श्रीरामचरितमानस अयोध्याकाण्ड भाग 4 | दशरथ-वियोग, भरत का प्रेम और राम-भरत मिलन | दोहा 151–240 अर्थ सहित
श्रीरामचरितमानस
अयोध्याकाण्ड — भाग ४
दशरथ-वियोग, भरत का निष्कपट प्रेम और चित्रकूट में राम–भरत मिलन
दोहा १५१–२४० · पूरा मूल क्रम · चौपाइयाँ, छंद, दोहे और सोरठे · सरल हिंदी अर्थ
वियोग से मिलन तक भरतजी की भक्ति-यात्रा
यह चौथा भाग पिछले लेख के दोहा १५० के बाद की चौपाइयों से आरंभ होकर दोहा २४० में राम–भरत के आलिंगन तक चलता है। सुमंत्र राम का संदेश सुनाते हैं; दशरथ रामनाम लेते हुए देह छोड़ते हैं। भरत लौटकर राज्य स्वीकारने के स्थान पर रामसेवा चाहते हैं और गुरु, माताओं तथा नगरवासियों के साथ चित्रकूट जाते हैं। मार्ग में गुह से मिलन, प्रयाग में निष्काम प्रेम की याचना, भरद्वाज का सत्कार तथा लक्ष्मण की आशंका पर राम का भरत-विश्वास इस क्रम की प्रमुख कड़ियाँ हैं।
भागों की संख्या कम रखने के लिए ९० क्रमांक एक ही लेख में रखे हैं। प्रत्येक क्रमांक के पहले की पूरी मूल चौपाइयाँ और उनका समेकित सरल हिंदी अर्थ दिया है। छंद और दोहा/सोरठा का अर्थ अलग है। यह मूल पाठ की स्वतंत्र अध्ययन-सहायक व्याख्या है, शब्दशः टीका नहीं।
खोलकर अपना दोहा चुनें
छोटे समूह खोलें और इच्छित प्रसंग पर जाएँ। पूरा मूल पाठ इसी लेख में है।
क्रमांक १५१–१६०
क्रमांक १६१–१७०
क्रमांक १७१–१८०
क्रमांक १८१–१९०
क्रमांक १९१–२००
क्रमांक २०१–२१०
क्रमांक २११–२२०
क्रमांक २२१–२३०
क्रमांक २३१–२४०
सुमंत्र द्वारा राम का संदेश सुनाना
चौपाइयाँ — मूल पाठ
सुमंत्र बताते हैं कि निषादराज की सेवा में रात बीती। प्रातः राम ने जटा बनाईं और सीता-लक्ष्मण सहित नाव पर चढ़े। उन्हें व्याकुल देखकर राम ने पिता को प्रणाम कहने और चरण पकड़कर उनकी चिंता दूर करने का अनुरोध किया।
छंद — मूल पाठ
राम ने कहा—पिता के अनुग्रह से वन में सुख मिलेगा। आज्ञा पूरी करके फिर दर्शन करने लौटेंगे। सभी माताओं को समझाएँ और ऐसा प्रयत्न करें कि कोसलराज कुशल रहें।
सोरठा १५१
राम ने गुरु को भी संदेश दिया कि वे राजा को ऐसा उपदेश दें जिससे वे उनकी चिंता में न डूबें।
भरत के लिए नीति और परिवार-सेवा का संदेश
चौपाइयाँ — मूल पाठ
राम ने नगर और परिवार को राजा का दुःख दूर करने की विनती भेजी। भरत से प्रजा का मन-वचन-कर्म से पालन, सभी माताओं की समान सेवा और भाईचारे के निर्वाह को कहा। लक्ष्मण की कठोर बातें न सुनाने की सौगंध भी दी।
दोहा १५२
सीता प्रणाम करके कुछ कहना चाहती थीं, पर प्रेम से वाणी रुक गई; आँखें सजल और शरीर रोमांचित हो गया।
संदेश सुनकर अवध का शोक
चौपाइयाँ — मूल पाठ
सुमंत्र कहते हैं कि नाव पार चली और वे हृदय कठोर करके देखते रहे। आत्मग्लानि से उनकी वाणी रुक जाती है। पुत्र का संदेश सुनकर दशरथ भूमि पर गिर पड़ते हैं; रानियाँ विलाप करती हैं और सबका धैर्य टूटता है।
दोहा १५३
राजमहल का रुदन सुनकर अयोध्या में ऐसा कोलाहल हुआ मानो रात में पक्षियों से भरे वन पर वज्र गिर पड़ा हो।
कौसल्या का धैर्यपूर्ण सहारा
चौपाइयाँ — मूल पाठ
राजा की दशा देखकर कौसल्या धैर्य धारण करती हैं। वे कहती हैं कि राम-वियोग का समुद्र अपार है, अयोध्या नाव है और राजा उसके कर्णधार हैं। यदि वे सँभलेंगे तो परिवार पार पाएगा तथा तीनों से फिर मिलन होगा।
दोहा १५४
पत्नी की कोमल वाणी सुनकर राजा ने आँखें खोलीं, मानो तड़पती मछली पर शीतल जल डाला गया हो।
रामनाम लेते हुए दशरथ का देहावसान
चौपाइयाँ — मूल पाठ
दशरथ धैर्य करके उठते, फिर राम, लक्ष्मण और सीता को पुकारते हैं। उन्हें अंध तपस्वी के शाप की स्मृति आती है और कौसल्या को पुरानी घटना सुनाते हैं। वियोग की असह्य पीड़ा में वे प्रिय पुत्र का नाम बार-बार लेते हैं।
दोहा १५५
रामनाम का उच्चारण करते हुए दशरथ ने रघुवर-विरह में शरीर छोड़ा और कथा के अनुसार स्वर्गधाम गए।
राजपरिवार का विलाप और वसिष्ठ की सांत्वना
चौपाइयाँ — मूल पाठ
कवि दशरथ के जीवन और रामप्रेम की कीर्ति कहते हैं। रानियाँ, सेवक और नगरवासी उनके गुण स्मरण कर रोते हैं; रात शोक में बीतती है। प्रातः ज्ञानी मुनि आते हैं और सबको सँभालते हैं।
दोहा १५६
वसिष्ठ समय के अनुकूल अनेक पुराने प्रसंग और आत्मविवेक की बातें कहकर सबका शोक शांत करने का प्रयत्न करते हैं।
भरत को बुलाने के लिए दूत
चौपाइयाँ — मूल पाठ
राजा का शरीर सुरक्षित रखकर वसिष्ठ दूतों को दोनों भाइयों को शीघ्र बुलाने भेजते हैं। उधर भरत अशुभ स्वप्नों से चिंतित हैं; दान और शिवपूजन करके परिवार की कुशल चाहते हैं। संदेश में गुरु के बुलावे की बात ही कही जाती है।
दोहा १५७
चिंतित भरत के पास दूत पहुँचे; गुरु की आज्ञा सुनकर वे गणेशजी का स्मरण करते हुए चल पड़े।
उदास अयोध्या में भरत का प्रवेश
चौपाइयाँ — मूल पाठ
भरत तीव्र गति से नदी, पर्वत और वन पार करते हैं, पर मन की चिंता बढ़ती है। नगर के पास अशुभ दृश्य, मुरझाए उद्यान और शोकग्रस्त प्राणी दिखते हैं। नर-नारियाँ मानो सर्वस्व खो चुके हों।
दोहा १५८
लोग मौन होकर प्रणाम करके चले जाते हैं; भय और दुःख से भरे भरत उनसे कुशल भी नहीं पूछ पाते।
कैकेयी से पिता और भाइयों की कुशल पूछना
चौपाइयाँ — मूल पाठ
कैकेयी पुत्र के आने पर आरती सजाकर स्वागत करती हैं। भरत परिवार की विपन्न दशा देखते हैं। मायके की कुशल बताकर वे पिता, सभी माताओं, सीता तथा प्रिय राम-लक्ष्मण का समाचार पूछते हैं।
दोहा १५९
भरत के प्रेमपूर्ण प्रश्न सुनकर कैकेयी आँखों में आँसू लाकर ऐसी बात कहती हैं जो उनके कान और मन में शूल जैसी लगती है।
पिता का निधन और वनवास सुनकर भरत की दशा
चौपाइयाँ — मूल पाठ
कैकेयी अपनी योजना सफल बताकर दशरथ के निधन का समाचार देती हैं। भरत पिता को पुकारते हुए गिर पड़ते हैं। सँभलकर कारण पूछने पर कैकेयी वरदानों और राम-वनवास की पूरी घटना कहती हैं।
