एक तें एका ॥
राम सकल नामन्ह ते अधिका। होउ नाथ अघ खग गन बधिका ॥
दोहा — मूल पाठ
राका रजनी भगति तव राम नाम सोइ सोम।
अपर नाम उडगन बिमल बसुहुँ भगत उर ब्योम ॥ ४२(क) ॥
दोहा — मूल पाठ
एवमस्तु मुनि सन कहेउ कृपासिंधु रघुनाथ।
तब नारद मन हरष अति प्रभु पद नायउ माथ ॥ ४२(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
नारद जानते हैं कि प्रभु भक्त से कुछ नहीं छिपाते और उसे देने योग्य किसी वस्तु में संकोच नहीं करते। वे वर माँगते हैं कि अनेक दिव्य नामों में रामनाम विशेष महिमा पाए और पापरूपी पक्षियों का विनाशक हो। भक्ति को पूर्णिमा की रात, रामनाम को चंद्रमा और दूसरे नामों को निर्मल तारों की उपमा दी गई है। श्रीराम ‘एवमस्तु’ कहते हैं और नारद आनंदित होकर प्रणाम करते हैं।
अति प्रसन्न रघुनाथहि जानी। पुनि नारद बोले मृदु बानी ॥
राम जबहिं प्रेरेउ निज माया। मोहेहु मोहि सुनहु रघुराया ॥
तब बिबाह मैं चाहउँ कीन्हा। प्रभु केहि कारन करै न दीन्हा ॥
सुनु मुनि तोहि कहउँ सहरोसा। भजहिं जे मोहि तजि सकल भरोसा ॥
करउँ सदा तिन्ह कै रखवारी। जिमि बालक राखइ महतारी ॥
गह सिसु बच्छ अनल अहि धाई। तहँ राखइ जननी अरगाई ॥
प्रौढ़ भएँ तेहि सुत पर माता। प्रीति करइ नहिं पाछिलि बाता ॥
मोरे प्रौढ़ तनय सम ग्यानी। बालक सुत सम दास अमानी ॥
जनहि मोर बल निज बल ताही। दुहु कहँ काम क्रोध रिपु आही ॥
यह बिचारि पंडित मोहि भजहीं। पाएहुँ ग्यान भगति नहिं तजहीं ॥
दोहा — मूल पाठ
काम क्रोध लोभादि मद प्रबल मोह कै धारि।
तिन्ह महँ अति दारुन दुखद मायारूपी नारि ॥ ४३ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
नारद पूछते हैं कि पूर्व मोह के समय प्रभु ने उनका विवाह क्यों नहीं होने दिया। श्रीराम कहते हैं कि सभी अन्य आश्रय छोड़ भजन करने वाले की वे माँ के समान रक्षा करते हैं, जैसे माँ बच्चे को आग या सर्प की ओर नहीं जाने देती। ज्ञानी और निष्काम सेवक की स्थिति समझाकर वे बताते हैं कि ज्ञान प्राप्त होने पर भी भक्ति नहीं छोड़नी चाहिए; विकार दोनों के लिए शत्रु हैं।
अवगुन मूल सूलप्रद प्रमदा सब दुख खानि।
ताते कीन्ह निवारन मुनि मैं यह जियँ जानि ॥ ४४ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
नारद के संन्यासी-वैराग्य के प्रसंग में विषयासक्ति की बाधा को स्त्री के रूपक से अनेक ऋतुओं, अंधकार और मछली पकड़ने की बंसी जैसी उपमाओं में समझाया गया है। अर्थ का केंद्र उनके व्यक्तिगत मोह से बचाव और साधना की रक्षा है। श्रीराम कहते हैं कि इसी कल्याण की दृष्टि से उन्होंने उस समय नारद को विवाह से रोका था। यह कथासंवाद अपने प्रसंग सहित पढ़ा गया है।
प्रभु का स्नेह सुनकर नारद भावविह्वल होते हैं और संतों के लक्षण पूछते हैं। श्रीराम ऐसे संत बताते हैं जो छह विकारों को जीत चुके, निष्काम, स्थिर, शुद्ध, विवेकी, संयमी और सत्यप्रिय हैं। वे दूसरों को सम्मान देते, स्वयं अभिमान नहीं रखते और धर्म का मर्म जानते हैं। उन्हें प्रभु के चरणों से बढ़कर अपना शरीर या घर भी प्रिय नहीं होता।
