श्रीरामचरितमानस लंकाकाण्ड भाग 1 | दोहा 1–60 | मूल पाठ और सरल हिंदी अर्थ

भक्ति भावना · गोस्वामी तुलसीदास कृत श्रीरामचरितमानस

लंकाकाण्ड · भाग 1

दोहा 1–60 · मूल पाठ और सरल हिंदी अर्थ
सम्पूर्ण काण्ड का प्रथम भाग · कुल दो भाग

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इस भाग को कैसे पढ़ें?

मूल चौपाइयाँ, छंद, दोहे और सोरठे उनके क्रम में हैं। प्रत्येक क्रमांक के बाद स्वतंत्र रूप से लिखा समेकित सरल हिंदी अर्थ दिया है; यह शब्द-शब्द अनुवाद नहीं है। संवाद को उसके प्रसंग सहित पढ़ें। काण्ड का समापन दूसरे भाग में है।

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मंगलाचरण और आरंभिक पद्य

रामं कामारिसेव्यं भवभयहरणं कालमत्तेभसिंहं योगीन्द्रं ज्ञानगम्यं गुणनिधिमजितं निर्गुणं निर्विकारम्। मायातीतं सुरेशं खलवधनिरतं ब्रह्मवृन्दैकदेवं वन्दे कन्दावदातं सरसिजनयनं देवमुर्वीशरूपम् ॥ १ ॥
शंखेन्द्वाभमतीवसुन्दरतनुं शार्दूलचर्माम्बरं कालव्यालकरालभूषणधरं गंगाशशांकप्रियम्। काशीशं कलिकल्मषौघशमनं कल्याणकल्पद्रुमं नौमीड्यं गिरिजापतिं गुणनिधिं कन्दर्पहं शङ्करम् ॥ २ ॥
यो ददाति सतां शम्भुः कैवल्यमपि दुर्लभम्। खलानां दण्डकृद्योऽसौ शङ्करः शं तनोतु मे ॥ ३ ॥
दो. लव निमेष परमानु जुग बरष कलप सर चंड। भजसि न मन तेहि राम को कालु जासु कोदंड ॥ सो. सिंधु बचन सुनि राम सचिव बोलि प्रभु अस कहेउ। अब बिलंबु केहि काम करहु सेतु उतरै कटकु ॥ सुनहु भानुकुल केतु जामवंत कर जोरि कह। नाथ नाम तव सेतु नर चढ़ि भव सागर तरिहिं ॥
मंगलाचरण का समेकित सरल अर्थ

राम को कामदेव के शत्रु शिव द्वारा सेवित, संसार के भय को हरने वाले, ज्ञान से प्राप्त, गुणों के धाम और माया से परे परमात्मा के रूप में प्रणाम है। फिर शिव की सुंदर, करुणामय और कल्याणकारी छवि का वंदन है। आरंभिक पद्यों में काल के स्वामी राम के भजन का उपदेश है। समुद्र की बात सुनकर राम सेतु बनाने को कहते हैं; जाम्बवान स्मरण कराते हैं कि रामनाम स्वयं संसार-सागर पार कराने वाला सेतु है।

लंकाकाण्ड · क्रमांक 1

सेतु-निर्माण की तैयारी

चौपाइयाँ — मूल पाठ

यह लघु जलधि तरत कति बारा। अस सुनि पुनि कह पवनकुमारा ॥ प्रभु प्रताप बड़वानल भारी। सोषेउ प्रथम पयोनिधि बारी ॥ तब रिपु नारी रुदन जल धारा। भरेउ बहोरि भयउ तेहिं खारा ॥ सुनि अति उकुति पवनसुत केरी। हरषे कपि रघुपति तन हेरी ॥ जामवंत बोले दोउ भाई। नल नीलहि सब कथा सुनाई ॥ राम प्रताप सुमिरि मन माहीं। करहु सेतु प्रयास कछु नाहीं ॥ बोलि लिए कपि निकर बहोरी। सकल सुनहु बिनती कछु मोरी ॥ राम चरन पंकज उर धरहू। कौतुक एक भालु कपि करहू ॥ धावहु मर्कट बिकट बरूथा। आनहु बिटप गिरिन्ह के जूथा ॥ सुनि कपि भालु चले करि हूहा। जय रघुबीर प्रताप समूहा ॥

दोहा — मूल पाठ

अति उतंग गिरि पादप लीलहिं लेहिं उठाइ। आनि देहिं नल नीलहि रचहिं ते सेतु बनाइ ॥ १ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

हनुमान प्रभु के प्रताप की महिमा कहते हैं। जामवंत नल-नील को राम-स्मरण करके सेतु बनाने को कहते और सेना को वृक्ष-पर्वत लाने के लिए प्रेरित करते हैं। भालू और वानर उत्साह से विशाल शिलाएँ उठाकर लाते हैं। नल और नील उन्हीं से समुद्र पर सेतु की रचना करते हैं।

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लंकाकाण्ड · क्रमांक 2

रामेश्वर की स्थापना और शिवभक्ति

चौपाइयाँ — मूल पाठ

सैल बिसाल आनि कपि देहीं। कंदुक इव नल नील ते लेहीं ॥ देखि सेतु अति सुंदर रचना। बिहसि कृपानिधि बोले बचना ॥ परम रम्य उत्तम यह धरनी। महिमा अमित जाइ नहिं बरनी ॥ करिहउँ इहाँ संभु थापना। मोरे हृदयँ परम कलपना ॥ सुनि कपीस बहु दूत पठाए। मुनिबर सकल बोलि लै आए ॥ लिंग थापि बिधिवत करि पूजा। सिव समान प्रिय मोहि न दूजा ॥ सिव द्रोही मम भगत कहावा। सो नर सपनेहुँ मोहि न पावा ॥ संकर बिमुख भगति चह मोरी। सो नारकी मूढ़ मति थोरी ॥

दोहा — मूल पाठ

संकर प्रिय मम द्रोही सिव द्रोही मम दास। ते नर करहि कलप भरि घोर नरक महुँ बास ॥ २ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

नल-नील की सुंदर रचना देखकर श्रीराम स्थान की पवित्रता बताते और शिवलिंग स्थापित करने की इच्छा प्रकट करते हैं। मुनियों को बुलाकर वे विधिपूर्वक पूजन करते हैं। वे शिव के प्रति अपने प्रेम और राम-शिव भक्ति के अभेद का संदेश देते हैं: एक से प्रेम का दावा करते हुए दूसरे से द्वेष करना सच्ची भक्ति नहीं है।

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लंकाकाण्ड · क्रमांक 3

रामेश्वर और सेतु की महिमा

चौपाइयाँ — मूल पाठ

जे रामेस्वर दरसनु करिहहिं। ते तनु तजि मम लोक सिधरिहहिं ॥ जो गंगाजलु आनि चढ़ाइहि। सो साजुज्य मुक्ति नर पाइहि ॥ होइ अकाम जो छल तजि सेइहि। भगति मोरि तेहि संकर देइहि ॥ मम कृत सेतु जो दरसनु करिही। सो बिनु श्रम भवसागर तरिही ॥ राम बचन सब के जिय भाए। मुनिबर निज निज आश्रम आए ॥ गिरिजा रघुपति कै यह रीती। संतत करहिं प्रनत पर प्रीती ॥ बाँधा सेतु नील नल नागर। राम कृपाँ जसु भयउ उजागर ॥ बूड़हिं आनहि बोरहिं जेई। भए उपल बोहित सम तेई ॥ महिमा यह न जलधि कइ बरनी। पाहन गुन न कपिन्ह कइ करनी ॥

दोहा — मूल पाठ

श्री रघुबीर प्रताप ते सिंधु तरे पाषान। ते मतिमंद जे राम तजि भजहिं जाइ प्रभु आन ॥ ३ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

श्रीराम रामेश्वर-दर्शन, गंगाजल अर्पण और निष्काम उपासना की महिमा कहते हैं। मुनि अपने आश्रम लौटते हैं। नल-नील के बनाए सेतु में डूबने वाले पत्थर भी नौका जैसे सहायक हो जाते हैं। इसका यश जल, पत्थर या वानरों की निजी शक्ति का नहीं, श्रीरघुवीर की कृपा और प्रताप का बताया गया है।

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लंकाकाण्ड · क्रमांक 4

समुद्र पर सेना का पारगमन

चौपाइयाँ — मूल पाठ

बाँधि सेतु अति सुदृढ़ बनावा। देखि कृपानिधि के मन भावा ॥ चली सेन कछु बरनि न जाई। गर्जहिं मर्कट भट समुदाई ॥ सेतुबंध ढिग चढ़ि रघुराई। चितव कृपाल सिंधु बहुताई ॥ देखन कहुँ प्रभु करुना कंदा। प्रगट भए सब जलचर बृंदा ॥ मकर नक्र नाना झष ब्याला। सत जोजन तन परम बिसाला ॥ अइसेउ एक तिन्हहि जे खाहीं। एकन्ह कें डर तेपि डेराहीं ॥ प्रभुहि बिलोकहिं टरहिं न टारे। मन हरषित सब भए सुखारे ॥ तिन्ह की ओट न देखिअ बारी। मगन भए हरि रूप निहारी ॥ चला कटकु प्रभु आयसु पाई। को कहि सक कपि दल बिपुलाई ॥

दोहा — मूल पाठ

सेतुबंध भइ भीर अति कपि नभ पंथ उड़ाहिं। अपर जलचरन्हि ऊपर चढ़ि चढ़ि पारहि जाहिं ॥ ४ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

सुदृढ़ सेतु बन जाने पर विशाल वानर-सेना चलती है। श्रीराम को देखने के लिए छोटे-बड़े और अत्यंत विशाल जलचर भी ऊपर आते हैं। वे प्रभु का रूप निहारने में तल्लीन हैं। सेना सेतु पर इतनी अधिक हो जाती है कि कुछ वानर आकाश से और कुछ जलचरों पर चढ़कर भी समुद्र पार करते हैं।

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लंकाकाण्ड · क्रमांक 5

लंका के सामने पड़ाव

चौपाइयाँ — मूल पाठ

अस कौतुक बिलोकि द्वौ भाई। बिहँसि चले कृपाल रघुराई ॥ सेन सहित उतरे रघुबीरा। कहि न जाइ कपि जूथप भीरा ॥ सिंधु पार प्रभु डेरा कीन्हा। सकल कपिन्ह कहुँ आयसु दीन्हा ॥ खाहु जाइ फल मूल सुहाए। सुनत भालु कपि जहँ तहँ धाए ॥ सब तरु फरे राम हित लागी। रितु अरु कुरितु काल गति त्यागी ॥ खाहिं मधुर फल बटप हलावहिं। लंका सन्मुख सिखर चलावहिं ॥ जहँ कहुँ फिरत निसाचर पावहिं। घेरि सकल बहु नाच नचावहिं ॥ दसनन्हि काटि नासिका काना। कहि प्रभु सुजसु देहिं तब जाना ॥ जिन्ह कर नासा कान निपाता। तिन्ह रावनहि कही सब बाता ॥ सुनत श्रवन बारिधि बंधाना। दस मुख बोलि उठा अकुलाना ॥

दोहा — मूल पाठ

बांध्यो बननिधि नीरनिधि जलधि सिंधु बारीस। सत्य तोयनिधि कंपति उदधि पयोधि नदीस ॥ ५ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

दोनों भाई सेना सहित समुद्र पार कर डेरा डालते हैं। प्रभु वानरों को फल-मूल खाने की अनुमति देते हैं। वृक्ष मानो उनकी सेवा में भरपूर फलते हैं। वानर पर्वत-शिखर लंका की ओर फेंकते और मिले राक्षसों को दंड देकर प्रभु का यश सुनाते हैं। समाचार पाकर रावण समुद्र के बँध जाने पर आश्चर्य और व्याकुलता प्रकट करता है।

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लंकाकाण्ड · क्रमांक 6

मंदोदरी की हितकारी सलाह

चौपाइयाँ — मूल पाठ

निज बिकलता बिचारि बहोरी। बिहँसि गयउ ग्रह करि भय भोरी ॥ मंदोदरीं सुन्यो प्रभु आयो। कौतुकहीं पाथोधि बँधायो ॥ कर गहि पतिहि भवन निज आनी। बोली परम मनोहर बानी ॥ चरन नाइ सिरु अंचलु रोपा। सुनहु बचन पिय परिहरि कोपा ॥ नाथ बयरु कीजे ताही सों। बुधि बल सकिअ जीति जाही सों ॥ तुम्हहि रघुपतिहि अंतर कैसा। खलु खद्योत दिनकरहि जैसा ॥ अतिबल मधु कैटभ जेहिं मारे। महाबीर दितिसुत संघारे ॥ जेहिं बलि बाँधि सहसभुज मारा। सोइ अवतरेउ हरन महि भारा ॥ तासु बिरोध न कीजिअ नाथा। काल करम जिव जाकें हाथा ॥

दोहा — मूल पाठ

रामहि सौपि जानकी नाइ कमल पद माथ। सुत कहुँ राज समर्पि बन जाइ भजिअ रघुनाथ ॥ ६ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

मंदोदरी रावण को स्नेह और विनम्रता से समझाती हैं कि बैर उसी से करना चाहिए जिसे बुद्धि-बल से जीता जा सके। श्रीराम और रावण का अंतर सूर्य तथा जुगनू जैसा है। वे प्रभु के पूर्व अवतारों के पराक्रम का स्मरण कराती हैं। उनका आग्रह है कि सीताजी लौटाकर चरणों में प्रणाम करें, पुत्र को राज्य दें और वन में रामभजन करें।

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लंकाकाण्ड · क्रमांक 7

शरणागति का अवसर

चौपाइयाँ — मूल पाठ

नाथ दीनदयाल रघुराई। बाघउ सनमुख गएँ न खाई ॥ चाहिअ करन सो सब करि बीते। तुम्ह सुर असुर चराचर जीते ॥ संत कहहिं असि नीति दसानन। चौथेंपन जाइहि नृप कानन ॥ तासु भजन कीजिअ तहँ भर्ता। जो कर्ता पालक संहर्ता ॥ सोइ रघुवीर प्रनत अनुरागी। भजहु नाथ ममता सब त्यागी ॥ मुनिबर जतनु करहिं जेहि लागी। भूप राजु तजि होहिं बिरागी ॥ सोइ कोसलधीस रघुराया। आयउ करन तोहि पर दाया ॥ जौं पिय मानहु मोर सिखावन। सुजसु होइ तिहुँ पुर अति पावन ॥

