श्रीरामचरितमानस अयोध्याकाण्ड भाग 3 | सीता-लक्ष्मण वनगमन, केवट मिलन और चित्रकूट | दोहा 61–150 अर्थ सहित
श्रीरामचरितमानस
अयोध्याकाण्ड — भाग ३
सीता-लक्ष्मण का वनगमन, केवट मिलन और चित्रकूट निवास
दोहा ६१–१५० · पूरा मूल क्रम · चौपाइयाँ, छंद, दोहे और सोरठे · सरल हिंदी अर्थ
एक बड़े भाग में वनयात्रा के अनेक प्रसंग
यह पाठ पिछले भाग के दोहा ६० के ठीक बाद की चौपाइयों से आरंभ होकर दोहा १५० तक चलता है। यहाँ सीताजी और लक्ष्मणजी की साथ चलने की विनती, अयोध्या से प्रस्थान, निषादराज की सेवा, लक्ष्मण का विवेक-उपदेश, केवट का प्रेम, प्रयाग और वाल्मीकि आश्रम, चित्रकूट निवास तथा सुमंत्र की अयोध्या-वापसी क्रम से पढ़ें।
भागों की संख्या कम रखने के लिए इस लेख में ९० क्रमांक एक साथ दिए हैं। प्रत्येक क्रमांक के नीचे बीच की पूरी मूल चौपाइयाँ और उनका समेकित सरल हिंदी अर्थ है; दोहे तथा सोरठे का अर्थ अलग है। यह शब्दशः टीका नहीं, मूल पाठ की स्वतंत्र अध्ययन-सहायक व्याख्या है। जहाँ छंद है, उसका पाठ और अर्थ भी अलग दिया है।
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क्रमांक ६१–७०
क्रमांक ७१–८०
क्रमांक ८१–९०
क्रमांक ९१–१००
क्रमांक १०१–११०
क्रमांक १११–१२०
क्रमांक १२१–१३०
क्रमांक १३१–१४०
क्रमांक १४१–१५०
सीताजी से अयोध्या में रहने का अनुरोध
पारायण संकेत: मासपारायण, चौदहवाँ विश्राम
चौपाइयाँ — मूल पाठ
माता के सामने संकोच रखते हुए राम सीता को अपना हित समझाकर घर रहने की सलाह देते हैं। वे चाहते हैं कि सीता सास-ससुर की सेवा करें और कौसल्या को उनके वियोग में पुरानी कथाएँ सुनाकर धीरज दें।
दोहा ६१
गुरु और वेदसम्मत आचरण से सहज धर्मफल मिलता है; हठ के कारण गालव और नहुष जैसे पात्रों ने संकट सहे।
वनमार्ग की कठिनाइयों का वर्णन
चौपाइयाँ — मूल पाठ
राम पिता का वचन पूरा करके लौटने का आश्वासन देते हैं। फिर कठोर मौसम, काँटे-पत्थरों वाला नंगे पाँव का मार्ग, पर्वत, गहरी नदियाँ और हिंसक जीवों का भय बताते हैं। वे सीता के कोमल चरणों की चिंता करते हैं।
दोहा ६२
वन में धरती पर सोना, वल्कल पहनना और कंद-मूल खाना होगा; ये साधन भी हर दिन अनुकूल मिलें, यह निश्चित नहीं।
हितकारी सीख मानने की बात
चौपाइयाँ — मूल पाठ
राम कहते हैं कि वन में छल करने वाले राक्षस, विषैले जीव और अनेक अनजाने संकट हैं। मानसरोवर की हंसिनी तथा आम्रवन की कोयल की उपमाओं से वे सीता को समझाते हैं कि सुखपूर्वक पली देह के लिए वनजीवन कठिन होगा।
दोहा ६३
स्वाभाविक हितैषी, गुरु और स्वामी की हितकारी सीख का अनादर करने वाला बाद में हानि और पछतावा अनुभव करता है।
सीताजी का उत्तर: वियोग सबसे बड़ा दुःख
चौपाइयाँ — मूल पाठ
राम की कोमल सीख सुनकर सीता की आँखों में आँसू भर आए। उन्होंने धैर्य रखकर सास के चरण पकड़े और विनयपूर्वक कहा कि पति ने उनका हित ही समझाया है, फिर भी उनके लिए प्रिय से बिछोह सबसे बड़ा दुःख है।
दोहा ६४
सीता कहती हैं—करुणामय प्रियतम, आपके बिना स्वर्ग भी मुझे नरक के समान लगेगा।
प्रिय के साथ वन भी सुखद
चौपाइयाँ — मूल पाठ
सीता अपने अनुभव की भाषा में कहती हैं कि प्रिय के वियोग में संबंधी, धन, राजमहल और भोग भी आनंद नहीं देते। उनके लिए राम का साथ ही जीवन का सुख है; उनके दर्शन से वन का अभाव भी अभाव नहीं रहेगा।
दोहा ६५
राम के साथ पक्षी-पशु परिजन, वन नगर, वल्कल सुंदर वस्त्र और पर्णकुटी स्वर्ग जैसा सुखद निवास बन जाएँगे।
साथ चलने की करुण विनती
चौपाइयाँ — मूल पाठ
सीता कहती हैं कि वन के देवता सास-ससुर जैसे, पत्तों की शय्या सुंदर पलंग और कंद-मूल अमृत जैसे लगेंगे। वन के सारे भय मिलकर भी राम-वियोग के क्षणभर के दुःख के बराबर नहीं हैं; इसलिए उन्हें साथ लिया जाए।
दोहा ६६
अयोध्या में रोकने पर उनके प्राण अवधि भर रहेंगे या नहीं, यह अनिश्चित है; वे दीनबंधु राम से करुणा चाहती हैं।
सेवा का संकल्प और विरह की पीड़ा
चौपाइयाँ — मूल पाठ
सीता मार्ग में चरण देखते चलने, थकान दूर करने, पाँव धोने, पंखा करने और विश्राम की व्यवस्था करने का संकल्प बताती हैं। राम की उपस्थिति में उन्हें भय नहीं लगता। केवल स्वयं को कोमल बताकर पीछे छोड़ने की बात उनके हृदय को दुखाती है।
दोहा ६७
सीता वेदना से कहती हैं—वियोग की इतनी कठोर बात सुनकर भी हृदय नहीं टूटा, तो ये प्राण आगे का विरह भी सहेंगे।
श्रीराम की स्वीकृति और माता की आकुलता
चौपाइयाँ — मूल पाठ
सीता की दशा देखकर राम उन्हें साथ वन चलने की अनुमति देते हैं और शीघ्र तैयारी को कहते हैं। माता के चरण छूकर आशिष लेते हैं। कौसल्या लौटकर उनकी सुंदर जोड़ी देखने और वक्ष से लगाने का दिन सोचकर विह्वल होती हैं।
दोहा ६८
कौसल्या सोचती हैं—कब फिर पुत्र को लाल, रघुपति और रघुवर कहकर बुलाऊँगी, हृदय से लगाकर आनंद से निहारूँगी?
कौसल्या का सीताजी को आशीर्वाद
चौपाइयाँ — मूल पाठ
राम माता को अनेक प्रकार से धीरज देते हैं। सीता सास के चरणों में कहती हैं कि सेवा के अवसर पर वन जाना उनका दुर्भाग्य है; स्नेह न छोड़ें। कौसल्या उन्हें बार-बार हृदय से लगाकर अखंड सौभाग्य का आशीष देती हैं।
दोहा ६९
अनेक सीख और आशीर्वाद पाकर सीता अत्यंत प्रेम से बार-बार सास के चरणों में सिर झुकाकर चलती हैं।
लक्ष्मण का व्याकुल होकर आना
चौपाइयाँ — मूल पाठ
समाचार सुनकर लक्ष्मण काँपते शरीर, पुलक और आँसुओं के साथ राम के चरण पकड़ लेते हैं। वे सोचते हैं कि साथ जाने देंगे या घर रखेंगे। राम उन्हें प्रेम में अधीर न होकर परिणाम समझने और हितकारी शिक्षा मानने को कहते हैं।
दोहा ७०
माता-पिता, गुरु और स्वामी की उचित सीख सहज भाव से मानना जीवन को सार्थक करता है।
परिवार और प्रजा की चिंता
चौपाइयाँ — मूल पाठ
राम समझाते हैं कि भरत-शत्रुघ्न यहाँ नहीं हैं और पिता वृद्ध तथा दुःखी हैं। लक्ष्मण भी चले जाएँगे तो परिवार और प्रजा का सहारा घटेगा। प्रजा को दुःख में रखकर राज्य-सुख चाहने वाले राजा को वे दोषी बताते हैं। लक्ष्मण यह सुनकर व्याकुल होते हैं।
दोहा ७१
लक्ष्मण उत्तर नहीं दे पाते; चरण पकड़कर कहते हैं—आप स्वामी हैं, मैं सेवक हूँ; छोड़ देंगे तो मेरा क्या उपाय है?
