श्रीरामचरितमानस अयोध्याकाण्ड भाग 5 | पादुका-प्रदान, भरत का नंदिग्राम-व्रत और अयोध्याकाण्ड सम्पूर्ण | दोहा 241–326 अर्थ सहित
श्रीरामचरितमानस
अयोध्याकाण्ड — भाग ५
जनकजी का परामर्श, पादुका-प्रदान और नंदिग्राम में भरतजी का व्रत
दोहा २४१–३२६ · अंतिम भाग · बीच की सभी चौपाइयाँ एवं चार छंद · मूल पाठ और सरल हिंदी अर्थ
भरत-चरित्र से अयोध्याकाण्ड के समापन तक
यह अंतिम भाग दोहा २४० के राम–भरत मिलन के ठीक बाद की चौपाइयों से शुरू होता है। यहाँ दोनों राजसमाजों का चित्रकूट में मिलना, जनकजी का परामर्श, भरतजी की निष्काम सेवा-विनती, राम का राजधर्म-उपदेश, पादुका-प्रदान, भरतकूप, अयोध्या-वापसी और नंदिग्राम का व्रत क्रम से पढ़ें। अंतिम सोरठा ३२६ के बाद मूल समापन-वचन भी दिया है।
भागों की संख्या कम रखने के लिए ८६ क्रमांक एक साथ रखे हैं। हर क्रमांक के पहले की पूरी चौपाइयाँ और उनका समेकित सरल हिंदी अर्थ है। छंद और दोहा/सोरठा का अर्थ अलग दिया है। यह मूल पाठ की स्वतंत्र अध्ययन-सहायक व्याख्या है, शब्दशः टीका नहीं।
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क्रमांक २४१–२५०
क्रमांक २५१–२६०
क्रमांक २६१–२७०
क्रमांक २७१–२८०
क्रमांक २८१–२९०
क्रमांक २९१–३००
क्रमांक ३०१–३१०
क्रमांक ३११–३२०
क्रमांक ३२१–३२६
भाइयों के मिलन की अवर्णनीय प्रीति
चौपाइयाँ — मूल पाठ
कवि कहते हैं कि राम और भरत के पूर्ण प्रेम को शब्दों में बाँधना कठिन है। दोनों अपनी सुधि भूल गए हैं। देवता पहले आशंकित होते हैं, फिर बृहस्पति के समझाने पर प्रेममय मिलन की प्रशंसा करके फूल बरसाते हैं।
दोहा २४१
राम शत्रुघ्न और गुह से प्रेमपूर्वक मिलते हैं; भरत और लक्ष्मण भी अत्यंत स्नेह से मिलकर प्रणाम करते हैं।
सीताजी का आशीष और समाज का समाचार
चौपाइयाँ — मूल पाठ
लक्ष्मण छोटे भाई और गुह से मिलते हैं। दोनों भाई मुनियों को प्रणाम करके सीता के चरणों की धूल सिर पर रखते हैं। सीता प्रेम से उठाकर आशीष देती हैं; उनका अनुकूल भाव देखकर भरत का भय मिट जाता है।
दोहा २४२
गुह हाथ जोड़कर बताते हैं कि गुरु, सभी माताएँ, नगरवासी, सेवक, सेनापति और मंत्री वियोग से व्याकुल होकर साथ आए हैं।
वसिष्ठ और गुह का आत्मीय मिलन
चौपाइयाँ — मूल पाठ
गुरु के आने का समाचार सुनकर राम शत्रुघ्न को सीता के पास रखकर शीघ्र जाते हैं। वसिष्ठ दोनों भाइयों को हृदय से लगाते हैं। गुह दूर से प्रणाम करते हैं, पर मुनि उन्हें आगे बढ़कर अपनाते हैं; देवता भक्ति की महिमा सराहते हैं।
दोहा २४३
गुह को देखकर वसिष्ठ का विशेष प्रेम से मिलना सीतापति की भक्ति का प्रत्यक्ष प्रभाव बताया गया है।
सबसे मिलकर माताओं को धीरज देना
चौपाइयाँ — मूल पाठ
राम सबके भाव के अनुसार मिलकर उनका संताप मिटाते हैं। अनेक पात्रों में एक सूर्य की छवि की तरह उनकी सर्वव्यापक कृपा का वर्णन है। वे पहले कैकेयी के चरण छूकर मिलते और समय-कर्म की गति बताकर उनका संकोच घटाते हैं।
दोहा २४४
सभी माताओं को संतोष देकर राम कहते हैं—जगत ईश्वराधीन है; किसी को दोष देकर अपना दुःख न बढ़ाएँ।
माताओं से मिलन और आश्रम की ओर जाना
चौपाइयाँ — मूल पाठ
दोनों भाई गुरु और अन्य मुनियों की पत्नियों को प्रणाम कर आशीर्वाद लेते हैं। सुमित्रा और कौसल्या से मिलन में आनंद तथा शोक दोनों उमड़ते हैं। राम गुरु को आश्रम पधारने को कहते हैं; नगरवासी उपयुक्त स्थानों पर पड़ाव करते हैं।
दोहा २४५
ब्राह्मण, मंत्री, माताएँ, गुरु और प्रमुख जन साथ लेकर भरत-लक्ष्मण सहित राम पवित्र आश्रम की ओर जाते हैं।
सीताजी का माताओं से करुण मिलन
चौपाइयाँ — मूल पाठ
सीता गुरु और मुनिपत्नियों को प्रणाम कर आशीर्वाद पाती हैं। शोकग्रस्त सासों को देखकर सहम जाती हैं। फिर धैर्य रखकर सबके चरणों में झुकती हैं; दोनों ओर के स्नेह से वातावरण करुणा में भर जाता है।
दोहा २४६
सीता अत्यंत प्रेम से प्रत्येक सास के चरण पकड़कर मिलती हैं; वे हृदय से उन्हें अखंड सौभाग्य का आशीष देती हैं।
दशरथ के निधन का समाचार और पितृकर्म
चौपाइयाँ — मूल पाठ
वसिष्ठ सबको बैठाकर जगत की परिवर्तनशीलता समझाते और दशरथ के स्वर्गगमन का समाचार देते हैं। अपने प्रेम को पिता की मृत्यु का कारण जानकर राम अत्यंत दुःखी होते हैं। सब स्नान करते हैं और उस दिन शोक में जल तक नहीं लेते।
दोहा २४७
अगली सुबह मुनि ने जो पितृकर्म बताए, राम ने श्रद्धा और भक्ति के साथ उनका आदरपूर्वक पालन किया।
समाज की कठिनाई देखकर राम की चिंता
चौपाइयाँ — मूल पाठ
पितृकर्म के बाद राम गुरु से कहते हैं कि सब वन में फल-मूल और जल पर रहकर दुःख पा रहे हैं। भरत, माताओं और मंत्रियों की दशा देखकर उन्हें समय युग जैसा लगता है। वे सबको नगर ले जाने का निवेदन करते हैं।
दोहा २४८
गुरु उनकी करुणा स्वीकारते हुए कहते हैं कि दुःखी लोग दो दिन और दर्शन पाकर कुछ संतोष तथा विश्राम पा लें।
चित्रकूट के वन में समाज का विश्राम
चौपाइयाँ — मूल पाठ
लौटने की बात से समाज आशंकित होता है, पर गुरु के रुकने के वचन से राहत मिलती है। लोग नदी में स्नान, रामदर्शन और प्रणाम करते हैं। वन के निर्मल जल, सुखद पवन, फल-पुष्प, शिलाओं और वृक्षछाया से आनंद लेते हैं।
दोहा २४९
सरोवरों में कमल, जलपक्षियों की बोली और भ्रमरों की गुंजार है; रंग-बिरंगे पशु-पक्षी वैर छोड़कर वन में विचरते हैं।
वनवासियों की निष्कपट अतिथि-सेवा
चौपाइयाँ — मूल पाठ
कोल, किरात और भील पत्तों के दोने भरकर मधु, फल-मूल और अंकुर लाते हैं। मूल्य लेने से मना करके स्वाद और उपयोग बताते हैं। राम के समान उनके परिवार-प्रजा को भी अपनाने की इच्छा से विनम्रतापूर्वक अपनी भेंट स्वीकारने को कहते हैं।
