श्रीरामचरितमानस अयोध्याकाण्ड भाग 5 | पादुका-प्रदान, भरत का नंदिग्राम-व्रत और अयोध्याकाण्ड सम्पूर्ण | दोहा 241–326 अर्थ सहित

॥ श्री सीताराम ॥ · भक्ति भावना प्रस्तुत

श्रीरामचरितमानस
अयोध्याकाण्ड — भाग ५

जनकजी का परामर्श, पादुका-प्रदान और नंदिग्राम में भरतजी का व्रत

दोहा २४१–३२६ · अंतिम भाग · बीच की सभी चौपाइयाँ एवं चार छंद · मूल पाठ और सरल हिंदी अर्थ

भरत-चरित्र से अयोध्याकाण्ड के समापन तक

यह अंतिम भाग दोहा २४० के राम–भरत मिलन के ठीक बाद की चौपाइयों से शुरू होता है। यहाँ दोनों राजसमाजों का चित्रकूट में मिलना, जनकजी का परामर्श, भरतजी की निष्काम सेवा-विनती, राम का राजधर्म-उपदेश, पादुका-प्रदान, भरतकूप, अयोध्या-वापसी और नंदिग्राम का व्रत क्रम से पढ़ें। अंतिम सोरठा ३२६ के बाद मूल समापन-वचन भी दिया है।

भागों की संख्या कम रखने के लिए ८६ क्रमांक एक साथ रखे हैं। हर क्रमांक के पहले की पूरी चौपाइयाँ और उनका समेकित सरल हिंदी अर्थ है। छंद और दोहा/सोरठा का अर्थ अलग दिया है। यह मूल पाठ की स्वतंत्र अध्ययन-सहायक व्याख्या है, शब्दशः टीका नहीं।

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क्रमांक २४१–२५०
क्रमांक २५१–२६०
क्रमांक २६१–२७०
क्रमांक २७१–२८०
क्रमांक २८१–२९०
क्रमांक २९१–३००
क्रमांक ३०१–३१०
क्रमांक ३११–३२०
क्रमांक ३२१–३२६
अयोध्याकाण्ड · दोहा २४१

भाइयों के मिलन की अवर्णनीय प्रीति

चौपाइयाँ — मूल पाठ

मिलनि प्रीति किमि जाइ बखानी। कबिकुल अगम करम मन बानी ॥ परम पेम पूरन दोउ भाई। मन बुधि चित अहमिति बिसराई ॥ कहहु सुपेम प्रगट को करई। केहि छाया कबि मति अनुसरई ॥ कबिहि अरथ आखर बलु साँचा। अनुहरि ताल गतिहि नटु नाचा ॥ अगम सनेह भरत रघुबर को। जहँ न जाइ मनु बिधि हरि हर को ॥ सो मैं कुमति कहौं केहि भाँती। बाज सुराग कि गाँडर ताँती ॥ मिलनि बिलोकि भरत रघुबर की। सुरगन सभय धकधकी धरकी ॥ समुझाए सुरगुरु जड़ जागे। बरषि प्रसून प्रसंसन लागे ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

कवि कहते हैं कि राम और भरत के पूर्ण प्रेम को शब्दों में बाँधना कठिन है। दोनों अपनी सुधि भूल गए हैं। देवता पहले आशंकित होते हैं, फिर बृहस्पति के समझाने पर प्रेममय मिलन की प्रशंसा करके फूल बरसाते हैं।

दोहा २४१

मिलि सपेम रिपुसूदनहि केवटु भेंटेउ राम। भूरि भायँ भेंटे भरत लछिमन करत प्रनाम ॥ २४१ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

राम शत्रुघ्न और गुह से प्रेमपूर्वक मिलते हैं; भरत और लक्ष्मण भी अत्यंत स्नेह से मिलकर प्रणाम करते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २४२

सीताजी का आशीष और समाज का समाचार

चौपाइयाँ — मूल पाठ

भेंटेउ लखन ललकि लघु भाई। बहुरि निषादु लीन्ह उर लाई ॥ पुनि मुनिगन दुहुँ भाइन्ह बंदे। अभिमत आसिष पाइ अनंदे ॥ सानुज भरत उमगि अनुरागा। धरि सिर सिय पद पदुम परागा ॥ पुनि पुनि करत प्रनाम उठाए। सिर कर कमल परसि बैठाए ॥ सीयँ असीस दीन्हि मन माहीं। मगन सनेहँ देह सुधि नाहीं ॥ सब बिधि सानुकूल लखि सीता। भे निसोच उर अपडर बीता ॥ कोउ किछु कहइ न कोउ किछु पूँछा। प्रेम भरा मन निज गति छूँछा ॥ तेहि अवसर केवटु धीरजु धरि। जोरि पानि बिनवत प्रनामु करि ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

लक्ष्मण छोटे भाई और गुह से मिलते हैं। दोनों भाई मुनियों को प्रणाम करके सीता के चरणों की धूल सिर पर रखते हैं। सीता प्रेम से उठाकर आशीष देती हैं; उनका अनुकूल भाव देखकर भरत का भय मिट जाता है।

दोहा २४२

नाथ साथ मुनिनाथ के मातु सकल पुर लोग। सेवक सेनप सचिव सब आए बिकल बियोग ॥ २४२ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

गुह हाथ जोड़कर बताते हैं कि गुरु, सभी माताएँ, नगरवासी, सेवक, सेनापति और मंत्री वियोग से व्याकुल होकर साथ आए हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २४३

वसिष्ठ और गुह का आत्मीय मिलन

चौपाइयाँ — मूल पाठ

सीलसिंधु सुनि गुर आगवनू। सिय समीप राखे रिपुदवनू ॥ चले सबेग रामु तेहि काला। धीर धरम धुर दीनदयाला ॥ गुरहि देखि सानुज अनुरागे। दंड प्रनाम करन प्रभु लागे ॥ मुनिबर धाइ लिए उर लाई। प्रेम उमगि भेंटे दोउ भाई ॥ प्रेम पुलकि केवट कहि नामू। कीन्ह दूरि तें दंड प्रनामू ॥ रामसखा रिषि बरबस भेंटा। जनु महि लुठत सनेह समेटा ॥ रघुपति भगति सुमंगल मूला। नभ सराहि सुर बरिसहिं फूला ॥ एहि सम निपट नीच कोउ नाहीं। बड़ बसिष्ठ सम को जग माहीं ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

गुरु के आने का समाचार सुनकर राम शत्रुघ्न को सीता के पास रखकर शीघ्र जाते हैं। वसिष्ठ दोनों भाइयों को हृदय से लगाते हैं। गुह दूर से प्रणाम करते हैं, पर मुनि उन्हें आगे बढ़कर अपनाते हैं; देवता भक्ति की महिमा सराहते हैं।

दोहा २४३

जेहि लखि लखनहु तें अधिक मिले मुदित मुनिराउ। सो सीतापति भजन को प्रगट प्रताप प्रभाउ ॥ २४३ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

गुह को देखकर वसिष्ठ का विशेष प्रेम से मिलना सीतापति की भक्ति का प्रत्यक्ष प्रभाव बताया गया है।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २४४

सबसे मिलकर माताओं को धीरज देना

चौपाइयाँ — मूल पाठ

आरत लोग राम सबु जाना। करुनाकर सुजान भगवाना ॥ जो जेहि भायँ रहा अभिलाषी। तेहि तेहि कै तसि तसि रुख राखी ॥ सानुज मिलि पल महु सब काहू। कीन्ह दूरि दुखु दारुन दाहू ॥ यह बड़ि बातँ राम कै नाहीं। जिमि घट कोटि एक रबि छाहीं ॥ मिलि केवटिहि उमगि अनुरागा। पुरजन सकल सराहहिं भागा ॥ देखीं राम दुखित महतारीं। जनु सुबेलि अवलीं हिम मारीं ॥ प्रथम राम भेंटी कैकेई। सरल सुभायँ भगति मति भेई ॥ पग परि कीन्ह प्रबोधु बहोरी। काल करम बिधि सिर धरि खोरी ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

राम सबके भाव के अनुसार मिलकर उनका संताप मिटाते हैं। अनेक पात्रों में एक सूर्य की छवि की तरह उनकी सर्वव्यापक कृपा का वर्णन है। वे पहले कैकेयी के चरण छूकर मिलते और समय-कर्म की गति बताकर उनका संकोच घटाते हैं।

दोहा २४४

भेटीं रघुबर मातु सब करि प्रबोधु परितोषु ॥ अंब ईस आधीन जगु काहु न देइअ दोषु ॥ २४४ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

सभी माताओं को संतोष देकर राम कहते हैं—जगत ईश्वराधीन है; किसी को दोष देकर अपना दुःख न बढ़ाएँ।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २४५

माताओं से मिलन और आश्रम की ओर जाना

चौपाइयाँ — मूल पाठ

गुरतिय पद बंदे दुहु भाई। सहित बिप्रतिय जे सँग आई ॥ गंग गौरि सम सब सनमानीं ॥ देहिं असीस मुदित मृदु बानी ॥ गहि पद लगे सुमित्रा अंका। जनु भेटीं संपति अति रंका ॥ पुनि जननि चरननि दोउ भ्राता। परे पेम ब्याकुल सब गाता ॥ अति अनुराग अंब उर लाए। नयन सनेह सलिल अन्हवाए ॥ तेहि अवसर कर हरष बिषादू। किमि कबि कहै मूक जिमि स्वादू ॥ मिलि जननहि सानुज रघुराऊ। गुर सन कहेउ कि धारिअ पाऊ ॥ पुरजन पाइ मुनीस नियोगू। जल थल तकि तकि उतरेउ लोगू ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

दोनों भाई गुरु और अन्य मुनियों की पत्नियों को प्रणाम कर आशीर्वाद लेते हैं। सुमित्रा और कौसल्या से मिलन में आनंद तथा शोक दोनों उमड़ते हैं। राम गुरु को आश्रम पधारने को कहते हैं; नगरवासी उपयुक्त स्थानों पर पड़ाव करते हैं।

दोहा २४५

महिसुर मंत्री मातु गुर गने लोग लिए साथ ॥ पावन आश्रम गवनु किय भरत लखन रघुनाथ ॥ २४५ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

ब्राह्मण, मंत्री, माताएँ, गुरु और प्रमुख जन साथ लेकर भरत-लक्ष्मण सहित राम पवित्र आश्रम की ओर जाते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २४६

सीताजी का माताओं से करुण मिलन

चौपाइयाँ — मूल पाठ

सीय आइ मुनिबर पग लागी। उचित असीस लही मन मागी ॥ गुरपतिनिहि मुनितियन्ह समेता। मिली पेमु कहि जाइ न जेता ॥ बंदि बंदि पग सिय सबही के। आसिरबचन लहे प्रिय जी के ॥ सासु सकल जब सीयँ निहारीं। मूदे नयन सहमि सुकुमारीं ॥ परीं बधिक बस मनहुँ मरालीं। काह कीन्ह करतार कुचालीं ॥ तिन्ह सिय निरखि निपट दुखु पावा। सो सबु सहिअ जो दैउ सहावा ॥ जनकसुता तब उर धरि धीरा। नील नलिन लोयन भरि नीरा ॥ मिली सकल सासुन्ह सिय जाई। तेहि अवसर करुना महि छाई ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

सीता गुरु और मुनिपत्नियों को प्रणाम कर आशीर्वाद पाती हैं। शोकग्रस्त सासों को देखकर सहम जाती हैं। फिर धैर्य रखकर सबके चरणों में झुकती हैं; दोनों ओर के स्नेह से वातावरण करुणा में भर जाता है।

दोहा २४६

लागि लागि पग सबनि सिय भेंटति अति अनुराग ॥ हृदयँ असीसहिं पेम बस रहिअहु भरी सोहाग ॥ २४६ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

सीता अत्यंत प्रेम से प्रत्येक सास के चरण पकड़कर मिलती हैं; वे हृदय से उन्हें अखंड सौभाग्य का आशीष देती हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २४७

दशरथ के निधन का समाचार और पितृकर्म

चौपाइयाँ — मूल पाठ

बिकल सनेहँ सीय सब रानीं। बैठन सबहि कहेउ गुर ग्यानीं ॥ कहि जग गति मायिक मुनिनाथा। कहे कछुक परमारथ गाथा ॥ नृप कर सुरपुर गवनु सुनावा। सुनि रघुनाथ दुसह दुखु पावा ॥ मरन हेतु निज नेहु बिचारी। भे अति बिकल धीर धुर धारी ॥ कुलिस कठोर सुनत कटु बानी। बिलपत लखन सीय सब रानी ॥ सोक बिकल अति सकल समाजू। मानहुँ राजु अकाजेउ आजू ॥ मुनिबर बहुरि राम समुझाए। सहित समाज सुसरित नहाए ॥ ब्रतु निरंबु तेहि दिन प्रभु कीन्हा। मुनिहु कहें जलु काहुँ न लीन्हा ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

वसिष्ठ सबको बैठाकर जगत की परिवर्तनशीलता समझाते और दशरथ के स्वर्गगमन का समाचार देते हैं। अपने प्रेम को पिता की मृत्यु का कारण जानकर राम अत्यंत दुःखी होते हैं। सब स्नान करते हैं और उस दिन शोक में जल तक नहीं लेते।

दोहा २४७

भोरु भएँ रघुनंदनहि जो मुनि आयसु दीन्ह ॥ श्रद्धा भगति समेत प्रभु सो सबु सादरु कीन्ह ॥ २४७ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

अगली सुबह मुनि ने जो पितृकर्म बताए, राम ने श्रद्धा और भक्ति के साथ उनका आदरपूर्वक पालन किया।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २४८

समाज की कठिनाई देखकर राम की चिंता

चौपाइयाँ — मूल पाठ

करि पितु क्रिया बेद जसि बरनी। भे पुनीत पातक तम तरनी ॥ जासु नाम पावक अघ तूला। सुमिरत सकल सुमंगल मूला ॥ सुद्ध सो भयउ साधु संमत अस। तीरथ आवाहन सुरसरि जस ॥ सुद्ध भएँ दुइ बासर बीते। बोले गुर सन राम पिरीते ॥ नाथ लोग सब निपट दुखारी। कंद मूल फल अंबु अहारी ॥ सानुज भरतु सचिव सब माता। देखि मोहि पल जिमि जुग जाता ॥ सब समेत पुर धारिअ पाऊ। आपु इहाँ अमरावति राऊ ॥ बहुत कहेउँ सब कियउँ ढिठाई। उचित होइ तस करिअ गोसाँई ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

पितृकर्म के बाद राम गुरु से कहते हैं कि सब वन में फल-मूल और जल पर रहकर दुःख पा रहे हैं। भरत, माताओं और मंत्रियों की दशा देखकर उन्हें समय युग जैसा लगता है। वे सबको नगर ले जाने का निवेदन करते हैं।

दोहा २४८

धर्म सेतु करुनायतन कस न कहहु अस राम। लोग दुखित दिन दुइ दरस देखि लहहुँ बिश्राम ॥ २४८ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

गुरु उनकी करुणा स्वीकारते हुए कहते हैं कि दुःखी लोग दो दिन और दर्शन पाकर कुछ संतोष तथा विश्राम पा लें।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २४९

चित्रकूट के वन में समाज का विश्राम

चौपाइयाँ — मूल पाठ

राम बचन सुनि सभय समाजू। जनु जलनिधि महुँ बिकल जहाजू ॥ सुनि गुर गिरा सुमंगल मूला। भयउ मनहुँ मारुत अनुकुला ॥ पावन पयँ तिहुँ काल नहाहीं। जो बिलोकि अघ ओघ नसाहीं ॥ मंगलमूरति लोचन भरि भरि। निरखहिं हरषि दंडवत करि करि ॥ राम सैल बन देखन जाहीं। जहँ सुख सकल सकल दुख नाहीं ॥ झरना झरिहिं सुधासम बारी। त्रिबिध तापहर त्रिबिध बयारी ॥ बिटप बेलि तृन अगनित जाती। फल प्रसून पल्लव बहु भाँती ॥ सुंदर सिला सुखद तरु छाहीं। जाइ बरनि बन छबि केहि पाहीं ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

लौटने की बात से समाज आशंकित होता है, पर गुरु के रुकने के वचन से राहत मिलती है। लोग नदी में स्नान, रामदर्शन और प्रणाम करते हैं। वन के निर्मल जल, सुखद पवन, फल-पुष्प, शिलाओं और वृक्षछाया से आनंद लेते हैं।

दोहा २४९

सरनि सरोरुह जल बिहग कूजत गुंजत भृंग। बैर बिगत बिहरत बिपिन मृग बिहंग बहुरंग ॥ २४९ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

सरोवरों में कमल, जलपक्षियों की बोली और भ्रमरों की गुंजार है; रंग-बिरंगे पशु-पक्षी वैर छोड़कर वन में विचरते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २५०

वनवासियों की निष्कपट अतिथि-सेवा

चौपाइयाँ — मूल पाठ

कोल किरात भिल्ल बनबासी। मधु सुचि सुंदर स्वादु सुधा सी ॥ भरि भरि परन पुटीं रचि रुरी। कंद मूल फल अंकुर जूरी ॥ सबहि देहिं करि बिनय प्रनामा। कहि कहि स्वाद भेद गुन नामा ॥ देहिं लोग बहु मोल न लेहीं। फेरत राम दोहाई देहीं ॥ कहहिं सनेह मगन मृदु बानी। मानत साधु पेम पहिचानी ॥ तुम्ह सुकृती हम नीच निषादा। पावा दरसनु राम प्रसादा ॥ हमहि अगम अति दरसु तुम्हारा। जस मरु धरनि देवधुनि धारा ॥ राम कृपाल निषाद नेवाजा। परिजन प्रजउ चहिअ जस राजा ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

कोल, किरात और भील पत्तों के दोने भरकर मधु, फल-मूल और अंकुर लाते हैं। मूल्य लेने से मना करके स्वाद और उपयोग बताते हैं। राम के समान उनके परिवार-प्रजा को भी अपनाने की इच्छा से विनम्रतापूर्वक अपनी भेंट स्वीकारने को कहते हैं।

दोहा २५०

यह जिँयँ जानि सँकोचु तजि करिअ छोहु लखि नेहु। हमहि कृतारथ करन लगि फल तृन अंकुर लेहु ॥ २५० ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

वे कहते हैं—हमारा प्रेम देखकर संकोच छोड़ें और हमें कृतार्थ करने के लिए ये वनफल तथा अंकुर ग्रहण करें।

