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श्रीरामचरितमानस लंकाकाण्ड भाग 2 | दोहा 61–121 | मूल पाठ और सरल हिंदी अर्थ
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भक्ति भावना · गोस्वामी तुलसीदास कृत श्रीरामचरितमानस
लंकाकाण्ड · भाग 2
दोहा 61–121 · मूल पाठ और सरल हिंदी अर्थ सम्पूर्ण काण्ड का अंतिम भाग · कुल दो भाग
लंकाकाण्ड · दोनों प्रकाशित भाग खोलें
इस भाग को कैसे पढ़ें?
मूल चौपाइयाँ, छंद, दोहे और सोरठे उनके क्रम में हैं। प्रत्येक क्रमांक के बाद स्वतंत्र रूप से लिखा समेकित सरल हिंदी अर्थ दिया है; यह शब्द-शब्द अनुवाद नहीं है। संवाद को उसके प्रसंग सहित पढ़ें। इस भाग के अंत में काण्ड का समापन है।
इस भाग की क्रम-सूची खोलें · 61–121लंकाकाण्ड · क्रमांक 61
लक्ष्मण के लिए राम का विलाप
चौपाइयाँ — मूल पाठ
उहाँ राम लछिमनहिं निहारी। बोले बचन मनुज अनुसारी ॥
अर्ध राति गइ कपि नहिं आयउ। राम उठाइ अनुज उर लायउ ॥
सकहु न दुखित देखि मोहि काऊ। बंधु सदा तव मृदुल सुभाऊ ॥
मम हित लागि तजेहु पितु माता। सहेहु बिपिन हिम आतप बाता ॥
सो अनुराग कहाँ अब भाई। उठहु न सुनि मम बच बिकलाई ॥
जौं जनतेउँ बन बंधु बिछोहू। पिता बचन मनतेउँ नहिं ओहू ॥
सुत बित नारि भवन परिवारा। होहिं जाहिं जग बारहिं बारा ॥
अस बिचारि जियँ जागहु ताता। मिलइ न जगत सहोदर भ्राता ॥
जथा पंख बिनु खग अति दीना। मनि बिनु फनि करिबर कर हीना ॥
अस मम जिवन बंधु बिनु तोही। जौं जड़ दैव जिआवै मोही ॥
जैहउँ अवध कवन मुहु लाई। नारि हेतु प्रिय भाइ गँवाई ॥
बरु अपजस सहतेउँ जग माहीं। नारि हानि बिसेष छति नाहीं ॥
अब अपलोकु सोकु सुत तोरा। सहिहि निठुर कठोर उर मोरा ॥
निज जननी के एक कुमारा। तात तासु तुम्ह प्रान अधारा ॥
सौंपेसि मोहि तुम्हहि गहि पानी। सब बिधि सुखद परम हित जानी ॥
उतरु काह दैहउँ तेहि जाई। उठि किन मोहि सिखावहु भाई ॥
बहु बिधि सिचत सोच बिमोचन। स्त्रवत सलिल राजिव दल लोचन ॥
उमा एक अखंड रघुराई। नर गति भगत कृपाल देखाई ॥
सोरठा — मूल पाठ
प्रभु प्रलाप सुनि कान बिकल भए बानर निकर।
आइ गयउ हनुमान जिमि करुना महँ बीर रस ॥ ६१ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
राम लक्ष्मण को हृदय से लगाकर उनके कोमल स्वभाव और त्याग का स्मरण करते हैं। भाई के वियोग की आशंका से वे सुमित्रा को उत्तर देने की चिंता करते हैं। शिव बताते हैं कि अखंड परमात्मा भक्तों के लिए मनुष्य जैसी लीला दिखाते हैं। इसी करुण समय में हनुमान आ पहुँचते हैं।
सुनि दसकंधर बचन तब कुंभकरन बिलखान।
जगदंबा हरि आनि अब सठ चाहत कल्यान ॥ ६२ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
राम हनुमान को प्रेम से गले लगाते हैं। सुषेण के उपचार से लक्ष्मण उठ बैठते हैं और पूरी सेना हर्षित होती है। समाचार सुनकर रावण दुःखी होकर कुंभकर्ण को जगाता है। कथा सुनकर कुंभकर्ण सीताहरण को उसके विनाश का कारण बताता है।
भल न कीन्ह तैं निसिचर नाहा। अब मोहि आइ जगाएहि काहा ॥
अजहूँ तात त्यागि अभिमाना। भजहु राम होइहि कल्याना ॥
हैं दससीस मनुज रघुनायक। जाके हनूमान से पायक ॥
अहह बंधु तैं कीन्हि खोटाई। प्रथमहिं मोहि न सुनाएहि आई ॥
कीन्हेहु प्रभू बिरोध तेहि देवक। सिव बिरंचि सुर जाके सेवक ॥
नारद मुनि मोहि ग्यान जो कहा। कहतेउँ तोहि समय निरबहा ॥
अब भरि अंक भेंटु मोहि भाई। लोचन सूफल करौ मैं जाई ॥
स्याम गात सरसीरुह लोचन। देखौं जाइ ताप त्रय मोचन ॥
दोहा — मूल पाठ
राम रूप गुन सुमिरत मगन भयउ छन एक।
रावन मागेउ कोटि घट मद अरु महिष अनेक ॥ ६३ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
कुंभकर्ण रावण से अभिमान छोड़कर राम का भजन करने को कहता है। हनुमान जैसे सेवक के स्वामी को साधारण मनुष्य मानना भूल है। वह राम के सुंदर रूप का दर्शन करने की इच्छा प्रकट करता है। क्षण भर उनके गुणों में मग्न होता है, फिर रावण उसके लिए मदिरा और भोजन मँगाता है।
महिष खाइ करि मदिरा पाना। गर्जा बज्राघात समाना ॥
कुंभकरन दुर्मद रन रंगा। चला दुर्ग तजि सेन न संगा ॥
देखि बिभीषनु आगें आयउ। परेउ चरन निज नाम सुनायउ ॥
अनुज उठाइ हृदयँ तेहि लायो। रघुपति भक्त जानि मन भायो ॥
तात लात रावन मोहि मारा। कहत परम हित मंत्र बिचारा ॥
तेहिं गलानि रघुपति पहिं आयउँ। देखि दीन प्रभु के मन भायउँ ॥
सुनु सुत भयउ कालबस रावन। सो कि मान अब परम सिखावन ॥
धन्य धन्य तैं धन्य बिभीषन। भयहु तात निसिचर कुल भूषन ॥
बंधु बंस तैं कीन्ह उजागर। भजेहु राम सोभा सुख सागर ॥
दोहा — मूल पाठ
बचन कर्म मन कपट तजि भजेहु राम रनधीर।
जाहु न निज पर सूझ मोहि भयउँ कालबस बीर। ६४ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
युद्ध को जाते हुए कुंभकर्ण विभीषण को गले लगाता है। राम की शरण जाने के लिए वह उनकी प्रशंसा करता और उन्हें कुल का भूषण कहता है। स्वयं काल के वश में होने की बात कहकर उन्हें दूर जाने तथा निष्कपट भाव से राम का भजन करने की सलाह देता है।
बंधु बचन सुनि चला बिभीषन। आयउ जहँ त्रैलोक बिभूषन ॥
नाथ भूधराकार सरीरा। कुंभकरन आवत रनधीरा ॥
एतना कपिन्ह सुना जब काना। किलकिलाइ धाए बलवाना ॥
लिए उठाइ बिटप अरु भूधर। कटकटाइ डारहिं ता ऊपर ॥
कोटि कोटि गिरि सिखर प्रहारा। करहिं भालु कपि एक एक बारा ॥
मुर् यो न मन तनु टर् यो न टार् यो। जिमि गज अर्क फलनि को मार्यो ॥
तब मारुतसुत मुठिका हन्यो। पर् यो धरनि ब्याकुल सिर धुन्यो ॥
पुनि उठि तेहिं मारेउ हनुमंता। घुर्मित भूतल परेउ तुरंता ॥
पुनि नल नीलहि अवनि पछारेसि। जहँ तहँ पटकि पटकि भट डारेसि ॥
चली बलीमुख सेन पराई। अति भय त्रसित न कोउ समुहाई ॥
दोहा — मूल पाठ
अंगदादि कपि मुरुछित करि समेत सुग्रीव।
काँख दाबि कपिराज कहुँ चला अमित बल सींव ॥ ६५ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
वानर पर्वत और वृक्षों से कुंभकर्ण पर प्रहार करते हैं, पर वह विचलित नहीं होता। हनुमान के घूँसे से गिरकर फिर उठता और उन्हें मूर्छित करता है। नल-नील तथा अंगद आदि भी उसके प्रहार से गिरते हैं। वह मूर्छित सुग्रीव को काँख में दबाकर चल पड़ता है।
उमा करत रघुपति नरलीला। खेलत गरुड़ जिमि अहिगन मीला ॥
भृकुटि भंग जो कालहि खाई। ताहि कि सोहइ ऐसि लराई ॥
जग पावनि कीरति बिस्तरिहहिं। गाइ गाइ भवनिधि नर तरिहहिं ॥
मुरुछा गइ मारुतसुत जागा। सुग्रीवहि तब खोजन लागा ॥
सुग्रीवहु कै मुरुछा बीती। निबुक गयउ तेहि मृतक प्रतीती ॥
काटेसि दसन नासिका काना। गरजि अकास चलउ तेहिं जाना ॥
गहेउ चरन गहि भूमि पछारा। अति लाघवँ उठि पुनि तेहि मारा ॥
पुनि आयसु प्रभु पहिं बलवाना। जयति जयति जय कृपानिधाना ॥
नाक कान काटे जियँ जानी। फिरा क्रोध करि भइ मन ग्लानी ॥
सहज भीम पुनि बिनु श्रुति नासा। देखत कपि दल उपजी त्रासा ॥
दोहा — मूल पाठ
जय जय जय रघुबंस मनि धाए कपि दै हूह।
एकहि बार तासु पर छाड़ेन्हि गिरि तरु जूह ॥ ६६ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
शिव राम की इस युद्ध-लीला को उनकी पवित्र कीर्ति फैलाने वाला बताते हैं। सुग्रीव चेतना आने पर कुंभकर्ण की पकड़ से निकलते और उसके नाक-कान काटते हैं। वे लौटकर राम की जय कहते हैं। क्रोधित कुंभकर्ण को देखकर वानर फिर एक साथ पर्वत और वृक्ष बरसाते हैं।
कुंभकरन रन रंग बिरुद्धा। सन्मुख चला काल जनु क्रुद्धा ॥
कोटि कोटि कपि धरि धरि खाई। जनु टीड़ी गिरि गुहाँ समाई ॥
कोटिन्ह गहि सरीर सन मर्दा। कोटिन्ह मीजि मिलव महि गर्दा ॥
मुख नासा श्रवनन्हि कीं बाटा। निसरि पराहिं भालु कपि ठाटा ॥
रन मद मत्त निसाचर दर्पा। बिस्व ग्रसिहि जनु एहि बिधि अर्पा ॥
मुरे सुभट सब फिरहिं न फेरे। सूझ न नयन सुनहिं नहिं टेरे ॥
कुंभकरन कपि फौज बिडारी। सुनि धाई रजनीचर धारी ॥
देखि राम बिकल कटकाई। रिपु अनीक नाना बिधि आई ॥
दोहा — मूल पाठ
सुनु सुग्रीव बिभीषन अनुज सँभारेहु सैन।
मैं देखउँ खल बल दलहि बोले राजिवनैन ॥ ६७ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