दोहा २५०
वे कहते हैं—हमारा प्रेम देखकर संकोच छोड़ें और हमें कृतार्थ करने के लिए ये वनफल तथा अंकुर ग्रहण करें।
सरल वनवासी प्रेम की महिमा
चौपाइयाँ — मूल पाठ
वनवासी अपनी सीमाएँ और पुराने दुर्गुण विनय से कहते हैं। रामदर्शन से दुःख-दोष मिटने और सेवा की बुद्धि जागने का अनुभव बताते हैं। नगरवासी उनकी निष्कपट वाणी और भाग्य देखकर प्रेम में भर जाते हैं।
छंद — मूल पाठ
लोग वनवासियों के बोलने-मिलने और सीता-राम के चरणप्रेम की प्रशंसा करते हैं। तुलसी प्रभुकृपा को ऐसा आश्रय कहते हैं जिससे लोहे के साथ साधारण सहचारी वस्तु भी तर जाती है।
सोरठा २५१
लोग प्रसन्न होकर प्रतिदिन वन में घूमते हैं, जैसे वर्षा की पहली बौछारों से मेंढक और मोर हृष्ट-पुष्ट हो उठते हैं।
माताओं की सेवा और कैकेयी का पश्चात्ताप
चौपाइयाँ — मूल पाठ
कथा में सीता प्रत्येक सास की समान रूप से सेवा करने के लिए अलग रूप बनाती हैं; इसका रहस्य राम जानते हैं। उनकी सेवा से माताएँ सुख पाती हैं। राम-सीता-लक्ष्मण की सरलता देखकर कैकेयी गहरे पश्चात्ताप में हैं; सबको लौटने का संशय है।
दोहा २५२
भरत की निर्मल चिंता इतनी बढ़ती है कि न दिन में भूख, न रात में नींद; वे घटते जल में फँसी मछली जैसे व्याकुल हैं।
राम को लौटाने का उपाय सोचते भरत
चौपाइयाँ — मूल पाठ
भरत विचार करते हैं कि गुरु राम की रुचि देखकर ही कहेंगे और कौसल्या हठ नहीं करेंगी। स्वयं सेवक होकर दबाव देना भी अनुचित लगता है। कोई उपाय स्थिर नहीं होता और रात बीतती है। सुबह मुनि उन्हें सभा में बुलाते हैं।
दोहा २५३
गुरु के चरणों में प्रणाम करके भरत आज्ञा से बैठते हैं; ब्राह्मण, प्रमुख नगरजन और मंत्री सभा में इकट्ठा होते हैं।
राम की आज्ञा और हित का आधार
चौपाइयाँ — मूल पाठ
वसिष्ठ सभा से कहते हैं कि राम सत्यनिष्ठ, धर्मपालक और नीति-प्रेम के ज्ञाता हैं। गुरु और माता-पिता की मर्यादा रखते हुए उनका अवतार लोकमंगल के लिए है। सभी शक्तियाँ और अधिकार उनकी आज्ञा के अधीन हैं।
दोहा २५४
राम की आज्ञा और इच्छा की रक्षा में सबका हित है; सभा मिलकर इसी आधार पर उचित निर्णय करे।
गुरु से समाधान की आशा
चौपाइयाँ — मूल पाठ
मुनि कहते हैं कि राम का अभिषेक सबको सुख देगा, इसलिए उचित उपाय बताया जाए। सभा मौन है। भरत गुरु की कृपा को अपने वंश और जगत के कल्याण का सहारा बताते हैं; उनसे उपाय पूछे जाने को अपना दुर्भाग्य मानते हैं।
दोहा २५५
भरत विनय करते हैं कि उपाय उनसे पूछा जा रहा है, जबकि सब गुरु के हाथ में है; यह प्रेमभरी बात सुनकर गुरु का स्नेह उमड़ता है।
वनवास अपने ऊपर लेने को तत्पर भरत
चौपाइयाँ — मूल पाठ
वसिष्ठ सुझाव देते हैं कि भरत-शत्रुघ्न वन जाएँ और राम-सीता-लक्ष्मण लौटें। दोनों भाई इसे सुनकर अत्यंत प्रसन्न होते हैं। भरत कहते हैं कि राम का लौटना हो तो वे जन्मभर वनवास भी सबसे बड़ा लाभ मानेंगे।
दोहा २५६
वे गुरु से अनुरोध करते हैं कि यदि यह सच्चा प्रस्ताव है तो उसे पूरा करें; राम-सीता और गुरु उनके अंतरभाव जानते हैं।
वसिष्ठ का राम से समाधान पूछना
चौपाइयाँ — मूल पाठ
भरत का प्रेम देखकर मुनि और सभा भावमग्न हैं; कवि उनकी महिमा को अगाध समुद्र कहते हैं। सब राम के पास जाते हैं। राम सम्मानपूर्वक आसन देते हैं और वसिष्ठ समय-परिस्थिति के अनुरूप उनसे बात करते हैं।
दोहा २५७
मुनि कहते हैं—आप सबके हृदय के भाव जानते हैं; नगरवासियों, माताओं और भरत का हित हो, ऐसा उपाय कहें।
भरत की विनती सुनने का आग्रह
चौपाइयाँ — मूल पाठ
राम गुरु की आज्ञा को सबके हित का उपाय बताते हैं और पहले कही सीख मानने को तत्पर हैं। वसिष्ठ स्वीकारते हैं कि भरत के प्रेम ने उन्हें भी बाँध लिया है; उनके भाव का सम्मान करके निर्णय होना चाहिए।
दोहा २५८
गुरु कहते हैं—भरत की विनती आदर से सुनें, फिर संतमत, लोकमत, राजधर्म और वेदसार का विचार करके उचित करें।
राम द्वारा भरत की महिमा स्वीकारना
चौपाइयाँ — मूल पाठ
गुरु का भरत पर अनुराग देखकर राम प्रसन्न होते हैं। वे पिता के चरणों की आन लेकर भरत जैसा भाई न होने की बात कहते हैं। गुरु की कृपा उनका विशेष सौभाग्य है और भरत की बात करने में राम भी संकोच रखते हैं।
दोहा २५९
गुरु भरत से कहते हैं कि संकोच छोड़कर करुणामय प्रिय भाई के सामने हृदय की बात कहें।
बाल्यकाल से राम की उदारता का स्मरण
चौपाइयाँ — मूल पाठ
भरत उत्तर देने का भार देखकर भावविह्वल होते हैं। कहते हैं कि राम ने अपराध पर भी क्रोध नहीं किया, बचपन से साथ रखा और कभी मन नहीं तोड़ा। खेल में स्वयं हारकर उन्हें जिताने तक की कृपा की है।
दोहा २६०
प्रेम और संकोच से भरत खुलकर कह नहीं पाते; उनकी प्रेमप्यासी आँखें आज तक दर्शन से तृप्त नहीं हुईं।
माता को दोष देने से भरत का पीछे हटना
चौपाइयाँ — मूल पाठ
भरत कहते हैं कि माता को दुष्ट और स्वयं को अच्छा मानना भी भीतर की कुटिलता होगी। वे अपने दुर्भाग्य को कारण मानकर माता पर व्यर्थ क्रोध करने का पछतावा करते हैं। गुरु और सीता-राम के आश्रय से मंगल की आशा रखते हैं।
दोहा २६१
पवित्र सभा में वे सच्चा भाव रखते हैं; उनके प्रेम में छल या सत्य क्या है, इसे मुनि और राम जानते हैं।
सबका दुःख देखकर भरत की आत्मपीड़ा
चौपाइयाँ — मूल पाठ
भरत पिता की मृत्यु, माताओं की व्याकुलता और नगर के संताप का स्मरण करते हैं। राम-सीता-लक्ष्मण के पैदल वनगमन तथा निषाद के प्रेम का समाचार सुनकर भी जीवित रहने पर ग्लानि कहते हैं। अब सब प्रत्यक्ष देखकर उनकी वेदना गहरी है।
दोहा २६२
वे कहते हैं कि जिनकी कोमलता देखकर विषैले जीव भी सौम्य हो जाएँ, उनसे विरोध रखने वाली माता के पुत्र के सिवा यह दुःख कौन सहेगा?