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अयोध्याकाण्ड · सोरठा २५१

सरल वनवासी प्रेम की महिमा

चौपाइयाँ — मूल पाठ

तुम्ह प्रिय पाहुने बन पगु धारे। सेवा जोगु न भाग हमारे ॥ देब काह हम तुम्हहि गोसाँई। ईधनु पात किरात मिताई ॥ यह हमारि अति बड़ि सेवकाई। लेहि न बासन बसन चोराई ॥ हम जड़ जीव जीव गन घाती। कुटिल कुचाली कुमति कुजाती ॥ पाप करत निसि बासर जाहीं। नहिं पट कटि नहि पेट अघाहीं ॥ सपनेहुँ धरम बुद्धि कस काऊ। यह रघुनंदन दरस प्रभाऊ ॥ जब तें प्रभु पद पदुम निहारे। मिटे दुसह दुख दोष हमारे ॥ बचन सुनत पुरजन अनुरागे। तिन्ह के भाग सराहन लागे ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

वनवासी अपनी सीमाएँ और पुराने दुर्गुण विनय से कहते हैं। रामदर्शन से दुःख-दोष मिटने और सेवा की बुद्धि जागने का अनुभव बताते हैं। नगरवासी उनकी निष्कपट वाणी और भाग्य देखकर प्रेम में भर जाते हैं।

छंद — मूल पाठ

लागे सराहन भाग सब अनुराग बचन सुनावहीं। बोलनि मिलनि सिय राम चरन सनेहु लखि सुखु पावहीं ॥ नर नारि निदरहिं नेहु निज सुनि कोल भिल्लनि की गिरा। तुलसी कृपा रघुबंसमनि की लोह लै लौका तिरा ॥
छंद का सरल हिंदी अर्थ

लोग वनवासियों के बोलने-मिलने और सीता-राम के चरणप्रेम की प्रशंसा करते हैं। तुलसी प्रभुकृपा को ऐसा आश्रय कहते हैं जिससे लोहे के साथ साधारण सहचारी वस्तु भी तर जाती है।

सोरठा २५१

बिहरहिं बन चहु ओर प्रतिदिन प्रमुदित लोग सब। जल ज्यों दादुर मोर भए पीन पावस प्रथम ॥ २५१ ॥
सोरठा का सरल हिंदी अर्थ

लोग प्रसन्न होकर प्रतिदिन वन में घूमते हैं, जैसे वर्षा की पहली बौछारों से मेंढक और मोर हृष्ट-पुष्ट हो उठते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २५२

माताओं की सेवा और कैकेयी का पश्चात्ताप

चौपाइयाँ — मूल पाठ

पुर जन नारि मगन अति प्रीती। बासर जाहिं पलक सम बीती ॥ सीय सासु प्रति बेष बनाई। सादर करइ सरिस सेवकाई ॥ लखा न मरमु राम बिनु काहूँ। माया सब सिय माया माहूँ ॥ सीयँ सासु सेवा बस कीन्हीं। तिन्ह लहि सुख सिख आसिष दीन्हीं ॥ लखि सिय सहित सरल दोउ भाई। कुटिल रानि पछितानि अघाई ॥ अवनि जमहि जाचति कैकेई। महि न बीचु बिधि मीचु न देई ॥ लोकहुँ बेद बिदित कबि कहहीं। राम बिमुख थलु नरक न लहहीं ॥ यहु संसउ सब के मन माहीं। राम गवनु बिधि अवध कि नाहीं ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

कथा में सीता प्रत्येक सास की समान रूप से सेवा करने के लिए अलग रूप बनाती हैं; इसका रहस्य राम जानते हैं। उनकी सेवा से माताएँ सुख पाती हैं। राम-सीता-लक्ष्मण की सरलता देखकर कैकेयी गहरे पश्चात्ताप में हैं; सबको लौटने का संशय है।

दोहा २५२

निसि न नीद नहिं भूख दिन भरतु बिकल सुचि सोच। नीच कीच बिच मगन जस मीनहि सलिल सँकोच ॥ २५२ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

भरत की निर्मल चिंता इतनी बढ़ती है कि न दिन में भूख, न रात में नींद; वे घटते जल में फँसी मछली जैसे व्याकुल हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २५३

राम को लौटाने का उपाय सोचते भरत

चौपाइयाँ — मूल पाठ

कीन्ही मातु मिस काल कुचाली। ईति भीति जस पाकत साली ॥ केहि बिधि होइ राम अभिषेकू। मोहि अवकलत उपाउ न एकू ॥ अवसि फिरहिं गुर आयसु मानी। मुनि पुनि कहब राम रुचि जानी ॥ मातु कहेहुँ बहुरहिं रघुराऊ। राम जननि हठ करबि कि काऊ ॥ मोहि अनुचर कर केतिक बाता। तेहि महँ कुसमउ बाम बिधाता ॥ जौं हठ करउँ त निपट कुकरमू। हरगिरि तें गुरु सेवक धरमू ॥ एकउ जुगुति न मन ठहरानी। सोचत भरतहि रैनि बिहानी ॥ प्रात नहाइ प्रभुहि सिर नाई। बैठत पठए रिषयँ बोलाई ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

भरत विचार करते हैं कि गुरु राम की रुचि देखकर ही कहेंगे और कौसल्या हठ नहीं करेंगी। स्वयं सेवक होकर दबाव देना भी अनुचित लगता है। कोई उपाय स्थिर नहीं होता और रात बीतती है। सुबह मुनि उन्हें सभा में बुलाते हैं।

दोहा २५३

गुर पद कमल प्रनामु करि बैठे आयसु पाइ। बिप्र महाजन सचिव सब जुरे सभासद आइ ॥ २५३ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

गुरु के चरणों में प्रणाम करके भरत आज्ञा से बैठते हैं; ब्राह्मण, प्रमुख नगरजन और मंत्री सभा में इकट्ठा होते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २५४

राम की आज्ञा और हित का आधार

चौपाइयाँ — मूल पाठ

बोले मुनिबरु समय समाना। सुनहु सभासद भरत सुजाना ॥ धरम धुरीन भानुकुल भानू। राजा रामु स्वबस भगवानू ॥ सत्यसंध पालक श्रुति सेतू। राम जनमु जग मंगल हेतू ॥ गुर पितु मातु बचन अनुसारी। खल दलु दलन देव हितकारी ॥ नीति प्रीति परमारथ स्वारथु। कोउ न राम सम जान जथारथु ॥ बिधि हरि हरु ससि रबि दिसिपाला। माया जीव करम कुलि काला ॥ अहिप महिप जहँ लगि प्रभुताई। जोग सिद्धि निगमागम गाई ॥ करि बिचार जिँयँ देखहु नीकें। राम रजाइ सीस सबही कें ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

वसिष्ठ सभा से कहते हैं कि राम सत्यनिष्ठ, धर्मपालक और नीति-प्रेम के ज्ञाता हैं। गुरु और माता-पिता की मर्यादा रखते हुए उनका अवतार लोकमंगल के लिए है। सभी शक्तियाँ और अधिकार उनकी आज्ञा के अधीन हैं।

दोहा २५४

राखें राम रजाइ रुख हम सब कर हित होइ। समुझि सयाने करहु अब सब मिलि संमत सोइ ॥ २५४ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

राम की आज्ञा और इच्छा की रक्षा में सबका हित है; सभा मिलकर इसी आधार पर उचित निर्णय करे।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २५५

गुरु से समाधान की आशा

चौपाइयाँ — मूल पाठ

सब कहुँ सुखद राम अभिषेकू। मंगल मोद मूल मग एकू ॥ केहि बिधि अवध चलहिं रघुराऊ। कहहु समुझि सोइ करिअ उपाऊ ॥ सब सादर सुनि मुनिबर बानी। नय परमारथ स्वारथ सानी ॥ उतरु न आव लोग भए भोरे। तब सिरु नाइ भरत कर जोरे ॥ भानुबंस भए भूप घनेरे। अधिक एक तें एक बड़ेरे ॥ जनमु हेतु सब कहँ पितु माता। करम सुभासुभ देइ बिधाता ॥ दलि दुख सजइ सकल कल्याना। अस असीस राउरि जगु जाना ॥ सो गोसाइँ बिधि गति जेहिं छेंकी। सकइ को टारि टेक जो टेकी ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

मुनि कहते हैं कि राम का अभिषेक सबको सुख देगा, इसलिए उचित उपाय बताया जाए। सभा मौन है। भरत गुरु की कृपा को अपने वंश और जगत के कल्याण का सहारा बताते हैं; उनसे उपाय पूछे जाने को अपना दुर्भाग्य मानते हैं।

दोहा २५५

बूझिअ मोहि उपाउ अब सो सब मोर अभागु। सुनि सनेहमय बचन गुर उर उमगा अनुरागु ॥ २५५ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

भरत विनय करते हैं कि उपाय उनसे पूछा जा रहा है, जबकि सब गुरु के हाथ में है; यह प्रेमभरी बात सुनकर गुरु का स्नेह उमड़ता है।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २५६

वनवास अपने ऊपर लेने को तत्पर भरत

चौपाइयाँ — मूल पाठ

तात बात फुरि राम कृपाहीं। राम बिमुख सिधि सपनेहुँ नाहीं ॥ सकुचउँ तात कहत एक बाता। अरध तजहिं बुध सरबस जाता ॥ तुम्ह कानन गवनहु दोउ भाई। फेरिअहिं लखन सीय रघुराई ॥ सुनि सुबचन हरषे दोउ भ्राता। भे प्रमोद परिपूरन गाता ॥ मन प्रसन्न तन तेजु बिराजा। जनु जिय राउ रामु भए राजा ॥ बहुत लाभ लोगन्ह लघु हानी। सम दुख सुख सब रोवहिं रानी ॥ कहहिं भरतु मुनि कहा सो कीन्हे। फलु जग जीवन्ह अभिमत दीन्हे ॥ कानन करउँ जनम भरि बासू। एहिं तें अधिक न मोर सुपासू ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

वसिष्ठ सुझाव देते हैं कि भरत-शत्रुघ्न वन जाएँ और राम-सीता-लक्ष्मण लौटें। दोनों भाई इसे सुनकर अत्यंत प्रसन्न होते हैं। भरत कहते हैं कि राम का लौटना हो तो वे जन्मभर वनवास भी सबसे बड़ा लाभ मानेंगे।

दोहा २५६

अँतरजामी रामु सिय तुम्ह सरबग्य सुजान। जो फुर कहहु त नाथ निज कीजिअ बचनु प्रवान ॥ २५६ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

वे गुरु से अनुरोध करते हैं कि यदि यह सच्चा प्रस्ताव है तो उसे पूरा करें; राम-सीता और गुरु उनके अंतरभाव जानते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २५७

वसिष्ठ का राम से समाधान पूछना

चौपाइयाँ — मूल पाठ

भरत बचन सुनि देखि सनेहू। सभा सहित मुनि भए बिदेहू ॥ भरत महा महिमा जलरासी। मुनि मति ठाढ़ि तीर अबला सी ॥ गा चह पार जतनु हियँ हेरा। पावति नाव न बोहितु बेरा ॥ औरु करिहि को भरत बड़ाई। सरसी सीपि कि सिंधु समाई ॥ भरतु मुनिहि मन भीतर भाए। सहित समाज राम पहिँ आए ॥ प्रभु प्रनामु करि दीन्ह सुआसनु। बैठे सब सुनि मुनि अनुसासनु ॥ बोले मुनिबरु बचन बिचारी। देस काल अवसर अनुहारी ॥ सुनहु राम सरबग्य सुजाना। धरम नीति गुन ग्यान निधाना ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

भरत का प्रेम देखकर मुनि और सभा भावमग्न हैं; कवि उनकी महिमा को अगाध समुद्र कहते हैं। सब राम के पास जाते हैं। राम सम्मानपूर्वक आसन देते हैं और वसिष्ठ समय-परिस्थिति के अनुरूप उनसे बात करते हैं।

दोहा २५७

सब के उर अंतर बसहु जानहु भाउ कुभाउ। पुरजन जननी भरत हित होइ सो कहिअ उपाउ ॥ २५७ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

मुनि कहते हैं—आप सबके हृदय के भाव जानते हैं; नगरवासियों, माताओं और भरत का हित हो, ऐसा उपाय कहें।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २५८

भरत की विनती सुनने का आग्रह

चौपाइयाँ — मूल पाठ

आरत कहहिं बिचारि न काऊ। सूझ जूआरिहि आपन दाऊ ॥ सुनि मुनि बचन कहत रघुराऊ। नाथ तुम्हारेहि हाथ उपाऊ ॥ सब कर हित रुख राउरि राखेँ। आयसु किएँ मुदित फुर भाषें ॥ प्रथम जो आयसु मो कहुँ होई। माथेँ मानि करौ सिख सोई ॥ पुनि जेहि कहँ जस कहब गोसाईँ। सो सब भाँति घटिहि सेवकाईँ ॥ कह मुनि राम सत्य तुम्ह भाषा। भरत सनेहँ बिचारु न राखा ॥ तेहि तें कहउँ बहोरि बहोरी। भरत भगति बस भइ मति मोरी ॥ मोरेँ जान भरत रुचि राखि। जो कीजिअ सो सुभ सिव साखी ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

राम गुरु की आज्ञा को सबके हित का उपाय बताते हैं और पहले कही सीख मानने को तत्पर हैं। वसिष्ठ स्वीकारते हैं कि भरत के प्रेम ने उन्हें भी बाँध लिया है; उनके भाव का सम्मान करके निर्णय होना चाहिए।

दोहा २५८

भरत बिनय सादर सुनिअ करिअ बिचारु बहोरि। करब साधुमत लोकमत नृपनय निगम निचोरि ॥ २५८ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

गुरु कहते हैं—भरत की विनती आदर से सुनें, फिर संतमत, लोकमत, राजधर्म और वेदसार का विचार करके उचित करें।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २५९

राम द्वारा भरत की महिमा स्वीकारना

चौपाइयाँ — मूल पाठ

गुरु अनुराग भरत पर देखी। राम ह्दयँ आनंदु बिसेषी ॥ भरतहि धरम धुरंधर जानी। निज सेवक तन मानस बानी ॥ बोले गुर आयस अनुकूला। बचन मंजु मृदु मंगलमूला ॥ नाथ सपथ पितु चरन दोहाई। भयउ न भुअन भरत सम भाई ॥ जे गुर पद अंबुज अनुरागी। ते लोकहुँ बेदहुँ बड़भागी ॥ राउर जा पर अस अनुरागू। को कहि सकइ भरत कर भागू ॥ लखि लघु बंधु बुद्धि सकुचाई। करत बदन पर भरत बड़ाई ॥ भरतु कहहीं सोइ किएँ भलाई। अस कहि राम रहे अरगाई ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

गुरु का भरत पर अनुराग देखकर राम प्रसन्न होते हैं। वे पिता के चरणों की आन लेकर भरत जैसा भाई न होने की बात कहते हैं। गुरु की कृपा उनका विशेष सौभाग्य है और भरत की बात करने में राम भी संकोच रखते हैं।

दोहा २५९

तब मुनि बोले भरत सन सब सँकोचु तजि तात। कृपासिंधु प्रिय बंधु सन कहहु हृदय कै बात ॥ २५९ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

गुरु भरत से कहते हैं कि संकोच छोड़कर करुणामय प्रिय भाई के सामने हृदय की बात कहें।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २६०

बाल्यकाल से राम की उदारता का स्मरण

चौपाइयाँ — मूल पाठ

सुनि मुनि बचन राम रुख पाई। गुरु साहिब अनुकूल अघाई ॥ लखि अपने सिर सबु छरु भारू। कहि न सकहिं कछु करहिं बिचारू ॥ पुलकि सरीर सभाँ भए ठाढें। नीरज नयन नेह जल बाढ़ें ॥ कहब मोर मुनिनाथ निबाहा। एहि तें अधिक कहौं मैं काहा। मैं जानउँ निज नाथ सुभाऊ। अपराधिहु पर कोह न काऊ ॥ मो पर कृपा सनेह बिसेषी। खेलत खुनिस न कबहूँ देखी ॥ सिसुपन तें परिहरेउँ न संगू। कबहुँ न कीन्ह मोर मन भंगू ॥ मैं प्रभु कृपा रीति जियँ जोही। हारेहुँ खेल जितावहिं मोही ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

भरत उत्तर देने का भार देखकर भावविह्वल होते हैं। कहते हैं कि राम ने अपराध पर भी क्रोध नहीं किया, बचपन से साथ रखा और कभी मन नहीं तोड़ा। खेल में स्वयं हारकर उन्हें जिताने तक की कृपा की है।

दोहा २६०

महूँ सनेह सकोच बस सनमुख कही न बैन। दरसन तृपित न आजु लगि पेम पिआसे नैन ॥ २६० ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

प्रेम और संकोच से भरत खुलकर कह नहीं पाते; उनकी प्रेमप्यासी आँखें आज तक दर्शन से तृप्त नहीं हुईं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २६१

माता को दोष देने से भरत का पीछे हटना

चौपाइयाँ — मूल पाठ

बिधि न सकेउ सहि मोर दुलारा। नीच बीचु जननी मिस पारा। यहउ कहत मोहि आजु न सोभा। अपनीं समुझि साधु सुचि को भा ॥ मातु मंदि मैं साधु सुचाली। उर अस आनत कोटि कुचाली ॥ फरइ कि कोदव बालि सुसाली। मुकुता प्रसव कि संबुक काली ॥ सपनेहुँ दोसक लेसु न काहू। मोर अभाग उदधि अवगाहू ॥ बिनु समुझें निज अघ परिपाकू। जारिउँ जायँ जननि कहि काकू ॥ हृदयँ हेरि हारेउँ सब ओरा। एकहि भाँति भलेहिं भल मोरा ॥ गुर गोसाइँ साहिब सिय रामू। लागत मोहि नीक परिनामू ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

भरत कहते हैं कि माता को दुष्ट और स्वयं को अच्छा मानना भी भीतर की कुटिलता होगी। वे अपने दुर्भाग्य को कारण मानकर माता पर व्यर्थ क्रोध करने का पछतावा करते हैं। गुरु और सीता-राम के आश्रय से मंगल की आशा रखते हैं।

दोहा २६१

साधु सभा गुर प्रभु निकट कहउँ सुथल सति भाउ। प्रेम प्रपंचु कि झूठ फुर जानहिं मुनि रघुराउ ॥ २६१ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

पवित्र सभा में वे सच्चा भाव रखते हैं; उनके प्रेम में छल या सत्य क्या है, इसे मुनि और राम जानते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २६२

सबका दुःख देखकर भरत की आत्मपीड़ा

चौपाइयाँ — मूल पाठ

भूपति मरन पेम पनु राखी। जननी कुमति जगतु सबु साखी ॥ देखि न जाहि बिकल महतारी। जरहिं दुसह जर पुर नर नारी ॥ महीं सकल अनरथ कर मूला। सो सुनि समुझि सहिउँ सब सूला ॥ सुनि बन गवनु कीन्ह रघुनाथा। करि मुनि बेष लखन सिय साथा ॥ बिनु पानहिन्ह पयादेहि पाएँ। संकरु साखि रहेउँ एहि घाएँ ॥ बहुरि निहार निषाद सनेहू। कुलिस कठिन उर भयउ न बेहू ॥ अब सबु आँखिन्ह देखेउँ आई। जिअत जीव जड़ सबइ सहाई ॥ जिन्हहि निरखि मग साँपिनि बीछी। तजहिं बिषम बिषु तामस तीछी ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

भरत पिता की मृत्यु, माताओं की व्याकुलता और नगर के संताप का स्मरण करते हैं। राम-सीता-लक्ष्मण के पैदल वनगमन तथा निषाद के प्रेम का समाचार सुनकर भी जीवित रहने पर ग्लानि कहते हैं। अब सब प्रत्यक्ष देखकर उनकी वेदना गहरी है।

दोहा २६२

तेइ रघुनंदनु लखनु सिय अनहित लागे जाहि। तासु तनय तजि दुसह दुख दैउ सहावइ काहि ॥ २६२ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

वे कहते हैं कि जिनकी कोमलता देखकर विषैले जीव भी सौम्य हो जाएँ, उनसे विरोध रखने वाली माता के पुत्र के सिवा यह दुःख कौन सहेगा?

