श्रीरामचरितमानस अयोध्याकाण्ड भाग 4 | दशरथ-वियोग, भरत का प्रेम और राम-भरत मिलन | दोहा 151–240 अर्थ सहित

॥ श्री सीताराम ॥ · भक्ति भावना प्रस्तुत

श्रीरामचरितमानस
अयोध्याकाण्ड — भाग ४

दशरथ-वियोग, भरत का निष्कपट प्रेम और चित्रकूट में राम–भरत मिलन

दोहा १५१–२४० · पूरा मूल क्रम · चौपाइयाँ, छंद, दोहे और सोरठे · सरल हिंदी अर्थ

वियोग से मिलन तक भरतजी की भक्ति-यात्रा

यह चौथा भाग पिछले लेख के दोहा १५० के बाद की चौपाइयों से आरंभ होकर दोहा २४० में राम–भरत के आलिंगन तक चलता है। सुमंत्र राम का संदेश सुनाते हैं; दशरथ रामनाम लेते हुए देह छोड़ते हैं। भरत लौटकर राज्य स्वीकारने के स्थान पर रामसेवा चाहते हैं और गुरु, माताओं तथा नगरवासियों के साथ चित्रकूट जाते हैं। मार्ग में गुह से मिलन, प्रयाग में निष्काम प्रेम की याचना, भरद्वाज का सत्कार तथा लक्ष्मण की आशंका पर राम का भरत-विश्वास इस क्रम की प्रमुख कड़ियाँ हैं।

भागों की संख्या कम रखने के लिए ९० क्रमांक एक ही लेख में रखे हैं। प्रत्येक क्रमांक के पहले की पूरी मूल चौपाइयाँ और उनका समेकित सरल हिंदी अर्थ दिया है। छंद और दोहा/सोरठा का अर्थ अलग है। यह मूल पाठ की स्वतंत्र अध्ययन-सहायक व्याख्या है, शब्दशः टीका नहीं।

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क्रमांक १५१–१६०
क्रमांक १६१–१७०
क्रमांक १७१–१८०
क्रमांक १८१–१९०
क्रमांक १९१–२००
क्रमांक २०१–२१०
क्रमांक २११–२२०
क्रमांक २२१–२३०
क्रमांक २३१–२४०
अयोध्याकाण्ड · सोरठा १५१

सुमंत्र द्वारा राम का संदेश सुनाना

चौपाइयाँ — मूल पाठ

केवट कीन्हि बहुत सेवकाई। सो जामिनि सिंगरौर गवाँई ॥ होत प्रात बट छीरु मगावा। जटा मुकुट निज सीस बनावा ॥ राम सखाँ तब नाव मगाई। प्रिया चढ़ाइ चढ़े रघुराई ॥ लखन बान धनु धरे बनाई। आपु चढ़े प्रभु आयसु पाई ॥ बिकल बिलोकि मोहि रघुबीरा। बोले मधुर बचन धरि धीरा ॥ तात प्रनामु तात सन कहेहु। बार बार पद पंकज गहेहू ॥ करबि पायँ परि बिनय बहोरी। तात करिअ जनि चिंता मोरी ॥ बन मग मंगल कुसल हमारें। कृपा अनुग्रह पुन्य तुम्हारें ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

सुमंत्र बताते हैं कि निषादराज की सेवा में रात बीती। प्रातः राम ने जटा बनाईं और सीता-लक्ष्मण सहित नाव पर चढ़े। उन्हें व्याकुल देखकर राम ने पिता को प्रणाम कहने और चरण पकड़कर उनकी चिंता दूर करने का अनुरोध किया।

छंद — मूल पाठ

तुम्हरे अनुग्रह तात कानन जात सब सुखु पाइहौं। प्रतिपालि आयसु कुसल देखन पाय पुनि फिरि आइहौं ॥ जननीं सकल परितोषि परि परि पायँ करि बिनती घनी। तुलसी करेहु सोइ जतनु जेहिं कुसली रहहिं कोसल धनी ॥
छंद का सरल हिंदी अर्थ

राम ने कहा—पिता के अनुग्रह से वन में सुख मिलेगा। आज्ञा पूरी करके फिर दर्शन करने लौटेंगे। सभी माताओं को समझाएँ और ऐसा प्रयत्न करें कि कोसलराज कुशल रहें।

सोरठा १५१

गुर सन कहब सँदेसु बार बार पद पदुम गहि। करब सोइ उपदेसु जेहिं न सोच मोहि अवधपति ॥ १५१ ॥
सोरठा का सरल हिंदी अर्थ

राम ने गुरु को भी संदेश दिया कि वे राजा को ऐसा उपदेश दें जिससे वे उनकी चिंता में न डूबें।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १५२

भरत के लिए नीति और परिवार-सेवा का संदेश

चौपाइयाँ — मूल पाठ

पुरजन परिजन सकल निहोरी। तात सुनाएहु बिनती मोरी ॥ सोइ सब भाँति मोर हितकारी। जातें रह नरनाहु सुखारी ॥ कहब सँदेसु भरत के आएँ। नीति न तजिअ राजपदु पाएँ ॥ पालेहु प्रजहि करम मन बानी। सेएहु मातु सकल सम जानी ॥ ओर निबाहेहु भायप भाई। करि पितु मातु सुजन सेवकाई ॥ तात भाँति तेहि राखब राऊ। सोच मोर जेहिं करै न काऊ ॥ लखन कहे कछु बचन कठोरा। बरजि राम पुनि मोहि निहोरा ॥ बार बार निज सपथ देवाई। कहबि न तात लखन लरिकाई ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

राम ने नगर और परिवार को राजा का दुःख दूर करने की विनती भेजी। भरत से प्रजा का मन-वचन-कर्म से पालन, सभी माताओं की समान सेवा और भाईचारे के निर्वाह को कहा। लक्ष्मण की कठोर बातें न सुनाने की सौगंध भी दी।

दोहा १५२

कहि प्रनाम कछु कहन लिय सिय भइ सिथिल सनेह। थकित बचन लोचन सजल पुलक पल्लवित देह ॥ १५२ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

सीता प्रणाम करके कुछ कहना चाहती थीं, पर प्रेम से वाणी रुक गई; आँखें सजल और शरीर रोमांचित हो गया।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १५३

संदेश सुनकर अवध का शोक

चौपाइयाँ — मूल पाठ

तेहि अवसर रघुबर रूख पाई। केवट पारहि नाव चलाई ॥ रघुकुलतिलक चले एहि भाँती। देखउँ ठाढ़ कुलिस धरि छाती ॥ मैं आपन किमि कहौं कलेसू। जिअत फिरेउँ लेइ राम सँदेसू ॥ अस कहि सचिव बचन रहि गयऊ। हानि गलानि सोच बस भयऊ ॥ सूत बचन सुनतहिं नरनाहू। परेउ धरनि उर दारुन दाहू ॥ तलफत बिषम मोह मन मापा। माजा मनहुँ मीन कहुँ ब्यापा ॥ करि बिलाप सब रोवहिं रानी। महा बिपति किमि जाइ बखानी ॥ सुनि बिलाप दुखहू दुखु लागा। धीरजहू कर धीरजु भागा ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

सुमंत्र कहते हैं कि नाव पार चली और वे हृदय कठोर करके देखते रहे। आत्मग्लानि से उनकी वाणी रुक जाती है। पुत्र का संदेश सुनकर दशरथ भूमि पर गिर पड़ते हैं; रानियाँ विलाप करती हैं और सबका धैर्य टूटता है।

दोहा १५३

भयउ कोलाहलु अवध अति सुनि नृप राउर सोरु। बिपुल बिहग बन परेउ निसि मानहुँ कुलिस कठोरु ॥ १५३ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

राजमहल का रुदन सुनकर अयोध्या में ऐसा कोलाहल हुआ मानो रात में पक्षियों से भरे वन पर वज्र गिर पड़ा हो।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १५४

कौसल्या का धैर्यपूर्ण सहारा

चौपाइयाँ — मूल पाठ

प्रान कंठगत भयउ भुआलू। मनि बिहीन जनु ब्याकुल ब्यालू ॥ इद्रीं सकल बिकल भइँ भारी। जनु सर सरसिज बनु बिनु बारी ॥ कौसल्याँ नृपु दीख मलाना। रबिकुल रबि अँथयउ जियँ जाना। उर धरि धीर राम महतारी। बोली बचन समय अनुसारी ॥ नाथ समुझि मन करिअ बिचारू। राम बियोग पयोधि अपारू ॥ करनधार तुम्ह अवध जहाजू। चढ़ेउ सकल प्रिय पथिक समाजू ॥ धीरजु धरिअ त पाइअ पारू। नाहिं त बूड़िहि सबु परिवारू ॥ जौं जियँ धरिअ बिनय पिय मोरी। रामु लखनु सिय मिलहिं बहोरी ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

राजा की दशा देखकर कौसल्या धैर्य धारण करती हैं। वे कहती हैं कि राम-वियोग का समुद्र अपार है, अयोध्या नाव है और राजा उसके कर्णधार हैं। यदि वे सँभलेंगे तो परिवार पार पाएगा तथा तीनों से फिर मिलन होगा।

दोहा १५४

प्रिया बचन मृदु सुनत नृपु चितयउ आँखि उघारि। तलफत मीन मलीन जनु सींचत सीतल बारि ॥ १५४ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

पत्नी की कोमल वाणी सुनकर राजा ने आँखें खोलीं, मानो तड़पती मछली पर शीतल जल डाला गया हो।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १५५

रामनाम लेते हुए दशरथ का देहावसान

चौपाइयाँ — मूल पाठ

धरि धीरजु उठी बैठ भुआलू। कहु सुमंत्र कहँ राम कृपालू ॥ कहाँ लखनु कहँ रामु सनेही। कहँ प्रिय पुत्रबधू बैदेही ॥ बिलपत राउ बिकल बहु भाँती। भइ जुग सरिस सिराति न राती ॥ तापस अंध साप सुधि आई। कौसल्यहि सब कथा सुनाई ॥ भयउ बिकल बरनत इतिहासा। राम रहित धिग जीवन आसा ॥ सो तनु राखि करब मैं काहा। जेंहि न प्रेम पनु मोर निबाहा ॥ हा रघुनंदन प्रान पिरीते। तुम्ह बिनु जिअत बहुत दिन बीते ॥ हा जानकी लखन हा रघुबर। हा पितु हित चित चातक जलधर।
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

दशरथ धैर्य करके उठते, फिर राम, लक्ष्मण और सीता को पुकारते हैं। उन्हें अंध तपस्वी के शाप की स्मृति आती है और कौसल्या को पुरानी घटना सुनाते हैं। वियोग की असह्य पीड़ा में वे प्रिय पुत्र का नाम बार-बार लेते हैं।

दोहा १५५

राम राम कहि राम कहि राम राम कहि राम। तनु परिहरि रघुबर बिरहँ राउ गयउ सुरधाम ॥ १५५ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

रामनाम का उच्चारण करते हुए दशरथ ने रघुवर-विरह में शरीर छोड़ा और कथा के अनुसार स्वर्गधाम गए।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १५६

राजपरिवार का विलाप और वसिष्ठ की सांत्वना

चौपाइयाँ — मूल पाठ

जिअन मरन फलु दसरथ पावा। अंड अनेक अमल जसु छावा ॥ जिअत राम बिधु बदनु निहारा। राम बिरह करि मरनु सँवारा ॥ सोक बिकल सब रोवहिं रानी। रूपु सील बलु तेजु बखानी ॥ करहिं बिलाप अनेक प्रकारा। परहीं भूमितल बारहिं बारा ॥ बिलपहिं बिकल दास अरु दासी। घर घर रुदनु करहिं पुरबासी ॥ अँथयउ आजु भानुकुल भानू। धरम अवधि गुन रूप निधानू ॥ गारीं सकल कैकइहि देहीं। नयन बिहीन कीन्ह जग जेहीं ॥ एहि बिधि बिलपत रैनि बिहानी। आए सकल महामुनि ग्यानी ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

कवि दशरथ के जीवन और रामप्रेम की कीर्ति कहते हैं। रानियाँ, सेवक और नगरवासी उनके गुण स्मरण कर रोते हैं; रात शोक में बीतती है। प्रातः ज्ञानी मुनि आते हैं और सबको सँभालते हैं।

दोहा १५६

तब बसिष्ठ मुनि समय सम कहि अनेक इतिहास। सोक नेवारेउ सबहि कर निज बिग्यान प्रकास ॥ १५६ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

वसिष्ठ समय के अनुकूल अनेक पुराने प्रसंग और आत्मविवेक की बातें कहकर सबका शोक शांत करने का प्रयत्न करते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १५७

भरत को बुलाने के लिए दूत

चौपाइयाँ — मूल पाठ

तेल नाँव भरि नृप तनु राखा। दूत बोलाइ बहुरि अस भाषा ॥ धावहु बेगि भरत पहिं जाहू। नृप सुधि कतहुँ कहहु जनि काहू ॥ एतनेइ कहेहु भरत सन जाई। गुर बोलाई पठयउ दोउ भाई ॥ सुनि मुनि आयसु धावन धाए। चले बेग बर बाजि लजाए ॥ अनरथु अवध अरंभेउ जब तें। कुसगुन होहिं भरत कहुँ तब तें ॥ देखहिं राति भयानक सपना। जागि करहिं कटु कोटि कलपना ॥ बिप्र जेवाँइ देहिं दिन दाना। सिव अभिषेक करहिं बिधि नाना ॥ मागहिं हृदयँ महेस मनाई। कुसल मातु पितु परिजन भाई ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

राजा का शरीर सुरक्षित रखकर वसिष्ठ दूतों को दोनों भाइयों को शीघ्र बुलाने भेजते हैं। उधर भरत अशुभ स्वप्नों से चिंतित हैं; दान और शिवपूजन करके परिवार की कुशल चाहते हैं। संदेश में गुरु के बुलावे की बात ही कही जाती है।

दोहा १५७

एहि बिधि सोचत भरत मन धावन पहुँचे आइ। गुर अनुसासन श्रवन सुनि चले गनेसु मनाइ ॥ १५७ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

चिंतित भरत के पास दूत पहुँचे; गुरु की आज्ञा सुनकर वे गणेशजी का स्मरण करते हुए चल पड़े।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १५८

उदास अयोध्या में भरत का प्रवेश

चौपाइयाँ — मूल पाठ

चले समीर बेग हय हाँके। नाघत सरित सैल बन बाँके ॥ हृदयँ सोचु बड़ कछु न सोहाई। अस जानहिं जियँ जाउँ उड़ाई ॥ एक निमेष बरस सम जाई। एहि बिधि भरत नगर निअराई ॥ असगुन होहिं नगर पैठारा। रटहिं कुभाँति कुखेत करारा ॥ खर सिआर बोलहिं प्रतिकूला। सुनि सुनि होइ भरत मन सूला ॥ श्रीहत सर सरिता बन बागा। नगरु बिसेषि भयावनु लागा ॥ खग मृग हय गय जाहिं न जोए। राम बियोग कुरोग बिगोए ॥ नगर नारि नर निपट दुखारी। मनहुँ सबन्हि सब संपति हारी ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

भरत तीव्र गति से नदी, पर्वत और वन पार करते हैं, पर मन की चिंता बढ़ती है। नगर के पास अशुभ दृश्य, मुरझाए उद्यान और शोकग्रस्त प्राणी दिखते हैं। नर-नारियाँ मानो सर्वस्व खो चुके हों।

दोहा १५८

पुरजन मिलिहिं न कहहिं कछु गवँहिं जोहारहिं जाहिं। भरत कुसल पूँछि न सकहिं भय बिषाद मन माहिं ॥ १५८ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

लोग मौन होकर प्रणाम करके चले जाते हैं; भय और दुःख से भरे भरत उनसे कुशल भी नहीं पूछ पाते।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १५९

कैकेयी से पिता और भाइयों की कुशल पूछना

चौपाइयाँ — मूल पाठ

हाट बाट नहिं जाइ निहारी। जनु पुर दहँ दिसि लागि दवारी ॥ आवत सुत सुनि कैकयनंदिनि। हरषी रबिकुल जलरुह चंदिनि ॥ सजि आरती मुदित उठि धाई। द्वारेहिं भेंटि भवन लेइ आई ॥ भरत दुखित परिवारु निहारा। मानहुँ तुहिन बनज बनु मारा ॥ कैकेई हरषित एहि भाँति। मनहुँ मुदित दव लाइ किराती ॥ सुतहि ससोच देखि मनु मारें। पूँछति नैहर कुसल हमारें ॥ सकल कुसल कहि भरत सुनाई। पूँछी निज कुल कुसल भलाई ॥ कहु कहँ तात कहाँ सब माता। कहँ सिय राम लखन प्रिय भ्राता ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

कैकेयी पुत्र के आने पर आरती सजाकर स्वागत करती हैं। भरत परिवार की विपन्न दशा देखते हैं। मायके की कुशल बताकर वे पिता, सभी माताओं, सीता तथा प्रिय राम-लक्ष्मण का समाचार पूछते हैं।

दोहा १५९

सुनि सुत बचन सनेहमय कपट नीर भरि नैन। भरत श्रवन मन सूल सम पापिनि बोली बैन ॥ १५९ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

भरत के प्रेमपूर्ण प्रश्न सुनकर कैकेयी आँखों में आँसू लाकर ऐसी बात कहती हैं जो उनके कान और मन में शूल जैसी लगती है।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १६०

पिता का निधन और वनवास सुनकर भरत की दशा

चौपाइयाँ — मूल पाठ

तात बात मैं सकल सँवारी। भै मंथरा सहाय बिचारी ॥ कछुक काज बिधि बीच बिगारेउ। भूपति सुरपति पुर पगु धारेउ ॥ सुनत भरतु भए बिबस बिषादा। जनु सहमेउ करि केहरि नादा ॥ तात तात हा तात पुकारी। परे भूमितल ब्याकुल भारी ॥ चलत न देखन पायउँ तोही। तात न रामहि सौंपेहु मोही ॥ बहुरि धीर धरि उठे सँभारी। कहु पितु मरन हेतु महतारी ॥ सुनि सुत बचन कहति कैकेई। मरमु पाँछि जनु माहुर देई ॥ आदिहु तें सब आपनि करनी। कुटिल कठोर मुदित मन बरनी ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

कैकेयी अपनी योजना सफल बताकर दशरथ के निधन का समाचार देती हैं। भरत पिता को पुकारते हुए गिर पड़ते हैं। सँभलकर कारण पूछने पर कैकेयी वरदानों और राम-वनवास की पूरी घटना कहती हैं।

दोहा १६०

भरतहि बिसरेउ पितु मरन सुनत राम बन गौनु। हेतु अपनपउ जानि जियँ थकित रहे धरि मौनु ॥ १६० ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

राम के वन जाने का समाचार सुनकर पिता की मृत्यु का दुःख भी क्षणभर पीछे पड़ गया; स्वयं को कारण मानकर भरत स्तब्ध हो गए।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १६१

