श्रीरामचरितमानस उत्तरकाण्ड भाग 2 | दोहा 66–130 | मूल पाठ और सरल हिंदी अर्थ

भक्ति भावना · गोस्वामी तुलसीदास कृत श्रीरामचरितमानस

उत्तरकाण्ड · भाग 2

दोहा 66–130 · मूल पाठ और सरल हिंदी अर्थ
सम्पूर्ण काण्ड का अंतिम भाग · कुल दो भाग

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मूल चौपाइयाँ, छंद, दोहे और सोरठे उनके क्रम में हैं। प्रत्येक क्रमांक के बाद स्वतंत्र रूप से लिखा समेकित सरल हिंदी अर्थ दिया है; यह शब्द-शब्द अनुवाद नहीं है। संवाद को उसके प्रसंग सहित पढ़ें। इस भाग के अंत में काण्ड का समापन है।

इस भाग की क्रम-सूची खोलें · 66–130
उत्तरकाण्ड · क्रमांक 66

अरण्य और किष्किन्धा की कथा का पुनःस्मरण

चौपाइयाँ — मूल पाठ

कहि दंडक बन पावनताई। गीध मइत्री पुनि तेहिं गाई ॥ पुनि प्रभु पंचवटीं कृत बासा। भंजी सकल मुनिन्ह की त्रासा ॥ पुनि लछिमन उपदेस अनूपा। सूपनखा जिमि कीन्हि कुरूपा ॥ खर दूषन बध बहुरि बखाना। जिमि सब मरमु दसानन जाना ॥ दसकंधर मारीच बतकहीं। जेहि बिधि भई सो सब तेहिं कही ॥ पुनि माया सीता कर हरना। श्रीरघुबीर बिरह कछु बरना ॥ पुनि प्रभु गीध क्रिया जिमि कीन्ही। बधि कबंध सबरिहि गति दीन्ही ॥ बहुरि बिरह बरनत रघुबीरा। जेहि बिधि गए सरोबर तीरा ॥

दोहा — मूल पाठ

प्रभु नारद संबाद कहि मारुति मिलन प्रसंग। पुनि सुग्रीव मिताई बालि प्रान कर भंग ॥ ६६(क) ॥

दोहा — मूल पाठ

कपिहि तिलक करि प्रभु कृत सैल प्रबरषन बास। बरनन बर्षा सरद अरु राम रोष कपि त्रास ॥ ६६(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

काकभुशुण्डि दंडकवन, जटायु, पंचवटी, रामगीता, सीताहरण और शबरी के प्रसंग सुनाते हैं। फिर राम-हनुमान मिलन, सुग्रीव-मैत्री, बालि-वध, प्रवरषण पर्वत और वर्षा-शरद का वर्णन करते हैं।

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उत्तरकाण्ड · क्रमांक 67

सीता-खोज से लंकायुद्ध तक

चौपाइयाँ — मूल पाठ

जेहि बिधि कपिपति कीस पठाए। सीता खोज सकल दिसि धाए ॥ बिबर प्रबेस कीन्ह जेहि भाँती। कपिन्ह बहोरि मिला संपाती ॥ सुनि सब कथा समीरकुमारा। नाघत भयउ पयोधि अपारा ॥ लंकाँ कपि प्रबेस जिमि कीन्हा। पुनि सीतहि धीरजु जिमि दीन्हा ॥ बन उजारि रावनहि प्रबोधी। पुर दहि नाघेउ बहुरि पयोधी ॥ आए कपि सब जहँ रघुराई। बैदेही कि कुसल सुनाई ॥ सेन समेति जथा रघुबीरा। उतरे जाइ बारिनिधि तीरा ॥ मिला बिभीषन जेहि बिधि आई। सागर निग्रह कथा सुनाई ॥

दोहा — मूल पाठ

सेतु बाँधि कपि सेन जिमि उतरी सागर पार। गयउ बसीठी बीरबर जेहि बिधि बालिकुमार ॥ ६७(क) ॥

दोहा — मूल पाठ

निसिचर कीस लराई बरनिसि बिबिध प्रकार। कुंभकरन घननाद कर बल पौरुष संघार ॥ ६७(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

सीता की खोज, संपाती, समुद्र-लाँघना और हनुमान की लंका-लीला का सार आता है। फिर विभीषण की शरणागति, सेतु, अंगद-दूताई तथा कुंभकर्ण-मेघनाद के वध का स्मरण है।

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उत्तरकाण्ड · क्रमांक 68

पूरी कथा सुनकर गरुड़ का मोह दूर

चौपाइयाँ — मूल पाठ

निसिचर निकर मरन बिधि नाना। रघुपति रावन समर बखाना ॥ रावन बध मंदोदरि सोका। राज बिभीषण देव असोका ॥ सीता रघुपति मिलन बहोरी। सुरन्ह कीन्ह अस्तुति कर जोरी ॥ पुनि पुष्पक चढ़ि कपिन्ह समेता। अवध चले प्रभु कृपा निकेता ॥ जेहि बिधि राम नगर निज आए। बायस बिसद चरित सब गाए ॥ कहेसि बहोरि राम अभिषैका। पुर बरनत नृपनीति अनेका ॥ कथा समस्त भुसुंड बखानी। जो मैं तुम्ह सन कही भवानी ॥ सुनि सब राम कथा खगनाहा। कहत बचन मन परम उछाहा ॥

सोरठा — मूल पाठ

गयउ मोर संदेह सुनेउँ सकल रघुपति चरित। भयउ राम पद नेह तव प्रसाद बायस तिलक ॥ ६८(क) ॥

सोरठा — मूल पाठ

मोहि भयउ अति मोह प्रभु बंधन रन महुँ निरखि। चिदानंद संदोह राम बिकल कारन कवन। ६८(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

रावण-वध, सीता-मिलन, अयोध्या-वापसी और राज्याभिषेक तक कथा पूरी होती है। गरुड़ कहते हैं कि संदेह मिट गया और रामचरणों में प्रेम हुआ। वे अपने पुराने नागपाश-संबंधी भ्रम का उल्लेख करते हैं।

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उत्तरकाण्ड · क्रमांक 69

भ्रम भी सत्संग का अवसर बना

चौपाइयाँ — मूल पाठ

देखि चरित अति नर अनुसारी। भयउ हृदयँ मम संसय भारी ॥ सोइ भ्रम अब हित करि मैं माना। कीन्ह अनुग्रह कृपानिधाना ॥ जो अति आतप ब्याकुल होई। तरु छाया सुख जानइ सोई ॥ जौं नहिं होत मोह अति मोही। मिलतेउँ तात कवन बिधि तोही ॥ सुनतेउँ किमि हरि कथा सुहाई। अति बिचित्र बहु बिधि तुम्ह गाई ॥ निगमागम पुरान मत एहा। कहहिं सिद्ध मुनि नहिं संदेहा ॥ संत बिसुद्ध मिलहिं परि तेही। चितवहिं राम कृपा करि जेही ॥ राम कृपाँ तव दरसन भयऊ। तव प्रसाद सब संसय गयऊ ॥

दोहा — मूल पाठ

सुनि बिहंगपति बानी सहित बिनय अनुराग। पुलक गात लोचन सजल मन हरषेउ अति काग ॥ ६९(क) ॥

दोहा — मूल पाठ

श्रोता सुमति सुसील सुचि कथा रसिक हरि दास। पाइ उमा अति गोप्यमपि सज्जन करहिं प्रकास ॥ ६९(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

गरुड़ अपने भ्रम को अब कृपा का अवसर मानते हैं, क्योंकि उसी से संत-दर्शन और कथा मिली। वे काकभुशुण्डि के प्रति कृतज्ञ हैं। विनयी, शुद्ध और कथा-प्रेमी श्रोता पाकर संत गूढ़ रहस्य भी प्रकट करते हैं।

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उत्तरकाण्ड · क्रमांक 70

मोह और विकारों की व्यापकता

चौपाइयाँ — मूल पाठ

बोलेउ काकभसुंड बहोरी। खग नाथ पर प्रीति न थोरी ॥ सब बिधि नाथ पूज्य तुम्ह मेरे। कृपापात्र रघुनायक केरे ॥ तुम्हहि न संसय मोह न माया। मो पर नाथ कीन्ह तुम्ह दाया ॥ पठइ मोह मिस खगपति तोही। रघुपति दीन्हि बड़ाई मोही ॥ तुम्ह निज मोह कही खग साईं। सो नहिं कछु आचरज गोसाईं ॥ नारद भव बिरंचि सनकादी। जे मुनिनायक आतमबादी ॥ मोह न अंध कीन्ह केहि केही। को जग काम नचाव न जेही ॥ तृस्नाँ केहि न कीन्ह बौराहा। केहि कर हृदय क्रोध नहिं दाहा ॥

दोहा — मूल पाठ

ग्यानी तापस सूर कबि कोबिद गुन आगार। केहि कै लौभ बिडंबना कीन्हि न एहिं संसार ॥ ७०(क) ॥

दोहा — मूल पाठ

श्री मद बक्र न कीन्ह केहि प्रभुता बधिर न काहि। मृगलोचनि के नैन सर को अस लाग न जाहि ॥ ७०(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

काकभुशुण्डि गरुड़ को राम का कृपापात्र कहते हैं। मोह, काम, तृष्णा, क्रोध, लोभ, धन और पद का अभिमान बड़े ज्ञानियों को भी प्रभावित कर सकता है। इसलिए अपने ज्ञान या सामर्थ्य पर अहंकार नहीं करना चाहिए।

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उत्तरकाण्ड · क्रमांक 71

माया की सेना और रामकृपा

चौपाइयाँ — मूल पाठ

गुन कृत सन्यपात नहिं केही। कोउ न मान मद तजेउ निबेही ॥ जोबन ज्वर केहि नहिं बलकावा। ममता केहि कर जस न नसावा ॥ मच्छर काहि कलंक न लावा। काहि न सोक समीर डोलावा ॥ चिंता साँपिनि को नहिं खाया। को जग जाहि न ब्यापी माया ॥ कीट मनोरथ दारु सरीरा। जेहि न लाग घुन को अस धीरा ॥ सुत बित लोक ईषना तीनी। केहि के मति इन्ह कृत न मलीनी ॥ यह सब माया कर परिवारा। प्रबल अमिति को बरनै पारा ॥ सिव चतुरानन जाहि डेराहीं। अपर जीव केहि लेखे माहीं ॥

दोहा — मूल पाठ

ब्यापि रहेउ संसार महुँ माया कटक प्रचंड ॥ सेनापति कामादि भट दंभ कपट पाषंड ॥ ७१(क) ॥

दोहा — मूल पाठ

सो दासी रघुबीर कै समुझें मिथ्या सोपि। छूट न राम कृपा बिनु नाथ कहउँ पद रोऽपि ॥ ७१(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

चिंता, ममता, ईर्ष्या और इच्छाएँ माया के प्रबल परिवार के रूप में बताई गई हैं। काम आदि उसके सेनापति हैं। फिर भी वह राम की दासी है। केवल अपना अभिमान छोड़कर प्रभु की कृपा से उसका बंधन छूटता है।

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उत्तरकाण्ड · क्रमांक 72

परमात्मा की मानवीय लीला

चौपाइयाँ — मूल पाठ

जो माया सब जगहि नचावा। जासु चरित लखि काहुँ न पावा ॥ सोइ प्रभु भ्रू बिलास खगराजा। नाच नटी इव सहित समाजा ॥ सोइ सच्चिदानंद घन रामा। अज बिग्यान रूपो बल धामा ॥ ब्यापक ब्याप्य अखंड अनंता। अखिल अमोघसक्ति भगवंता ॥ अगुन अदभ्र गिरा गोतीता। सबदरसी अनवद्य अजीता ॥ निर्मम निराकार निरमोहा। नित्य निरंजन सुख संदोहा ॥ प्रकृति पार प्रभु सब उर बासी। ब्रह्म निरीह बिरज अबिनासी ॥ इहाँ मोह कर कारन नाहीं। रबि सन्मुख तम कबहुँ कि जाहीं ॥

दोहा — मूल पाठ

भगत हेतु भगवान प्रभु राम धरेउ तनु भूप। किए चरित पावन परम प्राकृत नर अनुरूप ॥ ७२(क) ॥

दोहा — मूल पाठ

जथा अनेक बेष धरि नृत्य करइ नट कोइ। सोइ सोइ भाव देखावइ आपुन होइ न सोइ ॥ ७२(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

राम अखंड, अनंत और माया से परे सच्चिदानंद हैं। भक्तों के लिए वे राजकुमार का शरीर धारण करके मानवीय चरित्र करते हैं। अभिनेता अनेक भाव दिखाता है, पर वास्तव में वही पात्र नहीं बन जाता; इसी तरह लीला को समझना चाहिए।

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उत्तरकाण्ड · क्रमांक 73

अपना भ्रम प्रभु पर न आरोपें

चौपाइयाँ — मूल पाठ

असि रघुपति लीला उरगारी। दनुज बिमोहनि जन सुखकारी ॥ जे मति मलिन बिषयबस कामी। प्रभु मोह धरहिं इमि स्वामी ॥ नयन दोष जा कहँ जब होई। पीत बरन ससि कहुँ कह सोई ॥ जब जेहि दिसि भ्रम होइ खगेसा। सो कह पच्छिम उयउ दिनेसा ॥ नौकारूढ़ चलत जग देखा। अचल मोह बस आपुहि लेखा ॥ बालक भ्रमहिं न भ्रमहिं गृहादीं। कहहिं परस्पर मिथ्याबादी ॥ हरि बिषइक अस मोह बिहंगा। सपनेहुँ नहिं अग्यान प्रसंगा ॥ मायाबस मतिमंद अभागी। हृदयँ जमनिका बहुबिधि लागी ॥ ते सठ हठ बस संसय करहीं। निज अग्यान राम पर धरहीं ॥

दोहा — मूल पाठ

काम क्रोध मद लोभ रत गृहासक्त दुखरूप। ते किमि जानहिं रघुपतिहि मूढ़ परे तम कूप ॥ ७३(क) ॥

दोहा — मूल पाठ

निर्गुन रूप सुलभ अति सगुन जान नहिं कोइ। सुगम अगम नाना चरित सुनि मुनि मन भ्रम होइ ॥ ७३(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

नेत्र-दोष से चंद्रमा पीला और चलती नाव से संसार चलता दिखाई देता है। वैसे ही जीव अपनी अज्ञानता से प्रभु में मोह मानता है। राम की सगुण लीला सरल दिखकर भी गूढ़ है; विषयासक्ति उसकी सही पहचान में बाधा है।

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उत्तरकाण्ड · क्रमांक 74

कृपा से सेवक का अभिमान दूर

चौपाइयाँ — मूल पाठ

सुनु खगेस रघुपति प्रभुताई। कहउँ जथामति कथा सुहाई ॥ जेहि बिधि मोह भयउ प्रभु मोही। सोउ सब कथा सुनावउँ तोही ॥ राम कृपा भाजन तुम्ह ताता। हरि गुन प्रीति मोहि सुखदाता ॥ ताते नहिं कछु तुम्हहिं दुरावउँ। परम रहस्य मनोहर गावउँ ॥ सुनहु राम कर सहज सुभाऊ। जन अभिमान न राखहिं काऊ ॥ संसृत मूल सूलप्रद नाना। सकल सोक दायक अभिमाना ॥ ताते करहिं कृपानिधि दूरी। सेवक पर ममता अति भूरी ॥ जिमि सिसु तन ब्रन होइ गोसाई। मातु चिराव कठिन की नाईं ॥

दोहा — मूल पाठ

जदपि प्रथम दुख पावइ रोवइ बाल अधीर। ब्याधि नास हित जननी गनति न सो सिसु पीर ॥ ७४(क) ॥

दोहा — मूल पाठ

तिमि रघुपति निज दासकर हरहिं मान हित लागि। तुलसिदास ऐसे प्रभुहि कस न भजहु भ्रम त्यागि ॥ ७४(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

काकभुशुण्डि अपने अनुभव की भूमिका बताते हैं। राम सेवक का अहंकार नहीं रहने देते, क्योंकि वह दुख का मूल है। जैसे माँ बच्चे की बीमारी मिटाने के लिए पीड़ादायक उपचार भी कराती है, वैसे प्रभु हित के लिए अभिमान हरते हैं।

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उत्तरकाण्ड · क्रमांक 75

काकभुशुण्डि का बालराम-प्रेम

चौपाइयाँ — मूल पाठ

राम कृपा आपनि जड़ताई। कहउँ खगेस सुनहु मन लाई ॥ जब जब राम मनुज तनु धरहीं। भक्त हेतु लील बहु करहीं ॥ तब तब अवधपुरी मैं जाऊँ। बालचरित बिलोकि हरषाऊँ ॥ जन्म महोत्सव देखउँ जाई। बरष पाँच तहँ रहउँ लोभाई ॥ इष्टदेव मम बालक रामा। सोभा बपुष कोटि सत कामा ॥ निज प्रभु बदन निहारि निहारी। लोचन सुफल करउँ उरगारी ॥ लघु बायस बपु धरि हरि संगा। देखउँ बालचरित बहुरंगा ॥