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २६३

राम का भरत को निर्दोष बताना

चौपाइयाँ — मूल पाठ

सुनि अति बिकल भरत बर बानी। आरति प्रीति बिनय नय सानी ॥ सोक मगन सब सभाँ खभारू। मनहुँ कमल बन परेउ तुसारू ॥ कहि अनेक बिधि कथा पुरानी। भरत प्रबोधु कीन्ह मुनि ग्यानी ॥ बोले उचित बचन रघुनंदू। दिनकर कुल कैरव बन चंदू ॥ तात जाँय जियँ करहु गलानी। ईस अधीन जीव गति जानी ॥ तीनि काल तिभुअन मत मोरें। पुन्यसिलोक तात तर तोरे ॥ उर आनत तुम्ह पर कुटिलाई। जाइ लोकु परलोकु नसाई ॥ दोसु देहिं जननिहि जड़ तेई। जिन्ह गुर साधु सभा नहिं सेई ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

भरत की व्यथा से सभा शोक में डूबती है। मुनि उन्हें समझाते हैं। राम स्वयं उन्हें व्यर्थ ग्लानि न करने को कहते हैं; उनकी पवित्रता की प्रशंसा करके उन पर कपट का आरोप और माता को दोष देना अनुचित बताते हैं।

दोहा २६३

मिटिहहिं पाप प्रपंच सब अखिल अमंगल भार। लोक सुजसु परलोक सुखु सुमिरत नामु तुम्हार ॥ २६३ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

राम कहते हैं कि भरत का नाम स्मरण भी पाप-प्रपंच और अमंगल घटाकर लोक में सुयश तथा परलोक में सुख देने वाला होगा।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २६४

राम का प्रेमपूर्ण आश्वासन

चौपाइयाँ — मूल पाठ

कहउँ सुभाउ सत्य सिव साखी। भरत भूमि रह राउरि राखी ॥ तात कुतरक करहु जनि जाएँ। बैर पेम नहि दुरइ दुराएँ ॥ मुनि गन निकट बिहग मृग जाहीं। बाधक बधिक बिलोकि पराहीं ॥ हित अनहित पसु पच्छिउ जाना। मानुष तनु गुन ग्यान निधाना ॥ तात तुम्हहि मैं जानउँ नीकें। करौं काह असमंजस जीकें ॥ राखेउ रायँ सत्य मोहि त्यागी। तनु परिहरेउ पेम पन लागी ॥ तासु बचन मेटत मन सोचू। तेहि तें अधिक तुम्हार सँकोचू ॥ ता पर गुर मोहि आयसु दीन्हा। अवसि जो कहहु चहउँ सोइ कीन्हा ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

राम कहते हैं कि वे भरत को भलीभाँति जानते हैं; प्रेम और वैर छिपते नहीं। दशरथ ने सत्य और प्रेम दोनों निभाए, इसलिए उनका वचन बदलने में संकोच है। फिर भी गुरु की आज्ञा और भरत के प्रेम का पूरा आदर करते हैं।

दोहा २६४

मनु प्रसन्न करि सकुच तजि कहहु करौं सोइ आजु। सत्यसंध रघुबर बचन सुनि भा सुखी समाजु ॥ २६४ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

राम भरत से प्रसन्न मन और निष्संकोच होकर अपनी इच्छा कहने को कहते हैं; इस सत्यनिष्ठ वचन से सभा आनंदित होती है।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २६५

देवताओं का भरत की शरण का विचार

चौपाइयाँ — मूल पाठ

सुर गन सहित सभय सुरराजू। सोचहिं चाहत होन अकाजू ॥ बनत उपाउ करत कछु नाहीं। राम सरन सब गे मन माहीं ॥ बहुरि बिचारि परस्पर कहहीं। रघुपति भगत भगति बस अहहीं। सुधि करि अंबरीष दुरबासा। भे सुर सुरपति निपट निरासा ॥ सहे सुरन्ह बहु काल बिषादा। नरहरि किए प्रगट प्रहलादा ॥ लगि लगि कान कहहिं धुनि माथा। अब सुर काज भरत के हाथा ॥ आन उपाउ न देखिअ देवा। मानत रामु सुसेवक सेवा ॥ हियँ सपेम सुमिरहु सब भरतहि। निज गुन सील राम बस करतहि ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

देवता फिर देवकार्य के कारण चिंतित होते हैं, पर समझते हैं कि राम भक्त के प्रेम के वश हैं। अंबरीष-दुर्वासा और प्रह्लाद की कथाएँ याद कर वे भरत के निष्कपट गुणों को बाधा देने के बदले उनका स्मरण करने का निश्चय करते हैं।

दोहा २६५

सुनि सुर मत सुरगुर कहेउ भल तुम्हार बड़ भागु। सकल सुमंगल मूल जग भरत चरन अनुरागु ॥ २६५ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

बृहस्पति इसे सौभाग्य कहते हैं; भरत के चरणों में अनुराग को जगत के मंगल का मूल बताते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २६६

भरत का निष्कर्ष: राम की आज्ञा ही हित

चौपाइयाँ — मूल पाठ

सीतापति सेवक सेवकाई। कामधेनु सय सरिस सुहाई ॥ भरत भगति तुम्हरें मन आई। तजहु सोचु बिधि बात बनाई ॥ देखु देवपति भरत प्रभाऊ। सहज सुभायँ बिबस रघुराऊ ॥ मन थिर करहु देव डरु नाहीं। भरतहि जानि राम परिछाहीं ॥ सुनि सुरगुर सुर संमत सोचू। अंतरजामी प्रभुहि सकोचू ॥ निज सिर भारु भरत जियँ जाना। करत कोटि बिधि उर अनुमाना ॥ करि बिचारु मन दीन्ही ठीका। राम रजायस आपन नीका ॥ निज पन तजि राखेउ पनु मोरा। छोहु सनेहु कीन्ह नहिं थोरा ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

बृहस्पति देवताओं को भरत को राम की छाया समझकर न डरने को कहते हैं। राम अंतरभाव जानते हैं। भरत अपने ऊपर निर्णय का भार पहचानकर निश्चय करते हैं कि उनका वास्तविक भला राम की आज्ञा में है; प्रभु ने उनके प्रेम का पूरा सम्मान किया है।

दोहा २६६

कीन्ह अनुग्रह अमित अति सब बिधि सीतानाथ। करि प्रनामु बोले भरतु जोरि जलज जुग हाथ ॥ २६६ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

सीतानाथ के अपार अनुग्रह का अनुभव करके भरत प्रणाम करते और दोनों हाथ जोड़कर फिर विनय करते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २६७

शरणागत पर राम की छाया

चौपाइयाँ — मूल पाठ

कहौं कहावौं का अब स्वामी। कृपा अंबुनिधि अंतरजामी ॥ गुर प्रसन्न साहिब अनुकूला। मिटी मलिन मन कलपित सूला ॥ अपडर डरेउँ न सोच समूलें। रबिहि न दोसु देव दिसि भूलें ॥ मोर अभागु मातु कुटिलाई। बिधि गति बिषम काल कठिनाई ॥ पाउ रोऽपि सब मिलि मोहि घाला। प्रनतपाल पन आपन पाला ॥ यह नइ रीति न राउरि होई। लोकहुँ बेद बिदित नहिं गोई ॥ जगु अनभल भल एकु गोसाईं। कहिअ होइ भल कासु भलाईं ॥ देउ देवतरु सरिस सुभाऊ। सनमुख बिमुख न काहुहि काऊ ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

भरत कहते हैं कि गुरु और प्रभु की अनुकूलता से उनके कल्पित भय मिट गए। दुर्भाग्य तथा कठिन समय के बीच भी राम ने शरणागत की रक्षा की। वे प्रभु की उदारता को कल्पवृक्ष की शीतल छाया जैसी सबके लिए उपलब्ध कहते हैं।

दोहा २६७

जाइ निकट पहिचानि तरु छाहँ समनि सब सोच। मागत अभिमत पाव जग राउ रंकु भल पोच ॥ २६७ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

जो राजा-गरीब, अच्छा-बुरा कोई भी उचित आश्रय लेकर निकट आता है, वह मनचाहा कल्याण और चिंता से राहत पाता है।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २६८

भरत के अनेक विकल्प और सेवा का भाव

चौपाइयाँ — मूल पाठ

लखि सब बिधि गुर स्वामि सनेहू। मिटेउ छोभु नहिं मन संदेहू ॥ अब करुनाकर कीजिअ सोई। जन हित प्रभु चित छोभु न होई ॥ जो सेवकु साहिबहि सँकोची। निज हित चहइ तासु मति पोची ॥ सेवक हित साहिब सेवकाई। करै सकल सुख लोभ बिहाई ॥ स्वारथु नाथ फिरें सबही का। किएँ रजाइ कोटि बिधि नीका ॥ यह स्वारथ परमारथ सारु। सकल सुकृत फल सुगति सिंगारु ॥ देव एक बिनती सुनि मोरी। उचित होइ तस करब बहोरी ॥ तिलक समाजु साजि सबु आना। करिअ सुफल प्रभु जौं मनु माना ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

भरत कहते हैं कि अपना सुख चाहकर स्वामी को संकोच में डालना उचित सेवा नहीं। राम का लौटना सबकी कामना है; अभिषेक का सामान भी लाए हैं। वे उसे स्वीकार करने या अपने लिए कोई सेवापूर्ण विकल्प देने की विनती करते हैं।

दोहा २६८

सानुज पठइअ मोहि बन कीजिअ सबहि सनाथ। नतरु फेरिअहिं बंधु दोउ नाथ चलौं मैं साथ ॥ २६८ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

भरत चाहते हैं कि उन्हें शत्रुघ्न सहित वन भेजकर राम लौटें; अन्यथा दोनों भाई लौटें और उन्हें राम के साथ रहने दें।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २६९

अंतिम निर्णय राम की प्रसन्नता पर छोड़ना

चौपाइयाँ — मूल पाठ

नतरु जाहिं बन तीनिउ भाई। बहुरिअ सीय सहित रघुराई ॥ जेहि बिधि प्रभु प्रसन्न मन होई। करुना सागर कीजिअ सोई ॥ देवँ दीन्ह सबु मोहि अभारु। मोरें नीति न धरम बिचारु ॥ कहउँ बचन सब स्वारथ हेतू। रहत न आरत कें चित चेतू ॥ उतरु देइ सुनि स्वामि रजाई। सो सेवकु लखि लाज लजाई ॥ अस मैं अवगुन उदधि अगाधू। स्वामि सनेहँ सराहत साधू ॥ अब कृपाल मोहि सो मत भावा। सकुच स्वामि मन जाइँ न पावा ॥ प्रभु पद सपथ कहउँ सति भाऊ। जग मंगल हित एक उपाऊ ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

भरत यह विकल्प भी देते हैं कि तीनों छोटे भाई वन जाएँ और राम-सीता लौटें। फिर मानते हैं कि अपनी व्याकुलता में स्वार्थ की बातें कह गए। अब वे स्वामी के मन में तनिक भी संकोच न आने देने को सर्वोपरि रखते हैं।

दोहा २६९

प्रभु प्रसन्न मन सकुच तजि जो जेहि आयसु देब। सो सिर धरि धरि करिहि सबु मिटिहि अनट अवरेब ॥ २६९ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

प्रभु प्रसन्न मन से जिसे जो आज्ञा देंगे, सब उसे सिर पर रखेंगे; इसी से सारी उलझन और विघ्न मिटेंगे।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २७०

जनकजी के दूतों का आगमन

चौपाइयाँ — मूल पाठ

भरत बचन सुचि सुनि सुर हरषे। साधु सराहि सुमन सुर बरषे ॥ असमंजस बस अवध नेवासी। प्रमुदित मन तापस बनबासी ॥ चुपहिं रहे रघुनाथ सँकोची। प्रभु गति देखि सभा सब सोची ॥ जनक दूत तेहि अवसर आए। मुनि बसिष्ठँ सुनि बेगि बोलाए ॥ करि प्रनाम तिन्ह रामु निहारे। बेषु देखि भए निपट दुखारे ॥ दूतन्ह मुनिबर बूझी बाता। कहहु बिदेह भूप कुसलाता ॥ सुनि सकुचाइ नाइ महि माथा। बोले चर बर जोरें हाथा ॥ बूझब राउर सादर साईं। कुसल हेतु सो भयउ गोसाईं ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

भरत की निर्मल बात से देवता प्रसन्न, वनवासी आनंदित और अवधवासी असमंजस में हैं। राम मौन हैं। तभी जनक के दूत आते हैं। वसिष्ठ उन्हें बुलाकर कुशल पूछते हैं; राम का तपस्वीवेश देखकर वे दुःखी होते हैं।

दोहा २७०

नाहि त कोसल नाथ कें साथ कुसल गइ नाथ। मिथिला अवध बिसेष तें जगु सब भयउ अनाथ ॥ २७० ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

दूत कहते हैं कि असल कुशल तो दशरथ के साथ चली गई; मिथिला-अयोध्या ही नहीं, सारा जगत अपने को अनाथ अनुभव कर रहा है।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २७१

जनकजी द्वारा भरत का भाव जानना

चौपाइयाँ — मूल पाठ

कोसलपति गति सुनि जनकौरा। भे सब लोक सोक बस बौरा ॥ जेहिं देखे तेहि समय बिदेहू। नामु सत्य अस लाग न केहू ॥ रानि कुचालि सुनत नरपालहि। सूझ न कछु जस मनि बिनु ब्यालहि ॥ भरत राज रघुबर बनबासू। भा मिथिलेसहि हृदयँ हराँसू ॥ नृप बूझे बुध सचिव समाजू। कहहु बिचारि उचित का आजू ॥ समुझि अवध असमंजस दोऊ। चलिअ कि रहिअ न कह कछु कोऊ ॥ नृपहि धीर धरि हृदयँ बिचारी। पठए अवध चतुर चर चारी ॥ बूझि भरत सति भाउ कुभाऊ। आएहु बेगि न होइ लखाऊ ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

दूत बताते हैं कि दशरथ के निधन और वनवास की घटना से जनक तथा मिथिला शोक में डूब गए। मंत्रियों से स्पष्ट उपाय न मिलने पर जनक ने चार गुप्तचर भेजे कि भरत का वास्तविक भाव और आचरण जानकर लौटें।

दोहा २७१

गए अवध चर भरत गति बूझि देखि करतूति। चले चित्रकूटहि भरतु चार चले तेरहूति ॥ २७१ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

गुप्तचरों ने अयोध्या में भरत की करनी देखी; भरत के चित्रकूट चलने पर वे समाचार लेकर मिथिला लौटे।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २७२

जनकजी का चित्रकूट की ओर प्रस्थान

चौपाइयाँ — मूल पाठ

दूतन्ह आइ भरत कइ करनी। जनक समाज जथामति बरनी ॥ सुनि गुर परिजन सचिव महीपति। भे सब सोच सनेहँ बिकल अति ॥ धरि धीरजु करि भरत बड़ाई। लिए सुभट साहनी बोलाई ॥ घर पुर देस राखि रखवारे। हय गय रथ बहु जान सँवारे ॥ दुघरी साधि चले ततकाला। किए बिश्रामु न मग महीपाला ॥ भोरहिं आजु नहाइ प्रयागा। चले जमुन उतरन सबु लागा ॥ खबरि लेन हम पठए नाथा। तिन्ह कहि अस महि नायउ माथा ॥ साथ किरात छ सातक दीन्हे। मुनिबर तुरत बिदा चर कीन्हे ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

भरत का आचरण सुनकर जनक और परिवार प्रेम-शोक से व्याकुल हुए। राज्य की सुरक्षा करके वे सवारियों सहित तुरंत चले। प्रयाग स्नान और यमुना की ओर बढ़ने के बाद हाल जानने दूत भेजे गए; वसिष्ठ उन्हें मार्गदर्शक देकर लौटाते हैं।

दोहा २७२

सुनत जनक आगवनु सबु हरषेउ अवध समाजु। रघुनंदनहि सकोचु बड़ सोच बिबस सुरराजु ॥ २७२ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

जनक के आने का समाचार सुनकर अवध का समाज प्रसन्न हुआ; राम को संकोच और इंद्र को अपनी आशंका बढ़ती प्रतीत हुई।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २७३

अवधवासियों की रामराज्य की कामना

चौपाइयाँ — मूल पाठ

गरइ गलानि कुटिल कैकेई। काहि कहै केहि दूषनु देई ॥ अस मन आनि मुदित नर नारी। भयउ बहोरि रहब दिन चारी ॥ एहि प्रकार गत बासर सोऊ। प्रात नहान लाग सबु कोऊ ॥ करि मज्जनु पूजहिं नर नारी। गनप गौरि तिपुरारि तमारी ॥ रमा रमन पद बंदि बहोरी। बिनवहिं अंजुलि अंचल जोरी ॥ राजा रामु जानकी रानी। आनँद अवधि अवध रजधानी ॥ सुबस बसउ फिरि सहित समाजा। भरतहि रामु करहुँ जुबराजा ॥ एहि सुख सुधाँ सींची सब काहू। देव देहु जग जीवन लाहू ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