दोहा — मूल पाठ

अस कहि नयन नीर भरि गहि पद कंपित गात। नाथ भजहु रघुनाथहि अचल होइ अहिवात ॥ ७ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

मंदोदरी कहती हैं कि श्रीराम दीनदयाल और शरणागत से प्रेम करने वाले हैं। रावण बहुत विजय पा चुका है; जीवन के अंतिम चरण में राज्य छोड़ साधना की नीति उचित है। जो जगत के सृजन, पालन और संहार के अधिपति हैं, उन्हीं का भजन करे। आँसू भरकर वे रावण के चरण पकड़ती और प्रभु की शरण जाने की प्रार्थना करती हैं।

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लंकाकाण्ड · क्रमांक 8

अभिमान और चापलूसी के बीच प्रहस्त

चौपाइयाँ — मूल पाठ

तब रावन मयसुता उठाई। कहै लाग खल निज प्रभुताई ॥ सुनु तै प्रिया बृथा भय माना। जग जोधा को मोहि समाना ॥ बरुन कुबेर पवन जम काला। भुज बल जितेउँ सकल दिगपाला ॥ देव दनुज नर सब बस मोरें। कवन हेतु उपजा भय तोरें ॥ नाना बिधि तेहि कहेसि बुझाई। सभाँ बहोरि बैठ सो जाई ॥ मंदोदरीं हृदयँ अस जाना। काल बस्य उपजा अभिमाना ॥ सभाँ आइ मंत्रिन्ह तेंहि बूझा। करब कवन बिधि रिपु सैं जूझा ॥ कहहिं सचिव सुनु निसिचर नाहा। बार बार प्रभु पूछहु काहा ॥ कहहु कवन भय करिअ बिचारा। नर कपि भालु अहार हमारा ॥

दोहा — मूल पाठ

सब के बचन श्रवन सुनि कह प्रहस्त कर जोरि। नीति बिरोध न करिअ प्रभु मंत्रिन्ह मति अति थोरि ॥ ८ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

रावण अपनी विजय और शक्ति गिनाकर मंदोदरी का भय व्यर्थ बताता है। वे समझती हैं कि काल के वश उसका अभिमान बढ़ गया है। सभा में मंत्री राम की सेना को तुच्छ बताकर चापलूसी करते हैं। प्रहस्त हाथ जोड़कर इस मत का विरोध करता है और रावण को नीति के विरुद्ध निर्णय न लेने की सलाह देता है।

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लंकाकाण्ड · क्रमांक 9

कटु पर हितकारी वचन

चौपाइयाँ — मूल पाठ

कहहिं सचिव सठ ठकुरसोहाती। नाथ न पूर आव एहि भाँती ॥ बारिधि नाघि एक कपि आवा। तासु चरित मन महुँ सबु गावा ॥ छुधा न रही तुम्हहि तब काहू। जारत नगरु कस न धरि खाहू ॥ सुनत नीक आगें दुख पावा। सचिवन अस मत प्रभुहि सुनावा ॥ जेहिं बारीस बँधायउ हेला। उतरेउ सेन समेत सुबेला ॥ सो भनु मनुज खाब हम भाई। बचन कहहिं सब गाल फुलाई ॥ तात बचन मम सुनु अति आदर। जनि मन गुनहु मोहि करि कादर ॥ प्रिय बानी जे सुनहिं जे कहहीं। ऐसे नर निकाय जग अहहीं ॥ बचन परम हित सुनत कठोरे। सुनहिं जे कहहिं ते नर प्रभु थोरे ॥ प्रथम बसीठ पठउ सुनु नीती। सीता देइ करहु पुनि प्रीती ॥

दोहा — मूल पाठ

नारि पाइ फिरि जाहिं जौं तौ न बढ़ाइअ रारि। नाहिं त सन्मुख समर महि तात करिअ हठि मारि ॥ ९ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

प्रहस्त पूछता है कि यदि वानर इतने तुच्छ हैं तो नगर जलाने आए हनुमान को पकड़कर क्यों नहीं खाया गया। मीठी चापलूसी बाद में दुख देती है। वह दुर्लभ सलाहकार की पहचान बताता है जो अप्रिय लगने पर भी हित की बात कहता है। पहले दूत भेजकर सीताजी लौटाने और सुलह का मार्ग आजमाने, उसके बाद आवश्यकता हो तो युद्ध करने की नीति कहता है।

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लंकाकाण्ड · क्रमांक 10

रावण का मनोरंजन में मग्न होना

चौपाइयाँ — मूल पाठ

यह मत जौं मानहु प्रभु मोरा। उभय प्रकार सुजसु जग तोरा ॥ सुत सन कह दसकंठ रिसाई। असि मति सठ केहिं तोहि सिखाई ॥ अबहीं ते उर संसय होई। बेनुमूल सुत भयहु घमोई ॥ सुनि पितु गिरा परुष अति घोरा। चला भवन कहि बचन कठोरा ॥ हित मत तोहि न लागत कैसें। काल बिबस कहुँ भेषज जैसें ॥ संध्या समय जानि दससीसा। भवन चलेउ निरखत भुज बीसा ॥ लंका सिखर उपर आगारा। अति बिचित्र तहँ होइ अखारा ॥ बैठ जाइ तेही मंदिर रावन। लागे किंनर गुन गन गावन ॥ बाजहिं ताल पखाउज बीना। नृत्य करहिं अपछरा प्रबीना ॥

दोहा — मूल पाठ

सुनासीर सत सरिस सो संतत करइ बिलास। परम प्रबल रिपु सीस पर तद्यपि सोच न त्रास ॥ १० ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

रावण प्रहस्त की बात पर क्रोधित होकर अपमान करता है। पुत्र उसे कालवश औषधि न सुहाने वाले रोगी के समान समझाकर लौट जाता है। संध्या में रावण लंका के ऊँचे भवन में संगीत और नृत्य का आनंद लेने बैठता है। अत्यंत प्रबल शत्रु सामने होने पर भी वह चिंता छोड़ विलास में लगा रहता है।

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लंकाकाण्ड · क्रमांक 11

सुबेल पर प्रभु का विश्राम

चौपाइयाँ — मूल पाठ

इहाँ सुबेल सैल रघुबीरा। उतरे सेन सहित अति भीरा ॥ सिखर एक उतंग अति देखी। परम रम्य सम सुभ्र बिसेषी ॥ तहँ तरु किसलय सुमन सुहाए। लछिमन रचि निज हाथ डसाए ॥ ता पर रूचिर मृदुल मृगछाला। तेहीं आसन आसीन कृपाला ॥ प्रभु कृत सीस कपीस उछंगा। बाम दहिन दिसि चाप निषंगा ॥ दुहुँ कर कमल सुधारत बाना। कह लंकेस मंत्र लगि काना ॥ बड़भागी अंगद हनुमाना। चरन कमल चापत बिधि नाना ॥ प्रभु पाछें लछिमन बीरासन। कटि निषंग कर बान सरासन ॥

दोहा — मूल पाठ

एहि बिधि कृपा रूप गुन धाम रामु आसीन। धन्य ते नर एहिं ध्यान जे रहत सदा लयलीन ॥ ११(क) ॥

दोहा — मूल पाठ

पूरब दिसा बिलोकि प्रभु देखा उदित मयंक। कहत सबहि देखहु ससिहि मृगपति सरिस असंक ॥ ११(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

सुबेल पर्वत पर लक्ष्मण प्रभु के लिए कोमल पत्तों और फूलों का आसन बनाते हैं। श्रीराम सुग्रीव की गोद में सिर रखकर विश्राम करते, विभीषण से परामर्श सुनते और अंगद-हनुमान की सेवा स्वीकार करते हैं। लक्ष्मण सशस्त्र पीछे रहते हैं। यह ध्यान प्रेमपूर्ण सेवा का चित्र है। प्रभु पूर्व दिशा में उदित चंद्रमा की ओर सबका ध्यान दिलाते हैं।

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लंकाकाण्ड · क्रमांक 12

चंद्रमा के दाग पर भक्तिभाव

चौपाइयाँ — मूल पाठ

पूरब दिसि गिरिगुहा निवासी। परम प्रताप तेज बल रासी ॥ मत्त नाग तम कुंभ बिदारी। ससि केसरी गगन बन चारी ॥ बिथुरे नभ मुकुताहल तारा। निसि सुंदरी केर सिंगारा ॥ कह प्रभु ससि महुँ मेचकताई। कहहु काह निज निज मति भाई ॥ कह सुग्रीव सुनहु रघुराई। ससि महुँ प्रगट भूमि कै झाँई ॥ मारेउ राहु ससिहि कह कोई। उर महँ परी स्यामता सोई ॥ कोउ कह जब बिधि रति मुख कीन्हा। सार भाग ससि कर हरि लीन्हा ॥ छिद्र सो प्रगट इंदु उर माहीं। तेहि मग देखिअ नभ परिछाहीं ॥ प्रभु कह गरल बंधु ससि केरा। अति प्रिय निज उर दीन्ह बसेरा ॥ बिष संजुत कर निकर पसारी। जारत बिरहवंत नर नारी ॥

दोहा — मूल पाठ

कह हनुमंत सुनहु प्रभु ससि तुम्हारा प्रिय दास। तव मूरति बिधु उर बसति सोइ स्यामता अभास ॥ १२(क) ॥

दोहा — मूल पाठ

पवन तनय के बचन सुनि बिहँसे रामु सुजान। दच्छिन दिसि अवलोकि प्रभु बोले कृपा निधान ॥ १२(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

चंद्रमा के श्याम चिह्न के विषय में सब अपनी-अपनी समझ बताते हैं—पृथ्वी की छाया, राहु का आघात या सौंदर्य का सार लिया जाना। प्रभु विष से चंद्रमा के संबंध की काव्यात्मक बात कहते हैं। हनुमान कहते हैं कि चंद्रमा प्रभु का सेवक है और उसके हृदय में बसी श्रीराम की श्याम मूर्ति ही वह चिह्न है। यह उत्तर सुनकर प्रभु मुस्कराते हैं।

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लंकाकाण्ड · क्रमांक 13

रावण के छत्र-मुकुट पर बाण

चौपाइयाँ — मूल पाठ

देखु बिभीषन दच्छिन आसा। घन घमंड दामिनि बिलासा ॥ मधुर मधुर गरजइ घन घोरा। होइ बृष्टि जनि उपल कठोरा ॥ कहत बिभीषन सुनहु कृपाला। होइ न तड़ित न बारिद माला ॥ लंका सिखर उपर आगारा। तहँ दसकंधर देख अखारा ॥ छत्र मेघडंबर सिर धारी। सोइ जनु जलद घटा अति कारी ॥ मंदोदरी श्रवन ताटंका। सोइ प्रभु जनु दामिनी दमंका ॥ बाजहिं ताल मृदंग अनूपा। सोइ रव मधुर सुनहु सुरभूपा ॥ प्रभु मुसुकान समुझि अभिमाना। चाप चढ़ाइ बान संधाना ॥

दोहा — मूल पाठ

छत्र मुकुट ताटंक तब हते एकहीं बान। सबकें देखत महि परे मरमु न कोऊ जान ॥ १३(क) ॥

दोहा — मूल पाठ

अस कौतुक करि राम सर प्रबिसेउ आइ निषंग। रावन सभा ससंक सब देखि महा रसभंग ॥ १३(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

दक्षिण दिशा की चमक और ध्वनि को प्रभु बादल-बिजली जैसा कहते हैं। विभीषण बताते हैं कि वह रावण का छत्र, मंदोदरी के कर्णाभूषण और संगीत-सभा है। अभिमान समझकर श्रीराम एक बाण से छत्र, मुकुट और ताटंक गिरा देते हैं। बाण फिर तरकस में लौट आता है। सभा इस अनदेखे प्रहार से भयभीत और मनोरंजन से विरत हो जाती है।

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लंकाकाण्ड · क्रमांक 14

मंदोदरी का पुनः निवेदन

चौपाइयाँ — मूल पाठ

कंप न भूमि न मरुत बिसेषा। अस्त्र सस्त्र कछु नयन न देखा ॥ सोचहिं सब निज हृदय मझारी। असगुन भयउ भयंकर भारी ॥ दसमुख देखि सभा भय पाई। बिहसि बचन कह जुगुति बनाई ॥ सिरउ गिरे संतत सुभ जाही। मुकुट परे कस असगुन ताही ॥ सयन करहु निज निज गृह जाई। गवने भवन सकल सिर नाई ॥ मंदोदरी सोच उर बसेऊ। जब ते श्रवनपूर महि खसेऊ ॥ सजल नयन कह जुग कर जोरी। सुनहु प्रानपति बिनती मोरी ॥ कंत राम बिरोध परिहरहू। जानि मनुज जनि हठ मन धरहू ॥

दोहा — मूल पाठ

बिस्वरुप रघुबंस मनि करहु बचन बिस्वासु। लोक कल्पना बेद कर अंग अंग प्रति जासु ॥ १४ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

न भूकंप आया, न तेज हवा चली और न किसी ने अस्त्र देखा; सब इस घटना को भयंकर अशुभ संकेत मानते हैं। रावण उसका महत्त्व घटाकर सभा को विदा करता है। मंदोदरी चिंतित होकर फिर प्रार्थना करती हैं कि श्रीराम को साधारण मनुष्य समझकर विरोध न करें। वे उन्हें विश्वरूप परमात्मा बताते हुए वेद की अंग-उपमाओं का परिचय देती हैं।