लक्ष्मण की अनन्य सेवा-विनती
चौपाइयाँ — मूल पाठ
लक्ष्मण कहते हैं कि शिक्षा श्रेष्ठ है, पर उनका हृदय राम के स्नेह में पला है और कठिन धैर्य उठाने में स्वयं को असमर्थ पाता है। उनके सभी संबंध राम में ही केंद्रित हैं; मन-वचन-कर्म से चरणों में लगे सेवक को न छोड़ें।
दोहा ७२
लक्ष्मण की विनम्र और प्रेमभीत वाणी सुनकर करुणामय राम उन्हें समझाते हुए हृदय से लगा लेते हैं।
सुमित्रा से अनुमति लेने जाना
चौपाइयाँ — मूल पाठ
राम लक्ष्मण को माता से विदा लेकर शीघ्र आने और साथ चलने को कहते हैं। लक्ष्मण प्रसन्न होकर सुमित्रा के पास पहुँचते हैं और सब घटना बताते हैं। माता सहम जाती हैं; लक्ष्मण आशंकित होते हैं कि ममता कहीं अनुमति न रोक दे।
दोहा ७३
सीता-राम के सुशील रूप और राजा के प्रेम का विचार कर सुमित्रा इस अनर्थ के कारण पर दुख व्यक्त करती हैं।
जहाँ राम, वहीं अयोध्या
चौपाइयाँ — मूल पाठ
सुमित्रा धैर्य रखकर कहती हैं—सीता को माता और राम को पिता समझो; जहाँ राम हैं वहीं तुम्हारी अयोध्या है। गुरु, माता-पिता और संबंधों की सेवा की शिक्षा देकर वे राम को सबके निष्कपट हितैषी प्राणप्रिय बताते हुए साथ जाने को कहती हैं।
दोहा ७४
सुमित्रा लक्ष्मण के छलरहित रामप्रेम को अपना भी सौभाग्य मानकर उन पर बलिहार जाती हैं।
सुमित्रा की सेवा-शिक्षा और आशीष
चौपाइयाँ — मूल पाठ
सुमित्रा पुत्र की रामभक्ति को जीवन का श्रेष्ठ फल मानती हैं। वे आसक्ति, क्रोध, ईर्ष्या, अहंकार और मोह से बचकर मन-वचन-कर्म से सेवा करने को कहती हैं। लक्ष्य यही हो कि वन में राम-सीता को कोई कष्ट न हो।
छंद — मूल पाठ
माता कहती हैं—ऐसी सेवा करो कि राम-सीता को माता-पिता, प्रिय परिवार और नगर की कमी का दुःख वन में न सताए। फिर निर्मल, अखंड और प्रतिदिन बढ़ते चरणप्रेम का आशीर्वाद देती हैं।
सोरठा ७५
माता के चरणों में सिर झुकाकर लक्ष्मण तुरंत चले, मानो कठिन जाल से छूटा हिरण अवसर पाकर भाग निकला हो।
दशरथ के समक्ष तीनों का आगमन
चौपाइयाँ — मूल पाठ
लक्ष्मण राम के पास लौटकर सीता-राम को प्रणाम करते हैं और उनके साथ राजमहल आते हैं। नगर में गहरा विषाद है। सुमंत्र राजा को सँभालकर बैठाते हैं; राम के आने पर सीता सहित दोनों पुत्रों को देखकर दशरथ और आकुल हो जाते हैं।
दोहा ७६
दशरथ सीता और सुंदर दोनों पुत्रों को बार-बार देखते हैं तथा प्रेम से बार-बार हृदय से लगाते हैं।
वचनपालन और राजा का दुःख
चौपाइयाँ — मूल पाठ
शोक से मौन पिता से राम प्रसन्न भाव से आशीर्वाद और विदा माँगते हैं, ताकि प्रेम के कारण वचन की मर्यादा न टूटे। राजा उन्हें बैठाकर कर्मफल के सामान्य सिद्धांत का स्मरण करते हुए अपनी उलझन और पीड़ा व्यक्त करते हैं।
दोहा ७७
दशरथ कहते हैं—अपराध कोई और करे तथा फल दूसरा भोगे! ईश्वर की गति अत्यंत विचित्र है; उसे कौन पूर्ण जान सकता है?
सीताजी को रोकने के अनेक प्रयत्न
चौपाइयाँ — मूल पाठ
दशरथ राम को रोकने का प्रयास करते हैं, पर उनका सत्यनिष्ठ निश्चय समझ जाते हैं। फिर सीता को हृदय से लगाकर वन के कष्ट बताते हैं। मंत्री और गुरु की पत्नियाँ भी परिवार के हित में रहने की सीख देती हैं, किंतु सीता का मन रामचरणों में है।
दोहा ७८
सबकी शीतल और हितकारी वाणी भी वियोग के कारण सीता को चकवी के लिए शरद की चाँदनी जैसी पीड़ादायक लगती है।
वनवेश में प्रस्थान
चौपाइयाँ — मूल पाठ
सीता संकोच से मौन हैं। कैकेयी तपस्वियों के वस्त्र और सामान लाकर राम को उनके निर्णय के अनुसार चलने को कहती हैं। उनकी बात राजा को बाण जैसी लगती है। राम तुरंत मुनिवेश धारण कर माता-पिता को प्रणाम करते हैं।
दोहा ७९
पत्नी और भाई सहित वनयात्रा की तैयारी करके राम ब्राह्मणों तथा गुरु के चरण वंदते और सबको शोकविह्वल छोड़कर निकलते हैं।
सेवकों और माताओं की देखभाल सौंपना
चौपाइयाँ — मूल पाठ
राम शोकग्रस्त लोगों को समझाते हैं, गुरु की सहमति से दान और निर्वाह की व्यवस्था करते हैं तथा याचकों-मित्रों को संतुष्ट करते हैं। दास-दासियों को गुरु के संरक्षण में सौंपकर माता-पिता जैसे पालन का अनुरोध करते हैं और राजा को सुख पहुँचाने को कहते हैं।
दोहा ८०
राम नगरवासियों से निवेदन करते हैं कि ऐसा उपाय करें जिससे उनकी सभी माताएँ वियोग में दुःखी और असहाय न हों।
दशरथ का सुमंत्र को रथ ले जाने का आदेश
चौपाइयाँ — मूल पाठ
गुरु का आशीष लेकर राम चलते हैं और नगर शोक में डूबता है। मूर्छा से उठे दशरथ अपने असह्य विरह का वर्णन करते हुए सुमंत्र को रथ लेकर पुत्रों के साथ जाने का आदेश देते हैं।
दोहा ८१
राजा कहते हैं—दोनों राजकुमार और जनकसुता बहुत कोमल हैं; रथ पर वन दिखाकर चार दिन बाद उन्हें लौटा लाना।
सीताजी को लौटाने की आशा
चौपाइयाँ — मूल पाठ
दशरथ कहते हैं कि सत्यव्रती राम-लक्ष्मण न लौटें तो सीता से विनय कर उन्हें लौटाएँ। मायके या ससुराल में उनकी इच्छा से रहने की सुविधा बताएं। सीता के लौटने को अपने प्राणों का सहारा कहकर राजा फिर मूर्छित होते हैं।
दोहा ८२
राजा की आज्ञा लेकर सुमंत्र शीघ्र रथ तैयार करते हैं और नगर के बाहर सीता सहित दोनों भाइयों के पास पहुँचते हैं।