दोहा १६०
राम के वन जाने का समाचार सुनकर पिता की मृत्यु का दुःख भी क्षणभर पीछे पड़ गया; स्वयं को कारण मानकर भरत स्तब्ध हो गए।
राज्य के प्रस्ताव पर भरत की वेदना
चौपाइयाँ — मूल पाठ
कैकेयी राज्य सँभालकर शोक छोड़ने को कहती हैं, पर भरत को यह बात घाव पर अंगारे जैसी लगती है। वे क्रोध और ग्लानि में कहते हैं कि उनकी भलाई के नाम पर पूरे वंश का अनर्थ किया गया।
दोहा १६१
भरत अपने श्रेष्ठ वंश, दशरथ जैसे पिता और राम-लक्ष्मण जैसे भाइयों का स्मरण कर माता के कर्म पर गहरी पीड़ा व्यक्त करते हैं।
क्रोधित भरत का आत्मधिक्कार
चौपाइयाँ — मूल पाठ
भरत वर माँगने की निर्दयता और राम जैसे सर्वप्रिय के विरोध पर कैकेयी को कठोर उलाहना देते हैं। क्रोध में आए स्त्री-स्वभाव संबंधी व्यापक आरोप इसी पात्रगत क्षोभ का भाग हैं। अंततः वे स्वयं को इस अनर्थ का कारण मानकर दोष देते हैं।
दोहा १६२
भरत कहते हैं—मुझे रामविरोधी हृदय से जन्म मिला; अपने समान पापी मानकर वे माता को और दोष देना व्यर्थ समझते हैं।
शत्रुघ्न का क्रोध और भरत की करुणा
चौपाइयाँ — मूल पाठ
मंथरा सजधजकर आती है तो शत्रुघ्न क्रोध में उसे मारते और घसीटते हैं। भरत दयापूर्वक उसे छुड़ाते हैं और दोनों भाई कौसल्या के पास जाते हैं। कथा में उनका आचरण क्रोध के बीच करुणा का स्पष्ट विराम है।
दोहा १६३
कौसल्या मैले वस्त्र, पीली आकुल मुखाकृति और दुर्बल शरीर में ऐसी दिखती हैं मानो स्वर्णमयी कल्पलता को पाला मार गया हो।
कौसल्या के चरणों में भरत
चौपाइयाँ — मूल पाठ
भरत को देखकर कौसल्या दौड़ती और मूर्छित होती हैं। भरत चरणों में गिरकर पिता और भाइयों का समाचार पूछते हैं। कैकेयी के कर्म से जुड़कर वे स्वयं को कुलकलंक और सब विपत्तियों का कारण कहते हैं।
दोहा १६४
भरत की करुण वाणी सुनकर कौसल्या सँभलती हैं, उन्हें उठाकर हृदय से लगाती हैं और आँसू बहाती हैं।
कौसल्या का निष्कपट मातृस्नेह
चौपाइयाँ — मूल पाठ
कौसल्या भरत को ऐसे गले लगाती हैं मानो राम लौट आए हों; शत्रुघ्न को भी स्नेह देती हैं। भरत को गोद में बैठाकर आँसू पोंछती हैं और समय-कर्म की कठिन गति समझकर दोषारोपण तथा आत्मग्लानि छोड़ने को कहती हैं।
दोहा १६५
वे बताती हैं कि पिता की आज्ञा से राम ने बिना हर्ष-विषाद के राजवस्त्र-आभूषण छोड़े और वल्कल पहन लिए।
कौसल्या द्वारा वनगमन का स्मरण
चौपाइयाँ — मूल पाठ
कौसल्या कहती हैं कि राम प्रसन्न मुख से सबको संतोष देकर चले; सीता और लक्ष्मण भी साथ हो लिए। वह दृश्य अपनी आँखों के सामने होने पर भी साथ न जा सकने की पीड़ा में वे अपने हृदय को कठोर कहती हैं।
दोहा १६६
कौसल्या की वाणी सुनकर भरत सहित रनिवास विलाप करता है और राजभवन मानो शोक का निवास बन जाता है।
भरत की निर्दोषता की शपथ
चौपाइयाँ — मूल पाठ
कौसल्या दोनों भाइयों को सँभालती हैं और भरत भी माताओं को विवेक देते हैं। फिर भरत सरल वाणी में कहते हैं कि यदि वनवास की योजना में उनकी सहमति हो, तो घोर हिंसा, विश्वासघात और अन्य पापों के फल उन्हें मिलें।
दोहा १६७
वे इसी शपथ को आगे बढ़ाते हैं कि यदि माता की योजना उनकी भी हो, तो उन्हें भगवान से विमुख आचरण का दुष्फल मिले।
कौसल्या का भरत पर पूर्ण विश्वास
चौपाइयाँ — मूल पाठ
भरत कपट, लोभ, परनिंदा, धर्म के दुरुपयोग और दूसरों को छलने जैसे दुर्गुणों की गति अपने लिए माँगते हैं, यदि वे योजना जानते हों। इन शपथों से वे राम-विरोध में अपनी पूर्ण असहमति प्रकट करते हैं।
दोहा १६८
उनकी सच्ची सरल वाणी सुनकर कौसल्या कहती हैं—तात, तुम मन, वचन और शरीर से सदा राम के प्रिय हो।
धीरज रखकर आवश्यक कर्म करने की शिक्षा
चौपाइयाँ — मूल पाठ
कौसल्या कहती हैं कि असंभव बातें हो सकती हैं, पर भरत राम के प्रतिकूल नहीं हो सकते। रात सांत्वना और विलाप में बीतती है। प्रातः वामदेव-वसिष्ठ आते हैं और मंत्री तथा नगर के प्रमुख जन बुलाते हैं।
दोहा १६९
वसिष्ठ भरत से धैर्य रखकर समय का कर्तव्य करने को कहते हैं; भरत उठकर आवश्यक व्यवस्था कराने लगते हैं।
दशरथ के अंत्येष्टि-संस्कार और दान
चौपाइयाँ — मूल पाठ
भरत गुरु की आज्ञा से राजा के अंत्येष्टि-संस्कार की व्यवस्था करते हैं। माताओं को रोकते हैं; वे राम-दर्शन की आशा में रहती हैं। सरयू तट पर दाह-संस्कार, स्नान, तिलांजलि तथा अन्य निर्धारित कर्म पूरे करके दान किए जाते हैं।
दोहा १७०
भरत ने आसन, आभूषण, वस्त्र, अन्न, भूमि, धन और भवन आदि दान दिए; पाने वालों की आवश्यकताएँ पूर्ण हुईं।
वसिष्ठ का सभा में भावी की प्रबलता कहना
चौपाइयाँ — मूल पाठ
पितृकर्म के बाद सभा बुलाकर भरत-शत्रुघ्न को बैठाया जाता है। वसिष्ठ कैकेयी की करनी, दशरथ की सत्यनिष्ठा और राम के शील का वर्णन करते हैं। सीता-लक्ष्मण का प्रेम कहते हुए वे भी भावविह्वल हो जाते हैं।
दोहा १७१
वसिष्ठ कहते हैं—भावी बड़ी प्रबल है; हानि-लाभ, जीवन-मरण और यश-अपयश विधि के हाथ हैं।
शोक का विषय: दायित्व से विमुख आचरण
चौपाइयाँ — मूल पाठ
वसिष्ठ व्यर्थ क्रोध छोड़कर दशरथ की सद्गति समझने को कहते हैं। तत्कालीन सामाजिक भूमिकाओं के उदाहरणों से वे ज्ञानहीनता, प्रजाहित की उपेक्षा, कृपणता, अहंकार, छल और अनुशासनहीनता को खेद का विषय बताते हैं।
दोहा १७२
मोह में कर्तव्य छोड़ने वाला गृहस्थ और विवेक-वैराग्य छोड़कर प्रपंच में फँसा संन्यासी वास्तव में चिंतनीय हैं।
दशरथ की कीर्ति और गुणवान पुत्र
चौपाइयाँ — मूल पाठ
मुनि कहते हैं कि तप छोड़कर भोग चाहने वाला, परनिंदक, अकारण क्रोधी, निरदय और कपटी आचरण चिंतनीय है। इसके विपरीत दशरथ की कीर्ति सर्वत्र है और देवता भी उनके गुण कहते हैं।
दोहा १७३
जिसके राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न जैसे पवित्र पुत्र हों, उसकी महानता कोई पूरी कैसे कह सकता है?