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लंकाकाण्ड · क्रमांक 15

श्रीराम के विश्वरूप का वर्णन

चौपाइयाँ — मूल पाठ

पद पाताल सीस अज धामा। अपर लोक अँग अँग बिश्रामा ॥ भृकुटि बिलास भयंकर काला। नयन दिवाकर कच घन माला ॥ जासु घ्रान अस्विनीकुमारा। निसि अरु दिवस निमेष अपारा ॥ श्रवन दिसा दस बेद बखानी। मारुत स्वास निगम निज बानी ॥ अधर लोभ जम दसन कराला। माया हास बाहु दिगपाला ॥ आनन अनल अंबुपति जीहा। उतपति पालन प्रलय समीहा ॥ रोम राजि अष्टादस भारा। अस्थि सैल सरिता नस जारा ॥ उदर उदधि अधगो जातना। जगमय प्रभु का बहु कलपना ॥

दोहा — मूल पाठ

अहंकार सिव बुद्धि अज मन ससि चित्त महान। मनुज बास सचराचर रुप राम भगवान ॥ १५ क ॥

दोहा — मूल पाठ

अस बिचारि सुनु प्रानपति प्रभु सन बयरु बिहाइ। प्रीति करहु रघुबीर पद मम अहिवात न जाइ ॥ १५ ख ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

मंदोदरी पाताल, ब्रह्मलोक, सूर्य, बादल, दिशाएँ, वायु, अग्नि, समुद्र, पर्वत और नदियों को प्रभु के विराट अंगों के रूप में वर्णित करती हैं। शिव, ब्रह्मा और चंद्रमा तक उस विश्वरूप के तत्त्व हैं। मनुष्य-वेश में वही चराचरमय भगवान राम हैं। वे रावण से बैर छोड़कर चरणों में प्रेम करने और अपने परिवार की रक्षा का आग्रह करती हैं।

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लंकाकाण्ड · क्रमांक 16

रावण की हठधर्मिता

चौपाइयाँ — मूल पाठ

बिहँसा नारि बचन सुनि काना। अहो मोह महिमा बलवाना ॥ नारि सुभाउ सत्य सब कहहीं। अवगुन आठ सदा उर रहहीं ॥ साहस अनृत चपलता माया। भय अबिबेक असौच अदाया ॥ रिपु कर रुप सकल तैं गावा। अति बिसाल भय मोहि सुनावा ॥ सो सब प्रिया सहज बस मोरें। समुझि परा प्रसाद अब तोरें ॥ जानिउँ प्रिया तोरि चतुराई। एहि बिधि कहहु मोरि प्रभुताई ॥ तव बतकही गूढ़ मृगलोचनि। समुझत सुखद सुनत भय मोचनि ॥ मंदोदरि मन महुँ अस ठयऊ। पियहि काल बस मतिभ्रम भयऊ ॥

दोहा — मूल पाठ

एहि बिधि करत बिनोद बहु प्रात प्रगट दसकंध। सहज असंक लंकपति सभाँ गयउ मद अंध ॥ १६(क) ॥

सोरठा — मूल पाठ

फूलह फरइ न बेत जदपि सुधा बरषहिं जलद। मूरुख हृदयँ न चेत जौं गुर मिलहिं बिरंचि सम ॥ १६(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

रावण मंदोदरी की बात को मोह बताकर स्त्रियों के विषय में निंदात्मक सामान्यीकरण करता है; ये अभिमानी रावण के कथन हैं। वह विराट रूप के वर्णन को भी अपनी शक्ति की प्रशंसा में मोड़ लेता है। मंदोदरी जानती हैं कि काल ने उसकी बुद्धि भ्रमित कर दी है। अंतिम सोरठा बताता है कि मूर्ख हृदय श्रेष्ठ गुरु की सीख से भी नहीं चेतता।

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लंकाकाण्ड · क्रमांक 17

अंगद को दूत बनाकर भेजना

चौपाइयाँ — मूल पाठ

इहाँ प्रात जागे रघुराई। पूछा मत सब सचिव बोलाई ॥ कहहु बेगि का करिअ उपाई। जामवंत कह पद सिरु नाई ॥ सुनु सर्बग्य सकल उर बासी। बुधि बल तेज धर्म गुन रासी ॥ मंत्र कहउँ निज मति अनुसारा। दूत पठाइअ बालिकुमारा ॥ नीक मंत्र सब के मन माना। अंगद सन कह कृपानिधाना ॥ बालितनय बुधि बल गुन धामा। लंका जाहु तात मम कामा ॥ बहुत बुझाइ तुम्हहि का कहऊँ। परम चतुर मैं जानत अहऊँ ॥ काजु हमार तासु हित होई। रिपु सन करेहु बतकही सोई ॥

सोरठा — मूल पाठ

प्रभु अग्या धरि सीस चरन बंदि अंगद उठेउ। सोइ गुन सागर ईस राम कृपा जा पर करहु ॥ १७(क) ॥

सोरठा — मूल पाठ

स्वयं सिद्ध सब काज नाथ मोहि आदरु दियउ। अस बिचारि जुबराज तन पुलकित हरषित हियउ ॥ १७(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

प्रातः श्रीराम मंत्रियों से नीति पूछते हैं। जामवंत अंगद को दूत भेजने की सलाह देते हैं और सब सहमत होते हैं। प्रभु अंगद की बुद्धि-बल की प्रशंसा करके ऐसा संवाद करने को कहते हैं जिससे अपना कार्य भी हो और शत्रु का हित भी। अंगद प्रभु की कृपा से स्वयं को सम्मानित मानते हुए प्रसन्नतापूर्वक आज्ञा स्वीकार करते हैं।

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लंकाकाण्ड · क्रमांक 18

अंगद का निर्भय लंका-प्रवेश

चौपाइयाँ — मूल पाठ

बंदि चरन उर धरि प्रभुताई। अंगद चलेउ सबहि सिरु नाई ॥ प्रभु प्रताप उर सहज असंका। रन बाँकुरा बालिसुत बंका ॥ पुर पैठत रावन कर बेटा। खेलत रहा सो होइ गै भैंटा ॥ बातहिं बात करष बढ़ि आई। जुगल अतुल बल पुनि तरुनाई ॥ तेहि अंगद कहुँ लात उठाई। गहि पद पटकेउ भूमि भवाँई ॥ निसिचर निकर देखि भट भारी। जहँ तहँ चले न सकहिं पुकारी ॥ एक एक सन मरमु न कहहीं। समुझि तासु बध चुप करि रहहीं ॥ भयउ कोलाहल नगर मझारी। आवा कपि लंका जेहीं जारी ॥ अब धौं कहा करिहि करतारा। अति सभीत सब करहिं बिचारा ॥ बिनु पूछें मगु देहिं दिखाई। जेहि बिलोक सोइ जाइ सुखाई ॥

दोहा — मूल पाठ

गयउ सभा दरबार तब सुमिरि राम पद कंज। सिंह ठवनि इत उत चितव धीर बीर बल पुंज ॥ १८ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

रामप्रताप के भरोसे अंगद लंका में प्रवेश करते हैं। रावण के पुत्र से झगड़ा होने पर वे उसका आक्रमण रोककर उसे भूमि पर पटक देते हैं। नगर में भय फैलता है; लोग उन्हें नगर जलाने वाला वानर समझकर व्याकुल होते हैं। सब बिना पूछे ही सभा का मार्ग बताते हैं। अंगद रामचरणों का स्मरण कर सिंह के समान निर्भय होकर दरबार में पहुँचते हैं।

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लंकाकाण्ड · क्रमांक 19

रावण की सभा में रामदूत

चौपाइयाँ — मूल पाठ

तुरत निसाचर एक पठावा। समाचार रावनहि जनावा ॥ सुनत बिहँसि बोला दससीसा। आनहु बोलि कहाँ कर कीसा ॥ आयसु पाइ दूत बहु धाए। कपिकुंजरहि बोलि लै आए ॥ अंगद दीख दसानन बैंसें। सहित प्रान कज्जलगिरि जैसें ॥ भुजा बिटप सिर सृंग समाना। रोमावली लता जनु नाना ॥ मुख नासिका नयन अरु काना। गिरि कंदरा खोह अनुमाना ॥ गयउ सभाँ मन नेकु न मुरा। बालितनय अतिबल बाँकुरा ॥ उठे सभासद कपि कहुँ देखी। रावन उर भा क्रोध बिसेषी ॥

दोहा — मूल पाठ

जथा मत्त गज जूथ महुँ पंचानन चलि जाइ। राम प्रताप सुमिरि मन बैठ सभाँ सिरु नाइ ॥ १९ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

रावण दूतों द्वारा अंगद को बुलाता है। वे उसकी विशाल देह, अनेक भुजाओं और पर्वत-जैसे रूप को देखकर भी विचलित नहीं होते। सभासद आदर से उठते हैं, जिससे रावण को क्रोध होता है। रामप्रताप का स्मरण करके अंगद सभा में प्रणाम कर बैठते हैं; उनका धैर्य मदमस्त हाथियों के समूह में सिंह के प्रवेश जैसा चित्रित है।

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लंकाकाण्ड · क्रमांक 20

अंगद का शांति-संदेश

चौपाइयाँ — मूल पाठ

कह दसकंठ कवन तैं बंदर। मैं रघुबीर दूत दसकंधर ॥ मम जनकहि तोहि रही मिताई। तव हित कारन आयउँ भाई ॥ उत्तम कुल पुलस्ति कर नाती। सिव बिरंचि पूजेहु बहु भाँती ॥ बर पायहु कीन्हेहु सब काजा। जीतेहु लोकपाल सब राजा ॥ नृप अभिमान मोह बस किंबा। हरि आनिहु सीता जगदंबा ॥ अब सुभ कहा सुनहु तुम्ह मोरा। सब अपराध छमिहि प्रभु तोरा ॥ दसन गहहु तृन कंठ कुठारी। परिजन सहित संग निज नारी ॥ सादर जनकसुता करि आगें। एहि बिधि चलहु सकल भय त्यागें ॥

दोहा — मूल पाठ

प्रनतपाल रघुबंसमनि त्राहि त्राहि अब मोहि। आरत गिरा सुनत प्रभु अभय करैगो तोहि ॥ २० ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

अंगद स्वयं को श्रीराम का दूत और बालि का पुत्र बताते हैं। रावण के उत्तम वंश, तप और प्राप्त वरों का स्मरण कराते हैं, पर सीताहरण को अभिमान-मोह का परिणाम कहते हैं। वे अहंकार छोड़ सीताजी को आगे करके परिवार सहित प्रभु की शरण जाने की सलाह देते हैं। दीन विनती सुनकर शरणागत-पालक श्रीराम अभय देंगे—यही उनके संदेश का आशय है।

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लंकाकाण्ड · क्रमांक 21

अंगद–रावण संवाद में वंश और कुशल

चौपाइयाँ — मूल पाठ

रे कपिपोत बोलु संभारी। मूढ़ न जानेहि मोहि सुरारी ॥ कहु निज नाम जनक कर भाई। केहि नातें मानिऐ मिताई ॥ अंगद नाम बालि कर बेटा। तासों कबहुँ भई ही भेटा ॥ अंगद बचन सुनत सकुचाना। रहा बालि बानर मैं जाना ॥ अंगद तहीं बालि कर बालक। उपजेहु बंस अनल कुल घालक ॥ गर्भ न गयहु ब्यर्थ तुम्ह जायहु। निज मुख तापस दूत कहायहु ॥ अब कहु कुसल बालि कहँ अहई। बिहँसि बचन तब अंगद कहई ॥ दिन दस गएँ बालि पहिं जाई। बूझेहु कुसल सखा उर लाई ॥ राम बिरोध कुसल जसि होई। सो सब तोहि सुनाइहि सोई ॥ सुनु सठ भेद होइ मन ताकें। श्रीरघुबीर हृदय नहिं जाकें ॥

दोहा — मूल पाठ

हम कुल घालक सत्य तुम्ह कुल पालक दससीस। अंधउ बधिर न अस कहहिं नयन कान तव बीस ॥ २१।
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

रावण अंगद को अपमानित करके उनका नाम और पिता का परिचय पूछता है। बालि का पुत्र जानकर वह उनके दूत बनने की निंदा करता और बालि की कुशल पूछता है। अंगद निर्भीक उत्तर देते हैं कि रामविरोध की कुशल स्वयं आगे समझ में आ जाएगी। वे अनेक नेत्र-कान होते हुए भी नीति न समझने पर रावण को व्यंग्य सहित चेतावनी देते हैं।

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लंकाकाण्ड · क्रमांक 22

अंगद का रावण के धर्म-दावे पर प्रश्न

चौपाइयाँ — मूल पाठ

सिव बिरंचि सुर मुनि समुदाई। चाहत जासु चरन सेवकाई ॥ तासु दूत होइ हम कुल बोरा। अइसिहुँ मति उर बिहर न तोरा ॥ सुनि कठोर बानी कपि केरी। कहत दसानन नयन तरेरी ॥ खल तव कठिन बचन सब सहऊँ। नीति धर्म मैं जानत अहऊँ ॥ कह कपि धर्मसीलता तोरी। हमहुँ सुनी कृत पर त्रिय चोरी ॥ देखी नयन दूत रखवारी। बूड़ि न मरहु धर्म ब्रतधारी ॥ कान नाक बिनु भगिनि निहारी। छमा कीन्हि तुम्ह धर्म बिचारी ॥ धर्मसीलता तव जग जागी। पावा दरसु हमहुँ बड़भागी ॥

दोहा — मूल पाठ

जनि जल्पसि जड़ जंतु कपि सठ बिलोकु मम बाहु। लोकपाल बल बिपुल ससि ग्रसन हेतु सब राहु ॥ २२(क) ॥

दोहा — मूल पाठ

पुनि नभ सर मम कर निकर कमलन्हि पर करि बास। सोभत भयउ मराल इव संभु सहित कैलास ॥ २२(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

रावण अपनी सहनशीलता को नीति और धर्म का ज्ञान बताता है। अंगद पराई स्त्री का हरण और पहले दूत हनुमान के साथ हुए व्यवहार का स्मरण कराकर इस दावे की असंगति दिखाते हैं। रावण फिर अपनी भुजाओं की शक्ति और कैलास उठाने का पराक्रम गिनाता है। संवाद अहंकार तथा सत्य के बीच टकराव को तीखा करता है।