रथ चला, अयोध्या व्याकुल हुई
चौपाइयाँ — मूल पाठ
सुमंत्र राजा का संदेश सुनाकर सीता सहित दोनों भाइयों को रथ पर बैठाते हैं। वे अयोध्या को मन से प्रणाम कर चलते हैं। नगरवासी पीछे लगते हैं और समझाने पर भी लौट आते हैं। विरह में नगर, घर, बाग और जलाशय सभी भयावह तथा उदास लगते हैं।
दोहा ८३
घोड़े, हाथी, पाले हुए मृग और अनेक पक्षियों की सूची से कवि अगले प्रसंग में समस्त नगर की विरह-दशा विस्तार से दिखाते हैं।
तमसा तट पर पहला विश्राम
चौपाइयाँ — मूल पाठ
राम-वियोग में प्राणी चित्रवत ठिठक गए हैं। नगरवासियों को राम-लक्ष्मण-सीता के बिना नगर और सुख-साधन व्यर्थ लगते हैं। वे निश्चय करते हैं कि जहाँ राम हैं, वहीं उनका समाज है और सांसारिक सुविधा छोड़कर साथ चल पड़ते हैं।
दोहा ८४
बालकों और वृद्धों को घर छोड़कर लोग साथ चले; वनयात्रा के पहले दिन राम ने तमसा नदी के किनारे निवास किया।
नगरवासियों का कष्ट देखकर रात्रि में प्रस्थान
चौपाइयाँ — मूल पाठ
लोगों का प्रेम और दुःख देखकर करुणामय राम उन्हें लौटने की शिक्षा देते हैं, किंतु वे नहीं मानते। श्रम और शोक से सब सो जाते हैं। आधी रात बीतने पर राम सुमंत्र को रथ के चिह्न छिपाते हुए आगे बढ़ने को कहते हैं।
दोहा ८५
शिवजी को प्रणाम कर राम, लक्ष्मण और सीता रथ पर चढ़े; सुमंत्र ने खोजने योग्य रथचिह्न छिपाकर रथ चला दिया।
अवध लौटे लोगों का व्रत-संकल्प
चौपाइयाँ — मूल पाठ
प्रभात में राम को न पाकर लोग चारों ओर खोजते और विलाप करते हैं। फिर समझते हैं कि उनके कष्ट का विचार करके प्रभु आगे गए हैं। दुःख से अयोध्या लौटते हैं और चौदह वर्ष बाद दर्शन की आशा पर जीवन सँभालते हैं।
दोहा ८६
राम-दर्शन के लिए नर-नारी नियम और व्रत करने लगे; उनकी विरह-दशा सूर्य से रहित चकवा-चकवी तथा कमल जैसी है।
शृंगवेरपुर और गंगाजी के दर्शन
चौपाइयाँ — मूल पाठ
सीता और सुमंत्र सहित राम-लक्ष्मण शृंगवेरपुर पहुँचे। गंगाजी को देखकर सबने प्रणाम किया। राम ने गंगा की महिमा और कथाएँ सुनाईं। स्नान और निर्मल जलपान के बाद यात्रा का श्रम मिटा; कवि इसे प्रभु का मानवीय व्यवहार बताते हैं।
दोहा ८७
सच्चिदानंदस्वरूप सूर्यवंशकेतु राम मनुष्य जैसे चरित्र करते हुए भी भक्तों के लिए संसार-सागर पार करने के सेतु हैं।
निषादराज गुह का प्रेमपूर्ण स्वागत
चौपाइयाँ — मूल पाठ
गुह फल-मूल की भेंट लेकर आते हैं। राम उन्हें प्रेम से पास बैठाकर कुशल पूछते हैं। गुह अपना सर्वस्व समर्पित कर नगर में पधारने का अनुरोध करते हैं। राम उन्हें सखा कहकर पिता की आज्ञा और वनव्रत समझाते हैं।
दोहा ८८
चौदह वर्ष वन में मुनिवेश, व्रत और आहार अपनाना है; गाँव में रहना उचित नहीं—यह सुनकर गुह बहुत दुःखी होते हैं।
गुह की सेवा और शिंशपा के नीचे शय्या
चौपाइयाँ — मूल पाठ
ग्रामवासी तीनों को देखकर प्रेमविह्वल होते हैं। गुह शिंशपा वृक्ष के नीचे सुंदर स्थान दिखाते हैं; राम उसे पसंद करते हैं। संध्या के बाद गुह कुश और कोमल पत्तों की शय्या बिछाते तथा स्वच्छ फल-मूल और जल रखते हैं।
दोहा ८९
सीता, सुमंत्र और भाई सहित फल-मूल ग्रहण करके राम शयन करते हैं; लक्ष्मण उनके चरण दबाते हैं।
लक्ष्मण और गुह का रात्रि-जागरण
चौपाइयाँ — मूल पाठ
राम के सोने पर लक्ष्मण सुमंत्र को विश्राम करने को कहते और धनुष-बाण लेकर पहरा देते हैं। गुह विश्वस्त पहरेदार तैनात करके पास बैठते हैं। धरती पर सोते राम को देखकर उन्हें अयोध्या के अनुपम राजभवन का स्मरण होता है।
दोहा ९०
गुह उस राजमहल की सुगंधित, कोमल, सुंदर शय्या और मणिदीप याद करते हैं, जहाँ सुख की सभी सुविधाएँ रहती थीं।
धरती की शय्या देखकर गुह का विषाद
चौपाइयाँ — मूल पाठ
गुह कहते हैं कि जो राम-सीता राजमहल की उजली कोमल शय्याओं पर सोते और परिवार द्वारा प्राणवत सँभाले जाते थे, वे अब धरती पर हैं। वे जनक और दशरथ का वैभव याद करते हुए भाग्य की विपरीत दशा पर दुःख व्यक्त करते हैं।
दोहा ९१
गुह कैकेयी के कठोर निर्णय को दोष देते हैं, जिसने राम-सीता को सुख के अवसर पर दुःख दिया।
लक्ष्मण का कर्म और विवेक का उपदेश
चौपाइयाँ — मूल पाठ
गुह के शोक पर लक्ष्मण ज्ञान, वैराग्य और भक्ति से भरी वाणी बोलते हैं। वे कहते हैं कि सुख-दुःख, मिलन-वियोग, संपत्ति-विपत्ति और जन्म-मरण कर्म तथा जगत के परिवर्तनशील व्यवहार हैं; मोह के कारण इन्हें स्थायी सत्य मान लिया जाता है।
दोहा ९२
स्वप्न में राजा भिखारी और गरीब इंद्र बन जाए, तो जागने पर वास्तविक लाभ-हानि नहीं होती; जगत के प्रपंच को भी विवेक से देखो।
जागरण का अर्थ और राम का ब्रह्मस्वरूप
चौपाइयाँ — मूल पाठ
लक्ष्मण व्यर्थ क्रोध और दोषारोपण छोड़ने को कहते हैं। विषयों से वैराग्य तथा विवेक जगने पर मोह मिटता और रामचरणों में अनुराग होता है। मन-वचन-कर्म से रामप्रेम ही परम हित है; राम विकाररहित, अनादि और वेदों द्वारा अनिर्वचनीय ब्रह्म हैं।
दोहा ९३
करुणामय प्रभु भक्तों, पृथ्वी और लोकहित के लिए मनुष्यरूप में चरित्र करते हैं; उनका श्रवण सांसारिक बंधन मिटाने वाला है।
जटाधारण और सुमंत्र की लौटने की विनती
पारायण संकेत: मासपारायण, पंद्रहवा विश्राम