पिता के वचन को पूरा करने का आग्रह
चौपाइयाँ — मूल पाठ
वसिष्ठ भरत को पिता द्वारा दिए राज्य का दायित्व लेने को कहते हैं। दशरथ के वचनप्रेम और प्राचीन परशुराम तथा पुरु की कथाओं का उदाहरण देते हैं। ये उस संवाद के ऐतिहासिक तर्क हैं, किसी हिंसक कर्म का आज के लिए निर्देश नहीं।
दोहा १७४
मुनि पिता के वचनपालन का महत्त्व कहते हुए उसे सुख, सुयश और शुभ गति का साधन बताते हैं।
राज्य को राम की धरोहर मानकर सँभालने की सलाह
चौपाइयाँ — मूल पाठ
गुरु समझाते हैं कि भरत प्रजा का पालन करें तो पिता, राम-सीता और माताएँ संतुष्ट होंगी। राम लौटें तब राज्य उन्हें सौंपकर प्रेमपूर्वक सेवा करें। इस बीच दायित्व लेने को वे दोषरहित और लोकसम्मत बताते हैं।
दोहा १७५
मंत्री हाथ जोड़कर गुरु की आज्ञा मानने का अनुरोध करते हैं; राम लौटने पर उस समय जो उचित होगा, किया जाएगा।
कौसल्या का धैर्य देना और भरत का उत्तर
चौपाइयाँ — मूल पाठ
कौसल्या भी गुरु की आज्ञा को हितकारी कहती हैं। वन में राम, स्वर्ग में राजा और दुःखी परिवार-प्रजा की स्थिति देखकर भरत को सबका सहारा बनकर पालन करने का आग्रह करती हैं। भरत सबका स्नेह और हितभाव सुनते हैं।
छंद — मूल पाठ
माता की सरल स्नेहमयी वाणी से भरत अत्यंत व्याकुल हो गए। उनके आँसू विरह को और बढ़ाते प्रतीत हुए; सब उनकी स्वाभाविक प्रेममर्यादा की प्रशंसा करने लगे।
सोरठा १७६
धैर्य धारण करके भरत कमल जैसे हाथ जोड़ते हैं और अमृत में डूबी-सी वाणी से सबको उचित उत्तर देते हैं।
भरत की विनम्र असहमति
पारायण संकेत: मासपारायण, अठारहवाँ विश्राम
चौपाइयाँ — मूल पाठ
भरत गुरु, माता और हितैषियों की शिक्षा को श्रेष्ठ मानते हैं तथा उसका आदर करते हैं। फिर भी मन का संतोष नहीं मिलता। वे दुखी जन की भूल क्षमा करके अपनी परिस्थिति के अनुसार बात सुनने की प्रार्थना करते हैं।
दोहा १७७
वे पूछते हैं—पिता स्वर्ग में और राम-सीता वन में हैं; ऐसे में मुझे राज्य करने को कहना मेरा हित कैसे होगा?
राज्य के स्थान पर रामसेवा की चाह
चौपाइयाँ — मूल पाठ
भरत कहते हैं कि उनका हित सीतापति की सेवा में है, जो इस घटनाक्रम से छिन गई। राम के बिना राजसुख उन्हें निष्प्रयोजन लगता है, जैसे प्राण बिना देह। वे राम के पास जाने की अनुमति चाहते हैं।
दोहा १७८
भरत आत्मग्लानि में स्वयं को राज्य का अयोग्य मानते हैं और कहते हैं कि शुभचिंतक मोहवश उनसे सुख की आशा रखते हैं।
भरत की तीव्र आत्मग्लानि
चौपाइयाँ — मूल पाठ
भरत धर्मशील राजा की आवश्यकता बताते हैं, किंतु स्वयं को अनर्थ का कारण मानते हैं। राम-वनवास, पिता की मृत्यु और रामरहित महल में जीवित रहने की बात उन्हें पीड़ित करती है; वे अपने हृदय को अत्यंत कठोर कहते हैं।
दोहा १७९
कारण से कार्य अधिक कठोर हो सकता है—हड्डी से वज्र और पत्थर से लोहा जैसे उदाहरण देकर वे अपनी आत्मपीड़ा व्यक्त करते हैं।
राजतिलक को असमय उपचार बताना
चौपाइयाँ — मूल पाठ
भरत कटु विडंबना से कहते हैं कि कैकेयी के प्रयत्न से पति-वियोग, लोकनिंदा और प्रजा का शोक मिला, अब उन्हें राज्य देकर क्या सुख होगा? वे अपने लिए राजतिलक को दुःख बढ़ाने वाली स्थिति मानते हैं।
दोहा १८०
पहले से अनेक कष्टों में पड़े व्यक्ति को मदिरा देना उपचार नहीं; भरत इसी उपमा से राजतिलक के प्रस्ताव का विरोध करते हैं।
हितैषियों के प्रेम का आदर
चौपाइयाँ — मूल पाठ
भरत आत्मग्लानि में कहते हैं कि दशरथपुत्र और राम के भाई की प्रतिष्ठा भी उन्हें अपने आचरण से असंगत लगती है। फिर सभा को दोष न देकर मानते हैं कि सब संकोच, शील और प्रेम के कारण उनकी भलाई की बात कह रहे हैं।
दोहा १८१
वे कहते हैं कि सरल हृदय कौसल्या उनसे विशेष प्रेम करती हैं और उनकी दीन दशा देखकर स्वाभाविक स्नेह से राज्य की सलाह देती हैं।
लोकनिंदा से अधिक राम के दुःख की चिंता
चौपाइयाँ — मूल पाठ
भरत कहते हैं कि लोक उन्हें दोष देगा तो वे सह लेंगे; उन्हें अपयश या परलोक की चिंता मुख्य नहीं। हृदय की अग्नि यह है कि उनके कारण राम-सीता दुःखी हुए। लक्ष्मण का रामसेवा में जीवन लगाना उन्हें सार्थक लगता है।
दोहा १८२
सबको प्रणाम करके भरत कहते हैं—रघुनाथ के चरण देखे बिना मेरे हृदय की जलन नहीं मिटेगी।
राम की शरण और क्षमा पर भरोसा
चौपाइयाँ — मूल पाठ
भरत प्रातः राम के पास जाने का निश्चय बताते हैं। स्वयं को अपराधी मानते हुए भी उन्हें राम की सरलता, करुणा और शरणागतवत्सलता पर भरोसा है। वे सभा से अनुमति और आशीष चाहते हैं कि विनती सुनकर राम अयोध्या लौटें।
दोहा १८३
अपनी कमी स्वीकारकर भी भरत को विश्वास है कि रघुवीर उन्हें अपना जानकर त्यागेंगे नहीं।
वनयात्रा के प्रस्ताव को सबकी स्वीकृति
चौपाइयाँ — मूल पाठ
भरत की वाणी सबको रामप्रेम में भीगी लगती है और विरह में डूबे लोगों को आशा मिलती है। सब उन्हें प्रेम की मूर्ति कहते हैं। माता के दोष को पुत्र पर थोपना अनुचित बताकर नागमणि की दोषरहितता की उपमा दी जाती है।
दोहा १८४
सभा कहती है—जहाँ राम हैं वहाँ अवश्य चलें; भरत के इस सुंदर निर्णय ने शोकसागर में डूबते सबको सहारा दिया।
चित्रकूट चलने की तैयारी का उत्साह
चौपाइयाँ — मूल पाठ
अगली सुबह चलने का निर्णय सुनकर सबके मन में आनंद है। लोग गुरु और भरत को प्रणाम करके यात्रा की तैयारी करते हैं। किसी को घर की रखवाली के लिए रुकना भी कठिन लगता है, क्योंकि सब रामदर्शन चाहते हैं।
दोहा १८५
लोग भक्ति की उत्कंठा में कहते हैं कि रामचरणों की ओर जाने में सहायक न बने तो संपत्ति और सांसारिक सुविधा व्यर्थ है।
