श्रीरामचरितमानस अयोध्याकाण्ड भाग 3 | सीता-लक्ष्मण वनगमन, केवट मिलन और चित्रकूट | दोहा 61–150 अर्थ सहित

॥ श्री सीताराम ॥ · भक्ति भावना प्रस्तुत

श्रीरामचरितमानस
अयोध्याकाण्ड — भाग ३

सीता-लक्ष्मण का वनगमन, केवट मिलन और चित्रकूट निवास

दोहा ६१–१५० · पूरा मूल क्रम · चौपाइयाँ, छंद, दोहे और सोरठे · सरल हिंदी अर्थ

एक बड़े भाग में वनयात्रा के अनेक प्रसंग

यह पाठ पिछले भाग के दोहा ६० के ठीक बाद की चौपाइयों से आरंभ होकर दोहा १५० तक चलता है। यहाँ सीताजी और लक्ष्मणजी की साथ चलने की विनती, अयोध्या से प्रस्थान, निषादराज की सेवा, लक्ष्मण का विवेक-उपदेश, केवट का प्रेम, प्रयाग और वाल्मीकि आश्रम, चित्रकूट निवास तथा सुमंत्र की अयोध्या-वापसी क्रम से पढ़ें।

भागों की संख्या कम रखने के लिए इस लेख में ९० क्रमांक एक साथ दिए हैं। प्रत्येक क्रमांक के नीचे बीच की पूरी मूल चौपाइयाँ और उनका समेकित सरल हिंदी अर्थ है; दोहे तथा सोरठे का अर्थ अलग है। यह शब्दशः टीका नहीं, मूल पाठ की स्वतंत्र अध्ययन-सहायक व्याख्या है। जहाँ छंद है, उसका पाठ और अर्थ भी अलग दिया है।

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क्रमांक ६१–७०
क्रमांक ७१–८०
क्रमांक ८१–९०
क्रमांक ९१–१००
क्रमांक १०१–११०
क्रमांक १११–१२०
क्रमांक १२१–१३०
क्रमांक १३१–१४०
क्रमांक १४१–१५०
अयोध्याकाण्ड · दोहा ६१

सीताजी से अयोध्या में रहने का अनुरोध

पारायण संकेत: मासपारायण, चौदहवाँ विश्राम

चौपाइयाँ — मूल पाठ

मातु समीप कहत सकुचाहीं। बोले समउ समुझि मन माहीं ॥ राजकुमारि सिखावन सुनहू। आन भाँति जियँ जनि कछु गुनहू ॥ आपन मोर नीक जौं चहहू। बचनु हमार मानि गृह रहहू ॥ आयसु मोर सासु सेवकाई। सब बिधि भामिनि भवन भलाई ॥ एहि ते अधिक धरमु नहिं दूजा। सादर सासु ससुर पद पूजा ॥ जब जब मातु करिहि सुधि मोरी। होइहि प्रेम बिकल मति भोरी ॥ तब तब तुम्ह कहि कथा पुरानी। सुंदरि समुझाएहु मृदु बानी ॥ कहउँ सुभायँ सपथ सत मोही। सुमुखि मातु हित राखउँ तोही ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

माता के सामने संकोच रखते हुए राम सीता को अपना हित समझाकर घर रहने की सलाह देते हैं। वे चाहते हैं कि सीता सास-ससुर की सेवा करें और कौसल्या को उनके वियोग में पुरानी कथाएँ सुनाकर धीरज दें।

दोहा ६१

गुर श्रुति संमत धरम फलु पाइअ बिनहिं कलेस। हठ बस सब संकट सहे गालव नहुष नरेस ॥ ६१ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

गुरु और वेदसम्मत आचरण से सहज धर्मफल मिलता है; हठ के कारण गालव और नहुष जैसे पात्रों ने संकट सहे।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा ६२

वनमार्ग की कठिनाइयों का वर्णन

चौपाइयाँ — मूल पाठ

मैं पुनि करि प्रवान पितु बानी। बेगि फिरब सुनु सुमुखि सयानी ॥ दिवस जात नहिं लागिहि बारा। सुंदरि सिखवनु सुनहु हमारा ॥ जौ हठ करहु प्रेम बस बामा। तौ तुम्ह दुखु पाउब परिनामा ॥ काननु कठिन भयंकरु भारी। घोर घामु हिम बारि बयारी ॥ कुस कंटक मग काँकर नाना। चलब पयादेहिं बिनु पदत्राना ॥ चरन कमल मुदु मंजु तुम्हारे। मारग अगम भूमिधर भारे ॥ कंदर खोह नदीं नद नारे। अगम अगाध न जाहिं निहारे ॥ भालु बाघ बृक केहरि नागा। करहिं नाद सुनि धीरजु भागा ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

राम पिता का वचन पूरा करके लौटने का आश्वासन देते हैं। फिर कठोर मौसम, काँटे-पत्थरों वाला नंगे पाँव का मार्ग, पर्वत, गहरी नदियाँ और हिंसक जीवों का भय बताते हैं। वे सीता के कोमल चरणों की चिंता करते हैं।

दोहा ६२

भूमि सयन बलकल बसन असनु कंद फल मूल। ते कि सदा सब दिन मिलिहिं सबुइ समय अनुकूल ॥ ६२ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

वन में धरती पर सोना, वल्कल पहनना और कंद-मूल खाना होगा; ये साधन भी हर दिन अनुकूल मिलें, यह निश्चित नहीं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा ६३

हितकारी सीख मानने की बात

चौपाइयाँ — मूल पाठ

नर अहार रजनीचर चरहीं। कपट बेष बिधि कोटिक करहीं ॥ लागइ अति पहार कर पानी। बिपिन बिपति नहिं जाइ बखानी ॥ ब्याल कराल बिहग बन घोरा। निसिचर निकर नारि नर चोरा ॥ डरपहिं धीर गहन सुधि आएँ। मृगलोचनि तुम्ह भीरु सुभाएँ ॥ हंसगवनि तुम्ह नहिं बन जोगू। सुनि अपजसु मोहि देइहि लोगू ॥ मानस सलिल सुधाँ प्रतिपाली। जिअइ कि लवन पयोधि मराली ॥ नव रसाल बन बिहरनसीला। सोह कि कोकिल बिपिन करीला ॥ रहहु भवन अस हृदयँ बिचारी। चंदबदनि दुखु कानन भारी ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

राम कहते हैं कि वन में छल करने वाले राक्षस, विषैले जीव और अनेक अनजाने संकट हैं। मानसरोवर की हंसिनी तथा आम्रवन की कोयल की उपमाओं से वे सीता को समझाते हैं कि सुखपूर्वक पली देह के लिए वनजीवन कठिन होगा।

दोहा ६३

सहज सुह्द गुर स्वामि सिख जो न करइ सिर मानि ॥ सो पछिताइ अघाइ उर अवसि होइ हित हानि ॥ ६३ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

स्वाभाविक हितैषी, गुरु और स्वामी की हितकारी सीख का अनादर करने वाला बाद में हानि और पछतावा अनुभव करता है।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा ६४

सीताजी का उत्तर: वियोग सबसे बड़ा दुःख

चौपाइयाँ — मूल पाठ

सुनि मृदु बचन मनोहर पिय के। लोचन ललित भरे जल सिय के ॥ सीतल सिख दाहक भइ कैंसें। चकइहि सरद चंद निसि जैंसें ॥ उतरु न आव बिकल बैदेही। तजन चहत सुचि स्वामि सनेही ॥ बरबस रोकि बिलोचन बारी। धरि धीरजु उर अवनिकुमारी ॥ लागि सासु पग कह कर जोरी। छमबि देबि बड़ि अबिनय मोरी ॥ दीन्हि प्रानपति मोहि सिख सोई। जेहि बिधि मोर परम हित होई ॥ मैं पुनि समुझि दीखि मन माहीं। पिय बियोग सम दुखु जग नाहीं ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

राम की कोमल सीख सुनकर सीता की आँखों में आँसू भर आए। उन्होंने धैर्य रखकर सास के चरण पकड़े और विनयपूर्वक कहा कि पति ने उनका हित ही समझाया है, फिर भी उनके लिए प्रिय से बिछोह सबसे बड़ा दुःख है।

दोहा ६४

प्राननाथ करुनायतन सुंदर सुखद सुजान। तुम्ह बिनु रघुकुल कुमुद बिधु सुरपुर नरक समान ॥ ६४ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

सीता कहती हैं—करुणामय प्रियतम, आपके बिना स्वर्ग भी मुझे नरक के समान लगेगा।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा ६५

प्रिय के साथ वन भी सुखद

चौपाइयाँ — मूल पाठ

मातु पिता भगिनी प्रिय भाई। प्रिय परिवारु सुह्रद समुदाई ॥ सासु ससुर गुर सजन सहाई। सुत सुंदर सुसील सुखदाई ॥ जहँ लगि नाथ नेह अरु नाते। पिय बिनु तियहि तरनिहु ते ताते ॥ तनु धनु धामु धरनि पुर राजू। पति बिहीन सबु सोक समाजू ॥ भोग रोगसम भूषन भारू। जम जातना सरिस संसारू ॥ प्राननाथ तुम्ह बिनु जग माहीं। मो कहुँ सुखद कतहुँ कछु नाहीं ॥ जिय बिनु देह नदी बिनु बारी। तैसिअ नाथ पुरुष बिनु नारी ॥ नाथ सकल सुख साथ तुम्हारें। सरद बिमल बिधु बदनु निहारें ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

सीता अपने अनुभव की भाषा में कहती हैं कि प्रिय के वियोग में संबंधी, धन, राजमहल और भोग भी आनंद नहीं देते। उनके लिए राम का साथ ही जीवन का सुख है; उनके दर्शन से वन का अभाव भी अभाव नहीं रहेगा।

दोहा ६५

खग मृग परिजन नगरु बनु बलकल बिमल दुकूल। नाथ साथ सुरसदन सम परनसाल सुख मूल ॥ ६५ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

राम के साथ पक्षी-पशु परिजन, वन नगर, वल्कल सुंदर वस्त्र और पर्णकुटी स्वर्ग जैसा सुखद निवास बन जाएँगे।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा ६६

साथ चलने की करुण विनती

चौपाइयाँ — मूल पाठ

बनदेवीं बनदेव उदारा। करिहहिं सासु ससुर सम सारा ॥ कुस किसलय साथरी सुहाई। प्रभु सँग मंजु मनोज तुराई ॥ कंद मूल फल अमिअ अहारू। अवध सौध सत सरिस पहारू ॥ छिनु छिनु प्रभु पद कमल बिलोकि। रहिहउँ मुदित दिवस जिमि कोकी ॥ बन दुख नाथ कहे बहुतेरे। भय बिषाद परिताप घनेरे ॥ प्रभु बियोग लवलेस समाना। सब मिलि होहिं न कृपानिधाना ॥ अस जियँ जानि सुजान सिरोमनि। लेइअ संग मोहि छाड़िअ जनि ॥ बिनती बहुत करौं का स्वामी। करुनामय उर अंतरजामी ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

सीता कहती हैं कि वन के देवता सास-ससुर जैसे, पत्तों की शय्या सुंदर पलंग और कंद-मूल अमृत जैसे लगेंगे। वन के सारे भय मिलकर भी राम-वियोग के क्षणभर के दुःख के बराबर नहीं हैं; इसलिए उन्हें साथ लिया जाए।

दोहा ६६

राखिअ अवध जो अवधि लगि रहत न जनिअहिं प्रान। दीनबंधु संदर सुखद सील सनेह निधान ॥ ६६ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

अयोध्या में रोकने पर उनके प्राण अवधि भर रहेंगे या नहीं, यह अनिश्चित है; वे दीनबंधु राम से करुणा चाहती हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा ६७

सेवा का संकल्प और विरह की पीड़ा

चौपाइयाँ — मूल पाठ

मोहि मग चलत न होइहि हारी। छिनु छिनु चरन सरोज निहारी ॥ सबहि भाँति पिय सेवा करिहौं। मारग जनित सकल श्रम हरिहौं ॥ पाय पखारी बैठि तरु छाहीं। करिहउँ बाउ मुदित मन माहीं ॥ श्रम कन सहित स्याम तनु देखें। कहँ दुख समउ प्रानपति पेखें ॥ सम महि तृन तरुपल्लव डासी। पाग पलोटिहि सब निसि दासी ॥ बारबार मृदु मूरति जोही। लागहि तात बयारि न मोही। को प्रभु सँग मोहि चितवनिहारा। सिंघबधुहि जिमि ससक सिआरा ॥ मैं सुकुमारि नाथ बन जोगू। तुम्हहि उचित तप मो कहुँ भोगू ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

सीता मार्ग में चरण देखते चलने, थकान दूर करने, पाँव धोने, पंखा करने और विश्राम की व्यवस्था करने का संकल्प बताती हैं। राम की उपस्थिति में उन्हें भय नहीं लगता। केवल स्वयं को कोमल बताकर पीछे छोड़ने की बात उनके हृदय को दुखाती है।

दोहा ६७

ऐसेउ बचन कठोर सुनि जौं न ह्रदउ बिलगान। तौ प्रभु बिषम बियोग दुख सहिहहिं पावँर प्रान ॥ ६७ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

सीता वेदना से कहती हैं—वियोग की इतनी कठोर बात सुनकर भी हृदय नहीं टूटा, तो ये प्राण आगे का विरह भी सहेंगे।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा ६८

श्रीराम की स्वीकृति और माता की आकुलता

चौपाइयाँ — मूल पाठ

अस कहि सीय बिकल भइ भारी। बचन बियोगु न सकी सँभारी ॥ देखि दसा रघुपति जियँ जाना। हठि राखें नहिं राखिहि प्राना ॥ कहेउ कृपाल भानुकुलनाथा। परिहरि सोचु चलहु बन साथा ॥ नहिं बिषाद कर अवसरु आजू। बेगि करहु बन गवन समाजू ॥ कहि प्रिय बचन प्रिया समुझाई। लगे मातु पद आसिष पाई ॥ बेगि प्रजा दुख मेटब आई। जननी निठुर बिसरि जनि जाई ॥ फिरहि दसा बिधि बहुरि कि मोरी। देखिहउँ नयन मनोहर जोरी ॥ सुदिन सुघरी तात कब होइहि। जननी जिअत बदन बिधु जोइहि ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

सीता की दशा देखकर राम उन्हें साथ वन चलने की अनुमति देते हैं और शीघ्र तैयारी को कहते हैं। माता के चरण छूकर आशिष लेते हैं। कौसल्या लौटकर उनकी सुंदर जोड़ी देखने और वक्ष से लगाने का दिन सोचकर विह्वल होती हैं।

दोहा ६८

बहुरि बच्छ कहि लालु कहि रघुपति रघुबर तात। कबहिं बोलाइ लगाइ हियँ हरषि निरखिहउँ गात ॥ ६८ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

कौसल्या सोचती हैं—कब फिर पुत्र को लाल, रघुपति और रघुवर कहकर बुलाऊँगी, हृदय से लगाकर आनंद से निहारूँगी?

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अयोध्याकाण्ड · दोहा ६९

कौसल्या का सीताजी को आशीर्वाद

चौपाइयाँ — मूल पाठ

लखि सनेह कातरि महतारी। बचनु न आव बिकल भइ भारी ॥ राम प्रबोधु कीन्ह बिधि नाना। समउ सनेहु न जाइ बखाना ॥ तब जानकी सासु पग लागी। सुनिअ माय मैं परम अभागी ॥ सेवा समय दैअँ बनु दीन्हा। मोर मनोरथु सफल न कीन्हा ॥ तजब छोभु जनि छाड़िअ छोहू। करमु कठिन कछु दोसु न मोहू ॥ सुनि सिय बचन सासु अकुलानी। दसा कवनि बिधि कहौं बखानी ॥ बारहि बार लाइ उर लीन्ही। धरि धीरजु सिख आसिष दीन्ही ॥ अचल होउ अहिवातु तुम्हारा। जब लगि गंग जमुन जल धारा ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

राम माता को अनेक प्रकार से धीरज देते हैं। सीता सास के चरणों में कहती हैं कि सेवा के अवसर पर वन जाना उनका दुर्भाग्य है; स्नेह न छोड़ें। कौसल्या उन्हें बार-बार हृदय से लगाकर अखंड सौभाग्य का आशीष देती हैं।

दोहा ६९

सीतहि सासु असीस सिख दीन्हि अनेक प्रकार। चली नाइ पद पदुम सिरु अति हित बारहिं बार ॥ ६९ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

अनेक सीख और आशीर्वाद पाकर सीता अत्यंत प्रेम से बार-बार सास के चरणों में सिर झुकाकर चलती हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा ७०

लक्ष्मण का व्याकुल होकर आना

चौपाइयाँ — मूल पाठ

समाचार जब लछिमन पाए। ब्याकुल बिलख बदन उठि धाए ॥ कंप पुलक तन नयन सनीरा। गहे चरन अति प्रेम अधीरा ॥ कहि न सकत कछु चितवत ठाढ़े। मीनु दीन जनु जल तें काढ़े ॥ सोचु हृदयँ बिधि का होनिहारा। सबु सुखु सुकृत सिरान हमारा ॥ मो कहुँ काह कहब रघुनाथा। रखिहहिं भवन कि लेहहिं साथा ॥ राम बिलोकि बंधु कर जोरें। देह गेह सब सन तृनु तोरें ॥ बोले बचनु राम नय नागर। सील सनेह सरल सुख सागर ॥ तात प्रेम बस जनि कदराहू। समुझि हृदयँ परिनाम उछाहू ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

समाचार सुनकर लक्ष्मण काँपते शरीर, पुलक और आँसुओं के साथ राम के चरण पकड़ लेते हैं। वे सोचते हैं कि साथ जाने देंगे या घर रखेंगे। राम उन्हें प्रेम में अधीर न होकर परिणाम समझने और हितकारी शिक्षा मानने को कहते हैं।

दोहा ७०

मातु पिता गुरु स्वामि सिख सिर धरि करहि सुभायँ। लहेउ लाभु तिन्ह जनम कर नतरु जनमु जग जायँ ॥ ७० ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

माता-पिता, गुरु और स्वामी की उचित सीख सहज भाव से मानना जीवन को सार्थक करता है।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा ७१

परिवार और प्रजा की चिंता

चौपाइयाँ — मूल पाठ

अस जियँ जानि सुनहु सिख भाई। करहु मातु पितु पद सेवकाई ॥ भवन भरतु रिपुसूदन नाहीं। राउ बृद्ध मम दुखु मन माहीं ॥ मैं बन जाउँ तुम्हहि लेइ साथा। होइ सबहि बिधि अवध अनाथा ॥ गुरु पितु मातु प्रजा परिवारू। सब कहुँ परइ दुसह दुख भारू ॥ रहहु करहु सब कर परितोषू। नतरु तात होइहि बड़ दोषू ॥ जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी। सो नृपु अवसि नरक अधिकारी ॥ रहहु तात असि नीति बिचारी। सुनत लखनु भए ब्याकुल भारी ॥ सिअरें बचन सूखि गए कैंसें। परसत तुहिन तामरसु जैसें ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

राम समझाते हैं कि भरत-शत्रुघ्न यहाँ नहीं हैं और पिता वृद्ध तथा दुःखी हैं। लक्ष्मण भी चले जाएँगे तो परिवार और प्रजा का सहारा घटेगा। प्रजा को दुःख में रखकर राज्य-सुख चाहने वाले राजा को वे दोषी बताते हैं। लक्ष्मण यह सुनकर व्याकुल होते हैं।

दोहा ७१

उतरु न आवत प्रेम बस गहे चरन अकुलाइ। नाथ दासु मैं स्वामि तुम्ह तजहु त काह बसाइ ॥ ७१ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

लक्ष्मण उत्तर नहीं दे पाते; चरण पकड़कर कहते हैं—आप स्वामी हैं, मैं सेवक हूँ; छोड़ देंगे तो मेरा क्या उपाय है?