राम का भरत को निर्दोष बताना
चौपाइयाँ — मूल पाठ
भरत की व्यथा से सभा शोक में डूबती है। मुनि उन्हें समझाते हैं। राम स्वयं उन्हें व्यर्थ ग्लानि न करने को कहते हैं; उनकी पवित्रता की प्रशंसा करके उन पर कपट का आरोप और माता को दोष देना अनुचित बताते हैं।
दोहा २६३
राम कहते हैं कि भरत का नाम स्मरण भी पाप-प्रपंच और अमंगल घटाकर लोक में सुयश तथा परलोक में सुख देने वाला होगा।
राम का प्रेमपूर्ण आश्वासन
चौपाइयाँ — मूल पाठ
राम कहते हैं कि वे भरत को भलीभाँति जानते हैं; प्रेम और वैर छिपते नहीं। दशरथ ने सत्य और प्रेम दोनों निभाए, इसलिए उनका वचन बदलने में संकोच है। फिर भी गुरु की आज्ञा और भरत के प्रेम का पूरा आदर करते हैं।
दोहा २६४
राम भरत से प्रसन्न मन और निष्संकोच होकर अपनी इच्छा कहने को कहते हैं; इस सत्यनिष्ठ वचन से सभा आनंदित होती है।
देवताओं का भरत की शरण का विचार
चौपाइयाँ — मूल पाठ
देवता फिर देवकार्य के कारण चिंतित होते हैं, पर समझते हैं कि राम भक्त के प्रेम के वश हैं। अंबरीष-दुर्वासा और प्रह्लाद की कथाएँ याद कर वे भरत के निष्कपट गुणों को बाधा देने के बदले उनका स्मरण करने का निश्चय करते हैं।
दोहा २६५
बृहस्पति इसे सौभाग्य कहते हैं; भरत के चरणों में अनुराग को जगत के मंगल का मूल बताते हैं।
भरत का निष्कर्ष: राम की आज्ञा ही हित
चौपाइयाँ — मूल पाठ
बृहस्पति देवताओं को भरत को राम की छाया समझकर न डरने को कहते हैं। राम अंतरभाव जानते हैं। भरत अपने ऊपर निर्णय का भार पहचानकर निश्चय करते हैं कि उनका वास्तविक भला राम की आज्ञा में है; प्रभु ने उनके प्रेम का पूरा सम्मान किया है।
दोहा २६६
सीतानाथ के अपार अनुग्रह का अनुभव करके भरत प्रणाम करते और दोनों हाथ जोड़कर फिर विनय करते हैं।
शरणागत पर राम की छाया
चौपाइयाँ — मूल पाठ
भरत कहते हैं कि गुरु और प्रभु की अनुकूलता से उनके कल्पित भय मिट गए। दुर्भाग्य तथा कठिन समय के बीच भी राम ने शरणागत की रक्षा की। वे प्रभु की उदारता को कल्पवृक्ष की शीतल छाया जैसी सबके लिए उपलब्ध कहते हैं।
दोहा २६७
जो राजा-गरीब, अच्छा-बुरा कोई भी उचित आश्रय लेकर निकट आता है, वह मनचाहा कल्याण और चिंता से राहत पाता है।
भरत के अनेक विकल्प और सेवा का भाव
चौपाइयाँ — मूल पाठ
भरत कहते हैं कि अपना सुख चाहकर स्वामी को संकोच में डालना उचित सेवा नहीं। राम का लौटना सबकी कामना है; अभिषेक का सामान भी लाए हैं। वे उसे स्वीकार करने या अपने लिए कोई सेवापूर्ण विकल्प देने की विनती करते हैं।
दोहा २६८
भरत चाहते हैं कि उन्हें शत्रुघ्न सहित वन भेजकर राम लौटें; अन्यथा दोनों भाई लौटें और उन्हें राम के साथ रहने दें।
अंतिम निर्णय राम की प्रसन्नता पर छोड़ना
चौपाइयाँ — मूल पाठ
भरत यह विकल्प भी देते हैं कि तीनों छोटे भाई वन जाएँ और राम-सीता लौटें। फिर मानते हैं कि अपनी व्याकुलता में स्वार्थ की बातें कह गए। अब वे स्वामी के मन में तनिक भी संकोच न आने देने को सर्वोपरि रखते हैं।
दोहा २६९
प्रभु प्रसन्न मन से जिसे जो आज्ञा देंगे, सब उसे सिर पर रखेंगे; इसी से सारी उलझन और विघ्न मिटेंगे।
जनकजी के दूतों का आगमन
चौपाइयाँ — मूल पाठ
भरत की निर्मल बात से देवता प्रसन्न, वनवासी आनंदित और अवधवासी असमंजस में हैं। राम मौन हैं। तभी जनक के दूत आते हैं। वसिष्ठ उन्हें बुलाकर कुशल पूछते हैं; राम का तपस्वीवेश देखकर वे दुःखी होते हैं।
दोहा २७०
दूत कहते हैं कि असल कुशल तो दशरथ के साथ चली गई; मिथिला-अयोध्या ही नहीं, सारा जगत अपने को अनाथ अनुभव कर रहा है।
जनकजी द्वारा भरत का भाव जानना
चौपाइयाँ — मूल पाठ
दूत बताते हैं कि दशरथ के निधन और वनवास की घटना से जनक तथा मिथिला शोक में डूब गए। मंत्रियों से स्पष्ट उपाय न मिलने पर जनक ने चार गुप्तचर भेजे कि भरत का वास्तविक भाव और आचरण जानकर लौटें।
दोहा २७१
गुप्तचरों ने अयोध्या में भरत की करनी देखी; भरत के चित्रकूट चलने पर वे समाचार लेकर मिथिला लौटे।
जनकजी का चित्रकूट की ओर प्रस्थान
चौपाइयाँ — मूल पाठ
भरत का आचरण सुनकर जनक और परिवार प्रेम-शोक से व्याकुल हुए। राज्य की सुरक्षा करके वे सवारियों सहित तुरंत चले। प्रयाग स्नान और यमुना की ओर बढ़ने के बाद हाल जानने दूत भेजे गए; वसिष्ठ उन्हें मार्गदर्शक देकर लौटाते हैं।
दोहा २७२
जनक के आने का समाचार सुनकर अवध का समाज प्रसन्न हुआ; राम को संकोच और इंद्र को अपनी आशंका बढ़ती प्रतीत हुई।
अवधवासियों की रामराज्य की कामना
चौपाइयाँ — मूल पाठ
कैकेयी अपने कर्म से लज्जित हैं। अन्य लोग जनक के आने से कुछ दिन और दर्शन की आशा पाते हैं। सुबह स्नान-पूजन करके सब चाहते हैं कि राम राजा, जानकी रानी और भरत युवराज बनें तथा सब अयोध्या लौटें।