कैकेयी अपने कर्म से लज्जित हैं। अन्य लोग जनक के आने से कुछ दिन और दर्शन की आशा पाते हैं। सुबह स्नान-पूजन करके सब चाहते हैं कि राम राजा, जानकी रानी और भरत युवराज बनें तथा सब अयोध्या लौटें।

दोहा २७३

गुर समाज भाइन्ह सहित राम राजु पुर होउ। अछत राम राजा अवध मरिअ माग सबु कोउ ॥ २७३ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

सबकी प्रार्थना है कि गुरु और भाइयों सहित राम का राज्य हो तथा वे उनके अयोध्या में रहते जीवन पूरा करें।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २७४

जनकजी के स्वागत को राम का उठना

चौपाइयाँ — मूल पाठ

सुनि सनेहमय पुरजन बानी। निंदहिं जोग बिरति मुनि ग्यानी ॥ एहि बिधि नित्यकरम करि पुरजन। रामहि करहिं प्रनाम पुलकि तन ॥ ऊँच नीच मध्यम नर नारी। लहहिं दरसु निज निज अनुहारी ॥ सावधान सबही सनमानहिं। सकल सराहत कृपानिधानहिं ॥ लरिकाइहि ते रघुबर बानी। पालत नीति प्रीति पहिचानी ॥ सील सकोच सिंधु रघुराऊ। सुमुख सुलोचन सरल सुभाऊ ॥ कहत राम गुन गन अनुरागे। सब निज भाग सराहन लागे ॥ हम सम पुन्य पुंज जग थोरे। जिन्हहि रामु जानत करि मोरे ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

लोग राम के बचपन से परिचित शील, नीति, प्रेम और सरलता की चर्चा करते हैं। हर सामाजिक स्थिति के व्यक्ति को अपनी भावना के अनुसार सम्मान और दर्शन मिलते हैं। सब स्वयं को सौभाग्यशाली मानते हैं कि राम उन्हें अपना समझते हैं।

दोहा २७४

प्रेम मगन तेहि समय सब सुनि आवत मिथिलेसु। सहित सभा संभ्रम उठेउ रबिकुल कमल दिनेसु ॥ २७४ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

जनक के आने का समाचार मिलते ही प्रेममग्न राम पूरी सभा सहित तत्परतापूर्वक स्वागत के लिए उठ खड़े होते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २७५

जनक और राम का प्रेमपूर्ण मिलन

चौपाइयाँ — मूल पाठ

भाइ सचिव गुर पुरजन साथा। आगें गवनु कीन्ह रघुनाथा ॥ गिरिबरु दीख जनकपति जबहीं। करि प्रनाम रथ त्यागेउ तबहीं ॥ राम दरस लालसा उछाहू। पथ श्रम लेसु कलेसु न काहू ॥ मन तहँ जहँ रघुबर बैदेही। बिनु मन तन दुख सुख सुधि केही ॥ आवत जनकु चले एहि भाँती। सहित समाज प्रेम मति माती ॥ आए निकट देखि अनुरागे। सादर मिलन परसपर लागे ॥ लगे जनक मुनिजन पद बंदन। रिषिन्ह प्रनामु कीन्ह रघुनंदन ॥ भाइन्ह सहित रामु मिलि राजहि। चले लवाइ समेत समाजहि ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

राम गुरु, भाइयों, मंत्रियों और नगरवासियों के साथ आगे जाते हैं। जनक चित्रकूट देखकर रथ छोड़ प्रणाम करते हैं। दोनों समाज मिलते हैं; जनक मुनियों को और राम ऋषियों को प्रणाम करते हैं। राम सबको आश्रम ले चलते हैं।

दोहा २७५

आश्रम सागर सांत रस पूरन पावन पाथु। सेन मनहुँ करुना सरित लिएँ जाहिं रघुनाथु ॥ २७५ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

रूपक में आश्रम शांत रस का पवित्र समुद्र है और आती सेना करुणा की नदी, जिसे राम साथ ला रहे हैं।

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अयोध्याकाण्ड · सोरठा २७६

दोनों समाजों की करुणा का समुद्र

चौपाइयाँ — मूल पाठ

बोरति ग्यान बिराग करारे। बचन ससोक मिलत नद नारे ॥ सोच उसास समीर तंरगा। धीरज तट तरुबर कर भंगा ॥ बिषम बिषाद तोरावति धारा। भय भ्रम भवँर अबर्त अपारा ॥ केवट बुध बिद्या बड़ि नावा। सकहिं न खेइ ऐक नहिं आवा ॥ बनचर कोल किरात बिचारे। थके बिलोकि पथिक हियँ हारे ॥ आश्रम उदधि मिली जब जाई। मनहुँ उठेउ अंबुधि अकुलाई ॥ सोक बिकल दोउ राज समाजा। रहा न ग्यानु न धीरजु लाजा ॥ भूप रूप गुन सील सराही। रोवहिं सोक सिंधु अवगाही ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

कवि शोक को ऐसी नदी कहते हैं जो ज्ञान-वैराग्य और धैर्य के तट भी तोड़ देती है। दोनों राजसमाज आश्रम में मिलकर दशरथ के रूप, गुण और शील स्मरण करते हैं; किसी से गहरा प्रेमाश्रु रोका नहीं जाता।

छंद — मूल पाठ

अवगाहि सोक समुद्र सोचहिं नारि नर ब्याकुल महा। दै दोष सकल सरोष बोलहिं बाम बिधि कीन्हो कहा ॥ सुर सिद्ध तापस जोगिजन मुनि देखि दसा बिदेह की। तुलसी न समरथु कोउ जो तरि सकै सरित सनेह की ॥
छंद का सरल हिंदी अर्थ

नर-नारी शोकसागर में डूबकर विपरीत विधि को दोष देते हैं। जनक की दशा देखकर सिद्ध, तपस्वी और मुनि भी प्रेम की धारा पार करने में अपने को असमर्थ पाते हैं।

सोरठा २७६

किए अमित उपदेस जहँ तहँ लोगन्ह मुनिबरन्ह। धीरजु धरिअ नरेस कहेउ बसिष्ठ बिदेह सन ॥ २७६ ॥
सोरठा का सरल हिंदी अर्थ

मुनि जहाँ-तहाँ उपदेश देकर लोगों को सँभालते हैं; वसिष्ठ विशेष रूप से जनक से धैर्य धारण करने को कहते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २७७

ज्ञान के साथ रामप्रेम की महिमा

चौपाइयाँ — मूल पाठ

जासु ग्यानु रबि भव निसि नासा। बचन किरन मुनि कमल बिकासा ॥ तेहि कि मोह ममता निअराई। यह सिय राम सनेह बड़ाई ॥ बिषई साधक सिद्ध सयाने। त्रिबिध जीव जग बेद बखाने ॥ राम सनेह सरस मन जासू। साधु सभाँ बड़ आदर तासू ॥ सोह न राम पेम बिनु ग्यानू। करनधार बिनु जिमि जलजानू ॥ मुनि बहुबिधि बिदेहु समुझाए। रामघाट सब लोग नहाए ॥ सकल सोक संकुल नर नारी। सो बासरु बीतेउ बिनु बारी ॥ पसु खग मृगन्ह न कीन्ह अहारू। प्रिय परिजन कर कौन बिचारू ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

कवि कहते हैं कि जनक की दशा साधारण मोह नहीं, सीता-राम के प्रेम की महिमा है। ज्ञान भी रामप्रेम के बिना कर्णधारहीन नाव जैसा अधूरा है। मुनि समझाते हैं; सब स्नान करते हैं, पर दुःख में दिन भोजन-जल बिना बीतता है।

दोहा २७७

दोउ समाज निमिराजु रघुराजु नहाने प्रात। बैठे सब बट बिटप तर मन मलीन कृस गात ॥ २७७ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

अगली सुबह दोनों समाज, जनक और राम स्नान करके वटवृक्ष के नीचे बैठते हैं; सबका मन मलिन और शरीर दुर्बल है।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २७८

मुनियों का उपदेश और आहार की व्यवस्था

चौपाइयाँ — मूल पाठ

जे महिसुर दसरथ पुर बासी। जे मिथिलापति नगर निवासी ॥ हंस बंस गुर जनक पुरोधा। जिन्ह जग मगु परमारथु सोधा ॥ लगे कहन उपदेस अनेका। सहित धरम नय बिरति बिबेका ॥ कौसिक कहि कहि कथा पुरानीं। समुझाई सब सभा सुबानीं ॥ तब रघुनाथ कोसिकहि कहेऊ। नाथ कालि जल बिनु सबु रहेऊ ॥ मुनि कह उचित कहत रघुराई। गयउ बीति दिन पहर अढ़ाई ॥ रिषि रुख लखि कह तेरहुतिराजू। इहाँ उचित नहिं असन अनाजू ॥ कहा भूप भल सबहि सोहाना। पाइ रजायसु चले नहाना ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

अयोध्या-मिथिला के पुरोहित तथा गुरु धर्म, नीति, वैराग्य और विवेक की बातें कहते हैं। विश्वामित्र भी पुरानी कथाएँ सुनाते हैं। राम पिछले दिन सबके निराहार रहने की चिंता करते हैं; जनक वन में फलाहार को उचित बताते हैं।

दोहा २७८

तेहि अवसर फल फूल दल मूल अनेक प्रकार। लइ आए बनचर बिपुल भरि भरि काँवरि भार ॥ २७८ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

उसी समय वनवासी अनेक प्रकार के फल, फूल, पत्ते और मूल काँवरों में भरकर बहुत मात्रा में ले आते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २७९

चित्रकूट में जनक का आतिथ्य

चौपाइयाँ — मूल पाठ

कामद मे गिरि राम प्रसादा। अवलोकत अपहरत बिषादा ॥ सर सरिता बन भूमि बिभागा। जनु उमगत आनँद अनुरागा ॥ बेलि बिटप सब सफल सफूला। बोलत खग मृग अलि अनुकूला ॥ तेहि अवसर बन अधिक उछाहू। त्रिबिध समीर सुखद सब काहू ॥ जाइ न बरनि मनोहरताई। जनु महि करति जनक पहुनाई ॥ तब सब लोग नहाइ नहाई। राम जनक मुनि आयसु पाई ॥ देखि देखि तरुबर अनुरागे। जहँ तहँ पुरजन उतरन लागे ॥ दल फल मूल कंद बिधि नाना। पावन सुंदर सुधा समाना ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

कवि चित्रकूट को रामकृपा से शोकहर और आनंदमय बताते हैं। वन, नदी, फल-पुष्प, जीव और सुखद पवन मानो स्वयं जनक के सत्कार को तैयार हैं। स्नान करके लोग अपने-अपने स्थानों पर बैठते हैं।

दोहा २७९

सादर सब कहँ रामगुर पठए भरि भरि भार। पूजि पितर सुर अतिथि गुर लगे करन फरहार ॥ २७९ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

राम के गुरु सबके लिए फल-मूल भेजते हैं; पितर, देवता, अतिथि और गुरु का सम्मान करके सब फलाहार करते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २८०

वन में ही रहने की सबकी इच्छा

चौपाइयाँ — मूल पाठ

एहि बिधि बासर बीते चारी। रामु निरखि नर नारि सुखारी ॥ दुहु समाज असि रुचि मन माहीं। बिनु सिय राम फिरब भल नाहीं ॥ सीता राम संग बनबासू। कोटि अमरपुर सरिस सुपासू ॥ परिहरि लखन रामु बैदेही। जेहि घरु भाव बाम बिधि तेही ॥ दाहिन दइउ होइ जब सबही। राम समीप बसिअ बन तबही ॥ मंदाकिनि मज्जनु तिहु काला। राम दरसु मुद मंगल माला ॥ अटनु राम गिरि बन तापस थल। असनु अमिअ सम कंद मूल फल ॥ सुख समेत संबत दुइ साता। पल सम होहिं न जनिअहिं जाता ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

चार दिन दर्शन में सुख से बीतते हैं। दोनों समाज सोचते हैं कि सीता-राम के बिना लौटना अच्छा नहीं। स्नान, दर्शन, पवित्र वन-विहार और फलाहार में उनके साथ चौदह वर्ष भी क्षणवत बीत सकते हैं।

दोहा २८०

एहि सुख जोग न लोग सब कहहिं कहाँ अस भागु ॥ सहज सुभायँ समाज दुहु राम चरन अनुरागु ॥ २८० ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

सब इसे दुर्लभ सौभाग्य मानते हैं; दोनों समाजों में स्वाभाविक रूप से रामचरणों का अनुराग है।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २८१

सुनयना और अवध की माताओं का मिलन

चौपाइयाँ — मूल पाठ

एहि बिधि सकल मनोरथ करहीं। बचन सप्रेम सुनत मन हरहीं ॥ सीय मातु तेहि समय पठाईं। दासीं देखि सुअवसरु आईं ॥ सावकास सुनि सब सिय सासू। आयउ जनकराज रनिवासू ॥ कौसल्याँ सादर सनमानी। आसन दिए समय सम आनी ॥ सीलु सनेह सकल दुहु ओरा। द्रवहिं देखि सुनि कुलिस कठोरा ॥ पुलक सिथिल तन बारि बिलोचन। महि नख लिखन लगीं सब सोचन ॥ सब सिय राम प्रीति कि सि मूरती। जनु करुना बहु बेष बिसूरति ॥ सीय मातु कह बिधि बुधि बाँकी। जो पय फेनु फोर पबि टाँकी ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

सीता की माता उचित अवसर पाकर रानियों से मिलने आती हैं। कौसल्या आदर से आसन देती हैं। दोनों ओर शील और करुणा इतनी है कि कठोर हृदय भी द्रवित हो। सुनयना कोमल परिवार पर पड़े कठोर दुःख को देखकर विधि की विचित्रता कहती हैं।

दोहा २८१

सुनिअ सुधा देखिअहिं गरल सब करतूति कराल। जहँ तहँ काक उलूक बक मानस सकृत मराल ॥ २८१ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

वे कहती हैं कि अमृत का नाम सुनाई देता है, पर विष के अनुभव अधिक हैं; सच्चे दुर्लभ सज्जन का मिलना भी हंस जैसा विरला है।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २८२

कौसल्या की विशेष चिंता भरत के लिए

चौपाइयाँ — मूल पाठ

सुनि ससोच कह देबि सुमित्रा। बिधि गति बड़ि बिपरीत बिचित्रा ॥ जो सृजि पालइ हरइ बहोरी। बाल केलि सम बिधि मति भोरी ॥ कौसल्या कह दोसु न काहू। करम बिबस दुख सुख छति लाहू ॥ कठिन करम गति जान बिधाता। जो सुभ असुभ सकल फल दाता ॥ ईस रजाइ सीस सबही कें। उतपति थिति लय बिषहु अमी कें ॥ देबि मोह बस सोचिअ बादी। बिधि प्रपंचु अस अचल अनादी ॥ भूपति जिअब मरब उर आनी। सोचिअ सखि लखि निज हित हानी ॥ सीय मातु कह सत्य सुबानी। सुकृती अवधि अवधपति रानी ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

सुमित्रा विधि की विपरीत गति पर दुःख कहती हैं। कौसल्या किसी को दोष न देकर कर्म और ईश्वराधीन जगत की परिवर्तनशीलता समझाती हैं। सुनयना उनकी बात का आदर करती हैं। कौसल्या को तीनों वनयात्रियों के शुभ परिणाम का भरोसा है।

दोहा २८२

लखनु राम सिय जाहुँ बन भल परिनाम न पोचु। गहबरि हियँ कह कौसिला मोहि भरत कर सोचु ॥ २८२ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

वे भर्राए हृदय से कहती हैं कि उन्हें विशेष चिंता भरत की है, जिनका भीतर का वियोग अत्यंत गहरा है।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २८३

कौसल्या द्वारा भरत की गुणगाथा

चौपाइयाँ — मूल पाठ

ईस प्रसाद असीस तुम्हारी। सुत सुतबधू देवसरि बारी ॥ राम सपथ मैं कीन्ह न काऊ। सो करि कहउँ सखी सति भाऊ ॥ भरत सील गुन बिनय बड़ाई। भायप भगति भरोस भलाई ॥ कहत सारदहु कर मति हीचे। सागर सीप कि जाहिं उलीचे ॥ जानउँ सदा भरत कुलदीपा। बार बार मोहि कहेउ महीपा ॥ कसें कनकु मनि पारिखि पाएँ। पुरुष परिखिअहिं समयँ सुभाएँ। अनुचित आजु कहब अस मोरा। सोक सनेहँ सयानप थोरा ॥ सुनि सुरसरि सम पावनि बानी। भईं सनेह बिकल सब रानी ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

कौसल्या राम की शपथ लेकर भरत के शील, विनय, भाईचारे, भक्ति और भरोसे को अतुल कहती हैं। वे पहले से कुलदीपक थे, पर कठिन समय ने उनका स्वभाव और स्पष्ट दिखाया, जैसे कसौटी सोने-मणि की परीक्षा करती है।

दोहा २८३

कौसल्या कह धीर धरि सुनहु देबि मिथिलेसि। को बिबेकनिधि बल्लभहि तुम्हहि सकइ उपदेसि ॥ २८३ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

धैर्य रखकर कौसल्या सुनयना से कहती हैं कि वे और उनके विवेकनिधि पति स्वयं समझदार हैं; उन्हें कोई क्या उपदेश दे सकता है?