दोहा — मूल पाठ

लरिकाईं जहँ जहँ फिरहिं तहँ तहँ संग उड़ाउँ। जूठनि परइ अजिर महँ सो उठाइ करि खाउँ ॥ ७५(क) ॥

दोहा — मूल पाठ

एक बार अतिसय सब चरित किए रघुबीर। सुमिरत प्रभु लीला सोइ पुलकित भयउ सरीर ॥ ७५(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

जब राम मनुष्यरूप में अवतार लेते हैं, काकभुशुण्डि अयोध्या जाकर बाललीला देखते हैं। छोटे कौए का रूप लेकर वे प्रभु के साथ रहते और उनके आँगन की जूठन पाते हैं। एक विशेष लीला स्मरण करके उनका शरीर पुलकित होता है।

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उत्तरकाण्ड · क्रमांक 76

बालराम के चरण और अलंकार

चौपाइयाँ — मूल पाठ

कहइ भसुंड सुनहु खगनायक। रामचरित सेवक सुखदायक ॥ नृपमंदिर सुंदर सब भाँती। खचित कनक मनि नाना जाती ॥ बरनि न जाइ रुचिर अँगनाई। जहँ खेलहिं नित चारिउ भाई ॥ बालबिनोद करत रघुराई। बिचरत अजिर जननि सुखदाई ॥ मरकत मृदुल कलेवर स्यामा। अंग अंग प्रति छबि बहु कामा ॥ नव राजीव अरुन मृदु चरना। पदज रुचिर नख ससि दुति हरना ॥ ललित अंक कुलिसादिक चारी। नूपुर चारू मधुर रवकारी ॥ चारु पुरट मनि रचित बनाई। कटि किंकिन कल मुखर सुहाई ॥

दोहा — मूल पाठ

रेखा त्रय सुन्दर उदर नाभी रुचिर गँभीर। उर आयत भ्राजत बिबिध बाल बिभूषन चीर ॥ ७६ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

काकभुशुण्डि राजमहल के सुंदर आँगन में खेलते चारों भाइयों का वर्णन करते हैं। श्याम बालराम के कोमल चरण, शुभ चिह्न, नूपुर, करधनी और बाल-अलंकार उनके मन को आनंद देते हैं।

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उत्तरकाण्ड · क्रमांक 77

बाललीला देखकर क्षणिक मोह

चौपाइयाँ — मूल पाठ

अरुन पानि नख करज मनोहर। बाहु बिसाल बिभूषन सुंदर ॥ कंध बाल केहरि दर ग्रीवा। चारु चिबुक आनन छबि सींवा ॥ कलबल बचन अधर अरुनारे। दुइ दुइ दसन बिसद बर बारे ॥ ललित कपोल मनोहर नासा। सकल सुखद ससि कर सम हासा ॥ नील कंज लोचन भव मोचन। भ्राजत भाल तिलक गोरोचन ॥ बिकट भृकुटि सम श्रवन सुहाए। कुंचित कच मेचक छबि छाए ॥ पीत झीनि झगुली तन सोही। किलकनि चितवनि भावति मोही ॥ रूप रासि नृप अजिर बिहारी। नाचहिं निज प्रतिबिंब निहारी ॥ मोहि सन करहीं बिबिध बिधि क्रीड़ा। बरनत मोहि होति अति ब्रीड़ा ॥ किलकत मोहि धरन जब धावहिं। चलउँ भागि तब पूप देखावहिं ॥

दोहा — मूल पाठ

आवत निकट हँसहिं प्रभु भाजत रुदन कराहिं। जाउँ समीप गहन पद फिरि फिरि चितइ पराहिं ॥ ७७(क) ॥

दोहा — मूल पाठ

प्राकृत सिसु इव लीला देखि भयउ मोहि मोह। कवन चरित्र करत प्रभु चिदानंद संदोह ॥ ७७(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

राम की तोतली वाणी, मुसकान, सुंदर नेत्र और खेल का प्रेमपूर्ण वर्णन है। वे कौए को पकड़ने दौड़ते और फिर भागते हैं। सामान्य शिशु जैसी लीला देखकर काकभुशुण्डि के मन में क्षणिक प्रश्न उठता है कि सच्चिदानंद ऐसा क्यों कर रहे हैं।

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उत्तरकाण्ड · क्रमांक 78

जीव और ईश्वर का भेद

चौपाइयाँ — मूल पाठ

एतना मन आनत खगराया। रघुपति प्रेरित ब्यापी माया ॥ सो माया न दुखद मोहि काहीं। आन जीव इव संसृत नाहीं ॥ नाथ इहाँ कछु कारन आना। सुनहु सो सावधान हरिजाना ॥ ग्यान अखंड एक सीताबर। माया बस्य जीव सचराचर ॥ जौं सब कें रह ग्यान एकरस। ईस्वर जीवहि भेद कहहु कस ॥ माया बस्य जीव अभिमानी। ईस बस्य माया गुनखानी ॥ परबस जीव स्वबस भगवंता। जीव अनेक एक श्रीकंता ॥ मुधा भेद जद्यपि कृत माया। बिनु हरि जाइ न कोटि उपाया ॥

दोहा — मूल पाठ

रामचंद्र के भजन बिनु जो चह पद निर्बान। ग्यानवंत अपि सो नर पसु बिनु पूँछ बिषान ॥ ७८(क) ॥

दोहा — मूल पाठ

राकापति षोड़स उअहिं तारागन समुदाइ ॥ सकल गिरिन्ह दव लाइअ बिनु रबि राति न जाइ ॥ ७८(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

जीव माया के अधीन है और माया ईश्वर के अधीन। प्रभु स्वतंत्र, जीव परतंत्र है। काकभुशुण्डि बताते हैं कि बिना भजन ज्ञान का दावा भी मुक्ति नहीं दिलाता। जैसे सूर्य बिना रात नहीं मिटती, वैसे हरिभजन बिना क्लेश नहीं मिटते।

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उत्तरकाण्ड · क्रमांक 79

जहाँ गए, राम की भुजा पास मिली

चौपाइयाँ — मूल पाठ

ऐसेहिं हरि बिनु भजन खगेसा। मिटइ न जीवन्ह केर कलेसा ॥ हरि सेवकहि न ब्याप अबिद्या। प्रभु प्रेरित ब्यापइ तेहि बिद्या ॥ ताते नास न होइ दास कर। भेद भगति भाढ़इ बिहंगबर ॥ भ्रम ते चकित राम मोहि देखा। बिहँसे सो सुनु चरित बिसेषा ॥ तेहि कौतुक कर मरमु न काहूँ। जाना अनुज न मातु पिताहूँ ॥ जानु पानि धाए मोहि धरना। स्यामल गात अरुन कर चरना ॥ तब मैं भागि चलेउँ उरगामी। राम गहन कहँ भुजा पसारी ॥ जिमि जिमि दूरि उड़ाउँ अकासा। तहँ भुज हरि देखउँ निज पासा ॥

दोहा — मूल पाठ

ब्रह्मलोक लगि गयउँ मैं चितयउँ पाछ उड़ात। जुग अंगुल कर बीच सब राम भुजहि मोहि तात ॥ ७९(क) ॥

दोहा — मूल पाठ

सप्ताबरन भेद करि जहाँ लगें गति मोरि। गयउँ तहाँ प्रभु भुज निरखि ब्याकुल भयउँ बहोरि ॥ ७९(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

राम अपने सेवक का भ्रम देखकर मुसकराते और पकड़ने को हाथ बढ़ाते हैं। काकभुशुण्डि दूर-दूर, ब्रह्मलोक और ब्रह्मांड के आवरणों तक उड़ते हैं। हर जगह राम की भुजा दो अंगुल की दूरी पर ही देखकर वे व्याकुल हो जाते हैं।

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उत्तरकाण्ड · क्रमांक 80

राम के उदर में अनंत ब्रह्मांड

चौपाइयाँ — मूल पाठ

मूदेउँ नयन त्रसित जब भयउँ। पुनि चितवत कोसलपुर गयऊँ ॥ मोहि बिलोकि राम मुसुकाहीं। बिहँसत तुरत गयउँ मुख माहीं ॥ उदर माझ सुनु अंडज राया। देखेउँ बहु ब्रह्मांड निकाया ॥ अति बिचित्र तहँ लोक अनेका। रचना अधिक एक ते एका ॥ कोटिन्ह चतुरानन गौरीसा। अगनित उडगन रबि रजनीसा ॥ अगनित लोकपाल जम काला। अगनित भूधर भूमि बिसाला ॥ सागर सरि सर बिपिन अपारा। नाना भाँति सृष्टि बिस्तारा ॥ सुर मुनि सिद्ध नाग नर किंनर। चारि प्रकार जीव सचराचर ॥

दोहा — मूल पाठ

जो नहिं देखा नहिं सुना जो मनहूँ न समाइ। सो सब अद्भुत देखेउँ बरनि कवनि बिधि जाइ ॥ ८०(क) ॥

दोहा — मूल पाठ

एक एक ब्रह्मांड महुँ रहउँ बरष सत एक। एहि बिधि देखत फिरउँ मैं अंड कटाह अनेक ॥ ८०(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

नेत्र बंद करके खोलते ही काकभुशुण्डि अयोध्या में होते हैं। हँसते राम के मुख में जाकर वे असंख्य ब्रह्मांड, देवता, लोक, पर्वत, नदियाँ और प्राणी देखते हैं। प्रत्येक ब्रह्मांड में लंबे समय तक रहते हुए भी यह अद्भुत विस्तार समाप्त नहीं होता।

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उत्तरकाण्ड · क्रमांक 81

भिन्न सृष्टियों में वही राम

चौपाइयाँ — मूल पाठ

लोक लोक प्रति भिन्न बिधाता। भिन्न बिष्नु सिव मनु दिसित्राता ॥ नर गंधर्ब भूत बेताला। किंनर निसिचर पसु खग ब्याला ॥ देव दनुज गन नाना जाती। सकल जीव तहँ आनहि भाँती ॥ महि सरि सागर सर गिरि नाना। सब प्रपंच तहँ आनइ आना ॥ अंडकोस प्रति प्रति निज रुपा। देखेउँ जिनस अनेक अनूपा ॥ अवधपुरी प्रति भुवन निनारी। सरजू भिन्न भिन्न नर नारी ॥ दसरथ कौसल्या सुनु ताता। बिबिध रूप भरतादिक भ्राता ॥ प्रति ब्रह्मांड राम अवतारा। देखउँ बालबिनोद अपारा ॥

दोहा — मूल पाठ

भिन्न भिन्न मै दीख सबु अति बिचित्र हरिजान। अगनित भुवन फिरेउँ प्रभु राम न देखेउँ आन ॥ ८१(क) ॥

दोहा — मूल पाठ

सोइ सिसुपन सोइ सोभा सोइ कृपाल रघुबीर। भुवन भुवन देखत फिरउँ प्रेरित मोह समीर ॥ ८१(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

अनेक ब्रह्मांडों में देवता, जीव, नगर, सरयू, माता-पिता और भाई भिन्न दिखते हैं। किंतु हर जगह बालराम का वही करुणामय स्वरूप और वही सुंदर लीला है। प्रभु की एकता और सृष्टि की विविधता का अनुभव होता है।

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उत्तरकाण्ड · क्रमांक 82

असंख्य कल्प दो घड़ी में

चौपाइयाँ — मूल पाठ

भ्रमत मोहि ब्रह्मांड अनेका। बीते मनहुँ कल्प सत एका ॥ फिरत फिरत निज आश्रम आयउँ। तहँ पुनि रहि कछु काल गवाँयउँ ॥ निज प्रभु जन्म अवध सुनि पायउँ। निर्भर प्रेम हरषि उठि धायउँ ॥ देखउँ जन्म महोत्सव जाई। जेहि बिधि प्रथम कहा मैं गाई ॥ राम उदर देखेउँ जग नाना। देखत बनइ न जाइ बखाना ॥ तहँ पुनि देखेउँ राम सुजाना। माया पति कृपाल भगवाना ॥ करउँ बिचार बहोरि बहोरी। मोह कलिल ब्यापित मति मोरी ॥ उभय घरी महँ मैं सब देखा। भयउँ भ्रमित मन मोह बिसेषा ॥

दोहा — मूल पाठ

देखि कृपाल बिकल मोहि बिहँसे तब रघुबीर। बिहँसतहीं मुख बाहेर आयउँ सुनु मतिधीर ॥ ८२(क) ॥

दोहा — मूल पाठ

सोइ लरिकाई मो सन करन लगे पुनि राम। कोटि भाँति समुझावउँ मनु न लहइ बिश्राम ॥ ८२(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

काकभुशुण्डि को ब्रह्मांडों में घूमते सौ कल्प जैसे बीतते हैं। फिर राम के हँसते ही वे मुख से बाहर आ जाते हैं। बाहर केवल दो घड़ी बीती है। राम फिर वही बाललीला करते हैं, पर उनका मन अद्भुत अनुभव से चकित है।

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उत्तरकाण्ड · क्रमांक 83

कृपामय स्पर्श और वरदान

चौपाइयाँ — मूल पाठ

देखि चरित यह सो प्रभुताई। समुझत देह दसा बिसराई ॥ धरनि परेउँ मुख आव न बाता। त्राहि त्राहि आरत जन त्राता ॥ प्रेमाकुल प्रभु मोहि बिलोकी। निज माया प्रभुता तब रोकी ॥ कर सरोज प्रभु मम सिर धरेऊ। दीनदयाल सकल दुख हरेऊ ॥ कीन्ह राम मोहि बिगत बिमोहा। सेवक सुखद कृपा संदोहा ॥ प्रभुता प्रथम बिचारि बिचारी। मन महँ होइ हरष अति भारी ॥ भगत बछलता प्रभु कै देखी। उपजी मम उर प्रीति बिसेषी ॥ सजल नयन पुलकित कर जोरी। कीन्हिउँ बहु बिधि बिनय बहोरी ॥

दोहा — मूल पाठ

सुनि सप्रेम मम बानी देखि दीन निज दास। बचन सुखद गंभीर मृदु बोले रमानिवास ॥ ८३(क) ॥

दोहा — मूल पाठ

काकभसुंडि मागु बर अति प्रसन्न मोहि जानि। अनिमादिक सिधि अपर रिधि मोच्छ सकल सुख खानि ॥ ८३(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

व्याकुल होकर काकभुशुण्डि रक्षा पुकारते हैं। राम सिर पर हाथ रखकर मोह और दुख दूर करते हैं। भक्तवत्सलता देखकर उनका प्रेम बढ़ता है। प्रसन्न प्रभु उन्हें सिद्धि, संपत्ति, मुक्ति आदि में मनचाहा वर माँगने को कहते हैं।

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उत्तरकाण्ड · क्रमांक 84

अन्य सुखों के बदले विशुद्ध भक्ति

चौपाइयाँ — मूल पाठ

ग्यान बिबेक बिरति बिग्याना। मुनि दुर्लभ गुन जे जग नाना ॥ आजु देउँ सब संसय नाहीं। मागु जो तोहि भाव मन माहीं ॥ सुनि प्रभु बचन अधिक अनुरागेउँ। मन अनुमान करन तब लागेऊँ ॥ प्रभु कह देन सकल सुख सही। भगति आपनी देन न कही ॥ भगति हीन गुन सब सुख ऐसे। लवन बिना बहु बिंजन जैसे ॥ भजन हीन सुख कवने काजा। अस बिचारि बोलेउँ खगराजा ॥ जौं प्रभु होइ प्रसन्न बर देहू। मो पर करहु कृपा अरु नेहू ॥ मन भावत बर मागउँ स्वामी। तुम्ह उदार उर अंतरजामी ॥

दोहा — मूल पाठ

अबिरल भगति बिसुद्ध तव श्रुति पुरान जो गाव। जेहि खोजत जोगीस मुनि प्रभु प्रसाद कोउ पाव ॥ ८४(क) ॥

दोहा — मूल पाठ

भगत कल्पतरु प्रनत हित कृपा सिंधु सुख धाम। सोइ निज भगति मोहि प्रभु देहु दया करि राम ॥ ८४(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

काकभुशुण्डि सोचते हैं कि भक्ति बिना सभी गुण और सुख नमक रहित भोजन जैसे हैं। वे दूसरे वर छोड़कर वेद-पुराणों में गाई गई निर्मल, अविरल रामभक्ति माँगते हैं।

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उत्तरकाण्ड · क्रमांक 85

राम की प्रसन्नता और माया से रक्षा

चौपाइयाँ — मूल पाठ

एवमस्तु कहि रघुकुलनायक। बोले बचन परम सुखदायक ॥ सुनु बायस तैं सहज सयाना। काहे न मागसि अस बरदाना ॥ सब सुख खानि भगति तैं मागी। नहिं जग कोउ तोहि सम बड़भागी ॥ जो मुनि कोटि जतन नहिं लहहीं। जे जप जोग अनल तन दहहीं ॥ रीझेउँ देखि तोरि चतुराई। मागेहु भगति मोहि अति भाई ॥ सुनु बिहंग प्रसाद अब मोरें। सब सुभ गुन बसिहहिं उर तोरें ॥ भगति ग्यान बिग्यान बिरागा। जोग चरित्र रहस्य बिभागा ॥ जानब तैं सबही कर भेदा। मम प्रसाद नहिं साधन खेदा ॥