दोहा २७३
सबकी प्रार्थना है कि गुरु और भाइयों सहित राम का राज्य हो तथा वे उनके अयोध्या में रहते जीवन पूरा करें।
जनकजी के स्वागत को राम का उठना
चौपाइयाँ — मूल पाठ
लोग राम के बचपन से परिचित शील, नीति, प्रेम और सरलता की चर्चा करते हैं। हर सामाजिक स्थिति के व्यक्ति को अपनी भावना के अनुसार सम्मान और दर्शन मिलते हैं। सब स्वयं को सौभाग्यशाली मानते हैं कि राम उन्हें अपना समझते हैं।
दोहा २७४
जनक के आने का समाचार मिलते ही प्रेममग्न राम पूरी सभा सहित तत्परतापूर्वक स्वागत के लिए उठ खड़े होते हैं।
जनक और राम का प्रेमपूर्ण मिलन
चौपाइयाँ — मूल पाठ
राम गुरु, भाइयों, मंत्रियों और नगरवासियों के साथ आगे जाते हैं। जनक चित्रकूट देखकर रथ छोड़ प्रणाम करते हैं। दोनों समाज मिलते हैं; जनक मुनियों को और राम ऋषियों को प्रणाम करते हैं। राम सबको आश्रम ले चलते हैं।
दोहा २७५
रूपक में आश्रम शांत रस का पवित्र समुद्र है और आती सेना करुणा की नदी, जिसे राम साथ ला रहे हैं।
दोनों समाजों की करुणा का समुद्र
चौपाइयाँ — मूल पाठ
कवि शोक को ऐसी नदी कहते हैं जो ज्ञान-वैराग्य और धैर्य के तट भी तोड़ देती है। दोनों राजसमाज आश्रम में मिलकर दशरथ के रूप, गुण और शील स्मरण करते हैं; किसी से गहरा प्रेमाश्रु रोका नहीं जाता।
छंद — मूल पाठ
नर-नारी शोकसागर में डूबकर विपरीत विधि को दोष देते हैं। जनक की दशा देखकर सिद्ध, तपस्वी और मुनि भी प्रेम की धारा पार करने में अपने को असमर्थ पाते हैं।
सोरठा २७६
मुनि जहाँ-तहाँ उपदेश देकर लोगों को सँभालते हैं; वसिष्ठ विशेष रूप से जनक से धैर्य धारण करने को कहते हैं।
ज्ञान के साथ रामप्रेम की महिमा
चौपाइयाँ — मूल पाठ
कवि कहते हैं कि जनक की दशा साधारण मोह नहीं, सीता-राम के प्रेम की महिमा है। ज्ञान भी रामप्रेम के बिना कर्णधारहीन नाव जैसा अधूरा है। मुनि समझाते हैं; सब स्नान करते हैं, पर दुःख में दिन भोजन-जल बिना बीतता है।
दोहा २७७
अगली सुबह दोनों समाज, जनक और राम स्नान करके वटवृक्ष के नीचे बैठते हैं; सबका मन मलिन और शरीर दुर्बल है।
मुनियों का उपदेश और आहार की व्यवस्था
चौपाइयाँ — मूल पाठ
अयोध्या-मिथिला के पुरोहित तथा गुरु धर्म, नीति, वैराग्य और विवेक की बातें कहते हैं। विश्वामित्र भी पुरानी कथाएँ सुनाते हैं। राम पिछले दिन सबके निराहार रहने की चिंता करते हैं; जनक वन में फलाहार को उचित बताते हैं।
दोहा २७८
उसी समय वनवासी अनेक प्रकार के फल, फूल, पत्ते और मूल काँवरों में भरकर बहुत मात्रा में ले आते हैं।
चित्रकूट में जनक का आतिथ्य
चौपाइयाँ — मूल पाठ
कवि चित्रकूट को रामकृपा से शोकहर और आनंदमय बताते हैं। वन, नदी, फल-पुष्प, जीव और सुखद पवन मानो स्वयं जनक के सत्कार को तैयार हैं। स्नान करके लोग अपने-अपने स्थानों पर बैठते हैं।
दोहा २७९
राम के गुरु सबके लिए फल-मूल भेजते हैं; पितर, देवता, अतिथि और गुरु का सम्मान करके सब फलाहार करते हैं।
वन में ही रहने की सबकी इच्छा
चौपाइयाँ — मूल पाठ
चार दिन दर्शन में सुख से बीतते हैं। दोनों समाज सोचते हैं कि सीता-राम के बिना लौटना अच्छा नहीं। स्नान, दर्शन, पवित्र वन-विहार और फलाहार में उनके साथ चौदह वर्ष भी क्षणवत बीत सकते हैं।
दोहा २८०
सब इसे दुर्लभ सौभाग्य मानते हैं; दोनों समाजों में स्वाभाविक रूप से रामचरणों का अनुराग है।
सुनयना और अवध की माताओं का मिलन
चौपाइयाँ — मूल पाठ
सीता की माता उचित अवसर पाकर रानियों से मिलने आती हैं। कौसल्या आदर से आसन देती हैं। दोनों ओर शील और करुणा इतनी है कि कठोर हृदय भी द्रवित हो। सुनयना कोमल परिवार पर पड़े कठोर दुःख को देखकर विधि की विचित्रता कहती हैं।
दोहा २८१
वे कहती हैं कि अमृत का नाम सुनाई देता है, पर विष के अनुभव अधिक हैं; सच्चे दुर्लभ सज्जन का मिलना भी हंस जैसा विरला है।
कौसल्या की विशेष चिंता भरत के लिए
चौपाइयाँ — मूल पाठ
सुमित्रा विधि की विपरीत गति पर दुःख कहती हैं। कौसल्या किसी को दोष न देकर कर्म और ईश्वराधीन जगत की परिवर्तनशीलता समझाती हैं। सुनयना उनकी बात का आदर करती हैं। कौसल्या को तीनों वनयात्रियों के शुभ परिणाम का भरोसा है।
दोहा २८२
वे भर्राए हृदय से कहती हैं कि उन्हें विशेष चिंता भरत की है, जिनका भीतर का वियोग अत्यंत गहरा है।
कौसल्या द्वारा भरत की गुणगाथा
चौपाइयाँ — मूल पाठ
कौसल्या राम की शपथ लेकर भरत के शील, विनय, भाईचारे, भक्ति और भरोसे को अतुल कहती हैं। वे पहले से कुलदीपक थे, पर कठिन समय ने उनका स्वभाव और स्पष्ट दिखाया, जैसे कसौटी सोने-मणि की परीक्षा करती है।
दोहा २८३
धैर्य रखकर कौसल्या सुनयना से कहती हैं कि वे और उनके विवेकनिधि पति स्वयं समझदार हैं; उन्हें कोई क्या उपदेश दे सकता है?