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लंकाकाण्ड · क्रमांक 23

वानर सेना को तुच्छ बताने का प्रत्युत्तर

चौपाइयाँ — मूल पाठ

तुम्हरे कटक माझ सुनु अंगद। मो सन भिरिहि कवन जोधा बद ॥ तव प्रभु नारि बिरहँ बलहीना। अनुज तासु दुख दुखी मलीना ॥ तुम्ह सुग्रीव कूलद्रुम दोऊ। अनुज हमार भीरु अति सोऊ ॥ जामवंत मंत्री अति बूढ़ा। सो कि होइ अब समरारूढ़ा ॥ सिल्पि कर्म जानहिं नल नीला। है कपि एक महा बलसीला ॥ आवा प्रथम नगरु जेंहिं जारा। सुनत बचन कह बालिकुमारा ॥ सत्य बचन कहु निसिचर नाहा। साँचेहुँ कीस कीन्ह पुर दाहा ॥ रावन नगर अल्प कपि दहई। सुनि अस बचन सत्य को कहई ॥ जो अति सुभट सराहेहु रावन। सो सुग्रीव केर लघु धावन ॥ चलइ बहुत सो बीर न होई। पठवा खबरि लेन हम सोई ॥

दोहा — मूल पाठ

सत्य नगरु कपि जारेउ बिनु प्रभु आयसु पाइ। फिरि न गयउ सुग्रीव पहिं तेहिं भय रहा लुकाइ ॥ २३(क) ॥

दोहा — मूल पाठ

सत्य कहहि दसकंठ सब मोहि न सुनि कछु कोह। कोउ न हमारें कटक अस तो सन लरत जो सोह ॥ २३(ख) ॥

दोहा — मूल पाठ

प्रीति बिरोध समान सन करिअ नीति असि आहि। जौं मृगपति बध मेड़ुकन्हि भल कि कहइ कोउ ताहि ॥ २३(ग) ॥

दोहा — मूल पाठ

जद्यपि लघुता राम कहुँ तोहि बधें बड़ दोष। तदपि कठिन दसकंठ सुनु छत्र जाति कर रोष ॥ २३(घ) ॥

दोहा — मूल पाठ

बक्र उक्ति धनु बचन सर हृदय दहेउ रिपु कीस। प्रतिउत्तर सड़सिन्ह मनहुँ काढ़त भट दससीस ॥ २३(ङ) ॥

दोहा — मूल पाठ

हँसि बोलेउ दसमौलि तब कपि कर बड़ गुन एक। जो प्रतिपालइ तासु हित करइ उपाय अनेक ॥ २३(छ) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

रावण राम-लक्ष्मण, सुग्रीव और सेना को दुर्बल बताकर केवल लंका जलाने वाले हनुमान की शक्ति स्वीकार करता है। अंगद व्यंग्य से हनुमान को साधारण दूत बताते हुए प्रतिपक्ष के अहंकार का उत्तर देते हैं। वे कहते हैं कि समान प्रतिद्वंद्वी से ही प्रीति या बैर की नीति शोभती है। अनेक दोहों में यह वाक्युद्ध और स्वामीभक्त सेवक की निष्ठा प्रकट होती है।

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लंकाकाण्ड · क्रमांक 24

अंगद का पराक्रम-स्मरण से उत्तर

चौपाइयाँ — मूल पाठ

धन्य कीस जो निज प्रभु काजा। जहँ तहँ नाचइ परिहरि लाजा ॥ नाचि कूदि करि लोग रिझाई। पति हित करइ धर्म निपुनाई ॥ अंगद स्वामिभक्त तव जाती। प्रभु गुन कस न कहसि एहि भाँती ॥ मैं गुन गाहक परम सुजाना। तव कटु रटनि करउँ नहिं काना ॥ कह कपि तव गुन गाहकताई। सत्य पवनसुत मोहि सुनाई ॥ बन बिधंसि सुत बधि पुर जारा। तदपि न तेहिं कछु कृत अपकारा ॥ सोइ बिचारि तव प्रकृति सुहाई। दसकंधर मैं कीन्हि ढिठाई ॥ देखेउँ आइ जो कछु कपि भाषा। तुम्हरें लाज न रोष न माखा ॥ जौं असि मति पितु खाए कीसा। कहि अस बचन हँसा दससीसा ॥ पितहि खाइ खातेउँ पुनि तोही। अबहीं समुझि परा कछु मोही ॥ बालि बिमल जस भाजन जानी। हतउँ न तोहि अधम अभिमानी ॥ कहु रावन रावन जग केते। मैं निज श्रवन सुने सुनु जेते ॥ बलिहि जितन एक गयउ पताला। राखेउ बाँधि सिसुन्ह हयसाला ॥ खेलहिं बालक मारहिं जाई। दया लागि बलि दीन्ह छोड़ाई ॥ एक बहोरि सहसभुज देखा। धाइ धरा जिमि जंतु बिसेषा ॥ कौतुक लागि भवन लै आवा। सो पुलस्ति मुनि जाइ छोड़ावा ॥

दोहा — मूल पाठ

एक कहत मोहि सकुच अति रहा बालि की काँख। इन्ह महुँ रावन तैं कवन सत्य बदहि तजि माख ॥ २४ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

रावण वानरों की सेवा-प्रवृत्ति पर उपहास करता है। अंगद पहले हनुमान के हाथों हुए अपमान का स्मरण कराते हैं। फिर वे उन प्रसंगों का उल्लेख करते हैं जहाँ रावण बलि, सहस्रबाहु और बालि के सामने विवश हुआ था। प्रश्न यह है कि अनेक पराजय झेलने के बाद भी वह इतना अभिमान क्यों करता है। यह संवाद शरणागति की सलाह न मानने की मूर्खता को उजागर करता है।

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लंकाकाण्ड · क्रमांक 25

रावण का अपने बल पर अभिमान

चौपाइयाँ — मूल पाठ

सुनु सठ सोइ रावन बलसीला। हरगिरि जान जासु भुज लीला ॥ जान उमापति जासु सुराई। पूजेउँ जेहि सिर सुमन चढ़ाई ॥ सिर सरोज निज करन्हि उतारी। पूजेउँ अमित बार त्रिपुरारी ॥ भुज बिक्रम जानहिं दिगपाला। सठ अजहूँ जिन्ह कें उर साला ॥ जानहिं दिग्गज उर कठिनाई। जब जब भिरउँ जाइ बरिआई ॥ जिन्ह के दसन कराल न फूटे। उर लागत मूलक इव टूटे ॥ जासु चलत डोलति इमि धरनी। चढ़त मत्त गज जिमि लघु तरनी ॥ सोइ रावन जग बिदित प्रतापी। सुनेहि न श्रवन अलीक प्रलापी ॥

दोहा — मूल पाठ

तेहि रावन कहँ लघु कहसि नर कर करसि बखान। रे कपि बर्बर खर्ब खल अब जाना तव ग्यान ॥ २५ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

रावण शिव को सिर अर्पित करने, कैलास उठाने और दिग्पालों को पराजित करने का वर्णन करके अपनी वीरता का दावा करता है। वह प्रभु को मनुष्य बताकर उनकी प्रशंसा करने के कारण अंगद को तुच्छ कहता है। उसकी बातों में बाहुबल और तपफल का गर्व है, पर अपने किए अपराध और सामने उपस्थित संकट का विचार नहीं है।

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लंकाकाण्ड · क्रमांक 26

श्रीराम को साधारण मनुष्य न समझने की चेतावनी

चौपाइयाँ — मूल पाठ

सुनि अंगद सकोप कह बानी। बोलु सँभारि अधम अभिमानी ॥ सहसबाहु भुज गहन अपारा। दहन अनल सम जासु कुठारा ॥ जासु परसु सागर खर धारा। बूड़े नृप अगनित बहु बारा ॥ तासु गर्ब जेहि देखत भागा। सो नर क्यों दससीस अभागा ॥ राम मनुज कस रे सठ बंगा। धन्वी कामु नदी पुनि गंगा ॥ पसु सुरधेनु कल्पतरु रूखा। अन्न दान अरु रस पीयूषा ॥ बैनतेय खग अहि सहसानन। चिंतामनि पुनि उपल दसानन ॥ सुनु मतिमंद लोक बैकुंठा। लाभ कि रघुपति भगति अकुंठा ॥

दोहा — मूल पाठ

सेन सहित तब मान मथि बन उजारि पुर जारि ॥ कस रे सठ हनुमान कपि गयउ जो तव सुत मारि ॥ २६ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

अंगद परशुराम जैसे प्रतापी के गर्व को दूर करने वाले श्रीराम की महिमा स्मरण कराते हैं। गंगा, कामधेनु, कल्पवृक्ष, अमृत, गरुड़ और चिंतामणि जैसी वस्तुओं को सामान्य कहने की असंगति बताकर वे कहते हैं कि राम को साधारण मनुष्य समझना भी वैसी भूल है। हनुमान के पराक्रम का उदाहरण इस चेतावनी को और स्पष्ट करता है।

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लंकाकाण्ड · क्रमांक 27

बैर छोड़ भजन का आग्रह

चौपाइयाँ — मूल पाठ

सुनु रावन परिहरि चतुराई। भजसि न कृपासिंधु रघुराई ॥ जौ खल भएसि राम कर द्रोही। ब्रह्म रुद्र सक राखि न तोही ॥ मूढ़ बृथा जनि मारसि गाला। राम बयर अस होइहि हाला ॥ तव सिर निकर कपिन्ह के आगें। परिहहिं धरनि राम सर लागें ॥ ते तव सिर कंदुक सम नाना। खेलहहिं भालु कीस चौगाना ॥ जबहिं समर कोपहि रघुनायक। छुटिहहिं अति कराल बहु सायक ॥ तब कि चलिहि अस गाल तुम्हारा। अस बिचारि भजु राम उदारा ॥ सुनत बचन रावन परजरा। जरत महानल जनु घृत परा ॥

दोहा — मूल पाठ

कुंभकरन अस बंधु मम सुत प्रसिद्ध सक्रारि। मोर पराक्रम नहिं सुनेहि जितेउँ चराचर झारि ॥ २७ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

अंगद रावण को फिर रामभजन की सलाह देते हैं और कहते हैं कि प्रभु के विरोध में ब्रह्मा-शिव भी उसे नहीं बचा सकेंगे। युद्ध में रामबाण उसके गर्व को तोड़ देंगे। यह सुनकर रावण क्रोध से भर उठता और कुंभकर्ण, मेघनाद तथा अपनी शक्ति का गर्व करता है। चेतावनी और अहंकार का संघर्ष बना रहता है।

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लंकाकाण्ड · क्रमांक 28

दूत भेजने को दुर्बलता मानने की भूल

चौपाइयाँ — मूल पाठ

सठ साखामृग जोरि सहाई। बाँधा सिंधु इहइ प्रभुताई ॥ नाघहिं खग अनेक बारीसा। सूर न होहिं ते सुनु सब कीसा ॥ मम भुज सागर बल जल पूरा। जहँ बूड़े बहु सुर नर सूरा ॥ बीस पयोधि अगाध अपारा। को अस बीर जो पाइहि पारा ॥ दिगपालन्ह मैं नीर भरावा। भूप सुजस खल मोहि सुनावा ॥ जौं पै समर सुभट तव नाथा। पुनि पुनि कहसि जासु गुन गाथा ॥ तौ बसीठ पठवत केहि काजा। रिपु सन प्रीति करत नहिं लाजा ॥ हरगिरि मथन निरखु मम बाहू। पुनि सठ कपि निज प्रभुहि सराहू ॥

दोहा — मूल पाठ

सूर कवन रावन सरिस स्वकर काटि जेहिं सीस। हुने अनल अति हरष बहु बार साखि गौरीस ॥ २८ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

रावण सेतु बाँधने को साधारण कार्य कहता और अपनी बीस भुजाओं की तुलना अगाध समुद्र से करता है। वह प्रश्न करता है कि यदि श्रीराम वीर हैं तो सुलह के लिए दूत क्यों भेजा। फिर अपने सिर काटकर अग्नि में अर्पित करने का दावा करता है। उसकी दृष्टि में शांति का प्रयास और दया दुर्बलता हैं; यही उसका विवेकभ्रम है।

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लंकाकाण्ड · क्रमांक 29

मिथ्या वीरता का खंडन

चौपाइयाँ — मूल पाठ

जरत बिलोकेउँ जबहिं कपाला। बिधि के लिखे अंक निज भाला ॥ नर कें कर आपन बध बाँची। हसेउँ जानि बिधि गिरा असाँची ॥ सोउ मन समुझि त्रास नहिं मोरें। लिखा बिरंचि जरठ मति भोरें ॥ आन बीर बल सठ मम आगें। पुनि पुनि कहसि लाज पति त्यागे ॥ कह अंगद सलज्ज जग माहीं। रावन तोहि समान कोउ नाहीं ॥ लाजवंत तव सहज सुभाऊ। निज मुख निज गुन कहसि न काऊ ॥ सिर अरु सैल कथा चित रही। ताते बार बीस तैं कही ॥ सो भुजबल राखेउ उर घाली। जीतेहु सहसबाहु बलि बाली ॥ सुनु मतिमंद देहि अब पूरा। काटें सीस कि होइअ सूरा ॥ इंद्रजालि कहु कहिअ न बीरा। काटइ निज कर सकल सरीरा ॥

दोहा — मूल पाठ

जरहिं पतंग मोह बस भार बहहिं खर बृंद। ते नहिं सूर कहावहिं समुझि देखु मतिमंद ॥ २९ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

रावण अपने ललाट पर मनुष्य के हाथों मृत्यु का लेख देखकर भी उसे असत्य समझने की बात कहता है। अंगद उसके आत्मप्रशंसा-पूर्ण व्यवहार पर व्यंग्य करते हैं और पूर्व पराजयों की याद दिलाते हैं। वे समझाते हैं कि शरीर काट लेना, आग में कूदना या भारी भार ढोना अपने-आप वीरता नहीं है; पतंगे और भार ढोने वाले पशु भी ऐसा करते हैं।