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अयोध्याकाण्ड · दोहा ७२

लक्ष्मण की अनन्य सेवा-विनती

चौपाइयाँ — मूल पाठ

दीन्हि मोहि सिख नीकि गोसाईं। लागि अगम अपनी कदराईं ॥ नरबर धीर धरम धुर धारी। निगम नीति कहुँ ते अधिकारी ॥ मैं सिसु प्रभु सनेहँ प्रतिपाला। मंदरु मेरु कि लेहिं मराला ॥ गुर पितु मातु न जानउँ काहू। कहउँ सुभाउ नाथ पतिआहू ॥ जहँ लगि जगत सनेह सगाई। प्रीति प्रतीति निगम निजु गाई ॥ मोरें सबइ एक तुम्ह स्वामी। दीनबंधु उर अंतरजामी ॥ धरम नीति उपदेसिअ ताही। कीरति भूति सुगति प्रिय जाही ॥ मन क्रम बचन चरन रत होई। कृपासिंधु परिहरिअ कि सोई ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

लक्ष्मण कहते हैं कि शिक्षा श्रेष्ठ है, पर उनका हृदय राम के स्नेह में पला है और कठिन धैर्य उठाने में स्वयं को असमर्थ पाता है। उनके सभी संबंध राम में ही केंद्रित हैं; मन-वचन-कर्म से चरणों में लगे सेवक को न छोड़ें।

दोहा ७२

करुनासिंधु सुबंध के सुनि मृदु बचन बिनीत। समुझाए उर लाइ प्रभु जानि सनेहँ सभीत ॥ ७२ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

लक्ष्मण की विनम्र और प्रेमभीत वाणी सुनकर करुणामय राम उन्हें समझाते हुए हृदय से लगा लेते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा ७३

सुमित्रा से अनुमति लेने जाना

चौपाइयाँ — मूल पाठ

मागहु बिदा मातु सन जाई। आवहु बेगि चलहु बन भाई ॥ मुदित भए सुनि रघुबर बानी। भयउ लाभ बड़ गइ बड़ि हानी ॥ हरषित ह्दयँ मातु पहिं आए। मनहुँ अंध फिरि लोचन पाए। जाइ जननि पग नायउ माथा। मनु रघुनंदन जानकि साथा ॥ पूँछे मातु मलिन मन देखी। लखन कही सब कथा बिसेषी ॥ गई सहमि सुनि बचन कठोरा। मृगी देखि दव जनु चहु ओरा ॥ लखन लखेउ भा अनरथ आजू। एहिं सनेह बस करब अकाजू ॥ मागत बिदा सभय सकुचाहीं। जाइ संग बिधि कहिहि कि नाही ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

राम लक्ष्मण को माता से विदा लेकर शीघ्र आने और साथ चलने को कहते हैं। लक्ष्मण प्रसन्न होकर सुमित्रा के पास पहुँचते हैं और सब घटना बताते हैं। माता सहम जाती हैं; लक्ष्मण आशंकित होते हैं कि ममता कहीं अनुमति न रोक दे।

दोहा ७३

समुझि सुमित्राँ राम सिय रूप सुसीलु सुभाउ। नृप सनेहु लखि धुनेउ सिरु पापिनि दीन्ह कुदाउ ॥ ७३ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

सीता-राम के सुशील रूप और राजा के प्रेम का विचार कर सुमित्रा इस अनर्थ के कारण पर दुख व्यक्त करती हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा ७४

जहाँ राम, वहीं अयोध्या

चौपाइयाँ — मूल पाठ

धीरजु धरेउ कुअवसर जानी। सहज सुह्द बोली मृदु बानी ॥ तात तुम्हारि मातु बैदेही। पिता रामु सब भाँति सनेही ॥ अवध तहाँ जहँ राम निवासू। तहँइँ दिवसु जहँ भानु प्रकासू ॥ जौ पै सीय रामु बन जाहीं। अवध तुम्हार काजु कछु नाहिं ॥ गुर पितु मातु बंधु सुर साई। सेइअहिं सकल प्रान की नाईं ॥ रामु प्रानप्रिय जीवन जी के। स्वारथ रहित सखा सबही कै ॥ पूजनीय प्रिय परम जहाँ तें। सब मानिअहिं राम के नातें ॥ अस जियँ जानि संग बन जाहू। लेहु तात जग जीवन लाहू ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

सुमित्रा धैर्य रखकर कहती हैं—सीता को माता और राम को पिता समझो; जहाँ राम हैं वहीं तुम्हारी अयोध्या है। गुरु, माता-पिता और संबंधों की सेवा की शिक्षा देकर वे राम को सबके निष्कपट हितैषी प्राणप्रिय बताते हुए साथ जाने को कहती हैं।

दोहा ७४

भूरि भाग भाजनु भयहु मोहि समेत बलि जाउँ। जौम तुम्हरें मन छाड़ि छलु कीन्ह राम पद ठाउँ ॥ ७४ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

सुमित्रा लक्ष्मण के छलरहित रामप्रेम को अपना भी सौभाग्य मानकर उन पर बलिहार जाती हैं।

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अयोध्याकाण्ड · सोरठा ७५

सुमित्रा की सेवा-शिक्षा और आशीष

चौपाइयाँ — मूल पाठ

पुत्रवती जुबती जग सोई। रघुपति भगतु जासु सुतु होई ॥ नतरु बाँझ भलि बादि बिआनी। राम बिमुख सुत तें हित जानी ॥ तुम्हरेहिं भाग रामु बन जाहीं। दूसर हेतु तात कछु नाहीं ॥ सकल सुकृत कर बड़ फलु एहू। राम सीय पद सहज सनेहू ॥ राग रोषु इरिषा मदु मोहू। जनि सपनेहुँ इन्ह के बस होहू ॥ सकल प्रकार बिकार बिहाई। मन क्रम बचन करेहु सेवकाई ॥ तुम्ह कहुँ बन सब भाँति सुपासू। सँग पितु मातु रामु सिय जासू ॥ जेहिं न रामु बन लहहिं कलेसू। सुत सोइ करेहु इहइ उपदेसू ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

सुमित्रा पुत्र की रामभक्ति को जीवन का श्रेष्ठ फल मानती हैं। वे आसक्ति, क्रोध, ईर्ष्या, अहंकार और मोह से बचकर मन-वचन-कर्म से सेवा करने को कहती हैं। लक्ष्य यही हो कि वन में राम-सीता को कोई कष्ट न हो।

छंद — मूल पाठ

उपदेसु यहु जेहिं तात तुम्हरे राम सिय सुख पावहीं। पितु मातु प्रिय परिवार पुर सुख सुरति बन बिसरावहीं। तुलसी प्रभुहि सिख देइ आयसु दीन्ह पुनि आसिष दई। रति होउ अबिरल अमल सिय रघुबीर पद नित नित नई ॥
छंद का सरल हिंदी अर्थ

माता कहती हैं—ऐसी सेवा करो कि राम-सीता को माता-पिता, प्रिय परिवार और नगर की कमी का दुःख वन में न सताए। फिर निर्मल, अखंड और प्रतिदिन बढ़ते चरणप्रेम का आशीर्वाद देती हैं।

सोरठा ७५

मातु चरन सिरु नाइ चले तुरत संकित हृदयँ। बागुर बिषम तोराइ मनहुँ भाग मृगु भाग बस ॥ ७५ ॥
सोरठा का सरल हिंदी अर्थ

माता के चरणों में सिर झुकाकर लक्ष्मण तुरंत चले, मानो कठिन जाल से छूटा हिरण अवसर पाकर भाग निकला हो।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा ७६

दशरथ के समक्ष तीनों का आगमन

चौपाइयाँ — मूल पाठ

गए लखनु जहँ जानकिनाथू। भे मन मुदित पाइ प्रिय साथू ॥ बंदि राम सिय चरन सुहाए। चले संग नृपमंदिर आए ॥ कहहिं परसपर पुर नर नारी। भलि बनाइ बिधि बात बिगारी ॥ तन कृस दुखु बदन मलीने। बिकल मनहुँ माखी मधु छीने ॥ कर मीजहिं सिरु धुनि पछिताहीं। जनु बिन पंख बिहग अकुलाहीं ॥ भइ बड़ि भीर भूप दरबारा। बरनि न जाइ बिषादु अपारा ॥ सचिवँ उठाइ राउ बैठारे। कहि प्रिय बचन रामु पगु धारे ॥ सिय समेत दोउ तनय निहारी। ब्याकुल भयउ भूमिपति भारी ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

लक्ष्मण राम के पास लौटकर सीता-राम को प्रणाम करते हैं और उनके साथ राजमहल आते हैं। नगर में गहरा विषाद है। सुमंत्र राजा को सँभालकर बैठाते हैं; राम के आने पर सीता सहित दोनों पुत्रों को देखकर दशरथ और आकुल हो जाते हैं।

दोहा ७६

सीय सहित सुत सुभग दोउ देखि देखि अकुलाइ। बारहिं बार सनेह बस राउ लेइ उर लाइ ॥ ७६ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

दशरथ सीता और सुंदर दोनों पुत्रों को बार-बार देखते हैं तथा प्रेम से बार-बार हृदय से लगाते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा ७७

वचनपालन और राजा का दुःख

चौपाइयाँ — मूल पाठ

सकइ न बोलि बिकल नरनाहू। सोक जनित उर दारुन दाहू ॥ नाइ सीसु पद अति अनुरागा। उठि रघुबीर बिदा तब मागा ॥ पितु असीस आयसु मोहि दीजै। हरष समय बिसमउ कत कीजै ॥ तात किएँ प्रिय प्रेम प्रमादू। जसु जग जाइ होइ अपबादू ॥ सुनि सनेह बस उठि नरनाहाँ। बैठारे रघुपति गहि बाहाँ ॥ सुनहु तात तुम्ह कहुँ मुनि कहहीं। रामु चराचर नायक अहहीं ॥ सुभ अरु असुभ करम अनुहारी। ईस देइ फलु ह्दयँ बिचारी ॥ करइ जो करम पाव फल सोई। निगम नीति असि कह सबु कोई ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

शोक से मौन पिता से राम प्रसन्न भाव से आशीर्वाद और विदा माँगते हैं, ताकि प्रेम के कारण वचन की मर्यादा न टूटे। राजा उन्हें बैठाकर कर्मफल के सामान्य सिद्धांत का स्मरण करते हुए अपनी उलझन और पीड़ा व्यक्त करते हैं।

दोहा ७७

औरु करै अपराधु कोउ और पाव फल भोगु। अति बिचित्र भगवंत गति को जग जानै जोगु ॥ ७७ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

दशरथ कहते हैं—अपराध कोई और करे तथा फल दूसरा भोगे! ईश्वर की गति अत्यंत विचित्र है; उसे कौन पूर्ण जान सकता है?

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अयोध्याकाण्ड · दोहा ७८

सीताजी को रोकने के अनेक प्रयत्न

चौपाइयाँ — मूल पाठ

रायँ राम राखन हित लागी। बहुत उपाय किए छलु त्यागी ॥ लखी राम रुख रहत न जाने। धरम धुरंधर धीर सयाने ॥ तब नृप सीय लाइ उर लीन्ही। अति हित बहुत भाँति सिख दीन्ही ॥ कहि बन के दुख दुसह सुनाए। सासु ससुर पितु सुख समुझाए ॥ सिय मनु राम चरन अनुरागा। घरु न सुगमु बनु बिषमु न लागा ॥ औरउ सबहिं सीय समुझाई। कहि कहि बिपिन बिपति अधिकाई ॥ सचिव नारि गुर नारि सयानी। सहित सनेह कहहिं मृदु बानी ॥ तुम्ह कहुँ तौ न दीन्ह बनबासू। करहु जो कहहिं ससुर गुर सासू ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

दशरथ राम को रोकने का प्रयास करते हैं, पर उनका सत्यनिष्ठ निश्चय समझ जाते हैं। फिर सीता को हृदय से लगाकर वन के कष्ट बताते हैं। मंत्री और गुरु की पत्नियाँ भी परिवार के हित में रहने की सीख देती हैं, किंतु सीता का मन रामचरणों में है।

दोहा ७८

सिख सीतलि हित मधुर मृदु सुनि सीतहि न सोहानि। सरद चंद चंदनि लगत जनु चकई अकुलानि ॥ ७८ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

सबकी शीतल और हितकारी वाणी भी वियोग के कारण सीता को चकवी के लिए शरद की चाँदनी जैसी पीड़ादायक लगती है।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा ७९

वनवेश में प्रस्थान

चौपाइयाँ — मूल पाठ

सीय सकुच बस उतरु न देई। सो सुनि तमकि उठी कैकेई ॥ मुनि पट भूषन भाजन आनी। आगें धरि बोली मृदु बानी ॥ नृपहि प्रान प्रिय तुम्ह रघुबीरा। सील सनेह न छाड़िहि भीरा ॥ सुकृत सुजसु परलोकु नसाऊ। तुम्हहि जान बन कहिहि न काऊ ॥ अस बिचारि सोइ करहु जो भावा। राम जननि सिख सुनि सुखु पावा ॥ भूपहि बचन बानसम लागे। करहिं न प्रान पयान अभागे ॥ लोग बिकल मुरुछित नरनाहू। काह करिअ कछु सूझ न काहू ॥ रामु तुरत मुनि बेषु बनाई। चले जनक जननिहि सिरु नाई ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

सीता संकोच से मौन हैं। कैकेयी तपस्वियों के वस्त्र और सामान लाकर राम को उनके निर्णय के अनुसार चलने को कहती हैं। उनकी बात राजा को बाण जैसी लगती है। राम तुरंत मुनिवेश धारण कर माता-पिता को प्रणाम करते हैं।

दोहा ७९

सजि बन साजु समाजु सबु बनिता बंधु समेत। बंदि बिप्र गुर चरन प्रभु चले करि सबहि अचेत ॥ ७९ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

पत्नी और भाई सहित वनयात्रा की तैयारी करके राम ब्राह्मणों तथा गुरु के चरण वंदते और सबको शोकविह्वल छोड़कर निकलते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा ८०

सेवकों और माताओं की देखभाल सौंपना

चौपाइयाँ — मूल पाठ

निकसि बसिष्ठ द्वार भए ठाढ़े। देखे लोग बिरह दव दाढ़े ॥ कहि प्रिय बचन सकल समुझाए। बिप्र बृंद रघुबीर बोलाए ॥ गुर सन कहि बरषासन दीन्हे। आदर दान बिनय बस कीन्हे ॥ जाचक दान मान संतोषे। मीत पुनीत प्रेम परितोषे ॥ दासीं दास बोलाइ बहोरी। गुरहि सौंपि बोले कर जोरी ॥ सब कै सार सँभार गोसाईं। करबि जनक जननी की नाई ॥ बारहिं बार जोरि जुग पानी। कहत रामु सब सन मृदु बानी ॥ सोइ सब भाँति मोर हितकारी। जेहि तें रहै भुआल सुखारी ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

राम शोकग्रस्त लोगों को समझाते हैं, गुरु की सहमति से दान और निर्वाह की व्यवस्था करते हैं तथा याचकों-मित्रों को संतुष्ट करते हैं। दास-दासियों को गुरु के संरक्षण में सौंपकर माता-पिता जैसे पालन का अनुरोध करते हैं और राजा को सुख पहुँचाने को कहते हैं।

दोहा ८०

मातु सकल मोरे बिरहँ जेहिं न होहिं दुख दीन। सोइ उपाउ तुम्ह करेहु सब पुर जन परम प्रबीन ॥ ८० ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

राम नगरवासियों से निवेदन करते हैं कि ऐसा उपाय करें जिससे उनकी सभी माताएँ वियोग में दुःखी और असहाय न हों।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा ८१

दशरथ का सुमंत्र को रथ ले जाने का आदेश

चौपाइयाँ — मूल पाठ

एहि बिधि राम सबहि समुझावा। गुर पद पदुम हरषि सिरु नावा। गनपती गौरि गिरीसु मनाई। चले असीस पाइ रघुराई ॥ राम चलत अति भयउ बिषादू। सुनि न जाइ पुर आरत नादू ॥ कुसगुन लंक अवध अति सोकू। हहरष बिषाद बिबस सुरलोकू ॥ गइ मुरुछा तब भूपति जागे। बोलि सुमंत्रु कहन अस लागे ॥ रामु चले बन प्रान न जाहीं। केहि सुख लागि रहत तन माहीं। एहि तें कवन ब्यथा बलवाना। जो दुखु पाइ तजहिं तनु प्राना ॥ पुनि धरि धीर कहइ नरनाहू। लै रथु संग सखा तुम्ह जाहू ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

गुरु का आशीष लेकर राम चलते हैं और नगर शोक में डूबता है। मूर्छा से उठे दशरथ अपने असह्य विरह का वर्णन करते हुए सुमंत्र को रथ लेकर पुत्रों के साथ जाने का आदेश देते हैं।

दोहा ८१

सुठि सुकुमार कुमार दोउ जनकसुता सुकुमारि। रथ चढ़ाइ देखराइ बनु फिरेहु गएँ दिन चारि ॥ ८१ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

राजा कहते हैं—दोनों राजकुमार और जनकसुता बहुत कोमल हैं; रथ पर वन दिखाकर चार दिन बाद उन्हें लौटा लाना।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा ८२

सीताजी को लौटाने की आशा

चौपाइयाँ — मूल पाठ

जौ नहिं फिरहिं धीर दोउ भाई। सत्यसंध दृढ़ब्रत रघुराई ॥ तौ तुम्ह बिनय करेहु कर जोरी। फेरिअ प्रभु मिथिलेसकिसोरी ॥ जब सिय कानन देखि डेराई। कहेहु मोरि सिख अवसरु पाई ॥ सासु ससुर अस कहेउ सँदेसू। पुत्रि फिरिअ बन बहुत कलेसू ॥ पितृगृह कबहुँ कबहुँ ससुरारी। रहेहु जहाँ रुचि होइ तुम्हारी ॥ एहि बिधि करेहु उपाय कदंबा। फिरइ त होइ प्रान अवलंबा ॥ नाहिं त मोर मरनु परिनामा। कछु न बसाइ भएँ बिधि बामा ॥ अस कहि मुरुछि परा महि राऊ। रामु लखनु सिय आनि देखाऊ ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

दशरथ कहते हैं कि सत्यव्रती राम-लक्ष्मण न लौटें तो सीता से विनय कर उन्हें लौटाएँ। मायके या ससुराल में उनकी इच्छा से रहने की सुविधा बताएं। सीता के लौटने को अपने प्राणों का सहारा कहकर राजा फिर मूर्छित होते हैं।

दोहा ८२

पाइ रजायसु नाइ सिरु रथु अति बेग बनाइ। गयउ जहाँ बाहेर नगर सीय सहित दोउ भाइ ॥ ८२ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

राजा की आज्ञा लेकर सुमंत्र शीघ्र रथ तैयार करते हैं और नगर के बाहर सीता सहित दोनों भाइयों के पास पहुँचते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा ८३