भरत को वन में रखने का प्रस्ताव
चौपाइयाँ — मूल पाठ
कौसल्या सुनयना से अवसर देखकर जनक के सामने लक्ष्मण के लौटने और भरत के वन रहने का विकल्प रखने को कहती हैं। भरत के गूढ़ प्रेम के कारण उनका अयोध्या में रहना कठिन लगता है। रात बीतते देख सुमित्रा समय का ध्यान दिलाती हैं।
दोहा २८४
कौसल्या स्नेह से उन्हें विश्राम-स्थान लौटने को कहती हैं और अपना आश्रय ईश्वर तथा जनक की सहायता में मानती हैं।
सुनयना का आश्वासन
चौपाइयाँ — मूल पाठ
सुनयना कौसल्या के चरण पकड़कर उनके विनय का सम्मान करती हैं। जनक को सेवक और शिव-पार्वती को सदा सहायक कहती हैं। याज्ञवल्क्य के वचन स्मरण कर विश्वास दिलाती हैं कि राम देवकार्य पूरा करके अयोध्या में स्थिर राज्य करेंगे।
दोहा २८५
सीता के हित में विनती करके और चरणों में झुककर सुनयना अनुमति लेती हैं तथा सीता सहित अपने स्थान को जाती हैं।
जनक और जानकी का करुण मिलन
चौपाइयाँ — मूल पाठ
सीता प्रियजनों से मर्यादा के अनुसार मिलती हैं। उनका तपस्वीवेश देखकर सब दुःखी होते हैं। जनक अनुमति से आकर पुत्री को गले लगाते हैं; ज्ञाननिष्ठ जनक के भीतर भी राम-सीता का प्रेम समुद्र की तरह उमड़ता है।
दोहा २८६
माता-पिता का स्नेह देखकर सीता स्वयं को सँभाल नहीं पातीं; फिर समय और अपने धर्म का विचार कर धैर्य धारण करती हैं।
सीता के त्याग पर जनक का गौरव
चौपाइयाँ — मूल पाठ
जनक कहते हैं कि पुत्री ने दोनों कुल पवित्र किए और उनकी कीर्ति जगत में फैली है। माता-पिता आशीष और हितकारी सीख देते हैं। सीता रातभर वहाँ रहने में संकोच करती हैं; माता उनका संकेत समझकर जनक को बताती हैं।
दोहा २८७
सीता को ससम्मान विदा करके सुनयना उचित अवसर पर भरत की दशा और कौसल्या की चिंता जनक के सामने रखती हैं।
जनक की दृष्टि में भरत की अतुलनीयता
चौपाइयाँ — मूल पाठ
भरत का आचरण सुनकर जनक पुलकित होते हैं। वे कहते हैं कि धर्म, राजनीति और ब्रह्मविचार की उनकी समझ भी भरत की महिमा पूरी नहीं छू सकती। भरत की भक्ति, शील और पवित्र कर्मगाथा सबके लिए सुखद है।
दोहा २८८
भरत असीम गुणों वाले अनुपम पुरुष हैं; उनकी उपमा स्वयं भरत ही हैं, जैसे सुमेरु को छोटे मानक से नापा नहीं जा सकता।
भरत राम की आज्ञा नहीं टालेंगे
चौपाइयाँ — मूल पाठ
जनक स्वीकारते हैं कि लक्ष्मण के लौटने और भरत के वन जाने में सबको लाभ दिखता है। फिर भी दोनों भाइयों के प्रेम और विश्वास को ऐसे तर्क से नहीं बदला जा सकता। भरत का साधन और सिद्धि केवल रामचरणों का प्रेम है।
दोहा २८९
जनक कहते हैं कि भरत भूलकर भी मन में राम की आज्ञा नहीं टालेंगे; केवल स्नेहवश चिंता न की जाए।
समाज के हित के लिए राम का गुरु से निवेदन
चौपाइयाँ — मूल पाठ
राम-भरत के गुण कहते जनक-सुनयना की रात बीतती है। सुबह राम गुरु से कहते हैं कि माताएँ, भरत, नगरवासी और जनक का समाज लंबे समय से वनकष्ट सह रहे हैं; सबके हित का उचित उपाय करें। गुरु उनके संकोच का सम्मान करते हैं।
दोहा २९०
गुरु राम को प्राणों का प्राण और सुख का सुख कहते हैं; उनके बिना घर भी किसी को अच्छा नहीं लगता।
जनक से असमंजस सुलझाने की प्रार्थना
चौपाइयाँ — मूल पाठ
गुरु प्रेम को सुख, कर्म और ज्ञान की सार्थकता बताते हैं तथा राम को आश्रम भेजते हैं। फिर जनक के पास जाकर राम की करुणामयी बात कहते हैं और धर्म के साथ सभी का हित हो ऐसा निर्णय करने को कहते हैं।
दोहा २९१
ज्ञाननिधि, धर्मधीर और विवेकी जनक के सिवा इस समय उलझन मिटाने में और कौन समर्थ है—गुरु ऐसा पूछते हैं।
जनक का भरत से विमर्श
चौपाइयाँ — मूल पाठ
जनक सोचते हैं कि पिता ने राम को वन भेजा और अब वे भी वन में ही रहने को कहकर कैसे प्रसन्न लौटेंगे। प्रेम से सभा व्याकुल है। समय देखकर वे भरत के पास जाते और राम की सत्यनिष्ठा का स्मरण कराते हैं।
दोहा २९२
जनक कहते हैं कि राम धर्मरत हैं और सबके शील-स्नेह का आदर करते हुए संकट सह रहे हैं; भरत चाहें तो अपनी बात कहें।
भरत का सेवा-धर्म का उत्तर
चौपाइयाँ — मूल पाठ
भरत जनक को पिता समान पूज्य और गुरु-मुनियों को अपना हितैषी मानते हैं। स्वयं को शिष्य-सेवक कहकर शिक्षा चाहते हैं। वे सेवा में स्वार्थ का विरोध बताते हैं; न अंधा वैर उचित निर्णय दे सकता है, न विवेकहीन आग्रह।
दोहा २९३
वे कहते हैं कि राम की इच्छा, धर्म और व्रत सुरक्षित रखकर, उनके प्रेम को पहचानते हुए सबकी सहमति से सबका हित किया जाए।
थोड़े शब्दों में भरत का गहरा आशय
चौपाइयाँ — मूल पाठ
जनक भरत की सहज किंतु गूढ़ वाणी की प्रशंसा करते हैं। वे सबके साथ राम की सभा में जाते हैं। प्रेममय गुरु, जनक और भरत को देखकर स्वार्थग्रस्त देवताओं की चिंता फिर बढ़ती है।
दोहा २९४
इंद्र आशंकित होकर देवताओं से मिलकर कोई छल-उपाय रचने को कहते हैं; यह कथा में उनकी अनुचित स्वार्थबुद्धि दिखाई गई है।
सरस्वती का भरत की बुद्धि फेरने से इनकार
चौपाइयाँ — मूल पाठ
देवता सरस्वती से भरत की मति बदलने को कहते हैं। देवी इसे स्वार्थपूर्ण समझकर अस्वीकार करती हैं। जिनके हृदय में सीता-राम हैं वहाँ अज्ञान का अँधेरा कैसे होगा—यह कहकर वे चली जाती हैं।
दोहा २९५
देवता फिर स्वयं प्रबल माया से लोगों में भय, भ्रम, अरुचि और उचाट पैदा करने का कपटपूर्ण उपाय करते हैं।
राम की मर्यादा और सभा का संकोच
चौपाइयाँ — मूल पाठ
जनक और सभा को राम आदर देते हैं। वसिष्ठ जनक-भरत का संवाद सुनाकर राम को निर्णय कहने को कहते हैं। राम कहते हैं कि गुरु और जनक उपस्थित हैं, इसलिए उनका स्वयं आगे बढ़कर कहना उचित नहीं; उनकी आज्ञा स्वीकारेंगे।