चौपाइयाँ — मूल पाठ
लक्ष्मण गुह को मोह छोड़कर सीता-राम में अनुरक्त होने को कहते हैं। प्रभात में राम स्नान करके वटदूध से लक्ष्मण सहित जटा बनाते हैं। सुमंत्र आँसू भरकर दशरथ का आदेश सुनाते हैं और तीनों को वापस ले जाने की विनती करते हैं।
दोहा ९४
सुमंत्र कहते हैं—राजा ने ऐसा कहा है, फिर भी आप जो कहेंगे वही करूँगा; चरणों में गिरकर वे बालक की तरह रोते हैं।
राम का सत्यधर्म और पिता को आश्वासन
चौपाइयाँ — मूल पाठ
सुमंत्र अयोध्या को अनाथ न होने देने की विनती करते हैं। राम उन्हें उठाकर शिबि, दधीचि, हरिश्चंद्र, रंतिदेव और बलि के धर्मपालन का स्मरण कराते हैं। वे सत्य से बढ़कर धर्म नहीं मानते और प्राप्त वचनपालन छोड़ना अनुचित बताते हैं।
दोहा ९५
पिता के चरण पकड़कर मेरी अनेक प्रणामपूर्वक विनती कहना—तात, मेरी किसी बात की चिंता न करें।
राजा का सीताजी के लिए संदेश
चौपाइयाँ — मूल पाठ
राम सुमंत्र को पिता समान हितैषी कहकर दशरथ का दुःख घटाने को कहते हैं। लक्ष्मण की कुछ तीखी बातें वे रोकते हैं और उन्हें न सुनाने का वचन लेते हैं। सुमंत्र बताते हैं कि राजा सीता के वनकष्ट की कल्पना सह नहीं पाते।
दोहा ९६
राजा का संदेश है—विपत्ति बीतने तक सीता अपनी इच्छा से मायके या ससुराल में जहाँ मन हो, सुख से रहें।
सीता का छाया और प्रकाश की उपमाओं से उत्तर
चौपाइयाँ — मूल पाठ
राम सीता को लौटकर परिवार का दुःख मिटाने की सीख देते हैं। सीता पूछती हैं कि देह से छाया, सूर्य से किरण और चंद्रमा से चाँदनी कैसे अलग रहें? सुमंत्र को पिता-ससुर समान मानकर वे विनय से अपने साथ रहने का निश्चय बताती हैं।
दोहा ९७
सीता कहती हैं—दुःखवश सामने बोल रही हूँ, बुरा न मानें; आर्यपुत्र के चरणों के बिना मेरे लिए अन्य संबंध सुखद नहीं।
सीताजी का वन में सुखी रहने का संदेश
चौपाइयाँ — मूल पाठ
सीता जनक के ऐश्वर्य, दशरथ के प्रताप, प्रिय परिवार और मातृतुल्य सासों का स्मरण करती हैं। फिर कहती हैं कि राम के बिना उनमें भी आनंद नहीं। राम के साथ दुर्गम मार्ग, पर्वत, वन्यजीव और वनवासी भी उन्हें सुखद लगते हैं।
दोहा ९८
सास-ससुर के चरणों में मेरी ओर से विनती कहना—मेरी चिंता न करें, मैं वन में स्वभावतः सुखी हूँ।
सुमंत्र की विदाई और अश्वों का विरह
चौपाइयाँ — मूल पाठ
सीता दोनों वीरों के साथ स्वयं को निर्भय और सुखी बताती हैं। सुमंत्र फिर भी शोक से व्याकुल हैं। राम अनेक प्रकार से समझाते हैं; उनका निर्णय बदलता नहीं। अंत में सुमंत्र तीनों को प्रणाम कर भारी हृदय से लौटते हैं।
दोहा ९९
रथ के घोड़े राम की ओर बार-बार देखकर हिनहिनाते हैं; निषाद यह दृश्य देखकर शोक से सिर धुनते हैं।
केवट की प्रेमभरी शर्त
चौपाइयाँ — मूल पाठ
पशुओं का विरह देखकर माता-पिता और प्रजा की दशा का अनुमान होता है। राम नाव माँगते हैं। केवट अहल्या-उद्धार का स्मरण करके प्रेमपूर्ण विनोद करता है कि चरणरज से नाव भी नारी बन गई तो परिवार का पालन कैसे होगा; पहले चरण धोने दें।
छंद — मूल पाठ
केवट चरण धोकर नाव पर चढ़ाने की विनती करता है और उतराई न चाहने की बात कहता है। वह शपथपूर्वक आग्रह करता है कि चरण-पखारने की अनुमति के बिना पार नहीं उतारेगा।
सोरठा १००
केवट की विचित्र किंतु प्रेम से भरी बातें सुनकर करुणामय राम जानकी और लक्ष्मण की ओर देखकर हँस पड़ते हैं।
केवट द्वारा चरण-पखारना और गंगा पार कराना
चौपाइयाँ — मूल पाठ
राम मुस्कराकर केवट को नाव सुरक्षित रखने का उपाय करने और जल लाकर चरण धोने देते हैं। जिनका नाम संसार-सागर से तारता है, वे भक्त से नाव के लिए निवेदन करते हैं। केवट प्रेम से कठौते में जल लाकर चरण पखारता है।
दोहा १०१
चरणोदक ग्रहण करके परिवार और पितरों के उद्धार का आनंद पाता केवट प्रभु को प्रसन्नतापूर्वक दूसरे किनारे ले जाता है।
उतराई के बदले निर्मल भक्ति का वरदान
चौपाइयाँ — मूल पाठ
किनारे उतरकर राम को लगता है कि केवट को कुछ नहीं दिया। सीता उनका भाव जानकर अंगूठी उतारती हैं। केवट कहता है कि आज सेवा से सब मिल गया, अब कुछ नहीं चाहिए; लौटने पर जो प्रसाद मिलेगा, उसे स्वीकार करेगा।
दोहा १०२
राम, लक्ष्मण और सीता के बहुत कहने पर भी केवट उतराई नहीं लेता; राम निर्मल भक्ति का वर देकर उसे विदा करते हैं।
गंगाजी से सीता की प्रार्थना
चौपाइयाँ — मूल पाठ
राम स्नान करके पार्थिव शिवपूजन करते हैं। सीता गंगा से पति और देवर सहित कुशल लौटकर पूजा करने का मनोरथ कहती हैं। कथा में गंगा दिव्य वाणी से सीता के प्रभाव और विनय का सम्मान कर आशीर्वाद देती हैं।
दोहा १०३
गंगा आशीष देती हैं कि सीता पति और देवर सहित कुशलपूर्वक कोसल लौटेंगी तथा उनकी मनोकामना और यश सफल होंगे।
गुह को साथ चलने की अनुमति
चौपाइयाँ — मूल पाठ
गंगा के आशीर्वाद से सीता प्रसन्न हैं। राम गुह को घर लौटने को कहते हैं, पर वे कुछ दिन मार्ग दिखाने, सेवा करने और पर्णकुटी बनाने तक साथ रहने की विनती करते हैं। निष्कपट प्रेम देखकर राम उन्हें साथ लेते हैं।
दोहा १०४
गणपति और शिव का स्मरण तथा गंगा को प्रणाम करके राम मित्र गुह, छोटे भाई और सीता सहित वन की ओर बढ़ते हैं।