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २८४

भरत को वन में रखने का प्रस्ताव

चौपाइयाँ — मूल पाठ

रानि राय सन अवसरु पाई। अपनी भाँति कहब समुझाई ॥ रखिअहिं लखनु भरतु गबनहिं बन। जौं यह मत मानै महीप मन ॥ तौ भल जतनु करब सुबिचारी। मोरें सौचु भरत कर भारी ॥ गूढ़ सनेह भरत मन माही। रहें नीक मोहि लागत नाहीं ॥ लखि सुभाउ सुनि सरल सुबानी। सब भइ मगन करुन रस रानी ॥ नभ प्रसून झरि धन्य धन्य धुनि। सिथिल सनेहँ सिद्ध जोगी मुनि ॥ सबु रनिवासु बिथकि लखि रहेऊ। तब धरि धीर सुमित्राँ कहेऊ ॥ देबि दंड जुग जामिनि बीती। राम मातु सुनी उठी सप्रीती ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

कौसल्या सुनयना से अवसर देखकर जनक के सामने लक्ष्मण के लौटने और भरत के वन रहने का विकल्प रखने को कहती हैं। भरत के गूढ़ प्रेम के कारण उनका अयोध्या में रहना कठिन लगता है। रात बीतते देख सुमित्रा समय का ध्यान दिलाती हैं।

दोहा २८४

बेगि पाउ धारिअ थलहि कह सनेहँ सतिभाय। हमरें तौ अब ईस गति के मिथिलेस सहाय ॥ २८४ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

कौसल्या स्नेह से उन्हें विश्राम-स्थान लौटने को कहती हैं और अपना आश्रय ईश्वर तथा जनक की सहायता में मानती हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २८५

सुनयना का आश्वासन

चौपाइयाँ — मूल पाठ

लखि सनेह सुनि बचन बिनीता। जनकप्रिया गह पाय पुनीता ॥ देबि उचित असि बिनय तुम्हारी। दसरथ घरिनि राम महतारी ॥ प्रभु अपने नीचहु आदरहीं। अगिनि धूम गिरि सिर तिनु धरहीं ॥ सेवकु राउ करम मन बानी। सदा सहाय महेसु भवानी ॥ रउरे अंग जोगु जग को है। दीप सहाय कि दिनकर सोहै ॥ रामु जाइ बनु करि सुर काजू। अचल अवधपुर करिहहिं राजू ॥ अमर नाग नर राम बाहुबल। सुख बसिहहिं अपनें अपने थल ॥ यह सब जागबलिक कहि राखा। देबि न होइ मुधा मुनि भाषा ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

सुनयना कौसल्या के चरण पकड़कर उनके विनय का सम्मान करती हैं। जनक को सेवक और शिव-पार्वती को सदा सहायक कहती हैं। याज्ञवल्क्य के वचन स्मरण कर विश्वास दिलाती हैं कि राम देवकार्य पूरा करके अयोध्या में स्थिर राज्य करेंगे।

दोहा २८५

अस कहि पग परि पेम अति सिय हित बिनय सुनाइ ॥ सिय समेत सियमातु तब चली सुआयसु पाइ ॥ २८५ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

सीता के हित में विनती करके और चरणों में झुककर सुनयना अनुमति लेती हैं तथा सीता सहित अपने स्थान को जाती हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २८६

जनक और जानकी का करुण मिलन

चौपाइयाँ — मूल पाठ

प्रिय परिजनहि मिली बैदेही। जो जेहि जोगु भाँति तेहि तेही ॥ तापस बेष जानकी देखी। भा सबु बिकल बिषाद बिसेषी ॥ जनक राम गुर आयसु पाई। चले थलहि सिय देखी आई ॥ लीन्हि लाइ उर जनक जानकी। पाहुन पावन पेम प्रान की ॥ उर उमगेउ अंबुधि अनुरागू। भयउ भूप मनु मनहुँ पयागू ॥ सिय सनेह बटु बाढ़त जोहा। ता पर राम पेम सिसु सोहा ॥ चिरजीवी मुनि ग्यान बिकल जनु। बूड़त लहेउ बाल अवलंबनु ॥ मोह मगन मति नहिं बिदेह की। महिमा सिय रघुबर सनेह की ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

सीता प्रियजनों से मर्यादा के अनुसार मिलती हैं। उनका तपस्वीवेश देखकर सब दुःखी होते हैं। जनक अनुमति से आकर पुत्री को गले लगाते हैं; ज्ञाननिष्ठ जनक के भीतर भी राम-सीता का प्रेम समुद्र की तरह उमड़ता है।

दोहा २८६

सिय पितु मातु सनेह बस बिकल न सकी सँभारि। धरनिसुताँ धीरजु धरेउ समउ सुधरमु बिचारि ॥ २८६ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

माता-पिता का स्नेह देखकर सीता स्वयं को सँभाल नहीं पातीं; फिर समय और अपने धर्म का विचार कर धैर्य धारण करती हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २८७

सीता के त्याग पर जनक का गौरव

चौपाइयाँ — मूल पाठ

तापस बेष जनक सिय देखी। भयउ पेमु परितोषु बिसेषी ॥ पुत्रि पवित्र किए कुल दोऊ। सुजस धवल जगु कह सबु कोऊ ॥ जिति सुरसरि कीरति सरि तोरी। गवनु कीन्ह बिधि अंड करोरी ॥ गंग अवनि थल तीनि बड़ेरे। एहिं किए साधु समाज घनेरे ॥ पितु कह सत्य सनेहँ सुबानी। सीय सकुच महुँ मनहुँ समानी ॥ पुनि पितु मातु लीन्ह उर लाई। सिख आसिष हित दीन्हि सुहाई ॥ कहति न सीय सकुचि मन माहीं। इहाँ बसब रजनीं भल नाहीं ॥ लखि रुख रानि जनायउ राऊ। हृदयँ सराहत सीलु सुभाऊ ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

जनक कहते हैं कि पुत्री ने दोनों कुल पवित्र किए और उनकी कीर्ति जगत में फैली है। माता-पिता आशीष और हितकारी सीख देते हैं। सीता रातभर वहाँ रहने में संकोच करती हैं; माता उनका संकेत समझकर जनक को बताती हैं।

दोहा २८७

बार बार मिलि भेंट सिय बिदा कीन्ह सनमानि। कही समय सिर भरत गति रानि सुबानि सयानि ॥ २८७ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

सीता को ससम्मान विदा करके सुनयना उचित अवसर पर भरत की दशा और कौसल्या की चिंता जनक के सामने रखती हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २८८

जनक की दृष्टि में भरत की अतुलनीयता

चौपाइयाँ — मूल पाठ

सुनि भूपाल भरत ब्यवहारू। सोन सुगंध सुधा ससि सारू ॥ मूदे सजल नयन पुलके तन। सुजसु सराहन लगे मुदित मन ॥ सावधान सुनु सुमुखि सुलोचनि। भरत कथा भव बंध बिमोचनि ॥ धरम राजनय ब्रह्मबिचारू। इहाँ जथामति मोर प्रचारू ॥ सो मति मोरि भरत महिमाही। कहै काह छलि छुअति न छाँही ॥ बिधि गनपति अहिपति सिव सारद। कबि कोबिद बुध बुद्धि बिसारद ॥ भरत चरित कीरति करतूती। धरम सील गुन बिमल बिभूती ॥ समुझत सुनत सुखद सब काहू। सुचि सुरसरि रुचि निदर सुधाहू ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

भरत का आचरण सुनकर जनक पुलकित होते हैं। वे कहते हैं कि धर्म, राजनीति और ब्रह्मविचार की उनकी समझ भी भरत की महिमा पूरी नहीं छू सकती। भरत की भक्ति, शील और पवित्र कर्मगाथा सबके लिए सुखद है।

दोहा २८८

निरवधि गुन निरुपम पुरुषु भरतु भरत सम जानि। कहिअ सुमेरु कि सेर सम कबिकुल मति सकुचानि ॥ २८८ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

भरत असीम गुणों वाले अनुपम पुरुष हैं; उनकी उपमा स्वयं भरत ही हैं, जैसे सुमेरु को छोटे मानक से नापा नहीं जा सकता।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २८९

भरत राम की आज्ञा नहीं टालेंगे

चौपाइयाँ — मूल पाठ

अगम सबहि बरनत बरबरनी। जिमि जलहीन मीन गमु धरनी ॥ भरत अमित महिमा सुनु रानी। जानहिं रामु न सकहिं बखानी ॥ बरनि सप्रेम भरत अनुभाऊ। तिय जिय की रुचि लखि कह राऊ ॥ बहुरहिं लखनु भरतु बन जाहीं। सब कर भल सब के मन माहीं ॥ देबि परंतु भरत रघुबर की। प्रीति प्रतीति जाइ नहिं तरकी ॥ भरतु अवधि सनेह ममता की। जद्यपि रामु सीम समता की ॥ परमारथ स्वारथ सुख सारे। भरत न सपनेहुँ मनहुँ निहारे ॥ साधन सिद्ध राम पग नेहू ॥ मोहि लखि परत भरत मत एहू ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

जनक स्वीकारते हैं कि लक्ष्मण के लौटने और भरत के वन जाने में सबको लाभ दिखता है। फिर भी दोनों भाइयों के प्रेम और विश्वास को ऐसे तर्क से नहीं बदला जा सकता। भरत का साधन और सिद्धि केवल रामचरणों का प्रेम है।

दोहा २८९

भोरेहुँ भरत न पेलिहहिं मनसहुँ राम रजाइ। करिअ न सोचु सनेह बस कहेउ भूप बिलखाइ ॥ २८९ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

जनक कहते हैं कि भरत भूलकर भी मन में राम की आज्ञा नहीं टालेंगे; केवल स्नेहवश चिंता न की जाए।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २९०

समाज के हित के लिए राम का गुरु से निवेदन

चौपाइयाँ — मूल पाठ

राम भरत गुन गनत सप्रीती। निसि दंपतिहि पलक सम बीती ॥ राज समाज प्रात जुग जागे। न्हाइ न्हाइ सुर पूजन लागे ॥ गे नहाइ गुर पहीं रघुराई। बंदि चरन बोले रुख पाई ॥ नाथ भरतु पुरजन महतारी। सोक बिकल बनबास दुखारी ॥ सहित समाज राउ मिथिलेसू। बहुत दिवस भए सहत कलेसू ॥ उचित होइ सोइ कीजिअ नाथा। हित सबही कर रौरें हाथा ॥ अस कहि अति सकुचे रघुराऊ। मुनि पुलके लखि सीलु सुभाऊ ॥ तुम्ह बिनु राम सकल सुख साजा। नरक सरिस दुहु राज समाजा ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

राम-भरत के गुण कहते जनक-सुनयना की रात बीतती है। सुबह राम गुरु से कहते हैं कि माताएँ, भरत, नगरवासी और जनक का समाज लंबे समय से वनकष्ट सह रहे हैं; सबके हित का उचित उपाय करें। गुरु उनके संकोच का सम्मान करते हैं।

दोहा २९०

प्रान प्रान के जीव के जिव सुख के सुख राम। तुम्ह तजि तात सोहात गृह जिन्हहि तिन्हहिं बिधि बाम ॥ २९० ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

गुरु राम को प्राणों का प्राण और सुख का सुख कहते हैं; उनके बिना घर भी किसी को अच्छा नहीं लगता।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २९१

जनक से असमंजस सुलझाने की प्रार्थना

चौपाइयाँ — मूल पाठ

सो सुखु करमु धरमु जरि जाऊ। जहँ न राम पद पंकज भाऊ ॥ जोगु कुजोगु ग्यानु अग्यानू। जहँ नहिं राम पेम परधानू ॥ तुम्ह बिनु दुखी सुखी तुम्ह तेहीं। तुम्ह जानहु जिय जो जेहि केहीं ॥ राउर आयसु सिर सबही कें। बिदित कृपालहि गति सब नीकें ॥ आपु आश्रमहि धारिअ पाऊ। भयउ सनेह सिथिल मुनिराऊ ॥ करि प्रनाम तब रामु सिधाए। रिषि धरि धीर जनक पहिं आए ॥ राम बचन गुरु नृपहि सुनाए। सील सनेह सुभायँ सुहाए ॥ महाराज अब कीजिअ सोई। सब कर धरम सहित हित होई।
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

गुरु प्रेम को सुख, कर्म और ज्ञान की सार्थकता बताते हैं तथा राम को आश्रम भेजते हैं। फिर जनक के पास जाकर राम की करुणामयी बात कहते हैं और धर्म के साथ सभी का हित हो ऐसा निर्णय करने को कहते हैं।

दोहा २९१

ग्यान निधान सुजान सुचि धरम धीर नरपाल। तुम्ह बिनु असमंजस समन को समरथ एहि काल ॥ २९१ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

ज्ञाननिधि, धर्मधीर और विवेकी जनक के सिवा इस समय उलझन मिटाने में और कौन समर्थ है—गुरु ऐसा पूछते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २९२

जनक का भरत से विमर्श

चौपाइयाँ — मूल पाठ

सुनि मुनि बचन जनक अनुरागे। लखि गति ग्यानु बिरागु बिरागे ॥ सिथिल सनेहँ गुनत मन माहीं। आए इहाँ कीन्ह भल नाही ॥ रामहि रायँ कहेउ बन जाना। कीन्ह आपु प्रिय प्रेम प्रवाना ॥ हम अब बन तें बनहि पठाई। प्रमुदित फिरब बिबेक बड़ाई ॥ तापस मुनि महिसुर सुनि देखी। भए प्रेम बस बिकल बिसेषी ॥ समउ समुझि धरि धीरजु राजा। चले भरत पहिं सहित समाजा ॥ भरत आइ आगें भइ लीन्हे। अवसर सरिस सुआसन दीन्हे ॥ तात भरत कह तेरहुति राऊ। तुम्हहि बिदित रघुबीर सुभाऊ ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

जनक सोचते हैं कि पिता ने राम को वन भेजा और अब वे भी वन में ही रहने को कहकर कैसे प्रसन्न लौटेंगे। प्रेम से सभा व्याकुल है। समय देखकर वे भरत के पास जाते और राम की सत्यनिष्ठा का स्मरण कराते हैं।

दोहा २९२

राम सत्यब्रत धरम रत सब कर सीलु सनेहु ॥ संकट सहत सकोच बस कहिअ जो आयसु देहु ॥ २९२ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

जनक कहते हैं कि राम धर्मरत हैं और सबके शील-स्नेह का आदर करते हुए संकट सह रहे हैं; भरत चाहें तो अपनी बात कहें।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २९३

भरत का सेवा-धर्म का उत्तर

चौपाइयाँ — मूल पाठ

सुनि तन पुलकि नयन भरि बारी। बोले भरतु धीर धरि भारी ॥ प्रभु प्रिय पूज्य पिता सम आपू। कुलगुरु सम हित माय न बापू ॥ कौसिकादि मुनि सचिव समाजू। ग्यान अंबुनिधि आपुनु आजू ॥ सिसु सेवक आयसु अनुगामी। जानि मोहि सिख देइअ स्वामी ॥ एहिं समाज थल बूझब राउर। मौन मलिन मैं बोलब बाउर ॥ छोटे बदन कहउँ बड़ि बाता। छमब तात लखि बाम बिधाता ॥ आगम निगम प्रसिद्ध पुराना। सेवाधरमु कठिन जगु जाना ॥ स्वामि धरम स्वारथहि बिरोधू। बैरु अंध प्रेमहि न प्रबोधू ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

भरत जनक को पिता समान पूज्य और गुरु-मुनियों को अपना हितैषी मानते हैं। स्वयं को शिष्य-सेवक कहकर शिक्षा चाहते हैं। वे सेवा में स्वार्थ का विरोध बताते हैं; न अंधा वैर उचित निर्णय दे सकता है, न विवेकहीन आग्रह।

दोहा २९३

राखि राम रुख धरमु ब्रतु पराधीन मोहि जानि। सब कें संमत सर्ब हित करिअ पेमु पहिचानि ॥ २९३ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

वे कहते हैं कि राम की इच्छा, धर्म और व्रत सुरक्षित रखकर, उनके प्रेम को पहचानते हुए सबकी सहमति से सबका हित किया जाए।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २९४

थोड़े शब्दों में भरत का गहरा आशय

चौपाइयाँ — मूल पाठ

भरत बचन सुनि देखि सुभाऊ। सहित समाज सराहत राऊ ॥ सुगम अगम मृदु मंजु कठोरे। अरथु अमित अति आखर थोरे ॥ ज्यौ मुख मुकुर मुकुरु निज पानी। गहि न जाइ अस अदभुत बानी ॥ भूप भरत मुनि सहित समाजू। गे जहँ बिबुध कुमुद द्विजराजू ॥ सुनि सुधि सोच बिकल सब लोगा। मनहुँ मीनगन नव जल जोगा ॥ देवँ प्रथम कुलगुर गति देखी। निरखि बिदेह सनेह बिसेषी ॥ राम भगतिमय भरतु निहारे। सुर स्वारथी हहरि हियँ हारे ॥ सब कोउ राम पेममय पेखा। भउ अलेख सोच बस लेखा ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

जनक भरत की सहज किंतु गूढ़ वाणी की प्रशंसा करते हैं। वे सबके साथ राम की सभा में जाते हैं। प्रेममय गुरु, जनक और भरत को देखकर स्वार्थग्रस्त देवताओं की चिंता फिर बढ़ती है।

दोहा २९४

रामु सनेह सकोच बस कह ससोच सुरराज। रचहु प्रपंचहि पंच मिलि नाहिं त भयउ अकाजु ॥ २९४ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

इंद्र आशंकित होकर देवताओं से मिलकर कोई छल-उपाय रचने को कहते हैं; यह कथा में उनकी अनुचित स्वार्थबुद्धि दिखाई गई है।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २९५

सरस्वती का भरत की बुद्धि फेरने से इनकार

चौपाइयाँ — मूल पाठ

सुरन्ह सुमिरि सारदा सराही। देबि देव सरनागत पाही ॥ फेरि भरत मति करि निज माया। पालु बिबुध कुल करि छल छाया ॥ बिबुध बिनय सुनि देबि सयानी। बोली सुर स्वारथ जड़ जानी ॥ मो सन कहहु भरत मति फेरू। लोचन सहस न सूझ सुमेरू ॥ बिधि हरि हर माया बड़ि भारी। सोउ न भरत मति सकइ निहारी ॥ सो मति मोहि कहत करु भोरी। चंदिनि कर कि चंडकर चोरी ॥ भरत हृदयँ सिय राम निवासू। तहँ कि तिमिर जहँ तरनि प्रकासू ॥ अस कहि सारद गइ बिधि लोका। बिबुध बिकल निसि मानहुँ कोका ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

देवता सरस्वती से भरत की मति बदलने को कहते हैं। देवी इसे स्वार्थपूर्ण समझकर अस्वीकार करती हैं। जिनके हृदय में सीता-राम हैं वहाँ अज्ञान का अँधेरा कैसे होगा—यह कहकर वे चली जाती हैं।

दोहा २९५

सुर स्वारथी मलीन मन कीन्ह कुमंत्र कुठाटु ॥ रचि प्रपंच माया प्रबल भय भ्रम अरति उचाटु ॥ २९५ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

देवता फिर स्वयं प्रबल माया से लोगों में भय, भ्रम, अरुचि और उचाट पैदा करने का कपटपूर्ण उपाय करते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २९६