राज्य के प्रस्ताव पर भरत की वेदना

चौपाइयाँ — मूल पाठ

बिकल बिलोकि सुतहि समुझावति। मनहुँ जरे पर लोनु लगावति ॥ तात राउ नहिं सोचे जोगू। बिढ़इ सुकृत जसु कीन्हेउ भोगू ॥ जीवत सकल जनम फल पाए। अंत अमरपति सदन सिधाए ॥ अस अनुमानि सोच परिहरहू। सहित समाज राज पुर करहू ॥ सुनि सुठि सहमेउ राजकुमारू। पाकें छत जनु लाग अँगारू ॥ धीरज धरि भरि लेहिं उसासा। पापनि सबहि भाँति कुल नासा ॥ जौं पै कुरुचि रही अति तोही। जनमत काहे न मारे मोही ॥ पेड़ काटि तैं पालउ सींचा। मीन जिअन निति बारि उलीचा ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

कैकेयी राज्य सँभालकर शोक छोड़ने को कहती हैं, पर भरत को यह बात घाव पर अंगारे जैसी लगती है। वे क्रोध और ग्लानि में कहते हैं कि उनकी भलाई के नाम पर पूरे वंश का अनर्थ किया गया।

दोहा १६१

हंसबंसु दसरथु जनकु राम लखन से भाइ। जननी तूँ जननी भई बिधि सन कछु न बसाइ ॥ १६१ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

भरत अपने श्रेष्ठ वंश, दशरथ जैसे पिता और राम-लक्ष्मण जैसे भाइयों का स्मरण कर माता के कर्म पर गहरी पीड़ा व्यक्त करते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १६२

क्रोधित भरत का आत्मधिक्कार

चौपाइयाँ — मूल पाठ

जब तैं कुमति कुमत जियँ ठयऊ। खंड खंड होइ ह्रदउ न गयऊ ॥ बर मागत मन भइ नहिं पीरा। गरि न जीह मुहँ परेउ न कीरा ॥ भूपँ प्रतीत तोरि किमि कीन्ही। मरन काल बिधि मति हरि लीन्ही ॥ बिधिहुँ न नारि हृदय गति जानी। सकल कपट अघ अवगुन खानी ॥ सरल सुसील धरम रत राऊ। सो किमि जानै तीय सुभाऊ ॥ अस को जीव जंतु जग माहीं। जेहि रघुनाथ प्रानप्रिय नाहीं ॥ भे अति अहित रामु तेउ तोही। को तू अहसि सत्य कहु मोही ॥ जो हसि सो हसि मुहँ मसि लाई। आँखि ओट उठि बैठहिं जाई ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

भरत वर माँगने की निर्दयता और राम जैसे सर्वप्रिय के विरोध पर कैकेयी को कठोर उलाहना देते हैं। क्रोध में आए स्त्री-स्वभाव संबंधी व्यापक आरोप इसी पात्रगत क्षोभ का भाग हैं। अंततः वे स्वयं को इस अनर्थ का कारण मानकर दोष देते हैं।

दोहा १६२

राम बिरोधी हृदय तें प्रगट कीन्ह बिधि मोहि। मो समान को पातकी बादि कहउँ कछु तोहि ॥ १६२ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

भरत कहते हैं—मुझे रामविरोधी हृदय से जन्म मिला; अपने समान पापी मानकर वे माता को और दोष देना व्यर्थ समझते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १६३

शत्रुघ्न का क्रोध और भरत की करुणा

चौपाइयाँ — मूल पाठ

सुनि सत्रुघुन मातु कुटिलाई। जरहिं गात रिस कछु न बसाई ॥ तेहि अवसर कुबरी तहँ आई। बसन बिभूषन बिबिध बनाई ॥ लखि रिस भरेउ लखन लघु भाई। बरत अनल घृत आहुति पाई ॥ हुमगि लात तकि कूबर मारा। परि मुह भर महि करत पुकारा ॥ कूबर टूटेउ फूट कपारू। दलित दसन मुख रुधिर प्रचारू ॥ आह दइअ मैं काह नसावा। करत नीक फलु अनइस पावा ॥ सुनि रिपुहन लखि नख सिख खोटी। लगे घसीटन धरि धरि झोंटी ॥ भरत दयानिधि दीन्हि छड़ाई। कौसल्या पहिं गे दोउ भाई ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

मंथरा सजधजकर आती है तो शत्रुघ्न क्रोध में उसे मारते और घसीटते हैं। भरत दयापूर्वक उसे छुड़ाते हैं और दोनों भाई कौसल्या के पास जाते हैं। कथा में उनका आचरण क्रोध के बीच करुणा का स्पष्ट विराम है।

दोहा १६३

मलिन बसन बिबरन बिकल कृस सरीर दुख भार। कनक कलप बर बेलि बन मानहुँ हनी तुसार ॥ १६३ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

कौसल्या मैले वस्त्र, पीली आकुल मुखाकृति और दुर्बल शरीर में ऐसी दिखती हैं मानो स्वर्णमयी कल्पलता को पाला मार गया हो।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १६४

कौसल्या के चरणों में भरत

चौपाइयाँ — मूल पाठ

भरतहि देखि मातु उठि धाई। मुरुछित अवनि परी झइँ आई ॥ देखत भरतु बिकल भए भारी। परे चरन तन दसा बिसारी ॥ मातु तात कहँ देहि देखाई। कहँ सिय रामु लखनु दोउ भाई ॥ कैकइ कत जनमी जग माझा। जौं जनमि त भइ काहे न बाँझा ॥ कुल कलंकु जेहिं जनमेउ मोही। अपजस भाजन प्रियजन द्रोही ॥ को तिभुवन मोहि सरिस अभागी। गति असि तोरि मातु जेहि लागी ॥ पितु सुरपुर बन रघुबर केतू। मैं केवल सब अनरथ हेतु ॥ धिग मोहि भयउँ बेनु बन आगी। दुसह दाह दुख दूषन भागी ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

भरत को देखकर कौसल्या दौड़ती और मूर्छित होती हैं। भरत चरणों में गिरकर पिता और भाइयों का समाचार पूछते हैं। कैकेयी के कर्म से जुड़कर वे स्वयं को कुलकलंक और सब विपत्तियों का कारण कहते हैं।

दोहा १६४

मातु भरत के बचन मृदु सुनि सुनि उठी सँभारि ॥ लिए उठाइ लगाइ उर लोचन मोचति बारि ॥ १६४ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

भरत की करुण वाणी सुनकर कौसल्या सँभलती हैं, उन्हें उठाकर हृदय से लगाती हैं और आँसू बहाती हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १६५

कौसल्या का निष्कपट मातृस्नेह

चौपाइयाँ — मूल पाठ

सरल सुभाय मायँ हियँ लाए। अति हित मनहुँ राम फिरि आए ॥ भेंटेउ बहुरि लखन लघु भाई। सोकु सनेहु न हृदयँ समाई ॥ देखि सुभाउ कहत सबु कोई। राम मातु अस काहे न होई ॥ माताँ भरतु गोद बैठारे। आँसु पौंछि मृदु बचन उचारे ॥ अजहुँ बच्छ बलि धीरज धरहू। कुसमउ समुझि सोक परिहरहू ॥ जनि मानहु हियँ हानि गलानी। काल करम गति अघटित जानि ॥ काहुहि दोसु देहु जनि ताता। भा मोहि सब बिधि बाम बिधाता ॥ जो एतेहुँ दुख मोहि जिआवा। अजहुँ को जानइ का तेहि भावा ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

कौसल्या भरत को ऐसे गले लगाती हैं मानो राम लौट आए हों; शत्रुघ्न को भी स्नेह देती हैं। भरत को गोद में बैठाकर आँसू पोंछती हैं और समय-कर्म की कठिन गति समझकर दोषारोपण तथा आत्मग्लानि छोड़ने को कहती हैं।

दोहा १६५

पितु आयस भूषन बसन तात तजे रघुबीर। बिसमउ हरषु न हृदयँ कछु पहिरे बलकल चीर॥ १६५ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

वे बताती हैं कि पिता की आज्ञा से राम ने बिना हर्ष-विषाद के राजवस्त्र-आभूषण छोड़े और वल्कल पहन लिए।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १६६

कौसल्या द्वारा वनगमन का स्मरण

चौपाइयाँ — मूल पाठ

मुख प्रसन्न मन रंग न रोषू। सब कर सब बिधि करि परितोषू ॥ चले बिपिन सुनि सिय सँग लागी। रहइ न राम चरन अनुरागी ॥ सुनतहिं लखनु चले उठि साथा। रहहिं न जतन किए रघुनाथा ॥ तब रघुपति सबही सिरु नाई। चले संग सिय अरु लघु भाई ॥ रामु लखनु सिय बनहि सिधाए। गइउँ न संग न प्रान पठाए ॥ यहु सबु भा इन्ह आँखिन्ह आगें। तउ न तजा तनु जीव अभागें ॥ मोहि न लाज निज नेहु निहारी। राम सरिस सुत मैं महतारी ॥ जिऐ मरै भल भूपति जाना। मोर हृदय सत कुलिस समाना ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

कौसल्या कहती हैं कि राम प्रसन्न मुख से सबको संतोष देकर चले; सीता और लक्ष्मण भी साथ हो लिए। वह दृश्य अपनी आँखों के सामने होने पर भी साथ न जा सकने की पीड़ा में वे अपने हृदय को कठोर कहती हैं।

दोहा १६६

कौसल्या के बचन सुनि भरत सहित रनिवास। ब्याकुल बिलपत राजगृह मानहुँ सोक नेवासु ॥ १६६ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

कौसल्या की वाणी सुनकर भरत सहित रनिवास विलाप करता है और राजभवन मानो शोक का निवास बन जाता है।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १६७

भरत की निर्दोषता की शपथ

चौपाइयाँ — मूल पाठ

बिलपहिं बिकल भरत दोउ भाई। कौसल्याँ लिए हृदयँ लगाई ॥ भाँति अनेक भरतु समुझाए। कहि बिबेकमय बचन सुनाए ॥ भरतहुँ मातु सकल समुझाईं। कहि पुरान श्रुति कथा सुहाईं ॥ छल बिहीन सुचि सरल सुबानी। बोले भरत जोरि जुग पानी ॥ जे अघ मातु पिता सुत मारें। गाइ गोठ महिसुर पुर जारें ॥ जे अघ तिय बालक बध कीन्हें। मीत महीपति माहुर दीन्हें ॥ जे पातक उपपातक अहहीं। करम बचन मन भव कबि कहहीं ॥ ते पातक मोहि होहुँ बिधाता। जौं यहु होइ मोर मत माता ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

कौसल्या दोनों भाइयों को सँभालती हैं और भरत भी माताओं को विवेक देते हैं। फिर भरत सरल वाणी में कहते हैं कि यदि वनवास की योजना में उनकी सहमति हो, तो घोर हिंसा, विश्वासघात और अन्य पापों के फल उन्हें मिलें।

दोहा १६७

जे परिहरि हरि हर चरन भजहिं भूतगन घोर। तेहि कइ गति मोहि देउ बिधि जौं जननी मत मोर ॥ १६७ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

वे इसी शपथ को आगे बढ़ाते हैं कि यदि माता की योजना उनकी भी हो, तो उन्हें भगवान से विमुख आचरण का दुष्फल मिले।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १६८

कौसल्या का भरत पर पूर्ण विश्वास

चौपाइयाँ — मूल पाठ

बेचहिं बेदु धरमु दुहि लेहीं। पिसुन पराय पाप कहि देहीं ॥ कपटी कुटिल कलहप्रिय क्रोधी। बेद बिदूषक बिस्व बिरोधी ॥ लोभी लंपट लोलुपचारा। जे ताकहिं परधनु परदारा ॥ पावौं मैं तिन्ह के गति घोरा। जौं जननी यहु संमत मोरा ॥ जे नहिं साधुसंग अनुरागे। परमारथ पथ बिमुख अभागे ॥ जे न भजहिं हरि नरतनु पाई। जिन्हहि न हरि हर सुजसु सोहाई ॥ तजि श्रुतिपंथु बाम पथ चलहीं। बंचक बिरचि बेष जगु छलहीं ॥ तिन्ह कै गति मोहि संकर देऊ। जननी जौं यहु जानौं भेऊ ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

भरत कपट, लोभ, परनिंदा, धर्म के दुरुपयोग और दूसरों को छलने जैसे दुर्गुणों की गति अपने लिए माँगते हैं, यदि वे योजना जानते हों। इन शपथों से वे राम-विरोध में अपनी पूर्ण असहमति प्रकट करते हैं।

दोहा १६८

मातु भरत के बचन सुनि साँचे सरल सुभायँ। कहति राम प्रिय तात तुम्ह सदा बचन मन कायँ ॥ १६८ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

उनकी सच्ची सरल वाणी सुनकर कौसल्या कहती हैं—तात, तुम मन, वचन और शरीर से सदा राम के प्रिय हो।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १६९

धीरज रखकर आवश्यक कर्म करने की शिक्षा

चौपाइयाँ — मूल पाठ

राम प्रानहु तें प्रान तुम्हारे। तुम्ह रघुपतिहि प्रानहु तें प्यारे ॥ बिधु बिष चवै स्त्रवै हिमु आगी। होइ बारिचर बारि बिरागी ॥ भएँ ग्यानु बरु मिटै न मोहू। तुम्ह रामहि प्रतिकूल न होहू ॥ मत तुम्हार यहु जो जग कहहीं। सो सपनेहुँ सुख सुगति न लहहीं ॥ अस कहि मातु भरतु हियँ लाए। थन पय स्त्रवहिं नयन जल छाए ॥ करत बिलाप बहुत यहि भाँती। बैठेहिं बीति गइ सब राती ॥ बामदेउ बसिष्ठ तब आए। सचिव महाजन सकल बोलाए ॥ मुनि बहु भाँति भरत उपदेसे। कहि परमारथ बचन सुदेसे ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

कौसल्या कहती हैं कि असंभव बातें हो सकती हैं, पर भरत राम के प्रतिकूल नहीं हो सकते। रात सांत्वना और विलाप में बीतती है। प्रातः वामदेव-वसिष्ठ आते हैं और मंत्री तथा नगर के प्रमुख जन बुलाते हैं।

दोहा १६९

तात हृदयँ धीरजु धरहु करहु जो अवसर आजु। उठे भरत गुर बचन सुनि करन कहेउ सबु साजु ॥ १६९ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

वसिष्ठ भरत से धैर्य रखकर समय का कर्तव्य करने को कहते हैं; भरत उठकर आवश्यक व्यवस्था कराने लगते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १७०

दशरथ के अंत्येष्टि-संस्कार और दान

चौपाइयाँ — मूल पाठ

नृपतनु बेद बिदित अन्हवावा। परम बिचित्र बिमानु बनावा ॥ गहि पद भरत मातु सब राखी। रहीं रानि दरसन अभिलाषी ॥ चंदन अगर भार बहु आए। अमित अनेक सुगंध सुहाए ॥ सरजु तीर रचि चिता बनाई। जनु सुरपुर सोपान सुहाई ॥ एहि बिधि दाह क्रिया सब कीन्ही। बिधिवत न्हाइ तिलांजुलि दीन्ही ॥ सोधि सुमृति सब बेद पुराना। कीन्ह भरत दसगात बिधाना ॥ जहँ जस मुनिबर आयसु दीन्हा। तहँ तस सहस भाँति सबु कीन्हा ॥ भए बिसुद्ध दिए सब दाना। धेनु बाजि गज बाहन नाना ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

भरत गुरु की आज्ञा से राजा के अंत्येष्टि-संस्कार की व्यवस्था करते हैं। माताओं को रोकते हैं; वे राम-दर्शन की आशा में रहती हैं। सरयू तट पर दाह-संस्कार, स्नान, तिलांजलि तथा अन्य निर्धारित कर्म पूरे करके दान किए जाते हैं।

दोहा १७०

सिंघासन भूषन बसन अन्न धरनि धन धाम। दिए भरत लहि भूमिसुर भे परिपूरन काम ॥ १७० ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

भरत ने आसन, आभूषण, वस्त्र, अन्न, भूमि, धन और भवन आदि दान दिए; पाने वालों की आवश्यकताएँ पूर्ण हुईं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १७१

वसिष्ठ का सभा में भावी की प्रबलता कहना

चौपाइयाँ — मूल पाठ

पितु हित भरत कीन्हि जसि करनी। सो मुख लाख जाइ नहिं बरनी ॥ सुदिनु सोधि मुनिबर तब आए। सचिव महाजन सकल बोलाए ॥ बैठे राजसभाँ सब जाई। पठए बोलि भरत दोउ भाई ॥ भरतु बसिष्ठ निकट बैठारे। नीति धरममय बचन उचारे ॥ प्रथम कथा सब मुनिबर बरनी। कैकइ कुटिल कीन्हि जसि करनी ॥ भूप धरमब्रतु सत्य सराहा। जेहिं तनु परिहरि प्रेमु निबाहा ॥ कहत राम गुन सील सुभाऊ। सजल नयन पुलकेउ मुनिराऊ ॥ बहुरि लखन सिय प्रीति बखानी। सोक सनेह मगन मुनि ग्यानी ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

पितृकर्म के बाद सभा बुलाकर भरत-शत्रुघ्न को बैठाया जाता है। वसिष्ठ कैकेयी की करनी, दशरथ की सत्यनिष्ठा और राम के शील का वर्णन करते हैं। सीता-लक्ष्मण का प्रेम कहते हुए वे भी भावविह्वल हो जाते हैं।

दोहा १७१

सुनहु भरत भावी प्रबल बिलखि कहेउ मुनिनाथ। हानि लाभु जीवन मरनु जसु अपजसु बिधि हाथ ॥ १७१ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

वसिष्ठ कहते हैं—भावी बड़ी प्रबल है; हानि-लाभ, जीवन-मरण और यश-अपयश विधि के हाथ हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १७२

शोक का विषय: दायित्व से विमुख आचरण

चौपाइयाँ — मूल पाठ

अस बिचारि केहि देइअ दोसू। ब्यरथ काहि पर कीजिअ रोसू ॥ तात बिचारु करहु मन माहीं। सोच जोगु दसरथु नृपु नाहीं ॥ सोचिअ बिप्र जो बेद बिहीना। तजि निज धरमु बिषय लयलीना ॥ सोचिअ नृपति जो नीति न जाना। जेहि न प्रजा प्रिय प्रान समाना ॥ सोचिअ बयसु कृपन धनवानू। जो न अतिथि सिव भगति सुजानू ॥ सोचिअ सूद्रु बिप्र अवमानी। मुखर मानप्रिय ग्यान गुमानी ॥ सोचिअ पुनि पति बंचक नारी। कुटिल कलहप्रिय इच्छाचारी ॥ सोचिअ बटु निज ब्रतु परिहरई। जो नहिं गुर आयसु अनुसरई ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

वसिष्ठ व्यर्थ क्रोध छोड़कर दशरथ की सद्गति समझने को कहते हैं। तत्कालीन सामाजिक भूमिकाओं के उदाहरणों से वे ज्ञानहीनता, प्रजाहित की उपेक्षा, कृपणता, अहंकार, छल और अनुशासनहीनता को खेद का विषय बताते हैं।

दोहा १७२

सोचिअ गृही जो मोह बस करइ करम पथ त्याग। सोचिअ जति प्रंपच रत बिगत बिबेक बिराग ॥ १७२ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

मोह में कर्तव्य छोड़ने वाला गृहस्थ और विवेक-वैराग्य छोड़कर प्रपंच में फँसा संन्यासी वास्तव में चिंतनीय हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १७३

दशरथ की कीर्ति और गुणवान पुत्र

चौपाइयाँ — मूल पाठ

बैखानस सोइ सोचै जोगु। तपु बिहाइ जेहि भावइ भोगू ॥ सोचिअ पिसुन अकारन क्रोधी। जननि जनक गुर बंधु बिरोधी ॥ सब बिधि सोचिअ पर अपकारी। निज तनु पोषक निरदय भारी ॥ सोचनीय सबहि बिधि सोई। जो न छाड़ि छलु हरि जन होई ॥ सोचनीय नहिं कोसलराऊ। भुवन चारिदस प्रगट प्रभाऊ ॥ भयउ न अहइ न अब होनिहारा। भूप भरत जस पिता तुम्हारा ॥ बिधि हरि हरु सुरपति दिसिनाथा। बरनहिं सब दसरथ गुन गाथा ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

मुनि कहते हैं कि तप छोड़कर भोग चाहने वाला, परनिंदक, अकारण क्रोधी, निरदय और कपटी आचरण चिंतनीय है। इसके विपरीत दशरथ की कीर्ति सर्वत्र है और देवता भी उनके गुण कहते हैं।

दोहा १७३

कहहु तात केहि भाँति कोउ करिहि बड़ाई तासु। राम लखन तुम्ह सत्रुहन सरिस सुअन सुचि जासु ॥ १७३ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

जिसके राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न जैसे पवित्र पुत्र हों, उसकी महानता कोई पूरी कैसे कह सकता है?