दोहा २९६
राम की शपथपूर्वक आज्ञाकारिता से मुनि, जनक और सभा संकोच में हैं; सब भरत की ओर देखते हैं, पर उत्तर सहज नहीं निकलता।
भरत का विवेकपूर्ण धैर्य
चौपाइयाँ — मूल पाठ
सभा को अपनी ओर देखते जानकर भरत प्रेम को धैर्य से सँभालते हैं। कवि उनके विवेक को ऐसा उद्धारक कहते हैं जो शोक में डूबी बुद्धि को निकाल लाता है। वे सबको प्रणाम करके कठिन किंतु विनम्र बात कहने की अनुमति चाहते हैं।
दोहा २९७
प्रेम से शिथिल सभा को विवेक की दृष्टि से देखकर भरत सीता-राम का स्मरण करते और प्रणामपूर्वक बोलते हैं।
राम की कृपा से दोष भी सम्मान में बदले
चौपाइयाँ — मूल पाठ
भरत राम को माता-पिता, मित्र, गुरु और स्वामी सभी का आश्रय कहते हैं। स्वीकारते हैं कि मोह में पूरी सभा लेकर आए, फिर भी राम ने उनके हठ को प्रेम और सेवा माना। यह प्रभु के शील तथा शरणागतवत्सलता की देन है।
दोहा २९८
भरत कहते हैं—प्रभु ने अपनी कृपा और भलाई से मेरा भला किया; दोष आभूषण जैसे बने और चारों ओर सुंदर यश मिला।
शरणागत को अपनाने वाले स्वामी की महिमा
चौपाइयाँ — मूल पाठ
भरत कहते हैं कि प्रभु दुष्ट और दोषयुक्त जन को भी एक प्रणाम और सच्ची शरण पर अपनाते हैं। उसके दोष मन में न रखकर गुण सभा में कहते हैं। सेवक का सम्मान करते हुए वे अपनी उदारता का प्रदर्शन भी नहीं करते।
दोहा २९९
ऐसे कृपालु स्वामी ही सेवक को सुधार-सँवारकर संतों में अग्रणी बना सकते हैं; भरत इसे राम की अद्वितीय अनुग्रह-रीति कहते हैं।
अब स्पष्ट आज्ञा देने की विनती
चौपाइयाँ — मूल पाठ
भरत कहते हैं कि शोक, स्नेह या बालस्वभाव से आज्ञा के विपरीत आ पहुँचे, फिर भी राम ने उदारता से भला माना। दर्शन और समाज में मिले सम्मान से उन्हें प्रभु की अनुकूलता का निश्चय है; अपनी ढिठाई क्षमा करने को कहते हैं।
दोहा ३००
जानकार हितैषी स्वामी से अधिक कहना भी दोष है; भरत अब अपनी भूल सुधारकर स्पष्ट आज्ञा देने की प्रार्थना करते हैं।
आज्ञापालन ही भरत की इच्छित सेवा
चौपाइयाँ — मूल पाठ
भरत चरणरज की शपथ लेकर कहते हैं कि स्वार्थ, छल और चारों पुरुषार्थों की फलाकांक्षा छोड़कर स्वाभाविक सेवा चाहते हैं। श्रेष्ठ स्वामी की आज्ञा मानने जैसी सेवा नहीं। वे चरण पकड़ लेते हैं और राम उनका हाथ पकड़कर पास बैठाते हैं।
छंद — मूल पाठ
राम, मुनि, जनक और सभा भरत के भाईचारे और भक्ति पर भावविह्वल हैं। देवता प्रशंसा और पुष्पवर्षा करते हैं, पर स्वार्थ की मलिनता उनमें बनी है; लोग विदा की आशंका से संकुचित हैं।
सोरठा ३०१
दोनों दुःखी समाजों को देखकर भी इंद्र अपने स्वार्थ का मंगल चाहते हैं; कवि इसे पहले से पीड़ित को और मारने जैसा कहते हैं।
देवमाया से लोगों की दुविधा
चौपाइयाँ — मूल पाठ
इंद्र का स्वार्थपूर्ण छल लोगों में उचाट बढ़ाता है। रामप्रेम मिटता नहीं, पर मन कभी वन और कभी घर चाहता है। लोग एक-दूसरे से अपने मन की बात भी नहीं कह पाते। राम इस अस्थिरता के कारण को पहचानते हैं।
दोहा ३०२
भरत, जनक, मुनि, मंत्री और सजग साधुओं को छोड़कर अन्य लोगों पर उनकी स्थिति के अनुसार देवमाया का प्रभाव पड़ता है।
भरत की भक्ति का वर्णन कठिन
चौपाइयाँ — मूल पाठ
राम सबके दुःख और देवछल को देखते हैं। सभा भरत की भक्ति तथा राम की ओर आशाभरी दृष्टि से बँधी है। कवि कहते हैं कि भरत के प्रेम का थोड़ा अंश देखकर ही जनक-मुनि विभोर हैं; उसका पूरा वर्णन छोटी बुद्धि से कठिन है।
दोहा ३०३
भरत का निर्मल यश चंद्रमा और सद्बुद्धि चकोरी है, जो संतों के हृदयाकाश में उगे उस चंद्रमा को एकटक निहारती है।
राम का भरत को धर्मधुरीण कहना
चौपाइयाँ — मूल पाठ
कवि भरतस्मरण को रामप्रेम जगाने वाला बताते हैं। राम परिस्थिति, समय, सभा और सबके हित का विचार करके मधुर वाणी बोलते हैं। वे भरत को धर्म, लोक-वेद और प्रेम का गहरा ज्ञाता मानते हैं।
दोहा ३०४
मन-वचन-कर्म की निर्मलता में भरत की उपमा भरत ही हैं; कठिन समय और गुरुजन की सभा में छोटे भाई की प्रशंसा भी संकोच देती है।
गुरु और जनक के संरक्षण पर भरोसा
चौपाइयाँ — मूल पाठ
राम कहते हैं कि भरत वंश की सत्यनिष्ठ रीति, पिता की कीर्ति और सबके हित-अहित जानते हैं। उन्हें भरत पर पूर्ण भरोसा है। पिता के न रहने की विपत्ति में गुरु और जनक ने परिवार तथा समाज को सँभाला है।
दोहा ३०५
राजकार्य, प्रतिष्ठा, धर्म, भूमि, धन और गृह—सब गुरु के प्रभाव तथा मार्गदर्शन से सुरक्षित रहेंगे और परिणाम शुभ होगा।
बाँटकर विपत्ति सहने का दायित्व
चौपाइयाँ — मूल पाठ
राम भरत से कहते हैं कि घर और वन दोनों का संरक्षण गुरु की कृपा से है। माता-पिता, गुरु और स्वामी के निर्देश की मर्यादा रखकर वे भी सबको निभाने दें। कठिन समय में भरत प्रजा-परिवार सँभालें; सच्चे भाई संकट की चोट बाँटते हैं।
दोहा ३०६
सेवक हाथ-पैर और आँखों जैसे तथा स्वामी मुख जैसा हो—परस्पर सहयोग और संरक्षण वाली इस प्रीतिरीति को कवि सराहते हैं।
भरत का संतोष और अवधि का अवलंब
चौपाइयाँ — मूल पाठ
राम की प्रेमपूर्ण शिक्षा से भरत को संतोष मिलता है; मुख प्रसन्न और मन का विषाद कम होता है। वे कहते हैं कि उन्हें साथ जाने जैसा सुख मिल गया। अब आज्ञा मानेंगे, पर अवधि पार करने के लिए कोई सहारा चाहते हैं।
दोहा ३०७
भरत पूछते हैं कि गुरु की आज्ञा से अभिषेक के लिए लाए सभी तीर्थों के जल के विषय में प्रभु क्या आदेश देते हैं।
चित्रकूट-दर्शन और तीर्थजल रखने की अनुमति
चौपाइयाँ — मूल पाठ
भरत संकोच से चित्रकूट के पवित्र वन, जीव, नदी-झरने, पर्वत और रामचरणांकित भूमि देखने की इच्छा कहते हैं। राम अत्रि मुनि की आज्ञा से निर्भय भ्रमण करने तथा उनके बताए स्थान पर तीर्थजल रखने को कहते हैं।