रथ चला, अयोध्या व्याकुल हुई

चौपाइयाँ — मूल पाठ

तब सुमंत्र नृप बचन सुनाए। करि बिनती रथ रामु चढ़ाए ॥ चढ़ि रथ सीय सहित दोउ भाई। चले हृदयँ अवधहि सिरु नाई ॥ चलत रामु लखि अवध अनाथा। बिकल लोग सब लागे साथा ॥ कृपासिंधु बहुबिधि समुझावहिं। फिरहिं प्रेम बस पुनि फिरि आवहिं ॥ लागति अवध भयावनि भारी। मानहुँ कालराति अँधिआरी ॥ घोर जंतु सम पुर नर नारी। डरपहिं एकहि एक निहारी ॥ घर मसान परिजन जनु भूता। सुत हित मीत मनहुँ जमदूता ॥ बागन्ह बिटप बेलि कुम्हिलाहीं। सरित सरोवर देखि न जाहीं ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

सुमंत्र राजा का संदेश सुनाकर सीता सहित दोनों भाइयों को रथ पर बैठाते हैं। वे अयोध्या को मन से प्रणाम कर चलते हैं। नगरवासी पीछे लगते हैं और समझाने पर भी लौट आते हैं। विरह में नगर, घर, बाग और जलाशय सभी भयावह तथा उदास लगते हैं।

दोहा ८३

हय गय कोटिन्ह केलिमृग पुरपसु चातक मोर। पिक रथांग सुक सारिका सारस हंस चकोर ॥ ८३ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

घोड़े, हाथी, पाले हुए मृग और अनेक पक्षियों की सूची से कवि अगले प्रसंग में समस्त नगर की विरह-दशा विस्तार से दिखाते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा ८४

तमसा तट पर पहला विश्राम

चौपाइयाँ — मूल पाठ

राम बियोग बिकल सब ठाढ़े। जहँ तहँ मनहुँ चित्र लिखि काढ़े ॥ नगरु सफल बनु गहबर भारी। खग मृग बिपुल सकल नर नारी ॥ बिधि कैकेई किरातिनि कीन्ही। जेंहि दव दुसह दसहुँ दिसि दीन्ही ॥ सहि न सके रघुबर बिरहागी। चले लोग सब ब्याकुल भागी ॥ सबहिं बिचार कीन्ह मन माहीं। राम लखन सिय बिनु सुखु नाहीं ॥ जहाँ रामु तहँ सबुइ समाजू। बिनु रघुबीर अवध नहिं काजू ॥ चले साथ अस मंत्रु दृढ़ाई। सुर दुर्लभ सुख सदन बिहाई ॥ राम चरन पंकज प्रिय जिन्हही। बिषय भोग बस करहिं कि तिन्हही ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

राम-वियोग में प्राणी चित्रवत ठिठक गए हैं। नगरवासियों को राम-लक्ष्मण-सीता के बिना नगर और सुख-साधन व्यर्थ लगते हैं। वे निश्चय करते हैं कि जहाँ राम हैं, वहीं उनका समाज है और सांसारिक सुविधा छोड़कर साथ चल पड़ते हैं।

दोहा ८४

बालक बृद्ध बिहाइ गृँह लगे लोग सब साथ। तमसा तीर निवासु किय प्रथम दिवस रघुनाथ ॥ ८४ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

बालकों और वृद्धों को घर छोड़कर लोग साथ चले; वनयात्रा के पहले दिन राम ने तमसा नदी के किनारे निवास किया।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा ८५

नगरवासियों का कष्ट देखकर रात्रि में प्रस्थान

चौपाइयाँ — मूल पाठ

रघुपति प्रजा प्रेमबस देखी। सदय हृदयँ दुखु भयउ बिसेषी ॥ करुनामय रघुनाथ गोसाँई। बेगि पाइअहिं पीर पराई ॥ कहि सप्रेम मृदु बचन सुहाए। बहुबिधि राम लोग समुझाए ॥ किए धरम उपदेस घनेरे। लोग प्रेम बस फिरहिं न फेरे ॥ सीलु सनेहु छाड़ि नहिं जाई। असमंजस बस भे रघुराई ॥ लोग सोग श्रम बस गए सोई। कछुक देवमायाँ मति मोई ॥ जबहिं जाम जुग जामिनि बीती। राम सचिव सन कहेउ सप्रीती ॥ खोज मारि रथु हाँकहु ताता। आन उपायँ बनिहि नहिं बाता ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

लोगों का प्रेम और दुःख देखकर करुणामय राम उन्हें लौटने की शिक्षा देते हैं, किंतु वे नहीं मानते। श्रम और शोक से सब सो जाते हैं। आधी रात बीतने पर राम सुमंत्र को रथ के चिह्न छिपाते हुए आगे बढ़ने को कहते हैं।

दोहा ८५

राम लखन सिय जान चढ़ि संभु चरन सिरु नाइ ॥ सचिवँ चलायउ तुरत रथु इत उत खोज दुराइ ॥ ८५ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

शिवजी को प्रणाम कर राम, लक्ष्मण और सीता रथ पर चढ़े; सुमंत्र ने खोजने योग्य रथचिह्न छिपाकर रथ चला दिया।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा ८६

अवध लौटे लोगों का व्रत-संकल्प

चौपाइयाँ — मूल पाठ

जागे सकल लोग भएँ भोरू। गे रघुनाथ भयउ अति सोरू ॥ रथ कर खोज कतहहुँ नहिं पावहिं। राम राम कहि चहु दिसि धावहिं ॥ मनहुँ बारिनिधि बूड़ जहाजू। भयउ बिकल बड़ बनिक समाजू ॥ एकहि एक देंहिं उपदेसू। तजे राम हम जानि कलेसू ॥ निंदहिं आपु सराहहिं मीना। धिग जीवनु रघुबीर बिहीना ॥ जौं पै प्रिय बियोगु बिधि कीन्हा। तौ कस मरनु न मागें दीन्हा ॥ एहि बिधि करत प्रलाप कलापा। आए अवध भरे परितापा ॥ बिषम बियोगु न जाइ बखाना। अवधि आस सब राखहिं प्राना ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

प्रभात में राम को न पाकर लोग चारों ओर खोजते और विलाप करते हैं। फिर समझते हैं कि उनके कष्ट का विचार करके प्रभु आगे गए हैं। दुःख से अयोध्या लौटते हैं और चौदह वर्ष बाद दर्शन की आशा पर जीवन सँभालते हैं।

दोहा ८६

राम दरस हित नेम ब्रत लगे करन नर नारि। मनहुँ कोक कोकी कमल दीन बिहीन तमारि ॥ ८६ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

राम-दर्शन के लिए नर-नारी नियम और व्रत करने लगे; उनकी विरह-दशा सूर्य से रहित चकवा-चकवी तथा कमल जैसी है।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा ८७

शृंगवेरपुर और गंगाजी के दर्शन

चौपाइयाँ — मूल पाठ

सीता सचिव सहित दोउ भाई। सृंगबेरपुर पहुँचे जाई ॥ उतरे राम देवसरि देखी। कीन्ह दंडवत हरषु बिसेषी ॥ लखन सचिवँ सियँ किए प्रनामा। सबहि सहित सुखु पायउ रामा ॥ गंग सकल मुद मंगल मूला। सब सुख करनि हरनि सब सूला ॥ कहि कहि कोटिक कथा प्रसंगा। रामु बिलोकहिं गंग तरंगा ॥ सचिवहि अनुजहि प्रियहि सुनाई। बिबुध नदी महिमा अधिकाई ॥ मज्जनु कीन्ह पंथ श्रम गयऊ। सुचि जलु पिअत मुदित मन भयऊ ॥ सुमिरत जाहि मिटइ श्रम भारू। तेहि श्रम यह लौकिक ब्यवहारू ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

सीता और सुमंत्र सहित राम-लक्ष्मण शृंगवेरपुर पहुँचे। गंगाजी को देखकर सबने प्रणाम किया। राम ने गंगा की महिमा और कथाएँ सुनाईं। स्नान और निर्मल जलपान के बाद यात्रा का श्रम मिटा; कवि इसे प्रभु का मानवीय व्यवहार बताते हैं।

दोहा ८७

सुध्द सचिदानंदमय कंद भानुकुल केतु। चरित करत नर अनुहरत संसृति सागर सेतु ॥ ८७ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

सच्चिदानंदस्वरूप सूर्यवंशकेतु राम मनुष्य जैसे चरित्र करते हुए भी भक्तों के लिए संसार-सागर पार करने के सेतु हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा ८८

निषादराज गुह का प्रेमपूर्ण स्वागत

चौपाइयाँ — मूल पाठ

यह सुधि गुहँ निषाद जब पाई। मुदित लिए प्रिय बंधु बोलाई ॥ लिए फल मूल भेंट भरि भारा। मिलन चलेउ हिँयँ हरषु अपारा ॥ करि दंडवत भेंट धरि आगें। प्रभुहि बिलोकत अति अनुरागें ॥ सहज सनेह बिबस रघुराई। पूँछी कुसल निकट बैठाई ॥ नाथ कुसल पद पंकज देखें। भयउँ भागभाजन जन लेखें ॥ देव धरनि धनु धामु तुम्हारा। मैं जनु नीचु सहित परिवारा ॥ कृपा करिअ पुर धारिअ पाऊ। थापिय जनु सबु लोगु सिहाऊ ॥ कहेहु सत्य सबु सखा सुजाना। मोहि दीन्ह पितु आयसु आना ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

गुह फल-मूल की भेंट लेकर आते हैं। राम उन्हें प्रेम से पास बैठाकर कुशल पूछते हैं। गुह अपना सर्वस्व समर्पित कर नगर में पधारने का अनुरोध करते हैं। राम उन्हें सखा कहकर पिता की आज्ञा और वनव्रत समझाते हैं।

दोहा ८८

बरष चारिदस बासु बन मुनि ब्रत बेषु अहारु। ग्राम बासु नहिं उचित सुनि गुहहि भयउ दुखु भारु ॥ ८८ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

चौदह वर्ष वन में मुनिवेश, व्रत और आहार अपनाना है; गाँव में रहना उचित नहीं—यह सुनकर गुह बहुत दुःखी होते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा ८९

गुह की सेवा और शिंशपा के नीचे शय्या

चौपाइयाँ — मूल पाठ

राम लखन सिय रूप निहारी। कहहिं सप्रेम ग्राम नर नारी ॥ ते पितु मातु कहहु सखि कैसे। जिन्ह पठए बन बालक ऐसे ॥ एक कहहिं भल भूपति कीन्हा। लोयन लाहु हमहि बिधि दीन्हा ॥ तब निषादपति उर अनुमाना। तरु सिंसुपा मनोहर जाना ॥ लै रघुनाथहि ठाउँ देखावा। कहेउ राम सब भाँति सुहावा ॥ पुरजन करि जोहारु घर आए। रघुबर संध्या करन सिधाए ॥ गुहँ सँवारि साँथरी डसाई। कुस किसलयमय मृदुल सुहाई ॥ सुचि फल मूल मधुर मृदु जानी। दोना भरि भरि राखेसि पानी ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

ग्रामवासी तीनों को देखकर प्रेमविह्वल होते हैं। गुह शिंशपा वृक्ष के नीचे सुंदर स्थान दिखाते हैं; राम उसे पसंद करते हैं। संध्या के बाद गुह कुश और कोमल पत्तों की शय्या बिछाते तथा स्वच्छ फल-मूल और जल रखते हैं।

दोहा ८९

सिय सुमंत्र भ्राता सहित कंद मूल फल खाइ। सयन कीन्ह रघुबंसमनि पाय पलोटत भाइ ॥ ८९ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

सीता, सुमंत्र और भाई सहित फल-मूल ग्रहण करके राम शयन करते हैं; लक्ष्मण उनके चरण दबाते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा ९०

लक्ष्मण और गुह का रात्रि-जागरण

चौपाइयाँ — मूल पाठ

उठे लखनु प्रभु सोवत जानी। कहि सचिवहि सोवन मृदु बानी ॥ कछुक दूर सजि बान सरासन। जागन लगे बैठि बीरासन ॥ गुँह बोलाइ पाहरू प्रतीती। ठावँ ठाँव राखे अति प्रीती ॥ आपु लखन पहिं बैठेउ जाई। कटि भाथी सर चाप चढ़ाई ॥ सोवत प्रभुहि निहारि निषादू। भयउ प्रेम बस ह्दयँ बिषादू ॥ तनु पुलकित जलु लोचन बहई। बचन सप्रेम लखन सन कहई ॥ भूपति भवन सुभायँ सुहावा। सुरपति सदनु न पटतर पावा ॥ मनिमय रचित चारु चौबारे। जनु रतिपति निज हाथ सँवारे ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

राम के सोने पर लक्ष्मण सुमंत्र को विश्राम करने को कहते और धनुष-बाण लेकर पहरा देते हैं। गुह विश्वस्त पहरेदार तैनात करके पास बैठते हैं। धरती पर सोते राम को देखकर उन्हें अयोध्या के अनुपम राजभवन का स्मरण होता है।

दोहा ९०

सुचि सुबिचित्र सुभोगमय सुमन सुगंध सुबास। पलँग मंजु मनिदीप जहँ सब बिधि सकल सुपास ॥ ९० ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

गुह उस राजमहल की सुगंधित, कोमल, सुंदर शय्या और मणिदीप याद करते हैं, जहाँ सुख की सभी सुविधाएँ रहती थीं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा ९१

धरती की शय्या देखकर गुह का विषाद

चौपाइयाँ — मूल पाठ

बिबिध बसन उपधान तुराई। छीर फेन मृदु बिसद सुहाई ॥ तहँ सिय रामु सयन निसि करहीं। निज छबि रति मनोज मदु हरहीं ॥ ते सिय रामु साथरीं सोए। श्रमित बसन बिनु जाहिं न जोए ॥ मातु पिता परिजन पुरबासी। सखा सुसील दास अरु दासी ॥ जोगवहिं जिन्हहि प्रान की नाई। महि सोवत तेइ राम गोसाईं ॥ पिता जनक जग बिदित प्रभाऊ। ससुर सुरेस सखा रघुराऊ ॥ रामचंदु पति सो बैदेही। सोवत महि बिधि बाम न केही ॥ सिय रघुबीर कि कानन जोगू। करम प्रधान सत्य कह लोगू ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

गुह कहते हैं कि जो राम-सीता राजमहल की उजली कोमल शय्याओं पर सोते और परिवार द्वारा प्राणवत सँभाले जाते थे, वे अब धरती पर हैं। वे जनक और दशरथ का वैभव याद करते हुए भाग्य की विपरीत दशा पर दुःख व्यक्त करते हैं।

दोहा ९१

कैकयनंदिनि मंदमति कठिन कुटिलपनु कीन्ह। जेहीं रघुनंदन जानकिहि सुख अवसर दुखु दीन्ह ॥ ९१ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

गुह कैकेयी के कठोर निर्णय को दोष देते हैं, जिसने राम-सीता को सुख के अवसर पर दुःख दिया।

↑ क्रम-सूची पर लौटें
अयोध्याकाण्ड · दोहा ९२

लक्ष्मण का कर्म और विवेक का उपदेश

चौपाइयाँ — मूल पाठ

भइ दिनकर कुल बिटप कुठारी। कुमति कीन्ह सब बिस्व दुखारी ॥ भयउ बिषादु निषादहि भारी। राम सीय महि सयन निहारी ॥ बोले लखन मधुर मृदु बानी। ग्यान बिराग भगति रस सानी ॥ काहु न कोउ सुख दुख कर दाता। निज कृत करम भोग सबु भ्राता ॥ जोग बियोग भोग भल मंदा। हित अनहित मध्यम भ्रम फंदा ॥ जनमु मरनु जहँ लगि जग जालू। संपती बिपति करमु अरु कालू ॥ धरनि धामु धनु पुर परिवारू। सरगु नरकु जहँ लगि ब्यवहारू ॥ देखिअ सुनिअ गुनिअ मन माहीं। मोह मूल परमारथु नाहीं ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

गुह के शोक पर लक्ष्मण ज्ञान, वैराग्य और भक्ति से भरी वाणी बोलते हैं। वे कहते हैं कि सुख-दुःख, मिलन-वियोग, संपत्ति-विपत्ति और जन्म-मरण कर्म तथा जगत के परिवर्तनशील व्यवहार हैं; मोह के कारण इन्हें स्थायी सत्य मान लिया जाता है।

दोहा ९२

सपनें होइ भिखारि नृप रंकु नाकपति होइ। जागें लाभु न हानि कछु तिमि प्रपंच जियँ जोइ ॥ ९२ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

स्वप्न में राजा भिखारी और गरीब इंद्र बन जाए, तो जागने पर वास्तविक लाभ-हानि नहीं होती; जगत के प्रपंच को भी विवेक से देखो।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा ९३

जागरण का अर्थ और राम का ब्रह्मस्वरूप

चौपाइयाँ — मूल पाठ

अस बिचारि नहिं कीजा रोसू। काहुहि बादि न देइअ दोसू ॥ मोह निसाँ सबु सोवनिहारा। देखिअ सपन अनेक प्रकारा ॥ एहिं जग जामिनि जागहिं जोगी। परमारथी प्रपंच बियोगी ॥ जानिअ तबहिं जीव जग जागा। जब जब बिषय बिलास बिरागा ॥ होइ बिबेकु मोह भ्रम भागा। तब रघुनाथ चरन अनुरागा ॥ सखा परम परमारथु एहू। मन क्रम बचन राम पद नेहू ॥ राम ब्रह्म परमारथ रूपा। अबिगत अलख अनादि अनूपा ॥ सकल बिकार रहित गतभेदा। कहि नित नेति निरूपहिं बेदा।
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

लक्ष्मण व्यर्थ क्रोध और दोषारोपण छोड़ने को कहते हैं। विषयों से वैराग्य तथा विवेक जगने पर मोह मिटता और रामचरणों में अनुराग होता है। मन-वचन-कर्म से रामप्रेम ही परम हित है; राम विकाररहित, अनादि और वेदों द्वारा अनिर्वचनीय ब्रह्म हैं।

दोहा ९३

भगत भूमि भूसुर सुरभि सुर हित लागि कृपाल। करत चरित धरि मनुज तनु सुनत मिटहि जग जाल ॥ ९३ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

करुणामय प्रभु भक्तों, पृथ्वी और लोकहित के लिए मनुष्यरूप में चरित्र करते हैं; उनका श्रवण सांसारिक बंधन मिटाने वाला है।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा ९४

जटाधारण और सुमंत्र की लौटने की विनती

पारायण संकेत: मासपारायण, पंद्रहवा विश्राम

चौपाइयाँ — मूल पाठ

सखा समुझि अस परिहरि मोहु। सिय रघुबीर चरन रत होहू ॥ कहत राम गुन भा भिनुसारा। जागे जग मंगल सुखदारा ॥ सकल सोच करि राम नहावा। सुचि सुजान बट छीर मगावा ॥ अनुज सहित सिर जटा बनाए। देखि सुमंत्र नयन जल छाए ॥ हृदयँ दाहु अति बदन मलीना। कह कर जोरि बचन अति दीना ॥ नाथ कहेउ अस कोसलनाथा। लै रथु जाहु राम कें साथा ॥ बनु देखाइ सुरसरि अन्हवाई। आनेहु फेरि बेगि दोउ भाई ॥ लखनु रामु सिय आनेहु फेरी। संसय सकल सँकोच निबेरी ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

लक्ष्मण गुह को मोह छोड़कर सीता-राम में अनुरक्त होने को कहते हैं। प्रभात में राम स्नान करके वटदूध से लक्ष्मण सहित जटा बनाते हैं। सुमंत्र आँसू भरकर दशरथ का आदेश सुनाते हैं और तीनों को वापस ले जाने की विनती करते हैं।

दोहा ९४

नृप अस कहेउ गोसाईँ जस कहइ करौं बलि सोइ। करि बिनती पायन्ह परेउ दीन्ह बाल जिमि रोइ ॥ ९४ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