भरत की उत्तरदायी व्यवस्था
चौपाइयाँ — मूल पाठ
भरत सोचते हैं कि नगर, राजभवन और सारी संपत्ति राम की है; बिना सुरक्षा छोड़ना सेवा नहीं होगा। वे विश्वस्त, धर्मनिष्ठ सेवकों को उपयुक्त दायित्व देकर रखवाली सुनिश्चित करते हैं और फिर माताओं के पास जाते हैं।
दोहा १८६
माताओं को शोक से दुर्बल जानकर भरत उनके लिए पालकियाँ और आरामदायक सवारियाँ तैयार कराने को कहते हैं।
राम के वन में ही अभिषेक की तैयारी
चौपाइयाँ — मूल पाठ
रातभर जागे लोग सुबह यात्रा को तैयार हैं। भरत मंत्रियों से अभिषेक का सामान भी लेने को कहते हैं कि वन में ही राम को राज्य सौंपेंगे। वसिष्ठ अरुंधती सहित, ब्राह्मण, नगरवासी और रानियाँ सवारियों पर चल पड़ते हैं।
दोहा १८७
नगर विश्वस्त सेवकों को सौंपकर और सबकी यात्रा सम्मानपूर्वक शुरू कराकर भरत-शत्रुघ्न सीता-राम के चरण स्मरण करते हुए चलते हैं।
माता के आग्रह से भरत का रथ पर चढ़ना
चौपाइयाँ — मूल पाठ
राम-सीता के वनकष्ट सोचकर भरत-शत्रुघ्न पैदल चलते हैं; उन्हें देखकर लोग भी सवारियाँ छोड़ देते हैं। कौसल्या सबकी दुर्बलता बताकर भरत को रथ लेने को कहती हैं। वे आज्ञा मानते हैं; पहले तमसा, फिर गोमती तट पर पड़ाव होता है।
दोहा १८८
लोग भोग-आभूषण छोड़कर राम के हित में नियम रखते हैं—कोई दूध, कोई फल और कोई एक समय भोजन करता है।
सेना देखकर निषादराज की आशंका
चौपाइयाँ — मूल पाठ
शृंगवेरपुर के निकट भरत की सेना आने का समाचार सुनकर गुह का मन शंका करता है। बिना कारण जाने वे इसे राम के लिए खतरा समझ बैठते हैं और सोचना शुरू करते हैं कि कहीं राज्य के लिए अनिष्ट का उद्देश्य न हो।
दोहा १८९
इसी आशंका में गुह अपने जनों को सावधान होकर नावें कब्जे में लेने, जरूरत पर डुबाने और घाट रोकने की तैयारी कहते हैं।
राम की रक्षा के लिए गुह का संकल्प
चौपाइयाँ — मूल पाठ
गुह युद्ध करके भरत को गंगा पार न जाने देने का दृढ़ संकल्प करते हैं। वे शरीर को क्षणभंगुर और रामकार्य में प्राण देना सौभाग्य मानते हैं। उनके उत्साह के पीछे रामभक्ति है, किंतु भरत के उद्देश्य की जानकारी अभी अधूरी है।
दोहा १९०
गुह शोक हटाकर सबमें उत्साह भरते हैं और राम का स्मरण कर तरकस, धनुष तथा कवच मँगाते हैं।
निषाद वीरों की युद्ध-तैयारी
चौपाइयाँ — मूल पाठ
गुह की आज्ञा सुनकर निषाद योद्धा उत्साह से सजते हैं। वे अस्त्र-शस्त्र, रक्षा-सामग्री और धनुष लेकर स्वामी को प्रणाम करते हैं। गुह उनकी योग्यता देखकर नाम लेकर सम्मान और प्रोत्साहन देते हैं।
दोहा १९१
गुह कहते हैं कि आज उनका बड़ा काम है, धोखा न हो; वीर उत्तर देते हैं कि अधीर न हों।
बिना समझे युद्ध न करने का विवेक
चौपाइयाँ — मूल पाठ
युद्ध के उत्साह के बीच एक वृद्ध कहता है कि भरत राम को मनाने आ रहे हैं। गुह इस बात को उचित मानते हैं; बिना स्वभाव और उद्देश्य समझे जल्दबाजी में लड़ने से हितहानि और पछतावा हो सकता है।
दोहा १९२
वे योद्धाओं को घाट पर सँभलकर रहने को कहते हैं और स्वयं मिलकर मित्रता, शत्रुता या तटस्थता का वास्तविक भाव जानने जाते हैं।
भरत और गुह का प्रेममय आलिंगन
चौपाइयाँ — मूल पाठ
गुह भेंट की सामग्री लेकर मिलने चलते हैं और पहले वसिष्ठ को प्रणाम करते हैं। गुरु उन्हें राम का प्रिय मित्र बताते हैं। यह सुनकर भरत रथ से उतरते हैं; गुह अपना परिचय देकर भूमि पर झुकते हैं।
दोहा १९३
भरत उन्हें उठाकर ऐसे हृदय से लगाते हैं मानो लक्ष्मण से मिल रहे हों; उनका प्रेम हृदय में समाता नहीं।
भक्ति के आगे सामाजिक दूरी का टूटना
चौपाइयाँ — मूल पाठ
भरत और गुह का आलिंगन देखकर लोग धन्य कहते और देवता पुष्प बरसाते हैं। कवि तत्कालीन छुआछूत और सामाजिक हीनता की धारणाओं का उल्लेख करके दिखाते हैं कि राम का अपनापन उन्हें पार करता है; नाममहिमा में कर्मनाशा और वाल्मीकि की उपमाएँ आती हैं।
दोहा १९४
विभिन्न उपेक्षित समूहों का उल्लेख करते हुए कवि कहते हैं कि रामनाम सबको पवित्र करता है; जन्म से अधिक भक्ति की महिमा है।
गुह का विनय और कृतज्ञता
चौपाइयाँ — मूल पाठ
देवता रामनाम की महिमा कहते हैं और अवधवासी आनंद लेते हैं। भरत गुह की कुशल पूछते हैं। उनके शील और स्नेह से गुह भावविह्वल होकर कहते हैं कि प्रभु के दर्शन और अनुग्रह से उनका तथा परिवार का मंगल है।
दोहा १९५
गुह अपनी पूर्व स्थिति और प्रभु की महिमा स्मरण कर कहते हैं कि ऐसे रघुवीर के चरण न भजना बड़ा दुर्भाग्य होगा।
शत्रुघ्न, माताओं और नगरवासियों से मिलन
चौपाइयाँ — मूल पाठ
गुह कहते हैं कि राम ने अपनाकर उन्हें सम्मान दिया। शत्रुघ्न भी उनसे मिलते हैं। रानियाँ उन्हें लक्ष्मण समान मानकर आशीर्वाद देती हैं और नगरवासी देखकर सुख पाते हैं। गुह सबको आदरपूर्वक ठहराने ले चलते हैं।
दोहा १९६
स्वामी का संकेत पाकर सेवक घरों, वृक्षों के नीचे, सरोवरों, बागों और वन में सबके लिए पड़ाव बनाते हैं।
गंगा तट पर भरत की प्रेम-याचना
चौपाइयाँ — मूल पाठ
शृंगवेरपुर और रामघाट देखकर भरत का हृदय प्रेम से शिथिल होता है। सब गंगा को प्रणाम करके स्नान करते और रामचरणों में अनुराग माँगते हैं। भरत गंगा की रज को भक्तों के लिए कामधेनु समान हितकारी कहते हैं।
दोहा १९७
भरत स्नान करके गुरु की आज्ञा लेते हैं और सभी माताओं का स्नान पूरा जानकर उन्हें पड़ाव तक पहुँचाते हैं।
राम की विश्राम-भूमि के दर्शन
चौपाइयाँ — मूल पाठ
भरत सबके ठहरने का समाचार लेते, माताओं के चरण दबाते और सम्मान करते हैं। उनकी सेवा शत्रुघ्न को सौंपकर गुह से वह स्थान दिखाने को कहते हैं जहाँ राम-सीता-लक्ष्मण रात सोए थे। दोनों मित्र हाथ मिलाकर वहाँ जाते हैं।