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लंकाकाण्ड · क्रमांक 30

प्रभु की आज्ञा का संयम

चौपाइयाँ — मूल पाठ

अब जनि बतबढ़ाव खल करही। सुनु मम बचन मान परिहरही ॥ दसमुख मैं न बसीठीं आयउँ। अस बिचारि रघुबीर पठायउँ ॥ बार बार अस कहइ कृपाला। नहिं गजारि जसु बधें सृकाला ॥ मन महुँ समुझि बचन प्रभु केरे। सहेउँ कठोर बचन सठ तेरे ॥ नाहिं त करि मुख भंजन तोरा। लै जातेउँ सीतहि बरजोरा ॥ जानेउँ तव बल अधम सुरारी। सूनें हरि आनिहि परनारी ॥ तैं निसिचर पति गर्ब बहूता। मैं रघुपति सेवक कर दूता ॥ जौं न राम अपमानहि डरउँ। तोहि देखत अस कौतुक करऊँ ॥

दोहा — मूल पाठ

तोहि पटकि महि सेन हति चौपट करि तव गाउँ। तव जुबतिन्ह समेत सठ जनकसुतहि लै जाउँ ॥ ३० ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

अंगद कहते हैं कि वे प्रभु के विचार से दूत बनकर आए हैं और उन्हीं की वाणी का मान रख कठोर बातें सह रहे हैं। अन्यथा उनके पास रावण को दंड देकर सीताजी को लाने का बल है। वे सूनी कुटिया से सीताहरण को कायरता बताते हैं। उनके पराक्रम के साथ स्वामी की आज्ञा के प्रति संयम भी स्पष्ट है।

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लंकाकाण्ड · क्रमांक 31

चौदह प्रकार के जीवित-मृत का कथन

चौपाइयाँ — मूल पाठ

जौ अस करौं तदपि न बड़ाई। मुएहि बधें नहिं कछु मनुसाई ॥ कौल कामबस कृपिन बिमूढ़ा। अति दरिद्र अजसी अति बूढ़ा ॥ सदा रोगबस संतत क्रोधी। बिष्नु बिमूख श्रुति संत बिरोधी ॥ तनु पोषक निंदक अघ खानी। जीवन सव सम चौदह प्रानी ॥ अस बिचारि खल बधउँ न तोही। अब जनि रिस उपजावसि मोही ॥ सुनि सकोप कह निसिचर नाथा। अधर दसन दसि मीजत हाथा ॥ रे कपि अधम मरन अब चहसी। छोटे बदन बात बड़ि कहसी ॥ कटु जल्पसि जड़ कपि बल जाकें। बल प्रताप बुधि तेज न ताकें ॥

दोहा — मूल पाठ

अगुन अमान जानि तेहि दीन्ह पिता बनबास। सो दुख अरु जुबती बिरह पुनि निसि दिन मम त्रास ॥ ३१(क) ॥

दोहा — मूल पाठ

जिन्ह के बल कर गर्ब तोहि अइसे मनुज अनेक। खाहीं निसाचर दिवस निसि मूढ़ समुझु तजि टेक ॥ ३१(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

अंगद लोभ, वासना, निंदा, सतत क्रोध, धर्म-संत-विरोध और केवल तन-पोषण जैसे दोषों में डूबे चौदह प्रकार के मनुष्यों को जीवित होते हुए भी मृत के समान कहते हैं। वे रावण को इसी दृष्टि से तुच्छ मानते हैं। क्रुद्ध रावण श्रीराम के वनवास और वियोग का उपहास करता है; उसके ये कथन शत्रु के द्वेष और अज्ञान को प्रकट करते हैं।

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लंकाकाण्ड · क्रमांक 32

अंगद का प्रहार और गिरते मुकुट

चौपाइयाँ — मूल पाठ

जब तेहिं कीन्ह राम कै निंदा। क्रोधवंत अति भयउ कपिंदा ॥ हरि हर निंदा सुनइ जो काना। होइ पाप गोघात समाना ॥ कटकटान कपिकुंजर भारी। दुहु भुजदंड तमकि महि मारी ॥ डोलत धरनि सभासद खसे। चले भाजि भय मारुत ग्रसे ॥ गिरत सँभारि उठा दसकंधर। भूतल परे मुकुट अति सुंदर ॥ कछु तेहिं लै निज सिरन्हि सँवारे। कछु अंगद प्रभु पास पबारे ॥ आवत मुकुट देखि कपि भागे। दिनहीं लूक परन बिधि लागे ॥ की रावन करि कोप चलाए। कुलिस चारि आवत अति धाए ॥ कह प्रभु हँसि जनि हृदयँ डेराहू। लूक न असनि केतु नहिं राहू ॥ ए किरीट दसकंधर केरे। आवत बालितनय के प्रेरे ॥

दोहा — मूल पाठ

तरकि पवनसुत कर गहे आनि धरे प्रभु पास। कौतुक देखहिं भालु कपि दिनकर सरिस प्रकास ॥ ३२(क) ॥

दोहा — मूल पाठ

उहाँ सकोपि दसानन सब सन कहत रिसाइ। धरहु कपिहि धरि मारहु सुनि अंगद मुसुकाइ ॥ ३२(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

श्रीराम की निंदा सुनकर अंगद क्रोधित होकर दोनों भुजाएँ भूमि पर पटकते हैं। सभा हिल उठती और रावण के मुकुट गिर जाते हैं। कुछ वह उठा लेता है, कुछ अंगद प्रभु के पास फेंक देते हैं। वानर उन्हें देखकर आशंकित होते हैं, पर श्रीराम रहस्य बताते हैं। हनुमान मुकुट ग्रहण करते हैं। रावण अंगद को पकड़ने और मारने का आदेश देता है।

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लंकाकाण्ड · क्रमांक 33

अंगद की स्पष्ट चेतावनी

चौपाइयाँ — मूल पाठ

एहि बिधि बेगि सूभट सब धावहु। खाहु भालु कपि जहँ जहँ पावहु ॥ मर्कटहीन करहु महि जाई। जिअत धरहु तापस द्वौ भाई ॥ पुनि सकोप बोलेउ जुबराजा। गाल बजावत तोहि न लाजा ॥ मरु गर काटि निलज कुलघाती। बल बिलोकि बिहरति नहिं छाती ॥ रे त्रिय चोर कुमारग गामी। खल मल रासि मंदमति कामी ॥ सन्यपात जल्पसि दुर्बादा। भएसि कालबस खल मनुजादा ॥ याको फलु पावहिगो आगें। बानर भालु चपेटन्हि लागें ॥ रामु मनुज बोलत असि बानी। गिरहिं न तव रसना अभिमानी ॥ गिरिहहिं रसना संसय नाहीं। सिरन्हि समेत समर महि माहीं ॥

सोरठा — मूल पाठ

सो नर क्यों दसकंध बालि बध्यो जेहिं एक सर। बीसहुँ लोचन अंध धिग तव जन्म कुजाति जड़ ॥ ३३(क) ॥

सोरठा — मूल पाठ

तब सोनित की प्यास तृषित राम सायक निकर। तजउँ तोहि तेहि त्रास कटु जल्पक निसिचर अधम ॥ ३३(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

रावण के आदेश पर वीर दौड़ते हैं। अंगद उसे पराई स्त्री का अपहरण करने वाला और कुमार्गगामी कहकर धिक्कारते हैं। बालि को एक बाण से मारने वाले श्रीराम को मनुष्य कहने की मूर्खता बताते और आगामी युद्ध का परिणाम चेताते हैं। उनकी वाणी कठोर है, पर वे कहते हैं कि प्रभु के बाणों का मान रखकर अभी उसे छोड़ रहे हैं।

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लंकाकाण्ड · क्रमांक 34

अंगद का अचल चरण

चौपाइयाँ — मूल पाठ

मै तव दसन तोरिबे लायक। आयसु मोहि न दीन्ह रघुनायक ॥ असि रिस होति दसउ मुख तोरौं। लंका गहि समुद्र महँ बोरौं ॥ गूलरि फल समान तव लंका। बसहु मध्य तुम्ह जंतु असंका ॥ मैं बानर फल खात न बारा। आयसु दीन्ह न राम उदारा ॥ जुगति सुनत रावन मुसुकाई। मूढ़ सिखिहि कहँ बहुत झुठाई ॥ बालि न कबहुँ गाल अस मारा। मिलि तपसिन्ह तैं भएसि लबारा ॥ साँचेहुँ मैं लबार भुज बीहा। जौं न उपारिउँ तव दस जीहा ॥ समुझि राम प्रताप कपि कोपा। सभा माझ पन करि पद रोपा ॥ जौं मम चरन सकसि सठ टारी। फिरहिं रामु सीता मैं हारी ॥ सुनहु सुभट सब कह दससीसा। पद गहि धरनि पछारहु कीसा ॥ इंद्रजीत आदिक बलवाना। हरषि उठे जहँ तहँ भट नाना ॥ झपटहिं करि बल बिपुल उपाई। पद न टरइ बैठहिं सिरु नाई ॥ पुनि उठि झपटहीं सुर आराती। टरइ न कीस चरन एहि भाँती ॥ पुरुष कुजोगी जिमि उरगारी। मोह बिटप नहिं सकहिं उपारी ॥

दोहा — मूल पाठ

कोटिन्ह मेघनाद सम सुभट उठे हरषाइ। झपटहिं टरै न कपि चरन पुनि बैठहिं सिर नाइ ॥ ३४(क) ॥

दोहा — मूल पाठ

भूमि न छाँडत कपि चरन देखत रिपु मद भाग ॥ कोटि बिघ्न ते संत कर मन जिमि नीति न त्याग ॥ ३४(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

अंगद कहते हैं कि रावण की लंका उनके लिए गूलर के फल जैसी छोटी है, पर प्रभु ने बलपूर्वक कार्य की आज्ञा नहीं दी। रावण के उपहास पर वे सभा में चरण रोपकर उसे हटाने की चुनौती देते हैं। मेघनाद समेत अनेक योद्धा प्रयत्न करते हैं, पर चरण नहीं हिलता। उसकी स्थिरता संत के नीति में अडिग मन की उपमा बनती है।

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लंकाकाण्ड · क्रमांक 35

रावण को रामचरण पकड़ने का संदेश

चौपाइयाँ — मूल पाठ

कपि बल देखि सकल हियँ हारे। उठा आपु कपि कें परचारे ॥ गहत चरन कह बालिकुमारा। मम पद गहें न तोर उबारा ॥ गहसि न राम चरन सठ जाई। सुनत फिरा मन अति सकुचाई ॥ भयउ तेजहत श्री सब गई। मध्य दिवस जिमि ससि सोहई ॥ सिंघासन बैठेउ सिर नाई। मानहुँ संपति सकल गँवाई ॥ जगदातमा प्रानपति रामा। तासु बिमुख किमि लह बिश्रामा ॥ उमा राम की भृकुटि बिलासा। होइ बिस्व पुनि पावइ नासा ॥ तृन ते कुलिस कुलिस तृन करई। तासु दूत पन कहु किमि टरई ॥ पुनि कपि कही नीति बिधि नाना। मान न ताहि कालु निअराना ॥ रिपु मद मथि प्रभु सुजसु सुनायो। यह कहि चल्यो बालि नृप जायो ॥ हतौं न खेत खेलाइ खेलाई। तोहि अबहिं का करौं बड़ाई ॥ प्रथमहिं तासु तनय कपि मारा। सो सुनि रावन भयउ दुखारा ॥ जातुधान अंगद पन देखी। भय ब्याकुल सब भए बिसेषी ॥

दोहा — मूल पाठ

रिपु बल धरषि हरषि कपि बालितनय बल पुंज। पुलक सरीर नयन जल गहे राम पद कंज ॥ ३५(क) ॥

दोहा — मूल पाठ

साँझ जानि दसकंधर भवन गयउ बिलखाइ। मंदोदरी रावनहि बहुरि कहा समुझाइ ॥ ३५(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

रावण स्वयं चरण हटाने उठता है तो अंगद कहते हैं कि उनका पैर पकड़ने से उद्धार नहीं; वह श्रीराम के चरण पकड़े। रावण लज्जित और तेजहीन होकर लौट बैठता है। प्रभु की कृपा से दूत का प्रण अटल रहता है। अंगद फिर हित-नीति समझाकर वापस आते और भावविह्वल होकर रामचरण पकड़ते हैं। रावण संध्या में व्यथित घर लौटता है।

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लंकाकाण्ड · क्रमांक 36

मंदोदरी की अंतिम हित-चेतावनियाँ

चौपाइयाँ — मूल पाठ

कंत समुझि मन तजहु कुमतिही। सोह न समर तुम्हहि रघुपतिही ॥ रामानुज लघु रेख खचाई। सोउ नहिं नाघेहु असि मनुसाई ॥ पिय तुम्ह ताहि जितब संग्रामा। जाके दूत केर यह कामा ॥ कौतुक सिंधु नाघी तव लंका। आयउ कपि केहरी असंका ॥ रखवारे हति बिपिन उजारा। देखत तोहि अच्छ तेहिं मारा ॥ जारि सकल पुर कीन्हेसि छारा। कहाँ रहा बल गर्ब तुम्हारा ॥ अब पति मृषा गाल जनि मारहु। मोर कहा कछु हृदयँ बिचारहु ॥ पति रघुपतिहि नृपति जनि मानहु। अग जग नाथ अतुल बल जानहु ॥ बान प्रताप जान मारीचा। तासु कहा नहिं मानेहि नीचा ॥ जनक सभाँ अगनित भूपाला। रहे तुम्हउ बल अतुल बिसाला ॥ भंजि धनुष जानकी बिआही। तब संग्राम जितेहु किन ताही ॥ सुरपति सुत जानइ बल थोरा। राखा जिअत आँखि गहि फोरा ॥ सूपनखा कै गति तुम्ह देखी। तदपि हृदयँ नहिं लाज बिषेषी ॥

दोहा — मूल पाठ

बधि बिराध खर दूषनहि लीँलाँ हत्यो कबंध। बालि एक सर मारयो तेहि जानहु दसकंध ॥ ३६ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