सुमंत्र कहते हैं—राजा ने ऐसा कहा है, फिर भी आप जो कहेंगे वही करूँगा; चरणों में गिरकर वे बालक की तरह रोते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा ९५

राम का सत्यधर्म और पिता को आश्वासन

चौपाइयाँ — मूल पाठ

तात कृपा करि कीजिअ सोई। जातें अवध अनाथ न होई ॥ मंत्रहि राम उठाइ प्रबोधा। तात धरम मतु तुम्ह सबु सोधा ॥ सिबि दधीचि हरिचंद नरेसा। सहे धरम हित कोटि कलेसा ॥ रंतिदेव बलि भूप सुजाना। धरमु धरेउ सहि संकट नाना ॥ धरमु न दूसर सत्य समाना। आगम निगम पुरान बखाना ॥ मैं सोइ धरमु सुलभ करि पावा। तजें तिहूँ पुर अपजसु छावा ॥ संभावित कहुँ अपजस लाहू। मरन कोटि सम दारुन दाहू ॥ तुम्ह सन तात बहुत का कहऊँ। दिएँ उतरु फिरि पातकु लहऊँ ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

सुमंत्र अयोध्या को अनाथ न होने देने की विनती करते हैं। राम उन्हें उठाकर शिबि, दधीचि, हरिश्चंद्र, रंतिदेव और बलि के धर्मपालन का स्मरण कराते हैं। वे सत्य से बढ़कर धर्म नहीं मानते और प्राप्त वचनपालन छोड़ना अनुचित बताते हैं।

दोहा ९५

पितु पद गहि कहि कोटि नति बिनय करब कर जोरि। चिंता कवनिहु बात कै तात करिअ जनि मोरि ॥ ९५ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

पिता के चरण पकड़कर मेरी अनेक प्रणामपूर्वक विनती कहना—तात, मेरी किसी बात की चिंता न करें।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा ९६

राजा का सीताजी के लिए संदेश

चौपाइयाँ — मूल पाठ

तुम्ह पुनि पितु सम अति हित मोरें। बिनती करउँ तात कर जोरें ॥ सब बिधि सोइ करतब्य तुम्हारें। दुख न पाव पितु सोच हमारें ॥ सुनि रघुनाथ सचिव संबादू। भयउ सपरिजन बिकल निषादू ॥ पुनि कछु लखन कही कटु बानी। प्रभु बरजे बड़ अनुचित जानी ॥ सकुचि राम निज सपथ देवाई। लखन सँदेसु कहिअ जनि जाई ॥ कह सुमंत्रु पुनि भूप सँदेसू। सहि न सकिहि सिय बिपिन कलेसू ॥ जेहि बिधि अवध आव फिरि सीया। सोइ रघुबरहि तुम्हहि करनीया ॥ नतरु निपट अवलंब बिहीना। मैं न जिअब जिमि जल बिनु मीना ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

राम सुमंत्र को पिता समान हितैषी कहकर दशरथ का दुःख घटाने को कहते हैं। लक्ष्मण की कुछ तीखी बातें वे रोकते हैं और उन्हें न सुनाने का वचन लेते हैं। सुमंत्र बताते हैं कि राजा सीता के वनकष्ट की कल्पना सह नहीं पाते।

दोहा ९६

मइकें ससरें सकल सुख जबहिं जहाँ मनु मान ॥ तँह तब रहिहि सुखेन सिय जब लगि बिपति बिहान ॥ ९६ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

राजा का संदेश है—विपत्ति बीतने तक सीता अपनी इच्छा से मायके या ससुराल में जहाँ मन हो, सुख से रहें।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा ९७

सीता का छाया और प्रकाश की उपमाओं से उत्तर

चौपाइयाँ — मूल पाठ

बिनती भूप कीन्ह जेहि भाँती। आरति प्रीति न सो कहि जाती ॥ पितु सँदेसु सुनि कृपानिधाना। सियहि दीन्ह सिख कोटि बिधाना ॥ सासु ससुर गुर प्रिय परिवारू। फिरतु त सब कर मिटै खभारू ॥ सुनि पति बचन कहति बैदेही। सुनहु प्रानपति परम सनेही ॥ प्रभु करुनामय परम बिबेकी। तनु तजि रहति छाँह किमि छेंकी ॥ प्रभा जाइ कहँ भानु बिहाई। कहँ चंद्रिका चंदु तजि जाई ॥ पतिहि प्रेममय बिनय सुनाई। कहति सचिव सन गिरा सुहाई ॥ तुम्ह पितु ससुर सरिस हितकारी। उतरु देउँ फिरि अनुचित भारी ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

राम सीता को लौटकर परिवार का दुःख मिटाने की सीख देते हैं। सीता पूछती हैं कि देह से छाया, सूर्य से किरण और चंद्रमा से चाँदनी कैसे अलग रहें? सुमंत्र को पिता-ससुर समान मानकर वे विनय से अपने साथ रहने का निश्चय बताती हैं।

दोहा ९७

आरति बस सनमुख भइउँ बिलगु न मानब तात। आरजसुत पद कमल बिनु बादि जहाँ लगि नात ॥ ९७ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

सीता कहती हैं—दुःखवश सामने बोल रही हूँ, बुरा न मानें; आर्यपुत्र के चरणों के बिना मेरे लिए अन्य संबंध सुखद नहीं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा ९८

सीताजी का वन में सुखी रहने का संदेश

चौपाइयाँ — मूल पाठ

पितु बैभव बिलास मैं डीठा। नृप मनि मुकुट मिलित पद पीठा ॥ सुखनिधान अस पितु गृह मोरें। पिय बिहीन मन भाव न भोरें ॥ ससुर चक्कवइ कोसलराऊ। भुवन चारिदस प्रगट प्रभाऊ ॥ आगें होइ जेहि सुरपति लेई। अरध सिंघासन आसनु देई ॥ ससुरु एतादृस अवध निवासू। प्रिय परिवारु मातु सम सासू ॥ बिनु रघुपति पद पदुम परागा। मोहि केउ सपनेहुँ सुखद न लागा ॥ अगम पंथ बनभूमि पहारा। करि केहरि सर सरित अपारा ॥ कोल किरात कुरंग बिहंगा। मोहि सब सुखद प्रानपति संगा ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

सीता जनक के ऐश्वर्य, दशरथ के प्रताप, प्रिय परिवार और मातृतुल्य सासों का स्मरण करती हैं। फिर कहती हैं कि राम के बिना उनमें भी आनंद नहीं। राम के साथ दुर्गम मार्ग, पर्वत, वन्यजीव और वनवासी भी उन्हें सुखद लगते हैं।

दोहा ९८

सासु ससुर सन मोरि हुँति बिनय करबि परि पायँ ॥ मोर सोचु जनि करिअ कछु मैं बन सुखी सुभायँ ॥ ९८ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

सास-ससुर के चरणों में मेरी ओर से विनती कहना—मेरी चिंता न करें, मैं वन में स्वभावतः सुखी हूँ।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा ९९

सुमंत्र की विदाई और अश्वों का विरह

चौपाइयाँ — मूल पाठ

प्राननाथ प्रिय देवर साथा। बीर धुरीन धरें धनु भाथा ॥ नहिं मग श्रमु भ्रमु दुख मन मोरें। मोहि लगि सोचु करिअ जनि भोरें ॥ सुनि सुमंत्रु सिय सीतलि बानी। भयउ बिकल जनु फनि मनि हानी ॥ नयन सूझ नहिं सुनइ न काना। कहि न सकइ कछु अति अकुलाना ॥ राम प्रबोधु कीन्ह बहु भाँति। तदपि होति नहिं सीतलि छाती ॥ जतन अनेक साथ हित कीन्हे। उचित उतर रघुनंदन दीन्हे ॥ मेटि जाइ नहिं राम रजाई। कठिन करम गति कछु न बसाई ॥ राम लखन सिय पद सिरु नाई। फिरेउ बनिक जिमि मूर गवाँई ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

सीता दोनों वीरों के साथ स्वयं को निर्भय और सुखी बताती हैं। सुमंत्र फिर भी शोक से व्याकुल हैं। राम अनेक प्रकार से समझाते हैं; उनका निर्णय बदलता नहीं। अंत में सुमंत्र तीनों को प्रणाम कर भारी हृदय से लौटते हैं।

दोहा ९९

रथ हाँकेउ हय राम तन हेरि हेरि हिहिनाहिं। देखि निषाद बिषादबस धुनहिं सीस पछिताहिं ॥ ९९ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

रथ के घोड़े राम की ओर बार-बार देखकर हिनहिनाते हैं; निषाद यह दृश्य देखकर शोक से सिर धुनते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · सोरठा १००

केवट की प्रेमभरी शर्त

चौपाइयाँ — मूल पाठ

जासु बियोग बिकल पसु ऐसे। प्रजा मातु पितु जीहहिं कैसें ॥ बरबस राम सुमंत्रु पठाए। सुरसरि तीर आपु तब आए ॥ मागी नाव न केवटु आना। कहइ तुम्हार मरमु मैं जाना ॥ चरन कमल रज कहुँ सबु कहई। मानुष करनि मूरि कछु अहई ॥ छुअत सिला भइ नारि सुहाई। पाहन तें न काठ कठिनाई ॥ तरनिउ मुनि घरिनि होइ जाई। बाट परइ मोरि नाव उड़ाई ॥ एहिं प्रतिपालउँ सबु परिवारू। नहिं जानउँ कछु अउर कबारू ॥ जौ प्रभु पार अवसि गा चहहू। मोहि पद पदुम पखारन कहहू ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

पशुओं का विरह देखकर माता-पिता और प्रजा की दशा का अनुमान होता है। राम नाव माँगते हैं। केवट अहल्या-उद्धार का स्मरण करके प्रेमपूर्ण विनोद करता है कि चरणरज से नाव भी नारी बन गई तो परिवार का पालन कैसे होगा; पहले चरण धोने दें।

छंद — मूल पाठ

पद कमल धोइ चढ़ाइ नाव न नाथ उतराई चहौं। मोहि राम राउरि आन दसरथ सपथ सब साची कहौं ॥ बरु तीर मारहुँ लखनु पै जब लगि न पाय पखारिहौं। तब लगि न तुलसीदास नाथ कृपाल पारु उतारिहौं ॥
छंद का सरल हिंदी अर्थ

केवट चरण धोकर नाव पर चढ़ाने की विनती करता है और उतराई न चाहने की बात कहता है। वह शपथपूर्वक आग्रह करता है कि चरण-पखारने की अनुमति के बिना पार नहीं उतारेगा।

सोरठा १००

सुनि केबट के बैन प्रेम लपेटे अटपटे। बिहसे करुनाऐन चितइ जानकी लखन तन ॥ १०० ॥
सोरठा का सरल हिंदी अर्थ

केवट की विचित्र किंतु प्रेम से भरी बातें सुनकर करुणामय राम जानकी और लक्ष्मण की ओर देखकर हँस पड़ते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १०१

केवट द्वारा चरण-पखारना और गंगा पार कराना

चौपाइयाँ — मूल पाठ

कृपासिंधु बोले मुसुकाई। सोइ करु जेंहि तव नाव न जाई ॥ वेगि आनु जल पाय पखारू। होत बिलंबु उतारहि पारू ॥ जासु नाम सुमरत एक बारा। उतरहिं नर भवसिंधु अपारा ॥ सोइ कृपालु केवटहि निहोरा। जेहिं जगु किय तिहु पगहु ते थोरा ॥ पद नख निरखि देवसरि हरषी। सुनि प्रभु बचन मोहँ मति करषी ॥ केवट राम रजायसु पावा। पानि कठवता भरि लेइ आवा ॥ अति आनंद उमगि अनुरागा। चरन सरोज पखारन लागा ॥ बरषि सुमन सुर सकल सिहाहीं। एहि सम पुन्यपुंज कोउ नाहीं ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

राम मुस्कराकर केवट को नाव सुरक्षित रखने का उपाय करने और जल लाकर चरण धोने देते हैं। जिनका नाम संसार-सागर से तारता है, वे भक्त से नाव के लिए निवेदन करते हैं। केवट प्रेम से कठौते में जल लाकर चरण पखारता है।

दोहा १०१

पद पखारि जलु पान करि आपु सहित परिवार। पितर पारु करि प्रभुहि पुनि मुदित गयउ लेइ पार ॥ १०१ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

चरणोदक ग्रहण करके परिवार और पितरों के उद्धार का आनंद पाता केवट प्रभु को प्रसन्नतापूर्वक दूसरे किनारे ले जाता है।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १०२

उतराई के बदले निर्मल भक्ति का वरदान

चौपाइयाँ — मूल पाठ

उतरि ठाड़ भए सुरसरि रेता। सीयराम गुह लखन समेता ॥ केवट उतरि दंडवत कीन्हा। प्रभुहि सकुच एहि नहिं कछु दीन्हा ॥ पिय हिय की सिय जाननिहारी। मनि मुदरी मन मुदित उतारी ॥ कहेउ कृपाल लेहि उतराई। केवट चरन गहे अकुलाई ॥ नाथ आजु मैं काह न पावा। मिटे दोष दुख दारिद दावा ॥ बहुत काल मैं कीन्हि मजूरी। आजु दीन्ह बिधि बनि भलि भूरी ॥ अब कछु नाथ न चाहिअ मोरें। दीनदयाल अनुग्रह तोरें ॥ फिरती बार मोहि जे देबा। सो प्रसादु मैं सिर धरि लेबा ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

किनारे उतरकर राम को लगता है कि केवट को कुछ नहीं दिया। सीता उनका भाव जानकर अंगूठी उतारती हैं। केवट कहता है कि आज सेवा से सब मिल गया, अब कुछ नहीं चाहिए; लौटने पर जो प्रसाद मिलेगा, उसे स्वीकार करेगा।

दोहा १०२

बहुत कीन्ह प्रभु लखन सियँ नहिं कछु केवटु लेइ। बिदा कीन्ह करुनायतन भगति बिमल बरु देइ ॥ १०२ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

राम, लक्ष्मण और सीता के बहुत कहने पर भी केवट उतराई नहीं लेता; राम निर्मल भक्ति का वर देकर उसे विदा करते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १०३

गंगाजी से सीता की प्रार्थना

चौपाइयाँ — मूल पाठ

तब मज्जनु करि रघुकुलनाथा। पूजि पारथिव नायउ माथा ॥ सियँ सुरसरिहि कहेउ कर जोरी। मातु मनोरथ पुरउबि मोरी ॥ पति देवर संग कुसल बहोरी। आइ करौं जेहिं पूजा तोरी ॥ सुनि सिय बिनय प्रेम रस सानी। भइ तब बिमल बारि बर बानी ॥ सुनु रघुबीर प्रिया बैदेही। तव प्रभाउ जग बिदित न केही ॥ लोकप होहिं बिलोकत तोरें। तोहि सेवहिं सब सिधि कर जोरें ॥ तुम्ह जो हमहि बड़ि बिनय सुनाई। कृपा कीन्हि मोहि दीन्हि बड़ाई ॥ तदपि देबि मैं देबि असीसा। सफल होपन हित निज बागीसा ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

राम स्नान करके पार्थिव शिवपूजन करते हैं। सीता गंगा से पति और देवर सहित कुशल लौटकर पूजा करने का मनोरथ कहती हैं। कथा में गंगा दिव्य वाणी से सीता के प्रभाव और विनय का सम्मान कर आशीर्वाद देती हैं।

दोहा १०३

प्राननाथ देवर सहित कुसल कोसला आइ। पूजहि सब मनकामना सुजसु रहिहि जग छाइ ॥ १०३ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

गंगा आशीष देती हैं कि सीता पति और देवर सहित कुशलपूर्वक कोसल लौटेंगी तथा उनकी मनोकामना और यश सफल होंगे।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १०४

गुह को साथ चलने की अनुमति

चौपाइयाँ — मूल पाठ

गंग बचन सुनि मंगल मूला। मुदित सीय सुरसरि अनुकुला ॥ तब प्रभु गुहहि कहेउ घर जाहू। सुनत सूख मुखु भा उर दाहू ॥ दीन बचन गुह कह कर जोरी। बिनय सुनहु रघुकुलमनि मोरी ॥ नाथ साथ रहि पंथु देखाई। करि दिन चारि चरन सेवकाई ॥ जेहिं बन जाइ रहब रघुराई। परनकुटी मैं करबि सुहाई ॥ तब मोहि कहँ जसि देब रजाई। सोइ करिहउँ रघुबीर दोहाई ॥ सहज सनेह राम लखि तासु। संग लीन्ह गुह हृदय हुलासू ॥ पुनि गुहँ ग्याति बोलि सब लीन्हे। करि परितोषु बिदा तब कीन्हे ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

गंगा के आशीर्वाद से सीता प्रसन्न हैं। राम गुह को घर लौटने को कहते हैं, पर वे कुछ दिन मार्ग दिखाने, सेवा करने और पर्णकुटी बनाने तक साथ रहने की विनती करते हैं। निष्कपट प्रेम देखकर राम उन्हें साथ लेते हैं।

दोहा १०४

तब गनपति सिव सुमिरि प्रभु नाइ सुरसरिहि माथ। सखा अनुज सिय सहित बन गवनु कीन्ह रघुनाथ ॥ १०४ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

गणपति और शिव का स्मरण तथा गंगा को प्रणाम करके राम मित्र गुह, छोटे भाई और सीता सहित वन की ओर बढ़ते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १०५

तीर्थराज प्रयाग का राजकीय रूपक

चौपाइयाँ — मूल पाठ

तेहि दिन भयउ बिटप तर बासू। लखन सखाँ सब कीन्ह सुपासू ॥ प्रात प्रातकृत करि रधुसाई। तीरथराजु दीख प्रभु जाई ॥ सचिव सत्य श्रध्दा प्रिय नारी। माधव सरिस मीतु हितकारी ॥ चारि पदारथ भरा भँडारु। पुन्य प्रदेस देस अति चारु ॥ छेत्र अगम गढ़ु गाढ़ सुहावा। सपनेहुँ नहिं प्रतिपच्छिन्ह पावा ॥ सेन सकल तीरथ बर बीरा। कलुष अनीक दलन रनधीरा ॥ संगमु सिंहासनु सुठि सोहा। छत्रु अखयबटु मुनि मनु मोहा ॥ चवँर जमुन अरु गंग तरंगा। देखि होहिं दुख दारिद भंगा ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

वृक्ष के नीचे रात बिताकर और प्रातःकर्म करके राम प्रयाग पहुँचते हैं। कवि प्रयाग को राजा की तरह वर्णित करते हैं—सत्य मंत्री, श्रद्धा रानी, माधव हितैषी मित्र, संगम सिंहासन और अक्षयवट छत्र है; गंगा-यमुना की तरंगें चँवर हैं।

दोहा १०५

सेवहिं सुकृति साधु सुचि पावहिं सब मनकाम। बंदी बेद पुरान गन कहहिं बिमल गुन ग्राम ॥ १०५ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

पुण्यात्मा साधु इस पवित्र तीर्थ की सेवा से मनोरथ पाते हैं; वेद-पुराण मानो बंदीजन बनकर उसके निर्मल गुण गाते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १०६