तीर्थराज प्रयाग का राजकीय रूपक
चौपाइयाँ — मूल पाठ
वृक्ष के नीचे रात बिताकर और प्रातःकर्म करके राम प्रयाग पहुँचते हैं। कवि प्रयाग को राजा की तरह वर्णित करते हैं—सत्य मंत्री, श्रद्धा रानी, माधव हितैषी मित्र, संगम सिंहासन और अक्षयवट छत्र है; गंगा-यमुना की तरंगें चँवर हैं।
दोहा १०५
पुण्यात्मा साधु इस पवित्र तीर्थ की सेवा से मनोरथ पाते हैं; वेद-पुराण मानो बंदीजन बनकर उसके निर्मल गुण गाते हैं।
प्रयाग स्नान और भरद्वाज मुनि से मिलन
चौपाइयाँ — मूल पाठ
राम सीता, लक्ष्मण और गुह को प्रयाग की महिमा बताते हैं। त्रिवेणी में स्नान करके शिव और तीर्थदेवताओं का पूजन करते हैं। फिर भरद्वाज आश्रम पहुँचकर दंडवत करते हैं; मुनि उन्हें हृदय से लगाकर परम आनंद पाते हैं।
दोहा १०६
भरद्वाज आनंदपूर्वक आशीर्वाद देते हैं; उन्हें लगता है कि विधाता ने पुण्यफल को प्रत्यक्ष दर्शन का रूप दे दिया है।
भरद्वाज की निष्कपट भक्ति की याचना
चौपाइयाँ — मूल पाठ
मुनि कुशल पूछकर आसन और मधुर फल-मूल देते हैं। सीता, लक्ष्मण और गुह सहित राम भोजन कर विश्राम पाते हैं। भरद्वाज दर्शन से तप, जप, तीर्थ और वैराग्य सफल मानते हैं तथा चरणों में सहज प्रेम का वर माँगते हैं।
दोहा १०७
मुनि कहते हैं—मन, वचन और कर्म से छल छोड़कर प्रभु का सेवक बने बिना करोड़ों उपायों से भी सच्चा सुख नहीं मिलता।
प्रयागवासियों का दर्शन और प्रस्थान
चौपाइयाँ — मूल पाठ
राम मुनि के प्रेम से संकुचित होकर उनके गुणों की प्रशंसा करते हैं। दोनों परस्पर विनय और सम्मान करते हैं। समाचार सुनकर विद्यार्थी, तपस्वी और संत आते हैं; राम सबको प्रणाम करते और आशीर्वाद पाते हैं।
दोहा १०८
रात विश्राम और सुबह प्रयाग स्नान के बाद राम मुनि को प्रणाम करके सीता, लक्ष्मण तथा सेवक गुह सहित आगे चलते हैं।
मार्गदर्शक शिष्य और यमुनाजी का स्नान
चौपाइयाँ — मूल पाठ
राम आगे का मार्ग पूछते हैं। भरद्वाज प्रेमपूर्वक चार ब्रह्मचारी शिष्य साथ देते हैं। मार्ग के गाँवों में नर-नारी दर्शन के लिए दौड़ते, जीवन धन्य मानते और विदा के समय अपना मन उनके साथ भेजते हैं।
दोहा १०९
मार्ग दिखाने वाले विद्यार्थियों को ससम्मान विदा करके तीनों यमुना के उस श्याम जल में स्नान करते हैं जो राम के शरीर जैसा लगता है।
यमुना तट पर एक प्रेममग्न तपस्वी
चौपाइयाँ — मूल पाठ
यमुना तट के लोग काम छोड़कर दर्शन को आते हैं। सयाने लोग राजकुमारों को पहचानकर वनवास की कथा बताते हैं। उसी समय एक तेजस्वी, कम आयु का विरक्त तपस्वी आता है; उसकी वास्तविक पहचान इस मूल पाठ में स्पष्ट नाम से नहीं दी गई है।
दोहा ११०
अपने इष्टदेव को पहचानकर वह तपस्वी आँसू और रोमांच से भर जाता है तथा भूमि पर दंडवत गिर पड़ता है।
तपस्वी का स्वागत और गुह की विदाई
चौपाइयाँ — मूल पाठ
राम उस तपस्वी को प्रेम से गले लगाते हैं। वह लक्ष्मण और सीता के चरणों में झुकता और सीता से मातृवत आशीष पाता है। गुह भी उससे मिलते हैं। लोग तीनों को देखकर प्रेमविह्वल होते हैं और उनके वनवास पर दुःख करते हैं।
दोहा १११
राम मित्र गुह को अनेक हितकारी शिक्षाएँ देकर विदा करते हैं; आज्ञा सिर पर रखकर गुह अपने घर को लौटते हैं।
पथिकों की साथ चलने की विनती
चौपाइयाँ — मूल पाठ
यमुना को पुनः प्रणाम करके तीनों आगे बढ़ते हैं। पथिक उनके राजचिह्न और कोमल शरीर देखकर पैदल चलने का कारण सोचते हैं। दुर्गम वन में साथ चलकर गंतव्य तक पहुँचाने की सेवा की अनुमति चाहते हैं।
दोहा ११२
पथिक प्रेम से पुलकित और अश्रुपूर्ण होकर पूछते हैं; करुणामय राम विनम्र मधुर वाणी से उन्हें लौटा देते हैं।
चरण-स्पर्श से धन्य मार्ग और प्रकृति
चौपाइयाँ — मूल पाठ
कवि उन गाँवों, निवासियों, जलाशयों और वृक्षों का सौभाग्य गाते हैं जिन्हें राम का दर्शन और चरणस्पर्श मिलता है। देवता भी उन्हें सराहते हैं; धरती चरणरज पाकर स्वयं को धन्य मानती है।
दोहा ११३
बादल छाया करते हैं, देवता पुष्प बरसाते हैं और राम पर्वत, वन, पक्षी तथा पशुओं को देखते हुए आगे चलते हैं।
ग्रामवासियों का आतिथ्य
चौपाइयाँ — मूल पाठ
गाँव के पास पहुँचने पर बालक, वृद्ध, नर-नारी काम छोड़कर आते हैं। कोई दूसरों को दर्शन का लाभ लेने को बुलाता, कोई साथ चल पड़ता और कोई उस छवि को हृदय में बसाकर प्रेम में ठिठक जाता है।
दोहा ११४
कोई वटवृक्ष की छाया में कोमल घास-पत्ते बिछाकर कहता है—कुछ थकान मिटा लें; आगे अभी चलेंगे या सुबह?
वट की छाया में सुंदर विश्राम
चौपाइयाँ — मूल पाठ
कोई घड़ा भरकर जल लाता है। ग्रामवासियों का प्रेम और सीता की थकान देखकर राम वटछाया में कुछ समय रुकते हैं। लोग श्याम राम और गौर लक्ष्मण के तपस्वीवेश, धनुष-बाण और अनुपम शोभा को एकटक देखते हैं।
दोहा ११५
दोनों के सुंदर जटामुकुट, विशाल वक्ष-भुजाएँ-नेत्र और शरदपूर्णिमा के चंद्रमा जैसे मुखों पर श्रमबिंदु शोभित हैं।
ग्रामवधुओं का विनयपूर्वक प्रश्न
चौपाइयाँ — मूल पाठ
लोग तीनों की सुंदरता देखकर तृप्त नहीं होते। ग्रामवधुएँ सीता के पास जाकर चरण छूती हैं। वे अपनी ग्रामीण सरलता के लिए क्षमा माँगते हुए संकोच और स्नेह से दोनों राजकुमारों के संबंध में पूछने का साहस करती हैं।