कुंभकर्ण वानर सेना को बहुत क्षति पहुँचाता है और राक्षस भी उसकी सहायता को आते हैं। सेना की व्याकुल दशा देखकर राम सुग्रीव, विभीषण और लक्ष्मण से सेना सँभालने को कहते हैं। अब वे स्वयं शत्रु का बल देखने और युद्ध करने आगे बढ़ते हैं।
कर सारंग साजि कटि भाथा। अरि दल दलन चले रघुनाथा ॥
प्रथम कीन्ह प्रभु धनुष टँकोरा। रिपु दल बधिर भयउ सुनि सोरा ॥
सत्यसंध छाँड़े सर लच्छा। कालसर्प जनु चले सपच्छा ॥
जहँ तहँ चले बिपुल नाराचा। लगे कटन भट बिकट पिसाचा ॥
कटहिं चरन उर सिर भुजदंडा। बहुतक बीर होहिं सत खंडा ॥
घुर्मि घुर्मि घायल महि परहीं। उठि संभारि सुभट पुनि लरहीं ॥
लागत बान जलद जिमि गाजहीं। बहुतक देखी कठिन सर भाजहिं ॥
रुंड प्रचंड मुंड बिनु धावहिं। धरु धरु मारू मारु धुनि गावहिं ॥
दोहा — मूल पाठ
छन महुँ प्रभु के सायकन्हि काटे बिकट पिसाच।
पुनि रघुबीर निषंग महुँ प्रबिसे सब नाराच ॥ ६८ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
राम धनुष की टंकार करके शत्रु सेना को स्तब्ध कर देते हैं। उनके तीक्ष्ण बाण भीषण राक्षसों का संहार करते हैं। युद्धभूमि में घोर संघर्ष होता है। कार्य पूरा करके वे बाण फिर प्रभु के तरकस में लौट आते हैं।
अपनी सेना को नष्ट होते देख कुंभकर्ण क्रोधित होकर पर्वत फेंकता है। राम उन्हें बाणों से चूर करते और उसके शरीर पर प्रहार करते हैं। फिर भी वह गरजकर अनेक वानरों को पकड़ता और पृथ्वी पर पटकता है।
करि चिक्कार घोर अति धावा बदनु पसारि।
गगन सिद्ध सुर त्रासित हा हा हेति पुकारि ॥ ७० ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
भयभीत वानर राम से रक्षा की प्रार्थना करते हैं। राम सेना को पीछे करके स्वयं कुंभकर्ण का सामना करते हैं। वह दोनों हाथों में पर्वत लेकर दौड़ता है, पर प्रभु उसकी दोनों भुजाएँ काट देते हैं। तब वह मुँह फैलाकर अत्यंत भयानक गर्जना के साथ आगे आता है।
सभय देव करुनानिधि जान्यो। श्रवन प्रजंत सरासनु तान्यो ॥
बिसिख निकर निसिचर मुख भरेऊ। तदपि महाबल भूमि न परेऊ ॥
सरन्हि भरा मुख सन्मुख धावा। काल त्रोन सजीव जनु आवा ॥
तब प्रभु कोऽपि तीब्र सर लीन्हा। धर ते भिन्न तासु सिर कीन्हा ॥
सो सिर परेउ दसानन आगें। बिकल भयउ जिमि फनि मनि त्यागें ॥
धरनि धसइ धर धाव प्रचंडा। तब प्रभु काटि कीन्ह दुइ खंडा ॥
परे भूमि जिमि नभ तें भूधर। हेठ दाबि कपि भालु निसाचर ॥
तासु तेज प्रभु बदन समाना। सुर मुनि सबहिं अचंभव माना ॥
सुर दुंदुभीं बजावहिं हरषहिं। अस्तुति करहिं सुमन बहु बरषहिं ॥
करि बिनती सुर सकल सिधाए। तेही समय देवरिषि आए ॥
गगनोपरि हरि गुन गन गाए। रुचिर बीररस प्रभु मन भाए ॥
बेगि हतहु खल कहि मुनि गए। राम समर महि सोभत भए ॥
छंद — मूल पाठ
संग्राम भूमि बिराज रघुपति अतुल बल कोसल धनी।
श्रम बिंदु मुख राजीव लोचन अरुन तन सोनित कनी ॥
भुज जुगल फेरत सर सरासन भालु कपि चहु दिसि बने।
कह दास तुलसी कहि न सक छबि सेष जेहि आनन घने ॥
दोहा — मूल पाठ
निसिचर अधम मलाकर ताहि दीन्ह निज धाम।
गिरिजा ते नर मंदमति जे न भजहिं श्रीराम ॥ ७१ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
राम पहले बाणों से कुंभकर्ण का मुँह भरते और फिर उसका सिर काट देते हैं। सिर रावण के सामने गिरता है; विशाल धड़ को भी राम दो भागों में काटते हैं। उसका तेज प्रभु में समा जाता है। देवता स्तुति और पुष्पवर्षा करते हैं; तुलसीदास राम की अनुपम वीर छवि और कृपा का स्मरण करते हैं।
दिन ढलने पर दोनों सेनाएँ लौटती हैं। रावण अपने भाई का सिर हृदय से लगाकर विलाप करता है। मेघनाद उसे अपने दिव्य रथ और बल का भरोसा देता है। सुबह वह मायामय रथ पर आकाश में चढ़ता और अट्टहास करके वानर सेना को भयभीत करता है।
सक्ति सूल तरवारि कृपाना। अस्त्र सस्त्र कुलिसायुध नाना ॥
डारह परसु परिघ पाषाना। लागेउ बृष्टि करै बहु बाना ॥
दस दिसि रहे बान नभ छाई। मानहुँ मघा मेघ झरि लाई ॥
धरु धरु मारु सुनिअ धुनि काना। जो मारइ तेहि कोउ न जाना ॥
गहि गिरि तरु अकास कपि धावहिं। देखहि तेहि न दुखित फिरि आवहिं ॥
अवघट घाट बाट गिरि कंदर। माया बल कीन्हेसि सर पंजर ॥
जाहिं कहाँ ब्याकुल भए बंदर। सुरपति बंदि परे जनु मंदर ॥
मारुतसुत अंगद नल नीला। कीन्हेसि बिकल सकल बलसीला ॥
पुनि लछिमन सुग्रीव बिभीषन। सरन्हि मारि कीन्हेसि जर्जर तन ॥
पुनि रघुपति सैं जूझे लागा। सर छाँड़इ होइ लागहिं नागा ॥
ब्याल पास बस भए खरारी। स्वबस अनंत एक अबिकारी ॥
नट इव कपट चरित कर नाना। सदा स्वतंत्र एक भगवाना ॥
रन सोभा लगि प्रभुहिं बँधायो। नागपास देवन्ह भय पायो ॥
दोहा — मूल पाठ
गिरिजा जासु नाम जपि मुनि काटहिं भव पास।
सो कि बंध तर आवइ ब्यापक बिस्व निवास ॥ ७३ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
मेघनाद अदृश्य रहकर अनेक अस्त्र बरसाता है और सेना को व्याकुल करता है। उसके बाण सर्प बनकर राम को नागपाश में बाँधते दिखाई देते हैं। शिव स्पष्ट करते हैं कि जिनका नाम संसार के बंधन काट देता है, वे स्वयं बँध नहीं सकते; यह स्वतंत्र प्रभु की युद्ध-लीला है।
जाम्बवान मेघनाद का त्रिशूल पकड़कर उसी पर प्रहार करते हैं और उसे लंका में फेंक देते हैं। नारद के भेजे गरुड़ आते और मायामय सर्पों को खा जाते हैं। नागपाश दूर होते ही वानर प्रसन्न होकर फिर शत्रु पर धावा बोलते हैं।
मेघनाद गुफा में विजय दिलाने वाला यज्ञ करने जाता है। विभीषण उसका भेद राम को बताते हैं। राम लक्ष्मण और प्रमुख वानरों को यज्ञ नष्ट करने तथा उसका वध करने की आज्ञा देते हैं। लक्ष्मण प्रभु का प्रताप स्मरण करके दृढ़ संकल्प के साथ निकलते हैं।
वानर मेघनाद का यज्ञ नष्ट कर देते हैं। वह क्रोधित होकर युद्ध करता और अनेक मायावी रूप धारण करता है। लक्ष्मण राम के प्रताप का स्मरण करके उसके हृदय में बाण मारते हैं। मरते समय वह राम और रामानुज का नाम लेता है; हनुमान और अंगद उसकी माता को धन्य कहते हैं।
बिनु प्रयास हनुमान उठायो। लंका द्वार राखि पुनि आयो ॥
तासु मरन सुनि सुर गंधर्बा। चढ़ि बिमान आए नभ सर्बा ॥
बरषि सुमन दुंदुभीं बजावहिं। श्रीरघुनाथ बिमल जसु गावहिं ॥
जय अनंत जय जगदाधारा। तुम्ह प्रभु सब देवन्हि निस्तारा ॥
अस्तुति करि सुर सिद्ध सिधाए। लछिमन कृपासिन्धु पहिं आए ॥
सुत बध सुना दसानन जबहीं। मुरुछित भयउ परेउ महि तबहीं ॥
मंदोदरी रुदन कर भारी। उर ताड़न बहु भाँति पुकारी ॥
नगर लोग सब ब्याकुल सोचा। सकल कहहिं दसकंधर पोचा ॥
दोहा — मूल पाठ
तब दसकंठ बिबिध बिधि समुझाईं सब नारि।
नस्वर रूप जगत सब देखहु हृदयँ बिचारि ॥ ७७ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
हनुमान मेघनाद का शरीर लंका-द्वार पर रख आते हैं। देवता राम का यश गाते हैं और लक्ष्मण उनके पास लौटते हैं। पुत्र की मृत्यु सुनकर रावण मूर्छित होता है; मंदोदरी विलाप करती है। फिर रावण स्वयं स्त्रियों को संसार की नश्वरता समझाता है।
तिन्हहि ग्यान उपदेसा रावन। आपुन मंद कथा सुभ पावन ॥
पर उपदेस कुसल बहुतेरे। जे आचरहिं ते नर न घनेरे ॥
निसा सिरानि भयउ भिनुसारा। लगे भालु कपि चारिहुँ द्वारा ॥
सुभट बोलाइ दसानन बोला। रन सन्मुख जा कर मन डोला ॥
सो अबहीं बरु जाउ पराई। संजुग बिमुख भएँ न भलाई ॥
निज भुज बल मैं बयरु बढ़ावा। देहउँ उतरु जो रिपु चढ़ि आवा ॥
अस कहि मरुत बेग रथ साजा। बाजे सकल जुझाऊ बाजा ॥
चले बीर सब अतुलित बली। जनु कज्जल कै आँधी चली ॥
असगुन अमित होहिं तेहि काला। गनइ न भुजबल गर्ब बिसाला ॥
छंद — मूल पाठ
अति गर्ब गनइ न सगुन असगुन स्त्रवहिं आयुध हाथ ते।
भट गिरत रथ ते बाजि गज चिक्करत भाजहिं साथ ते ॥
गोमाय गीध कराल खर रव स्वान बोलहिं अति घने।
जनु कालदूत उलूक बोलहिं बचन परम भयावने ॥
दोहा — मूल पाठ
ताहि कि संपति सगुन सुभ सपनेहुँ मन बिश्राम।
भूत द्रोह रत मोहबस राम बिमुख रति काम ॥ ७८ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