दोहा १९८
जिस पवित्र शिंशपा वृक्ष के नीचे राम ने विश्राम किया था, भरत वहाँ अत्यंत प्रेम और आदर से दंडवत करते हैं।
कुशशय्या और चरणरज देखकर भरत का विरह
चौपाइयाँ — मूल पाठ
भरत कुशशय्या को प्रणाम और प्रदक्षिणा करते हैं, चरणचिह्नों की धूल आँखों से लगाते हैं। सीता के वस्त्राभूषण से गिरे स्वर्णकण पाकर उन्हें सीता समान आदर देते हैं। जनक और दशरथ के ऐश्वर्य की तुलना वनशय्या से कर व्याकुल होते हैं।
दोहा १९९
सीता की साधारण शय्या देखकर भी हृदय न टूटने पर भरत अपने हृदय को वज्र से अधिक कठोर कहकर दुखी होते हैं।
लक्ष्मण और राम के कष्ट की कल्पना
चौपाइयाँ — मूल पाठ
भरत कोमल, दुलारे और अनुपम भाई लक्ष्मण के वनकष्ट सोचते हैं। फिर राम के रूप, शील, विनय और सबको सुख देने वाले स्वभाव का स्मरण करते हैं, जिनकी प्रशंसा विरोधी भी करते हैं और गुणगणना देवता भी पूरी नहीं कर सकते।
दोहा २००
सुखस्वरूप और मंगल-आनंद के भंडार राम धरती पर कुश बिछाकर सोए—भरत को विधि की यह विपरीत गति अत्यंत दुःख देती है।
गुह द्वारा राम के भरतप्रेम का आश्वासन
चौपाइयाँ — मूल पाठ
भरत सोचते हैं कि जिन्हें माता-पिता ने प्राणवत सँभाला वे अब पैदल वन में हैं। आत्मग्लानि से भरते हैं। गुह उन्हें आश्वस्त करते हैं कि राम उनसे और वे राम से प्रिय हैं; व्यर्थ दोष और शोक न धारण करें।
छंद — मूल पाठ
गुह कहते हैं कि उस रात राम ने बार-बार भरत की आदरपूर्वक प्रशंसा की। भरत जैसा प्रिय कोई नहीं; अंत का मंगल सोचकर धैर्य रखें।
सोरठा २०१
गुह राम की अंतर्यामिता, संकोच, प्रेम और करुणा का भरोसा देकर भरत को दृढ़ मन से विश्राम के लिए चलने को कहते हैं।
गंगा पार करने की सामूहिक व्यवस्था
चौपाइयाँ — मूल पाठ
गुह की बात से भरत धैर्य लेकर पड़ाव लौटते हैं। नगरवासी भी राम की विश्रामभूमि देखकर भावविह्वल होते हैं। रात बीतती है; नावों से गुरु, माताओं और पूरे समाज को शीघ्र पार कराया जाता है। भरत उतरकर सबकी व्यवस्था सँभालते हैं।
दोहा २०२
प्रातःकर्म, माताओं का वंदन और गुरु को प्रणाम करके भरत निषाद मार्गदर्शकों को आगे रखते तथा यात्रा-दल चलाते हैं।
प्रयाग की ओर भरत की पदयात्रा
चौपाइयाँ — मूल पाठ
गुह मार्गदर्शन करते हैं और माताओं-गुरु की सवारियाँ चलती हैं। भरत साथ उपलब्ध घोड़े पर बैठने का आग्रह नहीं मानते। वे कहते हैं कि राम पैदल गए, तो सेवक के लिए सुविधा लेना उचित नहीं; रामस्मरण से आगे बढ़ते हैं।
दोहा २०३
दिन के तीसरे पहर भरत राम-सीता का नाम प्रेम से लेते हुए प्रयाग में प्रवेश करते हैं।
चार पुरुषार्थों से परे चरणप्रेम की याचना
चौपाइयाँ — मूल पाठ
भरत के पैरों में छाले देखकर समाज दुःखी होता है। वे सबकी खबर लेकर स्नान, दान और त्रिवेणी को प्रणाम करते हैं। तीर्थराज की उदारता का स्मरण कर याचक की तरह एक अनन्य वर माँगते हैं।
दोहा २०४
भरत धन, धर्मफल, कामना या मोक्ष नहीं चाहते; जन्म-जन्म राम के चरणों में प्रेम ही उनका माँगा हुआ वर है।
त्रिवेणी की आश्वस्त करने वाली वाणी
चौपाइयाँ — मूल पाठ
भरत कहते हैं कि लोकनिंदा या राम द्वारा गलत समझे जाने पर भी उनका चरणप्रेम बढ़ता रहे। चातक की अटल पुकार और तपे सोने की उपमा देते हैं। कथा में त्रिवेणी की वाणी उन्हें साधु और राम का अत्यंत प्रिय बताती है।
दोहा २०५
अनुकूल वाणी सुनकर भरत पुलकित और प्रसन्न होते हैं; देवता उन्हें धन्य कहकर पुष्प बरसाते हैं।
भरद्वाज आश्रम में भरत
चौपाइयाँ — मूल पाठ
प्रयागवासी भरत का शील और सच्चा स्नेह सराहते हैं। वे भरद्वाज को प्रणाम करते हैं; मुनि उठाकर गले लगाते और आसन देते हैं। भरत संकोच में हैं; मुनि सारी घटना जानने की बात कहते हैं।
दोहा २०६
मुनि भरत को माता की करनी से आत्मग्लानि न रखने को कहते हैं और कथा की देवप्रेरित बुद्धिभ्रांति का संदर्भ देते हैं।
भरत की निष्कपटता का समर्थन
चौपाइयाँ — मूल पाठ
भरद्वाज कहते हैं कि भरत को दोष देना उचित नहीं। पिता द्वारा राज्य दिए जाने पर उसका दायित्व लेने में भी दोष न होता। वनवास के अनर्थ में भरत की सम्मति नहीं थी; अब उनका राम को मनाने जाना विशेष सुंदर निर्णय है।
दोहा २०७
मुनि कहते हैं—भरत ने बहुत अच्छा किया; रामचरणों का प्रेम ही संसार के समस्त मंगलों का मूल है।
भरत: मानो रामस्नेह ने देह धारण की हो
चौपाइयाँ — मूल पाठ
मुनि कहते हैं कि चरणप्रेम भरत का धन, जीवन और प्राण है। राम-सीता-लक्ष्मण उस रात उनकी प्रशंसा करते रहे थे। राम का भरत के प्रति गहरा स्नेह बताकर वे उन्हें रामप्रेम का साकार रूप मानते हैं।
दोहा २०८
भरत जिसे अपना कलंक मान रहे हैं, वह सबके लिए भक्ति की शिक्षा बन गया; यह अवसर रामप्रेम को सिद्ध करने वाला है।
भरत के यश का चंद्रमा-रूपक
चौपाइयाँ — मूल पाठ
भरद्वाज भरत के निर्मल यश को ऐसे चंद्रमा से तुलना देते हैं जो बढ़ता रहेगा, कैकेयी के कर्मरूपी राहु से ढकेगा नहीं और रामप्रेम से पूर्ण रहेगा। फिर दशरथ की महिमा स्मरण करते हैं, जिनके प्रेमवश प्रभु ने अवतार लिया।
दोहा २०९
जिन राम को शिव हृदय और नेत्रों से निहारकर भी तृप्त नहीं होते, वे दशरथ के प्रेम-संकोच से पुत्ररूप में प्रकट हुए।
भरद्वाज द्वारा भरतदर्शन का गौरव
चौपाइयाँ — मूल पाठ
मुनि कहते हैं कि भरत को रामप्रेम मिल जाने पर निर्धनता का भय करने जैसी निरर्थक ग्लानि नहीं करनी चाहिए। राम-सीता-लक्ष्मण के दर्शन साधना का फल थे और भरत का दर्शन उस फल का फल है। सभा उनकी प्रशंसा करती है।
दोहा २१०