दोहा ११६
श्याम और गौर दोनों सुंदर किशोर सौंदर्य के भंडार हैं; उनके मुख शरदचंद्र और नेत्र शरदकालीन कमल जैसे हैं।
सीताजी का संकेत से परिचय देना
पारायण संकेत: मासपारायण, सोलहवाँ विश्राम · नवान्हपारायण, चौथा विश्राम
चौपाइयाँ — मूल पाठ
ग्रामवधुएँ पूछती हैं कि दोनों सुंदर पुरुष आपके कौन हैं। सीता संकोच से मुस्कराकर गौरवर्ण लक्ष्मण को अपना छोटा देवर कहती हैं। फिर मुख आँचल से ढककर तिरछे नेत्र और भौंह के संकेत से राम को पति बताती हैं।
दोहा ११७
प्रसन्न ग्रामवधुएँ सीता के चरणों में झुककर अत्यंत प्रेम से दीर्घ, अखंड सौभाग्य के आशीर्वाद देती हैं।
ग्रामवधुओं से विदा
चौपाइयाँ — मूल पाठ
स्त्रियाँ पार्वती जैसा दांपत्य-स्नेह पाने का आशीष देती और लौटते समय फिर दर्शन देने की विनती करती हैं। सीता मधुर वाणी से उन्हें संतोष देती हैं। लक्ष्मण आगे का रास्ता पूछते हैं तो विदा की पीड़ा में लोग सुगम मार्ग बताते हैं।
दोहा ११८
राम सबको प्रिय वचन कहकर लौटाते हैं और सीता-लक्ष्मण सहित आगे चलते हैं; लोगों के मन मानो अपने साथ ले जाते हैं।
वनवास पर ग्रामवासियों का करुण विमर्श
चौपाइयाँ — मूल पाठ
लौटते लोग विधाता की विपरीत व्यवस्था पर दुःख करते हैं। कहते हैं कि ऐसे कोमल राजकुमार पैदल चलें तो वाहन व्यर्थ, घास पर सोएँ तो सुंदर पलंग व्यर्थ और वृक्षों तले रहें तो ऊँचे भवन व्यर्थ हैं। यह प्रेम की अतिशयोक्तिपूर्ण करुण वाणी है।
दोहा ११९
यदि इतने सुंदर सुकुमार तपस्वीवेश और जटाओं में रहें, तो विधाता ने विविध आभूषण और वस्त्र व्यर्थ बनाए—लोग ऐसा कहते हैं।
दर्शन का सौभाग्य और मार्ग की चिंता
चौपाइयाँ — मूल पाठ
कोई कहता है कि ये कंद-मूल खाएँ तो उत्तम भोजन व्यर्थ है। कोई उनकी सुंदरता को सृष्टि की उपमाओं से परे मानता है। कुछ अपने दर्शन-सौभाग्य पर कृतज्ञ हैं और उनका दर्शन पाने वालों को भी पुण्यवान समझते हैं।
दोहा १२०
प्रेमपूर्ण बातें कहते हुए लोग आँसू भरते हैं और चिंता करते हैं कि इतने कोमल शरीर दुर्गम मार्ग पर कैसे चलेंगे।
दर्शन से वंचित लोगों की व्याकुलता
चौपाइयाँ — मूल पाठ
स्त्रियाँ कोमल चरणों के लिए फूलों का मार्ग चाहती हैं और कहती हैं कि वर मिले तो तीनों को आँखों में बसा लें। जो समय पर नहीं आए, वे समाचार पूछते हैं; समर्थ लोग दौड़कर दर्शन पाते हैं, अन्य पीछे रहकर व्याकुल होते हैं।
दोहा १२१
बालक, वृद्ध और असहाय लोग दर्शन न मिलने पर हाथ मलते हैं; राम जहाँ जाते हैं, लोग ऐसे प्रेमवश हो जाते हैं।
गाँव-गाँव में रामकथा और आनंद
चौपाइयाँ — मूल पाठ
मार्ग के गाँवों में दर्शन से आनंद है। कोई वनवास के लिए राजा-रानी को दोष देता, कोई इसी कारण मिले दर्शन को सौभाग्य मानता है। लोग माता-पिता, नगर, देश और मार्ग के उन स्थानों को धन्य कहते हैं जिनसे तीनों का संबंध जुड़ा है।
दोहा १२२
रघुकुल के सूर्य राम मार्ग के लोगों को सुख देते हुए सीता और लक्ष्मण सहित वन देखते आगे चलते हैं।
आगे राम, बीच में सीता, पीछे लक्ष्मण
चौपाइयाँ — मूल पाठ
आगे राम, बीच में सीता और पीछे लक्ष्मण की छवि को कवि अनेक उपमाओं से समझाते हैं। सीता राम के पदचिह्नों के बीच सावधानी से चलती हैं; लक्ष्मण उनके चिह्न बचाकर दाईं ओर चलते हैं। उनका परस्पर प्रेम वर्णन से परे है।
दोहा १२३
सीता सहित दोनों भाइयों को देखने वाले पथिक भक्तिभाव से मानो संसार की कठिन यात्रा सहज आनंद से पार कर लेते हैं।
वाल्मीकि आश्रम में आगमन
चौपाइयाँ — मूल पाठ
कवि इस पथिकरूप के हृदय में बसने को परम कल्याणकारी बताते हैं। सीता की थकान जानकर राम वृक्ष और जल के पास विश्राम करते हैं। फिर सुंदर पर्वत, वन और सरोवरों से घिरे वाल्मीकि आश्रम पहुँचते हैं, जहाँ जीव परस्पर वैर छोड़कर रहते हैं।
दोहा १२४
निर्मल सुंदर आश्रम देखकर राम प्रसन्न होते हैं; उनके आगमन का समाचार पाकर वाल्मीकि मुनि स्वागत को आगे आते हैं।
वाल्मीकि का अतिथि-सत्कार और राम की विनय
चौपाइयाँ — मूल पाठ
राम दंडवत करते हैं; वाल्मीकि आशीष देकर प्रेम से आश्रम लाते और मधुर फल-मूल देते हैं। राम उन्हें त्रिकालदर्शी कहकर वनवास का पूरा प्रसंग सुनाते हैं। वे पिता का वचन निभाने, माता का हित और भरत को राज्य मिलने में शुभ पक्ष देखते हैं।
दोहा १२५
राम कहते हैं—पिता के वचन, माता के हित, भरत जैसे राजा और आपके दर्शन की प्राप्ति, ये सब मेरे पुण्य का फल हैं।
निवास का प्रश्न और दिव्य स्वरूप की स्तुति
चौपाइयाँ — मूल पाठ
राम मुनियों को असुविधा न हो ऐसा पर्णकुटी का स्थान पूछते हैं। वे साधुजन की शांति और प्रसन्नता को शासन का दायित्व मानते हैं। वाल्मीकि उनकी सरल वाणी सराहकर कहते हैं कि वे सदैव धर्ममर्यादा के रक्षक हैं।
छंद — मूल पाठ
वाल्मीकि राम को जगदीश्वर, जानकी को सृष्टि की पालन-संहारकारी शक्ति और लक्ष्मण को सहस्रशीर्ष शेष का रूप बताते हैं; देवकार्य के लिए उनका मानव अवतार हुआ है।
सोरठा १२६
वाल्मीकि कहते हैं—राम का स्वरूप वाणी और बुद्धि से परे, अगम, अकथनीय और अपार है; वेद भी उसकी सीमा नहीं कह पाते।
जहाँ राम न हों, वह स्थान कहाँ?