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १७४

पिता के वचन को पूरा करने का आग्रह

चौपाइयाँ — मूल पाठ

सब प्रकार भूपति बड़भागी। बादि बिषादु करिअ तेहि लागी ॥ यहु सुनि समुझि सोचु परिहरहू। सिर धरि राज रजायसु करहू ॥ राँय राजपदु तुम्ह कहुँ दीन्हा। पिता बचनु फुर चाहिअ कीन्हा ॥ तजे रामु जेहिं बचनहि लागी। तनु परिहरेउ राम बिरहागी ॥ नृपहि बचन प्रिय नहिं प्रिय प्राना। करहु तात पितु बचन प्रवाना ॥ करहु सीस धरि भूप रजाई। हइ तुम्ह कहँ सब भाँति भलाई ॥ परसुराम पितु अग्या राखी। मारी मातु लोक सब साखी ॥ तनय जजातिहि जौबनु दयऊ। पितु अग्याँ अघ अजसु न भयऊ ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

वसिष्ठ भरत को पिता द्वारा दिए राज्य का दायित्व लेने को कहते हैं। दशरथ के वचनप्रेम और प्राचीन परशुराम तथा पुरु की कथाओं का उदाहरण देते हैं। ये उस संवाद के ऐतिहासिक तर्क हैं, किसी हिंसक कर्म का आज के लिए निर्देश नहीं।

दोहा १७४

अनुचित उचित बिचारु तजि जे पालहिं पितु बैन। ते भाजन सुख सुजस के बसहिं अमरपति ऐन ॥ १७४ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

मुनि पिता के वचनपालन का महत्त्व कहते हुए उसे सुख, सुयश और शुभ गति का साधन बताते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १७५

राज्य को राम की धरोहर मानकर सँभालने की सलाह

चौपाइयाँ — मूल पाठ

अवसि नरेस बचन फुर करहू। पालहु प्रजा सोकु परिहरहू ॥ सुरपुर नृप पाइहि परितोषू। तुम्ह कहुँ सुकृत सुजसु नहिं दोषू ॥ बेद बिदित संमत सबही का। जेहि पितु देइ सो पावइ टीका ॥ करहु राजु परिहरहु गलानी। मानहु मोर बचन हित जानी ॥ सुनि सुखु लहब राम बैदेहीं। अनुचित कहब न पंडित केहीं ॥ कौसल्यादि सकल महतारीं। तेउ प्रजा सुख होहिं सुखारीं ॥ परम तुम्हार राम कर जानिहि। सो सब बिधि तुम्ह सन भल मानिहि ॥ सौंपेहु राजु राम कै आएँ। सेवा करेहु सनेह सुहाएँ ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

गुरु समझाते हैं कि भरत प्रजा का पालन करें तो पिता, राम-सीता और माताएँ संतुष्ट होंगी। राम लौटें तब राज्य उन्हें सौंपकर प्रेमपूर्वक सेवा करें। इस बीच दायित्व लेने को वे दोषरहित और लोकसम्मत बताते हैं।

दोहा १७५

कीजिअ गुर आयसु अवसि कहहिं सचिव कर जोरि। रघुपति आएँ उचित जस तस तब करब बहोरि ॥ १७५ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

मंत्री हाथ जोड़कर गुरु की आज्ञा मानने का अनुरोध करते हैं; राम लौटने पर उस समय जो उचित होगा, किया जाएगा।

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अयोध्याकाण्ड · सोरठा १७६

कौसल्या का धैर्य देना और भरत का उत्तर

चौपाइयाँ — मूल पाठ

कौसल्या धरि धीरजु कहई। पूत पथ्य गुर आयसु अहई ॥ सो आदरिअ करिअ हित मानी। तजिअ बिषादु काल गति जानी ॥ बन रघुपति सुरपति नरनाहू। तुम्ह एहि भाँति तात कदराहू ॥ परिजन प्रजा सचिव सब अंबा। तुम्हही सुत सब कहँ अवलंबा ॥ लखि बिधि बाम कालु कठिनाई। धीरजु धरहु मातु बलि जाई ॥ सिर धरि गुर आयसु अनुसरहू। प्रजा पालि परिजन दुखु हरहू ॥ गुर के बचन सचिव अभिनंदनु। सुने भरत हिय हित जनु चंदनु ॥ सुनी बहोरि मातु मृदु बानी। सील सनेह सरल रस सानी ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

कौसल्या भी गुरु की आज्ञा को हितकारी कहती हैं। वन में राम, स्वर्ग में राजा और दुःखी परिवार-प्रजा की स्थिति देखकर भरत को सबका सहारा बनकर पालन करने का आग्रह करती हैं। भरत सबका स्नेह और हितभाव सुनते हैं।

छंद — मूल पाठ

सानी सरल रस मातु बानी सुनि भरत ब्याकुल भए। लोचन सरोरुह स्त्रवत सींचत बिरह उर अंकुर नए ॥ सो दसा देखत समय तेहि बिसरी सबहि सुधि देह की। तुलसी सराहत सकल सादर सीवँ सहज सनेह की ॥
छंद का सरल हिंदी अर्थ

माता की सरल स्नेहमयी वाणी से भरत अत्यंत व्याकुल हो गए। उनके आँसू विरह को और बढ़ाते प्रतीत हुए; सब उनकी स्वाभाविक प्रेममर्यादा की प्रशंसा करने लगे।

सोरठा १७६

भरतु कमल कर जोरि धीर धुरंधर धीर धरि। बचन अमिअँ जनु बोरि देत उचित उत्तर सबहि ॥ १७६ ॥
सोरठा का सरल हिंदी अर्थ

धैर्य धारण करके भरत कमल जैसे हाथ जोड़ते हैं और अमृत में डूबी-सी वाणी से सबको उचित उत्तर देते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १७७

भरत की विनम्र असहमति

पारायण संकेत: मासपारायण, अठारहवाँ विश्राम

चौपाइयाँ — मूल पाठ

मोहि उपदेसु दीन्ह गुर नीका। प्रजा सचिव संमत सबही का ॥ मातु उचित धरि आयसु दीन्हा। अवसि सीस धरि चाहउँ कीन्हा ॥ गुर पितु मातु स्वामि हित बानी। सुनि मन मुदित करिअ भलि जानी ॥ उचित कि अनुचित किएँ बिचारू। धरमु जाइ सिर पातक भारू ॥ तुम्ह तौ देहु सरल सिख सोई। जो आचरत मोर भल होई ॥ जद्यपि यह समुझत हउँ नीकें। तदपि होत परितोषु न जी कें ॥ अब तुम्ह बिनय मोरि सुनि लेहू। मोहि अनुहरत सिखावनु देहू ॥ ऊतरु देउँ छमब अपराधू। दुखित दोष गुन गनहिं न साधू ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

भरत गुरु, माता और हितैषियों की शिक्षा को श्रेष्ठ मानते हैं तथा उसका आदर करते हैं। फिर भी मन का संतोष नहीं मिलता। वे दुखी जन की भूल क्षमा करके अपनी परिस्थिति के अनुसार बात सुनने की प्रार्थना करते हैं।

दोहा १७७

पितु सुरपुर सिय रामु बन करन कहहु मोहि राजु। एहि तें जानहु मोर हित कै आपन बड़ काजु ॥ १७७ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

वे पूछते हैं—पिता स्वर्ग में और राम-सीता वन में हैं; ऐसे में मुझे राज्य करने को कहना मेरा हित कैसे होगा?

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १७८

राज्य के स्थान पर रामसेवा की चाह

चौपाइयाँ — मूल पाठ

हित हमार सियपति सेवकाई। सो हरि लीन्ह मातु कुटिलाई ॥ मैं अनुमानि दीख मन माहीं। आन उपायँ मोर हित नाहीं ॥ सोक समाजु राजु केहि लेखें। लखन राम सिय बिनु पद देखें ॥ बादि बसन बिनु भूषन भारू। बादि बिरति बिनु ब्रह्म बिचारू ॥ सरुज सरीर बादि बहु भोगा। बिनु हरिभगति जायँ जप जोगा ॥ जायँ जीव बिनु देह सुहाई। बादि मोर सबु बिनु रघुराई ॥ जाउँ राम पहिं आयसु देहू। एकहिं आँक मोर हित एहू ॥ मोहि नृप करि भल आपन चहहू। सोउ सनेह जड़ता बस कहहू ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

भरत कहते हैं कि उनका हित सीतापति की सेवा में है, जो इस घटनाक्रम से छिन गई। राम के बिना राजसुख उन्हें निष्प्रयोजन लगता है, जैसे प्राण बिना देह। वे राम के पास जाने की अनुमति चाहते हैं।

दोहा १७८

कैकेई सुअ कुटिलमति राम बिमुख गतलाज। तुम्ह चाहत सुखु मोहबस मोहि से अधम कें राज ॥ १७८ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

भरत आत्मग्लानि में स्वयं को राज्य का अयोग्य मानते हैं और कहते हैं कि शुभचिंतक मोहवश उनसे सुख की आशा रखते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १७९

भरत की तीव्र आत्मग्लानि

चौपाइयाँ — मूल पाठ

कहउँ साँचु सब सुनि पतिआहू। चाहिअ धरमसील नरनाहू ॥ मोहि राजु हठि देइहहु जबहीं। रसा रसातल जाइहि तबहीं ॥ मोहि समान को पाप निवासू। जेहि लगि सीय राम बनबासू ॥ रायँ राम कहुँ काननु दीन्हा। बिछुरत गमनु अमरपुर कीन्हा ॥ मैं सठु सब अनरथ कर हेतू। बैठ बात सब सुनउँ सचेतू ॥ बिनु रघुबीर बिलोकि अबासू। रहे प्रान सहि जग उपहासू ॥ राम पुनीत बिषय रस रूखे। लोलुप भूमि भोग के भूखे ॥ कहँ लगि कहौं हृदय कठिनाई। निदरि कुलिसु जेहिं लही बड़ाई ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

भरत धर्मशील राजा की आवश्यकता बताते हैं, किंतु स्वयं को अनर्थ का कारण मानते हैं। राम-वनवास, पिता की मृत्यु और रामरहित महल में जीवित रहने की बात उन्हें पीड़ित करती है; वे अपने हृदय को अत्यंत कठोर कहते हैं।

दोहा १७९

कारन तें कारजु कठिन होइ दोसु नहि मोर। कुलिस अस्थि तें उपल तें लोह कराल कठोर ॥ १७९ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

कारण से कार्य अधिक कठोर हो सकता है—हड्डी से वज्र और पत्थर से लोहा जैसे उदाहरण देकर वे अपनी आत्मपीड़ा व्यक्त करते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १८०

राजतिलक को असमय उपचार बताना

चौपाइयाँ — मूल पाठ

कैकेई भव तनु अनुरागे। पाँवर प्रान अघाइ अभागे ॥ जौं प्रिय बिरहँ प्रान प्रिय लागे। देखब सुनब बहुत अब आगे ॥ लखन राम सिय कहुँ बनु दीन्हा। पठइ अमरपुर पति हित कीन्हा ॥ लीन्ह बिधवपन अपजसु आपू। दीन्हेउ प्रजहि सोकु संतापू ॥ मोहि दीन्ह सुखु सुजसु सुराजू। कीन्ह कैकेईं सब कर काजू ॥ एहि तें मोर काह अब नीका। तेहि पर देन कहहु तुम्ह टीका ॥ कैकई जठर जनमि जग माहीं। यह मोहि कहँ कछु अनुचित नाहीं ॥ मोरि बात सब बिधिहिं बनाई। प्रजा पाँच कत करहु सहाई ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

भरत कटु विडंबना से कहते हैं कि कैकेयी के प्रयत्न से पति-वियोग, लोकनिंदा और प्रजा का शोक मिला, अब उन्हें राज्य देकर क्या सुख होगा? वे अपने लिए राजतिलक को दुःख बढ़ाने वाली स्थिति मानते हैं।

दोहा १८०

ग्रह ग्रहीत पुनि बात बस तेहि पुनि बीछी मार। तेहि पिआइअ बारुनी कहहु काह उपचार ॥ १८० ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

पहले से अनेक कष्टों में पड़े व्यक्ति को मदिरा देना उपचार नहीं; भरत इसी उपमा से राजतिलक के प्रस्ताव का विरोध करते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १८१

हितैषियों के प्रेम का आदर

चौपाइयाँ — मूल पाठ

कैकइ सुअन जोगु जग जोई। चतुर बिरंचि दीन्ह मोहि सोई ॥ दसरथ तनय राम लघु भाई। दीन्हि मोहि बिधि बादि बड़ाई ॥ तुम्ह सब कहहु कढ़ावन टीका। राय रजायसु सब कहँ नीका ॥ उतरु देउँ केहि बिधि केहि केही। कहहु सुखेन जथा रुचि जेही ॥ मोहि कुमातु समेत बिहाई। कहहु कहिहि के कीन्ह भलाई ॥ मो बिनु को सचराचर माहीं। जेहि सिय रामु प्रानप्रिय नाहीं ॥ परम हानि सब कहँ बड़ लाहू। अदिनु मोर नहि दूषन काहू ॥ संसय सील प्रेम बस अहहू। सबुइ उचित सब जो कछु कहहू ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

भरत आत्मग्लानि में कहते हैं कि दशरथपुत्र और राम के भाई की प्रतिष्ठा भी उन्हें अपने आचरण से असंगत लगती है। फिर सभा को दोष न देकर मानते हैं कि सब संकोच, शील और प्रेम के कारण उनकी भलाई की बात कह रहे हैं।

दोहा १८१

राम मातु सुठि सरलचित मो पर प्रेमु बिसेषि। कहइ सुभाय सनेह बस मोरि दीनता देखि ॥ १८१ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

वे कहते हैं कि सरल हृदय कौसल्या उनसे विशेष प्रेम करती हैं और उनकी दीन दशा देखकर स्वाभाविक स्नेह से राज्य की सलाह देती हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १८२

लोकनिंदा से अधिक राम के दुःख की चिंता

चौपाइयाँ — मूल पाठ

गुर बिबेक सागर जगु जाना। जिन्हहि बिस्व कर बदर समाना ॥ मो कहँ तिलक साज सज सोऊ। भएँ बिधि बिमुख बिमुख सबु कोऊ ॥ परिहरि रामु सीय जग माहीं। कोउ न कहिहि मोर मत नाहीं ॥ सो मैं सुनब सहब सुखु मानी। अंतहुँ कीच तहाँ जहँ पानी ॥ डरु न मोहि जग कहिहि कि पोचू। परलोकहु कर नाहिन सोचू ॥ एकइ उर बस दुसह दवारी। मोहि लगि भे सिय रामु दुखारी ॥ जीवन लाहु लखन भल पावा। सबु तजि राम चरन मनु लावा ॥ मोर जनम रघुबर बन लागी। झूठ काह पछिताउँ अभागी ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

भरत कहते हैं कि लोक उन्हें दोष देगा तो वे सह लेंगे; उन्हें अपयश या परलोक की चिंता मुख्य नहीं। हृदय की अग्नि यह है कि उनके कारण राम-सीता दुःखी हुए। लक्ष्मण का रामसेवा में जीवन लगाना उन्हें सार्थक लगता है।

दोहा १८२

आपनि दारुन दीनता कहउँ सबहि सिरु नाइ। देखें बिनु रघुनाथ पद जिय कै जरनि न जाइ ॥ १८२ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

सबको प्रणाम करके भरत कहते हैं—रघुनाथ के चरण देखे बिना मेरे हृदय की जलन नहीं मिटेगी।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १८३

राम की शरण और क्षमा पर भरोसा

चौपाइयाँ — मूल पाठ

आन उपाउ मोहि नहि सूझा। को जिय कै रघुबर बिनु बूझा ॥ एकहिं आँक इहइ मन माहीं। प्रातकाल चलिहउँ प्रभु पाहीं ॥ जद्यपि मैं अनभल अपराधी। भै मोहि कारन सकल उपाधी ॥ तदपि सरन सनमुख मोहि देखी। छमि सब करिहहिं कृपा बिसेषी ॥ सील सकुच सुठि सरल सुभाऊ। कृपा सनेह सदन रघुराऊ ॥ अरिहुक अनभल कीन्ह न रामा। मैं सिसु सेवक जद्यपि बामा ॥ तुम्ह पै पाँच मोर भल मानी। आयसु आसिष देहु सुबानी ॥ जेहिं सुनि बिनय मोहि जनु जानी। आवहिं बहुरि रामु रजधानी ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

भरत प्रातः राम के पास जाने का निश्चय बताते हैं। स्वयं को अपराधी मानते हुए भी उन्हें राम की सरलता, करुणा और शरणागतवत्सलता पर भरोसा है। वे सभा से अनुमति और आशीष चाहते हैं कि विनती सुनकर राम अयोध्या लौटें।

दोहा १८३

जद्यपि जनमु कुमातु तें मैं सठु सदा सदोस। आपन जानि न त्यागिहहिं मोहि रघुबीर भरोस ॥ १८३ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

अपनी कमी स्वीकारकर भी भरत को विश्वास है कि रघुवीर उन्हें अपना जानकर त्यागेंगे नहीं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १८४

वनयात्रा के प्रस्ताव को सबकी स्वीकृति

चौपाइयाँ — मूल पाठ

भरत बचन सब कहँ प्रिय लागे। राम सनेह सुधाँ जनु पागे ॥ लोग बियोग बिषम बिष दागे। मंत्र सबीज सुनत जनु जागे ॥ मातु सचिव गुर पुर नर नारी। सकल सनेहँ बिकल भए भारी ॥ भरतहि कहहि सराहि सराही। राम प्रेम मूरति तनु आही ॥ तात भरत अस काहे न कहहू। प्रान समान राम प्रिय अहहू ॥ जो पावँरु अपनी जड़ताई। तुम्हहि सुगाइ मातु कुटिलाई ॥ सो सठु कोटिक पुरुष समेता। बसिहि कलप सत नरक निकेता ॥ अहि अघ अवगुन नहि मनि गहई। हरइ गरल दुख दारिद दहई ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

भरत की वाणी सबको रामप्रेम में भीगी लगती है और विरह में डूबे लोगों को आशा मिलती है। सब उन्हें प्रेम की मूर्ति कहते हैं। माता के दोष को पुत्र पर थोपना अनुचित बताकर नागमणि की दोषरहितता की उपमा दी जाती है।