मंदोदरी रावण को कुमति छोड़ने को कहती हैं। वे लक्ष्मण की रेखा, हनुमान के लंका-दहन, अक्षयकुमार-वध, मारीच की चेतावनी, धनुषभंग, जयंत, शूर्पणखा तथा विराध-खर-दूषण-कबंध और बालि के प्रसंग स्मरण कराती हैं। उनका आशय है कि जिनके दूतों और पूर्व कृत्यों का प्रताप वह देख चुका है, उन रघुनाथ को सामान्य राजा मानकर युद्ध करना उचित नहीं है।

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लंकाकाण्ड · क्रमांक 37

काल और विवेक का हरण

चौपाइयाँ — मूल पाठ

जेहिं जलनाथ बँधायउ हेला। उतरे प्रभु दल सहित सुबेला ॥ कारुनीक दिनकर कुल केतू। दूत पठायउ तव हित हेतू ॥ सभा माझ जेहिं तव बल मथा। करि बरूथ महुँ मृगपति जथा ॥ अंगद हनुमत अनुचर जाके। रन बाँकुरे बीर अति बाँके ॥ तेहि कहँ पिय पुनि पुनि नर कहहू। मुधा मान ममता मद बहहू ॥ अहह कंत कृत राम बिरोधा। काल बिबस मन उपज न बोधा ॥ काल दंड गहि काहु न मारा। हरइ धर्म बल बुद्धि बिचारा ॥ निकट काल जेहि आवत साईं। तेहि भ्रम होइ तुम्हारिहि नाईं ॥

दोहा — मूल पाठ

दुइ सुत मरे दहेउ पुर अजहुँ पूर पिय देहु। कृपासिंधु रघुनाथ भजि नाथ बिमल जसु लेहु ॥ ३७ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

मंदोदरी राम के सेतु, सेना, करुणा और अंगद-हनुमान के पराक्रम का स्मरण कराती हैं। वे कहती हैं कि काल केवल डंडे से नहीं मारता; धर्म, बल, बुद्धि और विचार हर लेता है। नगर जल चुका और पुत्र मारे जा चुके हैं, इसलिए अभी भी प्रभु की शरण लेकर पवित्र यश प्राप्त किया जा सकता है। रावण इस अंतिम अवसर की भी उपेक्षा करता है।

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लंकाकाण्ड · क्रमांक 38

चार मुकुटों का नीतिपरक अर्थ

चौपाइयाँ — मूल पाठ

नारि बचन सुनि बिसिख समाना। सभाँ गयउ उठि होत बिहाना ॥ बैठ जाइ सिंघासन फूली। अति अभिमान त्रास सब भूली ॥ इहाँ राम अंगदहि बोलावा। आइ चरन पंकज सिरु नावा ॥ अति आदर सपीप बैठारी। बोले बिहँसि कृपाल खरारी ॥ बालितनय कौतुक अति मोही। तात सत्य कहु पूछउँ तोही ॥ । रावनु जातुधान कुल टीका। भुज बल अतुल जासु जग लीका ॥ तासु मुकुट तुम्ह चारि चलाए। कहहु तात कवनी बिधि पाए ॥ सुनु सर्बग्य प्रनत सुखकारी। मुकुट न होहिं भूप गुन चारी ॥ साम दान अरु दंड बिभेदा। नृप उर बसहिं नाथ कह बेदा ॥ नीति धर्म के चरन सुहाए। अस जियँ जानि नाथ पहिं आए ॥

दोहा — मूल पाठ

धर्महीन प्रभु पद बिमुख काल बिबस दससीस। तेहि परिहरि गुन आए सुनहु कोसलाधीस ॥ ३८(क) ॥

दोहा — मूल पाठ

परम चतुरता श्रवन सुनि बिहँसे रामु उदार। समाचार पुनि सब कहे गढ़ के बालिकुमार ॥ ३८(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

रावण सुबह फिर अभिमान सहित सभा में बैठता है। उधर श्रीराम अंगद से पूछते हैं कि वे उसके चार मुकुट कैसे लाए। अंगद उन्हें साम, दान, दंड और भेद के चार राजगुण बताते हैं। धर्महीन और प्रभुविमुख रावण को छोड़ ये गुण मानो प्रभु के पास आए हैं। श्रीराम उनकी चतुराई पर मुस्कराते और लंका के समाचार सुनते हैं।

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लंकाकाण्ड · क्रमांक 39

चार द्वारों पर आक्रमण की व्यवस्था

चौपाइयाँ — मूल पाठ

रिपु के समाचार जब पाए। राम सचिव सब निकट बोलाए ॥ लंका बाँके चारि दुआरा। केहि बिधि लागिअ करहु बिचारा ॥ तब कपीस रिच्छेस बिभीषन। सुमिरि हृदयँ दिनकर कुल भूषन ॥ करि बिचार तिन्ह मंत्र दृढ़ावा। चारि अनी कपि कटकु बनावा ॥ जथाजोग सेनापति कीन्हे। जूथप सकल बोलि तब लीन्हे ॥ प्रभु प्रताप कहि सब समुझाए। सुनि कपि सिंघनाद करि धाए ॥ हरषित राम चरन सिर नावहिं। गहि गिरि सिखर बीर सब धावहिं ॥ गर्जहिं तर्जहिं भालु कपीसा। जय रघुबीर कोसलाधीसा ॥ जानत परम दुर्ग अति लंका। प्रभु प्रताप कपि चले असंका ॥ घटाटोप करि चहुँ दिसि घेरी। मुखहिं निसान बजावहीं भेरी ॥

दोहा — मूल पाठ

जयति राम जय लछिमन जय कपीस सुग्रीव। गर्जहिं सिंघनाद कपि भालु महा बल सींव ॥ ३९ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

श्रीराम लंका के चार दुर्गम द्वारों पर चढ़ाई की नीति पूछते हैं। सुग्रीव, जामवंत और विभीषण विचार करके सेना के चार दल तथा उचित सेनापति निर्धारित करते हैं। वानर-भालू प्रभु का प्रताप सुनकर उत्साह से जयघोष करते हैं। वे पर्वत-शिखर लेकर दुर्ग की चारों दिशाओं को घेरते और राम-लक्ष्मण-सुग्रीव की जय बोलते हैं।

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लंकाकाण्ड · क्रमांक 40

राक्षस सेना की तैयारी

चौपाइयाँ — मूल पाठ

लंकाँ भयउ कोलाहल भारी। सुना दसानन अति अहँकारी ॥ देखहु बनरन्ह केरि ढिठाई। बिहँसि निसाचर सेन बोलाई ॥ आए कीस काल के प्रेरे। छुधावंत सब निसिचर मेरे ॥ अस कहि अट्टहास सठ कीन्हा। गृह बैठे अहार बिधि दीन्हा ॥ सुभट सकल चारिहुँ दिसि जाहू। धरि धरि भालु कीस सब खाहू ॥ उमा रावनहि अस अभिमाना। जिमि टिट्टिभ खग सूत उताना ॥ चले निसाचर आयसु मागी। गहि कर भिंडिपाल बर साँगी ॥ तोमर मुग्दर परसु प्रचंडा। सुल कृपान परिघ गिरिखंडा ॥ जिमि अरुनोपल निकर निहारी। धावहिं सठ खग मांस अहारी ॥ चोंच भंग दुख तिन्हहि न सूझा। तिमि धाए मनुजाद अबूझा ॥

दोहा — मूल पाठ

नानायुध सर चाप धर जातुधान बल बीर। कोट कँगूरन्हि चढ़ि गए कोटि कोटि रनधीर ॥ ४० ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

रावण वानरों का आक्रमण सुनकर हँसता और उन्हें भूखे राक्षसों का भोजन बताता है। शिव उसके अभिमान को छोटे पक्षी की निराधार अकड़ की उपमा देते हैं। राक्षस विविध अस्त्र लेकर कंगूरों पर चढ़ते हैं। जैसे मांस समझकर लाल पत्थरों पर झपटने वाला पक्षी चोंच टूटने का संकट नहीं समझता, वैसे वे भी सामने की शक्ति नहीं पहचानते।

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लंकाकाण्ड · क्रमांक 41

लंका दुर्ग पर भीषण युद्ध

चौपाइयाँ — मूल पाठ

कोट कँगूरन्हि सोहहिं कैसे। मेरु के सृंगनि जनु घन बैसे ॥ बाजहिं ढोल निसान जुझाऊ। सुनि धुनि होइ भटन्हि मन चाऊ ॥ बाजहिं भेरि नफीरि अपारा। सुनि कादर उर जाहिं दरारा ॥ देखिन्ह जाइ कपिन्ह के ठट्टा। अति बिसाल तनु भालु सुभट्टा ॥ धावहिं गनहिं न अवघट घाटा। पर्बत फोरि करहिं गहि बाटा ॥ कटकटाहिं कोटिन्ह भट गर्जहिं। दसन ओठ काटहिं अति तर्जहिं ॥ उत रावन इत राम दोहाई। जयति जयति जय परी लराई ॥ निसिचर सिखर समूह ढहावहिं। कूदि धरहिं कपि फेरि चलावहिं ॥

छंद — मूल पाठ

धरि कुधर खंड प्रचंड मर्कट भालु गढ़ पर डारहीं। झपटहिं चरन गहि पटकि महि भजि चलत बहुरि पचारहीं ॥ अति तरल तरुन प्रताप तरपहिं तमकि गढ़ चढ़ि चढ़ि गए। कपि भालु चढ़ि मंदिरन्ह जहँ तहँ राम जसु गावत भए ॥

दोहा — मूल पाठ

एकु एकु निसिचर गहि पुनि कपि चले पराइ। ऊपर आपु हेठ भट गिरहिं धरनि पर आइ ॥ ४१ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

दुर्ग के कंगूरों पर राक्षस, बाहर विशाल भालू-वानर और चारों ओर रणवाद्य का वर्णन है। दोनों दल जयघोष करके भिड़ते हैं। राक्षस शिखर गिराते हैं तो वानर उन्हें पकड़कर वापस फेंकते हैं। छंद में वानरों-भालुओं का गढ़ पर चढ़ना और रामयश गाना है। वे राक्षसों को पकड़कर ऊँचाई से नीचे गिराते हैं।

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लंकाकाण्ड · क्रमांक 42

रावण की धमकी और फिर आक्रमण

चौपाइयाँ — मूल पाठ

राम प्रताप प्रबल कपिजूथा। मर्दहिं निसिचर सुभट बरूथा ॥ चढ़े दुर्ग पुनि जहँ तहँ बानर। जय रघुबीर प्रताप दिवाकर ॥ चले निसाचर निकर पराई। प्रबल पवन जिमि घन समुदाई ॥ हाहाकार भयउ पुर भारी। रोवहिं बालक आतुर नारी ॥ सब मिलि देहिं रावनहि गारी। राज करत एहिं मृत्यु हँकारी ॥ निज दल बिचल सुनी तेहिं काना। फेरि सुभट लंकेस रिसाना ॥ जो रन बिमुख सुना मैं काना। सो मैं हतब कराल कृपाना ॥ सर्बसु खाइ भोग करि नाना। समर भूमि भए बल्लभ प्राना ॥ उग्र बचन सुनि सकल डेराने। चले क्रोध करि सुभट लजाने ॥ सन्मुख मरन बीर कै सोभा। तब तिन्ह तजा प्रान कर लोभा ॥

दोहा — मूल पाठ

बहु आयुध धर सुभट सब भिरहिं पचारि पचारि। ब्याकुल किए भालु कपि परिघ त्रिसूलन्हि मारी ॥ ४२ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

रामप्रताप से वानर-सेना राक्षसों को खदेड़ती है। नगर में भय और विलाप फैलता है; लोग युद्ध बुलाने के लिए रावण को दोष देते हैं। अपनी सेना का पलायन सुनकर वह पीठ दिखाने वालों को स्वयं मारने की धमकी देता है। भय और लज्जा से राक्षस फिर शस्त्र लेकर लौटते हैं और वानरों-भालुओं को व्याकुल कर देते हैं।

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लंकाकाण्ड · क्रमांक 43

हनुमान का मेघनाद पर प्रहार

चौपाइयाँ — मूल पाठ

भय आतुर कपि भागन लागे। जद्यपि उमा जीतिहहिं आगे ॥ कोउ कह कहँ अंगद हनुमंता। कहँ नल नील दुबिद बलवंता ॥ निज दल बिकल सुना हनुमाना। पच्छिम द्वार रहा बलवाना ॥ मेघनाद तहँ करइ लराई। टूट न द्वार परम कठिनाई ॥ पवनतनय मन भा अति क्रोधा। गर्जेउ प्रबल काल सम जोधा ॥ कूदि लंक गढ़ ऊपर आवा। गहि गिरि मेघनाद कहुँ धावा ॥ भंजेउ रथ सारथी निपाता। ताहि हृदय महुँ मारेसि लाता ॥ दुसरें सूत बिकल तेहि जाना। स्यंदन घालि तुरत गृह आना ॥

दोहा — मूल पाठ

अंगद सुना पवनसुत गढ़ पर गयउ अकेल। रन बाँकुरा बालिसुत तरकि चढ़ेउ कपि खेल ॥ ४३ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

संकटग्रस्त वानर अंगद, हनुमान और अन्य वीरों को पुकारते हैं। पश्चिम द्वार पर लड़ रहे हनुमान क्रुद्ध होकर गढ़ पर चढ़ते और मेघनाद पर धावा बोलते हैं। वे उसका रथ नष्ट कर सारथी मारते तथा लात से उसे घायल करते हैं। दूसरा सारथी उसे घर ले जाता है। हनुमान को अकेला गढ़ पर गया सुनकर अंगद भी वहाँ पहुँचते हैं।

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लंकाकाण्ड · क्रमांक 44

अंगद और हनुमान का संयुक्त पराक्रम

चौपाइयाँ — मूल पाठ

जुद्ध बिरुद्ध क्रुद्ध द्वौ बंदर। राम प्रताप सुमिरि उर अंतर ॥ रावन भवन चढ़े द्वौ धाई। करहि कोसलाधीस दोहाई ॥ कलस सहित गहि भवनु ढहावा। देखि निसाचरपति भय पावा ॥ नारि बृंद कर पीटहिं छाती। अब दुइ कपि आए उतपाती ॥ कपिलीला करि तिन्हहि डेरावहिं। रामचंद्र कर सुजसु सुनावहिं ॥ पुनि कर गहि कंचन के खंभा। कहेन्हि करिअ उतपात अरंभा ॥ गर्जि परे रिपु कटक मझारी। लागे मर्दै भुज बल भारी ॥ काहुहि लात चपेटन्हि केहू। भजहु न रामहि सो फल लेहू ॥