तुलसीदास बताते हैं कि दूसरों को उपदेश देना सरल है, उस पर स्वयं चलना दुर्लभ है। रावण अपनी सेना को जुटाकर युद्ध के लिए निकलता है। अनेक अपशकुन होते हैं, किंतु भुजबल के घमंड में वह उन्हें नहीं मानता। मोह और राम-विमुखता में उसे शांति नहीं मिलती।
धाए बिसाल कराल मर्कट भालु काल समान ते।
मानहुँ सपच्छ उड़ाहिं भूधर बृंद नाना बान ते ॥
नख दसन सैल महाद्रुमायुध सबल संक न मानहीं।
जय राम रावन मत्त गज मृगराज सुजसु बखानहीं ॥
रावण की विशाल सेना विविध वाहनों, ध्वजों और युद्धवाद्यों के साथ बढ़ती है। वह राम-लक्ष्मण को स्वयं मारने का दावा करता है। वानर और भालू राम की दुहाई देकर सामने आते हैं। दोनों पक्ष अपने स्वामी की जय बोलकर एक-दूसरे से भिड़ते हैं।
रावण को रथ पर और राम को बिना रथ देखकर विभीषण चिंतित होते हैं। राम विजय के वास्तविक धर्मरथ का वर्णन करते हैं: शौर्य-धैर्य उसके पहिए, सत्य-शील ध्वजा, बल-विवेक-संयम-परोपकार घोड़े तथा क्षमा-कृपा-समता लगाम हैं। ईश्वर-भजन सारथी है। वैराग्य, संतोष, दान, बुद्धि, विज्ञान, निर्मल मन और गुरु-सम्मान उसके साधन हैं। ऐसे रथ से संसाररूपी दुर्जय शत्रु भी जीता जा सकता है।
सुर ब्रह्मादि सिद्ध मुनि नाना। देखत रन नभ चढ़े बिमाना ॥
हमहू उमा रहे तेहि संगा। देखत राम चरित रन रंगा ॥
सुभट समर रस दुहु दिसि माते। कपि जयसील राम बल ताते ॥
एक एक सन भिरहिं पचारहिं। एकन्ह एक मर्दि महि पारहिं ॥
मारहिं काटहिं धरहिं पछारहिं। सीस तोरि सीसन्ह सन मारहिं ॥
उदर बिदारहिं भुजा उपारहिं। गहि पद अवनि पटकि भट डारहिं ॥
निसिचर भट महि गाड़हि भालू। ऊपर ढारि देहिं बहु बालू ॥
बीर बलिमुख जुद्ध बिरुद्धे। देखिअत बिपुल काल जनु क्रुद्धे ॥
छंद — मूल पाठ
क्रुद्धे कृतांत समान कपि तन स्त्रवत सोनित राजहीं।
मर्दहिं निसाचर कटक भट बलवंत घन जिमि गाजहीं ॥
मारहिं चपेटन्हि डाटि दातन्ह काटि लातन्ह मीजहीं।
चिक्करहिं मर्कट भालु छल बल करहिं जेहिं खल छीजहीं ॥
धरि गाल फारहिं उर बिदारहिं गल अँतावरि मेलहीं।
प्रहलादपति जनु बिबिध तनु धरि समर अंगन खेलहीं ॥
धरु मारु काटु पछारु घोर गिरा गगन महि भरि रही।
जय राम जो तृन ते कुलिस कर कुलिस ते कर तृन सही ॥
दोहा — मूल पाठ
निज दल बिचलत देखेसि बीस भुजाँ दस चाप।
रथ चढ़ि चलेउ दसानन फिरहु फिरहु करि दाप ॥ ८१ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
देवता, मुनि और शिव आकाश से युद्ध देखते हैं। राम के बल से वानर-भालू बड़े राक्षसों का सामना करते हैं। अपनी सेना को पीछे हटते देखकर रावण दस धनुष लेकर रथ पर आगे आता और सैनिकों को लौटने की ललकार देता है।
धायउ परम क्रुद्ध दसकंधर। सन्मुख चले हूह दै बंदर ॥
गहि कर पादप उपल पहारा। डारेन्हि ता पर एकहिं बारा ॥
लागहिं सैल बज्र तन तासू। खंड खंड होइ फूटहिं आसू ॥
चला न अचल रहा रथ रोपी। रन दुर्मद रावन अति कोपी ॥
इत उत झपटि दपटि कपि जोधा। मर्दै लाग भयउ अति क्रोधा ॥
चले पराइ भालु कपि नाना। त्राहि त्राहि अंगद हनुमाना ॥
पाहि पाहि रघुबीर गोसाई। यह खल खाइ काल की नाई ॥
तेहि देखे कपि सकल पराने। दसहुँ चाप सायक संधाने ॥
छंद — मूल पाठ
संधानि धनु सर निकर छाड़ेसि उरग जिमि उड़ि लागहीं।
रहे पूरि सर धरनी गगन दिसि बिदसि कहँ कपि भागहीं ॥
भयो अति कोलाहल बिकल कपि दल भालु बोलहिं आतुरे।
रघुबीर करुना सिंधु आरत बंधु जन रच्छक हरे ॥
दोहा — मूल पाठ
निज दल बिकल देखि कटि कसि निषंग धनु हाथ।
लछिमन चले क्रुद्ध होइ नाइ राम पद माथ ॥ ८२ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
वानरों के पर्वत और वृक्ष रावण के कठोर शरीर पर टूट जाते हैं। वह प्रबल प्रहार और बाणवर्षा से सेना को व्याकुल करता है। वानर राम से रक्षा की प्रार्थना करते हैं। उनकी दशा देखकर लक्ष्मण राम को प्रणाम करके युद्ध के लिए निकलते हैं।
रे खल का मारसि कपि भालू। मोहि बिलोकु तोर मैं कालू ॥
खोजत रहेउँ तोहि सुतघाती। आजु निपाति जुड़ावउँ छाती ॥
अस कहि छाड़ेसि बान प्रचंडा। लछिमन किए सकल सत खंडा ॥
कोटिन्ह आयुध रावन डारे। तिल प्रवान करि काटि निवारे ॥
पुनि निज बानन्ह कीन्ह प्रहारा। स्यंदनु भंजि सारथी मारा ॥
सत सत सर मारे दस भाला। गिरि सृंगन्ह जनु प्रबिसहिं ब्याला ॥
पुनि सत सर मारा उर माहीं। परेउ धरनि तल सुधि कछु नाहीं ॥
उठा प्रबल पुनि मुरुछा जागी। छाड़िसि ब्रह्म दीन्हि जो साँगी ॥
छंद — मूल पाठ
सो ब्रह्म दत्त प्रचंड सक्ति अनंत उर लागी सही।
पर्यो बीर बिकल उठाव दसमुख अतुल बल महिमा रही ॥
ब्रह्मांड भवन बिराज जाकें एक सिर जिमि रज कनी।
तेहि चह उठावन मूढ़ रावन जान नहिं त्रिभुअन धनी ॥
लक्ष्मण रावण के अस्त्र काटकर उसका रथ और सारथी नष्ट करते हैं। अनेक बाण लगने से वह गिरता है, फिर उठकर ब्रह्मा की दी शक्ति चलाता है। लक्ष्मण मूर्छित होते हैं, पर रावण उन्हें उठा नहीं पाता। तब हनुमान सहायता के लिए दौड़ते हैं।
उहाँ दसानन जागि करि करै लाग कछु जग्य।
राम बिरोध बिजय चह सठ हठ बस अति अग्य ॥ ८४ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
हनुमान रावण को घूँसा मारकर गिराते और लक्ष्मण को राम के पास लाते हैं। राम के वचन सुनकर लक्ष्मण उठ बैठते हैं और शक्ति लौट जाती है। वे फिर रावण को घायल करके गिराते हैं। सारथी उसे लंका ले जाता है; वहाँ वह विजय की आशा में नया यज्ञ आरंभ करता है।
विभीषण रावण के यज्ञ का भेद बताते हैं। राम की आज्ञा से हनुमान, अंगद आदि लंका जाकर उसे भंग कर देते हैं। रावण क्रोध में युद्ध के लिए निकल पड़ता है; अब वह जीवन की आशा भी छोड़ चुका है।
चलत होहिं अति असुभ भयंकर। बैठहिं गीध उड़ाइ सिरन्ह पर ॥
भयउ कालबस काहु न माना। कहेसि बजावहु जुद्ध निसाना ॥
चली तमीचर अनी अपारा। बहु गज रथ पदाति असवारा ॥
प्रभु सन्मुख धाए खल कैंसें। सलभ समूह अनल कहँ जैंसें ॥
इहाँ देवतन्ह अस्तुति कीन्ही। दारुन बिपति हमहि एहिं दीन्ही ॥
अब जनि राम खेलावहु एही। अतिसय दुखित होति बैदेही ॥
देव बचन सुनि प्रभु मुसकाना। उठि रघुबीर सुधारे बाना।
जटा जूट दृढ़ बाँधै माथे। सोहहिं सुमन बीच बिच गाथे ॥
अरुन नयन बारिद तनु स्यामा। अखिल लोक लोचनाभिरामा ॥
कटितट परिकर कस्यो निषंगा। कर कोदंड कठिन सारंगा ॥
छंद — मूल पाठ
सारंग कर सुंदर निषंग सिलीमुखाकर कटि कस्यो।
भुजदंड पीन मनोहरायत उर धरासुर पद लस्यो ॥
कह दास तुलसी जबहिं प्रभु सर चाप कर फेरन लगे।
ब्रह्मांड दिग्गज कमठ अहि महि सिंधु भूधर डगमगे ॥
दोहा — मूल पाठ
सोभा देखि हरषि सुर बरषहिं सुमन अपार।
जय जय जय करुनानिधि छबि बल गुन आगार ॥ ८६ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
रावण अपशकुनों की उपेक्षा करके सेना लाता है। देवता राम से युद्ध शीघ्र समाप्त करने की प्रार्थना करते हैं, क्योंकि सीताजी अत्यंत दुःखी हैं। राम जटाएँ बाँधकर धनुष-बाण सँभालते हैं। उनके तेज, सौंदर्य और बल को देखकर देवता पुष्पवर्षा करते हैं।
कादर भयंकर रुधिर सरिता चली परम अपावनी।
दोउ कूल दल रथ रेत चक्र अबर्त बहति भयावनी ॥
जल जंतुगज पदचर तुरग खर बिबिध बाहन को गने।
सर सक्ति तोमर सर्प चाप तरंग चर्म कमठ घने ॥
दोहा — मूल पाठ
बीर परहिं जनु तीर तरु मज्जा बहु बह फेन।
कादर देखि डरहिं तहँ सुभटन्ह के मन चेन ॥ ८७ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
दोनों सेनाओं का संग्राम वर्षा-ऋतु के घने बादलों जैसा वर्णित है। तलवारें बिजली, बाण वर्षा की बूँदें और पर्वतों के प्रहार वज्रपात जैसे हैं। राम के बाणों से राक्षस घायल होते हैं; रणभूमि रक्त की भयावह नदी जैसी हो जाती है।
बोल्लहिं जो जय जय मुंड रुंड प्रचंड सिर बिनु धावहीं।
खप्परिन्ह खग्ग अलुज्झि जुज्झहिं सुभट भटन्ह ढहावहीं ॥
बानर निसाचर निकर मर्दहिं राम बल दर्पित भए।
संग्राम अंगन सुभट सोवहिं राम सर निकरन्हि हए ॥
दोहा — मूल पाठ
रावन हृदयँ बिचारा भा निसिचर संघार।
मैं अकेल कपि भालु बहु माया करौं अपार ॥ ८८ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