प्रयाग स्नान और भरद्वाज मुनि से मिलन

चौपाइयाँ — मूल पाठ

को कहि सकइ प्रयाग प्रभाऊ। कलुष पुंज कुंजर मृगराऊ ॥ अस तीरथपति देखि सुहावा। सुख सागर रघुबर सुखु पावा ॥ कहि सिय लखनहि सखहि सुनाई। श्रीमुख तीरथराज बड़ाई ॥ करि प्रनामु देखत बन बागा। कहत महातम अति अनुरागा ॥ एहि बिधि आइ बिलोकी बेनी। सुमिरत सकल सुमंगल देनी ॥ मुदित नहाइ कीन्हि सिव सेवा। पुजि जथाबिधि तीरथ देवा ॥ तब प्रभु भरद्वाज पहिं आए। करत दंडवत मुनि उर लाए ॥ मुनि मन मोद न कछु कहि जाइ। ब्रह्मानंद रासि जनु पाई ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

राम सीता, लक्ष्मण और गुह को प्रयाग की महिमा बताते हैं। त्रिवेणी में स्नान करके शिव और तीर्थदेवताओं का पूजन करते हैं। फिर भरद्वाज आश्रम पहुँचकर दंडवत करते हैं; मुनि उन्हें हृदय से लगाकर परम आनंद पाते हैं।

दोहा १०६

दीन्हि असीस मुनीस उर अति अनंदु अस जानि। लोचन गोचर सुकृत फल मनहुँ किए बिधि आनि ॥ १०६ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

भरद्वाज आनंदपूर्वक आशीर्वाद देते हैं; उन्हें लगता है कि विधाता ने पुण्यफल को प्रत्यक्ष दर्शन का रूप दे दिया है।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १०७

भरद्वाज की निष्कपट भक्ति की याचना

चौपाइयाँ — मूल पाठ

कुसल प्रस्न करि आसन दीन्हे। पूजि प्रेम परिपूरन कीन्हे ॥ कंद मूल फल अंकुर नीके। दिए आनि मुनि मनहुँ अमी के ॥ सीय लखन जन सहित सुहाए। अति रुचि राम मूल फल खाए ॥ भए बिगतश्रम रामु सुखारे। भरव्दाज मृदु बचन उचारे ॥ आजु सुफल तपु तीरथ त्यागू। आजु सुफल जप जोग बिरागू ॥ सफल सकल सुभ साधन साजू। राम तुम्हहि अवलोकत आजू ॥ लाभ अवधि सुख अवधि न दूजी। तुम्हारें दरस आस सब पूजी ॥ अब करि कृपा देहु बर एहू। निज पद सरसिज सहज सनेहू ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

मुनि कुशल पूछकर आसन और मधुर फल-मूल देते हैं। सीता, लक्ष्मण और गुह सहित राम भोजन कर विश्राम पाते हैं। भरद्वाज दर्शन से तप, जप, तीर्थ और वैराग्य सफल मानते हैं तथा चरणों में सहज प्रेम का वर माँगते हैं।

दोहा १०७

करम बचन मन छाड़ि छलु जब लगि जनु न तुम्हार। तब लगि सुखु सपनेहुँ नहीं किएँ कोटि उपचार ॥ १०७ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

मुनि कहते हैं—मन, वचन और कर्म से छल छोड़कर प्रभु का सेवक बने बिना करोड़ों उपायों से भी सच्चा सुख नहीं मिलता।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १०८

प्रयागवासियों का दर्शन और प्रस्थान

चौपाइयाँ — मूल पाठ

सुनि मुनि बचन रामु सकुचाने। भाव भगति आनंद अघाने ॥ तब रघुबर मुनि सुजसु सुहावा। कोटि भाँति कहि सबहि सुनावा ॥ सो बड सो सब गुन गन गेहू। जेहि मुनीस तुम्ह आदर देहू ॥ मुनि रघुबीर परसपर नवहीं। बचन अगोचर सुखु अनुभवहीं ॥ यह सुधि पाइ प्रयाग निवासी। बटु तापस मुनि सिद्ध उदासी ॥ भरद्वाज आश्रम सब आए। देखन दसरथ सुअन सुहाए ॥ राम प्रनाम कीन्ह सब काहू। मुदित भए लहि लोयन लाहू ॥ देहिं असीस परम सुखु पाई। फिरे सराहत सुंदरताई ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

राम मुनि के प्रेम से संकुचित होकर उनके गुणों की प्रशंसा करते हैं। दोनों परस्पर विनय और सम्मान करते हैं। समाचार सुनकर विद्यार्थी, तपस्वी और संत आते हैं; राम सबको प्रणाम करते और आशीर्वाद पाते हैं।

दोहा १०८

राम कीन्ह बिश्राम निसि प्रात प्रयाग नहाइ। चले सहित सिय लखन जन मुदित मुनिहि सिरु नाइ ॥ १०८ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

रात विश्राम और सुबह प्रयाग स्नान के बाद राम मुनि को प्रणाम करके सीता, लक्ष्मण तथा सेवक गुह सहित आगे चलते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १०९

मार्गदर्शक शिष्य और यमुनाजी का स्नान

चौपाइयाँ — मूल पाठ

राम सप्रेम कहेउ मुनि पाहीं। नाथ कहिअ हम केहि मग जाहीं ॥ मुनि मन बिहसि राम सन कहहीं। सुगम सकल मग तुम्ह कहुँ अहहीं ॥ साथ लागि मुनि सिष्य बोलाए। सुनि मन मुदित पचासक आए ॥ सबन्हि राम पर प्रेम अपारा। सकल कहहि मगु दीख हमारा ॥ मुनि बटु चारि संग तब दीन्हे। जिन्ह बहु जनम सुकृत सब कीन्हे ॥ करि प्रनामु रिषि आयसु पाई। प्रमुदित हृदयँ चले रघुराई ॥ ग्राम निकट जब निकसहि जाई। देखहि दरसु नारि नर धाई ॥ होहि सनाथ जनम फलु पाई। फिरहि दुखित मनु संग पठाई ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

राम आगे का मार्ग पूछते हैं। भरद्वाज प्रेमपूर्वक चार ब्रह्मचारी शिष्य साथ देते हैं। मार्ग के गाँवों में नर-नारी दर्शन के लिए दौड़ते, जीवन धन्य मानते और विदा के समय अपना मन उनके साथ भेजते हैं।

दोहा १०९

बिदा किए बटु बिनय करि फिरे पाइ मन काम। उतरि नहाए जमुन जल जो सरीर सम स्याम ॥ १०९ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

मार्ग दिखाने वाले विद्यार्थियों को ससम्मान विदा करके तीनों यमुना के उस श्याम जल में स्नान करते हैं जो राम के शरीर जैसा लगता है।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा ११०

यमुना तट पर एक प्रेममग्न तपस्वी

चौपाइयाँ — मूल पाठ

सुनत तीरवासी नर नारी। धाए निज निज काज बिसारी ॥ लखन राम सिय सुन्दरताई। देखि करहिं निज भाग्य बड़ाई ॥ अति लालसा बसहिं मन माहीं। नाउँ गाउँ बूझत सकुचाहीं ॥ जे तिन्ह महुँ बयबिरिध सयाने। तिन्ह करि जुगुति रामु पहिचाने ॥ सकल कथा तिन्ह सबहि सुनाई। बनहि चले पितु आयसु पाई ॥ सुनि सबिषाद सकल पछिताहीं। रानी रायँ कीन्ह भल नाहीं ॥ तेहि अवसर एक तापसु आवा। तेजपुंज लघुबयस सुहावा ॥ कवि अलखित गति बेषु बिरागी। मन क्रम बचन राम अनुरागी ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

यमुना तट के लोग काम छोड़कर दर्शन को आते हैं। सयाने लोग राजकुमारों को पहचानकर वनवास की कथा बताते हैं। उसी समय एक तेजस्वी, कम आयु का विरक्त तपस्वी आता है; उसकी वास्तविक पहचान इस मूल पाठ में स्पष्ट नाम से नहीं दी गई है।

दोहा ११०

सजल नयन तन पुलकि निज इष्टदेउ पहिचानि। परेउ दंड जिमि धरनितल दसा न जाइ बखानि ॥ ११० ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

अपने इष्टदेव को पहचानकर वह तपस्वी आँसू और रोमांच से भर जाता है तथा भूमि पर दंडवत गिर पड़ता है।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १११

तपस्वी का स्वागत और गुह की विदाई

चौपाइयाँ — मूल पाठ

राम सप्रेम पुलकि उर लावा। परम रंक जनु पारसु पावा ॥ मनहुँ प्रेमु परमारथु दोऊ। मिलत धरे तन कह सबु कोऊ ॥ बहुरि लखन पायन्ह सोइ लागा। लीन्ह उठाइ उमगि अनुरागा ॥ पुनि सिय चरन धूरि धरि सीसा। जननि जानि सिसु दीन्हि असीसा ॥ कीन्ह निषाद दंडवत तेही। मिलेउ मुदित लखि राम सनेही ॥ पिअत नयन पुट रूपु पियूषा। मुदित सुअसनु पाइ जिमि भूखा ॥ ते पितु मातु कहहु सखि कैसे। जिन्ह पठए बन बालक ऐसे ॥ राम लखन सिय रूपु निहारी। होहिं सनेह बिकल नर नारी ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

राम उस तपस्वी को प्रेम से गले लगाते हैं। वह लक्ष्मण और सीता के चरणों में झुकता और सीता से मातृवत आशीष पाता है। गुह भी उससे मिलते हैं। लोग तीनों को देखकर प्रेमविह्वल होते हैं और उनके वनवास पर दुःख करते हैं।

दोहा १११

तब रघुबीर अनेक बिधि सखहि सिखावनु दीन्ह। राम रजायसु सीस धरि भवन गवनु तेँइँ कीन्ह ॥ १११ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

राम मित्र गुह को अनेक हितकारी शिक्षाएँ देकर विदा करते हैं; आज्ञा सिर पर रखकर गुह अपने घर को लौटते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा ११२

पथिकों की साथ चलने की विनती

चौपाइयाँ — मूल पाठ

पुनि सियँ राम लखन कर जोरी। जमुनहि कीन्ह प्रनामु बहोरी ॥ चले ससीय मुदित दोउ भाई। रबितनुजा कइ करत बड़ाई ॥ पथिक अनेक मिलहिं मग जाता। कहहिं सप्रेम देखि दोउ भ्राता ॥ राज लखन सब अंग तुम्हारें। देखि सोचु अति हृदय हमारें ॥ मारग चलहु पयादेहि पाएँ। ज्योतिषु झूठ हमारें भाएँ ॥ अगमु पंथ गिरि कानन भारी। तेहि महँ साथ नारि सुकुमारी ॥ करि केहरि बन जाइ न जोई। हम सँग चलहि जो आयसु होई ॥ जाब जहाँ लगि तहँ पहुँचाई। फिरब बहोरि तुम्हहि सिरु नाई ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

यमुना को पुनः प्रणाम करके तीनों आगे बढ़ते हैं। पथिक उनके राजचिह्न और कोमल शरीर देखकर पैदल चलने का कारण सोचते हैं। दुर्गम वन में साथ चलकर गंतव्य तक पहुँचाने की सेवा की अनुमति चाहते हैं।

दोहा ११२

एहि बिधि पूँछहिं प्रेम बस पुलक गात जलु नैन। कृपासिंधु फेरहि तिन्हहि कहि बिनीत मृदु बैन ॥ ११२ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

पथिक प्रेम से पुलकित और अश्रुपूर्ण होकर पूछते हैं; करुणामय राम विनम्र मधुर वाणी से उन्हें लौटा देते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा ११३

चरण-स्पर्श से धन्य मार्ग और प्रकृति

चौपाइयाँ — मूल पाठ

जे पुर गाँव बसहिं मग माहीं। तिन्हहि नाग सुर नगर सिहाहीं ॥ केहि सुकृतीं केहि घरीं बसाए। धन्य पुन्यमय परम सुहाए ॥ जहँ जहँ राम चरन चलि जाहीं। तिन्ह समान अमरावति नाहीं ॥ पुन्यपुंज मग निकट निवासी। तिन्हहि सराहहिं सुरपुरबासी ॥ जे भरि नयन बिलोकहिं रामहि। सीता लखन सहित घनस्यामहि ॥ जे सर सरित राम अवगाहहिं। तिन्हहि देव सर सरित सराहहिं ॥ जेहि तरु तर प्रभु बैठहिं जाई। करहिं कलपतरु तासु बड़ाई ॥ परसि राम पद पदुम परागा। मानति भूमि भूरि निज भागा ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

कवि उन गाँवों, निवासियों, जलाशयों और वृक्षों का सौभाग्य गाते हैं जिन्हें राम का दर्शन और चरणस्पर्श मिलता है। देवता भी उन्हें सराहते हैं; धरती चरणरज पाकर स्वयं को धन्य मानती है।

दोहा ११३

छाँह करहि घन बिबुधगन बरषहि सुमन सिहाहिं। देखत गिरि बन बिहग मृग रामु चले मग जाहिं ॥ ११३ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

बादल छाया करते हैं, देवता पुष्प बरसाते हैं और राम पर्वत, वन, पक्षी तथा पशुओं को देखते हुए आगे चलते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा ११४

ग्रामवासियों का आतिथ्य

चौपाइयाँ — मूल पाठ

सीता लखन सहित रघुराई। गाँव निकट जब निकसहिं जाई ॥ सुनि सब बाल बृद्ध नर नारी। चलहिं तुरत गृहकाजु बिसारी ॥ राम लखन सिय रूप निहारी। पाइ नयनफलु होहिं सुखारी ॥ सजल बिलोचन पुलक सरीरा। सब भए मगन देखि दोउ बीरा ॥ बरनि न जाइ दसा तिन्ह केरी। लहि जनु रंकन्ह सुरमनि ढेरी ॥ एकन्ह एक बोलि सिख देहीं। लोचन लाहु लेहु छन एहीं ॥ रामहि देखि एक अनुरागे। चितवत चले जाहिं सँग लागे ॥ एक नयन मग छबि उर आनी। होहिं सिथिल तन मन बर बानी ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

गाँव के पास पहुँचने पर बालक, वृद्ध, नर-नारी काम छोड़कर आते हैं। कोई दूसरों को दर्शन का लाभ लेने को बुलाता, कोई साथ चल पड़ता और कोई उस छवि को हृदय में बसाकर प्रेम में ठिठक जाता है।

दोहा ११४

एक देखिं बट छाँह भलि डासि मृदुल तृन पात। कहहिं गवाँइअ छिनुकु श्रमु गवनब अबहिं कि प्रात ॥ ११४ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

कोई वटवृक्ष की छाया में कोमल घास-पत्ते बिछाकर कहता है—कुछ थकान मिटा लें; आगे अभी चलेंगे या सुबह?

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अयोध्याकाण्ड · दोहा ११५

वट की छाया में सुंदर विश्राम

चौपाइयाँ — मूल पाठ

एक कलस भरि आनहिं पानी। अँचइअ नाथ कहहिं मृदु बानी ॥ सुनि प्रिय बचन प्रीति अति देखी। राम कृपाल सुसील बिसेषी ॥ जानी श्रमित सीय मन माहीं। घरिक बिलंबु कीन्ह बट छाहीं ॥ मुदित नारि नर देखहिं सोभा। रूप अनूप नयन मनु लोभा ॥ एकटक सब सोहहिं चहुँ ओरा। रामचंद्र मुख चंद चकोरा ॥ तरुन तमाल बरन तनु सोहा। देखत कोटि मदन मनु मोहा ॥ दामिनि बरन लखन सुठि नीके। नख सिख सुभग भावते जी के ॥ मुनिपट कटिन्ह कसें तूनीरा। सोहहिं कर कमलिनि धनु तीरा ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

कोई घड़ा भरकर जल लाता है। ग्रामवासियों का प्रेम और सीता की थकान देखकर राम वटछाया में कुछ समय रुकते हैं। लोग श्याम राम और गौर लक्ष्मण के तपस्वीवेश, धनुष-बाण और अनुपम शोभा को एकटक देखते हैं।

दोहा ११५

जटा मुकुट सीसनि सुभग उर भुज नयन बिसाल। सरद परब बिधु बदन बर लसत स्वेद कन जाल ॥ ११५ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

दोनों के सुंदर जटामुकुट, विशाल वक्ष-भुजाएँ-नेत्र और शरदपूर्णिमा के चंद्रमा जैसे मुखों पर श्रमबिंदु शोभित हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा ११६

ग्रामवधुओं का विनयपूर्वक प्रश्न

चौपाइयाँ — मूल पाठ

बरनि न जाइ मनोहर जोरी। सोभा बहुत थोरि मति मोरी ॥ राम लखन सिय सुंदरताई। सब चितवहिं चित मन मति लाई ॥ थके नारि नर प्रेम पिआसे। मनहुँ मृगी मृग देखि दिआ से ॥ सीय समीप ग्रामतिय जाहीं। पूँछत अति सनेहँ सकुचाहीं ॥ बार बार सब लागहिं पाएँ। कहहिं बचन मृदु सरल सुभाएँ ॥ राजकुमारि बिनय हम करहीं। तिय सुभायँ कछु पूँछत डरहीं। स्वामिनि अबिनय छमबि हमारी। बिलगु न मानब जानि गवाँरी ॥ राजकुअँर दोउ सहज सलोने। इन्ह तें लही दुति मरकत सोने ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

लोग तीनों की सुंदरता देखकर तृप्त नहीं होते। ग्रामवधुएँ सीता के पास जाकर चरण छूती हैं। वे अपनी ग्रामीण सरलता के लिए क्षमा माँगते हुए संकोच और स्नेह से दोनों राजकुमारों के संबंध में पूछने का साहस करती हैं।

दोहा ११६

स्यामल गौर किसोर बर सुंदर सुषमा ऐन। सरद सर्बरीनाथ मुखु सरद सरोरुह नैन ॥ ११६ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

श्याम और गौर दोनों सुंदर किशोर सौंदर्य के भंडार हैं; उनके मुख शरदचंद्र और नेत्र शरदकालीन कमल जैसे हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा ११७

सीताजी का संकेत से परिचय देना

पारायण संकेत: मासपारायण, सोलहवाँ विश्राम · नवान्हपारायण, चौथा विश्राम

चौपाइयाँ — मूल पाठ

कोटि मनोज लजावनिहारे। सुमुखि कहहु को आहिं तुम्हारे ॥ सुनि सनेहमय मंजुल बानी। सकुची सिय मन महुँ मुसुकानी ॥ तिन्हहि बिलोकि बिलोकति धरनी। दुहुँ सकोच सकुचित बरबरनी ॥ सकुचि सप्रेम बाल मृग नयनी। बोली मधुर बचन पिकबयनी ॥ सहज सुभाय सुभग तन गोरे। नामु लखनु लघु देवर मोरे ॥ बहुरि बदनु बिधु अंचल ढाँकी। पिय तन चितइ भौंह करि बाँकी ॥ खंजन मंजु तिरीछे नयननि। निज पति कहेउ तिन्हहि सियँ सयननि ॥ भइ मुदित सब ग्रामबधूटीं। रंकन्ह राय रासि जनु लूटीं ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

ग्रामवधुएँ पूछती हैं कि दोनों सुंदर पुरुष आपके कौन हैं। सीता संकोच से मुस्कराकर गौरवर्ण लक्ष्मण को अपना छोटा देवर कहती हैं। फिर मुख आँचल से ढककर तिरछे नेत्र और भौंह के संकेत से राम को पति बताती हैं।

दोहा ११७

अति सप्रेम सिय पायँ परि बहुबिधि देहिं असीस। सदा सोहागिनि होहु तुम्ह जब लगि महि अहि सीस ॥ ११७ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

प्रसन्न ग्रामवधुएँ सीता के चरणों में झुककर अत्यंत प्रेम से दीर्घ, अखंड सौभाग्य के आशीर्वाद देती हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा ११८