दोहा १८४

अवसि चलिअ बन रामु जहँ भरत मंत्रु भल कीन्ह। सोक सिंधु बूड़त सबहि तुम्ह अवलंबनु दीन्ह ॥ १८४ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

सभा कहती है—जहाँ राम हैं वहाँ अवश्य चलें; भरत के इस सुंदर निर्णय ने शोकसागर में डूबते सबको सहारा दिया।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १८५

चित्रकूट चलने की तैयारी का उत्साह

चौपाइयाँ — मूल पाठ

भा सब कें मन मोदु न थोरा। जनु घन धुनि सुनि चातक मोरा ॥ चलत प्रात लखि निरनउ नीके। भरतु प्रानप्रिय भे सबही के ॥ मुनिहि बंदि भरतहि सिरु नाई। चले सकल घर बिदा कराई ॥ धन्य भरत जीवनु जग माहीं। सीलु सनेहु सराहत जाहीं ॥ कहहि परसपर भा बड़ काजू। सकल चलै कर साजहिं साजू ॥ जेहि राखहिं रहु घर रखवारी। सो जानइ जनु गरदनि मारी ॥ कोउ कह रहन कहिअ नहिं काहू। को न चहइ जग जीवन लाहू ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

अगली सुबह चलने का निर्णय सुनकर सबके मन में आनंद है। लोग गुरु और भरत को प्रणाम करके यात्रा की तैयारी करते हैं। किसी को घर की रखवाली के लिए रुकना भी कठिन लगता है, क्योंकि सब रामदर्शन चाहते हैं।

दोहा १८५

जरउ सो संपति सदन सुखु सुहद मातु पितु भाइ। सनमुख होत जो राम पद करै न सहस सहाइ ॥ १८५ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

लोग भक्ति की उत्कंठा में कहते हैं कि रामचरणों की ओर जाने में सहायक न बने तो संपत्ति और सांसारिक सुविधा व्यर्थ है।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १८६

भरत की उत्तरदायी व्यवस्था

चौपाइयाँ — मूल पाठ

घर घर साजहिं बाहन नाना। हरषु हृदयँ परभात पयाना ॥ भरत जाइ घर कीन्ह बिचारू। नगरु बाजि गज भवन भँडारू ॥ संपति सब रघुपति कै आही। जौ बिनु जतन चलौं तजि ताही ॥ तौ परिनाम न मोरि भलाई। पाप सिरोमनि साइँ दोहाई ॥ करइ स्वामि हित सेवकु सोई। दूषन कोटि देइ किन कोई ॥ अस बिचारि सुचि सेवक बोले। जे सपनेहुँ निज धरम न डोले ॥ कहि सबु मरमु धरमु भल भाषा। जो जेहि लायक सो तेहिं राखा ॥ करि सबु जतनु राखि रखवारे। राम मातु पहिं भरतु सिधारे ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

भरत सोचते हैं कि नगर, राजभवन और सारी संपत्ति राम की है; बिना सुरक्षा छोड़ना सेवा नहीं होगा। वे विश्वस्त, धर्मनिष्ठ सेवकों को उपयुक्त दायित्व देकर रखवाली सुनिश्चित करते हैं और फिर माताओं के पास जाते हैं।

दोहा १८६

आरत जननी जानि सब भरत सनेह सुजान। कहेउ बनावन पालकीं सजन सुखासन जान ॥ १८६ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

माताओं को शोक से दुर्बल जानकर भरत उनके लिए पालकियाँ और आरामदायक सवारियाँ तैयार कराने को कहते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १८७

राम के वन में ही अभिषेक की तैयारी

चौपाइयाँ — मूल पाठ

चक्क चक्कि जिमि पुर नर नारी। चहत प्रात उर आरत भारी ॥ जागत सब निसि भयउ बिहाना। भरत बोलाए सचिव सुजाना ॥ कहेउ लेहु सबु तिलक समाजू। बनहिं देब मुनि रामहिं राजू ॥ बेगि चलहु सुनि सचिव जोहारे। तुरत तुरग रथ नाग सँवारे ॥ अरुंधती अरु अगिनि समाऊ। रथ चढ़ि चले प्रथम मुनिराऊ ॥ बिप्र बृंद चढ़ि बाहन नाना। चले सकल तप तेज निधाना ॥ नगर लोग सब सजि सजि जाना। चित्रकूट कहँ कीन्ह पयाना ॥ सिबिका सुभग न जाहिं बखानी। चढ़ि चढ़ि चलत भई सब रानी ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

रातभर जागे लोग सुबह यात्रा को तैयार हैं। भरत मंत्रियों से अभिषेक का सामान भी लेने को कहते हैं कि वन में ही राम को राज्य सौंपेंगे। वसिष्ठ अरुंधती सहित, ब्राह्मण, नगरवासी और रानियाँ सवारियों पर चल पड़ते हैं।

दोहा १८७

सौंपि नगर सुचि सेवकनि सादर सकल चलाइ। सुमिरि राम सिय चरन तब चले भरत दोउ भाइ ॥ १८७ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

नगर विश्वस्त सेवकों को सौंपकर और सबकी यात्रा सम्मानपूर्वक शुरू कराकर भरत-शत्रुघ्न सीता-राम के चरण स्मरण करते हुए चलते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १८८

माता के आग्रह से भरत का रथ पर चढ़ना

चौपाइयाँ — मूल पाठ

राम दरस बस सब नर नारी। जनु करि करिनि चले तकि बारी ॥ बन सिय रामु समुझि मन माहीं। सानुज भरत पयादेहिं जाहीं ॥ देखि सनेहु लोग अनुरागे। उतरि चले हय गय रथ त्यागे ॥ जाइ समीप राखि निज डोली। राम मातु मृदु बानी बोली ॥ तात चढ़हु रथ बलि महतारी। होइहि प्रिय परिवारु दुखारी ॥ तुम्हरें चलत चलिहि सबु लोगू। सकल सोक कृस नहिं मग जोगू ॥ सिर धरि बचन चरन सिरु नाई। रथ चढ़ि चलत भए दोउ भाई ॥ तमसा प्रथम दिवस करि बासू। दूसर गोमति तीर निवासू ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

राम-सीता के वनकष्ट सोचकर भरत-शत्रुघ्न पैदल चलते हैं; उन्हें देखकर लोग भी सवारियाँ छोड़ देते हैं। कौसल्या सबकी दुर्बलता बताकर भरत को रथ लेने को कहती हैं। वे आज्ञा मानते हैं; पहले तमसा, फिर गोमती तट पर पड़ाव होता है।

दोहा १८८

पय अहार फल असन एक निसि भोजन एक लोग। करत राम हित नेम ब्रत परिहरि भूषन भोग ॥ १८८ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

लोग भोग-आभूषण छोड़कर राम के हित में नियम रखते हैं—कोई दूध, कोई फल और कोई एक समय भोजन करता है।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १८९

सेना देखकर निषादराज की आशंका

चौपाइयाँ — मूल पाठ

सई तीर बसि चले बिहाने। सृंगबेरपुर सब निअराने ॥ समाचार सब सुने निषादा। हृदयँ बिचार करइ सबिषादा ॥ कारन कवन भरतु बन जाहीं। है कछु कपट भाउ मन माहीं ॥ जौं पै जियँ न होति कुटिलाई। तौ कत लीन्ह संग कटकाई ॥ जानहिं सानुज रामहि मारी। करउँ अकंटक राजु सुखारी ॥ भरत न राजनीति उर आनी। तब कलंकु अब जीवन हानी ॥ सकल सुरासुर जुरहिं जुझारा। रामहि समर न जीतनिहारा ॥ का आचरजु भरतु अस करहीं। नहिं बिष बेलि अमिअ फल फरहीं ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

शृंगवेरपुर के निकट भरत की सेना आने का समाचार सुनकर गुह का मन शंका करता है। बिना कारण जाने वे इसे राम के लिए खतरा समझ बैठते हैं और सोचना शुरू करते हैं कि कहीं राज्य के लिए अनिष्ट का उद्देश्य न हो।

दोहा १८९

अस बिचारि गुहँ ग्याति सन कहेउ सजग सब होहु। हथवाँसहु बोरहु तरनि कीजिअ घाटारोहु ॥ १८९ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

इसी आशंका में गुह अपने जनों को सावधान होकर नावें कब्जे में लेने, जरूरत पर डुबाने और घाट रोकने की तैयारी कहते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १९०

राम की रक्षा के लिए गुह का संकल्प

चौपाइयाँ — मूल पाठ

होहु सँजोइल रोकहु घाटा। ठाटहु सकल मरै के ठाटा ॥ सनमुख लोह भरत सन लेऊँ। जिअत न सुरसरि उतरन देऊँ ॥ समर मरनु पुनि सुरसरि तीरा। राम काजु छनभंगु सरीरा ॥ भरत भाइ नृपु मै जन नीचू। बड़ें भाग असि पाइअ मीचू ॥ स्वामि काज करिहउँ रन रारी। जस धवलिहउँ भुवन दस चारी ॥ तजउँ प्रान रघुनाथ निहोरें। दुहूँ हाथ मुद मोदक मोरें ॥ साधु समाज न जाकर लेखा। राम भगत महुँ जासु न रेखा ॥ जायँ जिअत जग सो महि भारू। जननी जौबन बिटप कुठारू ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

गुह युद्ध करके भरत को गंगा पार न जाने देने का दृढ़ संकल्प करते हैं। वे शरीर को क्षणभंगुर और रामकार्य में प्राण देना सौभाग्य मानते हैं। उनके उत्साह के पीछे रामभक्ति है, किंतु भरत के उद्देश्य की जानकारी अभी अधूरी है।

दोहा १९०

बिगत बिषाद निषादपति सबहि बढ़ाइ उछाहु। सुमिरि राम मागेउ तुरत तरकस धनुष सनाहु ॥ १९० ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

गुह शोक हटाकर सबमें उत्साह भरते हैं और राम का स्मरण कर तरकस, धनुष तथा कवच मँगाते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १९१

निषाद वीरों की युद्ध-तैयारी

चौपाइयाँ — मूल पाठ

बेगहु भाइहु सजहु सँजोऊ। सुनि रजाइ कदराइ न कोऊ ॥ भलेहिं नाथ सब कहहिं सहरषा। एकहिं एक बढ़ावइ करषा ॥ चले निषाद जोहारि जोहारी। सूर सकल रन रूचइ रारी ॥ सुमिरि राम पद पंकज पनहीं। भाथीं बाँधि चढ़ाइन्हि धनहीं ॥ अँगरी पहिरि कूँड़ि सिर धरहीं। फरसा बाँस सेल सम करहीं ॥ एक कुसल अति ओड़न खाँड़े। कूदहि गगन मनहुँ छिति छाँड़े ॥ निज निज साजु समाजु बनाई। गुह राउतहि जोहारे जाई ॥ देखि सुभट सब लायक जाने। लै लै नाम सकल सनमाने ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

गुह की आज्ञा सुनकर निषाद योद्धा उत्साह से सजते हैं। वे अस्त्र-शस्त्र, रक्षा-सामग्री और धनुष लेकर स्वामी को प्रणाम करते हैं। गुह उनकी योग्यता देखकर नाम लेकर सम्मान और प्रोत्साहन देते हैं।

दोहा १९१

भाइहु लावहु धोख जनि आजु काज बड़ मोहि। सुनि सरोष बोले सुभट बीर अधीर न होहि ॥ १९१ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

गुह कहते हैं कि आज उनका बड़ा काम है, धोखा न हो; वीर उत्तर देते हैं कि अधीर न हों।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १९२

बिना समझे युद्ध न करने का विवेक

चौपाइयाँ — मूल पाठ

राम प्रताप नाथ बल तोरे। करहिं कटकु बिनु भट बिनु घोरे ॥ जीवत पाउ न पाछें धरहीं। रुंड मुंडमय मेदिनि करहीं ॥ दीख निषादनाथ भल टोलू। कहेउ बजाउ जुझाऊ ढोलू ॥ एतना कहत छींक भइ बाँए। कहेउ सगुनिअन्ह खेत सुहाए ॥ बूढ़ु एकु कह सगुन बिचारी। भरतहि मिलिअ न होइहि रारी ॥ रामहि भरतु मनावन जाहीं। सगुन कहइ अस बिग्रहु नाहीं ॥ सुनि गुह कहइ नीक कह बूढ़ा। सहसा करि पछिताहिं बिमूढ़ा ॥ भरत सुभाउ सीलु बिनु बूझें। बड़ि हित हानि जानि बिनु जूझें ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

युद्ध के उत्साह के बीच एक वृद्ध कहता है कि भरत राम को मनाने आ रहे हैं। गुह इस बात को उचित मानते हैं; बिना स्वभाव और उद्देश्य समझे जल्दबाजी में लड़ने से हितहानि और पछतावा हो सकता है।

दोहा १९२

गहहु घाट भट समिटि सब लेउँ मरम मिलि जाइ। बूझि मित्र अरि मध्य गति तस तब करिहउँ आइ ॥ १९२ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

वे योद्धाओं को घाट पर सँभलकर रहने को कहते हैं और स्वयं मिलकर मित्रता, शत्रुता या तटस्थता का वास्तविक भाव जानने जाते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १९३

भरत और गुह का प्रेममय आलिंगन

चौपाइयाँ — मूल पाठ

लखन सनेहु सुभायँ सुहाएँ। बैरु प्रीति नहिं दुरइँ दुराएँ ॥ अस कहि भेंट सँजोवन लागे। कंद मूल फल खग मृग मागे ॥ मीन पीन पाठीन पुराने। भरि भरि भार कहारन्ह आने ॥ मिलन साजु सजि मिलन सिधाए। मंगल मूल सगुन सुभ पाए ॥ देखि दूरि तें कहि निज नामू। कीन्ह मुनीसहि दंड प्रनामू ॥ जानि रामप्रिय दीन्हि असीसा। भरतहि कहेउ बुझाइ मुनीसा ॥ राम सखा सुनि संदनु त्यागा। चले उतरि उमगत अनुरागा ॥ गाउँ जाति गुहँ नाउँ सुनाई। कीन्ह जोहारु माथ महि लाई ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

गुह भेंट की सामग्री लेकर मिलने चलते हैं और पहले वसिष्ठ को प्रणाम करते हैं। गुरु उन्हें राम का प्रिय मित्र बताते हैं। यह सुनकर भरत रथ से उतरते हैं; गुह अपना परिचय देकर भूमि पर झुकते हैं।

दोहा १९३

करत दंडवत देखि तेहि भरत लीन्ह उर लाइ। मनहुँ लखन सन भेंट भइ प्रेम न हृदयँ समाइ ॥ १९३ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

भरत उन्हें उठाकर ऐसे हृदय से लगाते हैं मानो लक्ष्मण से मिल रहे हों; उनका प्रेम हृदय में समाता नहीं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १९४

भक्ति के आगे सामाजिक दूरी का टूटना

चौपाइयाँ — मूल पाठ

भेंटत भरतु ताहि अति प्रीती। लोग सिहाहिं प्रेम कै रीती ॥ धन्य धन्य धुनि मंगल मूला। सुर सराहि तेहि बरिसहिं फूला ॥ लोक बेद सब भाँतिहिं नीचा। जासु छाँह छुइ लेइअ सींचा ॥ तेहि भरि अंक राम लघु भ्राता। मिलत पुलक परिपूरित गाता ॥ राम राम कहि जे जमुहाहीं। तिन्हहि न पाप पुंज समुहाहीं ॥ यह तौ राम लाइ उर लीन्हा। कुल समेत जगु पावन कीन्हा ॥ करमनास जलु सुरसरि परई। तेहि को कहहु सीस नहिं धरई ॥ उलटा नामु जपत जगु जाना। बालमीकि भए ब्रह्म समाना ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

भरत और गुह का आलिंगन देखकर लोग धन्य कहते और देवता पुष्प बरसाते हैं। कवि तत्कालीन छुआछूत और सामाजिक हीनता की धारणाओं का उल्लेख करके दिखाते हैं कि राम का अपनापन उन्हें पार करता है; नाममहिमा में कर्मनाशा और वाल्मीकि की उपमाएँ आती हैं।

दोहा १९४

स्वपच सबर खस जमन जड़ पावँर कोल किरात। रामु कहत पावन परम होत भुवन बिख्यात ॥ १९४ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

विभिन्न उपेक्षित समूहों का उल्लेख करते हुए कवि कहते हैं कि रामनाम सबको पवित्र करता है; जन्म से अधिक भक्ति की महिमा है।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १९५

गुह का विनय और कृतज्ञता

चौपाइयाँ — मूल पाठ

नहिं अचिरजु जुग जुग चलि आई। केहि न दीन्हि रघुबीर बड़ाई ॥ राम नाम महिमा सुर कहहीं। सुनि सुनि अवधलोग सुखु लहहीं ॥ रामसखहि मिलि भरत सप्रेमा। पूँछी कुसल सुमंगल खेमा ॥ देखि भरत कर सील सनेहू। भा निषाद तेहि समय बिदेहू ॥ सकुच सनेहु मोदु मन बाढ़ा। भरतहि चितवत एकटक ठाढ़ा ॥ धरि धीरजु पद बंदि बहोरी। बिनय सप्रेम करत कर जोरी ॥ कुसल मूल पद पंकज पेखी। मैं तिहुँ काल कुसल निज लेखी ॥ अब प्रभु परम अनुग्रह तोरें। सहित कोटि कुल मंगल मोरें ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

देवता रामनाम की महिमा कहते हैं और अवधवासी आनंद लेते हैं। भरत गुह की कुशल पूछते हैं। उनके शील और स्नेह से गुह भावविह्वल होकर कहते हैं कि प्रभु के दर्शन और अनुग्रह से उनका तथा परिवार का मंगल है।

दोहा १९५

समुझि मोरि करतूति कुलु प्रभु महिमा जियँ जोइ। जो न भजइ रघुबीर पद जग बिधि बंचित सोइ ॥ १९५ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

गुह अपनी पूर्व स्थिति और प्रभु की महिमा स्मरण कर कहते हैं कि ऐसे रघुवीर के चरण न भजना बड़ा दुर्भाग्य होगा।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १९६

शत्रुघ्न, माताओं और नगरवासियों से मिलन

चौपाइयाँ — मूल पाठ

कपटी कायर कुमति कुजाती। लोक बेद बाहेर सब भाँती ॥ राम कीन्ह आपन जबही तें। भयउँ भुवन भूषन तबही तें ॥ देखि प्रीति सुनि बिनय सुहाई। मिलेउ बहोरि भरत लघु भाई ॥ कहि निषाद निज नाम सुबानीं। सादर सकल जोहारीं रानीं ॥ जानि लखन सम देहिं असीसा। जिअहु सुखी सय लाख बरीसा ॥ निरखि निषादु नगर नर नारी। भए सुखी जनु लखनु निहारी ॥ कहहिं लहेउ एहिं जीवन लाहू। भेंटेउ रामभद्र भरि बाहू ॥ सुनि निषादु निज भाग बड़ाई। प्रमुदित मन लइ चलेउ लेवाई ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

गुह कहते हैं कि राम ने अपनाकर उन्हें सम्मान दिया। शत्रुघ्न भी उनसे मिलते हैं। रानियाँ उन्हें लक्ष्मण समान मानकर आशीर्वाद देती हैं और नगरवासी देखकर सुख पाते हैं। गुह सबको आदरपूर्वक ठहराने ले चलते हैं।