राम की मर्यादा और सभा का संकोच

चौपाइयाँ — मूल पाठ

करि कुचालि सोचत सुरराजू। भरत हाथ सबु काजु अकाजू ॥ गए जनकु रघुनाथ समीपा। सनमाने सब रबिकुल दीपा ॥ समय समाज धरम अबिरोधा। बोले तब रघुबंस पुरोधा ॥ जनक भरत संबादु सुनाई। भरत कहाउति कही सुहाई ॥ तात राम जस आयसु देहू। सो सबु करै मोर मत एहू ॥ सुनि रघुनाथ जोरि जुग पानी। बोले सत्य सरल मृदु बानी ॥ बिद्यमान आपुनि मिथिलेसू। मोर कहब सब भाँति भदेसू ॥ राउर राय रजायसु होई। राउरि सपथ सही सिर सोई ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

जनक और सभा को राम आदर देते हैं। वसिष्ठ जनक-भरत का संवाद सुनाकर राम को निर्णय कहने को कहते हैं। राम कहते हैं कि गुरु और जनक उपस्थित हैं, इसलिए उनका स्वयं आगे बढ़कर कहना उचित नहीं; उनकी आज्ञा स्वीकारेंगे।

दोहा २९६

राम सपथ सुनि मुनि जनकु सकुचे सभा समेत। सकल बिलोकत भरत मुखु बनइ न उतरु देत ॥ २९६ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

राम की शपथपूर्वक आज्ञाकारिता से मुनि, जनक और सभा संकोच में हैं; सब भरत की ओर देखते हैं, पर उत्तर सहज नहीं निकलता।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २९७

भरत का विवेकपूर्ण धैर्य

चौपाइयाँ — मूल पाठ

सभा सकुच बस भरत निहारी। रामबंधु धरि धीरजु भारी ॥ कुसमउ देखि सनेहु सँभारा। बढ़त बिंधि जिमि घटज निवारा ॥ सोक कनकलोचन मति छोनी। हरी बिमल गुन गन जगजोनी ॥ भरत बिबेक बराहँ बिसाला। अनायास उधरी तेहि काला ॥ करि प्रनामु सब कहँ कर जोरे। रामु राउ गुर साधु निहोरे ॥ छमब आजु अति अनुचित मोरा। कहउँ बदन मृदु बचन कठोरा ॥ हियँ सुमिरी सारदा सुहाई। मानस तें मुख पंकज आई ॥ बिमल बिबेक धरम नय साली। भरत भारती मंजु मराली ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

सभा को अपनी ओर देखते जानकर भरत प्रेम को धैर्य से सँभालते हैं। कवि उनके विवेक को ऐसा उद्धारक कहते हैं जो शोक में डूबी बुद्धि को निकाल लाता है। वे सबको प्रणाम करके कठिन किंतु विनम्र बात कहने की अनुमति चाहते हैं।

दोहा २९७

निरखि बिबेक बिलोचनन्हि सिथिल सनेहँ समाजु। करि प्रनामु बोले भरतु सुमिरि सीय रघुराजु ॥ २९७ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

प्रेम से शिथिल सभा को विवेक की दृष्टि से देखकर भरत सीता-राम का स्मरण करते और प्रणामपूर्वक बोलते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २९८

राम की कृपा से दोष भी सम्मान में बदले

चौपाइयाँ — मूल पाठ

प्रभु पितु मातु सुह्रद गुर स्वामी। पूज्य परम हित अतंरजामी ॥ सरल सुसाहिबु सील निधानू। प्रनतपाल सर्बग्य सुजानू ॥ समरथ सरनागत हितकारी। गुनगाहकु अवगुन अघ हारी ॥ स्वामि गोसाँइहि सरिस गोसाई। मोहि समान मैं साइँ दोहाई ॥ प्रभु पितु बचन मोह बस पेली। आयउँ इहाँ समाजु सकेली ॥ जग भल पोच ऊँच अरु नीचू। अमिअ अमरपद माहुरु मीचू ॥ राम रजाइ मेट मन माहीं। देखा सुना कतहुँ कोउ नाहीं ॥ सो मैं सब बिधि कीन्हि ढिठाई। प्रभु मानी सनेह सेवकाई ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

भरत राम को माता-पिता, मित्र, गुरु और स्वामी सभी का आश्रय कहते हैं। स्वीकारते हैं कि मोह में पूरी सभा लेकर आए, फिर भी राम ने उनके हठ को प्रेम और सेवा माना। यह प्रभु के शील तथा शरणागतवत्सलता की देन है।

दोहा २९८

कृपाँ भलाई आपनी नाथ कीन्ह भल मोर। दूषन भे भूषन सरिस सुजसु चारु चहु ओर ॥ २९८ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

भरत कहते हैं—प्रभु ने अपनी कृपा और भलाई से मेरा भला किया; दोष आभूषण जैसे बने और चारों ओर सुंदर यश मिला।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २९९

शरणागत को अपनाने वाले स्वामी की महिमा

चौपाइयाँ — मूल पाठ

राउरि रीति सुबानि बड़ाई। जगत बिदित निगमागम गाई ॥ कूर कुटिल खल कुमति कलंकी। नीच निसील निरीस निसंकी ॥ तेउ सुनि सरन सामुहें आए। सकृत प्रनामु किहें अपनाए ॥ देखि दोष कबहुँ न उर आने। सुनि गुन साधु समाज बखाने ॥ को साहिब सेवकहि नेवाजी। आपु समाज साज सब साजी ॥ निज करतूति न समुझिअ सपनें। सेवक सकुच सोचु उर अपनें ॥ सो गोसाइँ नहि दूसर कोपी। भुजा उठाइ कहउँ पन रोपी ॥ पसु नाचत सुक पाठ प्रबीना। गुन गति नट पाठक आधीना ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

भरत कहते हैं कि प्रभु दुष्ट और दोषयुक्त जन को भी एक प्रणाम और सच्ची शरण पर अपनाते हैं। उसके दोष मन में न रखकर गुण सभा में कहते हैं। सेवक का सम्मान करते हुए वे अपनी उदारता का प्रदर्शन भी नहीं करते।

दोहा २९९

यों सुधारि सनमानि जन किए साधु सिरमोर। को कृपाल बिनु पालिहै बिरिदावलि बरजोर ॥ २९९ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

ऐसे कृपालु स्वामी ही सेवक को सुधार-सँवारकर संतों में अग्रणी बना सकते हैं; भरत इसे राम की अद्वितीय अनुग्रह-रीति कहते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा ३००

अब स्पष्ट आज्ञा देने की विनती

चौपाइयाँ — मूल पाठ

सोक सनेहँ कि बाल सुभाएँ। आयउँ लाइ रजायसु बाएँ ॥ तबहुँ कृपाल हेरि निज ओरा। सबहि भाँति भल मानेउ मोरा ॥ देखेउँ पाय सुमंगल मूला। जानेउँ स्वामि सहज अनुकूला ॥ बड़ें समाज बिलोकेउँ भागू। बड़ीं चूक साहिब अनुरागू ॥ कृपा अनुग्रह अंगु अघाई। कीन्हि कृपानिधि सब अधिकाई ॥ राखा मोर दुलार गोसाईं। अपनें सील सुभायँ भलाईं ॥ नाथ निपट मैं कीन्हि ढिठाई। स्वामि समाज सकोच बिहाई ॥ अबिनय बिनय जथारुचि बानी। छमिहि देउ अति आरति जानी ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

भरत कहते हैं कि शोक, स्नेह या बालस्वभाव से आज्ञा के विपरीत आ पहुँचे, फिर भी राम ने उदारता से भला माना। दर्शन और समाज में मिले सम्मान से उन्हें प्रभु की अनुकूलता का निश्चय है; अपनी ढिठाई क्षमा करने को कहते हैं।

दोहा ३००

सुह्रद सुजान सुसाहिबहि बहुत कहब बड़ि खोरि। आयसु देइअ देव अब सबइ सुधारी मोरि ॥ ३०० ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

जानकार हितैषी स्वामी से अधिक कहना भी दोष है; भरत अब अपनी भूल सुधारकर स्पष्ट आज्ञा देने की प्रार्थना करते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · सोरठा ३०१

आज्ञापालन ही भरत की इच्छित सेवा

चौपाइयाँ — मूल पाठ

प्रभु पद पदुम पराग दोहाई। सत्य सुकृत सुख सीवँ सुहाई ॥ सो करि कहउँ हिए अपने की। रुचि जागत सोवत सपने की ॥ सहज सनेहँ स्वामि सेवकाई। स्वारथ छल फल चारि बिहाई ॥ अग्या सम न सुसाहिब सेवा। सो प्रसादु जन पावै देवा ॥ अस कहि प्रेम बिबस भए भारी। पुलक सरीर बिलोचन बारी ॥ प्रभु पद कमल गहे अकुलाई। समउ सनेहु न सो कहि जाई ॥ कृपासिंधु सनमानि सुबानी। बैठाए समीप गहि पानी ॥ भरत बिनय सुनि देखि सुभाऊ। सिथिल सनेहँ सभा रघुराऊ ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

भरत चरणरज की शपथ लेकर कहते हैं कि स्वार्थ, छल और चारों पुरुषार्थों की फलाकांक्षा छोड़कर स्वाभाविक सेवा चाहते हैं। श्रेष्ठ स्वामी की आज्ञा मानने जैसी सेवा नहीं। वे चरण पकड़ लेते हैं और राम उनका हाथ पकड़कर पास बैठाते हैं।

छंद — मूल पाठ

रघुराउ सिथिल सनेहँ साधु समाज मुनि मिथिला धनी। मन महुँ सराहत भरत भायप भगति की महिमा घनी ॥ भरतहि प्रसंसत बिबुध बरषत सुमन मानस मलिन से। तुलसी बिकल सब लोग सुनि सकुचे निसागम नलिन से ॥
छंद का सरल हिंदी अर्थ

राम, मुनि, जनक और सभा भरत के भाईचारे और भक्ति पर भावविह्वल हैं। देवता प्रशंसा और पुष्पवर्षा करते हैं, पर स्वार्थ की मलिनता उनमें बनी है; लोग विदा की आशंका से संकुचित हैं।

सोरठा ३०१

देखि दुखारी दीन दुहु समाज नर नारि सब। मघवा महा मलीन मुए मारि मंगल चहत ॥ ३०१ ॥
सोरठा का सरल हिंदी अर्थ

दोनों दुःखी समाजों को देखकर भी इंद्र अपने स्वार्थ का मंगल चाहते हैं; कवि इसे पहले से पीड़ित को और मारने जैसा कहते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा ३०२

देवमाया से लोगों की दुविधा

चौपाइयाँ — मूल पाठ

कपट कुचालि सीवँ सुरराजू। पर अकाज प्रिय आपन काजू ॥ काक समान पाकरिपु रीती। छली मलीन कतहुँ न प्रतीती ॥ प्रथम कुमत करि कपटु सँकेला। सो उचाटु सब कें सिर मेला ॥ सुरमायाँ सब लोग बिमोहे। राम प्रेम अतिसय न बिछोहे ॥ भय उचाट बस मन थिर नाहीं। छन बन रुचि छन सदन सोहाहीं ॥ दुबिध मनोगति प्रजा दुखारी। सरित सिंधु संगम जनु बारी ॥ दुचित कतहुँ परितोषु न लहहीं। एक एक सन मरमु न कहहीं ॥ लखि हियँ हँसि कह कृपानिधानू। सरिस स्वान मघवान जुबानू ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

इंद्र का स्वार्थपूर्ण छल लोगों में उचाट बढ़ाता है। रामप्रेम मिटता नहीं, पर मन कभी वन और कभी घर चाहता है। लोग एक-दूसरे से अपने मन की बात भी नहीं कह पाते। राम इस अस्थिरता के कारण को पहचानते हैं।

दोहा ३०२

भरतु जनकु मुनिजन सचिव साधु सचेत बिहाइ। लागि देवमाया सबहि जथाजोगु जनु पाइ ॥ ३०२ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

भरत, जनक, मुनि, मंत्री और सजग साधुओं को छोड़कर अन्य लोगों पर उनकी स्थिति के अनुसार देवमाया का प्रभाव पड़ता है।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा ३०३

भरत की भक्ति का वर्णन कठिन

चौपाइयाँ — मूल पाठ

कृपासिंधु लखि लोग दुखारे। निज सनेहँ सुरपति छल भारे ॥ सभा राउ गुर महिसुर मंत्री। भरत भगति सब कै मति जंत्री ॥ रामहि चितवत चित्र लिखे से। सकुचत बोलत बचन सिखे से ॥ भरत प्रीति नति बिनय बड़ाई। सुनत सुखद बरनत कठिनाई ॥ जासु बिलोकि भगति लवलेसू। प्रेम मगन मुनिगन मिथिलेसू ॥ महिमा तासु कहै किमि तुलसी। भगति सुभायँ सुमति हियँ हुलसी ॥ आपु छोटि महिमा बड़ि जानी। कबिकुल कानि मानि सकुचानी ॥ कहि न सकति गुन रुचि अधिकाई। मति गति बाल बचन की नाई ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

राम सबके दुःख और देवछल को देखते हैं। सभा भरत की भक्ति तथा राम की ओर आशाभरी दृष्टि से बँधी है। कवि कहते हैं कि भरत के प्रेम का थोड़ा अंश देखकर ही जनक-मुनि विभोर हैं; उसका पूरा वर्णन छोटी बुद्धि से कठिन है।

दोहा ३०३

भरत बिमल जसु बिमल बिधु सुमति चकोरकुमारि। उदित बिमल जन हृदय नभ एकटक रही निहारि ॥ ३०३ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

भरत का निर्मल यश चंद्रमा और सद्बुद्धि चकोरी है, जो संतों के हृदयाकाश में उगे उस चंद्रमा को एकटक निहारती है।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा ३०४

राम का भरत को धर्मधुरीण कहना

चौपाइयाँ — मूल पाठ

भरत सुभाउ न सुगम निगमहूँ। लघु मति चापलता कबि छमहूँ ॥ कहत सुनत सति भाउ भरत को। सीय राम पद होइ न रत को ॥ सुमिरत भरतहि प्रेमु राम को। जेहि न सुलभ तेहि सरिस बाम को ॥ देखि दयाल दसा सबही की। राम सुजान जानि जन जी की ॥ धरम धुरीन धीर नय नागर। सत्य सनेह सील सुख सागर ॥ देसु काल लखि समउ समाजू। नीति प्रीति पालक रघुराजू ॥ बोले बचन बानि सरबसु से। हित परिनाम सुनत ससि रसु से ॥ तात भरत तुम्ह धरम धुरीना। लोक बेद बिद प्रेम प्रबीना ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

कवि भरतस्मरण को रामप्रेम जगाने वाला बताते हैं। राम परिस्थिति, समय, सभा और सबके हित का विचार करके मधुर वाणी बोलते हैं। वे भरत को धर्म, लोक-वेद और प्रेम का गहरा ज्ञाता मानते हैं।

दोहा ३०४

करम बचन मानस बिमल तुम्ह समान तुम्ह तात। गुर समाज लघु बंधु गुन कुसमयँ किमि कहि जात ॥ ३०४ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

मन-वचन-कर्म की निर्मलता में भरत की उपमा भरत ही हैं; कठिन समय और गुरुजन की सभा में छोटे भाई की प्रशंसा भी संकोच देती है।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा ३०५

गुरु और जनक के संरक्षण पर भरोसा

चौपाइयाँ — मूल पाठ

जानहु तात तरनि कुल रीती। सत्यसंध पितु कीरति प्रीती ॥ समउ समाजु लाज गुरुजन की। उदासीन हित अनहित मन की ॥ तुम्हहि बिदित सबही कर करमू। आपन मोर परम हित धरमू ॥ मोहि सब भाँति भरोस तुम्हारा। तदपि कहउँ अवसर अनुसारा ॥ तात तात बिनु बात हमारी। केवल गुरुकुल कृपाँ सँभारी ॥ नतरु प्रजा परिजन परिवारू। हमहि सहित सबु होत खुआरू ॥ जौं बिनु अवसर अथवँ दिनेसू। जग केहि कहहु न होइ कलेसू ॥ तस उतपातु तात बिधि कीन्हा। मुनि मिथिलेस राखि सबु लीन्हा ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

राम कहते हैं कि भरत वंश की सत्यनिष्ठ रीति, पिता की कीर्ति और सबके हित-अहित जानते हैं। उन्हें भरत पर पूर्ण भरोसा है। पिता के न रहने की विपत्ति में गुरु और जनक ने परिवार तथा समाज को सँभाला है।

दोहा ३०५

राज काज सब लाज पति धरम धरनि धन धाम। गुर प्रभाउ पालिहि सबहि भल होइहि परिनाम ॥ ३०५ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

राजकार्य, प्रतिष्ठा, धर्म, भूमि, धन और गृह—सब गुरु के प्रभाव तथा मार्गदर्शन से सुरक्षित रहेंगे और परिणाम शुभ होगा।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा ३०६

बाँटकर विपत्ति सहने का दायित्व

चौपाइयाँ — मूल पाठ

सहित समाज तुम्हार हमारा। घर बन गुर प्रसाद रखवारा ॥ मातु पिता गुर स्वामि निदेसू। सकल धरम धरनीधर सेसू ॥ सो तुम्ह करहु करावहु मोहू। तात तरनिकुल पालक होहू ॥ साधक एक सकल सिधि देनी। कीरति सुगति भूतिमय बेनी ॥ सो बिचारि सहि संकटु भारी। करहु प्रजा परिवारु सुखारी ॥ बाँटी बिपति सबहिं मोहि भाई। तुम्हहि अवधि भरि बड़ि कठिनाई ॥ जानि तुम्हहि मृदु कहउँ कठोरा। कुसमयँ तात न अनुचित मोरा ॥ होहिं कुठायँ सुबंधु सुहाए। ओड़िअहिं हाथ असनिहु के घाए ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

राम भरत से कहते हैं कि घर और वन दोनों का संरक्षण गुरु की कृपा से है। माता-पिता, गुरु और स्वामी के निर्देश की मर्यादा रखकर वे भी सबको निभाने दें। कठिन समय में भरत प्रजा-परिवार सँभालें; सच्चे भाई संकट की चोट बाँटते हैं।

दोहा ३०६

सेवक कर पद नयन से मुख सो साहिबु होइ। तुलसी प्रीति कि रीति सुनि सुकबि सराहहिं सोइ ॥ ३०६ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

सेवक हाथ-पैर और आँखों जैसे तथा स्वामी मुख जैसा हो—परस्पर सहयोग और संरक्षण वाली इस प्रीतिरीति को कवि सराहते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा ३०७