ग्रामवधुओं से विदा

चौपाइयाँ — मूल पाठ

पारबती सम पतिप्रिय होहू। देबि न हम पर छाड़ब छोहू ॥ पुनि पुनि बिनय करिअ कर जोरी। जौं एहि मारग फिरिअ बहोरी ॥ दरसनु देब जानि निज दासी। लखीं सीयँ सब प्रेम पिआसी ॥ मधुर बचन कहि कहि परितोषीं। जनु कुमुदिनीं कौमुदीं पोषीं ॥ तबहिं लखन रघुबर रुख जानी। पूँछेउ मगु लोगन्हि मृदु बानी ॥ सुनत नारि नर भए दुखारी। पुलकित गात बिलोचन बारी ॥ मिटा मोदु मन भए मलीने। बिधि निधि दीन्ह लेत जनु छीने ॥ समुझि करम गति धीरजु कीन्हा। सोधि सुगम मगु तिन्ह कहि दीन्हा ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

स्त्रियाँ पार्वती जैसा दांपत्य-स्नेह पाने का आशीष देती और लौटते समय फिर दर्शन देने की विनती करती हैं। सीता मधुर वाणी से उन्हें संतोष देती हैं। लक्ष्मण आगे का रास्ता पूछते हैं तो विदा की पीड़ा में लोग सुगम मार्ग बताते हैं।

दोहा ११८

लखन जानकी सहित तब गवनु कीन्ह रघुनाथ। फेरे सब प्रिय बचन कहि लिए लाइ मन साथ ॥ ११८ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

राम सबको प्रिय वचन कहकर लौटाते हैं और सीता-लक्ष्मण सहित आगे चलते हैं; लोगों के मन मानो अपने साथ ले जाते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा ११९

वनवास पर ग्रामवासियों का करुण विमर्श

चौपाइयाँ — मूल पाठ

फिरत नारि नर अति पछिताहीं। देअहि दोषु देहिं मन माहीं ॥ सहित बिषाद परसपर कहहीं। बिधि करतब उलटे सब अहहीं ॥ निपट निरंकुस निठुर निसंकू। जेहिं ससि कीन्ह सरुज सकलंकू ॥ रूख कलपतरु सागरु खारा। तेहिं पठए बन राजकुमारा ॥ जौं पे इन्हहि दीन्ह बनबासू। कीन्ह बादि बिधि भोग बिलासू ॥ ए बिचरहिं मग बिनु पदत्राना। रचे बादि बिधि बाहन नाना ॥ ए महि परहिं डासि कुस पाता। सुभग सेज कत सृजत बिधाता ॥ तरुबर बास इन्हहि बिधि दीन्हा। धवल धाम रचि रचि श्रमु कीन्हा ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

लौटते लोग विधाता की विपरीत व्यवस्था पर दुःख करते हैं। कहते हैं कि ऐसे कोमल राजकुमार पैदल चलें तो वाहन व्यर्थ, घास पर सोएँ तो सुंदर पलंग व्यर्थ और वृक्षों तले रहें तो ऊँचे भवन व्यर्थ हैं। यह प्रेम की अतिशयोक्तिपूर्ण करुण वाणी है।

दोहा ११९

जौं ए मुनि पट धर जटिल सुंदर सुठि सुकुमार। बिबिध भाँति भूषन बसन बादि किए करतार ॥ ११९ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

यदि इतने सुंदर सुकुमार तपस्वीवेश और जटाओं में रहें, तो विधाता ने विविध आभूषण और वस्त्र व्यर्थ बनाए—लोग ऐसा कहते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १२०

दर्शन का सौभाग्य और मार्ग की चिंता

चौपाइयाँ — मूल पाठ

जौं ए कंद मूल फल खाहीं। बादि सुधादि असन जग माहीं ॥ एक कहहिं ए सहज सुहाए। आपु प्रगट भए बिधि न बनाए ॥ जहँ लगि बेद कही बिधि करनी। श्रवन नयन मन गोचर बरनी ॥ देखहु खोजि भुअन दस चारी। कहँ अस पुरुष कहाँ असि नारी ॥ इन्हहि देखि बिधि मनु अनुरागा। पटतर जोग बनावै लागा ॥ कीन्ह बहुत श्रम ऐक न आए। तेहिं इरिषा बन आनि दुराए ॥ एक कहहिं हम बहुत न जानहिं। आपुहि परम धन्य करि मानहिं ॥ ते पुनि पुन्यपुंज हम लेखे। जे देखहिं देखिहहिं जिन्ह देखे ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

कोई कहता है कि ये कंद-मूल खाएँ तो उत्तम भोजन व्यर्थ है। कोई उनकी सुंदरता को सृष्टि की उपमाओं से परे मानता है। कुछ अपने दर्शन-सौभाग्य पर कृतज्ञ हैं और उनका दर्शन पाने वालों को भी पुण्यवान समझते हैं।

दोहा १२०

एहि बिधि कहि कहि बचन प्रिय लेहिं नयन भरि नीर। किमि चलिहहि मारग अगम सुठि सुकुमार सरीर ॥ १२० ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

प्रेमपूर्ण बातें कहते हुए लोग आँसू भरते हैं और चिंता करते हैं कि इतने कोमल शरीर दुर्गम मार्ग पर कैसे चलेंगे।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १२१

दर्शन से वंचित लोगों की व्याकुलता

चौपाइयाँ — मूल पाठ

नारि सनेह बिकल बस होहीं। चकई साँझ समय जनु सोहीं ॥ मृदु पद कमल कठिन मगु जानी। गहबरि हृदयँ कहहिं बर बानी ॥ परसत मृदुल चरन अरुनारे। सकुचति महि जिमि हृदय हमारे ॥ जौं जगदीस इन्हहि बनु दीन्हा। कस न सुमनमय मारगु कीन्हा ॥ जौं मागा पाइअ बिधि पाहीं। ए रखिअहिं सखि आँखिन्ह माहीं ॥ जे नर नारि न अवसर आए। तिन्ह सिय रामु न देखन पाए ॥ सुनि सुरुप बूझहिं अकुलाई। अब लगि गए कहाँ लगि भाई ॥ समरथ धाइ बिलोकहिं जाई। प्रमुदित फिरहिं जनमफलु पाई ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

स्त्रियाँ कोमल चरणों के लिए फूलों का मार्ग चाहती हैं और कहती हैं कि वर मिले तो तीनों को आँखों में बसा लें। जो समय पर नहीं आए, वे समाचार पूछते हैं; समर्थ लोग दौड़कर दर्शन पाते हैं, अन्य पीछे रहकर व्याकुल होते हैं।

दोहा १२१

अबला बालक बृद्ध जन कर मीजहिं पछिताहिं ॥ होहिं प्रेमबस लोग इमि रामु जहाँ जहँ जाहिं ॥ १२१ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

बालक, वृद्ध और असहाय लोग दर्शन न मिलने पर हाथ मलते हैं; राम जहाँ जाते हैं, लोग ऐसे प्रेमवश हो जाते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १२२

गाँव-गाँव में रामकथा और आनंद

चौपाइयाँ — मूल पाठ

गाँव गाँव अस होइ अनंदू। देखि भानुकुल कैरव चंदू ॥ जे कछु समाचार सुनि पावहिं। ते नृप रानिहि दोसु लगावहिं ॥ कहहिं एक अति भल नरनाहू। दीन्ह हमहि जोइ लोचन लाहू ॥ कहहिं परस्पर लोग लोगाईं। बातें सरल सनेह सुहाईं ॥ ते पितु मातु धन्य जिन्ह जाए। धन्य सो नगरु जहाँ तें आए ॥ धन्य सो देसु सैलु बन गाऊँ। जहँ जहँ जाहिं धन्य सोइ ठाऊँ ॥ सुख पायउ बिरंचि रचि तेही। ए जेहि के सब भाँति सनेही ॥ राम लखन पथि कथा सुहाई। रही सकल मग कानन छाई ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

मार्ग के गाँवों में दर्शन से आनंद है। कोई वनवास के लिए राजा-रानी को दोष देता, कोई इसी कारण मिले दर्शन को सौभाग्य मानता है। लोग माता-पिता, नगर, देश और मार्ग के उन स्थानों को धन्य कहते हैं जिनसे तीनों का संबंध जुड़ा है।

दोहा १२२

एहि बिधि रघुकुल कमल रबि मग लोगन्ह सुख देत। जाहिं चले देखत बिपिन सिय सौमित्रि समेत ॥ १२२ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

रघुकुल के सूर्य राम मार्ग के लोगों को सुख देते हुए सीता और लक्ष्मण सहित वन देखते आगे चलते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १२३

आगे राम, बीच में सीता, पीछे लक्ष्मण

चौपाइयाँ — मूल पाठ

आगे रामु लखनु बने पाछें। तापस बेष बिराजत काछें ॥ उभय बीच सिय सोहति कैसे। ब्रह्म जीव बिच माया जैसे ॥ बहुरि कहउँ छबि जसि मन बसई। जनु मधु मदन मध्य रति लसई ॥ उपमा बहुरि कहउँ जियँ जोही। जनु बुध बिधु बिच रोहिनि सोही ॥ प्रभु पद रेख बीच बिच सीता। धरति चरन मग चलति सभीता ॥ सीय राम पद अंक बराएँ। लखन चलहिं मगु दाहिन लाएँ ॥ राम लखन सिय प्रीति सुहाई। बचन अगोचर किमि कहि जाई ॥ खग मृग मगन देखि छबि होहीं। लिए चोरि चित राम बटोहीं ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

आगे राम, बीच में सीता और पीछे लक्ष्मण की छवि को कवि अनेक उपमाओं से समझाते हैं। सीता राम के पदचिह्नों के बीच सावधानी से चलती हैं; लक्ष्मण उनके चिह्न बचाकर दाईं ओर चलते हैं। उनका परस्पर प्रेम वर्णन से परे है।

दोहा १२३

जिन्ह जिन्ह देखे पथिक प्रिय सिय समेत दोउ भाइ। भव मगु अगमु अनंदु तेइ बिनु श्रम रहे सिराइ ॥ १२३ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

सीता सहित दोनों भाइयों को देखने वाले पथिक भक्तिभाव से मानो संसार की कठिन यात्रा सहज आनंद से पार कर लेते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १२४

वाल्मीकि आश्रम में आगमन

चौपाइयाँ — मूल पाठ

अजहुँ जासु उर सपनेहुँ काऊ। बसहुँ लखनु सिय रामु बटाऊ ॥ राम धाम पथ पाइहि सोई। जो पथ पाव कबहुँ मुनि कोई ॥ तब रघुबीर श्रमित सिय जानी। देखि निकट बटु सीतल पानी ॥ तहँ बसि कंद मूल फल खाई। प्रात नहाइ चले रघुराई ॥ देखत बन सर सैल सुहाए। बालमीकि आश्रम प्रभु आए ॥ राम दीख मुनि बासु सुहावन। सुंदर गिरि काननु जलु पावन ॥ सरनि सरोज बिटप बन फूले। गुंजत मंजु मधुप रस भूले ॥ खग मृग बिपुल कोलाहल करहीं। बिरहित बैर मुदित मन चरहीं ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

कवि इस पथिकरूप के हृदय में बसने को परम कल्याणकारी बताते हैं। सीता की थकान जानकर राम वृक्ष और जल के पास विश्राम करते हैं। फिर सुंदर पर्वत, वन और सरोवरों से घिरे वाल्मीकि आश्रम पहुँचते हैं, जहाँ जीव परस्पर वैर छोड़कर रहते हैं।

दोहा १२४

सुचि सुंदर आश्रमु निरखि हरषे राजिवनेन। सुनि रघुबर आगमनु मुनि आगें आयउ लेन ॥ १२४ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

निर्मल सुंदर आश्रम देखकर राम प्रसन्न होते हैं; उनके आगमन का समाचार पाकर वाल्मीकि मुनि स्वागत को आगे आते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १२५

वाल्मीकि का अतिथि-सत्कार और राम की विनय

चौपाइयाँ — मूल पाठ

मुनि कहुँ राम दंडवत कीन्हा। आसिरबादु बिप्रबर दीन्हा ॥ देखि राम छबि नयन जुड़ाने। करि सनमानु आश्रमहिं आने ॥ मुनिबर अतिथि प्रानप्रिय पाए। कंद मूल फल मधुर मगाए ॥ सिय सौमित्रि राम फल खाए। तब मुनि आश्रम दिए सुहाए ॥ बालमीकि मन आनँदु भारी। मंगल मूरति नयन निहारी ॥ तब कर कमल जोरि रघुराई। बोले बचन श्रवन सुखदाई ॥ तुम्ह त्रिकाल दरसी मुनिनाथा। बिस्व बदर जिमि तुम्हरें हाथा ॥ अस कहि प्रभु सब कथा बखानी। जेहि जेहि भाँति दीन्ह बनु रानी ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

राम दंडवत करते हैं; वाल्मीकि आशीष देकर प्रेम से आश्रम लाते और मधुर फल-मूल देते हैं। राम उन्हें त्रिकालदर्शी कहकर वनवास का पूरा प्रसंग सुनाते हैं। वे पिता का वचन निभाने, माता का हित और भरत को राज्य मिलने में शुभ पक्ष देखते हैं।

दोहा १२५

तात बचन पुनि मातु हित भाइ भरत अस राउ। मो कहुँ दरस तुम्हार प्रभु सबु मम पुन्य प्रभाउ ॥ १२५ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

राम कहते हैं—पिता के वचन, माता के हित, भरत जैसे राजा और आपके दर्शन की प्राप्ति, ये सब मेरे पुण्य का फल हैं।

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अयोध्याकाण्ड · सोरठा १२६

निवास का प्रश्न और दिव्य स्वरूप की स्तुति

चौपाइयाँ — मूल पाठ

देखि पाय मुनिराय तुम्हारे। भए सुकृत सब सुफल हमारे ॥ अब जहँ राउर आयसु होई। मुनि उदबेगु न पावै कोई ॥ मुनि तापस जिन्ह तें दुखु लहहीं। ते नरेस बिनु पावक दहहीं ॥ मंगल मूल बिप्र परितोषू। दहइ कोटि कुल भूसुर रोषू ॥ अस जियँ जानि कहिअ सोइ ठाऊँ। सिय सौमित्रि सहित जहँ जाऊँ ॥ तहँ रचि रुचिर परन तृन साला। बासु करौ कछु काल कृपाला ॥ सहज सरल सुनि रघुबर बानी। साधु साधु बोले मुनि ग्यानी ॥ कस न कहहु अस रघुकुलकेतू। तुम्ह पालक संतत श्रुति सेतू ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

राम मुनियों को असुविधा न हो ऐसा पर्णकुटी का स्थान पूछते हैं। वे साधुजन की शांति और प्रसन्नता को शासन का दायित्व मानते हैं। वाल्मीकि उनकी सरल वाणी सराहकर कहते हैं कि वे सदैव धर्ममर्यादा के रक्षक हैं।

छंद — मूल पाठ

श्रुति सेतु पालक राम तुम्ह जगदीस माया जानकी। जो सृजति जगु पालति हरति रूख पाइ कृपानिधान की ॥ जो सहससीसु अहीसु महिधरु लखनु सचराचर धनी। सुर काज धरि नरराज तनु चले दलन खल निसिचर अनी ॥
छंद का सरल हिंदी अर्थ

वाल्मीकि राम को जगदीश्वर, जानकी को सृष्टि की पालन-संहारकारी शक्ति और लक्ष्मण को सहस्रशीर्ष शेष का रूप बताते हैं; देवकार्य के लिए उनका मानव अवतार हुआ है।

सोरठा १२६

राम सरुप तुम्हार बचन अगोचर बुद्धिपर। अबिगत अकथ अपार नेति नित निगम कह ॥ १२६ ॥
सोरठा का सरल हिंदी अर्थ

वाल्मीकि कहते हैं—राम का स्वरूप वाणी और बुद्धि से परे, अगम, अकथनीय और अपार है; वेद भी उसकी सीमा नहीं कह पाते।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १२७

जहाँ राम न हों, वह स्थान कहाँ?

चौपाइयाँ — मूल पाठ

जगु पेखन तुम्ह देखनिहारे। बिधि हरि संभु नचावनिहारे ॥ तेउ न जानहिं मरमु तुम्हारा। औरु तुम्हहि को जाननिहारा ॥ सोइ जानइ जेहि देहु जनाई। जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई ॥ तुम्हरिहि कृपाँ तुम्हहि रघुनंदन। जानहिं भगत भगत उर चंदन ॥ चिदानंदमय देह तुम्हारी। बिगत बिकार जान अधिकारी ॥ नर तनु धरेहु संत सुर काजा। कहहु करहु जस प्राकृत राजा ॥ राम देखि सुनि चरित तुम्हारे। जड़ मोहहिं बुध होहिं सुखारे ॥ तुम्ह जो कहहु करहु सबु साँचा। जस काछिअ तस चाहिअ नाचा ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

वाल्मीकि राम को जगत का साक्षी और देवताओं का भी प्रेरक बताते हैं। उनकी कृपा से ही भक्त उनका स्वरूप जानते हैं। मानववेश की लीला से अज्ञानी मोहित और ज्ञानी आनंदित होते हैं; प्रभु की वाणी भी अपनी अपनाई मर्यादा के अनुरूप सत्य है।

दोहा १२७

पूँछेहु मोहि कि रहौं कहँ मैं पूँछत सकुचाउँ। जहँ न होहु तहँ देहु कहि तुम्हहि देखावौं ठाउँ ॥ १२७ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

मुनि कहते हैं—आपने रहने का स्थान पूछा; पहले वह जगह बताइए जहाँ आप नहीं हैं, तब मैं कोई अलग स्थान दिखाऊँ।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १२८

कथा, दर्शन और गुणगान में लगा हृदय

चौपाइयाँ — मूल पाठ

सुनि मुनि बचन प्रेम रस साने। सकुचि राम मन महुँ मुसुकाने ॥ बालमीकि हँसि कहहिं बहोरी। बानी मधुर अमिअ रस बोरी ॥ सुनहु राम अब कहउँ निकेता। जहाँ बसहु सिय लखन समेता ॥ जिन्ह के श्रवन समुद्र समाना। कथा तुम्हारि सुभग सरि नाना ॥ भरहिं निरंतर होहिं न पूरे। तिन्ह के हिय तुम्ह कहुँ गृह रूरे ॥ लोचन चातक जिन्ह करि राखे। रहहिं दरस जलधर अभिलाषे ॥ निदरहिं सरित सिंधु सर भारी। रूप बिंदु जल होहिं सुखारी ॥ तिन्ह के हृदय सदन सुखदायक। बसहु बंधु सिय सह रघुनायक ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

राम मुस्कराते हैं। मुनि प्रेम से बताते हैं कि जिनके कान समुद्र की तरह कथा सुनकर भी तृप्त नहीं होते और जिनकी आँखें चातक की तरह दर्शन चाहती रहती हैं, उनका हृदय प्रभु के निवास के योग्य है।

दोहा १२८

जसु तुम्हार मानस बिमल हंसिनि जीहा जासु। मुकुताहल गुन गन चुनइ राम बसहु हियँ तासु ॥ १२८ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

जिसकी जीभ निर्मल मानस की हंसिनी बनकर प्रभु के गुणरूपी मोती चुनती है, राम उसके हृदय में बसें।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १२९