निज गुन श्रवन सुनत सकुचाहीं। पर गुन सुनत अधिक हरषाहीं ॥
सम सीतल नहिं त्यागहिं नीती। सरल सुभाउ सबहिं सन प्रीती ॥
जप तप ब्रत दम संजम नेमा। गुरु गोबिंद बिप्र पद प्रेमा ॥
श्रद्धा छमा मयत्री दाया। मुदिता मम पद प्रीति अमाया ॥
बिरति बिबेक बिनय बिग्याना। बोध जथारथ बेद पुराना ॥
दंभ मान मद करहिं न काऊ। भूलि न देहिं कुमारग पाऊ ॥
गावहिं सुनहिं सदा मम लीला। हेतु रहित परहित रत सीला ॥
मुनि सुनु साधुन्ह के गुन जेते। कहि न सकहिं सारद श्रुति तेते ॥
छंद — मूल पाठ
कहि सक न सारद सेष नारद सुनत पद पंकज गहे।
अस दीनबंधु कृपाल अपने भगत गुन निज मुख कहे ॥
सिरु नाइ बारहिं बार चरनन्हि ब्रह्मपुर नारद गए ॥
ते धन्य तुलसीदास आस बिहाइ जे हरि रँग रँए ॥
दोहा — मूल पाठ
रावनारि जसु पावन गावहिं सुनहिं जे लोग।
राम भगति दृढ़ पावहिं बिनु बिराग जप जोग ॥ ४६(क) ॥
दोहा — मूल पाठ
दीप सिखा सम जुबति तन मन जनि होसि पतंग।
भजहि राम तजि काम मद करहि सदा सतसंग ॥ ४६(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
संत अपनी प्रशंसा से संकोच और दूसरे के गुण सुनकर प्रसन्न होते हैं। उनमें शांति, सरलता, नीति, श्रद्धा, क्षमा, मैत्री, दया, विनय और निष्कपट प्रभुप्रेम होता है। वे बिना स्वार्थ परहित करते हैं। नारद चरणों में प्रणाम करके लौटते हैं। अंतिम ‘क’ दोहा रामयश के गायन-श्रवण से दृढ़ भक्ति और ‘ख’ दोहा काम-मद छोड़ रामभजन तथा निरंतर सत्संग का संदेश देता है।
अर्थ: कलियुग के कलुषों का नाश करने वाले श्रीरामचरितमानस का तीसरा सोपान यहाँ समाप्त होता है।
पारायण-संकेत: क्रमांक 29 (क) के बाद नवान्हपारायण का छठा विश्राम; अंत में मासपारायण का बाईसवाँ विश्राम।
पाठ-स्रोत और मिलान संबंधी जानकारी
मूल रचना गोस्वामी तुलसीदास की है। क्रम और देवनागरी पाठ के लिए उपलब्ध डिजिटल मूल पाठ तथा संदिग्ध टंकण के लिए गीताप्रेस के मुद्रित मूल पाठ का मिलान किया गया है। किसी आधुनिक अनुवाद का अर्थ यहाँ प्रतिलिपि नहीं किया गया है।
डिजिटल पृष्ठ पर मंगलाचरण से क्रमांक 4 तक दोहराया प्रारंभ एक बार रखा गया है।
स्पष्ट टंकण-दोष: अभ्दुतं → अद्भुतं, सनु सीता → सुनु सीता, उमय → उभय, मेध → मेघ, धीर धीर → धीर धरि, कुभंज → कुंभज, रधुबीर → रघुबीर, सिरु नाह → सिरु नाइ। युद्ध-छंद में मुद्रित ‘तब चले बान कराल’ रखा गया है।
क्रमांक 5, 6, 19, 20, 21, 29, 37, 38, 39, 42 और 46 के क–ख दोनों समापन-पाठ सुरक्षित हैं। जटायु-स्तुति के चार छंदों के आंतरिक क्रमांक काण्ड के दोहा-क्रम से अलग हैं।
अन्य शब्द सामान्यतः चयनित डिजिटल पाठ के अनुसार हैं; संस्करणों में वर्तनी और पाठांतर मिल सकते हैं।