भरत का संतोष और अवधि का अवलंब

चौपाइयाँ — मूल पाठ

सभा सकल सुनि रघुबर बानी। प्रेम पयोधि अमिअ जनु सानी ॥ सिथिल समाज सनेह समाधी। देखि दसा चुप सारद साधी ॥ भरतहि भयउ परम संतोषू। सनमुख स्वामि बिमुख दुख दोषू ॥ मुख प्रसन्न मन मिटा बिषादू। भा जनु गूँगेहि गिरा प्रसादू ॥ कीन्ह सप्रेम प्रनामु बहोरी। बोले पानि पंकरुह जोरी ॥ नाथ भयउ सुखु साथ गए को। लहेउँ लाहु जग जनमु भए को ॥ अब कृपाल जस आयसु होई। करौं सीस धरि सादर सोई ॥ सो अवलंब देव मोहि देई। अवधि पारु पावौं जेहि सेई ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

राम की प्रेमपूर्ण शिक्षा से भरत को संतोष मिलता है; मुख प्रसन्न और मन का विषाद कम होता है। वे कहते हैं कि उन्हें साथ जाने जैसा सुख मिल गया। अब आज्ञा मानेंगे, पर अवधि पार करने के लिए कोई सहारा चाहते हैं।

दोहा ३०७

देव देव अभिषेक हित गुर अनुसासनु पाइ। आनेउँ सब तीरथ सलिलु तेहि कहँ काह रजाइ ॥ ३०७ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

भरत पूछते हैं कि गुरु की आज्ञा से अभिषेक के लिए लाए सभी तीर्थों के जल के विषय में प्रभु क्या आदेश देते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा ३०८

चित्रकूट-दर्शन और तीर्थजल रखने की अनुमति

चौपाइयाँ — मूल पाठ

एकु मनोरथु बड़ मन माहीं। सभयँ सकोच जात कहि नाहीं ॥ कहहु तात प्रभु आयसु पाई। बोले बानि सनेह सुहाई ॥ चित्रकूट सुचि थल तीरथ बन। खग मृग सर सरि निर्झर गिरिगन ॥ प्रभु पद अंकित अवनि बिसेषी। आयसु होइ त आवौं देखी ॥ अवसि अत्रि आयसु सिर धरहू। तात बिगतभय कानन चरहू ॥ मुनि प्रसाद बनु मंगल दाता। पावन परम सुहावन भ्राता ॥ रिषिनायकु जहँ आयसु देहीं। राखेहु तीरथ जलु थल तेहीं ॥ सुनि प्रभु बचन भरत सुख पावा। मुनि पद कमल मुदित सिरु नावा ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

भरत संकोच से चित्रकूट के पवित्र वन, जीव, नदी-झरने, पर्वत और रामचरणांकित भूमि देखने की इच्छा कहते हैं। राम अत्रि मुनि की आज्ञा से निर्भय भ्रमण करने तथा उनके बताए स्थान पर तीर्थजल रखने को कहते हैं।

दोहा ३०८

भरत राम संबादु सुनि सकल सुमंगल मूल। सुर स्वारथी सराहि कुल बरषत सुरतरु फूल ॥ ३०८ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

राम-भरत का मंगलमय संवाद सुनकर देवता भी उनकी प्रशंसा और दिव्य पुष्पवर्षा करते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा ३०९

तीर्थजल के लिए अत्रि का निर्देश

चौपाइयाँ — मूल पाठ

धन्य भरत जय राम गोसाईं। कहत देव हरषत बरिआई। मुनि मिथिलेस सभाँ सब काहू। भरत बचन सुनि भयउ उछाहू ॥ भरत राम गुन ग्राम सनेहू। पुलकि प्रसंसत राउ बिदेहू ॥ सेवक स्वामि सुभाउ सुहावन। नेमु पेमु अति पावन पावन ॥ मति अनुसार सराहन लागे। सचिव सभासद सब अनुरागे ॥ सुनि सुनि राम भरत संबादू। दुहु समाज हियँ हरषु बिषादू ॥ राम मातु दुखु सुखु सम जानी। कहि गुन राम प्रबोधीं रानी ॥ एक कहहिं रघुबीर बड़ाई। एक सराहत भरत भलाई ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

देवता, जनक, मंत्री और दोनों समाज स्वामी-सेवक के पवित्र प्रेम की प्रशंसा करते हैं। सबके भीतर समाधान का सुख और बिछोह की पीड़ा साथ है। कौसल्या अन्य रानियों को राम और भरत के गुण कहकर सांत्वना देती हैं।

दोहा ३०९

अत्रि कहेउ तब भरत सन सैल समीप सुकूप। राखिअ तीरथ तोय तहँ पावन अमिअ अनूप ॥ ३०९ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

अत्रि भरत को पर्वत के निकट स्थित अच्छे कुएँ में अमृततुल्य पवित्र तीर्थजल रखने का निर्देश देते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा ३१०

भरतकूप की स्थापना का प्रसंग

चौपाइयाँ — मूल पाठ

भरत अत्रि अनुसासन पाई। जल भाजन सब दिए चलाई ॥ सानुज आपु अत्रि मुनि साधू। सहित गए जहँ कूप अगाधू ॥ पावन पाथ पुन्यथल राखा। प्रमुदित प्रेम अत्रि अस भाषा ॥ तात अनादि सिद्ध थल एहू। लोपेउ काल बिदित नहिं केहू ॥ तब सेवकन्ह सरस थलु देखा। किन्ह सुजल हित कूप बिसेषा ॥ बिधि बस भयउ बिस्व उपकारू। सुगम अगम अति धरम बिचारू ॥ भरतकूप अब कहिहहिं लोगा। अति पावन तीरथ जल जोगा ॥ प्रेम सनेम निमज्जत प्रानी। होइहहिं बिमल करम मन बानी ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

भरत जलपात्र भेजकर शत्रुघ्न, अत्रि और साधुओं सहित कुएँ तक जाते हैं। जल रखने पर मुनि इसे प्राचीन सिद्धस्थान बताते हैं, जो समय से अज्ञात हो गया था। तीर्थजल के संगम से यह लोकहितकारी स्थल भरतकूप कहलाएगा।

दोहा ३१०

कहत कूप महिमा सकल गए जहाँ रघुराउ। अत्रि सुनायउ रघुबरहि तीरथ पुन्य प्रभाउ ॥ ३१० ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

कूप की महिमा कहते हुए सब राम के पास लौटते हैं; अत्रि उस पवित्र तीर्थ के पुण्यप्रभाव का वर्णन सुनाते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा ३११

भरत की चित्रकूट परिक्रमा-जैसी वनयात्रा

चौपाइयाँ — मूल पाठ

कहत धरम इतिहास सप्रीती। भयउ भोरु निसि सो सुख बीती ॥ नित्य निबाहि भरत दोउ भाई। राम अत्रि गुर आयसु पाई ॥ सहित समाज साज सब सादें। चले राम बन अटन पयादें ॥ कोमल चरन चलत बिनु पनहीं। भइ मृदु भूमि सकुचि मन मनहीं ॥ कुस कंटक काँकरीं कुराईं। कटुक कठोर कुबस्तु दुराईं ॥ महि मंजुल मृदु मारग कीन्हे। बहत समीर त्रिबिध सुख लीन्हे ॥ सुमन बरषि सुर घन करि छाहीं। बिटप फूलि फलि तृन मृदुताहीं ॥ मृग बिलोकि खग बोलि सुबानी। सेवहिं सकल राम प्रिय जानी ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

प्रातःकर्म और राम, गुरु तथा अत्रि की अनुमति लेकर भरत-शत्रुघ्न सादे साधनों से पैदल वन देखते हैं। कवि प्रेमदृष्टि से कहते हैं कि भूमि कोमल हो गई, काँटे छिप गए, बादल छाया और देवता फूल देते हैं; प्रकृति रामप्रिय का स्वागत करती है।

दोहा ३११

सुलभ सिद्धि सब प्राकृतहु राम कहत जमुहात। राम प्रान प्रिय भरत कहुँ यह न होइ बड़ि बात ॥ ३११ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

जब सहज रामनाम से भी कल्याण संभव है, तो राम के प्राणप्रिय भरत के लिए यह अनुकूलता आश्चर्य नहीं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा ३१२

पाँच दिन में पवित्र स्थलों का दर्शन

चौपाइयाँ — मूल पाठ

एहि बिधि भरतु फिरत बन माहीं। नेमु प्रेमु लखि मुनि सकुचाहीं ॥ पुन्य जलाश्रय भूमि बिभागा। खग मृग तरु तृन गिरि बन बागा ॥ चारु बिचित्र पबित्र बिसेषी। बूझत भरतु दिब्य सब देखी ॥ सुनि मन मुदित कहत रिषिराऊ। हेतु नाम गुन पुन्य प्रभाऊ ॥ कतहुँ निमज्जन कतहुँ प्रनामा। कतहुँ बिलोकत मन अभिरामा ॥ कतहुँ बैठि मुनि आयसु पाई। सुमिरत सीय सहित दोउ भाई ॥ देखि सुभाउ सनेहु सुसेवा। देहिं असीस मुदित बनदेवा ॥ फिरहिं गएँ दिनु पहर अढ़ाई। प्रभु पद कमल बिलोकहिं आई ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

भरत वन के जलाशय, भूमि, जीव, वृक्ष और पर्वतों के नाम तथा महिमा अत्रि से पूछते हैं। कहीं स्नान, कहीं प्रणाम और कहीं अनुमति से बैठकर सीता-राम-लक्ष्मण का स्मरण करते हैं। प्रतिदिन लौटकर रामदर्शन पाते हैं।

दोहा ३१२

देखे थल तीरथ सकल भरत पाँच दिन माझ। कहत सुनत हरि हर सुजसु गयउ दिवसु भइ साँझ ॥ ३१२ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

पाँच दिनों में भरत ने सभी प्रमुख स्थान और तीर्थ देखे; शिव-विष्णु का यश कहते-सुनते दिन बीतकर संध्या हुई।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा ३१३

अयोध्या लौटकर सेवा की अनुमति माँगना

चौपाइयाँ — मूल पाठ

भोर न्हाइ सबु जुरा समाजू। भरत भूमिसुर तेरहुति राजू ॥ भल दिन आजु जानि मन माहीं। रामु कृपाल कहत सकुचाहीं ॥ गुर नृप भरत सभा अवलोकी। सकुचि राम फिरि अवनि बिलोकी ॥ सील सराहि सभा सब सोची। कहुँ न राम सम स्वामि सँकोची ॥ भरत सुजान राम रुख देखी। उठि सप्रेम धरि धीर बिसेषी ॥ करि दंडवत कहत कर जोरी। राखीं नाथ सकल रुचि मोरी ॥ मोहि लगि सहेउ सबहिं संतापू। बहुत भाँति दुखु पावा आपू ॥ अब गोसाइँ मोहि देउ रजाई। सेवौं अवध अवधि भरि जाई ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

सुबह सभा में राम की संकोचभरी इच्छा पहचानकर भरत धैर्य से उठते हैं। वे कहते हैं कि प्रभु ने उनकी सब रुचि रखी और बहुत कष्ट सहा। अब अवधि भर अयोध्या जाकर सेवा करने की आज्ञा चाहते हैं।

दोहा ३१३

जेहिं उपाय पुनि पाय जनु देखै दीनदयाल। सो सिख देइअ अवधि लगि कोसलपाल कृपाल ॥ ३१३ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

भरत दीनदयाल से ऐसी सीख और सहारा माँगते हैं जिससे अवधि पूरी होने पर सेवक फिर उनके चरण देख सके।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा ३१४

भरत का भरोसा और अंतिम शिक्षा की याचना

चौपाइयाँ — मूल पाठ

पुरजन परिजन प्रजा गोसाई। सब सुचि सरस सनेहँ सगाई ॥ राउर बदि भल भव दुख दाहू। प्रभु बिनु बादि परम पद लाहू ॥ स्वामि सुजानु जानि सब ही की। रुचि लालसा रहनि जन जी की ॥ प्रनतपालु पालिहि सब काहू। देउ दुहू दिसि ओर निबाहू ॥ अस मोहि सब बिधि भूरि भरोसो। किएँ बिचारु न सोचु खरो सो ॥ आरति मोर नाथ कर छोहू। दुहुँ मिलि कीन्ह ढीठु हठि मोहू ॥ यह बड़ दोषु दूरि करि स्वामी। तजि सकोच सिखइअ अनुगामी ॥ भरत बिनय सुनि सबहिं प्रसंसी। खीर नीर बिबरन गति हंसी ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

भरत कहते हैं कि परिवार और प्रजा सब प्रभु से निर्मल प्रेम रखते हैं। राम सबकी इच्छाएँ तथा जीवनचर्या जानते हैं और दोनों ओर हित निभाएँगे। इस भरोसे के साथ वे अपने हठ की क्षमा तथा निष्संकोच उचित शिक्षा चाहते हैं।

दोहा ३१४

दीनबंधु सुनि बंधु के बचन दीन छलहीन। देस काल अवसर सरिस बोले रामु प्रबीन ॥ ३१४ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

छलरहित, दीन भाई की बात सुनकर राम देश, काल और अवसर के अनुकूल कुशल मार्गदर्शन देते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा ३१५

प्रजापालन का मुख-रूपक

चौपाइयाँ — मूल पाठ

तात तुम्हारि मोरि परिजन की। चिंता गुरहि नृपहि घर बन की ॥ माथे पर गुर मुनि मिथिलेसू। हमहि तुम्हहि सपनेहुँ न कलेसू ॥ मोर तुम्हार परम पुरुषारथु। स्वारथु सुजसु धरमु परमारथु ॥ पितु आयसु पालिहिं दुहु भाई। लोक बेद भल भूप भलाई ॥ गुर पितु मातु स्वामि सिख पालें। चलेहुँ कुमग पग परहिं न खालें ॥ अस बिचारि सब सोच बिहाई। पालहु अवध अवधि भरि जाई ॥ देसु कोसु परिजन परिवारू। गुर पद रजहिं लाग छरुभारू ॥ तुम्ह मुनि मातु सचिव सिख मानी। पालेहु पुहुमि प्रजा रजधानी ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

राम कहते हैं कि गुरु और जनक घर-वन दोनों की चिंता सँभालेंगे। दोनों भाई पिता की आज्ञा निभाएँ—राम वन में और भरत अयोध्या की व्यवस्था में। गुरु, माताओं और मंत्रियों की सीख से भरत प्रजा, राज्य और परिवार का पालन करें।

दोहा ३१५

मुखिआ मुखु सो चाहिऐ खान पान कहुँ एक। पालइ पोषइ सकल अँग तुलसी सहित बिबेक ॥ ३१५ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

मुखिया मुख जैसा हो: भोजन एक स्थान ग्रहण करे, पर विवेक से सभी अंगों का पोषण करे; नेतृत्व का उद्देश्य सबका हित है।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा ३१६

राम द्वारा भरत को पादुकाएँ देना

चौपाइयाँ — मूल पाठ

राजधरम सरबसु एतनोई। जिमि मन माहँ मनोरथ गोई ॥ बंधु प्रबोधु कीन्ह बहु भाँती। बिनु अधार मन तोषु न साँती ॥ भरत सील गुर सचिव समाजू। सकुच सनेह बिबस रघुराजू ॥ प्रभु करि कृपा पाँवरीं दीन्हीं। सादर भरत सीस धरि लीन्हीं ॥ चरनपीठ करुनानिधान के। जनु जुग जामिक प्रजा प्रान के ॥ संपुट भरत सनेह रतन के। आखर जुग जुन जीव जतन के ॥ कुल कपाट कर कुसल करम के। बिमल नयन सेवा सुधरम के ॥ भरत मुदित अवलंब लहे तें। अस सुख जस सिय रामु रहे तें ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

राम राजधर्म समझाते हैं, पर भरत को अवधि के लिए प्रत्यक्ष सहारा चाहिए। प्रभु करुणा से पादुकाएँ देते हैं और भरत उन्हें सिर पर रखते हैं। कवि उन्हें प्रजा के प्राणरक्षक, प्रेमरत्न के पात्र, रामनाम के दो अक्षर और सेवा की आँखों जैसी उपमाएँ देते हैं।

दोहा ३१६

मागेउ बिदा प्रनामु करि राम लिए उर लाइ। लोग उचाटे अमरपति कुटिल कुअवसरु पाइ ॥ ३१६ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

भरत प्रणाम करके विदा माँगते हैं और राम उन्हें गले लगाते हैं; इंद्र अवसर पाकर लोगों में लौटने का उचाट बढ़ाते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा ३१७

विदा के समय राम का उमड़ता प्रेम

चौपाइयाँ — मूल पाठ

सो कुचालि सब कहँ भइ नीकी। अवधि आस सम जीवनि जी की ॥ नतरु लखन सिय सम बियोगा। हहरि मरत सब लोग कुरोगा ॥ रामकृपाँ अवरेब सुधारी। बिबुध धारि भइ गुनद गोहारी ॥ भेंटत भुज भरि भाइ भरत सो। राम प्रेम रसु कहि न परत सो ॥ तन मन बचन उमग अनुरागा। धीर धुरंधर धीरजु त्यागा ॥ बारिज लोचन मोचत बारी। देखि दसा सुर सभा दुखारी ॥ मुनिगन गुर धुर धीर जनक से। ग्यान अनल मन कसें कनक से ॥ जे बिरंचि निरलेप उपाए। पदुम पत्र जिमि जग जल जाए ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

रामकृपा से उलझन सुलझती है और लौटने की अवधि की आशा सबके जीवन का सहारा बनती है। भरत को भुजाओं में भरकर राम का धैर्य भी प्रेमाश्रुओं में बदलता है। विदा की इस दशा से देवता और ज्ञाननिष्ठ मुनि भी द्रवित हैं।

दोहा ३१७

तेउ बिलोकि रघुबर भरत प्रीति अनूप अपार। भए मगन मन तन बचन सहित बिराग बिचार ॥ ३१७ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

वैराग्य और विवेक में स्थिर जनक तथा गुरु-मुनि भी राम-भरत के अनुपम प्रेम को देखकर मन-वचन-शरीर से भावमग्न हो जाते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा ३१८

भरत और शत्रुघ्न की विदाई

चौपाइयाँ — मूल पाठ

जहाँ जनक गुर मति भोरी। प्राकृत प्रीति कहत बड़ि खोरी ॥ बरनत रघुबर भरत बियोगू। सुनि कठोर कबि जानिहि लोगू ॥ सो सकोच रसु अकथ सुबानी। समउ सनेहु सुमिरि सकुचानी ॥ भेंटि भरत रघुबर समुझाए। पुनि रिपुदवनु हरषि हियँ लाए ॥ सेवक सचिव भरत रुख पाई। निज निज काज लगे सब जाई ॥ सुनि दारुन दुखु दुहूँ समाजा। लगे चलन के साजन साजा ॥ प्रभु पद पदुम बंदि दोउ भाई। चले सीस धरि राम रजाई ॥ मुनि तापस बनदेव निहोरी। सब सनमानि बहोरि बहोरी ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