दोहा — मूल पाठ

एक एक सों मर्दहिं तोरि चलावहिं मुंड। रावन आगें परहिं ते जनु फूटहिं दधि कुंड ॥ ४४ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

दोनों वीर रामप्रताप का स्मरण करके रावण के भवन पर चढ़ते और ऊपरी निर्माण गिराते हैं। राक्षसों में भय बढ़ता है। स्वर्ण-स्तंभ लेकर वे सेना में उतरते और अनेक शत्रुओं को परास्त करते हैं। उनके प्रहार से कटे सिर रावण के सामने गिरते हैं। प्रसंग में उनका उत्साह, भुजबल और प्रभु के यश का घोष प्रमुख है।

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लंकाकाण्ड · क्रमांक 45

शत्रुओं पर भी प्रभु की कृपा

चौपाइयाँ — मूल पाठ

महा महा मुखिआ जे पावहिं। ते पद गहि प्रभु पास चलावहिं ॥ कहइ बिभीषनु तिन्ह के नामा। देहिं राम तिन्हहू निज धामा ॥ खल मनुजाद द्विजामिष भोगी। पावहिं गति जो जाचत जोगी ॥ उमा राम मृदुचित करुनाकर। बयर भाव सुमिरत मोहि निसिचर ॥ देहिं परम गति सो जियँ जानी। अस कृपाल को कहहु भवानी ॥ अस प्रभु सुनि न भजहिं भ्रम त्यागी। नर मतिमंद ते परम अभागी ॥ अंगद अरु हनुमंत प्रबेसा। कीन्ह दुर्ग अस कह अवधेसा ॥ लंकाँ द्वौ कपि सोहहिं कैसें। मथहि सिंधु दुइ मंदर जैसें ॥

दोहा — मूल पाठ

भुज बल रिपु दल दलमलि देखि दिवस कर अंत। कूदे जुगल बिगत श्रम आए जहँ भगवंत ॥ ४५ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

दोनों वानर बड़े राक्षसों को पकड़कर प्रभु के पास फेंकते हैं। विभीषण नाम बताते हैं और श्रीराम उन्हें गति देते हैं। शिव इस करुणा की व्याख्या करते हैं कि वैरभाव से स्मरण करने वालों पर भी प्रभु कृपा करते हैं। अंगद-हनुमान दुर्ग में ऐसे शोभते हैं जैसे दो मंदर पर्वत समुद्र मथ रहे हों। दिन ढलने पर वे प्रभु के पास लौटते हैं।

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लंकाकाण्ड · क्रमांक 46

रात्रि की मायावी अंधकार-लीला

चौपाइयाँ — मूल पाठ

प्रभु पद कमल सीस तिन्ह नाए। देखि सुभट रघुपति मन भाए ॥ राम कृपा करि जुगल निहारे। भए बिगतश्रम परम सुखारे ॥ गए जानि अंगद हनुमाना। फिरे भालु मर्कट भट नाना ॥ जातुधान प्रदोष बल पाई। धाए करि दससीस दोहाई ॥ निसिचर अनी देखि कपि फिरे। जहँ तहँ कटकटाइ भट भिरे ॥ द्वौ दल प्रबल पचारि पचारी। लरत सुभट नहिं मानहिं हारी ॥ महाबीर निसिचर सब कारे। नाना बरन बलीमुख भारे ॥ सबल जुगल दल समबल जोधा। कौतुक करत लरत करि क्रोधा ॥ प्राबिट सरद पयोद घनेरे। लरत मनहुँ मारुत के प्रेरे ॥ अनिप अकंपन अरु अतिकाया। बिचलत सेन कीन्हि इन्ह माया ॥ भयउ निमिष महँ अति अँधियारा। बृष्टि होइ रुधिरोपल छारा ॥

दोहा — मूल पाठ

देखि निबिड़ तम दसहुँ दिसि कपिदल भयउ खभार। एकहि एक न देखई जहँ तहँ करहिं पुकार ॥ ४६ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

प्रभु के कृपादर्शन से अंगद-हनुमान और लौटते वानरों का श्रम मिटता है। संध्या में राक्षस बल पाकर फिर आक्रमण करते हैं और दोनों दल भीषण युद्ध करते हैं। शत्रु मायावी उपाय से घना अंधकार, रक्त, पत्थर और राख की वर्षा करते हैं। वानर एक-दूसरे को भी न देख पाने से व्याकुल होकर पुकारते हैं।

↑ क्रम-सूची पर लौटें
लंकाकाण्ड · क्रमांक 47

अग्निबाण से अंधकार का नाश

चौपाइयाँ — मूल पाठ

सकल मरमु रघुनायक जाना। लिए बोलि अंगद हनुमाना ॥ समाचार सब कहि समुझाए। सुनत कोऽपि कपिकुंजर धाए ॥ पुनि कृपाल हँसि चाप चढ़ावा। पावक सायक सपदि चलावा ॥ भयउ प्रकास कतहुँ तम नाहीं। ग्यान उदयँ जिमि संसय जाहीं ॥ भालु बलीमुख पाइ प्रकासा। धाए हरष बिगत श्रम त्रासा ॥ हनूमान अंगद रन गाजे। हाँक सुनत रजनीचर भाजे ॥ भागत पट पटकहिं धरि धरनी। करहिं भालु कपि अद्भुत करनी ॥ गहि पद डारहिं सागर माहीं। मकर उरग झष धरि धरि खाहीं ॥

दोहा — मूल पाठ

कछु मारे कछु घायल कछु गढ़ चढ़े पराइ। गर्जहिं भालु बलीमुख रिपु दल बल बिचलाइ ॥ ४७ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

श्रीराम पूरी परिस्थिति जानकर अंगद-हनुमान को बुलाते और भेजते हैं। फिर अग्निबाण चलाकर अंधकार मिटा देते हैं; यह ज्ञान के उदय से संशय मिटने जैसा है। प्रकाश पाकर वानर-भालू हर्षित होकर फिर लड़ते हैं। अंगद और हनुमान के प्रहार से राक्षस भागते, घायल होते या गढ़ में छिपते हैं। सेना का उत्साह लौट आता है।

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लंकाकाण्ड · क्रमांक 48

माल्यवान की नीति-सलाह

चौपाइयाँ — मूल पाठ

निसा जानि कपि चारिउ अनी। आए जहाँ कोसला धनी ॥ राम कृपा करि चितवा सबही। भए बिगतश्रम बानर तबही ॥ उहाँ दसानन सचिव हँकारे। सब सन कहेसि सुभट जे मारे ॥ आधा कटकु कपिन्ह संघारा। कहहु बेगि का करिअ बिचारा ॥ माल्यवंत अति जरठ निसाचर। रावन मातु पिता मंत्री बर ॥ बोला बचन नीति अति पावन। सुनहु तात कछु मोर सिखावन ॥ जब ते तुम्ह सीता हरि आनी। असगुन होहिं न जाहिं बखानी ॥ बेद पुरान जासु जसु गायो। राम बिमुख काहुँ न सुख पायो ॥

दोहा — मूल पाठ

हिरन्याच्छ भ्राता सहित मधु कैटभ बलवान। जेहि मारे सोइ अवतरेउ कृपासिंधु भगवान ॥ ४८(क) ॥

दोहा — मूल पाठ

कालरूप खल बन दहन गुनागार घनबोध। सिव बिरंचि जेहि सेवहिं तासों कवन बिरोध ॥ ४८(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

रात में वानरों के लौटने पर प्रभु कृपा से उनका श्रम दूर करते हैं। रावण अपनी सेना की भारी हानि पर परामर्श माँगता है। वृद्ध माल्यवान सीताहरण के बाद से दिख रहे अशुभ संकेत बताते और प्रभुविरोध में किसी को सुख न मिलने की बात कहते हैं। वे पूर्व असुर-वध स्मरण कराकर श्रीराम को कृपासिंधु भगवान तथा कालरूप जानने की सलाह देते हैं।

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लंकाकाण्ड · क्रमांक 49

माल्यवान का अपमान और मेघनाद का प्रस्थान

चौपाइयाँ — मूल पाठ

परिहरि बयरु देहु बैदेही। भजहु कृपानिधि परम सनेही ॥ ताके बचन बान सम लागे। करिआ मुह करि जाहि अभागे ॥ बूढ़ भएसि न त मरतेउँ तोही। अब जनि नयन देखावसि मोही ॥ तेहि अपने मन अस अनुमाना। बध्यो चहत एहि कृपानिधाना ॥ सो उठि गयउ कहत दुर्बादा। तब सकोप बोलेउ घननादा ॥ कौतुक प्रात देखिअहु मोरा। करिहउँ बहुत कहौं का थोरा ॥ सुनि सुत बचन भरोसा आवा। प्रीति समेत अंक बैठावा ॥ करत बिचार भयउ भिनुसारा। लागे कपि पुनि चहूँ दुआरा ॥ कोऽपि कपिन्ह दुर्घट गढ़ु घेरा। नगर कोलाहलु भयउ घनेरा ॥ बिबिधायुध धर निसिचर धाए। गढ़ ते पर्बत सिखर ढहाए ॥

छंद — मूल पाठ

ढाहे महीधर सिखर कोटिन्ह बिबिध बिधि गोला चले। घहरात जिमि पबिपात गर्जत जनु प्रलय के बादले ॥ मर्कट बिकट भट जुटत कटत न लटत तन जर्जर भए। गहि सैल तेहि गढ़ पर चलावहिं जहँ सो तहँ निसिचर हए ॥

दोहा — मूल पाठ

मेघनाद सुनि श्रवन अस गढ़ु पुनि छेंका आइ। उतर्यो बीर दुर्ग तें सन्मुख चल्यो बजाइ ॥ ४९ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

माल्यवान सीताजी को लौटाकर राम की शरण लेने की सलाह देता है, पर रावण उसे अपमानित करता है। मेघनाद अपने पराक्रम का विश्वास दिलाता है। अगली सुबह फिर घोर युद्ध होता है और मेघनाद दुर्ग से निकलकर युद्धभूमि में आता है।

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लंकाकाण्ड · क्रमांक 50

मेघनाद की बाणवर्षा

चौपाइयाँ — मूल पाठ

कहँ कोसलाधीस द्वौ भ्राता। धन्वी सकल लोक बिख्याता ॥ कहँ नल नील दुबिद सुग्रीवा। अंगद हनूमंत बल सींवा ॥ कहाँ बिभीषनु भ्राताद्रोही। आजु सबहि हठि मारउँ ओही ॥ अस कहि कठिन बान संधाने। अतिसय क्रोध श्रवन लगि ताने ॥ सर समुह सो छाड़ै लागा। जनु सपच्छ धावहिं बहु नागा ॥ जहँ तहँ परत देखिअहिं बानर। सन्मुख होइ न सके तेहि अवसर ॥ जहँ तहँ भागि चले कपि रीछा। बिसरी सबहि जुद्ध कै ईछा ॥ सो कपि भालु न रन महँ देखा। कीन्हेसि जेहि न प्रान अवसेषा ॥

दोहा — मूल पाठ

दस दस सर सब मारेसि परे भूमि कपि बीर। सिंहनाद करि गर्जा मेघनाद बल धीर ॥ ५० ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

मेघनाद राम-लक्ष्मण और प्रमुख वानर योद्धाओं को ललकारता है। उसके तीखे बाणों से वानर-भालू घायल होकर गिरते हैं। सेना विचलित होती है और वह अपने बल का गर्व करके गर्जना करता है।

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लंकाकाण्ड · क्रमांक 51

हनुमान का प्रहार और राम के सामने निष्फल अस्त्र

चौपाइयाँ — मूल पाठ

देखि पवनसुत कटक बिहाला। क्रोधवंत जनु धायउ काला ॥ महासैल एक तुरत उपारा। अति रिस मेघनाद पर डारा ॥ आवत देखि गयउ नभ सोई। रथ सारथी तुरग सब खोई ॥ बार बार पचार हनुमाना। निकट न आव मरमु सो जाना ॥ रघुपति निकट गयउ घननादा। नाना भाँति करेसि दुर्बादा ॥ अस्त्र सस्त्र आयुध सब डारे। कौतुकहीं प्रभु काटि निवारे ॥ देखि प्रताप मूढ़ खिसिआना। करै लाग माया बिधि नाना ॥ जिमि कोउ करै गरुड़ सैं खेला। डरपावै गहि स्वल्प सपेला ॥

दोहा — मूल पाठ

जासु प्रबल माया बल सिव बिरंचि बड़ छोट। ताहि दिखावइ निसिचर निज माया मति खोट ॥ ५१ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

सेना को व्याकुल देखकर हनुमान पर्वत फेंकते हैं। मेघनाद आकाश में बच निकलता है, पर उसका रथ नष्ट हो जाता है। फिर वह राम पर अनेक अस्त्र और माया का प्रयोग करता है। तुलसीदास उसकी भूल बताते हैं कि वह सर्वशक्तिमान प्रभु को अपनी माया से डराना चाहता है।

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लंकाकाण्ड · क्रमांक 52

राम के बाण से माया का नाश

चौपाइयाँ — मूल पाठ

नभ चढ़ि बरष बिपुल अंगारा। महि ते प्रगट होहिं जलधारा ॥ नाना भाँति पिसाच पिसाची। मारु काटु धुनि बोलहिं नाची ॥ बिष्टा पूय रुधिर कच हाड़ा। बरषइ कबहुँ उपल बहु छाड़ा ॥ बरषि धूरि कीन्हेसि अँधिआरा। सूझ न आपन हाथ पसारा ॥ कपि अकुलाने माया देखें। सब कर मरन बना एहि लेखें ॥ कौतुक देखि राम मुसुकाने। भए सभीत सकल कपि जाने ॥ एक बान काटी सब माया। जिमि दिनकर हर तिमिर निकाया ॥ कृपादृष्टि कपि भालु बिलोके। भए प्रबल रन रहहिं न रोके ॥