दोहा — मूल पाठ

माया संभव भ्रम सब अब न ब्यापिहहिं तोहि। जानेसु ब्रह्म अनादि अज अगुन गुनाकर मोहि ॥ ८५(क) ॥

दोहा — मूल पाठ

मोहि भगत प्रिय संतत अस बिचारि सुनु काग। कायँ बचन मन मम पद करेसु अचल अनुराग ॥ ८५(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

राम भक्ति माँगने पर प्रसन्न होकर वर देते हैं। कृपा से काकभुशुण्डि को शुभ गुण, ज्ञान, वैराग्य और रहस्यबोध मिलेगा। माया का भ्रम उन्हें नहीं घेरेगा। प्रभु मन-वचन-कर्म से अपने चरणों में अचल प्रेम रखने को कहते हैं।

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उत्तरकाण्ड · क्रमांक 86

भक्त ही प्रभु को सबसे प्रिय

चौपाइयाँ — मूल पाठ

अब सुनु परम बिमल मम बानी। सत्य सुगम निगमादि बखानी ॥ निज सिद्धांत सुनावउँ तोही। सुनु मन धरु सब तजि भजु मोही ॥ मम माया संभव संसारा। जीव चराचर बिबिधि प्रकारा ॥ सब मम प्रिय सब मम उपजाए। सब ते अधिक मनुज मोहि भाए ॥ तिन्ह महँ द्विज द्विज महँ श्रुतिधारी। तिन्ह महुँ निगम धरम अनुसारी ॥ तिन्ह महँ प्रिय बिरक्त पुनि ग्यानी। ग्यानिहु ते अति प्रिय बिग्यानी ॥ तिन्ह ते पुनि मोहि प्रिय निज दासा। जेहि गति मोरि न दूसरि आसा ॥ पुनि पुनि सत्य कहउँ तोहि पाहीं। मोहि सेवक सम प्रिय कोउ नाहीं ॥ भगति हीन बिरंचि किन होई। सब जीवहु सम प्रिय मोहि सोई ॥ भगतिवंत अति नीचउ प्रानी। मोहि प्रानप्रिय असि मम बानी ॥

दोहा — मूल पाठ

सुचि सुसील सेवक सुमति प्रिय कहु काहि न लाग। श्रुति पुरान कह नीति असि सावधान सुनु काग ॥ ८६ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

राम सभी जीवों को अपना उत्पन्न और प्रिय कहते हैं। ज्ञान, आचरण आदि की विशेषताओं से आगे वे निष्कपट सेवक को अत्यंत प्रिय बताते हैं। बिना भक्ति ऊँचा पद भी पर्याप्त नहीं; भक्ति वाला सामान्य समझा जाने वाला जीव भी प्राणप्रिय है।

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उत्तरकाण्ड · क्रमांक 87

सबके लिए निष्कपट भक्ति का अधिकार

चौपाइयाँ — मूल पाठ

एक पिता के बिपुल कुमारा। होहिं पृथक गुन सील अचारा ॥ कोउ पंडिंत कोउ तापस ग्याता। कोउ धनवंत सूर कोउ दाता ॥ कोउ सर्बग्य धर्मरत कोई। सब पर पितहि प्रीति सम होई ॥ कोउ पितु भगत बचन मन कर्मा। सपनेहुँ जान न दूसर धर्मा ॥ सो सुत प्रिय पितु प्रान समाना। जद्यपि सो सब भाँति अयाना ॥ एहि बिधि जीव चराचर जेते। त्रिजग देव नर असुर समेते ॥ अखिल बिस्व यह मोर उपाया। सब पर मोहि बराबरि दाया ॥ तिन्ह महँ जो परिहरि मद माया। भजै मोहि मन बच अरू काया ॥

दोहा — मूल पाठ

पुरूष नपुंसक नारि वा जीव चराचर कोइ। सर्ब भाव भज कपट तजि मोहि परम प्रिय सोइ ॥ ८७(क) ॥

सोरठा — मूल पाठ

सत्य कहउँ खग तोहि सुचि सेवक मम प्रानप्रिय। अस बिचारि भजु मोहि परिहरि आस भरोस सब ॥ ८७(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

पिता अपने सभी पुत्रों से प्रेम करता है, पर अनन्य सेवाभावी पुत्र उसे विशेष प्रिय होता है। उसी तरह राम सब पर समान दया करते हैं। कोई भी स्त्री, पुरुष, नपुंसक या चराचर जीव कपट छोड़कर सर्वभाव से भजे तो परम प्रिय है।

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उत्तरकाण्ड · क्रमांक 88

काल से रक्षा और फिर बाललीला

चौपाइयाँ — मूल पाठ

कबहूँ काल न ब्यापिहि तोही। सुमिरेसु भजेसु निरंतर मोही ॥ प्रभु बचनामृत सुनि न अघाऊँ। तनु पुलकित मन अति हरषाऊँ ॥ सो सुख जानइ मन अरु काना। नहिं रसना पहिं जाइ बखाना ॥ प्रभु सोभा सुख जानहिं नयना। कहि किमि सकहिं तिन्हहि नहिं बयना ॥ बहु बिधि मोहि प्रबोधि सुख देई। लगे करन सिसु कौतुक तेई ॥ सजल नयन कछु मुख करि रूखा। चितइ मातु लागी अति भूखा ॥ देखि मातु आतुर उठि धाई। कहि मृदु बचन लिए उर लाई ॥ गोद राखि कराव पय पाना। रघुपति चरित ललित कर गाना ॥

सोरठा — मूल पाठ

जेहि सुख लागि पुरारि असुभ बेष कृत सिव सुखद। अवधपुरी नर नारि तेहि सुख महुँ संतत मगन ॥ ८८(क) ॥

सोरठा — मूल पाठ

सोइ सुख लवलेस जिन्ह बारक सपनेहुँ लहेउ। ते नहिं गनहिं खगेस ब्रह्मसुखहि सज्जन सुमति ॥ ८८(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

राम निरंतर स्मरण का निर्देश देकर काल से रक्षा का वर देते हैं। उनका अमृतवचन सुनकर काकभुशुण्डि भावमग्न हैं। फिर प्रभु भूखे शिशु की लीला करते हैं और माता गोद में लेकर दूध पिलाती हैं। अयोध्यावासी इस दुर्लभ सुख में रहते हैं।

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उत्तरकाण्ड · क्रमांक 89

कृपा, पहचान, विश्वास और प्रेम

चौपाइयाँ — मूल पाठ

मैं पुनि अवध रहेउँ कछु काला। देखेउँ बालबिनोद रसाला ॥ राम प्रसाद भगति बर पायउँ। प्रभु पद बंदि निजाश्रम आयउँ ॥ तब ते मोहि न ब्यापी माया। जब ते रघुनायक अपनाया ॥ यह सब गुप्त चरित मैं गावा। हरि मायाँ जिमि मोहि नचावा ॥ निज अनुभव अब कहउँ खगेसा। बिनु हरि भजन न जाहि कलेसा ॥ राम कृपा बिनु सुनु खगराई। जानि न जाइ राम प्रभुताई ॥ जानें बिनु न होइ परतीती। बिनु परतीति होइ नहिं प्रीती ॥ प्रीति बिना नहिं भगति दिढ़ाई। जिमि खगपति जल कै चिकनाई ॥

सोरठा — मूल पाठ

बिनु गुर होइ कि ग्यान ग्यान कि होइ बिराग बिनु। गावहिं बेद पुरान सुख कि लहिअ हरि भगति बिनु ॥ ८९(क) ॥

सोरठा — मूल पाठ

कोउ बिश्राम कि पाव तात सहज संतोष बिनु। चलै कि जल बिनु नाव कोटि जतन पचि पचि मरिअ ॥ ८९(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

भक्ति का वर पाकर काकभुशुण्डि आश्रम लौटते हैं। वे अनुभव से बताते हैं कि रामकृपा बिना प्रभुता की पहचान नहीं, पहचान बिना विश्वास और विश्वास बिना प्रेम नहीं। गुरु, वैराग्य, भक्ति और संतोष का परस्पर महत्व समझाया गया है।

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उत्तरकाण्ड · क्रमांक 90

विश्वास बिना दृढ़ भक्ति नहीं

चौपाइयाँ — मूल पाठ

बिनु संतोष न काम नसाहीं। काम अछत सुख सपनेहुँ नाहीं ॥ राम भजन बिनु मिटहिं कि कामा। थल बिहीन तरु कबहुँ कि जामा ॥ बिनु बिग्यान कि समता आवइ। कोउ अवकास कि नभ बिनु पावइ ॥ श्रद्धा बिना धर्म नहिं होई। बिनु महि गंध कि पावइ कोई ॥ बिनु तप तेज कि कर बिस्तारा। जल बिनु रस कि होइ संसारा ॥ सील कि मिल बिनु बुध सेवकाई। जिमि बिनु तेज न रूप गोसाई ॥ निज सुख बिनु मन होइ कि थीरा। परस कि होइ बिहीन समीरा ॥ कवनिउ सिद्धि कि बिनु बिस्वासा। बिनु हरि भजन न भव भय नासा ॥

दोहा — मूल पाठ

बिनु बिस्वास भगति नहिं तेहि बिनु द्रवहिं न रामु। राम कृपा बिनु सपनेहुँ जीव न लह बिश्रामु ॥ ९०(क) ॥

सोरठा — मूल पाठ

अस बिचारि मतिधीर तजि कुतर्क संसय सकल। भजहु राम रघुबीर करुनाकर सुंदर सुखद ॥ ९०(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

संतोष, श्रद्धा, तप, सदाचार और विज्ञान के महत्व को विविध उदाहरणों से समझाया गया है। विश्वास बिना भक्ति नहीं और भक्ति बिना राम की कृपा से मिलने वाला विश्राम नहीं। इसलिए कुतर्क और संदेह छोड़कर करुणामय राम का भजन करना चाहिए।

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उत्तरकाण्ड · क्रमांक 91

अनंत गुणों की सीमित अभिव्यक्ति

चौपाइयाँ — मूल पाठ

निज मति सरिस नाथ मैं गाई। प्रभु प्रताप महिमा खगराई ॥ कहेउँ न कछु करि जुगुति बिसेषी। यह सब मैं निज नयनन्हि देखी ॥ महिमा नाम रूप गुन गाथा। सकल अमित अनंत रघुनाथा ॥ निज निज मति मुनि हरि गुन गावहिं। निगम सेष सिव पार न पावहिं ॥ तुम्हहि आदि खग मसक प्रजंता। नभ उड़ाहिं नहिं पावहिं अंता ॥ तिमि रघुपति महिमा अवगाहा। तात कबहुँ कोउ पाव कि थाहा ॥ रामु काम सत कोटि सुभग तन। दुर्गा कोटि अमित अरि मर्दन ॥ सक्र कोटि सत सरिस बिलासा। नभ सत कोटि अमित अवकासा ॥

दोहा — मूल पाठ

मरुत कोटि सत बिपुल बल रबि सत कोटि प्रकास। ससि सत कोटि सुसीतल समन सकल भव त्रास ॥ ९१(क) ॥

दोहा — मूल पाठ

काल कोटि सत सरिस अति दुस्तर दुर्ग दुरंत। धूमकेतु सत कोटि सम दुराधरष भगवंत ॥ ९१(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

काकभुशुण्डि कहते हैं कि उन्होंने अपना प्रत्यक्ष अनुभव अपनी बुद्धि के अनुसार बताया है। पक्षी आकाश का अंत नहीं पाता, वैसे कोई राममहिमा की थाह नहीं पाता। सौंदर्य, बल, प्रकाश, शीतलता और पराक्रम की अनेक उपमाएँ उनकी असीमता बताती हैं।

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उत्तरकाण्ड · क्रमांक 92

राम के समान केवल राम

चौपाइयाँ — मूल पाठ

प्रभु अगाध सत कोटि पताला। समन कोटि सत सरिस कराला ॥ तीरथ अमित कोटि सम पावन। नाम अखिल अघ पूग नसावन ॥ हिमगिरि कोटि अचल रघुबीरा। सिंधु कोटि सत सम गंभीरा ॥ कामधेनु सत कोटि समाना। सकल काम दायक भगवाना ॥ सारद कोटि अमित चतुराई। बिधि सत कोटि सृष्टि निपुनाई ॥ बिष्नु कोटि सम पालन कर्ता। रुद्र कोटि सत सम संहर्ता ॥ धनद कोटि सत सम धनवाना। माया कोटि प्रपंच निधाना ॥ भार धरन सत कोटि अहीसा। निरवधि निरुपम प्रभु जगदीसा ॥

छंद — मूल पाठ

निरुपम न उपमा आन राम समान रामु निगम कहै। जिमि कोटि सत खद्योत सम रबि कहत अति लघुता लहै ॥ एहि भाँति निज निज मति बिलास मुनिस हरिहि बखानहीं। प्रभु भाव गाहक अति कृपाल सप्रेम सुनि सुख मानहीं ॥

दोहा — मूल पाठ

रामु अमित गुन सागर थाह कि पावइ कोइ। संतन्ह सन जस किछु सुनेउँ तुम्हहि सुनायउँ सोइ ॥ ९२(क) ॥

सोरठा — मूल पाठ

भाव बस्य भगवान सुख निधान करुना भवन। तजि ममता मद मान भजिअ सदा सीता रवन ॥ ९२(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

प्रभु की पवित्रता, गंभीरता, पालन, संहार और कृपा की उपमाएँ दी गई हैं। फिर कहा है कि कोई उपमा वास्तव में पर्याप्त नहीं। भगवान भाव ग्रहण करते हैं; इसलिए ममता, मद और मान छोड़कर सीतापति का प्रेम से भजन करें।

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उत्तरकाण्ड · क्रमांक 93

गरुड़ की गुरु के प्रति कृतज्ञता

चौपाइयाँ — मूल पाठ

सुनि भुसुंडि के बचन सुहाए। हरषित खगपति पंख फुलाए ॥ नयन नीर मन अति हरषाना। श्रीरघुपति प्रताप उर आना ॥ पाछिल मोह समुझि पछिताना। ब्रह्म अनादि मनुज करि माना ॥ पुनि पुनि काग चरन सिरु नावा। जानि राम सम प्रेम बढ़ावा ॥ गुर बिनु भव निधि तरइ न कोई। जौं बिरंचि संकर सम होई ॥ संसय सर्प ग्रसेउ मोहि ताता। दुखद लहरि कुतर्क बहु ब्राता ॥ तव सरूप गारुड़ि रघुनायक। मोहि जिआयउ जन सुखदायक ॥ तव प्रसाद मम मोह नसाना। राम रहस्य अनूपम जाना ॥

दोहा — मूल पाठ

ताहि प्रसंसि बिबिध बिधि सीस नाइ कर जोरि। बचन बिनीत सप्रेम मृदु बोलेउ गरुड़ बहोरि ॥ ९३(क) ॥

दोहा — मूल पाठ

प्रभु अपने अबिबेक ते बूझउँ स्वामी तोहि। कृपासिंधु सादर कहहु जानि दास निज मोहि ॥ ९३(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

राम का प्रताप समझकर गरुड़ भावविह्वल होते हैं और पुराने संदेह पर पछताते हैं। काकभुशुण्डि को गुरु मानकर प्रणाम करते हैं। संदेहरूपी सर्प से बचाने के लिए धन्यवाद देकर वे आगे एक प्रश्न पूछने की अनुमति चाहते हैं।

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उत्तरकाण्ड · क्रमांक 94

शरीर, दीर्घजीवन और आश्रम का रहस्य

चौपाइयाँ — मूल पाठ

तुम्ह सर्बग्य तन्य तम पारा। सुमति सुसील सरल आचारा ॥ ग्यान बिरति बिग्यान निवासा। रघुनायक के तुम्ह प्रिय दासा ॥ कारन कवन देह यह पाई। तात सकल मोहि कहहु बुझाई ॥ राम चरित सर सुंदर स्वामी। पायहु कहाँ कहहु नभगामी ॥ नाथ सुना मैं अस सिव पाहीं। महा प्रलयहुँ नास तव नाहीं ॥ मुधा बचन नहिं ईस्वर कहई। सोउ मोरें मन संसय अहई ॥ अग जग जीव नाग नर देवा। नाथ सकल जगु काल कलेवा ॥ अंड कटाह अमित लय कारी। कालु सदा दुरतिक्रम भारी ॥

सोरठा — मूल पाठ

तुम्हहि न ब्यापत काल अति कराल कारन कवन। मोहि सो कहहु कृपाल ग्यान प्रभाव कि जोग बल ॥ ९४(क) ॥

दोहा — मूल पाठ

प्रभु तव आश्रम आएँ मोर मोह भ्रम भाग। कारन कवन सो नाथ सब कहहु सहित अनुराग ॥ ९४(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