दोहा १९६

सनकारे सेवक सकल चले स्वामि रुख पाइ। घर तरु तर सर बाग बन बास बनाएन्हि जाइ ॥ १९६ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

स्वामी का संकेत पाकर सेवक घरों, वृक्षों के नीचे, सरोवरों, बागों और वन में सबके लिए पड़ाव बनाते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १९७

गंगा तट पर भरत की प्रेम-याचना

चौपाइयाँ — मूल पाठ

सृंगबेरपुर भरत दीख जब। भे सनेहँ सब अंग सिथिल तब ॥ सोहत दिएँ निषादहि लागू। जनु तनु धरें बिनय अनुरागू ॥ एहि बिधि भरत सेनु सबु संगा। दीखि जाइ जग पावनि गंगा ॥ रामघाट कहँ कीन्ह प्रनामू। भा मनु मगनु मिले जनु रामू ॥ करहिं प्रनाम नगर नर नारी। मुदित ब्रह्ममय बारि निहारी ॥ करि मज्जनु मागहिं कर जोरी। रामचंद्र पद प्रीति न थोरी ॥ भरत कहेउ सुरसरि तव रेनू। सकल सुखद सेवक सुरधेनू ॥ जोरि पानि बर मागउँ एहू। सीय राम पद सहज सनेहू ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

शृंगवेरपुर और रामघाट देखकर भरत का हृदय प्रेम से शिथिल होता है। सब गंगा को प्रणाम करके स्नान करते और रामचरणों में अनुराग माँगते हैं। भरत गंगा की रज को भक्तों के लिए कामधेनु समान हितकारी कहते हैं।

दोहा १९७

एहि बिधि मज्जनु भरतु करि गुर अनुसासन पाइ। मातु नहानीं जानि सब डेरा चले लवाइ ॥ १९७ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

भरत स्नान करके गुरु की आज्ञा लेते हैं और सभी माताओं का स्नान पूरा जानकर उन्हें पड़ाव तक पहुँचाते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १९८

राम की विश्राम-भूमि के दर्शन

चौपाइयाँ — मूल पाठ

जहँ तहँ लोगन्ह डेरा कीन्हा। भरत सोधु सबही कर लीन्हा ॥ सुर सेवा करि आयसु पाई। राम मातु पहिं गे दोउ भाई ॥ चरन चाँपि कहि कहि मृदु बानी। जननीं सकल भरत सनमानी ॥ भाइहि सौंपि मातु सेवकाई। आपु निषादहि लीन्ह बोलाई ॥ चले सखा कर सों कर जोरें। सिथिल सरीर सनेह न थोरें ॥ पूँछत सखहि सो ठाउँ देखाऊ। नेकु नयन मन जरनि जुड़ाऊ ॥ जहँ सिय रामु लखनु निसि सोए। कहत भरे जल लोचन कोए ॥ भरत बचन सुनि भयउ बिषादू। तुरत तहाँ लइ गयउ निषादू ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

भरत सबके ठहरने का समाचार लेते, माताओं के चरण दबाते और सम्मान करते हैं। उनकी सेवा शत्रुघ्न को सौंपकर गुह से वह स्थान दिखाने को कहते हैं जहाँ राम-सीता-लक्ष्मण रात सोए थे। दोनों मित्र हाथ मिलाकर वहाँ जाते हैं।

दोहा १९८

जहँ सिंसुपा पुनीत तर रघुबर किय बिश्रामु। अति सनेहँ सादर भरत कीन्हेउ दंड प्रनामु ॥ १९८ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

जिस पवित्र शिंशपा वृक्ष के नीचे राम ने विश्राम किया था, भरत वहाँ अत्यंत प्रेम और आदर से दंडवत करते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १९९

कुशशय्या और चरणरज देखकर भरत का विरह

चौपाइयाँ — मूल पाठ

कुस साँथरी निहारि सुहाई। कीन्ह प्रनामु प्रदच्छिन जाई ॥ चरन रेख रज आँखिन्ह लाई। बनइ न कहत प्रीति अधिकाई ॥ कनक बिंदु दुइ चारिक देखे। राखे सीस सीय सम लेखे ॥ सजल बिलोचन हृदयँ गलानी। कहत सखा सन बचन सुबानी ॥ श्रीहत सीय बिरहँ दुतिहीना। जथा अवध नर नारि बिलीना ॥ पिता जनक देउँ पटतर केही। करतल भोगु जोगु जग जेही ॥ ससुर भानुकुल भानु भुआलू। जेहि सिहात अमरावतिपालू ॥ प्राननाथु रघुनाथ गोसाई। जो बड़ होत सो राम बड़ाई ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

भरत कुशशय्या को प्रणाम और प्रदक्षिणा करते हैं, चरणचिह्नों की धूल आँखों से लगाते हैं। सीता के वस्त्राभूषण से गिरे स्वर्णकण पाकर उन्हें सीता समान आदर देते हैं। जनक और दशरथ के ऐश्वर्य की तुलना वनशय्या से कर व्याकुल होते हैं।

दोहा १९९

पति देवता सुतीय मनि सीय साँथरी देखि। बिहरत ह्रदउ न हहरि हर पबि तें कठिन बिसेषि ॥ १९९ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

सीता की साधारण शय्या देखकर भी हृदय न टूटने पर भरत अपने हृदय को वज्र से अधिक कठोर कहकर दुखी होते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २००

लक्ष्मण और राम के कष्ट की कल्पना

चौपाइयाँ — मूल पाठ

लालन जोगु लखन लघु लोने। भे न भाइ अस अहहिं न होने ॥ पुरजन प्रिय पितु मातु दुलारे। सिय रघुबरहि प्रानपिआरे ॥ मृदु मूरति सुकुमार सुभाऊ। तात बाउ तन लाग न काऊ ॥ ते बन सहहिं बिपति सब भाँती। निदरे कोटि कुलिस एहिं छाती ॥ राम जनमि जगु कीन्ह उजागर। रूप सील सुख सब गुन सागर ॥ पुरजन परिजन गुर पितु माता। राम सुभाउ सबहि सुखदाता ॥ बैरिउ राम बड़ाई करहीं। बोलनि मिलनि बिनय मन हरहीं ॥ सारद कोटि कोटि सत सेषा। करि न सकहिं प्रभु गुन गन लेखा ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

भरत कोमल, दुलारे और अनुपम भाई लक्ष्मण के वनकष्ट सोचते हैं। फिर राम के रूप, शील, विनय और सबको सुख देने वाले स्वभाव का स्मरण करते हैं, जिनकी प्रशंसा विरोधी भी करते हैं और गुणगणना देवता भी पूरी नहीं कर सकते।

दोहा २००

सुखस्वरुप रघुबंसमनि मंगल मोद निधान। ते सोवत कुस डासि महि बिधि गति अति बलवान ॥ २०० ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

सुखस्वरूप और मंगल-आनंद के भंडार राम धरती पर कुश बिछाकर सोए—भरत को विधि की यह विपरीत गति अत्यंत दुःख देती है।

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अयोध्याकाण्ड · सोरठा २०१

गुह द्वारा राम के भरतप्रेम का आश्वासन

चौपाइयाँ — मूल पाठ

राम सुना दुखु कान न काऊ। जीवनतरु जिमि जोगवइ राऊ ॥ पलक नयन फनि मनि जेहि भाँती। जोगवहिं जननि सकल दिन राती ॥ ते अब फिरत बिपिन पदचारी। कंद मूल फल फूल अहारी ॥ धिग कैकेई अमंगल मूला। भइसि प्रान प्रियतम प्रतिकूला ॥ मैं धिग धिग अघ उदधि अभागी। सबु उतपातु भयउ जेहि लागी ॥ कुल कलंकु करि सृजेउ बिधाताँ। साइँदोह मोहि कीन्ह कुमाताँ ॥ सुनि सप्रेम समुझाव निषादू। नाथ करिअ कत बादि बिषादू ॥ राम तुम्हहि प्रिय तुम्ह प्रिय रामहि। यह निरजोसु दोसु बिधि बामहि ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

भरत सोचते हैं कि जिन्हें माता-पिता ने प्राणवत सँभाला वे अब पैदल वन में हैं। आत्मग्लानि से भरते हैं। गुह उन्हें आश्वस्त करते हैं कि राम उनसे और वे राम से प्रिय हैं; व्यर्थ दोष और शोक न धारण करें।

छंद — मूल पाठ

बिधि बाम की करनी कठिन जेंहिं मातु कीन्ही बावरी। तेहि राति पुनि पुनि करहिं प्रभु सादर सरहना रावरी ॥ तुलसी न तुम्ह सो राम प्रीतमु कहतु हौं सौहें किएँ। परिनाम मंगल जानि अपने आनिए धीरजु हिएँ ॥
छंद का सरल हिंदी अर्थ

गुह कहते हैं कि उस रात राम ने बार-बार भरत की आदरपूर्वक प्रशंसा की। भरत जैसा प्रिय कोई नहीं; अंत का मंगल सोचकर धैर्य रखें।

सोरठा २०१

अंतरजामी रामु सकुच सप्रेम कृपायतन। चलिअ करिअ बिश्रामु यह बिचारि दृढ़ आनि मन ॥ २०१ ॥
सोरठा का सरल हिंदी अर्थ

गुह राम की अंतर्यामिता, संकोच, प्रेम और करुणा का भरोसा देकर भरत को दृढ़ मन से विश्राम के लिए चलने को कहते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २०२

गंगा पार करने की सामूहिक व्यवस्था

चौपाइयाँ — मूल पाठ

सखा बचन सुनि उर धरि धीरा। बास चले सुमिरत रघुबीरा ॥ यह सुधि पाइ नगर नर नारी। चले बिलोकन आरत भारी ॥ परदखिना करि करहिं प्रनामा। देहिं कैकइहि खोरि निकामा ॥ भरी भरि बारि बिलोचन लेंहीं। बाम बिधाताहि दूषन देहीं ॥ एक सराहहिं भरत सनेहू। कोउ कह नृपति निबाहेउ नेहू ॥ निंदहिं आपु सराहि निषादहि। को कहि सकइ बिमोह बिषादहि ॥ एहि बिधि राति लोगु सबु जागा। भा भिनुसार गुदारा लागा ॥ गुरहि सुनावँ चढ़ाइ सुहाईं। नईं नाव सब मातु चढ़ाईं ॥ दंड चारि महँ भा सबु पारा। उतरि भरत तब सबहि सँभारा ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

गुह की बात से भरत धैर्य लेकर पड़ाव लौटते हैं। नगरवासी भी राम की विश्रामभूमि देखकर भावविह्वल होते हैं। रात बीतती है; नावों से गुरु, माताओं और पूरे समाज को शीघ्र पार कराया जाता है। भरत उतरकर सबकी व्यवस्था सँभालते हैं।

दोहा २०२

प्रातक्रिया करि मातु पद बंदि गुरहि सिरु नाइ। आगें किए निषाद गन दीन्हेउ कटकु चलाइ ॥ २०२ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

प्रातःकर्म, माताओं का वंदन और गुरु को प्रणाम करके भरत निषाद मार्गदर्शकों को आगे रखते तथा यात्रा-दल चलाते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २०३

प्रयाग की ओर भरत की पदयात्रा

चौपाइयाँ — मूल पाठ

कियउ निषादनाथु अगुआईं। मातु पालकीं सकल चलाईं ॥ साथ बोलाइ भाइ लघु दीन्हा। बिप्रन्ह सहित गवनु गुर कीन्हा ॥ आपु सुरसरिहि कीन्ह प्रनामू। सुमिरे लखन सहित सिय रामू ॥ गवने भरत पयादेहिं पाए। कोतल संग जाहिं डोरिआए ॥ कहहिं सुसेवक बारहिं बारा। होइअ नाथ अस्व असवारा ॥ रामु पयादेहि पायँ सिधाए। हम कहँ रथ गज बाजि बनाए ॥ सिर भर जाउँ उचित अस मोरा। सब तें सेवक धरमु कठोरा ॥ देखि भरत गति सुनि मृदु बानी। सब सेवक गन गरहिं गलानी ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

गुह मार्गदर्शन करते हैं और माताओं-गुरु की सवारियाँ चलती हैं। भरत साथ उपलब्ध घोड़े पर बैठने का आग्रह नहीं मानते। वे कहते हैं कि राम पैदल गए, तो सेवक के लिए सुविधा लेना उचित नहीं; रामस्मरण से आगे बढ़ते हैं।

दोहा २०३

भरत तीसरे पहर कहँ कीन्ह प्रबेसु प्रयाग। कहत राम सिय राम सिय उमगि उमगि अनुराग ॥ २०३ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

दिन के तीसरे पहर भरत राम-सीता का नाम प्रेम से लेते हुए प्रयाग में प्रवेश करते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २०४

चार पुरुषार्थों से परे चरणप्रेम की याचना

चौपाइयाँ — मूल पाठ

झलका झलकत पायन्ह कैंसें। पंकज कोस ओस कन जैसें ॥ भरत पयादेहिं आए आजू। भयउ दुखित सुनि सकल समाजू ॥ खबरि लीन्ह सब लोग नहाए। कीन्ह प्रनामु त्रिबेनिहिं आए ॥ सबिधि सितासित नीर नहाने। दिए दान महिसुर सनमाने ॥ देखत स्यामल धवल हलोरे। पुलकि सरीर भरत कर जोरे ॥ सकल काम प्रद तीरथराऊ। बेद बिदित जग प्रगट प्रभाऊ ॥ मागउँ भीख त्यागि निज धरमू। आरत काह न करइ कुकरमू ॥ अस जियँ जानि सुजान सुदानी। सफल करहिं जग जाचक बानी ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

भरत के पैरों में छाले देखकर समाज दुःखी होता है। वे सबकी खबर लेकर स्नान, दान और त्रिवेणी को प्रणाम करते हैं। तीर्थराज की उदारता का स्मरण कर याचक की तरह एक अनन्य वर माँगते हैं।

दोहा २०४

अरथ न धरम न काम रुचि गति न चहउँ निरबान। जनम जनम रति राम पद यह बरदानु न आन ॥ २०४ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

भरत धन, धर्मफल, कामना या मोक्ष नहीं चाहते; जन्म-जन्म राम के चरणों में प्रेम ही उनका माँगा हुआ वर है।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २०५

त्रिवेणी की आश्वस्त करने वाली वाणी

चौपाइयाँ — मूल पाठ

जानहुँ रामु कुटिल करि मोही। लोग कहउ गुर साहिब द्रोही ॥ सीता राम चरन रति मोरें। अनुदिन बढ़उ अनुग्रह तोरें ॥ जलदु जनम भरि सुरति बिसारउ। जाचत जलु पबि पाहन डारउ ॥ चातकु रटनि घटें घटि जाई। बढ़े प्रेमु सब भाँति भलाई ॥ कनकहिं बान चढ़इ जिमि दाहें। तिमि प्रियतम पद नेम निबाहें ॥ भरत बचन सुनि माझ त्रिबेनी। भइ मृदु बानि सुमंगल देनी ॥ तात भरत तुम्ह सब बिधि साधू। राम चरन अनुराग अगाधू ॥ बाद गलानि करहु मन माहीं। तुम्ह सम रामहि कोउ प्रिय नाहीं ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

भरत कहते हैं कि लोकनिंदा या राम द्वारा गलत समझे जाने पर भी उनका चरणप्रेम बढ़ता रहे। चातक की अटल पुकार और तपे सोने की उपमा देते हैं। कथा में त्रिवेणी की वाणी उन्हें साधु और राम का अत्यंत प्रिय बताती है।

दोहा २०५

तनु पुलकेउ हियँ हरषु सुनि बेनि बचन अनुकूल। भरत धन्य कहि धन्य सुर हरषित बरषहिं फूल ॥ २०५ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

अनुकूल वाणी सुनकर भरत पुलकित और प्रसन्न होते हैं; देवता उन्हें धन्य कहकर पुष्प बरसाते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २०६

भरद्वाज आश्रम में भरत

चौपाइयाँ — मूल पाठ

प्रमुदित तीरथराज निवासी। बैखानस बटु गृही उदासी ॥ कहहिं परसपर मिलि दस पाँचा। भरत सनेह सीलु सुचि साँचा ॥ सुनत राम गुन ग्राम सुहाए। भरद्वाज मुनिबर पहिं आए ॥ दंड प्रनामु करत मुनि देखे। मूरतिमंत भाग्य निज लेखे ॥ धाइ उठाइ लाइ उर लीन्हे। दीन्हि असीस कृतारथ कीन्हे ॥ आसनु दीन्ह नाइ सिरु बैठे। चहत सकुच गृहँ जनु भजि पैठे ॥ मुनि पूँछब कछु यह बड़ सोचू। बोले रिषि लखि सीलु सँकोचू ॥ सुनहु भरत हम सब सुधि पाई। बिधि करतब पर किछु न बसाई ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

प्रयागवासी भरत का शील और सच्चा स्नेह सराहते हैं। वे भरद्वाज को प्रणाम करते हैं; मुनि उठाकर गले लगाते और आसन देते हैं। भरत संकोच में हैं; मुनि सारी घटना जानने की बात कहते हैं।

दोहा २०६

तुम्ह गलानि जियँ जनि करहु समुझी मातु करतूति। तात कैकइहि दोसु नहिं गई गिरा मति धूति ॥ २०६ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

मुनि भरत को माता की करनी से आत्मग्लानि न रखने को कहते हैं और कथा की देवप्रेरित बुद्धिभ्रांति का संदर्भ देते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २०७

भरत की निष्कपटता का समर्थन

चौपाइयाँ — मूल पाठ

यहउ कहत भल कहिहि न कोऊ। लोकु बेद बुध संमत दोऊ ॥ तात तुम्हार बिमल जसु गाई। पाइहि लोकउ बेदु बड़ाई ॥ लोक बेद संमत सबु कहई। जेहि पितु देइ राजु सो लहई ॥ राउ सत्यब्रत तुम्हहि बोलाई। देत राजु सुखु धरमु बड़ाई ॥ राम गवनु बन अनरथ मूला। जो सुनि सकल बिस्व भइ सूला ॥ सो भावी बस रानि अयानी। करि कुचालि अंतहुँ पछितानी ॥ तहँउँ तुम्हार अलप अपराधू। कहै सो अधम अयान असाधू ॥ करतेहु राजु त तुम्हहि न दोषू। रामहि होत सुनत संतोषू ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

भरद्वाज कहते हैं कि भरत को दोष देना उचित नहीं। पिता द्वारा राज्य दिए जाने पर उसका दायित्व लेने में भी दोष न होता। वनवास के अनर्थ में भरत की सम्मति नहीं थी; अब उनका राम को मनाने जाना विशेष सुंदर निर्णय है।

दोहा २०७

अब अति कीन्हेहु भरत भल तुम्हहि उचित मत एहु। सकल सुमंगल मूल जग रघुबर चरन सनेहु ॥ २०७ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

मुनि कहते हैं—भरत ने बहुत अच्छा किया; रामचरणों का प्रेम ही संसार के समस्त मंगलों का मूल है।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २०८