साधना का एक फल: चरणप्रेम

चौपाइयाँ — मूल पाठ

प्रभु प्रसाद सुचि सुभग सुबासा। सादर जासु लहइ नित नासा ॥ तुम्हहि निबेदित भोजन करहीं। प्रभु प्रसाद पट भूषन धरहीं ॥ सीस नवहिं सुर गुरु द्विज देखी। प्रीति सहित करि बिनय बिसेषी ॥ कर नित करहिं राम पद पूजा। राम भरोस हृदयँ नहि दूजा ॥ चरन राम तीरथ चलि जाहीं। राम बसहु तिन्ह के मन माहीं ॥ मंत्रराजु नित जपहिं तुम्हारा। पूजहिं तुम्हहि सहित परिवारा ॥ तरपन होम करहिं बिधि नाना। बिप्र जेवाँइ देहिं बहु दाना ॥ तुम्ह तें अधिक गुरहि जियँ जानी। सकल भायँ सेवहिं सनमानी ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

मुनि उन भक्तों का वर्णन करते हैं जो प्रसाद ग्रहण करते, गुरु और देवताओं का सम्मान करते, पूजा-जप, तीर्थयात्रा, दान और सेवा करते हैं। उनके सभी कर्म प्रभु को अर्पित हैं और हृदय में भरोसा केवल राम का है।

दोहा १२९

सबु करि मागहिं एक फलु राम चरन रति होउ। तिन्ह कें मन मंदिर बसहु सिय रघुनंदन दोउ ॥ १२९ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

जो सब साधन करके केवल रामचरणों का प्रेम माँगते हैं, उनके मनमंदिर में सीता और राम दोनों निवास करें।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १३०

निर्मल आचरण वाला मनमंदिर

चौपाइयाँ — मूल पाठ

काम कोह मद मान न मोहा। लोभ न छोभ न राग न द्रोहा ॥ जिन्ह कें कपट दंभ नहिं माया। तिन्ह कें हृदय बसहु रघुराया ॥ सब के प्रिय सब के हितकारी। दुख सुख सरिस प्रसंसा गारी ॥ कहहिं सत्य प्रिय बचन बिचारी। जागत सोवत सरन तुम्हारी ॥ तुम्हहि छाड़ि गति दूसरि नाहीं। राम बसहु तिन्ह के मन माहीं ॥ जननी सम जानहिं परनारी। धनु पराव बिष तें बिष भारी ॥ जे हरषहिं पर संपति देखी। दुखित होहिं पर बिपति बिसेषी ॥ जिन्हहि राम तुम्ह प्रानपिआरे। तिन्ह के मन सुभ सदन तुम्हारे ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

कपट, अहंकार, लोभ और द्वेष से मुक्त, सबका हित चाहने वाले, सुख-दुःख में सम और सत्यप्रिय लोग प्रभु के निवास हैं। वे दूसरे के परिवार का सम्मान, परधन से विरक्ति और दूसरों के सुख-दुःख में संवेदना रखते हैं।

दोहा १३०

स्वामि सखा पितु मातु गुर जिन्ह के सब तुम्ह तात। मन मंदिर तिन्ह कें बसहु सीय सहित दोउ भ्रात ॥ १३० ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

जिनके लिए स्वामी, मित्र, माता-पिता और गुरु सबका आश्रय राम हैं, उनके मनमंदिर में सीता सहित दोनों भाई बसें।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १३१

निष्काम और सहज प्रेम का घर

चौपाइयाँ — मूल पाठ

अवगुन तजि सब के गुन गहहीं। बिप्र धेनु हित संकट सहहीं ॥ नीति निपुन जिन्ह कइ जग लीका। घर तुम्हार तिन्ह कर मनु नीका ॥ गुन तुम्हार समुझइ निज दोसा। जेहि सब भाँति तुम्हार भरोसा ॥ राम भगत प्रिय लागहिं जेही। तेहि उर बसहु सहित बैदेही ॥ जाति पाँति धनु धरम बड़ाई। प्रिय परिवार सदन सुखदाई ॥ सब तजि तुम्हहि रहइ उर लाई। तेहि के हृदयँ रहहु रघुराई ॥ सरगु नरकु अपबरगु समाना। जहँ तहँ देख धरें धनु बाना ॥ करम बचन मन राउर चेरा। राम करहु तेहि कें उर डेरा ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

जो दूसरों के गुण ग्रहण करें, अपने दोष पहचानें, धर्मनीति पर चलें और भक्तों से प्रेम करें, उनका हृदय राम का घर है। प्रतिष्ठा, धन, संबंध और स्वर्ग-मोक्ष की चाह से ऊपर उठकर मन-वचन-कर्म से निष्काम सेवा की बात कही गई है।

दोहा १३१

जाहि न चाहिअ कबहुँ कछु तुम्ह सन सहज सनेहु। बसहु निरंतर तासु मन सो राउर निज गेहु ॥ १३१ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

जिसे प्रभु से कभी कुछ माँगना नहीं, केवल सहज प्रेम है, उसका मन राम का अपना घर है।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १३२

चित्रकूट और मंदाकिनी का निर्देश

चौपाइयाँ — मूल पाठ

एहि बिधि मुनिबर भवन देखाए। बचन सप्रेम राम मन भाए ॥ कह मुनि सुनहु भानुकुलनायक। आश्रम कहउँ समय सुखदायक ॥ चित्रकूट गिरि करहु निवासू। तहँ तुम्हार सब भाँति सुपासू ॥ सैलु सुहावन कानन चारू। करि केहरि मृग बिहग बिहारू ॥ नदी पुनीत पुरान बखानी। अत्रिप्रिया निज तपबल आनी ॥ सुरसरि धार नाउँ मंदाकिनि। जो सब पातक पोतक डाकिनि ॥ अत्रि आदि मुनिबर बहु बसहीं। करहिं जोग जप तप तन कसहीं ॥ चलहु सफल श्रम सब कर करहू। राम देहु गौरव गिरिबरहू ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

भक्तहृदय के निवास बताने के बाद वाल्मीकि व्यावहारिक आश्रम-स्थान भी बताते हैं। सुंदर वन, पर्वत, जीवों और अत्रि आदि मुनियों से युक्त चित्रकूट में रहने को कहते हैं। वहाँ अनुसूया के तप से प्रकट पवित्र मंदाकिनी का महत्त्व बताते हैं।

दोहा १३२

चित्रकूट महिमा अमित कहीं महामुनि गाइ। आए नहाए सरित बर सिय समेत दोउ भाइ ॥ १३२ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

मुनि चित्रकूट की महिमा सुनाते हैं; राम, सीता और लक्ष्मण वहाँ पहुँचकर उस श्रेष्ठ नदी में स्नान करते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १३३

चित्रकूट में पर्णकुटियों का निर्माण

चौपाइयाँ — मूल पाठ

रघुबर कहेउ लखन भल घाटू। करहु कतहुँ अब ठाहर ठाटू ॥ लखन दीख पय उतर करारा। चहुँ दिसि फिरेउ धनुष जिमि नारा ॥ नदी पनच सर सम दम दाना। सकल कलुष कलि साउज नाना ॥ चित्रकूट जनु अचल अहेरी। चुकइ न घात मार मुठभेरी ॥ अस कहि लखन ठाउँ देखरावा। थलु बिलोकि रघुबर सुखु पावा ॥ रमेउ राम मनु देवन्ह जाना। चले सहित सुर थपति प्रधाना ॥ कोल किरात बेष सब आए। रचे परन तृन सदन सुहाए ॥ बरनि न जाहि मंजु दुइ साला। एक ललित लघु एक बिसाला ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

राम लक्ष्मण से अच्छा निवास चुनने को कहते हैं। लक्ष्मण नदी और तट की सुंदरता रूपक से समझाकर स्थान दिखाते हैं। देवता प्रधान शिल्पी सहित वनवासियों का रूप लेकर आते और घास-पत्तों की एक छोटी तथा एक बड़ी सुंदर कुटी बनाते हैं।

दोहा १३३

लखन जानकी सहित प्रभु राजत रुचिर निकेत। सोह मदनु मुनि बेष जनु रति रितुराज समेत ॥ १३३ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

सुंदर निवास में सीता और लक्ष्मण सहित राम ऐसे शोभते हैं, मानो तपस्वीवेश में कामदेव रति और वसंत के साथ हों।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १३४

देवताओं और मुनियों का चित्रकूट आगमन

पारायण संकेत: मासपारायण, सत्रहँवा विश्राम

चौपाइयाँ — मूल पाठ

अमर नाग किंनर दिसिपाला। चित्रकूट आए तेहि काला ॥ राम प्रनामु कीन्ह सब काहू। मुदित देव लहि लोचन लाहू ॥ बरषि सुमन कह देव समाजू। नाथ सनाथ भए हम आजू ॥ करि बिनती दुख दुसह सुनाए। हरषित निज निज सदन सिधाए ॥ चित्रकूट रघुनंदनु छाए। समाचार सुनि सुनि मुनि आए ॥ आवत देखि मुदित मुनिबृंदा। कीन्ह दंडवत रघुकुल चंदा ॥ मुनि रघुबरहि लाइ उर लेहीं। सुफल होन हित आसिष देहीं ॥ सिय सौमित्र राम छबि देखहिं। साधन सकल सफल करि लेखहिं ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

देव, नाग, किन्नर और लोकपाल दर्शन को आते हैं; राम सबको प्रणाम करते हैं। वे पुष्प बरसाकर अपनी प्रार्थनाएँ निवेदित करते और लौटते हैं। समाचार पाकर मुनि भी आते, राम को गले लगाते और अपनी साधना सफल मानते हैं।

दोहा १३४

जथाजोग सनमानि प्रभु बिदा किए मुनिबृंद। करहि जोग जप जाग तप निज आश्रमन्हि सुछंद ॥ १३४ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

राम मुनियों को यथोचित सम्मान देकर विदा करते हैं; वे अपने आश्रमों में प्रसन्नतापूर्वक योग, जप, यज्ञ और तप करते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १३५

चित्रकूट के वनवासियों का मिलन

चौपाइयाँ — मूल पाठ

यह सुधि कोल किरातन्ह पाई। हरषे जनु नव निधि घर आई ॥ कंद मूल फल भरि भरि दोना। चले रंक जनु लूटन सोना ॥ तिन्ह महँ जिन्ह देखे दोउ भ्राता। अपर तिन्हहि पूँछहि मगु जाता ॥ कहत सुनत रघुबीर निकाई। आइ सबन्हि देखे रघुराई ॥ करहिं जोहारु भेंट धरि आगे। प्रभुहि बिलोकहिं अति अनुरागे ॥ चित्र लिखे जनु जहँ तहँ ठाढ़े। पुलक सरीर नयन जल बाढ़े ॥ राम सनेह मगन सब जाने। कहि प्रिय बचन सकल सनमाने ॥ प्रभुहि जोहारि बहोरि बहोरी। बचन बिनीत कहहिं कर जोरी ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

राम के आने का समाचार सुनकर कोल-किरात अत्यंत प्रसन्न होते हैं और फल-मूल लेकर आते हैं। परिचितों से मार्ग तथा स्वरूप पूछते हुए वे दर्शन पाते हैं। आँसू और रोमांच सहित भेंट देते हैं; राम उनके प्रेम को समझकर सबका आदर करते हैं।

दोहा १३५

अब हम नाथ सनाथ सब भए देखि प्रभु पाय। भाग हमारे आगमनु राउर कोसलराय ॥ १३५ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

वनवासी कहते हैं—प्रभु के चरण देखकर हम सब सनाथ हुए; कोसलराज, आपका यहाँ आना हमारा महान सौभाग्य है।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १३६

वनवासियों की सेवाभावना

चौपाइयाँ — मूल पाठ

धन्य भूमि बन पंथ पहारा। जहँ जहँ नाथ पाउ तुम्ह धारा ॥ धन्य बिहग मृग काननचारी। सफल जनम भए तुम्हहि निहारी ॥ हम सब धन्य सहित परिवारा। दीख दरसु भरि नयन तुम्हारा ॥ कीन्ह बासु भल ठाउँ बिचारी। इहाँ सकल रितु रहब सुखारी ॥ हम सब भाँति करब सेवकाई। करि केहरि अहि बाघ बराई ॥ बन बेहड़ गिरि कंदर खोहा। सब हमार प्रभु पग पग जोहा ॥ तहँ तहँ तुम्हहि अहेर खेलाउब। सर निरझर जलठाउँ देखाउब ॥ हम सेवक परिवार समेता। नाथ न सकुचब आयसु देता ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

वनवासी भूमि, वन, मार्ग और जीवों को राम के चरणस्पर्श से धन्य मानते हैं। वे हर ऋतु में सेवा, वन्य संकट से रक्षा और जलस्रोतों-मार्गों का परिचय कराने को तत्पर हैं। परिवार सहित सेवक मानकर निर्भय होकर आज्ञा देने का अनुरोध करते हैं।

दोहा १३६

बेद बचन मुनि मन अगम ते प्रभु करुना ऐन। बचन किरातन्ह के सुनत जिमि पितु बालक बैन ॥ १३६ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

जो प्रभु वेद और मुनिमन की पहुँच से परे हैं, वे उनकी सरल बातें ऐसे सुनते हैं जैसे पिता अपने बालकों की वाणी।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १३७

राम को केवल प्रेम प्रिय

चौपाइयाँ — मूल पाठ

रामहि केवल प्रेमु पिआरा। जानि लेउ जो जाननिहारा ॥ राम सकल बनचर तब तोषे। कहि मृदु बचन प्रेम परिपोषे ॥ बिदा किए सिर नाइ सिधाए। प्रभु गुन कहत सुनत घर आए ॥ एहि बिधि सिय समेत दोउ भाई। बसहिं बिपिन सुर मुनि सुखदाई ॥ जब ते आइ रहे रघुनायकु। तब तें भयउ बनु मंगलदायकु ॥ फूलहिं फलहिं बिटप बिधि नाना ॥ मंजु बलित बर बेलि बिताना ॥ सुरतरु सरिस सुभायँ सुहाए। मनहुँ बिबुध बन परिहरि आए ॥ गंज मंजुतर मधुकर श्रेनी। त्रिबिध बयारि बहइ सुख देनी ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

कवि स्पष्ट करते हैं कि राम के लिए प्रेम ही मुख्य है। राम मधुर वचन से वनवासियों को संतुष्ट कर विदा करते हैं। उनके निवास से वन मंगलमय हुआ; वृक्ष-लताएँ फल-फूल से लदे, भ्रमर गुंजे और सुखद पवन बहा।

दोहा १३७

नीलकंठ कलकंठ सुक चातक चक्क चकोर। भाँति भाँति बोलहिं बिहग श्रवन सुखद चित चोर ॥ १३७ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

मोर, कोयल, तोता, चातक, चकवा और चकोर जैसे विविध पक्षियों की मनमोहक ध्वनियाँ कानों को आनंद देती हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १३८

चित्रकूट की प्रकृति की धन्यता

चौपाइयाँ — मूल पाठ

केरि केहरि कपि कोल कुरंगा। बिगतबैर बिचरहिं सब संगा ॥ फिरत अहेर राम छबि देखी। होहिं मुदित मृगबंद बिसेषी ॥ बिबुध बिपिन जहँ लगि जग माहीं। देखि राम बनु सकल सिहाहीं ॥ सुरसरि सरसइ दिनकर कन्या। मेकलसुता गोदावरि धन्या ॥ सब सर सिंधु नदी नद नाना। मंदाकिनि कर करहिं बखाना ॥ उदय अस्त गिरि अरु कैलासू। मंदर मेरु सकल सुरबासू ॥ सैल हिमाचल आदिक जेते। चित्रकूट जसु गावहिं तेते ॥ बिंधि मुदित मन सुखु न समाई। श्रम बिनु बिपुल बड़ाई पाई ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

वन्य जीव वैर छोड़कर साथ विचरते हैं। अन्य दिव्य वन, नदियाँ, सरोवर और पर्वत चित्रकूट तथा मंदाकिनी का गुणगान करते हैं। कवि की भक्तिदृष्टि में प्रभु का निवास पूरे प्राकृतिक परिवेश को विशिष्ट और मंगलमय बना देता है।

दोहा १३८

चित्रकूट के बिहग मृग बेलि बिटप तृन जाति। पुन्य पुंज सब धन्य अस कहहिं देव दिन राति ॥ १३८ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

देवता दिन-रात चित्रकूट के पक्षी, पशु, लता, वृक्ष और घास तक को पुण्यसमूह तथा धन्य कहते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १३९

लक्ष्मण की अखंड सेवा

चौपाइयाँ — मूल पाठ

नयनवंत रघुबरहि बिलोकी। पाइ जनम फल होहिं बिसोकी ॥ परसि चरन रज अचर सुखारी। भए परम पद के अधिकारी ॥ सो बनु सैलु सुभायँ सुहावन। मंगलमय अति पावन पावन ॥ महिमा कहिअ कवनि बिधि तासू। सुखसागर जहँ कीन्ह निवासू ॥ पय पयोधि तजि अवध बिहाई। जहँ सिय लखनु रामु रहे आई ॥ कहि न सकहिं सुषमा जसि कानन। जौं सत सहस होंहिं सहसानन ॥ सो मैं बरनि कहौं बिधि केहीं। डाबर कमठ कि मंदर लेहीं ॥ सेवहिं लखनु करम मन बानी। जाइ न सीलु सनेहु बखानी ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

दर्शन और चरणरज पाकर जीव तथा अचल प्रकृति धन्य हैं। कवि कहते हैं कि जहाँ सुखसागर राम बसे हों उस वन की महिमा सहस्रमुख भी नहीं कह सकते। लक्ष्मण मन-वचन-कर्म से सेवा में लगे हैं; उनका शील और प्रेम अवर्णनीय है।

दोहा १३९

छिनु छिनु लखि सिय राम पद जानि आपु पर नेहु। करत न सपनेहुँ लखनु चितु बंधु मातु पितु गेहु ॥ १३९ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

सीता-राम के चरण और अपने प्रति उनका स्नेह देखकर लक्ष्मण को स्वप्न में भी घर, भाई या माता-पिता की अलग चिंता नहीं सताती।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १४०

सीताजी का वन में संतोष

चौपाइयाँ — मूल पाठ

राम संग सिय रहति सुखारी। पुर परिजन गृह सुरति बिसारी ॥ छिनु छिनु पिय बिधु बदनु निहारी। प्रमुदित मनहुँ चकोरकुमारी ॥ नाह नेहु नित बढ़त बिलोकी। हरषित रहति दिवस जिमि कोकी ॥ सिय मनु राम चरन अनुरागा। अवध सहस सम बनु प्रिय लागा ॥ परनकुटी प्रिय प्रियतम संगा। प्रिय परिवारु कुरंग बिहंगा ॥ सासु ससुर सम मुनितिय मुनिबर। असनु अमिअ सम कंद मूल फर ॥ नाथ साथ साँथरी सुहाई। मयन सयन सय सम सुखदाई ॥ लोकप होहिं बिलोकत जासू। तेहि कि मोहि सक बिषय बिलासू ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

राम के साथ सीता घर-परिवार की स्मृति से उत्पन्न कष्ट भूलकर सुखी रहती हैं। पर्णकुटी, पशु-पक्षी, मुनि-मुनिपत्नियाँ और कंद-मूल उन्हें प्रिय लगते हैं। राम का बढ़ता प्रेम वन को हजार अयोध्याओं जैसा सुखद बना देता है।

दोहा १४०

सुमिरत रामहि तजहिं जन तृन सम बिषय बिलासु। रामप्रिया जग जननि सिय कछु न आचरजु तासु ॥ १४० ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

जब रामस्मरण से साधारण भक्त भी विषयभोग छोड़ देते हैं, तब उनकी प्रिया जगज्जननी सीता की विरक्ति आश्चर्य नहीं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १४१