हृदय में राम-सीता, शरीर में रोमांच और आँखों में आँसू लेकर भरत मुनिमंडली को प्रणाम कर गद्गद वाणी में बोलते हैं।
भरत के दुःख का वास्तविक कारण
चौपाइयाँ — मूल पाठ
भरत कहते हैं कि मुनिसभा और तीर्थराज में बनाकर बोलना अनुचित होगा। उन्हें माता की करनी, अपनी लोकनिंदा या पिता की शुभ मृत्यु से बढ़कर पीड़ा यह है कि राम, लक्ष्मण और सीता कोमल पैरों से वन में घूम रहे हैं।
दोहा २११
तीनों मुनिवेश, फलाहार और कुश-पत्तों की धरती-शय्या अपनाकर वृक्षों के नीचे शीत, धूप, वर्षा और हवा सह रहे हैं।
राम की वापसी ही दुःख का उपाय
चौपाइयाँ — मूल पाठ
भरत कहते हैं कि इसी चिंता से दिन में भूख और रात में नींद नहीं आती। माता के कुमतिपूर्ण उपाय को वे सबके अनर्थ का कारण बताते हैं। उन्हें लगता है कि राम के लौटने पर ही अयोध्या की स्थिति सँभलेगी। मुनि उन्हें धैर्य देते हैं।
दोहा २१२
भरद्वाज समझाकर भरत से प्रेमपूर्वक आतिथ्य स्वीकार करने और आश्रम के फल-मूल आदि ग्रहण करने का आग्रह करते हैं।
भरद्वाज की अतिथि-सेवा का संकल्प
चौपाइयाँ — मूल पाठ
संकोच के बावजूद भरत गुरु की आज्ञा को अपना धर्म मानकर स्वीकारते हैं। मुनि शिष्यों को भोजन-सामग्री लाने भेजते हैं। बड़े अतिथि के अनुरूप सत्कार का विचार करते ही कथा में ऋद्धि-सिद्धियाँ उनकी आज्ञा लेने उपस्थित होती हैं।
दोहा २१३
मुनि कहते हैं—भाई और पूरे समाज सहित राम-विरह से व्याकुल भरत का आतिथ्य करके उनका यात्रा-श्रम मिटाओ।
तपोबल से अद्भुत आतिथ्य
चौपाइयाँ — मूल पाठ
ऋद्धि-सिद्धियाँ अपने को भाग्यशाली मानती हैं कि अतिथि राम के छोटे भाई हैं। वे सुंदर निवास, सेवा-सामग्री और विविध सुख-साधन रचती हैं। सबको उनकी आवश्यकता तथा रुचि के अनुसार ठहराया जाता है।
दोहा २१४
मुनि फिर परिवार सहित भरत को व्यवस्था स्वीकारने को कहते हैं; कथा में यह आश्चर्यजनक वैभव उनके तपोबल से प्रकट होता है।
वैभव के बीच भरत की अनासक्ति
चौपाइयाँ — मूल पाठ
आश्रम में सुंदर आसन, शय्या, वस्त्र, उद्यान, जीव, जलाशय और निर्मल भोजन की अपूर्व व्यवस्था है। उसे देखकर लोग आनंद और आश्चर्य अनुभव करते हैं। किंतु भरत का मन राम-विरह में है, सुविधाओं में आसक्ति नहीं बढ़ती।
दोहा २१५
संपत्ति चकवी और भरत चकवे जैसे अलग रहे; मुनि की आज्ञा से एक ही आश्रम में रात बिताकर भी वे भोगासक्त नहीं हुए।
चित्रकूट की ओर नंगे पाँव यात्रा
पारायण संकेत: मासपारायण, उन्नीसवाँ विश्राम
चौपाइयाँ — मूल पाठ
स्नान और मुनि की आज्ञा-आशीष लेकर भरत चित्रकूट चलते हैं। सिर पर छाया और पैरों में जूते नहीं; वे गुह से राम के मार्ग और पड़ाव पूछते हैं। विश्रामस्थलों को देखकर प्रेम बढ़ता है; देवता पुष्प बरसाते हैं।
दोहा २१६
बादल छाया और पवन शीतलता देता है; कवि कहते हैं कि भरत के लिए मार्ग उतना अनुकूल हुआ जितना राम के जाते समय भी न था।
भरतप्रेम देखकर इंद्र की चिंता
चौपाइयाँ — मूल पाठ
कवि भरतदर्शन की कल्याणकारी महिमा बताते हैं, क्योंकि राम स्वयं उनका स्मरण करते हैं। संत उनके प्रेम से प्रसन्न हैं। इंद्र को चिंता होती है कि भरत राम को लौटा ले जाएँगे और देवकार्य रुक जाएगा; वे बृहस्पति से बाधा का उपाय चाहते हैं।
दोहा २१७
इंद्र कहते हैं कि राम संकोची और प्रेमवश हैं तथा भरत प्रेमसागर; छल से मिलन रोकने का उपाय सोचने का उनका अनुचित प्रस्ताव है।
बृहस्पति की छल से बचने की शिक्षा
चौपाइयाँ — मूल पाठ
बृहस्पति इंद्र की संकीर्ण सोच पर मुस्कराकर समझाते हैं कि मायापति के भक्त से छल उलटा पड़ेगा। राम अपने प्रति अपराध पर क्रोधित नहीं होते, पर भक्त को हानि पहुँचाना गंभीर है। भरत का रामप्रेम अद्वितीय है।
दोहा २१८
वे इंद्र से कहते हैं कि रामभक्त का अहित मन में भी न लाएँ; इससे अपयश और निरंतर दुःख ही होगा।
भक्तसेवा का महत्त्व
चौपाइयाँ — मूल पाठ
बृहस्पति कहते हैं कि प्रभु को सेवक की सेवा प्रिय है और सेवक से वैर अनुचित है। राम सम और निर्लिप्त होते हुए भी भक्त के प्रेम के अनुरूप सगुण होकर कृपा करते हैं। वे इंद्र को कपट छोड़कर भरत से प्रेम करने को कहते हैं।
दोहा २१९
परहित में लगे और परदुःख से दुःखी होने वाले दयालु भक्तश्रेष्ठ भरत से डरने की कोई आवश्यकता नहीं।
इंद्र की शंका दूर, भरत यमुना तट पर
चौपाइयाँ — मूल पाठ
बृहस्पति कहते हैं कि राम सत्यनिष्ठ और भरत उनकी आज्ञा मानने वाले हैं; दोष भरत में नहीं, इंद्र के स्वार्थमोह में है। इंद्र प्रसन्न होकर पुष्प बरसाते हैं। भरत यात्रा में रामनाम लेते हुए यमुना पहुँचते और श्याम जल देखकर रो पड़ते हैं।
दोहा २२०
राम के वर्ण जैसा सुंदर जल देखकर पूरा समाज विरहसागर में डूबने लगता है, किंतु विवेकरूपी नाव से धैर्य रखता है।
यमुना पार और राम के पड़ावों को प्रणाम
चौपाइयाँ — मूल पाठ
रात्रि में अनेक नावें जुटती हैं और प्रातः सब पार होते हैं। गुह की सेवा से सब संतुष्ट हैं। गुरु और राजसमाज आगे, सादे वेश में भरत-शत्रुघ्न पैदल पीछे चलते हैं; राम के प्रत्येक विश्रामस्थल को प्रेम से प्रणाम करते हैं।
दोहा २२१
मार्गवासी घर और काम छोड़कर दर्शन को दौड़ते हैं तथा भरत का रूप और प्रेम देखकर जीवन सफल मानते हैं।
ग्रामवधुओं का भरत को पहचानना
चौपाइयाँ — मूल पाठ
ग्रामवधुएँ रूप की समानता से पहले राम-लक्ष्मण का अनुमान करती हैं, फिर वेश, सीता की अनुपस्थिति और सेना देखकर भेद पहचानती हैं। एक स्त्री पूरा प्रसंग बताकर भरत के शील, स्नेह और त्याग की प्रशंसा करती है।
दोहा २२२
पिता का दिया राज्य छोड़कर, फल खाते और पैदल चलते राम को मनाने जाने वाला भरत जैसा दूसरा कौन है?