भरत: मानो रामस्नेह ने देह धारण की हो

चौपाइयाँ — मूल पाठ

सो तुम्हार धनु जीवनु प्राना। भूरिभाग को तुम्हहि समाना ॥ यह तम्हार आचरजु न ताता। दसरथ सुअन राम प्रिय भ्राता ॥ सुनहु भरत रघुबर मन माहीं। पेम पात्रु तुम्ह सम कोउ नाहीं ॥ लखन राम सीतहि अति प्रीती। निसि सब तुम्हहि सराहत बीती ॥ जाना मरमु नहात प्रयागा। मगन होहिं तुम्हरें अनुरागा ॥ तुम्ह पर अस सनेहु रघुबर कें। सुख जीवन जग जस जड़ नर कें ॥ यह न अधिक रघुबीर बड़ाई। प्रनत कुटुंब पाल रघुराई ॥ तुम्ह तौ भरत मोर मत एहू। धरें देह जनु राम सनेहू ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

मुनि कहते हैं कि चरणप्रेम भरत का धन, जीवन और प्राण है। राम-सीता-लक्ष्मण उस रात उनकी प्रशंसा करते रहे थे। राम का भरत के प्रति गहरा स्नेह बताकर वे उन्हें रामप्रेम का साकार रूप मानते हैं।

दोहा २०८

तुम्ह कहँ भरत कलंक यह हम सब कहँ उपदेसु। राम भगति रस सिद्धि हित भा यह समउ गनेसु ॥ २०८ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

भरत जिसे अपना कलंक मान रहे हैं, वह सबके लिए भक्ति की शिक्षा बन गया; यह अवसर रामप्रेम को सिद्ध करने वाला है।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २०९

भरत के यश का चंद्रमा-रूपक

चौपाइयाँ — मूल पाठ

नव बिधु बिमल तात जसु तोरा। रघुबर किंकर कुमुद चकोरा ॥ उदित सदा अँथइहि कबहूँ ना। घटिहि न जग नभ दिन दिन दूना ॥ कोक तिलोक प्रीति अति करिही। प्रभु प्रताप रबि छबिहि न हरिही ॥ निसि दिन सुखद सदा सब काहू। ग्रसिहि न कैकइ करतबु राहू ॥ पूरन राम सुपेम पियूषा। गुर अवमान दोष नहिं दूषा ॥ राम भगत अब अमिअँ अघाहूँ। कीन्हेहु सुलभ सुधा बसुधाहूँ ॥ भूप भगीरथ सुरसरि आनी। सुमिरत सकल सुंमगल खानी ॥ दसरथ गुन गन बरनि न जाहीं। अधिकु कहा जेहि सम जग नाहीं ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

भरद्वाज भरत के निर्मल यश को ऐसे चंद्रमा से तुलना देते हैं जो बढ़ता रहेगा, कैकेयी के कर्मरूपी राहु से ढकेगा नहीं और रामप्रेम से पूर्ण रहेगा। फिर दशरथ की महिमा स्मरण करते हैं, जिनके प्रेमवश प्रभु ने अवतार लिया।

दोहा २०९

जासु सनेह सकोच बस राम प्रगट भए आइ ॥ जे हर हिय नयननि कबहुँ निरखे नहीं अघाइ ॥ २०९ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

जिन राम को शिव हृदय और नेत्रों से निहारकर भी तृप्त नहीं होते, वे दशरथ के प्रेम-संकोच से पुत्ररूप में प्रकट हुए।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २१०

भरद्वाज द्वारा भरतदर्शन का गौरव

चौपाइयाँ — मूल पाठ

कीरति बिधु तुम्ह कीन्ह अनूपा। जहँ बस राम पेम मृगरूपा ॥ तात गलानि करहु जियँ जाएँ। डरहु दरिद्रहि पारसु पाएँ ॥ ॥ सुनहु भरत हम झूठ न कहहीं। उदासीन तापस बन रहहीं ॥ सब साधन कर सुफल सुहावा। लखन राम सिय दरसनु पावा ॥ तेहि फल कर फलु दरस तुम्हारा। सहित पयाग सुभाग हमारा ॥ भरत धन्य तुम्ह जसु जगु जयऊ। कहि अस पेम मगन पुनि भयऊ ॥ सुनि मुनि बचन सभासद हरषे। साधु सराहि सुमन सुर बरषे ॥ धन्य धन्य धुनि गगन पयागा। सुनि सुनि भरतु मगन अनुरागा ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

मुनि कहते हैं कि भरत को रामप्रेम मिल जाने पर निर्धनता का भय करने जैसी निरर्थक ग्लानि नहीं करनी चाहिए। राम-सीता-लक्ष्मण के दर्शन साधना का फल थे और भरत का दर्शन उस फल का फल है। सभा उनकी प्रशंसा करती है।

दोहा २१०

पुलक गात हियँ रामु सिय सजल सरोरुह नैन। करि प्रनामु मुनि मंडलिहि बोले गदगद बैन ॥ २१० ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

हृदय में राम-सीता, शरीर में रोमांच और आँखों में आँसू लेकर भरत मुनिमंडली को प्रणाम कर गद्गद वाणी में बोलते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २११

भरत के दुःख का वास्तविक कारण

चौपाइयाँ — मूल पाठ

मुनि समाजु अरु तीरथराजू। साँचिहुँ सपथ अघाइ अकाजू ॥ एहिं थल जौं किछु कहिअ बनाई। एहि सम अधिक न अघ अधमाई ॥ तुम्ह सर्बग्य कहउँ सतिभाऊ। उर अंतरजामी रघुराऊ ॥ मोहि न मातु करतब कर सोचू। नहिं दुखु जियँ जगु जानिहि पोचू ॥ नाहिन डरु बिगरिहि परलोकू। पितहु मरन कर मोहि न सोकू ॥ सुकृत सुजस भरि भुअन सुहाए। लछिमन राम सरिस सुत पाए ॥ राम बिरहँ तजि तनु छनभंगू। भूप सोच कर कवन प्रसंगू ॥ राम लखन सिय बिनु पग पनहीं। करि मुनि बेष फिरहिं बन बनही ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

भरत कहते हैं कि मुनिसभा और तीर्थराज में बनाकर बोलना अनुचित होगा। उन्हें माता की करनी, अपनी लोकनिंदा या पिता की शुभ मृत्यु से बढ़कर पीड़ा यह है कि राम, लक्ष्मण और सीता कोमल पैरों से वन में घूम रहे हैं।

दोहा २११

अजिन बसन फल असन महि सयन डासि कुस पात। बसि तरु तर नित सहत हिम आतप बरषा बात ॥ २११ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

तीनों मुनिवेश, फलाहार और कुश-पत्तों की धरती-शय्या अपनाकर वृक्षों के नीचे शीत, धूप, वर्षा और हवा सह रहे हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २१२

राम की वापसी ही दुःख का उपाय

चौपाइयाँ — मूल पाठ

एहि दुख दाहँ दहइ दिन छाती। भूख न बासर नीद न राती ॥ एहि कुरोग कर औषधु नाहीं। सोधेउँ सकल बिस्व मन माहीं ॥ मातु कुमत बढ़ई अघ मूला। तेहिं हमार हित कीन्ह बँसूला ॥ कलि कुकाठ कर कीन्ह कुजंत्रू। गाड़ि अवधि पढ़ि कठिन कुमंत्रु ॥ मोहि लगि यहु कुठाटु तेहिं ठाटा। घालेसि सब जगु बारहबाटा ॥ मिटइ कुजोगु राम फिरि आएँ। बसइ अवध नहिं आन उपाएँ ॥ भरत बचन सुनि मुनि सुखु पाई। सबहिं कीन्ह बहु भाँति बड़ाई ॥ तात करहु जनि सोचु बिसेषी। सब दुखु मिटहि राम पग देखी ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

भरत कहते हैं कि इसी चिंता से दिन में भूख और रात में नींद नहीं आती। माता के कुमतिपूर्ण उपाय को वे सबके अनर्थ का कारण बताते हैं। उन्हें लगता है कि राम के लौटने पर ही अयोध्या की स्थिति सँभलेगी। मुनि उन्हें धैर्य देते हैं।

दोहा २१२

करि प्रबोध मुनिबर कहेउ अतिथि पेमप्रिय होहु। कंद मूल फल फूल हम देहिं लेहु करि छोहु ॥ २१२ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

भरद्वाज समझाकर भरत से प्रेमपूर्वक आतिथ्य स्वीकार करने और आश्रम के फल-मूल आदि ग्रहण करने का आग्रह करते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २१३

भरद्वाज की अतिथि-सेवा का संकल्प

चौपाइयाँ — मूल पाठ

सुनि मुनि बचन भरत हिँय सोचू। भयउ कुअवसर कठिन सँकोचू ॥ जानि गरुइ गुर गिरा बहोरी। चरन बंदि बोले कर जोरी ॥ सिर धरि आयसु करिअ तुम्हारा। परम धरम यहु नाथ हमारा ॥ भरत बचन मुनिबर मन भाए। सुचि सेवक सिष निकट बोलाए ॥ चाहिए कीन्ह भरत पहुनाई। कंद मूल फल आनहु जाई ॥ भलेहीं नाथ कहि तिन्ह सिर नाए। प्रमुदित निज निज काज सिधाए ॥ मुनिहि सोच पाहुन बड़ नेवता। तसि पूजा चाहिअ जस देवता ॥ सुनि रिधि सिधि अनिमादिक आई। आयसु होइ सो करहिं गोसाई ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

संकोच के बावजूद भरत गुरु की आज्ञा को अपना धर्म मानकर स्वीकारते हैं। मुनि शिष्यों को भोजन-सामग्री लाने भेजते हैं। बड़े अतिथि के अनुरूप सत्कार का विचार करते ही कथा में ऋद्धि-सिद्धियाँ उनकी आज्ञा लेने उपस्थित होती हैं।

दोहा २१३

राम बिरह ब्याकुल भरतु सानुज सहित समाज। पहुनाई करि हरहु श्रम कहा मुदित मुनिराज ॥ २१३ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

मुनि कहते हैं—भाई और पूरे समाज सहित राम-विरह से व्याकुल भरत का आतिथ्य करके उनका यात्रा-श्रम मिटाओ।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २१४

तपोबल से अद्भुत आतिथ्य

चौपाइयाँ — मूल पाठ

रिधि सिधि सिर धरि मुनिबर बानी। बड़भागिनि आपुहि अनुमानी ॥ कहहिं परसपर सिधि समुदाई। अतुलित अतिथि राम लघु भाई ॥ मुनि पद बंदि करिअ सोइ आजू। होइ सुखी सब राज समाजू ॥ अस कहि रचेउ रुचिर गृह नाना। जेहि बिलोकि बिलखाहिं बिमाना ॥ भोग बिभूति भूरि भरि राखे। देखत जिन्हहि अमर अभिलाषे ॥ दासीं दास साजु सब लीन्हें। जोगवत रहहिं मनहि मनु दीन्हें ॥ सब समाजु सजि सिधि पल माहीं। जे सुख सुरपुर सपनेहुँ नाहीं ॥ प्रथमहिं बास दिए सब केही। सुंदर सुखद जथा रुचि जेही ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

ऋद्धि-सिद्धियाँ अपने को भाग्यशाली मानती हैं कि अतिथि राम के छोटे भाई हैं। वे सुंदर निवास, सेवा-सामग्री और विविध सुख-साधन रचती हैं। सबको उनकी आवश्यकता तथा रुचि के अनुसार ठहराया जाता है।

दोहा २१४

बहुरि सपरिजन भरत कहुँ रिषि अस आयसु दीन्ह। बिधि बिसमय दायकु बिभव मुनिबर तपबल कीन्ह ॥ २१४ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

मुनि फिर परिवार सहित भरत को व्यवस्था स्वीकारने को कहते हैं; कथा में यह आश्चर्यजनक वैभव उनके तपोबल से प्रकट होता है।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २१५

वैभव के बीच भरत की अनासक्ति

चौपाइयाँ — मूल पाठ

मुनि प्रभाउ जब भरत बिलोका। सब लघु लगे लोकपति लोका ॥ सुख समाजु नहिं जाइ बखानी। देखत बिरति बिसारहीं ग्यानी ॥ आसन सयन सुबसन बिताना। बन बाटिका बिहग मृग नाना ॥ सुरभि फूल फल अमिअ समाना। बिमल जलासय बिबिध बिधाना। असन पान सुच अमिअ अमी से। देखि लोग सकुचात जमी से ॥ सुर सुरभी सुरतरु सबही कें। लखि अभिलाषु सुरेस सची कें ॥ रितु बसंत बह त्रिबिध बयारी। सब कहँ सुलभ पदारथ चारी ॥ स्त्रक चंदन बनितादिक भोगा। देखि हरष बिसमय बस लोगा ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

आश्रम में सुंदर आसन, शय्या, वस्त्र, उद्यान, जीव, जलाशय और निर्मल भोजन की अपूर्व व्यवस्था है। उसे देखकर लोग आनंद और आश्चर्य अनुभव करते हैं। किंतु भरत का मन राम-विरह में है, सुविधाओं में आसक्ति नहीं बढ़ती।

दोहा २१५

संपत चकई भरतु चक मुनि आयस खेलवार ॥ तेहि निसि आश्रम पिंजराँ राखे भा भिनुसार ॥ २१५ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

संपत्ति चकवी और भरत चकवे जैसे अलग रहे; मुनि की आज्ञा से एक ही आश्रम में रात बिताकर भी वे भोगासक्त नहीं हुए।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २१६

चित्रकूट की ओर नंगे पाँव यात्रा

पारायण संकेत: मासपारायण, उन्नीसवाँ विश्राम

चौपाइयाँ — मूल पाठ

कीन्ह निमज्जनु तीरथराजा। नाइ मुनिहि सिरु सहित समाजा ॥ रिषि आयसु असीस सिर राखी। करि दंडवत बिनय बहु भाषी ॥ पथ गति कुसल साथ सब लीन्हे। चले चित्रकूटहिं चितु दीन्हें ॥ रामसखा कर दीन्हें लागू। चलत देह धरि जनु अनुरागू ॥ नहिं पद त्रान सीस नहिं छाया। पेमु नेमु ब्रतु धरमु अमाया ॥ लखन राम सिय पंथ कहानी। पूँछत सखहि कहत मृदु बानी ॥ राम बास थल बिटप बिलोकें। उर अनुराग रहत नहिं रोकैं ॥ दैखि दसा सुर बरिसहिं फूला। भइ मृदु महि मगु मंगल मूला ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

स्नान और मुनि की आज्ञा-आशीष लेकर भरत चित्रकूट चलते हैं। सिर पर छाया और पैरों में जूते नहीं; वे गुह से राम के मार्ग और पड़ाव पूछते हैं। विश्रामस्थलों को देखकर प्रेम बढ़ता है; देवता पुष्प बरसाते हैं।

दोहा २१६

किएँ जाहिं छाया जलद सुखद बहइ बर बात। तस मगु भयउ न राम कहँ जस भा भरतहि जात ॥ २१६ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

बादल छाया और पवन शीतलता देता है; कवि कहते हैं कि भरत के लिए मार्ग उतना अनुकूल हुआ जितना राम के जाते समय भी न था।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २१७

भरतप्रेम देखकर इंद्र की चिंता

चौपाइयाँ — मूल पाठ

जड़ चेतन मग जीव घनेरे। जे चितए प्रभु जिन्ह प्रभु हेरे ॥ ते सब भए परम पद जोगू। भरत दरस मेटा भव रोगू ॥ यह बड़ि बात भरत कइ नाहीं। सुमिरत जिनहि रामु मन माहीं ॥ बारक राम कहत जग जेऊ। होत तरन तारन नर तेऊ ॥ भरतु राम प्रिय पुनि लघु भ्राता। कस न होइ मगु मंगलदाता ॥ सिद्ध साधु मुनिबर अस कहहीं। भरतहि निरखि हरषु हियँ लहहीं ॥ देखि प्रभाउ सुरेसहि सोचू। जगु भल भलेहि पोच कहुँ पोचू ॥ गुर सन कहेउ करिअ प्रभु सोई। रामहि भरतहि भेंट न होई ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

कवि भरतदर्शन की कल्याणकारी महिमा बताते हैं, क्योंकि राम स्वयं उनका स्मरण करते हैं। संत उनके प्रेम से प्रसन्न हैं। इंद्र को चिंता होती है कि भरत राम को लौटा ले जाएँगे और देवकार्य रुक जाएगा; वे बृहस्पति से बाधा का उपाय चाहते हैं।

दोहा २१७

रामु सँकोची प्रेम बस भरत सपेम पयोधि। बनी बात बेगरन चहति करिअ जतनु छलु सोधि ॥ २१७ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

इंद्र कहते हैं कि राम संकोची और प्रेमवश हैं तथा भरत प्रेमसागर; छल से मिलन रोकने का उपाय सोचने का उनका अनुचित प्रस्ताव है।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २१८

बृहस्पति की छल से बचने की शिक्षा

चौपाइयाँ — मूल पाठ

बचन सुनत सुरगुरु मुसकाने। सहस्रनयन बिनु लोचन जाने ॥ मायापति सेवक सन माया। करइ त उलटि परइ सुरराया ॥ तब किछु कीन्ह राम रुख जानी। अब कुचालि करि होइहि हानी ॥ सुनु सुरेस रघुनाथ सुभाऊ। निज अपराध रिसाहिं न काऊ ॥ जो अपराधु भगत कर करई। राम रोष पावक सो जरई ॥ लोकहुँ बेद बिदित इतिहासा। यह महिमा जानहिं दुरबासा ॥ भरत सरिस को राम सनेही। जगु जप राम रामु जप जेही ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

बृहस्पति इंद्र की संकीर्ण सोच पर मुस्कराकर समझाते हैं कि मायापति के भक्त से छल उलटा पड़ेगा। राम अपने प्रति अपराध पर क्रोधित नहीं होते, पर भक्त को हानि पहुँचाना गंभीर है। भरत का रामप्रेम अद्वितीय है।

दोहा २१८

मनहुँ न आनिअ अमरपति रघुबर भगत अकाजु। अजसु लोक परलोक दुख दिन दिन सोक समाजु ॥ २१८ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

वे इंद्र से कहते हैं कि रामभक्त का अहित मन में भी न लाएँ; इससे अपयश और निरंतर दुःख ही होगा।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २१९

भक्तसेवा का महत्त्व

चौपाइयाँ — मूल पाठ

सुनु सुरेस उपदेसु हमारा। रामहि सेवकु परम पिआरा ॥ मानत सुखु सेवक सेवकाई। सेवक बैर बैरु अधिकाई ॥ जद्यपि सम नहिं राग न रोषू। गहहिं न पाप पूनु गुन दोषू ॥ करम प्रधान बिस्व करि राखा। जो जस करइ सो तस फलु चाखा ॥ तदपि करहिं सम बिषम बिहारा। भगत अभगत हृदय अनुसारा ॥ अगुन अलेप अमान एकरस। रामु सगुन भए भगत पेम बस ॥ राम सदा सेवक रुचि राखी। बेद पुरान साधु सुर साखी ॥ अस जियँ जानि तजहु कुटिलाई। करहु भरत पद प्रीति सुहाई ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

बृहस्पति कहते हैं कि प्रभु को सेवक की सेवा प्रिय है और सेवक से वैर अनुचित है। राम सम और निर्लिप्त होते हुए भी भक्त के प्रेम के अनुरूप सगुण होकर कृपा करते हैं। वे इंद्र को कपट छोड़कर भरत से प्रेम करने को कहते हैं।

दोहा २१९

राम भगत परहित निरत पर दुख दुखी दयाल। भगत सिरोमनि भरत तें जनि डरपहु सुरपाल ॥ २१९ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