परिवार की स्मृति और परस्पर सांत्वना

चौपाइयाँ — मूल पाठ

सीय लखन जेहि बिधि सुखु लहहीं। सोइ रघुनाथ करहि सोइ कहहीं ॥ कहहिं पुरातन कथा कहानी। सुनहिं लखनु सिय अति सुखु मानी। जब जब रामु अवध सुधि करहीं। तब तब बारि बिलोचन भरहीं ॥ सुमिरि मातु पितु परिजन भाई। भरत सनेहु सीलु सेवकाई ॥ कृपासिंधु प्रभु होहिं दुखारी। धीरजु धरहिं कुसमउ बिचारी ॥ लखि सिय लखनु बिकल होइ जाहीं। जिमि पुरुषहि अनुसर परिछाहीं ॥ प्रिया बंधु गति लखि रघुनंदनु। धीर कृपाल भगत उर चंदनु ॥ लगे कहन कछु कथा पुनीता। सुनि सुखु लहहिं लखनु अरु सीता ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

राम वही करते और कहते हैं जिससे सीता-लक्ष्मण को सुख मिले; वे पुरानी पवित्र कथाएँ सुनाते हैं। माता-पिता, भाइयों और भरत का प्रेम याद कर उनकी आँखें भर आती हैं। दोनों की व्याकुलता देखकर वे धीरज रखकर कथा से सबको सांत्वना देते हैं।

दोहा १४१

रामु लखन सीता सहित सोहत परन निकेत। जिमि बासव बस अमरपुर सची जयंत समेत ॥ १४१ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

पर्णकुटी में सीता और लक्ष्मण सहित राम ऐसे सुशोभित हैं जैसे अमरावती में शची और जयंत सहित इंद्र।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १४२

कथा फिर सुमंत्र की ओर

चौपाइयाँ — मूल पाठ

जोगवहिं प्रभु सिय लखनहिं कैसें। पलक बिलोचन गोलक जैसें ॥ सेवहिं लखनु सीय रघुबीरहि। जिमि अबिबेकी पुरुष सरीरहि ॥ एहि बिधि प्रभु बन बसहिं सुखारी। खग मृग सुर तापस हितकारी ॥ कहेउँ राम बन गवनु सुहावा। सुनहु सुमंत्र अवध जिमि आवा ॥ फिरेउ निषादु प्रभुहि पहुँचाई। सचिव सहित रथ देखेसि आई ॥ मंत्री बिकल बिलोकि निषादू। कहि न जाइ जस भयउ बिषादू ॥ राम राम सिय लखन पुकारी। परेउ धरनितल ब्याकुल भारी ॥ देखि दखिन दिसि हय हिहिनाहीं। जनु बिनु पंख बिहग अकुलाहीं ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

राम सीता-लक्ष्मण को पलकों की तरह सँभालते हैं और लक्ष्मण उनकी अनन्य सेवा करते हैं। अब कवि सुमंत्र के लौटने की कथा लेते हैं। गुह लौटकर सुमंत्र और रथ को देखते हैं; मंत्री राम-सीता-लक्ष्मण पुकारकर भूमि पर गिर पड़ते हैं।

दोहा १४२

नहिं तृन चरहिं पिअहिं जलु मोचहिं लोचन बारि। ब्याकुल भए निषाद सब रघुबर बाजि निहारि ॥ १४२ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

राम के घोड़े न घास चरते, न जल पीते और आँखों से आँसू बहाते हैं; उन्हें देखकर सभी निषाद व्याकुल होते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १४३

गुह का धीरज देना और सेवक साथ भेजना

चौपाइयाँ — मूल पाठ

धरि धीरज तब कहइ निषादू। अब सुमंत्र परिहरहु बिषादू ॥ तुम्ह पंडित परमारथ ग्याता। धरहु धीर लखि बिमुख बिधाता बिबिध कथा कहि कहि मृदु बानी। रथ बैठारेउ बरबस आनी ॥ सोक सिथिल रथ सकइ न हाँकी। रघुबर बिरह पीर उर बाँकी ॥ चरफराहिँ मग चलहिं न घोरे। बन मृग मनहुँ आनि रथ जोरे ॥ अढ़ुकि परहिं फिरि हेरहिं पीछें। राम बियोगि बिकल दुख तीछें ॥ जो कह रामु लखनु बैदेही। हिंकरि हिंकरि हित हेरहिं तेही ॥ बाजि बिरह गति कहि किमि जाती। बिनु मनि फनिक बिकल जेहि भाँती ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

गुह सुमंत्र को उनके विवेक का स्मरण कर धैर्य देते और रथ पर बैठाते हैं। शोक से वे रथ चला नहीं पाते। घोड़े भी आगे नहीं बढ़ते, पीछे देखते और राम-लक्ष्मण-सीता का नाम सुनकर हिनहिनाते हैं।

दोहा १४३

भयउ निषाद बिषादबस देखत सचिव तुरंग। बोलि सुसेवक चारि तब दिए सारथी संग ॥ १४३ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

मंत्री और घोड़ों की दशा से दुःखी गुह चार विश्वस्त सेवक बुलाकर सारथी के साथ भेजते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १४४

सुमंत्र का आत्मग्लानि से भरा मार्ग

चौपाइयाँ — मूल पाठ

गुह सारथिहि फिरेउ पहुँचाई। बिरहु बिषादु बरनि नहिं जाई ॥ चले अवध लेइ रथहि निषादा। होहि छनहिं छन मगन बिषादा ॥ सोच सुमंत्र बिकल दुख दीना। धिग जीवन रघुबीर बिहीना ॥ रहिहि न अंतहुँ अधम सरीरू। जसु न लहेउ बिछुरत रघुबीरू ॥ भए अजस अघ भाजन प्राना। कवन हेतु नहिं करत पयाना ॥ अहह मंद मनु अवसर चूका। अजहुँ न हृदय होत दुइ टूका ॥ मीजि हाथ सिरु धुनि पछिताई। मनहँ कृपन धन रासि गवाँई ॥ बिरिद बाँधि बर बीरु कहाई। चलेउ समर जनु सुभट पराई ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

गुह कुछ दूर पहुँचाकर लौटते हैं। सेवक रथ अयोध्या ले चलते हैं और सुमंत्र बार-बार शोक में डूबते हैं। वे राम को छोड़कर जीवित लौटने पर स्वयं को धिक्कारते हैं; कवि हानि, लज्जा और हार की अनेक उपमाओं से उनकी दशा समझाते हैं।

दोहा १४४

बिप्र बिबेकी बेदबिद संमत साधु सुजाति। जिमि धोखें मदपान कर सचिव सोच तेहि भाँति ॥ १४४ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

सुमंत्र की ग्लानि उस विवेकी धर्मनिष्ठ व्यक्ति जैसी है जिसे अनजाने में अपने आचरण के विरुद्ध कार्य हो जाने का पश्चात्ताप हो।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १४५

अयोध्यावासियों को क्या उत्तर दूँगा?

चौपाइयाँ — मूल पाठ

जिमि कुलीन तिय साधु सयानी। पतिदेवता करम मन बानी ॥ रहै करम बस परिहरि नाहू। सचिव हृदयँ तिमि दारुन दाहु ॥ लोचन सजल डीठि भइ थोरी। सुनइ न श्रवन बिकल मति भोरी ॥ सूखहिं अधर लागि मुहँ लाटी। जिउ न जाइ उर अवधि कपाटी ॥ बिबरन भयउ न जाइ निहारी। मारेसि मनहुँ पिता महतारी ॥ हानि गलानि बिपुल मन ब्यापी। जमपुर पंथ सोच जिमि पापी ॥ बचनु न आव हृदयँ पछिताई। अवध काह मैं देखब जाई ॥ राम रहित रथ देखिहि जोई। सकुचिहि मोहि बिलोकत सोई ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

सुमंत्र का हृदय वियोग से जल रहा है; दृष्टि धुँधली, कंठ सूखा और बुद्धि व्याकुल है। उन्हें लगता है कि रामरहित रथ देखकर हर कोई प्रश्न करेगा। वे नगर लौटने और सबके सामने समाचार कहने की पीड़ा से काँपते हैं।

दोहा १४५

धाइ पूँछिहहिं मोहि जब बिकल नगर नर नारि। उतरु देब मैं सबहि तब हृदयँ बज्रु बैठारि ॥ १४५ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

वे सोचते हैं—व्याकुल नगरवासी दौड़कर पूछेंगे तो हृदय को वज्र जैसा कठोर बनाकर उन्हें उत्तर देना होगा।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १४६

माताओं और राजा के प्रश्नों की आशंका

चौपाइयाँ — मूल पाठ

पुछिहहिं दीन दुखित सब माता। कहब काह मैं तिन्हहि बिधाता ॥ पूछिहि जबहिं लखन महतारी। कहिहउँ कवन सँदेस सुखारी ॥ राम जननि जब आइहि धाई। सुमिरि बच्छु जिमि धेनु लवाई ॥ पूँछत उतरु देब मैं तेही। गे बनु राम लखनु बैदेही ॥ जोइ पूँछिहि तेहि ऊतरु देबा।जाइ अवध अब यहु सुखु लेबा ॥ पूँछिहि जबहिं राउ दुख दीना। जिवनु जासु रघुनाथ अधीना ॥ देहउँ उतरु कौनु मुहु लाई। आयउँ कुसल कुअँर पहुँचाई ॥ सुनत लखन सिय राम सँदेसू। तृन जिमि तनु परिहरिहि नरेसू ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

सुमंत्र सोचते हैं कि सुमित्रा, कौसल्या और अन्य माताओं को क्या कहेंगे। दशरथ के प्राण राम पर निर्भर हैं; वन में कुशल पहुँचाने का समाचार भी उन्हें वियोग की चोट देगा। यह सोचकर मंत्री का हृदय भारी आत्मपीड़ा से भरता है।

दोहा १४६

ह्रदउ न बिदरेउ पंक जिमि बिछुरत प्रीतमु नीरु ॥ जानत हौं मोहि दीन्ह बिधि यहु जातना सरीरु ॥ १४६ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

वे कहते हैं—प्रिय जल के बिछुड़ने पर कीचड़ जैसा मेरा हृदय क्यों न फटा; मानो विधाता ने यह शरीर यातना सहने को दिया है।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १४७

सुमंत्र का संध्या में अयोध्या प्रवेश

चौपाइयाँ — मूल पाठ

एहि बिधि करत पंथ पछितावा। तमसा तीर तुरत रथु आवा ॥ बिदा किए करि बिनय निषादा। फिरे पायँ परि बिकल बिषादा ॥ पैठत नगर सचिव सकुचाई। जनु मारेसि गुर बाँभन गाई ॥ बैठि बिटप तर दिवसु गवाँवा। साँझ समय तब अवसरु पावा ॥ अवध प्रबेसु कीन्ह अँधिआरें। पैठ भवन रथु राखि दुआरें ॥ जिन्ह जिन्ह समाचार सुनि पाए। भूप द्वार रथु देखन आए ॥ रथु पहिचानि बिकल लखि घोरे। गरहिं गात जिमि आतप ओरे ॥ नगर नारि नर ब्याकुल कैंसें। निघटत नीर मीनगन जैंसें ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

तमसा पहुँचकर मंत्री साथ आए निषाद सेवकों को विदा करते हैं। नगर में प्रवेश की लज्जा से दिन वृक्ष के नीचे बिताते और अँधेरे में महल पहुँचते हैं। रामरहित रथ तथा व्याकुल घोड़े देखकर नगर में शोक फैल जाता है।

दोहा १४७

सचिव आगमनु सुनत सबु बिकल भयउ रनिवासु। भवन भयंकरु लाग तेहि मानहुँ प्रेत निवासु ॥ १४७ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

सुमंत्र के आने का समाचार पाकर रनिवास व्याकुल हुआ; उन्हें राजभवन भी निर्जीव और भयावह निवास जैसा प्रतीत हुआ।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १४८

भूमि पर पड़े दशरथ से भेंट

चौपाइयाँ — मूल पाठ

अति आरति सब पूँछहिं रानी। उतरु न आव बिकल भइ बानी ॥ सुनइ न श्रवन नयन नहिं सूझा। कहहु कहाँ नृप तेहि तेहि बूझा ॥ दासिन्ह दीख सचिव बिकलाई। कौसल्या गृहँ गईं लवाई ॥ जाइ सुमंत्र दीख कस राजा। अमिअ रहित जनु चंदु बिराजा ॥ आसन सयन बिभूषन हीना। परेउ भूमितल निपट मलीना ॥ लेइ उसासु सोच एहि भाँती। सुरपुर तें जनु खँसेउ जजाती ॥ लेत सोच भरि छिनु छिनु छाती। जनु जरि पंख परेउ संपाती ॥ राम राम कह राम सनेही। पुनि कह राम लखन बैदेही ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

रानियाँ समाचार पूछती हैं, पर सुमंत्र बोल नहीं पाते। दासियाँ उन्हें कौसल्या के भवन ले जाती हैं। राजा आभूषण और शय्या छोड़कर भूमि पर पड़े हैं तथा राम, लक्ष्मण और सीता का नाम लेकर लंबी साँसें भरते हैं।

दोहा १४८

देखि सचिवँ जय जीव कहि कीन्हेउ दंड प्रनामु। सुनत उठेउ ब्याकुल नृपति कहु सुमंत्र कहँ रामु ॥ १४८ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

सुमंत्र दंडवत करके राजा की जय कहते हैं; उनकी आवाज सुनते ही दशरथ व्याकुल उठकर पूछते हैं—सुमंत्र, राम कहाँ हैं?

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १४९

पुत्र-दर्शन के लिए दशरथ की पुकार

चौपाइयाँ — मूल पाठ

भूप सुमंत्रु लीन्ह उर लाई। बूड़त कछु अधार जनु पाई ॥ सहित सनेह निकट बैठारी। पूँछत राउ नयन भरि बारी ॥ राम कुसल कहु सखा सनेही। कहँ रघुनाथु लखनु बैदेही ॥ आने फेरि कि बनहि सिधाए। सुनत सचिव लोचन जल छाए ॥ सोक बिकल पुनि पूँछ नरेसू। कहु सिय राम लखन संदेसू ॥ राम रूप गुन सील सुभाऊ। सुमिरि सुमिरि उर सोचत राऊ ॥ राउ सुनाइ दीन्ह बनबासू। सुनि मन भयउ न हरषु हराँसू ॥ सो सुत बिछुरत गए न प्राना। को पापी बड़ मोहि समाना ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

दशरथ सुमंत्र को गले लगाकर पास बैठाते और तीनों की कुशल पूछते हैं। राम लौटे या वन गए, क्या संदेश है—इन प्रश्नों के साथ वे पुत्र का शील और समभाव याद करते हैं तथा अपने जीवित रहने पर ग्लानि करते हैं।

दोहा १४९

सखा रामु सिय लखनु जहँ तहाँ मोहि पहुँचाउ। नाहिं त चाहत चलन अब प्रान कहउँ सतिभाउ ॥ १४९ ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

राजा कहते हैं—मुझे वहाँ पहुँचाओ जहाँ राम, सीता और लक्ष्मण हैं; अन्यथा सच कहता हूँ, प्राण अब निकलना चाहते हैं।

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अयोध्याकाण्ड · दोहा १५०

सुमंत्र का धैर्य-उपदेश और यात्रा-वृत्तांत

चौपाइयाँ — मूल पाठ

पुनि पुनि पूँछत मंत्रहि राऊ। प्रियतम सुअन सँदेस सुनाऊ ॥ करहि सखा सोइ बेगि उपाऊ। रामु लखनु सिय नयन देखाऊ ॥ सचिव धीर धरि कह मुदु बानी। महाराज तुम्ह पंडित ग्यानी ॥ बीर सुधीर धुरंधर देवा। साधु समाजु सदा तुम्ह सेवा ॥ जनम मरन सब दुख भोगा। हानि लाभ प्रिय मिलन बियोगा ॥ काल करम बस हौहिं गोसाईं। बरबस राति दिवस की नाईं ॥ सुख हरषहिं जड़ दुख बिलखाहीं। दोउ सम धीर धरहिं मन माहीं ॥ धीरज धरहु बिबेकु बिचारी। छाड़िअ सोच सकल हितकारी ॥
इन चौपाइयों का समेकित सरल हिंदी अर्थ

राजा बार-बार संदेश और पुत्रदर्शन चाहते हैं। सुमंत्र धैर्य रखकर कहते हैं कि जन्म-मरण, हानि-लाभ और मिलन-वियोग समय तथा कर्म के अधीन आते हैं। धीर व्यक्ति सुख-दुःख में संतुलन रखते हैं। वे राजा को विवेक से सँभलने को कहते हैं।

दोहा १५०

प्रथम बासु तमसा भयउ दूसर सुरसरि तीर। न्हाई रहे जलपानु करि सिय समेत दोउ बीर ॥ १५० ॥
दोहा का सरल हिंदी अर्थ

सुमंत्र यात्रा बताते हैं—पहला पड़ाव तमसा और दूसरा गंगा तट पर हुआ; दोनों वीर सीता सहित स्नान करके जलपान पर रहे।

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प्रेम, सेवा और विवेक का यह क्रम

सीताजी का दृढ़ प्रेम, लक्ष्मणजी की सेवा, सुमित्राजी का निर्मल मार्गदर्शन, निषादराज की आत्मीयता और केवट का समर्पण वनयात्रा को भक्ति की जीवंत शिक्षा बनाते हैं। वाल्मीकि के संवाद में राम का निवास केवल किसी भवन में नहीं, निष्कपट, सत्यप्रिय और हितकारी हृदय में बताया गया है। परिवार के वियोग की करुणा के बीच भी राम दूसरों के दुःख, सम्मान और हित का ध्यान रखते हैं।

पात्रों के आत्मधिक्कार, विरह-उपमाएँ तथा ऐतिहासिक सामाजिक शब्द कथा की भावभूमि में पढ़ें। उन्हें किसी व्यक्ति या समुदाय की आज की योग्यता, गरिमा अथवा जीवन-मूल्य का निर्णय न मानें।

पाठ-संदर्भ और संपादन

मूल अवधी पाठ का आधार संस्कृत डॉक्यूमेंट्स का अयोध्याकाण्ड पाठ है। संदिग्ध क्रमांकन और स्पष्ट अक्षर-दोषों की तुलना गीता प्रेस के मुद्रित मूल पाठ की पृष्ठ ४०२–४८० तथा पृष्ठ ४८१–५०० की स्कैन-प्रतियों से की गई है। किसी आधुनिक हिंदी या अंग्रेजी अनुवाद का पुनर्मुद्रण नहीं किया गया है।

सीमित संपादन और इस लेख की सीमा
  • डिजिटल पाठ के दोहा १०७ में छूटा क्रमांक मुद्रित पाठ से मिलाकर जोड़ा है।
  • दोहा ८५ में डिजिटल “सुय जान” के स्थान पर मुद्रित “सिय जान” रखा है।
  • दोहा १०४ में अतिरिक्त लैटिन चिह्न हटाकर मुद्रित “सिय सहित” और “रघुनाथ” का पाठ लिया है।
  • दोहा १०८ में स्पष्ट डिजिटल दोहराव “मुददित” को मुद्रित “मुदित” से मिलाया है; दोहा ११८ के बाद आया अलग लैटिन चिह्न हटाया है।
  • काव्य से अलग पारायण-संकेत अलग छोटे पाठ में सुरक्षित हैं। क्रमांक ७५, १०० और १२६ सोरठे हैं; उनके पहले के तीन छंद भी पूरे दिए हैं।
  • अन्य शब्द सामान्यतः चुने हुए डिजिटल पाठ के अनुसार हैं; संस्करणों में वर्तनी और पाठांतर मिल सकते हैं। यह भाग १५० पर रुकता है, अयोध्याकाण्ड का समापन नहीं है।

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अयोध्याकाण्ड सम्पूर्ण · भाग 1–5

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॥ जय श्री सीताराम ॥
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