🚩 श्री राम भजन ओ मेरे रघुवर तू ही सहारा है प्रभु श्रीराम के प्रति प्रेम, विश्वास और पूर्ण समर्पण से भरा सुंदर भक्तिमय भजन। ▶ Instagram पर भजन देखें भजन लिरिक्स ॥ श्री राम ॥ ओ मेरे रघुवर तू ही सहारा है, मेरी नैय्यां का तू ही किनारा है।। ओ मेरे रघुवर तू ही सहारा है, मेरे रघुवर तू ही सहारा है।। मेरे ख्वाबों में तू, मेरी स्वासों में तू, मेरे दिल की धड़कन में, बस तू ही तू। मेरे ख्वाबों में तू, मेरी स्वासों में तू, मेरे दिल की धड़कन में, बस तू ही तू।। दीवाने तेरे प्यार में, बड़ा ही बुरा हाल, है पड़ा हूँ तेरे दर पे, ना होश ना ख्याल। मेरी नैय्यां का तू ही किनारा है, ओ मेरे रघुवर तू ही सहारा है, मेरे रघुवर तू ही सहारा है।। मेरी नैय्यां का तू ही किनारा है।। अंधेरों में जैसे उजाले हो तुम उजाले ही तुम, गिरतों को कितने सम्हाले हो तुम, सम्हाले ही तुम। तेरे बिना रघुवर मेरी, दुनियाँ वीरान है, तेरी किरपा से मेरी दुनियाँ में पहिचान है। मेरी नैय्यां का तू ही किनारा है, ओ मेरे रघुवर तू ही...
🚩 श्रीरामचरितमानस श्रीरामचरितमानस की 24 प्रसिद्ध चौपाइयाँ प्रेम, भक्ति, सत्संग, कर्म, सद्बुद्धि, परोपकार और प्रभु श्रीराम की कृपा का मार्ग दिखाने वाली श्रीरामचरितमानस की प्रसिद्ध चौपाइयाँ सरल हिंदी अर्थ सहित। श्रीरामचरितमानस गोस्वामी तुलसीदासजी की अमर रचना है। इसमें प्रभु श्रीराम की कथा के साथ जीवन, भक्ति, धर्म, प्रेम, कर्म, सदाचार, सत्संग और लोककल्याण की अनेक शिक्षाएँ मिलती हैं। यहाँ 24 प्रसिद्ध चौपाइयों को सरल भावार्थ के साथ प्रस्तुत किया गया है, ताकि उनके संदेश को सहज रूप से समझा और जीवन में अपनाया जा सके। 📜 इस संग्रह में ❤️ प्रेम और भक्ति 🌿 जीवन और नीति 🙏 संकट और विश्वास 🚩 रामराज्य और आदर्श जीवन ❤️ प्रेम और भक्ति प्रभु-प्रेम, समर्पण और निर्मल हृदय का संदेश 01 प्रभु को केवल प्रेम प्रिय है रामहि केवल प्रेमु पिआरा। जानि लेउ जो जाननिहारा॥ ...
🌺 श्रीरामचरितमानस • बालकाण्ड जय जय गिरिवरराज किशोरी — सीता जी की गौरी स्तुति पुष्पवाटिका में प्रभु श्रीराम के दर्शन के बाद माता सीता द्वारा माता गौरी से की गई पावन प्रार्थना, संपूर्ण प्रसंग और सरल हिंदी अर्थ सहित। माता सीता ने गौरी स्तुति कब की? श्रीरामचरितमानस के बालकाण्ड में जनकपुर की पुष्पवाटिका का अत्यंत सुंदर प्रसंग आता है। माता सीता अपनी सखियों के साथ गौरी पूजन के लिए आई थीं। इसी वाटिका में उन्होंने पहली बार प्रभु श्रीराम को देखा। श्रीराम के दिव्य स्वरूप को देखकर उनका मन प्रेम से भर गया। उसी समय उन्हें अपने पिता महाराज जनक का वह प्रण भी स्मरण हुआ कि जो शिवजी के महान धनुष को उठाकर तोड़ेगा, उसी से सीता का विवाह होगा। माता सीता श्रीराम की छवि को हृदय में धारण करके पुनः माता भवानी के मंदिर में गईं और हाथ जोड़कर प्रार्थना करने लगीं। 🌸 पुष्पवाटिका में श्रीराम के दर्शन 🏹 पिता जनक के प्रण का स्मरण 🙏 गौरी माता से प्रार्थना ...
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