भरतदर्शन से मार्गवासियों का आनंद
चौपाइयाँ — मूल पाठ
स्त्रियाँ भरत के भाईचारे और भक्ति की कथा कह-सुनकर स्वयं को धन्य मानती हैं। कोई कैकेयी को दोष देता, कोई कहता है कि इसी घटनाक्रम से दुर्लभ दर्शन मिले। हर गाँव में आनंद ऐसा है जैसे मरुभूमि में कल्पवृक्ष उगा हो।
दोहा २२३
भरतदर्शन से मार्गवासियों का भाग्य खुला, मानो दूर सिंहल के निवासियों को प्रयाग सहज उपलब्ध हो गया हो।
हर तीर्थ पर केवल रामप्रेम की प्रार्थना
चौपाइयाँ — मूल पाठ
भरत राम के गुण सुनते, तीर्थों और आश्रमों में स्नान-प्रणाम करते तथा सीता-राम के चरणों में प्रेम माँगते हैं। वनवासी और साधु उन्हें कुशल समाचार देते हैं। जिन्होंने तीनों को देखा है, वे भरत को अत्यंत प्रिय लगते हैं।
दोहा २२४
उस दिन विश्राम के बाद सुबह सब राम का स्मरण कर चलते हैं; पूरे समाज में भरत जैसी दर्शन की लालसा है।
चित्रकूट के प्रथम दर्शन
चौपाइयाँ — मूल पाठ
कथा में शुभ संकेतों से सबको मिलन की आशा और उत्साह मिलता है। प्रेम से शरीर शिथिल और वाणी विह्वल है। गुह चित्रकूट तथा पयस्विनी के तट पर निवास का स्थान दिखाते हैं; सब राम को प्रणाम करते हैं।
दोहा २२५
उस समय भरत के प्रेम का वर्णन शेष भी पूरा नहीं कर सकते; अहंता-ममता से मलिन व्यक्ति को ब्रह्मानंद की तरह यह कवि की पकड़ से परे है।
सीताजी का स्वप्न और भरत के आने का समाचार
चौपाइयाँ — मूल पाठ
उधर सीता स्वप्न में भरत और शोकग्रस्त परिवार को देखती हैं। राम के नेत्र भर आते हैं और वे किसी अप्रिय समाचार की आशंका करते हैं। स्नान, शिवपूजन और साधु-सम्मान के बाद उत्तर दिशा में धूल तथा व्याकुल वन्यजीव दिखाई देते हैं।
छंद — मूल पाठ
राम देव-मुनियों को प्रणाम करके उत्तर देखते हैं। धूल और भागते पशु-पक्षियों का कारण सोचते हुए उठते हैं; तभी कोल-किरात आकर भरत के आगमन का समाचार कहते हैं।
सोरठा २२६
मंगलमय समाचार सुनकर राम का मन आनंदित, शरीर रोमांचित और कमल जैसे नेत्र प्रेमाश्रुओं से भर जाते हैं।
राम की चिंता और लक्ष्मण का निवेदन
चौपाइयाँ — मूल पाठ
बड़ी सेना साथ होने का समाचार सुनकर राम पिता के वचन और भाई के प्रेम के बीच विचार करते हैं। भरत के साधु स्वभाव पर भरोसा उन्हें संतोष देता है। लक्ष्मण उनकी चिंता देखकर बिना पूछे अपनी समझ कहने की अनुमति चाहते हैं।
दोहा २२७
लक्ष्मण कहते हैं—आप हितैषी, सरल, शील-स्नेह के भंडार हैं और सबको अपने जैसा प्रेम तथा विश्वास वाला मानते हैं।
लक्ष्मण की राजमद संबंधी आशंका
चौपाइयाँ — मूल पाठ
लक्ष्मण कहते हैं कि सत्ता पाकर मनुष्य मोह में बदल सकता है। भरत को नीति और प्रेम वाला जानते हुए भी वे सेना के कारण गलत अनुमान करते हैं कि दोनों भाई निष्कंटक राज्य चाहते हैं। यह आशंका अगले संवाद में राम दूर करेंगे।
दोहा २२८
लक्ष्मण चंद्रमा, नहुष और वेन की पुरानी कथाओं का उदाहरण देकर सत्ता और अहंकार से मर्यादा टूटने की बात कहते हैं।
रक्षा की तत्परता और क्रोध का बढ़ना
चौपाइयाँ — मूल पाठ
राजमद के और उदाहरण कहते-कहते लक्ष्मण युद्धोत्साह में आ जाते हैं। उन्हें लगता है कि राम को असहाय समझना अन्याय है। वे चरणरज सिर पर रखकर धनुषधारी सेवक होते हुए अपमान सहते रहने के विरुद्ध बोलते हैं।
दोहा २२९
वे अपने रघुवंशी क्षत्रिय और रामसेवक होने का स्मरण करके प्रतिक्रिया की बात कहते हैं; धूल की उपमा उनके तत्काल क्रोध की अभिव्यक्ति है।
युद्ध की अनुमति माँगते लक्ष्मण
चौपाइयाँ — मूल पाठ
लक्ष्मण जटा बाँधकर धनुष-बाण सँभालते और भरत की सेना से लड़ने की अनुमति माँगते हैं। क्रोध में वे पहले की पीड़ा भी निकालने तथा किसी सहायता से न डरने की प्रतिज्ञा करते हैं। यह उनकी भ्रांति की चरम स्थिति है।
दोहा २३०
लक्ष्मण का तीव्र क्रोध और दृढ़ शपथ देखकर लोक और लोकपाल भी भयभीत हो उठते हैं।
जल्दबाजी से बचना और भरत पर राम का विश्वास
चौपाइयाँ — मूल पाठ
आकाशवाणी बल की प्रशंसा के साथ कार्य को सोच-समझकर करने की शिक्षा देती है; जल्दबाजी पछतावा ला सकती है। लक्ष्मण संकुचित होते हैं। राम राजमद की कठिनाई स्वीकारकर कहते हैं कि भरत जैसा श्रेष्ठ जन कोई नहीं।
दोहा २३१
ब्रह्मा-विष्णु-शिव का पद पाकर भी भरत को राजमद नहीं होगा; खटाई की कुछ बूँदें क्षीरसागर को बिगाड़ सकती हैं क्या?