कवि युद्ध की भयानकता का विस्तार से चित्रण करते हैं। घायल और मृत योद्धाओं के बीच भूत-पिशाच तथा मांसभक्षी पक्षियों के दृश्य आते हैं। अपनी सेना नष्ट होते देखकर रावण सोचता है कि अब वह अकेला है और उसे प्रबल माया का सहारा लेना चाहिए।
देवन्ह प्रभुहि पयादें देखा। उपजा उर अति छोभ बिसेषा ॥
सुरपति निज रथ तुरत पठावा। हरष सहित मातलि लै आवा ॥
तेज पुंज रथ दिब्य अनूपा। हरषि चढ़े कोसलपुर भूपा ॥
चंचल तुरग मनोहर चारी। अजर अमर मन सम गतिकारी ॥
रथारूढ़ रघुनाथहि देखी। धाए कपि बलु पाइ बिसेषी ॥
सही न जाइ कपिन्ह कै मारी। तब रावन माया बिस्तारी ॥
सो माया रघुबीरहि बाँची। लछिमन कपिन्ह सो मानी साँची ॥
देखी कपिन्ह निसाचर अनी। अनुज सहित बहु कोसलधनी ॥
छंद — मूल पाठ
बहु राम लछिमन देखि मर्कट भालु मन अति अपडरे।
जनु चित्र लिखित समेत लछिमन जहँ सो तहँ चितवहिं खरे ॥
निज सेन चकित बिलोकि हँसि सर चाप सजि कोसल धनी।
माया हरी हरि निमिष महुँ हरषी सकल मर्कट अनी ॥
दोहा — मूल पाठ
बहुरि राम सब तन चितइ बोले बचन गँभीर।
द्वंदजुद्ध देखहु सकल श्रमित भए अति बीर ॥ ८९ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
देवताओं की चिंता देखकर इंद्र अपना दिव्य रथ भेजते हैं, जिसे मातलि लाते हैं। राम उस पर चढ़ते हैं। रावण बहुत से मायावी राम-लक्ष्मण दिखाता है, पर प्रभु उसकी माया मिटा देते हैं। थकी सेना को विश्राम देकर वे अब स्वयं द्वंद्वयुद्ध करने को कहते हैं।
अस कहि रथ रघुनाथ चलावा। बिप्र चरन पंकज सिरु नावा ॥
तब लंकेस क्रोध उर छावा। गर्जत तर्जत सन्मुख धावा ॥
जीतेहु जे भट संजुग माहीं। सुनु तापस मैं तिन्ह सम नाहीं ॥
रावन नाम जगत जस जाना। लोकप जाकें बंदीखाना ॥
खर दूषन बिराध तुम्ह मारा। बधेहु ब्याध इव बालि बिचारा ॥
निसिचर निकर सुभट संघारेहु। कुंभकरन घननादहि मारेहु ॥
आजु बयरु सबु लेउँ निबाही। जौं रन भूप भाजि नहिं जाहीं ॥
आजु करउँ खलु काल हवाले। परेहु कठिन रावन के पाले ॥
सुनि दुर्बचन कालबस जाना। बिहँसि बचन कह कृपानिधाना ॥
सत्य सत्य सब तव प्रभुताई। जल्पसि जनि देखाउ मनुसाई ॥
छंद — मूल पाठ
जनि जल्पना करि सुजसु नासहि नीति सुनहि करहि छमा।
संसार महँ पूरुष त्रिबिध पाटल रसाल पनस समा ॥
एक सुमनप्रद एक सुमन फल एक फलइ केवल लागहीं।
एक कहहिं कहहिं करहिं अपर एक करहिं कहत न बागहीं ॥
दोहा — मूल पाठ
राम बचन सुनि बिहँसा मोहि सिखावत ग्यान।
बयरु करत नहिं तब डरे अब लागे प्रिय प्रान ॥ ९० ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
रावण अपने बल की डींग मारकर पुराने योद्धाओं की मृत्यु का बदला लेने को कहता है। राम उसे कथन से अधिक पराक्रम दिखाने को कहते हैं। वे फूल, फूल-फल और केवल फल देने वाले वृक्षों के उदाहरण से बताते हैं कि कुछ केवल कहते, कुछ कहकर करते और कुछ चुपचाप कार्य करते हैं।
रावण अनेक प्रकार के बाण, शक्ति, चक्र और त्रिशूल चलाता है; राम उन्हें सहज काट देते हैं। वह मातलि को घायल करता है, तो राम अपने सारथी को सँभालते हैं। फिर क्रोधपूर्वक धनुष तानकर भयंकर बाण छोड़ते हैं।
चले बान सपच्छ जनु उरगा। प्रथमहिं हतेउ सारथी तुरगा ॥
रथ बिभंजि हति केतु पताका। गर्जा अति अंतर बल थाका ॥
तुरत आन रथ चढ़ि खिसिआना। अस्त्र सस्त्र छाँड़ेसि बिधि नाना ॥
बिफल होहिं सब उद्यम ताके। जिमि परद्रोह निरत मनसा के ॥
तब रावन दस सूल चलावा। बाजि चारि महि मारि गिरावा ॥
तुरग उठाइ कोऽपि रघुनायक। खैंचि सरासन छाँड़े सायक ॥
रावन सिर सरोज बनचारी। चलि रघुबीर सिलीमुख धारी ॥
दस दस बान भाल दस मारे। निसरि गए चले रुधिर पनारे ॥
स्त्रवत रुधिर धायउ बलवाना। प्रभु पुनि कृत धनु सर संधाना ॥
तीस तीर रघुबीर पबारे। भुजन्हि समेत सीस महि पारे ॥
काटतहीं पुनि भए नबीने। राम बहोरि भुजा सिर छीने ॥
प्रभु बहु बार बाहु सिर हए। कटत झटिति पुनि नूतन भए ॥
पुनि पुनि प्रभु काटत भुज सीसा। अति कौतुकी कोसलाधीसा ॥
रहे छाइ नभ सिर अरु बाहू। मानहुँ अमित केतु अरु राहू ॥
छंद — मूल पाठ
जनु राहु केतु अनेक नभ पथ स्त्रवत सोनित धावहीं।
रघुबीर तीर प्रचंड लागहिं भूमि गिरन न पावहीं ॥
एक एक सर सिर निकर छेदे नभ उड़त इमि सोहहीं।
जनु कोऽपि दिनकर कर निकर जहँ तहँ बिधुंतुद पोहहीं ॥
राम रावण का रथ तोड़ते और उसके सिर-भुजाएँ काटते हैं, पर वे तत्काल फिर उग आते हैं। आकाश कटे हुए सिरों से भर जाता है। कवि इसकी तुलना विषयों के सेवन से बार-बार बढ़ने वाली वासना से करते हैं।
पुनि दसकंठ क्रुद्ध होइ छाँड़ी सक्ति प्रचंड।
चली बिभीषन सन्मुख मनहुँ काल कर दंड ॥ ९३ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
नए सिर उगते देखकर रावण का गर्व और क्रोध बढ़ता है। उसकी बाणवर्षा राम के रथ को ढक देती है। राम फिर उसके बाण और सिर काटते हैं। अंत में रावण विभीषण को लक्ष्य करके अत्यंत प्रचंड शक्ति चलाता है।
आवत देखि सक्ति अति घोरा। प्रनतारति भंजन पन मोरा ॥
तुरत बिभीषन पाछें मेला। सन्मुख राम सहेउ सोइ सेला ॥
लागि सक्ति मुरुछा कछु भई। प्रभु कृत खेल सुरन्ह बिकलई ॥
देखि बिभीषन प्रभु श्रम पायो। गहि कर गदा क्रुद्ध होइ धायो ॥
रे कुभाग्य सठ मंद कुबुद्धे। तैं सुर नर मुनि नाग बिरुद्धे ॥
सादर सिव कहुँ सीस चढ़ाए। एक एक के कोटिन्ह पाए ॥
तेहि कारन खल अब लगि बाँच्यो। अब तव कालु सीस पर नाच्यो ॥
राम बिमुख सठ चहसि संपदा। अस कहि हनेसि माझ उर गदा ॥
छंद — मूल पाठ
उर माझ गदा प्रहार घोर कठोर लागत महि पर् यो।
दस बदन सोनित स्त्रवत पुनि संभारि धायो रिस भर् यो ॥
द्वौ भिरे अतिबल मल्लजुद्ध बिरुद्ध एकु एकहि हनै।
रघुबीर बल दर्पित बिभीषनु घालि नहिं ता कहुँ गनै ॥
दोहा — मूल पाठ
उमा बिभीषनु रावनहि सन्मुख चितव कि काउ।
सो अब भिरत काल ज्यों श्रीरघुबीर प्रभाउ ॥ ९४ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
अपने शरणागत की रक्षा के संकल्प से राम विभीषण को पीछे करके शक्ति स्वयं सहते हैं। विभीषण क्रोधित होकर रावण से लड़ते हैं। शिव बताते हैं कि पहले जो रावण के सामने देखने का भी साहस नहीं करते थे, वे राम के प्रताप से निर्भय युद्ध कर रहे हैं।
संभारि श्रीरघुबीर धीर पचारि कपि रावनु हन्यो।
महि परत पुनि उठि लरत देवन्ह जुगल कहुँ जय जय भन्यो ॥
हनुमंत संकट देखि मर्कट भालु क्रोधातुर चले।
रन मत्त रावन सकल सुभट प्रचंड भुज बल दलमले ॥
दोहा — मूल पाठ
तब रघुबीर पचारे धाए कीस प्रचंड।
कपि बल प्रबल देखि तेहिं कीन्ह प्रगट पाषंड ॥ ९५ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
विभीषण को थका देखकर हनुमान उनकी सहायता करते और रावण का रथ नष्ट करते हैं। दोनों आकाश में लड़ते हैं। कठिन संघर्ष में हनुमान राम का स्मरण करते हैं। वानर-भालू भी आगे आते हैं; उनका बल देखकर रावण फिर माया रचता है।
सुर बानर देखे बिकल हँस्यो कोसलाधीस।
सजि सारंग एक सर हते सकल दससीस ॥ ९६ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
रावण क्षणभर अदृश्य होकर असंख्य रूपों में प्रकट होता है। वानर और अनेक देवता भयभीत होते हैं; प्रभु की महिमा जानने वाले स्थिर रहते हैं। राम सेना की व्याकुलता देखकर मुसकराते और एक बाण से सभी मायावी रावण मिटा देते हैं।
प्रभु छन महुँ माया सब काटी। जिमि रबि उएँ जाहिं तम फाटी ॥
रावनु एकु देखि सुर हरषे। फिरे सुमन बहु प्रभु पर बरषे ॥
भुज उठाइ रघुपति कपि फेरे। फिरे एक एकन्ह तब टेरे ॥
प्रभु बलु पाइ भालु कपि धाए। तरल तमकि संजुग महि आए ॥
अस्तुति करत देवतन्हि देखें। भयउँ एक मैं इन्ह के लेखें ॥
सठहु सदा तुम्ह मोर मरायल। अस कहि कोऽपि गगन पर धायल ॥
हाहाकार करत सुर भागे। खलहु जाहु कहँ मोरें आगे ॥
देखि बिकल सुर अंगद धायो। कूदि चरन गहि भूमि गिरायो ॥
छंद — मूल पाठ
गहि भूमि पार् यो लात मार् यो बालिसुत प्रभु पहिं गयो।
संभारि उठि दसकंठ घोर कठोर रव गर्जत भयो ॥
करि दाप चाप चढ़ाइ दस संधानि सर बहु बरषई।
किए सकल भट घायल भयाकुल देखि निज बल हरषई ॥
दोहा — मूल पाठ
तब रघुपति रावन के सीस भुजा सर चाप।
काटे बहुत बढ़े पुनि जिमि तीरथ कर पाप। ९७ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