गरुड़ पूछते हैं कि काकभुशुण्डि को यह शरीर क्यों मिला, रामकथा कहाँ मिली और प्रलय में भी काल उनका नाश क्यों नहीं करता। आश्रम में आते ही मोह मिटने का कारण भी जानना चाहते हैं।

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उत्तरकाण्ड · क्रमांक 95

भक्ति मिलने से यह शरीर प्रिय

चौपाइयाँ — मूल पाठ

गरुड़ गिरा सुनि हरषेउ कागा। बोलेउ उमा परम अनुरागा ॥ धन्य धन्य तव मति उरगारी। प्रस्न तुम्हारि मोहि अति प्यारी ॥ सुनि तव प्रस्न सप्रेम सुहाई। बहुत जनम कै सुधि मोहि आई ॥ सब निज कथा कहउँ मैं गाई। तात सुनहु सादर मन लाई ॥ जप तप मख सम दम ब्रत दाना। बिरति बिबेक जोग बिग्याना ॥ सब कर फल रघुपति पद प्रेमा। तेहि बिनु कोउ न पावइ छेमा ॥ एहि तन राम भगति मैं पाई। ताते मोहि ममता अधिकाई ॥ जेहि तें कछु निज स्वारथ होई। तेहि पर ममता कर सब कोई ॥

सोरठा — मूल पाठ

पन्नगारि असि नीति श्रुति संमत सज्जन कहहिं। अति नीचहु सन प्रीति करिअ जानि निज परम हित ॥ ९५(क) ॥

सोरठा — मूल पाठ

पाट कीट तें होइ तेहि तें पाटंबर रुचिर। कृमि पालइ सबु कोइ परम अपावन प्रान सम ॥ ९५(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

काकभुशुण्डि प्रश्न सुनकर अनेक जन्म स्मरण करते हैं। वे कहते हैं कि सभी साधनों का फल रामचरणों का प्रेम है। इसी शरीर में भक्ति मिली, इसलिए यह उन्हें प्रिय है। जैसे रेशम देने वाला कीड़ा भी पालते हैं, वैसे परम हित के साधन का आदर होता है।

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उत्तरकाण्ड · क्रमांक 96

अनेक जन्मों की आत्मकथा

चौपाइयाँ — मूल पाठ

स्वारथ साँच जीव कहुँ एहा। मन क्रम बचन राम पद नेहा ॥ सोइ पावन सोइ सुभग सरीरा। जो तनु पाइ भजिअ रघुबीरा ॥ राम बिमुख लहि बिधि सम देही। कबि कोबिद न प्रसंसहिं तेही ॥ राम भगति एहिं तन उर जामी। ताते मोहि परम प्रिय स्वामी ॥ तजउँ न तन निज इच्छा मरना। तन बिनु बेद भजन नहिं बरना ॥ प्रथम मोहँ मोहि बहुत बिगोवा। राम बिमुख सुख कबहुँ न सोवा ॥ नाना जनम कर्म पुनि नाना। किए जोग जप तप मख दाना ॥ कवन जोनि जनमेउँ जहँ नाहीं। मैं खगेस भ्रमि भ्रमि जग माहीं ॥ देखेउँ करि सब करम गोसाई। सुखी न भयउँ अबहिं की नाई ॥ सुधि मोहि नाथ जन्म बहु केरी। सिव प्रसाद मति मोहँ न घेरी ॥

दोहा — मूल पाठ

प्रथम जन्म के चरित अब कहउँ सुनहु बिहगेस। सुनि प्रभु पद रति उपजइ जातें मिटहिं कलेस ॥ ९६(क) ॥

दोहा — मूल पाठ

पूरुब कल्प एक प्रभु जुग कलिजुग मल मूल ॥ नर अरु नारि अधर्म रत सकल निगम प्रतिकूल ॥ ९६(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

काकभुशुण्डि कहते हैं कि जीव का सच्चा हित मन-वचन-कर्म से रामप्रेम है। अनेक जन्म और साधन करके भी उन्हें वर्तमान जैसी शांति नहीं मिली थी। शिवकृपा से पिछले जन्मों की स्मृति है; अब वे एक पुराने कलियुग की कथा बताते हैं।

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उत्तरकाण्ड · क्रमांक 97

अभिमान और संकीर्ण भक्ति वाला पुराना जन्म

चौपाइयाँ — मूल पाठ

तेहि कलिजुग कोसलपुर जाई। जन्मत भयउँ सूद्र तनु पाई ॥ सिव सेवक मन क्रम अरु बानी। आन देव निंदक अभिमानी ॥ धन मद मत्त परम बाचाला। उग्रबुद्धि उर दंभ बिसाला ॥ जदपि रहेउँ रघुपति रजधानी। तदपि न कछु महिमा तब जानी ॥ अब जाना मैं अवध प्रभावा। निगमागम पुरान अस गावा ॥ कवनेहुँ जन्म अवध बस जोई। राम परायन सो परि होई ॥ अवध प्रभाव जान तब प्रानी। जब उर बसहिं रामु धनुपानी ॥ सो कलिकाल कठिन उरगारी। पाप परायन सब नर नारी ॥

दोहा — मूल पाठ

कलिमल ग्रसे धर्म सब लुप्त भए सदग्रंथ। दंभिन्ह निज मति कल्पि करि प्रगट किए बहु पंथ ॥ ९७(क) ॥

दोहा — मूल पाठ

भए लोग सब मोहबस लोभ ग्रसे सुभ कर्म। सुनु हरिजान ग्यान निधि कहउँ कछुक कलिधर्म ॥ ९७(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

वे अयोध्या में अपने पुराने जन्म को स्मरण करते हैं। शिव की सेवा करते हुए भी दूसरे देवताओं की निंदा, धन और दंभ में पड़े थे। नगर की महिमा नहीं पहचानी थी। उस समय धर्म के स्थान पर लोभ और मनगढ़ंत पंथ बढ़ रहे थे।

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उत्तरकाण्ड · क्रमांक 98

कलियुग में मूल्य-विपर्यय

चौपाइयाँ — मूल पाठ

बरन धर्म नहिं आश्रम चारी। श्रुति बिरोध रत सब नर नारी ॥ द्विज श्रुति बेचक भूप प्रजासन। कोउ नहिं मान निगम अनुसासन ॥ मारग सोइ जा कहुँ जोइ भावा। पंडित सोइ जो गाल बजावा ॥ मिथ्यारंभ दंभ रत जोई। ता कहुँ संत कहइ सब कोई ॥ सोइ सयान जो परधन हारी। जो कर दंभ सो बड़ आचारी ॥ जौ कह झूँठ मसखरी जाना। कलिजुग सोइ गुनवंत बखाना ॥ निराचार जो श्रुति पथ त्यागी। कलिजुग सोइ ग्यानी सो बिरागी ॥ जाकें नख अरु जटा बिसाला। सोइ तापस प्रसिद्ध कलिकाला ॥

दोहा — मूल पाठ

असुभ बेष भूषन धरें भच्छाभच्छ जे खाहिं। तेइ जोगी तेइ सिद्ध नर पूज्य ते कलिजुग माहिं ॥ ९८(क) ॥

सोरठा — मूल पाठ

जे अपकारी चार तिन्ह कर गौरव मान्य तेइ। मन क्रम बचन लबार तेइ बकता कलिकाल महुँ ॥ ९८(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

कथा में ऐसे सामाजिक पतन का चित्र है जहाँ डींग मारने वाला पंडित, कपटी संत और बाहरी वेशधारी तपस्वी कहलाता है। परधन हरण और झूठ को चतुराई माना जाता है। यह सत्याचार के स्थान पर दिखावे की आलोचना है।

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उत्तरकाण्ड · क्रमांक 99

लोभयुक्त गुरु-शिष्य और परिवार

चौपाइयाँ — मूल पाठ

नारि बिबस नर सकल गोसाई। नाचहिं नट मर्कट की नाई ॥ सूद्र द्विजन्ह उपदेसहिं ग्याना। मेलि जनेऊ लेहिं कुदाना ॥ सब नर काम लोभ रत क्रोधी। देव बिप्र श्रुति संत बिरोधी ॥ गुन मंदिर सुंदर पति त्यागी। भजहिं नारि पर पुरुष अभागी ॥ सौभागिनीं बिभूषन हीना। बिधवन्ह के सिंगार नबीना ॥ गुर सिष बधिर अंध का लेखा। एक न सुनइ एक नहिं देखा ॥ हरइ सिष्य धन सोक न हरई। सो गुर घोर नरक महुँ परई ॥ मातु पिता बालकन्हि बोलाबहिं। उदर भरै सोइ धर्म सिखावहिं ॥

दोहा — मूल पाठ

ब्रह्म ग्यान बिनु नारि नर कहहिं न दूसरि बात। कौड़ी लागि लोभ बस करहिं बिप्र गुर घात ॥ ९९(क) ॥

दोहा — मूल पाठ

बादहिं सूद्र द्विजन्ह सन हम तुम्ह ते कछु घाटि। जानइ ब्रह्म सो बिप्रबर आँखि देखावहिं डाटि ॥ ९९(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

इस प्रसंग में सामाजिक और धार्मिक अव्यवस्था के कठोर ऐतिहासिक वर्णन हैं। विशेष चेतावनी है कि शिष्य का धन लेकर उसका शोक न हरने वाला गुरु पतन पाता है। माता-पिता यदि केवल पेट भरने को धर्म सिखाएँ और ज्ञान के दावे के साथ लोभ रहे तो जीवन का लक्ष्य खो जाता है।

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उत्तरकाण्ड · क्रमांक 100

आचरणहीन ज्ञान का दिखावा

चौपाइयाँ — मूल पाठ

पर त्रिय लंपट कपट सयाने। मोह द्रोह ममता लपटाने ॥ तेइ अभेदबादी ग्यानी नर। देखा में चरित्र कलिजुग कर ॥ आपु गए अरु तिन्हहू घालहिं। जे कहुँ सत मारग प्रतिपालहिं ॥ कल्प कल्प भरि एक एक नरका। परहिं जे दूषहिं श्रुति करि तरका ॥ जे बरनाधम तेलि कुम्हारा। स्वपच किरात कोल कलवारा ॥ नारि मुई गृह संपति नासी। मूड़ मुड़ाइ होहिं सन्यासी ॥ ते बिप्रन्ह सन आपु पुजावहिं। उभय लोक निज हाथ नसावहिं ॥ बिप्र निरच्छर लोलुप कामी। निराचार सठ बृषली स्वामी ॥ सूद्र करहिं जप तप ब्रत नाना। बैठि बरासन कहहिं पुराना ॥ सब नर कल्पित करहिं अचारा। जाइ न बरनि अनीति अपारा ॥

दोहा — मूल पाठ

भए बरन संकर कलि भिन्नसेतु सब लोग। करहिं पाप पावहिं दुख भय रुज सोक बियोग ॥ १००(क) ॥

दोहा — मूल पाठ

श्रुति संमत हरि भक्ति पथ संजुत बिरति बिबेक। तेहि न चलहिं नर मोह बस कल्पहिं पंथ अनेक ॥ १००(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

कथा में वैराग्य और अभेदज्ञान का दावा करके भी विषयासक्ति तथा कपट न छोड़ने वालों की आलोचना है। पुराने सामाजिक संदर्भ की वर्णव्यवस्था-संबंधी पंक्तियाँ मूल रूप में हैं। प्रसंग का सार विवेक-वैराग्य सहित वास्तविक हरिभक्ति छोड़कर स्वार्थपूर्ण आचार गढ़ने का परिणाम है।

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उत्तरकाण्ड · क्रमांक 101

दंभ, अन्याय और लोकपीड़ा

छंद — मूल पाठ

बहु दाम सँवारहिं धाम जती। बिषया हरि लीन्हि न रहि बिरती ॥ तपसी धनवंत दरिद्र गृही। कलि कौतुक तात न जात कही ॥ कुलवंति निकारहिं नारि सती। गृह आनिहिं चेरी निबेरि गती ॥ सुत मानहिं मातु पिता तब लौं। अबलानन दीख नहीं जब लौं ॥ ससुरारि पिआरि लगी जब तें। रिपरूप कुटुंब भए तब तें ॥ नृप पाप परायन धर्म नहीं। करि दंड बिडंब प्रजा नितहीं ॥ धनवंत कुलीन मलीन अपी। द्विज चिन्ह जनेउ उघार तपी ॥ नहिं मान पुरान न बेदहि जो। हरि सेवक संत सही कलि सो। कबि बृंद उदार दुनी न सुनी। गुन दूषक ब्रात न कोऽपि गुनी ॥ कलि बारहिं बार दुकाल परै। बिनु अन्न दुखी सब लोग मरै ॥

दोहा — मूल पाठ

सुनु खगेस कलि कपट हठ दंभ द्वेष पाषंड। मान मोह मारादि मद ब्यापि रहे ब्रह्मंड ॥ १०१(क) ॥

दोहा — मूल पाठ

तामस धर्म करहिं नर जप तप ब्रत मख दान। देव न बरषहिं धरनीं बए न जामहिं धान ॥ १०१(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

धनी होते हुए वैराग्य का दिखावा, परिवार का अनादर, प्रजा को सताने वाला शासन और गुणियों की उपेक्षा वर्णित है। समाज में कपट, हठ, द्वेष और तामस साधन बढ़ते हैं। अकाल और अन्न-संकट से लोग दुःखी होते हैं।

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उत्तरकाण्ड · क्रमांक 102

दोषों के बीच नामस्मरण का सुलभ आधार

छंद — मूल पाठ

अबला कच भूषन भूरि छुधा। धनहीन दुखी ममता बहुधा ॥ सुख चाहहिं मूढ़ न धर्म रता। मति थोरि कठोरि न कोमलता ॥ १ ॥ नर पीड़ित रोग न भोग कहीं। अभिमान बिरोध अकारनहीं ॥ लघु जीवन संबतु पंच दसा। कलपांत न नास गुमानु असा ॥ २ ॥ कलिकाल बिहाल किए मनुजा। नहिं मानत क्वौ अनुजा तनुजा। नहिं तोष बिचार न सीतलता। सब जाति कुजाति भए मगता ॥ ३ ॥ इरिषा परुषाच्छर लोलुपता। भरि पूरि रही समता बिगता ॥ सब लोग बियोग बिसोक हुए। बरनाश्रम धर्म अचार गए ॥ ४ ॥ दम दान दया नहिं जानपनी। जड़ता परबंचनताति घनी ॥ तनु पोषक नारि नरा सगरे। परनिंदक जे जग मो बगरे ॥ ५ ॥

दोहा — मूल पाठ

सुनु ब्यालारि काल कलि मल अवगुन आगार। गुनउँ बहुत कलिजुग कर बिनु प्रयास निस्तार ॥ १०२(क) ॥

दोहा — मूल पाठ

कृतजुग त्रेता द्वापर पूजा मख अरु जोग। जो गति होइ सो कलि हरि नाम ते पावहिं लोग ॥ १०२(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

कठोरता, ईर्ष्या, बीमारी, असंतोष और छल से व्याकुल जीवन का वर्णन है। फिर काकभुशुण्डि कलियुग का बड़ा गुण बताते हैं: अन्य युगों में कठिन साधनों से मिलने वाली गति यहाँ हरिनाम से सुलभ है।

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उत्तरकाण्ड · क्रमांक 103

कलियुग में हरिगुण-गान और दान

चौपाइयाँ — मूल पाठ

कृतजुग सब जोगी बिग्यानी। करि हरि ध्यान तरहिं भव प्रानी ॥ त्रेताँ बिबिध जग्य नर करहीं। प्रभुहि समर्पि कर्म भव तरहीं ॥ द्वापर करि रघुपति पद पूजा। नर भव तरहिं उपाय न दूजा ॥ कलिजुग केवल हरि गुन गाहा। गावत नर पावहिं भव थाहा ॥ कलिजुग जोग न जग्य न ग्याना। एक अधार राम गुन गाना ॥ सब भरोस तजि जो भज रामहि। प्रेम समेत गाव गुन ग्रामहि ॥ सोइ भव तर कछु संसय नाहीं। नाम प्रताप प्रगट कलि माहीं ॥ कलि कर एक पुनीत प्रतापा। मानस पुन्य होहिं नहिं पापा ॥

दोहा — मूल पाठ

कलिजुग सम जुग आन नहिं जौं नर कर बिस्वास। गाइ राम गुन गन बिमलँ भव तर बिनहिं प्रयास ॥ १०३(क) ॥

दोहा — मूल पाठ

प्रगट चारि पद धर्म के कलिल महुँ एक प्रधान। जेन केन बिधि दीन्हें दान करइ कल्यान ॥ १०३(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

विभिन्न युगों की साधना का स्मरण करके कलियुग में प्रेमपूर्वक रामगुण-गान का महत्व बताया है। विश्वास से नाम का आश्रय लेने वाला संसार पार करता है। धर्म के चार चरणों में दान का विशेष कल्याणकारी महत्व भी कहा गया है।