चौपाइयाँ — मूल पाठ
वाल्मीकि राम को जगत का साक्षी और देवताओं का भी प्रेरक बताते हैं। उनकी कृपा से ही भक्त उनका स्वरूप जानते हैं। मानववेश की लीला से अज्ञानी मोहित और ज्ञानी आनंदित होते हैं; प्रभु की वाणी भी अपनी अपनाई मर्यादा के अनुरूप सत्य है।
दोहा १२७
मुनि कहते हैं—आपने रहने का स्थान पूछा; पहले वह जगह बताइए जहाँ आप नहीं हैं, तब मैं कोई अलग स्थान दिखाऊँ।
कथा, दर्शन और गुणगान में लगा हृदय
चौपाइयाँ — मूल पाठ
राम मुस्कराते हैं। मुनि प्रेम से बताते हैं कि जिनके कान समुद्र की तरह कथा सुनकर भी तृप्त नहीं होते और जिनकी आँखें चातक की तरह दर्शन चाहती रहती हैं, उनका हृदय प्रभु के निवास के योग्य है।
दोहा १२८
जिसकी जीभ निर्मल मानस की हंसिनी बनकर प्रभु के गुणरूपी मोती चुनती है, राम उसके हृदय में बसें।
साधना का एक फल: चरणप्रेम
चौपाइयाँ — मूल पाठ
मुनि उन भक्तों का वर्णन करते हैं जो प्रसाद ग्रहण करते, गुरु और देवताओं का सम्मान करते, पूजा-जप, तीर्थयात्रा, दान और सेवा करते हैं। उनके सभी कर्म प्रभु को अर्पित हैं और हृदय में भरोसा केवल राम का है।
दोहा १२९
जो सब साधन करके केवल रामचरणों का प्रेम माँगते हैं, उनके मनमंदिर में सीता और राम दोनों निवास करें।
निर्मल आचरण वाला मनमंदिर
चौपाइयाँ — मूल पाठ
कपट, अहंकार, लोभ और द्वेष से मुक्त, सबका हित चाहने वाले, सुख-दुःख में सम और सत्यप्रिय लोग प्रभु के निवास हैं। वे दूसरे के परिवार का सम्मान, परधन से विरक्ति और दूसरों के सुख-दुःख में संवेदना रखते हैं।
दोहा १३०
जिनके लिए स्वामी, मित्र, माता-पिता और गुरु सबका आश्रय राम हैं, उनके मनमंदिर में सीता सहित दोनों भाई बसें।
निष्काम और सहज प्रेम का घर
चौपाइयाँ — मूल पाठ
जो दूसरों के गुण ग्रहण करें, अपने दोष पहचानें, धर्मनीति पर चलें और भक्तों से प्रेम करें, उनका हृदय राम का घर है। प्रतिष्ठा, धन, संबंध और स्वर्ग-मोक्ष की चाह से ऊपर उठकर मन-वचन-कर्म से निष्काम सेवा की बात कही गई है।
दोहा १३१
जिसे प्रभु से कभी कुछ माँगना नहीं, केवल सहज प्रेम है, उसका मन राम का अपना घर है।
चित्रकूट और मंदाकिनी का निर्देश
चौपाइयाँ — मूल पाठ
भक्तहृदय के निवास बताने के बाद वाल्मीकि व्यावहारिक आश्रम-स्थान भी बताते हैं। सुंदर वन, पर्वत, जीवों और अत्रि आदि मुनियों से युक्त चित्रकूट में रहने को कहते हैं। वहाँ अनुसूया के तप से प्रकट पवित्र मंदाकिनी का महत्त्व बताते हैं।
दोहा १३२
मुनि चित्रकूट की महिमा सुनाते हैं; राम, सीता और लक्ष्मण वहाँ पहुँचकर उस श्रेष्ठ नदी में स्नान करते हैं।
चित्रकूट में पर्णकुटियों का निर्माण
चौपाइयाँ — मूल पाठ
राम लक्ष्मण से अच्छा निवास चुनने को कहते हैं। लक्ष्मण नदी और तट की सुंदरता रूपक से समझाकर स्थान दिखाते हैं। देवता प्रधान शिल्पी सहित वनवासियों का रूप लेकर आते और घास-पत्तों की एक छोटी तथा एक बड़ी सुंदर कुटी बनाते हैं।
दोहा १३३
सुंदर निवास में सीता और लक्ष्मण सहित राम ऐसे शोभते हैं, मानो तपस्वीवेश में कामदेव रति और वसंत के साथ हों।
देवताओं और मुनियों का चित्रकूट आगमन
पारायण संकेत: मासपारायण, सत्रहँवा विश्राम
चौपाइयाँ — मूल पाठ
देव, नाग, किन्नर और लोकपाल दर्शन को आते हैं; राम सबको प्रणाम करते हैं। वे पुष्प बरसाकर अपनी प्रार्थनाएँ निवेदित करते और लौटते हैं। समाचार पाकर मुनि भी आते, राम को गले लगाते और अपनी साधना सफल मानते हैं।
दोहा १३४
राम मुनियों को यथोचित सम्मान देकर विदा करते हैं; वे अपने आश्रमों में प्रसन्नतापूर्वक योग, जप, यज्ञ और तप करते हैं।
चित्रकूट के वनवासियों का मिलन
चौपाइयाँ — मूल पाठ
राम के आने का समाचार सुनकर कोल-किरात अत्यंत प्रसन्न होते हैं और फल-मूल लेकर आते हैं। परिचितों से मार्ग तथा स्वरूप पूछते हुए वे दर्शन पाते हैं। आँसू और रोमांच सहित भेंट देते हैं; राम उनके प्रेम को समझकर सबका आदर करते हैं।
दोहा १३५
वनवासी कहते हैं—प्रभु के चरण देखकर हम सब सनाथ हुए; कोसलराज, आपका यहाँ आना हमारा महान सौभाग्य है।
वनवासियों की सेवाभावना
चौपाइयाँ — मूल पाठ
वनवासी भूमि, वन, मार्ग और जीवों को राम के चरणस्पर्श से धन्य मानते हैं। वे हर ऋतु में सेवा, वन्य संकट से रक्षा और जलस्रोतों-मार्गों का परिचय कराने को तत्पर हैं। परिवार सहित सेवक मानकर निर्भय होकर आज्ञा देने का अनुरोध करते हैं।
दोहा १३६
जो प्रभु वेद और मुनिमन की पहुँच से परे हैं, वे उनकी सरल बातें ऐसे सुनते हैं जैसे पिता अपने बालकों की वाणी।
राम को केवल प्रेम प्रिय
चौपाइयाँ — मूल पाठ
कवि स्पष्ट करते हैं कि राम के लिए प्रेम ही मुख्य है। राम मधुर वचन से वनवासियों को संतुष्ट कर विदा करते हैं। उनके निवास से वन मंगलमय हुआ; वृक्ष-लताएँ फल-फूल से लदे, भ्रमर गुंजे और सुखद पवन बहा।
दोहा १३७
मोर, कोयल, तोता, चातक, चकवा और चकोर जैसे विविध पक्षियों की मनमोहक ध्वनियाँ कानों को आनंद देती हैं।
चित्रकूट की प्रकृति की धन्यता
चौपाइयाँ — मूल पाठ
वन्य जीव वैर छोड़कर साथ विचरते हैं। अन्य दिव्य वन, नदियाँ, सरोवर और पर्वत चित्रकूट तथा मंदाकिनी का गुणगान करते हैं। कवि की भक्तिदृष्टि में प्रभु का निवास पूरे प्राकृतिक परिवेश को विशिष्ट और मंगलमय बना देता है।
दोहा १३८
देवता दिन-रात चित्रकूट के पक्षी, पशु, लता, वृक्ष और घास तक को पुण्यसमूह तथा धन्य कहते हैं।
लक्ष्मण की अखंड सेवा
चौपाइयाँ — मूल पाठ
दर्शन और चरणरज पाकर जीव तथा अचल प्रकृति धन्य हैं। कवि कहते हैं कि जहाँ सुखसागर राम बसे हों उस वन की महिमा सहस्रमुख भी नहीं कह सकते। लक्ष्मण मन-वचन-कर्म से सेवा में लगे हैं; उनका शील और प्रेम अवर्णनीय है।
दोहा १३९
सीता-राम के चरण और अपने प्रति उनका स्नेह देखकर लक्ष्मण को स्वप्न में भी घर, भाई या माता-पिता की अलग चिंता नहीं सताती।
सीताजी का वन में संतोष
चौपाइयाँ — मूल पाठ
राम के साथ सीता घर-परिवार की स्मृति से उत्पन्न कष्ट भूलकर सुखी रहती हैं। पर्णकुटी, पशु-पक्षी, मुनि-मुनिपत्नियाँ और कंद-मूल उन्हें प्रिय लगते हैं। राम का बढ़ता प्रेम वन को हजार अयोध्याओं जैसा सुखद बना देता है।
दोहा १४०
जब रामस्मरण से साधारण भक्त भी विषयभोग छोड़ देते हैं, तब उनकी प्रिया जगज्जननी सीता की विरक्ति आश्चर्य नहीं।
परिवार की स्मृति और परस्पर सांत्वना
चौपाइयाँ — मूल पाठ
राम वही करते और कहते हैं जिससे सीता-लक्ष्मण को सुख मिले; वे पुरानी पवित्र कथाएँ सुनाते हैं। माता-पिता, भाइयों और भरत का प्रेम याद कर उनकी आँखें भर आती हैं। दोनों की व्याकुलता देखकर वे धीरज रखकर कथा से सबको सांत्वना देते हैं।
दोहा १४१
पर्णकुटी में सीता और लक्ष्मण सहित राम ऐसे सुशोभित हैं जैसे अमरावती में शची और जयंत सहित इंद्र।
कथा फिर सुमंत्र की ओर
चौपाइयाँ — मूल पाठ
राम सीता-लक्ष्मण को पलकों की तरह सँभालते हैं और लक्ष्मण उनकी अनन्य सेवा करते हैं। अब कवि सुमंत्र के लौटने की कथा लेते हैं। गुह लौटकर सुमंत्र और रथ को देखते हैं; मंत्री राम-सीता-लक्ष्मण पुकारकर भूमि पर गिर पड़ते हैं।
दोहा १४२
राम के घोड़े न घास चरते, न जल पीते और आँखों से आँसू बहाते हैं; उन्हें देखकर सभी निषाद व्याकुल होते हैं।
गुह का धीरज देना और सेवक साथ भेजना
चौपाइयाँ — मूल पाठ
गुह सुमंत्र को उनके विवेक का स्मरण कर धैर्य देते और रथ पर बैठाते हैं। शोक से वे रथ चला नहीं पाते। घोड़े भी आगे नहीं बढ़ते, पीछे देखते और राम-लक्ष्मण-सीता का नाम सुनकर हिनहिनाते हैं।
दोहा १४३
मंत्री और घोड़ों की दशा से दुःखी गुह चार विश्वस्त सेवक बुलाकर सारथी के साथ भेजते हैं।
सुमंत्र का आत्मग्लानि से भरा मार्ग
चौपाइयाँ — मूल पाठ
गुह कुछ दूर पहुँचाकर लौटते हैं। सेवक रथ अयोध्या ले चलते हैं और सुमंत्र बार-बार शोक में डूबते हैं। वे राम को छोड़कर जीवित लौटने पर स्वयं को धिक्कारते हैं; कवि हानि, लज्जा और हार की अनेक उपमाओं से उनकी दशा समझाते हैं।
दोहा १४४
सुमंत्र की ग्लानि उस विवेकी धर्मनिष्ठ व्यक्ति जैसी है जिसे अनजाने में अपने आचरण के विरुद्ध कार्य हो जाने का पश्चात्ताप हो।
अयोध्यावासियों को क्या उत्तर दूँगा?