माया मिटने पर देवता पुष्प बरसाते हैं और वानर लौटते हैं। रावण देवताओं की ओर दौड़ता है, तो अंगद उसका पाँव पकड़कर पृथ्वी पर गिराते हैं। फिर युद्ध में राम उसके सिर-भुजाएँ काटते हैं, किंतु वे बढ़ते जाते हैं। तुलसीदास इसकी तुलना तीर्थ में किए पाप के बढ़े दोष से करते हैं।
सिर भुज बाढ़ि देखि रिपु केरी। भालु कपिन्ह रिस भई घनेरी ॥
मरत न मूढ़ कटेउ भुज सीसा। धाए कोऽपि भालु भट कीसा ॥
बालितनय मारुति नल नीला। बानरराज दुबिद बलसीला ॥
बिटप महीधर करहिं प्रहारा। सोइ गिरि तरु गहि कपिन्ह सो मारा ॥
एक नखन्हि रिपु बपुष बिदारी। भागि चलहिं एक लातन्ह मारी ॥
तब नल नील सिरन्हि चढ़ि गयऊ। नखन्हि लिलार बिदारत भयऊ ॥
रुधिर देखि बिषाद उर भारी। तिन्हहि धरन कहुँ भुजा पसारी ॥
गहे न जाहिं करन्हि पर फिरहीं। जनु जुग मधुप कमल बन चरहीं ॥
कोऽपि कूदि द्वौ धरेसि बहोरी। महि पटकत भजे भुजा मरोरी ॥
पुनि सकोप दस धनु कर लीन्हे। सरन्हि मारि घायल कपि कीन्हे ॥
हनुमदादि मुरुछित करि बंदर। पाइ प्रदोष हरष दसकंधर ॥
मुरुछित देखि सकल कपि बीरा। जामवंत धायउ रनधीरा ॥
संग भालु भूधर तरु धारी। मारन लगे पचारि पचारी ॥
भयउ क्रुद्ध रावन बलवाना। गहि पद महि पटकइ भट नाना ॥
देखि भालुपति निज दल घाता। कोऽपि माझ उर मारेसि लाता ॥
छंद — मूल पाठ
उर लात घात प्रचंड लागत बिकल रथ ते महि परा।
गहि भालु बीसहुँ कर मनहुँ कमलन्हि बसे निसि मधुकरा ॥
मुरुछित बिलोकि बहोरि पद हति भालुपति प्रभु पहिं गयौ।
निसि जानि स्यंदन घालि तेहि तब सूत जतनु करत भयो ॥
दोहा — मूल पाठ
मुरुछा बिगत भालु कपि सब आए प्रभु पास।
निसिचर सकल रावनहि घेरि रहे अति त्रास ॥ ९८ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
अंगद, हनुमान, नल, नील आदि रावण पर प्रहार करते हैं। वह अनेक वीरों को मूर्छित करता है। जाम्बवान उसकी छाती में प्रबल लात मारकर गिराते हैं। रात होने पर सारथी रावण को सँभालता है और चेतना पाकर वानर राम के पास लौटते हैं।
तेही निसि सीता पहिं जाई। त्रिजटा कहि सब कथा सुनाई ॥
सिर भुज बाढ़ि सुनत रिपु केरी। सीता उर भइ त्रास घनेरी ॥
मुख मलीन उपजी मन चिंता। त्रिजटा सन बोली तब सीता ॥
होइहि कहा कहसि किन माता। केहि बिधि मरिहि बिस्व दुखदाता ॥
रघुपति सर सिर कटेहुँ न मरई। बिधि बिपरीत चरित सब करई ॥
मोर अभाग्य जिआवत ओही। जेहिं हौ हरि पद कमल बिछोही ॥
जेहिं कृत कपट कनक मृग झूठा। अजहुँ सो दैव मोहि पर रूठा ॥
जेहिं बिधि मोहि दुख दुसह सहाए। लछिमन कहुँ कटु बचन कहाए ॥
रघुपति बिरह सबिष सर भारी। तकि तकि मार बार बहु मारी ॥
ऐसेहुँ दुख जो राख मम प्राना। सोइ बिधि ताहि जिआव न आना ॥
बहु बिधि कर बिलाप जानकी। करि करि सुरति कृपानिधान की ॥
कह त्रिजटा सुनु राजकुमारी। उर सर लागत मरइ सुरारी ॥
प्रभु ताते उर हतइ न तेही। एहि के हृदयँ बसति बैदेही ॥
छंद — मूल पाठ
एहि के हृदयँ बस जानकी जानकी उर मम बास है।
मम उदर भुअन अनेक लागत बान सब कर नास है ॥
सुनि बचन हरष बिषाद मन अति देखि पुनि त्रिजटाँ कहा।
अब मरिहि रिपु एहि बिधि सुनहि सुंदरि तजहि संसय महा ॥
रावण के बार-बार सिर उगने का समाचार सुनकर सीताजी चिंतित होती हैं। त्रिजटा उन्हें सांत्वना देती है और राम की करुणा समझाती है। वह बताती है कि रावण का ध्यान भंग होने पर राम उसके हृदय में बाण मारेंगे और उसका अंत होगा।
अस कहि बहुत भाँति समुझाई। पुनि त्रिजटा निज भवन सिधाई ॥
राम सुभाउ सुमिरि बैदेही। उपजी बिरह बिथा अति तेही ॥
निसिहि ससिहि निंदति बहु भाँती। जुग सम भई सिराति न राती ॥
करति बिलाप मनहिं मन भारी। राम बिरहँ जानकी दुखारी ॥
जब अति भयउ बिरह उर दाहू। फरकेउ बाम नयन अरु बाहू ॥
सगुन बिचारि धरी मन धीरा। अब मिलिहहिं कृपाल रघुबीरा ॥
इहाँ अर्धनिसि रावनु जागा। निज सारथि सन खीझन लागा ॥
सठ रनभूमि छड़ाइसि मोही। धिग धिग अधम मंदमति तोही ॥
तेहिं पद गहि बहु बिधि समुझावा। भौरु भएँ रथ चढ़ि पुनि धावा ॥
सुनि आगवनु दसानन केरा। कपि दल खरभर भयउ घनेरा ॥
जहँ तहँ भूधर बिटप उपारी। धाए कटकटाइ भट भारी ॥
छंद — मूल पाठ
धाए जो मर्कट बिकट भालु कराल कर भूधर धरा।
अति कोप करहिं प्रहार मारत भजि चले रजनीचरा ॥
बिचलाइ दल बलवंत कीसन्ह घेरि पुनि रावनु लियो।
चहुँ दिसि चपेटन्हि मारि नखन्हि बिदारि तनु ब्याकुल कियो ॥
दोहा — मूल पाठ
देखि महा मर्कट प्रबल रावन कीन्ह बिचार।
अंतरहित होइ निमिष महुँ कृत माया बिस्तार ॥ १०० ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
त्रिजटा के जाने के बाद सीताजी राम-विरह में रात बिताती हैं। शुभ संकेत से उन्हें शीघ्र मिलन की आशा होती है। उधर रावण अपने सारथी को डाँटता और सुबह फिर युद्ध में आता है। वानरों के प्रबल आक्रमण से घिरकर वह नई माया रचता है।
जब कीन्ह तेहिं पाषंड। भए प्रगट जंतु प्रचंड ॥
बेताल भूत पिसाच। कर धरें धनु नाराच ॥ १ ॥
जोगिनि गहें करबाल। एक हाथ मनुज कपाल ॥
करि सद्य सोनित पान। नाचहिं करहिं बहु गान ॥ २ ॥
धरु मारु बोलहिं घोर। रहि पूरि धुनि चहुँ ओर ॥
मुख बाइ धावहिं खान। तब लगे कीस परान ॥ ३ ॥
जहँ जाहिं मर्कट भागि। तहँ बरत देखहिं आगि ॥
भए बिकल बानर भालु। पुनि लाग बरषै बालु ॥ ४ ॥
जहँ तहँ थकित करि कीस। गर्जेउ बहुरि दससीस ॥
लछिमन कपीस समेत। भए सकल बीर अचेत ॥ ५ ॥
हा राम हा रघुनाथ। कहि सुभट मीजहिं हाथ ॥
एहि बिधि सकल बल तोरि। तेहिं कीन्ह कपट बहोरि ॥ ६ ॥
प्रगटेसि बिपुल हनुमान। धाए गहे पाषान ॥
तिन्ह रामु घेरे जाइ। चहुँ दिसि बरूथ बनाइ ॥ ७ ॥
मारहु धरहु जनि जाइ। कटकटहिं पूँछ उठाइ ॥
दहँ दिसि लँगूर बिराज। तेहिं मध्य कोसलराज ॥ ८ ॥
छंद — मूल पाठ
तेहिं मध्य कोसलराज सुंदर स्याम तन सोभा लही।
जनु इंद्रधनुष अनेक की बर बारि तुंग तमालही ॥
प्रभु देखि हरष बिषाद उर सुर बदत जय जय जय करी।
रघुबीर एकहि तीर कोऽपि निमेष महुँ माया हरी ॥ १ ॥
माया बिगत कपि भालु हरषे बिटप गिरि गहि सब फिरे।
सर निकर छाड़े राम रावन बाहु सिर पुनि महि गिरे ॥
श्रीराम रावन समर चरित अनेक कल्प जो गावहीं।
सत सेष सारद निगम कबि तेउ तदपि पार न पावहीं ॥ २ ॥
दोहा — मूल पाठ
ताके गुन गन कछु कहे जड़मति तुलसीदास।
जिमि निज बल अनुरूप ते माछी उड़इ अकास ॥ १०१(क) ॥
दोहा — मूल पाठ
काटे सिर भुज बार बहु मरत न भट लंकेस।
प्रभु क्रीड़त सुर सिद्ध मुनि ब्याकुल देखि कलेस ॥ १०१(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
रावण भूत-पिशाच, आग, बालू की वर्षा और अनेक मायावी हनुमान प्रकट करता है। सेना व्याकुल होती है, पर राम एक बाण से पूरी माया समाप्त कर देते हैं। तुलसीदास विनम्रता से कहते हैं कि वे अपनी बुद्धि के अनुसार ही इस अपरंपार युद्ध का थोड़ा वर्णन कर सके हैं।
काटत बढ़हिं सीस समुदाई। जिमि प्रति लाभ लोभ अधिकाई ॥
मरइ न रिपु श्रम भयउ बिसेषा। राम बिभीषन तन तब देखा ॥
उमा काल मर जाकीं ईछा। सो प्रभु जन कर प्रीति परीछा ॥
सुनु सरबग्य चराचर नायक। प्रनतपाल सुर मुनि सुखदायक ॥
नाभिकुंड पियूष बस याकें। नाथ जिअत रावनु बल ताकें ॥
सुनत बिभीषन बचन कृपाला। हरषि गहे कर बान कराला ॥
असुभ होन लागे तब नाना। रोवहिं खर सृकाल बहु स्वाना ॥
बोलहि खग जग आरति हेतू। प्रगट भए नभ जहँ तहँ केतू ॥
दस दिसि दाह होन अति लागा। भयउ परब बिनु रबि उपरागा ॥
मंदोदरि उर कंपति भारी। प्रतिमा स्त्रवहिं नयन मग बारी ॥
छंद — मूल पाठ
प्रतिमा रुदहिं पबिपात नभ अति बात बह डोलति मही।
बरषहिं बलाहक रुधिर कच रज असुभ अति सक को कही ॥
उतपात अमित बिलोकि नभ सुर बिकल बोलहि जय जए।
सुर सभय जानि कृपाल रघुपति चाप सर जोरत भए ॥
दोहा — मूल पाठ
खैचि सरासन श्रवन लगि छाड़े सर एकतीस।
रघुनायक सायक चले मानहुँ काल फनीस ॥ १०२ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
रावण के सिर कटकर फिर बढ़ते हैं। राम विभीषण की ओर देखते हैं। वे बताते हैं कि उसकी नाभि में अमृत होने से वह जीवित है। तब राम इकतीस बाण संधान करते हैं। रावण के अंत के समय अनेक अशुभ संकेत होते हैं और भयभीत देवता प्रभु की जय कहते हैं।