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उत्तरकाण्ड · क्रमांक 104

युगधर्म और रामचरण-प्रेम

चौपाइयाँ — मूल पाठ

नित जुग धर्म होहिं सब केरे। हृदयँ राम माया के प्रेरे ॥ सुद्ध सत्व समता बिग्याना। कृत प्रभाव प्रसन्न मन जाना ॥ सत्व बहुत रज कछु रति कर्मा। सब बिधि सुख त्रेता कर धर्मा ॥ बहु रज स्वल्प सत्व कछु तामस। द्वापर धर्म हरष भय मानस ॥ तामस बहुत रजोगुन थोरा। कलि प्रभाव बिरोध चहुँ ओरा ॥ बुध जुग धर्म जानि मन माहीं। तजि अधर्म रति धर्म कराहीं ॥ काल धर्म नहिं ब्यापहिं ताही। रघुपति चरन प्रीति अति जाही ॥ नट कृत बिकट कपट खगराया। नट सेवकहि न ब्यापइ माया ॥

दोहा — मूल पाठ

हरि माया कृत दोष गुन बिनु हरि भजन न जाहिं। भजिअ राम तजि काम सब अस बिचारि मन माहिं ॥ १०४(क) ॥

दोहा — मूल पाठ

तेहि कलिकाल बरष बहु बसेउँ अवध बिहगेस। परेउ दुकाल बिपति बस तब मैं गयउँ बिदेस ॥ १०४(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

सत्त्व, रज और तम की विविधता से युगों का स्वभाव समझाया गया है। विवेकी धर्म अपनाते हैं; गहरे रामप्रेम वाले पर काल का दोष नहीं छाता। फिर काकभुशुण्डि बताते हैं कि पुराने जन्म में अकाल पड़ने पर वे अयोध्या छोड़कर विदेश गए।

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उत्तरकाण्ड · क्रमांक 105

उज्जयिनी में करुणामय गुरु

चौपाइयाँ — मूल पाठ

गयउँ उजेनी सुनु उरगारी। दीन मलीन दरिद्र दुखारी ॥ गएँ काल कछु संपति पाई। तहँ पुनि करउँ संभु सेवकाई ॥ बिप्र एक बैदिक सिव पूजा। करइ सदा तेहि काजु न दूजा ॥ परम साधु परमारथ बिंदक। संभु उपासक नहिं हरि निंदक ॥ तेहि सेवउँ मैं कपट समेता। द्विज दयाल अति नीति निकेता ॥ बाहिज नम्र देखि मोहि साईं। बिप्र पढ़ाव पुत्र की नाईं ॥ संभु मंत्र मोहि द्विजबर दीन्हा। सुभ उपदेस बिबिध बिधि कीन्हा ॥ जपउँ मंत्र सिव मंदिर जाई। हृदयँ दंभ अहमिति अधिकाई ॥

दोहा — मूल पाठ

मैं खल मल संकुल मति नीच जाति बस मोह। हरि जन द्विज देखें जरउँ करउँ बिष्नु कर द्रोह ॥ १०५(क) ॥

सोरठा — मूल पाठ

गुर नित मोहि प्रबोध दुखित देखि आचरन मम। मोहि उपजइ अति क्रोध दंभिहि नीति कि भावई ॥ १०५(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

उज्जयिनी में उन्हें वेदसम्मत शिवोपासक गुरु मिले, जो हरि की निंदा नहीं करते थे। गुरु पुत्र जैसा पढ़ाते और शिवमंत्र देते हैं। किंतु शिष्य के भीतर दंभ तथा विष्णु-भक्तों के प्रति द्वेष था। हितोपदेश भी उसे क्रोधित करता था।

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उत्तरकाण्ड · क्रमांक 106

गुरु के उपकार का अपमान

चौपाइयाँ — मूल पाठ

एक बार गुर लीन्ह बोलाई। मोहि नीति बहु भाँति सिखाई ॥ सिव सेवा कर फल सुत सोई। अबिरल भगति राम पद होई ॥ रामहि भजहिं तात सिव धाता। नर पावँर कै केतिक बाता ॥ जासु चरन अज सिव अनुरागी। तातु द्रोहँ सुख चहसि अभागी ॥ हर कहुँ हरि सेवक गुर कहेऊ। सुनि खगनाथ हृदय मम दहेऊ ॥ अधम जाति मैं बिद्या पाएँ। भयउँ जथा अहि दूध पिआएँ ॥ मानी कुटिल कुभाग्य कुजाती। गुर कर द्रोह करउँ दिनु राती ॥ अति दयाल गुर स्वल्प न क्रोधा। पुनि पुनि मोहि सिखाव सुबोधा ॥ जेहि ते नीच बड़ाई पावा। सो प्रथमहिं हति ताहि नसावा ॥ धूम अनल संभव सुनु भाई। तेहि बुझाव घन पदवी पाई ॥ रज मग परी निरादर रहई। सब कर पद प्रहार नित सहई ॥ मरुत उड़ाव प्रथम तेहि भरई। पुनि नृप नयन किरीटन्हि परई ॥ सुनु खगपति अस समुझि प्रसंगा। बुध नहिं करहिं अधम कर संगा ॥ कबि कोबिद गावहिं असि नीती। खल सन कलह न भल नहिं प्रीती ॥ उदासीन नित रहिअ गोसाईं। खल परिहरिअ स्वान की नाईं ॥ मैं खल हृदयँ कपट कुटिलाई। गुर हित कहइ न मोहि सोहाई ॥

दोहा — मूल पाठ

एक बार हर मंदिर जपत रहेउँ सिव नाम। गुर आयउ अभिमान तें उठि नहिं कीन्ह प्रनाम ॥ १०६(क) ॥

दोहा — मूल पाठ

सो दयाल नहिं कहेउ कछु उर न रोष लवलेस। अति अघ गुर अपमानता सहि नहिं सके महेस ॥ १०६(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

गुरु शिवसेवा का फल रामचरणों की भक्ति बताते हैं। अहंकारी शिष्य उलटे उन्हीं से द्रोह करता है। एक दिन शिवमंदिर में गुरु आने पर उठकर प्रणाम नहीं करता। गुरु शांत रहते हैं, पर शिव गुरु का अपमान सहन नहीं करते।

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उत्तरकाण्ड · क्रमांक 107

शिव का शाप और गुरु की करुणा

चौपाइयाँ — मूल पाठ

मंदिर माझ भई नभ बानी। रे हतभाग्य अग्य अभिमानी ॥ जद्यपि तव गुर कें नहिं क्रोधा। अति कृपाल चित सम्यक बोधा ॥ तदपि साप सठ दैहउँ तोही। नीति बिरोध सोहाइ न मोही ॥ जौं नहिं दंड करौं खल तोरा। भ्रष्ट होइ श्रुतिमारग मोरा ॥ जे सठ गुर सन इरिषा करहीं। रौरव नरक कोटि जुग परहीं ॥ त्रिजग जोनि पुनि धरहिं सरीरा। अयुत जन्म भरि पावहिं पीरा ॥ बैठ रहेसि अजगर इव पापी। सर्प होहि खल मल मति ब्यापी ॥ महा बिटप कोटर महुँ जाई ॥ रहु अधमाधम अधगति पाई ॥

दोहा — मूल पाठ

हाहाकार कीन्ह गुर दारुन सुनि सिव साप ॥ कंपित मोहि बिलोकि अति उर उपजा परिताप ॥ १०७(क) ॥

दोहा — मूल पाठ

करि दंडवत सप्रेम द्विज सिव सन्मुख कर जोरि। बिनय करत गदगद स्वर समुझि घोर गति मोरि ॥ १०७(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

आकाशवाणी से शिव अनुशासन और गुरुसम्मान का महत्व बताकर शिष्य को सर्प होने का शाप देते हैं। दयालु गुरु उसके दुख से व्याकुल होते हैं। वे शिव के सामने प्रणाम करके शिष्य के हित की प्रार्थना आरंभ करते हैं।

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उत्तरकाण्ड · क्रमांक 108

रुद्राष्टक और शिष्य के लिए क्षमा-याचना

छंद · रुद्राष्टक — मूल पाठ

नमामीशमीशान निर्वाणरूपं। विभुं ब्यापकं ब्रह्म वेदस्वरूपं। निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं। चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहं ॥ निराकारमोंकारमूलं तुरीयं। गिरा ग्यान गोतीतमीशं गिरीशं ॥ करालं महाकाल कालं कृपालं। गुणागार संसारपारं नतोऽहं ॥ तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं। मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरं ॥ स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गंगा। लसद्भालबालेन्दु कंठे भुजंगा ॥ चलत्कुंडलं भ्रू सुनेत्रं विशालं। प्रसन्नाननं नीलकंठं दयालं ॥ मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं। प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि ॥ प्रचंडं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं। अखंडं अजं भानुकोटिप्रकाशं ॥ त्रयःशूल निर्मूलनं शूलपाणिं। भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यं ॥ कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी। सदा सज्जनानंददाता पुरारी ॥ चिदानंदसंदोह मोहापहारी। प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी ॥ न यावद् उमानाथ पादारविन्दं। भजंतीह लोके परे वा नराणां ॥ न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं। प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं ॥ न जानामि योगं जपं नैव पूजां। नतोऽहं सदा सर्वदा शंभु तुभ्यं ॥ जरा जन्म दुःखौघ तातप्यमानं। प्रभो पाहि आपन्नमामीश शंभो ॥

श्लोक — मूल पाठ

रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये। ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भुः प्रसीदति ॥ ९ ॥

दोहा — मूल पाठ

-सुनि बिनती सर्बग्य सिव देखि बिप्र अनुरागु। पुनि मंदिर नभबानी भइ द्विजबर बर मागु ॥ १०८(क) ॥

दोहा — मूल पाठ

जौं प्रसन्न प्रभु मो पर नाथ दीन पर नेहु। निज पद भगति देइ प्रभु पुनि दूसर बर देहु ॥ १०८(ख) ॥

दोहा — मूल पाठ

तव माया बस जीव जड़ संतत फिरइ भुलान। तेहि पर क्रोध न करिअ प्रभु कृपा सिंधु भगवान ॥ १०८(ग) ॥

दोहा — मूल पाठ

संकर दीनदयाल अब एहि पर होहु कृपाल। साप अनुग्रह होइ जेहिं नाथ थोरेहीं काल ॥ १०८(घ) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

गुरु निराकार, करुणामय, ज्ञानातीत शिव की आठ पदों में स्तुति करते हैं। वे योग-जप की योग्यता का दावा छोड़कर जन्म-जरा के दुख से रक्षा माँगते हैं। प्रसन्न शिव से अपनी भक्ति और अज्ञानी शिष्य पर अनुग्रह माँगते हैं, ताकि शाप शीघ्र कल्याणकारी हो जाए।

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उत्तरकाण्ड · क्रमांक 109

शाप को अनुग्रह में बदलने वाली गुरु-कृपा

चौपाइयाँ — मूल पाठ

एहि कर होइ परम कल्याना। सोइ करहु अब कृपानिधाना ॥ बिप्रगिरा सुनि परहित सानी। एवमस्तु इति भइ नभबानी ॥ जदपि कीन्ह एहिं दारुन पापा। मैं पुनि दीन्ह कोप करि सापा ॥ तदपि तुम्हार साधुता देखी। करिहउँ एहि पर कृपा बिसेषी ॥ छमासील जे पर उपकारी। ते द्विज मोहि प्रिय जथा खरारी ॥ मोर श्राप द्विज ब्यर्थ न जाइहि। जन्म सहस अवस्य यह पाइहि ॥ जनमत मरत दुसह दुख होई। अहि स्वल्पउ नहिं ब्यापिहि सोई ॥ कवनेउँ जन्म मिटिहि नहिं ग्याना। सुनहि सूद्र मम बचन प्रवाना ॥ रघुपति पुरीं जन्म तब भयऊ। पुनि तैं मम सेवाँ मन दयऊ ॥ पुरी प्रभाव अनुग्रह मोरें। राम भगति उपजिहि उर तोरें ॥ सुनु मम बचन सत्य अब भाई। हरितोषन ब्रत द्विज सेवकाई ॥ अब जनि करहि बिप्र अपमाना। जानेहु संत अनंत समाना ॥ इंद्र कुलिस मम सूल बिसाला। कालदंड हरि चक्र कराला ॥ जो इन्ह कर मारा नहिं मरई। बिप्रद्रोह पावक सो जरई ॥ अस बिबेक राखेहु मन माहीं। तुम्ह कहँ जग दुर्लभ कछु नाहीं ॥ औरउ एक आसिषा मोरी। अप्रतिहत गति होइहि तोरी ॥

दोहा — मूल पाठ

सुनि सिव बचन हरषि गुर एवमस्तु इति भाषि। मोहि प्रबोधि गयउ गृह संभु चरन उर राखि ॥ १०९(क) ॥

दोहा — मूल पाठ

प्रेरित काल बिधि गिरि जाइ भयउँ मैं ब्याल। पुनि प्रयास बिनु सो तनु तजेउँ गएँ कछु काल ॥ १०९(ख) ॥

दोहा — मूल पाठ

जोइ तनु धरउँ तजउँ पुनि अनायास हरिजान। जिमि नूतन पट पहिरइ नर परिहरइ पुरान ॥ १०९(ग) ॥

दोहा — मूल पाठ

सिवँ राखी श्रुति नीति अरु मैं नहिं पावा क्लेस। एहि बिधि धरेउँ बिबिध तनु ग्यान न गयउ खगेस ॥ १०९(घ) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

गुरु की परोपकारी प्रार्थना से शिव शिष्य पर विशेष कृपा करते हैं। अनेक जन्म होंगे, पर जन्म-मृत्यु की पीड़ा और स्मृतिभ्रंश नहीं होगा। अयोध्या और शिवकृपा से रामभक्ति मिलेगी। संतों का अनादर न करने का उपदेश और निर्बाध गति का वर भी देते हैं।

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उत्तरकाण्ड · क्रमांक 110

नए जन्म में रामदर्शन की लालसा

चौपाइयाँ — मूल पाठ

त्रिजग देव नर जोइ तनु धरउँ। तहँ तहँ राम भजन अनुसरऊँ ॥ एक सूल मोहि बिसर न काऊ। गुर कर कोमल सील सुभाऊ ॥ चरम देह द्विज कै मैं पाई। सुर दुर्लभ पुरान श्रुति गाई ॥ खेलउँ तहूँ बालकन्ह मीला। करउँ सकल रघुनायक लीला ॥ प्रौढ़ भएँ मोहि पिता पढ़ावा। समझउँ सुनउँ गुनउँ नहिं भावा ॥ मन ते सकल बासना भागी। केवल राम चरन लय लागी ॥ कहु खगेस अस कवन अभागी। खरी सेव सुरधेनुहि त्यागी ॥ प्रेम मगन मोहि कछु न सोहाई। हारेउ पिता पढ़ाइ पढ़ाई ॥ भए कालबस जब पितु माता। मैं बन गयउँ भजन जनत्राता ॥ जहँ जहँ बिपिन मुनीस्वर पावउँ। आश्रम जाइ जाइ सिरु नावउँ ॥ बूझत तिन्हहि राम गुन गाहा। कहहिं सुनउँ हरषित खगनाहा ॥ सुनत फिरउँ हरि गुन अनुबादा। अब्याहत गति संभु प्रसादा ॥ छूटी त्रिबिध ईषना गाढ़ी। एक लालसा उर अति बाढ़ी ॥ राम चरन बारिज जब देखौं। तब निज जन्म सफल करि लेखौं ॥ जेहि पूँछउँ सोइ मुनि अस कहई। ईस्वर सर्ब भूतमय अहई ॥ निर्गुन मत नहिं मोहि सोहाई। सगुन ब्रह्म रति उर अधिकाई ॥

दोहा — मूल पाठ

गुर के बचन सुरति करि राम चरन मनु लाग। रघुपति जस गावत फिरउँ छन छन नव अनुराग ॥ ११०(क) ॥

दोहा — मूल पाठ

मेरु सिखर बट छायाँ मुनि लोमस आसीन। देखि चरन सिरु नायउँ बचन कहेउँ अति दीन ॥ ११०(ख) ॥

दोहा — मूल पाठ

सुनि मम बचन बिनीत मृदु मुनि कृपाल खगराज। मोहि सादर पूँछत भए द्विज आयहु केहि काज ॥ ११०(ग) ॥

दोहा — मूल पाठ

तब मैं कहा कृपानिधि तुम्ह सर्बग्य सुजान। सगुन ब्रह्म अवराधन मोहि कहहु भगवान ॥ ११०(घ) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

अनेक शरीरों में रामभजन करते हुए काकभुशुण्डि गुरु की करुणा नहीं भूलते। अंतिम मनुष्यजन्म में बचपन से रामलीला और भजन प्रिय हैं। माता-पिता के बाद वन में मुनियों से कथा सुनते फिरते हैं। बालराम के दर्शन की इच्छा लेकर लोमश मुनि के पास पहुँचते हैं।