चौपाइयाँ — मूल पाठ
सुमंत्र का हृदय वियोग से जल रहा है; दृष्टि धुँधली, कंठ सूखा और बुद्धि व्याकुल है। उन्हें लगता है कि रामरहित रथ देखकर हर कोई प्रश्न करेगा। वे नगर लौटने और सबके सामने समाचार कहने की पीड़ा से काँपते हैं।
दोहा १४५
वे सोचते हैं—व्याकुल नगरवासी दौड़कर पूछेंगे तो हृदय को वज्र जैसा कठोर बनाकर उन्हें उत्तर देना होगा।
माताओं और राजा के प्रश्नों की आशंका
चौपाइयाँ — मूल पाठ
सुमंत्र सोचते हैं कि सुमित्रा, कौसल्या और अन्य माताओं को क्या कहेंगे। दशरथ के प्राण राम पर निर्भर हैं; वन में कुशल पहुँचाने का समाचार भी उन्हें वियोग की चोट देगा। यह सोचकर मंत्री का हृदय भारी आत्मपीड़ा से भरता है।
दोहा १४६
वे कहते हैं—प्रिय जल के बिछुड़ने पर कीचड़ जैसा मेरा हृदय क्यों न फटा; मानो विधाता ने यह शरीर यातना सहने को दिया है।
सुमंत्र का संध्या में अयोध्या प्रवेश
चौपाइयाँ — मूल पाठ
तमसा पहुँचकर मंत्री साथ आए निषाद सेवकों को विदा करते हैं। नगर में प्रवेश की लज्जा से दिन वृक्ष के नीचे बिताते और अँधेरे में महल पहुँचते हैं। रामरहित रथ तथा व्याकुल घोड़े देखकर नगर में शोक फैल जाता है।
दोहा १४७
सुमंत्र के आने का समाचार पाकर रनिवास व्याकुल हुआ; उन्हें राजभवन भी निर्जीव और भयावह निवास जैसा प्रतीत हुआ।
भूमि पर पड़े दशरथ से भेंट
चौपाइयाँ — मूल पाठ
रानियाँ समाचार पूछती हैं, पर सुमंत्र बोल नहीं पाते। दासियाँ उन्हें कौसल्या के भवन ले जाती हैं। राजा आभूषण और शय्या छोड़कर भूमि पर पड़े हैं तथा राम, लक्ष्मण और सीता का नाम लेकर लंबी साँसें भरते हैं।
दोहा १४८
सुमंत्र दंडवत करके राजा की जय कहते हैं; उनकी आवाज सुनते ही दशरथ व्याकुल उठकर पूछते हैं—सुमंत्र, राम कहाँ हैं?
पुत्र-दर्शन के लिए दशरथ की पुकार
चौपाइयाँ — मूल पाठ
दशरथ सुमंत्र को गले लगाकर पास बैठाते और तीनों की कुशल पूछते हैं। राम लौटे या वन गए, क्या संदेश है—इन प्रश्नों के साथ वे पुत्र का शील और समभाव याद करते हैं तथा अपने जीवित रहने पर ग्लानि करते हैं।
दोहा १४९
राजा कहते हैं—मुझे वहाँ पहुँचाओ जहाँ राम, सीता और लक्ष्मण हैं; अन्यथा सच कहता हूँ, प्राण अब निकलना चाहते हैं।
सुमंत्र का धैर्य-उपदेश और यात्रा-वृत्तांत
चौपाइयाँ — मूल पाठ
राजा बार-बार संदेश और पुत्रदर्शन चाहते हैं। सुमंत्र धैर्य रखकर कहते हैं कि जन्म-मरण, हानि-लाभ और मिलन-वियोग समय तथा कर्म के अधीन आते हैं। धीर व्यक्ति सुख-दुःख में संतुलन रखते हैं। वे राजा को विवेक से सँभलने को कहते हैं।
दोहा १५०
सुमंत्र यात्रा बताते हैं—पहला पड़ाव तमसा और दूसरा गंगा तट पर हुआ; दोनों वीर सीता सहित स्नान करके जलपान पर रहे।
प्रेम, सेवा और विवेक का यह क्रम
सीताजी का दृढ़ प्रेम, लक्ष्मणजी की सेवा, सुमित्राजी का निर्मल मार्गदर्शन, निषादराज की आत्मीयता और केवट का समर्पण वनयात्रा को भक्ति की जीवंत शिक्षा बनाते हैं। वाल्मीकि के संवाद में राम का निवास केवल किसी भवन में नहीं, निष्कपट, सत्यप्रिय और हितकारी हृदय में बताया गया है। परिवार के वियोग की करुणा के बीच भी राम दूसरों के दुःख, सम्मान और हित का ध्यान रखते हैं।
पात्रों के आत्मधिक्कार, विरह-उपमाएँ तथा ऐतिहासिक सामाजिक शब्द कथा की भावभूमि में पढ़ें। उन्हें किसी व्यक्ति या समुदाय की आज की योग्यता, गरिमा अथवा जीवन-मूल्य का निर्णय न मानें।
पाठ-संदर्भ और संपादन
मूल अवधी पाठ का आधार संस्कृत डॉक्यूमेंट्स का अयोध्याकाण्ड पाठ है। संदिग्ध क्रमांकन और स्पष्ट अक्षर-दोषों की तुलना गीता प्रेस के मुद्रित मूल पाठ की पृष्ठ ४०२–४८० तथा पृष्ठ ४८१–५०० की स्कैन-प्रतियों से की गई है। किसी आधुनिक हिंदी या अंग्रेजी अनुवाद का पुनर्मुद्रण नहीं किया गया है।
सीमित संपादन और इस लेख की सीमा
- डिजिटल पाठ के दोहा १०७ में छूटा क्रमांक मुद्रित पाठ से मिलाकर जोड़ा है।
- दोहा ८५ में डिजिटल “सुय जान” के स्थान पर मुद्रित “सिय जान” रखा है।
- दोहा १०४ में अतिरिक्त लैटिन चिह्न हटाकर मुद्रित “सिय सहित” और “रघुनाथ” का पाठ लिया है।
- दोहा १०८ में स्पष्ट डिजिटल दोहराव “मुददित” को मुद्रित “मुदित” से मिलाया है; दोहा ११८ के बाद आया अलग लैटिन चिह्न हटाया है।
- काव्य से अलग पारायण-संकेत अलग छोटे पाठ में सुरक्षित हैं। क्रमांक ७५, १०० और १२६ सोरठे हैं; उनके पहले के तीन छंद भी पूरे दिए हैं।
- अन्य शब्द सामान्यतः चुने हुए डिजिटल पाठ के अनुसार हैं; संस्करणों में वर्तनी और पाठांतर मिल सकते हैं। यह भाग १५० पर रुकता है, अयोध्याकाण्ड का समापन नहीं है।
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