दोहा ३०८
राम-भरत का मंगलमय संवाद सुनकर देवता भी उनकी प्रशंसा और दिव्य पुष्पवर्षा करते हैं।
तीर्थजल के लिए अत्रि का निर्देश
चौपाइयाँ — मूल पाठ
देवता, जनक, मंत्री और दोनों समाज स्वामी-सेवक के पवित्र प्रेम की प्रशंसा करते हैं। सबके भीतर समाधान का सुख और बिछोह की पीड़ा साथ है। कौसल्या अन्य रानियों को राम और भरत के गुण कहकर सांत्वना देती हैं।
दोहा ३०९
अत्रि भरत को पर्वत के निकट स्थित अच्छे कुएँ में अमृततुल्य पवित्र तीर्थजल रखने का निर्देश देते हैं।
भरतकूप की स्थापना का प्रसंग
चौपाइयाँ — मूल पाठ
भरत जलपात्र भेजकर शत्रुघ्न, अत्रि और साधुओं सहित कुएँ तक जाते हैं। जल रखने पर मुनि इसे प्राचीन सिद्धस्थान बताते हैं, जो समय से अज्ञात हो गया था। तीर्थजल के संगम से यह लोकहितकारी स्थल भरतकूप कहलाएगा।
दोहा ३१०
कूप की महिमा कहते हुए सब राम के पास लौटते हैं; अत्रि उस पवित्र तीर्थ के पुण्यप्रभाव का वर्णन सुनाते हैं।
भरत की चित्रकूट परिक्रमा-जैसी वनयात्रा
चौपाइयाँ — मूल पाठ
प्रातःकर्म और राम, गुरु तथा अत्रि की अनुमति लेकर भरत-शत्रुघ्न सादे साधनों से पैदल वन देखते हैं। कवि प्रेमदृष्टि से कहते हैं कि भूमि कोमल हो गई, काँटे छिप गए, बादल छाया और देवता फूल देते हैं; प्रकृति रामप्रिय का स्वागत करती है।
दोहा ३११
जब सहज रामनाम से भी कल्याण संभव है, तो राम के प्राणप्रिय भरत के लिए यह अनुकूलता आश्चर्य नहीं।
पाँच दिन में पवित्र स्थलों का दर्शन
चौपाइयाँ — मूल पाठ
भरत वन के जलाशय, भूमि, जीव, वृक्ष और पर्वतों के नाम तथा महिमा अत्रि से पूछते हैं। कहीं स्नान, कहीं प्रणाम और कहीं अनुमति से बैठकर सीता-राम-लक्ष्मण का स्मरण करते हैं। प्रतिदिन लौटकर रामदर्शन पाते हैं।
दोहा ३१२
पाँच दिनों में भरत ने सभी प्रमुख स्थान और तीर्थ देखे; शिव-विष्णु का यश कहते-सुनते दिन बीतकर संध्या हुई।
अयोध्या लौटकर सेवा की अनुमति माँगना
चौपाइयाँ — मूल पाठ
सुबह सभा में राम की संकोचभरी इच्छा पहचानकर भरत धैर्य से उठते हैं। वे कहते हैं कि प्रभु ने उनकी सब रुचि रखी और बहुत कष्ट सहा। अब अवधि भर अयोध्या जाकर सेवा करने की आज्ञा चाहते हैं।
दोहा ३१३
भरत दीनदयाल से ऐसी सीख और सहारा माँगते हैं जिससे अवधि पूरी होने पर सेवक फिर उनके चरण देख सके।
भरत का भरोसा और अंतिम शिक्षा की याचना
चौपाइयाँ — मूल पाठ
भरत कहते हैं कि परिवार और प्रजा सब प्रभु से निर्मल प्रेम रखते हैं। राम सबकी इच्छाएँ तथा जीवनचर्या जानते हैं और दोनों ओर हित निभाएँगे। इस भरोसे के साथ वे अपने हठ की क्षमा तथा निष्संकोच उचित शिक्षा चाहते हैं।
दोहा ३१४
छलरहित, दीन भाई की बात सुनकर राम देश, काल और अवसर के अनुकूल कुशल मार्गदर्शन देते हैं।
प्रजापालन का मुख-रूपक
चौपाइयाँ — मूल पाठ
राम कहते हैं कि गुरु और जनक घर-वन दोनों की चिंता सँभालेंगे। दोनों भाई पिता की आज्ञा निभाएँ—राम वन में और भरत अयोध्या की व्यवस्था में। गुरु, माताओं और मंत्रियों की सीख से भरत प्रजा, राज्य और परिवार का पालन करें।
दोहा ३१५
मुखिया मुख जैसा हो: भोजन एक स्थान ग्रहण करे, पर विवेक से सभी अंगों का पोषण करे; नेतृत्व का उद्देश्य सबका हित है।
राम द्वारा भरत को पादुकाएँ देना
चौपाइयाँ — मूल पाठ
राम राजधर्म समझाते हैं, पर भरत को अवधि के लिए प्रत्यक्ष सहारा चाहिए। प्रभु करुणा से पादुकाएँ देते हैं और भरत उन्हें सिर पर रखते हैं। कवि उन्हें प्रजा के प्राणरक्षक, प्रेमरत्न के पात्र, रामनाम के दो अक्षर और सेवा की आँखों जैसी उपमाएँ देते हैं।
दोहा ३१६
भरत प्रणाम करके विदा माँगते हैं और राम उन्हें गले लगाते हैं; इंद्र अवसर पाकर लोगों में लौटने का उचाट बढ़ाते हैं।
विदा के समय राम का उमड़ता प्रेम
चौपाइयाँ — मूल पाठ
रामकृपा से उलझन सुलझती है और लौटने की अवधि की आशा सबके जीवन का सहारा बनती है। भरत को भुजाओं में भरकर राम का धैर्य भी प्रेमाश्रुओं में बदलता है। विदा की इस दशा से देवता और ज्ञाननिष्ठ मुनि भी द्रवित हैं।
दोहा ३१७
वैराग्य और विवेक में स्थिर जनक तथा गुरु-मुनि भी राम-भरत के अनुपम प्रेम को देखकर मन-वचन-शरीर से भावमग्न हो जाते हैं।
भरत और शत्रुघ्न की विदाई
चौपाइयाँ — मूल पाठ
कवि कहते हैं कि जहाँ जनक और गुरु भी विह्वल हों वहाँ वियोग का वर्णन कठिन है। राम भरत को समझाकर शत्रुघ्न को गले लगाते हैं। सेवक तैयारी करते हैं। दोनों भाई राम की आज्ञा सिर पर रखकर मुनियों और वनदेवताओं का सम्मान करते हैं।
दोहा ३१८
लक्ष्मण से मिलकर प्रणाम और सीता की चरणरज सिर पर लेकर वे प्रेमपूर्वक मंगलमय आशीष सुनते हुए चल पड़ते हैं।
जनक, मुनियों और कैकेयी को विदा देना
चौपाइयाँ — मूल पाठ
राम-लक्ष्मण जनक को प्रणाम कर उनके कष्ट के लिए कृतज्ञता कहते और नगर लौटने का आग्रह करते हैं। मुनि, ब्राह्मण, मातृपक्ष, मंत्री, परिचित और सभी आयुवर्ग के लोगों को यथोचित सम्मान से विदा करते हैं।
दोहा ३१९
राम कैकेयी के चरण छूकर निर्मल स्नेह से मिलते और उनका संकोच मिटाकर सजी पालकी से विदा देते हैं।
माताओं और दोनों समाजों का प्रस्थान
चौपाइयाँ — मूल पाठ
सीता माता-पिता, परिजनों और सासों से मिलकर सीख तथा आशीष लेती हैं। राम माताओं को पालकियों पर बैठाकर लक्ष्मण सहित बार-बार मिलते और पहुँचाते हैं। भरत तथा जनक का दल हृदय में तीनों का स्मरण लिए चल पड़ता है।
दोहा ३२०
सीता और लक्ष्मण सहित राम गुरु तथा गुरुपत्नी को प्रणाम करके लौटते हैं और अपनी पर्णकुटी पहुँचते हैं।