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उत्तरकाण्ड · क्रमांक 111

सगुण भक्ति और निर्गुण उपदेश का संवाद

चौपाइयाँ — मूल पाठ

तब मुनिष रघुपति गुन गाथा। कहे कछुक सादर खगनाथा ॥ ब्रह्मग्यान रत मुनि बिग्यानि। मोहि परम अधिकारी जानी ॥ लागे करन ब्रह्म उपदेसा। अज अद्वेत अगुन हृदयेसा ॥ अकल अनीह अनाम अरुपा। अनुभव गम्य अखंड अनूपा ॥ मन गोतीत अमल अबिनासी। निर्बिकार निरवधि सुख रासी ॥ सो तैं ताहि तोहि नहिं भेदा। बारि बीचि इव गावहि बेदा ॥ बिबिध भाँति मोहि मुनि समुझावा। निर्गुन मत मम हृदयँ न आवा ॥ पुनि मैं कहेउँ नाइ पद सीसा। सगुन उपासन कहहु मुनीसा ॥ राम भगति जल मम मन मीना। किमि बिलगाइ मुनीस प्रबीना ॥ सोइ उपदेस कहहु करि दाया। निज नयनन्हि देखौं रघुराया ॥ भरि लोचन बिलोकि अवधेसा। तब सुनिहउँ निर्गुन उपदेसा ॥ मुनि पुनि कहि हरिकथा अनूपा। खंडि सगुन मत अगुन निरूपा ॥ तब मैं निर्गुन मत कर दूरी। सगुन निरूपउँ करि हठ भूरी ॥ उत्तर प्रतिउत्तर मैं कीन्हा। मुनि तन भए क्रोध के चीन्हा ॥ सुनु प्रभु बहुत अवग्या किएँ। उपज क्रोध ग्यानिन्ह के हिएँ ॥ अति संघरषन जौं कर कोई। अनल प्रगट चंदन ते होई ॥

दोहा — मूल पाठ

-बारंबार सकोप मुनि करइ निरुपन ग्यान। मैं अपनें मन बैठ तब करउँ बिबिध अनुमान ॥ १११(क) ॥

दोहा — मूल पाठ

क्रोध कि द्वेतबुद्धि बिनु द्वैत कि बिनु अग्यान। मायाबस परिछिन्न जड़ जीव कि ईस समान ॥ १११(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

लोमश मुनि अखंड निर्गुण ब्रह्म का उपदेश देते हैं। काकभुशुण्डि सगुण राम के दर्शन की इच्छा बार-बार कहते हैं। प्रश्न-प्रतिप्रश्न से मुनि क्रोधित होते हैं। प्रसंग भिन्न साधन-रुचि, हठ और ज्ञान के साथ व्यवहार की परीक्षा दिखाता है।

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उत्तरकाण्ड · क्रमांक 112

लोमश का शाप और कौए का शरीर

चौपाइयाँ — मूल पाठ

कबहुँ कि दुख सब कर हित ताकें। तेहि कि दरिद्र परस मनि जाकें ॥ परद्रोही की होहिं निसंका। कामी पुनि कि रहहिं अकलंका ॥ बंस कि रह द्विज अनहित कीन्हें। कर्म कि होहिं स्वरूपहि चीन्हें ॥ काहू सुमति कि खल सँग जामी। सुभ गति पाव कि परत्रिय गामी ॥ भव कि परहिं परमात्मा बिंदक। सुखी कि होहिं कबहुँ हरिनिंदक ॥ राजु कि रहइ नीति बिनु जानें। अघ कि रहहिं हरिचरित बखानें ॥ पावन जस कि पुन्य बिनु होई। बिनु अघ अजस कि पावइ कोई ॥ लाभु कि किछु हरि भगति समाना। जेहि गावहिं श्रुति संत पुराना ॥ हानि कि जग एहि सम किछु भाई। भजिअ न रामहि नर तनु पाई ॥ अघ कि पिसुनता सम कछु आना। धर्म कि दया सरिस हरिजाना ॥ एहि बिधि अमिति जुगुति मन गुनऊँ। मुनि उपदेस न सादर सुनऊँ ॥ पुनि पुनि सगुन पच्छ मैं रोपा। तब मुनि बोलेउ बचन सकोपा ॥ मूढ़ परम सिख देउँ न मानसि। उत्तर प्रतिउत्तर बहु आनसि ॥ सत्य बचन बिस्वास न करही। बायस इव सबही ते डरही ॥ सठ स्वपच्छ तब हृदयँ बिसाला। सपदि होहि पच्छी चंडाला ॥ लीन्ह श्राप मैं सीस चढ़ाई। नहिं कछु भय न दीनता आई ॥

दोहा — मूल पाठ

तुरत भयउँ मैं काग तब पुनि मुनि पद सिरु नाइ। सुमिरि राम रघुबंस मनि हरषित चलेउँ उड़ाइ ॥ ११२(क) ॥

दोहा — मूल पाठ

उमा जे राम चरन रत बिगत काम मद क्रोध ॥ निज प्रभुमय देखहिं जगत केहि सन करहिं बिरोध ॥ ११२(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

काकभुशुण्डि भक्ति, दया और सदाचार का मन में विचार करते हुए भी सगुण पक्ष पर हठ रखते हैं। मुनि उन्हें कौआ होने का शाप देते हैं। वे बिना भय या विरोध के शाप स्वीकारकर प्रणाम करते और राम का स्मरण करके उड़ जाते हैं।

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उत्तरकाण्ड · क्रमांक 113

मुनि का स्नेह और रामचरितमानस की प्राप्ति

चौपाइयाँ — मूल पाठ

सुनु खगेस नहिं कछु रिषि दूषन। उर प्रेरक रघुबंस बिभूषन ॥ कृपासिंधु मुनि मति करि भोरी। लीन्हि प्रेम परिच्छा मोरी ॥ मन बच क्रम मोहि निज जन जाना। मुनि मति पुनि फेरी भगवाना ॥ रिषि मम महत सीलता देखी। राम चरन बिस्वास बिसेषी ॥ अति बिसमय पुनि पुनि पछिताई। सादर मुनि मोहि लीन्ह बोलाई ॥ मम परितोष बिबिध बिधि कीन्हा। हरषित राममंत्र तब दीन्हा ॥ बालकरूप राम कर ध्याना। कहेउ मोहि मुनि कृपानिधाना ॥ सुंदर सुखद मिहि अति भावा। सो प्रथमहिं मैं तुम्हहि सुनावा ॥ मुनि मोहि कछुक काल तहँ राखा। रामचरितमानस तब भाषा ॥ सादर मोहि यह कथा सुनाई। पुनि बोले मुनि गिरा सुहाई ॥ रामचरित सर गुप्त सुहावा। संभु प्रसाद तात मैं पावा ॥ तोहि निज भगत राम कर जानी। ताते मैं सब कहेउँ बखानी ॥ राम भगति जिन्ह कें उर नाहीं। कबहुँ न तात कहिअ तिन्ह पाहीं ॥ मुनि मोहि बिबिध भाँति समुझावा। मैं सप्रेम मुनि पद सिरु नावा ॥ निज कर कमल परसि मम सीसा। हरषित आसिष दीन्ह मुनीसा ॥ राम भगति अबिरल उर तोरें। बसिहि सदा प्रसाद अब मोरें ॥

दोहा — मूल पाठ

-सदा राम प्रिय होहु तुम्ह सुभ गुन भवन अमान। कामरूप इच्छामरन ग्यान बिराग निधान ॥ ११३(क) ॥

दोहा — मूल पाठ

जेंहिं आश्रम तुम्ह बसब पुनि सुमिरत श्रीभगवंत। ब्यापिहि तहँ न अबिद्या जोजन एक प्रजंत ॥ ११३(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

काकभुशुण्डि मुनि को दोष नहीं देते; इसे प्रभु द्वारा प्रेम की परीक्षा मानते हैं। लोमश उनकी विनय और विश्वास देखकर वापस बुलाते हैं। राममंत्र, बालरूप का ध्यान और रामचरितमानस की कथा देते हैं। फिर भक्ति, ज्ञान, वैराग्य और आश्रम के आसपास अज्ञान न रहने का आशीर्वाद देते हैं।

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उत्तरकाण्ड · क्रमांक 114

काल से परे रहने का वर और आश्रमवास

चौपाइयाँ — मूल पाठ

काल कर्म गुन दोष सुभाऊ। कछु दुख तुम्हहि न ब्यापिहि काऊ ॥ राम रहस्य ललित बिधि नाना। गुप्त प्रगट इतिहास पुराना ॥ बिनु श्रम तुम्ह जानब सब सोऊ। नित नव नेह राम पद होऊ ॥ जो इच्छा करिहहु मन माहीं। हरि प्रसाद कछु दुर्लभ नाहीं ॥ सुनि मुनि आसिष सुनु मतिधीरा। ब्रह्मगिरा भइ गगन गँभीरा ॥ एवमस्तु तव बच मुनि ग्यानी। यह मम भगत कर्म मन बानी ॥ सुनि नभगिरा हरष मोहि भयऊ। प्रेम मगन सब संसय गयऊ ॥ करि बिनती मुनि आयसु पाई। पद सरोज पुनि पुनि सिरु नाई ॥ हरष सहित एहिं आश्रम आयउँ। प्रभु प्रसाद दुर्लभ बर पायउँ ॥ इहाँ बसत मोहि सुनु खग ईसा। बीते कलप सात अरु बीसा ॥ करउँ सदा रघुपति गुन गाना। सादर सुनहिं बिहंग सुजाना ॥ जब जब अवधपुरीं रघुबीरा। धरहिं भगत हित मनुज सरीरा ॥ तब तब जाइ राम पुर रहऊँ। सिसुलीला बिलोकि सुख लहऊँ ॥ पुनि उर राखि राम सिसुरूपा। निज आश्रम आवउँ खगभूपा ॥ कथा सकल मैं तुम्हहि सुनाई। काग देह जेहिं कारन पाई ॥ कहिउँ तात सब प्रस्न तुम्हारी। राम भगति महिमा अति भारी ॥

दोहा — मूल पाठ

ताते यह तन मोहि प्रिय भयउ राम पद नेह। निज प्रभु दरसन पायउँ गए सकल संदेह ॥ ११४(क) ॥

दोहा — मूल पाठ

भगति पच्छ हठ करि रहेउँ दीन्हि महारिषि साप। मुनि दुर्लभ बर पायउँ देखहु भजन प्रताप ॥ ११४(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

मुनि के वर की आकाशवाणी से पुष्टि होती है। काकभुशुण्डि अपने आश्रम में आकर रामगुण गाते हैं। सत्ताईस कल्पों से वहाँ रहते और प्रत्येक अवतार में बाललीला देखने जाते हैं। इसी कौए के शरीर में दर्शन और प्रेम मिला, इसलिए वह प्रिय है।

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उत्तरकाण्ड · क्रमांक 115

ज्ञान और भक्ति का अंतर पूछा गया

चौपाइयाँ — मूल पाठ

जे असि भगति जानि परिहरहीं। केवल ग्यान हेतु श्रम करहीं ॥ ते जड़ कामधेनु गृहँ त्यागी। खोजत आकु फिरहिं पय लागी ॥ सुनु खगेस हरि भगति बिहाई। जे सुख चाहहिं आन उपाई ॥ ते सठ महासिंधु बिनु तरनी। पैरि पार चाहहिं जड़ करनी ॥ सुनि भसुंडि के बचन भवानी। बोलेउ गरुड़ हरषि मृदु बानी ॥ तव प्रसाद प्रभु मम उर माहीं। संसय सोक मोह भ्रम नाहीं ॥ सुनेउँ पुनीत राम गुन ग्रामा। तुम्हरी कृपाँ लहेउँ बिश्रामा ॥ एक बात प्रभु पूँछउँ तोही। कहहु बुझाइ कृपानिधि मोही ॥ कहहिं संत मुनि बेद पुराना। नहिं कछु दुर्लभ ग्यान समाना ॥ सोइ मुनि तुम्ह सन कहेउ गोसाईं। नहिं आदरेहु भगति की नाईं ॥ ग्यानहि भगतिहि अंतर केता। सकल कहहु प्रभु कृपा निकेता ॥ सुनि उरगारि बचन सुख माना। सादर बोलेउ काग सुजाना ॥ भगतिहि ग्यानहि नहिं कछु भेदा। उभय हरहिं भव संभव खेदा ॥ नाथ मुनीस कहहिं कछु अंतर। सावधान सोउ सुनु बिहंगबर ॥ ग्यान बिराग जोग बिग्याना। ए सब पुरुष सुनहु हरिजाना ॥ पुरुष प्रताप प्रबल सब भाँती। अबला अबल सहज जड़ जाती ॥

दोहा — मूल पाठ

-पुरुष त्यागि सक नारिहि जो बिरक्त मति धीर ॥ न तु कामी बिषयाबस बिमुख जो पद रघुबीर ॥ ११५(क) ॥

सोरठा — मूल पाठ

सोउ मुनि ग्याननिधान मृगनयनी बिधु मुख निरखि। बिबस होइ हरिजान नारि बिष्नु माया प्रगट ॥ ११५(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

भक्ति छोड़कर अन्य उपाय से सुख चाहने की तुलना नाव बिना समुद्र पार करने से है। गरुड़ ज्ञान और भक्ति का भेद पूछते हैं। काकभुशुण्डि कहते हैं कि दोनों संसार का दुख हरते हैं; आगे माया के प्रभाव को समझाने के लिए रूपक दिया गया है।

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उत्तरकाण्ड · क्रमांक 116

भक्ति के सामने माया संकुचित

चौपाइयाँ — मूल पाठ

इहाँ न पच्छपात कछु राखउँ। बेद पुरान संत मत भाषउँ ॥ मोह न नारि नारि कें रूपा। पन्नगारि यह रीति अनूपा ॥ माया भगति सुनहु तुम्ह दोऊ। नारि बर्ग जानइ सब कोऊ ॥ पुनि रघुबीरहि भगति पिआरी। माया खलु नर्तकी बिचारी ॥ भगतिहि सानुकूल रघुराया। ताते तेहि डरपति अति माया ॥ राम भगति निरुपम निरुपाधी। बसइ जासु उर सदा अबाधी ॥ तेहि बिलोकि माया सकुचाई। करि न सकइ कछु निज प्रभुताई ॥ अस बिचारि जे मुनि बिग्यानी। जाचहीं भगति सकल सुख खानी ॥

दोहा — मूल पाठ

यह रहस्य रघुनाथ कर बेगि न जानइ कोइ। जो जानइ रघुपति कृपाँ सपनेहुँ मोह न होइ ॥ ११६(क) ॥

दोहा — मूल पाठ

औरउ ग्यान भगति कर भेद सुनहु सुप्रबीन। जो सुनि होइ राम पद प्रीति सदा अबिछीन ॥ ११६(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

माया और भक्ति को रूपक में समान स्त्रीवर्ग कहकर समझाया गया है कि माया भक्त को वैसी तरह मोहित नहीं कर पाती। राम को भक्ति प्रिय है और उनका संरक्षण भक्त को मिलता है। विवेकी इसी कारण निष्काम, निर्बाध भक्ति माँगते हैं।

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उत्तरकाण्ड · क्रमांक 117

श्रद्धा की गाय से ज्ञान के दीपक तक

चौपाइयाँ — मूल पाठ

सुनहु तात यह अकथ कहानी। समुझत बनइ न जाइ बखानी ॥ ईस्वर अंस जीव अबिनासी। चेतन अमल सहज सुख रासी ॥ सो मायाबस भयउ गोसाईं। बँध्यो कीर मरकट की नाई ॥ जड़ चेतनहि ग्रंथि परि गई। जदपि मृषा छूटत कठिनई ॥ तब ते जीव भयउ संसारी। छूट न ग्रंथि न होइ सुखारी ॥ श्रुति पुरान बहु कहेउ उपाई। छूट न अधिक अधिक अरुझाई ॥ जीव हृदयँ तम मोह बिसेषी। ग्रंथि छूट किमि परइ न देखी ॥ अस संजोग ईस जब करई। तबहुँ कदाचित सो निरुअरई ॥ सात्त्विक श्रद्धा धेनु सुहाई। जौं हरि कृपाँ हृदयँ बस आई ॥ जप तप ब्रत जम नियम अपारा। जे श्रुति कह सुभ धर्म अचारा ॥ तेइ तृन हरित चरै जब गाई। भाव बच्छ सिसु पाइ पेन्हाई ॥ नोइ निबृत्ति पात्र बिस्वासा। निर्मल मन अहीर निज दासा ॥ परम धर्ममय पय दुहि भाई। अवटै अनल अकाम बिहाई ॥ तोष मरुत तब छमाँ जुड़ावै। धृति सम जावनु देइ जमावै ॥ मुदिताँ मथैं बिचार मथानी। दम अधार रजु सत्य सुबानी ॥ तब मथि काढ़ि लेइ नवनीता। बिमल बिराग सुभग सुपुनीता ॥

दोहा — मूल पाठ

जोग अगिनि करि प्रगट तब कर्म सुभासुभ लाइ। बुद्धि सिरावैं ग्यान घृत ममता मल जरि जाइ ॥ ११७(क) ॥

दोहा — मूल पाठ

तब बिग्यानरूपिनि बुद्धि बिसद घृत पाइ। चित्त दिआ भरि धरै दृढ़ समता दिअटि बनाइ ॥ ११७(ख) ॥