सायक एक नाभि सर सोषा। अपर लगे भुज सिर करि रोषा ॥
लै सिर बाहु चले नाराचा। सिर भुज हीन रुंड महि नाचा ॥
धरनि धसइ धर धाव प्रचंडा। तब सर हति प्रभु कृत दुइ खंडा ॥
गर्जेउ मरत घोर रव भारी। कहाँ रामु रन हतौं पचारी ॥
डोली भूमि गिरत दसकंधर। छुभित सिंधु सरि दिग्गज भूधर ॥
धरनि परेउ द्वौ खंड बढ़ाई। चापि भालु मर्कट समुदाई ॥
मंदोदरि आगें भुज सीसा। धरि सर चले जहाँ जगदीसा ॥
प्रबिसे सब निषंग महु जाई। देखि सुरन्ह दुंदुभीं बजाई ॥
तासु तेज समान प्रभु आनन। हरषे देखि संभु चतुरानन ॥
जय जय धुनि पूरी ब्रह्मंडा। जय रघुबीर प्रबल भुजदंडा ॥
बरषहि सुमन देव मुनि बृंदा। जय कृपाल जय जयति मुकुंदा ॥
छंद — मूल पाठ
जय कृपा कंद मुकंद द्वंद हरन सरन सुखप्रद प्रभो।
खल दल बिदारन परम कारन कारुनीक सदा बिभो ॥
सुर सुमन बरषहिं हरष संकुल बाज दुंदुभि गहगही।
संग्राम अंगन राम अंग अनंग बहु सोभा लही ॥
सिर जटा मुकुट प्रसून बिच बिच अति मनोहर राजहीं।
जनु नीलगिरि पर तड़ित पटल समेत उड़ुगन भ्राजहीं ॥
भुजदंड सर कोदंड फेरत रुधिर कन तन अति बने।
जनु रायमुनीं तमाल पर बैठीं बिपुल सुख आपने ॥
दोहा — मूल पाठ
कृपादृष्टि करि प्रभु अभय किए सुर बृंद।
भालु कीस सब हरषे जय सुख धाम मुकंद ॥ १०३ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
राम का एक बाण नाभि का अमृत सुखाता है और अन्य बाण सिर-भुजाएँ काट देते हैं। विशाल धड़ को भी वे दो भाग करते हैं। रावण गिरता है और उसका तेज राम में समा जाता है। देवता-मुनि पुष्प बरसाते हैं; प्रभु अपनी कृपादृष्टि से सबको निर्भय करते हैं।
अहह नाथ रघुनाथ सम कृपासिंधु नहिं आन।
जोगि बृंद दुर्लभ गति तोहि दीन्हि भगवान ॥ १०४ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
मंदोदरी रावण की दशा देखकर उसके पुराने प्रताप का स्मरण करती है। वह कहती है कि काल के वश में उसने जगत के स्वामी को मनुष्य समझा और हित की बात नहीं मानी। फिर वह राम की अद्वितीय कृपा का वंदन करती है, जिन्होंने रावण को भी दुर्लभ गति दी।
मंदोदरी बचन सुनि काना। सुर मुनि सिद्ध सबन्हि सुख माना ॥
अज महेस नारद सनकादी। जे मुनिबर परमारथबादी ॥
भरि लोचन रघुपतिहि निहारी। प्रेम मगन सब भए सुखारी ॥
रुदन करत देखीं सब नारी। गयउ बिभीषनु मन दुख भारी ॥
बंधु दसा बिलोकि दुख कीन्हा। तब प्रभु अनुजहि आयसु दीन्हा ॥
लछिमन तेहि बहु बिधि समुझायो। बहुरि बिभीषन प्रभु पहिं आयो ॥
कृपादृष्टि प्रभु ताहि बिलोका। करहु क्रिया परिहरि सब सोका ॥
कीन्हि क्रिया प्रभु आयसु मानी। बिधिवत देस काल जियँ जानी ॥
दोहा — मूल पाठ
मंदोदरी आदि सब देइ तिलांजलि ताहि।
भवन गई रघुपति गुन गन बरनत मन माहि ॥ १०५ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
मंदोदरी की वाणी सुनकर देवता और मुनि राम को प्रेम से देखते हैं। विभीषण भाई की दशा से दुःखी होते हैं। लक्ष्मण उन्हें समझाते हैं और राम शोक छोड़कर विधिपूर्वक अंतिम क्रिया करने की आज्ञा देते हैं। स्त्रियाँ तिलांजलि देकर लौटती हैं।
आइ बिभीषन पुनि सिरु नायो। कृपासिंधु तब अनुज बोलायो ॥
तुम्ह कपीस अंगद नल नीला। जामवंत मारुति नयसीला ॥
सब मिलि जाहु बिभीषन साथा। सारेहु तिलक कहेउ रघुनाथा ॥
पिता बचन मैं नगर न आवउँ। आपु सरिस कपि अनुज पठावउँ ॥
तुरत चले कपि सुनि प्रभु बचना। कीन्ही जाइ तिलक की रचना ॥
सादर सिंहासन बैठारी। तिलक सारि अस्तुति अनुसारी ॥
जोरि पानि सबहीं सिर नाए। सहित बिभीषन प्रभु पहिं आए ॥
तब रघुबीर बोलि कपि लीन्हे। कहि प्रिय बचन सुखी सब कीन्हे ॥
छंद — मूल पाठ
किए सुखी कहि बानी सुधा सम बल तुम्हारें रिपु हयो।
पायो बिभीषन राज तिहुँ पुर जसु तुम्हारो नित नयो ॥
मोहि सहित सुभ कीरति तुम्हारी परम प्रीति जो गाइहैं।
संसार सिंधु अपार पार प्रयास बिनु नर पाइहैं ॥
दोहा — मूल पाठ
प्रभु के बचन श्रवन सुनि नहिं अघाहिं कपि पुंज।
बार बार सिर नावहिं गहहिं सकल पद कंज ॥ १०६ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
पिता के वचन के कारण राम नगर में प्रवेश नहीं करते। वे लक्ष्मण और प्रमुख वानरों को विभीषण का राज्याभिषेक करने भेजते हैं। लौटने पर प्रभु विजय का यश अपने साथियों को देते हैं। उनकी अमृत जैसी प्रेमभरी वाणी सुनकर वानर बार-बार चरणों में प्रणाम करते हैं।
अति हरष मन तन पुलक लोचन सजल कह पुनि पुनि रमा।
का देउँ तोहि त्रेलोक महुँ कपि किमपि नहिं बानी समा ॥
सुनु मातु मैं पायो अखिल जग राजु आजु न संसयं।
रन जीति रिपुदल बंधु जुत पस्यामि राममनामयं ॥
दोहा — मूल पाठ
सुनु सुत सदगुन सकल तव हृदयँ बसहुँ हनुमंत।
सानुकूल कोसलपति रहहुँ समेत अनंत ॥ १०७ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
राम की आज्ञा से हनुमान सीताजी को सबकी कुशल, रावण-वध और विभीषण के राज्याभिषेक का समाचार देते हैं। सीताजी अत्यंत प्रसन्न होकर उन्हें सद्गुणों और राम-लक्ष्मण की अनुकूलता का आशीर्वाद देती हैं। हनुमान राम के स्वस्थ दर्शन को ही अपना सबसे बड़ा पुरस्कार बताते हैं।
सीताजी राम के दर्शन की इच्छा कहती हैं। प्रभु की आज्ञा से विभीषण और हनुमान उन्हें सम्मान सहित लाते हैं। राम उन्हें पैदल लाने को कहते हैं ताकि वानर अपनी जननी की तरह दर्शन कर सकें। कवि पूर्व की अग्नि-स्थापना वाली लीला की ओर संकेत करते हैं और आगे के अग्नि-प्रवेश का कारण बताते हैं।
प्रभु के बचन सीस धरि सीता। बोली मन क्रम बचन पुनीता ॥
लछिमन होहु धरम के नेगी। पावक प्रगट करहु तुम्ह बेगी ॥
सुनि लछिमन सीता कै बानी। बिरह बिबेक धरम निति सानी ॥
लोचन सजल जोरि कर दोऊ। प्रभु सन कछु कहि सकत न ओऊ ॥
देखि राम रुख लछिमन धाए। पावक प्रगटि काठ बहु लाए ॥
पावक प्रबल देखि बैदेही। हृदयँ हरष नहिं भय कछु तेही ॥
जौं मन बच क्रम मम उर माहीं। तजि रघुबीर आन गति नाहीं ॥
तौ कृसानु सब कै गति जाना। मो कहुँ होउ श्रीखंड समाना ॥
छंद — मूल पाठ
श्रीखंड सम पावक प्रबेस कियो सुमिरि प्रभु मैथिली।
जय कोसलेस महेस बंदित चरन रति अति निर्मली ॥
प्रतिबिंब अरु लौकिक कलंक प्रचंड पावक महुँ जरे।
प्रभु चरित काहुँ न लखे नभ सुर सिद्ध मुनि देखहिं खरे ॥ १ ॥
धरि रूप पावक पानि गहि श्री सत्य श्रुति जग बिदित जो।
जिमि छीरसागर इंदिरा रामहि समर्पी आनि सो ॥
सो राम बाम बिभाग राजति रुचिर अति सोभा भली।
नव नील नीरज निकट मानहुँ कनक पंकज की कली ॥ २ ॥
जनकसुता समेत प्रभु सोभा अमित अपार।
देखि भालु कपि हरषे जय रघुपति सुख सार ॥ १०९(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
सीताजी मन-वचन-कर्म की रामनिष्ठा का स्मरण करके अग्नि में प्रवेश करती हैं। तुलसीदास इसे पूर्ववर्णित लीला का समापन बताते हैं: प्रतिबिंब और लौकिक कलंक अग्नि में मिटते हैं। अग्निदेव प्रकट होकर सीताजी को राम को समर्पित करते हैं। उनके बाएँ भाग में सीता की शोभा देखकर सब हर्षित होते हैं।
तब रघुपति अनुसासन पाई। मातलि चलेउ चरन सिरु नाई ॥
आए देव सदा स्वारथी। बचन कहहिं जनु परमारथी ॥
दीन बंधु दयाल रघुराया। देव कीन्हि देवन्ह पर दाया ॥
बिस्व द्रोह रत यह खल कामी। निज अघ गयउ कुमारगगामी ॥
तुम्ह समरूप ब्रह्म अबिनासी। सदा एकरस सहज उदासी ॥
अकल अगुन अज अनघ अनामय। अजित अमोघसक्ति करुनामय ॥
मीन कमठ सूकर नरहरी। बामन परसुराम बपु धरी ॥
जब जब नाथ सुरन्ह दुखु पायो। नाना तनु धरि तुम्हइँ नसायो ॥
यह खल मलिन सदा सुरद्रोही। काम लोभ मद रत अति कोही ॥
अधम सिरोमनि तव पद पावा। यह हमरे मन बिसमय आवा ॥
हम देवता परम अधिकारी। स्वारथ रत प्रभु भगति बिसारी ॥
भव प्रबाहँ संतत हम परे। अब प्रभु पाहि सरन अनुसरे ॥
दोहा — मूल पाठ
करि बिनती सुर सिद्ध सब रहे जहँ तहँ कर जोरि।
अति सप्रेम तन पुलकि बिधि अस्तुति करत बहोरि ॥ ११० ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
मातलि आज्ञा लेकर लौटते हैं। देवता राम को अविनाशी, करुणामय ब्रह्म और अनेक अवतारों में रक्षा करने वाला कहते हैं। रावण को भी प्रभु के चरण मिलने पर वे आश्चर्य करते और अपनी स्वार्थवृत्ति स्वीकारते हैं। भक्ति भूलकर संसार में पड़े रहने से बचाने की प्रार्थना करते हैं।