विदा के बाद राम का भरत-स्मरण
चौपाइयाँ — मूल पाठ
गुह और वनवासियों को विदा करके राम, सीता और लक्ष्मण वटछाया में बैठते हैं। प्रियजनों के वियोग में राम भरत के शील, वाणी, विश्वास और प्रेम का वर्णन करते हैं। देवता उन्हें आश्वासन देकर लौटते हैं।
दोहा ३२१
पर्णकुटी में राम, सीता और लक्ष्मण ऐसे सुशोभित हैं मानो भक्ति, ज्ञान और वैराग्य ने साकार देह धारण की हो।
अयोध्या-वापसी और जनक का राज्य सँभालना
चौपाइयाँ — मूल पाठ
लौटता समाज मौन होकर रामगुण स्मरण करता है। यमुना और गंगा पार होते हैं; गुह सुविधा देते हैं। चौथे दिन अयोध्या पहुँचते हैं। जनक चार दिन रुककर व्यवस्था सँभालते और राज्य गुरु, मंत्री तथा भरत को सौंपकर मिथिला लौटते हैं।
दोहा ३२२
नर-नारी रामदर्शन की अवधि की आशा में भोग-आभूषण छोड़कर नियम और उपवास के साथ जीवन बिताते हैं।
सिंहासन पर प्रभु की पादुकाएँ
चौपाइयाँ — मूल पाठ
भरत मंत्री-सेवकों को कार्य और माताओं की सेवा शत्रुघ्न को सौंपते हैं। ब्राह्मण, प्रजा और परिवार से मार्गदर्शन देने का विनय करते हैं। गुरु से नियमपूर्वक रहने की अनुमति पाते हैं; वसिष्ठ उनके आचरण को धर्म का सार कहते हैं।
दोहा ३२३
गुरु की सीख और आशीष लेकर शुभ समय में भरत ने बिना स्वामित्व-अहंकार के प्रभु की पादुकाएँ सिंहासन पर प्रतिष्ठित कीं।
नंदिग्राम में भरत का संयमपूर्ण निवास
चौपाइयाँ — मूल पाठ
माता, गुरु और पादुकाओं की आज्ञा लेकर भरत नंदिग्राम में पर्णकुटी बनाते हैं। जटा, मुनिवस्त्र, कुशशय्या तथा संयमित आहार अपनाते हैं। विपुल राजवैभव उपलब्ध होने पर भी रामप्रेम में उसके प्रति आसक्ति नहीं रखते।
दोहा ३२४
भरत की महिमा केवल तप में नहीं, उनके रामप्रेम में है; जैसे चातक की निष्ठा और हंस का विवेक विशेष प्रशंसनीय हैं।
पादुका-पूजा और धर्मपूर्ण राजकार्य
चौपाइयाँ — मूल पाठ
शरीर दुबला होने पर भी भरत का रामप्रेम और धर्मनिष्ठा प्रतिदिन दृढ़ होते हैं। कवि हृदय को आकाश, संयम को तारे, विश्वास को ध्रुव और रामप्रेम को निर्मल चंद्रमा की उपमा देते हैं; उनकी भक्ति-विरक्ति का वर्णन कठिन है।
दोहा ३२५
भरत प्रतिदिन प्रभु की पादुकाएँ पूजते और उन्हीं से आज्ञा माँगकर अनेक प्रकार के राजकार्य करते हैं।
भरत-चरित्र की महिमा और अयोध्याकाण्ड समापन
चौपाइयाँ — मूल पाठ
हृदय में सीता-राम, जीभ पर नाम और नेत्रों में आँसू लेकर भरत तप तथा राजदायित्व निभाते हैं। वन में लक्ष्मण की सेवा और घर में भरत का व्रत दोनों महान हैं। कवि भरत-चरित्र को मोह, पाप और संताप दूर करने वाला मंगलमय आदर्श कहते हैं।
छंद — मूल पाठ
तुलसी कहते हैं कि सीता-राम के प्रेमामृत से पूर्ण भरत न होते तो ऐसा कठिन संयम-व्रत कौन निभाता? कौन अपने सुयश से दुख-दंभ मिटाता और मेरे जैसे जन को राम की ओर लगाता?
सोरठा ३२६
तुलसी कहते हैं कि भरत-चरित्र को नियमपूर्वक आदर से सुनने से सीता-राम के चरणों में प्रेम और सांसारिक आसक्ति से विरक्ति होती है।
॥ अयोध्याकाण्ड सम्पूर्ण ॥
पारायण संकेत: मासपारायण, इक्कीसवाँ विश्राम
अर्थ: समस्त कलिकालीन कलुष को दूर करने वाले श्रीरामचरितमानस का दूसरा सोपान यहाँ समाप्त होता है।
इस पाँच-भागीय पाठ-श्रृंखला का समापन: मंगलाचरण और दोहा १ से अंतिम सोरठा ३२६ तक प्रकाशित भागों की सूची नीचे है। अयोध्याकाण्ड समाप्त हुआ है; श्रीरामचरितमानस के आगे के काण्ड अलग हैं।
भक्ति और दायित्व साथ निभाने की शिक्षा
भरतजी केवल राम को लौटाने का हठ नहीं करते; अंततः राम की प्रसन्नता और आज्ञा को अपनी सेवा मानते हैं। पादुकाएँ उनके प्रेम का आश्रय और राजदायित्व की धरोहर बनती हैं। नंदिग्राम में संयम रखते हुए भी वे प्रजा और माताओं का पालन नहीं छोड़ते। इसी निष्काम अनुराग के फलरूप तुलसी सीता-राम के चरणप्रेम और विषयासक्ति से विरक्ति का उपदेश देते हैं।
पुराने सामाजिक संबोधन, आत्मधिक्कार, विरह-उपमाएँ और पात्रों के आरोप उनके कथा-संदर्भ में पढ़ें। उन्हें किसी व्यक्ति या समुदाय की गरिमा का आज का निर्णय न मानें। गुह का मुनि द्वारा आत्मीय स्वागत तथा वनवासियों के निष्कपट प्रेम का सम्मान इसी पाठ के महत्त्वपूर्ण प्रसंग हैं।
पाठ-संदर्भ और सीमित संपादन
मूल अवधी पाठ का आधार संस्कृत डॉक्यूमेंट्स का अयोध्याकाण्ड पाठ है। स्पष्ट डिजिटल अक्षर-दोष और समापन की तुलना गीता प्रेस के मुद्रित मूल पाठ की पृष्ठ ५६४–६०० तथा पृष्ठ ६०१–६४६ की स्कैन-प्रतियों से की गई है। किसी आधुनिक हिंदी या अंग्रेजी अनुवाद का पुनर्मुद्रण नहीं किया गया है।
मुद्रित पाठ से मिलाए गए स्पष्ट डिजिटल दोष
- क्रमांक २४९ से पहले “अंघ ओघ” के स्थान पर “अघ ओघ” और २५१ से पहले “सपोनेहुँ” के स्थान पर “सपनेहुँ” रखा है।
- क्रमांक २६० से पहले “सिसुपन तेम” के स्थान पर “सिसुपन तें” और २६६ से पहले “सुनो सुरगुर” के स्थान पर “सुनि सुरगुर” रखा है।
- क्रमांक ३२३ से पहले “पाइ पाइ सिख” का स्पष्ट दोहराव हटाकर “पाइ सिख” तथा “समुझव कहब” के स्थान पर “समुझब कहब” रखा है। यहाँ “बय बिनय” मूल मुद्रित शब्द है; उसे अनुमान से नहीं बदला गया है।
- चारों सोरठे २५१, २७६, ३०१ और ३२६ तथा उनके पहले के चार छंद पूरे सुरक्षित हैं। अन्य शब्द सामान्यतः चुने हुए डिजिटल पाठ के अनुसार हैं; संस्करणों में वर्तनी और पाठांतर मिल सकते हैं।
अब अन्य प्रकाशित भक्ति पाठ पढ़ें
अयोध्याकाण्ड यहाँ सम्पूर्ण है। आगे अरण्यकाण्ड और किष्किन्धाकाण्ड के संपूर्ण प्रकाशित पाठ ग्रंथालय में उपलब्ध हैं।
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