दोहा — मूल पाठ

तीनि अवस्था तीनि गुन तेहि कपास तें काढ़ि। तूल तुरीय सँवारि पुनि बाती करै सुगाढ़ि ॥ ११७(ग) ॥

सोरठा — मूल पाठ

एहि बिधि लेसै दीप तेज रासि बिग्यानमय ॥ जातहिं जासु समीप जरहिं मदादिक सलभ सब ॥ ११७(घ) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

ईश्वर का चेतन अंश जीव माया से जड़-चेतन की गाँठ में बँध जाता है। विस्तृत रूपक में सात्त्विक श्रद्धा गाय, सदाचार चारा, विश्वास पात्र, विचार मथानी और वैराग्य मक्खन हैं। योग से ज्ञानरूपी घी बनता है; समता के आधार पर विज्ञान का दीपक जलाया जाता है।

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उत्तरकाण्ड · क्रमांक 118

ज्ञान-दीप के मार्ग में बाधाएँ

चौपाइयाँ — मूल पाठ

सोहमस्मि इति बृत्ति अखंडा। दीप सिखा सोइ परम प्रचंडा ॥ आतम अनुभव सुख सुप्रकासा। तब भव मूल भेद भ्रम नासा ॥ प्रबल अबिद्या कर परिवारा। मोह आदि तम मिटइ अपारा ॥ तब सोइ बुद्धि पाइ उँजिआरा। उर गृहँ बैठि ग्रंथि निरुआरा ॥ छोरन ग्रंथि पाव जौं सोई। तब यह जीव कृतारथ होई ॥ छोरत ग्रंथि जानि खगराया। बिघ्न अनेक करइ तब माया ॥ रिद्धि सिद्धि प्रेरइ बहु भाई। बुद्धहि लोभ दिखावहिं आई ॥ कल बल छल करि जाहिं समीपा। अंचल बात बुझावहिं दीपा ॥ होइ बुद्धि जौं परम सयानी। तिन्ह तन चितव न अनहित जानी ॥ जौं तेहि बिघ्न बुद्धि नहिं बाधी। तौ बहोरि सुर करहिं उपाधी ॥ इंद्रीं द्वार झरोखा नाना। तहँ तहँ सुर बैठे करि थाना ॥ आवत देखहिं बिषय बयारी। ते हठि देही कपाट उघारी ॥ जब सो प्रभंजन उर गृहँ जाई। तबहिं दीप बिग्यान बुझाई ॥ ग्रंथि न छूटि मिटा सो प्रकासा। बुद्धि बिकल भइ बिषय बतासा ॥ इंद्रिन्ह सुरन्ह न ग्यान सोहाई। बिषय भोग पर प्रीति सदाई ॥ बिषय समीर बुद्धि कृत भोरी। तेहि बिधि दीप को बार बहोरी ॥

दोहा — मूल पाठ

तब फिरि जीव बिबिध बिधि पावइ संसृति क्लेस। हरि माया अति दुस्तर तरि न जाइ बिहगेस ॥ ११८(क) ॥

दोहा — मूल पाठ

कहत कठिन समुझत कठिन साधन कठिन बिबेक। होइ घुनाच्छर न्याय जौं पुनि प्रत्यूह अनेक ॥ ११८(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

अखंड आत्मबोध से अज्ञान मिटता और बंधन खुलने लगता है। माया सिद्धि-संपत्ति का लोभ और इंद्रियों से विषयों की हवा भेजकर ज्ञान-दीप बुझाने का प्रयास करती है। इसलिए ज्ञानमार्ग समझने और निभाने में कठिन तथा अनेक बाधाओं वाला बताया गया है।

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उत्तरकाण्ड · क्रमांक 119

सहज भक्ति और सेवक-सेव्य भाव

चौपाइयाँ — मूल पाठ

ग्यान पंथ कृपान कै धारा। परत खगेस होइ नहिं बारा ॥ जो निर्बिघ्न पंथ निर्बहई। सो कैवल्य परम पद लहई ॥ अति दुर्लभ कैवल्य परम पद। संत पुरान निगम आगम बद ॥ राम भजत सोइ मुकुति गोसाई। अनइच्छित आवइ बरिआई ॥ जिमि थल बिनु जल रहि न सकाई। कोटि भाँति कोउ करै उपाई ॥ तथा मोच्छ सुख सुनु खगराई। रहि न सकइ हरि भगति बिहाई ॥ अस बिचारि हरि भगत सयाने। मुक्ति निरादर भगति लुभाने ॥ भगति करत बिनु जतन प्रयासा। संसृति मूल अबिद्या नासा ॥ भोजन करिअ तृपिति हित लागी। जिमि सो असन पचवै जठरागी ॥ असि हरिभगति सुगम सुखदाई। को अस मूढ़ न जाहि सोहाई ॥

दोहा — मूल पाठ

सेवक सेब्य भाव बिनु भव न तरिअ उरगारि ॥ भजहु राम पद पंकज अस सिद्धांत बिचारि ॥ ११९(क) ॥

दोहा — मूल पाठ

जो चेतन कहँ जड़ करइ जड़हि करइ चैतन्य। अस समर्थ रघुनायकहिं भजहिं जीव ते धन्य ॥ ११९(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

ज्ञानमार्ग तलवार की धार समान कठिन है। रामभजन में मुक्ति अनचाहे भी साथ आती है और अज्ञान सहज मिटता है। काकभुशुण्डि सेवक और स्वामी के प्रेमभाव को संसार पार करने का सिद्धांत बताते हैं। सर्वसमर्थ राम का भजन करने वाले धन्य हैं।

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उत्तरकाण्ड · क्रमांक 120

रामभक्ति की चिंतामणि

चौपाइयाँ — मूल पाठ

कहेउँ ग्यान सिद्धांत बुझाई। सुनहु भगति मनि कै प्रभुताई ॥ राम भगति चिंतामनि सुंदर। बसइ गरुड़ जाके उर अंतर ॥ परम प्रकास रूप दिन राती। नहिं कछु चहिअ दिआ घृत बाती ॥ मोह दरिद्र निकट नहिं आवा। लोभ बात नहिं ताहि बुझावा ॥ प्रबल अबिद्या तम मिटि जाई। हारहिं सकल सलभ समुदाई ॥ खल कामादि निकट नहिं जाहीं। बसइ भगति जाके उर माहीं ॥ गरल सुधासम अरि हित होई। तेहि मनि बिनु सुख पाव न कोई ॥ ब्यापहिं मानस रोग न भारी। जिन्ह के बस सब जीव दुखारी ॥ राम भगति मनि उर बस जाकें। दुख लवलेस न सपनेहुँ ताकें ॥ चतुर सिरोमनि तेइ जग माहीं। जे मनि लागि सुजतन कराहीं ॥ सो मनि जदपि प्रगट जग अहई। राम कृपा बिनु नहिं कोउ लहई ॥ सुगम उपाय पाइबे केरे। नर हतभाग्य देहिं भटमेरे ॥ पावन पर्बत बेद पुराना। राम कथा रुचिराकर नाना ॥ मर्मी सज्जन सुमति कुदारी। ग्यान बिराग नयन उरगारी ॥ भाव सहित खोजइ जो प्रानी। पाव भगति मनि सब सुख खानी ॥ मोरें मन प्रभु अस बिस्वासा। राम ते अधिक राम कर दासा ॥ राम सिंधु घन सज्जन धीरा। चंदन तरु हरि संत समीरा ॥ सब कर फल हरि भगति सुहाई। सो बिनु संत न काहूँ पाई ॥ अस बिचारि जोइ कर सतसंगा। राम भगति तेहि सुलभ बिहंगा ॥

दोहा — मूल पाठ

ब्रह्म पयोनिधि मंदर ग्यान संत सुर आहिं। कथा सुधा मथि काढ़हिं भगति मधुरता जाहिं ॥ १२०(क) ॥

दोहा — मूल पाठ

बिरति चर्म असि ग्यान मद लोभ मोह रिपु मारि। जय पाइअ सो हरि भगति देखु खगेस बिचारि ॥ १२०(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

भक्ति ऐसी मणि है जो बिना दीपक के सदा प्रकाश देती है; मोह, लोभ और मानसिक विकार उसे नहीं बुझाते। संत, कथा, ज्ञान-वैराग्य और भावपूर्वक खोज से यह रामकृपा द्वारा मिलती है। सत्संग से भक्ति सुलभ होती है; इसी को सब साधनों का मधुर फल कहा है।

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उत्तरकाण्ड · क्रमांक 121

सात प्रश्न और मन के आध्यात्मिक रोग

चौपाइयाँ — मूल पाठ

पुनि सप्रेम बोलेउ खगराऊ। जौं कृपाल मोहि ऊपर भाऊ ॥ नाथ मोहि निज सेवक जानी। सप्त प्रस्न कहहु बखानी ॥ प्रथमहिं कहहु नाथ मतिधीरा। सब ते दुर्लभ कवन सरीरा ॥ बड़ दुख कवन कवन सुख भारी। सोउ संछेपहिं कहहु बिचारी ॥ संत असंत मरम तुम्ह जानहु। तिन्ह कर सहज सुभाव बखानहु ॥ कवन पुन्य श्रुति बिदित बिसाला। कहहु कवन अघ परम कराला ॥ मानस रोग कहहु समुझाई। तुम्ह सर्बग्य कृपा अधिकाई ॥ तात सुनहु सादर अति प्रीती। मैं संछेप कहउँ यह नीती ॥ नर तन सम नहिं कवनिउ देही। जीव चराचर जाचत तेही ॥ नरक स्वर्ग अपबर्ग निसेनी। ग्यान बिराग भगति सुभ देनी ॥ सो तनु धरि हरि भजहिं न जे नर। होहिं बिषय रत मंद मंद तर ॥ काँच किरिच बदलें ते लेही। कर ते डारि परस मनि देहीं ॥ नहिं दरिद्र सम दुख जग माहीं। संत मिलन सम सुख जग नाहीं ॥ पर उपकार बचन मन काया। संत सहज सुभाउ खगराया ॥ संत सहहिं दुख परहित लागी। परदुख हेतु असंत अभागी ॥ भूर्ज तरू सम संत कृपाला। परहित निति सह बिपति बिसाला ॥ सन इव खल पर बंधन करई। खाल कढ़ाइ बिपति सहि मरई ॥ खल बिनु स्वारथ पर अपकारी। अहि मूषक इव सुनु उरगारी ॥ पर संपदा बिनासि नसाहीं। जिमि ससि हति हिम उपल बिलाहीं ॥ दुष्ट उदय जग आरति हेतू। जथा प्रसिद्ध अधम ग्रह केतू ॥ संत उदय संतत सुखकारी। बिस्व सुखद जिमि इंदु तमारी ॥ परम धर्म श्रुति बिदित अहिंसा। पर निंदा सम अघ न गरीसा ॥ हर गुर निंदक दादुर होई। जन्म सहस्र पाव तन सोई ॥ द्विज निंदक बहु नरक भोगकरि। जग जनमइ बायस सरीर धरि ॥ सुर श्रुति निंदक जे अभिमानी। रौरव नरक परहिं ते प्रानी ॥ होहिं उलूक संत निंदा रत। मोह निसा प्रिय ग्यान भानु गत ॥ सब के निंदा जे जड़ करहीं। ते चमगादुर होइ अवतरहीं ॥ सुनहु तात अब मानस रोगा। जिन्ह ते दुख पावहिं सब लोगा ॥ मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला। तिन्ह ते पुनि उपजहिं बहु सूला ॥ काम बात कफ लोभ अपारा। क्रोध पित्त नित छाती जारा ॥ प्रीति करहिं जौं तीनिउ भाई। उपजइ सन्यपात दुखदाई ॥ बिषय मनोरथ दुर्गम नाना। ते सब सूल नाम को जाना ॥ ममता दादु कंडु इरषाई। हरष बिषाद गरह बहुताई ॥ पर सुख देखि जरनि सोइ छई। कुष्ट दुष्टता मन कुटिलई ॥ अहंकार अति दुखद डमरुआ। दंभ कपट मद मान नेहरुआ ॥ तृस्ना उदरबृद्धि अति भारी। त्रिबिध ईषना तरुन तिजारी ॥ जुग बिधि ज्वर मत्सर अबिबेका। कहँ लागि कहौं कुरोग अनेका ॥

दोहा — मूल पाठ

एक ब्याधि बस नर मरहिं ए असाधि बहु ब्याधि। पीड़हिं संतत जीव कहुँ सो किमि लहै समाधि ॥ १२१(क) ॥

दोहा — मूल पाठ

नेम धर्म आचार तप ग्यान जग्य जप दान। भेषज पुनि कोटिन्ह नहिं रोग जाहिं हरिजान ॥ १२१(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

गरुड़ दुर्लभ शरीर, बड़े दुख-सुख, संत-असंत, पुण्य-पाप और मानस-रोग पूछते हैं। उत्तर में मनुष्यजन्म दुर्लभ, दरिद्रता बड़ा दुख, संत-मिलन बड़ा सुख, अहिंसा धर्म और निंदा पाप है। मोह से उपजते काम, लोभ, क्रोध, ईर्ष्या आदि को रोगों के रूपक से समझाया गया है। ये आध्यात्मिक विकारों की उपमाएँ हैं।

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उत्तरकाण्ड · क्रमांक 122

सद्गुरु, संयम और भक्ति की संजीवनी

चौपाइयाँ — मूल पाठ

एहि बिधि सकल जीव जग रोगी। सोक हरष भय प्रीति बियोगी ॥ मानस रोग कछुक मैं गाए। हहिं सब कें लखि बिरलेन्ह पाए ॥ जाने ते छीजहिं कछु पापी। नास न पावहिं जन परितापी ॥ बिषय कुपथ्य पाइ अंकुरे। मुनिहु हृदयँ का नर बापुरे ॥ राम कृपाँ नासहि सब रोगा। जौं एहि भाँति बनै संयोगा ॥ सदगुर बैद बचन बिस्वासा। संजम यह न बिषय कै आसा ॥ रघुपति भगति सजीवन मूरी। अनूपान श्रद्धा मति पूरी ॥ एहि बिधि भलेहिं सो रोग नसाहीं। नाहिं त जतन कोटि नहिं जाहीं ॥ जानिअ तब मन बिरुज गोसाँई। जब उर बल बिराग अधिकाई ॥ सुमति छुधा बाढ़इ नित नई। बिषय आस दुर्बलता गई ॥ बिमल ग्यान जल जब सो नहाई। तब रह राम भगति उर छाई ॥ सिव अज सुक सनकादिक नारद। जे मुनि ब्रह्म बिचार बिसारद ॥ सब कर मत खगनायक एहा। करिअ राम पद पंकज नेहा ॥ श्रुति पुरान सब ग्रंथ कहाहीं। रघुपति भगति बिना सुख नाहीं ॥ कमठ पीठ जामहिं बरु बारा। बंध्या सुत बरु काहुहि मारा ॥ फूलहिं नभ बरु बहुबिधि फूला। जीव न लह सुख हरि प्रतिकूला ॥ तृषा जाइ बरु मृगजल पाना। बरु जामहिं सस सीस बिषाना ॥ अंधकारु बरु रबिहि नसावै। राम बिमुख न जीव सुख पावै ॥ हिम ते अनल प्रगट बरु होई। बिमुख राम सुख पाव न कोई ॥

दोहा — मूल पाठ

बारि मथें घृत होइ बरु सिकता ते बरु तेल। बिनु हरि भजन न भव तरिअ यह सिद्धांत अपेल ॥ १२२(क) ॥

दोहा — मूल पाठ

मसकहि करइ बिंरंचि प्रभु अजहि मसक ते हीन। अस बिचारि तजि संसय रामहि भजहिं प्रबीन ॥ १२२(ख) ॥

श्लोक — मूल पाठ

विनिश्चितं वदामि ते न अन्यथा वचांसि मे। हरिं नरा भजन्ति येऽतिदुस्तरं तरन्ति ते ॥ १२२(ग) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

आध्यात्मिक रोग-रूपक में सद्गुरु वैद्य, उनके वचन में विश्वास, विषयों से संयम, भक्ति संजीवनी और श्रद्धा उसका अनुपान हैं। वैराग्य, सद्बुद्धि और ज्ञान से मन निर्मल होता है। काकभुशुण्डि दृढ़ सिद्धांत कहते हैं कि हरिभजन बिना संसार का बंधन नहीं छूटता।

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उत्तरकाण्ड · क्रमांक 123

संत-समागम की कृतज्ञता

चौपाइयाँ — मूल पाठ

कहेउँ नाथ हरि चरित अनूपा। ब्यास समास स्वमति अनुरुपा ॥ श्रुति सिद्धांत इहइ उरगारी। राम भजिअ सब काज बिसारी ॥ प्रभु रघुपति तजि सेइअ काही। मोहि से सठ पर ममता जाही ॥ तुम्ह बिग्यानरूप नहिं मोहा। नाथ कीन्हि मो पर अति छोहा ॥ पूछिहुँ राम कथा अति पावनि। सुक सनकादि संभु मन भावनि ॥ सत संगति दुर्लभ संसारा। निमिष दंड भरि एकउ बारा ॥ देखु गरुड़ निज हृदयँ बिचारी। मैं रघुबीर भजन अधिकारी ॥ सकुनाधम सब भाँति अपावन। प्रभु मोहि कीन्ह बिदित जग पावन ॥