परहित में लगे और परदुःख से दुःखी होने वाले दयालु भक्तश्रेष्ठ भरत से डरने की कोई आवश्यकता नहीं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २२०

इंद्र की शंका दूर, भरत यमुना तट पर

चौपाइयाँ — मूल पाठ

सत्यसंध प्रभु सुर हितकारी। भरत राम आयस अनुसारी ॥ स्वारथ बिबस बिकल तुम्ह होहू। भरत दोसु नहिं राउर मोहू ॥ सुनि सुरबर सुरगुर बर बानी। भा प्रमोदु मन मिटी गलानी ॥ बरषि प्रसून हरषि सुरराऊ। लगे सराहन भरत सुभाऊ ॥ एहि बिधि भरत चले मग जाहीं। दसा देखि मुनि सिद्ध सिहाहीं ॥ जबहिं रामु कहि लेहिं उसासा। उमगत पेमु मनहँ चहु पासा ॥ द्रवहिं बचन सुनि कुलिस पषाना। पुरजन पेमु न जाइ बखाना ॥ बीच बास करि जमुनहिं आए। निरखि नीरु लोचन जल छाए ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

बृहस्पति कहते हैं कि राम सत्यनिष्ठ और भरत उनकी आज्ञा मानने वाले हैं; दोष भरत में नहीं, इंद्र के स्वार्थमोह में है। इंद्र प्रसन्न होकर पुष्प बरसाते हैं। भरत यात्रा में रामनाम लेते हुए यमुना पहुँचते और श्याम जल देखकर रो पड़ते हैं।

दोहा २२०

रघुबर बरन बिलोकि बर बारि समेत समाज। होत मगन बारिधि बिरह चढ़े बिबेक जहाज ॥ २२० ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

राम के वर्ण जैसा सुंदर जल देखकर पूरा समाज विरहसागर में डूबने लगता है, किंतु विवेकरूपी नाव से धैर्य रखता है।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २२१

यमुना पार और राम के पड़ावों को प्रणाम

चौपाइयाँ — मूल पाठ

जमुन तीर तेहि दिन करि बासू। भयउ समय सम सबहि सुपासू ॥ रातहिं घाट घाट की तरनी। आईं अगनित जाहिं न बरनी ॥ प्रात पार भए एकहि खेंवाँ। तोषे रामसखा की सेवाँ ॥ चले नहाइ नदिहि सिर नाई। साथ निषादनाथ दोउ भाई ॥ आगें मुनिबर बाहन आछें। राजसमाज जाइ सबु पाछें ॥ तेहिं पाछें दोउ बंधु पयादें। भूषन बसन बेष सुठि सादें ॥ सेवक सुह्रद सचिवसुत साथा। सुमिरत लखनु सीय रघुनाथा ॥ जहँ जहँ राम बास बिश्रामा। तहँ तहँ करहिं सप्रेम प्रनामा ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

रात्रि में अनेक नावें जुटती हैं और प्रातः सब पार होते हैं। गुह की सेवा से सब संतुष्ट हैं। गुरु और राजसमाज आगे, सादे वेश में भरत-शत्रुघ्न पैदल पीछे चलते हैं; राम के प्रत्येक विश्रामस्थल को प्रेम से प्रणाम करते हैं।

दोहा २२१

मगबासी नर नारि सुनि धाम काम तजि धाइ। देखि सरूप सनेह सब मुदित जनम फलु पाइ ॥ २२१ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

मार्गवासी घर और काम छोड़कर दर्शन को दौड़ते हैं तथा भरत का रूप और प्रेम देखकर जीवन सफल मानते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २२२

ग्रामवधुओं का भरत को पहचानना

चौपाइयाँ — मूल पाठ

कहहिं सपेम एक एक पाहीं। रामु लखनु सखि होहिं कि नाहीं ॥ बय बपु बरन रूप सोइ आली। सीलु सनेहु सरिस सम चाली ॥ बेषु न सो सखि सीय न संगा। आगें अनी चली चतुरंगा ॥ नहिं प्रसन्न मुख मानस खेदा। सखि संदेहु होइ एहिं भेदा ॥ तासु तरक तियगन मन मानी। कहहिं सकल तेहि सम न सयानी ॥ तेहि सराहि बानी फुरि पूजी। बोली मधुर बचन तिय दूजी ॥ कहि सपेम सब कथाप्रसंगू। जेहि बिधि राम राज रस भंगू ॥ भरतहि बहुरि सराहन लागी। सील सनेह सुभाय सुभागी ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

ग्रामवधुएँ रूप की समानता से पहले राम-लक्ष्मण का अनुमान करती हैं, फिर वेश, सीता की अनुपस्थिति और सेना देखकर भेद पहचानती हैं। एक स्त्री पूरा प्रसंग बताकर भरत के शील, स्नेह और त्याग की प्रशंसा करती है।

दोहा २२२

चलत पयादें खात फल पिता दीन्ह तजि राजु। जात मनावन रघुबरहि भरत सरिस को आजु ॥ २२२ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

पिता का दिया राज्य छोड़कर, फल खाते और पैदल चलते राम को मनाने जाने वाला भरत जैसा दूसरा कौन है?

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २२३

भरतदर्शन से मार्गवासियों का आनंद

चौपाइयाँ — मूल पाठ

भायप भगति भरत आचरनू। कहत सुनत दुख दूषन हरनू ॥ जो कछु कहब थोर सखि सोई। राम बंधु अस काहे न होई ॥ हम सब सानुज भरतहि देखें। भइन्ह धन्य जुबती जन लेखें ॥ सुनि गुन देखि दसा पछिताहीं। कैकइ जननि जोगु सुतु नाहीं ॥ कोउ कह दूषनु रानिहि नाहिन। बिधि सबु कीन्ह हमहि जो दाहिन ॥ कहँ हम लोक बेद बिधि हीनी। लघु तिय कुल करतूति मलीनी ॥ बसहिं कुदेस कुगाँव कुबामा। कहँ यह दरसु पुन्य परिनामा ॥ अस अनंदु अचिरिजु प्रति ग्रामा। जनु मरुभूमि कलपतरु जामा ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

स्त्रियाँ भरत के भाईचारे और भक्ति की कथा कह-सुनकर स्वयं को धन्य मानती हैं। कोई कैकेयी को दोष देता, कोई कहता है कि इसी घटनाक्रम से दुर्लभ दर्शन मिले। हर गाँव में आनंद ऐसा है जैसे मरुभूमि में कल्पवृक्ष उगा हो।

दोहा २२३

भरत दरसु देखत खुलेउ मग लोगन्ह कर भागु। जनु सिंघलबासिन्ह भयउ बिधि बस सुलभ प्रयागु ॥ २२३ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

भरतदर्शन से मार्गवासियों का भाग्य खुला, मानो दूर सिंहल के निवासियों को प्रयाग सहज उपलब्ध हो गया हो।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २२४

हर तीर्थ पर केवल रामप्रेम की प्रार्थना

चौपाइयाँ — मूल पाठ

निज गुन सहित राम गुन गाथा। सुनत जाहिं सुमिरत रघुनाथा ॥ तीरथ मुनि आश्रम सुरधामा। निरखि निमज्जहिं करहिं प्रनामा ॥ मनहीं मन मागहिं बरु एहू। सीय राम पद पदुम सनेहू ॥ मिलहिं किरात कोल बनबासी। बैखानस बटु जती उदासी ॥ करि प्रनामु पूँछहिं जेहिं तेही। केहि बन लखनु रामु बैदेही ॥ ते प्रभु समाचार सब कहहीं। भरतहि देखि जनम फलु लहहीं ॥ जे जन कहहिं कुसल हम देखे। ते प्रिय राम लखन सम लेखे ॥ एहि बिधि बूझत सबहि सुबानी। सुनत राम बनबास कहानी ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

भरत राम के गुण सुनते, तीर्थों और आश्रमों में स्नान-प्रणाम करते तथा सीता-राम के चरणों में प्रेम माँगते हैं। वनवासी और साधु उन्हें कुशल समाचार देते हैं। जिन्होंने तीनों को देखा है, वे भरत को अत्यंत प्रिय लगते हैं।

दोहा २२४

तेहि बासर बसि प्रातहीं चले सुमिरि रघुनाथ। राम दरस की लालसा भरत सरिस सब साथ ॥ २२४ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

उस दिन विश्राम के बाद सुबह सब राम का स्मरण कर चलते हैं; पूरे समाज में भरत जैसी दर्शन की लालसा है।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २२५

चित्रकूट के प्रथम दर्शन

चौपाइयाँ — मूल पाठ

मंगल सगुन होहिं सब काहू। फरकहिं सुखद बिलोचन बाहू ॥ भरतहि सहित समाज उछाहू। मिलिहहिं रामु मिटहि दुख दाहू ॥ करत मनोरथ जस जियँ जाके। जाहिं सनेह सुराँ सब छाके ॥ सिथिल अंग पग मग डगि डोलहिं। बिहबल बचन पेम बस बोलहिं ॥ रामसखाँ तेहि समय देखावा। सैल सिरोमनि सहज सुहावा ॥ जासु समीप सरित पय तीरा। सीय समेत बसहिं दोउ बीरा ॥ देखि करहिं सब दंड प्रनामा। कहि जय जानकि जीवन रामा ॥ प्रेम मगन अस राज समाजू। जनु फिरि अवध चले रघुराजू ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

कथा में शुभ संकेतों से सबको मिलन की आशा और उत्साह मिलता है। प्रेम से शरीर शिथिल और वाणी विह्वल है। गुह चित्रकूट तथा पयस्विनी के तट पर निवास का स्थान दिखाते हैं; सब राम को प्रणाम करते हैं।

दोहा २२५

भरत प्रेमु तेहि समय जस तस कहि सकइ न सेषु। कबिहिं अगम जिमि ब्रह्मसुखु अह मम मलिन जनेषु ॥ २२५ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

उस समय भरत के प्रेम का वर्णन शेष भी पूरा नहीं कर सकते; अहंता-ममता से मलिन व्यक्ति को ब्रह्मानंद की तरह यह कवि की पकड़ से परे है।

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अयोध्याकाण्ड · सोरठा २२६

सीताजी का स्वप्न और भरत के आने का समाचार

चौपाइयाँ — मूल पाठ

सकल सनेह सिथिल रघुबर कें। गए कोस दुइ दिनकर ढरकें ॥ जलु थलु देखि बसे निसि बीतें। कीन्ह गवन रघुनाथ पिरीतें ॥ उहाँ रामु रजनी अवसेषा। जागे सीयँ सपन अस देखा ॥ सहित समाज भरत जनु आए। नाथ बियोग ताप तन ताए ॥ सकल मलिन मन दीन दुखारी। देखीं सासु आन अनुहारी ॥ सुनि सिय सपन भरे जल लोचन। भए सोचबस सोच बिमोचन ॥ लखन सपन यह नीक न होई। कठिन कुचाह सुनाइहि कोई ॥ अस कहि बंधु समेत नहाने। पूजि पुरारि साधु सनमाने ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

उधर सीता स्वप्न में भरत और शोकग्रस्त परिवार को देखती हैं। राम के नेत्र भर आते हैं और वे किसी अप्रिय समाचार की आशंका करते हैं। स्नान, शिवपूजन और साधु-सम्मान के बाद उत्तर दिशा में धूल तथा व्याकुल वन्यजीव दिखाई देते हैं।

छंद — मूल पाठ

सनमानि सुर मुनि बंदि बैठे उत्तर दिसि देखत भए। नभ धूरि खग मृग भूरि भागे बिकल प्रभु आश्रम गए ॥ तुलसी उठे अवलोकि कारनु काह चित सचकित रहे। सब समाचार किरात कोलन्हि आइ तेहि अवसर कहे ॥
छंद का सरल हिंदी अर्थ

राम देव-मुनियों को प्रणाम करके उत्तर देखते हैं। धूल और भागते पशु-पक्षियों का कारण सोचते हुए उठते हैं; तभी कोल-किरात आकर भरत के आगमन का समाचार कहते हैं।

सोरठा २२६

सुनत सुमंगल बैन मन प्रमोद तन पुलक भर। सरद सरोरुह नैन तुलसी भरे सनेह जल ॥ २२६ ॥
सोरठा का सरल हिंदी अर्थ

मंगलमय समाचार सुनकर राम का मन आनंदित, शरीर रोमांचित और कमल जैसे नेत्र प्रेमाश्रुओं से भर जाते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २२७

राम की चिंता और लक्ष्मण का निवेदन

चौपाइयाँ — मूल पाठ

बहुरि सोचबस भे सियरवनू। कारन कवन भरत आगवनू ॥ एक आइ अस कहा बहोरी। सेन संग चतुरंग न थोरी ॥ सो सुनि रामहि भा अति सोचू। इत पितु बच इत बंधु सकोचू ॥ भरत सुभाउ समुझि मन माहीं। प्रभु चित हित थिति पावत नाही ॥ समाधान तब भा यह जाने। भरतु कहे महुँ साधु सयाने ॥ लखन लखेउ प्रभु हृदयँ खभारू। कहत समय सम नीति बिचारू ॥ बिनु पूँछ कछु कहउँ गोसाईं। सेवकु समयँ न ढीठ ढिठाई ॥ तुम्ह सर्बग्य सिरोमनि स्वामी। आपनि समुझि कहउँ अनुगामी ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

बड़ी सेना साथ होने का समाचार सुनकर राम पिता के वचन और भाई के प्रेम के बीच विचार करते हैं। भरत के साधु स्वभाव पर भरोसा उन्हें संतोष देता है। लक्ष्मण उनकी चिंता देखकर बिना पूछे अपनी समझ कहने की अनुमति चाहते हैं।

दोहा २२७

नाथ सुह्रद सुठि सरल चित सील सनेह निधान ॥ सब पर प्रीति प्रतीति जियँ जानिअ आपु समान ॥ २२७ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

लक्ष्मण कहते हैं—आप हितैषी, सरल, शील-स्नेह के भंडार हैं और सबको अपने जैसा प्रेम तथा विश्वास वाला मानते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २२८

लक्ष्मण की राजमद संबंधी आशंका

चौपाइयाँ — मूल पाठ

बिषई जीव पाइ प्रभुताई। मूढ़ मोह बस होहिं जनाई ॥ भरतु नीति रत साधु सुजाना। प्रभु पद प्रेम सकल जगु जाना ॥ तेऊ आजु राम पदु पाई। चले धरम मरजाद मेटाई ॥ कुटिल कुबंध कुअवसरु ताकी। जानि राम बनवास एकाकी ॥ करि कुमंत्रु मन साजि समाजू। आए करै अकंटक राजू ॥ कोटि प्रकार कलपि कुटलाई। आए दल बटोरि दोउ भाई ॥ जौं जियँ होति न कपट कुचाली। केहि सोहाति रथ बाजि गजाली ॥ भरतहि दोसु देइ को जाएँ। जग बौराइ राज पदु पाएँ ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

लक्ष्मण कहते हैं कि सत्ता पाकर मनुष्य मोह में बदल सकता है। भरत को नीति और प्रेम वाला जानते हुए भी वे सेना के कारण गलत अनुमान करते हैं कि दोनों भाई निष्कंटक राज्य चाहते हैं। यह आशंका अगले संवाद में राम दूर करेंगे।

दोहा २२८

ससि गुर तिय गामी नघुषु चढ़ेउ भूमिसुर जान। लोक बेद तें बिमुख भा अधम न बेन समान ॥ २२८ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

लक्ष्मण चंद्रमा, नहुष और वेन की पुरानी कथाओं का उदाहरण देकर सत्ता और अहंकार से मर्यादा टूटने की बात कहते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २२९

रक्षा की तत्परता और क्रोध का बढ़ना

चौपाइयाँ — मूल पाठ

सहसबाहु सुरनाथु त्रिसंकू। केहि न राजमद दीन्ह कलंकू ॥ भरत कीन्ह यह उचित उपाऊ। रिपु रिन रंच न राखब काऊ ॥ एक कीन्हि नहिं भरत भलाई। निदरे रामु जानि असहाई ॥ समुझि परिहि सोउ आजु बिसेषी। समर सरोष राम मुखु पेखी ॥ एतना कहत नीति रस भूला। रन रस बिटपु पुलक मिस फूला ॥ प्रभु पद बंदि सीस रज राखी। बोले सत्य सहज बलु भाषी ॥ अनुचित नाथ न मानब मोरा। भरत हमहि उपचार न थोरा ॥ कहँ लगि सहिअ रहिअ मनु मारें। नाथ साथ धनु हाथ हमारें ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

राजमद के और उदाहरण कहते-कहते लक्ष्मण युद्धोत्साह में आ जाते हैं। उन्हें लगता है कि राम को असहाय समझना अन्याय है। वे चरणरज सिर पर रखकर धनुषधारी सेवक होते हुए अपमान सहते रहने के विरुद्ध बोलते हैं।

दोहा २२९

छत्रि जाति रघुकुल जनमु राम अनुग जगु जान। लातहुँ मारें चढ़ति सिर नीच को धूरि समान ॥ २२९ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

वे अपने रघुवंशी क्षत्रिय और रामसेवक होने का स्मरण करके प्रतिक्रिया की बात कहते हैं; धूल की उपमा उनके तत्काल क्रोध की अभिव्यक्ति है।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २३०

युद्ध की अनुमति माँगते लक्ष्मण

चौपाइयाँ — मूल पाठ

उठि कर जोरि रजायसु मागा। मनहुँ बीर रस सोवत जागा ॥ बाँधि जटा सिर कसि कटि भाथा। साजि सरासनु सायकु हाथा ॥ आजु राम सेवक जसु लेऊँ। भरतहि समर सिखावन देऊँ ॥ राम निरादर कर फलु पाई। सोवहुँ समर सेज दोउ भाई ॥ आइ बना भल सकल समाजू। प्रगट करउँ रिस पाछिल आजू ॥ जिमि करि निकर दलइ मृगराजू। लेइ लपेटि लवा जिमि बाजू ॥ तैसेहिं भरतहि सेन समेता। सानुज निदरि निपातउँ खेता ॥ जौं सहाय कर संकरु आई। तौ मारउँ रन राम दोहाई ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

लक्ष्मण जटा बाँधकर धनुष-बाण सँभालते और भरत की सेना से लड़ने की अनुमति माँगते हैं। क्रोध में वे पहले की पीड़ा भी निकालने तथा किसी सहायता से न डरने की प्रतिज्ञा करते हैं। यह उनकी भ्रांति की चरम स्थिति है।

दोहा २३०

अति सरोष माखे लखनु लखि सुनि सपथ प्रवान। सभय लोक सब लोकपति चाहत भभरि भगान ॥ २३० ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

लक्ष्मण का तीव्र क्रोध और दृढ़ शपथ देखकर लोक और लोकपाल भी भयभीत हो उठते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २३१

जल्दबाजी से बचना और भरत पर राम का विश्वास

चौपाइयाँ — मूल पाठ

जगु भय मगन गगन भइ बानी। लखन बाहुबलु बिपुल बखानी ॥ तात प्रताप प्रभाउ तुम्हारा। को कहि सकइ को जाननिहारा ॥ अनुचित उचित काजु किछु होऊ। समुझि करिअ भल कह सबु कोऊ ॥ सहसा करि पाछैं पछिताहीं। कहहिं बेद बुध ते बुध नाहीं ॥ सुनि सुर बचन लखन सकुचाने। राम सीयँ सादर सनमाने ॥ कही तात तुम्ह नीति सुहाई। सब तें कठिन राजमदु भाई ॥ जो अचवँत नृप मातहिं तेई। नाहिन साधुसभा जेहिं सेई ॥ सुनहु लखन भल भरत सरीसा। बिधि प्रपंच महँ सुना न दीसा ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

आकाशवाणी बल की प्रशंसा के साथ कार्य को सोच-समझकर करने की शिक्षा देती है; जल्दबाजी पछतावा ला सकती है। लक्ष्मण संकुचित होते हैं। राम राजमद की कठिनाई स्वीकारकर कहते हैं कि भरत जैसा श्रेष्ठ जन कोई नहीं।

दोहा २३१

भरतहि होइ न राजमदु बिधि हरि हर पद पाइ ॥ कबहुँ कि काँजी सीकरनि छीरसिंधु बिनसाइ ॥ २३१ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

ब्रह्मा-विष्णु-शिव का पद पाकर भी भरत को राजमद नहीं होगा; खटाई की कुछ बूँदें क्षीरसागर को बिगाड़ सकती हैं क्या?