भरत के गुणों का राम द्वारा वर्णन
चौपाइयाँ — मूल पाठ
राम असंभव उपमाएँ देकर कहते हैं कि भरत को राजमद नहीं होगा। पिता की आन और लक्ष्मण की शपथ देकर उन्हें निर्मल भाई बताते हैं। संसार के गुण-दोष मिश्रण में भरत हंस की तरह गुणरूपी दूध ग्रहण करते और दोष छोड़ते हैं।
दोहा २३२
राम की वाणी और भरत के प्रति उनका प्रेम देखकर देवता ऐसे करुणामय स्वामी की प्रशंसा करते हैं।
भरत का आश्रम की ओर संकोचपूर्ण जाना
चौपाइयाँ — मूल पाठ
आकाशवाणी भरत की धर्मशीलता सराहती है। इधर भरत समाज को नदी के पास ठहराकर माताओं, गुरु और मंत्रियों की अनुमति से शत्रुघ्न-गुह सहित चलते हैं। उन्हें आशंका है कि माता की योजना में शामिल समझकर राम कहीं उनसे बचने न चले जाएँ।
दोहा २३३
वे सोचते हैं कि दोषी समझकर जो करें थोड़ा है; यदि क्षमा और सम्मान दें तो वह राम की अपनी उदारता होगी।
संकोच और भरोसे के बीच भरत
चौपाइयाँ — मूल पाठ
भरत सोचते हैं कि स्वीकारें या त्यागें, शरण केवल राम की पादुकाएँ हैं। माता के कर्म का संकोच पग रोकता, भक्ति और रामस्वभाव का भरोसा आगे बढ़ाता है। गुह उनका प्रेम देखकर भावविह्वल होते हैं।
दोहा २३४
गुह शुभ संकेत देखकर कहते हैं कि चिंता मिटेगी और आनंद होगा, किंतु अंत में फिर वियोग का दुःख होगा।
रामवन का विवेक-राज्य रूपक
चौपाइयाँ — मूल पाठ
आश्रम के निकट सुंदर वन देखकर भरत को शरण और राहत मिलती है। कवि उसे शुभ राज्य का रूपक देते हैं—विवेक राजा, वैराग्य मंत्री, यम-नियम सैनिक और शांति-सुमति रानियाँ हैं। उस राज्य का उत्साह रामचरणों पर आश्रित है।
दोहा २३५
विवेकरूपी राजा मोह के राजा को सेना सहित जीतकर सुख, समृद्धि और शांति का निष्कंटक शासन कर रहा है।
चित्रकूट का मंगलमय प्राकृतिक वैभव
चौपाइयाँ — मूल पाठ
मुनियों के आश्रम नगर-गाँव जैसे और विविध जीव प्रजा जैसे दिखते हैं। पशु वैर छोड़कर साथ चरते हैं। झरने नगाड़े, पक्षियों का गान और मोरों का नृत्य मानो सुशासन का उत्सव है; वनस्पतियाँ फल-फूल से भरी हैं।
दोहा २३६
राम के पर्वत की शोभा देखकर भरत का हृदय प्रेम से ऐसा भरता है जैसे व्रत पूरा करके तपस्वी को तपफल मिल गया हो।
गुह द्वारा पर्णकुटी का स्थान दिखाना
पारायण संकेत: मासपारायण, बीसवाँ विश्राम · नवाह्नपारायण, पाँचवाँ विश्राम
चौपाइयाँ — मूल पाठ
गुह ऊँचाई पर चढ़कर विशाल वृक्ष और बीच का सघन वट दिखाते हैं। नदी के निकट वहीं राम की पर्णकुटी है। सीता और लक्ष्मण के लगाए पौधे तथा सीता के हाथों बनी वटछाया की वेदी का परिचय देते हैं।
दोहा २३७
उस वेदी पर सीता-राम प्रतिदिन मुनियों के साथ बैठकर कथा, इतिहास, आगम, वेद और पुराण सुनते हैं।
चरणचिह्नों का दर्शन और प्रेम की पराकाष्ठा
चौपाइयाँ — मूल पाठ
गुह की बात सुनकर भरत-शत्रुघ्न प्रणाम करते आगे चलते हैं। राम के पदचिह्नों की धूल सिर, हृदय और आँखों से लगाकर मिलन जैसा आनंद पाते हैं। उनका प्रेम देखकर जड़-चेतन सब भावमग्न हैं; गुह भी मार्ग भूलने लगते हैं।
दोहा २३८
रूपक में भरत गहरा समुद्र, विरह मंदर और प्रेम अमृत है; इस मंथन से करुणासागर राम का प्रकट होना कहा गया है।
मुनिमंडली के बीच सीता-राम के दर्शन
चौपाइयाँ — मूल पाठ
घने वन की ओट से लक्ष्मण ने अभी आने वालों को नहीं देखा। भरत आश्रम में प्रवेश करके राम के आगे खड़े लक्ष्मण तथा वेदी पर मुनियों सहित सीता-राम को देखते हैं। प्रभु की मुस्कान और दर्शन से हृदय का संताप मिटता है।
दोहा २३९
मुनियों के बीच सीता और राम ऐसे सुशोभित हैं मानो ज्ञानसभा में भक्ति और सच्चिदानंद ने साकार रूप धारण किया हो।
भरत और राम का करुण आलिंगन
चौपाइयाँ — मूल पाठ
भरत रक्षा की पुकार करते भूमि पर दंडवत गिरते हैं। स्वर पहचानकर लक्ष्मण भाई से मिलने की चाह और रामसेवा के दायित्व के बीच रुकते हैं। वे राम को भरत के प्रणाम की सूचना देते हैं; राम प्रेमातुर होकर तत्काल उठ पड़ते हैं।
दोहा २४०
करुणामय राम भरत को उठाकर हृदय से लगाते हैं; यह मिलन देखकर सब अपनी सुधि भूल जाते हैं।
भरत-चरित्र के पाँच मनन-सूत्र
- पद और वैभव से बड़ा प्रियजन का हित तथा धर्मपूर्ण दायित्व है।
- सच्चा सेवक राम की संपत्ति को धरोहर समझता है; भरत यात्रा से पहले नगर की सुरक्षा करते हैं।
- भ्रम में तुरंत प्रतिक्रिया देने के स्थान पर उद्देश्य जानें—गुह और लक्ष्मण के प्रसंग विवेक की आवश्यकता दिखाते हैं।
- भरत का वर है निष्काम चरणप्रेम; वे उसके बदले राज्य या मोक्ष भी नहीं माँगते।
- राम का भरत पर विश्वास और भरत की शरणागति मिलकर चित्रकूट के आलिंगन को संभव करते हैं।
विरह, आत्मधिक्कार, क्रोध और प्राचीन सामाजिक भूमिकाओं के कथन उनके पात्रगत कथा-संदर्भ में पढ़ें। उन्हें आज किसी व्यक्ति, स्त्री या समुदाय की गरिमा घटाने अथवा हिंसा का निर्देश न मानें। भरत द्वारा मंथरा को छुड़ाना और गुह को हृदय से लगाना इस क्रम की करुणामयी कड़ियाँ हैं।
पाठ-संदर्भ और संपादन
मूल अवधी पाठ का आधार संस्कृत डॉक्यूमेंट्स का अयोध्याकाण्ड पाठ है। संदिग्ध क्रमांकन, छंद-प्रकार और स्पष्ट अक्षर-दोषों की तुलना गीता प्रेस के मुद्रित मूल पाठ की पृष्ठ ४८१–५००, पृष्ठ ५०१–५६३ तथा पृष्ठ ५६४–६०० की स्कैन-प्रतियों से की गई है। किसी आधुनिक अनुवाद का पुनर्मुद्रण नहीं किया गया है।
सीमित पाठ-संपादन और इस भाग की सीमा
- क्रमांक २२६ को मुद्रित पाठ के अनुसार सोरठा पहचाना है; १५१, १७६ और २०१ भी सोरठे हैं। इन चार स्थानों के पहले के छंद पूरे दिए हैं।
- क्रमांक १५२ से पहले डिजिटल “सीहु मातु” के स्थान पर मुद्रित “सेएहु मातु” और १५३ से पहले “सुत बचन” के स्थान पर “सूत बचन” रखा है।
- क्रमांक १७२ से पहले डिजिटल पंक्ति में आए अतिरिक्त “केहि” को मुद्रित “तात बिचारु करहु मन माहीं” से मिलाकर हटाया है।
- क्रमांक १९९ के पहले शब्दों के बीच आया अलग लैटिन चिह्न हटाया है। क्रमांक २०३ की चौपाइयों में डिजिटल “पयोदेहिं/पयोदेहि” के स्थान पर मुद्रित “पयादेहिं/पयादेहि” रखा है।
- १६५, १८१ और २२५ में क्रमांक-समापन के टंकण-चिह्न व्यवस्थित किए हैं। पारायण-संकेत काव्य से अलग छोटे पाठ में सुरक्षित हैं। अन्य शब्द सामान्यतः चुने हुए डिजिटल पाठ के अनुसार हैं; संस्करणों में वर्तनी और पाठांतर मिल सकते हैं।
- यह भाग राम–भरत मिलन के क्रमांक २४० पर समाप्त होता है। आगे की कथा अभी शेष है; इसे अयोध्याकाण्ड सम्पूर्ण न मानें।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें
🙏 जय श्री राम 🙏
अपनी श्रद्धा, सुझाव या प्रतिक्रिया कमेंट में अवश्य लिखें।
कृपया भाषा शालीन और सम्मानजनक रखें।
🚩 भक्ति भावना परिवार से जुड़े रहने के लिए धन्यवाद।