दोहा — मूल पाठ

आयसु मागि राम पहिं अंगदादि कपि साथ। लछिमन चले क्रुद्ध होइ बान सरासन हाथ ॥ ५२ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

मेघनाद भयानक दृश्य, अंगारों की वर्षा और घना अंधकार उत्पन्न करता है। वानर भयभीत होते हैं, पर राम एक बाण से सारी माया मिटा देते हैं। उनकी कृपादृष्टि से सेना फिर बलवान होती है। लक्ष्मण आज्ञा लेकर अंगद आदि के साथ युद्ध करने चलते हैं।

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लंकाकाण्ड · क्रमांक 53

दोनों सेनाओं का घोर संग्राम

चौपाइयाँ — मूल पाठ

छतज नयन उर बाहु बिसाला। हिमगिरि निभ तनु कछु एक लाला ॥ इहाँ दसानन सुभट पठाए। नाना अस्त्र सस्त्र गहि धाए ॥ भूधर नख बिटपायुध धारी। धाए कपि जय राम पुकारी ॥ भिरे सकल जोरिहि सन जोरी। इत उत जय इच्छा नहिं थोरी ॥ मुठिकन्ह लातन्ह दातन्ह काटहिं। कपि जयसील मारि पुनि डाटहिं ॥ मारु मारु धरु धरु धरु मारू। सीस तोरि गहि भुजा उपारू ॥ असि रव पूरि रही नव खंडा। धावहिं जहँ तहँ रुंड प्रचंडा ॥ देखहिं कौतुक नभ सुर बृंदा। कबहुँक बिसमय कबहुँ अनंदा ॥

दोहा — मूल पाठ

रुधिर गाड़ भरि भरि जम्यो ऊपर धूरि उड़ाइ। जनु अँगार रासिन्ह पर मृतक धूम रह्यो छाइ ॥ ५३ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

लक्ष्मण युद्धभूमि में पहुँचते हैं और रावण भी अपने योद्धा भेजता है। वानर पर्वत, वृक्ष और नखों से लड़ते हैं। रणभूमि में भीषण प्रहार होते हैं; आकाश से देवता इस युद्ध को कभी विस्मय और कभी प्रसन्नता से देखते हैं।

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लंकाकाण्ड · क्रमांक 54

लक्ष्मण को वीरघातिनी शक्ति लगना

चौपाइयाँ — मूल पाठ

घायल बीर बिराजहिं कैसे। कुसुमित किंसुक के तरु जैसे ॥ लछिमन मेघनाद द्वौ जोधा। भिरहिं परसपर करि अति क्रोधा ॥ एकहि एक सकइ नहिं जीती। निसिचर छल बल करइ अनीती ॥ क्रोधवंत तब भयउ अनंता। भंजेउ रथ सारथी तुरंता ॥ नाना बिधि प्रहार कर सेषा। राच्छस भयउ प्रान अवसेषा ॥ रावन सुत निज मन अनुमाना। संकठ भयउ हरिहि मम प्राना ॥ बीरघातिनी छाड़िसि साँगी। तेज पुंज लछिमन उर लागी ॥ मुरुछा भई सक्ति के लागें। तब चलि गयउ निकट भय त्यागें ॥

दोहा — मूल पाठ

मेघनाद सम कोटि सत जोधा रहे उठाइ। जगदाधार सेष किमि उठै चले खिसिआइ ॥ ५४ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

लक्ष्मण और मेघनाद का कठोर युद्ध होता है। लक्ष्मण उसका रथ और सारथी नष्ट कर देते हैं। प्राण-संकट देखकर मेघनाद वीरघातिनी शक्ति चलाता है, जिससे लक्ष्मण मूर्छित होते हैं। राक्षस उन्हें उठाने का प्रयत्न करते हैं, पर जगत के आधार शेष को उठा नहीं पाते।

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लंकाकाण्ड · क्रमांक 55

हनुमान लक्ष्मण और वैद्य सुषेण को लाते हैं

चौपाइयाँ — मूल पाठ

सुनु गिरिजा क्रोधानल जासू। जारइ भुवन चारिदस आसू ॥ सक संग्राम जीति को ताही। सेवहिं सुर नर अग जग जाही ॥ यह कौतूहल जानइ सोई। जा पर कृपा राम कै होई ॥ संध्या भइ फिरि द्वौ बाहनी। लगे सँभारन निज निज अनी ॥ ब्यापक ब्रह्म अजित भुवनेस्वर। लछिमन कहाँ बूझ करुनाकर ॥ तब लगि लै आयउ हनुमाना। अनुज देखि प्रभु अति दुख माना ॥ जामवंत कह बैद सुषेना। लंकाँ रहइ को पठई लेना ॥ धरि लघु रूप गयउ हनुमंता। आनेउ भवन समेत तुरंता ॥

दोहा — मूल पाठ

राम पदारबिंद सिर नायउ आइ सुषेन। कहा नाम गिरि औषधी जाहु पवनसुत लेन ॥ ५५ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

हनुमान मूर्छित लक्ष्मण को राम के पास लाते हैं। भाई की दशा देखकर राम दुःखी होते हैं। जाम्बवान की सलाह पर हनुमान लंका से वैद्य सुषेण को घर सहित उठा लाते हैं। सुषेण पर्वत और औषधि का नाम बताकर उन्हें लेने भेजता है।

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लंकाकाण्ड · क्रमांक 56

कालनेमि के पास रावण

चौपाइयाँ — मूल पाठ

राम चरन सरसिज उर राखी। चला प्रभंजन सुत बल भाषी ॥ उहाँ दूत एक मरमु जनावा। रावन कालनेमि गृह आवा ॥ दसमुख कहा मरमु तेहिं सुना। पुनि पुनि कालनेमि सिरु धुना ॥ देखत तुम्हहि नगरु जेहिं जारा। तासु पंथ को रोकन पारा ॥ भजि रघुपति करु हित आपना। छाँड़हु नाथ मृषा जल्पना ॥ नील कंज तनु सुंदर स्यामा। हृदयँ राखु लोचनाभिरामा ॥ मैं तैं मोर मूढ़ता त्यागू। महा मोह निसि सूतत जागू ॥ काल ब्याल कर भच्छक जोई। सपनेहुँ समर कि जीतिअ सोई ॥

दोहा — मूल पाठ

सुनि दसकंठ रिसान अति तेहिं मन कीन्ह बिचार। राम दूत कर मरौं बरु यह खल रत मल भार ॥ ५६ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

हनुमान राम का स्मरण करके औषधि लेने निकलते हैं। उन्हें रोकने के लिए रावण कालनेमि से सहायता चाहता है। कालनेमि पहले राम की शरण जाने की सलाह देता है। रावण के क्रोध से वह सोचता है कि ऐसे दुष्ट के हाथों मरने से रामदूत के हाथों मरना अच्छा है।

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लंकाकाण्ड · क्रमांक 57

मायावी आश्रम और मकरी से मुक्ति

चौपाइयाँ — मूल पाठ

अस कहि चला रचिसि मग माया। सर मंदिर बर बाग बनाया ॥ मारुतसुत देखा सुभ आश्रम। मुनिहि बूझि जल पियौं जाइ श्रम ॥ राच्छस कपट बेष तहँ सोहा। मायापति दूतहि चह मोहा ॥ जाइ पवनसुत नायउ माथा। लाग सो कहै राम गुन गाथा ॥ होत महा रन रावन रामहिं। जितहहिं राम न संसय या महिं ॥ इहाँ भएँ मैं देखेउँ भाई। ग्यान दृष्टि बल मोहि अधिकाई ॥ मागा जल तेहिं दीन्ह कमंडल। कह कपि नहिं अघाउँ थोरें जल ॥ सर मज्जन करि आतुर आवहु। दिच्छा देउँ ग्यान जेहिं पावहु ॥

दोहा — मूल पाठ

सर पैठत कपि पद गहा मकरीं तब अकुलान। मारी सो धरि दिव्य तनु चली गगन चढ़ि जान ॥ ५७ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

कालनेमि मार्ग में सुंदर आश्रम और सरोवर रचकर मुनि का रूप धारण करता है। वह राम की विजय की बातें कहकर हनुमान को विश्वास में लेता और स्नान के बहाने सरोवर में भेजता है। वहाँ मकरी उनका पाँव पकड़ती है। उसके मारे जाने पर दिव्य स्त्री का रूप प्रकट होता है।

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लंकाकाण्ड · क्रमांक 58

कालनेमि-वध और औषधि-पर्वत

चौपाइयाँ — मूल पाठ

कपि तव दरस भइउँ निष्पापा। मिटा तात मुनिबर कर सापा ॥ मुनि न होइ यह निसिचर घोरा। मानहु सत्य बचन कपि मोरा ॥ अस कहि गई अपछरा जबहीं। निसिचर निकट गयउ कपि तबहीं ॥ कह कपि मुनि गुरदछिना लेहू। पाछें हमहि मंत्र तुम्ह देहू ॥ सिर लंगूर लपेटि पछारा। निज तनु प्रगटेसि मरती बारा ॥ राम राम कहि छाड़ेसि प्राना। सुनि मन हरषि चलेउ हनुमाना ॥ देखा सैल न औषध चीन्हा। सहसा कपि उपारि गिरि लीन्हा ॥ गहि गिरि निसि नभ धावत भयऊ। अवधपुरी उपर कपि गयऊ ॥

दोहा — मूल पाठ

देखा भरत बिसाल अति निसिचर मन अनुमानि। बिनु फर सायक मारेउ चाप श्रवन लगि तानि ॥ ५८ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

शाप से मुक्त अप्सरा कालनेमि का भेद बताती है। हनुमान उस कपटी राक्षस का अंत करते हैं और आगे बढ़ते हैं। औषधि पहचान न पाने पर वे पर्वत ही उठा लेते हैं। अयोध्या के ऊपर से जाते समय भरत उन्हें राक्षस समझकर बिना फल वाला बाण चलाते हैं।

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लंकाकाण्ड · क्रमांक 59

भरत और हनुमान का प्रेमपूर्ण मिलन

चौपाइयाँ — मूल पाठ

परेउ मुरुछि महि लागत सायक। सुमिरत राम राम रघुनायक ॥ सुनि प्रिय बचन भरत तब धाए। कपि समीप अति आतुर आए ॥ बिकल बिलोकि कीस उर लावा। जागत नहिं बहु भाँति जगावा ॥ मुख मलीन मन भए दुखारी। कहत बचन भरि लोचन बारी ॥ जेहिं बिधि राम बिमुख मोहि कीन्हा। तेहिं पुनि यह दारुन दुख दीन्हा ॥ जौं मोरें मन बच अरु काया। प्रीति राम पद कमल अमाया ॥ तौ कपि होउ बिगत श्रम सूला। जौं मो पर रघुपति अनुकूला ॥ सुनत बचन उठि बैठ कपीसा। कहि जय जयति कोसलाधीसा ॥

सोरठा — मूल पाठ

लीन्ह कपिहि उर लाइ पुलकित तनु लोचन सजल। प्रीति न हृदयँ समाइ सुमिरि राम रघुकुल तिलक ॥ ५९ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

बाण लगने पर हनुमान रामनाम लेते हुए गिरते हैं। रामनाम सुनकर भरत दौड़ते और उन्हें हृदय से लगाते हैं। अपनी निष्कपट रामभक्ति का स्मरण करके वे हनुमान के स्वस्थ होने की प्रार्थना करते हैं। हनुमान उठकर राम की जय कहते हैं; दोनों का हृदय प्रेम से भर जाता है।

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लंकाकाण्ड · क्रमांक 60

भरत की सहायता और हनुमान का प्रस्थान

चौपाइयाँ — मूल पाठ

तात कुसल कहु सुखनिधान की। सहित अनुज अरु मातु जानकी ॥ कपि सब चरित समास बखाने। भए दुखी मन महुँ पछिताने ॥ अहह दैव मैं कत जग जायउँ। प्रभु के एकहु काज न आयउँ ॥ जानि कुअवसरु मन धरि धीरा। पुनि कपि सन बोले बलबीरा ॥ तात गहरु होइहि तोहि जाता। काजु नसाइहि होत प्रभाता ॥ चढ़ु मम सायक सैल समेता। पठवौं तोहि जहँ कृपानिकेता ॥ सुनि कपि मन उपजा अभिमाना। मोरें भार चलिहि किमि बाना ॥ राम प्रभाव बिचारि बहोरी। बंदि चरन कह कपि कर जोरी ॥

दोहा — मूल पाठ

तव प्रताप उर राखि प्रभु जेहउँ नाथ तुरंत। अस कहि आयसु पाइ पद बंदि चलेउ हनुमंत ॥ ६०(क) ॥

दोहा — मूल पाठ

भरत बाहु बल सील गुन प्रभु पद प्रीति अपार। मन महुँ जात सराहत पुनि पुनि पवनकुमार ॥ ६०(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

हनुमान से राम, लक्ष्मण और सीताजी का समाचार सुनकर भरत दुःखी होते हैं। समय बचाने के लिए वे पर्वत सहित हनुमान को अपने बाण पर भेजने का प्रस्ताव करते हैं। हनुमान क्षणिक अभिमान छोड़कर भरत के चरणों में प्रणाम करते हैं और उनके बल, शील तथा रामप्रेम की प्रशंसा करते हुए चल पड़ते हैं।

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मूल पाठ और अर्थ के बारे में

मूल रचना गोस्वामी तुलसीदास की है। मूल पाठ के लिए देवनागरी डिजिटल संस्करण और संदिग्ध स्थानों के मिलान के लिए मुद्रित संस्करण का संदर्भ लिया गया है। संस्करणों में वर्तनी और पाठांतर मिल सकते हैं। हिंदी अर्थ भक्ति भावना के लिए स्वतंत्र रूप से लिखे गए हैं।

डिजिटल मूल पाठ का संदर्भ · मुद्रित मूल पाठ का संदर्भ

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॥ जय श्री सीताराम ॥
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