कवि कहते हैं कि जहाँ जनक और गुरु भी विह्वल हों वहाँ वियोग का वर्णन कठिन है। राम भरत को समझाकर शत्रुघ्न को गले लगाते हैं। सेवक तैयारी करते हैं। दोनों भाई राम की आज्ञा सिर पर रखकर मुनियों और वनदेवताओं का सम्मान करते हैं।

दोहा ३१८

लखनहि भेंटि प्रनामु करि सिर धरि सिय पद धूरि। चले सप्रेम असीस सुनि सकल सुमंगल मूरि ॥ ३१८ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

लक्ष्मण से मिलकर प्रणाम और सीता की चरणरज सिर पर लेकर वे प्रेमपूर्वक मंगलमय आशीष सुनते हुए चल पड़ते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा ३१९

जनक, मुनियों और कैकेयी को विदा देना

चौपाइयाँ — मूल पाठ

सानुज राम नृपहि सिर नाई। कीन्हि बहुत बिधि बिनय बड़ाई ॥ देव दया बस बड़ दुखु पायउ। सहित समाज काननहिं आयउ ॥ पुर पगु धारिअ देइ असीसा। कीन्ह धीर धरि गवनु महीसा ॥ मुनि महिदेव साधु सनमाने। बिदा किए हरि हर सम जाने ॥ सासु समीप गए दोउ भाई। फिरे बंदि पग आसिष पाई ॥ कौसिक बामदेव जाबाली। पुरजन परिजन सचिव सुचाली ॥ जथा जोगु करि बिनय प्रनामा। बिदा किए सब सानुज रामा ॥ नारि पुरुष लघु मध्य बड़ेरे। सब सनमानि कृपानिधि फेरे ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

राम-लक्ष्मण जनक को प्रणाम कर उनके कष्ट के लिए कृतज्ञता कहते और नगर लौटने का आग्रह करते हैं। मुनि, ब्राह्मण, मातृपक्ष, मंत्री, परिचित और सभी आयुवर्ग के लोगों को यथोचित सम्मान से विदा करते हैं।

दोहा ३१९

भरत मातु पद बंदि प्रभु सुचि सनेहँ मिलि भेंटि। बिदा कीन्ह सजि पालकी सकुच सोच सब मेटि ॥ ३१९ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

राम कैकेयी के चरण छूकर निर्मल स्नेह से मिलते और उनका संकोच मिटाकर सजी पालकी से विदा देते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा ३२०

माताओं और दोनों समाजों का प्रस्थान

चौपाइयाँ — मूल पाठ

परिजन मातु पितहि मिलि सीता। फिरी प्रानप्रिय प्रेम पुनीता ॥ करि प्रनामु भेंटी सब सासू। प्रीति कहत कबि हियँ न हुलासू ॥ सुनि सिख अभिमत आसिष पाई। रही सीय दुहु प्रीति समाई ॥ रघुपति पटु पालकीं मगाईं। करि प्रबोधु सब मातु चढ़ाई ॥ बार बार हिलि मिलि दुहु भाई। सम सनेहँ जननी पहुँचाई ॥ साजि बाजि गज बाहन नाना। भरत भूप दल कीन्ह पयाना ॥ हृदयँ रामु सिय लखन समेता। चले जाहिं सब लोग अचेता ॥ बसह बाजि गज पसु हियँ हारें। चले जाहिं परबस मन मारें ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

सीता माता-पिता, परिजनों और सासों से मिलकर सीख तथा आशीष लेती हैं। राम माताओं को पालकियों पर बैठाकर लक्ष्मण सहित बार-बार मिलते और पहुँचाते हैं। भरत तथा जनक का दल हृदय में तीनों का स्मरण लिए चल पड़ता है।

दोहा ३२०

गुर गुरतिय पद बंदि प्रभु सीता लखन समेत। फिरे हरष बिसमय सहित आए परन निकेत ॥ ३२० ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

सीता और लक्ष्मण सहित राम गुरु तथा गुरुपत्नी को प्रणाम करके लौटते हैं और अपनी पर्णकुटी पहुँचते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा ३२१

विदा के बाद राम का भरत-स्मरण

चौपाइयाँ — मूल पाठ

बिदा कीन्ह सनमानि निषादू। चलेउ हृदयँ बड़ बिरह बिषादू ॥ कोल किरात भिल्ल बनचारी। फेरे फिरे जोहारि जोहारी ॥ प्रभु सिय लखन बैठि बट छाहीं। प्रिय परिजन बियोग बिलखाहीं ॥ भरत सनेह सुभाउ सुबानी। प्रिया अनुज सन कहत बखानी ॥ प्रीति प्रतीति बचन मन करनी। श्रीमुख राम प्रेम बस बरनी ॥ तेहि अवसर खग मृग जल मीना। चित्रकूट चर अचर मलीना ॥ बिबुध बिलोकि दसा रघुबर की। बरषि सुमन कहि गति घर घर की ॥ प्रभु प्रनामु करि दीन्ह भरोसो। चले मुदित मन डर न खरो सो ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

गुह और वनवासियों को विदा करके राम, सीता और लक्ष्मण वटछाया में बैठते हैं। प्रियजनों के वियोग में राम भरत के शील, वाणी, विश्वास और प्रेम का वर्णन करते हैं। देवता उन्हें आश्वासन देकर लौटते हैं।

दोहा ३२१

सानुज सीय समेत प्रभु राजत परन कुटीर। भगति ग्यानु बैराग्य जनु सोहत धरें सरीर ॥ ३२१ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

पर्णकुटी में राम, सीता और लक्ष्मण ऐसे सुशोभित हैं मानो भक्ति, ज्ञान और वैराग्य ने साकार देह धारण की हो।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा ३२२

अयोध्या-वापसी और जनक का राज्य सँभालना

चौपाइयाँ — मूल पाठ

मुनि महिसुर गुर भरत भुआलू। राम बिरहँ सबु साजु बिहालू ॥ प्रभु गुन ग्राम गनत मन माहीं। सब चुपचाप चले मग जाहीं ॥ जमुना उतरि पार सबु भयऊ। सो बासरु बिनु भोजन गयऊ ॥ उतरि देवसरि दूसर बासू। रामसखाँ सब कीन्ह सुपासू ॥ सई उतरि गोमतीं नहाए। चौथें दिवस अवधपुर आए। जनकु रहे पुर बासर चारी। राज काज सब साज सँभारी ॥ सौंपि सचिव गुर भरतहि राजू। तेरहुति चले साजि सबु साजू ॥ नगर नारि नर गुर सिख मानी। बसे सुखेन राम रजधानी ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

लौटता समाज मौन होकर रामगुण स्मरण करता है। यमुना और गंगा पार होते हैं; गुह सुविधा देते हैं। चौथे दिन अयोध्या पहुँचते हैं। जनक चार दिन रुककर व्यवस्था सँभालते और राज्य गुरु, मंत्री तथा भरत को सौंपकर मिथिला लौटते हैं।

दोहा ३२२

राम दरस लगि लोग सब करत नेम उपबास। तजि तजि भूषन भोग सुख जिअत अवधि कीं आस ॥ ३२२ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

नर-नारी रामदर्शन की अवधि की आशा में भोग-आभूषण छोड़कर नियम और उपवास के साथ जीवन बिताते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा ३२३

सिंहासन पर प्रभु की पादुकाएँ

चौपाइयाँ — मूल पाठ

सचिव सुसेवक भरत प्रबोधे। निज निज काज पाइ सिख ओधे ॥ पुनि सिख दीन्ह बोलि लघु भाई। सौंपी सकल मातु सेवकाई ॥ भूसुर बोलि भरत कर जोरे। करि प्रनाम बय बिनय निहोरे ॥ ऊँच नीच कारजु भल पोचू। आयसु देब न करब सँकोचू ॥ परिजन पुरजन प्रजा बोलाए। समाधानु करि सुबस बसाए ॥ सानुज गे गुर गेहँ बहोरी। करि दंडवत कहत कर जोरी ॥ आयसु होइ त रहौं सनेमा। बोले मुनि तन पुलकि सपेमा ॥ समुझब कहब करब तुम्ह जोई। धरम सारु जग होइहि सोई ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

भरत मंत्री-सेवकों को कार्य और माताओं की सेवा शत्रुघ्न को सौंपते हैं। ब्राह्मण, प्रजा और परिवार से मार्गदर्शन देने का विनय करते हैं। गुरु से नियमपूर्वक रहने की अनुमति पाते हैं; वसिष्ठ उनके आचरण को धर्म का सार कहते हैं।

दोहा ३२३

सुनि सिख पाइ असीस बड़ि गनक बोलि दिनु साधि। सिंघासन प्रभु पादुका बैठारे निरुपाधि ॥ ३२३ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

गुरु की सीख और आशीष लेकर शुभ समय में भरत ने बिना स्वामित्व-अहंकार के प्रभु की पादुकाएँ सिंहासन पर प्रतिष्ठित कीं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा ३२४

नंदिग्राम में भरत का संयमपूर्ण निवास

चौपाइयाँ — मूल पाठ

राम मातु गुर पद सिरु नाई। प्रभु पद पीठ रजायसु पाई ॥ नंदिगावँ करि परन कुटीरा। कीन्ह निवासु धरम धुर धीरा ॥ जटाजूट सिर मुनिपट धारी। महि खनि कुस साँथरी सँवारी ॥ असन बसन बासन ब्रत नेमा। करत कठिन रिषिधरम सप्रेमा ॥ भूषन बसन भोग सुख भूरी। मन तन बचन तजे तिन तूरी ॥ अवध राजु सुर राजु सिहाई। दसरथ धनु सुनि धनदु लजाई ॥ तेहिं पुर बसत भरत बिनु रागा। चंचरीक जिमि चंपक बागा ॥ रमा बिलासु राम अनुरागी। तजत बमन जिमि जन बड़भागी ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

माता, गुरु और पादुकाओं की आज्ञा लेकर भरत नंदिग्राम में पर्णकुटी बनाते हैं। जटा, मुनिवस्त्र, कुशशय्या तथा संयमित आहार अपनाते हैं। विपुल राजवैभव उपलब्ध होने पर भी रामप्रेम में उसके प्रति आसक्ति नहीं रखते।

दोहा ३२४

राम पेम भाजन भरतु बड़े न एहिं करतूति। चातक हंस सराहिअत टेंक बिबेक बिभूति ॥ ३२४ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

भरत की महिमा केवल तप में नहीं, उनके रामप्रेम में है; जैसे चातक की निष्ठा और हंस का विवेक विशेष प्रशंसनीय हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा ३२५

पादुका-पूजा और धर्मपूर्ण राजकार्य

चौपाइयाँ — मूल पाठ

देह दिनहुँ दिन दूबरि होई। घटइ तेजु बलु मुखछबि सोई ॥ नित नव राम प्रेम पनु पीना। बढ़त धरम दलु मनु न मलीना ॥ जिमि जलु निघटत सरद प्रकासे। बिलसत बेतस बनज बिकासे ॥ सम दम संजम नियम उपासा। नखत भरत हिय बिमल अकासा ॥ ध्रुव बिस्वास अवधि राका सी। स्वामि सुरति सुरबीथि बिकासी ॥ राम पेम बिधु अचल अदोषा। सहित समाज सोह नित चोखा ॥ भरत रहनि समुझनि करतूती। भगति बिरति गुन बिमल बिभूती ॥ बरनत सकल सुकचि सकुचाहीं। सेस गनेस गिरा गमु नाहीं ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

शरीर दुबला होने पर भी भरत का रामप्रेम और धर्मनिष्ठा प्रतिदिन दृढ़ होते हैं। कवि हृदय को आकाश, संयम को तारे, विश्वास को ध्रुव और रामप्रेम को निर्मल चंद्रमा की उपमा देते हैं; उनकी भक्ति-विरक्ति का वर्णन कठिन है।

दोहा ३२५

नित पूजत प्रभु पाँवरी प्रीति न हृदयँ समाति ॥ मागि मागि आयसु करत राज काज बहु भाँति ॥ ३२५ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

भरत प्रतिदिन प्रभु की पादुकाएँ पूजते और उन्हीं से आज्ञा माँगकर अनेक प्रकार के राजकार्य करते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · सोरठा ३२६

भरत-चरित्र की महिमा और अयोध्याकाण्ड समापन

चौपाइयाँ — मूल पाठ

पुलक गात हियँ सिय रघुबीरू। जीह नामु जप लोचन नीरू ॥ लखन राम सिय कानन बसहीं। भरतु भवन बसि तप तनु कसहीं ॥ दोउ दिसि समुझि कहत सबु लोगू। सब बिधि भरत सराहन जोगू ॥ सुनि ब्रत नेम साधु सकुचाहीं। देखि दसा मुनिराज लजाहीं ॥ परम पुनीत भरत आचरनू। मधुर मंजु मुद मंगल करनू ॥ हरन कठिन कलि कलुष कलेसू। महामोह निसि दलन दिनेसू ॥ पाप पुंज कुंजर मृगराजू। समन सकल संताप समाजू। जन रंजन भंजन भव भारू। राम सनेह सुधाकर सारू ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

हृदय में सीता-राम, जीभ पर नाम और नेत्रों में आँसू लेकर भरत तप तथा राजदायित्व निभाते हैं। वन में लक्ष्मण की सेवा और घर में भरत का व्रत दोनों महान हैं। कवि भरत-चरित्र को मोह, पाप और संताप दूर करने वाला मंगलमय आदर्श कहते हैं।

छंद — मूल पाठ

सिय राम प्रेम पियूष पूरन होत जनमु न भरत को। मुनि मन अगम जम नियम सम दम बिषम ब्रत आचरत को ॥ दुख दाह दारिद दंभ दूषन सुजस मिस अपहरत को। कलिकाल तुलसी से सठन्हि हठि राम सनमुख करत को ॥
छंद का सरल हिंदी अर्थ

तुलसी कहते हैं कि सीता-राम के प्रेमामृत से पूर्ण भरत न होते तो ऐसा कठिन संयम-व्रत कौन निभाता? कौन अपने सुयश से दुख-दंभ मिटाता और मेरे जैसे जन को राम की ओर लगाता?

सोरठा ३२६

भरत चरित करि नेमु तुलसी जो सादर सुनहिं। सीय राम पद पेमु अवसि होइ भव रस बिरति ॥ ३२६ ॥
सोरठा का सरल हिंदी अर्थ

तुलसी कहते हैं कि भरत-चरित्र को नियमपूर्वक आदर से सुनने से सीता-राम के चरणों में प्रेम और सांसारिक आसक्ति से विरक्ति होती है।

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॥ अयोध्याकाण्ड सम्पूर्ण ॥

पारायण संकेत: मासपारायण, इक्कीसवाँ विश्राम

इति श्रीमद्रामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने द्वितीयः सोपानः समाप्तः।

अर्थ: समस्त कलिकालीन कलुष को दूर करने वाले श्रीरामचरितमानस का दूसरा सोपान यहाँ समाप्त होता है।

इस पाँच-भागीय पाठ-श्रृंखला का समापन: मंगलाचरण और दोहा १ से अंतिम सोरठा ३२६ तक प्रकाशित भागों की सूची नीचे है। अयोध्याकाण्ड समाप्त हुआ है; श्रीरामचरितमानस के आगे के काण्ड अलग हैं।

भक्ति और दायित्व साथ निभाने की शिक्षा

भरतजी केवल राम को लौटाने का हठ नहीं करते; अंततः राम की प्रसन्नता और आज्ञा को अपनी सेवा मानते हैं। पादुकाएँ उनके प्रेम का आश्रय और राजदायित्व की धरोहर बनती हैं। नंदिग्राम में संयम रखते हुए भी वे प्रजा और माताओं का पालन नहीं छोड़ते। इसी निष्काम अनुराग के फलरूप तुलसी सीता-राम के चरणप्रेम और विषयासक्ति से विरक्ति का उपदेश देते हैं।

पुराने सामाजिक संबोधन, आत्मधिक्कार, विरह-उपमाएँ और पात्रों के आरोप उनके कथा-संदर्भ में पढ़ें। उन्हें किसी व्यक्ति या समुदाय की गरिमा का आज का निर्णय न मानें। गुह का मुनि द्वारा आत्मीय स्वागत तथा वनवासियों के निष्कपट प्रेम का सम्मान इसी पाठ के महत्त्वपूर्ण प्रसंग हैं।

पाठ-संदर्भ और सीमित संपादन

मूल अवधी पाठ का आधार संस्कृत डॉक्यूमेंट्स का अयोध्याकाण्ड पाठ है। स्पष्ट डिजिटल अक्षर-दोष और समापन की तुलना गीता प्रेस के मुद्रित मूल पाठ की पृष्ठ ५६४–६०० तथा पृष्ठ ६०१–६४६ की स्कैन-प्रतियों से की गई है। किसी आधुनिक हिंदी या अंग्रेजी अनुवाद का पुनर्मुद्रण नहीं किया गया है।

मुद्रित पाठ से मिलाए गए स्पष्ट डिजिटल दोष
  • क्रमांक २४९ से पहले “अंघ ओघ” के स्थान पर “अघ ओघ” और २५१ से पहले “सपोनेहुँ” के स्थान पर “सपनेहुँ” रखा है।
  • क्रमांक २६० से पहले “सिसुपन तेम” के स्थान पर “सिसुपन तें” और २६६ से पहले “सुनो सुरगुर” के स्थान पर “सुनि सुरगुर” रखा है।
  • क्रमांक ३२३ से पहले “पाइ पाइ सिख” का स्पष्ट दोहराव हटाकर “पाइ सिख” तथा “समुझव कहब” के स्थान पर “समुझब कहब” रखा है। यहाँ “बय बिनय” मूल मुद्रित शब्द है; उसे अनुमान से नहीं बदला गया है।
  • चारों सोरठे २५१, २७६, ३०१ और ३२६ तथा उनके पहले के चार छंद पूरे सुरक्षित हैं। अन्य शब्द सामान्यतः चुने हुए डिजिटल पाठ के अनुसार हैं; संस्करणों में वर्तनी और पाठांतर मिल सकते हैं।

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॥ जय श्री सीताराम ॥
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