दोहा — मूल पाठ

आजु धन्य मैं धन्य अति जद्यपि सब बिधि हीन। निज जन जानि राम मोहि संत समागम दीन ॥ १२३(क) ॥

दोहा — मूल पाठ

नाथ जथामति भाषेउँ राखेउँ नहिं कछु गोइ। चरित सिंधु रघुनायक थाह कि पावइ कोइ ॥ १२३(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

काकभुशुण्डि कहते हैं कि उन्होंने अपनी बुद्धि के अनुसार कथा कही है; राम के चरित्र-सागर की थाह कौन पाए? संत-समागम को वे अपनी पात्रता का गर्व नहीं, राम की कृपा मानते हैं। उसी से वे स्वयं को धन्य कहते हैं।

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उत्तरकाण्ड · क्रमांक 124

राम की अद्वितीय करुणा

चौपाइयाँ — मूल पाठ

सुमिरि राम के गुन गन नाना। पुनि पुनि हरष भुसुंडि सुजाना ॥ महिमा निगम नेति करि गाई। अतुलित बल प्रताप प्रभुताई ॥ सिव अज पूज्य चरन रघुराई। मो पर कृपा परम मृदुलाई ॥ अस सुभाउ कहुँ सुनउँ न देखउँ। केहि खगेस रघुपति सम लेखउँ ॥ साधक सिद्ध बिमुक्त उदासी। कबि कोबिद कृतग्य संन्यासी ॥ जोगी सूर सुतापस ग्यानी। धर्म निरत पंडित बिग्यानी ॥ तरहिं न बिनु सेएँ मम स्वामी। राम नमामि नमामि नमामी ॥ सरन गएँ मो से अघ रासी। होहिं सुद्ध नमामि अबिनासी ॥

दोहा — मूल पाठ

जासु नाम भव भेषज हरन घोर त्रय सूल। सो कृपालु मोहि तो पर सदा रहउ अनुकूल ॥ १२४(क) ॥

दोहा — मूल पाठ

सुनि भुसुंडि के बचन सुभ देखि राम पद नेह। बोलेउ प्रेम सहित गिरा गरुड़ बिगत संदेह ॥ १२४(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

काकभुशुण्डि प्रभु की असीम महिमा और अपने प्रति कोमल कृपा स्मरण करते हैं। साधक और ज्ञानी भी उनकी सेवा बिना पार नहीं होते; शरणागति पापी को भी निर्मल करती है। वे राम की अनुकूलता का आशीर्वाद गरुड़ को देते हैं।

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उत्तरकाण्ड · क्रमांक 125

संत का हृदय और गरुड़ की विदाई

चौपाइयाँ — मूल पाठ

मै कृत्कृत्य भयउँ तव बानी। सुनि रघुबीर भगति रस सानी ॥ राम चरन नूतन रति भई। माया जनित बिपति सब गई ॥ मोह जलधि बोहित तुम्ह भए। मो कहँ नाथ बिबिध सुख दए ॥ मो पहिं होइ न प्रति उपकारा। बंदउँ तव पद बारहिं बारा ॥ पूरन काम राम अनुरागी। तुम्ह सम तात न कोउ बड़भागी ॥ संत बिटप सरिता गिरि धरनी। पर हित हेतु सबन्ह कै करनी ॥ संत हृदय नवनीत समाना। कहा कबिन्ह परि कहै न जाना ॥ निज परिताप द्रवइ नवनीता। पर दुख द्रवहिं संत सुपुनीता ॥ जीवन जन्म सुफल मम भयऊ। तव प्रसाद संसय सब गयऊ ॥ जानेहु सदा मोहि निज किंकर। पुनि पुनि उमा कहइ बिहंगबर ॥

दोहा — मूल पाठ

तासु चरन सिरु नाइ करि प्रेम सहित मतिधीर। गयउ गरुड़ बैकुंठ तब हृदयँ राखि रघुबीर ॥ १२५(क) ॥

दोहा — मूल पाठ

गिरिजा संत समागम सम न लाभ कछु आन। बिनु हरि कृपा न होइ सो गावहिं बेद पुरान ॥ १२५(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

गरुड़ कथा से कृतार्थ होकर गुरु के चरणों को प्रणाम करते हैं। संत का हृदय मक्खन से भी बढ़कर है: मक्खन अपने ताप से, संत दूसरे के दुख से पिघलते हैं। राम को हृदय में रखकर गरुड़ बैकुंठ जाते हैं। शिव सत्संग को सर्वोच्च लाभ बताते हैं।

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उत्तरकाण्ड · क्रमांक 126

सभी साधनों का फल हरिभक्ति

चौपाइयाँ — मूल पाठ

कहेउँ परम पुनीत इतिहासा। सुनत श्रवन छूटहिं भव पासा ॥ प्रनत कल्पतरु करुना पुंजा। उपजइ प्रीति राम पद कंजा ॥ मन क्रम बचन जनित अघ जाई। सुनहिं जे कथा श्रवन मन लाई ॥ तीर्थाटन साधन समुदाई। जोग बिराग ग्यान निपुनाई ॥ नाना कर्म धर्म ब्रत दाना। संजम दम जप तप मख नाना ॥ भूत दया द्विज गुर सेवकाई। बिद्या बिनय बिबेक बड़ाई ॥ जहँ लगि साधन बेद बखानी। सब कर फल हरि भगति भवानी ॥ सो रघुनाथ भगति श्रुति गाई। राम कृपाँ काहूँ एक पाई ॥

दोहा — मूल पाठ

मुनि दुर्लभ हरि भगति नर पावहिं बिनहिं प्रयास। जे यह कथा निरंतर सुनहिं मानि बिस्वास ॥ १२६ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

शिव कहते हैं कि मन लगाकर कथा सुनने से मन-वचन-कर्म के पाप घटते और रामचरणों में प्रेम होता है। तीर्थ, ज्ञान, योग, दया, सेवा, विनय और अन्य साधनों का फल भक्ति है। विश्वास सहित निरंतर कथा सुनने से वह सुलभ होती है।

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उत्तरकाण्ड · क्रमांक 127

रामप्रेम से जीवन की धन्यता

चौपाइयाँ — मूल पाठ

सोइ सर्बग्य गुनी सोइ ग्याता। सोइ महि मंडित पंडित दाता ॥ धर्म परायन सोइ कुल त्राता। राम चरन जा कर मन राता ॥ नीति निपुन सोइ परम सयाना। श्रुति सिद्धांत नीक तेहिं जाना ॥ सोइ कबि कोबिद सोइ रनधीरा। जो छल छाड़ि भजइ रघुबीरा ॥ धन्य देस सो जहँ सुरसरी। धन्य नारि पतिब्रत अनुसरी ॥ धन्य सो भूपु नीति जो करई। धन्य सो द्विज निज धर्म न टरई ॥ सो धन धन्य प्रथम गति जाकी। धन्य पुन्य रत मति सोइ पाकी ॥ धन्य घरी सोइ जब सतसंगा। धन्य जन्म द्विज भगति अभंगा ॥

दोहा — मूल पाठ

सो कुल धन्य उमा सुनु जगत पूज्य सुपुनीत। श्रीरघुबीर परायन जेहिं नर उपज बिनीत ॥ १२७ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

राम में रमा मन ही ज्ञान, गुण और नीति को सार्थक करता है। निष्कपट भजन वास्तविक चतुराई है। धर्मयुक्त शासन, सत्कर्म, सदुपयोगी धन और सत्संग की घड़ी धन्य हैं। विनयी रामभक्त जिस कुल में जन्मे, वह भी पवित्र माना गया है।

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उत्तरकाण्ड · क्रमांक 128

कथा का आदरपूर्वक श्रवण

चौपाइयाँ — मूल पाठ

मति अनुरूप कथा मैं भाषी। जद्यपि प्रथम गुप्त करि राखी ॥ तव मन प्रीति देखि अधिकाई। तब मैं रघुपति कथा सुनाई ॥ यह न कहिअ सठही हठसीलहि। जो मन लाइ न सुन हरि लीलहि ॥ कहिअ न लोभिहि क्रोधहि कामिहि। जो न भजइ सचराचर स्वामिहि ॥ द्विज द्रोहिहि न सुनाइअ कबहूँ। सुरपति सरिस होइ नृप जबहूँ ॥ राम कथा के तेइ अधिकारी। जिन्ह कें सतसंगति अति प्यारी ॥ गुर पद प्रीति नीति रत जेई। द्विज सेवक अधिकारी तेई ॥ ता कहँ यह बिसेष सुखदाई। जाहि प्रानप्रिय श्रीरघुराई ॥

दोहा — मूल पाठ

राम चरन रति जो चह अथवा पद निर्बान। भाव सहित सो यह कथा करउ श्रवन पुट पान ॥ १२८ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

शिव प्रेम देखकर कथा सुनाने का कारण बताते हैं। हठ, उपेक्षा, लोभ और द्वेष से कथा का लाभ नहीं लिया जाता। सत्संग, गुरुप्रेम और नीति में रुचि रखने वाला उपयुक्त श्रोता है। रामप्रेम या मुक्ति चाहने वाला भाव से कथा का अमृत ग्रहण करे।

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उत्तरकाण्ड · क्रमांक 129

सात सोपान और पार्वती की कृतार्थता

चौपाइयाँ — मूल पाठ

राम कथा गिरिजा मैं बरनी। कलि मल समनि मनोमल हरनी ॥ संसृति रोग सजीवन मूरी। राम कथा गावहिं श्रुति सूरी ॥ एहि महँ रुचिर सप्त सोपाना। रघुपति भगति केर पंथाना ॥ अति हरि कृपा जाहि पर होई। पाउँ देइ एहिं मारग सोई ॥ मन कामना सिद्धि नर पावा। जे यह कथा कपट तजि गावा ॥ कहहिं सुनहिं अनुमोदन करहीं। ते गोपद इव भवनिधि तरहीं ॥ सुनि सब कथा हृदयँ अति भाई। गिरिजा बोली गिरा सुहाई ॥ नाथ कृपाँ मम गत संदेहा। राम चरन उपजेउ नव नेहा ॥

दोहा — मूल पाठ

मैं कृतकृत्य भइउँ अब तव प्रसाद बिस्वेस। उपजी राम भगति दृढ़ बीते सकल कलेस ॥ १२९ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

रामकथा के सात सोपान भक्ति के मार्ग हैं। निष्कपट गायन, श्रवण और अनुमोदन से संसार पार करना सुलभ होता है। पूरी कथा सुनकर पार्वती कहती हैं कि उनका संदेह मिटा, नया रामप्रेम और दृढ़ भक्ति मिली तथा क्लेश दूर हुए।

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उत्तरकाण्ड · क्रमांक 130

मानस का समापन और तुलसीदास की प्रार्थना

चौपाइयाँ — मूल पाठ

यह सुभ संभु उमा संबादा। सुख संपादन समन बिषादा ॥ भव भंजन गंजन संदेहा। जन रंजन सज्जन प्रिय एहा ॥ राम उपासक जे जग माहीं। एहि सम प्रिय तिन्ह के कछु नाहीं ॥ रघुपति कृपाँ जथामति गावा। मैं यह पावन चरित सुहावा ॥ एहिं कलिकाल न साधन दूजा। जोग जग्य जप तप ब्रत पूजा ॥ रामहि सुमिरिअ गाइअ रामहि। संतत सुनिअ राम गुन ग्रामहि ॥ जासु पतित पावन बड़ बाना। गावहिं कबि श्रुति संत पुराना ॥ ताहि भजहि मन तजि कुटिलाई। राम भजें गति केहिं नहिं पाई ॥

छंद — मूल पाठ

पाई न केहिं गति पतित पावन राम भजि सुनु सठ मना। गनिका अजामिल ब्याध गीध गजादि खल तारे घना ॥ आभीर जमन किरात खस स्वपचादि अति अघरूप जे। कहि नाम बारक तेपि पावन होहिं राम नमामि ते ॥ १ ॥ रघुबंस भूषन चरित यह नर कहहिं सुनहिं जे गावहीं। कलि मल मनोमल धोइ बिनु श्रम राम धाम सिधावहीं ॥ सत पंच चौपाईं मनोहर जानि जो नर उर धरै। दारुन अबिद्या पंच जनित बिकार श्रीरघुबर हरै ॥ २ ॥ सुंदर सुजान कृपा निधान अनाथ पर कर प्रीति जो। सो एक राम अकाम हित निर्बानप्रद सम आन को ॥ जाकी कृपा लवलेस ते मतिमंद तुलसीदासहूँ। पायो परम बिश्रामु राम समान प्रभु नाहीं कहूँ ॥ ३ ॥

दोहा — मूल पाठ

मो सम दीन न दीन हित तुम्ह समान रघुबीर। अस बिचारि रघुबंस मनि हरहु बिषम भव भीर ॥ १३०(क) ॥

दोहा — मूल पाठ

कामिहि नारि पिआरि जिमि लोभहि प्रिय जिमि दाम। तिमि रघुनाथ निरंतर प्रिय लागहु मोहि राम ॥ १३०(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ

शिव-पार्वती का संवाद शोक और संशय हरने वाला है। तुलसीदास रामकृपा से कथा गाने की विनय करते हैं। रामनाम से विविध जीवों के पवित्र होने का स्मरण है। अंतिम प्रार्थना में वे स्वयं को दीन मानकर संसार-भय हरने और राम सदा अत्यंत प्रिय लगने का वर माँगते हैं।

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॥ उत्तरकाण्ड सम्पूर्ण ॥

श्लोक-यत्पूर्वं प्रभुणा कृतं सुकविना श्रीशम्भुना दुर्गमं श्रीमद्रामपदाब्जभक्तिमनिशं प्राप्त्यै तु रामायणम्। मत्वा तद्रघुनाथनामनिरतं स्वान्तस्तमःशान्तये भाषाबद्धमिदं चकार तुलसीदासस्तथा मानसम् ॥ १ ॥ पुण्यं पापहरं सदा शिवकरं विज्ञानभक्तिप्रदं मायामोहमलापहं सुविमलं प्रेमाम्बुपूरं शुभम्। श्रीमद्रामचरित्रमानसमिदं भक्त्यावगाहन्ति ये ते संसारपतङ्गघोरकिरणैर्दह्यन्ति नो मानवाः ॥ २ ॥ मासपारायण, तीसवाँ विश्राम नवान्हपारायण, नवाँ विश्राम इति श्रीमद्रामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने सप्तमः सोपानः समाप्तः। (उत्तरकाण्ड समाप्त) आरति श्रीरामायनजी की। कीरति कलित ललित सिय पी की ॥ गावत ब्रह्मादिक मुनि नारद। बालमीक बिग्यान बिसारद। सुक सनकादि सेष अरु सारद। बरनि पवनसुत कीरति नीकी ॥ १ ॥ गावत बेद पुरान अष्टदस। छओ सास्त्र सब ग्रंथन को रस। मुनि जन धन संतन को सरबस। सार अंस संमत सबही की ॥ २ ॥ गावत संतत संभु भवानी। अरु घटसंभव मुनि बिग्यानी। ब्यास आदि कबिबर्ज बखानी। कागभुसुंडि गरुड के ही की ॥ ३ ॥ कलिमल हरनि बिषय रस फीकी। सुभग सिंगार मुक्ति जुबती की। दलन रोग भव मूरि अमी की। तात मात सब बिधि तुलसी की ॥ ४ ॥

समापन श्लोकों का सरल अर्थ: शिव द्वारा रचित रामायण से प्रेरित होकर तुलसीदास ने अपने अंतःकरण का अंधकार मिटाने और रामचरणों की भक्ति के लिए यह मानस लोकभाषा में रचा। यह पवित्र कथा प्रेमरूपी जल से भरा सरोवर है; श्रद्धा से इसमें अवगाहन करने वाले संसार के ताप से रक्षा पाते हैं।

आरती का समेकित अर्थ: रामायण की आरती करते हुए ब्रह्मा, नारद, वाल्मीकि, शिव-पार्वती और अन्य मुनियों द्वारा गाई उसकी कीर्ति का स्मरण है। इसे शास्त्रों का सार, संतों का आश्रय, कलियुग का मल हरने वाली और माता-पिता समान हितकारी कहा गया है।

श्रीरामचरितमानस का सातवाँ और अंतिम सोपान यहाँ समाप्त होता है।

मूल पाठ और अर्थ के बारे में

मूल रचना गोस्वामी तुलसीदास की है। मूल पाठ के लिए देवनागरी डिजिटल संस्करण और संदिग्ध स्थानों के मिलान के लिए मुद्रित संस्करण का संदर्भ लिया गया है। संस्करणों में वर्तनी और पाठांतर मिल सकते हैं। हिंदी अर्थ भक्ति भावना के लिए स्वतंत्र रूप से लिखे गए हैं।

डिजिटल मूल पाठ का संदर्भ · मुद्रित मूल पाठ का संदर्भ

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॥ जय श्री सीताराम ॥
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