जय राम सदा सुखधाम हरे। रघुनायक सायक चाप धरे ॥
भव बारन दारन सिंह प्रभो। गुन सागर नागर नाथ बिभो ॥
तन काम अनेक अनूप छबी। गुन गावत सिद्ध मुनींद्र कबी ॥
जसु पावन रावन नाग महा। खगनाथ जथा करि कोप गहा ॥
जन रंजन भंजन सोक भयं। गतक्रोध सदा प्रभु बोधमयं ॥
अवतार उदार अपार गुनं। महि भार बिभंजन ग्यानघनं ॥
अज ब्यापकमेकमनादि सदा। करुनाकर राम नमामि मुदा ॥
रघुबंस बिभूषन दूषन हा। कृत भूप बिभीषन दीन रहा ॥
गुन ग्यान निधान अमान अजं। नित राम नमामि बिभुं बिरजं ॥
भुजदंड प्रचंड प्रताप बलं। खल बृंद निकंद महा कुसलं ॥
बिनु कारन दीन दयाल हितं। छबि धाम नमामि रमा सहितं ॥
भव तारन कारन काज परं। मन संभव दारुन दोष हरं ॥
सर चाप मनोहर त्रोन धरं। जरजारुन लोचन भूपबरं ॥
सुख मंदिर सुंदर श्रीरमनं। मद मार मुधा ममता समनं ॥
अनवद्य अखंड न गोचर गो। सबरूप सदा सब होइ न गो ॥
इति बेद बदंति न दंतकथा। रबि आतप भिन्नमभिन्न जथा ॥
कृतकृत्य बिभो सब बानर ए। निरखंति तवानन सादर ए ॥
धिग जीवन देव सरीर हरे। तव भक्ति बिना भव भूलि परे ॥
अब दीन दयाल दया करिऐ। मति मोरि बिभेदकरी हरिऐ ॥
जेहि ते बिपरीत क्रिया करिऐ। दुख सो सुख मानि सुखी चरिऐ ॥
खल खंडन मंडन रम्य छमा। पद पंकज सेवित संभु उमा ॥
नृप नायक दे बरदानमिदं। चरनांबुज प्रेम सदा सुभदं ॥
दोहा — मूल पाठ
बिनय कीन्हि चतुरानन प्रेम पुलक अति गात।
सोभासिंधु बिलोकत लोचन नहीं अघात ॥ १११ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
ब्रह्माजी राम के सौंदर्य, पराक्रम, निष्कारण दया और जगत के कल्याण की स्तुति करते हैं। वे भक्ति के बिना देवजीवन को भी अधूरा कहते हैं। भेद उत्पन्न करने वाली बुद्धि दूर करने तथा राम के चरणकमलों में सदा शुभ प्रेम देने का वर माँगते हैं।
तेहि अवसर दसरथ तहँ आए। तनय बिलोकि नयन जल छाए ॥
अनुज सहित प्रभु बंदन कीन्हा। आसिरबाद पिताँ तब दीन्हा ॥
तात सकल तव पुन्य प्रभाऊ। जीत्यों अजय निसाचर राऊ ॥
सुनि सुत बचन प्रीति अति बाढ़ी। नयन सलिल रोमावलि ठाढ़ी ॥
रघुपति प्रथम प्रेम अनुमाना। चितइ पितहि दीन्हेउ दृढ़ ग्याना ॥
ताते उमा मोच्छ नहिं पायो। दसरथ भेद भगति मन लायो ॥
सगुनोपासक मोच्छ न लेहीं। तिन्ह कहुँ राम भगति निज देहीं ॥
बार बार करि प्रभुहि प्रनामा। दसरथ हरषि गए सुरधामा ॥
दोहा — मूल पाठ
अनुज जानकी सहित प्रभु कुसल कोसलाधीस।
सोभा देखि हरषि मन अस्तुति कर सुर ईस ॥ ११२ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
दशरथजी आकर राम-लक्ष्मण को आशीर्वाद देते हैं। राम विजय का श्रेय पिता के पुण्य को देते हैं। प्रभु उन्हें दृढ़ ज्ञान प्रदान करते हैं। शिव सगुण भक्ति की विशेषता बताते हैं कि ऐसे उपासक भक्ति को ही चाहते हैं। दशरथजी प्रसन्न होकर देवलोक लौटते हैं।
जय राम सोभा धाम। दायक प्रनत बिश्राम ॥
धृत त्रोन बर सर चाप। भुजदंड प्रबल प्रताप ॥ १ ॥
जय दूषनारि खरारि। मर्दन निसाचर धारि ॥
यह दुष्ट मारेउ नाथ। भए देव सकल सनाथ ॥ २ ॥
जय हरन धरनी भार। महिमा उदार अपार ॥
जय रावनारि कृपाल। किए जातुधान बिहाल ॥ ३ ॥
लंकेस अति बल गर्ब। किए बस्य सुर गंधर्ब ॥
मुनि सिद्ध नर खग नाग। हठि पंथ सब कें लाग ॥ ४ ॥
परद्रोह रत अति दुष्ट। पायो सो फलु पापिष्ट ॥
अब सुनहु दीन दयाल। राजीव नयन बिसाल ॥ ५ ॥
मोहि रहा अति अभिमान। नहिं कोउ मोहि समान ॥
अब देखि प्रभु पद कंज। गत मान प्रद दुख पुंज ॥ ६ ॥
कोउ ब्रह्म निर्गुन ध्याव। अब्यक्त जेहि श्रुति गाव ॥
मोहि भाव कोसल भूप। श्रीराम सगुन सरूप ॥ ७ ॥
बैदेहि अनुज समेत। मम हृदयँ करहु निकेत ॥
मोहि जानिए निज दास। दे भक्ति रमानिवास ॥ ८ ॥
दे भक्ति रमानिवास त्रास हरन सरन सुखदायकं।
सुख धाम राम नमामि काम अनेक छबि रघुनायकं ॥
सुर बृंद रंजन द्वंद भंजन मनुज तनु अतुलितबलं।
ब्रह्मादि संकर सेब्य राम नमामि करुना कोमलं ॥
इंद्र राम की विजय और संसार का भार हरने की स्तुति करते हैं। वे अपना पुराना अभिमान स्वीकारकर कहते हैं कि प्रभु के चरणों से वह दूर हुआ। सीता और लक्ष्मण सहित राम को हृदय में बसाने, अपना सेवक जानने और भक्ति देने की प्रार्थना करते हैं।
परम प्रीति कर जोरि जुग नलिन नयन भरि बारि।
पुलकित तन गदगद गिराँ बिनय करत त्रिपुरारि ॥ ११४(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
राम इंद्र से अपने लिए प्राण देने वाले वानर-भालुओं को जिलाने को कहते हैं। अमृतवर्षा से वे उठकर प्रसन्नतापूर्वक प्रभु के पास आते हैं। राक्षसों की मुक्ति का प्रसंग राम की कृपा के रूप में बताया गया है। देवताओं के विदा होने पर शिव प्रेम से स्तुति करने आते हैं।
शिव राम से रक्षा, मोह और संशय का नाश तथा काम-क्रोध-अभिमान से मुक्ति की प्रार्थना करते हैं। वे सीता और लक्ष्मण सहित राम को अपने हृदय में सदा बसाने को कहते हैं। अयोध्या में राज्याभिषेक के समय फिर दर्शन करने आने का निवेदन करते हैं।
करि बिनती जब संभु सिधाए। तब प्रभु निकट बिभीषनु आए ॥
नाइ चरन सिरु कह मृदु बानी। बिनय सुनहु प्रभु सारँगपानी ॥
सकुल सदल प्रभु रावन मार् यो। पावन जस त्रिभुवन बिस्तार् यो ॥
दीन मलीन हीन मति जाती। मो पर कृपा कीन्हि बहु भाँती ॥
अब जन गृह पुनीत प्रभु कीजे। मज्जनु करिअ समर श्रम छीजे ॥
देखि कोस मंदिर संपदा। देहु कृपाल कपिन्ह कहुँ मुदा ॥
सब बिधि नाथ मोहि अपनाइअ। पुनि मोहि सहित अवधपुर जाइअ ॥
सुनत बचन मृदु दीनदयाला। सजल भए द्वौ नयन बिसाला ॥
दोहा — मूल पाठ
तोर कोस गृह मोर सब सत्य बचन सुनु भ्रात।
भरत दसा सुमिरत मोहि निमिष कल्प सम जात ॥ ११६(क) ॥
दोहा — मूल पाठ
तापस बेष गात कृस जपत निरंतर मोहि।
देखौं बेगि सो जतनु करु सखा निहोरउँ तोहि ॥ ११६(ख) ॥
दोहा — मूल पाठ
बीतें अवधि जाउँ जौं जिअत न पावउँ बीर।
सुमिरत अनुज प्रीति प्रभु पुनि पुनि पुलक सरीर ॥ ११६(ग) ॥
दोहा — मूल पाठ
करेहु कल्प भरि राजु तुम्ह मोहि सुमिरेहु मन माहिं।
पुनि मम धाम पाइहहु जहाँ संत सब जाहिं ॥ ११६(घ) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
विभीषण राम को अपने घर और संपत्ति स्वीकारने तथा विश्राम करने का आग्रह करते हैं। राम प्रेम से कहते हैं कि उनका सब कुछ अपना है, पर भरत की दशा स्मरण करके क्षण भी कल्प समान लग रहा है। वे शीघ्र अयोध्या लौटने की व्यवस्था चाहते और विभीषण को राज्य तथा अंत में अपने धाम का आशीर्वाद देते हैं।
सुनत बिभीषन बचन राम के। हरषि गहे पद कृपाधाम के ॥
बानर भालु सकल हरषाने। गहि प्रभु पद गुन बिमल बखाने ॥
बहुरि बिभीषन भवन सिधायो। मनि गन बसन बिमान भरायो ॥
लै पुष्पक प्रभु आगें राखा। हँसि करि कृपासिंधु तब भाषा ॥
चढ़ि बिमान सुनु सखा बिभीषन। गगन जाइ बरषहु पट भूषन ॥
नभ पर जाइ बिभीषन तबही। बरषि दिए मनि अंबर सबही ॥
जोइ जोइ मन भावइ सोइ लेहीं। मनि मुख मेलि डारि कपि देहीं ॥
हँसे रामु श्री अनुज समेता। परम कौतुकी कृपा निकेता ॥
दोहा — मूल पाठ
मुनि जेहि ध्यान न पावहिं नेति नेति कह बेद।
कृपासिंधु सोइ कपिन्ह सन करत अनेक बिनोद ॥ ११७(क) ॥
दोहा — मूल पाठ
उमा जोग जप दान तप नाना मख ब्रत नेम।
राम कृपा नहि करहिं तसि जसि निष्केवल प्रेम ॥ ११७(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
विभीषण पुष्पक विमान में वस्त्र और आभूषण लाते हैं। राम उन्हें आकाश से बाँटने को कहते हैं। वानरों की सरल चेष्टाएँ देखकर राम, सीता और लक्ष्मण हँसते हैं। शिव समझाते हैं कि निष्कपट प्रेम से प्रभु जैसी कृपा करते हैं, वैसी केवल विविध साधनों से नहीं होती।
भालु कपिन्ह पट भूषन पाए। पहिरि पहिरि रघुपति पहिं आए ॥
नाना जिनस देखि सब कीसा। पुनि पुनि हँसत कोसलाधीसा ॥
चितइ सबन्हि पर कीन्हि दाया। बोले मृदुल बचन रघुराया ॥
तुम्हरें बल मैं रावनु मार् यो। तिलक बिभीषन कहँ पुनि सार् यो ॥
निज निज गृह अब तुम्ह सब जाहू। सुमिरेहु मोहि डरपहु जनि काहू ॥