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २३२

भरत के गुणों का राम द्वारा वर्णन

चौपाइयाँ — मूल पाठ

तिमिरु तरुन तरनिहि मकु गिलई। गगनु मगन मकु मेघहिं मिलई ॥ गोपद जल बूड़हिं घटजोनी। सहज छमा बरु छाड़ै छोनी ॥ मसक फूँक मकु मेरु उड़ाई। होइ न नृपमदु भरतहि भाई ॥ लखन तुम्हार सपथ पितु आना। सुचि सुबंधु नहिं भरत समाना ॥ सगुन खीरु अवगुन जलु ताता। मिलइ रचइ परपंचु बिधाता ॥ भरतु हंस रबिबंस तड़ागा। जनमि कीन्ह गुन दोष बिभागा ॥ गहि गुन पय तजि अवगुन बारी। निज जस जगत कीन्हि उजिआरी ॥ कहत भरत गुन सीलु सुभाऊ। पेम पयोधि मगन रघुराऊ ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

राम असंभव उपमाएँ देकर कहते हैं कि भरत को राजमद नहीं होगा। पिता की आन और लक्ष्मण की शपथ देकर उन्हें निर्मल भाई बताते हैं। संसार के गुण-दोष मिश्रण में भरत हंस की तरह गुणरूपी दूध ग्रहण करते और दोष छोड़ते हैं।

दोहा २३२

सुनि रघुबर बानी बिबुध देखि भरत पर हेतु। सकल सराहत राम सो प्रभु को कृपानिकेतु ॥ २३२ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

राम की वाणी और भरत के प्रति उनका प्रेम देखकर देवता ऐसे करुणामय स्वामी की प्रशंसा करते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २३३

भरत का आश्रम की ओर संकोचपूर्ण जाना

चौपाइयाँ — मूल पाठ

जौं न होत जग जनम भरत को। सकल धरम धुर धरनि धरत को ॥ कबि कुल अगम भरत गुन गाथा। को जानइ तुम्ह बिनु रघुनाथा ॥ लखन राम सियँ सुनि सुर बानी। अति सुखु लहेउ न जाइ बखानी ॥ इहाँ भरतु सब सहित सहाए। मंदाकिनीं पुनीत नहाए ॥ सरित समीप राखि सब लोगा। मागि मातु गुर सचिव नियोगा ॥ चले भरतु जहँ सिय रघुराई। साथ निषादनाथु लघु भाई ॥ समुझि मातु करतब सकुचाहीं। करत कुतरक कोटि मन माहीं ॥ रामु लखनु सिय सुनि मम नाऊँ। उठि जनि अनत जाहिं तजि ठाऊँ ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

आकाशवाणी भरत की धर्मशीलता सराहती है। इधर भरत समाज को नदी के पास ठहराकर माताओं, गुरु और मंत्रियों की अनुमति से शत्रुघ्न-गुह सहित चलते हैं। उन्हें आशंका है कि माता की योजना में शामिल समझकर राम कहीं उनसे बचने न चले जाएँ।

दोहा २३३

मातु मते महुँ मानि मोहि जो कछु करहिं सो थोर। अघ अवगुन छमि आदरहिं समुझि आपनी ओर ॥ २३३ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

वे सोचते हैं कि दोषी समझकर जो करें थोड़ा है; यदि क्षमा और सम्मान दें तो वह राम की अपनी उदारता होगी।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २३४

संकोच और भरोसे के बीच भरत

चौपाइयाँ — मूल पाठ

जौं परिहरहिं मलिन मनु जानी। जौ सनमानहिं सेवकु मानी ॥ मोरें सरन रामहि की पनही। राम सुस्वामि दोसु सब जनही ॥ जग जस भाजन चातक मीना। नेम पेम निज निपुन नबीना ॥ अस मन गुनत चले मग जाता। सकुच सनेहँ सिथिल सब गाता ॥ फेरत मनहुँ मातु कृत खोरी। चलत भगति बल धीरज धोरी ॥ जब समुझत रघुनाथ सुभाऊ। तब पथ परत उताइल पाऊ ॥ भरत दसा तेहि अवसर कैसी। जल प्रबाहँ जल अलि गति जैसी ॥ देखि भरत कर सोचु सनेहू। भा निषाद तेहि समयँ बिदेहू ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

भरत सोचते हैं कि स्वीकारें या त्यागें, शरण केवल राम की पादुकाएँ हैं। माता के कर्म का संकोच पग रोकता, भक्ति और रामस्वभाव का भरोसा आगे बढ़ाता है। गुह उनका प्रेम देखकर भावविह्वल होते हैं।

दोहा २३४

लगे होन मंगल सगुन सुनि गुनि कहत निषादु। मिटिहि सोचु होइहि हरषु पुनि परिनाम बिषादु ॥ २३४ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

गुह शुभ संकेत देखकर कहते हैं कि चिंता मिटेगी और आनंद होगा, किंतु अंत में फिर वियोग का दुःख होगा।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २३५

रामवन का विवेक-राज्य रूपक

चौपाइयाँ — मूल पाठ

सेवक बचन सत्य सब जाने। आश्रम निकट जाइ निअराने ॥ भरत दीख बन सैल समाजू। मुदित छुधित जनु पाइ सुनाजू ॥ ईति भीति जनु प्रजा दुखारी। त्रिबिध ताप पीड़ित ग्रह मारी ॥ जाइ सुराज सुदेस सुखारी। होहिं भरत गति तेहि अनुहारी ॥ राम बास बन संपति भ्राजा। सुखी प्रजा जनु पाइ सुराजा ॥ सचिव बिरागु बिबेकु नरेसू। बिपिन सुहावन पावन देसू ॥ भट जम नियम सैल रजधानी। सांति सुमति सुचि सुंदर रानी ॥ सकल अंग संपन्न सुराऊ। राम चरन आश्रित चित चाऊ ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

आश्रम के निकट सुंदर वन देखकर भरत को शरण और राहत मिलती है। कवि उसे शुभ राज्य का रूपक देते हैं—विवेक राजा, वैराग्य मंत्री, यम-नियम सैनिक और शांति-सुमति रानियाँ हैं। उस राज्य का उत्साह रामचरणों पर आश्रित है।

दोहा २३५

जीति मोह महिपालु दल सहित बिबेक भुआलु। करत अकंटक राजु पुरँ सुख संपदा सुकालु ॥ २३५ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

विवेकरूपी राजा मोह के राजा को सेना सहित जीतकर सुख, समृद्धि और शांति का निष्कंटक शासन कर रहा है।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २३६

चित्रकूट का मंगलमय प्राकृतिक वैभव

चौपाइयाँ — मूल पाठ

बन प्रदेस मुनि बास घनेरे। जनु पुर नगर गाउँ गन खेरे ॥ बिपुल बिचित्र बिहग मृग नाना। प्रजा समाजु न जाइ बखाना ॥ खगहा करि हरि बाघ बराहा। देखि महिष बृष साजु सराहा ॥ बयरु बिहाइ चरहिं एक संगा। जहँ तहँ मनहुँ सेन चतुरंगा ॥ झरना झरहिं मत्त गज गाजहिं। मनहुँ निसान बिबिधि बिधि बाजहिं ॥ चक चकोर चातक सुक पिक गन। कूजत मंजु मराल मुदित मन ॥ अलिगन गावत नाचत मोरा। जनु सुराज मंगल चहु ओरा ॥ बेलि बिटप तृन सफल सफूला। सब समाजु मुद मंगल मूला ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

मुनियों के आश्रम नगर-गाँव जैसे और विविध जीव प्रजा जैसे दिखते हैं। पशु वैर छोड़कर साथ चरते हैं। झरने नगाड़े, पक्षियों का गान और मोरों का नृत्य मानो सुशासन का उत्सव है; वनस्पतियाँ फल-फूल से भरी हैं।

दोहा २३६

राम सैल सोभा निरखि भरत हृदयँ अति पेमु। तापस तप फलु पाइ जिमि सुखी सिरानें नेमु ॥ २३६ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

राम के पर्वत की शोभा देखकर भरत का हृदय प्रेम से ऐसा भरता है जैसे व्रत पूरा करके तपस्वी को तपफल मिल गया हो।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २३७

गुह द्वारा पर्णकुटी का स्थान दिखाना

पारायण संकेत: मासपारायण, बीसवाँ विश्राम · नवाह्नपारायण, पाँचवाँ विश्राम

चौपाइयाँ — मूल पाठ

तब केवट ऊँचें चढ़ि धाई। कहेउ भरत सन भुजा उठाई ॥ नाथ देखिअहिं बिटप बिसाला। पाकरि जंबु रसाल तमाला ॥ जिन्ह तरुबरन्ह मध्य बटु सोहा। मंजु बिसाल देखि मनु मोहा ॥ नील सघन पल्ल्व फल लाला। अबिरल छाहँ सुखद सब काला ॥ मानहुँ तिमिर अरुनमय रासी। बिरची बिधि सँकेलि सुषमा सी ॥ ए तरु सरित समीप गोसाँई। रघुबर परनकुटी जहँ छाई ॥ तुलसी तरुबर बिबिध सुहाए। कहुँ कहुँ सियँ कहुँ लखन लगाए ॥ बट छायाँ बेदिका बनाई। सियँ निज पानि सरोज सुहाई ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

गुह ऊँचाई पर चढ़कर विशाल वृक्ष और बीच का सघन वट दिखाते हैं। नदी के निकट वहीं राम की पर्णकुटी है। सीता और लक्ष्मण के लगाए पौधे तथा सीता के हाथों बनी वटछाया की वेदी का परिचय देते हैं।

दोहा २३७

जहाँ बैठि मुनिगन सहित नित सिय रामु सुजान। सुनहिं कथा इतिहास सब आगम निगम पुरान ॥ २३७ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

उस वेदी पर सीता-राम प्रतिदिन मुनियों के साथ बैठकर कथा, इतिहास, आगम, वेद और पुराण सुनते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २३८

चरणचिह्नों का दर्शन और प्रेम की पराकाष्ठा

चौपाइयाँ — मूल पाठ

सखा बचन सुनि बिटप निहारी। उमगे भरत बिलोचन बारी ॥ करत प्रनाम चले दोउ भाई। कहत प्रीति सारद सकुचाई ॥ हरषहिं निरखि राम पद अंका। मानहुँ पारसु पायउ रंका ॥ रज सिर धरि हियँ नयनन्हि लावहिं। रघुबर मिलन सरिस सुख पावहिं ॥ देखि भरत गति अकथ अतीवा। प्रेम मगन मृग खग जड़ जीवा ॥ सखहि सनेह बिबस मग भूला। कहि सुपंथ सुर बरषहिं फूला ॥ निरखि सिद्ध साधक अनुरागे। सहज सनेहु सराहन लागे ॥ होत न भूतल भाउ भरत को। अचर सचर चर अचर करत को ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

गुह की बात सुनकर भरत-शत्रुघ्न प्रणाम करते आगे चलते हैं। राम के पदचिह्नों की धूल सिर, हृदय और आँखों से लगाकर मिलन जैसा आनंद पाते हैं। उनका प्रेम देखकर जड़-चेतन सब भावमग्न हैं; गुह भी मार्ग भूलने लगते हैं।

दोहा २३८

पेम अमिअ मंदरु बिरहु भरतु पयोधि गँभीर। मथि प्रगटेउ सुर साधु हित कृपासिंधु रघुबीर ॥ २३८ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

रूपक में भरत गहरा समुद्र, विरह मंदर और प्रेम अमृत है; इस मंथन से करुणासागर राम का प्रकट होना कहा गया है।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २३९

मुनिमंडली के बीच सीता-राम के दर्शन

चौपाइयाँ — मूल पाठ

सखा समेत मनोहर जोटा। लखेउ न लखन सघन बन ओटा ॥ भरत दीख प्रभु आश्रमु पावन। सकल सुमंगल सदनु सुहावन ॥ करत प्रबेस मिटे दुख दावा। जनु जोगीं परमारथु पावा ॥ देखे भरत लखन प्रभु आगे। पूँछे बचन कहत अनुरागे ॥ सीस जटा कटि मुनि पट बाँधें। तून कसें कर सरु धनु काँधें ॥ बेदी पर मुनि साधु समाजू। सीय सहित राजत रघुराजू ॥ बलकल बसन जटिल तनु स्यामा। जनु मुनि बेष कीन्ह रति कामा ॥ कर कमलनि धनु सायकु फेरत। जिय की जरनि हरत हँसि हेरत ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

घने वन की ओट से लक्ष्मण ने अभी आने वालों को नहीं देखा। भरत आश्रम में प्रवेश करके राम के आगे खड़े लक्ष्मण तथा वेदी पर मुनियों सहित सीता-राम को देखते हैं। प्रभु की मुस्कान और दर्शन से हृदय का संताप मिटता है।

दोहा २३९

लसत मंजु मुनि मंडली मध्य सीय रघुचंदु। ग्यान सभाँ जनु तनु धरे भगति सच्चिदानंदु ॥ २३९ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

मुनियों के बीच सीता और राम ऐसे सुशोभित हैं मानो ज्ञानसभा में भक्ति और सच्चिदानंद ने साकार रूप धारण किया हो।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा २४०

भरत और राम का करुण आलिंगन

चौपाइयाँ — मूल पाठ

सानुज सखा समेत मगन मन। बिसरे हरष सोक सुख दुख गन ॥ पाहि नाथ कहि पाहि गोसाई। भूतल परे लकुट की नाई ॥ बचन सपेम लखन पहिचाने। करत प्रनामु भरत जियँ जाने ॥ बंधु सनेह सरस एहि ओरा। उत साहिब सेवा बस जोरा ॥ मिलि न जाइ नहिं गुदरत बनई। सुकबि लखन मन की गति भनई ॥ रहे राखि सेवा पर भारू। चढ़ी चंग जनु खैंच खेलारू ॥ कहत सप्रेम नाइ महि माथा। भरत प्रनाम करत रघुनाथा ॥ उठे रामु सुनि पेम अधीरा। कहुँ पट कहुँ निषंग धनु तीरा ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

भरत रक्षा की पुकार करते भूमि पर दंडवत गिरते हैं। स्वर पहचानकर लक्ष्मण भाई से मिलने की चाह और रामसेवा के दायित्व के बीच रुकते हैं। वे राम को भरत के प्रणाम की सूचना देते हैं; राम प्रेमातुर होकर तत्काल उठ पड़ते हैं।

दोहा २४०

बरबस लिए उठाइ उर लाए कृपानिधान। भरत राम की मिलनि लखि बिसरे सबहि अपान ॥ २४० ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

करुणामय राम भरत को उठाकर हृदय से लगाते हैं; यह मिलन देखकर सब अपनी सुधि भूल जाते हैं।

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भरत-चरित्र के पाँच मनन-सूत्र

  1. पद और वैभव से बड़ा प्रियजन का हित तथा धर्मपूर्ण दायित्व है।
  2. सच्चा सेवक राम की संपत्ति को धरोहर समझता है; भरत यात्रा से पहले नगर की सुरक्षा करते हैं।
  3. भ्रम में तुरंत प्रतिक्रिया देने के स्थान पर उद्देश्य जानें—गुह और लक्ष्मण के प्रसंग विवेक की आवश्यकता दिखाते हैं।
  4. भरत का वर है निष्काम चरणप्रेम; वे उसके बदले राज्य या मोक्ष भी नहीं माँगते।
  5. राम का भरत पर विश्वास और भरत की शरणागति मिलकर चित्रकूट के आलिंगन को संभव करते हैं।

विरह, आत्मधिक्कार, क्रोध और प्राचीन सामाजिक भूमिकाओं के कथन उनके पात्रगत कथा-संदर्भ में पढ़ें। उन्हें आज किसी व्यक्ति, स्त्री या समुदाय की गरिमा घटाने अथवा हिंसा का निर्देश न मानें। भरत द्वारा मंथरा को छुड़ाना और गुह को हृदय से लगाना इस क्रम की करुणामयी कड़ियाँ हैं।

पाठ-संदर्भ और संपादन

मूल अवधी पाठ का आधार संस्कृत डॉक्यूमेंट्स का अयोध्याकाण्ड पाठ है। संदिग्ध क्रमांकन, छंद-प्रकार और स्पष्ट अक्षर-दोषों की तुलना गीता प्रेस के मुद्रित मूल पाठ की पृष्ठ ४८१–५००, पृष्ठ ५०१–५६३ तथा पृष्ठ ५६४–६०० की स्कैन-प्रतियों से की गई है। किसी आधुनिक अनुवाद का पुनर्मुद्रण नहीं किया गया है।

सीमित पाठ-संपादन और इस भाग की सीमा
  • क्रमांक २२६ को मुद्रित पाठ के अनुसार सोरठा पहचाना है; १५१, १७६ और २०१ भी सोरठे हैं। इन चार स्थानों के पहले के छंद पूरे दिए हैं।
  • क्रमांक १५२ से पहले डिजिटल “सीहु मातु” के स्थान पर मुद्रित “सेएहु मातु” और १५३ से पहले “सुत बचन” के स्थान पर “सूत बचन” रखा है।
  • क्रमांक १७२ से पहले डिजिटल पंक्ति में आए अतिरिक्त “केहि” को मुद्रित “तात बिचारु करहु मन माहीं” से मिलाकर हटाया है।
  • क्रमांक १९९ के पहले शब्दों के बीच आया अलग लैटिन चिह्न हटाया है। क्रमांक २०३ की चौपाइयों में डिजिटल “पयोदेहिं/पयोदेहि” के स्थान पर मुद्रित “पयादेहिं/पयादेहि” रखा है।
  • १६५, १८१ और २२५ में क्रमांक-समापन के टंकण-चिह्न व्यवस्थित किए हैं। पारायण-संकेत काव्य से अलग छोटे पाठ में सुरक्षित हैं। अन्य शब्द सामान्यतः चुने हुए डिजिटल पाठ के अनुसार हैं; संस्करणों में वर्तनी और पाठांतर मिल सकते हैं।
  • यह भाग राम–भरत मिलन के क्रमांक २४० पर समाप्त होता है। आगे की कथा अभी शेष है; इसे अयोध्याकाण्ड सम्पूर्ण न मानें।

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अयोध्याकाण्ड सम्पूर्ण · भाग 1–5

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॥ जय श्री सीताराम ॥
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