सुनत बचन प्रेमाकुल बानर। जोरि पानि बोले सब सादर ॥
प्रभु जोइ कहहु तुम्हहि सब सोहा। हमरे होत बचन सुनि मोहा ॥
दीन जानि कपि किए सनाथा। तुम्ह त्रेलोक ईस रघुनाथा ॥
सुनि प्रभु बचन लाज हम मरहीं। मसक कहूँ खगपति हित करहीं ॥
देखि राम रुख बानर रीछा। प्रेम मगन नहिं गृह कै ईछा ॥
दोहा — मूल पाठ
प्रभु प्रेरित कपि भालु सब राम रूप उर राखि।
हरष बिषाद सहित चले बिनय बिबिध बिधि भाषि ॥ ११८(क) ॥
दोहा — मूल पाठ
कपिपति नील रीछपति अंगद नल हनुमान।
सहित बिभीषन अपर जे जूथप कपि बलवान ॥ ११८(ख) ॥
दोहा — मूल पाठ
कहि न सकहिं कछु प्रेम बस भरि भरि लोचन बारि।
सन्मुख चितवहिं राम तन नयन निमेष निवारि ॥ ११८(ग) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
राम साथियों को विजय का श्रेय देकर निर्भय अपने घर जाने और अपना स्मरण रखने को कहते हैं। वानर उनकी दया के आगे अपनी सेवा को बहुत छोटा मानते हैं। कुछ विदा होते हैं, जबकि सुग्रीव, हनुमान, अंगद आदि प्रेम में डूबे प्रभु को निहारते रहते हैं।
अतिसय प्रीति देख रघुराई। लिन्हे सकल बिमान चढ़ाई ॥
मन महुँ बिप्र चरन सिरु नायो। उत्तर दिसिहि बिमान चलायो ॥
चलत बिमान कोलाहल होई। जय रघुबीर कहइ सबु कोई ॥
सिंहासन अति उच्च मनोहर। श्री समेत प्रभु बैठै ता पर ॥
राजत रामु सहित भामिनी। मेरु सृंग जनु घन दामिनी ॥
रुचिर बिमानु चलेउ अति आतुर। कीन्ही सुमन बृष्टि हरषे सुर ॥
परम सुखद चलि त्रिबिध बयारी। सागर सर सरि निर्मल बारी ॥
सगुन होहिं सुंदर चहुँ पासा। मन प्रसन्न निर्मल नभ आसा ॥
कह रघुबीर देखु रन सीता। लछिमन इहाँ हत्यो इँद्रजीता ॥
हनूमान अंगद के मारे। रन महि परे निसाचर भारे ॥
कुंभकरन रावन द्वौ भाई। इहाँ हते सुर मुनि दुखदाई ॥
दोहा — मूल पाठ
इहाँ सेतु बाँध्यो अरु थापेउँ सिव सुख धाम।
सीता सहित कृपानिधि संभुहि कीन्ह प्रनाम ॥ ११९(क) ॥
दोहा — मूल पाठ
जहँ जहँ कृपासिंधु बन कीन्ह बास बिश्राम।
सकल देखाए जानकिहि कहे सबन्हि के नाम ॥ ११९(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
साथियों का प्रेम देखकर राम उन्हें भी विमान पर बैठा लेते हैं। उत्तर दिशा में चलते हुए वे सीता को युद्धस्थल, लक्ष्मण की विजय, हनुमान-अंगद के पराक्रम, सेतु और रामेश्वर का स्थान दिखाते हैं। दोनों शिव को प्रणाम करते हैं; वनवास के अन्य पड़ाव भी स्मरण कराते हैं।
राम ऋषियों के आश्रम और चित्रकूट होते हुए यमुना, गंगा, प्रयाग तथा त्रिवेणी का महत्व सीता को बताते हैं। अयोध्या का दर्शन करके वे प्रेम से प्रणाम करते हैं। त्रिवेणी में स्नान और ब्राह्मणों को विविध दान करते हैं।
प्रभु हनुमंतहि कहा बुझाई। धरि बटु रूप अवधपुर जाई ॥
भरतहि कुसल हमारि सुनाएहु। समाचार लै तुम्ह चलि आएहु ॥
तुरत पवनसुत गवनत भयउ। तब प्रभु भरद्वाज पहिं गयऊ ॥
नाना बिधि मुनि पूजा कीन्ही। अस्तुती करि पुनि आसिष दीन्ही ॥
मुनि पद बंदि जुगल कर जोरी। चढ़ि बिमान प्रभु चले बहोरी ॥
इहाँ निषाद सुना प्रभु आए। नाव नाव कहँ लोग बोलाए ॥
सुरसरि नाघि जान तब आयो। उतरेउ तट प्रभु आयसु पायो ॥
तब सीताँ पूजी सुरसरी। बहु प्रकार पुनि चरनन्हि परी ॥
दीन्हि असीस हरषि मन गंगा। सुंदरि तव अहिवात अभंगा ॥
सुनत गुहा धायउ प्रेमाकुल। आयउ निकट परम सुख संकुल ॥
प्रभुहि सहित बिलोकि बैदेही। परेउ अवनि तन सुधि नहिं तेही ॥
प्रीति परम बिलोकि रघुराई। हरषि उठाइ लियो उर लाई ॥
छंद — मूल पाठ
लियो हृदयँ लाइ कृपा निधान सुजान रायँ रमापती।
बैठारि परम समीप बूझी कुसल सो कर बीनती।
अब कुसल पद पंकज बिलोकि बिरंचि संकर सेब्य जे।
सुख धाम पूरनकाम राम नमामि राम नमामि ते ॥ १ ॥
सब भाँति अधम निषाद सो हरि भरत ज्यों उर लाइयो।
मतिमंद तुलसीदास सो प्रभु मोह बस बिसराइयो ॥
यह रावनारि चरित्र पावन राम पद रतिप्रद सदा।
कामादिहर बिग्यानकर सुर सिद्ध मुनि गावहिं मुदा ॥ २ ॥
दोहा — मूल पाठ
समर बिजय रघुबीर के चरित जे सुनहिं सुजान।
बिजय बिबेक बिभूति नित तिन्हहि देहिं भगवान ॥ १२१(क) ॥
दोहा — मूल पाठ
यह कलिकाल मलायतन मन करि देखु बिचार।
श्रीरघुनाथ नाम तजि नाहिन आन अधार ॥ १२१(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
राम हनुमान को ब्राह्मण-बटु का रूप धरकर भरत को कुशल समाचार देने भेजते हैं। स्वयं भरद्वाज का आशीर्वाद लेकर आगे बढ़ते हैं। गंगातट पर सीता पूजन करती हैं और राम निषादराज को भरत समान गले लगाते हैं। अंतिम दोहे कथा के कल्याणकारी फल तथा कलियुग में रामनाम के आधार का स्मरण कराते हैं।
श्रीरामचरितमानस के छठे सोपान का मूल पाठ यहाँ समाप्त होता है।
मूल पाठ और अर्थ के बारे में
मूल रचना गोस्वामी तुलसीदास की है। मूल पाठ के लिए देवनागरी डिजिटल संस्करण और संदिग्ध स्थानों के मिलान के लिए मुद्रित संस्करण का संदर्भ लिया गया है। संस्करणों में वर्तनी और पाठांतर मिल सकते हैं। हिंदी अर्थ भक्ति भावना के लिए स्वतंत्र रूप से लिखे गए हैं।
🚩 श्री राम भजन ओ मेरे रघुवर तू ही सहारा है प्रभु श्रीराम के प्रति प्रेम, विश्वास और पूर्ण समर्पण से भरा सुंदर भक्तिमय भजन। ▶ Instagram पर भजन देखें भजन लिरिक्स ॥ श्री राम ॥ ओ मेरे रघुवर तू ही सहारा है, मेरी नैय्यां का तू ही किनारा है।। ओ मेरे रघुवर तू ही सहारा है, मेरे रघुवर तू ही सहारा है।। मेरे ख्वाबों में तू, मेरी स्वासों में तू, मेरे दिल की धड़कन में, बस तू ही तू। मेरे ख्वाबों में तू, मेरी स्वासों में तू, मेरे दिल की धड़कन में, बस तू ही तू।। दीवाने तेरे प्यार में, बड़ा ही बुरा हाल, है पड़ा हूँ तेरे दर पे, ना होश ना ख्याल। मेरी नैय्यां का तू ही किनारा है, ओ मेरे रघुवर तू ही सहारा है, मेरे रघुवर तू ही सहारा है।। मेरी नैय्यां का तू ही किनारा है।। अंधेरों में जैसे उजाले हो तुम उजाले ही तुम, गिरतों को कितने सम्हाले हो तुम, सम्हाले ही तुम। तेरे बिना रघुवर मेरी, दुनियाँ वीरान है, तेरी किरपा से मेरी दुनियाँ में पहिचान है। मेरी नैय्यां का तू ही किनारा है, ओ मेरे रघुवर तू ही...
🚩 श्रीरामचरितमानस श्रीरामचरितमानस की 24 प्रसिद्ध चौपाइयाँ प्रेम, भक्ति, सत्संग, कर्म, सद्बुद्धि, परोपकार और प्रभु श्रीराम की कृपा का मार्ग दिखाने वाली श्रीरामचरितमानस की प्रसिद्ध चौपाइयाँ सरल हिंदी अर्थ सहित। श्रीरामचरितमानस गोस्वामी तुलसीदासजी की अमर रचना है। इसमें प्रभु श्रीराम की कथा के साथ जीवन, भक्ति, धर्म, प्रेम, कर्म, सदाचार, सत्संग और लोककल्याण की अनेक शिक्षाएँ मिलती हैं। यहाँ 24 प्रसिद्ध चौपाइयों को सरल भावार्थ के साथ प्रस्तुत किया गया है, ताकि उनके संदेश को सहज रूप से समझा और जीवन में अपनाया जा सके। 📜 इस संग्रह में ❤️ प्रेम और भक्ति 🌿 जीवन और नीति 🙏 संकट और विश्वास 🚩 रामराज्य और आदर्श जीवन ❤️ प्रेम और भक्ति प्रभु-प्रेम, समर्पण और निर्मल हृदय का संदेश 01 प्रभु को केवल प्रेम प्रिय है रामहि केवल प्रेमु पिआरा। जानि लेउ जो जाननिहारा॥ ...
🌺 श्रीरामचरितमानस • बालकाण्ड जय जय गिरिवरराज किशोरी — सीता जी की गौरी स्तुति पुष्पवाटिका में प्रभु श्रीराम के दर्शन के बाद माता सीता द्वारा माता गौरी से की गई पावन प्रार्थना, संपूर्ण प्रसंग और सरल हिंदी अर्थ सहित। माता सीता ने गौरी स्तुति कब की? श्रीरामचरितमानस के बालकाण्ड में जनकपुर की पुष्पवाटिका का अत्यंत सुंदर प्रसंग आता है। माता सीता अपनी सखियों के साथ गौरी पूजन के लिए आई थीं। इसी वाटिका में उन्होंने पहली बार प्रभु श्रीराम को देखा। श्रीराम के दिव्य स्वरूप को देखकर उनका मन प्रेम से भर गया। उसी समय उन्हें अपने पिता महाराज जनक का वह प्रण भी स्मरण हुआ कि जो शिवजी के महान धनुष को उठाकर तोड़ेगा, उसी से सीता का विवाह होगा। माता सीता श्रीराम की छवि को हृदय में धारण करके पुनः माता भवानी के मंदिर में गईं और हाथ जोड़कर प्रार्थना करने लगीं। 🌸 पुष्पवाटिका में श्रीराम के दर्शन 🏹 पिता जनक के प्रण का स्मरण 🙏 गौरी माता से प्रार्थना ...
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